जीतने के बाद इसे ढहा देंगे... टेक्सास में 90 फीट ऊंची भगवान हनुमान की प्रतिमा को लेकर धमकी, फिर भारतीय मूल के सैनिक ने...

अमेरिका के टेक्सस में स्थापित 90 फीट ऊंची भगवान हनुमान की प्रतिमा को गिराने की धमकी भरी सोशल मीडिया पोस्ट से नया विवाद खड़ा हो गया है। अमेरिकी सेना के पूर्व वेटरन रुचर बक्शी ने इस धार्मिक असहिष्णुता का कड़ा विरोध किया। इस घटना ने अमेरिका में धार्मिक स्वतंत्रता और बहुलतावादी पहचान को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी है।
अमेरिका में मध्यावधि चुनावों के माहौल के बीच टेक्सस से सामने आई एक सोशल मीडिया पोस्ट ने धार्मिक स्वतंत्रता और अमेरिकी पहचान को लेकर नई बहस छेड़ दी। मामला टेक्सस के शुगरलैंड स्थित श्री अष्टलक्ष्मी मंदिर का है। जहां भगवान हनुमान की करीब 90 फीट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। इसे स्टैचू ऑफ यूनियन नाम दिया गया। अगस्त 2024 में इसका उद्घाटन हुआ था और मंदिर के अनुसार यह उत्तर अमेरिका में भगवान हनुमान की सबसे ऊंची प्रतिमा। लेकिन अब यही प्रतिमा राजनीतिक और धार्मिक बहस के केंद्र में आ गई। यह विवाद तब शुरू हुआ जब YouTube पर जेसी ह्यूस ने सोशल मीडिया पर इस प्रतिमा की तस्वीर साझा करते हुए लिखा जब हम जीतेंगे तो हम इसे गिरा देंगे। ह्यूस ने अपनी पोस्ट में यह स्पष्ट नहीं किया कि वह किस जीत की बात कर रहे थे। लेकिन पोस्ट के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई। कुछ लोगों ने इसे धार्मिक असहिष्णुता से जोड़कर देखा। जबकि दूसरी तरफ से इसे अमेरिका में धार्मिक प्रतीकों और पहचान को लेकर चल रही व्यापक सांस्कृतिक बहस का हिस्सा बताया गया। इसी बीच अमेरिकी सेना के पूर्व कॉम्बैट वेटरन और हिंदू अमेरिकी रुचर बक्शी ने इस पोस्ट पार्टी की प्रतिक्रिया दी।
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बक्शी अफगानिस्तान और इराक में सैन्य मिशनों में सेवा कर चुके हैं। उन्होंने जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने अमेरिकी सेना की वर्दी इसलिए नहीं पहनी। अपना परिवार इसलिए नहीं छोड़ा और युद्ध क्षेत्र में इसलिए नहीं गए कि बाद में कोई व्यक्ति उनके धर्म को निशाना बनाने की बात करें। बक्शी ने कहा कि उन्होंने ईसाइयों, यहूदियों, मुसलमानों, नास्तिकों और दूसरे हिंदुओं के साथ सेवा की। उनके मुताबिक सेना में किसी की धार्मिक पहचान को इस तरह दूसरे के खिलाफ इस्तेमाल नहीं किया जाता था। उन्होंने यह भी कहा कि जिन हिंदू समुदायों के मंदिरों को निशाना बनाने की बात की जा रही है, वे लोग अमेरिका में टैक्स देते हैं, कारोबार चलाते हैं और अपने बेटे बेटियों को उसी अमेरिकी सेना में भेजते हैं जिसमें उन्होंने खुद सेवा की। बक्शी का तर्क था कि किसी दूसरे अमेरिकी समुदाय के पूजा स्थल को सिर्फ इसलिए नुकसान पहुंचाने की बात करना कि वहां किसी दूसरे धर्म की पूजा होती है। देशभक्ति की परिभाषा में फिट नहीं बैठता।
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अगर अमेरिका में जीत का मतलब किसी धार्मिक समुदाय के मंदिरों को गिराना है तो फिर वो अमेरिका किसके लिए? आप तो जानते ही हैं कि सोशल मीडिया क्या करता है और इस मामले में भी वही हुआ। सवाल करने पर बक्शी को ट्रोल किया गया। एक यूजर ने उनकी सैन्य सेवा का हवाला देने पर सवाल उठाते हुए तर्क दिया कि सेना में सेवा करना अपने आप में किसी व्यक्ति की वफादारी साबित नहीं करता। उसने ऐतिहासिक उदाहरण के तौर पर रोमन साम्राज्य का जिक्र किया और कहा कि अलग-अलग समुदाय के लोगों ने इतिहास में साम्राज्यों की सेनाओं में सेवा की और बाद में उन्हीं के खिलाफ खड़े भी हुए। यानी अब बहस सिर्फ हनुमान जी की प्रतिमा तक सीमित नहीं रहे। एक तरफ सवाल है कि क्या अमेरिका में किसी धार्मिक समुदाय को अपने प्रतीकों और पूजा स्थलों के साथ समान अधिकार मिलना चाहिए। दूसरी तरफ बहस यह है कि अमेरिका की पहचान को धार्मिक बहुलता के आधार पर देखा जाए या किसी एक धार्मिक सांस्कृतिक परंपरा के प्रभुत्व के आधार पर 90 फीट की यह प्रतिमा अगस्त 2024 में धार्मिक आस्था के प्रतीक के तौर पर स्थापित की गई।
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