तेल संकट के बीच PM मोदी ने चीन को दिया ऐसा ऑफर, चौंक गए ट्रंप

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह फैसला हुआ। इसके तहत, अप्रैल 2020 में बनी प्रेस नोट 3 (PN3) की व्यवस्था में बदलाव को मंजूरी दी गई।
भारत की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। सरकार ने चीन से आने वाले निवेश को लेकर कुछ शर्तों में ढील देने का फैसला किया है। यानी अब चीन की कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना पहले से आसान हो सकता है। आपको बता दें सरकार का मानना है कि इससे देश में निवेश बढ़ेगा। रोजगार के नए अवसर बनेंगे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिलेगी। लेकिन इस फैसले को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक बहस भी शुरू हो चुकी है। तो आखिर जानते हैं क्या है मोदी कैबिनेट का यह बड़ा फैसला। चीन को भारत में निवेश की अनुमति क्यों दी जा रही है? इससे भारत को फायदा होगा या खतरा।
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क्या है मोदी कैबिनेट का बड़ा फैस
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह फैसला हुआ। इसके तहत, अप्रैल 2020 में बनी प्रेस नोट 3 (PN3) की व्यवस्था में बदलाव को मंजूरी दी गई। सरकारी बयान के मुताबिक, इससे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।' कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर जैसे चुनिंदा सेक्टरों और गतिविधियों में निवेश के प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर निर्णय कर दिया जाएगा। दरअसल 2020 में लद्दाख के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने चीन सहित पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर कड़ी निगरानी और सख्त मंजूरी की शर्तें लागू कर दी थी। उस समय सरकार का मकसद था कि भारत की कंपनियों पर किसी तरह का विदेशी नियंत्रण ना हो सके। लेकिन अब सरकार का मानना है कि अगर निवेश नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से आता है तो इससे भारतीय उपभोग को फायदा हो सकता है।
क्या है अहम बदलाव?
सरकार ने तय किया है कि इन देशों से कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर जैसे चुनिंदा सेक्टरों और गतिविधियों में निवेश के प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर निर्णय कर दिया जाएगा। सेक्टरों की लिस्ट में बाद में बदलाव भी किया जा सकता है। कहा गया कि निवेश करने वाली इकाई पर नियंत्रण और उसमें बहुमत हिस्सेदारी रेजिडेंट इंडियन सिटिजन या ऐसी रेजिडेंट इंडियन यूनिट के पास होनी चाहिए, जिस पर हर समय भारतीय नागरिक का नियंत्रण हो। इसके अलावा, 10 प्रतिशत तक के "गैर-नियंत्रणकारी एलबीसी लाभकारी स्वामित्व" वाले निवेशकों को स्वतः ही मंजूरी दे दी जाएगी। आमतौर पर 49% तक के इक्विटी स्वामित्व को "गैर-नियंत्रणकारी" माना जाता है, जबकि लाभकारी स्वामी किसी संस्था का स्वामी और नियंत्रक होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, पीएन3 प्रतिबंध में ढील देने का राजनीतिक निर्णय आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के बाद लिया गया, जिसमें भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के लिए चीनी कंपनियों से निवेश आकर्षित करने की प्रबल वकालत की गई थी। नीति आयोग के सदस्य राजीव गाबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने भी विनिर्माण क्षेत्र के हित में चीनी निवेश पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की सिफारिश की थी।
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क्या है बेनेफिशियल ओनरशिप?
बेनेफिशियल ओनरशिप की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है। बेनेफिशियल ओनरशिप निवेश करने वाली इकाई के स्तर पर देखी जाएगी। जिन कंपनियों में इन देशों के निवेशकों की बेनेफिशियल ओनरशिप 10% तक
होगी, उनके एफडीआई प्रस्ताव ऑटोमैटिक रूट से मंजूर किए जाएंगे। अभी तक किसी कंपनी में इन देशों का एक भी शेयरधारक होने पर एफडीआई के लिए भारत सरकार के शीर्ष स्तर से मंजूरी की जरूरत होती थी। हालांकि है इस छूट के बावजूद विभिन्न सेक्टरों में एफडीआई की जो सीमा तय की गई है, वह लागू होगी।
क्यों लगाया था PN3?
भारत ने एफडीआई के मामले में 17 अप्रैल 2020 को प्रेस नोट 3 की व्यवस्था बनाई थी। इसके तहत जिन देशों से भारत की थल सीमा जुड़ती है, अगर वहां के शेयरहोल्डर किसी कंपनी में हों, तो ऐसी कंपनी को भारत के किसी भी सेक्टर में निवेश के लिए सरकार से मंजूरी लेने की बात तय की गई थी। कोविड के दौरान कंपनियों का वैल्यूएशन काफी घट जाने के बीच उनमें निवेश के जरिए उनका स्वामित्व विदेशी हाथों में न चला जाए, इसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया था। हालांकि उसी साल जून में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के रक्तरंजित संघर्ष के बाद कड़ाई और बढ़ा दी गई।
क्या है मकसद?
सरकारी बयान में कहा गया पॉलिसी में बदलाव का उद्देश्य स्टार्टअप्स और डीप टेक्नालॅजी स्टार्टअप्स के लिए ग्लोबल फंड्स से ज्यादा एफडीआई लाना और कारोबारी सहूलियत बढ़ाना है। दरअसल भारत तेजी से मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश कर रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर में भारी निवेश की जरूरत है। ऐसे में चीन की कई बड़ी कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने और निवेश करने की इच्छुक बताई जा रही है। तो इसलिए सरकार का मानना है कि अगर सही नियमों और सुरक्षा जांच के साथ निवेश की अनुमति दी जाए तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिल सकता है।
क्यों उठ रहे सवाल
हालांकि इस फैसले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के साथ रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सेक्टर में किसी भी तरह की ढील नहीं दी जाएगी। सिर्फ उन क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा जहां भारत को तकनीक और पूंजी की जरूरत है। अगर यह नीति लागू होती है तो भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आ सकता है। इससे नई फैक्ट्रियां लगेंगी। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत वैश्विक सप्लाई चेन में और मजबूत हो सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत आर्थिक फायदे और रणनीति सुरक्षा के बीच संतुलन बना पाएगा? चीन के निवेश को लेकर मोदी सरकार का यह कदम आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों पर असर डाल सकता है।
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बहरहाल, मोदी सरकार का चीनी निवेश नियमों (पीएन3) में ढील देने का फैसला एक व्यावहारिक लेकिन चुनौतीपूर्ण कदम है। भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने और रोजगार बढ़ाने के लिए विदेशी पूंजी और तकनीक की सख्त जरूरत है। लेकिन, दूसरी ओर चीन के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमारा मानना है कि यह फैसला सरकार की आर्थिक कूटनीति का एक बड़ा परीक्षण है। अगर 'नियंत्रित निवेश' और 'सुरक्षा' के बीच यह मुश्किल संतुलन साध लिया जाता है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। हालांकि, इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीनी स्तर पर इन सुरक्षा मानकों और शर्तों को कितनी कड़ाई और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाता है।
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