Ashfaquallah Khan and Kakori conspiracy | एक देशभक्त मुसलमान की कहानी | Matrubhoomi

अमर शहीद अशफाक उल्ला खां भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख क्रांतिकारी थे। उन्होंने रामप्रसाद बिस्मिल के साथ मिलकर हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन और ऐतिहासिक काकोरी ट्रेन एक्शन में अहम भूमिका निभाई। दिसंबर 1927 में फांसी पाने वाले अशफाक और बिस्मिल की अटूट मित्रता आज भी हिंदू-मुस्लिम एकता तथा अदम्य देशभक्ति का अमर प्रतीक है।
न चाहूं मान दुनिया में, न चाहूं स्वर्ग को जाना, मुझे वर दे यही माता रहूं भारत पे दीवाना
करुं मैं कौम की सेवा पड़े चाहे करोड़ों दुख, अगर फ़िर जन्म लूं आकर तो भारत में ही हो आना।
ये बस एक कविता नहीं, ये एक हौसला है। ये पंक्तियां नहीं ये जलजला है। वो जलजला जिसने अंग्रेजी हूकूमत के पांव तले जमीन खिसका दी थी। ये किस्सा अमर शहीद अशफाक उल्लाह खां वारसी का है। शहीदों की कतार में अशफाक उल्ला खां का नाम भी वतन के सजदे का हकदार होगा। पहले उर्दू की शायरी में दिलचस्पी रखने वाले अशफाक जब बिस्मिल से मिले तो उनकी कलम की स्याही भी लाल होने लगी। भारत के स्वाधीनता आंदोलन और काकोरी कांड में बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले शख्स अशफाक उल्ला खां शुरुआत में महात्मा गांधी की विचारधारा को काफी पसंद करते थे लेकिन जब चौरी-चौरा की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो अशफाक उल्ला खां का रुझान क्रांतिकारियों की ओर हो गया था और उस वक्त देश में चल रहे आंदोलनों को और क्रांतिकारी घटनाओं ने अशफाक को इस तरह प्रभावित किया कि उनके बारे में भी क्रांतिकारी भावना दिखने लगे देश इस रणबांकुरे के योगदान को कभी नहीं भूल सकता। आज मातृभूमि में बात करेंगे अशफाक उल्ला खां के जीवन की, काकोरी कांड के बारे में भी जानेंगे।
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शुरुआती जीवन
अशफाक उल्लाह खां का जन्म 26 अक्तूबर 1900 को उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर में हुआ था उनके पिता का नाम मोहम्मद शफीकुल्लाह खां और माता का नाम मजहूरुन्निशां बेगम था। कि वह पठान परिवार से ताल्लुक रखते थे। अशफाक छह भाई-बहनों में सबसे छोटे थे उन्हें बचपन से ही देश के लिए कुछ करने का जुनून था। बचपन में उका मन पढ़ाई में नहीं लगता था। उनकी रुचि तैराकी घुड़सवारी निशानेबाजी में अधिक थी। कि उनकी कविताएं लिखने का काफी शौक था जिसमें वह अपना उपनाम हसरत लिखा करते थे। अशफाक को विदेशी दासता, छात्र जीवन से ही खलती थी कि देश के लिए कुछ करने को बेताब रहने लगे। देश की भलाई के लिए किए गए आंदोलनों के बारे में विशेष रूप से ही रुचि लेकर जानकारी जुटाते थे। किशोर से जवानी की दहलीज पर खड़े अशफाक शुरुआत में महात्मा गांधी की विचारधारा को काफी पसंद करते थे। लेकिन जब चोरा चोरी की घटना के बाद महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तो अशफाक उल्ला खां का रुझान क्रांतिकारियों की ओर हो गया था। देश में चल रहे आंदोलनों और क्रांतिकारी घटनाओं से प्रभावित अशफाक उल्ला खां के मन में भी क्रांतिकारी भावना जागे। अशफाक उल्ला खां किसी क्रांतिकारी दल में शामिल होना चाहते थे। वे रामप्रसाद बिस्मिल से मिलना चाहते थे। कई बार मिलने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। आखिरकार 1920 में बिस्मिल शाहजहां आए जहां अशफाक उल्लाह खां की बिस्मिल से पहली मुलाकात हुई। जब 1922 में रामप्रसाद बिस्मिल ने असहयोग आंदोलन को लेकर एक बैठक बुलाई तो उसमें अशफाक उल्ला खां भी आए। वहां बिस्मल उनसे बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने उन्हें अपनी पार्टी मां त्रिवेदी का सक्रिय सदस्य बना लिया। यहीं से उनकी जिंदगी का नया अध्याय शुरू हुआ। वे शायर के साथ-साथ कौम के लिए मर मिटने वाले क्रांतिकारी बन गए।
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अशफाक की बिस्मिल को सलाह
अशफाक उल्लाह खां बहुत दूरदर्शी थे। उनका मानना था कि क्रांतिकारी गतिविधियों के साथ-साथ कांग्रेस पार्टी में पैठ बना कर रखना भी जरूरी है तभी आज़ाद मुल्क के लक्ष्य को हासिल किया जा सकता है कि उन्होंने राम प्रसाद बिस्मिल को इसके लिए सलाह भी दी। अशफाक और बिस्मिल के साथ ही शाहजहांपुर के कई नौजवान कांग्रेस में शामिल हुए। 1921 में कांग्रेस के अहमदाबाद अधिवेशन में बिस्मिल के साथ अशफाक भी शामिल हुए। उनकी मुलाकात मौलाना हसरत मोहानी से हुई जो उस वक्त कांग्रेस के बड़े नेताओं में से एक थे। हसरत मोहानी ने एक अधिवेशन में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव रखा। महात्मा गांधी ने इसका विरोध किया। इस पर शाहजहांपुर के कांग्रेसी स्वयंसेवकों ने गांधी जी का विरोध किया। इस तरह जब 1922 में गांधी जी ने असहयोग आंदोलन वापस ले लिया तब गया अधिवेशन में कांग्रेस के स्वयंसेवकों ने इसका जमकर विरोध किया था। बाद में 1922 में गया कांग्रेस में दो दल बन गए। जिसमें इसे एक दल स्वराज पार्टी और दूसरा क्रांतिकारी पार्टी का था। इसके बाद अशफाक और बिस्मिल क्रांतिकारी पार्टी के कामों में शामिल हो गए।
काकोरी का ऐतिहासिक महत्व
देश के इतिहास में काकोरी कांड एक बेहद ही महत्वपूर्ण घटना है। इस कांड का उद्देश्य अंग्रेजी शासन के विरूद्ध सरकारी खजाना लूटना और उन पैसों से हथियार खरीदना था। इतिहासकारों ने काकोरी कांड को बहुत ज्यादा अहमियत नहीं दी। लेकिन यही वो घटना है जिससे देश में क्रांतिकारियों के प्रति लोगों का नजरिया बदलने का काम किया। 9 अगस्त की तारीख का संबंध काकोरी ट्रेन एक्शन से है। इसी दिन रामप्रसाद बिस्मिल, चंद्रशेखर आजाद, अश्फाक उल्लाह खान और उनके सात साथियों ने मिलकर काकोरी की घटना को अंजाम दिया था। क्रांतिकारी संगठन के दस सदस्यों से काकोरी स्टेशन से सहारनपुर पैसेंजर ट्रेन में प्रवेश किया। जैसे ही ट्रेन स्टेशन से आगे चली। बिस्मिल ने ट्रेन की चेन खींच दी। चंद्रशेखर आजाद, अश्फाक उल्लाह खान, राजेंद्र नाथ भी ट्रेन में मौजूद थे। इन क्रांतिकारियों ने सरकारी धनराशी को अपने कब्जे में ले लिया। इस घटना से ये बताने की कोशिश की गई कि अब अंग्रेजों को भारत छोड़ने का वक्त आ गया है। अंग्रेजी हुकूमत में अंग्रेजों को ही मिली चुनौती से वे परेशान हो गए थे। करीब 50 गिरफ्तारियां की गई। इसके बाद दिसंबर 1927 में क्रांतिकारी रामप्रसाद बिस्मिल अश्फाक उल्लाह खान, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई। लखनऊ में काकोरी शहीद स्मारक भी बनाया गया है जो कि काकोरी रेलवे स्टेशन से मात्र 2 किलोमीटर की दूरी पर है। अशफाक उल्ला खां को शाहजहांपुर में उनके पुश्तैनी मकान के सामने वाले बगीचे में दफनाया गया। उनके मजार पर संगमरमर के पत्थर पर अशफाक उल्ला खां की ही कहीं पंक्तियां ज़िंदगी बाद-ए-फ़ना तुझको मिलेगी हसरत, तेरा जीना तेरे मरने की बदौलत होगा लिखी गई।
हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन से जुड़ाव
अशफाकुल्ला खान 1924 में स्थापित 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) के एक सक्रिय सदस्य थे।
इस संगठन का उद्देश्य सशस्त्र संघर्ष के माध्यम से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकना और एक स्वतंत्र तथा लोकतांत्रिक भारत की स्थापना करना था। HRA समानता, न्याय और सार्वभौमिक अधिकारों पर आधारित एक राष्ट्र बनाने में विश्वास रखता था, जैसा कि इसके घोषणापत्र 'द रिवोल्यूशनरी' में बताया गया था। अशफाकुल्ला खान ने संगठन को मजबूत करने, गतिविधियों की योजना बनाने और दूसरों को इस आंदोलन से जुड़ने के लिए प्रेरित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
बाद में, यह संगठन व्यापक वैचारिक लक्ष्यों के साथ 'हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HSRA) के रूप में विकसित हुआ।
राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाकुल्ला खान की जोड़ी
अशफाकुल्ला खान की राम प्रसाद बिस्मिल के साथ गहरी दोस्ती और कामकाजी रिश्ते थे। बिस्मिल उस दौर के एक प्रमुख क्रांतिकारी थे। उनके बीच का यह रिश्ता आपसी सम्मान, एक जैसी सोच और भारत की आज़ादी के प्रति समर्पण पर टिका था। उन्होंने मिलकर क्रांतिकारी गतिविधियों को संगठित करने में अहम भूमिका निभाई, जिसमें 'काकोरी कांड' भी शामिल था। उनकी दोस्ती को हिंदू-मुस्लिम एकता के एक सशक्त उदाहरण के रूप में याद किया जाता है, जो यह दिखाता है कि अलग-अलग पृष्ठभूमि के लोग एक साझा राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए एकजुट हो सकते हैं।
आधुनिक भारत में अशफाकउल्ला खान की विरासत
अशफाक उल्ला खां को एक महान शहीद और राष्ट्रीय नायक के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने भारत की आज़ादी के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए। उनकी कहानी आज भी छात्रों, युवाओं और नागरिकों को सच्चाई, साहस और न्याय के पक्ष में खड़े होने के लिए प्रेरित करती है। उन्हें एकता और भाईचारे के प्रतीक के रूप में देखा जाता है, खासकर इसलिए क्योंकि वे अलग-अलग समुदायों के क्रांतिकारियों के साथ गहराई से जुड़े हुए थे। पूरे भारत में स्मारकों, शैक्षिक सामग्री और ऐतिहासिक सम्मान के माध्यम से उनके योगदान को याद किया जाता है। उनका जीवन हमें देशभक्ति, एकता और सही के लिए लड़ने के साहस का महत्व सिखाता है।
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