इजरायल में धड़ाधड़ वोटिंग चालू, नेतन्याहू नहीं, आइजेनकोट बनेंगे PM?

इजराइल में 61 सीटों के बहुमत और गठबंधन की शर्तों के कारण प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सत्ता में वापसी की राह कठिन हो गई है। सैन्य भर्ती विवाद, गठबंधन में फूट और भ्रष्टाचार के मुकदमों के बीच मतदाता भी युद्ध व महंगाई से परेशान हैं। कई नागरिक देश को तानाशाही से बचाने और शांति के लिए नेतृत्व परिवर्तन चाहते हैं।
इजराइल के इतिहास में आज तक किसी भी सिंगल पार्टी को अकेले 61 सीटें नहीं मिली हैं। वहां हमेशा खिचड़ी सरकार यानी गठबंधन वाली गवर्नमेंट होती है। और नेतन्याहू इसी गठबंधन के सबसे बड़े खिलाड़ी। यानी नेतन्याहू के लिए यह चुनाव सिर्फ एक राजनीतिक लड़ाई नहीं है बल्कि जेल जाने से बचने का आखिरी रास्ता भी है। 27 अक्टूबर 2026 इजराइल के इतिहास का एक ऐसा मोड़ जिस पर आज पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। यह सिर्फ एक आम चुनाव नहीं है बल्कि दुनिया के सबसे अनुभवी और कद्दावर राजनेताओं में से एक बेंजामिन नेतन्या के पूरे राजनीतिक जीवन की सबसे अनोखी परीक्षा है। एक ऐसा नेता जिसने हर संकट से देश को निकालने का दावा किया। आज इजराइल के ही एक अनोखे राजनीतिक चक्रव्यूह में वो घिरा हुआ है। मीडिया रिपोर्ट्स एक बेहद दिलचस्प संभावना की तरफ इशारा कर रही हैं कि नेतन्याहू की पार्टी सबसे बड़ी ताकत बनकर उभर तो सकती है लेकिन इजराइल के पेचीदा चुनावी गणित और गठबंधन की शर्तों के कारण शायद शायद सत्ता की चाबी उनके हाथ से फिसल जाए। जीत की दहलीज पर खड़े होकर भी सरकार बनाने का यह रास्ता इतना मुश्किल क्यों हो गया है?
इजराइल में जनता किसी एक प्रधानमंत्री उम्मीदवार को सीधा वोट नहीं देती। वहां लोग पार्टियों को वोट देते हैं। संसद में कुल 120 सीटें हैं और सरकार बनाने के लिए जादुई आंकड़ा है 61 सीटों का। इजराइल के इतिहास में आज तक किसी भी सिंगल पार्टी को अकेले 61 सीटें नहीं मिली हैं। इसका मतलब इसका मतलब है कि वहां हमेशा खिचड़ी सरकार यानी गठबंधन कोिशन वाली गवर्नमेंट होती है। और नेतन याहू इसी गठबंधन के सबसे बड़े खिलाड़ी हैं। वो छोटी-छोटी कट्टरपंथी और दक्षिणपंथी पार्टियों को मिलाकर किसी तरह 61 वाला आंकड़ा जुटा लेते हैं। मीडिया रिपोर्ट्स कहती हैं इस बार इसी दक्षिणपंथी वोट बैंक में एक बहुत बड़ी दरार आ चुकी है। अब बात करते हैं उस बारूद के ढेर की जिसने नेतन्या की सरकार को हिलाया है। सेना में भर्ती वाला कानून मिलिट्री कॉनक्रिप्शन लॉ। इजराइल में एक नियम है कि हर नागरिक चाहे लड़का हो या लड़की उसे दो से तीन साल तक इजराइल के डिफेंस फोर्स में देश की सेवा करनी ही होगी। लेकिन 1948 से इजराइल के अति रूढ़िवादी यानी हरेदी यहूदियों को इससे छूट मिली हुई थी। वो सिर्फ धार्मिक पढ़ाई करते थे और उन्हें सेना में नहीं जाना पड़ता था। लेकिन 7 अक्टूबर के हमलों और लगातार चल रहे बहु मोर्चे के युद्ध के बाद इजराइल की सेना थक चुकी है। सेना के चीफ ने साफ कह दिया कि अब हमें और सैनिक चाहिए और यह भेदभाव नहीं चलेगा।
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पूरे इज़राइल में मतदान केंद्र खुलने पर, अलग-अलग उम्र के मतदाताओं ने देश के राजनीतिक नेतृत्व, आर्थिक चुनौतियों, चल रहे युद्ध और शांति की आवश्यकता पर अपने विचार साझा किए। इनमें से किसी ने नेतृत्व में बदलाव की मांग की, तो किसी ने भविष्य के और अधिक शांतिपूर्ण होने की उम्मीद जताई। यरूशलेम में ANI से बात करते हुए, 23 वर्षीय लियोनाइट ने कहा कि वह मौजूदा प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के खिलाफ वोट दे रहे हैं। उन्होंने लोकतंत्र के लिए खतरे और इजरायली समाज में पैदा हुए विभाजन को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा सबसे पहली बात, मुझे लगता है कि हमें अपने देश को तानाशाही से बचाना है। अगर नेतन्याहू फिर से अपनी सीट जीत जाते हैं, तो देश में तानाशाही आ जाएगी।" लियोनाइट ने आगे कहा, "दुर्भाग्य से, उन्होंने हमारे देश और हमारे लोगों को दो समूहों में बांट दिया है - असली यहूदी और नकली यहूदी। मुझे लगता है कि यह सही नहीं है। इसलिए, मैं उनके खिलाफ वोट देने आया हूं और उन मूल्यों के समर्थन में वोट दे रहा हूं, जिनमें मेरा विश्वास है।" इज़राइल के अंतरराष्ट्रीय संबंधों पर उन्होंने कहा कि देश को अपना नजरिया बदलने की जरूरत है। उन्होंने तर्क दिया कि नेतन्याहू ने बहुत कट्टर तरीके से काम किया है और ज्यादातर इज़राइली उनके इन कदमों का समर्थन नहीं करते हैं। देश के सामने मौजूद मुख्य मुद्दों का जिक्र करते हुए, लियोनाइट ने सुपरमार्केट में बढ़ती कीमतों, आर्थिक एकाधिकार (मोनोपोली), युद्ध की आर्थिक लागत और धार्मिक पाबंदियों की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा सुपरमार्केट में इतनी ज्यादा कीमतें होने का कोई कारण नहीं है। इसकी वजह एकाधिकार (मोनोपोली) है। हमारी अर्थव्यवस्था में एकाधिकार गहराई तक पैठ बना चुका है। हमें इसे खत्म करना होगा।" चल रहे संघर्ष का जिक्र करते हुए उन्होंने आगे कहा युद्ध लड़ने में बहुत पैसा खर्च होता है। इसलिए, हम लोगों की हत्याओं को रोकना चाहते हैं - मेरा मतलब है कि हम लोगों की जान जाना रोकना चाहते हैं।" नागरिकों से चुनाव में हिस्सा लेने की अपील करते हुए लियोनाइट ने कहा हर किसी को यहां आना चाहिए, क्योंकि हम एक लोकतंत्र में रहते हैं और आपके एक वोट का बहुत बड़ा महत्व है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप किसे वोट दे रहे हैं - चाहे वह धुर-दक्षिणपंथी हों, धुर-वामपंथी हों, या फिर बीच के किसी विचार वाले हों।
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इस बीच, एक अन्य मतदाता पास्कल, जो सात साल से इज़राइल में रह रहे हैं, ने एक नई सरकार और देश के लिए अधिक शांतिपूर्ण भविष्य की उम्मीद जताई। ANI से बात करते हुए, जब उनसे इज़राइल के सामने मौजूद मुद्दों के बारे में पूछा गया, तो पास्कल ने कहा कि उन्हें एक बेहतर सरकार और एक अच्छे जीवन की उम्मीद है। देश के प्रति अपना लगाव जताते हुए उन्होंने कहा, "मुझे अपना छोटा सा देश बहुत पसंद है। नई सरकार नहीं बनती तब तक मौजूदा पीएम ही केयरटेकर पीएम बने रहेंगे। वो देश को बार-बार चुनाव में झोंक भी सकते हैं ताकि उनकी कुर्सी बची रहे। लेकिन वो ऐसा कर क्यों रहे हैं? इसकी वजह बहुत पर्सनल और डरावनी मानी जा रही है। नेतन याहू पर सालों से भ्रष्टाचार, धोखाधड़ी और रिश्वतखोरी के गंभीर मुकदमे चल रहे हैं। जब तक वह प्रधानमंत्री की कुर्सी पर हैं, उनके पास कानूनी सुरक्षा है।
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