अल अक्सा के लिए इजरायल से जंग? एर्दोगान VS नेतन्याहू, खुली ललकार

इजराइल समर्थकों का कहना है। लेकिन यह जंग सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है। क्योंकि तुर्की भी कोई मामूली देश नहीं है। इसके पीछे एक नया और बड़ा जिओपॉलिटिकल गेम है और वह गेम चल रहा है सोमाली में।
दुनिया सोच रही थी कि गजा और लेबनान के मोर्चे पर उलझा इजरायल थम जाएगा। लेकिन बेंजामिन नेतन्याहू ने तुर्किय के राष्ट्रपति रिचब तैयब एर्दोगान पर जो तीखा हमला बोला है उसने पूरी दुनिया को सन्न कर दिया है। नेतन्याहू ने सीधे एर्दोगान को चेतावनी दे दी है कि वह अपनी औकात और इतिहास ना भूलें। लेकिन इस दुश्मनी की जहरीली शुरुआत आज नहीं हुई। आपको याद होगा एर्दोगान का वो बयान जिसने इजराइल के सीने में तीर की तरह चुभन पैदा की थी। एर्दोगान ने खुलेआम हुंकार भरी थी कि वे इजराइल को नष्ट करना चाहते हैं और फिर से यरूशलम और पवित्र अलक्सा मस्जिद पर नियंत्रण हासिल करना चाहते हैं। एर्दोगान ने अलक्सा की आजादी का नारा बुलंद किया था और खुद को मुस्लिम उमा का खलीफा साबित करने के लिए इजराइल के खात्मे की बातें कही थी। यही वो बयान था जिसने नेत्नयाहू को अंदर तक हिला दिया था और इजराइल इस अपमान को भुला नहीं था। वो बस सही वक्त के इंतजार में था और अब नेतन्याहू ने चुनचुन कर बदला लिया है।
नेतन्याहू ने एर्गोदान केशलम नियंत्रण वाले ख्वाब की धज्जियां उड़ाते हुए कहा, मुझे लगता है कि वे भूल गए हैं। उस्मानी यानी ऑटोमन शासन के 400 साल अब समाप्त हो चुके हैं। आज एक मजबूत इजराइल मौजूद है। नेतन्याहू यहीं नहीं रुके। उन्होंने एर्दोगान को सीधे शब्दों में औकात याद दिलाते हुए धमकी दे डाली। उन्हें शांत हो जाना चाहिए। हम किसी भी अपने अस्तित्व या अपनी सुरक्षा को खतरे में डालने की अनुमति नहीं देंगे और मुझे लगता है कि हमने दिखा दिया है कि हम क्या करने में सक्षम है। इस बयान से नेतन्याहू ने साफ कर दिया कि आज का इजराइल 19वीं सदी का कमजोर फिलिस्तीन इलाका नहीं है बल्कि एक परमाणु संपन्न आधुनिक महाशक्ति है। ऐसा इजराइल समर्थकों का कहना है। लेकिन यह जंग सिर्फ बयानों तक सीमित नहीं है। क्योंकि तुर्की भी कोई मामूली देश नहीं है। इसके पीछे एक नया और बड़ा जिओपॉलिटिकल गेम है और वह गेम चल रहा है सोमाली में।
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दरअसल तुर्की इन दिनों अफ्रीका में अपनी पैठ बढ़ा रहा है। सोमाली और इथोपिया के बीच जब एक पोर्ट को लेकर डील हुई तो तुर्की बीच में कूद पड़ा। उसने सोमालिया के साथ डिफेंस डील की और वहां अपनी नौसेना तैनात करने का फैसला कर लिया। इजराइल इसे अपने लिए एक बड़ी घेराबंदी मान बैठा। इजराइल को डर है कि अगर तुर्की लाल सागर के इस मुहाने पर बैठ गया तो वह इजराइल की समुद्री लाइफ लाइन को कभी भी चौक कर सकता है। इसी सोमाली लैंड विवाद ने दोनों को एक दूसरे का जानी दुश्मन बना दिया। जब पानी सिर से ऊपर चला गया तो इजरायली कैबिनेट ने वो चाल चली जो तुर्किए के इतिहास का सबसे बड़ा सच बताया गया। इजरायली कैबिनेट ने एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित कर दिया। आर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक मान्यता। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान ऑटोमन साम्राज्य यानी उस्मानी शासन ने लाखों आर्मेनियाई ईसाइयों को मौत के घाट उतार दिया था।
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तुर्की आज तक दुनिया के सामने इस बात से मुकरता आया है कि यह कोई नरसंहार था। लेकिन इजराइल ने ठीक इसी दुखती रक्त पर पैर रख दिया। तुर्की के ऑटोमन साम्राज्य के गौरव को मटियामेट करने के लिए इजराइल ने लाखों आर्मेनियाई लोगों के मारे जाने पर मोहर लगा दी। लेकिन इजराइल यह भूल रहा है कि तुर्किए ना तो हमास है और ना ही हिजबुल्लाह है। तुर्किए अपने आप में इतना मजबूत है कि अगर इजराइल से उसकी लड़ाई हुई तो शायद इजराइल को अब तक का सबसे बड़ा झटका लग सकता है। तुर्किए की सेना इतनी मजबूत मानी जाती है कि इजराइल उसके सामने पानी मांगने लगेगा। अक्स की आजादी के दावे से शुरू हुई यह कहानी सुमाली लैंड के समंदर होते हुए ऑटोमन साम्राज्य के 400 साल पुराने इतिहास पर आकर टिक गई है। नेतन्याहू ने साफ कह दिया कि इसराइल क्या कर सकता है वो गाजा लेबनान में दिखा चुके हैं। अब देखना यह है क्या सुल्तान बनने का ख्वाब देखने वाले अद्वान इस चेतावनी के बाद शांत बैठेंगे या फिर मिडिल ईस्ट में एक और ऐसा महायुद्ध छिड़ेगा जो पूरी दुनिया के नक्शे को बदल कर रख देगा।
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दुनिया भर में अमेरिका के 750 से ज्यादा सैन्य ठिकाने हैं। जिनमें 89 बेस सिर्फ मिडिल ईस्ट में मौजूद हैं। लेकिन अब वही बेस जो कभी अमेरिका की सबसे बड़ी ताकत माने जाते थे उसकी सबसे बड़ी कमजोरी बनते दिखाई दे रहे हैं। लगातार मिसाइल और ड्रोन हमलों, बदलते युद्ध तकनीक और बढ़ते क्षेत्र तनाव के बीच अमेरिका अपने दशकों पुरानी सैन्य रणनीति बदलने की तैयारी कर रहा है।
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