पारिवारिक और सामाजिक पुनर्वास की मानवीय पहल

Vishnudev Sai
ANI

देश के एक तिहाई जिलों पर लाल आतंक के रूप में कुख्यात रहा नक्सलवाद अब आखिरी सांसें गिन रहा है। गृहमंत्री अमित शाह के दावे के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक देश तकरीबन नक्सलमुक्त हो चुका है। इस दौरान सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में ज्यादातर बड़े नक्सली कमांडर मारे जा चुके हैं, या कई ने आत्मसमर्पण कर दिया है।

अभी हाल ही में पिता दिवस गुजरा है। इस दिन सोशल मीडिया समेत तमाम जगहों पर हुई चर्चाओं में एक बात प्रमुखता से छायी रही। ऐसा कहा गया कि पिता बनने के बाद लोगों की शख्सियत में बदलाव आ जाता है। चूंकि जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं, लिहाजा इन दायित्वों के चलते कठोर से कठोर हृदय वाला व्यक्ति भी नरम हो जाता है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने जब पूर्व नक्सलियों की जबरिया कराई गई नसबंदी को खोलने वाले जटिल ऑपरेशन को हरी झंडी दिखाई, पता नहीं, उसके दिमाग में यह तथ्य था या नहीं। लेकिन उसकी इस कोशिश से कभी इंन्सानी खून से लाल रही बस्तर की धरती के कई आंगन किलकारियां गूंज रही हैं। 

देश के एक तिहाई जिलों पर लाल आतंक के रूप में कुख्यात रहा नक्सलवाद अब आखिरी सांसें गिन रहा है। गृहमंत्री अमित शाह के दावे के मुताबिक, 31 मार्च 2026 तक देश तकरीबन नक्सलमुक्त हो चुका है। इस दौरान सुरक्षा बलों से मुठभेड़ में ज्यादातर बड़े नक्सली कमांडर मारे जा चुके हैं, या कई ने आत्मसमर्पण कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, 2700 नक्सली आत्म समर्पण कर चुके है। इन पूर्व नक्सलियों के पुनर्वास के लिए केंद्रीय सहयोग के साथ नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें कई सारी योजनाएं चला रही हैं। नक्सलवाद से सर्वाधिक प्रभावित रहे छत्तीसगढ़ और झारखंड में आर्थिक सहयोग, रोजगार, घर आदि की सुविधाएं दी जा रही हैं। इससे नक्सलियों के पुनर्वास को गति मिली है। लेकिन पूर्व नक्सलियों के पुनर्वास कार्यक्रमों में एक अनूठी मुहिम चलाई जा रही है। यह विशेष मुहिम सिर्फ छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ही चला रही है। इस मुहिम को पारिवारिक और सामाजिक पुनर्वासन कहा जा सकता है। 

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दरअसल नक्सली संगठनों में फील्ड कार्य कर रहे नक्सलियों के लिए अमानवीय प्रथा थी। फील्ड में काम कर रहे कम उम्र के नक्सलियों की अमानवीय तरीके से जबरिया नसबंदी करा दी जाती थी, ताकि नक्सली कार्य करते वक्त वे अपना परिवार न बढ़ा सकें। नक्सली संगठनों में महिला नक्सली भी सक्रिय थीं, उनके बीच रिश्ते पनपने संभव थे। लेकिन उन रिश्तों से बच्चे ना हों, इसलिए पुरूष नक्सलियों को जबरदस्ती नसबंदी के लिए मजबूर किया गया। जिनमें बहुत सारे नक्सलियों की उम्र बेहद कम थी। लेकिन सरकारी मुहिम के बाद जब उन्होंने आत्मसमर्पण किया तो उनके मन में भी परिवार बसाने और अपने घर-आंगन में किलकारी गूंजने की चाहत जगी। चूंकि इनकी नसबंदी हो चुकी थी, लिहाजा इन्हें मन-मसोस कर रह जाना पड़ता था। छत्तीसगढ़ सरकार इन्हीं समर्पित प्रजनन उम्र वाले नक्सलियों के लिए पारिवारिक तौर पर ज्यादा सक्रिय होने के लिए यह मानवीय पहल शुरू की है। 

पशुपति यानी नेपाल से लेकर तिरूपति यानी आंध्र के जंगली गलियारे तक तूती बोलने के दौर में छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग सबसे ज्यादा नक्सल प्रभावित था। खूंखार नक्सलियों के लिए कुख्यात इसी बस्तर संभाग से छत्तीसगढ़ सरकार ने मानवीय पहल शुरू की है। इसके तहत प्रजनन की उम्र वाले उन नक्सलियों का रिवर्स वैसेक्टॉमी शुरू किया है। नसबंदी करा चुके लोगों के लिए रिवर्स वासेक्टॉमी एक तरह से उनकी नसों को फिर से खोलने और उन्हें प्रजनन योग्य बनाने की जटिल प्रक्रिया है। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने इस अनूठी पहल को यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के विशेषज्ञों की मदद से शुरू किया है। 14 जून तक के आंकड़ों के अनुसार, दो चरणों में 73 पूर्व नक्सलियों की नसबंदी खोलने का ऑपरेशन पूरा किया जा चुका है। पहले चरण में 33 पूर्व नक्सलियों को खुशहाल जिंदगी गुजारने की दिशा में आगे बढ़ने के लिए इस ऑपरेशन को अंजाम दिया गया तो दूसरे चरण में 40 पूर्व नक्सलियों की नसबंदी को खोला गया। पहले चरण में जिन 33 पूर्व नक्सलियों की नसबंदी खोलने की प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है, उनमें से 27 के आंगन किलकारियों से गूंज रहे हैं। बस्तर के पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा के अनुसार, बस्तर के एक पूर्व नक्सली के घर दो महीने पहले ही बच्ची का जन्म हो चुका है। उस पूर्व नक्सली का परिवार इस बच्ची के साथ अपना पारिवारिक जीवन आनंद से बिता रहा है। 

आमतौर नसबंदी खोलने के इस जटिल ऑपरेशन के लिए बड़े शहरों और महानगरों के सुविधा संपन्न अस्पतालों में जाना पड़ता है। लेकिन यह पहला मौका है, जब छत्तीसगढ़ के दूर-दराज के बस्तर संभाग में स्थानीय स्तर पर बड़े पैमाने पर इस जटिल ऑपरेशन प्रक्रिया को सफलता के साथ अंजाम तक पहुंचाया गया। इस पहल में बस्तर के जिला प्रशासन के साथ ही बस्तर पुलिस और यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के पश्चिमी जोन की बड़ी और महत्वपूर्ण भूमिका रही। यूरोलॉजिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के अध्यक्ष और इंदौर निवासी डॉक्टर राजेश कुकरेजा का कहना है कि बस्तर जैसे इलाके में इतने बड़े स्तर पर नसबंदी खोलने का सफल ऑपरेशन किया जाना चिकित्सा क्षेत्र की बड़ी उपलब्धि है। इस ऑपरेशन की शुरूआत जगदलपुर के महारानी अस्पताल में की गई। इसके लिए विशेष शिविर आयोजित किए गए। जगदलपुर के जिला अस्पताल में नसबंदी खोलने के विशेष शिविरों में देश के जाने माने यूरोलॉजिस्ट डॉ. सुशील राठी, डॉ. ललित शाह एवं डॉ. योगेश बरापात्रे सहित इंदौर के डॉ. राजेश कुकरेजा, पुणे के डॉ. सागर भालेराव और डॉ. राहुल, महाराष्ट्र के नांदेड़ के डॉ. अभिषेक, मुंबई के डॉ. निनाद तंबोली और डॉ. पार्थ मानेक के साथ ही रायपुर के डॉ. राहुल कपूर एवं डॉ. घनश्याम हटवार की टीम ने पूर्व नक्सिलियों का सफल ऑपरेशन किया है। इनके सहयोग के लिए छह स्थानीय डॉक्टरों सहित करीब 50 सदस्यों वाली मेडिकल टीम जुटी रही।

छत्तीसगढ़ सरकार की यह पहल बाकी राज्यों द्वारा नक्सलियों के आर्थिक और जमीनी पुनर्वास नीति से अलग है। विष्णुदेव साय सरकार की इस मानवीय पहल की प्रशंसा मेडिकल जगत के साथ ही समाजविज्ञानी भी कर रहे हैं। इस पहल के तहत शारीरिक और मेडिकल जांच के साथ ही प्रजनन योग्य पाए जाने वाले नक्सलियों के ही ऑपरेशन किए जाते हैं। इनमें चालीस साल तक की उम्र वाले पूर्व नक्सलियों को ही प्राथमिकता दी जाती है। जगदलपुर के महारानी अस्पताल के सिविल सर्जन डॉक्टर संजय प्रसाद के मुताबिक, राज्य सरकार की पहल पर जल्द ही तीसरे चरण का भी शिविर लगाने की तैयारी है, जिसमें दो दर्जन से ज्यादा पूर्व नक्सलियों के ऑपरेशन किये जायेंगे। 

छत्तीसगढ़ की यह मानवीय पहल समर्पित नक्सलियों को ना सिर्फ अपने समाज, बल्कि परिवार से भी जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। यह पहल नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा रणनीति से आगे बढ़कर विश्वास निर्माण और सामाजिक-मानवीय पुनर्वास मॉडल के रूप में आगे आ रहा है। ये 73 ऑपरेशन महज चिकित्सकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि इन परिवारों की उम्मीद और सामान्य जीवन की ओर आगे बढ़ने का भी प्रतीक है। उम्मीद की जानी चाहिए कि झारखंड और दूसरे नक्सल प्रभावित राज्यों की सरकारें भी इस पहल से प्रेरित होंगी। 

- उमेश चतुर्वेदी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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