ज्ञानेश कुमार पर सवाल उठाने वालों को चुनाव आयोग ने 'मिलकर' दिया करारा जवाब! आरोपों की निकाल दी हवा

एक बुनियादी बात समझना जरूरी है। किसी फाइल पर किसी अधिकारी या निर्वाचन आयुक्त की टिप्पणी, सवाल अथवा सुझाव दर्ज होने का अर्थ अपने आप यह नहीं होता कि आयोग ने अंतिम निर्णय भी उसी टिप्पणी के आधार पर लिया।
चुनाव आयोग पर सवाल उठाना विपक्ष का लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन सवालों की आड़ में संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर लगातार हमला करना और तथ्यों के सामने आने के बाद भी राजनीतिक आरोपों की धार बनाए रखना लोकतांत्रिक विमर्श की स्वस्थ परंपरा नहीं हो सकती। हम आपको बता दें कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में काम कर रहे भारतीय निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने हलफनामे के जरिए उन आरोपों का जवाब दिया है, जिनके माध्यम से आयोग की निर्णय प्रक्रिया और विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की निष्पक्षता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। आयोग का पक्ष सामने आने के बाद अब इस पूरे विवाद को केवल राजनीतिक आरोपों के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। दस्तावेज क्या कहते हैं, कानून क्या कहता है और अदालत के सामने कौन-सी दलीलें रखी गई हैं, यह देखना भी उतना ही जरूरी है।
हम आपको यह भी बता दें कि आज इस मामले पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के हलफनामे पर जवाब दाखिल करने के लिए याचिकाकर्ता राकेश कुमार सिंह को 10 दिन का समय दिया है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई दिवाली की छुट्टियों के बाद करने का फैसला किया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर को होने की संभावना है। इसका अर्थ यह है कि अदालत ने अभी न तो आयोग के पक्ष को अंतिम रूप से स्वीकार किया है और न ही याचिकाकर्ताओं के आरोपों को सही ठहराया है। अदालत दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर मामले को आगे बढ़ाएगी।
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दूसरी ओर, आयोग के हलफनामे का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि उसने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि एसआईआर से जुड़े तीन प्रमुख आदेश 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से जारी किए गए थे। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों निर्वाचन आयुक्तों की सहमति से ही इन निर्णयों को अंतिम रूप दिया गया। हलफनामे को भी ज्ञानेश कुमार, सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी की सर्वसम्मति से मंजूरी दी गई।
साथ ही यहां एक बुनियादी बात समझना जरूरी है। किसी फाइल पर किसी अधिकारी या निर्वाचन आयुक्त की टिप्पणी, सवाल अथवा सुझाव दर्ज होने का अर्थ अपने आप यह नहीं होता कि आयोग ने अंतिम निर्णय भी उसी टिप्पणी के आधार पर लिया। आयोग ने अपने हलफनामे में इसी अंतर को स्पष्ट किया है। उसका कहना है कि फाइलें निर्धारित प्रक्रिया के तहत एक निर्वाचन आयुक्त से दूसरे निर्वाचन आयुक्त और फिर मुख्य चुनाव आयुक्त के पास जाती हैं। जरूरी मामलों में इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी भी ली जा सकती है, जिसे बाद में रिकॉर्ड पर दर्ज किया जाता है। आयोग का तर्क है कि आंतरिक विचार-विमर्श को अंतिम निर्णय के साथ मिलाकर देखना उचित नहीं है।
यह दलील उन आरोपों के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिनमें दावा किया गया था कि एसआईआर से जुड़े 14 निर्णय दोनों निर्वाचन आयुक्तों की आपत्तियों के बावजूद आयोग के नाम पर लिए गए। लेकिन आयोग ने इन आरोपों के आधार को चुनौती देते हुए कहा है कि समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट अपने आप में आरोपों का निर्णायक कानूनी प्रमाण नहीं हो सकती। अब याचिकाकर्ता को अपना जवाब दाखिल करना है और अदालत को यह तय करना है कि उपलब्ध रिकॉर्ड से क्या निष्कर्ष निकलता है।
दूसरा बड़ा मुद्दा फॉर्म-6 को लेकर है, जिसका इस्तेमाल मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए किया जाता है। आयोग ने कहा है कि वैधानिक फॉर्म-6 में संशोधन नहीं किया गया। उसके मुताबिक, एसआईआर के दौरान मांगा गया अतिरिक्त घोषणा-पत्र अलग दस्तावेज है, जिसे मूल आवेदन-पत्र में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए। हालांकि आयोग ने यह स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया की प्रस्तुति से फॉर्म-6 में बदलाव होने का आभास पैदा हो सकता था। इसके बाद 21 अक्टूबर से ऑनलाइन प्रक्रिया को फॉर्म-6 और अलग एसआईआर घोषणा-पत्र में विभाजित करने की व्यवस्था किए जाने की बात भी कही गई।
यही वह बिंदु है जहां आयोग के पक्ष को संतुलित दृष्टि से देखना चाहिए। किसी प्रक्रिया को स्पष्ट करने के लिए उसमें सुधार करना प्रशासनिक जिम्मेदारी का हिस्सा है। यदि ऑनलाइन व्यवस्था से भ्रम पैदा हुआ था, तो उसे अलग करना उपयोगी कदम हो सकता है। लेकिन इससे यह निष्कर्ष अपने आप नहीं निकलता कि हर विवाद समाप्त हो गया। असली कसौटी यह है कि व्यवस्था कानून के अनुरूप है या नहीं और पात्र मतदाताओं को किसी प्रकार की परेशानी तो नहीं हो रही।
साथ ही आयोग ने मतदाता सूची के पुनरीक्षण पर भी अपना पक्ष रखा है। उसका कहना है कि जिन मतदाताओं का रिकॉर्ड पुरानी मतदाता सूचियों से नहीं मिल पाता, उनके घर जाकर बूथ स्तर के अधिकारी दस्तावेज एकत्र कर सकते हैं। ऐसे मतदाताओं को सामान्यतः सुनवाई के लिए बुलाने की जरूरत नहीं होगी और असाधारण मामलों में सुनवाई की जा सकती है। आयोग ने यह भी कहा है कि ECINet प्रणाली पर किसी मतदाता का नाम जोड़ने या हटाने के लिए संबंधित निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का आदेश आवश्यक है। इसके अतिरिक्त, तकनीकी व्यवस्था की जांच के लिए आईआईटी और भारतीय विज्ञान संस्थान के विशेषज्ञों को शामिल करने वाली समिति का उल्लेख किया गया है।
इन दलीलों से आयोग यह बताना चाहता है कि मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने के लिए निर्धारित प्रक्रियाएं और प्रशासनिक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। मतदाता सूची में मृत, स्थानांतरित या दोहरी प्रविष्टियों की पहचान करना आवश्यक है, लेकिन किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटना भी उतना ही गंभीर विषय है।
अब बात ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व की। किसी मुख्य चुनाव आयुक्त की कार्यक्षमता का फैसला इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि विपक्ष उनके कामकाज से संतुष्ट है या नहीं। असली प्रश्न यह है कि क्या निर्णय कानून के अनुरूप लिए जा रहे हैं, क्या उनका रिकॉर्ड उपलब्ध है और क्या मतदाता के अधिकार सुरक्षित हैं। आयोग का हलफनामा इन सवालों का जवाब देने का एक औपचारिक प्रयास है। यदि उसके तर्क न्यायिक परीक्षण में सही साबित होते हैं, तो यह उसके संस्थागत पक्ष को मजबूती देगा। वहीं, यदि किसी निर्णय में कानूनी खामी पाई जाती है, तो उसे सुधारना भी उसी संवैधानिक व्यवस्था का हिस्सा है जिसकी रक्षा आयोग करता है।
हम आपको यह भी बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्पष्ट किया था कि वह रिकॉर्ड की जांच करेगा और कानून के विपरीत पाए जाने वाले निर्णयों पर हस्तक्षेप कर सकता है। इसलिए इस मामले में न तो आयोग को अदालत से पहले क्लीन चिट दी जा सकती है और न ही केवल आरोपों के आधार पर उसे दोषी ठहराया जा सकता है। यही न्यायिक प्रक्रिया की खूबसूरती है।
बहरहाल, चुनाव आयोग किसी राजनीतिक दल का प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है। उसकी आलोचना होनी चाहिए तो प्रमाणों के साथ और उसका बचाव होना चाहिए तो तथ्यों के आधार पर। ज्ञानेश कुमार के नेतृत्व में आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा है। अब याचिकाकर्ता का जवाब और अदालत की अगली सुनवाई इस विवाद की दिशा तय करेंगे। लोकतंत्र के हित में सबसे जरूरी यही है कि राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर मतदाता के अधिकार, कानून की सर्वोच्चता और चुनाव आयोग की जवाबदेही को केंद्र में रखा जाए।
-नीरज कुमार दुबे
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