Middle East Conflict से शेयर बाजार में हड़कंप, Crude Oil $100 पार होने से बढ़ी Inflation की चिंता

Brent Crude
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Ankit Jaiswal । Sep 10 2026 8:47PM

अमेरिकी-ईरान टकराव और कच्चे तेल के 100 डॉलर के पार जाने से अंतरराष्ट्रीय शेयर बाजारों में भारी गिरावट दर्ज की गई है, जिससे निवेशकों की जोखिम लेने की क्षमता सीमित हो गई है। तेल की उच्च कीमतों से सेवा क्षेत्र की लागत और वैश्विक मुद्रास्फीति में वृद्धि की आशंका प्रबल हो गई है, जो आगामी अमेरिकी फेडरल रिजर्व और यूरोपीय केंद्रीय बैंक के फैसलों को प्रभावित कर सकती है। यह भू-राजनीतिक अस्थिरता वैश्विक वित्तीय संस्थानों, सरकारी उधारी और बांड मार्केट के रिटर्न पर दीर्घकालिक दबाव बना रही है।

वैश्विक बाजारों में बुधवार को एक बार फिर चिंता का माहौल दिखाई दिया। मध्य पूर्व में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य टकराव ने कच्चे तेल की कीमतों को तेज कर दिया है। ब्रेंट कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार कर गया। इसके साथ ही निवेशकों के बीच यह डर बढ़ गया है कि महंगा ईंधन दुनिया भर में महंगाई को फिर से बढ़ा सकता है।

ब्रेंट कच्चे तेल का प्रमुख वायदा कान्ट्रैक्ट बुधवार को 100.19 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गया। यह 24 जुलाई के बाद इसका सबसे ऊंचा स्तर है। उस समय अमेरिका और ईरान के बीच एक समझौते को लेकर उम्मीद बनी हुई थी और तेल की कीमतों में गिरावट देखी जा रही थी।

मौजूद जानकारी के अनुसार,अमेरिका ने रातभर की कार्रवाई में ईरान के कच्चे तेल से जुड़े पांच जहाजों को निशाना बनाया। इसके जवाब में ईरान ने जॉर्डन में अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल हमले किए और समुद्री जहाजों को भी निशाना बनाया। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि वाशिंगटन अमेरिकी युद्धपोतों पर कथित हमलों के जवाब में ईरानी तेल टैंकरों के खिलाफ कार्रवाई जारी रखेगा।

इस सैन्य तनाव का असर शेयर बाजारों पर भी पड़ा है। अमेरिका के प्रमुख शेयर सूचकांक एसएंडपी 500, डाउ जोंस और नैस्डैक में मामूली गिरावट दर्ज की गई। यूरोप के शेयर बाजार भी करीब एक सप्ताह के निचले स्तर पर पहुंच गए। औद्योगिक और बैंकिंग कंपनियों के शेयरों पर ज्यादा दबाव देखा गया। कनाडा के प्रमुख शेयरों के वायदा भाव में भी हल्की गिरावट आई।

एशियाई बाजारों में हालांकि तस्वीर मिली-जुली रही। तकनीकी कंपनियों के शेयरों में सुधार जारी रहा। एआई से जुड़ी कंपनियों में निवेशकों की दिलचस्पी ने इस क्षेत्र को सहारा दिया है। इसके बावजूद महंगे तेल और युद्ध की आशंका के कारण बाजार में जोखिम लेने की प्रवृत्ति कमजोर बनी हुई है।

स्विट्जरलैंड की वित्तीय संस्था स्विसकोट की वरिष्ठ विश्लेषक इपेक ओजकारडेस्काया ने कहा कि युद्ध के कारण तेल की कीमतों में बढ़ोतरी ने निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा को कमजोर किया है। उनके मुताबिक, गर्मियों में शांति समझौते को लेकर जो उम्मीद बनी थी, सितंबर आते-आते वह कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है।

रणनीतिकारो ने 100 डॉलर को मुख्य रूप से मनोवैज्ञानिक सीमा बताया। उनका कहना है कि मांग पर बड़ा असर पड़ने के लिए कच्चे तेल की कीमत करीब 150 डॉलर तक पहुंचनी पड़ सकती है। हालांकि, उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि डीजल की बढ़ती कीमतें महंगाई और सेवा क्षेत्र की लागत को प्रभावित कर सकती हैं।

गौरतलब है कि तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी से केंद्रीय बैंकों के सामने नई मुश्किल खड़ी हो सकती है। महंगाई बढ़ने की आशंका के कारण ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कमजोर पड़ सकती है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक की बैठक गुरुवार को होने वाली है, जबकि अमेरिकी केंद्रीय बैंक अगले सप्ताह ब्याज दरों पर फैसला करेगा।

बांड बाजार भी इस तनाव से अछूते नहीं हैं। महंगाई की चिंता के चलते हाल के सप्ताहों में बांड पर मिलने वाली रिटर्न रेट बढ़ी है। अगस्त के अंत में अमेरिका और ईरान के बीच हमले फिर शुरू होने के बाद अमेरिका, जापान और कुछ यूरोपीय देशों के प्रमुख सरकारी बांडों की रिटर्न दर कई दशकों के ऊंचे स्तर के करीब पहुंच गई है। इससे सरकारों की उधारी महंगी होने और वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर दबाव बढ़ने की चिंता पैदा हुई है। ऐसे में आगे तेल की कीमत और मध्य पूर्व में संघर्ष की दिशा ही वैश्विक बाजारों की चाल तय करने में अहम भूमिका निभाएगी। 

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