नेतन्याहू जिसे शर्म कहते थे, अब इजरायल में वही मुस्लिम शासन? मिट जाएगा इतिहास!

Netanyahu
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अभिनय आकाश । Oct 30 2026 12:39PM

इजराइल के 2026 संसदीय चुनावों में त्रिशंकु संसद बनने के बाद अरब पार्टियां किंगमेकर बनकर उभरी हैं। विपक्षी नेता गदी आइजेनकोट ने सरकार बनाने हेतु अरब गुट से संपर्क किया, जिस पर नेतन्याहू खेमे ने कड़ा विरोध जताया। वहीं अरब नेताओं ने नागरिक अधिकारों की शर्त पर समर्थन देने की बात कही है।

वो देश जिसे दुनिया एक कट्टर यहूदी राष्ट्र के रूप में जानती है, अब अपनी राजनीतिक चाबी उन अरब पार्टियों के हाथों में सौंपने जा रहा है जिन्हें वह कभी मुख्यधारा का हिस्सा मानता ही नहीं था। अक्टूबर 2026 के इजराइली संसदीय चुनाव के नतीजों ने ना सिर्फ इजराइल बल्कि पूरी दुनिया के भू राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया। 120 सीटों वाली इस संसद में ना तो बेंजामिन नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को बहुमत मिला और ना ही विपक्ष के नेता गदी आइजेनकोर्ट के मध्यम मार्गी गुट को बहुमत के जादुई आंकड़े यानी कि 61 सीटों से दोनों ही दूर रह गए और इसी त्रिशंकु संसद के बीच से निकलकर सामने आई एक ऐसी सच्चाई जिसने पारंपरिक यहूदी राष्ट्रवादियों की रातों की नींद उड़ा दी है। अरब पार्टियां किंग मेकर बन चुकी हैं। लेकिन सबसे बड़ा राजनीतिक भूचाल तब आया जब विपक्ष के यहूदी नेता गादी आइजनेकोर्ट ने परंपराओं को तोड़ते हुए अरब गुट के नेताओं से मुलाकात की। इस पूरे डर और बहस की जड़ में है वो मुलाकात जो चुनाव के नतीजों के तुरंत बाद देखी गई। विपक्ष के नेता गदी आइजेनकोट जो खुद इजराइल के सैन्य प्रमुख आईडीएफ चीफ रह चुके हैं और सुरक्षा के मामले में एक सख्त यहूदी चेहरा माने जाते हैं। उन्होंने अरब गुट के नेताओं से हाथ मिलाया। इतिहास गवाह है कि इजराइल की मुख्यधारा की यहूदी पार्टियां अरब पार्टियों को हमेशा ही गैर जायनवादी यानी कि नॉन जायनिस्ट मानकर सत्ता के गलियारों से दूर रखती आई हैं। उन्हें डर रहता था कि अरब पार्टियों को शामिल करने से देश की सुरक्षा और खुफिया फैसलों से समझौता हो सकता है।  

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2026 के आंकड़ों की मजबूरी ने इस दीवार को तोड़ दिया है। अब गादी के गुट ने अरब नेताओं को तवज्जो दी तो दक्षिणपंथी खेमे में हड़कंप मच गया। दक्षिणपंथी नेताओं का आरोप है कि सत्ता की भूख में यहूदी गुट उन ताकतों के सामने झुक रहे हैं जो इज़राइल को एक शुद्ध यहूदी राष्ट्र के रूप में देखना ही नहीं चाहती। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ एक गठबंधन की मजबूरी है या इजराइल के राजनीति में एक नए युग की शुरुआत है? नेतन्याहू के खेमे ने इस मुलाकात को इजराइल की राष्ट्रीय सुरक्षा और यहूदी पहचान के साथ ही विश्वासघात करार दिया। उनके सहयोगियों का कहना है कि एक ऐसी सरकार जो उन अरब पार्टियों के भरोसे चलेगी जो इजराइल की सुरक्षा और सुरक्षा बलों के अभियानों का विरोध करती हैं। वो देश की संप्रभुता की रक्षा कैसे करेगी? विपक्ष के नेता गदी आईजन कोर्ट क्या कह रहे हैं? उन्होंने सफाई दी है। उनका कहना है कि सभी आरोप बेबुनियाद हैं। 

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इजराइल एक यहूदी देश होने के साथ-साथ एक लोकतांत्रिक देश भी है। इजराइल के अरब नागरिक इसी देश का हिस्सा हैं और संसद में उनके प्रतिनिधियों से बात करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। हम देश की सुरक्षा से समझौता किए बिना एक स्थिर सरकार देना चाहते हैं। अरब गुट की ओर से भी प्रतिक्रिया आई है। मंसूर अब्बास और अन्य नेताओं ने बयान दिए। अरब नेताओं का रुख इस बार बेहद रणनीतिक है। बहुत ही ज्यादा डिप्लोमेटिक। राअम पार्टी के नेता मंसूर अब्बास ने साफ किया कि हमारा मकसद इजराइल को खत्म करना नहीं बल्कि इजराइल के भीतर रहने वाले 22% अरब नागरिकों को उनके हक दिलाना है। हम बजट, शिक्षा, बुनियादी ढांचे और नागरिक अधिकारों की शर्तों पर किसी भी लोकतांत्रिक सरकार को समर्थन देने के लिए तैयार हैं। नेताओं के बयानों से आगे बढ़कर अगर हम अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों और इजरायली राजनीति के विशेषज्ञों के विश्लेषण को देखें तो इसके तीन बड़े दीर्घकालिक परिणाम सामने आ सकते हैं। यहूदी और लोकतांत्रिक संतुलन में बदलाव। जानकारों का मानना है कि अब तक इजराइल के यहूदी चरित्र को लोकतांत्रिक चरित्र पर प्राथमिकता मिलती रही। लेकिन अगर अरब पार्टियां नीति निर्माता बनती हैं तो इजराइल को अपने लोकतांत्रिक स्वरूप को ज्यादा मजबूत करना होगा और इसका मतलब होगा कि भविष्य में इजराइल को अपने सभी नागरिकों यहूदी और अरब को पूरी तरह से समान अधिकार देने होंगे और अपना ध्यान इस पर केंद्रित करना होगा। 

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