ईरान के लिए सलमान ने दिखाया अपना असली रौब, ट्रंप की पूरी सरकार बौखला उठी

वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब सऊदी अरब से अपने अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ताजो सामान को कम करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। वजह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस का वो एक ऐसा फैसला जिसने वाशिंगटन के पैरों तले जमी खिसका दी है।
ईरान महाशक्ति बनने की ओर इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है कि खाड़ी के सऊदी जैसे देश अब अमेरिका से कतराने लगे हैं। अमेरिका और सऊदी अरब के बीच सब कुछ बेपटरी हो चुका है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की एक चौंकाने वाली रिपोर्ट के मुताबिक राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अब सऊदी अरब से अपने अमेरिकी सैनिकों और सैन्य ताजो सामान को कम करने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं। वजह सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी एमबीएस का वो एक ऐसा फैसला जिसने वाशिंगटन के पैरों तले जमी खिसका दी है। पूरा विवाद शुरू हुआ प्रोजेक्ट फ्रीडम से। होर्मुज स्टेट में फंसे कमर्शियल जहाजों को ईरान के डर से बाहर निकालने और अमेरिकी प्रभुत्व दिखाने के लिए ट्रंप ने इस सीक्रेट मिलिट्री मिशन का ऐलान किया था। लेकिन जैसे ही अमेरिकी जट्स ने उड़ान भरने की तैयारी की सऊदी अरब ने अपने प्रिंस सुल्तान एयरबेस का इस्तेमाल करने से और अमेरिकी लड़ाकों विमानों को अपना एयर स्पेस यानी आसमान देने से साफ तौर पर इंकार कर दिया।
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सऊदी के इस अचानक इंकार की वजह से ट्रंप का यहत्वाकांक्षी मिशन शुरू होने के महज 36 घंटों के भीतर ही ओधे मुंह गिर गया और अमेरिका को इसे रोकना पड़ गया। सऊदी अरब के इस कदम से बौखलाए वाशिंगटन ने रियाद को खुली धमकी दे डाली थी। अमेरिका ने कहा कि अगर सऊदी अरब ने उसका साथ नहीं दिया तो वह उन एयर डिफेंस यानी इंटरसेप्टर्स पेट्रियट मिसाइल सिस्टम की सप्लाई काट देगा जो सऊदी अरब को ईरानी मिसाइलों और ड्रोन हमलों से बचाते हैं। तनातनी इस कदर बढ़ चुकी है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्कोरबियो जब हाल ही में खाड़ी देशों के दौरे पर पहुंचे तो उन्होंने जानबूझकर रियाद यानी सऊदी की राजधानी का दौरा स्किप कर दिया।
वो यूएई गए, बहरीन गए, कुवैत गए लेकिन सऊदी अरब नहीं गए। यह इस बात का सीधा सबूत है कि दोनों देशों के रिश्ते अब आईसीयू में पहुंच चुके हैं। अब सवाल उठता है कि सऊदी अरब ऐसा क्यों कर रहा है? जवाब साफ है वो अमेरिका के लिए ईरान से सीधी जंग मोड़ नहीं लेना चाहता। हाल ही में जब फ्रांस में ईरान जंग को लेकर जी7 देशों की बैठकें हुई तो सऊदी के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने इस बैठक से दूरी बना ली थी। सऊदी को यह बखूबी समझ आ चुका है कि अमेरिका तो सात समंदर पार बैठा है लेकिन ईरान उसका पड़ोसी है। अगर अमेरिका ईरान की जंग में सऊदी ने अमेरिका को अपने बेच दिए तो ईरान के आत्मघाती ड्रोन सबसे पहले सऊदी के तेल कुओं को तबाह कर देंगे। इसलिए सऊदी अब धीरे-धीरे ईरान के साथ अपने रिश्तों को रिसेट कर रहा है और अमेरिका की दादागिरी को ठेंगा दिखा रहा है।
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इतिहास गवाह है कि मध्य पूर्व में तेल की राजनीति और हथियारों का सौदा हमेशा अमेरिका के इशारों पर चलता था। लेकिन आज सऊदी ने सबसे मुश्किल वक्त में अमेरिका को बेस ना देकर यह साबित कर दिया कि वह अब वाशिंगटन का पिछलकू बनकर नहीं रहेगा। महाशक्तियों का यह बदलता संतुलन दुनिया को किस मोड़ पर ले जाएगा यह देखना अब दिलचस्प होता जा रहा है। सवाल यह है क्या सऊदी अरब अब ईरान से ही अपनी रक्षा करवाएगा या फिर ईरान के ड्रोन और मिसाइल खाएगा? यही सवाल सोशल मीडिया पर लोग इसलिए पूछ रहे हैं क्योंकि सऊदी अरब अगर अब अमेरिका के पीछेछे चला तो ईरान के ड्रोंस और मिसाइल क्या वो अपने पास रखेगा या फिर सऊदी भेज देगा? यही सवाल सोशल मीडिया पर लोग पूछ रहे हैं। जंग और बातचीत दोनों एक साथ नहीं हो सकती है। ईरान ने साफ इंकार कर दिया है कि टेबल पर अब आमने-सामने की बातचीत नहीं हो सकती। क़तर में होने वाली सीधी बातचीत के टेबल पर बैठने से पहले अमेरिका के उकसावे वाली कारवाही का ईरान ने विरोध किया और एक दूसरे को देखने से भी मना कर दिया। पश्चिम एशिया की राजनीति में इस वक्त एक नया और बेहद गंभीर मोड़ आ चुका है।
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