UNSC सुधार: बिना वीटो नए स्थायी सदस्य सिर्फ दूसरे दर्जे के बनकर रह जाएंगे, भारत की दो टूक

संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुरक्षा परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को यह अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने आगाह किया कि वीटो के बिना नए स्थायी सदस्य बनाने से वे केवल दोयम दर्जे के सदस्य बनेंगे और फैसले लेने का नियंत्रण मौजूदा पांच देशों के पास ही रहेगा। भारत ने दोनों श्रेणियों में विस्तार की वकालत करते हुए कहा कि केवल अस्थायी सीटें बढ़ाना सुधार प्रक्रिया को विफल कर देगा।
(योषिता सिंह) संयुक्त राष्ट्र, 27 अक्टूबर भारत ने कहा है कि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) में वीटो के अधिकार के बिना नए स्थायी सदस्यों की एक अलग श्रेणी बनाने से वे वास्तव में ‘‘दूसरे दर्जे’’ के सदस्य बन जाएंगे और फैसले लेने का अधिकार मौजूदा पांच स्थायी सदस्यों के पास ही बना रहेगा। चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका 15 सदस्यीय सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य हैं और इनके पास वीटो का अधिकार है। परिषद में 10 अस्थायी सदस्य भी होते हैं, जिन्हें दो साल के कार्यकाल के लिए चुना जाता है।
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थायी प्रतिनिधि राजदूत हरीश पर्वतनेनी ने सोमवार को कहा कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधार के बाद भी परिषद के सभी स्थायी सदस्यों को यह अधिकार मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि निष्पक्षता और न्याय के लिए जरूरी है कि सभी स्थायी सदस्यों के अधिकार और जिम्मेदारियां समान हों। उन्होंने कहा, ‘‘वीटो के संबंध में भारत का रुख सैद्धांतिक और सर्वविदित है... हम एक बार फिर यही दोहराते हैं कि जब तक वीटो का प्रावधान मौजूद है, तब तक सुधार के बाद गठित परिषद के सभी स्थायी सदस्यों के पास यह अधिकार होना चाहिए।’’ पर्वतनेनी ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘वीटो के सवाल पर विषयवार चर्चा’ के मुद्दे पर आयोजित अंतर-सरकारी वार्ता (आईजीएन) के पूर्ण सत्र को संबोधित करते हुए कहा कि सुरक्षा परिषद में सुधार के तहत वीटो के अधिकार के बिना स्थायी सदस्यों की एक नयी श्रेणी बनाने से इस श्रेणी में शामिल देश वास्तव में ‘‘दूसरे दर्जे’’ के सदस्य बन जाएंगे।
इससे पांच स्थायी सदस्यों (पी5) के फैसले लेने के तरीके में कोई बदलाव नहीं आएगा। भारत स्थायी और अस्थायी दोनों तरह की श्रेणियों में सदस्यों की संख्या के विस्तार की लगातार मांग करता रहा है। भारत ने आगाह किया है कि अगर सुधार के प्रयास केवल अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक सीमित रहे, तो वे लगभग ‘‘विफल’’ साबित होंगे।
भारत सुरक्षा परिषद में सुधार को लेकर कई साल से जारी प्रयासों में सबसे आगे रहा है। भारत का कहना है कि 1945 में बनी यह संस्था 21वीं सदी के हिसाब से उपयुक्त नहीं है और यह मौजूदा भू-राजनीतिक वास्तविकताओं को नहीं दर्शाती है। भारत इस बात पर लगातार जोर देता रहा है कि वह सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता का उचित हकदार है।
भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद में अस्थायी सीट पाने की कोशिश भी कर रहा है। इस कार्यकाल के लिए चुनाव अगले साल जून में होने हैं। इसमें एशिया-प्रशांत समूह के लिए आवंटित एकमात्र सीट के लिए भारत और ताजिकिस्तान के बीच मुकाबला होगा।
भारत इससे पहले 2021-22 में सुरक्षा परिषद का सदस्य रहा था। यह परिषद में उसका आठवां कार्यकाल था। इससे पहले भारत 1950-51, 1967-68, 1972-73, 1977-78, 1984-85, 1991-92 और 2011-12 में भी परिषद का सदस्य रह चुका है।
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