Delhi High Court का अहम फैसला, आवारा जानवर सामने आने पर भी चालक लापरवाही से मुक्त नहीं

Delhi High Court का अहम फैसला, आवारा जानवर सामने आने पर भी चालक लापरवाही से मुक्त नहीं
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दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक सड़क हादसे के मामले में बीमा कंपनी की अपील खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि आवारा पशु के अचानक सामने आने पर भी वाहन चालक को लापरवाही के दायित्व से छूट नहीं मिल सकती। अदालत ने कहा कि भारत में सड़क उपयोगकर्ताओं में यातायात अनुशासन की अनदेखी की प्रवृत्ति है, इसलिए चालकों को हर समय सतर्क रहने की जरूरत है। इस फैसले के तहत अदालत ने पीड़ित पक्ष को ब्याज सहित 1.7 करोड़ रुपये का मुआवजा देने के न्यायाधिकरण के आदेश को बरकरार रखा।

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि भारत में सड़क का इस्तेमाल करने वाले लोगों में यातायात अनुशासन का पालन नहीं करने और नियमों का सख्ती से पालन करने से बचने की प्रवृत्ति है। अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘अप्रत्याशित स्थिति’ के सिद्धांत का इस्तेमाल करके किसी चालक को लापरवाही के लिए दोषमुक्त नहीं किया जा सकता, भले ही सड़क पर कोई आवारा जानवर आ गया हो और वाहन दुर्घटनाग्रस्त हो गया हो। अदालत ने कहा कि चालकों से अपेक्षा की जाती है कि वे ऐसे खतरों का पहले से अनुमान लगाएं और वाहन में सवार लोगों तथा सड़क का इस्तेमाल करने वाले अन्य लोगों को नुकसान से बचाने के लिए उचित सावधानी बरतें।

अदालत ने ‘आईसीआईसीआई लोम्बार्ड जनरल इंश्योरेंस कंपनी’ की अपील खारिज कर दी। कंपनी ने मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (एमएसीटी) के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें कुत्ते को टक्कर मारने से बचने की कोशिश में कार के सड़क के डिवाइडर से टकरा जाने के बाद गंभीर रूप से घायल हुए सतीश चंद्र गुप्ता को ब्याज सहित 1.7 करोड़ रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया था। उच्च न्यायालय ने पांच अक्टूबर को अपने आदेश में कहा कि चालक की यह दलील कि उसने कुत्ते को बचाने के लिए कार मोड़ी थी, अपने आप में उसे लापरवाही के आरोप से मुक्त नहीं करती।

अदालत ने कहा कि इस मामले में खतरा किसी अन्य व्यक्ति के कारण नहीं, बल्कि एक आवारा पशु के अचानक सामने आ जाने से पैदा हुआ था। उसने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में भी चालकों को सतर्क रहना चाहिए और उचित सावधानी बरतनी चाहिए। न्यायमूर्ति अनीश दयाल ने कहा, ‘‘दोनों ही स्थितियों में ‘अचानक पैदा हुए खतरे’ की स्थिति मौजूद होती है।’’ अदालत ने किसी अन्य व्यक्ति के आचरण से पैदा हुए खतरे और किसी पशु या प्राकृतिक कारण से उत्पन्न खतरे के बीच अंतर स्पष्ट किया।

अदालत ने कहा कि अचानक खतरे का सामना करने वाले व्यक्ति से सटीक निर्णय लेने या पूरी सूझबूझ दिखाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, लेकिन जब खतरा किसी आवारा पशु या अन्य प्राकृतिक कारण से पैदा होता है, तो स्थिति अलग होती है। अदालत ने कहा, ‘‘सड़क का इस्तेमाल करने वाले लोगों में यातायात नियमों का सख्ती से पालन नहीं करने की प्रवृत्ति है। इससे स्वाभाविक रूप से कई तरह की अप्रत्याशित स्थितियां पैदा होती हैं, जिनका सामना भारत में सड़क का इस्तेमाल करने वाले लोगों को अक्सर करना पड़ता है।’’ अदालत ने कहा, ‘‘दुर्घटनाओं से बचने के लिए स्वाभाविक रूप से त्वरित कदम उठाने, लगातार सतर्क रहने और सूझबूझ बनाए रखने की जरूरत होती है।’’ इस मामले में दुर्घटना 28 मई 2014 को हुई थी।

संजय भाटी कार चला रहा था और गुप्ता पिछली सीट पर बैठे थे। कुत्ते को बचाने के लिए भाटी ने कार मोड़ी, जिससे वाहन डिवाइडर से टकरा गया। गुप्ता 22 अगस्त 2020 को अपनी मृत्यु तक कोमा में रहे।

बीमा कंपनी ने इस बात पर भी सवाल उठाया था कि गुप्ता कार में यात्री के रूप में सवार थे या खुद वाहन चला रहे थे।

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