एलर्जी की दवा Antihistamines दिमाग और सतर्कता पर डालती हैं अलग-अलग असर, जानिए सही चयन

एलर्जी की दवा Antihistamines दिमाग और सतर्कता पर डालती हैं अलग-अलग असर, जानिए सही चयन
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किंग्स्टन विश्वविद्यालय की विशेषज्ञ के अनुसार एलर्जी से राहत दिलाने वाली सभी एंटीहिस्टामाइन दवाएं शरीर पर एक जैसा प्रभाव नहीं छोड़ती हैं। पुरानी पीढ़ी की दवाएं दिमाग की कार्यप्रणाली, याददाश्त और प्रतिक्रिया देने की गति को काफी धीमा कर सकती हैं। वहीं आधुनिक या दूसरी पीढ़ी की दवाओं में सुस्ती और एंटीकोलिनर्जिक दुष्प्रभावों की संभावना अपेक्षाकृत काफी कम होती है।

(दीपा कामदार, किंग्स्टन विश्वविद्यालय में फार्मेसी प्रैक्टिस की एसोसिएट प्रोफेसर) लंदन, एक नवंबर (द कन्वरसेशन) लाखों लोग एलर्जी से राहत पाने के लिए एंटीहिस्टामाइन दवाओं का सेवन करते हैं, लेकिन इनमें से कुछ दवाओं से आपको नींद आ सकती है, आपकी प्रतिक्रिया देने की गति धीमी हो सकती है और एकाग्रता प्रभावित हो सकती है। वहीं, कुछ अन्य दवाइयों में ये प्रभाव होने की संभावना बहुत कम होती है। इन दोनों के बीच अंतर जानने से आपको एलर्जी के लिए ऐसी दवा चुनने में मदद मिल सकती है, जो आपकी रोजमर्रा की गतिविधियों में बाधा न डाले।

एंटीहिस्टामाइन दवाएं हिस्टामाइन नामक रसायन की क्रिया को रोककर काम करती हैं। यह रसायन एलर्जी की प्रतिक्रिया के दौरान प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा जारी किया जाता है। हिस्टामाइन के कारण एलर्जी के कई सामान्य लक्षण उत्पन्न होते हैं, जैसे खुजली, छींक आना, आंखों से पानी आना और नाक बहना।

पहली एंटीहिस्टामाइन दवाओं को 1940 के दशक में विकसित किया गया था। क्लोरफेनामाइन, डाइफेनहाइड्रामाइन और प्रोमेथाजिन जैसी दवाओं को पहली पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाएं कहा जाता है। ये दवाएं आज भी एलर्जी की दवाओं, सर्दी-जुकाम के उपचार और नींद लाने वाली दवाओं में व्यापक रूप से इस्तेमाल की जाती हैं।

वर्ष 1980 और 1990 के दशकों में लोराटाडाइन, सेटिरिजीन और फेक्सोफेनाडीन जैसी नयी एंटीहिस्टामाइन दवाएं विकसित की गईं। इन्हें दूसरी पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाएं कहा जाता है। इन दवाओं को इस तरह विकसित किया गया था कि इनके दुष्प्रभाव कम हों, विशेष रूप से इनसे नींद आने की समस्या कम हो।

कुछ एंटीहिस्टामाइन दवाओं से नींद आती है, जबकि कुछ से नहीं। इसका मुख्य कारण यह है कि ये दवाएं मस्तिष्क में किस तरह असर करती हैं। शोधकर्ताओं का मानना है कि एंटीहिस्टामाइन दवाओं को केवल दो श्रेणियों में बांटना सही नहीं है—एक वे जो नींद लाती हैं और दूसरी वे जो नींद नहीं लातीं।

इसके बजाय, इन दवाओं को एक ऐसे क्रम में समझना अधिक उचित है, जिसमें कुछ दवाओं से नींद अधिक आती है, जबकि कुछ से कम। कुछ पुरानी एंटीहिस्टामाइन दवाएं सतर्कता और जागरूकता को काफी हद तक प्रभावित करती हैं, जबकि कुछ नयी दवाओं का प्रभाव हल्का होता है और कुछ का मस्तिष्क पर लगभग कोई असर नहीं पड़ता। यही वजह है कि एक जैसे एलर्जी के लक्षणों का इलाज करने वाली दो अलग-अलग दवाएं लेने पर आपको उनके प्रभाव में काफी अंतर महसूस हो सकता है।

कुछ लोगों को इन दवाओं का नींद लाने वाला प्रभाव उपयोगी लगता है। उदाहरण के लिए डिफेनहाइड्रामाइन कई ऐसी दवाओं में इस्तेमाल किया जाता है, जो बिना डॉक्टर के पर्चे के उपलब्ध हैं। लेकिन दवा के कारण नींद आना हमेशा हानिरहित नहीं होता।

एंटीहिस्टामाइन दवाएं आपकी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता, याददाश्त, शारीरिक समन्वय और प्रतिक्रिया देने की गति को प्रभावित कर सकती हैं। इसके कारण गाड़ी चलाना या मशीनें चलाने जैसे काम करना कम सुरक्षित हो सकता है। हो सकता है कि आपको इस बात का एहसास भी न हो कि ये दवाएं आपको कितना प्रभावित कर रही हैं।

भले ही आपको केवल हल्की थकान महसूस हो, फिर भी आपकी प्रतिक्रिया देने की गति धीमी हो सकती है और एकाग्रता कम हो सकती है। जिन लोगों को एलर्जी के इलाज के लिए नियमित रूप से दवाएं लेने की आवश्यकता होती है, उनके लिए आमतौर पर नयी पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाओं की सलाह दी जाती है, क्योंकि इनसे नींद आने की संभावना कम होती है। हालांकि, दूसरी पीढ़ी की कुछ एंटीहिस्टामाइन दवाएं, विशेष रूप से सेटिरिजीन, कुछ लोगों में सुस्ती पैदा कर सकती हैं।

फिर भी इनका यह प्रभाव पुरानी पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाओं की तुलना में आमतौर पर कम होता है। पुरानी पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाओं से केवल नींद आने की समस्या ही नहीं होती। इनमें से कई दवाएं शरीर में मौजूद एक अन्य रासायनिक संदेशवाहक के कामकाज को भी प्रभावित करती हैं।

इसके कारण उनमें एंटीकोलिनर्जिक प्रभाव देखने को मिलते हैं। अल्पकालिक रूप से, एंटीकोलिनर्जिक प्रभाव वाली दवाओं के सेवन से मुंह सूखना, धुंधला दिखाई देना, कब्ज, चक्कर आना और भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। ये दुष्प्रभाव बुजुर्गों में अधिक गंभीर हो सकते हैं।

इसके कारण उनके गिरने का खतरा बढ़ सकता है, जिससे अस्पताल में भर्ती होने की नौबत आ सकती है। वैज्ञानिकों ने यह भी अध्ययन किया है कि क्या एंटीकोलिनर्जिक प्रभाव वाली दवाएं, जिनमें पहली पीढ़ी की एंटीहिस्टामाइन दवाएं भी शामिल हैं, मस्तिष्क के स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, अब तक हुए शोध से यह साबित नहीं हुआ है कि इन दवाओं के कारण सीधे तौर पर मनोभ्रंश (डिमेंशिया) होता है।

हालांकि, इन शोध निष्कर्षों के बाद अनावश्यक रूप से एंटीकोलिनर्जिक दवाओं के सेवन से बचने की सलाह और भी मजबूत हुई है, विशेष रूप से बुजुर्गों को ऐसी दवाओं के इस्तेमाल से बचने की सलाह दी गई है। एलर्जी की कोई भी गोली लेने से पहले यह अवश्य जांच लें कि उसमें कौन-सा एंटीहिस्टामाइन मौजूद है। एक जैसे लक्षणों का इलाज करने वाली दवाओं का आपकी जागरूकता पर अलग-अलग प्रभाव हो सकता है।

सही दवा का चयन आपके पूरे दिन की दिनचर्या और कार्यक्षमता पर असर डाल सकता है।

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