कौन जीतेगा चुनावी महाभारत? क्या बंगाल में होगा बदलाव? क्या केरल में आखिरी किला बचा पाएंगे वामपंथी?

Modi Rahul
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पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा अब तक सत्ता से दूर रही है, लेकिन इस बार वह पूरी ताकत के साथ अपनी राजनीतिक उपस्थिति को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। इन राज्यों में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय दल हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी के बीच एक और बड़े मुकाबले की तैयारी शुरू हो चुकी है, जबकि वामपंथ अपने आखिरी किले को बचाने की जंग लड़ने की स्थिति में दिखाई दे रहा है। असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव केवल राज्यों की सत्ता का सवाल नहीं हैं, बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने वाले निर्णायक राजनीतिक संघर्ष के रूप में उभर रहे हैं। इन चुनावों में भारतीय जनता पार्टी अपने विस्तार की रणनीति के साथ मैदान में है, जबकि कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल इसे भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकने की आखिरी बड़ी परीक्षा के रूप में देख रहे हैं।

देखा जाये तो लोकसभा चुनाव 2024 के बाद हुए कई विधानसभा चुनावों ने यह संकेत दिया कि भाजपा अभी भी राष्ट्रीय राजनीति की सबसे मजबूत ताकत बनी हुई है। विपक्ष को उम्मीद थी कि लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत बेहतर प्रदर्शन के बाद उसका मनोबल बढ़ेगा, लेकिन बाद के चुनावों में भाजपा ने अपनी पकड़ बनाए रखी। अब पांच राज्यों में हो चुका चुनावी शंखनाद का दौर यह तय करेगा कि क्या भाजपा उन राज्यों में भी अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर सकती है जहां अब तक उसे सत्ता नहीं मिली है।

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देखा जाये तो इन चुनावों की घोषणा ऐसे समय हुई है जब विपक्ष प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर व्यक्तिगत रूप से तथा एनडीए सरकार पर कई मुद्दों को लेकर लगातार हमला कर रहा है। अमेरिका के साथ व्यापार समझौता, पश्चिम एशिया संकट के कारण ऊर्जा आपूर्ति को लेकर चिंता और मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण जैसे मुद्दों को लेकर सरकार पर सवाल उठाए जा रहे हैं। ऐसे माहौल में इन चुनावों को जनता के वास्तविक राजनीतिक मूड की परीक्षा के रूप में भी देखा जा रहा है।

भाजपा इस चुनावी दौर में असम में सबसे अधिक आत्मविश्वास के साथ उतर रही है। 2016 से राज्य की सत्ता में मौजूद भाजपा मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में खुद को मजबूत स्थिति में मान रही है। पार्टी ने बांग्लादेश से होने वाली घुसपैठ और स्थानीय पहचान के मुद्दों को चुनावी बहस के केंद्र में ला दिया है, जिससे चुनावी वातावरण और अधिक तीखा हो गया है।

दूसरी ओर पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल ऐसे राज्य हैं जहां भाजपा अब तक सत्ता से दूर रही है, लेकिन इस बार वह पूरी ताकत के साथ अपनी राजनीतिक उपस्थिति को विस्तार देने की कोशिश कर रही है। इन राज्यों में भाजपा की सबसे बड़ी चुनौती क्षेत्रीय दल हैं। पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और तमिलनाडु में मुख्यमंत्री एमके स्टालिन भाजपा के सबसे मुखर विरोधियों में शामिल हैं और दोनों ही नेता इस चुनावी मुकाबले में सीधे भाजपा के निशाने पर हैं।

हम आपको बता दें कि चारों राज्यों में भाजपा केवल असम में सत्ता में है, जबकि केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में वह सत्तारुढ़ गठबंधन का हिस्सा है। असम के बाद पार्टी की सबसे बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पश्चिम बंगाल में दिखाई देती है, जहां वह तृणमूल कांग्रेस को सीधी चुनौती दे रही है। वहीं तमिलनाडु में भाजपा ने अन्नाद्रमुक के नेतृत्व में एक व्यापक गठबंधन तैयार कर द्रमुक के नेतृत्व वाले मोर्चे को घेरने की रणनीति बनाई है।

केरल का चुनाव अलग मायने रखता है क्योंकि यहां परंपरागत रूप से वाम लोकतांत्रिक मोर्चा और कांग्रेस के नेतृत्व वाला संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा ही मुख्य मुकाबले में रहे हैं। लेकिन पिछले चुनावों में भाजपा को करीब 17 प्रतिशत मत मिलने के बाद उसे यहां एक प्रभावशाली कारक के रूप में देखा जाने लगा है। ऐसे में यह चुनाव वामपंथ के लिए अपने आखिरी मजबूत किले को बचाने की चुनौती भी बन गया है।

हम आपको बता दें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनावी अभियान की कमान संभालते हुए इन सभी राज्यों में लगातार दौरे और रैलियां की हैं। विकास परियोजनाओं के उद्घाटन के साथ राजनीतिक संदेश देने की रणनीति अपनाते हुए उन्होंने खास तौर पर पश्चिम बंगाल में अपने हमलों को और अधिक तीखा किया। कोलकाता में आयोजित रैली में उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सीधा हमला बोलते हुए आरोप लगाया कि उनकी राजनीति राज्य में तुष्टिकरण की नीति को बढ़ावा देती है।

भाजपा का दावा है कि पश्चिम बंगाल में घुसपैठ और धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों ने व्यापक राजनीतिक बहस को जन्म दिया है। पार्टी का मानना है कि इन मुद्दों ने राज्य में राजनीतिक ध्रुवीकरण को मजबूत किया है और इससे उसे चुनाव में फायदा मिल सकता है।

ममता बनर्जी 2011 से लगातार सत्ता में हैं और उन्होंने कई बार भाजपा की चुनौती को रोकने में सफलता हासिल की है। हालांकि 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया था। इसके बाद हुए चुनावों में भाजपा का मत प्रतिशत लगभग 38 से 39 प्रतिशत के बीच स्थिर रहा है, जिससे पार्टी को उम्मीद है कि इस बार वह ममता बनर्जी के किले में बड़ी सेंध लगा सकती है।

कांग्रेस के लिए भी यह चुनाव किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं हैं। 2014 के बाद से राष्ट्रीय राजनीति में लगातार कमजोर होती जा रही कांग्रेस अब इन चुनावों के जरिये अपने राजनीतिक अस्तित्व को फिर से मजबूत करने की कोशिश कर रही है। पार्टी को उम्मीद है कि केरल में जीत उसके लिए नई राजनीतिक ऊर्जा लेकर आ सकती है।

असम में कांग्रेस ने गौरव गोगोई जैसे अपेक्षाकृत युवा चेहरे को आगे कर नई रणनीति अपनाई है। पार्टी का लक्ष्य कम से कम इतना प्रदर्शन करना है कि यह धारणा टूट सके कि असम पूरी तरह भाजपा का गढ़ बन चुका है। तमिलनाडु में कांग्रेस द्रमुक के साथ गठबंधन में है, हालांकि सीटों के बंटवारे को लेकर शुरुआती मतभेद भी सामने आए। वहीं अभिनेता विजय की नई पार्टी के उभार ने चुनावी समीकरण को और जटिल बना दिया है, जिससे तीन कोणीय मुकाबले की संभावना बन रही है।

पश्चिम बंगाल में कांग्रेस ने इस बार अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। पिछले चुनाव में पार्टी को शून्य सीट और केवल तीन प्रतिशत मत मिले थे। इस बार उसका लक्ष्य कम से कम पंद्रह प्रतिशत मत हासिल कर अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता को फिर से स्थापित करना है।

कुल मिलाकर असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल के चुनाव केवल क्षेत्रीय सत्ता की लड़ाई नहीं हैं। यह चुनाव इस बात का संकेत भी देंगे कि क्या नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा का राजनीतिक विस्तार जारी रहेगा या राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष कोई नया राजनीतिक संतुलन स्थापित कर पाएगा। वैसे इसमें कोई दो राय नहीं कि आने वाले महीनों में यह चुनावी संघर्ष भारतीय राजनीति के सबसे तीखे मुकाबलों में से एक बन सकता है।

-नीरज कुमार दुबे

(इस लेख में लेखक के अपने विचार हैं।)
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