झारखंड के कृषि सचिव ने BAU वैज्ञानिकों से कम लागत वाली तकनीक बनाने को कहा

झारखंड के कृषि सचिव ने BAU वैज्ञानिकों से कम लागत वाली तकनीक बनाने को कहा
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झारखंड के कृषि सचिव अबूबाकर सिद्दीकी पी ने वैज्ञानिकों से फसल उत्पादन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए सस्ती व व्यावहारिक तकनीक तैयार करने की अपील की है। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय की रबी अनुसंधान परिषद की बैठक में उन्होंने 10 लाख हेक्टेयर खाली पड़े धान के खेतों में विविधीकरण की रणनीति पर जोर दिया। विशेषज्ञों ने अक्टूबर के बाद पानी की कमी से निपटने के लिए सूक्ष्म सिंचाई और दलहन-तिलहन की खेती की संभावनाओं को रेखांकित किया।

रांची, तीन नवंबर झारखंड के कृषि सचिव अबूबाकर सिद्दीकी पी ने मंगलवार को वैज्ञानिकों से फसल क्षेत्र का विस्तार करने तथा उत्पादन एवं उत्पादकता बढ़ाने के लिए कम लागत वाली, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप और व्यावहारिक तकनीक विकसित करने का आग्रह किया। बिरसा कृषि विश्वविद्यालय (बीएयू) की 46वीं रबी अनुसंधान परिषद की बैठक को ऑनलाइन संबोधित करते हुए सिद्दीकी ने कहा कि किसानों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए जिला स्तर पर स्थित कृषि विज्ञान केंद्रों (केवीके) को फसल सुधार, मृदा प्रबंधन, पौध संरक्षण, जल संरक्षण और जलवायु परिवर्तन प्रबंधन से जुड़ी तकनीकों के प्रसार में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंने कहा, राज्य के 10 लाख हेक्टेयर धान के खाली पड़े खेतों में चरणबद्ध तरीके से विविध फसलों की खेती शुरू करने के लिए प्रभावी रणनीति तैयार करने की जरूरत है।

रांची स्थित आईसीएआर-भारतीय कृषि जैव प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईएबी) के निदेशक सुजय रक्षित ने कहा कि पर्याप्त वर्षा होने के बावजूद झारखंड में अक्टूबर के बाद से ही पानी की किल्लत शुरू हो जाती है। उन्होंने कहा, जल संचयन, संरक्षण, पुनर्चक्रण और स्प्रिंकलर तथा ड्रिप सिंचाई जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों पर अधिक ध्यान देने की जरूरत है। इसके अलावा, राज्य में सब्जियों, अरहर, उड़द, मूंगफली और सरसों की खेती की अपार संभावनाएं हैं।

इनका लाभ उठाने के लिए योजनाबद्ध प्रयास किए जाने चाहिए। बीएयू के कुलपति एससी दुबे ने वैज्ञानिकों से राज्य के धान के खाली पड़े खेतों के लिए खेती की समग्र कार्ययोजना विकसित करने का आग्रह किया। इसमें देर से बोई जाने वाली, कम समय में पकने वाली और जलवायु अनुकूल किस्मों से लेकर फसल प्रबंधन, संरक्षण और कटाई तक की व्यवस्था शामिल होनी चाहिए, ताकि उपज की क्षमता से समझौता किए बिना कटाई के बाद होने वाले नुकसान को न्यूनतम किया जा सके।

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