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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[कानून का चकमा देने का अनैतिक खेल है दल बदल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/defection-is-an-unethical-game-of-circumventing-the-law]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अरस्तू का मानना था कि राजनीति और नैतिकता एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। जब राजनीति व्यक्तिगत स्वार्थ या भ्रष्टाचार से ग्रसित हो जाती है, तो समाज का नैतिक पतन होता है, जो लोकतंत्र के मूल उद्देश्य—"सामान्य कल्याण" को कमजोर कर देता है। देश में विपक्षी दलों के सांसदों में मची भगदड़ से अरस्तू का यह कथन आज भी अत्यंत प्रासंगिक है। सांसदों का एक दल से दूसरे दल में जाना केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है; यह उस गहरी प्रवृत्ति का संकेत है जिसे संस्थागत अवसरवाद कहा जा सकता है। आज दल-बदल अपवाद नहीं रहा, बल्कि एक सामान्यीकृत राजनीतिक व्यवहार बनता जा रहा है, जहाँ जनादेश, विचारधारा और नैतिकता—तीनों क्रमशः हाशिए पर खिसकते प्रतीत होते हैं।</div><div><br></div><div>शिवसेना यूबीटी के नौ लोकसभा सांसदों में से छह ने एकनाथ शिंदे गुट का दामन थाम लिया। इन सभी सांसदों ने दिल्ली में लोकसभा स्पीकर ओम बिरला से पहले मुलाकात की और फिर शिवसेना में विलय की घोषणा की। उद्धव ठाकरे की शिवसेना में यह दूसरी बार टूट हुई है। इससे पहले 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में पार्टी दोफाड़ हो गई थी। फिर चुनाव आयोग ने एकनाथ शिंदे के गुट को भी मूल शिवसेना का दर्जा मिल गया। तब उद्धव ठाकरे ने अपने गुट का नाम शिवसेना यूबीटी रख लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/operation-lotus-or-legal-merger-clause-within-the-opposition-goa-case-will-determine-the-outcome" target="_blank">कानून का 'Merger' या BJP का Operation Lotus? Goa Case का फैसला बदलेगा दलबदल का पूरा खेल</a></h3><div>इससे पहले तृणमूल कांग्रेस के 22 सांसदों ने भी पार्टी तोड़कर एनसीपीआई का दामन थाम लिया था। एनसीपीआई एनडीए की एक बेहद छोटी पार्टी है। शिवसेना यूबीटी में टूट का सीधा फायदा केंद्र में सत्ताधारी एनडीए को मिलने वाला है। इससे एनडीए का संख्या बल और बढ़ जाएगा। माना जा रहा है कि केंद्र सरकार लोकसभा में दो तिहाई बहुमत के जुगाड़ में लगी है ताकि आने वाले दिनों में वह कुछ अहम संविधान संशोधन विधेयकों को पास करवा सके। शिवसेना उद्धव गुट के सांसदों के शिवसेना में शामिल होने के बाद लोकसभा में एनडीए का कुनबा 320 के करीब पहुंच गया है।</div><div><br></div><div>सांसदों और विधायकों की ऐसी ही टूटफूट से ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस हाशिए पर आ चुकी है। टीएमसी के 80 विधायकों में से 58 ने ममता से विद्रोह कर दिया था। ममता बनर्जी इस झटके से उबर भी नहीं पाई कि तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने बागी होने की घोषणा कर दी। टीएमसी के पास लोकसभा की 28 सीटें होने के कारण, बागी गुट को दो-तिहाई बहुमत हासिल करने के लिए कम से कम 19 सांसदों के समर्थन की आवश्यकता थी। एक ऐसी राजनीतिक पार्टी, जिसकी न लोकसभा और न ही विधनसाभा, कहीं पर भी एक सीट तक नहीं है, उस पार्टी में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने विलय कर लिया है। इस कदम को दल-बदल विरोधी कानून से बचने के लिए अहम माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>विगत महीनों में गैरभाजपा दलों में विधायकों—सांसदों के विद्रोह की शुरुआत अरविन्द केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से हुई थी। आम आदमी पार्टी के सात राज्य सभा सांसदों ने भाजपा का दामन थाम लिया। इस फैसले के बाद उच्च सदन में आप की ताकत घटकर सिर्फ तीन सांसदों तक रह गई है। राज्यसभा में की ताकत बढ़कर 113 पहुंची वहीं, इस बदलाव से भाजपा को सीधा फायदा हुआ है और उसकी संख्या राज्यसभा में बढ़कर 113 पहुंच गई है। इसके साथ ही एनडीए का आंकड़ा 148 पहुंच गया। वहीं, जिन सात सांसदों का भाजपा में विलय हुआ है, उनमें राघव चड्ढा, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, संदीप पाठक, विक्रमजीत साहनी, स्वाति मालीवाल और राजिंदर गुप्ता शामिल हैं।</div><div><br></div><div>अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या विधायकों का एक गुट खुद विलय की घोषणा कर सकता है, या जिस राजनीतिक दल का वे प्रतिनिधित्व करते हैं, उसे सहमत होना जरूरी है? सुप्रीम कोर्ट को इस मामले पर अभी फैसला लेना है। भारत का दल-बदल विरोधी कानून संविधान की दसवीं अनुसूची के माध्यम से पेश किया गया था। यह 1985 में 52वें संवैधानिक संशोधन के जरिए लागू हुआ। यह 'आया राम, गया राम' की राजनीति की घटना की प्रतिक्रिया थी, जिसमें सरकारें गिराने या खुद की उन्नति हासिल करने के लिए विधायक/सांसद मध्यावधि में दल बदल लेते हैं। बता दें कि दसवीं अनुसूची के तहत, कोई भी विधायक जो स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है या सदन में अपनी पार्टी के निर्देश के खिलाफ वोट करता है, उसे अयोग्य घोषित कर दिया जाता है।</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक के विधायकों के मामले में अपना निर्णय समाज विज्ञान के सम्मानित प्रोफेसर आंद्रे बेताई के इन शब्दों से शुरू किया था। कोर्ट ने लिखा, ‘हमारे संविधान निर्माताओं ने लोगों को सांविधानिक मूल्यों को बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपी है, लेकिन प्रश्न है कि हम अपने इस कर्तव्य को निभाने में कितने सफल हुए? लोकतंत्र और सांविधानिक जिम्मेदारियों को कितना निभा सके?’ कोर्ट ने कहा, मतभेद और दलबदल ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। इन्हें अलग साबित करके ही लोकतांत्रिक मूल्यों को अन्य लोकतांत्रिक विचारों के साथ संतुलित रखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>कोर्ट ने कहा था कि ‘संसदीय लोकतंत्र में सांविधानिक नैतिकता बरकरार रखने की जिम्मेदारी सरकार और विपक्ष दोनों पर बराबर होती है। भारत में राजनीतिक दल सत्ता में रहने पर अलग और सत्ता से बाहर होने पर अलग ढंग से इस जिम्मेदारी को देखते हैं। यही वजह है कि भारत में जनमानस मानने लगा है कि हमारी राजनीतिक व्यवस्था अनैतिक हो चुकी है। कोर्ट ने कहा, मतभेद और दलबदल ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। इन्हें अलग साबित करके ही लोकतांत्रिक मूल्यों को अन्य लोकतांत्रिक विचारों के साथ संतुलित रखा जा सकता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ‘केवल संविधान की रक्षा और उसकी अक्षुण्णता की शपथ लेना काफी नहीं है। बल्कि सांविधानिक मूल्यों को रोजमर्रा के कामों में शामिल करने की अपेक्षा हमारे महान संविधान ने की है।</div><div><br></div><div>आज दल-बदल अपवाद नहीं रहा, बल्कि एक सामान्यीकृत राजनीतिक व्यवहार बनता जा रहा है, जहाँ जनादेश, विचारधारा और नैतिकता—तीनों क्रमशः हाशिए पर खिसकते प्रतीत होते हैं।</div><div>यह स्थिति हमें यह पुनर्विचार करने के लिए बाध्य करती है कि क्या राजनीति अब भी सिद्धांतों और मूल्यों से संचालित है?, या वह केवल सत्ता- समीकरणों का खेल बनकर रह गई है। इस संदर्भ में यह स्वीकार करना होगा कि कानून केवल आंशिक समाधान प्रदान कर सकता है; वास्तविक समाधान राजनीतिक संस्कृति और नैतिकता में निहित है।</div><div><br></div><div>पार्टी विद डिफरेंस का जुमला गढ़ने वाली भाजपा भी लोकतंत्र को कमजोर करने वाले दल बदल के खेल में शामिल हो गई। दल बदलने वाले पहले भाजपा को और भाजपा इनको देशद्रोही, भ्रष्टाचारी, मुसलमान समर्थक या मुसलमान विरोधी और न जाने किस किस ढंग से कोसते रहें हैं। दल बदलने के बाद अचानक से दल बदलने वाले और इन्हें लेने वाले पवित्र गाय बन गए। दल बदल कराए बगैर जनाधार बढ़ाना काफी तकलीफदेह होता है। मतलब खुद के बलबूते पर पूर्ण सत्ता प्राप्त करने में बड़ा जोर आता है। इसके लिए जनता से वादे करने पड़ते हैं, उन्हें निभाने के लिए ईमानदारी और पारदर्शिता की जरूरत होती है। ऐसे में यदि दूसरे का पकाया हुआ खाने को मिल जाए तो कौन पीछे रहना चाहेगा। सिद्धान्तों और नैतिकता, ये सब अब किताबी बातें रह गई हैं।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 18:29:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/defection-is-an-unethical-game-of-circumventing-the-law</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[अपना बोया ही काट रही ममता बनर्जी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mamata-banerjee-is-reaping-exactly-what-she-sowed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में सत्तासीन तृणमूल कांग्रेस को मिली ऐतिहासिक पराजय के बाद, जिस तरह पार्टी के विधायक और सांसद ममता बनर्जी से नाता तोड़ रहे हैं, उसने कई लोगों को हैरान किया है। लेकिन ममता बनर्जी पिछले 28-29 सालों से जिस तरह की सिद्धान्तहीन राजनीति करती रही हैं, उसे देखते हुए इन जन-प्रतिनिधियों के कारनामे कुछ भी असामान्य नहीं लगते। वे बस वही कर रहे हैं जो ममता दीदी ने उन्हें सिखाया है। असल में, अच्छा शिष्य वही है जो अपने गुरु के दिखाए रास्ते पर चले। ये सांसद और विधायक भी वही कर रहे हैं जो ममता बनर्जी करती रही हैं, यानी बिना किसी सिद्धांत या आदर्शवादी राजनीति। किसी को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करना और काम निकल जाने पर उसे छोड़ देना, बार-बार उससे मुंह मोड़ लेना और विपक्षी पार्टियों के विधायकों पर हमला करना।</div><div><br></div><div>तृणमूल कांग्रेस के बागी विधायकों और सांसदों पर मुख्य आरोप यह है कि तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने के बाद, वे अब विपक्षी भाजपा के साथ मिल रहे हैं, वही भाजपा, जिसे उन्होंने चुनाव के दौरान सांप्रदायिक पार्टी बताकर हराया था। लेकिन ममता बनर्जी ने भी 1998 में ऐसा ही किया था, जब उन्होंने 1 जनवरी 1998 को कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उस समय ममता बनर्जी को कांग्रेस से यह शिकायत थी कि राज्य में लेफ्ट फ्रंट को हराने के लिए कांग्रेस भाजपा के साथ हाथ क्यों नहीं मिला रही है? उस समय ममता भाजपा को सांप्रदायिक नहीं मानती थीं। उन्होंने यह भी कहा था कि भाजपा कोई सांप्रदायिक पार्टी नहीं है। तो, अगर अब तृणमूल कांग्रेस के सांसद और विधायक कह रहे हैं कि भाजपा सांप्रदायिक पार्टी नहीं है, तो इसमें क्या गलत है? वे बस अपनी प्रिय नेता के पदचिन्हों पर चल रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/tmc-rebel-mps-merge-with-ncpi-political-crisis" target="_blank">गुमनाम पार्टी में क्यों शामिल हुए TMC के नामी सांसद? दलबदल विरोधी नारे वाला दल क्यों बना तृणमूल के बागियों का नया ठिकाना?</a></h3><div>बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने चार बार (2013, 2017, 2022 और 2024 में) अपना पक्ष बदला, लेकिन ममता बनर्जी अब तक पांच बार अपना पक्ष बदल चुकी हैं। इतिहास के पन्ने पलटे तो, बात 1997 की है, केंद्र में संयुक्त मोर्चा की सरकार थी। संयुक्त मोर्चा सरकार को बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने अपना समर्थन वापस ले लिया, नतीजतन नवंबर 1997 में सरकार गिर गई और 1998 में नए सिरे से लोकसभा चुनाव हुए। तब तक ममता कांग्रेस छोड़कर एक नई पार्टी बना चुकी थीं। चुनावों में ममता की तृणमूल कांग्रेस ने भाजपा के साथ सीट का समझौता किया और सात सीटें जीतीं। हालांकि, वह सरकार में शामिल नहीं हुईं क्योंकि उन्होंने राज्य में अपनी नई बनी पार्टी को मजबूत करने पर ध्यान दिया। 13 महीने बाद केंद्र सरकार गिर गई।</div><div><br></div><div>1999 के चुनावों के बाद एक नई सरकार बनी, जिसमें ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं। 2001 में, जब बंगाल विधानसभा चुनाव नजदीक थे, तो ममता को लगा कि कांग्रेस पार्टी के साथ गठबंधन करना फायदेमंद रहेगा। इसलिए, मार्च 2001 में उन्होंने रक्षा क्षेत्र में भ्रष्टाचार के मामले (तहलका स्टिंग ऑपरेशन) का हवाला देते हुए केंद्र सरकार से इस्तीफा दे दिया और कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया। हालांकि, इससे भी बंगाल में लेफ्ट फ्रंट को हराया नहीं जा सका। लेफ्ट फ्रंट ने 199 सीटें जीतीं, जबकि तृणमूल कांग्रेस को 31 प्रतिशत वोट के साथ सिर्फ़ 60 सीटें मिलीं।</div><div><br></div><div>अगले विधानसभा चुनाव में अभी पांच साल बाकी थे और केंद्र में भाजपा की सरकार थी। इसलिए, 2003 में ममता बनर्जी फिर से वाजपेयी सरकार में शामिल हो गईं। वह सितंबर 2003 में वाजपेयी सरकार में मंत्री बनीं, जबकि गुजरात दंगे डेढ़ साल पहले, यानी फरवरी 2002 में हो चुके थे। उन्होंने दंगों के लिए गुजरात में मोदी सरकार के इस्तीफे की मांग की थी, लेकिन जब अप्रैल 2002 में लोकसभा में वाजपेयी सरकार के खिलाफ निंदा प्रस्ताव लाया गया, तो ममता की पार्टी ने वाजपेयी का समर्थन किया। इस समर्थन के बदले, कुछ महीनों बाद उन्हें फिर से मंत्री बनाया गया।</div><div><br></div><div>ममता बनर्जी ने 2004 के लोकसभा और 2006 के विधानसभा चुनाव बीजेपी के साथ गठबंधन करके लड़े। हालांकि, जब उनकी पार्टी को दोनों चुनावों में करारी हार का सामना करना पड़ा। 2004 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल को सिर्फ एक सीट मिली और 2006 के विधानसभा चुनावों में न सिर्फ पार्टी का वोट शेयर घटा (26 प्रतिशत हो गया) बल्कि उसकी सीटें भी आधी रह गईं, तो ममता को लगा कि भाजपा के साथ गठबंधन करने का कोई फायदा नहीं है। केंद्र में भाजपा के सत्ता से बाहर होने के बाद, ममता बनर्जी ने फिर से कांग्रेस पार्टी का रुख किया। उन्होंने 2009 के लोकसभा चुनाव मिलकर लड़े। तृणमूल कांग्रेस ने 19 सीटें जीतीं। इस जीत से उत्साहित होकर, उन्होंने कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर 2011 का विधानसभा चुनाव लड़ा और सरकार बनाई।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>सरकार बनाने के ठीक एक साल बाद, ममता ने कांग्रेस से गठबंधन तोड़ दिया, क्योंकि उन्हें अब कांग्रेस की सीढ़ी की जरूरत नहीं थी, लेकिन वह यहीं नहीं रुकीं। वह उस सीढ़ी को ही आग लगाने पर आमादा थीं। इसलिए उन्होंने विपक्षी विधायकों को एक-एक करके तोड़ना शुरू किया और अगले पांच सालों में कांग्रेस पार्टी के 42 विधायकों को अपनी तरफ कर लिया। कांग्रेस ही पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस बन चुकी थी। उन्होंने लेफ्ट फ्रंट के चार विधायकों को भी पार्टी में शामिल किया, जबकि उन्हें उनकी जरूरत नहीं थी। इन विधायकों के बिना भी, पार्टी के पास 184 विधायकों का मजबूत बहुमत था।</div><div><br></div><div>2016 के विधानसभा चुनाव के बाद भी ममता बनर्जी ने विपक्षी विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल करना जारी रखा, जबकि तृणमूल कांग्रेस ने पहली बार अकेले चुनाव लड़ा था और 211 सीटें जीती थीं। उन्हें विपक्षी विधायकों को अपने पाले में लाने की जरूरत नहीं थी। फिर भी, अगले पांच सालों में उन्होंने कांग्रेस के 18 और लेफ्ट फ्रंट के 4 विधायकों को अपनी पार्टी में शामिल कर लिया। यह सिलसिला 2021 के चुनावों के बाद भी जारी रहा, जब भाजपा के टिकट पर चुने गए 7 विधायक तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए। इनमें से सिर्फ तीन या चार विधायकों ने अपनी सीट से इस्तीफा दिया और तृणमूल कांग्रेस के टिकट पर उपचुनाव लड़ा। बाकी नेता अपनी सीटें छोड़े बिना तृणमूल कांग्रेस के साथ बने रहे। स्पीकर उनकी सदस्यता रद्द करने की याचिकाओं पर कोई फैसला नहीं ले रहे थे, जबकि वे अपना विधायी कार्यकाल पूरा करते रहे। कुछ नेता तो मंत्री भी बन गए, और कुछ ने सत्ता के फायदों का आनंद लेना जारी रखा।</div><div><br></div><div>विपक्ष के जिन विधायकों ने मंत्री पद, पैसे और सत्ता के लिए पाला बदला था, और ममता बनर्जी को उसमें कुछ भी अनैतिक नहीं लगा था, वही काम आज उनकी ‘अपनी’ पार्टी के तृणमूल विधायक और सांसद भी कर रहे हैं; तो फिर ममता को क्या शिकायत होनी चाहिए? बागी तृणमूल विधायक और सांसद अपना नया गुट बनाकर भाजपा नीत एनडीए के पक्ष में खड़े है। असल में आज ममता दीदी को वही फसल काटनी पड़ रही है, जो खुद उन्होंने बोयी थी। तृणमूल कांग्रेस के पंद्रह साल के कार्यकाल में जो अत्याचार, अनाचार और भ्रष्टाचार हुआ है, उससे ममता दीदी की छवि को गहरा धक्का लगा। आज उनके साथ जो हो रहा है, वो उनके कर्मों का ही नतीजा है। इसलिए उनके साथ न उनके नेता खड़े हैं, और न ही जनता।&nbsp; तृणमूल कांग्रेस और ममता बनर्जी के साथ आज जो कुछ हो रहा है, उस घटनाक्रम से ममता बनर्जी के सिवाय कोई दूसरा दुखी भी नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. आशीष वशिष्ठ,&nbsp;</div><div>स्वतंत्र पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 14:55:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mamata-banerjee-is-reaping-exactly-what-she-sowed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[NDA से मिल रहे झटकों से उबरने के लिए Congress में लौटेंगे Sharad Pawar, Mamata Banerjee, Jagan Mohan Reddy!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-bloc-future-and-congress-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति इन दिनों एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां पुराने रिश्तों, टूटी महत्वाकांक्षाओं और सत्ता की नई हकीकतों ने विपक्ष की राजनीति को गहरे सवालों के सामने ला खड़ा किया है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की करारी हार, महाराष्ट्र में शरद पवार की कमजोर होती पकड़ और उद्धव ठाकरे के सामने खड़ा राजनीतिक संकट अब केवल क्षेत्रीय दलों की परेशानी नहीं रह गया है, बल्कि यह पूरे विपक्ष की दिशा तय करने वाला मुद्दा बन चुका है। इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस में "घर वापसी" की बहस ने अचानक जोर पकड़ लिया है।</div><div><br></div><div>तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस के विलय की अटकलों ने तब तेजी पकड़ी जब ममता बनर्जी ने सोनिया गांधी से मुलाकात की और उसके बाद अभिषेक बनर्जी की राहुल गांधी के साथ लंबी बैठक हुई। हालांकि दोनों दलों ने इन खबरों को सिरे से खारिज कर दिया, लेकिन इस बहस ने एक बड़ा राजनीतिक सवाल खड़ा कर दिया कि क्या भाजपा के खिलाफ मजबूत मोर्चा बनाने के लिए कांग्रेस से अलग हुए नेताओं को अब फिर उसी छतरी के नीचे लौट आना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-meaning-of-mamata-tears-who-showed-her-eyes-to-congress" target="_blank">कांग्रेस को आंखे दिखाने वाली ममता के आंसूओं का मर्म</a></h3><div>दरअसल ममता बनर्जी की स्थिति पहली बार इतनी कमजोर नजर आ रही है। पंद्रह साल तक बंगाल की राजनीति पर एकछत्र राज करने वाली ममता की पार्टी विधानसभा चुनाव में महज अस्सी सीटों पर सिमट गई और भाजपा ने राज्य में पहली बार सरकार बना ली। चुनावी हार के बाद संकट और गहरा गया। कई विधायक और करीबी सहयोगी भाजपा के संपर्क में चले गए। पार्टी के भीतर अभिषेक बनर्जी को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया। पुराने नेताओं ने आरोप लगाया कि जिन्होंने वर्षों तक पार्टी को खड़ा किया, उन्हें किनारे कर दिया गया। कभी कांग्रेस को तुच्छ समझने वाली ममता बनर्जी को आखिरकार उसी कांग्रेस के दरवाजे पर दस्तक देनी पड़ी।</div><div><br></div><div>कुछ ऐसी ही कहानी शरद पवार की भी है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी बनाकर कांग्रेस से अलग रास्ता चुनने वाले पवार आज अपनी ही पार्टी और चुनाव चिन्ह पर नियंत्रण खो चुके हैं। अजित पवार के विद्रोह ने उनकी राजनीतिक ताकत को बुरी तरह झटका दिया था। उद्धव ठाकरे की हालत भी अलग नहीं है। शिवसेना पर नियंत्रण गंवाने के बाद अब उनके सांसदों में भी टूट हो गयी है। इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि जिन क्षेत्रीय दलों को कभी अपने राज्यों में अजेय माना जाता था, वह अब भाजपा के आक्रामक विस्तार और अंदरूनी बिखराव के सामने कमजोर पड़ रहे हैं।</div><div><br></div><div>इसी माहौल में शिवसेना नेता संजय राउत ने यह विचार उछाला कि कांग्रेस से निकले दलों को फिर से मूल पार्टी में लौट आना चाहिए। राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और महाराष्ट्र कांग्रेस के नेता नाना पटोले ने भी इस सोच का समर्थन किया। पहली नजर में यह तर्क मजबूत लगता है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भाजपा आज देश की सबसे प्रभावशाली राजनीतिक ताकत बन चुकी है। कभी केवल सात राज्यों तक सीमित रहने वाली पार्टी अब 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सत्ता का हिस्सा है। विपक्ष बिखरा हुआ है और कई क्षेत्रीय दल कमजोर पड़ चुके हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन असली सवाल यह है कि ये नेता कांग्रेस छोड़कर गए ही क्यों थे? ममता बनर्जी ने वैचारिक मतभेदों के कारण कांग्रेस नहीं छोड़ी थी। उन्हें लगता था कि कांग्रेस बंगाल में वाम मोर्चे को हराने में नाकाम हो चुकी है। उन्होंने आक्रामक राजनीति का रास्ता चुना और तृणमूल कांग्रेस बनाई। नतीजा यह हुआ कि उन्होंने चौंतीस साल पुरानी वाम सत्ता को उखाड़ फेंका। शरद पवार ने सोनिया गांधी के विदेशी मूल का मुद्दा उठाकर अलग पार्टी बनाई और महाराष्ट्र में अपनी अलग पहचान कायम की। जगन मोहन रेड्डी ने भी कांग्रेस नेतृत्व से उपेक्षा महसूस करने के बाद नई पार्टी बनाई और कुछ ही वर्षों में आंध्र प्रदेश में कांग्रेस को लगभग समाप्त कर दिया।</div><div><br></div><div>आज हालात बदले हैं तो उसकी वजह कांग्रेस की मजबूती नहीं, बल्कि भाजपा का विस्फोटक उभार है। पहले क्षेत्रीय दल कांग्रेस की खाली होती जमीन पर फैलते थे, लेकिन अब उन्हें भाजपा से सीधी टक्कर लेनी पड़ रही है। भाजपा न केवल चुनाव जीत रही है, बल्कि नेताओं, कार्यकर्ताओं और संगठन को भी अपने पक्ष में खींच रही है। यही वजह है कि क्षेत्रीय दलों की जमीन लगातार सिकुड़ रही है।</div><div><br></div><div>फिर भी सवाल बना हुआ है कि क्या कांग्रेस में वापसी वास्तव में संभव है? क्या ममता बनर्जी या शरद पवार जैसे नेता दशकों तक अपनी पार्टी चलाने के बाद राहुल गांधी या मल्लिकार्जुन खरगे के नेतृत्व में काम करना स्वीकार करेंगे? क्या उनके समर्थक इसे पचा पाएंगे। साथ ही पश्चिम बंगाल में अधीर रंजन चौधरी और ममता बनर्जी को एक मंच पर साथ काम करते देखना लगभग असंभव लगता है, क्योंकि दोनों की राजनीति ही एक दूसरे के विरोध पर खड़ी रही है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा विपक्षी दल पहले से ही इंडिया गठबंधन के जरिए साथ काम कर रहे हैं। लोकसभा चुनाव में कांग्रेस, तृणमूल, समाजवादी पार्टी, द्रमुक, शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने अलग पहचान बनाए रखते हुए भाजपा को कड़ी चुनौती दी थी। इससे साबित हुआ कि भाजपा के खिलाफ एकजुटता के लिए औपचारिक विलय जरूरी नहीं है। असली समस्या क्षेत्रीय दलों में आपसी प्रतिस्पर्धा की है, जो केवल विलय से खत्म नहीं होने वाली।</div><div><br></div><div>सच्चाई यह है कि कांग्रेस को केवल बड़े चेहरे नहीं, बल्कि मजबूत संगठन और जमीनी कार्यकर्ताओं की जरूरत है। वहीं ममता बनर्जी, शरद पवार और जगन मोहन रेड्डी जैसे नेताओं की असली ताकत उनकी क्षेत्रीय पहचान और जनता से सीधा जुड़ाव रहा है। इसलिए उनके लिए कांग्रेस में लौटना शायद राजनीतिक आत्मसमर्पण जैसा होगा। विपक्ष की राजनीति का भविष्य किसी औपचारिक विलय में नहीं, बल्कि साझा रणनीति और मजबूत तालमेल में छिपा दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, फिलहाल इतना तय नजर आता है कि भाजपा के खिलाफ लड़ाई में विपक्षी दलों को साथ चलना ही होगा, लेकिन अपनी अलग पहचान खत्म कर कांग्रेस में समा जाना कई क्षेत्रीय नेताओं के लिए राजनीतिक आत्मघाती साबित हो सकता है। वजह साफ है, कांग्रेस में आखिरकार निर्णय की धुरी एक ही परिवार के इर्दगिर्द घूमती दिखाई देती है। ऐसे में वर्षों की मेहनत से अपनी जमीन तैयार करने वाले क्षेत्रीय क्षत्रप बाद में खुद को हाशिये पर पाकर पछता सकते हैं। जिस पार्टी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे तक को हर बड़े फैसले पर "हाईकमान से पूछना पड़ेगा" कहना पड़ता हो, वहां आंतरिक लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 13:16:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/india-bloc-future-and-congress-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Wedding Season शुरू हो गया, Iran-US War खत्म हो गयी, क्या अब Gold Jewellery को खरीदना सही रहेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/iran-us-war-gold-prices-india-wedding-season-jewellery-market-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया में ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों से एक साल तक सोना नहीं खरीदने और सादगी अपनाने की अपील की थी। उनका तर्क था कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है और जब कच्चे तेल की कीमतें तथा वैश्विक तनाव दोनों बढ़ते हैं, तब सोने का आयात देश के विदेशी मुद्रा भंडार और चालू खाते के घाटे पर भारी दबाव डालता है। इसी चिंता को देखते हुए सरकार ने सोना और चांदी पर सीमा शुल्क छह प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत कर दिया था। इस फैसले के बाद देश में सोने का आयात करीब 70 प्रतिशत घटकर 75 से 100 टन प्रति माह के स्तर से गिरकर केवल 25 से 30 टन रह गया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा सोना उपभोक्ता है और देश के कुल आयात में सोने की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत से अधिक है। सरकार का मानना है कि पश्चिम एशिया में अनिश्चितताओं के कारण आयात लागत और बढ़ सकती है, इसलिए विदेशी मुद्रा को कच्चे तेल, उर्वरक, औद्योगिक कच्चे माल और पूंजीगत वस्तुओं जैसे आवश्यक आयातों के लिए बचाना जरूरी है। यही वजह थी कि प्रधानमंत्री मोदी ने आभूषणों पर अत्यधिक खर्च से बचने और अनावश्यक सोना खरीद पर नियंत्रण की अपील की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/significant-impact-of-15-percent-import-duty-on-gold-imports-country-dropped-by-70-percent" target="_blank">सोने पर 15% आयात शुल्क का बड़ा असर: देश में गोल्ड इम्पोर्ट 70 प्रतिशत घटा, भारी विदेशी मुद्रा बचाने की कवायद</a></h3><div>दरअसल, भारत में सोने के प्रति मोह सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। यहां सोने का महत्व केवल निवेश तक सीमित नहीं है। भारत में सोना सामाजिक प्रतिष्ठा, सुरक्षा और पारिवारिक परंपरा का प्रतीक माना जाता है। यही कारण है कि हर वर्ष सैकड़ों टन सोना आयात किया जाता है। आर्थिक रिपोर्टों के अनुसार भारत ने पिछले वर्ष 800 टन से अधिक सोना आयात किया, जबकि घरेलू उत्पादन बेहद कम रहा। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी भारी निर्भरता भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ाती है।</div><div><br></div><div>अब सवाल यह है कि यदि ईरान अमेरिका संघर्ष समाप्ति की ओर बढ़ रहा है, तो क्या लोगों को फिर से सोना खरीदना शुरू कर देना चाहिए? इस प्रश्न का उत्तर सीधा नहीं है, क्योंकि सोने की कीमतें केवल युद्ध से तय नहीं होतीं। उनमें डॉलर की मजबूती, अमेरिकी ब्याज दरें, केंद्रीय बैंकों की खरीदारी, महंगाई और निवेशकों की मनोवृत्ति भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।</div><div><br></div><div>हाल के सप्ताहों में देखने को मिला कि जैसे ही अमेरिका और ईरान के बीच अस्थायी समझौते तथा युद्धविराम की खबरें सामने आयीं, अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतों में नरमी आई। तेल कीमतों में गिरावट और डॉलर की मजबूती के कारण सोना दबाव में रहा। अमेरिकी फेडरल रिजर्व की सख्त ब्याज दर नीति ने भी सोने की चमक कम की।</div><div><br></div><div>हालांकि दूसरी ओर कई वैश्विक निवेश बैंक अब भी लंबे समय के लिए सोने को मजबूत निवेश मान रहे हैं। जेपी मोर्गन का अनुमान है कि 2026 और 2027 में सोने की कीमतें और ऊपर जा सकती हैं, क्योंकि दुनिया भर के केंद्रीय बैंक लगातार अपने भंडार में सोना जोड़ रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि युद्ध समाप्त होने के बाद सोने में तात्कालिक गिरावट संभव है, लेकिन लंबी अवधि में इसकी मांग बनी रह सकती है। मार्केटवाच की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल युद्ध के आधार पर सोना खरीदना हमेशा लाभकारी रणनीति नहीं होती, क्योंकि कई बार युद्ध के दौरान भी सोना गिरा है। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि सोने को भावनात्मक निर्णय की बजाय संतुलित निवेश के रूप में देखना चाहिए।</div><div><br></div><div>उधर, भारत में इस समय शादी विवाह का मौसम शुरू हो चुका है। पारंपरिक रूप से यह वह समय होता है जब परिवार आभूषण खरीदने के लिए बाजार का रुख करते हैं। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। एक ओर कीमतों में भारी उतार चढ़ाव है, दूसरी ओर वैश्विक हालात को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यही कारण है कि आम उपभोक्ता दुविधा में है कि अभी खरीदारी करे या कुछ समय प्रतीक्षा करे।</div><div><br></div><div>ज्वेलरी उद्योग से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि जिन परिवारों को अगले कुछ महीनों में विवाह के लिए आभूषण की आवश्यकता है, उन्हें पूरी खरीदारी एक साथ करने की बजाय चरणबद्ध तरीके से करनी चाहिए। यदि कीमतों में गिरावट आती है तो औसत लागत कम हो सकती है। निवेश के नजरिये से भी विशेषज्ञ सलाह दे रहे हैं कि केवल भौतिक सोना खरीदने के बजाय डिजिटल गोल्ड, गोल्ड ईटीएफ या सावरिन गोल्ड बांड जैसे विकल्पों पर भी विचार किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, ज्वैलरी बाजार में ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए कई बड़े-छोटे ज्वैलर्स पुराने सोने के आभूषणों के बदले नये आभूषण देने की विशेष योजनाएं भी चला रहे हैं। बाजार में अनिश्चितता और ऊंची कीमतों के कारण ग्राहक सीधे नयी खरीदारी से बच रहे हैं, इसलिए ज्वैलर्स एक्सचेंज आफर, कम मेकिंग चार्ज और अतिरिक्त छूट जैसी योजनाएं लेकर आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जिन परिवारों के पास पुराना सोना रखा हुआ है, वे इन योजनाओं का लाभ उठाकर अपेक्षाकृत कम खर्च में नये डिजाइन के आभूषण खरीद सकते हैं। कई कंपनियां पुराने गहनों के मूल्यांकन पर अतिरिक्त बोनस भी दे रही हैं, जिससे ग्राहकों को बाजार की ऊंची कीमतों के बावजूद राहत मिल रही है। शादी विवाह के मौजूदा मौसम में यह विकल्प खास तौर पर मध्यम वर्गीय परिवारों के लिए उपयोगी माना जा रहा है, क्योंकि इससे एकमुश्त भारी नकद खर्च का दबाव कम हो सकता है।</div><div><br></div><div>यह भी ध्यान देने योग्य है कि भारत में महंगाई और कच्चे तेल की कीमतों का सीधा असर सोने पर पड़ता है। हाल की रिपोर्टों में बताया गया है कि ईरान संघर्ष के कारण थोक महंगाई में तेजी आई थी। यदि युद्ध वास्तव में समाप्त होता है और तेल कीमतें स्थिर रहती हैं, तो भारतीय बाजार में सोने की कीमतों पर दबाव कम हो सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी की अपील तत्काल आर्थिक दबाव को कम करने की कोशिश थी। लेकिन भारतीय समाज में सोने का सांस्कृतिक महत्व इतना गहरा है कि इसकी मांग पूरी तरह रुकना संभव नहीं है। ईरान अमेरिका तनाव कम होने से अल्पकाल में कीमतों में नरमी आ सकती है, इसलिए जिन परिवारों को वास्तविक आवश्यकता है, वे योजनाबद्ध और सीमित खरीदारी कर सकते हैं। वहीं निवेशकों को जल्दबाजी से बचते हुए लंबी अवधि की रणनीति अपनानी चाहिए, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अनिश्चितता अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 17:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/iran-us-war-gold-prices-india-wedding-season-jewellery-market-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सनातन व नारी सम्मान पर बड़ी लकीर खींचते योगी आदित्यनाथ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-sets-a-new-benchmark-for-sanatan-values-and-respect-for-women]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ राजनीति से ऊपर उठकर सनातन धर्म तथा स्त्री गरिमा तथा सम्मान के हित में बड़ी रेखाएं खींच रहे हैं। इसी क्रम में उन्होंने सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी के प्रति सोशल मीडिया के माध्यम से आपत्तिजनक बयानबाजी करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्यवाही करने केआदेश जारी किए हैं। मुख्यमंत्री के आदेश के बाद अपराधियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हो गयी है। मुख्यमंत्री ने सख्ती के साथ कहा है कि किसी भी बेटी के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए हर बेटी का सम्मान होना चाहिए। हम उन संस्कारों में पले -बढ़े हैं जहां गांव की बेटी-बहन को पूरे गांव की बेटी -बहन माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुख्यमंत्री योगी बेटियों की सुरक्षा के लिए संकल्पवान हैं। वह कई जनसभाओं मे अपना मंतव्य स्पष्ट कर चुके हैं कि अगर किसी ने बेटियों की सुरक्षा में सेंध लगाने का प्रयास किया तो अगले चैराहे पर उसका इंतजार यमराज कर रहा होगा। योगी जी के बयानों का असर धरातल पर भी दिखाई पड़ता है। बेटियों के साथ होने वाली अप्रिय घटनाओं पर त्वरित कार्यवाही हो रही है। आरोपियों का हाफ एनकाउंटर हो रहा है तथा आवश्यकता पड़ने पर बुलडोजर एक्शन भी हो रहे हैं। प्रदेश में नारी समाज को सशक्त बनाने के लिए कई कदम उठाए जा रहे हैं। नवरात्रि के अवसर पर मिशन शक्ति जैसे अभियान चलाए जा रहे हैं। केंद्र व राज्य सरकार की योजनाओं के माध्यम से नारी सशक्तीकरण का महाअभियान चलाया जा रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cm-yogi-adityanath-backs-akhilesh-yadav-orders-fir-on-daughter-trolls" target="_blank">Akhilesh की बेटी पर अभद्र Post पर CM Yogi का एक्शन, Zero Tolerance दिखाते हुए दिए FIR के निर्देश</a></h3><div>सपा मुखिया अखिलेश यादव की बेटी पर टिप्पणी करने वालों के खिलाफ मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कड़ा रवैया दिखाकर सपा मुखिया अखिलेश यादव द्वारा बुने जा रहे चक्रव्यूह को एक ही झटके में ध्वस्त कर दिया है। सपा मुखिया अखिलेश की बेटी अदिति पर सोशल मीडिया पर अभद्र टिप्प्णी के बाद मुख्यमंत्री योगी ने जो एक्शन लिया है उसने इस दुखद घटना पर बनाए जा रहे सपा के राजनैतिक नैरेटिव को ध्वस्त कर दिया है। जब सोशल मीडिया के माध्यम से यह विवाद बड़े राजनीतिक तूफान में बदल रहा था और सपा योगी जी व प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यह कहकर घेरने का प्रयास कर रही थी कि, “जिनका खुद का परिवार नहीं वो परिवार का दर्द क्या समझेंगे“ तब योगी जी इस घटना के जिम्मेदार लोगों को ढूंढ रहे थे। योगी जी ने अपराधियों पर तुरंत एफआईआर कराने के निर्देश जारी करते हुए कहा कि वह किसी भी बेटी क्यों न हो&nbsp; बेटी पर अभद्र टिप्पणी बर्दाश्त नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यूपी चुनाव से पहले योगी आदित्यनाथ ने अपने इस कदम से सिद्ध कर दिया है कि महिला सुरक्षा और सम्मान के मामले में उनकी सरकार बिना किसी भेदभाव के काम करती है। इससे सपा मुखिया रक्षात्मक रुख अपनाने को बाध्य हो गए हैं। अब भाजपा सपा के पुराने बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट्स को लेकर उस पर हमलावर है। जो मुद्दा सरकार को घेरने के लिए तैयार किया जा रहा था उस पर योगी जी की प्रशासनिक और राजनीतिक सूझबूझ का बुलडोजर चल गया है। समाजवादी पूर्व में कई बार नारी सम्मान व उनकी गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली बयानबाजी करते रहे हैं। स्वर्गीय मुलायम सिंह यादव ने एक बार कहा था कि “लड़के हैं गलतियां हो जाती हैं। सपा के कद्दावर नेता माने जाने वाले आजम खां जैसे नेता तो कई बार महिलाओं की गरिमा के खिलाफ अभद्र टिप्पणी कर चुके हैं। मायावती जी पर तो सपाइयों ने हमला ही बोल दिया था। सपा राज में महिला सुरक्षा की कितनी बुरी स्थिति थी यह हर कोई जानता है।</div><div><br></div><div>योगी की पाती दे रही सनातन विचार-विश्व वृद्धजन दुर्व्यवहार जागरुकता दिवस पर योगी जी ने एक पाती जारी की है। इस पाती में उन्होंने वृद्धजनों की स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए लिखा है कि उम्र के अमृतकाल में वृद्धजनों को अपनत्व की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, दुर्भाग्य से समाज ऐसे समय का साक्षी बन रहा है जब वृद्धजनों को अपनों का दुर्व्यवहार सहना पड़ता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>योगी जी ने आगे लिखा है कि सनातन संस्कृति में माता-पिता और गुरु को साक्षात ईश्वर माना जाता है। पाती में योगी ने एक प्राचीन कथा के माध्यम से इस विषय को समझाया। भगवान शिव-पार्वती ने पुत्र गणेश जी और कार्तिकेय के समक्ष समस्त जगत की परिक्रमा की चुनौती रखी। भगवान गणेश ने माता-पिता को ही संपूर्ण सृष्टि मानकर उनकी परिक्रमा कर ली। उन्होंने भगवान श्रीराम का भी उदाहरण दिया। योगी जी का स्पष्ट कहना है कि सनातन, धार्मिक तथा सामाजिक परंपराओें, पारिवारिक संबंधों एवं मूल्यों पर आधारित जीवन शैली है। सनातन में बड़ों&nbsp; का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लेने की परंपरा है ऐसा इसलिए क्योंकि वे हमारी संस्कृति और जीवन मूल्यों के धरोहर हैं। वृद्धजनों का सम्मान केवल संस्कर नहीं बल्कि हमारी गौरवशाली सभ्यता की पहचान है। अपनी पाती मे वह बता रहे हैं कि वृद्धजन व निराश्रित महिलाओं के लिए प्रदेश सरकार ने 1500 रुपए प्रति माह पेंशन देने का निर्णय लिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार सनातन संस्कृति के विचारों पर चलते हुए उन्हें आगे बढ़ा रही है और सनातन संस्कृति को पुष्ट करने वाले निर्णय ले रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 17:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-sets-a-new-benchmark-for-sanatan-values-and-respect-for-women</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सार्वजनिक जीवन में विश्वास की पूंजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-capital-of-trust-in-public-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विश्वास और भरोसा ही मनुष्य की सबसे बड़ी पूंजी है। सार्वजनिक जीवन में जन विश्वास गंवाने वाला व्यक्ति किसी योग्य नहीं रह जाता। हाल ही में भारतीय राजनीति में जन विश्वास से जुड़ी दो अहम घटनाएं घटित हुई। पहली घटना में एक नेता ने जन विश्वास की पूंजी खो दिया। वहीं दूसरी घटना में नेता ने जन विश्वास की पूंजी को सहेजा ही नहीं, बल्कि हर बीतते दिन के साथ उसमें वृद्धि भी की।</div><div><br></div><div>पहली घटना 4 मई की है। इस दिन जन विश्वास खो चुकी तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष एवं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा। तृणमूल और ममता से नाराजगी का आलम यह था कि स्वयं ममता बनर्जी अपनी सीट हार गई। आज ममता बनर्जी और उनकी पार्टी की जो दुर्दशा हो रही है, उसकी जिम्मेदार कोई दूसरा नहीं बल्कि वह स्वयं और उनके कर्म ही हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mamata-moves-high-court-against-assembly-speaker" target="_blank">Bengal में LoP पद पर संग्राम, विधानसभा Speaker के खिलाफ High Court पहुंचीं ममता बनर्जी</a></h3><div>तृणमूल कांग्रेस के विधायक और सांसद अपना अलग गुट बना चुके हैं। स्वतंत्र भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में ऐसा कोई दूसरा उदाहरण मिलना मुश्किल है, जब किसी राजनीतिक दल का इतनी तेजी से विघटन हुआ हो। या किसी नेता की तथाकथित साख चुनाव हारने के चंद दिनों में ही औंधे मुंह गिरी हो। सत्ता गंवाने के बाद ममता बनर्जी को मंदिर जाने की याद आई। कालीबाड़ी दर्शन करने पहुंची ममता बनर्जी को लोगों ने पूरी तरह अनदेखा किया। डेढ दशक तक सूबे का मुख्यमंत्री रहने वाले नेता की जनता इस हद तक उपेक्षा करे, तो यह सिर्फ चुनावी हार नहीं, जनविश्वास के टूटने का संकेत होता है।</div><div><br></div><div>तृणमूल कांग्रेस के कुशासन से आजिज जनता आज उसके नेताओं का अंडे, टमाटर, जूते और मार कुटाई से&nbsp; सत्कार कर रही है। तृणमूल के नेताओं को देखकर चोर-चोर के नारे लगाए जा रहे हैं। ये वो लोग है जो पिछले 15 वर्षों से तृणमूल नेताओं की तानाशाही, गुण्डागर्दी और अत्याचार चुपचाप सह रहे थे। तृणमूल नेताओं के प्रति जनता का व्यवहार उनके स्वाभाविक क्रोध, कुंठा, निराशा और हताशा का परिणाम है।</div><div><br></div><div>ममता सरकार के डेढ़ दशक के शासन के दौरान राजनीतिक दलों के नेताओं व कार्यकर्ताओं की हत्या व अपहरण, पोलिंग एजेंटों की पिटाई, बमबाजी, गोलीबारी, बूथों में तोड़फोड़, वोटों की लूट, प्रत्याशियों व उनके परिवार के सदस्यों को धमकियां, ये सब बंगाल में आम बातें हो चुकीं थीं। भाजपा के अपने अनुमानों के अनुसार, 2021 में विधानसभा चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद हुई हिंसा में टीएमसी के गुंडों ने 300 से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या की थी। तत्कालीन राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने कानून व व्यवस्था के मुद्दे पर सरकार को कटघरे में खड़ा करते हुए कहा था कि, राज्य में लोकतंत्र सांस नहीं ले पा रहा है। मुख्यमंत्री और प्रशासन मूक दर्शक बने हुए हैं।</div><div><br></div><div>दूसरी घटना 10 जून को घटित हुई। इस दिन नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में 4,399 दिन पूरे किए, जो देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में पूरे किए गए 4,398 दिन के कार्यकाल से ज्यादा है। इस तरह जनविश्वास, सुशासन और राष्ट्रहित के प्रति अटूट समर्पण का प्रतीक बनकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बन गए। यह सिर्फ रिकॉर्ड नहीं, 140 करोड़ भारतीयों के अटूट विश्वास की जीत है।</div><div><br></div><div>2014 में देश ने उत्साह और अटूट विश्वास के साथ नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री चुना था, लेकिन उन्होंने स्वयं को हमेशा एक प्रधानसेवक माना। इसी रूप में वे अपना राष्ट्रधर्म निभाते हुए विकसित भारत के निर्माण में जुटे हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास’ के संकल्प के साथ उन्होंने समाज के हर वर्ग का विश्वास जीता है। उनके नेतृत्व में केंद्र सरकार की अनेक कल्याणकारी योजनाओं ने समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति को अधिकार, सम्मान और आत्मनिर्भरता का एहसास कराया है। विपक्ष के लगातार मिथ्या प्रचार, व्यक्तिगत हमलों, यहां तक की अपशब्द देने के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी अहर्निशं जनसेवा में जुटे हैं। देश की जनता उन पर भरोसा करती है, जनता को विश्वास है मोदी के रहते उनका अहित नहीं होगा। इसलिए वो लगातार तीसरी बार उन्हें प्रधानमंत्री की कुर्सी सहर्ष सौंपती है।</div><div><br></div><div>जब विश्वास टूटता है तो बड़े से बड़े नेता और व्यक्ति अर्श से फर्श पर आ जाता है। भारतीय राजनीति में इंदिरा गांधी का बड़ा कद था। लेकिन अपनी सत्ता बचाने के लिए 1975 को इमरजेंसी लगाने के बाद जनता का विश्वास इंदिरा गांधी से टूट गया। 1977 के आम चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक हार का मुंह देखना पड़ा। इंदिरा का घमंड चूर चूर हो गया, और देश में आजादी के बाद पहली बार गैर कांग्रेसी सरकार का गठन हुआ।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, उड़ीसा में बीजू जनता दल, दिल्ली में आम आदमी पार्टी तमाम ऐसे उदाहरण ऐसे हैं, जब जनता ने इन दलों पर विश्वास करके सत्ता के सिंहासन पर बैठाया। लेकिन जब ये नेता विश्वास और उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे तो, जनता ने इन्हें इनको आसमान से जमीन पर पटकने में देरी नहीं की। तमिलनाडु में विश्वास ही तो खत्म हुआ होगा, तभी तो वहां की जनता ने सत्तारूढ़ डीएमके को हटाकर अभिनेता चंद्रशेखरन जोसेफ विजय की नयी नवेली पार्टी तमिलगा वेत्री कड़गम यानी टीवीके को सत्ता की कुंजी सौंप दी।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं कई ऐसे उदाहरण भी हैं, जहां विश्वास के चलते जनता ने बार बार जीत का आशीष दिया। गुजरात में बीते 31 और मध्य प्रदेश 21 साल से भाजपा की सरकार है। इतने लंबे समय तक विश्वास और सेवा किये बिना कोई नेता या दल सत्ता या लोगों के दिलों में नहीं रह सकता। किसी जमाने में हरियाणा में भाजपा कोई बड़ी शक्ति नहीं थी। बामुश्किल उसके दो या तीन विधायक ही जीतते थे। लेकिन विश्वास और जनसेवा की बदौलत ही पिछले 12 वर्षों से हरियाणा में भाजपा की सरकार सत्ता में है।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश की राजनीति में मिथक था कि यहां कोई सरकार दोबारा रिपीट नहीं करती। 2017 में भाजपा को पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने का अवसर मिला। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपने कृतित्व एवं व्यक्तित्व से सरकार और शासन के प्रति जनता के विश्वास को लगातार बढ़ाने का काम किया। नतीजा उत्तर प्रदेश की राजनीति में 37 साल पुराना यह मिथक 2022 के विधानसभा चुनाव में टूट गया। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भाजपा ने प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में वापसी कर लगातार दूसरी बार सरकार बनाई। पहाड़ी राज्य उत्तराखंड में भाजपा सरकार पिछले नौ साल से लगातार जनसेवा में जुटी है।</div><div><br></div><div>जीवन की सबसे बड़ी पूंजी पद नहीं, बल्कि विश्वास होता है। यह विश्वास किसी नेता, राजनीतिक दल या किसी&nbsp; व्यक्ति की सबसे बड़ी पूंजी है। यह विश्वास बना रहना ही चाहिए। और जिस दिन यह विश्वास टूटता है, उस दिन नतीजे वैसे ही होते हैं, जैसे 4 मई को पश्चिम बंगाल में ईवीएम से निकले। हारने वाला कुंठा, निराशा और हताशा में भले ही इसे वोट की लूट बताता रहे, लेकिन ये वोट की नहीं बल्कि दिल की लूट होती है। इसलिए व्यक्तिगत और सार्वजनिक जीवन में विश्वास बनाए रखें।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. आशीष वशिष्ठ</div><div>(लेखक-पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 17:54:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-capital-of-trust-in-public-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कांग्रेस को आंखे दिखाने वाली ममता के आंसूओं का मर्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-meaning-of-mamata-tears-who-showed-her-eyes-to-congress]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीति में नेता कब चौला बदल ले, पता नहीं चलता। कांग्रेस को आंखे दिखाने वाली पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी जब सोनिया गांधी से मिली उनकी आंखों में आंसू भर आए। यह वाक्या बताता है कि राजनीति में कुछ भी स्थिर नहीं है। दोस्त कब दुश्मन बन जाएं और दुश्मन कब दोस्त, इसका राजनीतिक इतिहास पुराना है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इंडिया गठबंधन की दिल्ली बैठक के दौरान सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की भावुक मुलाकात ने कांग्रेस-टीएमसी के 30 साल पुराने उतार-चढ़ाव वाले संबंधों और बंगाल चुनाव के बाद आयी दरारों को फिर से चर्चा में ला दिया। पश्चिम बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस सुप्रीमो ममता बनर्जी अपनी पार्टी में टूट के बीच जब बैठक में पहुंचीं, तो कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने आगे बढ़कर उन्हें गले लगा लिया। बंद कमरे में अपनी पुरानी सहेली और राजनीतिक साथी को सामने देख ममता बनर्जी के आंसू छलक पड़े।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/trinamool-scattering-blade-by-blade" target="_blank">तृण तृण बिखरती तृणमूल</a></h3><div>ममता के ये आंसू दरअसल कांग्रेस के साथ किए गए अपने खराब पुराने बर्ताव या कांग्रेस से अलग होने की गलती के एहसास की वजह से नहीं आए, बल्कि भाजपा द्वारा विधानसभा चुनाव जीत कर सारा दंभ हवा होने से गई सत्ता गंवाने और अपने सांसदों के टूटने की वजह से आएं। दरअसल पश्चिम बंगाल से तृणमूल कांग्रेस के सत्ता से बाहर होने और पार्टी के सांसदों के विद्रोह से ममता के राजनीतिक अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। जिसकी ममता बनर्जी ने कभी कल्पना भी नहीं की थी।</div><div><br></div><div>ममता को सोनिया गांधी से मिली ‘जादू की झप्पी’ सिर्फ व्यक्तिगत ढाढ़स नहीं थी। यह कांग्रेस और टीएमसी के बीच पिछले 3 दशकों से चले आ रहे उतार-चढ़ाव, पुरानी राजनीतिक दरारों और बंगाल में एक-दूसरे के वजूद को मिटाने की खूनी क्रोनोलॉजी का अंतिम और सबसे असहाय पड़ाव था। 1997-98 में ममता बनर्जी ने तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व (सोनिया गांधी के उभार के समय) पर वामपंथियों (वाममोर्चा) के खिलाफ ढुलमुल रवैया अपनाने का आरोप लगाते हुए कांग्रेस से नाता तोड़ लिया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>ममता ने अलग तृणमूल कांग्रेस पार्टी का गठन किया था। अगले दो दशक में ममता बनर्जी ने वामपंथ के साथ-साथ कांग्रेस को भी बंगाल में शून्य कर दिया। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी ने बंगाल में कांग्रेस को महज दो सीटों पर ही लोकसभा चुनाव लड़ने की पेशकस की थी, मगर कांग्रेस टीएमसी से 10-12 सीटों की डिमांड कर रही थी। ममता बनर्जी ने कांग्रेस की 10-12 लोकसभा सीटों की मांग को ‘अनुचित’ बताया था और पश्चिम बंगाल में सीट बंटवारे पर चर्चा में देरी के लिए कांग्रेस की आलोचना की थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>ममता ने ‘एकला चलो’ की नीति अपनाते हुए बहरमपुर में यूसुफ पठान को उतारकर कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी को हरा दिया। इससे दिल्ली का कांग्रेस नेतृत्व अंदर से बेहद आहत था। कांग्रेस पार्टी के पारंपरिक गढ़ों (मालदा, मुर्शिदाबाद और उत्तर दिनाजपुर) को भी पूरी तरह से ममता बनर्जी ने निगल लिया। अधीर रंजन चौधरी जैसे कद्दावर नेताओं को साइडलाइन कर उन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक पर अपना एकछत्र राज स्थापित कर लिया था।</div><div><br></div><div>ममता की राजनीतिक महत्वकांक्षा इतनी प्रबल हो गई, कि पश्चिम बंगाल तक सीमित होने के बावजूद कांग्रेस का नेतृत्व किसी रूप में स्वीकार करने से इंकार कर दिया। इससे भी आगे बढ़ कर इंडिया गठबंधन के नेतृत्व का दावा तक पेश कर दिया था। इस नेतृत्व का मतलब था गठबंधन की तरफ से प्रधानमंत्री पद की दावेदारी। ममता बनर्जी ने चुनावों और उपचुनावों में इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन पर निराशा जाहिर करते हुए कहा था कि वह इसकी कमान संभालने को तैयार है।&nbsp;</div><div><br></div><div>कांग्रेस सांसद वर्षा गायकवाड़ ने तब कहा था कि 'ममता बनर्जी को ऐसा लगता है पर हमें ऐसा नहीं लगता। चर्चा करेंगे। उनके कहने से उनकी पार्टी चलती है। हम तो कांग्रेस के कहने से चलते हैं। केरल में वाम शासन को काग्रेस के हाथ गंवा चुकी लेफ्ट ने भी कांग्रेस पर सवाल उठाए थे। तब लेफ्ट नेता डी राज्या ने भी कहा था कि 'कांग्रेस को आत्मचिंतन करने की जरूरत है। राज्या ने कहा था कि कांग्रेस ने हरियाणा और महाराष्ट्र चुनावों में गठबंधन सहयोगियों को समायोजित नहीं किया। अगर कांग्रेस ने इंडिया ब्लॉक सहयोगियों की बात सुनी होती तो लोकसभा और हरियाणा-महाराष्ट्र में नतीजे अलग होते।</div><div><br></div><div>बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 में जब भारतीय जनता पार्टी&nbsp; ने 207 सीटें जीतकर ममता बनर्जी को सत्ता से बेदखल कर दिया, तो अचानक से पूरी बाजी पलट गयी। सत्ता हाथ से जाते ही टीएमसी के भीतर सांसदों और विधायकों में भगदड़ मच गयी। टीएमसी से बगावत करने वाले सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिख कर अलग से सीट देने की मांग की है। इससे पहले टीएमसी के विधायक पश्चिम बंगाल विधानसभा मे यह कारनामा कर चुके हैं। इसके बाद ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन की याद आयी। गठबंधन की बैठक में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी साख बचाने के लिए दीदी अब कांग्रेस और सोनिया गांधी के दरबार में मदद की गुहार लगा रही हैं।</div><div><br></div><div>देश की सबसे कद्दावर विपक्षी चेहरा रहीं ममता बनर्जी की हकीकत अब यही है कि ‘इंडिया’ गठबंधन में ‘किंगमेकर’ या प्रधानमंत्री पद की दावेदार वाली उनकी पुरानी मजबूत स्थिति अब नहीं रही। इसलिए वह इंडिया गठबंधन की शरण में हैं। कांग्रेस बेशक लोकसभा और ज्यादातर राज्यों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को टक्कर नहीं दे सकी, किन्तु गठबंधन में कांग्रेस का दबदबा है, इसलिए ममता को लगता है कि सहानुभूति पाकर कांग्रेस से डूबते को तिनका का सहारा मिल सकता है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक में जमीर को एक तरफ करके सत्ता के लिए नेता किसी भी हद तक जा सकते हैं। दरअसल नेताओं में नैतिकता या सिद्धान्त बचा नहीं है। ऐसा नहीं है कि सत्ता की राजनीतिक में आवरण बदलने का काम सिर्फ ममता ने ही किया हो, इससे पहले भाजपा, कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों ने दूसरे दलों से गठबंधन करके और मौका पाकर उनको छिटक कर यह काम किया है।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 14:28:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-meaning-of-mamata-tears-who-showed-her-eyes-to-congress</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[तृण तृण बिखरती तृणमूल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/trinamool-scattering-blade-by-blade]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब 4 मई 2026 को बंगाल जनता ने ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल सरकार की विदाई का जनादेश सुनाया तब किसी ने भी सपने नहीं सोचा था कि इस हार के बाद तृणमूल कांग्रेस तृण तृण होकर बिखरने लगेगी। बंगाल विधानसभा में तृणमूल के 80 विधायक जीतकर आए थे जिनमें से पहले 58 विधायक अलग हुए फिर उनकी संख्या बढ़कर 64 हो गई, नेता प्रतिपक्ष भी उन्होंने अपने मन का बना लिया। लोकसभा में 19 सांसदों&nbsp; ने बागी होकर अलग गुट बना लिया है, बागियों की संख्या आगे भी बढ़ सकती है। राज्यसभा सांसदों के त्यागपत्र&nbsp; भी आ रहे हैं। राज्यसभा सांसद सुखेदु शेखर रॉय और सुष्मिता देव तथा प्रकाश चिक बराईक इस्तीफा दे चुके हैं। आश्चर्यजनक रूप से ममता के सबसे करीबी कल्याण बनर्जी भी बगावती तेवर दिखा रहे हैं। जिला और पंचायत स्तर पर भी पार्टी की यही स्थिति है।</div><div>&nbsp;</div><div>मात्र एक महीना पहले तक यही सांसद और विधायक ममता दीदी के साथ साए की तरह लगे रहते थे। जैसे ही बंगाल की जनता ने सत्ता बदली इन नेताओं का रुख बदल गया। आज ये नेता जिन विषयों पर ममता और अभिषेक बनर्जी को कोस रहे हैं सत्ता में रहते हुए कभी उन विषयों पर मुंह नहीं खोला, आर.जी. कर और संदेशखाली तक ये लोग मुंह में दही जमाए थे। राजनैतिक विश्लेषक मान रहे हैं कि इनमें से कई लोग ऐसे भी हैं जिनके ऊपर कोई न कोई केस चल रहा है और सत्ता जाने के बाद ममता दीदी में इनको बचाने का सारथ्य नहीं रहे तो ये भविष्य में किसी जांच और सजा से बचने के लिए ऐसा कर रहे हैं। तृणमूल सांसदों व विधायकों की लगातार बगावत से यह संकेत भी जा रहा है कि क्या ममता दीदी का अपने भतीजे अभिषेक बनर्जी के प्रति अधिक झुकाव उनकी पार्टी की इस हालत का कारण है। इससे तृणमूल के बागी नेताओं के स्वार्थी चरित्र&nbsp; की भी पोल खुल रही है। दल में तानाशाही इनको तब दिखाई दी जब सत्ता की मलाई छीन गई, यदि अभिषेक बनर्जी की अगुआई में पार्टी जीत गई होती और इनका लूट खसोट का धंधा चलता रहता तो इनकी आज जागी हुई आत्मा सोई पड़ी रहती।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/kalyan-banerjee-u-turn-reconciliation-with-abhishek-declaration-of-war-against-the-nda" target="_blank">Kalyan Banerjee का U-turn: Abhishek संग सुलह, NDA के खिलाफ जंग का ऐलान! TMC में सब ठीक?</a></h3><div>आज जो सांसद बगावती तेवर अपना रहे हैं उनमें से दस पहली बार चुनकर आए हैं। ये तृणमूल नेताओं की वो पीढ़ी है जिसे ममता बनर्जी ने बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का नया चेहरा बनाकर आगे बढ़ाया था। अब यही लोग अपना भविष्य सुधारने के लिए ममता दीदी के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, क्योंकि ये जानते हैं बंगाल में सत्ता में आई पार्टियाँ कम से कम डेढ़-दो दशक सता में रहती हैं, इस तरह आने वाले 15-20 वर्षों तक इनका कोई भविष्य नहीं होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तृणमूल नेताओं के प्रति जनता के गुस्से का आलम ये है कि चुनाव में पार्टी को धूल चटाने के बाद भी उसका मन नहीं भरा है। आए दिन तृणमूल नेताओं की सड़कों पिटाई की जा रही है। तृणमूल नेता जहां भी जाते हैं जनता उन्हें चोर-चोर कहकर पुकारती है और उन पर टमाटर-अंडे फेंकती है। अभिषेक बनर्जी और कल्याण बनर्जी जैसे नेताओ तक पर अंडे टमाटर फेंके जा चुके हैं और पिटाई हो चुकी है। यह भी संभव कि&nbsp; बंगाल की जनता में व्याप्त इस भयंकर आक्रोश से बचने के लिए भी तृणमूल नेता बगावती हो रहे हों।&nbsp;</div><div><br></div><div>तृणमूल के जिला स्तरीय नामचीन नेता इस्तीफा दे रहे हैं। कोलकाता के मेयर फिरहाद हकीम, चंदन नगर के मेयर राम चक्रवर्ती, बिधान नगर के मेयर कृष्णा चक्रवर्ती और कटवा म्युनिसिपलिटी चेयरमैन कमलकांता चक्रवर्ती ने सौ से अधिक पार्षदों सहित इस्तीफा दे दिया है। राज्यभर से तृणमूल से लगातार इस्तीफों व बगावत के समाचार आ रहे हैं। हुगली, नादिया, मुर्शिदाबाद और उत्तर व दक्षिण -24 परगना जैसे गढ़ों में प्रतिदिन पंचायत सदस्यों&nbsp; के पाला बदलने की ख़बरें आ रही हैं। टीएमसी में बगावत व इस्तीफों के बाद कोलकाता नगर निगम ही भंग कर दिया गया है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में यह भी दावा किया जा रहा है कि इनमें से बहुत से लोग जेल जाने से बचने के लिए यह तरीका अपना रहे हैं। अभिषेक बनर्जी के डायमंड हार्बर मॉडल का कुख्यात चेहरा और चुनावों के दौरान अपने आप को पुष्पा कहने वाला फाल्टा विधानसभा चुनाव का उम्मीदवार जहाँगीर खां के जेल जाने से अफरा तफरी का माहौल है। तृणमूल नेताओं के पाप जैसे उतरा रहे हैं। बंगाल पुलिस को संदेशखाली के तालाब से बड़ी मात्रा में हथियार मिले हैं, एक खेत से करोड़ों का कैश और हथियार मिले हैं। बमों व अन्य हथियारों की फैक्ट्रियां मिल रही हैं। हजारों की संख्या में सफ़ेद साड़ियाँ मिली हैं जो तृणमूल ने चार मई के बाद भाजपा कार्यकर्ताओं की विधवाओं को देने के लिए रखी थीं यदि गलती से भी तृणमूल जीत जाती तो यही लोग जो आज इस्तीफा देकर भाग रहे हैं भाजपा कार्यकर्ताओं के नर संहार का नेतृत्व करते।&nbsp;</div><div><br></div><div>अपराधों की जो फेहरिस्त है उसे देखकर लगता है कि ममता दीदी और उनके चाटुकारों का शेष जीवन अब कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाने या फिर जेल में ही बीतने वाला है। एक समय वाराणसी लोकसभा से पीएम नरेंद्र मोदी को हराने और दिल्ली आकर इंडी गठबंधन का नेतृत्व करने&nbsp; वाली ममता दीदी के लिए अपनी पार्टी का अस्तित्व बचा कर रखना भी मुश्किल हो चुका है।</div><div>&nbsp;</div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 13:19:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/trinamool-scattering-blade-by-blade</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[मोदी युग के बारह वर्ष: विकास, विश्वास और विराट का उदय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/twelve-years-of-the-modi-era-development-trust-and-the-rise-of-the-colossal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में कुछ कालखंड केवल शासन परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि राष्ट्रीय चेतना के पुनर्जागरण के लिए याद किए जाते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीते बारह वर्षों का दौर ऐसा ही एक कालखंड है। यह केवल एक प्रधानमंत्री के लंबे कार्यकाल की कहानी नहीं है, बल्कि उस भारत की कहानी है जिसने स्वयं को नए आत्मविश्वास, नई ऊर्जा और नई वैश्विक पहचान के साथ स्वयं को स्थापित किया है। नरेंद्र मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेकर स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने के रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया। यह उपलब्धि केवल राजनीतिक सफलता नहीं है, बल्कि जनता के उस विश्वास का प्रमाण है जो बार-बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से व्यक्त हुआ है। भारत जैसा विशाल, बहुभाषी, बहुधार्मिक और सांस्कृतिक विविधताओं से भरा देश किसी नेतृत्व को लगातार तीन बार राष्ट्रीय जनादेश दे, यह अपने आप में असाधारण एवं ऐतिहासिक घटना है।</div><div><br></div><div>मोदी युग की सबसे बड़ी विशेषता केवल विकास नहीं, बल्कि विकास और विश्वास का समन्वय है। नेहरू युग को आधुनिक भारत के निर्माण का काल कहा गया, तो मोदी युग को उस भारत के आत्मविश्वास के पुनर्जागरण का काल कहा जा सकता है। मोदी ने केवल सड़कों, पुलों, हवाई अड्डों और डिजिटल नेटवर्क का निर्माण नहीं किया, बल्कि करोड़ों भारतीयों के मन में यह विश्वास भी जगाया कि भारत किसी से कम नहीं है और वह विश्व मंच पर नेतृत्वकारी भूमिका निभा सकता है। मोदी की सबसे विलक्षण विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता संचालन का माध्यम नहीं माना, बल्कि उसे जनभावनाओं और राष्ट्रीय आकांक्षाओं से जोड़ा। वे उन विरले नेताओं में हैं जिन्होंने सरकारी योजनाओं को केवल प्रशासनिक दस्तावेज नहीं रहने दिया, बल्कि उन्हें जनआंदोलन का स्वरूप दिया। स्वच्छ भारत अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। सफाई का विषय जो कभी सरकारी विभागों तक सीमित था, उसे राष्ट्रीय चरित्र और सामाजिक जिम्मेदारी से जोड़ दिया गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/modi-becomes-indias-longest-serving-elected-pm" target="_blank">मोदी ने नेहरु का रिकॉर्ड तोड़ने के साथ ही कांग्रेस का घमंड भी चकनाचूर कर दिया है</a></h3><div>मोदी युग को भारत की गुम होती सांस्कृतिक अस्मिता की पुनर्स्थापना के लिए भी याद किया जाएगा। सदियों से उपेक्षित राष्ट्रीय प्रतीकों, तीर्थस्थलों और सांस्कृतिक विरासत को नई गरिमा मिली। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर का निर्माण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सांस्कृतिक चेतना के सम्मान का प्रतीक बना। काशी विश्वनाथ धाम, महाकाल लोक, केदारनाथ पुनर्निर्माण और सोमनाथ जैसे तीर्थों का विकास यह संकेत देता है कि आधुनिकता और परंपरा एक-दूसरे की विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हो सकती हैं। मोदी की एक और विशेषता यह है कि उन्होंने भारत की विदेश नीति को आत्मविश्वास का नया आयाम दिया। कभी विश्व शक्तियों के बीच संतुलन साधने वाला भारत आज वैश्विक विमर्श को प्रभावित करने वाला राष्ट्र बनकर उभरा है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया का संकट हो, जी-20 का नेतृत्व हो अथवा वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की आवाज उठाने का प्रश्न- भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई है। यह वही भारत है जिसे कभी विकासशील देशों की कतार में खड़ा माना जाता था, लेकिन आज दुनिया उसकी ओर समाधान प्रदाता राष्ट्र के रूप में देख रही है।</div><div>इन बारह वर्षों की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि यह भी है कि शासन के केंद्र में पहली बार अंतिम व्यक्ति को रखने का गंभीर प्रयास दिखाई दिया। जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, पीएम आवास योजना, मुफ्त राशन योजना तथा प्रत्यक्ष लाभ अंतरण जैसी योजनाओं ने करोड़ों गरीबों के जीवन में बदलाव लाने का काम किया। शासन की पारदर्शिता बढ़ी और बिचौलियों की भूमिका सीमित हुई। डिजिटल इंडिया अभियान ने तकनीक को केवल महानगरों तक सीमित नहीं रखा, बल्कि गांव-गांव तक पहुंचाया। नरेंद्र मोदी की नेतृत्व शैली का एक विशिष्ट पक्ष उनका संकल्पबोध है। वे बड़े लक्ष्य निर्धारित करते हैं और उन्हें राष्ट्रीय अभियान का स्वरूप देते हैं। चाहे 370 का उन्मूलन हो, तीन तलाक पर रोक हो, जीएसटी लागू करना हो, महिला आरक्षण विधेयक हो अथवा नक्सलवाद और आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति-इन सभी निर्णयों में राजनीतिक जोखिम था, लेकिन उन्होंने जोखिम उठाने का साहस दिखाया। यही साहस उन्हें सामान्य राजनेताओं से अलग करता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, किसी भी लोकतांत्रिक शासन की तरह चुनौतियां भी कम नहीं हैं। बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की बढ़ती लागत, सामाजिक विषमताएं तथा आर्थिक अवसरों का असमान वितरण ऐसे प्रश्न हैं जिनका समाधान अभी अपेक्षित है। भारत यदि 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य प्राप्त करना चाहता है तो केवल आर्थिक वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ चिकित्सा, रोजगार सृजन और भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन को भी समान प्राथमिकता देनी होगी। मोदी सरकार के आगामी वर्षों से सबसे बड़ी अपेक्षा यही है कि वह भ्रष्टाचार के विरुद्ध अपने अभियान को और अधिक प्रभावी बनाए। भारत को ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता है जहां ईमानदारी अपवाद नहीं, सामान्य व्यवहार बने। शिक्षा और स्वास्थ्य को व्यावसायिक माफियाओं के प्रभाव से मुक्त कर आम नागरिक की पहुंच में लाना भी समय की मांग है। साथ ही उद्यमिता को बड़े औद्योगिक घरानों तक सीमित रखने के बजाय गांवों, युवाओं और महिलाओं तक पहुंचाना होगा ताकि प्रत्येक नागरिक रोजगार खोजने वाला नहीं, बल्कि रोजगार देने वाला बन सके।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुझे अनेक अवसरों पर मिलने और उन्हें निकट से देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। वर्ष 2007 में, जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे, तब गुजरात के आदिवासी अंचल कवांट में पूज्य आदिवासी जैन संत गणि राजेंद्र विजयजी के सान्निध्य में आयोजित एक विराट आदिवासी सम्मेलन में उनसे विस्तृत संवाद का अवसर मिला। उस सम्मेलन में वे केवल औपचारिक अतिथि के रूप में नहीं आए थे, बल्कि अपने संपूर्ण मंत्रिमंडल के साथ उपस्थित होकर आदिवासी समाज के विकास के प्रति अपनी प्रतिबद्धता का परिचय दिया था। उसी अवसर पर उन्होंने आदिवासी क्षेत्रों के शैक्षिक उत्थान हेतु एकलव्य मॉडल आवासीय विद्यालय को हमारे सुखी परिवार फाउंडेशन को संचालित करने के लिए प्रदान किया तथा आदिवासी विकास की दिशा में ऐतिहासिक 15,000 करोड़ रुपये की वनबंधु कल्याण योजना की घोषणा की। यह उनकी दूरदृष्टि और समाज के अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुंचाने की सोच का प्रमाण था। इसी सम्मेलन के दौरान एक अत्यंत रोचक और ऐतिहासिक प्रसंग भी सामने आया। गणि राजेंद्र विजयजी ने नरेंद्र मोदी से कहा-“अब आपको दिल्ली जाना चाहिए और देश की बागडोर संभालनी चाहिए।” उस समय मोदीजी ने सहज मुस्कान के साथ उत्तर दिया-“मुझे दिल्ली कौन ले जाएगा?” किंतु संतों की वाणी में एक विशेष शक्ति होती है। जो बात उस समय एक साधारण संवाद प्रतीत हुई, वही कुछ वर्षों बाद भविष्यवाणी के रूप में सत्य सिद्ध हुई।&nbsp;</div><div><br></div><div>उन दिनों गुजरात सचिवालय में भी अनेक बार जाने और मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलने का अवसर मिला। वहां जो सबसे अधिक प्रभावित करने वाली बात थी, वह उनकी कार्यसंस्कृति का प्रभाव था। सचिवालय में बड़े से बड़े आईएएस अधिकारी भी आत्मानुशासन, समयपालन और स्वावलंबन का अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत करते थे। अपने छोटे-छोटे कार्य स्वयं करना, अनावश्यक तामझाम से दूर रहना, समय का सदुपयोग करना और जिम्मेदारी को सर्वोपरि मानना वहां की प्रशासनिक संस्कृति का हिस्सा बन चुका था। स्पष्ट महसूस होता था कि यह कार्यशैली शीर्ष नेतृत्व की प्रेरणा से विकसित हुई है। नरेंद्र मोदी केवल आदेश देने वाले प्रशासक नहीं हैं, बल्कि अपने आचरण से व्यवस्था को दिशा देने वाले नेतृत्वकर्ता हैं। भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि इस ऊर्जा को कौशल, नवाचार और उद्यमिता से जोड़ा गया तो भारत केवल विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हो सकता है। इसी प्रकार महिला शक्ति को विकास की मुख्यधारा में पूर्ण भागीदारी देकर राष्ट्र निर्माण की गति को कई गुना बढ़ाया जा सकता है। मोदी युग की सबसे बड़ी उपलब्धि शायद आंकड़ों, परियोजनाओं या चुनावी जीतों में नहीं, बल्कि उस मनोवैज्ञानिक परिवर्तन में है जो भारत के जनमानस में दिखाई देता है। नरेंद्र मोदी ने बारह वर्षों में विकास की संरचनाएं खड़ी की हैं, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उन्होंने करोड़ों भारतीयों के भीतर भविष्य के भारत की एक आकांक्षा जगाई है। 2047 के विकसित भारत का उनका संकल्प तभी साकार होगा जब विकास के साथ विश्वास, समृद्धि के साथ समान अवसर और शक्ति के साथ संवेदनशीलता भी जुड़ेगी। यदि यह संतुलन बना रहता है, तो इतिहास मोदी युग को केवल एक लंबे राजनीतिक कार्यकाल के रूप में नहीं, बल्कि भारत के आत्मविश्वास, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और वैश्विक उदय के युग के रूप में याद करेगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 18:05:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/twelve-years-of-the-modi-era-development-trust-and-the-rise-of-the-colossal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पूर्व प्रधानमंत्री HD Deve Gowda ने आलेख लिख कर बताया PM Modi की सफलता का राज, नेहरू और मोदी की तुलना करते हुए कह गये बड़ी बात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/former-pm-hd-deve-gowda-wrote-an-article-explaining-the-secret-of-pm-modi-success]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व, कार्यशैली और राजनीतिक यात्रा पर अपने विचार रखते हुए कहा है कि मोदी की सबसे बड़ी विशेषता उनका आत्मचिंतनशील स्वभाव है। मोदी सरकार के 12 साल पूरे होने के अवसर पर लिखे गये अपने आलेख में देवेगौड़ा ने लिखा है कि नरेंद्र मोदी केवल लंबे समय तक पद पर बने रहने वाले नेता नहीं हैं, बल्कि वह ऐसे जननेता हैं जिन्होंने बदलते भारत की आकांक्षाओं, चुनौतियों और लोकतांत्रिक चेतना को समझते हुए स्वयं को समय के अनुरूप ढाला है।</div><div><br></div><div>देवेगौड़ा लिखते हैं कि नरेंद्र मोदी अब भारत के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित प्रधानमंत्री बन चुके हैं। इस उपलब्धि ने जवाहरलाल नेहरू का पुराना कीर्तिमान पीछे छोड़ दिया है। यह केवल एक व्यक्ति की राजनीतिक सफलता नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता और जीवंतता का प्रमाण भी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies" target="_blank">दिल्ली अग्निकाडों के हादसों की राजधानी बनी</a></h3><div>अपने आलेख में वह बताते हैं कि जब नेहरू देश के पहले प्रधानमंत्री बने थे, तब परिस्थितियां बिल्कुल अलग थीं। स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत, महात्मा गांधी का नैतिक प्रभाव और कांग्रेस का व्यापक प्रभुत्व उनके साथ था। उस समय विपक्ष बेहद कमजोर था और चुनावी प्रतिस्पर्धा सीमित थी। 1952 के पहले आम चुनाव में केवल कुछ ही दल मैदान में थे और मतदाताओं की संख्या भी अपेक्षाकृत कम थी।</div><div><br></div><div>इसके विपरीत नरेंद्र मोदी ने ऐसे दौर में राजनीति की जब देश का सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वरूप पूरी तरह बदल चुका था। अब लोकतंत्र अधिक जागरूक, प्रश्न पूछने वाला और प्रतिस्पर्धी हो गया है। मोदी ने वर्ष 2014 में पहली बार और फिर 2024 में तीसरी बार प्रधानमंत्री पद प्राप्त किया। देवेगौड़ा के अनुसार यह उपलब्धि साधारण नहीं है, क्योंकि आज का मतदाता अधिक सजग और अपेक्षाओं से भरा हुआ है।</div><div><br></div><div>अपने आलेख में देवेगौड़ा इस बात पर भी जोर देते हैं कि पहले के प्रधानमंत्रियों को जो सामाजिक और राजनीतिक आधार सहज रूप से मिल जाता था, वह मोदी जैसे नेताओं को नहीं मिला। न तो वह किसी राजनीतिक वंश से आए और न ही उनके पास कोई पारिवारिक विरासत थी। इसके बावजूद उन्होंने अपनी मेहनत, संगठन क्षमता और जनता से सीधे संवाद के बल पर स्वयं को स्थापित किया।</div><div><br></div><div>देवेगौड़ा अपने अनुभव का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि उनका स्वयं का प्रधानमंत्री कार्यकाल बहुत छोटा रहा, इसलिए वह यह देखकर आश्चर्य करते हैं कि नरेंद्र मोदी लगातार लंबे समय तक जनता का विश्वास बनाए रखने में कैसे सफल रहे? उनके अनुसार इसका उत्तर मोदी की अद्भुत ऊर्जा, अनुशासन और निरंतर आत्ममंथन में छिपा है।</div><div><br></div><div>देवेगौड़ा के आलेख में नेहरू और मोदी के समय के बीच सामाजिक बदलावों की तुलना भी की गई है। देवेगौड़ा लिखते हैं कि नेहरू के समय मंत्रिमंडल में समाज के विभिन्न वर्गों का पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं था। उस दौर में ऊंची जातियों का वर्चस्व अधिक दिखाई देता था। इसके विपरीत मोदी के मंत्रिमंडल में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं की भागीदारी अधिक दिखाई देती है। इसे वह आधुनिक भारत की सामाजिक विविधता का प्रतिबिंब मानते हैं।</div><div><br></div><div>महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने को लेकर भी देवेगौड़ा ने मोदी सरकार की सराहना की है। उनका कहना है कि संसद और राजनीति में महिलाओं को अधिक प्रतिनिधित्व देने की दिशा में जो प्रयास हुए हैं, वह भारत को अधिक समावेशी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं।</div><div><br></div><div>देवेगौड़ा के अनुसार आज का भारत नेहरू काल के भारत से बहुत अलग है। अब नागरिक अधिक शिक्षित, जागरूक और अधिकारों के प्रति सजग हैं। सामाजिक न्याय, पर्यावरण, महिला अधिकार और नागरिक अधिकार जैसे विषयों पर समाज में गहरी चर्चा होती है। ऐसे समय में शासन चलाना पहले की तुलना में कहीं अधिक कठिन हो गया है। अपने आलेख में वह विशेष रूप से यह भी कहते हैं कि आज के नेताओं को चौबीसों घंटे सोशल मीडिया और समाचार चैनलों की आलोचना का सामना करना पड़ता है। कभी कभी आलोचना कठोर और व्यक्तिगत भी हो जाती है। फिर भी नरेंद्र मोदी लगातार जनता के बीच सक्रिय बने हुए हैं और आलोचनाओं से घबराने की बजाय स्वयं को जनता के सामने खुला रखते हैं।</div><div><br></div><div>अपने आलेख में देवेगौड़ा ने मोदी की विदेश नीति, राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्थिक दृष्टि का भी उल्लेख किया। उन्होंने लिखा है कि मोदी ने भारत को तेजी से आगे बढ़ती अर्थव्यवस्था बनाने का प्रयास किया है। साथ ही राष्ट्रीय हितों की रक्षा के मामले में उन्होंने दृढ़ता दिखाई है। उन्होंने लिखा है कि सैन्य संघर्षों और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों के समय उनका निर्णयात्मक नेतृत्व स्पष्ट रूप से सामने आया। पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा यह भी कहते हैं कि मोदी केवल प्रशासनिक प्रमुख नहीं हैं, बल्कि वह जनता से भावनात्मक जुड़ाव रखने वाले नेता हैं। अपने रेडियो संवाद, तकनीक के उपयोग और सीधे संपर्क के माध्यम से उन्होंने समाज के हर वर्ग तक पहुंचने का प्रयास किया है।</div><div><br></div><div>अपने आलेख के अंत में देवेगौड़ा निष्कर्ष देते हैं कि नरेंद्र मोदी की सफलता का सबसे बड़ा कारण उनका आत्मचिंतनशील स्वभाव है। वह निरंतर स्वयं का मूल्यांकन करते रहते हैं, जनता की अपेक्षाओं को समझते हैं और बदलते समय के अनुसार अपने कार्य और दृष्टिकोण में सुधार करते रहते हैं। यही गुण उन्हें लंबे समय तक जनविश्वास प्राप्त कराने में सबसे अधिक सहायक बना है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 11:37:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/former-pm-hd-deve-gowda-wrote-an-article-explaining-the-secret-of-pm-modi-success</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[परिवर्तन के 12 वर्ष: विकास, विरासत और वैश्विक नेतृत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/12-years-of-transformation-development-legacy-and-global-leadership]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले 12 वर्षों में भारत ने राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक परिवर्तनों का एक नया युग देखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास ने केवल गति ही नहीं, बल्कि नई दिशा और नई चेतना भी प्राप्त की। आर्थिक सुधारों से लेकर डिजिटल क्रांति, राष्ट्रीय सुरक्षा से सामाजिक समावेशन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण तक भारत ने आत्मनिर्भरता, सुशासन और वैश्विक प्रतिष्ठा की ओर उल्लेखनीय यात्रा तय की है। “सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास” के मंत्र के साथ प्रारंभ हुई यह यात्रा आज “विकसित भारत 2047” के व्यापक राष्ट्रीय संकल्प में रूपांतरित होती दिखाई देती है।</div><div><br></div><h2>आर्थिक सुधार और वित्तीय समावेशन&nbsp;</h2><div><br></div><div>मोदी सरकार की शुरुआती और सबसे महत्वाकांक्षी पहलों में वर्ष 2014 का “मेक इन इंडिया” अभियान प्रमुख रहा, जिसने भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा प्रदान की। घरेलू उत्पादन, विदेशी निवेश और सरल नियमों के कारण इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा निर्माण और मोबाइल उत्पादन जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई। इससे रोजगार और औद्योगिक विकास को नई गति मिली।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-what-are-the-political-and-economic-implications-of-the-economic-tsunami" target="_blank">आखिर आर्थिक सुनामी के राजनीतिक व आर्थिक मायने मायने क्या हैं?</a></h3><div>इसी दौरान “अंत्योदय” के संकल्प के तहत आर्थिक समावेशन पर विशेष ध्यान दिया गया। वर्ष 2015 में शुरू हुई प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ने छोटे उद्यमियों, महिलाओं और युवाओं को बिना गारंटी ऋण उपलब्ध कराकर स्वरोजगार और ग्रामीण उद्यमिता को नई पहचान दी। 6.3 करोड़ से अधिक MSME उद्यमों को सहायता मिली। वहीं, जन धन योजना के तहत 55 करोड़ से अधिक बैंक खाते खोले गए, जिनमें 30.80 करोड़ खाते महिलाओं के नाम हैं। 36.73 करोड़ ग्रामीण खातों के साथ यह दुनिया का सबसे बड़ा वित्तीय समावेशन अभियान बना।</div><div><br></div><div>वर्ष 2017 में लागू GST को स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े कर सुधारों में माना जाता है। अनेक अप्रत्यक्ष करों को हटाकर “एक राष्ट्र, एक कर” की अवधारणा को मजबूत किया गया, जिससे पारदर्शिता बढ़ी, कर आधार विस्तृत हुआ और राजस्व संग्रह अधिक व्यवस्थित बना। IMF के अनुसार भारत का GDP वर्ष 2014 के लगभग 2 ट्रिलियन डॉलर से बढ़कर 2025 में 4.18 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो गया है। भारत जापान को पीछे छोड़ विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है, जबकि Economic Survey 2025-26 ने FY26 में 7.4 प्रतिशत वृद्धि का अनुमान जताया है।</div><div><br></div><div>कोविड के बाद “आत्मनिर्भर भारत” अभियान आर्थिक रणनीति का केंद्र बना। Production Linked Incentive (PLI) योजना के तहत इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा, टेलीकॉम और ऑटोमोबाइल सहित 14 रणनीतिक क्षेत्रों को बढ़ावा मिला, जिससे 5.31 लाख करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात हुआ। Ease of Doing Business, GST सुधार और डिजिटल पारदर्शिता के कारण 2025-26 में रिकॉर्ड 94.5 बिलियन अमेरिकी डॉलर का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश प्राप्त हुआ। वहीं, नोटबंदी ने अल्पकालिक चुनौतियों के बावजूद डिजिटल भुगतान, औपचारिक अर्थव्यवस्था तथा काले धन, नकली मुद्रा और आतंक वित्तपोषण पर रोक लगाने की दिशा में महत्वपूर्ण प्रभाव डाला।</div><div><br></div><div>वहीं, योजना आयोग के स्थान पर नीति आयोग की स्थापना ने सहकारी संघवाद, तकनीक-आधारित शासन और प्रशासनिक दक्षता को नई मजबूती प्रदान की।</div><div><br></div><h2>डिजिटल इंडिया, सामाजिक सशक्तिकरण और आधारभूत विकास&nbsp;</h2><div><br></div><div>डिजिटल इंडिया अभियान ने पिछले दशक में भारत की आर्थिक और तकनीकी तस्वीर को व्यापक रूप से बदल दिया। भीम ऐप, आधार और UPI जैसी पहलों ने भारत को डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में वैश्विक नेतृत्व दिलाया, जहाँ आज विश्व के लगभग 49 प्रतिशत रियल-टाइम डिजिटल ट्रांजैक्शन भारत में होते हैं। UPI कई देशों में सक्रिय है, जबकि IMPS और FASTag ने डिजिटल अर्थव्यवस्था को और गति दी। DBT, ऑनलाइन सेवाओं और डिजिटल पारदर्शिता ने सरकारी योजनाओं में लीकेज कम किए तथा लाभार्थियों तक सहायता सीधे पहुँचाने का मार्ग प्रशस्त किया।</div><div><br></div><div>स्टार्टअप इंडिया और स्टैंड-अप इंडिया जैसी पहलों ने उद्यमिता को नई ऊर्जा प्रदान की। इन योजनाओं ने युवाओं, महिलाओं और वंचित वर्गों को रोजगार खोजने वालों से रोजगार सृजित करने वालों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना ने पारंपरिक कारीगरों को प्रशिक्षण, आधुनिक उपकरण और डिजिटल बाज़ार से जोड़कर नई पहचान प्रदान की।</div><div><br></div><div>सामाजिक सशक्तिकरण की दिशा में “स्वच्छ भारत अभियान” के तहत 11 करोड़ से अधिक शौचालयों का निर्माण हुआ, जबकि आयुष्मान भारत योजना के माध्यम से 50 करोड़ से अधिक लोगों को स्वास्थ्य सुरक्षा उपलब्ध हुई। “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” अभियान ने बालिका शिक्षा, सुरक्षा और जागरूकता को राष्ट्रीय आंदोलन का स्वरूप दिया। वहीं, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना ने करोड़ों गरीब महिलाओं को धुएँ से मुक्ति दिलाकर स्वच्छ ईंधन, बेहतर स्वास्थ्य और सम्मानजनक जीवन की नई दिशा दी। “तीन तलाक” प्रथा पर रोक लगाकर मुस्लिम महिलाओं को समानता, सम्मान और संवैधानिक अधिकारों की नई सुरक्षा प्रदान की गई।</div><div><br></div><div>कृषि क्षेत्र में PM-KISAN योजना के माध्यम से 11 करोड़ किसानों को प्रतिवर्ष 6,000 रुपये की प्रत्यक्ष सहायता दी गई। आधारभूत संरचना के क्षेत्र में पीएम गति शक्ति योजना के तहत 100 लाख करोड़ रुपये से अधिक के निवेश का लक्ष्य निर्धारित किया गया। 3.5 लाख किलोमीटर से अधिक ग्रामीण सड़कें तथा तीव्र गति से विस्तारित राष्ट्रीय राजमार्गों ने देश की कनेक्टिविटी को नई ऊँचाइयाँ प्रदान कीं। नए हवाई अड्डों के निर्माण और ‘उड़ान’ योजना ने देश की हवाई कनेक्टिविटी का अभूतपूर्व विस्तार किया, जबकि वंदे भारत और तेजस जैसी आधुनिक ट्रेनों ने भारतीय रेल के आधुनिकीकरण को नई गति दी।</div><div><br></div><div>शिक्षा क्षेत्र में 2014 के बाद 1,200 से अधिक नए विश्वविद्यालय, 10 नए IIT तथा 7 नए IIM स्थापित किए गए। वहीं, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) को 10 प्रतिशत आरक्षण प्रदान कर सामाजिक न्याय के दायरे का विस्तार किया गया, जिससे आर्थिक रूप से वंचित वर्गों को शिक्षा और रोजगार में नए अवसर प्राप्त हुए।</div><div><br></div><div>नई शिक्षा नीति 2020 ने शिक्षा को अधिक व्यावहारिक, कौशल-आधारित और आधुनिक स्वरूप प्रदान किया। “स्किल इंडिया मिशन” और “प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना” के माध्यम से युवाओं को उद्योग आधारित प्रशिक्षण उपलब्ध कराया गया। वर्ष 2025 तक 2.27 करोड़ से अधिक युवाओं को कौशल प्रशिक्षण दिया जा चुका है। AI, 5G, ड्रोन, साइबर सुरक्षा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में 400 से अधिक आधुनिक पाठ्यक्रम प्रारंभ किए गए। इंडिया AI मिशन और सेमीकंडक्टर मिशन ने भारत को भविष्य की प्रौद्योगिकियों का वैश्विक केंद्र बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया। नई दिल्ली में आयोजित AI Impact Summit ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता के क्षेत्र में भारत की वैश्विक नेतृत्वकारी भूमिका को और सुदृढ़ किया।</div><div><br></div><div>वहीं, “खेलो इंडिया” अभियान ने युवाओं में खेल संस्कृति को नई ऊर्जा दी। 2025 के खेलो इंडिया यूथ गेम्स में 10,000 से अधिक खिलाड़ियों की भागीदारी ने भारत की उभरती खेल प्रतिभा और “फिट इंडिया” विज़न को और मजबूत किया।</div><div><br></div><h2>सुरक्षा, सांस्कृतिक और वैश्विक नेतृत्व&nbsp;</h2><div><br></div><div>राष्ट्रीय सुरक्षा के क्षेत्र में मोदी सरकार ने अधिक स्पष्ट, आक्रामक और निर्णायक नीति अपनाई। उरी और पुलवामा आतंकी हमलों के बाद सर्जिकल स्ट्राइक और बालाकोट एयर स्ट्राइक ने आतंकवाद के प्रति भारत की कठोर रणनीति को विश्व के सामने स्थापित किया। “ऑपरेशन सिंदूर” में भारतीय वायुसेना द्वारा आतंकी ठिकानों पर की गई सटीक कार्रवाई ने भारत की सामरिक क्षमता का परिचय दिया। “अग्निपथ योजना” ने युवाओं को सेना से जोड़ते हुए सशस्त्र बलों को अधिक युवा और तकनीक-सक्षम बनाने की दिशा में पहल की। वहीं, वर्ष 2019 में अनुच्छेद 370 हटाकर जम्मू-कश्मीर के पूर्ण राष्ट्रीय एकीकरण और विकास की दिशा में ऐतिहासिक कदम उठाया गया।</div><div><br></div><div>नक्सली हिंसा का खात्मा और ‘रेड कॉरिडोर’ के सिमटने से नक्सल-मुक्त भारत के लक्ष्य की प्राप्ति हुई। सुरक्षा और विकास की समन्वित रणनीति ने प्रभावित क्षेत्रों में प्रशासनिक पहुँच, आधारभूत सुविधाओं और जनविश्वास को मजबूत किया।</div><div><br></div><div>इसी अवधि में भारत की सांस्कृतिक और सभ्यतागत विरासत के पुनर्जागरण को नई ऊर्जा मिली। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, महाकाल लोक, गौतम बुद्ध सर्किट, केदारनाथ पुनर्विकास और सोमनाथ मंदिर परिसर के आधुनिकीकरण ने आध्यात्मिक पर्यटन और सांस्कृतिक चेतना को सशक्त बनाया। राष्ट्र गीत ‘वंदे मातरम्’ के राष्ट्रप्रेरक स्वरूप को रेखांकित करते हुए राष्ट्र गान के समानांतर दर्जा दिया गया।</div><div><br></div><div>नया संसद भवन आधुनिक भारत की लोकतांत्रिक आकांक्षाओं का प्रतीक बनकर उभरा। वहीं, डॉ. भीमराव आंबेडकर राष्ट्रीय स्मारक, स्टेच्यू ऑफ यूनिटी, राष्ट्र प्रेरणा स्थल और प्रधानमंत्री संग्रहालय जैसे संस्थानों ने भारत की ऐतिहासिक विरासत, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय गौरव को नई मजबूती दी।</div><div><br></div><div>अंतरिक्ष क्षेत्र में भी भारत ने ऐतिहासिक उपलब्धियाँ हासिल कीं। चंद्रयान-3 की सफल लैंडिंग के साथ भारत चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुँचने वाला विश्व का पहला देश बना, जबकि मंगलयान मिशन ने भारत को सबसे कम लागत में मंगल तक पहुँचने वाले देशों की अग्रणी श्रेणी में स्थापित किया।</div><div><br></div><div>वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका पिछले वर्षों में लगातार सशक्त हुई है। सफल G20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी और “ग्लोबल साउथ” की प्रभावशाली आवाज़ के रूप में भारत ने नई पहचान बनाई। संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक विरासत की वैश्विक स्वीकृति का प्रतीक बना। वहीं, “वैक्सीन मैत्री” अभियान के तहत 100 से अधिक देशों को कोविड वैक्सीन उपलब्ध कराकर भारत ने वैश्विक मानवीय सहयोग और जिम्मेदारी का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया।</div><div><br></div><div>अतः, मोदी सरकार के 12 वर्ष भारत के “अमृत काल” की मजबूत आधारशिला के रूप में उभरे हैं। “विकसित भारत 2047” का विज़न केवल आर्थिक प्रगति का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह एक समावेशी, तकनीक-सक्षम, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण का व्यापक संकल्प है। मतभेदों के शोर से परे, परिवर्तन की यह यात्रा स्वयं साक्षी है कि बीते 12 वर्षों में भारत ने विकास, विरासत और वैश्विक नेतृत्व की एक नई गाथा रची है।</div><div><br></div><div>- डॉ. शिवानी कटारा</div><div>(लेखिका विश्वविद्यालय में सहायक आचार्य हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 16:46:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/12-years-of-transformation-development-legacy-and-global-leadership</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[टूटते भरोसे के वेंटिलेटर पर देश की परीक्षा व्यवस्था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-country-examination-system-on-the-ventilator-of-crumbling-trust]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में परीक्षा अब केवल योग्यता का आकलन नहीं रह गई है बल्कि यह करोड़ों सपनों की निर्णायक कसौटी बन चुकी है लेकिन जब यही कसौटी बार-बार संदिग्ध हो जाए, जब मेहनत और ईमानदारी की जगह ‘जुगाड़’ और ‘माफिया नेटवर्क’ हावी हो जाएं, तब यह केवल परीक्षा का संकट नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य का संकट बन जाता है। पेपर लीक के चलते नीट-यूजी 2026 परीक्षा का रद्द होना, सीबीएसई की ऑन स्क्रीन मार्किंग (ओएसएम) प्रणाली पर उठे गंभीर सवाल और एसएससी जीडी परीक्षा में धांधली, ये घटनाएं मिलकर यह साबित करती हैं कि भारत की परीक्षा प्रणाली अब गहरे संस्थागत संकट में फंस चुकी है और भारत की परीक्षा प्रणाली अब वेंटिलेटर पर है। नीट-यूजी 2026 का घटनाक्रम तो इस विफलता की सबसे भयावह तस्वीर पेश करता है। लगभग 22.79 लाख छात्रों की मेहनत, उनके परिवारों के त्याग और वर्षों की तैयारी एक झटके में शून्य हो गई। यह केवल एक परीक्षा का रद्द होना नहीं था बल्कि उस विश्वास का टूटना था, जिस पर पूरी शिक्षा व्यवस्था टिकी हुई है। इससे भी अधिक चिंताजनक तथ्य यह है कि इस बार मामला केवल बाहरी गिरोहों तक सीमित नहीं रहा बल्कि जांच में राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (एनटीए) के भीतर तक मिलीभगत के आरोप सामने आए।</div><div><br></div><div>सीबीआई की जांच और संसदीय समिति की पूछताछ में यह संकेत मिले हैं कि प्रश्नपत्र तैयार करने और परीक्षा प्रबंधन से जुड़े कुछ अधिकारियों ने मोटी रकम लेकर चुनिंदा छात्रों तक प्रश्नपत्र पहुंचाने का काम किया। यदि ये आरोप सही हैं तो यह केवल भ्रष्टाचार नहीं बल्कि संस्थागत विश्वासघात है। जिस संस्था को निष्पक्षता की गारंटी देनी थी, वही यदि धांधली का हिस्सा बन जाए तो पूरी व्यवस्था का नैतिक आधार ही खत्म हो जाता है। नीट पेपर लीक की प्रकृति भी सामान्य नहीं थी। ‘गेस पेपर’ के नाम पर लगभग 150 से अधिक प्रश्नों का हूबहू मिल जाना, परीक्षा से पहले 600 अंकों तक के सवालों का प्रसार, व्हाट्सएप और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर खुलेआम प्रश्नपत्र का घूमना, ये सब किसी संयोग का परिणाम नहीं हो सकते। यह एक संगठित, बहुस्तरीय और तकनीकी रूप से सक्षम नेटवर्क का संकेत है, जो परीक्षा प्रणाली की हर कमजोर कड़ी को भेद चुका है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि 2024 में पेपर लीक के बाद भी कोई ठोस सुधार क्यों नहीं हुआ? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों, जांच समितियों और सिफारिशों के बावजूद 2026 में स्थिति और बदतर कैसे हो गई? इसका सीधा अर्थ है कि समस्या तकनीकी कम और इच्छाशक्ति की अधिक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/neet-ug-paper-leak-shashi-tharoor-said-modi-government-is-betraying-an-entire-generation" target="_blank">NEET UG Paper Leak: Shashi Tharoor बोले, 'पूरी पीढ़ी से विश्वासघात कर रही है Modi Govt'</a></h3><div>भारत की परीक्षा प्रणाली का ढ़ांचा ही कई स्तरों पर कमजोर है। प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर वितरण तक की प्रक्रिया में निजी एजेंसियों और आउटसोर्स कर्मचारियों की बड़ी भूमिका रहती है। यही वह जगह है, जहां से माफिया नेटवर्क अपनी जड़ें जमाता है। जब प्रश्नपत्र परीक्षा केंद्र तक पहुंचने से पहले ही स्कैन होकर डिजिटल रूप में फैल सकता है तो यह स्पष्ट संकेत है कि सुरक्षा तंत्र केवल कागजों पर मजबूत है, जमीन पर नहीं। दूसरी ओर, कोचिंग उद्योग का अनियंत्रित विस्तार इस संकट को और गहरा कर रहा है। मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाएं अब हजारों करोड़ रुपये का बाजार बन चुकी हैं। इस बाजार में ‘सफलता’ एक उत्पाद है, जिसे खरीदने के लिए छात्र और अभिभावक किसी भी हद तक जाने को मजबूर हैं। इसी मानसिकता का फायदा उठाकर एजुकेशन माफिया ‘सीक्रेट पेपर’, ‘100 प्रतिशत सलेक्शन गारंटी’ और ‘इनसाइडर एक्सेस’ जैसे झूठे वादों के जरिए पूरे सिस्टम को खोखला कर रहा है।</div><div><br></div><div>यदि नीट प्रकरण परीक्षा प्रणाली की सुरक्षा पर सवाल खड़ा करता है तो सीबीएसई का ओएसएम विवाद मूल्यांकन प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर चोट करता है। डिजिटल मूल्यांकन को पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाने के उद्देश्य से लागू किया गया था लेकिन इसके परिणाम उलटे दिखाई दिए। पास प्रतिशत में गिरावट, मेधावी छात्रों को अपेक्षा से कम अंक मिलना और स्कैन की गई कॉपियों में भारी गड़बड़ियां, ये सब इस बात के संकेत हैं कि तकनीक को बिना पर्याप्त तैयारी और परीक्षण के लागू किया गया। कई छात्रों ने शिकायत की कि उनकी कॉपियां धुंधली थी, कुछ को गलत उत्तर पुस्तिकाएं मिली और कुछ मामलों में तो पूरी कॉपी ही किसी और की थी। यह स्थिति केवल तकनीकी त्रुटि नहीं मानी जा सकती बल्कि यह सरासर गंभीर प्रशासनिक लापरवाही है। यदि एक छात्र की मेहनत को किसी दूसरे की कॉपी से बदल दिया जाए तो यह केवल गलती नहीं है बल्कि उस छात्र के भविष्य के साथ सीधा खिलवाड़ है। शिक्षा मंत्रालय और बोर्ड भले ही इन खामियों को सीमित मामलों तक बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करें लेकिन छात्रों में बढ़ता असंतोष इस बात का प्रमाण है कि समस्या व्यापक है।</div><div>तीसरी बड़ी घटना, एसएससी कांस्टेबल जीडी परीक्षा में धांधली, इस बात को और स्पष्ट करती है कि यह संकट किसी एक परीक्षा या संस्था तक सीमित नहीं है। उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड जैसे राज्यों में पेपर लीक, तकनीकी खराबी और प्रशासनिक अव्यवस्था के कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी। ग्रेटर नोएडा में यूपी एसटीएफ द्वारा पकड़े गए रैकेट ने इस धांधली के आधुनिक रूप को उजागर किया। प्रॉक्सी सर्वर, स्क्रीन शेयरिंग ऐप्स और डमी कैंडिडेट्स के जरिए परीक्षा में हेरफेर किया जा रहा था। यह पारंपरिक नकल या पेपर लीक से कहीं अधिक खतरनाक है क्योंकि इसमें तकनीक का इस्तेमाल कर पूरी प्रणाली को भीतर से हैक किया जा रहा है। इन तीनों घटनाओं को एक साथ देखें तो एक भयावह तस्वीर उभरती है, एक ऐसी व्यवस्था, जहां प्रश्नपत्र सुरक्षित नहीं, मूल्यांकन विश्वसनीय नहीं और परीक्षा प्रक्रिया पारदर्शी नहीं है। सबसे अधिक पीड़ित वह छात्र है, जो ईमानदारी से मेहनत करता है। ग्रामीण क्षेत्रों के हजारों छात्र, जिनके माता-पिता ने कर्ज लेकर या जमीन गिरवी रखकर उन्हें कोचिंग दिलाई, आज सबसे ज्यादा निराश हैं। एक परीक्षा रद्द होने का मतलब केवल दोबारा परीक्षा देना नहीं होता बल्कि यह मानसिक तनाव, आर्थिक बोझ और आत्मविश्वास के टूटने का कारण बनता है।</div><div><br></div><div>इस पूरे संकट का एक और खतरनाक पहलू है व्यवस्था के प्रति बढ़ता अविश्वास। जब छात्र यह मानने लगें कि सफलता मेहनत से नहीं बल्कि ‘सेटिंग’ से मिलती है तो यह केवल शिक्षा का नहीं बल्कि सामाजिक नैतिकता का भी पतन है। अब सवाल यह है कि समाधान क्या है? क्या हर बार जांच, गिरफ्तारी और बयानबाजी से काम चल जाएगा? स्पष्ट है कि नहीं। सबसे पहले परीक्षा प्रणाली में पूर्ण डिजिटल और एन्क्रिप्टेड मॉडल लागू करना होगा। प्रश्नपत्रों को परीक्षा से कुछ मिनट पहले तक सुरक्षित सर्वर में रखा जाए और सीधे केंद्रों पर डिजिटल रूप में उपलब्ध कराया जाए। इससे छपाई और परिवहन से जुड़ी कमजोरियां समाप्त होंगी। दूसरा, आउटसोर्सिंग व्यवस्था को सीमित करना होगा। संवेदनशील कार्यों में केवल प्रशिक्षित और जवाबदेह सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। तीसरा, पेपर लीक को संगठित आर्थिक अपराध घोषित कर इसके लिए गैर-जमानती कठोर कानून बनाए जाएं। जब तक अपराधियों को कठोर सजा नहीं मिलेगी, तब तक यह धंधा बंद नहीं होगा। चौथा, साइबर निगरानी को मजबूत करना होगा। टेलीग्राम, डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म्स पर सक्रिय नेटवर्क को ट्रैक करने के लिए विशेष एजेंसियां बनाई जानी चाहिए। पांचवां, तकनीक को लागू करने से पहले उसका व्यापक परीक्षण और प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए। सीबीएसई ओएसएम विवाद ने यह स्पष्ट कर दिया है कि बिना तैयारी के लागू की गई तकनीक समाधान नहीं बल्कि नई समस्या बन सकती है।</div><div>&nbsp;</div><div>सबसे महत्वपूर्ण है राजनीतिक और प्रशासनिक इच्छाशक्ति। जब तक सरकार इस समस्या को ‘राष्ट्रीय आपदा’ की तरह नहीं देखेगी, तब तक आधे-अधूरे समाधान ही सामने आएंगे। नीट-यूजी 2026, सीबीएसई ओएसएम विवाद और एसएससी परीक्षा धांधली, ये घटनाएं चेतावनी हैं। यदि अब भी कठोर और स्थायी सुधार नहीं किए गए तो आने वाले समय में हर परीक्षा संदेह के घेरे में होगी। तब सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं होगी कि पेपर लीक हुआ बल्कि यह होगी कि देश के युवाओं का विश्वास पूरी तरह टूट जाएगा। और जिस राष्ट्र के युवा ही अपनी व्यवस्था पर विश्वास खो दें, उसके भविष्य की नींव कितनी कमजोर हो जाती है, यह समझना मुश्किल नहीं है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 16:45:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-country-examination-system-on-the-ventilator-of-crumbling-trust</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rajya Sabha Elections Candidates के जरिये BJP ने सामाजिक और Congress ने राजनीतिक समीकरणों को साधने पर दिया जोर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rajya-sabha-elections-candidates-bjp-focused-on-social-equations-and-con-on-political-equations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राज्यसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इन घोषणाओं ने केवल संसदीय राजनीति ही नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को लेकर भी कई संकेत दिए हैं। भाजपा ने जहां संगठन के पुराने और भरोसेमंद चेहरों को आगे बढ़ाने के साथ-साथ सामाजिक और क्षेत्रीय संतुलन साधने की कोशिश की है, वहीं कांग्रेस ने भी अपने अनुभवी नेताओं और संगठन से जुड़े चेहरों को प्राथमिकता देकर राजनीतिक संदेश देने का प्रयास किया है।</div><div><br></div><div>भाजपा ने राज्यसभा की द्विवार्षिक चुनाव प्रक्रिया और ओडिशा उपचुनाव के लिए कुल ग्यारह उम्मीदवार उतारे हैं। इनमें मणिपुर भाजपा अध्यक्ष ए शारदा देवी, राष्ट्रीय महासचिव अलका गुर्जर, राष्ट्रीय सचिव तरुण चुघ, राजस्थान के प्रभावशाली जाट नेता सतीश पूनिया और हाल ही में बीजद छोड़कर भाजपा में शामिल हुए देबाशीष सामंतराय प्रमुख हैं। पार्टी सूत्रों के अनुसार यह चयन केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि संगठन के प्रति लंबे समय से समर्पित नेताओं को सम्मान देने की रणनीति का हिस्सा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mahua-moitra-attacks-tmc-rebellion-says-if-you-have-the-courage" target="_blank">TMC में बगावत पर Mahua Moitra का हमला, बोलीं- हिम्मत है तो Resign देकर चुनाव लड़ें</a></h3><div>भाजपा की सूची में सबसे अधिक चर्चा देबाशीष सामंतराय के नाम को लेकर हुई। सामंतराय ने हाल ही में बीजद से इस्तीफा देकर भाजपा का दामन थामा था और तुरंत उन्हें ओडिशा उपचुनाव में उम्मीदवार बना दिया गया। इससे साफ संकेत है कि भाजपा ओडिशा में अपने पुराने सहयोगी रहे बीजद को लगातार कमजोर करने की नीति पर काम कर रही है। नवीन पटनायक के नेतृत्व वाली बीजद पहले ही कमजोर स्थिति में मानी जा रही है और भाजपा अब वहां अपने प्रभाव को स्थायी रूप से बढ़ाना चाहती है।</div><div><br></div><div>भाजपा ने गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश और मणिपुर जैसे राज्यों में अपने मजबूत संगठनात्मक आधार का लाभ उठाते हुए ऐसे उम्मीदवार चुने हैं जिनकी जीत लगभग तय मानी जा रही है। गुजरात से राजुभाई शुक्ला, मुकेशभाई राठवा, मानसिंह परमार और जितेंद्र कंजरिया को उतारकर पार्टी ने पिछड़ा और जनजातीय वर्गों को साधने का प्रयास किया है। राजस्थान में अलका गुर्जर और सतीश पूनिया को उम्मीदवार बनाकर भाजपा ने दो प्रभावशाली पिछड़े वर्ग समुदायों को संदेश देने की कोशिश की है। यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि राजस्थान में कांग्रेस संगठनात्मक रूप से सक्रिय दिखाई दे रही है और भाजपा वहां सामाजिक समीकरण मजबूत करना चाहती है।</div><div><br></div><div>पंजाब भाजपा नेता तरुण चुघ को मध्य प्रदेश से उम्मीदवार बनाना भी राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। पंजाब में अगले वर्ष चुनाव होने हैं और भाजपा वहां पारंपरिक समर्थक वर्ग को मजबूत करने के साथ-साथ सिख समुदाय में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। इससे पहले पार्टी ने केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब भाजपा अध्यक्ष बनाकर जाट सिख समुदाय तक पहुंच बनाने की कोशिश की थी।</div><div><br></div><div>इन चुनावों में भाजपा द्वारा केंद्रीय मंत्रियों रवनीत सिंह बिट्टू और जॉर्ज कुरियन को दोबारा उम्मीदवार नहीं बनाए जाने से भी राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है। दोनों वर्तमान में राज्यसभा सदस्य हैं और उनका कार्यकाल जून में समाप्त हो रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इससे केंद्र सरकार में मंत्रिमंडल फेरबदल की संभावना मजबूत हुई है। इससे पहले भी वर्ष 2022 में मुख्तार अब्बास नकवी और आरसीपी सिंह को दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया था और बाद में उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर होना पड़ा था। भाजपा संगठन में भी बदलाव की चर्चा है और माना जा रहा है कि पार्टी नए नेतृत्व और नई सामाजिक रणनीति के साथ आगे बढ़ना चाहती है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर कांग्रेस ने भी राज्यसभा चुनाव के लिए अपने उम्मीदवारों की सूची जारी की है। पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, प्रवक्ता पवन खेड़ा और मंसूर अली खान को कर्नाटक से उम्मीदवार बनाया गया है। मध्य प्रदेश से मीनाक्षी नटराजन, राजस्थान से नीरज डांगी, तमिलनाडु से प्रवीण चक्रवर्ती और झारखंड से प्रणव झा को उम्मीदवार घोषित किया गया है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस की सूची से साफ है कि पार्टी अनुभव और संगठनात्मक निष्ठा दोनों को महत्व दे रही है। मल्लिकार्जुन खरगे को फिर राज्यसभा भेजना कांग्रेस नेतृत्व की स्थिरता बनाए रखने का संकेत है। वहीं पवन खेड़ा को उम्मीदवार बनाकर पार्टी ने अपने आक्रामक राजनीतिक और मीडिया चेहरे को संसद में मजबूत करने की कोशिश की है। मीनाक्षी नटराजन को मध्य प्रदेश से उतारकर कांग्रेस ने संगठन के पुराने और वैचारिक रूप से मजबूत नेताओं को महत्व देने का संदेश दिया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि 245 सदस्यीय राज्यसभा में भाजपा के पास अभी 113 सदस्य हैं जबकि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की कुल संख्या 148 है। इसलिए भाजपा इन चुनावों के जरिये अपने संख्याबल को और मजबूत करना चाहती है। वहीं, आंध्र प्रदेश में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने राज्यसभा सीटों का बंटवारा कर लिया है। चार सीटों में से तीन तेलुगु देशम पार्टी और एक सीट जन सेना को दी गई है। इससे साफ है कि भाजपा दक्षिण भारत में अपने सहयोगियों के साथ संतुलन बनाकर चलना चाहती है ताकि क्षेत्रीय दलों के सहारे वहां अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत कर सके।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर भाजपा और कांग्रेस दोनों की उम्मीदवार सूची केवल संसदीय चुनाव की तैयारी नहीं, बल्कि आने वाले विधानसभा और लोकसभा चुनावों की रणनीतिक भूमिका भी तय कर रही है। भाजपा जहां सामाजिक विस्तार, संगठनात्मक निष्ठा और विपक्षी दलों में सेंध लगाने की नीति पर आगे बढ़ रही है, वहीं कांग्रेस अनुभवी नेतृत्व और वैचारिक प्रतिबद्धता के सहारे अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 14:12:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rajya-sabha-elections-candidates-bjp-focused-on-social-equations-and-con-on-political-equations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Modi 10 June को रचने जा रहे हैं सबसे बड़ा इतिहास, भारतीय लोकतंत्र के नये रिकॉर्ड को देखकर दुनिया कह उठेगी वाह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/nehru-record-broken-modi-becomes-india-longest-erving-prime-minister]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास रच दिया है। दस जून को वह देश के सबसे लंबे समय तक लगातार निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने वाले नेता बन जाएंगे। इस उपलब्धि के साथ वह पंडित जवाहरलाल नेहरू के उस लंबे कार्यकाल को पीछे छोड़ देंगे, जिसे दशकों तक भारतीय राजनीति का सबसे मजबूत अध्याय माना जाता रहा। मई 2014 में पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने वाले नरेंद्र मोदी दस जून 2026 तक लगातार चार हजार 399 दिनों तक देश का नेतृत्व कर चुके होंगे, जबकि नेहरू का लगातार निर्वाचित कार्यकाल चार हजार 398 दिनों का था।</div><div><br></div><div>यह केवल समय का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि भारतीय राजनीति के बदलते स्वरूप का प्रतीक भी है। एक ओर नेहरू का दौर था, जब कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन की विरासत के सहारे लगभग निर्विरोध सत्ता में थी, वहीं दूसरी ओर नरेंद्र मोदी का उदय बेहद कठिन और प्रतिस्पर्धी राजनीतिक माहौल में हुआ। मोदी ने पहले गुजरात में लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक और प्रशासनिक क्षमता साबित की और फिर पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचाया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-may-make-praveen-chakravarty-a-rajya-sabha-candidate-from-tamil-nadu-thanks-to-cm-vijay" target="_blank">Praveen Chakravarti को Tamil Nadu से Rajya Sabha उम्मीदवार बना सकती है कांग्रेस, CM Vijay का आभार!</a></h3><div>साल 2014 भारतीय राजनीति का निर्णायक मोड़ साबित हुआ। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने तीन दशकों बाद किसी गैर कांग्रेसी दल को पूर्ण बहुमत दिलाया। कांग्रेस मात्र 44 सीटों पर सिमट गई और देश में गठबंधन युग की राजनीति को निर्णायक चुनौती मिली। इसके बाद 2019 में भाजपा ने और भी बड़ी जीत दर्ज करते हुए तीन सौ तीन सीटें हासिल कीं। वर्ष 2024 में भले ही पार्टी अपने दम पर बहुमत से थोड़ी दूर रही, लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने फिर सत्ता बरकरार रखी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो प्रधानमंत्री मोदी का राजनीतिक सफर उनकी संगठन क्षमता और जनसंपर्क कौशल का भी उदाहरण है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्होंने भूकंप के बाद बदहाल स्थिति में राज्य की कमान संभाली और विकास आधारित प्रशासन को नई पहचान दी। यही मॉडल बाद में पूरे देश में चर्चा का विषय बना। गुजरात में लगातार तीन चुनाव जीतकर वह राज्य के सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले मुख्यमंत्री बने।</div><div><br></div><div>मोदी सरकार के कार्यकाल में कई ऐसे फैसले हुए जिन्हें दशकों तक असंभव माना जाता था। जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाना, तीन तलाक समाप्त करना और अयोध्या में राम मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होना, ऐसे ऐतिहासिक कदम रहे जिन्होंने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी। भाजपा समर्थकों का मानना है कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विकास के संतुलन ने मोदी को देश की जनता के बीच असाधारण स्वीकार्यता दिलाई।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता केवल भारत तक सीमित नहीं है। विश्व स्तर पर भी उनकी पहचान एक मजबूत और निर्णायक नेता के रूप में बनी है। विभिन्न वैश्विक सर्वेक्षणों में उनकी लोकप्रियता दुनिया के कई लोकतांत्रिक नेताओं से कहीं अधिक दर्ज की जाती रही है। डिजिटल माध्यमों पर भी उनकी पहुंच अत्यंत प्रभावशाली है। सोशल मीडिया के जरिए उन्होंने जनता से सीधा संवाद स्थापित कर एक नई राजनीतिक शैली की शुरुआत सबसे पहले की थी, जिसका उन्हें भरपूर लाभ मिला।</div><div><br></div><div>मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का भौगोलिक विस्तार भी अभूतपूर्व रहा है। वर्ष 2014 में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन केवल सात राज्यों में सत्ता में था, जबकि अब यह संख्या 21 हो चुकी है। पूर्वोत्तर से लेकर पूर्वी तथा दक्षिण भारत तक भाजपा ने अपने संगठन और जनाधार को मजबूत किया है। संसद में भी पार्टी की ताकत लगातार बढ़ी है। लोकसभा और राज्यसभा दोनों सदनों में भाजपा की उपस्थिति पहले की तुलना में कई गुना मजबूत हुई है।</div><div><br></div><div>आर्थिक मोर्चे पर भी मोदी सरकार ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। भारत की अर्थव्यवस्था ने पिछले एक दशक में तेज गति से विस्तार किया है। वर्ष 2014 में दुनिया की दसवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रहा भारत अब चौथे स्थान पर पहुंच चुका है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था का आकार 4.3 खरब डॉलर तक पहुंच गया है। जापान को पीछे छोड़ते हुए भारत अब केवल अमेरिका, चीन और जर्मनी से पीछे है।</div><div><br></div><div>इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह लंबा कार्यकाल केवल राजनीतिक स्थायित्व का उदाहरण नहीं, बल्कि बदलते भारत की नई पहचान भी बन गया है। उन्होंने भारतीय राजनीति की भाषा, शैली और प्राथमिकताओं को बदलते हुए विकास, राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व का ऐसा मिश्रण प्रस्तुत किया, जिसने उन्हें समकालीन भारत का सबसे प्रभावशाली नेता बना दिया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत केवल आर्थिक और राजनीतिक रूप से ही मजबूत नहीं हुआ, बल्कि विकसित भारत और आत्मनिर्भर भारत जैसे अभियानों के माध्यम से आत्मविश्वास से भरे नए राष्ट्र के रूप में उभरा है। घरेलू उत्पादन, रक्षा निर्माण, डिजिटल क्रांति, स्टार्टअप संस्कृति और आधारभूत ढांचे के विस्तार ने भारत को आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ाया है। वहीं वैश्विक मंच पर मोदी की कूटनीति ने भारत की प्रतिष्ठा को अभूतपूर्व ऊंचाइयों तक पहुंचाया है। अमेरिका से लेकर पश्चिम एशिया, यूरोप से लेकर इंडो पैसिफिक तक भारत की आवाज पहले से कहीं अधिक प्रभावशाली हुई है। जी-20 की सफल अध्यक्षता, वैश्विक संकटों में संतुलित भूमिका और भारत केंद्रित विदेश नीति ने यह साबित किया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत अब केवल दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करने वाली एक निर्णायक शक्ति बन चुका है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 13:31:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/nehru-record-broken-modi-becomes-india-longest-erving-prime-minister</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पंजाब त्रिस्तरीय निकाय चुनाव के दलगत, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सियासी मायने अहम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/national-and-international-political-implications-of-punjab-local-body-elections-are-significant]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पंजाब के त्रिस्तरीय शहरी निकाय चुनाव- नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायत- सिर्फ स्थानीय सत्ता का संघर्ष नहीं हैं, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव का “सेमीफाइनल” माने जा रहे हैं। ये चुनाव सिर्फ स्थानीय प्रशासनिक चुनाव नहीं हैं, बल्कि ये पंजाब की बदलती क्षेत्रीय राजनीति, राष्ट्रीय दलों की रणनीति और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की संघीय लोकतांत्रिक छवि से भी जुड़े हुए हैं। यही वजह है कि 2026 के इन चुनावों को 2027 विधानसभा चुनाव का सबसे बड़ा “पॉलिटिकल टेस्ट” माना जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पंजाब नगर निकाय चुनाव 2026 के चुनाव आयोग और मतगणना से जुड़े अब तक के मुख्य आंकड़े निम्नलिखित हैं- कुल 102 शहरी निकायों- नगर निगम, नगर परिषद और नगर पंचायतों- में चुनाव हुए, जहां मतदान प्रतिशत लगभग 63.94% दर्ज किया गया। नगर पंचायतों में सबसे अधिक 76.18% मतदान हुआ। नगर निगम क्षेत्रों में सबसे कम लगभग 59.91% मतदान दर्ज हुआ। नगर परिषदों में लगभग 65.06% मतदान हुआ। कुल 1,896 वार्डों के लिए मतदान कराया गया। लगभग 7,555 उम्मीदवार मैदान में थे, जिनमें से 79 उम्मीदवार निर्विरोध चुने गए।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/aap-wins-punjab-civic-polls-with-landslide-victory-defeats-congress-and-bjp" target="_blank">पंजाब निकाय चुनाव में AAP की प्रचंड जीत, Congress-BJP पस्त, Bhagwant Mann बोले- यह विकास की जीत</a></h3><div>इस चुनाव में अब तक आए नतीजों और घोषित रुझानों के अनुसार आम आदमी पार्टी ने सबसे बड़ी जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस मुख्य विपक्षी पार्टी बनी है। आप ने लगभग 886 वार्ड जीते। जबकि कांग्रेस ने लगभग 358 वार्ड जीते। वहीं शिरोमणि अकाली दल (SAD) को 191–192 वार्ड, भाजपा को 172 वार्ड, बसपा को 7 वार्ड, और निर्दलीय उम्मीदवारों को 251 वार्ड पर जीत मिली। वहीं सीट प्रतिशत के हिसाब से मोटे अनुमान के मुताबिक, आप ने लगभग 50% के आसपास वार्ड, कांग्रेस ने लगभग 20% वार्ड, एसएडी ने लगभग 9% वार्ड, बीजेपी ने लगभग 7% वार्ड और बीएसपी सहित अन्य ने लगभग 14% सीटो पर जीत व बढ़त हासिल की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहाँ तक वोट प्रतिशत का सवाल है, तो विभिन्न मीडिया रिपोर्टों और संकलित रुझानों के अनुसार दल और अनुमानित वोट प्रतिशत इसप्रकार हैं- आम आदमी पार्टी को लगभग 41–44%, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को लगभग 24–27%, भारतीय जनता पार्टी को लगभग 13–16%, शिरोमणि अकाली दल को लगभग 10–13% और निर्दलीय व अन्य लगभग 5–8% वोट हासिल हुए हैं। इस प्रकार आप का वोट शेयर सबसे अधिक रहा, जबकि कांग्रेस दूसरे नंबर पर, शिरोमणि अकाली दल तीसरे नम्बर पर रही और इसने ग्रामीण-सिख बेल्ट में कुछ आधार वापस पाया, जबकि बीजेपी चौथे स्थान पर जाकर कुछ शहरी पॉकेट्स तक सीमित रही। आधिकारिक वोट प्रतिशत का सबसे विश्वसनीय डेटा sec.punjab.gov.in⁠ पर उपलब्ध है।</div><div><br></div><div>अब जिस तरह से इन चुनावों के नतीजे आए हैं, उसने यह तय कर दिया है कि राज्य की राजनीति में आम आदमी पार्टी की जमीन मजबूत हो रही है और कांग्रेस, भाजपा, एसएडी जैसे विपक्षी दल बचाव की मुद्रा में आ चुके हैं। लिहाजा पंजाब त्रिस्तरीय शहरी निकाय चुनाव के दलगत, क्षेत्रीय, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सियासी मायने अहम हैं।</div><div><br></div><h2># आइए जानते हैं कि इन चुनावों से पंजाब की राजनीति के मद्देनजर दलगत यानी किस दल के लिए क्या निकलते हैं?</h2><div>&nbsp;</div><div>पहला, आप (AAP) अपने जनविश्वास की परीक्षा में सफल: मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के लिए यह चुनाव सत्ता में आने के बाद शहरी जनसमर्थन मापने का अवसर था, जो बड़ी जीत के साथ उम्मीदों पर खरा उतरा। निकायों में मजबूत जीत मिली है। इससे यह संदेश गया कि पंजाब में आप सिर्फ “वैकल्पिक प्रयोग” नहीं, बल्कि स्थायी राजनीतिक शक्ति बन चुकी है। आप की बड़ी जीत इसी ओर संकेत करती है। आप (AAP) के लिए ये चुनाव सबसे अहम थे क्योंकि वह राज्य की सत्ता में है।&nbsp; नगर निकायों में मजबूत प्रदर्शन से यह संदेश गया कि जनता अभी भी मुख्यमंत्री भगवंत मान की सरकार पर भरोसा कर रही है। इसमें आप के लिए फायदे की बात यह है कि शहरी वोट बैंक पर पकड़ मजबूत होने से “दिल्ली मॉडल” की तरह "पंजाब मॉडल" को भी प्रचारित करने का अवसर मिला। साथ ही विपक्ष के बिखराव का भी लाभ मिला। वहीं, आप के लिए खतरे की बात यह है कि नशा, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक दखल के आरोप बड़ी चुनौती बने हुए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, कांग्रेस के अस्तित्व की लड़ाई पर विपक्षी हैसियत बनाई: भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के लिए पंजाब आखिरी बड़े राज्यों में से एक है जहाँ वह अब भी राजनीतिक पुनर्जीवन की उम्मीद देखती है। वह मिली भी और पार्टी मुख्य विपक्षी पार्टी की हैसियत पा गई। भले ही कांग्रेस ने निकाय चुनावों में कमजोर प्रदर्शन किया, लेकिन इतनी सीट मिल गई कि उसका संगठनात्मक संकट ज्यादा नहीं बढ़ेगा। पंजाब कभी कांग्रेस का मजबूत गढ़ था, लेकिन लगातार संगठनात्मक कमजोरी और गुटबाजी ने उसे कमजोर किया है। फिर भी कांग्रेस के लिए अवसर यह है कि कई शहरों में दूसरे स्थान पर भी उसने मजबूत उपस्थिति दिखाई है, और वह खुद को मुख्य विपक्ष के रूप में स्थापित कर चुकी है, जबकि आगे शहरी असंतोष को भुनाने का मौका मिलेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, अकाली दल के पुनर्जीवन का संघर्ष बढ़ा: शिरोमणि अकाली दल किसान आंदोलन और पुराने सत्ता-विरोधी माहौल के बाद अपनी खोई जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहा है। लेकिन इन चुनावों ने बता दिया कि “पंजाबियत” और क्षेत्रीय पहचान की राजनीति अभी कितनी प्रभावी है। शिरोमणि अकाली दल के लिए ये चुनाव “राजनीतिक पुनर्जीवन” की परीक्षा थे और आगे भी रहेंगे। किसान आंदोलन और पुराने भ्रष्टाचार आरोपों के बाद पार्टी जो कमजोर हुई थी, वह स्थिति नहीं बदली है।&nbsp;</div><div>लिहाजा अब वह खुद को “पंजाबियत” और क्षेत्रीय अस्मिता की पार्टी के रूप में फिर स्थापित करना चाहती है। शिरोमणि अकाली दल के लिए सकारात्मक संकेत यह है कि ग्रामीण-सिख वोट बैंक में आंशिक वापसी हुई, जो भाजपा से अलग होकर स्वतंत्र पहचान मजबूत करने की कोशिश हो सकती है, जबकि उसकी चुनौती यह है कि शहरी क्षेत्रों में कमजोर संगठन के चलते युवा मतदाताओं के बीच सीमित आकर्षण है।</div><div><br></div><div>चौथा, भाजपा के विस्तार की प्रयोगशाला: भारतीय जनता पार्टी पंजाब में शहरी हिंदू वोट और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों के सहारे धीरे-धीरे विस्तार करना चाहती है। इसमें वह सफल रही। भाजपा नगर निकायों में सीटें ज्यादा नहीं बढ़ा पाई है, लिहाजा वह 2027 में गठबंधन राजनीति के बिना भी अधिक आक्रामक रणनीति अपना सकती है। भाजपा के लिए पंजाब अभी भी विस्तार का राज्य है। पार्टी हिंदू-शहरी वोट और राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों के सहारे जगह बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि यहां भाजपा के लिए अवसर यह है कि कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल की कमजोरी का लाभ मिलेगा और शहरी निकायों में सीटें बढ़ाकर दीर्घकालिक आधार तैयार करने में सहूलियत होगी। हालांकि सबसे बड़ी बाधा किसान आंदोलन के बाद ग्रामीण पंजाब में अविश्वास। के चलते राज्य में अभी भी सीमित संगठनात्मक नेटवर्क है।</div><div><br></div><div>पांचवां, पंजाब में बहुजन समाज पार्टी (BSP) अकेले चुनाव लड़कर दलित वोट बैंक को पुनर्जीवित करने की कोशिश कर रही है, जो इस बार भी नहीं मिली। क्योंकि वहां बड़ी दलित आबादी होने के कारण बीएसपी भविष्य की राजनीति में “किंगमेकर” की भूमिका देख रही है। लिहाजा इन चुनावों से उभरते बड़े संकेत इस बात की तस्दीक करते हैं कि पंजाब की राजनीति अब पूरी तरह बहुकोणीय हो चुकी है। शहरी मतदाता विकास के साथ-साथ नशे और प्रशासनिक जवाबदेही को भी अहम मुद्दा मान रहा है।</div><div><br></div><h2># जानिए इन चुनावों के अहम क्षेत्रीय मायने</h2><div><br></div><div>पंजाब के त्रिस्तरीय निकाय चुनावों ने तीन बड़े संकेत दिए हैं जिनके क्षेत्रीय मायने स्पष्ट हैं- पहला, पंजाब की राजनीति अब स्थायी रूप से बहुकोणीय हो चुकी है। दूसरा, 'आप' फिलहाल मजबूत हुई है, लेकिन विपक्ष समाप्त नहीं हुआ। तीसरा, पंजाब की राजनीति अब केवल स्थानीय मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष, संघीय लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय प्रवासी राजनीति से भी जुड़ चुकी है, जिसके क्षेत्रीय फायदे भी दिखेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, इन चुनावों से ऐसा प्रतीत हुआ है कि स्थानीय मुद्दों पर क्षेत्रीय जनमत हावी है। यही वजह है कि इस बार सिर्फ सड़क, पानी और सफाई ही नहीं, बल्कि बेरोजगारी, नशा, कानून-व्यवस्था और भ्रष्टाचार भी बड़ा मुद्दा बने। कई जगह मतदाताओं ने जवाबदेही की मांग की। पांचवां, बहुकोणीय मुकाबले ने राजनीति बदली है। लिहाजा, आप, कांग्रेस, भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (SAD) और बहुजन समाज पार्टी (BSP)— सभी के लिए अलग-अलग सियासी स्पेस बनते प्रतीत हो रहे हैं, क्योंकि सभी दलों ने अपनी अपनी ताकत झोंक दिए थे। इन चुनावों से पंजाब में “दो-दलीय राजनीति” की बजाय बहुकोणीय राजनीति और मजबूत हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात तो यह है कि आप फिलहाल भारी बढ़त में दिखी है, लेकिन विपक्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ। लिहाजा 2027 विधानसभा चुनाव में गठबंधन राजनीति और सीट-समझौते फिर अहम हो सकते हैं। कुल मिलाकर, ये चुनाव सिर्फ मेयर या पार्षद चुनने के नहीं, बल्कि पंजाब की अगली राजनीतिक दिशा तय करने वाले चुनाव बन चुके हैं। लिहाजा, इन चुनावों के राजनीतिक मायने बड़े हैं, क्योंकि ये 2027 विधानसभा चुनाव का ट्रेलर समझे जा रहे हैं। इन चुनावों को पंजाब की जनता का “मूड टेस्ट” माना जा रहा है। वहीं, शहरी क्षेत्रों में किस दल की पकड़ मजबूत है, इससे अगले विधानसभा चुनाव की रणनीति तय होगी।</div><div><br></div><h2># जानिए इन चुनावों के राष्ट्रीय राजनीतिक मायने</h2><div><br></div><div>पहला, 2029 लोकसभा चुनाव की पृष्ठभूमि: पंजाब के ये चुनाव राष्ट्रीय दलों के लिए “मूड इंडिकेटर” हैं। 2029 लोकसभा चुनाव से पहले यह देखा जा रहा है कि क्षेत्रीय दल आप यहां निरंतर मजबूत हो रही है और राष्ट्रीय दलों का प्रभाव कम हो रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, विपक्षी राजनीति का संकेत: चूंकि कांग्रेस और आप&nbsp; दोनों पंजाब में प्रतिस्पर्धा जारी है, इसलिए राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता की संभावनाएँ कमजोर प्रतीत होती हैं और कांग्रेस/भाजपा विरोधी तीसरे मोर्चे को पंख लग सकते हैं।&nbsp; इससे भाजपा को विपक्ष के बिखराव का लाभ मिल सकता है। लेकिन जिस तरह से विपक्ष की राजनीति में आप सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल का दबदबा बढ़ेगा, वह भाजपा के लिए भावी चिंता का सबब बन सकती है।</div><div><br></div><div>तीसरा, संघीय राजनीति का मॉडल: पंजाब में बहुकोणीय मुकाबला दिखाता है कि भारत की राजनीति अब पूरी तरह द्विध्रुवीय नहीं रही। यहाँ क्षेत्रीय अस्मिता, किसान राजनीति, धर्म, युवा रोजगार और शहरी प्रशासन—सब मिलकर चुनावी समीकरण तय किए, जिससे सत्ताधारी आप को बहुत फ़ायदा मिला।</div><div><br></div><div>चौथा, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता: चुनावों के दौरान प्रशासनिक दखल, बूथ प्रबंधन और निष्पक्षता को लेकर आरोप भी लगे। विपक्ष ने राज्य मशीनरी के दुरुपयोग की शिकायतें उठाईं। ऐसे मुद्दे राष्ट्रीय स्तर पर चुनाव आयोग और लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर बहस को बढ़ाते हैं। लेकिन यह बेतुकी बात है और विपक्षी सियासी हथकंडे के अलावा कुछ नहीं है।</div><div><br></div><h2># समझिए इन चुनावों के अंतरराष्ट्रीय सियासी मायने</h2><div><br></div><div>पहला, प्रवासी पंजाबी (Diaspora) की निगाह: कनाडा, यूनाइटेड किंगडम और संयुक्त राज्य अमेरिका में बड़ी पंजाबी आबादी रहती है। पंजाब की राजनीति और चुनावों पर इन देशों के प्रवासी समुदाय की गहरी नजर रहती है। निकाय चुनावों के नतीजे यह संकेत देते हैं कि पंजाब में कौन-सी राजनीतिक धारा मजबूत हो रही है—क्षेत्रीय, राष्ट्रवादी या वैकल्पिक राजनीति। लिहाजा अब आप को इनसे भरपूर फायदा मिलेगा, जिससे आगामी चुनावों&nbsp; में वह और मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>दूसरा, भारत की लोकतांत्रिक छवि: भारत दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में स्थानीय निकाय चुनावों को भी बड़े लोकतांत्रिक अभ्यास के रूप में प्रस्तुत करता है। पंजाब जैसे संवेदनशील सीमावर्ती राज्य में शांतिपूर्ण चुनाव भारत की संस्थागत मजबूती का संदेश देते हैं। यहां पर आप को मिली जीत और कांग्रेस को मिले दूसरे स्थान ने ईवीएम में गड़बड़ी के उनके दावों की हवा निकाल दी है।</div><div><br></div><div>तीसरा, सीमावर्ती राज्य की रणनीतिक अहमियत: पाकिस्तान से सटे पंजाब में राजनीतिक स्थिरता राष्ट्रीय सुरक्षा से भी जुड़ी मानी जाती है। नशा, कट्टरता, तस्करी और सीमा सुरक्षा जैसे मुद्दे स्थानीय चुनावों में भी प्रभाव डालते हैं। इसलिए अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समुदाय पंजाब की राजनीति को सिर्फ राज्यीय राजनीति नहीं, बल्कि दक्षिण एशियाई स्थिरता के संदर्भ में भी देखता है। अब यहां जिस तरह से आप की सरकार को जीत मिली है, उससे केंद्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार की अंतरराष्ट्रीय चिंता और बढ़ेगी। उन्हें कतिपय विरोधाभासों का भी सामना करना पड़ेगा।</div><div><br></div><div>चौथा, किसान और संघीय आंदोलन की वैश्विक प्रतिध्वनि:&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">किसान आंदोलन के दौरान पंजाब वैश्विक मीडिया और प्रवासी राजनीति का केंद्र बना था। इसमें दिल्ली की तत्कालीन आप सरकार का बड़ा रोल था। इसका लाभ उसे पंजाब में जीत के रूप में मिली। इसलिए यहाँ के चुनावों को यह देखने के लिए भी देखा जा रहा है कि किसान असंतोष अब आप की राजनीतिक दिशा में जा रहा है, जो भाजपा/काँग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों के लिए चिंता की बात है।</span></div><div><br></div><div>वस्तुतः पंजाब निकाय चुनाव 2026 के परिणामों में आम आदमी पार्टी ने सबसे बड़ा प्रदर्शन करते हुए राज्यभर में भारी बढ़त और जीत दर्ज की है। शहरी पंजाब में भगवंत मान सरकार को जनसमर्थन मिलने का दावा आप कर रही है। जबकि कांग्रेस ने कई शहरों में खुद को मुकाबला में बनाए रखा। वहीं जबकि अकाली दल ने कुछ इलाकों में वापसी के संकेत दिए। इन रुझानों में सबसे बड़ा लाभ आप को मिला, जिसने सीटों के साथ वोट शेयर में भी बढ़त बनाई। कांग्रेस शहरी क्षेत्रों में दूसरे नंबर पर रही, जबकि बीजेपी और अकाली दल का प्रदर्शन क्षेत्रवार अलग-अलग रहा। आधिकारिक और विस्तृत वार्डवार परिणाम आप sec.punjab.gov.in⁠ पर देख सकते हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 13:00:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/national-and-international-political-implications-of-punjab-local-body-elections-are-significant</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[किसानों के लिए कुछ भी कर जाते हैं PM Modi, समुद्र में अटके खाद के 17 जहाज, अब Fertiliser को हजारों किलोमीटर घुमाकर Saudi Arabia के रास्ते लाने की तैयारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/fertilizer-ships-stranded-at-sea-now-preparing-to-transport-fertilizer-thousands-of-km-via-saudi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसानों के हितों की रक्षा और देश की खाद्य सुरक्षा को मजबूत बनाए रखना मोदी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकताओं में शामिल है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्पष्ट मानना है कि किसानों को सस्ती दरों पर खाद उपलब्ध कराने में कोई कमी नहीं आनी चाहिए, इसलिए जरूरत पड़ने पर सरकार इसके लिए खजाना खोलने से भी पीछे नहीं हटती। हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण वैश्विक स्तर पर खाद की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन केंद्र सरकार ने समय रहते कई महत्वपूर्ण कदम उठाकर यह सुनिश्चित करने की तैयारी शुरू कर दी है कि खरीफ और रबी मौसम में किसानों को खाद की कमी का सामना न करना पड़े। वैकल्पिक परिवहन मार्गों की तलाश, अतिरिक्त आयात, बढ़ती सब्सिडी का बोझ उठाने की तैयारी और सक्रिय कूटनीतिक प्रयास इस बात का प्रमाण हैं कि किसानों की जरूरतों को पूरा करना सरकार की सबसे बड़ी चिंता है।</div><div><br></div><div>रिपोर्टों के मुताबिक, पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद भारत आने वाले खाद से लदे 17 जहाज फारस की खाड़ी क्षेत्र में फंस गए हैं। इन जहाजों के अटकने से देश में खाद आपूर्ति प्रभावित होने की आशंका पैदा हो गई थी। स्थिति की गंभीरता को देखते हुए केंद्र सरकार ने एक वैकल्पिक योजना पर काम शुरू किया है। इसके तहत संबंधित बंदरगाहों पर जहाजों के पहुंचने के बाद खाद को सड़क मार्ग से लगभग 1200 किलोमीटर दूर सऊदी अरब के यनबू बंदरगाह तक पहुंचाया जाएगा। वहां से इसे फिर समुद्री मार्ग के जरिए भारतीय बंदरगाहों तक लाने की योजना बनाई जा रही है। यद्यपि यह मार्ग लंबा है और इसमें अधिक समय लगेगा, लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में इसे सबसे व्यवहारिक विकल्प माना जा रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-china-border-talks-related-news-and-analysis" target="_blank">India के साथ खड़ा हो गया China! Pakistan हैरान, Shehbaz Sharif, Asim Munir के लौटते ही Jinping ने किया बड़ा खेल</a></h3><div>सूत्रों के अनुसार खाद विभाग ने मंत्रियों के एक अनौपचारिक समूह को इस योजना की जानकारी दी है। अधिकारियों का मानना है कि जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही बुरी तरह प्रभावित होने के कारण सीधे मार्ग से आपूर्ति फिलहाल संभव नहीं है। देरी के कारण 60 से 70 दिनों तक अतिरिक्त समय लग सकता है, जिससे लागत भी बढ़ेगी। हालांकि सरकार का मानना है कि खरीफ मौसम के दौरान किसानों को खाद की उपलब्धता बनाए रखने के लिए यह अतिरिक्त प्रयास जरूरी है। अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि यदि संघर्ष लंबा खिंचता है तो इसका असर रबी फसलों की बुआई पर भी पड़ सकता है।</div><div><br></div><div>इसी चुनौती से निपटने के लिए भारत ने खाद आयात की दिशा में भी बड़े कदम उठाए हैं। केंद्र सरकार ने 17 लाख टन यूरिया के आयात के लिए नया वैश्विक निविदा आमंत्रित किया है। सरकारी क्षेत्र की राष्ट्रीय उर्वरक लिमिटेड ने पश्चिमी और पूर्वी तटों के लिए अलग-अलग मात्रा में आयात प्रस्ताव मांगे हैं। इन खेपों को जुलाई के तीसरे सप्ताह तक रवाना करने की योजना बनाई गई है, ताकि धान, मक्का और सोयाबीन जैसी प्रमुख खरीफ फसलों की बुआई से पहले पर्याप्त भंडारण सुनिश्चित किया जा सके।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा यूरिया आयातक देश है और ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया का संघर्ष प्राकृतिक गैस तथा अमोनिया जैसी प्रमुख कच्ची सामग्रियों की आपूर्ति को प्रभावित कर रहा है, तब मोदी सरकार ने दूरदर्शिता का परिचय दिया है। इससे पहले अप्रैल में भी 25 लाख टन यूरिया आयात के लिए निविदा जारी की गई थी। वैश्विक स्तर पर आपूर्ति बाधित होने और कीमतों में वृद्धि के बावजूद सरकार लगातार अतिरिक्त खरीद और भंडारण की नीति पर काम कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर केवल आपूर्ति व्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा दबाव केंद्र सरकार के वित्तीय प्रबंधन पर भी पड़ रहा है। खाद विभाग के नवीनतम आकलन के अनुसार यदि मौजूदा वैश्विक कीमतें बनी रहती हैं तो चालू वित्त वर्ष में खाद सब्सिडी का बोझ बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच सकता है, जबकि इसके लिए बजट में केवल 1.7 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया था। युद्ध के बाद यूरिया की वैश्विक कीमतों में 120 प्रतिशत से अधिक, डीएपी में 38 प्रतिशत, सल्फर में 87 प्रतिशत और अमोनिया में 84 प्रतिशत तक वृद्धि दर्ज की गई है। रुपये की कमजोरी के कारण लागत में अतिरिक्त बढ़ोतरी भी हुई है। भारत डीएपी, पोटाश और एनपीके जैसे प्रमुख उर्वरकों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में उथल-पुथल का सीधा असर देश पर पड़ता है। इसके बावजूद केंद्र सरकार किसानों पर अतिरिक्त बोझ डालने के बजाय सब्सिडी के माध्यम से राहत देने की नीति पर कायम है। अधिकारियों का मानना है कि यदि तनाव लंबा चला तो जहाजों की सामान्य आवाजाही बहाल होने में दो से तीन महीने लग सकते हैं, जबकि तेल और गैस आपूर्ति पूरी तरह पटरी पर आने में और अधिक समय लग सकता है। ऐसे में सरकार एक ओर आपूर्ति बनाए रखने का प्रयास कर रही है तो दूसरी ओर बढ़ती लागत के बावजूद किसानों को राहत पहुंचाने के लिए अतिरिक्त वित्तीय संसाधन जुटाने की तैयारी भी कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि मोदी सरकार की कूटनीति भी इस संकट के दौरान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। भारत ने केवल खाड़ी क्षेत्र पर निर्भर रहने के बजाय रूस, मिस्र, कतर, नाइजीरिया समेत कई देशों से खाद और उससे जुड़ी आवश्यक सामग्रियों की आपूर्ति सुनिश्चित की है। सरकार दीर्घकालिक आपूर्ति समझौतों को बढ़ावा देने के साथ-साथ वैकल्पिक समुद्री मार्गों की भी तलाश कर रही है। इसका उद्देश्य भविष्य में किसी एक क्षेत्र पर अत्यधिक निर्भरता को कम करना और आपूर्ति श्रृंखला को अधिक मजबूत बनाना है।</div><div><br></div><div>रिपोर्टों के मुताबिक, घरेलू उत्पादन को बनाए रखने के लिए भी सरकार ने महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। खाद कारखानों को मिलने वाली गैस की आपूर्ति को पहले के लगभग 70 से 75 प्रतिशत स्तर से बढ़ाकर करीब 90 प्रतिशत तक कर दिया गया है। इससे उत्पादन क्षमता को बनाए रखने में मदद मिली है और घरेलू बाजार में खाद की उपलब्धता को स्थिर रखा जा सका है।</div><div><br></div><div>हालांकि वैश्विक बाजार में यूरिया की कीमतें अब भी ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं। परिवहन लागत में वृद्धि, सीमित उपलब्धता और आपूर्ति मार्गों में बाधाओं के कारण अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसके बावजूद केंद्र सरकार लगातार निगरानी रखते हुए किसानों तक खाद की निर्बाध उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयास कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि खाद विभाग के अनुसार खरीफ मौसम के लिए कुल आवश्यकता लगभग 3.9 करोड़ टन पोषक तत्वों की है और वर्तमान में देश के पास करीब 2 करोड़ टन का भंडार उपलब्ध है। हालांकि वैश्विक बाजार में कीमतों में तेज वृद्धि के कारण खाद सब्सिडी का बोझ बढ़कर लगभग 3.8 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है, फिर भी केंद्र सरकार किसानों पर इसका भार नहीं डालना चाहती। प्रधानमंत्री मोदी की अगुवाई में सरकार बढ़ती लागत के बावजूद किसानों को सस्ती खाद उपलब्ध कराने के लिए सरकारी खजाने से अतिरिक्त संसाधन खर्च करने को तैयार है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बहरहाल, पश्चिम एशिया संकट, बाधित आपूर्ति श्रृंखलाओं और बढ़ती वैश्विक कीमतों के बीच मोदी सरकार की सक्रिय कूटनीति, वैकल्पिक परिवहन व्यवस्था, विविधीकृत आयात नीति और किसानों के पक्ष में सब्सिडी देने का संकल्प यह दर्शाता है कि देश की खाद्य सुरक्षा और किसानों के हित सर्वोपरि हैं तथा इनसे किसी भी परिस्थिति में समझौता नहीं किया जाएगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:02:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बदलकर कर्नाटक का धर्मंसंकट टला! क्या सीएम बदलकर से हल निकलेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/congress-averts-karnataka-crisis-by-replacing-chief-minister-will-changing-the-cm-provide-solution]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कर्नाटक में कांग्रेस इस समय एक गहरे राजनीतिक धर्मसंकट में दिखाई दे रही थी, लेकिन मुख्यमंत्री बदलकर उसने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। जिस तरह से आलाकमान के निर्देश पर सिद्धारमैया की जगह डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने का फैसला किया है, वह दूरदर्शिता का परिचायक है। लेकिन सवाल है कि क्या मुख्यमंत्री बदलने से समस्या का स्थायी हल निकल चुका है? या फिर कोई और नई समस्या पनपेगी! कांग्रेस का अतीत इसी बात की चुगली करता है।</div><div><br></div><div>चूंकि कांग्रेस के लिए जहां एक ओर सत्ता संतुलन मायने रखता है, तो वहीं दूसरी ओर एक स्थिर और टिकाऊ सरकार की चुनौती उसके समक्ष मौजूद है, जो चुनावी मुद्दा भी 2028 के विधानसभा चुनाव में बनेगा। और इसी बीच मुख्यमंत्री बदलने की लगातार चल रही चर्चाओं को सही साबित करके और अपना नया मुख्यमंत्री घोषित करके उसने कर्नाटक के राजनीतिक तापमान बढ़ा चुकी है।</div><div><br></div><h2>सवाल यह है कि क्या नेतृत्व परिवर्तन वास्तव में समाधान बन सकता है, या फिर यह कांग्रेस के लिए कोई नया संकट खड़ा कर देगा?&nbsp;</h2><div><br></div><div>इसलिए आइए पहले कर्नाटक कांग्रेस के मौजूदा समीकरण को समझते हैं। वह यह कि वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया&nbsp; राज्य में जनाधार और प्रशासनिक अनुभव वाले नेता माने जाते हैं, जबकि उपमुख्यमंत्री डी के शिवकुमार संगठन, संसाधन और रणनीतिक राजनीति के मजबूत स्तंभ हैं। चूँकि गत 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की जीत में दोनों की बड़ी भूमिका रही थी। इसलिए सत्ता संतुलन शुरू से ही संवेदनशील मुद्दा बना हुआ है। उम्मीद है कि अब डी के शिवकुमार को मुख्यमंत्री बनाने से पार्टी को मजबूती मिलेगी। यही वजह है कि मुख्यमंत्री बदलना केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि राजनीतिक संतुलन का प्रश्न बन चुका था, जो अब जाकर पूरा हुआ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/karnataka-siddaramaiah-resigns-from-the-post-of-cm-says-i-did-what-the-high-command-said" target="_blank">Karnataka: सिद्धारमैया ने सीएम पद से दिया इस्तीफा, बोले- आलाकमान ने जो कहा वो किया...</a></h3><div>ऐसे में सुलगता सवाल है कि आखिर दोनों नेताओं के बीच का संतुलन कैसे बदला और क्या मुख्यमंत्री बदलने से इसका हल निकल सकता है? तो जवाब होगा कि सैद्धांतिक रूप से नेतृत्व परिवर्तन से असंतोष कम किया जा सकता है, लेकिन व्यवहारिक राजनीति में ऐसा प्रयोग हमेशा सफल नहीं होता। बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि बदलाव सहमति से हुई या दबाव में, सत्ता हस्तांतरण सम्मानजनक हुआ या टकरावपूर्ण, संगठन और विधायकों का समर्थन किसके साथ रहे और जनता इसे स्थिरता माने या आंतरिक संघर्ष। क्योंकि यदि बदलाव “समझौते” की तरह दिखाई दिया है, तो कांग्रेस इसे संतुलन की राजनीति कह सकती है। लेकिन विपक्ष इस लंबी चली खींचतान को अस्थिरता के रूप में ही पेश करेगा।</div><div><br></div><h2>आइए पहले समझते हैं कि कांग्रेस का तल्ख अतीत क्या कहता है?</h2><div><br></div><div>पहला, राजस्थान मॉडल: बदलाव टला, लेकिन संघर्ष बढ़ा। आपने गौर किया होगा कि राजस्थान में अशोक गहलोत&nbsp; और सचिन पायलट के बीच लंबे समय तक नेतृत्व संघर्ष चला। फिर भी कांग्रेस हाईकमान स्पष्ट निर्णय लेने से बचता रहा। नतीजा यह निकला कि सरकार लगातार अंदरूनी तनाव में रही और युवा बनाम वरिष्ठ नेतृत्व की बहस तेज हुई। इससे चुनावी नैरेटिव कमजोर हुआ और अंततः सूबाई सत्ता भाजपा के हाथों गंवानी पड़ी। यह उदाहरण बताता है कि “निर्णय टालना” भी कभी-कभी संकट को लंबा कर देता है और विनाशकारी प्रभाव छोड़ता है।</div><div><br></div><div>दूसरा, मध्यप्रदेश मॉडल: असंतोष की कीमत सत्ता गंवाकर चुकाई। आपने महसूस किया होगा कि मध्यप्रदेश में कमलनाथ और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच बढ़ते असंतोष को समय रहते नहीं संभाला गया। आखिरकार सिंधिया समर्थक विधायकों के जाने से कांग्रेस सरकार गिर गई। यह कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सबक बना कि केवल “हाईकमान नियंत्रण” हर बार पर्याप्त नहीं होता।</div><div><br></div><div>तीसरा, पंजाब मॉडल: नेतृत्व परिवर्तन उल्टा भी पड़ सकता है। आपने समझा होगा कि पंजाब में कांग्रेस ने अमरिंदर सिंह को हटाकर चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया। उद्देश्य था एंटी-इन्कम्बेंसी कम करना और सामाजिक समीकरण मजबूत करना। लेकिन पार्टी के भीतर विभाजन और बढ़ गया। इससे संगठनात्मक भ्रम पैदा हुआ और चुनाव में कांग्रेस को भारी नुकसान हुआ। इससे यह संदेश गया कि देर से किया गया नेतृत्व परिवर्तन हमेशा लाभकारी नहीं होता।</div><div><br></div><h2>तो ऐसी उलझाऊ परिस्थितियों में आखिर कांग्रेस का असली धर्मसंकट क्या है?</h2><div><br></div><div>देखा जाए तो कांग्रेस के सामने फिलवक्त तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं:- एक, स्थिरता बनाम महत्वाकांक्षा: यदि बदलाव नहीं हुआ तो एक धड़ा असंतुष्ट रह सकता है। यदि बदलाव हुआ तो दूसरा धड़ा अस्थिर हो सकता है। दूसरा, दक्षिण भारत का राजनीतिक महत्व: कर्नाटक फिलहाल दक्षिण भारत में कांग्रेस की सबसे बड़ी सत्ता है। यह राज्य केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय रणनीति का केंद्र बन चुका है। तीसरा, भाजपा को अवसर न मिले: भारतीय जनता पार्टी लगातार कांग्रेस की आंतरिक राजनीति पर नजर रखे हुए है। लिहाजा कांग्रेस जानती है कि सार्वजनिक संघर्ष विपक्ष को बड़ा मुद्दा दे सकता है।</div><div><br></div><h2>जानिए क्या हो सकता है आगे?</h2><div><br></div><div>कांग्रेस संभवतः विभिन्न रास्तों पर विचार कर रही होगी: पहला, समयबद्ध सत्ता परिवर्तन और फिर संगठन और सरकार के बीच नई जिम्मेदारियों का बंटवारा। मुख्यमंत्री बदलने के बाद उसकी सबसे संभावित रणनीति फिलहाल यही दिखती है कि पार्टी किसी भी बदलाव को “संघर्ष” नहीं बल्कि “सहमति” के रूप में प्रस्तुत करना चाहेगी।</div><div><br></div><div>वास्तव में अतीत कांग्रेस को यह सिखाता है कि नेतृत्व परिवर्तन न करना भी जोखिम है और गलत समय पर करना उससे बड़ा जोखिम। इसलिए कर्नाटक में पार्टी इसी संतुलन को साधने की कोशिश कर चुकी है, क्योंकि यहां गलती केवल राज्य सरकार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश को भी प्रभावित कर सकती है। यही वजह है कि कर्नाटक में कांग्रेस नेतृत्व परिवर्तन यानी मुख्यमंत्री बदलने का निर्णय बेहद सावधानी पूर्वक किया गया है, क्योंकि पार्टी को यह एहसास है कि सत्ता परिवर्तन की आंतरिक राजनीति कई राज्यों में उसे भारी नुकसान पहुँचा चुकी है। यही कारण है कि पार्टी राजस्थान और मध्यप्रदेश जैसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति से बचना चाहती दिख रही थी और उसने डी के शिवकुमार के धैर्य और प्रयासों को ग्रेस दिया।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 17:54:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/congress-averts-karnataka-crisis-by-replacing-chief-minister-will-changing-the-cm-provide-solution</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों की सफल यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/prime-minister-narendra-modi-successful-five-nation-visit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानंमत्री नरेंद्र मोदी की पांच देशों संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) नीदरलैंड, स्वीडन, नार्वे और इटली की छह दिवसीय यात्रा संपन्न हो चुकी है। पश्चिमी एशिया संकट सहित दुनियाभर में चल रही उथल -पुथल तथा चीन की विस्तारवादी नीतियों के दृष्टिगत प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्रा इन देशों से द्विपक्षीय संबंध सुधारने की दिशा में एक अहम पड़ाव बनी। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के दौरान उन्हें स्वीडन तथा नार्वे जैसे देशों ने अपना सर्वोच्च नागरिक सम्मान देकर सम्मानित किया। नार्वे की यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भारत-नार्डिक देशों के शिखर सम्मेलन में भी भाग लिया। प्रधानमंत्री की पांच देशों की यात्रा के दौरान कुल 57 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा के व्यापक कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक निहितार्थ हैं। इन यात्राओं का एक परोक्ष संदेश यह भी है अब भारत दुनिया के ताकतवर देशों की कूटनीति की छत्रछाया से बाहर निकल कर अपनी स्वतंत्र नीति पर चल रहा है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>यूएई की यात्रा- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पांच देशों की यात्रा के प्रथम चरण में यूएई पहुंचे। यहाँ भारत और यूएई के मध्य सात समझौते हुए। इन समझौतों के अंतर्गत भारत व यूएई में संयुक्त तौर पर पेट्रो उत्पादों के रणनीतिक भंडार बनाए जाएंगे। यूएई भारत में दीर्घकालिक तौर पर एलपीजी आपूर्ति करेगा, पांच अरब डॉलर का नया निवेश करके भारत में सुपर कंप्यूटर क्लस्टर स्थापित करेगा। एक समझौता गुजरात के वाडीनार में शिप रिपेयरिंग क्लस्टर बनाने को लेकर भी है। इससे लाखों लोगों को रोजगार के नए अवसर मिलेंगे। दोनो देशों की कंपनियां मिलकर बहुत शक्तिशाली कंप्यूटर प्रणाली स्थापित करेंगी जो एआई ट्रेनिंग, रिसर्च और बड़े-बड़े मॉडल चालने के लिए प्रयोग की जाएगी। दोनों देशों के बीच रक्षा, औद्योगिक सहयोग, नवाचार उन्नत प्रौद्योगिकी, प्रशिक्षण, संयुक्त अभ्यास शिक्षा एवं सैन्य डॉक्ट्रिन, विशेष अभियान, अंतर-संचालन क्षमता, समुद्री सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, सुरक्षित संचार और सूचना आदान प्रदान के लिए एक व्यापक रणनीतिक ढांचा स्थपित करने की&nbsp; सहमति बनी है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/national-and-international-diplomatic-significance-of-the-quad-foreign-ministers-meeting" target="_blank">क्वाड विदेशी मंत्रियों की नई दिल्ली बैठक के राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मायने</a></h3><div>नीदरलैंड- अपनी यात्रा के अगले चरण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नीदरलैंड पहुंचे जहां उनका भव्य व गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया। भारत और नीदरलैंड के मध्य 17 द्विपक्षीय समझौतों से एक नया रिकॉर्ड बना। भारत और नीदरलैंड व्यापार और निवेश रक्षा और सुरक्षा, सेमीकंडक्टर, अंतरिक्ष, खनिज, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, और क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में साथ मिलकर काम करेंगे। प्रधानमंत्री मोदी और नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रॉब जे टेन के मध्य हूई वार्ता के बाद अलग-अलग क्षेत्रों में 17 समझौते हुए। हरित हाइड्रोजन के विकास पर सहमति के साथ दोनों देश संयुक्त रक्षा उपकरण प्रणाली घटकों और अन्य प्रमुख क्षमताओं के संयुक्त निर्माण के लिए रक्षा औद्योगिक रोडमैप&nbsp; स्थापित करने की संभावनाओं का भी पता लगाएंगे। इसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और संयुक्त उद्यमों की स्थापना शामिल है।&nbsp;</div><div><br></div><div>संयुक्त बयान के अनुसार दोनों पक्षों ने विज्ञान और नवाचार, सतत विकास, स्वास्थ्य, कृषि जल प्रबंधन, जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा संक्रमण, समुद्री विकास और जन संबंधों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की। आव्रजन मोबिलिटी पर भी समझौता हुआ। इसके अंतर्गत कुशल भारतीय पेशवेरों के लिए नीदरलैंड में काम करने की प्रक्रियाओं को आसान व निष्पक्ष बनाया जाएगा। अवैध प्रवासन रोकने के लिए भी सहमति बनी है। नीदरलैंड के पास पानी के प्रबंधन की बेहतरीन तकनीक है जिसमें भारत के साथ सहयेाग मजबूत होगा। समझौतों से अर्धचालक, अहम खनिज, स्वास्थ्य, जल, नवीकरणीय ऊर्जा, कृषि व संस्कृति जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ेगा। इस दौरे की एक बड़ी बात यह रही कि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री जेटेन ने अप्रैल 2025 में हुए पहलगात आतंकी हमले की कड़ी निंदा की और आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में भारत को अटूट समर्थन का भरोसा दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्वीडन- प्रधानमंत्री नरेंद मोदी अपनी यात्रा के तीसरे चरण में स्वीडन पहुंचे जहां एयरपोर्ट पर स्वीडिश प्रधानमंत्री उल्फ क्रिस्टरसन ने स्वयं प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत किया। स्वीडन ने प्रधानमंत्री मोदी को सर्वोच्च सम्मान “रॉयल ऑर्डरऑफ़ पोलर स्टार“ से सम्मानित किया। यह प्रधानमंत्री मोदी का 31 वां सम्मान है। भारत-स्वीडन संबंधों में प्रधानमंत्री मोदी के असाधारण योगदान और दूरदर्शी नेतृत्व के लिए उन्हें इस सम्मान से सम्मानित किया गया। दोनों पक्षों ने द्विपक्षीय संबंधों के सभी पहलुओं की समीक्षा की और पारस्परिक व्यापार को बढ़ाने सहित व्यापक अवसरों और निवेश को बढा़वा देने पर चर्चा की।&nbsp;</div><div><br></div><div>नार्वे- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नार्वे यात्रा अत्यंत महत्वपूर्ण थी क्योंकि यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की 43 वर्षों के अंतराल के बाद की जाने वाली नार्वे यात्रा थी। प्रधानमंत्री मोदी ने नार्वे के शहर ओस्लो में भारत-नार्डिक शिखर सम्मलेन में भाग लिया। प्रधानमंत्री मोदी को नार्वे का सर्वोच्च नागरिक सम्मान “ग्रैंड क्रास ऑफ़ द रॉयल नार्वेजियन आर्डर ऑफ़ मेरिट“ से सम्मनित किया गया। यह प्रधानमंत्री मोदी को मिला 32 वां अंतरराष्ट्रीय सम्मान है। भारत और नार्वे के बीच ग्रीन एनर्जी और सतत विकास को बढ़ावा देने के लिए ग्रीन स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप समझौते पर सहमति बनी।नार्वे के साथ स्वास्थ्य और डिजिटल तकनीक क्षेत्र में भी समझौते हुए। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि वैश्विक संघर्ष के बीच भारत और यूरोप के रिश्ते नए स्वर्णिम समय में प्रवेश कर रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इटली- प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पांचवां और अंतिम पड़ाव इटली रहा, जहां भारत और इटली ने आपसी संबंधों को मजबूत करने के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी पर बल दिया। दोनों नेताओं ने भारत-इटली साझेदारी के संपूर्ण आयामों पर विस्तृत चर्चा की और आपसी संबंधों को दिशा देने के लिए वर्ष 2025-29 की कार्य योजना की समीक्षा की। दोनों नेताओं के मध्य भारत- ईयू के मध्य मुक्त व्यापार समझौते पर भी चर्चा हुई। इटली की पीएम मेलोनी ने इंडिया-मिडिल ईस्ट यूरोप इकोनामिक कारिडोर जैसी बड़ी वैश्विक पहल पर सहयोग बढ़ाने पर बल दिया है। 2027 में “भारत -इटली ईयर ऑफ़ कल्चर एंड टूरिज्म“ मनाने की योजना पर भी चर्चा की गयी। आतंकवाद के मुद्दे पर भारत-इटली ने आपसी सहयेाग और प्रगाढ़ करने का निर्णय किया है। इटली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को संयुक्त राष्ट्र की एजेंसी एएफओ के मुख्यालय में आयोजित समारोह में एएफओ का एग्रिकोला मेडल प्रदान किया गया। उन्हें यह सम्मान कृषि, खाद्य सुरक्षा, और ग्रामीण विकास में भारत के योगदान के लिए प्रदान किया गया। प्रधानमंत्री की इटली यात्रा के दौरान भारत की मेलोडी टॉफी चर्चा में रही क्योंकि यह स्वदेशी उत्पाद प्रधानमंत्री ने इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को उपहार में दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की यह यात्राएं कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण थीं, इनमें सामरिक, कूटनीतिक तथा रणनीतिक संदेश छिपे हुए थे। इस यात्रा में प्रधानमंत्री मोदी नए अवसरों व सप्लाई चेन के नए मार्गों की खोज करने गए थे। यदि यूएई के रास्ते यूरोप के देशों तक नया कॉरिडोर बन जाता है तो इससे भविष्य में व्यापार बहुत आसान हो जायेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 16:43:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/prime-minister-narendra-modi-successful-five-nation-visit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA['कॉकरोच जनता पार्टी' की डिजिटल लोकप्रियता के सियासी निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-cockroach-janata-party-digital-popularity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कॉकरोच जनता पार्टी जैसे व्यंग्यात्मक डिजिटल पेज को लाखों लाइक मिलना केवल इंटरनेट-मज़ाक नहीं माना जा सकता, बल्कि यह कई गहरे सामाजिक-राजनीतिक संकेत देता है- खासकर युवाओं, मध्यम वर्ग और डिजिटल समाज की मानसिकता के बारे में। यही वजह है कि केंद्र-राज्यों में सत्तारूढ़ दलों और नागरिक प्रशासन को सावधान हो जाना चाहिए, अन्यथा उन्हें अगली जेन-जी क्रांति के साइड इफेक्ट्स का सामना करना पड़ सकता है।</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी अशोभनीय थी, जिससे अब खुद भी वो मुकर चुके हैं, लेकिन उनकी उक्ति ने सत्ता प्रतिष्ठान की सोच को उजागर करके लोगों को भड़काने का काम किया है, और शायद विपक्षी दलों के हिमायती लोग और उनकी समर्थक युवा पीढ़ी इसी मौके की तलाश में थी, जो कॉकरोच जनता पार्टी जैसे व्यंग्यात्मक डिजिटल पेज के सृजन और उसको मिले लाखों लाइक से स्पष्ट होती है। इसे केवल इंटरनेट-मज़ाक समझने की बजाए इस असंतोष की जड़ में जाना होगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/is-the-cockroach-janata-party-merely-a-sham" target="_blank">कॉकरोच जनता पार्टी क्या सिर्फ एक छलावा मात्र है?</a></h3><h2>कॉकरोच जनता पार्टी' की डिजिटल लोकप्रियता के सियासी निहितार्थ निम्नलिखित है:-</h2><div><br></div><div>पहला, व्यवस्था के प्रति बढ़ती निराशा-हताशा: जब बड़ी संख्या में लोग किसी व्यंग्यात्मक या मीम-आधारित राजनीतिक पेज से जुड़ते हैं, तो इसका अर्थ होता है कि: लोग पारंपरिक राजनीति से असंतुष्ट हैं, और उन्हें लगता है कि उनकी समस्याएँ नहीं सुनी जा रहीं, और वे गुस्से को हास्य, व्यंग्य और डिजिटल ट्रेंड के रूप में व्यक्त कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>दूसरा, जेन-जी (Gen-Z) की “डिजिटल राजनीति”: आज की युवा पीढ़ी सड़क से पहले सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देती है, मीम, रील, ट्रोलिंग और व्यंग्य को राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम बना चुकी है। इसलिए ऐसे पेज “डिजिटल जनमत” का संकेत बन जाते हैं।</div><div><br></div><div>तीसरा, बेरोज़गारी और अवसर संकट का दबाव: ऐसे प्लेटफॉर्मों की लोकप्रियता अक्सर इन मुद्दों से जुड़ती है: बेरोज़गारी, परीक्षा पेपर लीक, प्रतियोगी परीक्षाओं में देरी, महंगाई, और अवसरों में असमानता। लिहाजा, जब युवाओं को लगता है कि मेहनत के बावजूद व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है, तब व्यंग्यात्मक आंदोलन लोकप्रिय होने लगते हैं।</div><div><br></div><div>चौथा, राजनीतिक दलों पर भरोसे में गिरावट: यह संकेत भी माना जा सकता है कि कुछ युवाओं को मुख्यधारा के दलों में अपना प्रतिनिधित्व नहीं दिख रहा, वे “एंटी-एस्टैब्लिशमेंट” भावनाओं की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यानी वे सीधे किसी पार्टी का समर्थन नहीं, बल्कि “सिस्टम विरोधी भावना” व्यक्त कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>पांचवां, डिजिटल असंतोष भविष्य में वास्तविक आंदोलन बन सकता है: इतिहास बताता है कि कई बड़े आंदोलन पहले सोशल मीडिया ट्रेंड के रूप में शुरू हुए, और बाद में वे वास्तविक राजनीतिक दबाव में बदल गए। हालाँकि हर वायरल ट्रेंड आंदोलन नहीं बनता, लेकिन यह “सामाजिक तापमान” अवश्य दिखाता है।</div><div><br></div><div>छठा, हास्य अब राजनीतिक हथियार बन चुका है: पहले राजनीतिक विरोध भाषण, धरना, पोस्टर तक सीमित था। अब मीम, पैरोडी, व्यंग्यात्मक नाम, वायरल वीडियो भी जनभावना को प्रभावित कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>सातवां, भारत में “डिजिटल क्रांति” का संकेत: यह भी माना जा सकता है कि भारत में असंतोष फिलहाल संगठित सड़क आंदोलन से ज्यादा, डिजिटल संस्कृति में दिखाई दे रहा है। यानी भारत का जेन-जेड (Gen-Z) पहले “ऑनलाइन राजनीतिक चेतना” बना रहा है। लेकिन सावधानी भी जरूरी सोशल मीडिया की लोकप्रियता हमेशा वास्तविक जनसमर्थन के बराबर नहीं होती।</div><div><br></div><div>जानकारों की मानें तो कई बार एल्गोरिद्म, ट्रेंडिंग संस्कृति, मनोरंजन, और क्षणिक गुस्सा भी किसी पेज को वायरल बना देते हैं। इसलिए इसे पूर्ण राजनीतिक क्रांति का संकेत मानना जल्दबाज़ी होगी, लेकिन इसे युवाओं की बेचैनी और व्यवस्था से असंतोष का महत्वपूर्ण डिजिटल संकेत जरूर माना जा सकता है। राजनीतिक रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने ठीक ही कहा है कि कॉकरोच जनता पार्टी कोई मान्यता दल नहीं है, न ही उसकी कोई घोषित नीति-सिद्धांत है। फिर भी पेज की लोकप्रियता विपक्षी नेताओं के मनोबल बढ़ाने को काफी हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 17:03:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-cockroach-janata-party-digital-popularity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[आखिर विश्व, भारत की विकास यात्रा का हिस्सा बनना क्यों चाहता है? समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-after-all-does-the-world-want-to-be-a-part-of-india-development-journey-find-out]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विश्व आज भारत की विकास यात्रा का हिस्सा इसलिए बनना चाहता है, क्योंकि भारत केवल “बड़ा बाजार” नहीं रहा, बल्कि वह अब यह देश वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, तकनीक, सुरक्षा और मानव संसाधन का एक निर्णायक केंद्र बनता जा रहा है। खास बात यह है कि अब वह कई मामलों में अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस-जर्मनी-यूके जैसे यूरोपीय देशों से होड़ भी लेने लगा है।</div><div><br></div><div>पहला, दुनिया को भारत में सबसे बड़ा बाजार दिख रहा है: भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। यहां तेजी से बढ़ता मध्यम वर्ग, डिजिटल उपभोक्ता और विशाल युवा शक्ति वैश्विक कंपनियों को आकर्षित कर रही है। इसी कारण तकनीक, ई-कॉमर्स, ऑटोमोबाइल, रक्षा, सेमीकंडक्टर और ऊर्जा क्षेत्रों में भारी विदेशी निवेश आ रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-strategic-partnership-between-india-and-cyprus" target="_blank">भारत और साइप्रस के बीच हुई रणनीतिक साझेदारी- समझौतों के कूटनीतिक, सामरिक और आर्थिक मायने</a></h3><div>दूसरा, चीन के विकल्प के रूप में भारत: अमेरिका-चीन तनाव और सप्लाई चेन संकट के बाद दुनिया “चाइना प्लस वन” रणनीति अपना रही है। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां अब उत्पादन और निवेश का बड़ा हिस्सा भारत में स्थानांतरित करना चाहती हैं, क्योंकि वो भारत को एक स्थिर लोकतांत्रिक, कानूनी और विशाल श्रम-आधारित अर्थव्यवस्था माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>तीसरा, भारत की डिजिटल क्रांति ने दुनिया को प्रभावित किया: यूपीआई, आधार, डिजिटल गवर्नेंस, स्टार्टअप इकोसिस्टम और एआई आधारित सेवाओं ने भारत को “डिजिटल पावर” बना दिया है। चूंकि दुनिया अब भारतीय डिजिटल मॉडल को कम लागत और बड़े पैमाने पर लागू होने वाली व्यवस्था के रूप में देख रही है। इसलिए भारत की ओर उनका झुकाव स्वाभाविक है।</div><div><br></div><div>चौथा, भारत वैश्विक स्थिरता का नया स्तंभ बन रहा है: आज दुनिया बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है। ऐसे समय में भारत, अमेरिका से भी संबंध रखता है, रूस से भी, यूरोप, जापान, खाड़ी देशों और अफ्रीका से भी। यही संतुलित कूटनीति भारत को “विश्वसनीय शक्ति” बनाती है। इसलिए अधिकांश देश भारत के साथ रणनीतिक साझेदारी बढ़ाना चाहते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत का युवा मानव संसाधन दुनिया की जरूरत है: यूरोप, जापान और कई विकसित देशों में वृद्ध आबादी बढ़ रही है। इसके विपरीत भारत के पास विशाल युवा कार्यबल है। आईटी, स्वास्थ्य, इंजीनियरिंग, एआई और सेवा क्षेत्र में भारतीय प्रतिभा वैश्विक अर्थव्यवस्था को चलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>छठा, रक्षा और सामरिक शक्ति का बढ़ता प्रभाव: भारत तेजी से रक्षा उत्पादन और तकनीकी आत्मनिर्भरता बढ़ा रहा है। ब्रह्मोस मिसाइल, रक्षा कॉरिडोर, अंतरिक्ष कार्यक्रम और समुद्री शक्ति ने भारत को सामरिक दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सात, भारत “ग्लोबल साउथ” की आवाज बन गया है: अफ्रीका, एशिया और विकासशील देशों को लगता है कि भारत पश्चिम और चीन- दोनों से अलग एक संतुलित मॉडल प्रस्तुत कर सकता है। जी-20, ब्रिक्स और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>आठवां, निवेशकों को भारत में दीर्घकालिक अवसर दिखते हैं: विश्व की बड़ी कंपनियां समझती हैं कि अगले 20-25 वर्षों तक भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था रहेगा,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">इंफ्रास्ट्रक्चर, ऊर्जा, एआई, हरित तकनीक और विनिर्माण में विशाल अवसर मौजूद हैं।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>लेकिन चुनौतियां भी कम नहीं हैं। भले ही दुनिया भारत में अवसर तो देख रही है, पर साथ ही कुछ चिंताएं भी हैं: बेरोजगारी, सामाजिक असमानता, शिक्षा और स्वास्थ्य की गुणवत्ता, न्यायिक व प्रशासनिक देरी, राजनीतिक ध्रुवीकरण, और बुनियादी ढांचे की असमानता। यदि भारत इन चुनौतियों को संतुलित ढंग से संभाल लेता है, तो 21वीं सदी में वह केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था को प्रभावित करने वाली महाशक्ति बन सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 19:11:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-after-all-does-the-world-want-to-be-a-part-of-india-development-journey-find-out</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तपती धरती, झुलसता जीवन: जनता के समक्ष हीटवेव की चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2026 की गर्मी केवल एक मौसमीय घटना नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के सामने खड़ी एक गंभीर चेतावनी बनकर सामने आई है। अप्रैल-मई के दौरान भारत सहित दक्षिण एशिया के अनेक हिस्सों में पड़ी रिकॉर्ड हीटवेव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य का संकट नहीं, वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में तापमान 46 से 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया। कई शहरों में बिजली की मांग ने रिकॉर्ड तोड़ दिए। सड़कें सूनी दिखने लगीं, श्रमिकों का श्रम ठहरने लगा और बच्चों, बुजुर्गों तथा गरीब तबकों के सामने जीवन बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। यह संकट अचानक नहीं आया। यह दशकों से प्रकृति के साथ किए गए असंतुलित व्यवहार, अंधाधुंध शहरीकरण, जंगलों की कटाई, संसाधनों के दोहन और सुविधावादी जीवनशैली का परिणाम है। प्रकृति ने बार-बार संकेत दिए, लेकिन विकास की अंधी दौड़ में हमने उन संकेतों को अनसुना किया। आज वही उपेक्षित चेतावनियां लू बनकर हमारे सामने खड़ी हैं।</div><div><br></div><div>हीटवेव का सबसे बड़ा कारण केवल बढ़ता तापमान नहीं, बल्कि वह विकास मॉडल है जिसने धरती की प्राकृतिक ढाल को कमजोर कर दिया। जंगल सदियों से पृथ्वी के प्राकृतिक एयर कंडीशनर रहे हैं। वे कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, वाष्पोत्सर्जन द्वारा वातावरण को शीतल रखते हैं और वर्षा चक्र को संतुलित बनाए रखते हैं। लेकिन विडंबना है कि विकास के नाम पर जंगलों का तेजी से विनाश हुआ। हर वर्ष लाखों हेक्टेयर वन क्षेत्र समाप्त हो रहे हैं। इसका परिणाम यह हुआ कि स्थानीय स्तर पर तापमान बढ़ा, नमी कम हुई, वर्षा चक्र प्रभावित हुआ और गर्म हवाओं की अवधि लंबी होती गई। आज शहर “कंक्रीट के जंगल” बन चुके हैं। महानगरों में हरित क्षेत्र सिकुड़ते जा रहे हैं और उनकी जगह सीमेंट, डामर और शीशे की ऊंची इमारतें ले रही हैं। इससे “अर्बन हीट आइलैंड” प्रभाव तेजी से बढ़ा है। शहर अब आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में कई डिग्री अधिक गर्म हो चुके हैं। कंक्रीट दिनभर सूर्य की ऊष्मा को सोखता है और रात में धीरे-धीरे छोड़ता है। परिणामस्वरूप रातें भी गर्म होती जा रही हैं और शरीर को राहत नहीं मिल पाती।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india" target="_blank">भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए</a></h3><div>दिल्ली, मुंबई, जयपुर और लखनऊ जैसे शहरों में रात का तापमान पहले की तुलना में लगातार बढ़ रहा है। गरीब बस्तियों में स्थिति और भी गंभीर है। वहां न हरित क्षेत्र हैं, न पर्याप्त जल आपूर्ति, न शीतलन के साधन। टीन की छतों वाले घर दिन में भट्ठी बन जाते हैं। गर्मी की मार सामाजिक असमानता को और गहरा करती है। अमीर वर्ग एयर कंडीशनर और बंद कमरों में राहत खोज लेता है, लेकिन मजदूर, रिक्शाचालक, रेहड़ी वाले और निर्माण कार्य में लगे श्रमिक खुले आसमान के नीचे झुलसते रहते हैं। विडंबना यह भी है कि गर्मी से राहत का सबसे लोकप्रिय साधन एयर कंडीशनर स्वयं संकट को बढ़ाने वाला कारक बनता जा रहा है। एक एयर कंडीशनर कमरे को ठंडा करता है, लेकिन बाहर उतनी ही गर्म हवा छोड़ता है। इसके साथ ही बिजली की खपत बढ़ती है, जिसका बड़ा हिस्सा अभी भी कोयला आधारित ऊर्जा से आता है। रेफ्रिजरेंट गैसें अतिरिक्त ग्रीनहाउस प्रभाव पैदा करती हैं। इस प्रकार एक दुष्चक्र निर्मित हो गया है-गर्मी बढ़ती है, एसी बढ़ते हैं, उत्सर्जन बढ़ता है और फिर गर्मी और बढ़ जाती है।</div><div><br></div><div>जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल तापमान तक सीमित नहीं है। यह कृषि, खाद्य सुरक्षा, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर भी व्यापक असर डाल रहा है। वैज्ञानिक अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि बढ़ती गर्मी और अनिश्चित मौसम के कारण गेहूं, धान और अन्य फसलों की उत्पादकता प्रभावित हो रही है। गर्म हवाएं पौधों की वृद्धि रोकती हैं, जल स्रोतों को सुखाती हैं और मिट्टी की उर्वरता को प्रभावित करती हैं। यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले वर्षों में खाद्य संकट भी गहरा सकता है। स्वास्थ्य क्षेत्र पर भी इसका गंभीर प्रभाव दिख रहा है। लू लगना, निर्जलीकरण, हीट स्ट्रोक, हृदय रोग और मानसिक तनाव जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। अस्पतालों में गर्मी से जुड़ी बीमारियों के मरीजों की संख्या बढ़ रही है। सबसे अधिक खतरा बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बाहर काम करने वाले श्रमिकों को है।</div><div><br></div><div>गर्मी का यह संकट सामाजिक और मानवीय संकट भी बन सकता है। जल स्रोतों के सूखने, कृषि संकट और जीवन परिस्थितियों के बिगड़ने से बड़े पैमाने पर पलायन बढ़ सकता है। जैव विविधता पर भी इसका गहरा प्रभाव पड़ रहा है। अनेक जीव-जंतु और वनस्पतियां अपने प्राकृतिक आवास खो रही हैं। हजारों प्रजातियों के अस्तित्व पर संकट मंडरा रहा है। ऐसी स्थिति में सरकारों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। केवल रेड अलर्ट और ऑरेंज अलर्ट जारी करना पर्याप्त नहीं है। हीटवेव को राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन के प्रमुख विषय के रूप में स्वीकार करते हुए दीर्घकालिक नीतियां बनानी होंगी। सबसे पहले शहरों में हीट एक्शन प्लान को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। प्रत्येक शहर में हरित क्षेत्र बढ़ाने, जल संरक्षण, छायादार मार्ग, सार्वजनिक प्याऊ और शीतलन केंद्रों की व्यवस्था आवश्यक है। स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों के समय निर्धारण में क्षेत्रीय तापमान को ध्यान में रखा जाना चाहिए। तीखी दोपहर में श्रमिकों के लिए कार्यावधि सीमित की जाए और उनके लिए विश्राम तथा पेयजल की व्यवस्था अनिवार्य हो।</div><div><br></div><div>सरकार को भवन निर्माण नीति में भी परिवर्तन लाना होगा। पारंपरिक भारतीय वास्तुकला-हवादार घर, आंगन, मिट्टी आधारित निर्माण, हरित छतें और प्राकृतिक वेंटिलेशन को बढ़ावा देना चाहिए। कांच की चमचमाती इमारतों और ऊष्मा अवशोषित करने वाले निर्माणों पर पुनर्विचार की आवश्यकता है। “कूल रूफ” तकनीक, वर्षा जल संचयन और सौर ऊर्जा आधारित शीतलन प्रणाली को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। वन संरक्षण और वृक्षारोपण केवल अभियान नहीं, राष्ट्रीय प्राथमिकता बनना चाहिए। शहरों में माइक्रो फॉरेस्ट, पार्क और हरित गलियारों का निर्माण किया जाए। जल निकायों और पारंपरिक तालाबों को पुनर्जीवित किया जाए क्योंकि वे स्थानीय तापमान नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन केवल सरकारें यह लड़ाई नहीं जीत सकतीं। आम जनता को भी अपनी भूमिका समझनी होगी। हमें उपभोगवादी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा। पानी का संयमित उपयोग, ऊर्जा की बचत, वृक्षारोपण, सार्वजनिक परिवहन का उपयोग और स्थानीय पर्यावरण संरक्षण अब व्यक्तिगत विकल्प नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी हैं।</div><div><br></div><div>भारतीय समाज में कभी सार्वजनिक प्याऊ, छायादार विश्राम स्थल और जल सेवा की समृद्ध परंपरा थी। गर्मियों में राहगीरों के लिए जल की व्यवस्था पुण्य कार्य माना जाता था। आज उस परंपरा को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है। समाज, धार्मिक संस्थाएं और स्वयंसेवी संगठन मिलकर जल सेवा और राहत कार्यों का अभियान चला सकते हैं। गर्मी और जल संकट को राजनीति का विषय बनाने के बजाय सहयोग और समाधान का विषय बनाना होगा। जल विवादों और संसाधनों पर स्वार्थपूर्ण राजनीति भविष्य को और कठिन बनाएगी। आवश्यकता इस बात की है कि जल प्रबंधन, पर्यावरण संरक्षण और जलवायु अनुकूलन को राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाया जाए।</div><div><br></div><div>वर्ष 2026 की यह झुलसाती गर्मी हमें चेतावनी दे रही है कि यदि हमने अभी भी प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित नहीं किया तो आने वाले वर्षों में स्थिति और विकराल होगी। पृथ्वी का तापमान बढ़ेगा, जैव विविधता नष्ट होगी, खाद्य संकट गहराएगा और मानव जीवन अधिक कठिन हो जाएगा। यह समय प्रकृति से संघर्ष का नहीं, उसके साथ सामंजस्य का है। हमें विकास की ऐसी दिशा चुननी होगी जिसमें पर्यावरण, मानव जीवन और भविष्य सुरक्षित रह सके। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब सूरज की तपिश केवल असुविधा नहीं, अस्तित्व का संकट बन जाएगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक,पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:29:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[डबल गेम खेल रही Congress को Mayawati ने किया Out, Uttar Pradesh की इस राजनीतिक हलचल ने सबको चौंकाया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mayawati-shows-congress-the-door-big-game-in-up-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आगामी उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों को देखते हुए कांग्रेस ने एक बार फिर बसपा प्रमुख मायावती के करीब जाने की रणनीति बनानी शुरू कर दी है। चूंकि कांग्रेस इस समय समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन में है, इसलिए उसके शीर्ष नेता खुलकर मायावती से संपर्क नहीं कर सकते थे। ऐसे में कांग्रेस से जुड़े कुछ दलित नेताओं के माध्यम से मायावती तक पहुंचने की कोशिश की गई, लेकिन मायावती ने इस प्रयास को पूरी तरह विफल कर दिया। लखनऊ स्थित अपने आवास पर पहुंचे कांग्रेस नेताओं को उन्होंने मिलने का समय तक नहीं दिया। इस घटनाक्रम ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नए संकेत दे दिए हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल मंगलवार शाम कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजेंद्र पाल गौतम और कांग्रेस सांसद तनुज पुनिया मायावती से मिलने उनके आवास पहुंच गए। बताया गया कि उनके साथ कुछ अन्य दलित नेता भी थे। हालांकि उन्हें मायावती से मिलने का समय नहीं मिला और पूरा प्रयास असफल हो गया। बाद में कांग्रेस नेतृत्व ने खुद को इस घटनाक्रम से अलग दिखाने की कोशिश की और दोनों नेताओं को नोटिस जारी कर दिया। पार्टी ने इसे अनधिकृत और निजी मुलाकात बताकर राजनीतिक नुकसान को सीमित करने का प्रयास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mayawati-big-attack-on-sp-for-insulting-brahmins-said-akhilesh-yadav-should-apologize-immediately" target="_blank">ब्राह्मण अपमान पर Mayawati का SP पर बड़ा हमला, कहा- Akhilesh Yadav तुरंत माफी मांगें</a></h3><div>कांग्रेस के लिए यह स्थिति इसलिए भी असहज हो गई क्योंकि उसी समय राहुल गांधी रायबरेली और अमेठी के दौरे पर थे तथा दलित समाज से जुड़े कार्यक्रमों में भाग ले रहे थे। हम आपको याद दिला दें कि राहुल गांधी पहले भी सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर चुके हैं कि पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान उन्होंने मायावती को गठबंधन का प्रस्ताव दिया था। राहुल गांधी ने यह भी कहा था कि उन्होंने मायावती को मुख्यमंत्री पद तक की पेशकश की थी, लेकिन बसपा प्रमुख ने प्रस्ताव ठुकरा दिया था। इसके बाद कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी के साथ हाथ मिलाया और लोकसभा चुनावों में इस गठबंधन को अपेक्षाकृत अच्छा परिणाम मिला। अब जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहे हैं, कांग्रेस के भीतर फिर यह सोच मजबूत होती दिखाई दे रही है कि बसपा को साथ लाए बिना भाजपा के खिलाफ व्यापक सामाजिक समीकरण तैयार करना कठिन होगा।</div><div><br></div><div>लेकिन यह कोशिश ऐसे समय हुई है जब समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव लगातार यह कह रहे हैं कि उनका मौजूदा गठबंधन आगे भी जारी रहेगा। लखनऊ में आयोजित एक कार्यक्रम में अखिलेश यादव ने स्पष्ट कहा कि भविष्य के चुनावों में भी सहयोगियों के साथ गठबंधन बना रहेगा और उसका आधार सीटों की सौदेबाजी नहीं बल्कि जीत का लक्ष्य होगा। उन्होंने कहा कि समाजवादी पार्टी गठबंधन चलाना जानती है और उसने कभी अपने सहयोगियों को धोखा नहीं दिया। अखिलेश का यह बयान सीधे तौर पर कांग्रेस के लिए भी संदेश माना गया, क्योंकि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा चल रही थी कि कांग्रेस समानांतर राजनीतिक विकल्प तलाश रही है।</div><div><br></div><div>उधर, कांग्रेस नेताओं की मायावती से मुलाकात की असफल कोशिश ने इन अटकलों को और तेज कर दिया। कांग्रेस की ओर से सफाई दी गई कि यह केवल शिष्टाचार भेंट थी और नेताओं ने मायावती के स्वास्थ्य का हाल जानने के लिए जाने का फैसला किया था। लेकिन राजनीतिक जानकार इसे सहज घटना मानने को तैयार नहीं हैं। खासकर तब, जब कांग्रेस नेतृत्व ने इतनी तेजी से नोटिस जारी कर दूरी बनाने की कोशिश की। इससे साफ संकेत मिलता है कि पार्टी को डर था कि समाजवादी पार्टी इस घटनाक्रम को संदेह की नजर से देख सकती है।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह भी चर्चा है कि कांग्रेस सत्ता और राजनीतिक अवसरों के लिए सहयोगी बदलने में कभी देर नहीं लगाती। हाल के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव इसका उदाहरण माने जा रहे हैं। चुनाव के दौरान कांग्रेस द्रमुक के साथ खड़ी थी, लेकिन परिणाम आते ही सत्ता की संभावनाओं को देखते हुए उसने तेजी से पाला बदलकर टीवीके के साथ गठबंधन कर लिया और उसकी सरकार में भी शामिल हो गयी। ऐसे में उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की वर्तमान सक्रियता को केवल औपचारिक राजनीतिक संपर्क मानना आसान नहीं है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर देखें तो कांग्रेस नेताओं की मायावती से असफल मुलाकात ने उत्तर प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। कांग्रेस भले ही इसे निजी पहल बताकर पीछे हटने की कोशिश कर रही हो, लेकिन यह साफ दिखाई दे रहा है कि विधानसभा चुनाव से पहले विपक्षी राजनीति के भीतर नए समीकरणों की तलाश शुरू हो चुकी है। वहीं मायावती ने बिना कुछ कहे यह संकेत दे दिया है कि वह फिलहाल किसी भी राजनीतिक संदेश या दबाव में आने वाली नहीं हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 12:28:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mayawati-shows-congress-the-door-big-game-in-up-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शुभेंदु सरकार के त्वरित निर्णयों से उभरता नया बंगाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-bengal-emerging-from-shubhendu-sarkar-swift-decisions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद बनी शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने चुनावी संकल्प पत्र के अनुरूप काम पर लग गई है। सत्ता परिवर्तन होते ही सभी धार्मिक स्थलों पर लाउडस्पीकर बंद करवाए गए। अवैध बूचड़खानों पर बुलडोजर एक्शन के आदेश जारी हुए। सभी विद्यालयों में अब सम्पूर्ण वंदेमातरम का गायन अनिवार्य कर दिया गया है। सड़कों पर नमाज व अन्य धार्मिक गतिविघियों पर पाबंदी लगा दी गई है। सीमा पर फेंसिंग के लिए सीमा सुरक्षा बल को जगह दे दी गई है और सम्पूर्ण भूमिहस्तांतरण निर्णय के 45 दिन में पूरा हो जाएगा। चिकन नेक क्षेत्र केंद्र को सौंप दिया गया है। धार्मिक आधार पर चलने वाली योजनाएं जैसे इमामों को वेतन बंद कर दिया गया है। आर.जी.कर केस की फाइल दोबारा खुलने के आदेश हो गए हैं। आयुष्मान भारत जैसी केंद्रीय जन कल्याण योजनाएं अब बंगाल पहुँच रही हैं।</div><div><br></div><div>शुभेंदु सरकार की गति और संकल्प सिद्धि के प्रयासों से जुड़े निर्णयों का प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ने लगा है। हालत यह हो गई है पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी का डायमंड हार्बर मॉडल का पुष्पा ”जहागीर खान” बहाना बनाकर फलटा विधानसभा उपचुनाव में ठीक उसी समय पलटा मारकर कर भाग गया जब मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार को विजयी बनने के लिए रोड शो निकाल रहे थे। यह वही क्षेत्र है जहां विधानसभा चुनावों के दौरान ईवीएम मशीन पर भाजपा के चुनाव चिन्ह के आगे काला टेप लगा दिया गया था। यूपी के एक तेजतर्रार पुलिस अफसर अजय पाल शर्मा की आब्जर्वर के रूप में नियुक्ति हुई थी जिसके बाद जहांगीर खान ने पोस्टर जारी करके अपने आप को पुष्पा बताने की जुर्रत की थी। आज वही तथाकथित पुष्पा चुनावी मैदान बीच में छोड़कर भाग खड़ा हुआ। यह भय बनाम भरोसे में भरोसे की एक और बड़ी जीत है। यह सब कुछ हिंदुओं की एकजुटता और उनके जागरण से ही संभव हो सका है अगर हिंदू समाज आगे भी इसी प्रकार एकजुट रहता है तो सनातन का अपमान करने व उन्हें भयभीत करने वाले लोग इसी प्रकार से स्वतः प्रेरणा से भागते रहेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/battles-erupt-as-bjp-comes-to-power-in-bengal-tmc-to-protest-against-bulldozer-action-on-may-21" target="_blank">Bengal में BJP राज आते ही सड़क पर संग्राम, Bulldozer एक्शन पर TMC का 21 मई को Protest</a></h3><div>बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने प्रचार के दौरान उत्तर प्रदेश के भगवावस्त्र धारी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के चरण स्पर्श किए थे और उनके शपथ ग्रहण में योगी जी ने अपना भगवा पटका उनके गले में डाला था तभी यह बात तय हो गई थी कि बंगाल भी उत्तर प्रदेश की तरह सांस्कृतिक पुनर्जागरण के मार्ग पर चलने वाला है। बंगाल में भी दंगाइयों व उत्पातियों का इलाज यूपी की ही तरह होगा। कोलकाता के जिस थाने पर दगांइयों ने हमला करने का प्रयास किया था वहां मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी खुद पहुंचे और पुलिस बलों का मनोबल बढ़ाते हुए दंगाइयों व उपद्रवियों के प्रति जीरो टालरेंस की नीति अपनाने को कहा। मुख्यमंत्री अधिकारी ने कहा कि पुलिस पहले ममता दीदी के गुंडों से डरती थी किंतु अब समय बदल चुका है।&nbsp;</div><div><br></div><div>शुभेंदु सरकार के बड़े निर्णयों में वर्ष 2021 के चुनावों के बाद राज्य में हुई राजनतिक हत्याओं व हिंसक घटनाओं&nbsp; की सभी फाइलें खोलना भी है जिसके कारण ममता दीदी इतनी अधिक भयभीत हो गयीं कि वह काला कोट पहनकर हाईकार्ट पहुंच गयीं और 2021 की हिंसा से ध्यान भटकाने के लिए 2026 के चुनावों&nbsp; के बाद घटी कुछ छुटपुट घटनाओं को सनसनीखेज बताने का असफल प्रयास किया। जब वह कोर्ट परिसर से बाहर निकलने लगीं तब वकीलों के एक बड़े समूह ने उन्हें घेर लिया ओैर चोर -चोर के नारे लगाए।</div><div>&nbsp;</div><div>बंगाल में अब सीबीआई तथा ईडी जैसे केंद्रीय जांच एजेंसियों का प्रवेश संभव हो गया है, जिससे वहां 69 वर्षों में हुए घोटालों की जांच में गति आएगी। ईडी ने टीएमसी के बड़े नेताओं को हिरासत में ले भी लिया है। शुभेंदु अधिकारी के 145 एकड़ जमीन बीएसफ को देने के ऐतिहासिक निर्णय से बांग्लादेशी घुसपैठ की रोकथाम में महत्वपूर्ण सफलता मिलने की आशा है क्योंकि बांग्लादेश से लगी हुई बंगाल की लंबी खुली सीमा से&nbsp; बांग्लादेशी व रोहिंग्या घुसपैठिए आसानी प्रवेश कर लेते थे। अब सीमा पर तीव्रता के साथ फेंसिंग का कार्य होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए धर्म के आधार पर चलने वाली सभी योजनाएं बंद कर दी गई हैं। नई सरकार ने वोटबैंक के पुराने ढर्रे को ध्वस्त करने के एजेंडे पर आगे बढ़ चुकी है। बंगाल कैबिनेट ने धर्म के आधार पर चलाई जा रही सभी वित्तीय सहायता योजनाओ को पूरी&nbsp; तरह से बंद करने का निर्णय लिया है। यह मात्र एक प्रशासनिक निर्णय&nbsp; नहीं अपितु बंगाल की राजनीतिक दिशा को बदलने वाला वैचारिक परिवर्तन है। चुनावी बिसात पर इमामों, मुअज्जिनों और पुरोहितों के लिए शुरू की गई मासिक भत्ता पूरी तरह से बंद कर दिया गया है। बंगाल के खेल मंत्री नीशिथ प्रामाणिक ने कोलकाता के युवा भारती क्रीडांगन परिसर में लगी व लोगो वाली फुटबालर की आधी प्रतिमा को तोड़े जाने का आदेश दिया है, बंगाल सरकार की विभिन्न वेबसाइाटो से भी इसे हटाया जा रहा है। दिसंबर 22 में अर्जेंटीना के फुटबॉलर मेसी के कार्यक्रम में मची भगदड़ और कुप्रबंधन की जांच की जाएगी। उस घटना की फाइलें खोलने के आदेश जारी हो चुके हैं। मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी व अन्य सभी सहयोगी मंत्री यह बात लगातार कह रहे हैं कि जिन लोगों ने बंगाल को लूटा और जनता के मन मे भय पैदा किया उन सभी पर कार्यवाही जरूर की जाएगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में अब आयुष्मान भारत योजना सहित केंद्र सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं के लागू होने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है। भाजपा ने बंगाल की महिलाओं से किए गए वादों&nbsp; को भी लागू करना भी आरंभ कर दिया है। आगामी एक जून 2026 से महिलाओं को 3000 रुपये की मासिक सहायता वाली अन्नपूर्णा योजना को भी मंजूरी दे दी गई है। बंगाल की महिलाओ को बस में फ्री यात्रा की सुविधा भी मिलने जा रही है। सरकारी कर्मचारियों के साथ किया गया 7वें वेतन आयोग का वादा भी पूरा होने जा रहा है। बंगाल मे पड़ोसी राज्यों से ट्रकों की आवाजाही के दौरान 100 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक की जो कटमनी टीएमसी के गुंडे वसूल रहे थे उनके अनधिकृत टोल नाके बंद किए जाने के आदेश आ चुके हैं। बंगाल का आलू अब पूरे भारत में जाएगा।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>बंगभूमि पर वंदेमातरम की गूंज व जयश्रीराम का नारा सुनाई दे रहा है। बंगाल परिवर्तन की डगर पर चल पड़ा है। भय पर भरोसे की विजय हो रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 12:57:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-new-bengal-emerging-from-shubhendu-sarkar-swift-decisions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति कितनी जायज या नाजायज है? चिंतन कीजिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ultimately-to-what-extent-is-the-tendency-to-attack-the-system-justified-or-unjustified]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय के 53वें&nbsp; मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई के क्रम में याचिकाकर्ता की अपरिपक्व भाषा और समकालीन “सिस्टम पर हमले की प्रवृत्ति” पर एक तल्ख टिप्पणी की और परजीवी तक कह डाला। लिहाजा इसको भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं के संदर्भ में देखा जाना चाहिए। हालांकि, यह टिप्पणी केवल न्यायपालिका तक सीमित नहीं है, बल्कि संसद, चुनाव आयोग, मीडिया, नौकरशाही और संवैधानिक संस्थाओं पर लगातार बढ़ते अविश्वास, राजनीतिक ध्रुवीकरण और सोशल मीडिया आधारित आक्रामक विमर्श की ओर संकेत करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए इसके अहम सियासी और प्रशासनिक मायने हैं और संविधान का संरक्षक होने के नाते सर्वोच्च न्यायालय भी अपने नैतिक दायित्व से सिर्फ छिछली टिप्पणी करके बच नहीं सकता, क्योंकि उसे हासिल स्वतः संज्ञान का अधिकार भी गरीबों की भलाई में एक हदतक निरर्थक प्रतीत होता आया है। बावजूद इसके सीजेआई की टिप्पणी कई मायनों में जायज मानी जा सकती है, क्योंकि आज भारत सहित दुनिया के अनेक लोकतंत्रों में यह प्रवृत्ति बढ़ी है कि यदि किसी संस्था का निर्णय किसी राजनीतिक या वैचारिक समूह के पक्ष में नहीं जाता, तो पूरी संस्था की वैधता पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया जाता है। इससे संस्थागत विश्वास कमजोर होता है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संस्थाओं की विश्वसनीयता से भी चलता है।</div><div><br></div><div>मीडिया माध्यमों का अनुभव बताता है कि हाल के वर्षों में न्यायपालिका पर “पक्षपात”, चुनाव आयोग पर “सरकारी प्रभाव”, मीडिया पर “प्रोपेगेंडा”, और जांच एजेंसियों पर “राजनीतिक उपयोग” जैसे आरोप लगातार तेज हुए हैं, जो दूसरी ओर, सत्ता पक्ष का तर्क रहता है कि कई बार आलोचना के नाम पर संस्थाओं को जानबूझकर बदनाम करने का अभियान चलाया जाता है। ऐसे माहौल में सीजेआई का यह कहना कि “पूरे सिस्टम पर हमला” लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है, एक संतुलित चेतावनी के रूप में देखा जा सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/maneka-gandhi-enraged-by-the-supreme-courts-order-on-stray-dogs" target="_blank">Stray Dogs पर Supreme Court के आदेश से भड़कीं Maneka Gandhi, कहा- कोर्ट ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ा</a></h3><div>हालांकि, इस टिप्पणी का दूसरा स्याह पक्ष भी है। लोकतंत्र में संस्थाओं की आलोचना करना नागरिकों और विपक्ष का अधिकार है। यदि किसी संस्था के निर्णयों, कार्यशैली या पारदर्शिता पर सवाल उठते हैं, तो उन्हें “सिस्टम पर हमला” कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। चूंकि स्वस्थ लोकतंत्र में जवाबदेही और आलोचना दोनों जरूरी हैं। न्यायपालिका स्वयं कई ऐतिहासिक फैसलों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और असहमति के अधिकार को लोकतंत्र का मूल तत्व बता चुकी है।</div><div><br></div><div>दरअसल समस्या तब पैदा होती है जब आलोचना तथ्यों और संवैधानिक बहस की जगह व्यक्तिगत हमलों, दुष्प्रचार, ट्रोलिंग या संस्थाओं को पूरी तरह अवैध बताने तक पहुंच जाती है। इससे जनता का भरोसा टूटता है और लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इसलिए सीजेआई की टिप्पणी को पूरी तरह गलत भी नहीं कहा जा सकता और इसे आलोचना-विरोधी बयान भी नहीं माना जाना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>वस्तुतः इसका सार सत्य यह है कि संस्थाओं की आलोचना हो, लेकिन तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा के साथ। असहमति हो, लेकिन लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त करने वाली भाषा से बचा जाए। संस्थाएं भी पारदर्शिता, निष्पक्षता और आत्मसुधार बनाए रखें, ताकि जनता का विश्वास मजबूत रहे। लोकतंत्र में सबसे बड़ा संतुलन यही है कि संस्थाओं का सम्मान भी बना रहे और उनकी जवाबदेही भी सुनिश्चित होती रहे।</div><div><br></div><div>जहां तक विद्रूप होती व्यवस्था के कड़वे सच से सामना की बात है तो बेरोजगार युवाओं के भीतर यह भावना तेजी से बढ़ती जा रही है कि व्यवस्था में अवसर समान नहीं हैं। जब भर्ती प्रक्रियाओं में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद, राजनीतिक संरक्षण, जातीय ध्रुवीकरण, क्षेत्रीय पक्षपात या आर्थिक प्रभाव की खबरें सामने आती हैं, तो स्वाभाविक रूप से निराशा और आक्रोश पैदा होता है। बांग्लादेश और नेपाल में हुई जेन-जेड क्रांति और नेतृत्व परिवर्तन के पीछे भी यही आरोप थे। यही कारण है कि कई युवा यह प्रश्न उठाते हैं कि यदि योग्यता के बजाय “पहचान”, “संपर्क” या “प्रभाव” ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाए, तो मेहनत और प्रतिभा का मूल्य क्या रह जाता है। आखिर ऐसी व्यवस्था को लोकतंत्र और संविधान की आड़ में कबतक झेला जाएगा?</div><div><br></div><div>लेकिन इस प्रश्न को संतुलन से समझना जरूरी है। चूंकि भारत जैसे विशाल और विविध समाज में कुछ नीतियां—जैसे- सामाजिक न्याय, आरक्षण, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व या कल्याणकारी योजनाएं—ऐतिहासिक असमानताओं को कम करने के उद्देश्य से बनाई गई थीं। लिहाजा, समस्या तब पैदा होती है जब इनका उपयोग वास्तविक सुधार के बजाय राजनीतिक लाभ, वोट बैंक या सत्ता-सुरक्षा के साधन के रूप में होने लगे। तब योग्य युवाओं को लगता है कि व्यवस्था निष्पक्ष नहीं है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, आज बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी पीड़ा केवल नौकरी की कमी नहीं, बल्कि “समान अवसर पर भरोसे का संकट” है। उनकी शिकायतें मुख्यतः इन बिंदुओं पर केंद्रित हैं- भर्ती परीक्षाओं में पेपर लीक और भ्रष्टाचार, राजनीतिक संरक्षण और भाई-भतीजावाद, लंबे समय तक भर्तियों का अटकना, योग्यता की तुलना में पहचान आधारित लाभ का अनुभव, निजी क्षेत्र में भी नेटवर्क और प्रभाव की भूमिका और बढ़ती प्रतिस्पर्धा और सीमित अवसर। लिहाजा, यह आक्रोश लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए चेतावनी भी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे में यदि युवाओं को लगे कि मेहनत का उचित प्रतिफल नहीं मिलेगा, तो सामाजिक असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए किसी भी सरकार और व्यवस्था की प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह- भर्ती प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी बनाए, पेपर लीक और भ्रष्टाचार पर कठोर कार्रवाई करे, कौशल आधारित रोजगार बढ़ाए, शिक्षा और उद्योग के बीच बेहतर तालमेल बनाए, अवसरों को अधिक निष्पक्ष और प्रतिस्पर्धात्मक बनाए तथा सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में मेरिट को मजबूत करे। साथ ही यह भी जरूरी है कि व्यवस्था की कमियों के खिलाफ आवाज लोकतांत्रिक और रचनात्मक तरीके से उठे।&nbsp;</div><div><br></div><div>यद्यपि पूरे संविधान, लोकतंत्र या किसी समुदाय के खिलाफ घृणा पैदा करना समाधान नहीं बनता। बल्कि वास्तविक सुधार संस्थागत दबाव, जन-जागरूकता, न्यायिक हस्तक्षेप, पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही से आता है। चूंकि भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी युवा आबादी है। यदि यही वर्ग व्यवस्था से पूरी तरह निराश हो जाए, तो यह केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक संकट भी बन सकता है। इसलिए “योग्यता आधारित अवसर” और “सामाजिक न्याय”- दोनों के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय की सबसे बड़ी चुनौती होगी।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 19:16:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/ultimately-to-what-extent-is-the-tendency-to-attack-the-system-justified-or-unjustified</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mussoorie की जगह Bangladesh को भाने लगा Lahore, भारत की बजाय पाक में अपने अफसरों को ट्रेनिंग दिला रहे हैं Tarique Rahman]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tarique-rahman-is-training-his-officers-in-pakistan-instead-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बांग्लादेश में नई सरकार आने के बाद लगा था कि मुहम्मद युनूस वाली गलतियां नहीं दोहराई जाएंगी और चीन तथा पाकिस्तान के खेमे में जाने की बजाय ढाका का झुकाव भारत की ओर ही रहेगा लेकिन ऐसा होता दिख नहीं रहा है। हम आपको बता दें कि ताजा घटनाक्रम के तहत बांग्लादेश ने अपने नौकरशाहों के प्रशिक्षण के लिए भारत के मसूरी स्थित लाल बहादुर शास्त्री राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी की बजाय पाकिस्तान के लाहौर स्थित सिविल सर्विसेज अकादमी को चुना है। यह कदम दक्षिण एशिया की बदलती कूटनीतिक राजनीति और बांग्लादेश की नई विदेश नीति का संकेत माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि करीब एक दशक तक बांग्लादेशी अधिकारियों के लिए मसूरी प्रशिक्षण का प्रमुख केंद्र रहा। वर्ष 2014 में शेख हसीना सरकार के दौरान बांग्लादेश के लोक प्रशासन मंत्रालय और भारत के राष्ट्रीय सुशासन केंद्र के बीच समझौता हुआ था। इसके बाद 2019 और 2024 में भी नए समझौते हुए। 2019 से 2024 के बीच भारत में 1019 से अधिक बांग्लादेशी सिविल सेवकों को प्रशिक्षण दिया गया, जबकि कुल मिलाकर लगभग 2500 अधिकारी भारत में प्रशिक्षित हुए। लेकिन अब पहली बार 12 बांग्लादेशी अधिकारी 4 से 21 मई तक लाहौर में प्रशिक्षण ले रहे हैं और इसका पूरा खर्च पाकिस्तान सरकार उठा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/dangerous-women-were-planning-against-india-even-russia-was-shaken" target="_blank"> भारत के खिलाफ प्लान बना रही थी खतरनाक महिलाएं, रूस भी हिल गया!</a></h3><div>यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब शेख हसीना के सत्ता से बाहर होने के बाद ढाका और इस्लामाबाद के बीच रिश्ते तेजी से मजबूत हो रहे हैं। हाल ही में बांग्लादेश की विदेश राज्य मंत्री शमा ओबायद इस्लाम और पाकिस्तान के आंतरिक मंत्री सैयद मोहसिन रजा नकवी के बीच हुई बैठक में दोनों देशों ने व्यापार, खेल, संस्कृति, शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और डिजिटल नवाचार जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर जोर दिया। दोनों पक्षों ने दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन को फिर से सक्रिय बनाने और क्षेत्रीय संपर्क मजबूत करने की आवश्यकता भी दोहराई।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति में अधिक रणनीतिक स्वतंत्रता दिखाना चाहता है। नई राजनीतिक व्यवस्था के बाद ढाका भारत पर अत्यधिक निर्भरता से बचते हुए पाकिस्तान और चीन जैसे देशों के साथ भी संतुलित संबंध बनाने की कोशिश कर रहा है। यही कारण है कि नई सरकार भारत के साथ संबंध बनाए रखते हुए दूसरे विकल्पों की ओर भी बढ़ रही है। हालांकि बांग्लादेश और भारत दोनों यह समझते हैं कि टकराव लंबे समय तक उनके हित में नहीं है। इसी वजह से दोनों देशों के बीच सैन्य सहयोग, आर्थिक संपर्क और राजनयिक संवाद फिर से शुरू करने की कोशिशें भी हो रही हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी दोनों देशों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शेख हसीना का भारत में रहना बांग्लादेश की राजनीति में लगातार विवाद का विषय बना हुआ है। ढाका में यह धारणा मजबूत हुई है कि भारत बांग्लादेश की आंतरिक राजनीति में जरूरत से ज्यादा प्रभाव बनाए रखना चाहता है। खासकर युवा वर्ग में राष्ट्रवाद और राजनीतिक स्वायत्तता की भावना पहले से अधिक मजबूत हुई है। भारत विरोधी भावना अब केवल वैचारिक मुद्दा नहीं रह गई, बल्कि घरेलू राजनीतिक पहचान का हिस्सा बनती जा रही है।</div><div><br></div><div>सीमा प्रबंधन, अवैध तस्करी, प्रवासन और जल बंटवारे जैसे पुराने विवाद भी अब तक हल नहीं हो पाए हैं। तीस्ता जल समझौता वर्षों से लंबित है और जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में यह विवाद और गंभीर हो सकता है। हालांकि पश्चिम बंगाल की राजनीति में हुए बदलाव के बाद कुछ विश्लेषकों को उम्मीद है कि इस दिशा में नई पहल संभव हो सकती है।</div><div><br></div><div>इसके बावजूद आर्थिक संबंध दोनों देशों के रिश्तों को स्थिर बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था काफी हद तक भारतीय बाजार और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर निर्भर है, जबकि भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के लिए बांग्लादेश का भूभाग संपर्क और व्यापार के लिहाज से बेहद अहम है। यही आर्थिक परस्पर निर्भरता हर तनाव के बावजूद रिश्तों को पूरी तरह टूटने से बचाती रही है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, चीन भी बांग्लादेश की विदेश नीति में तेजी से प्रभाव बढ़ा रहा है। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री तारिक रहमान अपनी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा चीन को समर्पित कर सकते हैं। चीन पहले ही बांग्लादेश के साथ अपने संबंधों को नई ऊंचाई पर पहुंचा हुआ बता चुका है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ढाका अब बहुध्रुवीय कूटनीति अपनाते हुए भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो दक्षिण एशिया की बदलती राजनीति में बांग्लादेश का यह नया रुख केवल एक देश की विदेश नीति का बदलाव नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन के नए दौर की शुरुआत माना जा रहा है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत और बांग्लादेश अपने ऐतिहासिक रिश्तों को नई राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ किस तरह संतुलित करते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, विशेषज्ञों का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का सबसे मजबूत पक्ष यह रहा है कि भारत ने तमाम राजनीतिक उतार चढ़ाव और तनाव के बावजूद बांग्लादेश के साथ संवाद और सहयोग के रास्ते कभी पूरी तरह बंद नहीं किये। चाहे ऊर्जा सहयोग हो, व्यापार, संपर्क परियोजनाएं, सुरक्षा साझेदारी या मानवीय सहायता, भारत ने हर कठिन समय में ढाका का साथ दिया है। दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान की नीतियों को दक्षिण एशिया में अक्सर रणनीतिक हितों और अवसरवाद से प्रेरित माना जाता रहा है। चीन निवेश और बुनियादी ढांचे के जरिये प्रभाव बढ़ाने की कोशिश करता है, जबकि पाकिस्तान के साथ बांग्लादेश के रिश्तों का इतिहास भी कई संवेदनशील अध्यायों से जुड़ा रहा है। ऐसे में आने वाले समय में बांग्लादेश को यह एहसास हो सकता है कि स्थायी, भरोसेमंद और निस्वार्थ सहयोगी के रूप में भारत का महत्व सबसे अधिक है। हालांकि सवाल यह भी है कि जब तक ढाका इस वास्तविकता को पूरी तरह समझेगा, तब तक कहीं रणनीतिक और कूटनीतिक स्तर पर बहुत देर ना हो जाये।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 16 May 2026 13:38:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tarique-rahman-is-training-his-officers-in-pakistan-instead-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल में “शुभ राज“ के साथ सनातन का सूर्योदय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-sunrise-of-sanatan-in-bengal-accompanied-by-auspicious-rule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में 69 वर्षों के अथक संघर्ष के बाद भारतीय जनता पार्टी की पूर्ण बहुमत वाली सरकार प्रथम सरकार शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में कार्यभार ग्रहण करके काम पर लग गयी है। बंगाल में बीजेपी की विजय बहुत बड़ी व ऐतिहासिक है। बंगाल ही नहीं भारत के अन्य भागों में भी इस विजय का आनंद दिखाई वातावरण दे रहा है। इस विजय के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कर्नाटक, तेलंगना और गुजरात के दौरे में जो भीड़ उमड़ रही है उससे स्पष्ट रूप से जनसामान्य और भाजपा कायकर्ताओं के उत्साह का अनुमान लगाया जा सकता है। बंगाल विधानसभा चुनावों मे हिंदू समाज ने पहली बार बांग्लादेशी घुसपैठ और मुस्लिम तुष्टिकरण की विकृत राजनीति के विरुद्ध एकजुट होकर मतदान किया और जिसका परिणाम आज पूरा भारत देख रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल की जिस धरती पर 75 वर्ष पूर्व डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने जनसंघ की वैचारिक नींव रखी थी उसी बंगाल में पहली बार भाजपा 27 सीटों के साथ सत्ता के शिखर पर पंहुची और भगवा वस्त्रों में शुभेंदु अधिकारी ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। बंगाल की कैबिनेट में अभी पांच मंत्रियों को ही शपथ दिलाई गई है, जिसमें बंगाल में भाजपा का संगठन खड़ा करने में अहम भूमिका निभाने वाले दिलीप घोष, फैशन डिजाइनर से बंगाल भाजपा की सबसे मुखर नेत्री बनी अग्निमित्रा पॉल जिन्होंने तृणमूल के खिलाफ आक्रामक मोर्चा संभाला, बांग्लादेश के हिंदू शरणार्थी मतुआ समुदाय के प्रमुख चेहरे अशोक कीर्तनिया जो उत्तर 24 परगना जिले के भारत-बांग्लादेश सीमा से सटे इलाको में भाजपा के जमीनी संगठनकर्ता के रूप मे अत्यंत सक्रिय रहे हैं, छात्र राजनीति से उभरे नेता निशीथ प्रामाणिक जो 2019 में भाजपा से जुड़े और जंगल महल के आदिवासी समुदाय के बड़े नेता खुदीराम टुडू शामिल हैं। अभी इस मंत्रिमंडल है का विस्तार होना बाकी है। बंगाल में शपथ ग्रहण समारोह के मंच पर एक भारत श्रेष्ठ भारत की संकल्पना के अनुरूप लघु भारत के भव्य दर्शन हो रहे थे तथा भविष्य की राजनीति के संकेत भी मिल रहे थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration" target="_blank">अब घुसपैठ से मुक्त होगा पश्चिम बंगाल</a></h3><div>स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से आज तक बंगाल में कांग्रेस, वामपंथ और तृणमूल की सरकारें रहीं जो तुष्टिकरण में आकंठ डूबी रहीं और हिंदुओ को दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया। स्थितियां इतनी विकट हो गयी थीं कि बंगाल की धरती पर जय श्रीराम बोलने पर नफरत का कहर टूट पड़ता था। आज उसी बंगाल में जब जयश्रीराम के नारे गूंज रहे हैं तो बंगाल का हर सनातनी खुशी से सराबोर हो रहा है। बंगाल में भाजपा सरकार आने से पश्चिम बंगाल के हिन्दुओं को तुष्टिकरण की दमनकारी नीतियों और भय के माहौल से आजादी मिली है। यह विजय केवल सत्ता का परिवर्तन नही अपितु बंगाल के पुनरुत्थान का शंखनाद है। अब बंगाल सही मायने में सोनार बांग्ला बनने की ओर अग्रसर होगा। भाजपा&nbsp; नेताओं&nbsp; का कहना है कि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल सांस्कृतिक, आध्यात्मिक व आर्थिक उत्थान के नए दौर मे प्रवेश करेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>हार की कुंठा से ग्रसित तृणमूल&nbsp; व विरोधी दलों के नेता अभी भी एसआईआर, चुनाव आयोग और केंद्रीय सुरक्षाबलों वाले आरोप दोहरा रहे हैं जबकि वास्तविकता यह है कि भाजपा ने यह चुनाव लम्बे संघर्ष और अपने कार्यकर्ताओं के बलिदान के बाद जीता है। तृणमूल के राज में वर्ष&nbsp; 2011 से 2025 के बीच भाजपा के 321 कार्यकर्ता मारे गए, उनके विरुद्ध हुई हिंसा में&nbsp; हजारों घर उजाड़ दी गए, भाजपा व संघ के किसी कार्यकर्ता को बम से उड़ाया गया किसी को पेड़ से लटकाया गया। 2021 में तो भाजपा कार्यकर्ताओं के प्रति तृणमूल के लोगों ने क्रूरता की सभी सीमाएं लांघ दी थीं। नंदीग्राम से लेकर वीरभूम तक, कूच बिहार हो या वशीर हाट चुनाव के बाद बदले के नाम पर पूरे-पूरे गांव खाली करवा दिए गए थे। 2021 की चुनावी हिंसा में हाईकोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए किंतु ममता सरकार उन सभी में अड़ंगा डालती रही। आज संदेशखाली से आर जी कर कांड तक सभी पीड़ित परिवारों के मन में एक नया सबेरा आया है कि अब न्याय होकर रहेगा। बंगाल के हिंदू जनमानस को नयी सरकार पर भरोसा है इसलिए नई सरकार को भी अत्यंत तत्परता और सतर्कता के साथ संकल्प पत्र को पूरा करना होगा। नई सरकार ने अपनी पहली कैबिनेट की पहली बैठक में जो निर्णय लिए हैं उनसे उसकी गंभीरता तथा बंगाल की जनता के प्रति प्रतिबद्धता का पता चलता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>नई सरकार के पहले फैसले- शुभेंदु मंत्रिपरिषद ने अपनी पहली बैठक में ही कई बड़े निर्णय लिए हैं। जिनमें आयुष्मान भारत योजना को बंगाल में लागू करना, भारतीय न्याय सहिंता के तीन कानूनों को लागू करना, बीएसएफ को सीमावर्ती क्षेत्रों में 45 दिनों के अन्दर जमीन स्थानांतरित करना शामिल है। ममता बनर्जी की सरकार इन सभी कार्यों में&nbsp; लगातार अड़ंगा ही डालती रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 14 May 2026 14:20:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-sunrise-of-sanatan-in-bengal-accompanied-by-auspicious-rule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पीएम मोदी के राष्ट्रहित के आह्वान में भी राजनीति क्यों?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-there-politics-even-in-pm-modi-call-for-the-national-interest]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज पूरी दुनिया एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहां युद्ध, आर्थिक अस्थिरता, ऊर्जा संकट और वैश्विक बाजार की अनिश्चितताओं ने मानव सभ्यता को नई चुनौतियों के सामने खड़ा कर दिया है। खाड़ी देशों में लंबे समय से चल रहे संघर्ष और युद्ध की विभीषिका ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को गहरे तक प्रभावित किया है। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि, आपूर्ति श्रृंखलाओं का बाधित होना, डॉलर के मुकाबले विभिन्न देशों की मुद्राओं का कमजोर होना और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में उत्पन्न असंतुलन ने लगभग हर राष्ट्र की आर्थिक व्यवस्था को प्रभावित किया है। भारत भी इन परिस्थितियों से अछूता नहीं रह सकता। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है और सोने का भी विश्व के सबसे बड़े उपभोक्ताओं में से एक है। ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा देशवासियों से ईंधन के संयमित उपयोग और सोने की खरीद को सीमित करने का आह्वान केवल एक आर्थिक सलाह नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में किया गया दूरदर्शी चिंतन है। दुर्भाग्य यह है कि मोदी की मितव्ययिता की अपील पर पूरे देश को एकजुट होकर गंभीरता से विचार करना चाहिए था, उस विषय को भी राजनीतिक विवाद का हथियार बना दिया गया। कुछ विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री की इस अपील को जनता में भय फैलाने वाला कदम बताया, तो कुछ ने इसे सरकार की विफलताओं को छिपाने का प्रयास कहा। जबकि वस्तुतः यह अपील राष्ट्र को भविष्य की संभावित चुनौतियों के प्रति सचेत करने और समय रहते आत्मानुशासन अपनाने का संदेश है। यह राजनीति का विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जिम्मेदारी का प्रश्न है। जब विश्व के बड़े-बड़े राष्ट्र आर्थिक संकटों से जूझ रहे हों, तब भारत के प्रधानमंत्री यदि नागरिकों को संयम एवं मितव्ययिता का सूत्र देते हैं तो उसे राजनीतिक चश्मे से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दृष्टि से देखा जाना चाहिए। यह पहला अवसर नहीं है, जब प्रधानमंत्री ने देश की तरक्की को बनाए रखने की सामूहिक चिन्ता करते हुए मितव्ययिता एवं संयम की अपील की हो।</div><div><br></div><div>भारत की संस्कृति मूलतः संयम प्रधान रही है। भारतीय जीवन-दर्शन में संयम को केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि जीवन की सबसे बड़ी शक्ति माना गया है। हमारे ऋषियों, मुनियों और महापुरुषों ने सदैव आवश्यकता और विलासिता के बीच अंतर करना सिखाया। महावीर, बुद्ध, गांधी और विनोबा भावे जैसे महापुरुषों ने त्याग और संयम को ही मानवता की सबसे बड़ी शक्ति बताया। भारतीय संस्कृति कहती है कि जितना आवश्यक हो उतना ही उपभोग करो, क्योंकि असीमित उपभोग अंततः संकट को जन्म देता है। यही कारण है कि भारतीय सभ्यता हजारों वर्षों तक टिकाऊ और संतुलित बनी रही। आज जब पूरी दुनिया उपभोक्तावाद के दुष्परिणाम भुगत रही है, तब भारत की यही संयम आधारित संस्कृति समाधान का मार्ग दिखा सकती है। सोने के प्रति भारतीय समाज का आकर्षण ऐतिहासिक और सांस्कृतिक दोनों स्तरों पर गहरा रहा है। विवाह, पारिवारिक उत्सव, धार्मिक परंपराएं और सामाजिक प्रतिष्ठा में सोने का विशेष स्थान है। लेकिन यह भी एक कठोर सत्य है कि भारत का अधिकांश सोना आयातित होता है। हर वर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सोने के आयात पर खर्च होता है। यह सोना उत्पादन या औद्योगिक विकास में उपयोग होने के बजाय घरों और लॉकरों में बंद होकर निष्क्रिय पड़ा रहता है। ऐसे समय में जब विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ रहा हो और रुपये की कीमत लगातार गिर रही हो, तब सोने की खरीद में संयम बरतने की अपील आर्थिक दृष्टि से अत्यंत प्रासंगिक है। यह किसी की परंपराओं के विरोध में नहीं, बल्कि देश की आर्थिक मजबूती के पक्ष में उठाया गया कदम है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/how-justified-is-the-politics-surrounding-prime-minister-modi-appeal" target="_blank">प्रधानमंत्री मोदी की अपील पर राजनीति कितनी जायज</a></h3><div>इसी प्रकार ईंधन के उपयोग में संयम भी समय की आवश्यकता है। भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयातित तेल पर निर्भर है। खाड़ी देशों में युद्ध और अस्थिरता के कारण तेल की कीमतों में लगातार वृद्धि हो रही है। इसका सीधा प्रभाव पेट्रोल, डीजल, परिवहन, उद्योग और महंगाई पर पड़ता है। यदि नागरिक ईंधन के अनावश्यक उपयोग को सीमित करें, सार्वजनिक परिवहन का अधिक उपयोग करें, ऊर्जा बचत को जीवनशैली का हिस्सा बनाएं, तो इससे न केवल देश की अर्थव्यवस्था को राहत मिलेगी, बल्कि पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलेगी। संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं होता, बल्कि दूरदर्शिता और जिम्मेदारी भी होता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील इसी जिम्मेदारी की भावना से प्रेरित प्रतीत होती है। उन्होंने किसी प्रकार की जबरदस्ती या प्रतिबंध की बात नहीं की, बल्कि नागरिकों से स्वैच्छिक सहयोग की अपेक्षा की। यह लोकतांत्रिक नेतृत्व की पहचान है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक जिम्मेदार प्रधानमंत्री का कर्तव्य केवल संकट आने पर कदम उठाना नहीं होता, बल्कि संकट के संकेतों को पहचानकर समय रहते जनता को तैयार करना भी होता है। आज जब दुनिया के कई देशों में आर्थिक अस्थिरता के कारण भारी महंगाई, बेरोजगारी और सामाजिक तनाव देखने को मिल रहे हैं, तब भारत अपेक्षाकृत स्थिर स्थिति में है। यह केवल संयोग नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में पिछले वर्षों में अपनाई गई आर्थिक नीतियों, बुनियादी ढांचे के विस्तार, डिजिटल अर्थव्यवस्था, आत्मनिर्भर भारत अभियान और वैश्विक स्तर पर भारत की मजबूत स्थिति का परिणाम है। यह भी उल्लेखनीय है कि विश्वव्यापी संकटों के बावजूद भारत ने अपने नागरिकों पर अत्यधिक आर्थिक बोझ नहीं पड़ने दिया। महामारी से लेकर युद्धजनित परिस्थितियों तक भारत सरकार ने लगातार राहत योजनाएं चलाईं, गरीबों को मुफ्त राशन उपलब्ध कराया, किसानों और मध्यम वर्ग को विभिन्न प्रकार की सहायता दी तथा अर्थव्यवस्था को स्थिर बनाए रखने के लिए अनेक कदम उठाए। वैश्विक मंदी और युद्ध के वातावरण में भी भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल बना हुआ है। यह प्रधानमंत्री मोदी के कुशल नेतृत्व और दूरदर्शिता का प्रमाण है।</div><div><br></div><div>दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि देशहित के ऐसे विषयों पर भी कुछ राजनीतिक दल संकीर्ण राजनीति से ऊपर नहीं उठ पा रहे। लोकतंत्र में आलोचना का अधिकार सभी को है, लेकिन हर विषय को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू में तौलना राष्ट्रहित के विरुद्ध है। यदि प्रधानमंत्री जनता से संयम की अपील करते हैं तो विपक्ष को चाहिए कि वह भी जनता को जागरूक करे, न कि भय और भ्रम का वातावरण बनाए। राजनीति तब तक स्वस्थ मानी जाती है जब तक वह राष्ट्रहित से जुड़ी रहे। लेकिन जब राजनीति केवल विरोध के लिए विरोध करने लगे और राष्ट्रीय संकटों को भी अवसर की तरह देखने लगे, तब वह लोकतंत्र को कमजोर करती है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पूरा देश एक परिवार की तरह सोचते हुए राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि माने। संकट के समय संयम, अनुशासन और सहयोग ही किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी ताकत होते हैं। भारत ने इतिहास में अनेक बार यह सिद्ध किया है कि जब भी राष्ट्र पर संकट आया, भारतीय समाज ने अद्भुत त्याग और एकता का परिचय दिया। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर युद्धकाल तक, भारतीय जनता ने अपने निजी हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को महत्व दिया है। आज फिर वही समय है जब हमें समझना होगा कि अनावश्यक उपभोग, दिखावे की प्रवृत्ति और अंधाधुंध विलासिता अंततः देश की आर्थिक मजबूती को कमजोर करती है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अपील को इसी व्यापक संदर्भ में देखने की आवश्यकता है। यह केवल सोना न खरीदने या ईंधन बचाने का संदेश नहीं, बल्कि आत्मसंयम, आत्मअनुशासन और राष्ट्रीय जिम्मेदारी का संदेश है। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर भी यही रहा है कि व्यक्ति अपने आचरण से समाज और राष्ट्र को मजबूत बनाए। यदि हम संयम को जीवन का हिस्सा बना लें तो अनेक आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरणीय समस्याओं का समाधान स्वतः संभव हो सकता है। आज दुनिया जिस अनिश्चितता और संकट के दौर से गुजर रही है, उसमें भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में खड़ा है। इसका श्रेय देश की जनता की सामर्थ्य के साथ-साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी जाता है। ऐसे समय में आवश्यकता राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और सकारात्मक सोच की है। संयम केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का आधार है। यदि हम इस भावना को समझ सकें, तो न केवल वर्तमान संकटों का सामना कर पाएंगे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मजबूत और आत्मनिर्भर भारत का निर्माण कर सकेंगे।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 13:01:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-there-politics-even-in-pm-modi-call-for-the-national-interest</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब घुसपैठ से मुक्त होगा पश्चिम बंगाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार के तौर पर शुभेन्दु अधिकारी ने शासन की बागडोर संभाल ली है। भाजपा का यह स्पष्ट नारा रहा है कि वह विदेशी घुसपैठियों को देश से बाहर करेगी। इसलिए पश्चिम बंगाल के जनादेश में इस पर अब जनता की मुहर भी लग गई है। कई राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि तृणमूल कांग्रेस की नेता ममता बनर्जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण को बढ़ावा देकर अपने शासन का संचालन किया। इसमें बांग्लादेश के घुसपैठियों का भी समर्थन भी शामिल रहा। अब भाजपा की सरकार बनने के बाद यह तय हो चुका है कि अब पश्चिम बंगाल की बांग्लादेश से लगी हुई सीमाएं पहले से ज्यादा सुरक्षित होंगी और एक बड़ी समस्या से छुटकारा भी मिलेगा। इससे यह भी आशय निकलता है कि सबका साथ और सबका विकास वाली राजनीतिक अवधारणा को स्वीकार किया जाने लगा है। देश में इसी प्रकार की राजनीति की आवश्यकता है। क्योंकि राजनीतिक दलों ने आज देश में रहने वाले समाज के बीच इतना भेद पैदा कर दिया है कि कई जगह समाज बंधु एक दूसरे के दुश्मन बन गए हैं। हिन्दू और मुसलमान समाज के ही हिस्से हैं, इसलिए इनको अलग अलग देखने की राजनीति नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत देश के कुछ राजनीतिक दलों का आधार ही मुस्लिम वोट हैं। जबकि यह भी सही है कि तुष्टिकरण से किसी का भला न तो हुआ है और न ही होगा।</div><div><br></div><div>लम्बे समय से पश्चिम बंगाल में जनसंख्या का अप्रत्याशित रूप से बढ़ना कई प्रकार के सवाल खड़ा करता रहा है। इसके पीछे बांग्लादेश से आए घुसपैठिए भी एक बड़ा कारण है। इस समस्या से बंगाल ही नहीं, असम भी प्रभावित है, लेकिन अच्छी बात यह है कि विपक्षी राजनीतिक दलों को यह समस्या दिखाई नहीं देती। असम और पश्चिम बंगाल की जनता इस घुसपैठ के विरोध में खड़ी हो गई है, इसलिए इस बार का जनादेश भी बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में आया। इसी के चलते असम में भाजपा सरकार का पुनः बनना और पश्चिम बंगाल में एक नए राजनीतिक उदय के साथ सत्तारूढ़ होना इसी बात का परिचायक है कि भाजपा ही नहीं, जनता भी देश से घुसपैठियों को निकालने का मन बना चुकी है। सुनने में यह भी आ रहा है जो बांग्लादेशी नागरिक पश्चिम बंगाल में घुसपैठ करके आए, वे अपने देश वापस जाने का मानस बना चुके हैं। इसलिए यह भी कहा जा रहा है कि अब पश्चिम बंगाल घुसपैठ की समस्या से मुक्त हो जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/fortunes-of-jhalmuri-vendor-who-have-become-medium-for-political-discourse-are-set-to-turn-around" target="_blank">राजनीतिक विमर्श का जरिया बनी झालमुढ़ी वालों के फिरेंगे दिन</a></h3><div>भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल में प्रारंभ से ही इस बात पर जोर दिया था कि वह विदेशी घुसपैठियों के खिलाफ है। भाजपा के नेताओं के भाषण भी इसी पर केंद्रित रहते थे। इस मुद्दे पर भाजपा को जनता का भी समर्थन मिला और जनता ने भाजपा को बहुमत दे दिया। इसके अलावा ममता बनर्जी के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस की सरकार ने जो कार्य किए, वह कहीं न कहीं हिन्दू समाज को नीचा दिखाने वाले ही थे, लेकिन तृणमूल कांग्रेस के नेता शायद इस बात को भूल गए कि बहुसंख्यक समाज को नकारने की राजनीति एक प्रकार से उसके लिए सत्ता से अलग होने की तस्वीर पेश कर सकती है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल घुसपैठ की समस्या से बहुत प्रभावित हुए हैं। यहां पर अप्रत्याशित रूप से ज़मीनों पर अवैध कब्जे हो रहे हैं। कई जगह अचानक ही मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र बनते जा रहे हैं। जिनमें मुर्शिदाबाद, उत्तर दिनाजपुर और मालदा आदि है। यह तीनों जिले बांग्लादेश की सीमा से लगे हुए हैं। इसके चलते बंगाल में अपराध भी बहुत होने लगे हैं। इसका कारण यही माना जा रहा है कि जो व्यक्ति घुसपैठ करके आए हैं, उनके सामने रोजगार का संकट है। जब रोजगार नहीं मिलेगा तो स्वाभाविक रूप से व्यक्ति गलत कार्य भी करने लगता है। इससे की दशा और दिशा भी ख़राब हो रही है।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद के रास्ते कई बांग्लादेशी नागरिक घुसपैठ करते रहे हैं। स्थानीय नागरिकों की मदद से वे सभी अपने आशियाने भी बना रहे थे, इनके ज्यादातर आशियाने अवैध कब्ज़ा करके ही बने हैं। तृणमूल कांग्रेस की सरकार के समय इनको पर्याप्त संरक्षण भी मिला। उल्लेखनीय है जिन क्षेत्रों में मुस्लिमों की जनसंख्या अचानक बढ़ी है, वे सभी तृणमूल कांग्रेस के प्रभाव वाले क्षेत्र रहे हैं। इन क्षेत्रों में हिन्दू समाज का कोई भी व्यक्ति जाने से डरता है। सवाल यह है कि यह डर किसने पैदा किया और इसको संरक्षण देने वाले कौन हैं। तृणमूल कांग्रेस ने तुष्टिकरण की राह पर चलते हुए इनको ताकत देने का काम किया। और यही उसकी हार का कारण भी बना।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब पश्चिम बंगाल का राजनीतिक दृश्य परिवर्तित हो चुका है। जिन्होंने लम्बे समय तक अमानुषिक अत्याचार सहन किए, वे सत्ता में आ चुके हैं, लेकिन भाजपा को यह सत्ता ऐसे ही नही मिल गई। उसके सैकड़ों कार्यकर्ता का बलिदान इस जीत के नींव के पत्थर बने। चुनाव के बाद शुभेन्दु अधिकारी के निजी सहायक देवनाथ की हत्या इसका ताजा उदाहरण है। जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह कार्य प्रशिक्षित अपराधियों ने किया। संभावना इस बात की भी है कि घटना के बाद ये बांग्लादेश भाग चुके हैं। इसे राजनीतिक हत्या के तौर पर भी देखा जा रहा है और इसके आरोप तृणमूल कांग्रेस के नेताओं पर लग रहे हैं।</div><div><br></div><div>घुसपैठियों की समस्या से त्रस्त पश्चिम बंगाल में सरकार बदलने के बाद विदेशी घुसपैठिओं के चेहरे उतरने लगे हैं, क्योंकि अब इन विदेशी घुसपैठियों को सहन नहीं किया जाएगा। अब उनको बाहर जाना ही होगा। भाजपा की सरकार ही इनको बाहर निकलेगी। देश के गृह मंत्री अमित शाह इसकी चेतावनी पहले से ही देते रहे हैं। यहां यह कहना भी उचित होगा कि भाजपा ने केवल घुसपैठियों को बाहर निकालने की ही बात की है, भारत के मुसलमानों की नहीं, लेकिन विपक्ष और खासकर तृणमूल कांग्रेस ने ऐसा भ्रम फैलाने का प्रयास किया कि सारे मुस्लिमों पर इसका प्रभाव होगा। विदेशी घुसपैठियों को बाहर निकालना सभी चाहते हैं, विपक्ष को इस मुद्दे पर भाजपा का साथ देना चाहिए, क्योंकि यह राष्ट्रीय हित की बात है।</div><div><br></div><div>- सुरेश हिंदुस्तानी,&nbsp;</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 12:51:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-will-now-be-free-from-infiltration</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” के आह्वान के राजनीतिक-आर्थिक निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-economic-implications-of-pm-modi-call-to-save-foreign-exchange]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी भी प्रकार की आपदा को अवसर में बदलना जानते हैं। पहले कृत्रिम वैश्विक महामारी कोरोना (कोविड-19), फिर रूस-यूक्रेन युद्ध और अब अमेरिका/इजरायल-ईरान युद्ध के दौरान भी उन्होंने कुछ ऐसा ही किया है। फिलवक्त मौजूदा वैश्विक संकट से भारत को निजात दिलाने और इससे प्रभावित हो रहे आम भारतीयों के हितों की रक्षा करने के लिए ही उन्होंने विदेशी मुद्रा बचाने, आयातित वस्तुओं का उपभोग मितव्ययिता पूर्वक करने और इनके मौजूद देशी विकल्प को आजमाते हुए स्थायी हल निकालने और उनपर निर्भर होने की दिशा में जनसहयोग का आह्वान करके सबको चौंका दिया है।</div><div><br></div><div>समझा जाता है कि अमेरिका, चीन, यूरोप और अरब के कुछ देशों के द्वारा लगातार भारत विरोधी षड्यंत्र किए जा रहे हैं। कोई अपना इस्लामिक एजेंडा भारत पर थोपना चाहता है तो कोई भारत-रूस के भरोसेमंद सम्बन्धों में पलीता लगाना चाहता है और कोई भारत को पाकिस्तान, बंग्लादेश और चीन के त्रिपक्षीय कुचक्र में उलझा कर अपना आर्थिक हित साधना चाहता है। जबकि, तेजी से आर्थिक और सैन्य उन्नति कर रहा 21वीं सदी का भारत अब रूस-ईरान-इजरायल के सहयोग से मध्य एशिया, पश्चिम एशिया और यूरोप के बाजारों तक पहुंच बढ़ाने की दिशा में अग्रसर है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-modi-forbidding-people-from-buying-gold-will-work-from-home-be-allowed-again" target="_blank">सोना खरीदने से क्यों मना कर रहे हैं मोदी? क्या फिर से होने वाला है Work From Home? पेट्रोल-डीजल के दाम कबसे बढ़ेंगे?</a></h3><div>भारत-यूरोप की बढ़ती नजदीकियों और उसको निकट भविष्य में और अधिक बल देने वाली विभिन्न महत्वाकांक्षी योजनाओं पर अमल से चिढ़े अमेरिकी डीप स्टेट और उनके चीनी-अरबी पिट्ठुओं ने पहले ईरान को बर्बाद करने और फिर इंडिया को उसकी तपिश में झुलसाने की जो कुचक्र रची है, अब भारत उसकी भी काट ढूंढ चुका है। इस बार भारत ने लोकल फ़ॉर वोकल और चीनी वस्तुओं के बहिष्कार करने की जगह विदेशी मुद्रा बचाने हेतु विभिन्न सकारात्मक पहल करने का आह्वान किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि मौजूदा सरकार अपनी त्रासदी से निपटने के लिए आपसे कोई सोना नहीं मांग रही है, बल्कि अगले 1 साल तक इनकी खरीदारी कम करने की बात कह रही है ताकि विदेशी मुद्रा बचे। इसी कड़ी में उन्होंने उन तमाम वस्तुओं का जिक्र बारी-बारी से किया और कहा कि इनपर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होते हैं, इसलिए अगले 1 साल तक इनका संयमित उपभोग कीजिए। दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित कीजिए।</div><div><br></div><div>स्पष्ट है कि यह सिर्फ “देशभक्ति” वाला संदेश नहीं होता; बल्कि यह आर्थिक संकेत भी होता है कि सरकार को वैश्विक अनिश्चितता, महंगे आयात, या डॉलर पर दबाव की चिंता है। ऐसा इसलिए कि जब विदेशी मुद्रा पर दबाव होता है, तब देश कोशिश करता है कि रुपये पर ज्यादा दबाव न पड़े, जरूरी आयात (तेल, दवा, रक्षा) जारी रह सकें, महंगाई नियंत्रित रहे, विदेशी मुद्रा भंडार सुरक्षित रहे। उल्लेखनीय है कि भारत की विदेशी मुद्रा कई बड़े क्षेत्रों में खर्च होती है, लेकिन सबसे ज्यादा खर्च आयात पर होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अगर “सबसे ज्यादा” की बात करें, तो आमतौर पर क्रम कुछ ऐसा रहता है: 1. कच्चा तेल → 2. इलेक्ट्रॉनिक्स/मशीनरी → 3. सोना → 4. रसायन/उर्वरक → 5. रक्षा खरीद। हाल के वर्षों में भारत का सबसे बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च कच्चे तेल के आयात पर ही रहा है। उनके हाल के बयान की बात करें तो मौजूदा वैश्विक संकट (जैसे युद्ध, तेल कीमतें, सप्लाई-चेन दबाव) के बीच प्रधानमंत्री ने विदेशी मुद्रा (Forex) बचाने की बात जब कही, तो इसका अर्थ आमतौर पर यह होता है कि भारत डॉलर में होने वाले खर्च को कम करे और आय बढ़ाए।&nbsp;</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि ऐसे आह्वानों के मुख्य बिंदु आमतौर पर ये होते हैं: आयात कम करना/ आत्मनिर्भरता बढ़ाना– खासकर तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स, रक्षा, खाद्य तेल जैसी चीजों में विदेश निर्भरता घटाना। “लोकल खरीदें” और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की बात इसी से जुड़ती है। इसलिए प्रधानमंत्री द्वारा “विदेशी मुद्रा बचाने” की बात का राजनीतिक-आर्थिक मतलब संदर्भ पर निर्भर करता है, लेकिन आम तौर पर इसके कई स्तर होते हैं। इसके मायने क्या हैं? इसे ऐसे समझते हैं।</div><div><br></div><div>पहला, आर्थिक मायने: आयात बिल कम करने का संकेत। चूंकि भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च तेल, सोना और इलेक्ट्रॉनिक्स आयात पर होता है। लिहाजा जब सरकार विदेशी मुद्रा बचाने की बात करती है, तो अक्सर मतलब होता है: घरेलू उत्पादन बढ़ाओ (“मेक इन इंडिया” जैसी नीति), आयातित वस्तुओं पर निर्भरता घटाओ, ऊर्जा बचत या वैकल्पिक ऊर्जा को बढ़ावा दो और रुपये और व्यापार घाटे पर दबाव कम करो। क्योंकि अगर बहुत ज्यादा डॉलर बाहर जाते हैं तो रुपये पर दबाव पड़ सकता है और व्यापार घाटा बढ़ सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए विदेशी मुद्रा बचाने का संदेश बाजार को यह संकेत भी देता है कि सरकार बाहरी आर्थिक जोखिमों को लेकर सतर्क है। चूंकि ऊर्जा सुरक्षा का मुद्दा अहम है इसलिए तेल आयात महंगा होने पर सरकार कभी-कभी ईंधन बचत, एथेनॉल मिश्रण, इलेक्ट्रिक वाहन, या घरेलू उत्पादन पर जोर देती है ताकि डॉलर खर्च कम हो। वहीं, विदेशी मुद्रा भंडार को मजबूत रखने से आयात भुगतान, संकट प्रबंधन और निवेशकों का भरोसा बनाए रखने में मदद मिलती है।</div><div><br></div><div>दूसरा, राजनीतिक मायने: आत्मनिर्भरता की राजनीतिक कथा जैसा संदेश अक्सर “देशी बनाम विदेशी निर्भरता” या आत्मनिर्भरता के नैरेटिव से जुड़ता है—यानी आर्थिक राष्ट्रवाद का तत्व। वहीं जनता से व्यवहार परिवर्तन की अपील के पीछे कभी-कभी सरकार जनता से कुछ आदतें बदलने (जैसे ऊर्जा बचत, आयातित वस्तुओं का कम उपयोग) की नैतिक अपील करती है, ताकि नीति को सामाजिक समर्थन मिले। इससे कठिन आर्थिक समय का संकेत भी मिलता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्पष्ट है कि यदि बयान ऐसे समय आए जब तेल महंगा हो, डॉलर मजबूत हो, या वैश्विक संकट हो, तो यह आर्थिक सावधानी का संकेत भी माना जा सकता है—हालाँकि जरूरी नहीं कि संकट ही हो। जहां तक नीतिगत फैसलों की पृष्ठभूमि तैयार करने की बात है तो ऐसे बयान आगे चलकर कुछ कदमों (आयात शुल्क, उत्पादन प्रोत्साहन, ऊर्जा नीति, निर्यात बढ़ावा) के लिए राजनीतिक आधार भी बना सकते हैं।</div><div><br></div><h2># आइए, यहां पर हमलोग समझते हैं कि किन-किन वस्तुओं पर विदेशी मुद्रा ज्यादा खर्च होती है-&nbsp;</h2><div><br></div><div><b>पहला, कच्चा तेल और पेट्रोलियम आयात:</b> भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए विदेशी मुद्रा का सबसे बड़ा खर्च तेल, गैस और पेट्रोलियम उत्पादों पर होता है। उदाहरण: ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन (ओएनजीसी) जैसी घरेलू कंपनियाँ उत्पादन करती हैं, फिर भी आयात बहुत अधिक है।</div><div><br></div><div><b>दूसरा, सोना आयात:</b> भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में है। ज्वेलरी और निवेश के लिए भारी मात्रा में सोना आयात किया जाता है, जिससे डॉलर में भुगतान करना पड़ता है।</div><div><br></div><div><b>तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी: </b>मोबाइल फोन के पार्ट्स, सेमीकंडक्टर, कंप्यूटर उपकरण, औद्योगिक मशीनें आदि विदेशों से आती हैं। जैसे एप्पल इंक. या अन्य ब्रांडों के कंपोनेंट्स का आयात।</div><div><br></div><div><b>चौथा, रक्षा उपकरण:</b> लड़ाकू विमान, हथियार, रक्षा तकनीक और सैन्य उपकरणों की खरीद पर भी विदेशी मुद्रा खर्च होती है। उदाहरण: राफेल जैसे विमान खरीद।</div><div><br></div><div><b>पांचवां, रसायन, उर्वरक और दवाओं का कच्चा माल: </b>खेती के लिए उर्वरक और दवा उद्योग के लिए कई सक्रिय रसायन विदेशों से मंगाए जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>छठा, विदेश यात्रा और शिक्षा:</b> भारतीय जब विदेश में पढ़ाई, इलाज, पर्यटन या बिज़नेस के लिए खर्च करते हैं, तब भी विदेशी मुद्रा बाहर जाती है।</div><div><br></div><div><b>सातवां, विदेशी कंपनियों को भुगतान:</b> टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर लाइसेंस, रॉयल्टी, निवेशकों को मुनाफा आदि के रूप में भी डॉलर/विदेशी मुद्रा जाती है।</div><div><br></div><div><b>आठवां, ऊर्जा बचत: </b>तेल आयात भारत का बड़ा विदेशी मुद्रा खर्च है। पेट्रोल-डीजल की खपत कम करना, गैस/बिजली की बचत, वैकल्पिक ऊर्जा अपनाना—इनका सीधा असर डॉलर बचत पर पड़ता है। वैश्विक संघर्षों से तेल आपूर्ति प्रभावित होने की चिंता सरकार ने भी जताई है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>नौवां, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा: </b>विदेशी सामान की जगह भारतीय उत्पाद खरीदने से डॉलर बाहर कम जाता है। “वोकल फॉर लोकल” का आर्थिक मतलब यही है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>दसवां, निर्यात और निवेश बढ़ाना:</b> विदेश से डॉलर कमाने के लिए निर्यात, सेवाएँ, और विदेशी निवेश आकर्षित करने पर जोर।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 14:22:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-economic-implications-of-pm-modi-call-to-save-foreign-exchange</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहा 'इंडिया गठबंधन' तोड़ रहा है सियासी दम? जानिए कैसे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-the-india-alliance-adrift-in-the-mirage-of-secularism-gasping-for-political-breath]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धर्मनिरपेक्षता की भारतीय अवधारणा मूलतः “सर्वधर्म समभाव” और राज्य की धार्मिक निष्पक्षता पर आधारित रही है। लेकिन पिछले कई दशकों में भारतीय राजनीति के एक हिस्से ने इसे सामाजिक संतुलन के बजाय “अल्पसंख्यक तुष्टिकरण” के राजनीतिक औजार के रूप में प्रस्तुत किया। यही कारण है कि आज अनेक क्षेत्रीय और राष्ट्रीय दल वैचारिक संकट से गुजरते दिखाई दे रहे हैं। सच कहूं तो वे सभी धर्मनिरपेक्षता की मृगतृष्णा में भटक रहे हैं, 'इंडिया गठबंधन' के सहयोगी दल कांग्रेस की बेरुखी से अपना अपना सियासी दम तोड़ते जा रहे हैं! जानिए कैसे</div><div><br></div><div>जहां कांग्रेस ने स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति की केंद्रीय धुरी के रूप में स्थापित रखा। परंतु समय के साथ उस पर यह आरोप मजबूत होता गया कि उसने बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को पर्याप्त महत्व नहीं दिया और वोट बैंक आधारित राजनीति को प्राथमिकता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि भाजपा ने “सांस्कृतिक राष्ट्रवाद” और “बहुसंख्यक अस्मिता” के प्रश्न को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-clear-mandate-a-grueling-trial-by-fire-awaits-the-new-governments" target="_blank">विधानसभा चुनाव परिणाम: स्पष्ट जनादेश, नई सरकारों की होगी कड़ी अग्निपरीक्षा</a></h3><div>आज स्थिति यह है कि जो दल कभी भाजपा के हिंदुत्व विमर्श का तीखा विरोध करते थे, वे भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मंदिर, सनातन परंपरा, जातीय-सामाजिक प्रतिनिधित्व और राष्ट्रवाद की भाषा बोलने लगे हैं। इससे स्पष्ट संकेत मिलता है कि भारतीय मतदाता अब केवल “धर्मनिरपेक्षता” के पारंपरिक नारों से संतुष्ट नहीं है, बल्कि वह सांस्कृतिक आत्मसम्मान और विकास के संतुलन की अपेक्षा कर रहा है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस के सामने सबसे बड़ा संकट यह है कि वह अभी तक यह तय नहीं कर पाई है कि उसकी राजनीति की मूल दिशा क्या होगी—पारंपरिक अल्पसंख्यक केंद्रित गठजोड़?</div><div>सामाजिक न्याय आधारित नई राजनीति? या फिर भारतीय सांस्कृतिक चेतना के साथ सामंजस्य? यदि कांग्रेस और उसके सहयोगी दल समय रहते अपने वैचारिक ढांचे का पुनर्मूल्यांकन नहीं करते, तो उनके सामने तीन बड़े खतरे बने रहेंगे—</div><div><br></div><div>पहला, बहुसंख्यक समाज से लगातार बढ़ती दूरी उनके लिए सियासी चिंता का सबब बन सकती है। क्योंकि क्षेत्रीय दलों द्वारा उनके पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाया जा चुका है। दूसरा, भाजपा के राष्ट्रवादी विमर्श के सामने वैकल्पिक नैरेटिव का अभाव उतपन्न हो गया है। हालांकि यह भी ध्यान रखना होगा कि भारतीय लोकतंत्र केवल बहुसंख्यक या अल्पसंख्यक राजनीति पर नहीं चलता। तीसरा, अंततः जनता विकास, सुशासन, सुरक्षा, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय आत्मविश्वास—इन सभी का संतुलन चाहती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए भविष्य उसी राजनीतिक शक्ति का होगा जो पहचान की राजनीति से ऊपर उठकर विश्वसनीय शासन मॉडल प्रस्तुत कर सके। कांग्रेस के लिए चुनौती केवल चुनाव जीतने की नहीं, बल्कि अपनी वैचारिक प्रासंगिकता बचाने की है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि वह अपने पुराने ढांचे से बाहर निकलकर नई राजनीतिक भाषा गढ़ पाती है या नहीं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 09 May 2026 18:23:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-the-india-alliance-adrift-in-the-mirage-of-secularism-gasping-for-political-breath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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