<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[Jhalmuri और Fish Curry के जरिये BJP ने मिटा दिया बाहरी होने का ठप्पा, West Bengal Elections में पलट गयी बाजी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/jhalmuri-and-fish-curry-the-bjp-erased-the-outsider-tag-and-turned-the-tables-in-bengal-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार एक बड़ा बदलाव साफ दिखाई दे रहा है। भाजपा, जिस पर लंबे समय से बाहरी होने का आरोप लगता रहा, उसने इस धारणा को काफी हद तक कमजोर कर दिया है। चुनाव प्रचार के दौरान जिस तरह पार्टी के नेता स्थानीय खानपान, परंपराओं और सांस्कृतिक प्रतीकों से जुड़ते नजर आए हैं, उससे बंगाल के लोगों के बीच यह संदेश गया है कि यह दल अब बाहरी नहीं, बल्कि अपना ही है। स्थानीय भोजन के साथ जुड़ाव ने इस राजनीतिक दूरी को कम करने में अहम भूमिका निभाई है और मतदाताओं के मन में अपनापन पैदा किया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य में इस बार राजनीति और भोजन का एक अनोखा संगम देखने को मिल रहा है। यह केवल प्रचार का तरीका नहीं, बल्कि पहचान, सांस्कृतिक जुड़ाव और स्वीकार्यता का प्रतीक बन गया है। जिस तरह फिल्मकार सत्यजीत रे ने अपनी फिल्मों में काशी को बंगालियों के दूसरे घर के रूप में दिखाया था, ठीक उसी तरह अब राजनीतिक दल बंगाल के लिए अपनापन दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में स्थानीय खानपान को एक प्रमुख माध्यम बनाया गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/himanta-biswa-sarma-big-claim-will-score-a-century-in-assam-and-a-double-century-in-west-bengal" target="_blank">Himanta Biswa Sarma का बड़ा दावा- Assam में शतक और West Bengal में दोहरा शतक लगाएंगे</a></h3><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का झारग्राम में झालमुरी खाना हो या अन्य नेताओं का मछली के साथ प्रचार करना, यह सब एक सोची समझी रणनीति का हिस्सा है। लंबे समय से बंगाल में बाहरी होने के आरोप से जूझ रही भाजपा का स्थानीय भोजन को अपनाना एक संकेत है कि वह खुद को बंगाल की संस्कृति के करीब दिखाना चाहते हैं। चुनाव प्रचार के दौरान खासतौर पर भोजन केवल खाने की वस्तु नहीं, बल्कि पहचान और जुड़ाव का माध्यम बन गया है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बंगाल में बाहरी का अर्थ केवल भौगोलिक नहीं है, बल्कि यह भाषा, व्यवहार और खानपान से भी जुड़ा हुआ है। वर्ष 2021 के चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने इस बाहरी मुद्दे को प्रभावी ढंग से उठाया था। इसी के बाद अब भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है और स्थानीय संस्कृति के साथ सामंजस्य बैठाने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि चुनाव प्रचार में भाजपा के कई नेता जैसे अनुराग ठाकुर मछली खाते हुए नजर आए, वहीं कुछ उम्मीदवार मछली हाथ में लेकर प्रचार करते दिखे। विशेषज्ञों के अनुसार, मोदी का झालमुरी खाना एक सुरक्षित और संतुलित विकल्प था। चूंकि वह शाकाहारी हैं, इसलिए उनके लिए मछली खाना संभव नहीं था। हम आपको बता दें कि बंगाल का खानपान अपने आप में विविधता से भरा है। इसमें इस्लामी, डच और अंग्रेजी प्रभाव भी देखने को मिलता है। साथ ही घोटी और बंगाल समुदायों के बीच भी भोजन को लेकर अलग अलग परंपराएं हैं। ऐसे में झालमुरी एक ऐसा विकल्प है जो हर वर्ग में समान रूप से स्वीकार्य है। यह सस्ता, सरल और सर्वव्यापी है, इसलिए राजनीतिक रूप से भी सुरक्षित माना जाता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, चुनावी माहौल में केवल नेता ही नहीं, बल्कि मीडिया भी इस भोजन राजनीति का हिस्सा बन गया है। विभिन्न समाचार चैनल और पत्रकार चुनाव कवरेज के दौरान स्थानीय भोजन को प्रमुखता से दिखा रहे हैं। कहीं किसी होटल से चर्चा हो रही है तो कहीं सड़कों पर खाने के दृश्य दिखाए जा रहे हैं। इस तरह भोजन अब एक समाचार विषय भी बन गया है। वैसे जब कोई नेता स्थानीय भोजन खाता है तो वह यह संदेश देना चाहता है कि वह उस जगह का हिस्सा है। लेकिन जब यह सब कैमरे के सामने किया जाता है, तो यह कृत्रिम भी लग सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि इस चुनाव में भोजन एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपकरण बन गया है। लेकिन यह बात भी सही है कि जब चुनावी मुद्दे रोजगार, विकास और प्रवासन से हटकर केवल खानपान पर केंद्रित हो जाते हैं, तो असली समस्याएं पीछे छूटने का खतरा पैदा हो जाता है। वैसे इस बार चुनावी मुकाबले में भोजन केवल प्रतीक नहीं, बल्कि प्रभावी राजनीतिक संदेश बनकर उभरा है। जिस तरह भाजपा ने स्थानीय स्वाद और संस्कृति के जरिए अपनी छवि को बदला है, उससे यह संकेत मिल रहा है कि रणनीति असर दिखा रही है। ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि इस चुनाव में झालमुरी और मछली केवल खानपान की चीजें नहीं रहीं, बल्कि वह ऐसे प्रतीक बन गई हैं जो भाजपा की नैया पार लगाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 13:26:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/jhalmuri-and-fish-curry-the-bjp-erased-the-outsider-tag-and-turned-the-tables-in-bengal-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/25/narendra-modi-anurag_large_1326_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[महिला आरक्षण बिल: भावनाओं का जाल- विपक्ष गिरफ्तार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/women-reservation-bill-the-web-of-emotion-opposition-trapped]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बीच केंद्र सरकार ने देश की महिलाओं को संसद व राज्य विधानसभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण का लाभ वर्ष 2034 की बजाए 2029 से देने के लिए 131वां संशोधन विधेयक पारित कराने के लिए तीन दिन का विशेष सत्र बुलाया। यह संशोधन विधेयक पारित होने के लिए इसके पक्ष में दो तिहाई बहुमत चाहिए था। कांग्रेस, सपा, तृणमूल कांग्रेस व डीएमके जैसे दलों ने इस संशोधन को समर्थन नहीं दिया जिससे दो तिहाई बहुमत न मिलने के कारण यह 298 मतों के मुकाबले 230 मतों से गिर गया। लोकसभा में महिला आरक्षण विधेयक गिरने के बाद विपक्षी दलों ने इसको प्रधानमंत्री की हार बताते हुए मेजें थपथपाकर जश्न मनाया।&nbsp;</div><div><br></div><div>लोकसभा में विधेयक पर हुई चर्चा के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट कर दिया था कि इन सभी विधेयकों में उत्तर दक्षिण से कोई भेदभाव नहीं किया गया है तथा सरकार इसका कोई क्रेडिट भी लेना नहीं चाहती। साथ ही प्रधानमंत्री ने चेतावनी देते हुए कहा था कि महिला आरक्षण का विरोध करने वाले लंबे समय तक इसका खामियाजा भुगतेंगे, नंबर का खेल समय तय करेगा किंतु नारी नीयत देखेगी। प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में मतदान से पूर्व कई बार विरोधी दलों से बिल का समर्थन प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से विपक्षी सांसदों से भावुक अपील भी की थी। प्रधानमंत्री के सभी प्रयासों के बाद भी राजनैतिक स्वार्थ, अहंकार व सामंतवादी मानसिकता से त्रस्त परिवारवादी राजनैतिक दलों ने यह बिल पारित नहीं होने दिए। यदि यह विधेयक पारित हो जाते तो यह सत्र भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का महत्वपूर्ण पड़ाव बन जाता।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/women-participation-in-power-remains-far-below-the-global-average" target="_blank">वैश्विक औसत से बहुत दूर है सत्ता में महिलाओं की भागीदारी</a></h3><div>विधेयक को दो तिहाई मत मिलने पर विरोधी दल ऐसे आनंदित हो रहे हैं जैसे उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की सरकार गिरा दी हो। वो इसे मोदी की हार कह रहे हैं और यही विरोधी दलों ने एक राजनैतिक भूल है। महिला आरक्षण बिल भाजपा के लिए “चित भी मेरी - पट भी मेरी” वाला खेल बन गया है और पार्टी इस विषय को लेकर आक्रामक रूप से जनता में जा रही है। सदन में सभी विरोधी दलों ने परिसीमन और आरक्षण को लेकर भ्रम व झूठ का मायाजाल फैलाया। कुछ दलों ने जातीय जनगणना पर झूठ बोला और एससी-एसटी, ओबीसी, दलित आदिवासी व मुस्लिम महिलाओं के लिए अलग आरक्षण की मांग कर डाली। समाजवादी पार्टी ने दो कदम आगे जाकर 33 प्रतिशत आरक्षण के अंदर ही मुस्लिम महिलाओं के लिए पांच प्रतिशत आरक्षण की मांग करते हुए बिल को असंवैधानिक बताकर अपने मुस्लिम तुष्टिकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया। वास्तविकता यह है कि धर्म आधारित आरक्षण संविधान के विरुद्ध है जिसका असफल प्रयास कुछ दक्षिणी राज्यों में किया गया था जिसे सुप्रीम कोर्ट खारिज कर चुका है। वहीं यदि परिसीमन करने वाला बिल और महिला आरक्षण बिल पारित हो जाते तो जनसंख्या वृद्धि के अनुसार 2029 में महिला सांसदों की संख्या 272 हो जाती और देश के राजनैतिक परिदृश्य में एक व्यापक परिवर्तन दिखाई पड़ता।&nbsp;</div><div><br></div><div>विरोधी दलों ने लोकसभा में यह विधेयक गिरा दिया है लेकिन अब यह उनके लिए, “चिड़िया चुग गई खेत” वाली कहावत सिद्ध करने जा रहा है। भाजपा ने इसे अपने पक्ष में बड़ा राजनैतिक हथियार बना लिया है। इस विषय को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को संबोधित करके अपनी मंशा स्पष्ट कर दी है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में कांग्रेस का काला चिट्ठा खोलकर विस्तारपवूर्वक देशवासियों के समक्ष रखा और बताया कि किस प्रकार कांग्रेस ने सभी सुधारवादी प्रयासों का विरोध किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि परिवारवादी पार्टियों को डर है कि अगर नारी सशक्त हो गई तो इनका अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। ये कभी नही चाहेंगे कि उनके परिवार के बाहर की महिलाएं आगे बढ़ें। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमारा अत्मबल अजेय है, हमारे प्रयास रुकेंगे नहीं। देश की 100 प्रतिशत नारी शक्ति आशीर्वाद हमारे साथ है और हम इस संकल्प को पूरा करके रहेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल और तमिलनाडु जहां अभी विधानसभा का मतदान शेष है वहां प्रधानमंत्री मोदी व गृहमंत्री अमित शाह सहित भाजपा के सभी स्टार प्रचारक अपनी रैलियों में यह मुद्दा आक्रामक ढंग से उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सहित बीजेपी व राजग शासित राज्यों के मुख्यमंत्री महिला आरक्षण पर प्रेस वार्ता करके राज्यों में विपक्षी व क्षेत्रीय दलों को बेनकाब कर रहे हैं। महिला आरक्षण बिल पास न होने पर मुख्यमंत्री योगी ने कहा कि संसद में उस दिन द्रौपदी के चीरहरण जैसा दृश्य था। योगी जी ने कहा कि अगर ये बिल पारित हो जाता तो महिलाओं को उनका हक मिलता लेकिन इंडी गठबंधन के कारण ऐसा नहीं हो सका।</div><div><br></div><div>यदि यह विधेयक सर्वसम्मति से पास हो जाता तो स्वाभाविक रूप से इसका श्रेय पूरे सदन व सभी राजनैतिक दलों को मिलता, विरोधी दलों ने एक बहुत बड़ा अवसर खो दिया है। इस घटनाक्रम ने राजनैतिक दृष्टि से राजग गठबंधन को स्पष्ट&nbsp; बढ़त दी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:26:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/women-reservation-bill-the-web-of-emotion-opposition-trapped</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/24/women-reservation-bill_large_1226_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में सत्ता विरोधी लहर का फायदा क्या उठा पाएगी भाजपा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-bjp-be-able-to-take-advantage-of-the-anti-incumbency-wave-in-west-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। सवाल सीधा है कि क्या सत्ताविरोधी माहौल को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) अपने पक्ष में मोड़ पाएगी? या फिर ममता बनर्जी का जादू एक बार फिर कायम रहेगा? वैसे राज्य में चुनावी हवा भले ही बदलाव की सुगबुगाहट दिखा रही हो, लेकिन जमीन पर हालात इतने सरल नहीं हैं। देखा जाये तो इस बार के चुनावों में भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लगातार रैलियां, केंद्रीय नेतृत्व की सक्रियता और संगठन की आक्रामक रणनीति यह संकेत देती है कि पार्टी किसी भी कीमत पर बंगाल में सत्ता का स्वाद चखना चाहती है। दूसरी ओर, तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भी अपनी पकड़ ढीली पड़ने देने के मूड में नहीं है। ममता बनर्जी, जो लंबे समय से राज्य की राजनीति का केंद्र रही हैं, अब भी अपने जनाधार और कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे मैदान में डटी हुई हैं।</div><div><br></div><div>उधर, भाजपा के लिए उम्मीद की सबसे बड़ी वजह है ‘एंटी-इंकम्बेंसी’ यानी सत्ता के खिलाफ बढ़ती नाराज़गी। टीएमसी सरकार पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक अक्षमता और कानून-व्यवस्था के सवालों को लेकर विपक्ष लगातार हमलावर रहा है। भर्ती घोटाले, स्थानीय स्तर पर पार्टी कार्यकर्ताओं की दबंगई और राजनीतिक हिंसा जैसे मुद्दे भाजपा के चुनावी एजेंडे के केंद्र में हैं। पार्टी का दावा है कि जनता बदलाव चाहती है और इस बार वोट उसी दिशा में जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat" target="_blank">पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर: ममता को सताने लगा हार का डर</a></h3><div>लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही मजबूत है। ममता बनर्जी ने बीते वर्षों में महिला मतदाताओं, ग्रामीण गरीबों और अल्पसंख्यकों के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है। ‘लक्ष्मी भंडार’ जैसी योजनाओं ने महिलाओं के बीच भरोसा पैदा किया है, जबकि अन्य सामाजिक योजनाओं ने गरीब तबकों को सीधे लाभ पहुंचाया है। यही कारण है कि भाजपा के आक्रामक अभियान के बावजूद टीएमसी का आधार पूरी तरह हिलता नजर नहीं आता।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, भाजपा की रणनीति में एक अहम किरदार हैं शुभेन्दु अधिकारी, जो कभी ममता बनर्जी के करीबी सहयोगी थे और अब उनके सबसे बड़े राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बन चुके हैं। शुभेन्दु अधिकारी ने नंदीग्राम में ममता बनर्जी को मात दी थी और इस बार ममता बनर्जी को उनके गढ़ भवानीपुर में चुनौती दे रहे हैं। शुभेन्दु अधिकारी राज्य में भाजपा का चेहरा बनने का प्रयास कर रहे हैं हालांकि, उनका प्रभाव सीमित इलाकों तक ही केंद्रित माना जाता है, और पूरे बंगाल में एक व्यापक लहर खड़ी करना उनके लिए आसान नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 2019 के लोकसभा चुनाव भाजपा के लिए पश्चिम बंगाल में टर्निंग प्वाइंट साबित हुए थे। पार्टी ने उस चुनाव में अप्रत्याशित सफलता हासिल करते हुए खुद को एक मजबूत विपक्ष के रूप में स्थापित किया था। उसी प्रदर्शन के आधार पर भाजपा को उम्मीद थी कि वह विधानसभा चुनाव में सत्ता तक पहुंच सकती है। लेकिन बाद के चुनावी अनुभवों ने यह भी दिखाया कि लोकसभा और विधानसभा की राजनीति में मतदाताओं का व्यवहार अलग हो सकता है।</div><div><br></div><div>एक और चुनौती भाजपा के सामने सांस्कृतिक और भाषाई असंतुलन की है। बंगाल की अपनी विशिष्ट पहचान है, और यहां बाहरी बनाम स्थानीय का मुद्दा अक्सर उभरता रहता है। भाजपा के कई नेताओं के बयान और रणनीतियां कभी-कभी स्थानीय संवेदनशीलताओं से मेल नहीं खातीं, जिससे पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। टीएमसी इस मुद्दे को भुनाने में माहिर रही है और खुद को ‘बंगाल की असली आवाज’ के रूप में पेश करती है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, मतदाताओं के एक हिस्से में यह धारणा भी है कि भाजपा की राजनीति अत्यधिक ध्रुवीकरण पर आधारित है। धार्मिक और पहचान की राजनीति का असर भले कुछ क्षेत्रों में दिखता हो, लेकिन पूरे राज्य में यह रणनीति कितनी कारगर होगी, इस पर सवाल बना हुआ है। बंगाल का सामाजिक ताना-बाना जटिल है, और यहां की राजनीति सिर्फ एक मुद्दे पर नहीं टिकती।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, टीएमसी के खिलाफ असंतोष को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। ग्रामीण इलाकों में विकास की असमानता, स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार और रोजगार के अवसरों की कमी जैसे मुद्दे लोगों के बीच चर्चा में हैं। भाजपा इन्हीं सवालों को उठाकर खुद को एक वैकल्पिक शक्ति के रूप में स्थापित करना चाहती है।</div><div><br></div><div>वैसे बंगाल की चुनावी लड़ाई सिर्फ आंकड़ों और नारों की नहीं है, बल्कि भावनाओं, पहचान और भरोसे की भी है। भाजपा के पास आक्रामक अभियान और राष्ट्रीय नेतृत्व का समर्थन है, लेकिन टीएमसी के पास जमीनी नेटवर्क और ममता बनर्जी की व्यक्तिगत लोकप्रियता है। इसलिए, यह कहना जल्दबाजी होगी कि सत्ताविरोधी लहर किसके पक्ष में जाएगी। भाजपा के लिए यह अवसर भी है और चुनौती भी क्योंकि उसे नाराज़गी को वोट में बदलना होगा। वहीं ममता बनर्जी के लिए यह अपनी विश्वसनीयता और जनसंपर्क की सबसे बड़ी परीक्षा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इस चुनाव का नतीजा सिर्फ सत्ता परिवर्तन या सत्ता में पुनरावृत्ति तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह तय करेगा कि बंगाल की राजनीति आने वाले वर्षों में किस दिशा में आगे बढ़ेगी। फिलहाल, मैदान सजा है, दांव बड़े हैं और फैसला पूरी तरह जनता के हाथ में है, जो इस बार सिर्फ सरकार नहीं, बल्कि राजनीतिक कथा का अगला अध्याय लिखने जा रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 16:24:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-bjp-be-able-to-take-advantage-of-the-anti-incumbency-wave-in-west-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/22/modi-mamata_large_1624_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कुरुक्षेत्र स्थित राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कुरुक्षेत्र में दो महीनों के भीतर चार छात्रों द्वारा आत्महत्या की घटनाएं केवल एक संस्थान की त्रासदी एवं नाकामी नहीं हैं, बल्कि पूरे भारतीय समाज, शिक्षा व्यवस्था और हमारी सामूहिक संवेदनहीनता पर लगा गहरा प्रश्नचिह्न हैं। ये घटनाएं हमें झकझोरती हैं कि आखिर वह कौन-सी परिस्थितियां हैं, जिनमें देश की सर्वश्रेष्ठ प्रतिभाएं जीवन से हार मानने को विवश हो जाती हैं। कोई भी युवा, जो कठिन प्रतिस्पर्धा से गुजरकर ऐसे प्रतिष्ठित संस्थानों तक पहुंचता है, वह सहज रूप से जीवन का परित्याग नहीं करता, वह तब यह निर्णय लेता है जब उसे हर ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता है। यह अंधकार केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक, पारिवारिक और संस्थागत विफलताओं का सम्मिलित परिणाम है। एक बड़ा सवाल है कि इस तरह छात्रों का आत्मघात करना क्या सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी? आज भारत का भविष्य कहे जाने वाले युवा जिस मानसिक दबाव, प्रतिस्पर्धा और अपेक्षाओं के बोझ तले दबे हैं, वह अभूतपूर्व चिन्ताजनक है। कोटा जैसे शिक्षा नगरों में हर वर्ष दर्जनों छात्र आत्महत्या करते हैं। इन घटनाओं को हम आंकड़ों में बदल देते हैं, लेकिन हर आंकड़े के पीछे एक जीवित सपना, एक संघर्षरत परिवार और टूटती उम्मीदों की कहानी होती है। कोटा, दिल्ली, हैदराबाद, चेन्नई और अन्य शिक्षा केंद्रों में बढ़ती आत्महत्याएं इस बात का संकेत हैं कि हमारी शिक्षा व्यवस्था में कुछ मूलभूत त्रुटियां हैं। यह केवल पढ़ाई का दबाव नहीं है, यह उस मानसिक संरचना का संकट है, जिसमें सफलता को जीवन का पर्याय बना दिया गया है और असफलता को जीवन का अंत।</div><div><br></div><div>भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार 2018 से 2023 के बीच उच्च शिक्षण संस्थानों में 98 छात्रों ने आत्महत्या की। इनमें सबसे अधिक घटनाएं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में हुईं, इसके बाद एनआईटी और केंद्रीय विश्वविद्यालयों का स्थान है। यह तथ्य इस धारणा को तोड़ता है कि केवल कमजोर छात्र ही मानसिक तनाव का शिकार होते हैं। सच्चाई यह है कि सबसे प्रतिभाशाली और संवेदनशील छात्र ही अक्सर सबसे अधिक दबाव महसूस करते हैं, क्योंकि वे स्वयं से अत्यधिक अपेक्षाएं रखते हैं और असफलता को स्वीकार नहीं कर पाते। यहां प्रश्न केवल संस्थानों का नहीं है, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता का भी है जिसने सफलता को एक संकीर्ण परिभाषा में बांध दिया है। परिवार अपने बच्चों को बचपन से ही यह सिखाते हैं कि जीवन का लक्ष्य केवल प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त करना है। अभिभावक अपनी सामर्थ्य से अधिक खर्च कर कोचिंग संस्थानों में बच्चों को भेजते हैं, बैंक से कर्ज लेते हैं और अपनी अधूरी इच्छाओं को बच्चों के माध्यम से पूरा करने का प्रयास करते हैं। यह अपेक्षाओं का बोझ बच्चों के मन पर इतना भारी पड़ता है कि वे स्वयं को एक प्रोजेक्ट की तरह देखने लगते हैं, एक इंसान की तरह नहीं। जब यह प्रोजेक्ट असफल होता है, तो उन्हें लगता है कि उनका अस्तित्व ही निरर्थक हो गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/a-massive-conspiracy-was-afoot-in-the-name-of-education-in-kashmir" target="_blank">Kashmir में शिक्षा के नाम पर चल रही थी बड़ी साजिश! खुफिया रिपोर्ट के बाद तीन विश्वविद्यालयों ने लिया बड़ा एक्शन</a></h3><div>शिक्षा व्यवस्था का ढांचा भी इस संकट के लिए कम जिम्मेदार नहीं है। हमारी शिक्षा प्रणाली बच्चों को ज्ञान तो देती है, लेकिन जीवन जीने की कला नहीं सिखाती। उन्हें बताया जाता है कि गणित कैसे हल करना है, लेकिन यह नहीं सिखाया जाता कि जीवन की समस्याओं का समाधान कैसे करना है। उन्हें भौतिकी के नियम याद कराए जाते हैं, लेकिन यह नहीं बताया जाता कि मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखना है। परिणामस्वरूप, जब वे वास्तविक जीवन की चुनौतियों से सामना करते हैं तो वे टूट जाते हैं। आज के शिक्षण संस्थानों में शिक्षक और छात्र के बीच का संबंध भी बदल गया है। पहले शिक्षक केवल ज्ञान देने वाले नहीं, बल्कि मार्गदर्शक और संरक्षक होते थे। आज यह संबंध औपचारिक हो गया है। कई शिक्षक अपनी भूमिका को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित रखते हैं। वे छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य, उनके भावनात्मक संघर्षों और उनके आंतरिक द्वंद्व को समझने का प्रयास नहीं करते। यह दूरी छात्रों को और अधिक अकेला बना देती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विचित्र है कि जो देश दुनिया भर में अपनी संतुलित जीवनशैली एवं अहिंसा के लिये जाना जाता है, वहां के शिक्षा-संस्थानों में हिंसा का भाव पनपना एवं छात्रों के आत्महंता होते जाने की प्रवृत्ति का बढ़ना अनेक प्रश्नों को खड़ा कर रहा है। ऐसे ही अनेक प्रश्नों एवं खौफनाक दुर्घटनाओं के आंकड़ों ने शासन-व्यवस्था के साथ-साथ समाज-निर्माताओं को चेताया है और गंभीरतापूर्वक इस विडम्बनापूर्ण एवं चिन्ताजनक समस्या पर विचार करने के लिये जागरूक किया है, लेकिन क्या कुछ सार्थक पहल होगी? बहुत जरूरी है कि उच्च शिक्षण संस्थान अपनी कार्यशैली एवं परिवेश में आमूल-चूल परिर्वतन करें ताकि छात्रों पर बढ़ते दबावों को खत्म किया जा सके। फिलहाल जरूरी यह भी है कि इन संस्थानों में एक ऐसे तंत्र को विकसित किया जाए, जो निराश, हताश और अवसादग्रस्त छात्रों के लगातार संपर्क में रहकर उनमें आशा का संचार कर सके, उन्हें सकारात्मकता के संस्कार दे सके। इसके लिए स्थाई तौर पर कुछ मनोवैज्ञानिकों एवं विशेषज्ञों की सेवाएं भी ली जा सकती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>राज्यसभा सांसद जॉन ब्रिटास द्वारा इस मुद्दे पर केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग करना एक सकारात्मक कदम है, लेकिन केवल जांच समितियां बनाना समस्या का समाधान नहीं है। समितियां रिपोर्ट दे सकती हैं, लेकिन वे खोए हुए जीवन को वापस नहीं ला सकतीं। आवश्यकता इस बात की है कि हम समस्या की जड़ तक पहुंचें और उसे दूर करने के लिए ठोस और दीर्घकालिक उपाय करें। छात्रों में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति को केवल मानसिक स्वास्थ्य का मुद्दा मानना भी पर्याप्त नहीं है। यह एक व्यापक सामाजिक संकट है, जिसमें शिक्षा प्रणाली, पारिवारिक संरचना, सामाजिक अपेक्षाएं और व्यक्तिगत मनोविज्ञान सभी शामिल हैं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम एक ऐसे समाज में जी रहे हैं, जहां सफलता की अंधी दौड़ ने मानवीय संवेदनाओं को पीछे छोड़ दिया है। यहां हर कोई आगे बढ़ना चाहता है, लेकिन यह भूल जाता है कि इस दौड़ में पीछे छूटने वाले भी इंसान हैं। इस समस्या का समाधान केवल नीतिगत बदलावों से नहीं होगा, बल्कि एक सामाजिक आंदोलन की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें शिक्षा की परिभाषा को बदलना होगा। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि एक संतुलित और सशक्त व्यक्तित्व का निर्माण होना चाहिए। स्कूलों और कॉलेजों में मानसिक स्वास्थ्य को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। छात्रों को यह सिखाया जाना चाहिए कि असफलता जीवन का अंत नहीं, बल्कि एक नई शुरुआत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरे, अभिभावकों को भी अपनी सोच बदलनी होगी। उन्हें अपने बच्चों को यह समझाना होगा कि वे उनसे अधिक महत्वपूर्ण हैं, न कि उनकी सफलता। उन्हें बच्चों पर अपनी अपेक्षाओं का बोझ नहीं डालना चाहिए, बल्कि उन्हें अपने सपनों को पहचानने और उन्हें पूरा करने की स्वतंत्रता देनी चाहिए। तीसरे, शिक्षण संस्थानों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझना होगा। उन्हें केवल अकादमिक उत्कृष्टता पर नहीं, बल्कि छात्रों के मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देना होगा। हर संस्थान में प्रभावी काउंसलिंग सिस्टम होना चाहिए, जहां छात्र बिना किसी डर या संकोच के अपनी समस्याएं साझा कर सकें। शिक्षकों को भी इस दिशा में प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे छात्रों के व्यवहार में होने वाले बदलावों को पहचान सकें और समय रहते उनकी सहायता कर सकें। निश्चिततौर पर समाज को भी अपनी संवेदनशीलता को पुनर्जीवित करना होगा। हमें यह समझना होगा कि हर जीवन अमूल्य है और किसी भी सफलता से अधिक महत्वपूर्ण है। हमें एक ऐसा वातावरण बनाना होगा, जहां बच्चे बिना किसी भय के अपने सपनों का पीछा कर सकें और असफल होने पर भी सम्मान के साथ जी सकें। यदि हम इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाते, तो यह संकट और गहराता जाएगा। हर आत्महत्या केवल एक व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती, बल्कि हमारे समाज की विफलता का प्रमाण होती है। अब समय आ गया है कि हम इस विफलता को स्वीकार करें और इसे सुधारने के लिए एकजुट होकर प्रयास करें। तभी हम अपने युवाओं को इस आत्मघाती मार्ग से बचा सकेंगे और उन्हें एक उज्ज्वल भविष्य की ओर ले जा सकेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:11:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/22/student_large_1211_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर: ममता को सताने लगा हार का डर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल चुनाव दिनों-दिन बेहद दिलचस्प होता दिख रहा है। अजेय समझी जाने वाली ममता बनर्जी हैरान, परेशानी और आक्रोशित दिखाई दे रही हैं। हाल ही में एक चुनावी सभा में उनका ये बयान - 'रहा तृणमूल तो फिर मिलेंगे' ; ख़ूब चर्चा में है। जहां कुछ सियासी पंडित इसे ममता बनर्जी के चुनाव में सरेंडर करने से जोड़ रहे हैं। वहीं कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि- ये उनका शक्ति प्रदर्शन का अंदाज़ ए बयां है। लेकिन जिस तरह से पश्चिम बंगाल के चुनाव में दृश्य दिखाई दे रहे हैं। वो किसी भी लिहाज़ से ममता बनर्जी के पक्ष में नहीं हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>अपने चुनावी अभियान के बीच ममता बनर्जी उकसावे वाले बयान दे रही हैं।चुनाव कराने आए सुरक्षाबलों के ख़िलाफ़ लोगों को उकसा रही हैं। 25 मार्च 2026 को दार्जिलिंग के नक्सलबाड़ी में नंदप्रसाद गर्ल्स हाई स्कूल के मैदान में आयोजित एक जनसभा में उनका उकसावे वाला बयान सामने आया। एक वीडियो में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कथित तौर पर CRPFके जवानों को ‘धमकाती’ नजर आ रही हैं। आरोप है कि जनसभा के दौरान उन्होंने सभी महिलाओं और लड़कियों से अपील की कि- वे भारी संख्या में पोलिंग बूथ पर मौजूद रहें। चुनाव आयोग के अधिकारियों के अनुसार उन्होंने कथित तौर पर यह भी कहा कि —“अगर जरूरत पड़े तो महिलाएं CRPF जवानों से ‘निपटने’ के लिए घरेलू रसोई के उपकरणों (जैसे बर्तन या अन्य सामान) का इस्तेमाल करें।”&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-modi-muslims-and-women-a-do-or-die-election-in-west-bengal" target="_blank">ममता, मोदी, मुस्लिम और महिला- पश्चिम बंगाल में 'करो या मरो' का चुनाव</a></h3><div>इस खीझ, उकसावे से — ये आईने की तरह साफ़ हो रहा है कि बंगाल की सियासी पिच से ममता बाहर हो चुकी हैं। इसी के चलते वो किसी भी मुद्दे पर जनता के बीच ख़ुद को साबित नहीं कर पा रही हैं।तिस पर ऐसे बयान दे रही हैं मानो पश्चिम बंगाल — भारत से अलग कोई देश है। जहां ममता बनर्जी के बिना पत्ता नहीं हिलेगा। ममता बनर्जी को लगता है कि वो संविधान से ऊपर हैं।लेकिन ऐसा कतई नहीं है। यहां जनता से बढ़कर कोई नहीं।ममता बनर्जी जिस मुस्लिम वोटबैंक के नाम पर एक छत्र राज कर रही थीं। वो मुस्लिम समुदाय अब अपने 'इस्लामी' एजेंडे की ओर बढ़ चला है। हुमायूं कबीर, असद्दुदीन ओवैसी जैसे मुस्लिम नेता — मुस्लिम सत्ता और वर्चस्व की वकालत कर रहे हैं। कांग्रेस, टीएमसी की वोटकटवा वाली भूमिका में है। साफ़ है कि इसका सीधा फायदा बीजेपी के खाते में क्रेडिट होगा। कांग्रेस के दिग्गज नेता कहे जाने वाले अधीर रंजन चौधरी,ममता बनर्जी के मुस्लिम तुष्टिकरण के ख़िलाफ़ बिगुल फूंक रहे हैं। इतना ही नहीं पश्चिम बंगाल में मुस्लिम वर्ग भी भाजपा की रैलियों और जनसभाओं में नज़र आ रहा है। मुस्लिम महिलाएं और पुरुष ये कहते देखे गए हैं कि —“ममता बनर्जी ने भ्रष्टाचार किया है। उन्होंने कोई काम नहीं किया है। ममता मुसलमानों को बीजेपी के नाम पर केवल डराने का काम कर रही हैं। जबकि जिन राज्यों में बीजेपी की सरकार है। वहां मुसलमानों में कोई भय नहीं है वहां विकास हो रहा है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के अलग-अलग हिस्सों में रहने वाले मेरे कई परिचित लोग जिनका राजनीति से कोई विशेष सरोकार नहीं है। उन्होंने कई महत्वपूर्ण बातें कहीं। 2021 के चुनाव में जहां वो बीजेपी की राह कठिन बता रहे थे। वहीं इस बार पश्चिम बंगाल में बड़े परिवर्तन को भांप रहे हैं। उनका कहना है कि — इस बार पश्चिम बंगाल, कुछ अलग तरह के चुनावी माहौल में है। जहां पिछले चुनावों में ममता समर्थकों की गुंडागर्दी, हिंसा और उत्पात से लोग डरे-सहमे रहते थे। वहीं अब लोग ममता बनर्जी के ख़िलाफ़ खुलकर सामने आ रहे हैं। उन्हें अब किसी चीज़ का भय नहीं लग रहा है। जिन पोलिंग बूथों में टीएमसी के गुंडों का खौफ़ रहता था। वहां अब लोग ममता बनर्जी का खुला विरोध जता रहे हैं । साथ ही साइलेंटली भी बीजेपी के पक्ष में वहां हवा चल पड़ी है। ममता के मुस्लिम तुष्टिकरण से बंगाल की जनता मुक्ति चाहती है। डेमोग्राफिक बदलाव को लेकर स्थानीय लोग ख़ासे चिंतित हैं। पश्चिम बंगाल में खुलेआम होती गौहत्याएं, जनसांख्यिकी बदलाव, गुंडागर्दी, हिंसा, अराजकता और अपराधियों को मिलते संरक्षण से वहां की जनता त्रस्त हो चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये संकेत बता रहे हैं कि वंदेमातरम् की राष्ट्रीय चेतना वाली बंगभूमि जागृत हो चुकी है। वहां का जन-मानस ऐतिहासिक परिवर्तन करने वाला है। बंगाली भद्रोलोक में इस बार गहन चिंतन मंथन चला है।उनका मानना है कि अगर ममता बनर्जी, अपने मज़हबी तुष्टिकरण, अवैध घुसपैठियों को संरक्षण न देतीं। दुर्गा पूजा, रामनवमी, हिन्दू त्योहारों पर लगातार अंकुश लगाने का प्रयास न करती तो उनके प्रति सहानुभूति बनी रहती।लेकिन ममता बनर्जी ने जिस ढंग से हिंदू समुदाय के ख़िलाफ़ हुई हिंसाओं में मौन साधे रखा। मज़हबी कट्टरपंथियों को संरक्षण देती रहीं। उससे बंगाली समुदाय के स्वाभिमान को धक्का लगा। संदेशखाली, आर जी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल, दुर्गापुर लॉ कॉलेज, साउथ कोलकाता लॉ कॉलेज में महिलाओं के साथ हुए दुराचार, अत्याचार की — वीभत्स घटनाओं ने, उनके महिला सुरक्षा के तमाम दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक महिला होने के नाते भी ममता बनर्जी का असंवेदनशील रूप पश्चिम बंगाल की जनता ने देखा है। जो ये बताता है कि वो सिर्फ़ अपने वोटबैंक की राजनीति करती हैं। उनके लिए महिला सुरक्षा कोई मायने नहीं रखती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं ममता बनर्जी का खुलकर मुस्लिम पक्षकार के तौर पर आना। लगातार केंद्र की जनकल्याणकारी योजनाओं को लागू न करना। केंद्र से हर मुद्दे पर टकराव लेना। SIR— के विरोध में उतरना। मालदा में ममता राज में, एसआइआर के काम में लगे 3 महिला सहित 7 न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाए जाने की झकझोर देने वाली घटना ने एक गंभीर ख़तरे की ओर संकेत किया है। जब एक भीड़ ने 9 घंटे तक उन्हें बंधक बनाए रखा। उकसावे के बयान दिए जाते रहे। अधिकारी अपनी जान बचाने की गुहार लगाते रहे। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद केंद्रीय सुरक्षाबलों ने उन्हें रेस्क्यू किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्थिति की भयावहता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्वत: संज्ञान लिया। देर रात 2बजे तक सुनवाई की और NIA को जांच सौंपी। मामले में सुनवाई करते हुए मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने कहा था कि —“कलकत्ता उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सुजॉय पाल ने उन्हें देर रात और फिर सुबह इस स्थिति के बारे में सूचित किया था। सूचना मिलने के बावजूद मुख्य सचिव, गृह सचिव, पुलिस महानिदेशक और स्थानीय एसपी की भूमिका को 'बेहद निराशाजनक' है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस बात पर जोर दिया कि — “न्यायाधीशों को डराने-धमकाने या उनके काम में बाधा डालने के प्रयासों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और न्यायपालिका अपने अधिकारियों की सुरक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने के लिए दृढ़ संकल्पित है। पीठ ने आगे कहा कि राज्य सरकार की निष्क्रियता 'बेहद निंदनीय' है। यह घटना न्यायिक अधिकारियों का मनोबल गिराने और चल रही चुनावी प्रक्रिया को रोकने के लिए सोची-समझी साजिश प्रतीत होती है।”&nbsp;</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणियां ममता बनर्जी सरकार का असल चरित्र पेश करती हैं। आप सोचिए कि सीमावर्ती राज्य में ऐसे दृश्य कितने ख़तरनाक हैं। जहां एक संगठित भीड़ न्यायिक अधिकारियों को बंधक बना लेती हो। खुलेआम देश के संविधान और कानून को चुनौती दी जाती हो। हिंसा, उत्पात के दृश्य दिखाई देते हों। क्या ये देश की एकता और अखंडता को चुनौती नहीं है? आख़िर ये दुस्साहस कहां से आया? स्पष्ट है राज्य की ममता बनर्जी सरकार की उस तानाशाही और तुष्टिकरण की नीति से, जो केवल सत्ता चाहती है। उनके लिए राष्ट्रीयता जैसे मूल्य कोई मायने नहीं रखते हैं। कोई आम नागरिक भी सोचे कि — अगर सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप ना करता, केंद्रीय बल रेस्क्यू न करते— तो क्या न्याय अधिकारी सुरक्षित रहते? अगर वहां न्याय अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं तो क्या आम नागरिक सुरक्षित हो सकता है? क्या ये दृश्य अलगाव, आतंक को स्पष्ट बयां नहीं करते हैं? क्या किसी भी नेता, राजनीतिक दल को, देश की एकता और अखंडता को चुनौती देने की छूट दी जा सकती है?&nbsp;</div><div><br></div><div>पहले कम्युनिस्ट शासन उसके बाद ममता बनर्जी सरकार के लंबे समय के अराजक शासन से बंगाल त्रस्त हो गया है। वो अब इन सबसे मुक्ति चाहता है। इसी के दृश्य पश्चिम बंगाल में सर्वत्र दिखाई देते हैं। कोलकाता के रहने वाले एक युवा ने कहा कि— “पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती इलाक़ों में अचानक बदलती डेमोग्राफी। पश्चिम बंगाल के संसाधनों पर डाका डालते, बांग्लादेशी घुसपैठियों, रोहिंग्याओं से लोगों में भय का वातावरण बना है।” लेकिन ममता सरकार में उनकी कहीं सुनवाई नहीं हुई। ये सारी बातें ममता बनर्जी को ख़ासा डैमेज कर रही हैं। सुवेंदु अधिकारी के नामांकन रोड शो, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी , केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह की सभाओं में लगातार उमड़ता विशाल जनसमूह—बड़े परिवर्तन का संकेत दे रहा है। बीजेपी को‌ लेकर जनता में जैसा उत्साह 2026 के विधानसभा चुनाव में देखने को मिल रहा है। वो परिवर्तन की बड़ी आहट के तौर पर दिखाई दे रहा है। महिलाओं, युवा, बुजुर्ग — सभी में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के केन्द्रीय नेतृत्व, भाजपा की नीतियों को लेकर विश्वास की लहर दौड़ रही है। छोटे-छोटे बच्चे तक अपने माता-पिता के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की रैलियों में, सभाओं में पहुंच रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र के इंतज़ार में बच्चों के निश्छल, भावुक कर देने वाले वीडियो देखने को मिल रहे हैं। जहां तक नज़र जाती है वहां विशाल जनसमूह दिखाई देता है। जबकि दूसरी ओर ममता बनर्जी की संभाएं खाली दिख रही हैं। इसी के चलते प्रेशर से बचने के लिए उन्होंने जनसभाओं के आकार को छोटा कर दिया। ममता बनर्जी की सभाओं में लोग उनका बॉयकॉट करते नज़र आ रहे हैं। ये सब स्पष्ट संकेत हैं कि — पश्चिम बंगाल की भूमि इस बार अपने मूल स्वरूप में लौट आई है। संन्यासी क्रांति, वंदेमातरम् की भूमि- हिंसा, अत्याचार, अराजकता से मुक्ति चाहती है। वहीं पश्चिम बंगाल के अतिसंवेदनशील और संवदेनशील इलाक़ों में सेना ने जिस तरह से भयमुक्त निर्वाचन के लिए मोर्चा संभाला है। उससे जनता में उत्साह की लहर देखने को मिली है। लोग भयमुक्त होकर अपनी राय व्यक्त कर रहे हैं। नए परिवर्तन के लिए आगे आ रहे हैं। स्पष्ट है कि हाल-फिलहाल पूरा गेम ममता के हाथों से फिसलता जा रहा है। पश्चिम बंगाल भाजपा की ओर रुख कर रहा है।‌ये आश्चर्य की कोई बात नहीं होगी कि — 4 मई को रिजल्ट के दिन हरियाणा और महाराष्ट्र जैसा मैजिक देखने को मिले। टीएमसी दो अंकों में सिमट जाए और बीजेपी प्रचंड बहुमत के साथ विजय तिलक करे।&nbsp;</div><div><br></div><div>— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल&nbsp;</div><div>(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:22:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/21/mamata_large_1922_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[महिला कोटे से जुड़े संविधान बिल के लुढ़कने के सियासी निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-constitutional-bill-on-women-quotas-falling-through]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इंडिया गठबंधन की विपक्षी एकजुटता ने पुनः सत्ताधारी गठबंधन एनडीए की नींद उड़ा दी है। ऐसा इसलिए कि लोकसभा में संविधान (131वां संशोधन) विधेयक 2026, जो लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण लाने से जुड़ा था, 16 अप्रैल 2026 को वोटिंग में गिर गया। इसके पक्ष में 298 और विपक्ष में 230 वोट पड़े, जबकि न्यूनतम दो-तिहाई बहुमत (लगभग 352 वोट) की आवश्यकता थी, जो सरकार के रणनीतिकारों ने नहीं जुटा पाए। शायद पहली बार सदन में अमित शाह की रणनीति पिट गई। इसका राजनीतिक प्रभाव यह रहा कि मोदी सरकार के लिए 12 साल में पहली बड़ी संवैधानिक हार हुई है, जो विपक्ष की एकजुटता को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इसे "संविधान पर हमला" बताकर कांग्रेस-विपक्ष की रणनीति की जीत घोषित की, जबकि भाजपा इसे विपक्ष विरोधी हथियार बनाने की योजना बना रही है। एक सत्ता विरोधी रणनीति के तहत जहां विपक्ष ने बिल को "छलावा" करार दिया, वहीं दावा किया कि यह परिसीमन और चुनावी नक्शा बदलने की साजिश है। वहीं, एक एनडीए नेता के अनुसार, बिल गिरने से सरकार अब सड़क पर विपक्ष को महिलाओं के अधिकारों के नाम पर घेरेगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nari-shakti-vandan-adhiniyam-equality-in-power" target="_blank">नारी शक्ति वंदन अधिनियम: सत्ता में समानता</a></h3><div>हालांकि, सरकार ने शेष दो बिल (परिसीमन और अन्य) आगे नहीं बढ़ाए, क्योंकि वे मुख्य बिल पर निर्भर थे। एचएम अमित शाह और पीएम मोदी विपक्ष के विरोध को कांग्रेस के इतिहास से जोड़कर जनता में प्रचार करेंगे। यह 2029 चुनावों से पहले राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज कर सकता है। लेकिन इसका साइड इफेक्ट्स पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों में भी दिख सकता है, क्योंकि विपक्षी एकजुटता का पुनः संदेश गया है।</div><div><br></div><div>वहीं, मोदी सरकार महिला आरक्षण बिल को दोबारा लाने के लिए रणनीतिक बदलाव कर सकती है, खासकर 16 अप्रैल 2026 को लोकसभा में हार के बाद। समझा जाता है कि सरकार नई विधेयक रणनीति के तहत दो या तीन नए विधेयक ला सकती है: पहला लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला आरक्षण सुनिश्चित करेगा, जिसमें एससी/एसटी के लिए सब-कोटा भी शामिल होगा। लेकिन फिर सवाल उठेगा कि ओबीसी और ईडब्ल्यूएस के लिए क्यों नहीं? दूसरा परिसीमन आयोग स्थापित करेगा, लेकिन इसे राज्यों के अनुमोदन से अलग रखा जा सकता है ताकि दो-तिहाई बहुमत आसान हो।</div><div><br></div><div>सरकार का मानना है कि विपक्ष से सहमति निर्माण के बाद आवश्यक कदम उठाए जाएंगे, क्योंकि पीएम मोदी सभी दलों को पत्र लिखकर सर्वसम्मति की अपील कर चुके हैं, इसी सिलसिले में कांग्रेस और अन्य विपक्षियों से बातचीत जारी है। महिला कोटा बिल को 2029 चुनावों से पहले लागू करने के लिए 2011 जनगणना पर आधारित संशोधन पर जोर दिया, और नई जनगणना-परीक्षण का इंतजार खत्म किया जाएगा। इसके निमित्त संसदीय प्रक्रिया यह हैं कि विशेष सत्र बुलाकर संशोधित बिल पेश करना संभव होगा, जहां 18 घंटे लोकसभा और 10 घंटे राज्यसभा चर्चा होगी। वहीं सड़क पर प्रचार के साथ विपक्ष को ओबीसी हितों पर घेराव, जिससे राजनीतिक दबाव बनेगा। यह 2029 से पहले बहुमत जुटाने की कोशिश होगी।</div><div><br></div><div>इस प्रकार देखा जाए तो महिला आरक्षण बिल को 2029 से पहले लागू करना संवैधानिक रूप से जटिल है, क्योंकि इसके लिए परिसीमन प्रक्रिया अनिवार्य है जो 2011 जनगणना पर आधारित होनी चाहिए। इसका संभावित विकल्प संशोधित बिल पुनर्प्रस्तावहै जिसके तहत सरकार दोबारा संशोधित विधेयक ला सकती है, जिसमें लोकसभा सीटें बढ़ाकर (543 से 850 तक) 33% महिला कोटा सुनिश्चित हो, लेकिन विपक्ष सहमति के बिना दो-तिहाई बहुमत मुश्किल है। इसलिए विपक्ष से सर्वसम्मति की पहल तेज है। सरकार सभी दलों से बातचीत तेज कर विशेष सत्र बुलाना, परिसीमन को अलग रखकर बिल पास करवाना, हालांकि विपक्ष इसे "परिसीमन साजिश" मान रहा है।</div><div><br></div><div>जहाँ तक व्यावहारिक बाधाओं की बात है तो परिसीमन आयोग को पब्लिक हियरिंग और प्रक्रिया में कम से कम 2-3 वर्ष लगते हैं, इसलिए 2029 चुनाव से पहले पूरा होना असंभव है। वहीं बिल गिरने से अब अगली जनगणना (2031) और उसके बाद के परिसीमन तक (2034+) देरी तय, दक्षिणी राज्यों की चिंताएं टल सकती हैं। सरकार सड़क प्रचार पर जोर देगी। वहीं विपक्ष ने लोकसभा में गिरे महिला आरक्षण संविधान संशोधन बिल पर मुख्य रूप से परिसीमन प्रक्रिया, ओबीसी/एससी/एसटी सब-कोटा और राजनीतिक साजिश को लेकर आपत्तियां दर्ज कीं। मुख्य आपत्तियां निम्नलिखित हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, परिसीमन साजिश: बिल को लोकसभा/विधानसभा सीटें बढ़ाने और 2011 जनगणना पर परिसीमन से जोड़ा गया, जिसे विपक्ष ने उत्तर भारत (विशेषकर भाजपा शासित राज्यों) को लाभ पहुंचाने वाली "सीट रिबनिंग" करार दिया। फलतः दक्षिणी राज्य अपनी सीटें खोने के डर से विरोधी हो गए।</div><div><br></div><div>दूसरा, ओबीसी/ईडब्ल्यूएस आरक्षण अनुपस्थिति: 33% महिला कोटा में ओबीसी, ईडब्ल्यूएस के लिए सब-कोटा न होने से सामाजिक न्याय का उल्लंघन ठहराया, और इसे "सवर्ण महिलाओं के लिए" नया मौका बताया।</div><div><br></div><div>तीसरा, संविधान पर हमला: राहुल गांधी ने इसे "संविधान बचाओ" का मुद्दा बनाया, और दावा किया कि बिल चुनावी नक्शा बदलकर विपक्ष कमजोर करेगा।</div><div><br></div><div>इस प्रकार राजनीतिक तर्क देते हुए विपक्ष ने इसे "छलावा" कहा, क्योंकि लागू होने में 2029-34 तक देरी होगी। इसलिए एकजुट होकर वोटिंग में भाजपा नीत एनडीए को हराया।</div><div><br></div><div>वहीं, मोदी सरकार ने विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए बिल को महिलाओं के सशक्तिकरण का ऐतिहासिक कदम बताया, जो 25-30 साल पहले ही लागू हो जाना चाहिए था। परिसीमन पर स्पष्टीकरण देते हुए सरकार ने कहा कि परिसीमन 2011 जनगणना पर आधारित होगा, जो निष्पक्ष है और दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं पहुंचाएगा; यह सीट वृद्धि के साथ संतुलित होगा। अमित शाह ने चुनौती दी कि यदि विपक्ष संशोधन चाहे तो सदन एक घंटा रोकें, वे तुरंत बदलाव लाएंगे।</div><div><br></div><div>वहीं, ओबीसी/एससी/एसटी कोटा पर जवाब देते हुए सरकार ने ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा की मांग पर अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए सरकार ने स्पष्ट कहा कि संविधान धर्म या जाति आधारित अतिरिक्त आरक्षण की अनुमति नहीं देता; इसलिए मौजूदा एससी/एसटी कोटा में महिलाओं को प्राथमिकता रहेगी। पीएम मोदी ने विपक्ष को "महिलाओं के खिलाफ" करार दिया, और कहा कि पंचायत स्तर पर सफलता साबित हो चुकी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हालांकि राजनीतिक आरोपों का खंडन करते हुए और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के "संविधान पर हमला" सम्बन्धी दावे पर शाह ने कहा कि विपक्ष सैद्धांतिक रूप से सहमत था लेकिन वोटिंग में नकारा; अब सड़क पर इसका जवाब मिलेगा। सभी दलों से सर्वसम्मति की अपील की गई।</div><div><br></div><div>उल्लेखनीय है कि महिला आरक्षण बिल (संविधान 131वां संशोधन विधेयक 2026) के प्रमुख प्रावधान लोकसभा, और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए कुल सीटों का एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित करने से जुड़े हैं, जिसका&nbsp;</div><div>मुख्य प्रावधान इस प्रकार है:-</div><div><br></div><div>पहला, आरक्षण का दायरा: लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और दिल्ली विधानसभा में कुल सीटों का 33% महिलाओं के लिए आरक्षित, जिसमें एससी/एसटी आरक्षित सीटों का भी एक-तिहाई हिस्सा शामिल है।</div><div><br></div><div>दूसरा, परिसीमन प्रक्रिया: 2011 जनगणना पर आधारित परिसीमन आयोग द्वारा सीटों का आवंटन और रोटेशन, जिसमें लोकसभा सीटें 543 से बढ़ाकर 850 तक प्रस्तावित है।</div><div><br></div><div>तीसरा, अवधि और प्रभावी तिथि: 15 वर्ष के लिए (संसद द्वारा विस्तार योग्य), अगले परिसीमन के बाद 2029 चुनावों से लागू होगा।</div><div><br></div><div>चौथा, अतिरिक्त विशेषताएं: रोटेशन आधारित सीटें प्रत्येक परिसीमन में बदलेंगी, लेकिन ओबीसी/ईडब्ल्यूएस सब-कोटा शामिल नहीं होना भी विवाद का कारण बना।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:53:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-political-implications-of-the-constitutional-bill-on-women-quotas-falling-through</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/18/women-reservation-bill_large_1753_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा बिहार का नया ‘सम्राट’]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bihar-new-emperor-stands-amidst-a-labyrinth-of-challenges]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति में सत्ता का शिखर छूना जितना कठिन है, उससे कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण है उस शिखर पर टिके रहकर अपनी सर्वमान्यता सिद्ध करना। सम्राट चौधरी का बिहार के 24वें मुख्यमंत्री के रूप में उदय राज्य के सियासी इतिहास में एक नए युग का सूत्रपात माना जा रहा है। यह केवल एक व्यक्ति का मुख्यमंत्री बनना नहीं है बल्कि भारतीय जनता पार्टी का बिहार में उस ‘बड़े भाई’ की भूमिका को आधिकारिक रूप से स्वीकार करना है, जिसका इंतजार पार्टी कार्यकर्ता दशकों से कर रहे थे। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद पैदा हुए राजनीतिक शून्य को भरने की जिम्मेदारी अब सम्राट चौधरी के कंधों पर है। लेकिन सवाल यह है कि क्या वह नीतीश कुमार की उस लंबी और गहरी छाया से बाहर निकल पाएंगे, जिसने पिछले दो दशकों से बिहार की राजनीति को परिभाषित किया है? यही वह कसौटी है, जिस पर अब सम्राट चौधरी को परखा जाएगा।</div><div><br></div><div>सम्राट चौधरी का राजनीतिक उदय कोई आकस्मिक घटना नहीं है। यह उनके पिता शकुनी चौधरी की विरासत, और उनके स्वयं के आक्रामक संघर्ष, दशकों की राजनीतिक यात्रा, रणनीतिक धैर्य और समयानुकूल निर्णयों का परिणाम है। 16 नवंबर 1968 को मुंगेर के लखनपुर में जन्मे सम्राट ने बहुत कम उम्र में ही सत्ता का स्वाद चख लिया था। 1999 में राबड़ी देवी सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बनने से लेकर आज मुख्यमंत्री की कुर्सी तक का सफर वैचारिक बदलावों और रणनीतिक फैसलों से भरा रहा है। राजद और जदयू जैसी क्षेत्रीय शक्तियों के साथ काम करने के बाद 2017 में भाजपा का दामन थामना उनके करियर का सबसे निर्णायक मोड़ साबित हुआ। भाजपा ने उनमें एक ऐसे पिछड़ा नेतृत्व (ओबीसी) को देखा, जो न केवल संगठन में जान फूंक सकता था बल्कि राजद के ‘माई’ (एमवाई) समीकरण के सामने एनडीए के ‘लव-कुश’ समीकरण को मजबूती दे सकता था। विशेषकर कुशवाहा समुदाय से आने के कारण सम्राट चौधरी भाजपा के लिए सामाजिक संतुलन का सबसे सटीक मोहरा साबित हुए। भाजपा ने उन्हें न केवल स्वीकार किया बल्कि प्रदेश अध्यक्ष जैसे महत्वपूर्ण पद देकर उनकी नेतृत्व क्षमता पर भरोसा भी जताया। यही भरोसा आज उन्हें मुख्यमंत्री पद तक ले आया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-command-of-bihar-is-in-the-hands-of-samrat-choudhary" target="_blank">सम्राट को सुशासन का हस्तांतरण</a></h3><div>मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी की नियुक्ति के साथ ही बिहार की राजनीति में एक दुर्लभ संयोग भी जुड़ा है। जननायक कर्पूरी ठाकुर के बाद वह दूसरे ऐसे नेता बने हैं, जिन्होंने पहले उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी संभाली और बाद में मुख्यमंत्री के पद तक पहुंचे। यह उपलब्धि उनके कद को तो बढ़ाती है लेकिन इसके साथ आने वाली अपेक्षाएं उनके लिए हिमालयी चुनौतियों जैसी हैं। नीतीश कुमार केवल एक राजनेता नहीं थे बल्कि वह बिहार के लिए एक ‘इंस्टीट्यूशन’ बन चुके थे। उनके 20 वर्षों के शासनकाल ने राज्य में सुशासन की एक ऐसी परिभाषा गढ़ी, जिसमें महिला सुरक्षा, सड़कें, बिजली और शराबबंदी जैसे मुद्दे हर घर से जुड़े थे। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि वे स्वयं को नीतीश कुमार के विकल्प के रूप में पेश करते हैं या एक ऐसी नई पहचान गढ़ते हैं, जो नीतीश के ‘विकास’ और भाजपा की ‘वैचारिक प्रखरता’ का संगम हो।</div><div><br></div><div>अधिकांश राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य नेता बनना सम्राट चौधरी के लिए रातों-रात संभव नहीं होगा। नीतीश कुमार की स्वीकार्यता समाज के हर वर्ग, चाहे वह महादलित हो, अति पिछड़ा हो या आधी आबादी (महिलाएं) हो, में गहराई तक थी। सम्राट चौधरी के पास फिलहाल एक मजबूत सांगठनिक ढांचा और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का आशीर्वाद है लेकिन उन्हें अपनी ‘आक्रामक छवि’ को अब ‘प्रशासकीय संयम’ में बदलना होगा। मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठने के बाद अब उनके हर फैसले की तुलना नीतीश कुमार के मानकों से की जाएगी। क्या वह उसी सहजता से महादलितों और अति पिछड़ों के हितों की रक्षा कर पाएंगे? क्या वह शराबबंदी जैसी पेचीदा नीतियों को लेकर जनता के बीच अपना स्पष्ट नजरिया रख पाएंगे? ये कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका उत्तर उनके कार्यकाल के शुरुआती सौ दिन ही तय करेंगे।</div><div><br></div><div>चुनौतियां केवल बाहर ही नहीं, गठबंधन के भीतर भी हैं। नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने के बाद जदयू के भविष्य और निशांत कुमार के सक्रिय राजनीति में प्रवेश ने नई चर्चाओं को जन्म दिया है। जदयू के भीतर इस बदलाव को लेकर एक दबी हुई छटपटाहट है। सम्राट चौधरी को यह सुनिश्चित करना होगा कि गठबंधन के सहयोगी दल खुद को उपेक्षित महसूस न करें। साथ ही, उन्हें भाजपा के भीतर भी उन वरिष्ठ नेताओं को विश्वास में लेना होगा, जो मुख्यमंत्री पद की दौड़ में पीछे रह गए। सम्राट चौधरी पर उनके पुराने विवादों, जैसे कम उम्र में मंत्री पद से हटाए जाने की घटना और उनके शैक्षणिक पहलुओं को लेकर विपक्ष हमलावर रहेगा। एक मुख्यमंत्री के रूप में उनकी पेशेवर छवि और शुचिता पर उठने वाले सवालों का सामना उन्हें अपनी कार्यशैली से ही करना होगा।</div><div><br></div><div>बिहार में 2025 का जनादेश एक तरह से ‘फेयरवेल मैंडेट’ जैसा रहा है, जहां जनता बदलाव की मानसिक तैयारी कर चुकी थी। सम्राट चौधरी के लिए सबसे बड़ी ताकत उनका ओबीसी समुदाय से होना और भाजपा आलाकमान का पूर्ण समर्थन है लेकिन उनकी राह का सबसे बड़ा कांटा ‘नीतीश कुमार का औरा’ है। भाजपा ने अब तक बिहार में नीतीश कुमार के साये में राजनीति की है, अब उसे अपनी स्वतंत्र इमारत खड़ी करनी है, जिसकी नींव सम्राट चौधरी को रखनी है। यह सफर कांटों भरा है क्योंकि उन्हें न केवल विकास की रफ्तार बनाए रखनी है बल्कि बिहार की उस जटिल सामाजिक संरचना को भी साधे रखना है, जहां जाति की राजनीति कभी खत्म नहीं होती। सम्राट चौधरी की कहानी एक ऐसे संघर्षशील नेता की है, जिसने शून्य से शिखर तक का सफर तय किया है लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में उनकी असली परीक्षा अब शुरू होने जा रही है। क्या वे बिहार को ‘बीमारू’ छवि से पूर्णतः मुक्त कर ‘विकसित बिहार’ के संकल्प को सिद्ध कर पाएंगे? यह भविष्य के गर्भ में है मगर फिलहाल बिहार की सत्ता का यह नया ‘सम्राट’ चुनौतियों के चक्रव्यूह के बीच खड़ा है। सम्राट चौधरी के पास अवसर भी है और चुनौती भी, अब यह उनके नेतृत्व पर निर्भर करेगा कि वे इस अवसर को इतिहास में कैसे दर्ज कराते हैं।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:17:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bihar-new-emperor-stands-amidst-a-labyrinth-of-challenges</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/18/samrat-choudhary_large_1717_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[लाल गलियारे का अंत: शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने रची सुरक्षा की नई इबारत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-end-of-the-red-corridor-shah-zero-tolerance-policy-scripts-a-new-chapter-in-security]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की आंतरिक सुरक्षा के इतिहास में यदि किसी एक समस्या ने दशकों तक देश की प्रगति को बाधित किया और हजारों निर्दोषों का लहू बहाया, तो वह नक्सलवाद था। एक समय ऐसा भी था जब तत्कालीन सरकारों ने इसे देश के लिए 'सबसे बड़ा खतरा' स्वीकार किया था, लेकिन इसके समाधान के लिए वह ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई थी जो आज नजर आ रही है। आज जब हम 2026 के मुहाने पर खड़े हैं, तो भारत के नक्शे से 'लाल गलियारे' का सिकुड़ता दायरा और बस्तर के जंगलों में गूंजती शांति इस बात का प्रमाण है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की 'जीरो टॉलरेंस' नीति ने इस नासूर को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया है।अमित शाह ने गृह मंत्रालय की कमान संभालते ही नक्सलवाद को केवल एक स्थानीय कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय इसे एक राष्ट्रव्यापी सुरक्षा चुनौती के रूप में चिन्हित किया और इसे समाप्त करने के लिए 'समाधान' और 'लौह प्रहार' जैसी रणनीतियों का सूत्रपात किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमित शाह की कार्यशैली का सबसे प्रमुख पहलू उनका 'परिणाम-आधारित' दृष्टिकोण है। उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में बार-बार इस बात पर जोर दिया है कि नक्सलवाद का अस्तित्व केवल बंदूकों के दम पर नहीं, बल्कि विकास की कमी और वैचारिक भ्रम के कारण टिका हुआ था। शाह ने उन 'अर्बन नक्सल' समूहों को भी बेनकाब किया जो शहरों में बैठकर जंगलों में हिंसा फैलाने वालों के लिए वैचारिक कवच तैयार करते थे। गृह मंत्री का मानना है कि लोकतंत्र में हिंसा का कोई स्थान नहीं है, और यदि कोई समूह हथियार उठाकर संविधान को चुनौती देता है, तो उसे उसी की भाषा में जवाब देना राज्य का उत्तरदायित्व है। इसी सोच के तहत उन्होंने सुरक्षा बलों को वह 'फ्री हैंड' दिया, जिसकी मांग वे दशकों से कर रहे थे। आज सुरक्षा बल न केवल नक्सलियों के गढ़ों में घुसकर प्रहार कर रहे हैं, बल्कि उन दुर्गम इलाकों में भी तिरंगा फहरा रहे हैं जहाँ पहले जाना असंभव माना जाता था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maoists-will-no-longer-thrive-do-spare-a-thought-for-them-too" target="_blank">अब नहीं पनपेंगे माओवादी: जरा याद इन्हें भी कर लो</a></h3><div>पिछले कुछ वर्षों में, विशेष रूप से छत्तीसगढ़, ओडिशा और झारखंड के सीमावर्ती इलाकों में सैकड़ों नए सुरक्षा कैंप स्थापित किए गए हैं। इन कैंपों ने नक्सलियों की रसद, सूचना तंत्र और छिपने के ठिकानों को पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया है। अमित शाह ने व्यक्तिगत रूप से इन क्षेत्रों का दौरा कर जवानों का मनोबल बढ़ाया और उन्हें आधुनिक तकनीक, ड्रोन, सैटेलाइट इमेजरी और संचार के बेहतर साधनों से लैस किया। गृह मंत्री ने संसद में स्पष्ट किया था कि जब तक अंतिम नक्सली हथियार नहीं डाल देता या उसका सफाया नहीं हो जाता, तब तक सरकार चैन से नहीं बैठेगी। अमित शाह की रणनीति केवल सैन्य कार्यवाही तक सीमित नहीं रही है। उनके भाषणों का एक बड़ा हिस्सा 'विकास' को समर्पित रहा है। उनका तर्क है कि जहाँ सड़क पहुँचती है, वहाँ नक्सलवाद पीछे हट जाता है। इसी सोच के साथ उन्होंने सड़क संपर्क परियोजनाओं को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। हजारों किलोमीटर लंबी सड़कों का जाल उन इलाकों में बिछाया गया जहाँ कभी नक्सलियों का खौफ हुआ करता था। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी क्रांतिकारी बदलाव आए हैं। एकलव्य मॉडल स्कूलों के माध्यम से जनजातीय बच्चों को मुख्यधारा से जोड़ना और मोबाइल टावरों के जरिए डिजिटल इंडिया को घने जंगलों तक पहुँचाना शाह के 'सर्वांगीण विकास' मॉडल का हिस्सा है। जब एक आदिवासी युवक के हाथ में बंदूक के बजाय स्मार्टफोन और रोजगार के अवसर आए, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही ध्वस्त हो गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमित शाह ने बार-बार एक और महत्वपूर्ण बात कही है—'संवाद और पुनर्वास'। उन्होंने उन युवाओं के लिए हमेशा 'लाल कालीन' बिछाई है जो गुमराह होकर हिंसा की राह पर चले गए थे। सरकार की आत्मसमर्पण नीति को इतना आकर्षक और सुलभ बनाया गया कि हजारों नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। शाह ने अपने भाषणों में स्पष्ट संदेश दिया कि सरकार उन लोगों के प्रति सहानुभूति रखती है जो भटक गए हैं, लेकिन जो निर्दोषों की हत्या और विकास कार्यों में बाधा डालेंगे, उन्हें सुरक्षा बलों के लौह प्रहार का सामना करना पड़ेगा। यह 'कैरेट एंड स्टिक' (पुरस्कार और दंड) की नीति ही थी जिसने नक्सली संगठनों के भीतर दरार पैदा कर दी और उनके नेतृत्व को कमजोर कर दिया।</div><div><br></div><div>आज झारखंड का 'बूढ़ा पहाड़' हो या छत्तीसगढ़ का 'अबूझमाड़', इन क्षेत्रों की पहचान अब आतंक के बजाय प्रगति से होने लगी है। अमित शाह ने सुरक्षा बलों, राज्य सरकारों और खुफिया एजेंसियों के बीच जिस तरह का समन्वय स्थापित किया, वह प्रशासनिक कौशल का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। उन्होंने 'यूनिफाइड कमांड' के माध्यम से सूचनाओं के आदान-प्रदान को तेज किया, जिससे ऑपरेशन की सटीकता बढ़ी और सुरक्षा बलों के हताहत होने की दर में भारी कमी आई।&nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>अमित शाह का योगदान आधुनिक भारत के निर्माण में एक ऐसे सेनापति के रूप में देखा जाएगा जिसने देश की आंतरिक एकता को खंडित करने वाली सबसे बड़ी शक्ति को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। उनके नेतृत्व में भारत ने न केवल नक्सलियों को हराया है, बल्कि उन लाखों लोगों के मन में विश्वास जगाया है जो दशकों तक डर और अभाव के साये में जीने को मजबूर थे। आज का भारत अब 'लाल गलियारे' के अंत का जश्न मना रहा है और विकास के नए क्षितिज की ओर अग्रसर है, जहाँ गोलियों की जगह कलम होगी और भय की जगह स्वाभिमान होगा।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत भूषण अरजरिया,</div><div>प्रभारी मीडिया काउंसिल ऑफ इंडिया</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:41:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-end-of-the-red-corridor-shah-zero-tolerance-policy-scripts-a-new-chapter-in-security</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/17/amit-shah_large_1841_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[लीजिये अब Corporate Jihad आ गया! Nashik TCS Case और Amravati कांड ने मचाया देशभर में हड़कंप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-nashik-tcs-case-and-the-amravati-scandal-have-created-a-stir-across-the-country]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाराष्ट्र के नासिक और अमरावती में सामने आए हिंदू महिलाओं के धर्मांतरण और यौन शोषण से जुड़े मामलों ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इन घटनाओं ने न केवल कार्यस्थलों की सुरक्षा और महिलाओं की गरिमा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या संगठित तरीके से हिंदुओं को निशाना बनाया जा रहा है? अमरावती में सैंकड़ों लड़कियों के यौन शोषण को लव जिहाद का मामला बताया जा रहा है तो वहीं नासिक में टीसीएस के ऑफिस में हुए धर्मांतरण और यौन शोषण मामले को कॉर्पोरेट जिहाद की संज्ञा दी जा रही है। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तानी आतंकवादियों ने पर्यटकों को उनका धर्म पूछ कर मारा था और अब देश के विभिन्न हिस्सों से सामने आ रही घटनाएं दर्शा रही हैं कि धर्म के आधार पर निशाना बनाने की घटनाएं तेजी से बढ़ रही हैं और इसका सबसे आसान शिकार महिलाएं और लड़कियां बन रही हैं।</div><div><br></div><div>सबसे पहले नासिक से सामने आये घटनाक्रम की बात करें तो आपको बता दें कि एक प्रमुख आईटी कंपनी टीसीएस में काम करने वाली महिला कर्मचारियों द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों ने पूरे कॉर्पोरेट जगत में हलचल मचा दी है। कई महिला कर्मचारियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर यौन उत्पीड़न, मानसिक प्रताड़ना और धार्मिक दबाव बनाने जैसे आरोप लगाए हैं। इन शिकायतों के आधार पर पुलिस ने कई प्राथमिकी दर्ज की हैं और अब तक कई आरोपियों को गिरफ्तार किया जा चुका है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/fadnavis-major-action-in-nashik-tcs-casesays-it-a-serious-matter-the-culprits-will-not-be-spared" target="_blank">Nashik TCS केस में फडणवीस का बड़ा एक्शन, बोले- गंभीर मामला, दोषी बख्शे नहीं जाएंगे</a></h3><div>शिकायतों के अनुसार, यह घटनाएं पिछले दो से तीन वर्षों के दौरान हुईं। पीड़िताओं की उम्र लगभग अठारह से पच्चीस वर्ष के बीच बताई गई है। आरोप है कि कुछ टीम लीडर और कर्मचारी महिलाओं को नौकरी, वेतन वृद्धि या अन्य लाभ का लालच देकर उनका शोषण करते थे। पुलिस के अनुसार, इस मामले में दुष्कर्म, छेड़छाड़ और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने से जुड़े मामले दर्ज किए गए हैं। एक विशेष जांच दल का गठन किया गया है, जो तकनीकी और भौतिक साक्ष्यों के आधार पर जांच कर रहा है। इस बीच, कंपनी ने बयान जारी कर कहा है कि वह किसी भी प्रकार के उत्पीड़न के प्रति शून्य सहनशीलता की नीति अपनाती है और जांच पूरी होने तक आरोपित कर्मचारियों को निलंबित कर दिया गया है। हालांकि, यह सवाल भी उठ रहे हैं कि यदि पहले शिकायतें की गई थीं तो उन पर समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई?</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस मामले ने बीपीओ और केपीओ क्षेत्र के कार्य वातावरण पर भी गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं। कुछ कर्मचारियों ने दावा किया कि रात की शिफ्ट, कमजोर निगरानी और पद पर बैठे लोगों की शक्ति का दुरुपयोग ऐसे मामलों को बढ़ावा देता है। कुछ पीड़ितों का कहना है कि उन्हें बार बार व्यक्तिगत टिप्पणियों, अनुचित प्रस्तावों और दबाव का सामना करना पड़ा। कुछ मामलों में कथित तौर पर निजी तस्वीरों या वीडियो के माध्यम से ब्लैकमेल करने की भी बात सामने आई है। एक पुरुष कर्मचारी ने भी मानसिक दबाव और जबरदस्ती धार्मिक आचरण अपनाने के लिए मजबूर किए जाने का आरोप लगाया है। हालांकि इन दावों की पुष्टि जांच के बाद ही हो सकेगी, लेकिन यह स्पष्ट है कि कार्यस्थल की सुरक्षा, शिकायत निवारण प्रणाली और निगरानी तंत्र को लेकर गंभीर चिंताएं सामने आई हैं।</div><div><br></div><div>इसी बीच महाराष्ट्र के अमरावती जिले में एक और सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसमें एक 19 वर्षीय युवक पर कई युवतियों को बहला फुसलाकर उनके आपत्तिजनक वीडियो बनाने और उन्हें फैलाने का आरोप है। पुलिस के अनुसार, आरोपी युवतियों से दोस्ती करता था, उनका विश्वास जीतता था और फिर उन्हें निजी संबंधों में फंसाकर वीडियो रिकॉर्ड करता था। बाद में इन वीडियो का इस्तेमाल कथित तौर पर दबाव और ब्लैकमेल के लिए किया गया। आरोपी के पास से मोबाइल, लैपटॉप और अन्य डिजिटल उपकरण बरामद किए गए हैं, जिन्हें फोरेंसिक जांच के लिए भेजा गया है।</div><div><br></div><div>उधर, पुलिस सूत्रों के अनुसार, मुख्य आरोपी ने पूछताछ में स्वीकार किया कि वह सोशल मीडिया के माध्यम से युवतियों से संपर्क करता था और धीरे-धीरे उन्हें अपने प्रभाव में लेता था। उसका सोशल मीडिया पर सक्रिय होना और दिखावटी जीवनशैली भी इस प्रक्रिया में सहायक रही। जांच एजेंसियां अब यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही हैं कि क्या इस मामले में कोई संगठित नेटवर्क शामिल है या यह व्यक्तिगत स्तर का अपराध है।</div><div><br></div><div>इस बीच, दोनों मामलों ने राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर तीखी प्रतिक्रियाएं पैदा की हैं। कुछ नेताओं ने इन घटनाओं को कार्यस्थल सुरक्षा और कानून व्यवस्था की विफलता बताया है, जबकि अन्य ने इसे व्यापक सामाजिक समस्या के रूप में उठाया है। कई स्थानों पर विरोध प्रदर्शन भी हुए और आरोपियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की गई। वहीं इस मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर धर्मांतरण कराने वालों पर NSA-UAPA लगाने की मांग की है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नासिक और अमरावती के ये दोनों मामले इस बात की ओर संकेत करते हैं कि कार्यस्थलों और समाज में महिलाओं की सुरक्षा, डिजिटल अपराधों की रोकथाम और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई बेहद जरूरी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 17:46:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-nashik-tcs-case-and-the-amravati-scandal-have-created-a-stir-across-the-country</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/17/nashik-tcs-case_large_1746_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिहार में विकास सम्बन्धी चुनौतियों को अवसरों में बदलना होगा नए सम्राट को!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/new-emperor-must-transform-the-development-related-challenges-in-bihar-into-opportunities]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार के नए सम्राट को फूलों की सेज नहीं, बल्कि कांटों का ताज मिला है। चाहे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हों, या पूर्व मुख्यमंत्री दम्पत्ति लालू प्रसाद और राबड़ी देवी, कभी भी चैन पूर्वक राज नहीं कर सके। लिहाजा, मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी उन जातीय और साम्प्रदायिक चुनौतियों से जूझना होगा, जो बिहार के विकास में शुरू से ही बाधक समझी गई हैं। लेकिन जिस प्रकार से आधुनिक बिहार के निर्माता और प्रथम मुख्यमंत्री श्री कृष्ण सिन्हा को कांग्रेस के सहयोग से लंबे समय तक राज करते हुए जनसेवा का मौका मिला, वैसी ही मौजूदा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भाजपा के सहयोग से जनसेवा का मौका मिलेगा। उन्होंने कहा भी है कि पार्टी ने उन्हें पद नहीं, जनसेवा का अवसर दिया है, इसलिए विकास, सुशासन और समृद्धि उनके शासन का मूलमंत्र होगा।</div><div><br></div><div>बिहार के आर्थिक विश्लेषक बताते हैं कि बिहार के विकास में श्रीकृष्ण सिन्हा के बाद नीतीश कुमार ने एक बड़ी रेखा खींचने की कोशिश की, प्रगति नजर भी आई, लेकिन महाराष्ट्र, गुजरात, तमिलनाडु, कर्नाटक, आंध्रप्रदेश और हाल के वर्षों में उत्तरप्रदेश के विकास को देखा जाए तो अब भी बिहार के विकास में कई बड़ी बड़ी चुनौतियाँ बाकी हैं, जो आंकड़ों और राज्य की सामाजिक आर्थिक स्थिति को देखने पर साफ दिखती हैं। इसलिए भाजपा की सरकार के सुलझे हुए और समावेशी प्रवृति वाले मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को भी बिहार के समग्र विकास के लिए निम्नलिखित चुनौतियों से जूझना होगा। लेकिन अपने मृदु स्वभाव से वे एक एक करके इनसे पार पा जाएंगे, ऐसा मुझे दृढ़ विश्वास है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/possibility-of-development-in-bihar-now-the-power-belongs-to-the-emperor" target="_blank">बिहार में संभावनाएं विकास की: अब सत्ता सम्राट की</a></h3><h2>पहला, निर्धनता, रोज़गार और मानव पूंजी के नजरिए से विकास</h2><div><br></div><div>आंकड़े बताते हैं कि बिहार, भारत के सबसे कम आय वाले राज्यों में शुमार है, जहां गरीबी दर अभी भी काफ़ी ऊँची है और रोज़गार की गुणवत्ता कमज़ोर है। समझा जाता है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कम होने के कारण यहां की “मानव पूंजी” कमज़ोर है- साक्षरता और स्किल लेवल अभी भी देश के स्तर से काफी नीचे हैं, जिससे युवाओं को अच्छे रोज़गार के अवसर मिलने में दिक्कत होती है। ऐसे में यदि अपराध, जातीय सोच और सांप्रदायिक मिजाज को हतोत्साहित करके इन लक्ष्यों को पाया जा सकता है। इसके लिए अप्रवासी बिहारियों और बिहार मूल के एनआरआई को आकर्षित करने वाली योजनाओं को बनाना होगा और उनपर दृढ़तापूर्वक अमल करना होगा।</div><div><br></div><h2>दूसरा, कृषि पर अत्यधिक निर्भरता के चलते उत्पादकता&nbsp; बढ़ाने पर देना होगा ध्यान</h2><div><br></div><div>यद्यपि हार की आबादी का बड़ा हिस्सा अभी भी कृषि पर निर्भर है, लेकिन उत्पादकता और आय दोनों ही अपेक्षाकृत कम हैं। ऐसा इसलिए कि उत्तर बिहार 4 महीना बाढ़ से&nbsp; आक्रांत रहता है और तभी दक्षिण बिहार सूखा से जूझ रहा होता है। खेती और बागवानी यहां पर होती तो है, लेकिन भंडारण सुविधाएँ, बाढ़ प्रबंधन, सिंचाई व्यवस्था, जलवायु परिवर्तन और बारहमासी सिंचाई की सीमित पहुँच जैसे कारकों के कारण कृषि अभी भी बहुत जोखिम भरी और कम लाभ वाली काम साबित होती है। लिहाजा किसानों और मजदूरों के बच्चे परदेश कमाने चले जाते हैं और अपनी उद्यमिता से सबको सुख पहुंचाते हैं।</div><div><br></div><h2>तीसरा, औद्योगिक विकास और निवेश की दिक्कत सबसे बड़ी अड़चन</h2><div><br></div><div>बिहार में 26 साल पहले हुए राज्य विभाजन के बाद औद्योगिक आधार छोटा हुआ है, क्योंकि अधिकांश बड़े उद्योग-धंधे झारखंड के हिस्से में चले गए। ततपश्चात छोटे और कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प, कृषि आधारित उद्योग तकनीकी पिछड़ेपन और वित्तीय अभाव के कारण इनका समग्र विस्तार नहीं हो पा रहे हैं। इस स्थिति को बदलना होगा। इस कारण और निजी निवेश की दृष्टि से बिहार अभी भी “निवेश अनुकूल” राज्यों की पहली पंक्ति में नहीं है, बल्कि तेज़ी के साथ उद्योग बढ़ाने की चुनौती बरकरार है। ऐसे में भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व और राज्य नेतृत्व को चाहिए कि वह महाराष्ट्र और गुजरात की तर्ज पर बिहार-उत्तरप्रदेश में औद्योगिक विकास की गति तेज करे, क्योंकि इन दोनों राज्यों में औद्योगिक रफ्तार तेज होने से लुक ईस्ट की विदेश नीति को मजबूत आधार मिलेगा।</div><div><br></div><h2>चौथा, बुनियादी ढांचा और शहरीकरण में निवेश और विस्तार</h2><div><br></div><div>बिहार में सड़क नेटवर्क, बिजली, जल सुविधा, नालियाँ, जनस्वास्थ्य और शहरी बुनियादी ढांचा अभी भी प्रमुख रूप से कमज़ोर जगह बनी हुई हैं। चाहे स्थापित शहर हों या कस्बाई शहर, यहां शहरीकरण बहुत धीमी गति से हो रहा है, जिससे औद्योगिक सेवा अर्थव्यवस्था को उतना बल नहीं मिल पा रहा जितना दूसरे विकसित राज्यों में मिला है। इसलिए नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा, क्योंकि रोजगार के सृजन में इस क्षेत्र का बड़ा इगड6 होता है।</div><div><br></div><h2>पांचवां, जनस्वास्थ्य और सार्वजनिक सेवाएँ बेहतर करना</h2><div><br></div><div>बिहार के शहरी इलाकों की अपेक्षा ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य सेवाएँ बेहद कमज़ोर हैं- खासकर डॉक्टर आबादी अनुपात कम, स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या पर्याप्त नहीं है और कुपोषण जैसी समस्याएँ अभी भी गंभीरबनी हुई हैं। इसी तरह पीडीएस (PDS), राशन, योजनाओं के वितरण में धांधली, रिसाव और कार्यान्वयन की कमज़ोरी विकास के लाभों को गरीबों तक पहुँचने से रोकते हैं। इस स्थिति में अमूलचूल बदलाव लाना होगा, ताकि स्थिति बदले।</div><div><br></div><h2>छठा, शासन, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था पर कम ध्यान</h2><div><br></div><div>बिहारी में जब भी नेतृत्व परिवर्तन होता है तो शासन, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था में बदलाव की उम्मीदें बंधती हैं, लेकिन बाद में सबकुछ पुराने ढर्रे पर चलने लगता है। अब इस स्थिति को बदलना होगा। क्योंकि कई रिपोर्टों में बिहार को भ्रष्टाचार, निष्पक्ष नियोजन और प्रशासनिक दक्षता की दिक्कत से जूझता हुआ देखा गया है, जिससे बजट का अच्छे तरीके से उपयोग होना मुश्किल होता है। वहीं, कानून व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रियाओं में देरी निवेशक और नागरिक दोनों के लिए चिंता का मुद्दा है। इसलिए नए मुख्यमंत्री को इसे समझना होगा और विशेष टास्क फोर्स का गठन कर इस स्थिति को बदलना होगा। इसी में बिहार का हित निहित है।</div><div><br></div><h2>सातवां, क्षेत्रीय असमानता और जाति धर्म की संवेदनशील राजनीति&nbsp;&nbsp;</h2><div><br></div><div>अनुभव बताता है कि बिहार में अलग अलग जिलों के बीच विकास का अंतर बड़ा है; कुछ शहर आगे बढ़ रहे हैं तो बहुत से ग्रामीण और पिछड़े क्षेत्र विकास “समीक्षा चक्र” से बाहर रह जाते हैं। साथ ही, जाति आधारित राजनीति और आरक्षण संबंधी विवाद नीतियों को लंबे समय तक टिकाने और निष्पक्ष ढंग से लागू करने में बाधा बनते हैं। इसलिए सूझबूझ पूर्वक इन चुनौतियों को अवसर में बदलना होगा। इससे सबका हित सधेगा और बिहार विकास के नए कीर्तिमान खड़े करेगा। इस यश नए मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को मिलेगा। भाजपा को मिलेगी।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:17:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/new-emperor-must-transform-the-development-related-challenges-in-bihar-into-opportunities</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/16/samrat-choudhary_large_1217_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक, प्रशासनिक व राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-an-industrial-administrative-political-nexus-responsible-for-the-violent-labor-unrest-in-noida]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश के राजनेता भले ही चुनावों के दौरान दलित-महादलित-आदिवासी, ओबीसी-ईबीसी, अल्पसंख्यक-पसमांदा और गरीब सवर्ण आदि से जुड़े सामाजिक न्याय सम्बन्धी तरह-तरह की बातें करते हैं, ममनगढ़ंत आंकड़े गिनाते/बताते हैं, लेकिन उनकी नाक के नीचे श्रमजीवियों का अंतहीन शोषण होता रहता है, जिससे उनका मुंह फेरे रहना या फिर किसी बड़े आंदोलन के बाद सक्रिय होना उनके नेतृत्वकारी भूमिका पर सवाल उठाता है।</div><div><br></div><div>आमतौर पर प्रशासनिक अधिकारियों और उद्योगपतियों की मिलीभगत से किस कदर श्रमजीवी मजदूरों का शोषण अनवरत रूप से जारी रहता है और फिर एक दिन नोएडा मजदूर आंदोलन के शक्ल&nbsp; में फूट पड़ता है, इसका यह ताजा उदाहरण है। इसी प्रवृति से नई आर्थिक नीति विफलता के कगार पर खड़ी है। नीति निर्माण में नेताओं/नौकरशाहों ने जो पक्षपात दिखाया है, वह सभी समस्याओं की जड़ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida" target="_blank">Noida में क्यों हिंसक हुआ कर्मचारियों का प्रोटेस्ट, आंदोलन या साज़िश?</a></h3><div>यक्ष प्रश्न यह कि जिस देश में महंगी शिक्षा, महंगा स्वास्थ्य और खर्चीला शहरी जीवन का बोलबाला हो, वहां पर निजी क्षेत्र के असमान वेतन स्तर के लिए हमारे नीति निर्माता जिम्मेदार नहीं हैं तो कौन है, वही बताएं। विपक्ष का काम संसद में, विधान मंडल में इन्हीं पहलुओं पर तर्कसंगत बहस करना है, लेकिन वह भी नीतिगत नकारापन का शानदार नमूना बन चुका है। दिलचस्प तो यह कि पहले सत्ताधारी यूपीए के वक्त एनडीए विपक्ष में था और अब सत्ताधारी एनडीए के वक्त यूपीए/इंडिया गठबंधन विपक्ष में है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि दोनों पूंजीवादी गठबंधन हैं और अपने आर्थिक मोहपाश में जनोन्मुखी समाजवादी व वामपंथी सियासत को बांध चुके हैं, जिससे सबकुछ गड्डमड्ड हो चुका है। कहीं जातिवाद, कहीं क्षेत्रवाद और कहीं सम्प्रदायवाद के नाम पर परस्पर बंटी हुई जनता को अपनी मौलिक जरूरतों का एहसास ही नहीं है।</div><div><br></div><div>काबिलेगौर है कि शहरों/महानगरों या गांवों में जो आमतौर पर वेतन स्ट्रक्चर होता है, उससे कोई युवा या वयस्क अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों का सम्यक निर्वहन कर सकता है क्या? जवाब होगा- संभव नहीं! कोढ़ में खाज यह कि तरह तरह के मित्रों- शिक्षा मित्र, स्वास्थ्य मित्र आदि के मार्फ़त सरकारी क्षेत्र भी इन्हीं पूंजीवादी मानसिकता को तरजीह देता आया है, जिस पर उदार हृदय से बहस करने और भारतीयों के जीवन स्तर को सुधारने की जरूरत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सवाल है कि जिन शहरों में फ्लैट्स या जमीन की कृत्रिम कीमतें आसमान छूती हों, वहां के दिहाड़ी मजदूरों की मजदूरी, अंशकालिक/पूर्णकालिक श्रमिकों के वेतनमान, और भारतीय कानूनों से अधिकारियों/उद्योगपतियों के खिलवाड़ से पूरी श्रम व्यवस्था विस्फोटक कगार पर खड़ी है। शहरों में बढ़ता झुग्गी-झोपड़ी कल्चर किसी नैतिक महामारी जैसा प्रतीत होता है।</div><div><br></div><div>सुलगता सवाल है कि निजी क्षेत्र में कितने लोगों को नियुक्ति पत्र, पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी, सामूहिक स्वास्थ्य बीमा, जीवन बीमा और पेंशन आदि की सुविधाएं निजी कम्पनियों में मिलती है। प्रोपर्टी इंडस्ट्री की तरह आधा ब्लैक सैलरी और आधा व्हाइट सैलरी वाली आंखों में धूल झोंकने वाली व्यवस्था से खुफिया तंत्र अनजान क्यों है? सरकारी क्षेत्रों की तरह आवासीय सुविधाओं से निजी क्षेत्र के श्रमिकों को वंचित क्यों रखा जाता है? नौकरी बाजार में श्रम ठेकेदार पैदा करने से किसके हित सधते हैं? सवाल अनेक हैं, लेकिन उत्तर एक- राजनीतिक, प्रशासनिक और औद्योगिक सांठगांठ से जारी नीतिगत भ्रष्टाचार एक लाइलाज बीमारी है, जो किसी बड़ी जनक्रांति के बाद ही करवट लेगी।</div><div><br></div><div>जरा कल्पना कीजिए कि जब नरेंद्रमोदी सरकार और योगी आदित्यनाथ की सरकार में ऐसी मजदूर विरोधी परिस्थिति है तो पूर्व की सरकारों में कैसा जंगलराज रहा होगा, विचारणीय पहलू है। मजदूर शोषण कांड की एसआईटी और न्यायिक जांच होनी चाहिए, क्योंकि आम भारतीयों के भविष्य के साथ एफडीआई आकर्षित करने के चक्कर में घोर अन्याय हो रहा है, जिससे बचे जाने की जरूरत है।</div><div><br></div><div>अब नोएडा में मजदूरों के हिंसक आंदोलन के राजनीतिक निहितार्थ की बात करते हैं। चूंकि नोएडा में मजदूरों का हिंसक आंदोलन वेतन वृद्धि की मांग पर केंद्रित है, जो हरियाणा की 35% न्यूनतम मजदूरी बढ़ोतरी से प्रेरित है। लिहाजा, योगी सरकार को तुरंत इसे लागू करना चाहिए। बताया गया कि यह प्रदर्शन फेज-2 होजरी कॉम्प्लेक्स से शुरू होकर पूरे नोएडा में फैल गया, जहां पेशेवर विपक्षी आंदोलनों के तर्ज ओर तोड़फोड़ और आगजनी हुई।</div><div><br></div><div>आंदोलन के पृष्ठभूमि की यदि बात की जाए तो मजदूर न्यूनतम वेतन 20,000 रुपये तक बढ़ाने, बोनस और ओवरटाइम भत्ते की मांग कर रहे हैं। चूंकि हरियाणा से जुड़े एक फैसले ने उत्तर प्रदेश के मजदूरों में असंतोष पैदा किया, क्योंकि यहां अनस्किल्ड वर्कर को 15,000 से कम वेतन मिलता है। यही वजह है कि योगी सरकार ने संवाद के लिए हाई लेवल कमेटी गठित की है और अविलंब इसके निर्णयों को लागू करने की जरूरत है।</div><div><br></div><div>जहां तक राजनीतिक प्रतिक्रियाएं की बात है तो योगी सरकार ने आंदोलन को साजिश, नक्सलवाद या राजनीतिक हाथ बताया, जिससे सहमत होना मुश्किल है, लेकिन आंदोलन के हिंसक होने के दृष्टिगत मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गलत भी नहीं हैं। वहीं, यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री और सपा मुखिया अखिलेश यादव ने भाजपा की 'पूंजीपति पक्षधर' नीति को जिम्मेदार ठहराया और मजदूर शोषण का आरोप लगाया, जो अतिरेक है। चूंकि कांग्रेस और सपा ने सरकार की आलोचना की, इसलिए केंद्र भी सतर्क है।</div><div><br></div><div>इस अप्रत्याशित आंदोलन का प्रमुख निहितार्थ यह है कि यह आंदोलन श्रम नीतियों पर बहस तेज कर सकता है, क्योंकि पड़ोसी राज्यों के फैसलों से अंतरराज्यीय दबाव बढ़ा रहा है। एक तरफ जहां विपक्ष को मजदूर वोट बैंक मजबूत करने का मौका मिला, वहीं दूसरी तरफ भाजपा को कानून-व्यवस्था पर खुद को साबित करने की चुनौती बढ़ी।दिल्ली-एनसीआर में इसके फैलाव का खतरा है, जो आगामी चुनावों में यदि बड़ा मुद्दा बना तो सत्ताधारी भाजपा के लिए 2027 के राज्य विधानसभा चुनाव और 2029 के आम चुनाव में राजनीतिक मुश्किलों का कारण बन सकता है। इसलिए पार्टी के रणनीतिकार समय रहते ही सचेत हो जाएं। इसी में राजनीतिक बुद्धिमानी होगी।</div><div><br></div><div>यह कोरा सच है कि नोएडा मजदूर हिंसक आंदोलन के लिए औद्योगिक-प्रशासनिक-राजनीतिक सांठगांठ जिम्मेदार है। नोएडा मजदूर आंदोलन 2027 यूपी विधानसभा चुनावों पर अप्रत्यक्ष प्रभाव डाल सकता है, क्योंकि यह श्रमिक असंतोष को विपक्ष के लिए बड़ा मुद्दा बना रहा है। हालांकि अभी ताजा घटना होने से विश्लेषण अनुमानित हैं, लेकिन राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हो रहा है। इससे विपक्ष को लाभ मिलता प्रतीत हो रहा है, क्योंकि अखिलेश यादव ने इसे भाजपा की 'पूंजीपति नीति' बताकर मजदूरों का समर्थन किया, जो पीडीए (PDA) यानी पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक वोट बैंक को मजबूत कर सकता है। इस मामले में कांग्रेस ने भी सरकार को जिम्मेदार ठहराया, और विपक्षी एकता का संकेत दिया। नोएडा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिक वोट (गौतमबुद्धनगर सीटें) प्रभावित हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>इससे भाजपा की जमीनी चुनौती बढ़ेगी और हिंदुत्व दम तोड़ देगा, इसलिए योगी सरकार ने वेतन, ओवरटाइम सम्बन्धी निर्देश देकर क्षतिपूर्ति की कोशिश की, लेकिन इसे 'साजिश' बताकर विपक्ष को और हवा मिली। कानून-व्यवस्था का सवाल उठा, जो भाजपा के 'मजबूत सरकार' वाले नैरेटिव को कमजोर करता है। इससे दिल्ली-एनसीआर में आंदोलन के फैलाव से पश्चिम यूपी की सीटें जोखिम में पड़ सकती हैं। वहीं, श्रम मुद्दा, बढ़ती महंगाई-बेरोजगारी से जुड़कर 2027 में प्रमुख हो सकता है, खासकर ग्रेटर नोएडा-जेवर जैसे क्षेत्रों में। इसलिए यदि समाधान न हुआ तो विपक्ष मजबूत, वरना भाजपा इसे 'विकास' के पक्ष में पलट सकती है। कुल मिलाकर, नोएडा रणभूमि बन चुका है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 19:00:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/is-an-industrial-administrative-political-nexus-responsible-for-the-violent-labor-unrest-in-noida</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/15/noida-factory-workers-protest_large_1900_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल में आक्रामक हुआ चुनाव प्रचार, जारी हुआ भाजपा संकल्प पत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/election-campaign-intensifies-in-bengal-bjp-manifesto-released]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असम, केरल व पुद्दुचेरी में विधानसभा चुनाव हेतु मतदान संपन्न हो जाने के बाद पश्चिम बंगाल व तमिलनाडु के चुनाव प्रचार मे आक्रामकता आ गई है। बंगाल के सन्दर्भ में प्राप्त विश्लेषणों के अनुसार ऐसा लग रहा है कि इन चुनावों में बंगाल में मात्र दो प्रतिशत मतों के अंतर से ही सरकार बनने का खेल होने वाला है। सत्ता के लिए प्रमुख लड़ाई चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए प्रयासरत ममता बनर्जी तथा भारतीय जनता पार्टी के बीच ही है और यही दोनों आक्रामक रूप से चुनाव प्रचार भी कर रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी ने पहले ममता सरकार के खिलाफ श्वेत पत्र जारी किया फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीन विशाल जनसभाओं के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा का संकल्प पत्र जारी किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस बीच बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी व उनकी पार्टी के कुछ नेताओं ने बीजेपी की बढ़ती लोकप्रियता से घबराकर हिंसा को बढ़ावा देने वाली बयानबाजी आरम्भ कर दी। अभिषेक बनर्जी तो अपनी रैली में सीधे तौर पर भाजपा के कार्यकर्ताओं की गर्दन, हाथ, पैर तोड़ने तक की बात कह रहे हैं। इसके लिए उनके खिलाफ चुनाव आयोग की ओर से एफआईआर भी की गई है। बंगाल की मुख्यमंत्री ने स्वयं चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है और लगातार कोर्ट में अभियान चला रही हैं। बंगाल की मतदाता सूची से लगभग 91 लाख मतदाताओं के नाम कट जाने से वह अधिक परेशान हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/supreme-court-strict-remarks-in-west-bengal-voter-list-case" target="_blank">चुनावी रंग में अंधे नहीं हो सकते, West Bengal Voter List मामले पर Supreme Court की सख्त टिप्पणी</a></h3><div>भाजपा भी इस बार सरकार बनाने के लिए लड़ रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी हल्दिया, आसनसोल व सिउड़ी में विशाल जनसभाओं में बंगाल की जनता को छह गारंटियां दीं जिनको भाजपा के संकल्प पत्र में दोहरा कर मजबूत किया गया। इन जनसभाओं में प्रधानमंत्री मोदी ने जहाँ एक ओर विकास और सुशासन का एजेंडा सामने रखा वहीं दूसरी ओेर टीएमसी सरकार पर चौतरफा प्रहार किया। प्रधानमंत्री ने कहा कि सरकार बनने के बाद सबका साथ सबका विकास तो होगा ही लेकिन जिन लोगों ने लूटा है, उन लुटेरों का हिसाब भी होगा। उन्होंने ममता सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि विगत 15 वर्षों में राज्य में सिंडीकेट, कट मनी और गुंडाराज का बोलबाला रहा है जिससे आम जनता का विश्वास टूटा है। भाजपा सरकार आने पर&nbsp; भय की जगह भरोसा कायम किया जायेगा। भ्रष्टाचार करने वालों को जेल भेजेंगे। सरकारी सिस्टम जनता के लिए जवाबदेह होगा। हर घोटाले, भ्रष्टाचार ओर बहन बेटियों के साथ हुए अन्याय की फाइलें, खुलेंगी। घुसपैठियों को खोज खोजकर खदेड़ा जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की विशाल जनसभाओं के बाद गृहमंत्री अमित शाह ने भाजपा का संकल्प पत्र जारी किया है जिसमें कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की गयी हैं। बंगाल में कोलकाता के भाजपा कार्यालय में एक विशाल वंदेमातरम संग्रहालय बनाया जाएगा। गृहमंत्री ने कहा कि हम वंदे मातरम की परिकल्पना के माध्यम से बंगाल की संस्कृति को वैश्विक मंच पर प्रदर्शित करेंगे। अभी वंदेमातरम की 150 वीं जयंती पर संसद में विशेष सत्र का आयोजन हो चुका है तथा साथ ही अब सरकारी आयोजनों में संपूर्ण वंदेमातरम गायन अनिवार्य किया जा चुका है। बंगाल की दृष्टि से वंदेमातरम संग्रहालय की स्थापना एक महत्वपूर्ण घोषणा है।</div><div>&nbsp;</div><div>सिंगूर को लेकर घोषणा- भारतीय जनता पार्टी ने अपने संकल्प पत्र में दूसरी बड़ी घोषणा सिंगूर को लेकर की है जिसमें भाजपा ने सरकार बनने के बाद वहां एक औद्योगिक पार्क बनाने का संकल्प किया है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सिंगूर से अपनी राजनैतिक जमीन बनाने की शुरुआत की थी। पश्चिम बंगाल का सिंगूर विवाद भारत के औद्योगिक और राजनीतिक इतिहास की एक महत्वपूर्ण घटना रही है। सिंगूर विवाद वर्ष 2006 में शुरू हुआ था जब तत्कालीन वामपंथी सरकार ने हुगली जिले के सिंगूर में टाटा मोटर्स को नैनो कार बनाने के लिए करीब 997 एकड़ जमीन दी। सरकार ने यह जमीन पुराने भूमि अधिग्रहण कानून के अंतर्गत ली थी किंतु सरकार ने निर्णय का कुछ स्थानीय किसान संगठनों ने विरोध किया था तब ममता बनर्जी किसानों के समर्थन में आ गई और मां, माटी और मानुष का नारा दिया। आज बंगाल मे सभी कल कारखाने बंद हो चुके हैं और भारी बेरोजगारी है। यही कारण है कि भाजपा ने अब सिंगूर में ही औद्योगिक पार्क बनवाने का संकल्प लिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>संकल्प पत्र में राज्य में कानून व्यवस्था सुधारने और विकास को गति देने को भाजपा का लक्ष्य बताया गया है। भाजपा ने अपने घोषणापत्र में महिलाओं, युवाओं, किसानों, बुजुर्गों एवं व्यापारियों के लिए घोषणा की है। भाजपा के संकल्प पत्र में बंगाल मे राजनीतिक हिंसा की जांच के लिए उच्चतम न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के नेतृत्व में एक विशेष आयोग बनाया जाएगा और सभी मामलों की जांच कर दोषियों को सजा दिलाई जाएगी। साथ ही कानून व्यवस्था की स्थिति पर श्वेत पत्र जारी किया जाएगा। इसके अलावा घुसपैठियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाते हुए डिटेक्ट, डिलीट और डिपोर्ट नीति लागू की जाएगी। कर्मचारियों के लिए महंगाई भत्ता लागू किया जाएगा। महिलाओं को हर महीने 3000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाएगी। आयुष्मान भारत सहित केंद्र सरकार की सभी योजनाएं बंगाल में लागू की जाएंगी। भाजपा ने बंगाल में भी समान नागरिक संहिता लागू&nbsp; करने का संकल्प लिया है और युवाओं को एक करोड़ रोजगार देने का वादा भी किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भाजपा वर्ष 2026 में बंगाल से ममता सरकार की विदाई तय करने के लिए सतर्कता के साथ कड़ी मेहनत कर रही है। बंगाल के विश्लेषकों का मत है कि बंगाल में ममता दीदी का दुर्ग भेदना अभी भी बहुत कठिन है क्योंकि चुनावी हिंसा बहुत अधिक होती है लेकिन इस बार चुनाव आयोग भी बहुत सख्त है अतः परिस्थिति बदल सकती है। इस बार चुनावों के बाद भी दो माह तक बंगाल में केंद्रीय बल तैनात रहेंगे। विश्लेषकों कहना है कि यदि इस बार बंगाल चुनाव बिना किसी हिंसा के संपन्न हो जाते हैं तो भाजपा सरकार बनने की सम्भावना भी बन सकती है।</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 15:01:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/election-campaign-intensifies-in-bengal-bjp-manifesto-released</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/13/amit-shah_large_1501_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Veerappan की पत्नी और बेटी को चुनाव मैदान में जनता का मिल रहा समर्थन, Tamilnadu में नई सियासी हलचल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/veerappans-wife-and-daughter-are-receiving-public-support-in-the-election-field]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु के सलेम क्षेत्र में एक दिलचस्प राजनीतिक बदलाव देखने को मिल रहा है। लगभग दो दशक पहले जिस नाम से जंगलों में भय का माहौल बन जाता था, उसी वीरप्पन की विरासत को अब उसकी बेटी और पत्नी नए रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रही हैं। कभी एक खतरनाक जंगली डाकू के रूप में पहचाने जाने वाले वीरप्पन की छवि को अब लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से एक अलग दिशा देने का प्रयास हो रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि वीरप्पन की बड़ी बेटी विद्यारानी, जो पेशे से वकील हैं, वह इस बार मेट्टूर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में हैं। वह नाम तमिलर काची नामक पार्टी की उम्मीदवार के रूप में अपनी किस्मत आजमा रही हैं। यह उनका दूसरा चुनाव है, इससे पहले उन्होंने 2024 के लोकसभा चुनाव में कृष्णगिरि से चुनाव लड़ा था और एक लाख से अधिक मत हासिल किए थे। दूसरी ओर, उनकी मां मुथुलक्ष्मी कृष्णगिरि सीट से तमिलगा वलवुरिमै काची पार्टी की उम्मीदवार हैं। हम आपको बता दें कि यह दोनों ही दल तमिल पहचान और तमिल राष्ट्रवाद को अपने राजनीतिक आधार के रूप में प्रस्तुत करते हैं।</div><div><br></div><div>विद्यारानी का कहना है कि यदि उनके पिता आज जीवित होते तो वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनते। वह अपने भाषणों में वीरप्पन की छवि को एक ऐसे व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करती हैं जिसने शोषण और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। मेट्टूर में एक जनसभा के दौरान उन्होंने कहा कि उनके पिता को जिस तरह से खतरनाक अपराधी के रूप में दिखाया गया, वह पूरी सच्चाई नहीं है। उनके इस बयान को खासकर युवाओं के बीच अच्छा समर्थन मिल रहा है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ranveer-singh-suddenly-reached-nagpur-and-met-mohan-bhagwat-at-the-rss-office" target="_blank">Ranveer Singh ने अचानक नागपुर पहुँच कर RSS Office में Mohan Bhagwat से की मुलाकात, सोशल मीडिया पर मचा बवाल</a></h3><div><br></div><div>नाम तमिलर काची के प्रमुख सीमैन भी विद्यारानी के समर्थन में खुलकर सामने आए हैं। उन्होंने वीरप्पन की तुलना एक ऐसे रक्षक से की जो जंगलों और तमिल समाज की रक्षा करता था। इस तरह के बयान यह संकेत देते हैं कि यह चुनाव केवल स्थानीय मुद्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पहचान और इतिहास की व्याख्या भी शामिल है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि विद्यारानी की राजनीतिक यात्रा भी काफी उतार-चढ़ाव भरी रही है। उन्होंने अपने कॅरियर की शुरुआत पट्टाली मक्कल काची से की थी, जो वन्नियार समुदाय में मजबूत पकड़ रखने वाली पार्टी मानी जाती है। बाद में वह 2020 में भारतीय जनता पार्टी में शामिल हुईं और फिर 2024 में नाम तमिलर काची का दामन थाम लिया। इस बदलाव से यह भी स्पष्ट होता है कि वह अपने लिए एक ऐसी राजनीतिक जमीन तलाश रही हैं जहां उनकी पहचान और विचारधारा को ज्यादा जगह मिल सके।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, वीरप्पन की पत्नी मुथुलक्ष्मी अपने चुनाव प्रचार में किसानों के मुद्दों पर खास जोर दे रही हैं। उनका कहना है कि उन्होंने किसानों के बीच रहकर उनकी समस्याओं को करीब से समझा है। वह पानी, फसल और किसानों की गरिमा के सवाल को अपने चुनावी अभियान का मुख्य मुद्दा बना रही हैं। उनका यह रुख ग्रामीण मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात यह है कि दोनों ही महिलाएं अपने अतीत को छिपाने के बजाय उसे खुले तौर पर स्वीकार कर रही हैं। उनका कहना है कि उन्हें लोगों से किसी तरह का विरोध नहीं झेलना पड़ रहा, बल्कि उन्हें सम्मान मिल रहा है। यह बात इस ओर इशारा करती है कि समय के साथ लोगों की सोच में भी बदलाव आया है और अब वह पुराने घटनाक्रमों को नए नजरिए से देखने लगे हैं।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन दोनों की उम्मीदवारी का असर खास तौर पर पट्टाली मक्कल काची पर पड़ सकता है, जो अन्नाद्रमुक की सहयोगी पार्टी है। मेट्टूर और कृष्णगिरि क्षेत्र में वन्नियार समुदाय का प्रभाव काफी ज्यादा है और यह माना जा रहा है कि विद्यारानी और मुथुलक्ष्मी इस समुदाय के मतों में सेंध लगा सकती हैं। हालांकि दोनों उम्मीदवार अपने अभियान में जाति को सीधे तौर पर मुद्दा नहीं बना रही हैं, फिर भी सामाजिक समीकरणों पर इसका असर पड़ना तय माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह चुनाव केवल सत्ता की लड़ाई नहीं बल्कि छवि, विरासत और पहचान की नई परिभाषा गढ़ने की कोशिश भी है। वीरप्पन की कहानी को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करने का यह प्रयास तमिलनाडु की राजनीति में एक अनोखा अध्याय जोड़ रहा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि मतदाता इस नई कथा को कितना स्वीकार करते हैं और इसका चुनाव परिणामों पर क्या असर पड़ता है?</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 13:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/veerappans-wife-and-daughter-are-receiving-public-support-in-the-election-field</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/11/veerappan_large_1438_24.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विधानसभा चुनावों में लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा और सत्ता के नए समीकरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/assembly-elections-democracy-trial-by-fire-and-new-equations-of-power]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनावों ने देश की राजनीति को उबाल पर ला दिया है। केरल से लेकर असम, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केंद्र शासित प्रदेश पुदुचेरी तक सियासी हलचल अपने चरम पर है। रैलियों की गूंज, वादों की बरसात और आरोप-प्रत्यारोप के तीखे तीरों के बीच लोकतंत्र का यह उत्सव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। हर राजनीतिक दल अपने-अपने एजेंडे, घोषणापत्र और रणनीति के साथ मैदान में है और मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए हरसंभव प्रयास कर रहा है। इस बार का चुनाव केवल सरकार बनाने का साधन नहीं बल्कि बीते पांच वर्षों के कामकाज का जनमत संग्रह और आने वाले राजनीतिक भविष्य की दिशा तय करने वाला निर्णायक क्षण है।</div><div><br></div><div>इन पांच राज्यों की कुल 824 विधानसभा सीटों पर लगभग 17.4 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे। यह केवल आंकड़ों का खेल नहीं बल्कि 116 लोकसभा सीटों के प्रभाव क्षेत्र से जुड़ा हुआ वह राजनीतिक रणक्षेत्र है, जो राष्ट्रीय राजनीति की धुरी को प्रभावित कर सकता है। चुनाव कार्यक्रम भी बेहद दिलचस्प है, असम, केरल और पुदुचेरी में 9 अप्रैल को मतदान होगा, तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और पश्चिम बंगाल में दो चरणों (23 और 29 अप्रैल) में वोट डाले जाएंगे। नतीजे 4 मई को घोषित होंगे और उसी दिन यह स्पष्ट हो जाएगा कि जनता ने किसके पक्ष में अपना विश्वास व्यक्त किया। इस बार का चुनावी परिदृश्य कई स्तरों पर जटिल और बहुआयामी है। सत्ताधारी दल जहां अपने विकास कार्यों, कल्याणकारी योजनाओं और ‘डबल इंजन’ जैसे नारों के सहारे जनता तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं, वहीं विपक्ष बेरोजगारी, महंगाई, सामाजिक असमानता और प्रशासनिक खामियों को मुद्दा बनाकर आक्रामक रुख अपनाए हुए है। यह संघर्ष अब केवल सत्ता का नहीं रहा बल्कि विचारधारा, नीतियों और विकास के मॉडलों की प्रतिस्पर्धा में बदल चुका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/rising-anarchy-in-west-bengal-a-challenge-to-democracy" target="_blank">पश्चिम बंगाल में बढ़ती अराजकता लोकतंत्र के लिए चुनौती</a></h3><div>सबसे अधिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है पश्चिम बंगाल, जहां राजनीतिक तापमान सबसे ज्यादा है। 294 सीटों वाली विधानसभा में 6.44 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का उपयोग करेंगे। पिछले चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने प्रचंड बहुमत हासिल कर सत्ता पर कब्जा बनाए रखा था जबकि भाजपा ने मुख्य विपक्षी दल के रूप में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई थी। इस बार मुकाबला और अधिक तीखा हो गया है। तृणमूल कांग्रेस अपने ‘बंगाल मॉडल’, महिला सशक्तिकरण योजनाओं और क्षेत्रीय अस्मिता के मुद्दों के साथ मैदान में है, वहीं भाजपा ‘डबल इंजन’ सरकार के वादे और घुसपैठ जैसे मुद्दों को प्रमुखता दे रही है। रोजगार, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक पारदर्शिता जैसे मुद्दे भी चुनावी विमर्श के केंद्र में हैं। विश्लेषकों का मानना है कि यहां मुकाबला बेहद कांटे का होगा, एक तरफ ममता बनर्जी की राजनीतिक विरासत दांव पर है तो दूसरी ओर भाजपा के लिए यह पूर्वी भारत में विस्तार का सुनहरा अवसर है।</div><div><br></div><div>असम का चुनाव भी कम दिलचस्प नहीं है। 126 सीटों वाली विधानसभा में 2.25 करोड़ मतदाता निर्णायक भूमिका निभाएंगे। यहां मुख्य सवाल यही है कि क्या भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी कर पाएगी या कांग्रेस और उसके सहयोगी दल वापसी का रास्ता तैयार करेंगे। मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व में भाजपा विकास, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा के मुद्दों को लेकर जनता के बीच है। वहीं विपक्ष सीएए-एनआरसी, बेरोजगारी और क्षेत्रीय पहचान जैसे मुद्दों को उठाकर सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। राष्ट्रीय स्तर के नेताओं की सक्रियता ने इस चुनाव को और अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है। असम में परिणाम न केवल राज्य की राजनीति बल्कि पूर्वोत्तर भारत में शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करेंगे।</div><div><br></div><div>दक्षिण भारत में तमिलनाडु और केरल की राजनीति अपनी विशिष्ट पहचान रखती है। तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का प्रभाव इतना गहरा है कि राष्ट्रीय दलों की भूमिका सीमित हो जाती है। 234 सीटों वाली विधानसभा में 5.67 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। पिछले चुनाव में डीएमके गठबंधन ने सत्ता हासिल की थी और इस बार भी वह अपने ‘द्रविड़ मॉडल’, सामाजिक न्याय और कल्याणकारी योजनाओं के दम पर मैदान में है। वहीं एआईएडीएमके गठबंधन महंगाई, बिजली संकट और स्थानीय मुद्दों को लेकर सरकार पर हमला बोल रहा है। इसके अलावा अभिनेता विजय की पार्टी का चुनावी मैदान में उतरना एक नया समीकरण बना सकता है, खासकर युवा मतदाताओं के बीच।</div><div><br></div><div>केरल में 140 सीटों के लिए 2.7 करोड़ मतदाता मतदान करेंगे। यहां का चुनाव पारंपरिक रूप से सत्ता परिवर्तन के लिए जाना जाता रहा है लेकिन पिछले चुनाव में वाम मोर्चे ने लगातार दूसरी बार जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया था। इस बार यदि वह तीसरी बार सत्ता में आता है तो यह एक नया राजनीतिक अध्याय होगा। वाम मोर्चा अपने स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक कल्याण के मॉडल को प्रमुखता दे रहा है जबकि कांग्रेस नेतृत्व वाला यूडीएफ महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के मुद्दों को लेकर हमलावर है। भाजपा भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय होता जा रहा है।</div><div><br></div><div>पुदुचेरी भले ही छोटा केंद्र शासित प्रदेश हो, लेकिन यहां की राजनीति बेहद संवेदनशील और निर्णायक है। 30 सीटों वाली विधानसभा में 9.44 लाख मतदाता मतदान करेंगे। यहां गठबंधन राजनीति का महत्व सबसे अधिक है, जहां छोटे-छोटे वोट अंतर भी सत्ता की दिशा तय कर सकते हैं। पिछले चुनाव में एनडीए गठबंधन ने सत्ता हासिल की थी और इस बार भी वह अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश में है, जबकि कांग्रेस और क्षेत्रीय दल सत्ता वापसी के लिए संघर्षरत हैं। इन सभी राज्यों में एक समान बात यह है कि वोट प्रतिशत और सीटों का समीकरण हमेशा सीधा नहीं होता। कई बार मामूली वोट अंतर भी भारी सीट अंतर में बदल जाता है। यही कारण है कि राजनीतिक दल बूथ स्तर तक अपनी रणनीति को मजबूत कर रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल प्रचार ने चुनावी अभियान को एक नई दिशा दी है, जहां नैरेटिव की लड़ाई केवल मैदान में नहीं बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर भी लड़ी जा रही है।</div><div><br></div><div>चुनावी मुद्दों की बात करें तो इस बार कोई एक मुद्दा हावी नहीं है। रोजगार, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि संकट और महिला सशक्तिकरण जैसे मुद्दे अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग रूप में सामने आ रहे हैं। यही विविधता इन चुनावों को और अधिक जटिल और रोचक बनाती है। राजनीतिक दृष्टि से इन चुनावों को 2029 के लोकसभा चुनाव का सेमीफाइनल भी माना जा रहा है। इन राज्यों से आने वाली 116 लोकसभा सीटें राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभाती हैं। यदि भाजपा असम में अपनी पकड़ बनाए रखती है, पश्चिम बंगाल में बेहतर प्रदर्शन करती है और दक्षिण भारत में अपनी उपस्थिति मजबूत करती है, तो उसकी राष्ट्रीय स्थिति और सुदृढ़ हो सकती है। वहीं, यदि तृणमूल कांग्रेस बंगाल में अपनी सत्ता बरकरार रखती है तो ममता बनर्जी विपक्षी राजनीति की प्रमुख धुरी बनी रह सकती हैं। केरल में वाम मोर्चे की जीत वामपंथी राजनीति के लिए नई ऊर्जा लेकर आएगी जबकि तमिलनाडु में डीएमके की निरंतरता द्रविड़ राजनीति की दिशा तय करेगी।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, यह चुनाव केवल राजनीतिक दलों के बीच मुकाबला नहीं बल्कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी परीक्षा है। मतदाता इस बार खामोश जरूर हैं लेकिन उनकी चुप्पी के भीतर गहराई से सोच-विचार और निर्णय की प्रक्रिया चल रही है। 4 मई को जब परिणाम सामने आएंगे, तभी यह स्पष्ट होगा कि किसने जनता की अपेक्षाओं को समझा और किसे आत्ममंथन की आवश्यकता है। लोकतंत्र का यह महापर्व एक बार फिर यह सिद्ध करने जा रहा है कि अंतिम निर्णय जनता के हाथ में होता है और वही निर्णय देश की राजनीति की दिशा और दशा तय करता है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 12:20:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/assembly-elections-democracy-trial-by-fire-and-new-equations-of-power</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/9/assembly-elections_large_1220_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अफसरों के नाकारापन से नहीं थमेंगे नालंदा मंदिर जैसे हादसे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tragedies-like-the-nalanda-temple-incident-will-not-cease-due-to-the-incompetence-of-officials]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सरकारी मशीनरी के नाकारा होने के कारण देश में धार्मिक आयोजनों में भगदड़ जैसे हादसे रुक नहीं रहे हैं। हादसों ऐसी श्रृंखला में नालंदा मंदिर का हादसा भी जुड़ गया है। नालंदा के शीतला माता मंदिर में पूजा करने के दौरान भगदड़ मच गई और इसमें 9 लोगों की जान चली गई। आठ महिलाओं की भीड़ में दबने से मौके पर ही मौत हो गई थी, जबकि एक पुरुष ने अस्पताल में दम तोड़ा। चैत्र महीने के आखिरी मंगलवार को शीतला अष्टमी के मौके पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस मंदिर में पहुंचे थे। वहां मेला भी लगा था। इसी दिन राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू आज मंगलवार को नालंदा यूनिवर्सिटी के दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति शामिल हुईं।&nbsp;</div><div><br></div><div>दीक्षांत समारोह में राष्ट्रपति ने कई देशों के छात्रों को डिग्री व मेधावी छात्रों को स्वर्ण पदक प्रदान दिया गया। राष्ट्रपति की यात्रा की सुरक्षा में 8 जिलों के 2500 जवानों को लगाया गया था, जबकि मंदिर में जुटी 10 हजार की भीड़ के लिए एक भी पुलिस वाले की तैनाती नहीं थी। यह हालत है देश में जिम्मेदार मानी जाने वाली चुनी हुई सरकारों की। अधिकारी इस बात का आकलन ही नहीं कर सके कि इतने बड़े आयोजन में कोई हादसा भी हो सकता है। इसी भारी चूक की वजह से मंदिर स्थल पर पुलिस सुरक्षा का इंतजाम नहीं किया गया। सारी फोर्स राष्ट्रपति की सुरक्षा के इंतजाम में लगा दी गई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/are-the-questions-emerging-from-the-tragedy-at-the-sheetla-mata-temple-demanding-answers" target="_blank">बिहारशरीफ, नालंदा स्थित शीतला माता मंदिर में हुए हादसे से उभरते सवाल मांग रहे जवाब?</a></h3><div>कुंभ मेले, मंदिर दर्शन, सत्संग, त्योहार और रेलवे स्टेशनों पर ट्रेन पकड़ने की होड़ जैसी घटनाएं न केवल आस्था का प्रतीक हैं, बल्कि प्रबंधन की कमी के कारण अक्सर जानलेवा साबित होती रही है। साल-दर-साल मची भगदड़ में सैकड़ों निर्दोष जिंदगियां चली जाती हैं, जिनमें महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। ये हादसे मुख्य रूप से सुरक्षा व्यवस्थाओं की चूक, अपवाहें, संकरी जगहों पर अत्यधिक भीड़ और प्रशासन की लापरवाही के कारण होती हैं। देश के सरकारी तंत्र ने विगत वर्षों में हुए इस तरह के हादसों से कोई सबक नहीं सीखा। यही वजह ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति थम नहीीं रही है। विगत एक दशक में ऐसा शायद ही कोई साल गया होगा, जब भगदड़ में मौतों की दर्दनाक घटनाएं सामने नहीं आई होंगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>3 मई 2025 को गोवा के श्री लैरे देवी मंदिर के वार्षिक मेले में पूजा-अर्चना के दौरान भगदड़ मची। इसमें छह श्रद्धालुओं की मौत हुई और लगभग 55 लोग घायल हुए। 15 फरवरी 2025 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर प्रयागराज कुंभ में शामिल होने के लिए ट्रेन पकड़ने की होड़ के चलते मची भगदड़ में 18 यात्रियों की जान गई। 9 जनवरी 2025 को प्रयागराज महाकुंभ के संगम क्षेत्र में भगदड़ 30 तीर्थयात्रियों की मौत हुई और 60 लोग घायल हुए। इसी तरह 8 जनवरी 2025 आंध्र प्रदेश के तिरुपति में श्री वेंकटेश्वर मंदिर में छह श्रद्धालुओं की मौत हुई।</div><div><br></div><div>इसी तरह 2 जुलाई 2024 उत्तर प्रदेश के हाथरस में संत भोले बाबा (नारायण साकार हरि) की सत्संग के बाद भगदड़ मची। इस घटना में कुल 121 लोगों की मौत हुई, जिनमें अधिकांश महिलाएं और बच्चे थे। यह हादसा सुरक्षा प्रबंधों की कमी के चलते हुआ। 31 मार्च 2023 मध्यप्रदेश के इंदौर में रामनवमी पर ढाई तालाब की बावड़ी की छत गिरने के दौरान भगदड़ मच गई। इस हादसे में 36 तीर्थयात्रियों की मौत हुई और 16 अन्य घायल हुए। भीड़-नियंत्रण में चूक यहां भी जानलेवा साबित हुई। इन हादसों के अलावा विगत वर्षों में कटरा जम्मू में वैष्णो देवी मंदिर, महाराष्ट्र के मंधर देवी, नासिक में कुंभ स्नान, आंध्र प्रदेश के राजामुंद्री, बिहार के पटना में गांधी मैदान, मध्य प्रदेश के दतिया में पुल पर अफवाह फैलने, हरिद्वार में हर-की-पौड़ी घाट पर आयोजित गायत्री महायज्ञ आयोजन, उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़, जोधपुर में चामुंडा देवी मंदिर में हिमाचल के नैना देवी में भगदड़ के दौरान सैकड़ों लोगों की जान चली गई थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>नालंदा में हुए दर्दनाक हादसे के बाद अन्य हादसों की तरह वही जांच कमेटी बना दी गई। बिहार सरकार की तरफ से मृतकों के परिजनों को सांत्वना राशि की घोषणा कर दी गई। राजनीतिक दलों के नेताओं की तरफ से औपचारिकता निभानते हुए घड़ियाली आसूं बहाए गए। किन्तु एक भी जिम्मेदार अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की गई। अन्य हादसों की तरह इस हादसे में भी एक भी अफसर को जेल नहीं होगी। किसी का भी बांल बांका नहीं होगा, होगा भी तो सिर्फ दिखावे के लिए छोटे कर्मचारी अधिकारियों पर गाज घटना की गाज गिर सकती है। देश में परंपरा रही है कि बड़े अफसर हर बार बच निकलते हैं। इस लिहाज से बिहार की इस घटना इससे अलग नहीं है। सरकारों ने ना पहले हुए ऐसे हादसों से कोई सबक सीखा था ना ही बिहार हादसे से सीखेंगे। ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति देश में जारी रहेगी। ऐसे हादसों में सरकारी कुप्रबंधन की वजह से आम लोगों की मौत होती रहेगी और सरकारें तमाशबीन बनी रहेंगी।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 17:55:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/tragedies-like-the-nalanda-temple-incident-will-not-cease-due-to-the-incompetence-of-officials</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/7/nalanda-temple-stampede_large_1755_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pakistan की गीदड़ भभकी पर West Bengal की सियासत भड़की, चूहे को शेर बताकर किसको डराना चाहती हैं Mamata Banerjee?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-politics-flared-up-over-pakistan-threats-on-kolkata]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के खिलाफ जहर उगलने के आदी पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने जब कोलकाता को निशाना बनाने की धमकी दी तो यह उनकी बौखलाहट का खुला प्रदर्शन था, लेकिन हैरानी इससे भी ज्यादा इस बात पर है कि भारत के भीतर कुछ नेता इस खोखली धमकी को लेकर हंगामा खड़ा कर रहे हैं। जिसे बार-बार उसकी हर हरकत पर मुंहतोड़ जवाब मिला हो, जिसे उसकी गुस्ताखियों की सजा उसके घर में घुसकर दी गई हो, उसकी गीदड़ भभकी पर तृणमूल कांग्रेस के नेताओं का शोर मचाना न केवल हास्यास्पद है बल्कि चिंताजनक भी है। देखा जाये तो यह एक कमजोर और बेअसर खतरे को बढ़ा चढ़ाकर पेश करने और चूहे को शेर बताकर लोगों में डर पैदा करने की कोशिश से ज्यादा कुछ नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ख्वाजा आसिफ ने पिछले सप्ताह सियालकोट में मीडिया से बातचीत के दौरान यह दावा किया था कि भविष्य में भारत के साथ होने वाला कोई भी संघर्ष सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा और पाकिस्तान कोलकाता जैसे बड़े शहरों को भी निशाना बना सकता है। देखा जाये तो पाकिस्तान की इस ताजा धमकी को भारत में गंभीरता से कम और हास्य के रूप में अधिक लिया जा रहा है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की सैन्य क्षमता, तकनीक और खुफिया तंत्र पाकिस्तान से कहीं अधिक मजबूत है, ऐसे में इस तरह की बयानबाजी केवल मानसिक दबाव बनाने का असफल प्रयास है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/congress-in-the-mood-to-teach-a-lesson-to-rebel-soldiers" target="_blank">बागी सिपाहियों को सबक सिखाने के मूड में कांग्रेस</a></h3><div>लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे दिलचस्प पहलू देश के भीतर की राजनीति बन गई है। तृणमूल कांग्रेस के नेता अभिषेक बनर्जी ने इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला और तीखी भाषा का इस्तेमाल किया। उन्होंने यह तक कह दिया कि उनकी सरकार आने पर दुश्मनों को उनके घर में घुसकर जवाब दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी प्रधानमंत्री से सवाल किया कि उन्होंने इस धमकी पर प्रतिक्रिया क्यों नहीं दी?</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि पाकिस्तान की किसी भी दुस्साहसिक हरकत का जवाब अभूतपूर्व और निर्णायक होगा। उन्होंने यह भी दोहराया कि भारत अपनी सुरक्षा को लेकर किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगा। राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के बयान पर कहा, "पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने जो बयान दिया है उसके बारे में इतना कहूंगा कि उन्हें ये नहीं भूलना चाहिए कि 55 साल पहले 1971 में पाकिस्तान ने एक बार बंगाल की तरफ नजर उठाने की कोशिश की थी तो पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए एक पाकिस्तान और दूसरा बांग्लादेश बन गया। इस बार यदि बंगाल की तरफ नजर उठाने की कोशिश की तो उसका क्या परिणाम होगा ये भविष्य में पता चल जाएगा।"</div><div><br></div><div>अब यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान ने खास तौर पर कोलकाता का नाम क्यों लिया? देखा जाये तो इसके पीछे कई रणनीतिक कारण छिपे हो सकते हैं। एक तो पाकिस्तान यह संदेश देना चाहता है कि वह केवल सीमा क्षेत्रों तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचने का दावा करता है। कोलकाता जैसे ऐतिहासिक और प्रमुख शहर का नाम लेकर वह मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। साथ ही पाकिस्तान जानता है चूंकि पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं तो ऐसे में वहां की राजधानी का नाम लेना तुरंत ही सुर्खियों में ला सकता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, पश्चिम बंगाल की राजनीति में पहले से ही सीमा और घुसपैठ के मुद्दे गर्म रहते हैं। ऐसे में कोलकाता का नाम लेकर पाकिस्तान अप्रत्यक्ष रूप से भारत के आंतरिक राजनीतिक माहौल को प्रभावित करने की कोशिश करना चाह रहा है। साथ ही, यह एक रणनीतिक भ्रम पैदा करने की चाल भी हो सकती है। जब खतरे को कई दिशाओं में दिखाया जाता है तो विरोधी देश को अपनी सैन्य तैयारी को व्यापक स्तर पर फैलाना पड़ता है। पाकिस्तान संभवतः भारत की रणनीतिक एकाग्रता को बांटने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, पाकिस्तान के घरेलू हालात भी इस बयानबाजी के पीछे एक बड़ा कारण हैं। आर्थिक संकट, आंतरिक अस्थिरता और पश्चिमी सीमाओं पर तनाव के बीच वहां की सरकार भारत विरोधी बयान देकर अपने नागरिकों का ध्यान भटकाने की कोशिश करती है। पाकिस्तान के पूर्व उच्चायुक्त अब्दुल बासित जैसे लोगों के बयान भी इसी मानसिकता को दर्शाते हैं, जिनमें भारत के बड़े शहरों को निशाना बनाने की बात कही गई है। यह सब मिलकर एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का हिस्सा प्रतीत होता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह स्पष्ट है कि पाकिस्तान की यह धमकी उसकी कमजोरी और हताशा का प्रतीक है। भारत आज न केवल सैन्य बल्कि कूटनीतिक और आर्थिक रूप से भी मजबूत स्थिति में है। ऐसे में इस तरह की गीदड़ भभकियां केवल शोर से अधिक कुछ नहीं हैं। भारत की नीति स्पष्ट है कि किसी भी आक्रामकता का जवाब उसी की भाषा में दिया जाएगा। और इतिहास गवाह है कि जब जब पाकिस्तान ने सीमा लांघने की कोशिश की है, उसे मुंहतोड़ जवाब मिला है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 13:06:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/west-bengal-politics-flared-up-over-pakistan-threats-on-kolkata</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/7/rajnath-mamata-khawaja_large_1306_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बंगाल विधानसभा चुनावों से पूर्व फिर खेल हुआ प्रारंभ, आखिर कब तक बचाव कर पाएंगी ममता दीदी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-game-has-begun-once-again-ahead-of-the-bengal-assembly-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधनासभा चुनाव घोषित हो चुके हैं। जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहा है वैसे वैसे राज्य की राजनीति का पारा चढ़ रहा है। बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए अपने प्रचार को आक्रामक बना चुकी हैं। उनके लिए इस बार राह उतनी आसान नहीं है। भारतीय जनता पार्टी भी इस बार हर हाल में बंगाल में अपनी सरकार बनाने को संकल्पबद्ध है। बिहार विधानसभा चुनाव परिणामों के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सभा में कहा था कि गंगा नदी बिहार से ही बंगाल में जाती है और उसी दिन से&nbsp; बंगाल मे राजनीतिक तपिश का अनुभव होने लगा था।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंगाल में ममता दीदी के चौथी बार मुख्यमंत्री बनने की राह बहुत आसान नहीं है क्योकि कांग्रेस और वामपंथी दल भी पूरी ताकत से ममता दीदी को हराने के लिए काम कर रहे हैं। उनकी अपनी ही पार्टी के निष्कासित विधायक हुमायूं कबीर ने मुर्शिदाबाद में बाबरी मस्जिद के नाम पर मस्जिद की नींव रखने और फिर नयी पार्टी बनाकर विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर राजनैतिक ध्रुवीकरण की समस्या पैदा कर दी है। मुर्शिदाबाद में हुमायूं कबीर के कदमों का ममता दीदी की सरकार ने कोई प्रतिवाद नहीं किया कि कहीं उनके मुस्लिम मतदाता नाराज न हो जाएं। बंगाल की कानून व्यवस्था भी ममता बनर्जी के लिए चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए समस्या पैदा कर सकती है। संदेशखाली में महिलाओं के साथ घटित वीभत्स घटना के आरोपी को बचाने से लेकर आर. जी कर में महिला डाक्टर के साथ बलात्कार&nbsp; और हत्या की भयंकर घटना में शामिल तृणमूल समर्थकों को बचाने के प्रयास चुनाव प्रचार के दौरान जमकर उछाले जायेंगे। इसके अलावा बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और उनकी सरकार अनेक घोटालों में बुरी तरह से फंसी हुई है और उन सभी घोटालो की जांच रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/rising-anarchy-in-west-bengal-a-challenge-to-democracy" target="_blank">पश्चिम बंगाल बढ़ती अराजकताः लोकतंत्र के लिए चुनौती</a></h3><div>चुनाव आयोग की तरफ से मतदाता सूची के शुद्धीकरण के गहन अभियान को ममता बनर्जी ने जिस तरह बाधित करने का प्रयास किया उससे उनकी अपनी ही छवि ख़राब हुई है। मतदाता शुद्धीकरण अभियान के दौरान ममता बनर्जी व उनकी पार्टी ने पूरा दम लगा दिया कि किसी&nbsp; प्रकार इस कार्य को बाधित किया जाए या रोक दिया जाए। ममता की ओर से एसआईआर को लेकर भ्रम पैदा करने के पूरे प्रयास किए गए जिसमें&nbsp; उनकी ओर से पहले कहा गया कि वह एसआईआर फार्म नहीं भरेंगी और फिर उन्होंने भर भी दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>आई पैक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय की छापेमारी के दौरान ममता जी जिस तरह पुलिस लेकर पहुँच गयीं वह हास्यास्पद था लेकिन अब उनके लिए अत्यंत गंभीर समस्या बनने जा रहा है। अब आई पैक का प्रकरण हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गया है। ममता दीदी ने कहा है कि बीजेपी ईडी के सहारे उनकी पार्टी की रणनीति चुराना चाहती है। आई-पैक प्रकरण को लेकर वह अत्यंत आक्रामक मुद्रा हैं। आई-पैक प्रकारण में ग्रीन फाइल को लेकर प्रश्न किया जा रहा है कि आखिर उन ग्रीन फाईल में ऐसा क्या था जिसे पाने के लिए ममता दीदी ने राज्य पुलिस की पूरी ताकत लगा दी। अब ईडी उन फाईल्स को तत्काल पाने के लिए हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गई है। अदालत में दोनों ही पक्षों ने अपनी-अपनी याचिकाएं लगा दी है। आई-पैक प्रकरण में ईडी की छापेमारी की खबर मीडिया में आग की तरह फैली और उसके बाद से ही&nbsp; कोलकाता से लेकर नई दिल्ली तक राजनीतिक हलचल तीव्र हो गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>टीवी चैनलों पर संविधान की किताब हाथ में लेकर घूमने वाले आ गए और कहा जाने लगा कि चुनाव से दो-तीन महीने पहले ही यह छापेमारी क्यों शुरू हो जाती है? जबकि वास्तविकता यह है कि यह जांच काफी समय से चल रही है इस घोटाले की जांच रुकवाने के लिए तृणमूल नेता अभिषेक बनर्जी ने एक याचिका दायर की थी जो खारिज हो चुकी है। ईडी का यह छापा तृणमूल कांग्रेस आईटी सेल के हेड प्रतीक जैन के घर और कार्यालय पर पड़ा था और माना जा रहा है कि उनके रिश्ते चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर से भी हैं बिहार में अपनी सरकार बनने का सपना देखने वाले प्रशांत किशोर बंगाल में ममता दीदी के प्रमुख रणनीतिकारों में से एक हैं। यही कारण है कि जब ईडी का छापा पड़ा और ममता दीदी की पुलिस ने ईडी के कब्जे से ग्रीन फाइल अपने कब्जे में ली तभी से यह आरोप लगाया जाने लगा कि आखिर ममता दीदी की दाल में कुछ तो काला है । आखिर क्यों उन्हें ग्रीन फाइलों से इतना लगाव है? पहले ममता जी धमकी देते हुए कह रही थीं&nbsp; कि अगर वह बीजेपी के कार्यालाय में घुस गयीं तो क्या हो जाएगा और अब कह रही हैं कि जब बीजेपी को पता चला कि अबकी बार बीजेपी को पहले की तुलना में भी कम सीटें आ रही हैं&nbsp; तब उन्होंने हमारी रणनीति चुराने का प्रयास किया। जबकि प्रवर्तन निदेशालय ने अब सरकारी काम में बाधा डालने तथा कोयला घोटाले में ममता दीदी व तृणमूल सरकार को आरोपी बनाने का फैसला किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ममता दीदी के सामने अब वैसी गंभीर चुनौती है जैसी दिल्ली के मुख्यंमत्री अरविंद केजरीवाल और झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के समक्ष आ गई थी। अगर ममता दीदी को कोर्ट से राहत नहीं मिलती या वे ग्रीन फाइल्स को लेकर जांच एजेंसियों के साथ टकराव का रास्ता अपनाती हैं तो केंद्र सरकार पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने पर मजबूर हो सकती है। बंगाल में लंबे समय से कई अवसरों पर राष्ट्रपति शासन लागू करने की मांग भाजपा व अन्य संगठनों की ओर से लगातार की जा रही है किंतु अभी तक केंद्र की राजग सरकार ने ऐसा कोई कदम नहीं उठाया है जबकि राज्य में चुनावों के समय तृणमूल कांग्रेस के संगठित अपराधियों द्वारा चुनावी हिंसा का दौर प्रांरभ हो जाता है जिसके शिकार भाजपा व हिंदू संगठनो के कार्यकर्ता होते हैं। अभी आई -पैक प्रकरण के दौरान&nbsp; मची हलचल के बीच&nbsp; भाजपा नेता शुभेंदु अधिकारी की कार पर हमला बोला गया और वह आरोपियों पर कार्रवाई करने की मांग को लेकर धरने पर बैठ गए।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा नहीं है कि ममता दीदी का जांच एजेंसियों के साथ टकराव पहली बार हुआ हो इससे पहले 27 अक्तूबर 2023 को जब राशन घोटाले में तत्कालीन मंत्री ज्योतिप्रिया मल्लिक को गिरफ्तार किया तब ममता उनके बचाव में उतरीं थीं। 11 अगस्त 2022 सीबीआई ने पशु तस्करी में तृणमूल नेता अनुव्रत मंडल को गिरफ्तार किया वह भी ममता दीदी के करीबी थे। 23 जुलाई 2022 को स्कूल भर्ती घोटाले में ईडी ने शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी को गिरफ्तार किया। 6 सितबर 2021 को नारद स्टिंग केस में सीबीआई ने तृणमूल नेताओं को गिरफ्तार किया तब ममता दीदी ने सीबीआई के कार्यालय के बाहर 6 घंटे धरना दिया। 6 सिंतबर 2021 को ममता के भतीजे अभिषेक बनर्जी से कोयला घोटाले में 9 घंटे तक पूछताछ हो चुकी हैं। बंगाल के राजनीतिक इतिहास में सबसे बड़ा शरदा चिटफड घोटाला हुआ है जिसकी जांच के दायरे में ममता दीदी सीधे फंसी हुई हैं ।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>आगामी सप्ताह में बंगाल की राजनीति और चटखदार होने वाली है क्योंकि अब दोनों पक्षों नें एक दूसरे पर वार-पलटवार तेज कर दिए हैं। अदालतों का निर्णय बंगाल विधानसभा चुनावों की दिशा और दशा तय करने वाले हो सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 15:22:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-game-has-begun-once-again-ahead-of-the-bengal-assembly-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/4/bengal-assembly-elections_large_1522_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर पश्चिम बंगाल में 'चुनावी जंगलराज' के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-no-action-being-taken-against-officials-responsible-for-electoral-jungle-raj-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के दौरान 7 न्यायिक अधिकारियों, जिनमें 3 महिलाएं भी शामिल थीं, के साथ हुई दुर्व्यवहार की घटना वहां के कानून-व्यवस्था और चुनावी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाती है। चूंकि राज्य में चुनावी प्रक्रिया चल रही है और राज्य प्रशासन चुनाव आयोग के अधीन है, इसलिए मौजूदा स्थिति के लिए ममता सरकार को दोषी ठहराना न्यायोचित नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल, मालदा के कयाचक क्षेत्र में वोटर लिस्ट से नाम हटाए जाने के विरोध में सैकड़ों लोगों ने 1 अप्रैल 2026 को दोपहर 3:30 बजे से 9 घंटे से अधिक समय तक अधिकारियों को घेर लिया। प्रदर्शनकारियों ने बीडीओ कार्यालय में अधिकारियों को बंधक बनाया, जहां उन्हें भोजन-पानी के बिना रखा गया। सुप्रीम कोर्ट ने कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के पत्र पर स्वत: संज्ञान लिया। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, गृह सचिव, डीजीपी, मालदा डीएम व एसपी को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किया और 6 अप्रैल को ऑनलाइन सुनवाई बुलाई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/anand-sharma-stand-away-from-his-own-party-praised-nda-government-policy-on-west-asia-crisis" target="_blank">अपनी ही पार्टी से अलग सुर, Anand Sharma ने West Asia Crisis पर NDA Govt की नीति को सराहा</a></h3><div>सुप्रीम कोर्ट ने इसे "नागरिक व पुलिस प्रशासन की पूर्ण विफलता" बताया तथा सीबीआई या एनआईए से जांच के निर्देश दिए, जिसे चुनाव आयोग ने सीबीआई को सौंप दिया। यह घटना न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर हमले के रूप में देखी जा रही है, जिसके राजनीतिक मायने खतरनाक हैं, क्योंकि बीजेपी ने टीएमसी पर भीड़ भड़काने का आरोप लगाया, साथ ही इसे "लॉ एंड ऑर्डर की विफलता" और "नकली वोटरों के नाम डिलीट होने का डर" बताया। वहीं, टीएमसी ने बीजेपी व चुनाव आयोग को जिम्मेदार ठहराया, और एसआईआर को "गंदी साजिश" कहा। उल्लेखनीय है कि आगामी विधानसभा चुनावों (23-29 अप्रैल) से ठीक पहले इस विवाद के उभरने से राजनीतिक ध्रुवीकरण तेज हुए हैं।</div><div><br></div><div>वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने मालदा घटना पर पश्चिम बंगाल सरकार को कड़ी फटकार लगाई, और इसे न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने की सुनियोजित साजिश और अदालत के अधिकार को खुली चुनौती बताया। कोर्ट ने राज्य प्रशासन की निष्क्रियता पर सख्ती दिखाते हुए इसे कानून-व्यवस्था की पूर्ण विफलता करार दिया। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा, "यह कोई सामान्य विरोध नहीं, बल्कि एसआईआर की प्रक्रिया को बाधित करने का पूर्वनियोजित प्रयास था।" इससे प्रशासन की भूमिका पर सवाल उठते हैं। आखिर "रात 11 बजे तक डीएम-एसपी&nbsp; क्यों नहीं पहुंचे? जब राजनीतिक नेता मौके पर थे तो प्रशासन क्यों सो रहा था?" इसे न्यायपालिका पर हमला बताते हुए "घिनौना प्रयास" कहा, जो चुनावी प्रक्रिया को पटरी से उतारने का मकसद रखता था।&nbsp;</div><div><br></div><div>ततपश्चात कोर्ट ने मुख्य सचिव, डीजीपी, मालदा डीएम-एसपी को कारण बताओ (शो-कॉज) नोटिस जारी किया और 6 अप्रैल को सुनवाई बुलाई। वहीं, चुनाव आयोग को एसआईआर से जुड़े अधिकारियों की सुरक्षा के लिए केंद्रीय बल तैनात करने तथा भीड़ नियंत्रण (5 से अधिक लोगों पर रोक) के निर्देश दिए। साथ ही सीबीआई/एनआईए जांच का सुझाव भी दिया।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगालकी मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मालदा घटना पर चुनाव आयोग को दोषी ठहराते हुए कहा कि राज्य प्रशासन उनके नियंत्रण में नहीं रहा। उन्होंने दावा किया कि उन्हें घटना की जानकारी आधी रात को एक पत्रकार से मिली और एसआईआर प्रक्रिया से लोगों का गुस्सा जायज है। ममता ने कहा, "मुझे नहीं पता वे कौन थे जिन्होंने अधिकारियों का घेराव किया, लेकिन एसआईआर से लोग नाराज हैं।" उन्होंने चुनाव आयोग पर आरोप लगाया कि चुनाव से पहले शीर्ष अधिकारियों के तबादले से "सुपर राष्ट्रपति शासन" चल रहा है। बीजेपी को जिम्मेदार बताते हुए जांच की मांग की और कहा, "मेरी सारी शक्तियां छीन ली गईं।" ममता का यह बयान सागरदिघी या धूमुरपहाड़ी रैली में आया, जहां उन्होंने टीएमसी को निर्दोष बताया।&nbsp; सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद यह चुनाव आयोग व बीजेपी पर हमला है, जो आगामी चुनावों में ध्रुवीकरण बढ़ा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बेहतर होगा कि इस मामले में केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त, राज्य के पुलिस महानिदेशक और मुख्य सचिव के अलावा मालदा डीएम, एसपी को अविलंब नौकरी से बर्खास्त किया जाना चाहिए, क्योंकि चुनावी दिनों में इन सबकी अविवेकी हरकतों से एक निर्वाचित सरकार की बदनामी बढ़ी है, और इसके चुनावी दुष्प्रभाव से इनकार नहीं किया जा सकता है। वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे प्रशासनिक विफलता और आपराधिक अवमानना करार देते हुए कड़ी फटकार लगाई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह कितनी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश पर राज्य में सक्रिय न्यायिक अधिकारियों को सुरक्षा प्रदान करने में राज्य प्रशासन ने घोर कोताही बरती। यह महाजंगल राज नहीं तो क्या है? आखिर ऐसी नौबत क्यों आई, शोध का विषय है। उचित तो यह होगा कि इस उपद्रव में शामिल लोगों के व्यवहार को अराजक घोषित करते हुए इनके मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशनकार्ड आदि जब्त किया जाए और तमाम सरकारी सुविधाओं से ऐसे उग्र लोगों को वंचित किया जाए। साथ ही इन्हें उकसाने वाले राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द की जाए और इसके प्रदेश अध्यक्ष को अविलंब गिरफ्तार किया जाए। यदि ऐसी सख्त कार्रवाई होगी, तभी भारत में स्वस्थ लोकतंत्र बहाल किया जा सकता है, अन्यथा नहीं!</div><div><br></div><div>देखा जाए तो पहले दिल्ली में आप पार्टी की केजरीवाल सरकार और अब पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की ममता सरकार के खिलाफ केंद्रीय प्रशासनिक अधिकारियों का जिस तरह से दुरूपयोग किया जा रहा है और राज्य प्रशासन के अधिकारियों के साथ उनके नीतिगत काउंटर हो रहे हैं, उसे कतई निष्पक्ष करार नहीं दिया जा सकता है, क्योंकि चुनी हुई सरकारों को 'बर्बरतापूर्ण' तरीक़े से हटाने की सियासी परिस्थिति पैदा करने में इनकी अहम भूमिका है। केंद्र और राज्य प्रशासन में सक्रिय पक्षपाती तत्वों की शिनाख्त होनी चाहिए, क्योंकि जो हो रहा है, वह अस्वीकार्य है। यह संवैधानिक और न्यायिक विफलता है और इसके पीछे सम्बन्धित अधिकारियों की सियासी मिलीभगत की जांच होनी चाहिए। ताकि कानून का शासन बहाल हो और राजनीतिक नंगानाच पर लगाम लगे। यक्ष प्रश्न है कि आखिर पश्चिम बंगाल में 'चुनावी जंगलराज' के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 15:07:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-no-action-being-taken-against-officials-responsible-for-electoral-jungle-raj-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/3/west-bengal_large_1507_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिहारशरीफ, नालंदा स्थित शीतला माता मंदिर में हुए हादसे से उभरते सवाल मांग रहे जवाब?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/are-the-questions-emerging-from-the-tragedy-at-the-sheetla-mata-temple-demanding-answers]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब दुनियादारी से परेशान व्यक्ति ईश्वरीय आस्था की शरण में जाता है तो उसके बेचैन मन को असीम शांति मिलती है। फलस्वरूप वह नाना प्रकार के रोगों से प्रभावित होते रहने से बच जाता है। वहीं उसकी मनोकामनाएं रूपीं मन्नतें भाव मार्ग द्वारा सम्बन्धित हृदय को प्रभावित करते हुए द्रवित करती हैं, जिससे श्रद्धालु के मनोरथ पूरे हो जाते हैं। यही वजह है कि ईश्वरीय आस्था व विश्वास हर धर्म में किसी न किसी रूप में व्याप्त और सर्वव्यापी है।</div><div><br></div><div>यद्यपि, मौजूदा दौर में धर्म-कर्म को भी मुनाफे का धंधा बना दिया गया है। जहां अमीर मंदिरों पर सरकारी नियंत्रण कसा हुआ है, वहीं गरीब मंदिरों की व्यवस्था भगवान भरोसे या मंदिर स्वयंसेवक के जरिए संचालित होते हैं। इनमें से कुछ मंदिरों में भारी भीड़ होती है, लेकिन स्थानीय सिविल प्रशासन की अदूरदर्शिता और पुलिस प्रशासन की लापरवाही से जब तब हादसे होते रहते हैं। लिहाजा सुव्यवस्था व सुशासन अक्सर सवालों के घेरे में रहते आये हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/nalanda-temple-stampede-8-women-dead-in-bihar-nitish-kumar-in-action-now" target="_blank">Bihar के Nalanda मंदिर में कैसे मची भगदड़? 8 मौतों के बाद जांच के आदेश, CM Nitish का एक्शन</a></h3><div>ताजा मामला बिहार के अभागे जिला नालंदा का है जहां के मूल निवासी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अस्ताचलगामी राजनीतिक साम्राज्य के लिए शीतला माता मंदिर भगदड़ से उपजी टीस सालों तक लोगों को सालती रहेगी। उनके पास से गृह मंत्रालय क्या गया, उनका गृह जिला भी मानवीय आपदा का शिकार हो गया। उनका मन जरूर अफसोस करता होगा, यदि अपनी मिट्टी से थोड़ा सा भी प्यार बचा रह गया होगा तो!</div><div><br></div><div>गौरतलब है कि बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ स्थित शीतला माता मंदिर में 31 मार्च 2026 को चैत्र मास के अंतिम मंगलवार को भगदड़ मच गई, जिसमें 8-9 श्रद्धालुओं (ज्यादातर महिलाओं) की मौत हो गई और कई घायल हुए। बताया गया कि यह हादसा भारी भीड़, अपर्याप्त सुरक्षा और प्रबंधन की कमी के कारण हुआ। नीतिगत दृष्टि से यह घटना राज्य की भीड़ प्रबंधन व्यवस्था पर सवाल उठाती है। लिहाजा, स्थानीय पुलिस अधीक्षक ने लोकल थाना प्रभारी को कर्तव्य हीनता के आरोप में निलंबित कर दिया है।</div><div><br></div><div>इस गम्भीर हादसे के कारण के तौर पर मंदिर का छोटा होना, बैरिकेडिंग न होना और पुलिस की अनुपस्थिति से हुई धक्कामुक्की आदि बताया गया। प्रत्यक्षदर्शियों ने बताया कि महावीर जयंती के संयोग से भीड़ बढ़ गई, लेकिन कोई पूर्व तैयारी नहीं की गई। बिहार राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की गाइडलाइन का पालन न होने से हादसा हुआ, जो टलने योग्य था।</div><div><br></div><div>इस हादसे पर प्रशासनिक प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अफसोस जताया और मृतकों के परिजनों को 6 लाख रुपये मुआवजा घोषित किया और अधिकारियों को इसे अविलंब पीड़ितों को प्रदान करने के निर्देश दिए। दीपनगर थानाध्यक्ष को निलंबित किया गया तथा जांच शुरू हुई। क्योंकि विपक्ष ने इसे प्रशासनिक लापरवाही करार दिया।</div><div><br></div><div>इस हादसे के नीतिगत निहितार्थ निम्नलिखित हैं- पहला, यह घटना धार्मिक स्थलों पर भीड़ प्रबंधन नीति (SOP) को मजबूत करने की जरूरत बताती है, जैसे अतिरिक्त पुलिस तैनाती और सीसीटीवी बढ़ाना। दूसरा, बिहार में पूर्व हादसों (जैसे पटना 2012-14) के बावजूद दोहराई जाने वाली चूक से केंद्रीय स्तर पर एकरूप नीति की मांग तेज हो सकती है। इसलिए अन्य मंदिरों में सुरक्षा सख्ती इसका प्रत्यक्ष प्रभाव है।</div><div><br></div><div>यदि पिछले मंदिर भगदड़ हादसों से तुलना की जाए तो ऐसा करने पर शीतला माता हादसा भीड़ प्रबंधन की पुरानी कमियों को दोहराता दिखता है। बिहार में विशेष रूप से सावन या चैत्र जैसे उत्सवों पर ऐसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं।</div><div><br></div><div>वहीं, प्रमुख हादसों की तुलना इस प्रकार है:- यदि हादसा, स्थान, तारीख, मौतें, मुख्य कारण और प्रतिक्रिया की बात की जाए तो इससे पूर्व बाबा सिद्धेश्वर मंदिर, जहानाबाद, में 7 अगस्त 2024 को हादसा हुआ, जो पुलिस लापरवाही और भारी भीड़ के चलते हुए थी। वहीं, गरीबनाथ मंदिर, मुजफ्फरपुर, में 13 अगस्त 2018 को हुए हादसे में 25 घायल हुए थे। क्योंकि सावन सोमवार पर जलाभिषेक के दौरान धक्कामुक्की हुई थी। वहीं, महाबोधि मंदिर/पटना दशहरा, पटना, में 3 अक्टूबर 2014 को हुए हादसे में 32 से ज्यादा लोग मर गए थे, क्योंकि तार गिरने की अफवाह से भगदड़ मची थी। वहीं पड़ोसी राज्य उत्तरप्रदेश में हाथरस सत्संग के दौरान जुलाई 2024 में हादसा हुआ जिसमें 121 लोग मारे गए क्योंकि भगदड़ सत्संग में मची थी। फिर मुख्य आरोपी गिरफ्तार हुए।</div><div><br></div><div>उपर्युक्त हादसों से जुड़ीं समानताएं और सबक यह हैं कि सभी मामलों में कारण भारी भीड़, अपर्याप्त सुरक्षा और अफवाहें रहीं। बिहार के हादसे छोटे मंदिरों में ज्यादा, जबकि यूपी जैसे राज्यों में बड़े आयोजनों पर हो ही जाते हैं, इसलिए नीतिगत रूप से SOP, CCTV और पूर्व चेतावनी प्रणाली की कमी उजागर होती है।</div><div><br></div><div>आपको यह पता होना चाहिए कि मंदिर भगदड़ रोकने के लिए NDMA दिशानिर्देशों और राज्य SOP का कड़ाई से पालन जरूरी है। ये उपाय पूर्व तैयारी, तकनीक और समन्वय पर आधारित हैं। वहीं पूर्व योजना के तहत भीड़ का अनुमान लगाकर ऑनलाइन पंजीकरण और समयबद्ध प्रवेश लागू करें। मास गेदरिंग प्लान बनाएं जिसमें आयोजक, पुलिस और NGO की भूमिका स्पष्ट हो। मॉक ड्रिल नियमित करें।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक भीड़ प्रबंधन की बात है तो प्रवेश-निकास द्वार अलग रखें, बैरिकेडिंग लगाएं और चौड़ी राहें सुनिश्चित करें। AI-CCTV, ड्रोन से रीयल-टाइम मॉनिटरिंग करें (6 व्यक्ति/वर्गमीटर पर अलर्ट)। पर्याप्त प्रशिक्षित पुलिस/स्वयंसेवक तैनात करें। वहीं, बुनियादी ढांचा जैसे आपातकालीन द्वार, अग्निशामक यंत्र, पानी/आराम सुविधाएं उपलब्ध रखें। संकेतक चिन्ह, PA सिस्टम से निर्देश दें और पार्किंग रोकें।वहीं, भविष्योन्मुखी कदम उठाते हुए DMA 2005 के तहत जिलों में मास गेदरिंग नीति लागू करें। भक्तों को जागरूकता दें किभीड़ में हाथ छाती से सटाकर खड़े रहें।वहीं, बिहार जैसे राज्यों में धार्मिक उत्सवों पर केंद्रीय फंडिंग से सुरक्षा मजबूत करें।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 14:30:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/are-the-questions-emerging-from-the-tragedy-at-the-sheetla-mata-temple-demanding-answers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/2/stampede-sheetla-mata-temple_large_1430_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नक्सलवाद मुक्त भारत की डेडलाइन पूरी, ख्वाब अधूरी, अब अर्बन नक्सलियों पर नजर!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/deadline-for-naxal-free-india-expires-dream-remains-unfulfilled-focus-shifts-to-urban-naxals]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश के 'पीएम इन वेटिंग' और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने नक्सलियों और आतंकवादियों की कमर तोड़ने में अभूतपूर्व और उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि भारत अभी पूरी तरह नक्सलवाद और आतंकवाद मुक्त हुआ है। हां, सरकार की कोशिशें सराहनीय हैं। यदि शाह अपने नेक मकसद में कामयाब हुए तो प्रधानमंत्री पद की उनकी दावेदारी और पुख्ता हो जाएगी, क्योंकि उन्होंने मनमाफिक राष्ट्रीय टीम पहले से ही बना रखी है।</div><div><br></div><div>यह ठीक है कि सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद को समाप्त करने का लक्ष्य रखा था, और आतंकवाद समाप्ति को लेकर ऐसा कोई दुरूह लक्ष्य घोषित नहीं किया गया था और कड़ी कार्रवाई गतिमान है, लेकिन पूरे देश की बात छोड़ दी जाए तो खुद दिल्ली-एनसीआर से ब्रेक के बाद सामने आने वाले मामले इस बात की चुगली कर रहे हैं कि उद्देश्यपूर्ति काफी जटिल है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/much-remains-to-be-done-even-after-the-declaration-of-the-end-of-naxalism" target="_blank">नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा के बाद भी बहुत कुछ करना होगा</a></h3><div>ऐसा इसलिए कि नक्सलियों और आतंकवादियों को बौद्धिक और आर्थिक खुराक देने वाली जमात राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक हलकों में सक्रिय हैं! प्रशासनिक गलियारों तक में इनकी जातिवादी और सांप्रदायिक पैठ है।जबतक इनकी शिनाख्त और गिरफ्तारी नहीं होती, उद्देश्य अधूरा रहेगा। संभव हो कुछ तत्व सत्ताधारी दल से भी डायरेक्ट या भाया मीडिया सम्बन्धित हों।</div><div><br></div><div>आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ के कुछ जिलों में नक्सली गतिविधियाँ बनी हुई हैं। फरवरी 2026 तक नक्सल प्रभावित जिलों की संख्या घटकर 6-7 रह गई थी, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र (बीजापुर, सुकमा, नारायणपुर) में। वहीं, मार्च 2026 के अंत में सुकमा में नक्सली मुठभेड़ हुई, जहाँ एक नक्सली मारा गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा कि नक्सलवाद लगभग समाप्ति की कगार पर है, लेकिन औपचारिक घोषणा प्रक्रिया पूरी होने पर होगी। सरकारी दावा करते हुए अमित शाह ने 30 मार्च 2026 को लोकसभा में कहा कि "देश नक्सल मुक्त हो चुका है" और "नक्सलवाद विलुप्ति की ओर है।" 31 मार्च 2026 की डेडलाइन के ठीक पहले भी ऑपरेशन चल रहे थे, जिसमें सैकड़ों नक्सली मारे गए या आत्मसमर्पण कर चुके हैं। फिर भी, बस्तर जैसे क्षेत्रों में सीमित गतिविधियाँ जारी हैं।</div><div><br></div><div>प्रगति के आंकड़े बताते हैं कि नक्सल प्रभावित जिले 126 (2010) से घटकर 6-7 (2026) पर पहुंच गए और ज्यादातर नक्सली मारे गए। 700+ तो हाल के वर्षों में।वहीं, आत्मसमर्पण करने वाले 4,800+ नक्सली दूसरे धंधों में जुड़ चुके हैं। बहरहाल, नक्सलवाद बहुत कमजोर हो चुका है, लेकिन पूर्ण मुक्ति की घोषणा अभी बाकी है। भारत में नक्सल प्रभावित 6 जिलों की स्थिति काफी संवेदनशील बनी हुई है, जहाँ सुरक्षा बल लगातार अभियान चला रहे हैं। ये जिले मुख्यतः छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में केंद्रित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, सबसे अधिक प्रभावित जिले निम्नलिखित 6 जिले हैं, जिनके नाम छत्तीसगढ़ (बीजापुर, कांकेर/नारायणपुर, नारायणपुर, सुकमा), झारखंड (पश्चिमी सिंहभूम), और महाराष्ट्र (गढ़चिरौली) हैं। इनमें नक्सली गतिविधियाँ सीमित लेकिन सक्रिय हैं, जैसे छिपे हुए कैंप और छोटे हमले। सुरक्षा बलों ने हाल के ऑपरेशनों से इन क्षेत्रों में घुसपैठ बढ़ाई है।</div><div><br></div><div>जहां तक वर्तमान अभियान की बात है तो छत्तीसगढ़ के सुकमा, बीजापुर, नारायणपुर और गरियाबंद (कभी-कभी सूचीबद्ध) में हाई-अलर्ट सर्च ऑपरेशन चल रहे हैं। सरकार ने अंतिम बड़े अभियान की तैयारी की है, जिसमें आत्मसमर्पण और मुठभेड़ों पर जोर है। मार्च 2026 तक हिंसा में भारी कमी आई, लेकिन पूर्ण नियंत्रण बाकी है।वहीं प्रगति संकेत यह है कि नक्सली संख्या घटी, सैकड़ों आत्मसमर्पण हुए। विकास परियोजनाएँ शुरू हुईं, जैसे सड़कें और स्कूल।&nbsp;</div><div><br></div><div>फिर भी, जंगलों में छिटपुट गतिविधियाँ जारी हैं। लिहाजा, 31 मार्च 2026 की डेडलाइन के बाद भी इन जिलों पर फोकस रहेगा। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने नक्सल प्रभावित 6 जिलों (मुख्यतः छत्तीसगढ़ के बीजापुर, कांकेर/नारायणपुर, सुकमा, झारखंड का पश्चिमी सिंहभूम, महाराष्ट्र का गढ़चिरोली) को नक्सल मुक्त करने के लिए बहुआया रणनीति अपनाई है। यह योजना 31 मार्च 2026 तक पूर्ण मुक्ति का लक्ष्य रखती है, जिसमें सुरक्षा अभियान, आत्मसमर्पण नीति और विकास पर जोर है। सुरक्षा अभियान भी जारी है।</div><div><br></div><div>सुरक्षा बलों ने इन जिलों में सघन सर्च ऑपरेशन तेज कर दिए हैं, जैसे कुर्रेगुट्टालू पहाड़ मॉडल पर आधारित लंबे अभियान। नक्सलियों के सहयोगी नेटवर्क (एड नेटवर्क) को निशाना बनाया जा रहा है, साथ ही 576 मजबूत पुलिस स्टेशन और 336 नए कैंप स्थापित किए गए। मुठभेड़ों और घेराबंदी से नक्सली कमांडरों को खत्म करने पर फोकस है।</div><div><br></div><div>वहीं नक्सलियों के आत्मसमर्पण और पुनर्वास पर बल दिया गया है। नक्सलियों के आत्मसमर्पण को प्रोत्साहित करने के लिए उदार नीति लागू है, जिसमें वित्तीय सहायता, प्रशिक्षण और रोजगार दिया जाता है। हाल के वर्षों में हजारों नक्सली सरेंडर कर चुके हैं। पकड़े गए या आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा में लाने के लिए कौशल विकास केंद्र खोले जा रहे हैं। विकास पहल तेज है। इन जिलों में 137 केंद्र योजनाओं का तेज वितरण, सड़कें, स्कूल, अस्पताल और औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान स्थापित हो रहे। एसआरई योजना के तहत क्षमता निर्माण जारी रहेगा ताकि नक्सलवाद न लौटे। 10-सूत्री योजना में वित्तीय सहायता प्रणाली तोड़ना और स्थानीय विकास शामिल है।</div><div><br></div><div>फिर भी अपेक्षित परिणाम की उम्मीद पूरी होनी अभी बाकी है। सरकार ने ठीक ही कहा है कि 31 मार्च 2026 के बाद 'अर्बन नक्सल' पर नजर रखी जाएगी। ये प्रयास नक्सलवाद को जड़ से समाप्त करने के करीब हैं, लेकिन जंगलों में छिटपुट चुनौतियाँ बाकी हैं। रही गई बात आतंकवाद की तो इसे पर्दे के पीछे से धर्म और डिप्लोमैट बढ़ावा दे रहे हैं, इसलिए इनसे निबटने में अभी वक्त लगेगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 13:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/deadline-for-naxal-free-india-expires-dream-remains-unfulfilled-focus-shifts-to-urban-naxals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/31/naxalite-problem_large_1300_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संवैधानिक संस्थाओं पर उठते सवालों से कमजोर होता लोकतंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/democracy-weakened-by-questions-raised-over-constitutional-institutions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश में समय के साथ लोकतंत्र के परिपक्कव होने के बजाए कमजोर होने की आहट आ रही है। आजादी के बाद देश में ऐसा पहली बार हुआ है कि संवैधानिक संस्थाओं को पक्षपात के आरोपों के कारण कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। इन संस्थाओं के कामकाज के तौर—तरीकों पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन पर पूरी तरह से सत्तारुढ केंद्र की नरेन्द्र मोदी सरकार के इशारों पर काम करने करने और विपक्ष के अधिकारों को दबाने के आरोप लगाए जा रहे हैं। आरोपों के इस घेरे में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला, राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़, भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक और अब मुख्य चुनाव आयुक्त आ चुके हैं।</div><div><br></div><div>लोकसभा स्पीकर को हटाने के लिए 118 विपक्षी सांसदों के समर्थन से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था। विपक्षी सांसदों का दावा था कि ओम बिरला ने "पक्षपातपूर्ण व्यवहार" दिखाया है और उनका कार्यालय अपेक्षित निष्पक्षता बनाए रखने में विफल रहा है। अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा कि कई बार लोकतांत्रिक प्रक्रिया और स्पीकर की भूमिका पर चर्चा हुई है और कई बार मेरा नाम लिया गया, मेरे बारे में गंदी बातें कही गईं। उन्होंने कहा कि यह सदन भारत के लोगों की अभिव्यक्ति है। यह सदन किसी एक पार्टी का नहीं है, यह पूरे देश का प्रतिनिधित्व करता है। जब भी हम बोलने के लिए उठते हैं, हमें बोलने से रोक दिया जाता है। ""पिछली बार जब मैंने बात की थी, तब मैंने हमारे प्रधानमंत्री के किए गए समझौतों के बारे में एक बुनियादी सवाल उठाया था। कई बार मुझे बोलने से रोका गया है। पहली बार लोकसभा के इतिहास में नेता प्रतिपक्ष को बोलने नहीं दिया गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/when-finally-will-our-rulers-become-vigilant-and-proactive-regarding-hate-speech" target="_blank">आखिर नफरत भरे भाषण पर कब सजग और सक्रिय होंगे हमारे हुक्मरान? यक्ष प्रश्न</a></h3><div>नेता विपक्ष राहुल गांधी पर हमला करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि 17वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 51% थी। नेशनल एवरेज 66% था। 16वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 52% थी। नेशनल एवरेज 80% था। 15वीं लोकसभा में उनकी अटेंडेंस 43% थी, जबकि नेशनल एवरेज 76% था। उन्होंने कुछ सदस्यों की शिकायतों पर भी बात की कि उन्हें माइक्रोफोन की दिक्कतों की वजह से बोलने नहीं दिया गया। शाह ने कहा कि जो कोई भी नियमों का पालन नहीं करेगा या सदन में अनुशासन बनाए नहीं रखेगा, उसका माइक्रोफोन बंद कर दिया जाएगा और कहा कि संसद की कार्यवाही इसी तरह चलनी चाहिए।</div><div><br></div><div>लोकसभा स्पीकर बिरला के कामकाज के तौर—तरीकों पर उनको हटाने का प्रस्ताव लाकर नाराजगी जताने से पहले राज्यसभा के सभापति रहे जगदीप धनखड़ पर इसी तरह के आरोप लगाते हुए विपक्ष ने दिसंबर 2024 में उन्हें पद से हटाने का नोटिस दिया था। विपक्ष का आरोप था कि राज्य सभा के सभापति जगदीप धनखड़ पक्षपातपूर्ण तरीके से सदन की कार्यवाही का संचालन करते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खर्गे ने आरोप लगाया था कि कि धनखड़ एक सरकारी प्रवक्ता के रूप में काम कर रहे हैं और एक स्कूल के प्रधानाध्यापक की तरह व्यवहार कर रहे हैं, जो अक्सर अनुभवी विपक्षी नेताओं को उपदेश देते हैं और उन्हें सदन में बोलने से रोकते हैं। खरगे ने यह भी दावा किया था कि सदन में हुई गड़बड़ी के लिए स्वयं श्री धनखड़ जिम्मेदार हैं।</div><div><br></div><div>राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने विपक्ष का सभापति धनखड़ को हटाने का नोटिस खारिज कर दिया था, जिसमें पक्षपातपूर्ण तरीके से उच्च सदन के संचालन का आरोप लगाते हुए सभापति जगदीप धनखड़ को पद से हटाने की मांग की गई थी। हरिवंश ने यह कहते हुए विपक्ष का नोटिस खारिज कर दिया कि यह तथ्यों से परे है और इसका मकसद केवल प्रचार हासिल करना है। उपसभापति ने कहा था कि धनखड़ के खिलाफ नोटिस अनुचित और त्रुटिपूर्ण है, जिसे उपराष्ट्रपति की प्रतिष्ठा को धूमिल करने के लिए जल्दबाजी में तैयार किया गया है। राज्यसभा के महासचिव पी सी मोदी को सौंपे अपने फैसले में हरिवंश ने कहा कि नोटिस देश की संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा कम करने और मौजूदा उपराष्ट्रपति की छवि खराब करने की साजिश का हिस्सा है।</div><div><br></div><div>इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस (इंडिया गठबंधन) के घटक दलों ने सभापति धनखड़ को उपराष्ट्रपति पद से हटाने के लिए प्रस्ताव लाने संबंधी नोटिस 10 दिसंबर को राज्यसभा के महासचिव को सौंपा था। नोटिस पर कांग्रेस, टीएमसी, आम आदमी पार्टी, डीएमके, समाजवादी पार्टी और कई अन्य विपक्षी दलों के 60 नेताओं ने हस्ताक्षर किए थे। कांग्रेस संसदीय दल की प्रमुख सोनिया गांधी, नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, डीएमके नेता तिरुचि शिवा और टीएमसी के नेता डेरेक ओब्रायन ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। समाजवादी पार्टी के नेता रामगोपाल यादव, आम आदमी पार्टी के संजय सिंह, तृणमूल कांग्रेस के सुखेंदु शेखर रॉय, राज्यसभा में कांग्रेस के उप नेता प्रमोद तिवारी, मुख्य सचेतक जयराम रमेश, वरिष्ठ नेता राजीव शुक्ला तथा कई अन्य सीनियर सदस्यों ने धनखड़ के खिलाफ दिए गए नोटिस पर हस्ताक्षर किए थे।</div><div><br></div><div>संसद के दोनों सदनों के प्रमुखों के खिलाफ हटाने के प्रयासों के अलावा विपक्षी दलों ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने के लिए महाभियोग प्रस्ताव लाने के संबंध में लोकसभा और राज्यसभा में सौंपा है। एसआईआर को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। विपक्ष का आरोप है कि इस प्रक्रिया का इस्तेमाल भाजपा को चुनावी लाभ पहुंचाने के लिए किया जा रहा है। हालांकि जिस तरह लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति को हटाने के विपक्ष के प्रयास सफल नहीं हो सके, उसी तरह मुख्य निर्वाचन आयुक्त के खिलाफ महाभियोग के भी पारित होने की संभावना क्षीण है। विपक्ष के पास महाभियोग पारित कराने के लिए आवश्यक संख्या बल नहीं है। इस तरह के संवैधानिक पदों पर आसीन लोगों को हटाने के लिए एकजुट विपक्ष के प्रयास बेशक सफल नहीं हो पाएं, किन्तु ऐसे प्रयासों से इन पदों की गरिमा कम हुई है। देश में विपक्ष को पूरी तरह से खारिज करके मजबूत लोकतंत्र की तरफ नहीं बढ़ा जा सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>संवैधानिक संस्थाओं की निष्पक्षता पर उठते सवालों के घेरे में भारत के नियंत्रक-महालेखा परीक्षक (कैग) का पद भी आ चुका है। इस पद के चयन के लिए कमेटी बनाने की मांग पर सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका लंबित है। एनजीओ सेंटर फॉर पब्लिक इंट्रेस्ट लिटिगेशन की याचिका में कहा गया है कि अभी कैग की नियुक्ति प्रधानमंत्री की सिफारिश पर राष्ट्रपति करते हैं। इस पद की अहमियत को देखते हुए इसके लिए योग्य और निष्पक्ष व्यक्ति का चयन जरूरी है इसलिए, सुप्रीम कोर्ट प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता विपक्ष और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस की कमेटी के जरिए कैग के चयन का आदेश दे। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर केंद्र सरकार को नोटिस जारी कर चुका है।</div><div><br></div><div>संवैधानिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर उठते सवाल भारतीय लोकतंत्र में एक गंभीर विषय बन गए हैं। इन संस्थाओं को परिपक्वता से काम करना चाहिए ताकि उन पर सवाल न उठें।&nbsp; विपक्ष का आरोप है कि इन संस्थाओं का इस्तेमाल राजनीतिक हितों के लिए किया जा रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि वे संविधान के अनुसार काम कर रही हैं। यह बहस लोकतंत्र के लिए जन आंदोलन का रूप ले चुकी है।</div><div><br></div><div>-&nbsp; योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 11:46:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/democracy-weakened-by-questions-raised-over-constitutional-institutions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/30/indian-parliament_large_1151_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जनसंख्या नियंत्रण की आवश्यकता: बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम और पारंपरिक भ्रांतियाँ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/adverse-consequences-of-a-growing-population-and-traditional-misconceptions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत आज दुनिया का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन चुका है। 2024 में भारत की जनसंख्या लगभग 145 करोड़ को पार कर गई है। यह एक ऐसी समस्या है जो देश के विकास, संसाधनों, पर्यावरण और लोगों के जीवन स्तर पर सीधा असर डालती है। एक तरफ जहाँ देश तरक्की की राह पर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती आबादी उस तरक्की को खा जा रही है। सड़कों पर भीड़, अस्पतालों में लंबी कतारें, स्कूलों में जगह की कमी और बेरोजगारी— ये सब बढ़ती जनसंख्या के प्रत्यक्ष परिणाम हैं। इस लेख में हम बढ़ती जनसंख्या से होने वाले नुकसानों को समझेंगे और उन पारंपरिक विचारधाराओं का खंडन करेंगे जो अधिक संतान पैदा करने को प्रेरित करती हैं।</div><div><br></div><div><b>बढ़ती जनसंख्या के दुष्परिणाम: </b>गरीबी और भुखमरी: जब किसी परिवार में कमाने वाला एक होता है और खाने वाले दस, तो गरीबी अपने आप आ जाती है। यही बात पूरे देश पर लागू होती है। भारत में उत्पादन बढ़ रहा है, लेकिन उससे कहीं ज्यादा तेजी से आबादी बढ़ रही है। नतीजा यह होता है कि प्रति व्यक्ति आय कम रह जाती है। करोड़ों लोग आज भी दो वक्त की रोटी के लिए जूझ रहे हैं। गरीबी का सीधा संबंध अधिक जनसंख्या से है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/census-2027-nityanand-rai-said-census-will-be-conducted-in-two-phases-online-option-also-available" target="_blank">Census 2027 पर बड़ा ऐलान: नित्यानंद राय बोले- दो चरणों में होगी जनगणना, Online का भी मिलेगा विकल्प</a></h3><div><b>बेरोजगारी : </b>हर साल लाखों युवा पढ़-लिखकर नौकरी ढूँढने निकलते हैं, लेकिन नौकरियाँ उतनी तेजी से नहीं बढ़तीं जितनी तेजी से लोग बढ़ रहे हैं। एक सरकारी पद के लिए लाखों आवेदन आते हैं। इससे निराशा, अपराध और सामाजिक अस्थिरता बढ़ती है। अगर जनसंख्या नियंत्रित होती तो हर हाथ को काम मिलना आसान होता।</div><div><br></div><div><b>शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर बोझ: </b>सरकारी स्कूलों में एक कक्षा में 60-70 बच्चे बैठते हैं, जहाँ शिक्षक का ध्यान हर बच्चे पर देना असंभव हो जाता है। सरकारी अस्पतालों में मरीजों की इतनी भीड़ होती है कि डॉक्टर को एक मरीज को देखने के लिए मुश्किल से दो मिनट मिलते हैं। बढ़ती आबादी के कारण सरकार चाहकर भी हर व्यक्ति तक अच्छी शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधा नहीं पहुँचा पाती।</div><div><br></div><div><b>पर्यावरण का विनाश:</b> ज्यादा लोग यानी ज्यादा जमीन की जरूरत, ज्यादा पानी की खपत, ज्यादा प्रदूषण और ज्यादा कचरा। जंगल काटकर बस्तियाँ बसाई जा रही हैं, नदियाँ प्रदूषित हो रही हैं, भूजल का स्तर गिर रहा है। जलवायु परिवर्तन का एक बड़ा कारण अनियंत्रित जनसंख्या वृद्धि है। अगर यही रफ्तार जारी रही तो आने वाली पीढ़ियों को साफ पानी और स्वच्छ हवा भी नसीब नहीं होगी।</div><div><br></div><div><b>आवास और शहरीकरण की समस्या: </b>शहरों में जगह कम पड़ रही है। मुंबई, दिल्ली जैसे शहरों में झुग्गी-झोपड़ियों की संख्या बढ़ती जा रही है। लोग तंग और अस्वच्छ जगहों पर रहने को मजबूर हैं। ट्रैफिक जाम, पानी की कमी और बिजली की समस्या — ये सब अधिक जनसंख्या का ही नतीजा है।</div><div><br></div><div><b>अपराध और सामाजिक अशांत:</b> जब लोगों की बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं होतीं तो अपराध बढ़ता है। भूख, बेरोजगारी और निराशा लोगों को गलत रास्ते पर धकेलती है। अधिक जनसंख्या वाले इलाकों में चोरी, लूट और हिंसा की घटनाएँ ज्यादा देखी जाती हैं।</div><div><br></div><div><b>पारंपरिक भ्रांतियाँ और उनका खंडन:</b> हमारे समाज में कई ऐसी पुरानी मान्यताएँ प्रचलित हैं जो लोगों को अधिक संतान पैदा करने के लिए प्रेरित करती हैं। इन मान्यताओं की जड़ें धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परंपराओं में हैं। आइए इन भ्रांतियों को एक-एक करके समझें और उनका तर्कपूर्ण खंडन करें।</div><div><br></div><div><b>भ्रांति 1:</b> संतान से मोक्ष मिलता है: यह सबसे प्रचलित मान्यता है कि पुत्र के बिना मोक्ष नहीं मिलता। कहा जाता है कि पुत्र पिंडदान करेगा तो पूर्वज मुक्त होंगे। इस मान्यता के कारण लोग बेटे की चाह में कई संतानें पैदा करते रहते हैं।</div><div><br></div><div><b>खंडन :</b> अगर हम धर्मग्रंथों को गहराई से पढ़ें तो मोक्ष कर्म, ज्ञान और भक्ति से मिलता है, संतान की संख्या से नहीं। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं कि मोक्ष का मार्ग निष्काम कर्म और आत्मज्ञान है। कोई भी धर्मग्रंथ यह नहीं कहता कि जिसके ज्यादा बच्चे होंगे, उसे ज्यादा पुण्य मिलेगा। मोक्ष व्यक्ति के अपने आचरण, सदाचार और आध्यात्मिक साधना पर निर्भर करता है। अगर संतान से ही मोक्ष मिलता तो संन्यासियों, साधुओं और ऋषि-मुनियों को मोक्ष कैसे प्राप्त होता? शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद — इन सबने संतान नहीं उत्पन्न की, फिर भी ये महापुरुष माने गए।</div><div><br></div><div><b>भ्रांति 2: </b>बेटा जरूरी है, बेटी से काम नहीं चलता : समाज में यह धारणा गहरी जड़ें जमाए बैठी है कि बेटा वंश आगे बढ़ाता है, बुढ़ापे का सहारा बनता है और अंतिम संस्कार करता है। इसलिए लोग बेटे की चाह में बच्चे पैदा करते रहते हैं।</div><div><br></div><div><b>खंडन : </b>आज के समय में बेटियाँ हर क्षेत्र में बेटों से आगे निकल रही हैं। चाहे सेना हो, अंतरिक्ष हो, खेल हो या प्रशासन — बेटियाँ हर जगह अपना परचम लहरा रही हैं। कई बेटियाँ अपने माता-पिता की बुढ़ापे में बेटों से बेहतर देखभाल करती हैं। रही बात अंतिम संस्कार की, तो आज कानूनी रूप से बेटी को भी यह अधिकार प्राप्त है। जो लोग बेटे की चाह में पाँच-छह बेटियाँ पैदा कर देते हैं, वे न उन बेटियों को अच्छी शिक्षा दे पाते हैं, न अच्छा जीवन। यह कोई समझदारी नहीं, बल्कि मूर्खता है।</div><div><br></div><div><b>भ्रांति 3 :</b> ज्यादा बच्चे यानी बुढ़ापे का सहारा : कई लोग सोचते हैं कि जितने ज्यादा बच्चे होंगे, बुढ़ापे में उतना ज्यादा सहारा मिलेगा। उनका मानना है कि एक-दो बच्चे हुए तो कौन देखभाल करेगा।</div><div><br></div><div><b>खंडन :</b> सच्चाई यह है कि आज के समय में ज्यादा बच्चे होने का मतलब ज्यादा सहारा नहीं, बल्कि ज्यादा खर्चा और ज्यादा चिंता है। अगर आप दो बच्चों को अच्छी शिक्षा देते हैं, उन्हें संस्कारवान बनाते हैं, तो वे दो बच्चे दस बच्चों से बेहतर देखभाल करेंगे। दूसरी तरफ, अगर पाँच-छह बच्चे हों और किसी को भी अच्छी शिक्षा या संस्कार न मिले, तो वे सब मिलकर भी बुढ़ापे में सहारा नहीं बन पाएँगे। आज वृद्धाश्रमों में ऐसे बहुत से बुजुर्ग हैं जिनके चार-पाँच बच्चे हैं, लेकिन कोई उनकी सुध लेने वाला नहीं।</div><div><br></div><div><b>भ्रांति 4 : </b>संतान ईश्वर की देन है, रोकना पाप है : कुछ लोगों का मानना है कि संतान ऊपर वाले की मर्जी से आती है और इसे रोकना ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध है। इसलिए वे परिवार नियोजन को पाप मानते हैं।</div><div><br></div><div><b>खंडन : </b>ईश्वर ने इंसान को बुद्धि भी दी है। अगर हम बुद्धि का उपयोग नहीं करेंगे तो यह ईश्वर की देन का अपमान होगा। ईश्वर ने हमें सोचने-समझने की शक्ति दी है ताकि हम सही फैसले ले सकें। जब कोई व्यक्ति अपनी आर्थिक हालत जानते हुए भी बिना सोचे-समझे बच्चे पैदा करता रहता है और फिर उन बच्चों को भूखा, अशिक्षित और बीमार रखता है — तो क्या यह ईश्वर की सेवा है? यह तो उन मासूम बच्चों के साथ अन्याय है। असली धर्म यह है कि जितने बच्चे पैदा करो, उन सबकी अच्छे से परवरिश करो। अगर यह संभव नहीं, तो संयम रखना ही सबसे बड़ा धर्म है।</div><div><br></div><div><b>भ्रांति 5 :</b> परिवार नियोजन शरीर के लिए हानिकारक है</div><div><br></div><div>ग्रामीण क्षेत्रों में यह अफवाह बहुत फैली हुई है कि नसबंदी या गर्भनिरोधक उपायों से शरीर कमजोर हो जाता है, काम करने की ताकत खत्म हो जाती है या और भी कई तरह की बीमारियाँ हो जाती हैं।</div><div><br></div><div><b>खंडन :</b> चिकित्सा विज्ञान ने बार-बार यह सिद्ध किया है कि आधुनिक परिवार नियोजन के तरीके पूरी तरह सुरक्षित हैं। नसबंदी एक छोटी सी प्रक्रिया है जिसमें कोई खतरा नहीं होता। गर्भनिरोधक गोलियाँ और अन्य उपाय डॉक्टर की सलाह से लेने पर बिल्कुल सुरक्षित हैं। उलटा, बार-बार गर्भधारण से महिलाओं के शरीर को बहुत ज्यादा नुकसान होता है। कम उम्र में बार-बार माँ बनना महिलाओं में कमजोरी, खून की कमी और कई गंभीर बीमारियों का कारण बनता है।</div><div><br></div><h2>जनसंख्या नियंत्रण के उपाय</h2><div>जनसंख्या नियंत्रण कोई कठिन काम नहीं है, बस इसके लिए जागरूकता और इच्छाशक्ति चाहिए। सबसे पहले शिक्षा का प्रसार जरूरी है, खासकर लड़कियों की शिक्षा। जो परिवार शिक्षित होते हैं, वे खुद समझ जाते हैं कि छोटा परिवार ही सुखी परिवार है। परिवार नियोजन के साधनों को गाँव-गाँव तक पहुँचाना जरूरी है। सरकार को जागरूकता अभियान चलाने चाहिए जो धार्मिक भ्रांतियों को दूर करें। महिला सशक्तिकरण भी जनसंख्या नियंत्रण में बहुत बड़ी भूमिका निभाता है — जब महिलाएँ आत्मनिर्भर होती हैं तो वे अपने शरीर और अपने परिवार के बारे में सही फैसले लेती हैं।</div><div><br></div><div>निष्कर्ष : बढ़ती जनसंख्या भारत की सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक है। यह गरीबी, बेरोजगारी, पर्यावरण विनाश और सामाजिक अशांति की जड़ है। पारंपरिक मान्यताएँ जैसे संतान से मोक्ष, बेटे की अनिवार्यता, ज्यादा बच्चे ज्यादा सहारा — ये सब भ्रम हैं जिनका कोई तार्किक या धार्मिक आधार नहीं है। असली धर्म यह है कि जो बच्चे हैं उनकी अच्छी परवरिश हो, उन्हें शिक्षा मिले, स्वास्थ्य मिले और एक सम्मानजनक जीवन मिले। यह तभी संभव है जब परिवार छोटा हो।</div><div><br></div><div>हमें पुरानी सोच को बदलना होगा। मोक्ष संतानों की संख्या से नहीं, अच्छे कर्मों से मिलता है। बेटे और बेटी में कोई भेद नहीं है। बुढ़ापे का सहारा ज्यादा बच्चे नहीं, बल्कि अच्छे संस्कार वाले बच्चे होते हैं। परिवार नियोजन पाप नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और समझदार कदम है। जब तक हम यह नहीं समझेंगे, तब तक न तो हमारा परिवार खुशहाल होगा और न ही हमारा देश। छोटा परिवार, सुखी परिवार — यह सिर्फ एक नारा नहीं, बल्कि जीवन का सत्य है।</div><div><br></div><div>- डॉ. शैलेश शुक्ला</div><div>वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह</div><div>सलाहकार संपादक, नईदुनिया</div><div>आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 28 Mar 2026 11:39:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/adverse-consequences-of-a-growing-population-and-traditional-misconceptions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/28/population_large_1143_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[धर्म, जाति और धर्मांतरण: सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/religion-caste-and-conversion-the-supreme-court-historic-verdict]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धर्म, जाति और धर्मांतरण का प्रश्न भारत के सामाजिक, संवैधानिक और राष्ट्रीय जीवन से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील और जटिल विषय है। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह निर्णय कि यदि अनुसूचित जाति का कोई व्यक्ति हिन्दू, सिख या बौद्ध धर्म छोड़कर किसी अन्य धर्म को स्वीकार कर लेता है तो वह अनुसूचित जाति का संवैधानिक दर्जा और उससे जुड़े लाभों का अधिकारी नहीं रहेगा, केवल एक सामान्य कानूनी निर्णय नहीं है, बल्कि यह भारतीय संविधान की मूल भावना, सामाजिक न्याय की अवधारणा और राष्ट्रीय एकता की आवश्यकता को ध्यान में रखकर दिया गया एक दूरगामी और ऐतिहासिक निर्णय है। इस निर्णय को भारतीय न्याय व्यवस्था की परिपक्वता, संतुलन और दूरदर्शिता का प्रतीक कहा जा सकता है।</div><div><br></div><div>भारत में अनुसूचित जाति की व्यवस्था का निर्माण किसी धर्म विशेष को लाभ देने के लिए नहीं किया गया था, बल्कि उन सामाजिक वर्गों को संरक्षण और अवसर देने के लिए किया गया था, जो सदियों से सामाजिक भेदभाव, अस्पृश्यता और सामाजिक बहिष्कार का सामना करते रहे थे। संविधान निर्माताओं ने यह माना था कि समाज में जो ऐतिहासिक अन्याय और सामाजिक असमानता रही है, उसे दूर किए बिना वास्तविक समानता स्थापित नहीं की जा सकती। इसी कारण आरक्षण और विशेष कानूनी संरक्षण की व्यवस्था की गई। यह व्यवस्था मूलतः सामाजिक भेदभाव पर आधारित थी, आर्थिक आधार पर नहीं। इसलिए अनुसूचित जाति का प्रश्न धर्म से अधिक सामाजिक संरचना से जुड़ा हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-socio-political-implications-of-the-supreme-order-regarding-religion-and-caste" target="_blank">धर्म और जाति को लेकर आए 'सुप्रीम आदेश' के राजनीतिक-सामाजिक मायने</a></h3><div>जब कोई व्यक्ति धर्म परिवर्तन कर ऐसे धर्म को स्वीकार करता है, जहां जाति व्यवस्था को मान्यता नहीं दी जाती, तो फिर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या उसे उसी आधार पर अनुसूचित जाति के लाभ मिलते रहने चाहिए। इसी प्रश्न को लेकर वर्षों से देश में बहस चलती रही है। कई मामलों में यह देखा गया कि व्यक्ति ने धर्म परिवर्तन कर लिया, वह दूसरे धर्म की धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था में सक्रिय भी हो गया, लेकिन वह अनुसूचित जाति के आरक्षण, छात्रवृत्ति, नौकरी में आरक्षण और एससी/एसटी एक्ट जैसे कानूनों का लाभ लेना चाहता था। इससे एक प्रकार की कानूनी और सामाजिक विसंगति उत्पन्न हो रही थी। सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी विसंगति को दूर करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है और यह स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का उपयोग उसी सामाजिक संदर्भ में किया जा सकता है, जिसके लिए वे बनाई गई थीं।</div><div><br></div><div>धर्मांतरण का प्रश्न भारत में केवल धार्मिक आस्था का विषय नहीं रहा है, बल्कि कई बार यह सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और जनसंख्या संतुलन से भी जुड़ जाता है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में विशेषकर गरीब, वंचित और अनुसूचित जाति तथा जनजाति वर्गों में धर्मांतरण की घटनाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। कई बार धर्मांतरण शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और सामाजिक सहायता के माध्यम से हुआ, तो कई बार लालच, प्रलोभन, दबाव या सामाजिक परिस्थितियों के कारण भी धर्म परिवर्तन के आरोप लगे। इसी कारण कई राज्यों ने धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए कानून बनाए, ताकि बल, प्रलोभन या धोखे से होने वाले धर्म परिवर्तन को रोका जा सके, लेकिन इन कानूनों का प्रभाव उतना व्यापक नहीं हो पाया जितनी अपेक्षा थी।</div><div><br></div><div>जब किसी विशेष सामाजिक वर्ग का बड़े पैमाने पर धर्म परिवर्तन होता है, तो उसका प्रभाव केवल धर्म पर ही नहीं पड़ता, बल्कि जातीय संरचना, सामाजिक संतुलन, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सामाजिक संबंधों पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे यह स्थिति सामाजिक और धार्मिक संतुलन को प्रभावित करने लगती है। भारत जैसे बहुधर्मी और बहुजातीय देश में सामाजिक और धार्मिक संतुलन का बने रहना राष्ट्रीय एकता और अखंडता के लिए अत्यंत आवश्यक है। यदि समाज लगातार जाति, धर्म और वर्ग के आधार पर बदलता और विभाजित होता रहेगा, तो इसका प्रभाव सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय एकता पर पड़ना स्वाभाविक है। इस दृष्टि से धर्मांतरण का प्रश्न केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं रह जाता, बल्कि यह सामाजिक और राष्ट्रीय संतुलन का भी प्रश्न बन जाता है।</div><div><br></div><div>आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य भी यही था कि जो लोग सामाजिक रूप से वंचित हैं, उन्हें शिक्षा, रोजगार और सामाजिक सम्मान के क्षेत्र में अवसर मिल सके। लेकिन यदि धर्म परिवर्तन के बाद भी लोग आरक्षण का लाभ लेते रहेंगे, तो इससे आरक्षण व्यवस्था का मूल उद्देश्य प्रभावित होगा और वास्तविक जरूरतमंद लोगों के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा। इससे समाज में असंतोष और असंतुलन भी उत्पन्न हो सकता है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय आरक्षण व्यवस्था को अधिक न्यायसंगत, पारदर्शी और उद्देश्यपूर्ण बनाने की दिशा में भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यह निर्णय यह स्पष्ट करता है कि संविधान की सुविधाएँ अधिकार हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।</div><div><br></div><div>भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता में एकता है। यहां अनेक धर्म, जातियां, भाषाएं और संस्कृतियां होते हुए भी देश एक है। लेकिन यदि धर्म, जाति और जनसंख्या संतुलन को लेकर लगातार राजनीतिक और सामाजिक प्रयोग होते रहेंगे, तो इससे राष्ट्रीय एकता प्रभावित हो सकती है। धर्मांतरण यदि पूरी तरह से व्यक्तिगत आस्था और विचार की स्वतंत्रता के आधार पर हो तो वह व्यक्ति का अधिकार है, लेकिन यदि वह लालच, भय, दबाव, सामाजिक अलगाव या राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हो, तो वह केवल धार्मिक परिवर्तन नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय संतुलन को प्रभावित करने वाली प्रक्रिया बन जाता है। इसलिए इस विषय पर संतुलित, संवेदनशील और राष्ट्रीय दृष्टि से विचार करना आवश्यक है।</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है। यह निर्णय केवल यह नहीं कहता कि धर्म परिवर्तन के बाद अनुसूचित जाति का दर्जा समाप्त हो जाएगा, बल्कि यह निर्णय संविधान की मूल भावना को भी स्पष्ट करता है कि सामाजिक न्याय का आधार सामाजिक वास्तविकता है, न कि केवल कानूनी तकनीक। यह निर्णय यह भी स्पष्ट करता है कि संविधान द्वारा दी गई सुविधाओं का उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना है, न कि कानूनी व्यवस्था का दुरुपयोग होने देना।</div><div><br></div><div>आज भारत एक नए दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां कानून, संविधान और न्याय व्यवस्था केवल तकनीकी व्याख्याओं तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सामाजिक वास्तविकता, राष्ट्रीय हित और सामाजिक संतुलन को ध्यान में रखकर निर्णय दिए जा रहे हैं। इस दृष्टि से यह निर्णय नए भारत की कानूनी सोच और संवैधानिक दृष्टि का प्रतीक भी कहा जा सकता है। यह निर्णय यह संदेश देता है कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता दोनों साथ-साथ चल सकते हैं और संविधान दोनों की रक्षा करने में सक्षम है।</div><div><br></div><div>अंततः यह कहा जा सकता है कि धर्म, जाति, आरक्षण और धर्मांतरण का प्रश्न भारत में लंबे समय से विवाद और बहस का विषय रहा है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह निर्णय इस जटिल विषय को स्पष्ट करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है। इससे न केवल आरक्षण व्यवस्था अधिक स्पष्ट और न्यायसंगत बनेगी, बल्कि धर्मांतरण और कानूनी लाभ के बीच जो विसंगतियाँ थीं, वे भी काफी हद तक समाप्त होंगी। यह निर्णय सामाजिक संतुलन, कानूनी स्पष्टता और राष्ट्रीय एकता-तीनों को मजबूत करने वाला निर्णय है। इसलिए यह कहना उचित होगा कि यह निर्णय केवल एक न्यायालय का फैसला नहीं, बल्कि नए भारत, सशक्त भारत और संगठित भारत की दिशा में एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ के रूप में देखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 13:01:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/religion-caste-and-conversion-the-supreme-court-historic-verdict</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/25/supreme-court_large_1305_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[धार्मिक स्थलों को क्यों नही मिलती बंदरों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-do-religious-sites-not-find-relief-from-monkeys]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक स्थलों को बंदरों से क्यों नही मिलती मुक्ति। सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह है कि इन स्थानों पर आने वाले श्रृद्धालु कब तक इनके आंतक झेलते रहेंगे? कब तक इनका शिकार होते रहेंगे?</div><div><br></div><div>हाल में राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु अपने कार्यकाल में 19 मार्च को वृंदावन आईं। वे दूसरी बार यहां आईं है। इससे पहले इसी पद पर रहते हुए प्रणब मुखर्जी व रामनाथ कोविंद भी अपने कार्यकाल में दो बार वृंदावन आए थे। लेकिन, राष्ट्रपति मुर्मु&nbsp; वृंदावन के तीन दिवसीय प्रवास पर आने वाली पहली राष्ट्रपति हैं। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्रप्रसाद, ज्ञानी जैल सिंह एक बार वृंदावन आए। उपराष्ट्रपति पद पर रहते हुए डॉक्टर शंकरदयाल शर्मा, आर वेंकटरामन, डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन भी वृंदावन अपनी धार्मिक यात्रा पर आ चुके हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/high-alert-ahead-of-president-murmu-vrindavan-visit" target="_blank">President Murmu के Vrindavan दौरे से पहले हाई अलर्ट, चश्मा चोर बंदरों को डराएंगे लंगूर के कटआउट</a></h3><div>निवर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद भी दो बार वृंदावन आए। आश्रय सदन में वृद्ध विधवा माताओं से मुलाकात करने आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते प्रणब मुखर्जी पहली बार 16 नवंबर 2014 को अक्षयपात्र में चंद्रोदय मंदिर के भूमि पूजन में आए तो दूसरी बार 18 नवंबर 2015 को चैतन्य महाप्रभु के वृंदावन आगमनोत्सव के पांच सौ वे वर्ष पूरे होने पर आयोजित कार्यक्रम में आए थे। राष्ट्रपति पद पर रहते ज्ञानी जैल सिंह 1987 में वृंदावन आए और रंगजी मंदिर में दर्शन करने पहुंचे थे 1957 में देश के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद वृंदावन आए। उप राष्ट्रपति पद पर रहते 1985 में आर वेंकटरामन, 1993 में डॉ. शंकरदयाल शर्मा, 1959 में डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन वृंदावन आ चुके हैं। राष्ट्रपति या कोई वीवीआईपी जब भी वृंदावन आता है। प्रत्येक बार उनकी सुरक्षा तो होती ही है। सबसे बड़ा काम होता है वीवीआईपी को यहां के झपटमार बदंर से बचाना। ये बंदर झपटामार कर श्रद्धालु का चश्मा उतारते और किसी ऊंची जगह पेड़ या दीवार पर जाकर बैठ जाते हैं। ये चश्मा तभी लौटाते हैं जब उन्हें खाने के लिए फ्रूटी, केला या दूसरे खाने के सामान दिए जाएं। वीवीआईपी दौरे को देखते हुए प्रशासन लंगूरों के जगह−जगह कट आउट लगवाता है। माना जाता है कि लंगूर से बंदर डरतें हैं। उन्हें डराने के लिए ऐसा&nbsp; किया जाता है। कुछ जगह लंगूर भी लाकर बांध दिए जाते हैं। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु की सुरक्षा से लेकर रूट पर व्यवस्थाओं को दुरस्त करने के लिए जिला प्रशासन ने रात दिन एक कर दिया। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मु के दौरे को देखते एक प्रशासन ने लंगूरों के जगह−जगह कट आउट लगवाए।</div><div><br></div><div>लेखक को चित्रकूट में हनुमान गढ़ी जाने का अवसर मिला। वहां रास्ते में बंदर और लंगूर मिलते और आपके कपड़े और बैग पकड़कर रोक लेते हैं। वे आपके बैग और जेब से खाने का सामान प्रसाद आदि निकालकर ही आपको आगे जाने देते हैं। शुक्रताल में तो हनुमान धाम में बंदरों को भगाने के लिए लंगूर बांधा हुआ था। बंदर उसके अभयस्त हो गए थे। उन्हें पता था कि रस्सी में बंधे लंगूर की पंहुच कहां तक हैं। बदंर आते और लंगूर की पंहुच की दूरी से अगल रहकर लौट जाते।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रश्न है कि वीवीआईपी के आने पर ही क्यों बंदरों को रोकने की व्यवस्था होती है। देश के आम आदमी को भी वीवीआईपी क्यों नही समझा जाता। उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी तो सरकार की है। उसके लिए क्यों नही ऐसी व्यवस्थाएं होती। बंदर हम हिंदुओं की श्रद्धा है। हम उसे पवित्र मानते हैं। पूजनीय मानते है। इतना होने पर भी उसके भोजन की व्यवस्था क्यों नही करते। अयोध्या में बड़ी तादाद में बंदर है। हनुमान गढ़ी पर मैंने बंदरों को फूलों की माला तोड़कर उसमें भोजन के अंश तलाशते देखा है। इसी शहर में डस्टविन से भोजन खोजते बंदर मुझे मिलें हैं। हमारी समाज सेवी संस्थाए क्यों नही इनके भोजन की जरूरत पूरी करती। बंदरों की संख्या लगातार बढ़ रही है। बढती बंदरों की जनसंख्या को भोजन चाहिए। भोजन ने मिलने वह निरीह प्राणी अपना पेट भरने के लिए कुछ तो करेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>बंदरों के आतंक के कारण कई शहरों में तो महिलाओं और बच्चों का छतों पर जाना कठिन हो गया है। शहरों की नही अब तो जंगल में भी इनकी बढ़ती आबादी किसानों के लिए संकट बन चुकी है। भोजन के अभाव में बंदर खेतों की फसल तोड़कर खा रहे हैं। गेंहू की बाली खा जाते है। बोए गए गन्ने के बीज जमीन से निकाल कर वे अपनी उदरपूर्ति कर रहे हैं। किसान फसल की रक्षा को लेकर परेशान हैं। अब तो किसानों ने खेतों की रक्षा के लिए नौकर रखने शुरू कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>आज बंदरों का आंतक धार्मिक स्थलों के साथ अन्य स्थानों पर भी बढ़ता जा रहा है। शहरी आबादी के साथ किसान भी परेशान है। आज जरूरी हो गया है कि सरकार द्वारा बंदरों की आबादी कम करने के लिए अभियान चलाया जाए। बंदरों के ग्रुप लीडर की नसंबदी कराकर उनकी आबादी नियंत्रित की जाए। जनता के शोर मचाने पर बंदरों का पकड़कर जंगलों में छोड़ा जाना कोई स्थायी निदान नही है। ये जंगल और वनों से लौटकर फिर आबादी की ओर आ जाते हैं। बढ़ती बंदरों की आबादी को भोजन चाहिए। भोजन न मिलने पर उन्हें भी पेट भरना है। जैसे आदमी अपनी भोजन की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे साधन ढ़ूंढ़ता है। वैसे ही आज बंदर कर रहे हैं। तीर्थ स्थलों पर चश्मा छीन रहे हैं तो कुछ जगह श्रद्धालुओं को पकड़कर उनके बैग से भोजन ले रहे हैं। गांव और शहरों में भोजन के लिए कपड़े उठाकर ले जाना आम बात है। ये उठाए गए कपड़े तब छोड़ते हैं, जब उन्हें खाने की सामग्री मिल जाए।</div><div>&nbsp;</div><div>अशोक मधुप</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 11:17:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-do-religious-sites-not-find-relief-from-monkeys</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/24/monkeys_large_1121_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Yogi Adityanath के 9 साल: Ram Mandir से Kashi Corridor तक, UP में सांस्कृतिक पुनर्जागरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cm-yogi-9-years-report-card]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2017 में विधानसभा चुनावों के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बनी भाजपा गठबंधन की सरकार ने नौ वर्ष पूर्ण कर लिए हैं। इन नौ वर्षों में सरकार ने कानून व्यवस्था, सांस्कृतिक पुनर्जागरण तथा विकास के अनेक प्रतिमान गढ़े हैं। अपनी उपलब्धियों को जन जन तक पहुँचाने के लिए सरकार ने, ''नवनिर्माण के नौ वर्ष'' नामक पुस्तक का प्रकाशन भी किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वर्ष 2017 के पूर्व उत्तर प्रदेश अराजकता के जाल में फंसा हुआ था। छोटी -छोटी बातों पर फसाद हो जाते थे। कानून और व्यवस्था की बुरी स्थिति के कारण निवेशक यहां आने से डरते थे। मुस्लिम तुष्टिकरण चरम पर था। लोग उल्टा प्रदेश कहकर प्रदेश का उपहास करते थे। 2017 में योगी जी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनने के बाद से इस स्थिति में व्यापक परिवर्तन हुआ है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि अब प्रदेश की पहचान का संकट समाप्त हो चुका है, सुरक्षा निवेश व विकास प्रदेश की नई पहचान बन चुके हैं। प्रदेश में सभी पर्व शांति, सौहार्द के साथ मनाए जा रहे हैं। कहीं कोई तनाव, कर्फ्यू व दंगा नही है। ऐसे माफियाओं का अंत हुआ है जिनके सामने सपा, बसपा व कांग्रेस की पुरानी सरकारें नतमस्तक हो जाया करती थीं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-is-intelligently-bridging-the-discontent-among-bjp-workers-in-uttar-pradesh" target="_blank">उत्तरप्रदेश में भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच उपजे असंतोष को सूझबूझ पूर्वक पाट रहे हैं योगी आदित्यनाथ!</a></h3><div>शासन व्यवस्था में सुधार व मजबूत कानून व्यवस्था के कारण आज प्रदेश का चहुंमुखी विकास हो रहा है। व्यापक स्तर पर सांस्कृतिक पुनर्जागरण हो रहा है। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद अयोध्या में दिव्य व भव्य राम मंदिर का निर्माण हुआ है जहाँ लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। अयोध्या को अपना एयरपोर्ट, आधुनिकीकृत रेलवे स्टेशन, मेडिकल कालेज&nbsp; मिला, सम्पूर्ण अयोध्या नगरी का नवीनतम और पुरातन संस्कृति के सामंजस्य व समन्वय के साथ व्यापक स्तर पर विकास हो रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी प्रकार काशी का विश्वनाथ धाम कॉरिडोर निर्माण से काशी का स्वरूप भी निखरकर सामने आ रहा है। प्रयागराज में महाकुंभ में 66 करोड़ श्रद्धालुओें ने पुण्य की डुबकी लगाकर इतिहास रच दिया। इसी प्रकार मां विन्ध्यवासिनी कॉरिडोर के निर्माण से मां विन्ध्यवासिनी जाने वाले सभी श्रद्धालुओं को एक विशेष अनुभूति व आध्यात्मिक आनंद की प्राप्ति हो रही है। योगी सरकार आने के बाद प्रदेश में धार्मिक पर्यटन के साथ साथ अन्य पर्यटन गतिविधियों का विकास होने के कारण इस क्षेत्र में युवाओ के लिए रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं। प्रदेश की आस्था, संस्कृति व परंपराओं&nbsp; को सम्मान देते हुए उन्हें नई पहचान दिलाने का प्रयास लगातार जारी है। प्रदेश में पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए कई अहम प्रयास किए जा रहे हैं, जिसके अंतर्गत&nbsp; 96 लाख एमएमएमई इकाइयां संचालित की जा रही हैं। लखनऊ में राष्ट्र प्रेरणा स्थल का निर्माण किया गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक जिला-एक उत्पाद योजना, एक जिला एक व्यंजन योजना के साथ ही प्रदेश के हर जिले में कम से कम एक पर्यटन स्थल का विकास किया जा रहा है। विगत नौ वर्षों के कार्यकाल में सरकार ने सुरक्षा, इंफ्रास्ट्रक्चर, निवेश, रोजगार, किसानों के कल्याण, महिलाओं के सशक्तीकरण और गरीबों के उत्थान के लिए व्यापक स्तर पर कार्य किए हैं। अनेकानेक कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से दलितों, वंचितों और समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक सरकारी लाभ पहुंच रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और सेवा क्षेत्रों में सुधार करते हुए सुशासन की दिशा में भी उल्लेखनीय प्रगति हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रदेश में हिंदू समाज के मतांतरण को रोकने के लिए एक कड़ा कानून लाया गया और साथ ही लव जिहाद जैसी घटनाओं को रोकने के लिए भी प्रदेश सरकार कनून लेकर आई। बेटियों की सुरक्षा के लिए एंटी रोमियो स्क्वायड का गठन किया गया। महिला सुरक्षा एवं सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए कई अहम कदम सरकार द्वारा समय-समय पर उठाए जाते रहे हैं। नारी सुरक्षा, सम्मान और स्वावलंबन को समर्पित मिशन शक्ति अभियान प्रदेशभर में चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री सुमंगला योजना से बेटियां सशक्त हो रही हैं। प्रदेश की पीएसी को जीवन्त करते हुए प्रदेश में पहली बार पीएसी मे महिलाओं के लिए तीन नई बटालियन की शुरुआत की गई। गरीब बेटियों के लिए विवाह के समय दी जाने वाली सरकारी सहायता भी बढ़ा दी गई है। मेधावी बेटियों के लिए स्कूटी योजना आई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रदेश का विकास परिवर्तनकारी है आज प्रदेश में सात एक्सप्रेस वे संचालित हैं, 15 का विकास कार्य प्रगति पर है। प्रदेश में 16 एयरपोर्ट संचालित हो रहे हैं और 8 निर्माणाधीन हैं। बहु प्रतीक्षित जेवर एयरपोर्ट का उद्घाटन आगामी 28 मार्च, 2026 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी करेंगे। सात प्रमुख शहरों में मेट्रो सेवा चल रही है। नई सड़क परियोजनाएं राज्य के विकास के लिए पहचान बन चुकी हैं। वाराणसी से प्रयागराज और बलिया से अयोध्या तक वाटर-वे की सुविया बढ़ाई जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश तीव्र गति से विकसित प्रदेश बनने की राह पर अग्रसर है। खाद्यान्न, गन्ना, आम एवं दुग्ध उत्पादन सहित अनेक क्षेत्रों में यूपी देश के पहले पायदान पर पहुंच चुका है। प्रदेश के किसानों को पूरी ईमानदारी से, समय पर भुगतान तो हो रहा है। किसानों की आय दोगुनी करने के लिए व्यापक योजनाएं चलाई जा रही हैं। किसानों तक केंद्र व राज्य सरकार की समस्त योजनाओं का लाभ पहुँचाया जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रदेश में भरपूर निवेश लाने के लिए स्वयं मुख्यमंत्री योगी ने जापान और सिंगापुर का सफल दौरा किया जबकि उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने जर्मनी का सफल दौरा किया। प्रदेश के नौ लाख से अधिक युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल चुकी हैं। युवाओं के लिए सरकार ने कई कदम उठाए तथा ऐतिहासिक घोषणाएं की हैं जिनके अंतर्गत अब प्रदेश सरकार युवाओं को एआई जैसे नये क्षेत्रों में भी प्रशिक्षित करने जा रही है। सरकार ने युवाओं के लिए अभ्युदय कोचिंग चलाई जिससे हजारों छात्र सफल होकर नौकरी प्राप्त कर चुके हैं। मुख्यमंत्री योगी के नेतृत्व वाली सरकार में हिंदुओं के आस्था&nbsp; केंद्रों का सम्मान हुआ है।</div><div><br></div><div>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ हर क्षण जनसमस्याओं के समाधान के प्रति कार्यरत रहते हैं। उन्होंने जनता दरबार के साथ साथ, जनता से सीधे जुड़े रहने के लिए योगी की पाती लिखनी आरम्भ की है। मुख्यंमत्री ने ''नवनिर्माण के नौ वर्ष'' पुस्तक विमोचन के अवसर पर सनतान का संदेश दिया और भविष्य की दृष्टि भी स्पष्ट की।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 21 Mar 2026 14:31:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cm-yogi-9-years-report-card</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/21/yogi-adityanath_large_1434_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mamata Banerjee के किले में इस बार लग सकती है सेंध, पूरे West Bengal में BJP ने बिछाई है जबरदस्त चुनावी बिसात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bjp-laying-a-strong-electoral-ground-across-west-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के लिए भारतीय जनता पार्टी ने अपनी पहली और दूसरी सूची जारी कर साफ संकेत दे दिया है कि इस बार वह आधी अधूरी तैयारी के साथ नहीं बल्कि पूरी ताकत, पूरी रणनीति और पूरी आक्रामकता के साथ मैदान में उतरी है। खासतौर पर दूसरी सूची में 111 उम्मीदवारों के नामों पर नजर डालने पर पता चलता है कि एक एक सीट पर गहरे मंथन के बाद उम्मीदवार तय किये गये हैं। हम आपको बता दें कि हिंगलगंज से रेखा पात्रा, खड़दह से कल्याण चक्रवर्ती, सोनारपुर दक्षिण से रूपा गांगुली, मथाभांगा से निसिथ प्रमाणिक, चोपड़ा से शंकर अधिकारी, बैरकपुर से कौस्तव बागची, कमरहाटी से अरूप चौधरी जैसे नाम सीधे चुनावी मुकाबले को और दमदार बना रहे हैं। इसके अलावा एंटाली से प्रियंका तिबरेवाल और मणिकतला से तपस रॉय जैसे उम्मीदवार राजनीतिक समीकरणों को पूरी तरह बदलने की क्षमता रखते हैं।</div><div><br></div><div>अगर पहली सूची पर नजर डालें तो वहां भी बड़े नामों की भरमार है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी को नंदीग्राम के साथ-साथ भवानीपुर से उतारकर पार्टी ने सीधे ममता बनर्जी को चुनौती दे दी है। दिलीप घोष, स्वपन दासगुप्ता, अग्निमित्रा पाल, रुद्रनील घोष और बंकिम चंद्र घोष जैसे चेहरे इस चुनाव को हाई वोल्टेज बना रहे हैं। खास बात यह है कि इस बार पार्टी ने सिर्फ चर्चित चेहरों पर नहीं बल्कि जमीनी कार्यकर्ताओं पर भी भरोसा दिखाया है। आउसग्राम से कलिता माजी जैसी साधारण पृष्ठभूमि की कार्यकर्ता को टिकट देना इसी रणनीति का हिस्सा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bjp-second-list-released-big-bet-on-nisith-pramanik-and-roopa-ganguly" target="_blank">Bengal Election 2024: BJP की दूसरी लिस्ट जारी, Nisith Pramanik और Roopa Ganguly पर बड़ा दांव</a></h3><div>इस चुनाव का एक और बड़ा और चौंकाने वाला पहलू है पूर्व पुलिस आयुक्त डॉ. राजेश कुमार का राजनीति में प्रवेश। यह सिर्फ एक उम्मीदवार का नाम नहीं बल्कि भाजपा की रणनीतिक चाल है। डॉ. राजेश कुमार का प्रशासनिक अनुभव, वित्त और प्रबंधन में गहरी समझ और कानून व्यवस्था पर मजबूत पकड़ उन्हें एक अलग ही स्तर का नेता बनाती है। कोलकाता के पुलिस आयुक्त के रूप में उनका कार्यकाल, अपराध जांच विभाग और यातायात सुरक्षा जैसे अहम पदों पर उनकी भूमिका उन्हें आम नेता से अलग पहचान देती है।</div><div><br></div><div>उनकी छवि एक सख्त लेकिन न्यायप्रिय अधिकारी की रही है। मानव तस्करी के खिलाफ उनकी मुहिम और कमजोर वर्गों की सुरक्षा के लिए किए गए काम उन्हें जनता के बीच भरोसेमंद चेहरा बनाते हैं। भाजपा के लिए यह कदम इसलिए भी फायदेमंद है क्योंकि बंगाल में कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में एक पूर्व शीर्ष पुलिस अधिकारी का चुनावी मैदान में उतरना सीधे तौर पर संदेश देता है कि पार्टी व्यवस्था सुधारने के लिए गंभीर है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक रूप से भी यह दांव गहरा है। डॉ. राजेश कुमार का प्रशासनिक और बौद्धिक कद भाजपा को उस वर्ग में भी मजबूती देगा जो अब तक तटस्थ रहा है। उनकी कानूनी लड़ाइयों ने यह भी साबित किया है कि वह दबाव में झुकने वाले नहीं हैं। यह छवि भाजपा के लिए चुनाव में बड़ी पूंजी साबित हो सकती है।</div><div><br></div><div>इस चुनाव को और भावनात्मक और विस्फोटक बनाने वाला मुद्दा है आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना। उस दर्दनाक घटना ने पूरे बंगाल को झकझोर दिया था। अब पीड़िता की मां का राजनीति में आने का संकेत यह बता रहा है कि जनता के भीतर गुस्सा अभी ठंडा नहीं हुआ है। महिलाओं का सड़क पर उतरना, रात भर प्रदर्शन करना और न्याय की मांग करना तृणमूल सरकार के खिलाफ एक बड़ा जनमत बना चुका है। माना जा रहा है कि पीड़िता की मां ने भाजपा से पनिहाटी से टिकट मांगा है। भाजपा उन्हें उम्मीदवार बनाने पर विचार कर रही है क्योंकि पार्टी उस जनाक्रोश को राजनीतिक ऊर्जा में बदलने की कोशिश कर रही है। हम आपको बता दें कि पनिहाटी उन 38 सीटों में शामिल है जहां से भाजपा ने अब तक अपने उम्मीदवार घोषित नहीं किये हैं।</div><div><br></div><div>इसके अलावा भाजपा ने सामाजिक समीकरणों पर भी खास ध्यान दिया है। अनुसूचित जाति और जनजाति सीटों पर मजबूत उम्मीदवार उतारकर पार्टी ने अपने आधार को और व्यापक बनाने का प्रयास किया है। उत्तर बंगाल से लेकर दक्षिण तक हर क्षेत्र में संतुलन साधने की रणनीति साफ दिख रही है। इसके अलावा भाजपा अपने संगठन को बूथ स्तर तक मजबूत करने, स्थानीय चेहरों को आगे लाने और ममता सरकार के खिलाफ जन असंतोष को वोट में बदलने की रणनीति भी बहुत पहले ही बना चुकी है और उसी के आधार पर चुनाव प्रचार चलाया जायेगा।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, इस बार भाजपा की सबसे बड़ी ताकत उसका बदला हुआ दृष्टिकोण है। पिछली बार जहां पार्टी पर बाहरी चेहरों पर ज्यादा भरोसा करने का आरोप लगा था, इस बार उसने जमीनी कार्यकर्ताओं और विचारधारा से जुड़े लोगों को प्राथमिकता दी है। इससे कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ा है और संगठन ज्यादा मजबूत नजर आ रहा है। दूसरी तरफ तृणमूल सरकार पर कानून व्यवस्था, महिला सुरक्षा और भ्रष्टाचार जैसे आरोप लगातार भारी पड़ रहे हैं। यही वजह है कि भाजपा पूरे दमखम के साथ यह दावा कर रही है कि इस बार बंगाल में सत्ता परिवर्तन तय है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, उम्मीदवारों की सूची, पूर्व पुलिस आयुक्त जैसे मजबूत चेहरे की भाजपा में एंट्री, जमीनी कार्यकर्ताओं पर भरोसा और जनता के गुस्से को सही दिशा देने की रणनीति ने भाजपा को इस चुनाव में बेहद मजबूत प्रतिद्वंद्वी और सत्ता का सबसे प्रबल दावेदार बना दिया है। अब देखना यह है कि क्या यह रणनीति मतदान के दिन वोट में बदलती है या नहीं, लेकिन इतना तय है कि इस बार बंगाल की लड़ाई पहले से कहीं ज्यादा तीखी, ज्यादा धारदार और ज्यादा निर्णायक होने वाली है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 13:38:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/bjp-laying-a-strong-electoral-ground-across-west-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/20/amit-shah-mamata_large_1341_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[युद्धकाल का संकट, राजनीति और नागरिक कर्तव्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wartime-crisis-politics-and-civic-duty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका-इजराइयल और ईरान युद्ध को प्रारंभ हुए 15 दिन का समय व्यतीत हो चुका है और अभी भी युद्ध का दायरा बढ़ ही रहा है। खाड़ी देशों में चल रहे युद्ध और आक्रामकता के कारण संपूर्ण विश्व में तेल और गैस की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हो रही है। अन्य आवश्यक उत्पादों के जहाजों की आवाजाही भी प्रभावित हो रही है। विश्व के तमाम देशों की सरकारें एवं विपक्षी दल कदम से कडम मिलाकर तेल, गैस व ऊर्जा संकट, आर्थिक अनिश्चितता तथा कार्यालयों के पलायन के कारण उत्पन्न हो रहे संकट का सामना कर रहे हैं। सभी देशों में सत्तापक्ष व विपक्ष मिलजुल कर कर रहे हैं वहीं&nbsp; भारत में विपक्ष इस संकट का उपयोग अपने ही देश को नीचा दिखाने के लिए कर रहा है।</div><div>&nbsp;</div><div>भारत में इस युद्ध तथा उससे उपजे वैश्विक संकट पर अलग ही राजनीति हो रही है। जब से युद्ध आरम्भ हुआ है भारत में लखनऊ से लेकर श्रीनगर और जम्मू कश्मीर के बडगाम जिले तक अमेरिका-इजराइल के खिलाफ आक्रोश व्यक्त करने के लिए आक्रामक विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। विरोध प्रदर्शन कर रहे इन लोगों ने पहले कभी भारत में होने वाले आतंकवादी हमलों निंदा तक नहीं की है। विपक्ष में बैठे राजनीतिक दल तथा उनके नेता इन प्रदर्शनों को हवा दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी की सोनिया गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे आदि सरकार की विदेश नीति के खिलाफ अनवरत लेख लिख रहे हैं और किसी न किसी बहाने प्रधानमंत्री मोदी की छवि को नुकसान पहुंचाने के प्रयास कर रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/questions-arising-from-gas-queues-how-secure-is-india-energy-system" target="_blank">गैस की कतारों से उठते सवाल: कितनी सुरक्षित है भारत की ऊर्जा व्यवस्था?</a></h3><div>युद्धकाल के कारण पूरी दुनिया में आपूर्ति व्यवस्था बाधित हो जाने के कारण तेल, गैस व अन्य उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हो रही है। चीन, जापान, कोरिया जैसे समृद्ध देश और पाकिस्तान, बांग्लादेश व श्रीलंका जैसे हमारे पड़ोसी देश पेट्रोल व डीजल की कीमतों में 10 प्रतिशत से लेकर 60 प्रतिशत तक की वृद्धि कर चुके हैं। कई देशों में महंगाई चरम सीमा पर पहुंच रही है पड़ोसी पाकिस्तान में तो लॉकडाउन जैसे हालात पैदा हो गए हैं जबकि भारत मे पेट्रोल व डीजल के दाम काफी स्थिर हैं। भारत में केवल घरेलू रसोई गैस के दामों में ही 60 रुपए की वृद्धि की गई है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युद्ध से पैदा हुए संकट पर स्वयं नजर रख रहे हैं। भारत के विदेश मंत्री तथा प्रधानमंत्री मोदी दुनियाभर के नेताओं के साथ संपर्क में हैं तथा आपूर्ति श्रृंखला को बनाए रखने के लिए नए मार्ग ढूंढ रहे हैं। अभी तक भारत केवल 27 देशों से&nbsp; ही तेल व गैस की खरीदता था किंतु अब 40 देशों के साथ क्रय सम्बन्ध बनाए जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>विडंबना है कि विपक्ष इस संकट का उपयोग राजनीति के लिए कर रहा है। विपक्षी दल के नेता, आईटी सेल तथा कार्यकर्ता अपने आकाओं की शह पाकर अफवाह बाज बनकर सड़क पर आ गए हैं। बड़े नेता ऊपर संसद ठप कर रहे हैं और छोटे-बड़े जमाखोरों के साथ मिलकर आम जनमानस का पैनिक बटन दबाकर गैस सिलेंडर के लिए लंबी-लंबी कतारें लगवा रहे हैं। कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दल प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास कर रहे हैं जबकि प्रधानमंत्री मोदी व उनकी सरकार की पहल का ही परिणाम है कि ईरान-अमेरिका-इजरायल जंग के बीच होर्मुज स्ट्रेट से दो भारतीय जहाज शिवालिक और नंदादेवी 927000 मीट्रिक टन एलपीजी लेकर भारत आ रहे हैं। भारत सरकार व अधिकारियों के प्रयास से ही फारस की खाड़ी में सभी भारतीय सुरक्षित हैं। भारत के 253 नाविक अब तक सुरक्षित वापस आ चुके हैं। भारत सरकार ऊर्जा आपूर्ति और नागरिक सुरक्षा पर पर्याप्त ध्यान दे रही है। प्रधानमंत्री मोदी कैबिनेट की बैठक में अपने मंत्रियों से स्पष्ट कर चुके हैं कि युद्ध का असर आम जनता पर नहीं पड़ना चाहिए।</div><div><br></div><div>युद्धकाल में जो लोग भारत की विदेश नीति को फेल बताने वालों को स्मरण रखना चाहिए कि कि जब संघर्ष के कारण उड़ानें प्रभावित होने पर कई ईरानी नागरिक भारत में फंस गए थे भारत ने ही उन्हें ईरान की सहायता से उनके देश पहुँचाया। वहीं युद्ध के बीच 1.72 लाख भारतीय सकुशल भारत वापस आए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत सरकार युद्धकाल में जनता को कोई समस्या न हो इसके लिए लगातार कार्य कर रही है किंतु क्या हम सभी नागरिक अपने कर्तव्य का पालन कर रहे हैं? परिस्थितियां इसका उत्तर नहीं में दे रही हैं। यदि नागरिक भी कर्त्तव्य बोध से बंधे होते तो आज देश में गैस सिलेंडर को लेकर जो पैनिक मचा हुआ है वह न होता। ऊर्जा संकट की आहट मात्र से अफवाह बाज सक्रिय हो गए और ऐसी अफवाहें उड़ाई गई कि जमाखोरी और कालाबाजारी शुरू हो गई है। जिन घरों मे एक या दो भरे हुए एलपीजी सिलिंडर मौजूद हैं वो भी हल्ला मचा रहे हैं। प्रतिदिन होने वाली सिलिंडर बुकिंग 55 लाख से बढ़कर 75 लाख हो गई। देशभर मे अजीब नजारे देखने को मिल रहे हैं। जो परिवार 853 रुपए का गैस सिलेंडर खरीदने में भार का अनुभव करते थे अब वही लोग&nbsp; चोर बाजार से 3500 तक का सिलेंडर खरीदने की हैसियत दिखा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>समाज मे नैतिकता व सदाचार की कमी के कारण ही जमाखोरी व कालाबाजारी एक सामाजिक बुराई का रूप ले चुकी है। युद्धकाल में देशवासियों का एक बहुत बड़ा वर्ग कर्तव्य से विमुख होकर अपने लिए मुनाफे का अवसर खोज रहा है। अभी भारत का युद्ध से कोई सबंध नहीं है और यह युद्ध भारत से बहुत दूर हो रहा है तब भी जिस प्रकार का पैनिक भारत में हुआ है वह कुछ भारतीयों की ही विकृत मानसिकता को प्रदर्शित कर रहा है। संकट है किंतु अगर कुछ भी कर्त्तव्य बोध होता तो हालात बिल्कुल सामान्य ही रहते। अंततः अब सरकार ने जमाखोरों और कालाबाजारियों पर कार्यवाई आरम्भ कर दी है और उसके नतीजे भी सामने आने लगे हैं।</div><div><br></div><div>ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध अभी काफी लंबा चलने की आशंका है तथा हालात अभी और भी खराब ही हो सकते हैं किन्तु भारत ही एकमात्र ऐसा राष्ट्र है जिसके लिए होमुर्ज स्ट्रेट का रास्ता खोला गया है। सरकार अपना काम कर रही है किंतु अब समय आ गया है कि भारतीय नागरिक भी अपने कर्तव्य का पालन करें और पैनिक न हों।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 10:02:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wartime-crisis-politics-and-civic-duty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/18/lpg_large_1005_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mamata Banerjee Vs Suvendu Adhikari : West Bengal Elections में फिर से दिखेगा हाई वोल्टेज ड्रामा, कौन जीतेगा सबसे बड़ी टक्कर?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mamata-banerjee-vs-suvendu-adhikari-contest-analysis-in-wes-bengal-election]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर दो दिग्गज नेताओं के आमने सामने आने से बेहद दिलचस्प मोड़ पर पहुंच गई है। विपक्ष के नेता शुभेंदु अधिकारी और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बीच यह मुकाबला केवल चुनावी लड़ाई नहीं बल्कि राजनीतिक इतिहास, व्यक्तिगत संबंधों और सत्ता की रणनीति का गहरा टकराव बन चुका है। पश्चिम बंगाल में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने शुभेंदु अधिकारी को न केवल नंदीग्राम बल्कि भवानीपुर से भी उम्मीदवार बनाकर एक बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है।</div><div><br></div><div>शुभेंदु अधिकारी वही नेता हैं जिन्होंने 2021 में नंदीग्राम सीट पर ममता बनर्जी को बेहद करीबी मुकाबले में हराया था। उस चुनाव में ममता बनर्जी ने केवल एक सीट से चुनाव लड़ा था और हार के बाद उन्हें भवानीपुर से उपचुनाव जीतकर विधानसभा में वापसी करनी पड़ी थी। लेकिन इस बार स्थिति अलग है। भाजपा ने शुभेंदु को दो सीटों से मैदान में उतारकर ममता बनर्जी को सीधी चुनौती दी है कि मुकाबला बराबरी का ही नहीं बल्कि अधिक आक्रामक होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/as-the-political-battle-begins-democratic-values-are-once-again-at-stake" target="_blank">राजनीतिक जंग के आगाज में लोकतांत्रिक मूल्य फिर दांव पर</a></h3><div>भाजपा की पहली सूची में 144 उम्मीदवारों के बीच शुभेंदु अधिकारी का नाम दो सीटों पर होना यह दर्शाता है कि पार्टी उन्हें इस चुनाव का सबसे महत्वपूर्ण चेहरा मान रही है। यह कदम भाजपा के लिए असामान्य जरूर है, लेकिन इससे पहले नरेंद्र मोदी भी 2014 में दो सीटों से चुनाव लड़ चुके हैं। इससे साफ है कि पार्टी शुभेंदु को बड़े नेतृत्व के रूप में स्थापित करना चाहती है।</div><div><br></div><div>नंदीग्राम और भवानीपुर दोनों सीटों का महत्व अलग अलग है। नंदीग्राम ग्रामीण क्षेत्र है जहां शुभेंदु की मजबूत पकड़ मानी जाती है, जबकि भवानीपुर को ममता बनर्जी का गढ़ माना जाता है। यहां से वह लंबे समय से जीतती रही हैं। हालांकि हाल के मतदाता सूची संशोधन में बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने से यह सीट अब पहले जैसी सुरक्षित नहीं मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>इस चुनावी रणनीति का एक उद्देश्य ममता बनर्जी पर दबाव बनाना भी है। भाजपा चाहती है कि वह भवानीपुर में अधिक समय दें और अन्य क्षेत्रों में उनका प्रचार सीमित हो जाए। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस भी नंदीग्राम में मजबूत उम्मीदवार उतारकर शुभेंदु को चुनौती देने की तैयारी में है। यदि ममता बनर्जी दोनों सीटों से चुनाव लड़ती हैं तो यह मुकाबला और भी रोमांचक हो जाएगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी का संबंध कभी बेहद करीबी हुआ करता था। वर्ष 2007 के नंदीग्राम आंदोलन में दोनों साथ थे, जिसने वाम मोर्चा सरकार के पतन की नींव रखी थी। उस समय शुभेंदु एक उभरते हुए नेता थे और ममता बनर्जी के भरोसेमंद सहयोगी माने जाते थे। 2011 में जब तृणमूल कांग्रेस सत्ता में आई तो शुभेंदु की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही।</div><div><br></div><div>शुभेंदु का राजनीतिक सफर तेजी से आगे बढ़ा। वह सांसद बने, मंत्री बने और संगठन में मजबूत पकड़ बनाई। एक समय उन्हें पार्टी का दूसरा सबसे प्रभावशाली नेता माना जाता था। लेकिन समय के साथ मतभेद बढ़े। पार्टी में अन्य नेताओं की बढ़ती भूमिका और निर्णय प्रक्रिया से असंतोष के कारण उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़ दी और भाजपा में शामिल हो गए।</div><div><br></div><div>यहीं से दोनों नेताओं के बीच कड़वी प्रतिद्वंद्विता की शुरुआत हुई। 2021 का नंदीग्राम चुनाव इस टकराव का पहला बड़ा उदाहरण था जिसमें शुभेंदु ने ममता को हराकर अपनी राजनीतिक ताकत साबित की। अब 2026 में वही संघर्ष एक नए रूप में सामने है, जहां एक ओर शुभेंदु अपनी जीत को दोहराने और विस्तार देने की कोशिश में हैं, वहीं ममता अपने गढ़ को बचाने के साथ-साथ राजनीतिक प्रतिष्ठा की लड़ाई लड़ रही हैं।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, दो सीटों से चुनाव लड़ना शुभेंदु के लिए अवसर और जोखिम दोनों है। यदि वह ममता बनर्जी को फिर से पराजित करते हैं और भाजपा सत्ता में आती है, तो उन्हें मुख्यमंत्री पद का प्रमुख दावेदार माना जा सकता है। लेकिन यदि उनकी हार होती है तो इसका उनके राजनीतिक भविष्य पर नकारात्मक असर भी पड़ सकता है। दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस इसे शुभेंदु और भाजपा की कमजोरी बता रही है। उनका कहना है कि दो सीटों से चुनाव लड़ना आत्मविश्वास की कमी को दर्शाता है। हालांकि वास्तविक तस्वीर चुनाव परिणाम ही स्पष्ट करेंगे।</div><div><br></div><div>बहरहाल, देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम ने पश्चिम बंगाल के चुनाव को बेहद रोचक बना दिया है। ग्रामीण बनाम शहरी, पुराना सहयोगी बनाम नई प्रतिद्वंद्विता और रणनीति बनाम जनाधार, इन सभी पहलुओं का संगम इस चुनाव में देखने को मिलेगा। शुभेंदु अधिकारी और ममता बनर्जी के बीच यह सीधा मुकाबला न केवल राज्य की राजनीति की दिशा तय करेगा बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी इसके गहरे संकेत देखने को मिल सकते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 14:16:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/mamata-banerjee-vs-suvendu-adhikari-contest-analysis-in-wes-bengal-election</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/17/mamata-banerjee-suvendu-adhikari_large_1419_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-nishant-sensational-political-entry-into-the-jdu-have-far-reaching-political-implications]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अविवाहित इंजीनियर पुत्र निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी लॉन्चिंग से बिहार की राजनीति में दूरगामी असर पड़ना लाजिमी है। चूंकि वह अपने प्रगतिशील और यशस्वी पिता की प्रगतिशील समाजवादी सियासत को संभालेंगे, इसलिए कुछ बातें स्पष्ट हैं। वह यह कि अब तीन बड़े स्तरों पर इस पूरे घटनाक्रम का असर पड़ेगा– सत्ता संतुलन, जेडीयू की आंतरिक राजनीति और राज्य की व्यापक सियासी प्रतिस्पर्धा। इसके अलावा कुछ मौलिक सवाल भी उभरेंगे, जिनकी चर्चा पहले लाजिमी है। स्वाभाविक सवाल है कि क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? हालांकि इसका जवाब गुजशते वक्त की कोख में पल रहा है, जो समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा।</div><div><br></div><div>पहला यह कि उनके पिता नीतीश कुमार अब शारीरिक रूप से अस्वस्थ होकर 'विलासितापूर्ण' सदन राज्यसभा की ओर रुखसत हो चुके हैं, जबकि बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने अभी भली भांति पूर्वक&nbsp; जवान भी नहीं हो पाए हैं। इसलिए उन्हें उचित नीतिगत पोषण प्रदान करते हुए जवान करने की जिम्मेदारी अब टीम निशांत कुमार की होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/nitish-exit-under-a-cloud-of-questions" target="_blank">सवालों के घेरे में नीतीश कुमार की विदाई</a></h3><div>कहना न होगा कि पहले 20 साल तक यानी 1985 से 2025 तक नीतीश कुमार ने व्यक्तिगत संघर्ष की राजनीति की और बाद के 20 वर्षों तक यानी 2005 से 2025 उन्होंने सत्ता संघर्ष की राजनीति की। इसी कशमकश में बिहार के पुनर्निर्माण के उनके सपने वैचारिक कुपोषण, प्रशासनिक धूर्तता के शिकार हो गए और पूरी तरह से जवान नहीं हो पाए।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा यह कि जनता दल यूनाइटेड की सहयोगी पार्टी&nbsp; भाजपा भले ही राष्ट्रीय समाजवादी राजनीति की तरह ही सूबाई समाजवादी राजनीति के प्रतिबिंब जदयू को पीछे धकेलते हुए आगे बढ़ चुकी है, लेकिन पुनः सियासी धोबिया पाट पर राजनीतिक चोट देते हुए जदयू को देश-प्रदेश में पुनः बड़े भाई का दर्जा दिलवाने के सारे दारोमदार अब निशांत कुमार के कंधे पर होंगे। संदेश स्पष्ट है कि बड़े सपने देखेंगे तो उड़ीसा के नवीन पटनायक की तरह सफलतापूर्वक भविष्य में राज करेंगे, अन्यथा चिराग पासवान की तरह बीजेपी के आगे सियासी दुम हिलाते नजर आएंगे। यदि ऐसा हुआ तो यही समझा जाएगा कि बिहार के चाणक्य नीतीश कुमार ने अपनी पुत्र को समुचित राजनीतिक शिक्षा दिए ही उनकी लॉन्चिंग करवा दी। कुछ ऐसे ही&nbsp; सवाल लोगों के जेहन में उठ भी रहे हैं।</div><div><br></div><div>तीसरा यह कि जेडीयू और उसके सत्ता समीकरण पर इसका सीधा असर पड़ेगा। क्योंकि नीतीश कुमार के राज्‍यसभा जाने और संभावित नेतृत्व परिवर्तन के साथ निशांत को डिप्टी सीएम/मुख्य चेहरा बनाने की तैयारी है, जिससे जेडीयू में नेतृत्व का खालीपन भरने की कोशिश होगी। यह कदम बीजेपी–जेडीयू गठबंधन में निरंतरता का संदेश देगा कि नीतीश भले पटना से दिल्ली शिफ्ट हों, पर “उनका आदमी/परिवार” सत्ता में रहेगा, जिससे अचानक अस्थिरता की संभावना घटेगी। लेकिन इसके दूरगामी असर नकारात्मक भी हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>चौथा यह कि जेडीयू की आंतरिक राजनीति भी इस घटनाक्रम से प्रभावित होगी। ऐसा इसलिए कि जेडीयू के कई एमएलए–एमपी ने खुले तौर पर मांग की कि निशांत ही पार्टी को “एकजुट रख सकते हैं”, जो यह दिखाता है कि नेतृत्व संकट से बचने के लिए संगठन परिवारवाद को स्वीकार कर चुका है। इससे पुराने कद्दावर नेताओं के बीच पद–प्रतिष्ठा को लेकर खींचतान बढ़ सकती है क्योंकि अचानक एक नए, राजनीतिक रूप से अनुभवहीन चेहरे को शीर्ष पर लाना वरिष्ठों की महत्वाकांक्षाओं से टकराएगा।</div><div><br></div><div>पांचवां यह कि इस बड़े&nbsp; बदलाव से जदयू के वंशवाद बनाम सुशासन की छवि टकराएगी, क्योंकि नीतीश लंबे समय से वंशवाद के खिलाफ बोलते रहे हैं; और अब बेटे की लॉन्चिंग से उनकी राजनीतिक व वैचारिक साख और “सुशासन बाबू बनाम पारिवारिक राजनीति” वाली नैरेटिव पर विपक्ष को मजबूत हमला करने का मौका मिलेगा। वहीं, आरजेडी–कांग्रेस सहित विपक्ष इसे “डबल स्टैंडर्ड” कहकर भुनाएगा, जिससे सामाजिक न्याय बनाम परिवारवाद की पुरानी बहस फिर तेज होगी और यादव–गैर लवकुश ओबीसी–अल्पसंख्यक वोटों की समीकऱण राजनीति और ज्यादा आक्रामक हो सकती है, जिसकी धार नीतीश कुमार और भाजपा मिलकर कुंद कर चुकी हैं।</div><div><br></div><div>छठा यह कि जदयू के इस घटनाक्रम का सूबाई युवा और सामाजिक आधार पर भी संभावित प्रभाव पड़ेगा। अब जदयू पार्टी के भीतर से यह तर्क दिया जा रहा है कि निशांत के आने से युवा वोटर और पढ़ा–लिखा मध्यवर्ग जुड़ सकता है, लेकिन यह तभी होगा जब वे जल्दी ज़मीनी राजनीति सीखकर स्वतंत्र छवि बना पाएं। अभी के लिए उनका पूरा राजनीतिक वैधता पूंजी “नीतीश के बेटे” होने से आती है; अगर प्रशासनिक या संगठनात्मक क्षमता जल्दी साबित न हुई तो वे सिर्फ प्रतीकात्मक वारिस बनकर रह सकते हैं, जिससे जेडीयू की गिरती सामाजिक पकड़ नहीं रुक पाएगी।</div><div><br></div><div>सातवां यह कि निशांत कुमार की लॉन्चिंग का बिहार की व्यापक सियासत में लंबी अवधि का असर पड़ेगा। निकट भविष्य में यह कदम बीजेपी–जेडीयू सरकार को स्थायित्व देगा, लेकिन मध्यम अवधि में यह तय करेगा कि नीतीश के बाद जेडीयू स्वतंत्र शक्ति बनी रहती है या भाजपा पर और अधिक निर्भर हो जाती है। ऐसा इसलिए कि यदि निशांत कुमार पार्टी के अंदर स्वीकार्यता बना लेते हैं और संगठन पर पकड़ मजबूत कर लेते हैं, तो वे आने वाले चुनावों में जेडीयू को “पोस्ट-नीतीश” दौर में भी प्रासंगिक रख सकते हैं; वहीं यदि असफल रहे तो बिहार की राजनीति और ज़्यादा द्विध्रुवीय (बीजेपी बनाम आरजेडी–कांग्रेस) हो सकती है और जेडीयू हाशिये पर जा सकता है।</div><div><br></div><div>आठवां यह कि निशांत की एंट्री ने नीतीश कुमार के सालों पुराने एंटी वंशवाद नैरेटिव को सीधे काट दिया और बिहार में लगभग सभी बड़े नेताओं के परिवारवाद को एक साथ एक्सपोज़ कर दिया। इससे यह साफ दिखने लगा कि ‘वंशवाद विरोध’ ज्यादातर नैतिकता नहीं, बल्कि अवसरवादी राजनीति की भाषा थी। इस मुद्दे पर नीतीश का यू टर्न और नैतिकता का संकट खड़ा हो गया है। नीतीश खुद को कर्पूरी ठाकुर की परंपरा का मानते रहे, जो बेटे को राजनीति से दूर रख कर वंशवाद के खिलाफ उदाहरण बताए जाते हैं।</div><div><br></div><div>नौवां यह कि, कई दशक तक वे लालू प्रसाद, कांग्रेस और अन्य दलों पर परिवारवाद का हमला बोलते रहे; और अब उसी मॉडल पर अपने बेटे निशांत को सीधे उत्तराधिकारी की तरह आगे कर रहे हैं। जिस तरह से राज्यसभा जाने और बेटे के लिए स्पेस बनाने के लिए उन्होंने राजनीतिक पटकथा लिखी है, उससे उनकी समाजवादी राजनीति पर भी सवाल उठना लाजिमी है। बताया जाता है कि विपक्ष (जैसे RJD) ने इसे तुरंत पकड़ लिया कि जिसने हमेशा नेपोटिज़्म को कोसा, वही अब “अपने उत्तराधिकारी को सेट” कर रहा है, यानी नैतिक ऊँचाई ढह गई।</div><div><br></div><div>दसवां यह कि बिहार की ओबीसी/दलित ‘राजवंशी’ राजनीति अब खुलकर सामने आ चुकी है। पहले से ही तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, जीतन राम मांझी के बेटे संतोष सुमन, उपेंद्र कुशवाहा के बेटे दीपक आदि खुले तौर पर पिता की विरासत संभाल रहे थे। इसी कड़ी में नीतीश पुत्र निशांत की एंट्री के बाद तस्वीर और साफ हो गई कि लगभग हर प्रमुख सामाजिक राजनीतिक धड़े का नेतृत्व अब “पॉलिटिकल वंशजों” के हाथ में जा रहा है, यानी पूरा सत्ता-संतुलन परिवारों के इर्द गिर्द घूम रहा है।</div><div><br></div><div>ग्यारहवां यह कि प्रशांत किशोर व अन्य आलोचकों ने राजनीतिक&nbsp; पाखंड उजागर किया। प्रशांत किशोर ने सीधे सवाल उठाया कि जो नेता जीवन भर वंशवाद के विरोध का दावा करते रहे, वे आज अपने ही बेटे के लिए जगह बना रहे हैं; यानी ‘सिद्धांत’ दरअसल सत्ता और परिवार के हिसाब से बदलने वाली चीज़ है। वहीं, राजद नेताओं ने भी कहा कि नीतीश अब उसी रास्ते पर चल पड़े हैं, जिसको वे लालू परिवार की राजनीति में दोष बताते थे; इससे “हम अलग हैं” वाला दावा कमजोर हो गया।</div><div><br></div><div>बारहवां यह कि युवाओं के मुद्दों बनाम राजनीतिक वंश की कशमकश अब तेज होगी। क्योंकि निशांत की लॉन्चिंग बहस के साथ ही बेरोजगारी, पलायन और सुशासन बनाम परिवारवाद जैसे सवाल फिर उभरे हैं: क्या नई पीढ़ी के लिए नेतृत्व का मतलब सिर्फ नेताओं के बच्चे होंगे या आम कार्यकर्ता/युवा भी ऊपर आएंगे? वहीं जदयू और सहयोगी इसे “नई पीढ़ी का नेतृत्व” कह कर बचाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन यह तर्क भी उसी समय कमजोर पड़ जाता है जब टिकट, पद और कुर्सी लगभग पूरी तरह परिवारों में सिमटते दिखते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्वाभाविक सवाल है कि क्या जदयू में निशांत कुमार की धमाकेदार सियासी एंट्री के राजनीतिक असर दूरगामी होंगे? हालांकि इसका जवाब गुजशते वक्त की कोख में पल रहा है, जो समय के साथ स्पष्ट होता जाएगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 12:06:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-nishant-sensational-political-entry-into-the-jdu-have-far-reaching-political-implications</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/16/nishant-kumar_large_1209_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तमिलनाडु की राजनीति में शशिकला का जबरदस्त Come-Back, विधानसभा चुनावों में गड़बड़ाएंगे सभी दलों के समीकरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sasikala-new-party-changes-political-equations-ahead-of-tamil-nadu-assembly-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। दिवंगत जे. जयललिता की करीबी सहयोगी रहीं वीके शशिकला ने नई राजनीतिक पार्टी की घोषणा कर राज्य की चुनावी राजनीति को नया मोड़ दे दिया है। उन्होंने अपनी पार्टी का नाम आल इंडिया पुराची थलैवर मक्कल मुनेत्र कझगम घोषित किया है और उसका चुनाव चिह्न नारियल के पेड़ों का खेत बताया है। आगामी तमिलनाडु विधानसभा चुनाव से पहले यह कदम राज्य की राजनीति में नए समीकरण बना सकता है।</div><div><br></div><div>शशिकला लंबे समय तक अखिल भारतीय अन्ना द्रविड मुनेत्र कझगम यानी एआईएडीएमके की महत्वपूर्ण नेता रही हैं और जयललिता की सबसे भरोसेमंद सहयोगी मानी जाती थीं। लेकिन बाद में पार्टी नेतृत्व के साथ मतभेद के कारण उन्हें संगठन से निकाल दिया गया। अब नई पार्टी बनाकर उन्होंने एक बार फिर सक्रिय राजनीति में अपनी मजबूत वापसी का संकेत दिया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/sasikala-claims-mgr-jayalalithaa-legacy-returns-to-tamil-nadu-politics-form-new-political-party" target="_blank">MGR-Jayalalithaa की विरासत पर Sasikala का दावा, नई Political Party बनाकर Tamil Nadu की सियासत में वापसी</a></h3><div>शशिकला ने आज संवाददाता सम्मेलन में स्पष्ट किया कि उनकी नई पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में भाग लेगी। सूत्रों के अनुसार शशिकला की पार्टी लगभग चालीस विधानसभा क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारने की तैयारी कर रही हैं। विशेष रूप से दक्षिणी जिलों के थेवर बहुल क्षेत्रों में उनकी रणनीति केंद्रित बताई जा रही है। इन क्षेत्रों में शशिकला की सामाजिक और राजनीतिक पकड़ मानी जाती है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि शशिकला इन क्षेत्रों में प्रभावी प्रदर्शन करती हैं तो इसका सीधा असर एआईएडीएमके के वोट बैंक पर पड़ सकता है। इससे चुनावी मुकाबला और अधिक त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, शशिकला ने पीएमके के संस्थापक एस रामदास से उनके थैलापुरम स्थित फार्महाउस में मुलाकात भी की। दोनों नेताओं के बीच लगभग एक घंटे तक बातचीत हुई। सूत्रों के अनुसार इस बैठक में विधानसभा चुनाव के लिए संभावित गठबंधन पर चर्चा हुई। बताया जा रहा है कि रामदास की स्थिति भी फिलहाल असमंजस में है। द्रविड मुनेत्र कझगम यानी डीएमके ने उनके लिए अपने गठबंधन के दरवाजे लगभग बंद कर दिए हैं। दूसरी ओर एआईएडीएमके उन्हें सीमित सीटें देने की बात कर रही है, लेकिन उनके बेटे अंबुमणि रामदास कम सीटों पर तैयार नहीं हैं। ऐसे में शशिकला के साथ संभावित गठबंधन रामदास के लिए नया राजनीतिक विकल्प बन सकता है। यदि यह गठबंधन आकार लेता है तो उत्तर और दक्षिण तमिलनाडु में एक नया राजनीतिक समीकरण उभर सकता है, जो प्रमुख दलों के लिए चुनौती बन सकता है।</div><div><br></div><div>नई पार्टी की घोषणा करते समय शशिकला ने जयललिता की जयंती के अवसर पर भावनात्मक और राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण भाषण भी दिया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2016 में जयललिता के निधन के बाद कई मंत्रियों और विधायकों ने उनसे मुख्यमंत्री बनने का अनुरोध किया था। शशिकला ने कहा कि उस समय उन्होंने सत्ता संभालने से इंकार कर दिया था और कहा था कि पहले जयललिता की परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार और अन्य रस्में पूरी की जाएं। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय उन्होंने ओ. पन्नीरसेल्वम के मुख्यमंत्री बने रहने का समर्थन किया था और मंत्रियों को पद की शपथ लेने के लिए प्रोत्साहित किया था। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि जयललिता की मृत्यु के बाद उनके खिलाफ तरह तरह के आरोप लगाए गए और यहां तक कहा गया कि उन्होंने ही जयललिता को नुकसान पहुंचाया। शशिकला ने इन आरोपों को अपने राजनीतिक विरोधियों की साजिश बताया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शशिकला ने अपनी नई पार्टी का झंडा भी जारी किया है। झंडे में लाल सफेद और काले रंग की पट्टियां हैं तथा उस पर द्रविड आंदोलन के प्रमुख नेताओं सीएन अन्नादुरै, एमजी रामचंद्रन और जयललिता की तस्वीरें दिखाई गई हैं। शशिकला ने कहा है कि उनकी पार्टी द्रविड विचारधारा पर आधारित होगी और अन्ना, एमजीआर तथा जयललिता की राजनीतिक परंपरा को आगे बढ़ाएगी। उन्होंने दावा किया कि उनकी पार्टी आम लोगों के हितों के लिए काम करेगी और राजनीतिक विरोधियों का मजबूती से सामना करेगी।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि शशिकला के राजनीतिक सफर में विवाद भी कम नहीं रहे हैं। जयललिता के निधन के बाद वह एआईएडीएमके की महासचिव बनी थीं और मुख्यमंत्री बनने की कोशिश कर रही थीं। लेकिन आय से अधिक संपत्ति मामले में दोषी ठहराए जाने के कारण उन्हें चार वर्ष की जेल की सजा हुई। इसके कारण वह अभी वर्ष 2027 तक चुनाव नहीं लड़ सकती हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि शशिकला को जेल होने के बाद एआईएडीएमके में एडप्पडी पलानीस्वामी और ओ. पन्नीरसेल्वम ने मिलकर पार्टी का नेतृत्व संभाला और बाद में शशिकला को संगठन से बाहर कर दिया था। बाद में पलानीस्वामी ने पन्नीरसेल्वम को भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। शशिकला ने कई बार पलानीस्वामी को विश्वासघाती बताया है, जबकि पलानीस्वामी का कहना है कि उन्हें विधायकों ने चुना था।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो तमिलनाडु में आगामी विधानसभा चुनाव पहले से ही बेहद प्रतिस्पर्धी माने जा रहे हैं। डीएमके नेता एमके स्टालिन, एआईएडीएमके के एडप्पडी पलानीस्वामी जैसे अनुभवी नेता चुनावी मैदान में हैं। इसके अलावा राष्ट्रीय स्तर की पार्टियां भी राज्य में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही हैं। ऐसे समय में शशिकला की नई पार्टी का गठन चुनावी समीकरण बदल सकता है। खास तौर पर एआईएडीएमके के पारंपरिक वोट बैंक में विभाजन की संभावना से चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि शशिकला क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन बनाने में सफल होती हैं तो वह कई सीटों पर निर्णायक भूमिका निभा सकती हैं। कुल मिलाकर शशिकला की वापसी ने तमिलनाडु की राजनीति को फिर से गरमा दिया है और आगामी विधानसभा चुनाव को और अधिक रोचक बना दिया है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 15:45:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sasikala-new-party-changes-political-equations-ahead-of-tamil-nadu-assembly-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/13/vk-sasikala_large_1548_23.webp" />
    </item>
  </channel>
</rss>