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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Maharashtra में Auto Rickshaw, Taxi Drivers के लिए Marathi Mandatory क्यों की गयी? मराठी सीखने के लिए दबाव क्यों डालना?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/maharashtra-marathi-mandatory-auto-taxi-drivers-language-rule-rto-action]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाराष्ट्र में ऑटो रिक्शा और टैक्सी चालकों के लिए मराठी का व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य करने का फैसला अब केवल सरकारी घोषणा नहीं, बल्कि जमीनी कार्रवाई का रूप ले चुका है। राज्यभर में शुरू हुई जांच के पहले ही दिन 1,268 व्यावसायिक यात्री वाहन चालकों मुख्यतः ऑटो और टैक्सी चालकों, को मराठी का पर्याप्त ज्ञान नहीं होने पर नोटिस जारी कर दिया गया। राज्य सरकार इसे यात्रियों की सुविधा, सुरक्षा और महाराष्ट्र की भाषा-संस्कृति से जोड़ रही है, लेकिन इस कार्रवाई ने रोज़गार, प्रवासी चालकों की आजीविका, नियमों की अस्पष्टता और कानूनी वैधता को लेकर गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं।</div><div><br></div><div>महाराष्ट्र के परिवहन मंत्री प्रताप सरनाईक के अनुसार, राज्य में ऑटो और टैक्सी चलाने के लिए मराठी का ‘वर्किंग नॉलेज’ यानी व्यावहारिक ज्ञान अनिवार्य है। राज्य सरकार का तर्क है कि चालकों को रोजमर्रा के कामकाज में यात्रियों से संवाद करना पड़ता है और कई शिकायतें मिली हैं कि कुछ चालक मराठी में यात्रियों की बात, दिशा-निर्देश या सामान्य निर्देश तक नहीं समझ पाते। मंत्री का कहना है कि मराठी का व्यावहारिक ज्ञान केवल नियम पालन का मामला नहीं, बल्कि यात्रियों की सुविधा और सुरक्षा से भी जुड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या भाषा जानना सचमुच यात्री सुरक्षा का प्रश्न है, या फिर सुरक्षा के नाम पर एक ऐसी व्यवस्था लागू की जा रही है जिसकी कसौटियां अभी तक स्पष्ट नहीं हैं?</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि राज्य सरकार ने मई में मराठी की बुनियादी जानकारी अनिवार्य करने की घोषणा की थी और गैर-मराठी चालकों के लिए मराठी प्रशिक्षण पाठ्यक्रम शुरू कराया गया। 105 दिनों तक चले अभियान में लगभग 1.65 लाख चालकों को प्रशिक्षण देकर प्रमाणपत्र जारी किए गए। मुंबई में पहले के अभियान में करीब 1.25 लाख चालकों ने भाग लिया था, जिनमें 7,750 चालक परीक्षा में असफल रहे, जबकि 14,000 से अधिक प्रशिक्षण पूरा नहीं कर सके। अब 15 अगस्त तक मराठी सीखने की समयसीमा समाप्त होने के बाद सरकार ने सीधे जांच और कार्रवाई का रास्ता अपनाया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/maharashtra-rto-issues-show-cause-notices-to-auto-taxi-drivers-over-marathi-language" target="_blank">Maharashtra RTO ने 1499 Auto Taxi चालकों को जारी किया नोटिस, मराठी न जानने पर कार्रवाई</a></h3><div>राज्यव्यापी जांच के पहले दिन शाम तक 8,217 चालकों का परीक्षण किया गया। इनमें मुंबई महानगर क्षेत्र में 3,995 चालक शामिल थे, जिनमें से 604 को मराठी का पर्याप्त व्यावहारिक ज्ञान नहीं होने पर नोटिस दिया गया। राज्य के बाकी हिस्सों में 4,222 चालकों की जांच हुई और 664 को नोटिस जारी किए गए। यह जांच अभियान 30 सितंबर तक जारी रहेगा। चालकों को एक महीने का समय दिया गया है। यदि वे इसके बाद भी मराठी में संतोषजनक ढंग से जवाब नहीं दे सके, तो उनका बैज तीन महीने के लिए निलंबित किया जा सकता है। इसके बाद उन्हें फिर एक महीने का अवसर मिलेगा। लगातार उल्लंघन की स्थिति में कार्रवाई और कठोर हो सकती है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि जांच के दौरान चालकों को 16 सवालों के जरिए परखा जा रहा है। इनमें रोजमर्रा की बातचीत से जुड़े वाक्य शामिल हैं, जैसे— “मला CNG भरायचे आहे, थोडे थांबावे लागेल” अर्थात मुझे सीएनजी भरवानी है, थोड़ी देर रुकना होगा; “माझी रिक्षा/टॅक्सी शेअरिंगची आहे” यानी मेरी रिक्शा या टैक्सी शेयरिंग की है; और “मीटर चालू केले आहे” अर्थात मीटर चालू कर दिया है। प्रश्न यात्रियों से गंतव्य पूछने, रास्ता समझने, किराया, मीटर और स्टैंड से जुड़े संवाद पर आधारित हैं। परिवहन विभाग ने जांच की वीडियोग्राफी कराने के भी निर्देश दिए हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि यह प्रशिक्षण कोंकण साहित्य परिषद के माध्यम से कराया गया था और इसका समापन स्वतंत्रता दिवस पर हुआ। राज्य सरकार का दावा है कि उसका उद्देश्य किसी की रोजी-रोटी छीनना नहीं, बल्कि मराठी भाषा और महाराष्ट्र की पहचान व संस्कृति को संरक्षित करना है। यहीं से विवाद का दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण पक्ष शुरू होता है यानि कानून। हम आपको याद दिला दें कि 2017 में बॉम्बे हाई कोर्ट ने ऑटो रिक्शा परमिट के लिए मराठी दक्षता की एक ऐसी ही शर्त को रद्द कर दिया था। अदालत ने कहा था कि ऑटो रिक्शा ‘मोटर कैब’ की श्रेणी में आते हैं और महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स के नियम 24 में भाषा संबंधी प्रावधान सार्वजनिक सेवा वाहन बैज के कुछ मामलों से जुड़ा है, लेकिन मोटर कैब को उसमें विशेष रूप से बाहर रखा गया है। अदालत ने स्पष्ट किया था कि नियम 24 के आधार पर ऑटो रिक्शा कॉन्ट्रैक्ट कैरिज परमिट के लिए मराठी दक्षता अनिवार्य नहीं बनाई जा सकती।</div><div><br></div><div>अब राज्य सरकार का कहना है कि वर्तमान कार्रवाई मौजूदा नियमों के अनुपालन और संशोधित महाराष्ट्र मोटर व्हीकल्स रूल्स, 1989 के तहत की जा रही है। अधिकारियों का तर्क है कि 2017 का फैसला परमिट से संबंधित था, जबकि मौजूदा व्यवस्था बैज, प्राधिकरण और उनके नवीनीकरण से जुड़ी है। सरकार यह भी कहती है कि व्यावहारिक मराठी ज्ञान की शर्त 1989 से ही नियमों में मौजूद थी, लेकिन उसका कड़ाई से पालन नहीं हुआ।</div><div><br></div><div>फिर भी सबसे बड़ा सवाल बना हुआ है, ‘वर्किंग नॉलेज ऑफ मराठी’ की स्पष्ट परिभाषा क्या है? टैक्सी यूनियनों ने आशंका जताई है कि नियमों में यह नहीं बताया गया कि व्यावहारिक ज्ञान का मानक क्या होगा। सेवा सारथी टैक्सी यूनियन के नेता डीएम गोसावी ने चेतावनी दी है कि अस्पष्टता आरटीओ में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे सकती है। सेवानिवृत्त आरटीओ अधिकारियों का भी कहना है कि संशोधित नियमों में यह स्पष्ट नहीं है कि परीक्षा मौखिक होगी या लिखित, पास होने का मानक क्या होगा और सभी जगह एक जैसी जांच कैसे सुनिश्चित की जाएगी।</div><div><br></div><div>राज्य सरकार के सामने इसलिए दोहरी चुनौती है। एक ओर उसे राज्य की भाषा और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करनी है, दूसरी ओर लाखों चालकों, जिनमें बड़ी संख्या प्रवासी और सीमित औपचारिक शिक्षा वाले श्रमिकों की है, उनकी आजीविका भी सुरक्षित रखनी है। रिपोर्टों के मुताबिक, मुंबई में ही 2.8 लाख से अधिक ऑटो रिक्शा और लगभग 20,000 टैक्सी परमिट हैं, जिनसे शिफ्टों में अनुमानित पांच लाख चालक जुड़े हैं।</div><div><br></div><div>यहां सबसे तीखा सवाल यह है कि क्या राज्य सरकार प्रशिक्षण और सहयोग की नीति को प्राथमिकता देगी या भाषा परीक्षा को लाइसेंस और बैज निलंबन का हथियार बनाएगी? क्या 16 सवालों की परीक्षा वास्तव में किसी चालक की संवाद क्षमता का निष्पक्ष पैमाना है? और सबसे अहम सवाल यह है कि क्या संशोधित नियम अदालत की कसौटी पर टिकेंगे?</div><div><br></div><div>बहरहाल, मराठी सीखना और उसका सम्मान करना एक बात है, लेकिन किसी की आजीविका को भाषा की ऐसी परीक्षा से जोड़ना, जिसकी परिभाषा और मानक ही स्पष्ट न हों, प्रशासनिक मनमानी का रास्ता भी खोल सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 15:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/maharashtra-marathi-mandatory-auto-taxi-drivers-language-rule-rto-action</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कश्मीर पर अमेरिकी सुर बदलेः भारत का कद बढ़ा, पाक बेचैन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/us-stance-on-kashmir-shifts-india-stature-rises-pakistan-uneasy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर का 19 अगस्त 2026 को श्रीनगर में दिया गया यह बयान कि जम्मू-कश्मीर “भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा” है, सामान्य कूटनीतिक टिप्पणी मानकर नजरअंदाज करने योग्य नहीं है। यह ऐसे समय आया है जब कश्मीर को लेकर भारत और पाकिस्तान की धारणाओं के बीच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नए समीकरण बन रहे हैं। गोर ने जम्मू-कश्मीर की निरन्तर सुधर रही सुरक्षा स्थिति की बात कही और अमेरिकी यात्रा संबंधी परामर्श पर पुनर्विचार के संकेत भी दिए। पाकिस्तान ने इस बयान पर अमेरिका के शीर्ष राजनयिक को तलब कर तीखा विरोध दर्ज कराया। इस पूरे घटनाक्रम को केवल कश्मीर के संदर्भ में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसे भारत-अमेरिका संबंधों में आ रहे व्यापक परिवर्तन, दक्षिण एशिया की बदलती सामरिक संरचना और पाकिस्तान की घटती कूटनीतिक प्रभावशीलता के संदर्भ में समझना अधिक उचित होगा।</div><div><br></div><div>अमेरिका की कश्मीर नीति में लंबे समय से एक प्रकार की सावधानी रही है। वाशिंगटन सामान्यतः भारत और पाकिस्तान के बीच संवाद तथा शांतिपूर्ण समाधान की बात करता रहा है। अमेरिकी विदेश विभाग की पूर्व घोषित नीति भी जम्मू-कश्मीर में सामान्य स्थिति और राजनीतिक-आर्थिक स्थिरता की वापसी का समर्थन करती रही है। इसलिए गोर का श्रीनगर में जाकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” कहना निश्चित रूप से भाषा के स्तर पर एक उल्लेखनीय परिवर्तन है। लेकिन इसे अमेरिका की पूरी कश्मीर नीति में तत्काल और औपचारिक परिवर्तन मानना भी जल्दबाजी होगी। किसी राजदूत का बयान और किसी सरकार की औपचारिक नीति में अंतर होता है। फिर भी कूटनीति में शब्दों का अपना महत्व होता है। विशेष रूप से तब, जब वही शब्द उस भूभाग में बोले जाएं जिसे पाकिस्तान दशकों से अंतरराष्ट्रीय विवाद के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। इस दृष्टि से गोर का बयान भारत के लिए मनोवैज्ञानिक और कूटनीतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/us-ambassador-sergio-gor-visit-to-jammu-and-kashmir-has-countered-sino-pakistani-maneuvers" target="_blank">अमेरिकी राजदूत सर्जियो गौर की जम्मू-कश्मीर यात्रा ने चीनी-पाकिस्तानी चालों को किया दुरुस्त!</a></h3><div>इस बयान का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष जम्मू-कश्मीर की बदलती जमीन से जुड़ा है। गोर ने सुरक्षा व्यवस्था में सुधार का उल्लेख करते हुए यात्रा संबंधी अमेरिकी परामर्श में कमी लाने की संभावना जताई है। इसका अर्थ यह है कि वाशिंगटन अब कश्मीर को केवल सुरक्षा संकट या आतंकवाद की दृष्टि से देखने के बजाय पर्यटन, आर्थिक गतिविधियों और सामान्य जनजीवन की संभावनाओं वाले क्षेत्र के रूप में भी देख रहा है। यहीं से भारत-अमेरिका संबंधों की नई रोशनी दिखाई देती है। दोनों देशों के संबंध अब केवल व्यापार या रक्षा तक सीमित नहीं हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव, समुद्री सुरक्षा, प्रौद्योगिकी, ऊर्जा, आपूर्ति-शृंखला और वैश्विक शक्ति-संतुलन जैसे विषयों ने भारत को अमेरिका के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार और शुल्क जैसे मुद्दों पर मतभेद भी मौजूद हैं, फिर भी व्यापक सामरिक साझेदारी अपनी उपयोगिता बनाए हुए है। हाल में अमेरिकी विदेश मंत्री की भारत यात्रा का उद्देश्य भी तनावों के बीच संबंधों को सुदृढ़ करना और व्यापार तथा ऊर्जा सहयोग को आगे बढ़ाना था।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए कश्मीर पर अमेरिकी भाषा को भारत-अमेरिका संबंधों के व्यापक पुनर्संतुलन का हिस्सा मानना अधिक तार्किक होगा। अमेरिका के लिए भारत अब केवल दक्षिण एशिया का एक बड़ा देश नहीं, बल्कि एशिया में शक्ति-संतुलन का प्रमुख आधार है। भारत के लिए भी अमेरिका महत्वपूर्ण है, लेकिन भारत ने अपनी विदेश नीति को किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण निर्भरता के बजाय रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित रखा है। यही कारण है कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी बढ़ाते हुए रूस, यूरोप, पश्चिम एशिया और अन्य शक्तियों के साथ भी अपने संबंध बनाए रखता है। कश्मीर के संदर्भ में यह घटनाक्रम पाकिस्तान के लिए निश्चित रूप से असहज करने वाला है। इस्लामाबाद ने गोर के बयान को अस्वीकार करते हुए कहा कि जम्मू-कश्मीर एक विवादित क्षेत्र है और उसका अंतिम निर्धारण होना बाकी है। पाकिस्तान ने इसे अमेरिका की पूर्व स्थिति से विचलन बताते हुए औपचारिक विरोध दर्ज कराया।&nbsp;</div><div><br></div><div>पाकिस्तान की समस्या यह है कि वह कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी विदेश नीति का केंद्रीय विषय बनाए रखना चाहता है, जबकि विश्व राजनीति की प्राथमिकताएं तेजी से बदल रही हैं। आतंकवाद, आर्थिक स्थिरता, चीन का बढ़ता प्रभाव, पश्चिम एशिया का संकट, समुद्री सुरक्षा और वैश्विक आपूर्ति-शृंखलाएं आज बड़ी शक्तियों की चिंता के केंद्र में हैं। ऐसे वातावरण में केवल कश्मीर के प्रश्न को बार-बार अंतरराष्ट्रीयकरण करने की पाकिस्तानी कोशिशों की प्रभावशीलता सीमित होती जा रही है। भारत ने दूसरी ओर लगातार यह रेखांकित किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े विषय भारत की संप्रभुता और द्विपक्षीय संबंधों के दायरे में आते हैं। गोर का श्रीनगर दौरा स्वयं इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि एक प्रमुख अमेरिकी राजनयिक ने जम्मू-कश्मीर की यात्रा की, वहां के निर्वाचित नेतृत्व से मुलाकात की और क्षेत्र की सुरक्षा तथा आर्थिक संभावनाओं पर सकारात्मक टिप्पणी की। यह पाकिस्तान की उस कोशिश के विपरीत है जिसमें वह कश्मीर को केवल विवाद और अस्थिरता के चश्मे से प्रस्तुत करना चाहता है।</div><div><br></div><div>फिर भी भारत को इस बयान से अत्यधिक उत्साहित होकर यह मान लेने से बचना चाहिए कि अमेरिका ने कश्मीर पर अपनी संपूर्ण नीति बदल दी है। अमेरिका की विदेश नीति परिस्थितियों के अनुसार बदलती रहती है और वह भारत तथा पाकिस्तान दोनों के साथ अपने हितों को संतुलित करने की कोशिश करता है। आज भी वाशिंगटन के लिए पाकिस्तान आतंकवाद-रोध, क्षेत्रीय सुरक्षा और अफगानिस्तान सहित कुछ विषयों में उपयोगी साझेदार है। अतः भारत के लिए इस बयान का वास्तविक महत्व किसी औपचारिक अमेरिकी नीति-परिवर्तन से अधिक उस कूटनीतिक वातावरण में है, जिसमें भारत की स्थिति को पहले की तुलना में अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है। यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कूटनीति में किसी देश का महत्व केवल इस बात से तय नहीं होता कि कितने देश उसके पक्ष में बयान दे रहे हैं, बल्कि इससे तय होता है कि वैश्विक शक्तियों के हित उसके साथ कितने गहरे जुड़े हैं। आज भारत की आर्थिक क्षमता, विशाल बाजार, तकनीकी सामर्थ्य, लोकतांत्रिक संस्थाएं, युवा शक्ति और सामरिक स्थिति उसे विश्व व्यवस्था का महत्वपूर्ण स्तंभ बनाती हैं। इसी बदलती वास्तविकता का प्रभाव कश्मीर पर भी दिखाई देना स्वाभाविक है।</div><div><br></div><div>गोर का बयान इसलिए भारत के लिए एक उपलब्धि से अधिक एक संकेत है-संकेत इस बात का कि जम्मू-कश्मीर को लेकर अंतरराष्ट्रीय विमर्श धीरे-धीरे बदल रहा है। पाकिस्तान के लिए यह चेतावनी है कि केवल पुराने नारों और कूटनीतिक दबाव से वह कश्मीर को विश्व राजनीति के केंद्र में नहीं रख सकता और अमेरिका के लिए यह उसके बदलते हितों के अनुरूप संतुलन साधने की कोशिश है। अंततः कश्मीर की स्थायी शांति केवल अंतरराष्ट्रीय बयानों से नहीं, बल्कि लोकतंत्र, विकास, सुरक्षा, जनभागीदारी और सीमा-पार आतंकवाद के अंत से सुनिश्चित होगी। भारत को इस नए कूटनीतिक वातावरण का उपयोग आक्रामक प्रचार के बजाय जिम्मेदार और आत्मविश्वासी राष्ट्र की तरह करना चाहिए। सर्जियो गोर का बयान इस बदलती तस्वीर की एक महत्वपूर्ण झलक है-जहां कश्मीर को लेकर भारत की स्थिति पहले की अपेक्षा अधिक स्पष्ट अंतरराष्ट्रीय स्वीकार्यता प्राप्त करती दिखाई दे रही है और पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती पहले से अधिक कठिन होती जा रही है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 15:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/us-stance-on-kashmir-shifts-india-stature-rises-pakistan-uneasy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Manipur में 'No NRC, No Census' आंदोलन क्यों पकड़ रहा रफ्तार? आखिर क्यों सड़कों पर उतर रही है जनता?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/manipur-nrc-before-census-protest-demographic-crisis-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब बड़ा रूप ले चुका है और राज्य सरकार ही नहीं बल्कि केंद्र सरकार की चिंताएं भी बढ़ती जा रही हैं। मणिपुर में बड़े प्रयासों के बाद शांति स्थापित हुई लेकिन नये आंदोलन के चलते प्रशासन के हाथ पांव फूल रहे हैं और जनगणना प्रशिक्षण का काम कुछ जिलों में रोकना पड़ गया है। देखा जाये तो मणिपुर में ‘नो एनआरसी, नो सेंसस’ का नारा अब केवल जनगणना रोकने की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। इसके पीछे विस्थापन, जनसंख्या में बदलाव, भूमि अधिकार, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर लंबे समय से चली आ रही चिंताएं हैं। तीन साल से अधिक समय से जातीय हिंसा की मार झेल रहे मणिपुर में जनगणना से पहले एनआरसी की मांग अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक मुद्दे का रूप ले चुकी है।</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि वर्तमान आंदोलन की सबसे बड़ी चिंता 40 हजार से अधिक आंतरिक रूप से विस्थापित लोगों से जुड़ी है। चुराचांदपुर या मोरेह से विस्थापित कोई मैतेई परिवार आज इम्फाल के राहत शिविर में रह रहा है, तो जनगणना में उसकी वर्तमान स्थिति दर्ज हो सकती है। इसी तरह इम्फाल से विस्थापित कोई कुकी परिवार चुराचांदपुर में गिना जा सकता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या जनगणना मणिपुर की वास्तविक जनसंख्या संरचना दर्ज करेगी या हिंसा और विस्थापन से अस्थायी रूप से बदले भूगोल को? यह चिंता इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि जनगणना के आंकड़े भविष्य में विकास योजनाओं, संसाधनों के आवंटन, परिसीमन, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/manipur-orders-closure-of-educational-institutes-due-to-law-and-order" target="_blank">Manipur में 20 से 22 अगस्त तक बंद रहेंगे सभी स्कूल और कॉलेज, सरकार ने जारी किया आदेश</a></h3><div>इसी पृष्ठभूमि में कैंपेन फॉर जस्ट एंड फेयर डिलिमिटेशन के नेतृत्व में आंदोलन तेज हुआ। 48 घंटे के बंद के दौरान कई घाटी जिलों में सड़कें जाम की गईं, प्रदर्शन हुए और मुख्यमंत्री व गृह मंत्री के पुतले जलाए गए। छात्रों और महिलाओं की भागीदारी ने आंदोलन को व्यापक जनरूप दिया। अब सरकारी कार्यालयों के बहिष्कार का भी ऐलान किया गया है, जबकि आवश्यक सेवाओं को इससे अलग रखा गया है। बढ़ते तनाव के बीच राज्य सरकार ने शिक्षण संस्थानों को तीन दिन के लिए बंद करने का आदेश दिया है।</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि आंदोलन की मूल मांग है कि जनगणना से पहले नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन्स यानी एनआरसी को लागू या अपडेट किया जाए। देखा जाये तो यहां एनआरसी और जनगणना में अंतर समझना जरूरी है। जनगणना का उद्देश्य आबादी की गणना और उसकी सामाजिक-आर्थिक जानकारी जुटाना है, जबकि एनआरसी का संबंध भारतीय नागरिकों की पहचान से है। नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 14ए और 2003 के नियम इसके कानूनी ढांचे से जुड़े हैं। आंदोलन समर्थकों का तर्क है कि पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि राज्य की वैध जनसांख्यिकीय आबादी कौन है, उसके बाद ही नई जनगणना के आंकड़ों को भविष्य के प्रशासनिक और राजनीतिक फैसलों का आधार बनाया जाए।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मणिपुर में यह मांग नई नहीं है। विधानसभा 2022 और फिर 2024 में एनआरसी लागू करने संबंधी प्रस्ताव पारित कर चुकी है। राज्य जनसंख्या आयोग का गठन भी इसी बहस की पृष्ठभूमि में हुआ। लेकिन सबसे विवादास्पद मुद्दा कट-ऑफ वर्ष का है। कई नागरिक संगठनों की मांग है कि 1951 को आधार बनाया जाए, जबकि राज्य मंत्रिमंडल ने इनर लाइन परमिट के संदर्भ में 1961 को ‘मूल निवासी’ निर्धारण का आधार स्वीकार किया था। यही अंतर अब आंदोलन की राजनीतिक धार को और तेज कर रहा है।</div><div><br></div><div>जनसांख्यिकीय बदलाव की आशंका के पीछे पुराने आंकड़ों का भी हवाला दिया जा रहा है। हम आपको बता दें कि 1961 में मणिपुर की दशकीय जनसंख्या वृद्धि 35.04 प्रतिशत और 1971 में 37.52 प्रतिशत रही, जबकि 2011 में यह 24.50 प्रतिशत थी। समर्थकों का कहना है कि ऐसे बदलावों की गंभीर जांच होनी चाहिए। हालांकि यह भी उतना ही जरूरी है कि जनसंख्या वृद्धि को सीधे अवैध प्रवास का प्रमाण नहीं मान लिया जाए। हर दावा तथ्यों और प्रमाणों की कसौटी पर परखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>यहीं यह बहस सबसे संवेदनशील हो जाती है। म्यांमार सीमा से लगे मणिपुर में अवैध प्रवास का मुद्दा लंबे समय से राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहा है। लेकिन कुकी-जो समुदायों के म्यांमार के चिन समुदायों से जातीय संबंध भी हैं। इसलिए पूरे समुदाय को अवैध प्रवास की दृष्टि से देखना न केवल तथ्यात्मक रूप से गलत हो सकता है, बल्कि पहले से विभाजित समाज में अविश्वास को और गहरा कर सकता है। एनआरसी पर बहस प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए, किसी समुदाय के सामूहिक संदेहीकरण के आधार पर नहीं।</div><div><br></div><div>उधर, अब 2027 की जनगणना इस विवाद का तात्कालिक केंद्र बन गई है। पहले चरण में सितंबर में हाउस लिस्टिंग प्रस्तावित है, जबकि फरवरी 2027 में जनसंख्या और सामाजिक-आर्थिक विवरण जुटाए जाने हैं। इसी बीच लिलोंग के एसडीओ द्वारा जनगणना प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द किया जाना तनाव कम करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब ज्ञापन, प्रदर्शन और चेतावनियां पहले से मौजूद थीं, तब राजनीतिक संवाद पहले क्यों नहीं शुरू हुआ?</div><div><br></div><div>इसी बीच विभिन्न समुदायों और संगठनों के नेताओं का एक 10 सदस्यीय दल दिल्ली रवाना हुआ है, ताकि केंद्र के समक्ष एनआरसी और जनगणना का मुद्दा उठाया जा सके। दिल्ली जाना जरूरी हो सकता है, क्योंकि एनआरसी और जनगणना जैसे फैसलों में केंद्र की भूमिका निर्णायक है। लेकिन हर बार स्थानीय संकट के बाद दिल्ली की ओर देखना राजनीतिक नेतृत्व की सीमाओं को भी उजागर करता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो जनगणना शासन, विकास और कल्याण के लिए अनिवार्य है। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या लंबे विस्थापन, अधूरी पुनर्वास प्रक्रिया और गहरे जनसांख्यिकीय अविश्वास के बीच की गई जनगणना मणिपुर की सामान्य सामाजिक संरचना का वास्तविक चित्र पेश कर पाएगी?</div><div><br></div><div>बहरहाल, सरकार को आंदोलन को केवल कानून-व्यवस्था की समस्या मानने की बजाय उसके पीछे छिपे विश्वास के संकट को समझना होगा। एक प्रशिक्षण कार्यक्रम रद्द कर देना या दिल्ली में ज्ञापन सौंप देना पर्याप्त नहीं होगा। मणिपुर को तथ्य-आधारित एनआरसी बहस, विस्थापितों की सुरक्षित वापसी, जनगणना की विश्वसनीयता और सभी समुदायों की संवैधानिक सुरक्षा पर गंभीर राजनीतिक संवाद चाहिए।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 13:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/manipur-nrc-before-census-protest-demographic-crisis-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sajjan-kumar-death-1984-anti-sikh-riots-convict-congress-mp-tihar-jail]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे सज्जन कुमार का गुरुवार को दिल्ली में निधन हो गया। वह 80 वर्ष के थे। एक समय ग्रामीण और बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे ताकतवर चेहरों में गिने जाने वाले, जाट समाज में व्यापक जनाधार रखने वाले और राष्ट्रीय राजधानी की सियासत में कांग्रेस की सत्ता का मजबूत स्तंभ रहे सज्जन कुमार की जिंदगी आखिरकार एक ऐसे मोड़ पर खत्म हुई, जिसे उनके राजनीतिक उत्थान और बाद के पतन की पूरी कहानी के रूप में देखा जा सकता है। सत्ता के शिखर से लेकर तिहाड़ जेल तक का उनका सफर इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि बुरे काम का अंजाम बुरा ही होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार को तिहाड़ जेल से सफदरजंग अस्पताल ले जाया गया था, जहां चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। अस्पताल की ओर से उनकी मौत के कारण को लेकर तत्काल कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई। सज्जन कुमार अपने जीवन के अंतिम वर्षों में 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में मिली उम्रकैद की सजा काट रहे थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/former-congress-mp-sajjan-kumar-who-was-serving-a-life-sentence-in-the-1984-riots-case" target="_blank">1984 दंगा केस में उम्रकैद काट रहे पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार की मौत, दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में तोड़ा दम</a></h3><div>हम आपको बता दें कि सज्जन कुमार दिल्ली की राजनीति में 1970 के दशक से ही प्रभावशाली चेहरा बनकर उभरे थे। उन्होंने 1977 में पार्षद के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की और इसके बाद बाहरी दिल्ली लोकसभा सीट से तीन बार सांसद चुने गए। ग्रामीण दिल्ली और जाट बहुल इलाकों में उनकी पकड़ बेहद मजबूत मानी जाती थी। 1980 के दशक में वह दिल्ली कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेताओं में शामिल थे। स्थानीय संगठन, ग्रामीण मतदाता और जाट समाज में उनके मजबूत आधार ने उन्हें कांग्रेस की राजनीति का बड़ा खिलाड़ी बना दिया था। एक समय ऐसा था जब बाहरी दिल्ली की राजनीति में सज्जन कुमार का नाम ही सत्ता और प्रभाव का पर्याय माना जाता था। लेकिन जिस राजनीतिक ताकत ने उन्हें दशकों तक प्रभावशाली बनाए रखा, वही ताकत 1984 के सिख विरोधी दंगों के आरोपों और फिर लंबे कानूनी संघर्ष के सामने धीरे-धीरे कमजोर पड़ती चली गई।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की उनके अंगरक्षकों द्वारा हत्या के बाद देश, विशेषकर दिल्ली में सिख विरोधी हिंसा भड़क उठी थी। इसके पीछे ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद पैदा हुई परिस्थितियों को भी महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के रूप में देखा गया था। दिल्ली में कई दिनों तक हिंसा का भयावह दौर चला था। सिखों के घरों, दुकानों और धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया था। हजारों लोगों की जान गई। अलग-अलग आकलनों में मृतकों की संख्या अलग रही, लेकिन दिल्ली में 2,700 से अधिक सिखों के मारे जाने की पुष्टि हुई, जबकि देशभर में मृतकों की संख्या 3,000 से अधिक बताई गई।</div><div><br></div><div>इसी हिंसा से जुड़े कई मामलों में सज्जन कुमार का नाम सामने आया। उन पर हिंसक भीड़ का नेतृत्व करने, लोगों को उकसाने, आपराधिक साजिश और सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने जैसे गंभीर आरोप लगे। अगले तीन दशकों से अधिक समय तक उनके खिलाफ मुकदमों का सिलसिला चलता रहा और कई मामलों में उन्हें कभी राहत मिली तो कभी कानूनी शिकंजा कसता गया। सज्जन कुमार के राजनीतिक और कानूनी जीवन का सबसे बड़ा मोड़ 17 दिसंबर 2018 को आया। दिल्ली हाईकोर्ट ने निचली अदालत के 2013 के उस फैसले को पलट दिया, जिसमें उन्हें बरी कर दिया गया था। हाईकोर्ट ने सज्जन कुमार को 1984 के दंगों के दौरान दिल्ली के राज नगर पार्ट-1, पालम कॉलोनी में पांच सिखों की हत्या और एक गुरुद्वारे को जलाने से जुड़े मामले में दोषी ठहराया। अदालत ने उन्हें आपराधिक साजिश और हिंसा के लिए उकसाने सहित गंभीर अपराधों का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई।</div><div><br></div><div>अपने फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने 1984 की सिख विरोधी हिंसा को “मानवता के खिलाफ अपराध” तक करार दिया था। अदालत ने यह भी निर्देश दिया था कि सज्जन कुमार को अपने प्राकृतिक जीवन के शेष समय तक जेल में रहना होगा। यहीं से वह नेता, जो कभी दिल्ली की सत्ता के गलियारों में बेहद प्रभावशाली माना जाता था, तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे पहुंच गया। हम आपको यह भी बता दें कि 1984 के दंगों से जुड़े आरोपों के बावजूद कांग्रेस लंबे समय तक सज्जन कुमार के साथ खड़ी रही। वह पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे और वर्षों तक पार्टी की राजनीतिक व्यवस्था का हिस्सा बने रहे। हालांकि समय के साथ राजनीतिक दबाव बढ़ता गया। 2009 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस ने सज्जन कुमार और जगदीश टाइटलर को दिए गए चुनाव टिकट वापस ले लिए थे। इसके बाद सज्जन कुमार धीरे-धीरे पार्टी के भीतर हाशिये पर चले गए।</div><div><br></div><div>2018 में दिल्ली हाईकोर्ट से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद उन्होंने कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। इसके साथ ही कांग्रेस के साथ उनका औपचारिक रिश्ता समाप्त हो गया। जिस पार्टी में वह कभी दिल्ली की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में शामिल थे, उसी पार्टी से उनका राजनीतिक सफर अंततः अलगाव और हाशिये पर खत्म हुआ। साथ ही 2018 की सजा सज्जन कुमार के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई नहीं थी। फरवरी 2025 में दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट ने उन्हें 1984 के दंगों से जुड़े एक अन्य मामले में भी उम्रकैद की सजा सुनाई। यह मामला सरस्वती विहार क्षेत्र में भीड़ के हमले से जुड़ा था, जिसमें पिता-पुत्र जसवंत सिंह और तरुणदीप सिंह को कथित रूप से जिंदा जलाकर मार दिए जाने का मामला सामने आया था। अभियोजन पक्ष ने सज्जन कुमार के लिए मृत्युदंड की मांग की थी, लेकिन अदालत ने उनकी उम्र और स्वास्थ्य समेत अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई। इस तरह सज्जन कुमार को 1984 की हिंसा से जुड़े अलग-अलग मामलों में एक से अधिक बार उम्रकैद की सजा मिली और वह जीवन के अंतिम समय तक तिहाड़ जेल में ही रहे।</div><div><br></div><div>साथ ही इस वर्ष जनवरी में सज्जन कुमार को 1984 के दंगों से जुड़े जनकपुरी और विकासपुरी क्षेत्रों के हिंसा भड़काने के आरोप वाले दो अलग-अलग मामलों में दिल्ली की अदालत से बरी कर दिया गया था। लेकिन इन बरी होने के फैसलों से उनकी रिहाई का रास्ता नहीं खुला, क्योंकि वह अन्य मामलों में उम्रकैद की सजा काट रहे थे। उनकी 2018 की दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ चुनौती भी सुप्रीम कोर्ट में लंबित थी। यानी कानूनी लड़ाई के लंबे दौर में कुछ मामलों में उन्हें राहत जरूर मिली, लेकिन 1984 के दंगों से जुड़े अपराधों में हुई दोषसिद्धियों ने उनकी जिंदगी की दिशा पूरी तरह बदल दी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सज्जन कुमार का राजनीतिक जीवन भारतीय राजनीति की उन कहानियों में शामिल हो गया है, जहां एक नेता का जनाधार और राजनीतिक प्रभाव लंबे समय तक उसे मजबूत बनाए रखता है, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया अंततः दशकों पुराने मामलों तक पहुंचती है। 1977 में पार्षद से राजनीतिक शुरुआत करने वाला नेता तीन बार लोकसभा पहुंचा। बाहरी दिल्ली में उसका व्यापक जनाधार था, ग्रामीण और जाट बहुल क्षेत्रों में उसकी मजबूत पकड़ थी और वह कांग्रेस की दिल्ली इकाई का बड़ा चेहरा था। लेकिन 1984 की हिंसा का दाग उसके राजनीतिक कद से कहीं ज्यादा भारी साबित हुआ। करीब चार दशक तक चले मुकदमों, राजनीतिक विवादों, जनाक्रोश और कानूनी लड़ाइयों के बाद सज्जन कुमार को उम्रकैद की सजा मिली। कांग्रेस से उनका रिश्ता टूटा, राजनीतिक प्रभाव खत्म हुआ और जीवन के अंतिम वर्ष तिहाड़ जेल में बीते।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो 80 वर्ष की उम्र में उनका निधन उस दौर का अंत है, जिसमें सज्जन कुमार कभी बाहरी दिल्ली की राजनीति के सबसे शक्तिशाली नेताओं में गिने जाते थे। लेकिन उनकी अंतिम पहचान एक ऐसे पूर्व कांग्रेस सांसद की बन गई, जो 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में दोषी ठहराए जाने के बाद उम्रकैद की सजा काट रहा था। सज्जन कुमार की कहानी सत्ता के शिखर से जेल की सलाखों तक पहुंचने की कहानी है। यह उस राजनीतिक प्रभाव की भी कहानी है, जो वर्षों तक कायम रहा, और उस न्यायिक संघर्ष की भी, जिसने दशकों बाद अपना फैसला सुनाया। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि सत्ता कितनी भी बड़ी क्यों न हो, समय और कानून के सामने उसका प्रभाव हमेशा कायम नहीं रहता। सज्जन कुमार का जीवन और अंत इसी कड़वे सच की एक बड़ी राजनीतिक कहानी बनकर दर्ज हो गया।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 16:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sajjan-kumar-death-1984-anti-sikh-riots-convict-congress-mp-tihar-jail</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sergio-gor-kashmir-india-statement-pakistan-us-clash-trump-administration]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सर्जियो गोर के एक बयान ने पाकिस्तान को ऐसा झटका दिया कि इस्लामाबाद ट्रंप प्रशासन पर बुरी तरह भड़क उठा। अमेरिका के भारत में राजदूत और दक्षिण व मध्य एशिया के विशेष दूत सर्जियो गोर ने श्रीनगर पहुंचकर जम्मू-कश्मीर को भारत का “महत्वपूर्ण हिस्सा” क्या बताया, पाकिस्तान की वर्षों पुरानी कूटनीतिक पटकथा ही हिल गई। प्रतिक्रिया इतनी तीखी थी कि पाकिस्तान ने अमेरिकी चार्जे डी'अफेयर्स नताली बेकर को विदेश मंत्रालय तलब कर बाकायदा “स्ट्रॉन्ग डिमार्श” थमा दिया और गोर के बयान को “गैर-जिम्मेदाराना” करार दे डाला। सवाल यह है कि आखिर गोर के शब्दों में ऐसा क्या था जिसने पाकिस्तान को सीधे अमेरिका से भिड़ने के लिए मजबूर कर दिया?</div><div><br></div><div>दरअसल, श्रीनगर दौरे पर पहुंचे गोर ने साफ कहा, “यह भारत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और मैं यहां पहली बार आया हूं।” उन्होंने जम्मू-कश्मीर की खूबसूरती की तारीफ की, मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से मुलाकात की और कहा कि अमेरिका जम्मू-कश्मीर के लिए अपनी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा कर सकता है। गोर ने यह भी माना कि केंद्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने क्षेत्र को अधिक सुरक्षित बनाने के लिए महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं। इसके बाद उनका डल झील में शिकारा की सवारी करना केवल पर्यटन कार्यक्रम नहीं, बल्कि एक मजबूत प्रतीकात्मक संदेश भी बन गया। अमेरिका का शीर्ष राजनयिक जम्मू-कश्मीर की जमीन पर खुले तौर पर भारत की संप्रभुता के अनुरूप भाषा बोल रहा था और क्षेत्र को संभावित रूप से अमेरिकी पर्यटकों के लिए सुरक्षित गंतव्य के रूप में देख रहा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-bulldozer-action-pakistan-high-commission-unauthorised-structures-new-delhi" target="_blank">पाकिस्तान पर India का Bulldozer Action, Delhi में Pakistan High Commission के बाहर बने अवैध ढांचे ध्वस्त</a></h3><div>यही बात पाकिस्तान को सबसे ज्यादा चुभी। इस्लामाबाद ने तुरंत पुराना राग छेड़ते हुए जम्मू-कश्मीर को “अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त विवादित क्षेत्र” बताया और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों तथा “कश्मीरी लोगों की आकांक्षाओं” का हवाला दिया। पाकिस्तान का आरोप था कि गोर की टिप्पणी अमेरिका की पुरानी स्थिति के विपरीत है। यानी जिस वाशिंगटन से पाकिस्तान दशकों से कश्मीर पर अंतरराष्ट्रीय दखल, मध्यस्थता और भारत पर दबाव की उम्मीद लगाए बैठा था, उसी अमेरिकी प्रशासन के एक प्रमुख प्रतिनिधि ने श्रीनगर में जाकर ऐसी भाषा बोल दी जिसने इस्लामाबाद की कूटनीतिक बेचैनी बढ़ा दी।</div><div><br></div><div>इस घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद बड़ा है। भारत लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और इससे जुड़ा कोई भी लंबित मुद्दा भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय है। भारत ने तीसरे पक्ष की मध्यस्थता को हमेशा खारिज किया है। इसके उलट पाकिस्तान का पूरा प्रयास कश्मीर को लगातार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जीवित विवाद के रूप में पेश करने का रहा है। गोर का “इंपॉर्टेंट पार्ट ऑफ इंडिया” वाला बयान, यदि वाशिंगटन की व्यापक नीति में किसी बदलाव का संकेत साबित होता है, तो यह पाकिस्तान की इसी रणनीति पर सीधा प्रहार होगा।</div><div><br></div><div>हालांकि यहां कूटनीतिक सावधानी भी जरूरी है। पूर्व विदेश सचिव कंवल सिब्बल ने इस बयान को महत्वपूर्ण बताया है, लेकिन यह संभावना भी जताई कि गोर अपने औपचारिक निर्देशों से आगे निकल गए हों और पाकिस्तान को शांत करने के लिए अमेरिका बाद में अपना पुराना रुख दोहरा सकता है। यही कारण है कि भारत के लिए केवल एक बयान को अंतिम अमेरिकी नीति परिवर्तन मान लेना जल्दबाजी होगी। फिर भी, यह टिप्पणी उस पृष्ठभूमि में बेहद मायने रखती है जिसमें अमेरिका के पिछले रुख में अक्सर “कश्मीरी लोगों की इच्छाओं” जैसी भाषा दिखाई देती रही है और स्वयं डोनाल्ड ट्रंप कई मौकों पर कश्मीर पर मध्यस्थता की पेशकश कर चुके हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन इस पूरे विवाद का एक दूसरा और शायद ज्यादा दिलचस्प रणनीतिक पहलू पाकिस्तान की गोर से सीधी भिड़ंत है। गोर दक्षिण और मध्य एशिया के विशेष दूत भी हैं और उनके दायरे में पाकिस्तान भी आता है। ऐसे में पाकिस्तान ने जिस तीखे तरीके से उन्हें निशाने पर लिया है, उससे गोर के लिए पाकिस्तान संबंधी कूटनीतिक भूमिका और मुश्किल हो सकती है। सिब्बल ने भी इसी ओर इशारा करते हुए कहा कि पाकिस्तान ने गोर पर जिस तरह हमला किया है, उससे वह नाराज हो सकते हैं और यह भारत के लिए अच्छी बात है।</div><div><br></div><div>इसका सीधा लाभ यह हो सकता है कि अमेरिका-पाकिस्तान समीकरण में पैदा होने वाली खटास वाशिंगटन को दक्षिण एशिया में अपनी प्राथमिकताओं पर नए सिरे से विचार करने के लिए प्रेरित करे। पाकिस्तान लंबे समय से अमेरिकी मध्यस्थता की उम्मीद पर कश्मीर नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय बनाने की कोशिश करता रहा है। लेकिन अगर ट्रंप प्रशासन के प्रभावशाली चेहरे के साथ ही उसका टकराव गहराता है, तो इस्लामाबाद की वाशिंगटन लॉबिंग कमजोर पड़ सकती है और भारत के लिए अमेरिका के साथ रणनीतिक संवाद को मजबूत करने की गुंजाइश बढ़ सकती है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुगेलमैन ने भी गोर की टिप्पणी को भारत-अमेरिका संबंधों को सुधारने की दिशा में मददगार बताया है। उन्होंने कहा है कि दिल्ली आने के बाद गोर भारत के साथ रिश्तों को सुधारने के लक्ष्य पर काम कर रहे हैं और यह बयान उस प्रयास को निश्चित रूप से मजबूती दे सकता है। हालांकि उन्होंने यह चेतावनी भी दी कि यदि यह वास्तव में अमेरिकी नीति का संकेत है, तो यह वर्षों पुराने अमेरिकी रुख से अलग होगा और पाकिस्तान के साथ दोबारा मजबूत हो रहे संबंधों को प्रभावित कर सकता है।</div><div><br></div><div>साथ ही गोर के दौरे का आर्थिक और सुरक्षा संबंधी संदेश भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिका फिलहाल जम्मू-कश्मीर के लिए “लेवल-4: डू नॉट ट्रैवल” एडवाइजरी बनाए हुए है, जो अंतरराष्ट्रीय पर्यटन के लिए बड़ी बाधा रही है। पिछले वर्ष पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद सुरक्षा चिंताएं और बढ़ी थीं। अब गोर का यह कहना कि अमेरिकी प्रशासन ट्रैवल चेतावनी को कम करने की संभावना पर विचार करेगा, जम्मू-कश्मीर के लिए बड़ा अवसर बन सकता है। यदि एडवाइजरी में ढील मिलती है तो इसका संदेश केवल पर्यटकों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि यह क्षेत्र की सुरक्षा स्थिति पर अमेरिकी भरोसे का अंतरराष्ट्रीय संकेत होगा।</div><div><br></div><div>मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी गोर के साथ पर्यटन, बागवानी और नई अर्थव्यवस्था जैसे क्षेत्रों में जम्मू-कश्मीर और अमेरिका के बीच संबंधों को व्यापक और गहरा करने पर चर्चा की। ऐसे समय में जब पर्यटन से हजारों परिवारों की रोजी-रोटी जुड़ी है और पीडीपी प्रमुख महबूबा मुफ्ती भी अमेरिकी ट्रैवल एडवाइजरी की समीक्षा की मांग कर चुकी हैं, किसी संभावित बदलाव का आर्थिक असर व्यापक हो सकता है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, श्रीनगर में सर्जियो गोर का दौरा पाकिस्तान के लिए सिर्फ एक कूटनीतिक झटका नहीं, बल्कि उसके वर्षों पुराने कश्मीर नैरेटिव पर सीधा प्रहार है। पाकिस्तान ने अमेरिकी अधिकारी को तलब कर अपनी नाराजगी तो दर्ज करा दी, लेकिन इस आक्रामक प्रतिक्रिया ने यह भी साफ कर दिया कि गोर के शब्द इस्लामाबाद को कितनी गहराई तक चुभे हैं। अब नजर इस बात पर रहेगी कि क्या ट्रंप प्रशासन गोर की टिप्पणी को आगे की नीति में बदलता है या पाकिस्तान को शांत करने के लिए पुराने अमेरिकी रुख की ओर लौटता है। लेकिन फिलहाल इतना तय है कि श्रीनगर से निकला यह संदेश भारत के लिए रणनीतिक, कूटनीतिक और आर्थिक, तीनों मोर्चों पर संभावित लाभ का दरवाजा खोलता है, जबकि पाकिस्तान के सामने सवाल यह खड़ा कर देता है कि अमेरिका से भिड़कर उसने अपनी ही कूटनीतिक जमीन तो और कमजोर नहीं कर ली है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 11:49:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sergio-gor-kashmir-india-statement-pakistan-us-clash-trump-administration</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[अल्पसंख्यकों की असुरक्षा से आतंकवाद तक पाक का यथार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/pakistan-reality-from-minority-insecurity-to-terrorism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी का स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर दिया गया हालिया बयान केवल एक जहरीली एवं कड़वी राजनीतिक टिप्पणी ही नहीं है, बल्कि पाकिस्तान की उस मानसिकता का आईना है, जिसमें भारत के प्रति कटुता, अविश्वास, नफरत और वैचारिक विरोध आज भी गहरे पैठे हुए हैं। जरदारी ने ‘अखंड भारत’ की अवधारणा पर टिप्पणी करते हुए कहा कि भारतीय इसमें विश्वास करते हैं, लेकिन वे मुसलमान होने के नाते इससे सहमत नहीं हैं। साथ ही उन्होंने पाकिस्तान में हिंदुओं के सुरक्षित और सुखी होने का दावा भी किया। सवाल यह है कि दुनिया किसी राष्ट्राध्यक्ष के दावे पर विश्वास करे या आंकड़ों और जमीन पर दिखाई देने वाली वास्तविकता पर? इतिहास का न्याय भावनाओं से नहीं, तथ्यों से होता है। और पाकिस्तान के संदर्भ में जनसांख्यिकी, अल्पसंख्यकों की स्थिति, धार्मिक स्वतंत्रता और आतंकवाद-ये चारों क्षेत्र ऐसे आईने हैं जिनमें उसकी अपनी तस्वीर साफ दिखाई देती है।</div><div><br></div><div>1947 में जब पाकिस्तान वजूद में आया एवं 1951 की जनगणना में पूरे तत्कालीन पाकिस्तान में हिंदुओं की हिस्सेदारी लगभग 14.6 प्रतिशत थी, पाकिस्तान की 2023 की आधिकारिक जनगणना में ‘हिंदू जाति’ की आबादी 3,867,729 और ‘अनुसूचित जाति’ की आबादी 1,349,487 दर्ज की गई है। कुल आबादी 240.46 मिलियन है। इन दोनों श्रेणियों को जोड़ें तो हिस्सा लगभग 2.17 प्रतिशत बैठता है। अर्थात आज के पाकिस्तान में हिंदू समुदाय की जनसंख्या हिस्सेदारी अत्यंत सीमित रह गई है। इसके विपरीत भारत की स्थिति को भी तथ्यों के साथ ही देखना चाहिए। भारत की अंतिम प्रकाशित पूर्ण जनगणना 2011 की है। उसमें मुस्लिम आबादी 14.23 प्रतिशत, यानी 17.22 करोड़ दर्ज हुई थी। यही वह बिंदु है जहां भारत और पाकिस्तान के बीच वास्तविक अंतर सामने आता है। भारत ने धर्म के आधार पर नागरिकता की अवधारणा को राज्य की नागरिकता का आधार नहीं बनाया। संविधान ने हर नागरिक को समान नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता और अपनी आस्था के पालन की स्वतंत्रता दी। भारत में मुसलमानों ने राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, केंद्रीय मंत्री, राज्यपाल, मुख्यमंत्री, न्यायपालिका, सेना, शिक्षा, उद्योग, कला, खेल और प्रशासन सहित जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। इसके विपरीत पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति पर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं की रिपोर्टें गंभीर प्रश्न उठाती हैं। ह्यूमन राइटस वाच की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के दुरुपयोग ने धार्मिक अल्पसंख्यकों को हिंसा, मनमानी गिरफ्तारी और सामाजिक दबाव के प्रति अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। रिपोर्ट में हिंदुओं, ईसाइयों और अहमदियों सहित अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा और जबरन विवाह-धर्मांतरण जैसी समस्याओं का उल्लेख है। 2023 में पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के जरनवाला में ईशनिंदा के आरोपों के बाद चर्चों और ईसाई घरों पर भीड़ के हमले हुए। ह्यूमन राइटस वाच ने पाकिस्तान में ईशनिंदा कानूनों के इस्तेमाल से अल्पसंख्यकों की संपत्ति पर कब्जे और उन्हें घर छोड़ने के लिए मजबूर किए जाने के मामलों का भी दस्तावेजीकरण किया है। ऐसे में जरदारी का यह कहना कि पाकिस्तान के हिंदू बहुत खुश हैं, एक झूठा, गुमराह करने वाला एवं भ्रामक राजनीतिक दावा तो हो सकता है, लेकिन उसे व्यापक तथ्यात्मक प्रमाण की कसौटी पर परखा जाना चाहिए। किसी देश में अल्पसंख्यक सुरक्षित हैं या नहीं, इसका प्रमाण केवल राष्ट्राध्यक्ष का बयान नहीं, बल्कि उनके नागरिक अधिकार, धार्मिक स्वतंत्रता, मंदिरों और पूजा स्थलों की सुरक्षा, कानून के सामने समानता तथा भयमुक्त जीवन है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/javed-akhtar-slams-asif-ali-zardari-over-remarks-on-hindu-minority" target="_blank">'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना</a></h3><div>भारत में सरकारों के खिलाफ मुसलमानों एवं अन्य अल्पसंख्यकों के द्वारा आवाज उठाई जा सकती है, न्यायालयों में चुनौती दी जा सकती है। यही लोकतांत्रिक भारत और धार्मिक-सामुदायिक असुरक्षा से जूझते पाकिस्तान के बीच बुनियादी अंतर है। दूसरा बड़ा प्रश्न पाकिस्तान के भारत-विरोधी आतंकवाद का है। पिछले कई दशकों में सीमा पार आतंकवाद भारत की सुरक्षा के सामने सबसे गंभीर चुनौतियों में रहा है। संसद पर हमला, मुंबई हमले, पठानकोट, उरी, पुलवामा और जम्मू-कश्मीर में लगातार हिंसक घटनाएं इस समस्या का हिस्सा रही हैं। 2019 में पुलवामा हमले के बाद भारत ने बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के प्रशिक्षण शिविर पर कार्रवाई की। विदेश मंत्रालय ने उस समय स्पष्ट किया था कि पाकिस्तान की जमीन पर चल रहे आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध कार्रवाई की गई क्योंकि पाकिस्तान उन्हें नष्ट करने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहा था। 2025 में पहलगाम के आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने भारत की सुरक्षा नीति में एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन का संकेत दिया।&nbsp;</div><br><div>22 अप्रैल 2025 के हमले में 26 लोगों की हत्या के बाद 7 मई को भारत ने पाकिस्तान और पाकिस्तान-अधिकृत जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया। भारत सरकार ने इसे आतंकवादी ढांचे के विरुद्ध लक्षित और नियंत्रित कार्रवाई बताया।&nbsp; यह परिवर्तन केवल सैन्य कार्रवाई तक सीमित नहीं है। भारत ने आतंकवाद के साथ-साथ उसके वित्तीय और नशीले पदार्थों के नेटवर्क पर भी ध्यान केंद्रित किया है। सरकार ने विदेशी तत्वों द्वारा नशीले पदार्थों को सीमा पार भेजकर ‘नार्को-टेरर’ को वित्त उपलब्ध कराने की बात कही है। यहां भारत की चुनौती केवल सीमा पर बंदूक लेकर खड़े आतंकवादी से नहीं है। चुनौती उस पूरे तंत्र से है जिसमें आतंकवाद, हथियार, ड्रोन, नशीले पदार्थ, फर्जी सूचनाएं और सामाजिक विभाजन-सब एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। पिछले एक दशक से अधिक समय में भारत की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही है कि उसने पाकिस्तान को यह संदेश दिया है कि आतंकवाद और बातचीत को समानांतर रास्तों पर नहीं चलाया जा सकता। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक, 2019 की बालाकोट कार्रवाई और 2025 का ऑपरेशन सिंदूर अलग-अलग घटनाएं जरूर हैं, लेकिन इनके पीछे एक समान संदेश दिखाई देता है-भारत अब आतंकवाद को केवल सहने या निंदा करने तक सीमित नहीं रहेगा। इस बदले हुए भारत की तस्वीर पाकिस्तान की बेचैनी को समझने के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत की अर्थव्यवस्था, तकनीकी क्षमता, अंतरिक्ष कार्यक्रम, रक्षा उत्पादन, डिजिटल बुनियादी ढांचा, वैश्विक कूटनीति और रणनीतिक प्रभाव लगातार बढ़े हैं। आज भारत को विश्व राजनीति में केवल दक्षिण एशिया की शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक निर्णय-प्रक्रिया के महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखा जाता है। पाकिस्तान की समस्या केवल यह नहीं है कि भारत उससे आर्थिक और सामरिक रूप से आगे निकल रहा है, उसकी बड़ी समस्या यह है कि भारत अपनी बहुलतावादी लोकतांत्रिक पहचान के साथ आगे बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>जरदारी का बयान इसलिए भी विचारणीय है कि पाकिस्तान को भारत के भीतर की विविधता पर टिप्पणी करने से पहले अपने घर के भीतर झांकना चाहिए। भारत में मुसलमानों की आबादी बढ़ती आबादी का तथ्य स्वयं बताता है कि भारत में मुस्लिम समुदाय का अस्तित्व, विस्तार और सामाजिक जीवन किसी ‘समाप्ति’ की कहानी नहीं है। दूसरी ओर पाकिस्तान में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर आज भी अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाएं गंभीर चिंता व्यक्त कर रही हैं। इसलिए दुनिया के उन देशों को भी पाकिस्तान के प्रति अपनी नीति पर पुनर्विचार करना चाहिए, जो केवल रणनीतिक या राजनीतिक हितों के कारण उसकी हर बात का समर्थन करते हैं। किसी राष्ट्र का मूल्यांकन उसके भाषणों से नहीं, उसके व्यवहार से होना चाहिए। यदि कोई देश एक तरफ आतंकवाद के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रतिबद्धता जताए और दूसरी तरफ उसकी धरती से सक्रिय आतंकी नेटवर्क लगातार पड़ोसी को निशाना बनाते रहें, तो अंतरराष्ट्रीय समुदाय को केवल कूटनीतिक शब्दों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। भारत की शक्ति का अर्थ किसी धर्म या देश के प्रति घृणा नहीं, बल्कि अपने नागरिकों की सुरक्षा, सीमाओं की रक्षा और आतंकवाद के विरुद्ध निर्णायक कार्रवाई है। भारत के मुसलमान भी उतने ही भारतीय हैं जितने हिंदू, सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और अन्य समुदाय। आज पाकिस्तान के सामने सबसे बड़ा प्रश्न भारत नहीं, बल्कि स्वयं पाकिस्तान है-वह कब यह स्वीकार करेगा कि आतंकवाद को विदेश नीति का औजार बनाना अंततः उसी समाज को अस्थिर करता है जिसने उसे जन्म दिया? पाकिस्तान में आतंकवादी संगठनों की हिंसा का दंश स्वयं वहां के नागरिक भी झेल रहे हैं। ह्यूमन राइटस वाच के अनुसार 2025 में पाकिस्तान में विभिन्न उग्रवादी संगठनों के हमलों में सैकड़ों लोग मारे गए। जरदारी को भारत के ‘अखंड भारत’ की चिंता करने से पहले अपने वर्तमान पाकिस्तान की अखंडता, शांति और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की चिंता करनी चाहिए। इतिहास का सबसे बड़ा व्यंग्य यही है कि जो राष्ट्र भारत की एकता पर प्रश्न उठाता है, वह स्वयं आतंकवाद, राजनीतिक अस्थिरता, आर्थिक संकट और सामाजिक विभाजन से जूझता रहा है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 14:59:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/pakistan-reality-from-minority-insecurity-to-terrorism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gyanesh Kumar की तारीफ कर Donald Trump ने भारत में विपक्षी दलों की 'बेचैनी' और बढ़ा दी है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/trump-praises-india-election-system-gyanesh-kumar-election-commission-voter-id]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत की चुनाव व्यवस्था और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की तारीफ कर भारतीय राजनीति में एक नई बहस को जन्म दे दिया है। ट्रंप ने भारत में मतदाता पहचान की अनिवार्यता और विशाल स्तर पर चुनाव कराने की क्षमता का हवाला देते हुए अमेरिका में कड़े मतदाता पहचान नियम लागू करने की अपनी मुहिम को फिर हवा दी है। लेकिन इस बयान का असर केवल अमेरिका तक सीमित रहने वाला नहीं है। भारत में यह बयान चुनाव आयोग पर विपक्ष के आरोपों और सत्ता पक्ष की राजनीतिक रणनीति के बीच पहले से चल रही जंग को और तेज कर सकता है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया मंच ट्रूथ सोशल पर कहा कि ज्ञानेश कुमार ने अमेरिकी प्रशासन से पूछा था कि वैध फोटो पहचान पत्र के बिना अमेरिका में चुनाव कैसे हो सकते हैं? उन्होंने भारत के पिछले आम चुनाव में करीब 64 करोड़ 60 लाख मतदाताओं का उल्लेख करते हुए कहा कि डाक से मतदान करने वालों की संख्या एक प्रतिशत से भी कम रही और मतदाताओं के लिए वैध फोटो पहचान पत्र जरूरी था। इसके साथ ही उन्होंने अमेरिका में मतदाता पहचान और नागरिकता से जुड़े कड़े नियम लागू करने वाले 'सेव अमेरिका अधिनियम' को पारित करने की मांग दोहराई।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-praises-india-election-system-calls-for-the-save-america-act" target="_blank">Donald Trump ने की भारतीय चुनाव प्रणाली की तारीफ़, भारत की तर्ज पर अमेरिका में भी लागू हो 'SAVE अमेरिका एक्ट'</a></h3><div>ट्रंप का तर्क है कि मतदाता की पहचान और नागरिकता की कड़ी जांच चुनाव की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है। हम आपको बता दें कि इस प्रस्तावित कानून में संघीय चुनावों के लिए पंजीकरण के समय नागरिकता का दस्तावेज, मतदान केंद्र पर फोटो पहचान और डाक से मतदान पर कड़े प्रतिबंध जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। अमेरिका में इस अधिनियम के विरोधियों का तर्क है कि गैर नागरिकों द्वारा चुनावी धोखाधड़ी बहुत दुर्लभ है और कठोर दस्तावेजी नियम उन पात्र मतदाताओं के लिए मुश्किल पैदा कर सकते हैं जिनके पास पासपोर्ट या जन्म प्रमाण पत्र आसानी से उपलब्ध नहीं है। इस बीच, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने ट्रंप के बयान का समर्थन करते हुए कहा है कि भारत के पिछले चुनाव में 64.6 करोड़ मतदाताओं के लिए पहचान पत्र की अनिवार्यता इस बात का मजबूत उदाहरण है कि अमेरिका को भी सेव अमेरिका अधिनियम लागू करना चाहिए।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, ट्रंप के बयान के बाद भारत में राजनीति गरमा गयी है। सत्तारुढ़ भारतीय जनता पार्टी ट्रंप के बयान को विपक्ष के चुनाव संबंधी आरोपों के खिलाफ मजबूत राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रही है। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि दुनिया का एक प्रमुख नेता भारत की विशाल चुनावी व्यवस्था और मतदाता पहचान प्रणाली को उदाहरण के रूप में देख रहा है। वहीं ट्रंप के बयान के बाद विपक्ष के मतदाता सूची में गड़बड़ी, बड़े पैमाने पर मताधिकार से वंचित किए जाने और वोट चोरी जैसे आरोपों को हवा निकलती नजर आ रही है।</div><div><br></div><div>ट्रंप की ओर से ज्ञानेश कुमार की प्रशंसा भारत में विपक्षी दलों को इसलिए भी नहीं पच रही क्योंकि वह संसद में ज्ञानेश कुमार के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने के अलावा उनके खिलाफ तमाम राजनीतिक आरोपों से लेकर निजी आक्षेप तक लगा चुके हैं। बदले हालात में विपक्ष यह तर्क दे रहा है कि किसी विदेशी नेता की प्रशंसा से भारत के भीतर चुनाव आयोग को लेकर उठे सवाल खत्म नहीं होते। विपक्ष विशेष गहन पुनरीक्षण यानि एसआईआर की कवायद और मतदाता सूचियों में कथित विसंगतियों को लेकर अपने आरोपों पर भी कायम है।</div><div><br></div><div>उधर, ज्ञानेश कुमार की सार्वजनिक छवि अब दो बिल्कुल विपरीत खेमों में बंटी दिखाई दे रही है। सत्ता समर्थक और तटस्थ वर्ग उन्हें ऐसी चुनावी व्यवस्था के संचालक के रूप में देख रहा है जिसकी विशालता और तकनीकी क्षमता दुनिया के लिए उदाहरण है। वहीं आलोचक अब भी कह रहे हैं कि अंतरराष्ट्रीय प्रशंसा घरेलू विवादों को मिटा नहीं सकती।</div><div><br></div><div>वैसे भारतीय चुनाव आयोग पर हमलावर रहने वाले विपक्षी दलों को यह समझना होगा कि अपनी हार के कारणों पर मंथन करने की बजाय भारतीय चुनाव आयोग पर ही सारा ठीकरा फोड़ देने से उन्हें सफलता नहीं मिलेगी। भारतीय निर्वाचन आयोग की पूरी दुनिया में साख है जोकि विपक्ष के राजनीतिक आरोपों से खराब नहीं होगी। भारत की चुनावी ताकत का वैश्विक पहलू बेहद महत्वपूर्ण है। भारतीय चुनाव आयोग के अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण और लोकतांत्रिक प्रबंधन कार्यक्रमों के जरिए सौ से अधिक देशों के चुनाव अधिकारियों को मतदाता पंजीकरण, मतदान केंद्र प्रबंधन, महिला भागीदारी और सुरक्षित तकनीक के प्रशिक्षण का लाभ मिला है। भारतीय चुनाव आयुक्तों ने अतीत में कंबोडिया, यूगोस्लाविया, नामीबिया तथा अन्य तमाम देशों में चुनावी व्यवस्थाओं में भी सहायता की है। यही नहीं, भारत की इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों और फोटो पहचान आधारित व्यवस्था को भी कई विकासशील देशों ने उपयोगी माना है। साथ ही संयुक्त राष्ट्र की ओर से अक्सर विभिन्न देशों में चुनाव के दौरान भारतीय निर्वाचन आयोग के अधिकारियों को पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता है जोकि गौरव की बात है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, एक ओर दुनिया भारत के चुनाव मॉडल को लोकतंत्र की ताकत मान रही है, दूसरी ओर देश के भीतर उसी व्यवस्था पर सबसे तीखा सियासी हमला जारी है। आने वाले समय में असली लड़ाई केवल मतदाता पहचान की नहीं होगी, बल्कि इस सवाल की होगी कि चुनाव आयोग पर जनता का भरोसा किसके तर्क से बनेगा और किसके आरोप से टूटेगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 11:51:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/trump-praises-india-election-system-gyanesh-kumar-election-commission-voter-id</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच पक रही सियासी खिचड़ी के निहितार्थ क्या हैं? समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/what-exactly-are-the-implications-of-the-political-alliance-brewing-between-the-jsp-and-the-ljp]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में जन सुराज पार्टी के नवनिर्वाचित विधायक प्रशांत किशोर और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान के बीच जो राजनीतिक खिचड़ी पकने की चर्चा है, वह उत्तरप्रदेश की राजनीति से अभिप्रेरित है। चूंकि प्रशांत किशोर मशहूर चुनावी रणनीतिकार भी हैं और लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के रणनीतिक घाटों की पानी का स्वाद चख चुके हैं, इसलिए उनसे जुड़ी इस आशय की चर्चा भी अनायास नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक न्याय क्रांति और मंडल बनाम कमंडल की मतलबी राजनीति की कड़ी में जहां उत्तरप्रदेश में चार-चार बार दलित नेत्री सुश्री मायावती को मुख्यमंत्री बनने का मौका मिला और उनकी बहुजन समाज पार्टी तीन बार गठबंधन के तहत और एक बार पूर्ण बहुमत से यूपी की सत्ता में आई। लेकिन बिहार में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद, जदयू के हुक्मरान नीतीश कुमार ने लोजपा के राम विलास पासवान और उनके पुत्र चिराग पासवान को कभी पूर्ण रूप से उभरने ही नहीं दिया और गठबंधन में भी कमजोर बनाए रखा।&nbsp;</div><div><br></div><div>यही वजह है कि बिहार में नए जमाने की राजनीति के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने चिराग पासवान के साथ गठबंधन की सम्भवनाओं को हवा दिलवाकर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, जनता दल यूनाइटेड के सुप्रीमो नीतीश कुमार और राष्ट्रीय जनता दल नेता तेजस्वी यादव के समक्ष एक तगड़ी चुनौती पेश करने की अपनी मंशा उजागर कर दी है। चिराग पासवान जिस तरह से खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान करार देते हैं, इससे उनकी भी बेचैनी बढ़ेगी हो।</div><div><br></div><div>यह ठीक है कि जन सुराज पार्टी और लोजपा रामविलास के बीच किसी औपचारिक गठबंधन की सार्वजनिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है। लेकिन अगस्त 2026 की ताजा राजनीतिक हलचल को देखें तो दोनों के बीच संभावित सियासी तालमेल की चर्चा को महज अफवाह मानकर खारिज करना भी जल्दबाजी होगी। क्योंकि हाल की रिपोर्टों में दोनों के करीब आने और भाजपा-राजद से अलग एक संभावित धुरी की चर्चा सामने आई है। इससे एनडीए की राजनीति में चिराग पासवान का रुतबा बढ़ना भी स्वाभाविक है। फिर भी यदि चिराग पासवान को दलित मुख्यमंत्री बनाने के स्वप्न प्रशांत किशोर यदि दिखाते हैं, या फिर उपमुख्यमंत्री पद का भी सियासी चारा डालते हैं तो मिशन 2029 के संसदीय चुनाव और 2030 के विधानसभा चुनावों को लेकर एनडीए और महागठबंधन के हाथपांव फूलना स्वाभाविक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-took-the-oath-in-the-bihar-legislative-assembly" target="_blank">Prashant Kishor ने Bihar विधानसभा में ली शपथ, बोले- यह मेरे लिए गर्व और जिम्मेदारी का पल</a></h3><div>आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर इस मनोवांछित सियासी खिचड़ी में क्या-क्या पक रहा है? और इसके राजनीतिक स्वाद के मिजाज से इसके क्या क्या मायने हो सकते हैं-</div><div><br></div><div>पहला, लोजपा युवराज चिराग पासवान के लिए यह NDA के भीतर दबाव की राजनीति हो सकती है, क्योंकि चिराग पासवान पहले भी सीट बंटवारे और NDA के भीतर अपनी राजनीतिक हैसियत को लेकर स्वतंत्र रुख दिखाते रहे हैं। 2025 में भी उनके प्रशांत किशोर से संभावित संपर्क की खबरें सामने आई थीं। इसलिए सियासत में हर खुली हुई सम्भवनाओं और उससे बनने बिगड़ने वाली हवा से इंकार नहीं किया जा सकता है।</div><div><br></div><div>दूसरा, जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के लिए लोजपा रामविलास प्रमुख चिराग पासवान एक महत्वपूर्ण सामाजिक-पॉलिटिकल पुल हो सकते हैं। ऐसा इसलिए कि</div><div>जन सुराज अपने को BJP और RJD—दोनों से अलग विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहता है। अब बांकीपुर में किशोर की जीत ने उन्हें सिर्फ आंदोलनकारी नहीं, बल्कि क्षेत्रीय चुनावी ताकत के रूप में भी स्थापित किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, सबसे दिलचस्प संभावना है—'माइनस BJP, माइनस RJD' राजनीति। यानी कि ताजा राजनीतिक चर्चाओं में इसी तरह के पुनर्संयोजन की संभावना उठ रही है। इसका अर्थ होगा कि चिराग पासवान अपना दलित/पासवान प्रभाव और जन सुराज पार्टी अपना युवा, गैर-पारंपरिक तथा शहरी-मध्यवर्गीय आधार जोड़ने की कोशिश करे। दोनों ने यदि रणनीतिक रूप से सवर्णों को तरजीह दी तो भाजपा/कांग्रेस के लिए यह किसी झटके की तरह होगा।</div><div><br></div><div>लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि दोनों की राजनीतिक जरूरतें अलग अलग हैं। चाहे चिराग पासवान हों या&nbsp;</div><div>प्रशांत किशोर, दोनों अपना स्वतंत्र राजनीतिक स्पेस बढ़ाना चाहते हैं, साथ ही खुद को तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करना चाहते हैं। जहां चिराग पासवान NDA में रहते हुए अपना bargaining power बढ़ाना चाहते हैं, वहीं प्रशांत किशोर BJP और RJD दोनों से दूरी दिखाना चाहते हैं।</div><div><br></div><div>इस बात में कोई दो राय नही कि उत्तरप्रदेश के जाटवों के वोट बैंक के तरह ही बिहार में भी पासवान वोट का मजबूत आधार है, जबकि प्रशांत किशोर युवा, शिक्षित और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं पर जोर देते हैं। वह संगठन और चुनावी नेटवर्क के कार्यसाधक हैं। उनमें नया राजनीतिक नैरेटिव गढ़ने और अभियान चलाने की अद्भुत क्षमता है। लिहाजा यहीं से असली सवाल पैदा होता है—क्या चिराग NDA के भीतर रहकर जन सुराज से तालमेल करेंगे, या भविष्य में कोई व्यापक वैकल्पिक मोर्चा बनेगा?</div><div><br></div><div>अलबत्ता, इन चर्चाओं में एक और बड़ा संकेत निहित है। वह यह कि प्रशांत किशोर अब केवल विधानसभा की राजनीति तक सीमित नहीं दिख रहे, बल्कि जन सुराज की नजर विधान परिषद के चुनावी क्षेत्रों पर भी बताई जा रही है। यानी संगठन को लगातार चुनावी मशीनरी में बदलने की कोशिश हो रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरी ओर चिराग पासवान ने भी हाल के दिनों में ऐसे मुद्दे उठाए हैं जिन पर सरकार/NDA के भीतर असहजता पैदा हो सकती है। उदाहरण के लिए, उन्होंने गत दिनों बिहार की शराबबंदी नीति की प्रभावशीलता पर खुलकर सवाल उठाया। यानी दोनों के बीच संभावित तालमेल का आधार केवल जातीय गणित नहीं, बल्कि 'एंटी-एस्टैब्लिशमेंट' और 'नया विकल्प' का राजनीतिक नैरेटिव भी बन सकता है।</div><div><br></div><div>मगर सबसे बड़ी अड़चन भी यही है। खासकर प्रशांत किशोर की राजनीति का मूल दावा ही है कि वे पारंपरिक राजनीतिक दलों के गठजोड़ से अलग व्यवस्था खड़ी करेंगे। 2025 में उन्होंने चिराग के साथ गठबंधन की संभावना को सार्वजनिक रूप से नकारते हुए कहा था कि उनका गठबंधन जनता के साथ है। इसलिए यदि आज दोनों के बीच नजदीकी बढ़ती है, तो इसे सीधा चुनावी गठबंधन मानने के बजाय 'रणनीतिक संवाद' समझना ज्यादा उचित होगा।</div><div><br></div><div>मेरी नजर में असली खेल के दृष्टिगत 2026 का गठबंधन कम और 2029–30 की जमीन तैयार करने की कवायद ज्यादा हो सकती है। वाकई यदि चिराग + जन सुराज साथ आते हैं तो बिहार में तीन ध्रुव उभर सकते हैं:- पहला, NDA बनाम RJD; दूसरा, महागठबंधन बनाम जन सुराज–LJP(RV जैसा वैकल्पिक ध्रुव। और यदि इस तीसरे ध्रुव में पप्पू यादव, उपेंद्र कुशवाहा या दूसरे छोटे सामाजिक आधार वाले नेता भी किसी रूप में जुड़ते हैं, तो बिहार की पारंपरिक दो-ध्रुवीय राजनीति के लिए यह गंभीर चुनौती बन सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस परिस्थिति में सामान्य जातियों के वोटबैंक का महत्व और अधिक बढ़ जाएगा। क्योंकि यूपी में भी ओबीसी सियासत से ब्राह्मण परेशान होकर मायावती के साथ हो लिए थे। कुछ ऐसा ही उभार बिहार में भी नजर आ रहा है, खासकर सोशल मीडिया पर सवर्ण विरोधी पोस्टों की बाढ़।</div><div>फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण संकेत यही है कि दोनों की तरफ से औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं हुई है। इसलिए 'खिचड़ी पक रही है' कहना राजनीतिक संकेतों के लिहाज से उचित है, लेकिन 'खिचड़ी तैयार हो गई है' कहना अभी तथ्यात्मक रूप से जल्दबाजी होगी। शायद वह "बीरबल की खिचड़ी" न बन जाए।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 17:40:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/what-exactly-are-the-implications-of-the-political-alliance-brewing-between-the-jsp-and-the-ljp</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[CJI Surya Kant के प्रति बढ़ रही नाराजगी! NALSAR के बाद NLSIU Bengaluru के छात्रों ने भी जताया विरोध, BCI President Manan Kumar Mishra पर भी उठे सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/nalsar-nlsiu-law-students-protest-cji-surya-kant-manan-kumar-mishra-bci-controversy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्रों की ओर से सीजेआई सूर्यकांत का बढ़ता विरोध हर किसी को चौंका रहा है क्योंकि देश के इतिहास में ऐसा घटनाक्रम पहले कभी देखने में नहीं आया। हम आपको बता दें कि हैदराबाद की NALSAR से उठी छात्रों की असहमति अब बेंगलुरु की NLSIU तक पहुंच गई है और देखते ही देखते यह मामला एक दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के विरोध से कहीं बड़ा बन गया है। इस समय स्थिति यह है कि कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र अब सीधे उन संस्थाओं और पदों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें कानून और न्याय की व्यवस्था का प्रहरी माना जाता है। इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में CJI सूर्यकांत को लेकर छात्रों की नाराजगी, BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की विवादित कार्रवाई और उसके बाद छात्रों के पक्ष में खड़ी होती कानून की युवा पीढ़ी है। सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि दीक्षांत समारोह में कौन आएगा, बल्कि यह है कि क्या असहमति जताने वाले कानून के छात्रों को अपनी आवाज उठाने की कीमत अपने भविष्य से चुकानी पड़ेगी?</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि विवाद की शुरुआत NALSAR के छात्रों की उस आपत्ति से हुई, जिसमें उन्होंने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को मुख्य अतिथि बनाए जाने पर असहमति जताई। छात्रों की नाराजगी का संबंध 20 जुलाई को संसद की ओर हुए छात्रों के मार्च और उस दौरान कथित पुलिस ज्यादती से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई से था। छात्रों ने CJI की अध्यक्षता वाली पीठ के रुख को लेकर अपनी आपत्ति दर्ज कराई थी। हालांकि बाद में उन्हीं मामलों में अदालत ने छात्रों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई पर रोक लगाई, वीडियो और CCTV फुटेज सुरक्षित रखने को कहा और स्वतंत्र जांच जैसे विकल्पों पर भी विचार किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/who-is-manan-kumar-mishra-bci-chairman-in-headlines-due-to-nalsar-controversy-and-cjp-campaign" target="_blank">Manan Kumar Mishra कौन हैं? NALSAR विवाद और CJP कैंपेन से सुर्खियों में BCI चेयरमैन</a></h3><div>इस बीच CJI सूर्यकांत ने स्वयं स्पष्ट कर दिया कि उन्होंने NALSAR का निमंत्रण स्वीकार ही नहीं किया था। उन्होंने कहा कि जब उन्होंने निमंत्रण स्वीकार नहीं किया तो उनके वहां जाने का सवाल ही नहीं उठता। यानी जिस विवाद ने इतना बड़ा रूप ले लिया, उसमें CJI की ओर से मुख्य अतिथि बनने की सहमति ही नहीं थी। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। असली तूफान तब आया जब इस छात्र विरोध में बार काउंसिल ऑफ इंडिया यानी BCI कूद पड़ा।</div><div><br></div><div>13 अगस्त को BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा ने राज्य बार काउंसिलों को निर्देश दिया कि NALSAR के 2026 बैच के छात्रों का अधिवक्ता के रूप में नामांकन अगले आदेश तक रोक दिया जाए। BCI ने यह कदम उन छात्रों के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान की जांच का हवाला देते हुए उठाया था। लेकिन यह आदेश कुछ ही घंटों में कानूनी बिरादरी और छात्रों के बीच भारी विरोध का कारण बन गया। सवाल उठा कि आखिर कुछ छात्रों के विरोध के जवाब में उनकी पूरी कक्षा के भविष्य को ही अधर में कैसे डाला जा सकता है?</div><div><br></div><div>विरोध बढ़ा तो BCI को पीछे हटना पड़ा। संशोधित आदेश में कहा गया कि अधिकांश छात्र निर्दोष हैं और कुछ लोगों के कथित आचरण के लिए पूरी कक्षा को दंडित नहीं किया जा सकता। बाद में मनन कुमार मिश्रा ने छात्रों से माफी भी मांगी। उन्होंने कहा कि उनके किसी शब्द या पत्र से छात्रों की भावनाएं आहत हुई हों तो उन्हें इसका खेद है और छात्रों की भावनाओं का सम्मान किया जाना चाहिए। लेकिन माफी के बाद भी सबसे बड़ा सवाल वहीं खड़ा रहा कि क्या BCI को ऐसा आदेश देने का अधिकार था?</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां मामला महज विवाद से निकलकर कानून के दायरे में पहुंचता है। Advocates Act, 1961 के तहत BCI का काम कानूनी शिक्षा के मानक तय करना, अधिवक्ताओं के पेशेवर आचरण को नियंत्रित करना, अनुशासनात्मक व्यवस्था और राज्य बार काउंसिलों की निगरानी करना है। लेकिन अधिवक्ताओं के रूप में नामांकन राज्य बार काउंसिलों के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में NALSAR के छात्रों का नामांकन रोकने का निर्देश BCI के अधिकार-क्षेत्र की सीमा को लेकर गंभीर सवाल खड़ा करता है। यहीं से विवाद ने एक नया रूप लिया।</div><div><br></div><div>बेंगलुरु के NLSIU के छात्रों और पूर्व छात्रों ने NALSAR के छात्रों के समर्थन में मोर्चा खोल दिया। 165 स्नातक छात्रों, 409 वर्तमान छात्रों और 128 पूर्व छात्रों सहित 700 से अधिक लोगों ने संयुक्त बयान जारी किया। उन्होंने NALSAR के छात्रों और शिक्षकों के प्रति बिना शर्त समर्थन जताते हुए अपने विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में CJI सूर्यकांत और BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा की उपस्थिति पर भी आपत्ति दर्ज कर दी।</div><div><br></div><div>NLSIU के छात्रों ने BCI से सार्वजनिक और बिना शर्त माफी की मांग की। उन्होंने छात्रों और शिक्षकों की पहचान बताने के निर्देश को “विच-हंट” बताते हुए कहा कि ऐसी कार्रवाई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर डर पैदा कर सकती है। उनका तर्क है कि संविधान का अनुच्छेद 19(1)(a) नागरिकों को अपनी बात कहने का अधिकार देता है और किसी वैधानिक संस्था की शक्ति का इस्तेमाल असहमति दबाने के लिए नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>छात्रों ने BCI चेयरमैन मनन कुमार मिश्रा के पुराने बयानों पर भी सवाल उठाए। उन्होंने प्रदर्शनकारी छात्रों को लेकर उनकी कथित टिप्पणियों का हवाला देते हुए कहा कि इस तरह की भाषा ने कानूनी संस्थाओं में भरोसे को नुकसान पहुंचाया है। दूसरी ओर, मनन कुमार मिश्रा ने अब छात्रों को देश के सबसे जागरूक और विवेकशील युवाओं में बताते हुए कहा है कि शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और छात्रों को अपने फैसले स्वतंत्र रूप से लेने चाहिए।</div><div><br></div><div>इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है कि कानून पढ़ने वाले छात्र अब केवल कानून के दर्शक नहीं बने रहना चाहते। वे उस कानून को अपने ऊपर लागू होते हुए भी देख रहे हैं और उसी के आधार पर सवाल भी पूछ रहे हैं। NALSAR से NLSIU तक पहुंची यह आवाज इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आज के ये छात्र ही कल के वकील, वरिष्ठ अधिवक्ता, शिक्षक और न्यायाधीश होंगे। यदि कानून के संस्थानों से जुड़े सवालों पर सवाल उठाना ही अनुशासनहीनता मान लिया जाएगा, तो लोकतंत्र में असहमति की जगह कहां बचेगी?</div><div><br></div><div>उधर, BCI के लिए भी यह घटना आत्ममंथन का अवसर है। जिस संस्था पर देश में कानूनी पेशे के स्तर और अनुशासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी है, उससे यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि वह अपनी हर कार्रवाई को स्पष्ट वैधानिक अधिकार और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर ही करे। NALSAR प्रकरण ने दिखा दिया है कि कानून की सबसे बड़ी ताकत उसका अधिकार नहीं, बल्कि उस अधिकार का संयमित और न्यायपूर्ण इस्तेमाल है।</div><div><br></div><div>फिलहाल तस्वीर साफ है। एक तरफ देश की कानूनी व्यवस्था के शीर्ष पद हैं, दूसरी तरफ देश की प्रतिष्ठित कानून यूनिवर्सिटियों के छात्र। और इन छात्रों का संदेश भी उतना ही साफ है कि पद बड़ा हो सकता है, लेकिन संविधान उससे बड़ा है; संस्था शक्तिशाली हो सकती है, लेकिन कानून उससे ऊपर है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:47:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/nalsar-nlsiu-law-students-protest-cji-surya-kant-manan-kumar-mishra-bci-controversy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भारतीय परंपराओं में निहित है संवाद, संवाद से ही होता है समाधान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/dialogue-is-embedded-in-indian-traditions-it-is-through-dialogue-that-solutions-are-found]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हाल ही में संघ प्रमुख श्री मोहन भागवत ने जेन जी से बातचीत की पहल की, इस प्रकार का संवाद नया नहीं हैं बल्कि हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा का हिस्सा रहा है जो जीवन से जुड़ी सत्य को उजागर करता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>आज की युवा हमारी पीढ़ी जैसी नहीं बल्कि उससे थोड़ी अलग है वह आदेश नहीं, बल्कि तर्क, प्रश्न और संवाद चाहती है। जेन जी तर्क तो करते हैं लेकिन उसके साथ ही ये भारतीय संस्कृति, परिवार, सामाजिक उत्तरदायित्व और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे मूल्यों का भी सम्मान करते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद का सर्वोच्च स्थान है। यहां गुरु शिष्य पर अपनी बात थोपता नहीं, बल्कि प्रश्नों के द्वारा उसकी शंका का समाधान कर उसे निर्णय लेने की स्वतंत्रता प्रदान करता है। इस प्रकार उदाहरणों में नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद विशेष रूप से विख्यात है। नेता-छात्र संवाद भारतीय संस्कृति एवं परंपरा का एक अत्यंत महत्वपूर्ण भाग रहा है। हमारी भारतीय ज्ञान परंपरा में देश के नेतृत्वकर्ताओं, सम्राटों, ऋषियों, गुरुओं एवं युवा शिष्यों, छात्रों के मध्य संवाद को समाज के निर्माण का मुख्य आधार माना गया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-perspective-of-the-gen-z-movement-in-bhagwat-view" target="_blank">भागवत की नजरों में जेन-जी आंदोलन का दृष्टिकोण</a></h3><div>जेन-जी के साथ डिक्टेशन के बजाय डिस्कशन को प्राथमिकता देते हुए संघ प्रमुख ने संवाद का मार्ग चुना। यह पहल न केवल युवा पीढ़ी के विचारों, प्रश्नों और आकांक्षाओं को समझने की आवश्यकता को रेखांकित करती है, बल्कि भारत की उस प्राचीन संवाद-परंपरा की पुनर्प्रतिष्ठा भी करती है, जिसमें&nbsp; संवाद को सामाजिक जीवन का आधार माना गया है। आज जब&nbsp; भारत विकसित राष्ट्र की दिशा में आगे बढ़ रहा है, युवाओं के साथ संवाद की यह परंपरा उनके ऊर्जा, नवाचार और दृष्टि को राष्ट्र-निर्माण से जोड़ने में महती भूमिका निभा सकती है।</div><br><div>भारतीय ज्ञान परंपरा में संवाद केवल वार्तालाप नहीं है, अपितु सत्य की खोज, आपसी मतभेदों का समाधान एवं ज्ञान के आदान-प्रदान का जरिया रहा है। उपनिषदों में वर्णित गुरु-शिष्य के मध्य संवाद, भगवद्गीता में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद तथा बौद्ध-जैन परंपराओं की शास्त्रार्थ परंपरा इसका अनोखा उदाहरण है जो हमें दो पीढ़ियों की बीच हुए संवाद की महत्ता बताते हैं।&nbsp; हमारी भारतीय परंपरा का मूल मंत्र है "वादे वादे जायते तत्त्वबोधः", अर्थात संवाद से ही सत्य का बोध होता है। मोहन भागवत का जेन जी से संवाद इसी परंपरा को वर्तमान में आगे बढ़ाने का प्रयास है, जिसमें युवाओं के साथ सम्मानपूर्ण, तर्कपूर्ण और खुले संवाद के माध्यम से भारतीय ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक मूल्यों को जोड़ने की बात कही गई है।</div><div><br></div><div>नचिकेता–यम संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में एक प्रमुख संवाद है। नचिकेता की उम्र आज की जेन अल्फा पीढ़ी के बराबर की थी जब बालक नचिकेता एवं यमराज के मध्य संवाद के द्वारा आत्मा, ब्रह्म, मोक्ष और जीवन के सत्य पर विस्तृत बातचीत हुई। इस संवाद की विशेषता यह रही है कि यहां गुरु ने प्रश्न पूछने से नहीं रोका बल्कि जिज्ञासा का सम्मान किया, तर्क एवं विवेचन द्वारा विश्लेषण कर उत्तर दिया। सत्य को कृत्रिम न कर उसे स्वयं समझने का अवसर प्रदान किया।</div><div><br></div><div>इसी प्रकार करुक्षेत्र की रणभूमि में श्रीकृष्ण एवं अर्जुन का संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में जीवन से जुड़े सत्यों का विश्लेषण करने में विशेष महत्ता रखता है। गीता के उपदेश के उपरांत श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा कि सभी तथ्यों पर विचार कर अपनी इच्छानुसार सब कुछ करो। यह भारतीय संवाद परंपरा का सर्वोच्च आदर्श है। इसमें श्रीकृष्ण ने निर्णय अर्जुन पर छोड़ दिया। उन्हें ज्ञान दिया, तर्क दिया, मार्गदर्शन दिया, परंतु निर्णय की स्वतंत्रता लेने की स्वतंत्रता नहीं छीनी। "इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया। विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु॥" (गीता 18.63)</div><div><br></div><div>प्रश्न पूछना दोष नहीं, ज्ञान का प्रारंभ है। गुरु का कार्य आदेश देना नहीं, मार्गदर्शन करना है। संवाद का उद्देश्य किसी पर विचार थोपना नहीं, सत्य का बोध कराना है। अंतिम निर्णय व्यक्ति की विवेकपूर्ण स्वतंत्रता पर छोड़ा जाता है। इसी कारण नचिकेता–यम संवाद और श्रीकृष्ण–अर्जुन संवाद भारतीय ज्ञान परंपरा में आदर्श माने जाते हैं। आज के संदर्भ में भी जब युवाओं से संवाद की बात होती है, तो उसका आशय यही है कि उनकी जिज्ञासाओं का सम्मान किया जाए, तर्कपूर्ण चर्चा हो और उन्हें सोच-समझकर स्वयं निर्णय लेने का अवसर दिया जाए।</div><div><br></div><div>इसके अलावा चाणक्य एवं चंद्रगुप्त का संवाद भी भारतीय इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है। यहां चाणक्य एक दूरदर्शी शिक्षक और नेता के रूप में युवा छात्र चंद्रगुप्त का मार्गदर्शन कर उन्हें अखंड भारत का सम्राट बनाया। विवेकानंद भी हमेशा युवाओं से सीधा संवाद करते थे ताकि उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना जागृत हो और वह राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारी भारतीय संस्कृति में संवाद अर्थहीन नहीं है अपितु अपने अंदर महत्वपूर्ण मूल्यों को समाहित किए हुए। इनमें विनय एवं बड़ों के प्रति सम्मान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। हमारी भारतीय संस्कृति छात्रों को हमेशा विनयशीलता एवं गुरुजनों के प्रति आदर करना सीखाती है। साथ ही अपने गुरुजनों की बातों को धैर्यपूर्वक सुनना छात्रों का गुण माना जाता है। यह संवाद कभी अर्थहीन नहीं होते। इनका उद्देश्य किसी को हराना नहीं, बल्कि सत्य और सही मार्ग को खोजना होता है।</div><div><br></div><div>भारतीय ज्ञान परंपरा में वर्णित संवादों के अपने लोकतांत्रिक मूल्य हैं। संवाद के परंपरागत मार्ग हमारे लोकतंत्र और जीवंत होता है। वर्तमान के युवा ही भविष्य के नेता होते हैं, यह संवाद उन्हें इस जिम्मेदारी का अहसास कराता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 15:01:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/dialogue-is-embedded-in-indian-traditions-it-is-through-dialogue-that-solutions-are-found</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/find-out-why-delhi-remains-a-target-for-terrorists]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आपको पता होगा कि 15 अगस्त और 26 जनवरी के मौके पर यानी राष्ट्रीय पर्वों दिल्ली अक्सर पाक परस्त आतंकियों के निशाने पर रहती है! ऐसा खुफिया जानकारियों से भी पता चलता है। ऐसा इसलिए कि नई दिल्ली सिर्फ भारत की राजधानी नहीं, बल्कि भारत की राजनीतिक, संवैधानिक और प्रतीकात्मक शक्ति का सबसे बड़ा केंद्र है। चूंकि राष्ट्रीय पर्व—15 अगस्त तथा 26 जनवरी—आतंकियों के लिए इसी प्रतीकात्मक महत्व को भुनाने और इसमें भागीदारी जताने वालों के बीच अधिकतम भयावह माहौल पैदा करने का षड्यंत्र रचा जाता है, इसलिए खुफिया व सुरक्षा एजेंसियां चौकस हो जाती हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल, इस अहम मौके पर जगह जगह उमड़ने वाली भीड़ के बीच आतंकियों द्वारा अपने नापाक इरादों को पूरे करने के अवसर के रूप में देखा जाता है और इसी उद्देश्य से वो अमन-चैन के दुश्मन बन जाते हैं। भला हो एनआईए, खुफिया एजेंसियों और दिल्ली पुलिस का जो समय रहते ही उनके नापाक इरादों को ध्वस्त कर देती हैं। इस समय यह सवाल और गंभीर है, क्योंकि 13 अगस्त 2026 को सामने आई संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट ने नवंबर 2025 के Red Fort आतंकी हमले को AQIS (Al-Qaeda in the Indian Subcontinent) से आधिकारिक रूप से जोड़ा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/taliban-five-years-diplomacy-india-pakistan-afghanistan" target="_blank">Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान</a></h3><div>आइए, अब उन वजहों की चर्चा करते हैं जिनकी वजह से दिल्ली आतंकियों के निशाने पर रहती है:-</div><div><br></div><div>पहला, दिल्ली पर हमला यानी पूरे भारत को संदेश: आतंकी संगठन केवल जान-माल का नुकसान नहीं चाहते, बल्कि उनका असली लक्ष्य अक्सर भय, प्रचार और राजनीतिक संदेश पैदा करना होता है। चूंकि दिल्ली में संसद, राष्ट्रपति भवन, प्रधानमंत्री कार्यालय, सुप्रीम कोर्ट, मंत्रालय, विदेशी दूतावास और राष्ट्रीय स्मारक जैसे संस्थान हैं। इसलिए यहां घटी हुई छोटी सी घटना का भी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बहुत बड़ा हो सकता है।</div><div><br></div><div>दूसरा, राष्ट्रीय पर्वों पर प्रतीकात्मक मूल्य बढ़ जाता है कई गुना: 15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से प्रधानमंत्री का राष्ट्र को संबोधन और 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस समारोह—ये दोनों भारत की राजकीय संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता के सबसे बड़े सार्वजनिक प्रतीक हैं। इसीलिए सुरक्षा एजेंसियां वर्षों से मानती रही हैं कि Independence Day समारोह आतंकियों और उग्रवादी संगठनों के लिए “attractive target” हो सकते हैं।&nbsp; यानी आतंकियों की गणित कुछ ऐसी होती है: सामान्य दिन का हमला → स्थानीय/क्षेत्रीय खबर, लेकिन राष्ट्रीय पर्व के दिन दिल्ली में हमला → अंतरराष्ट्रीय सुर्खियां + राष्ट्रीय मनोवैज्ञानिक प्रभाव + सरकार की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल।</div><div><br></div><div>तीसरा, भीड़ और VVIP मौजूदगी: राष्ट्रीय समारोहों में हजारों लोग, VVIP/VIP, सुरक्षा बल, मीडिया और देश-विदेश के प्रतिनिधि मौजूद होते हैं। 15 अगस्त 2026 के Red Fort समारोह के लिए भी सुरक्षा व्यवस्था बेहद व्यापक है और दिल्ली में प्रवेश, यातायात, मेट्रो तथा संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष प्रतिबंध लगाए गए हैं। आतंकी संगठनों के लिए भीड़ का अर्थ होता है कि एक छोटी कोशिश भी बड़े पैमाने पर अफरा-तफरी पैदा कर सकती है।</div><div><br></div><div>चौथा, लाल किला स्वयं एक असाधारण प्रतीक है: लाल किला केवल ऐतिहासिक इमारत नहीं है। 15 अगस्त को प्रधानमंत्री का तिरंगा फहराना उसे आधुनिक भारतीय राष्ट्र-राज्य के सबसे शक्तिशाली प्रतीकों में बदल देता है।</div><div>&nbsp;</div><div>इसीलिए Red Fort पहले भी आतंकवादी लक्ष्य रहा है। दिसंबर 2000 में वहां आतंकी हमला हुआ था। और नवंबर 2025 का हमला इस खतरे की आधुनिक अभिव्यक्ति था। अब संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट में AQIS का नाम सामने आना इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, दिल्ली की एक और कमजोरी—बहुत बड़ा और खुला महानगरीय क्षेत्र: यह केवल Red Fort की सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि दिल्ली-NCR में रेलवे स्टेशन, मेट्रो नेटवर्क, बाजार, बस अड्डे, धार्मिक एवं पर्यटन स्थल, सरकारी संस्थान, भीड़भाड़ वाले सार्वजनिक स्थान और बहुत बड़ी संख्या में हैं। इसलिए किसी आतंकी संगठन के लिए केवल मुख्य समारोह को निशाना बनाना ही जरूरी नहीं होता। समारोह के आसपास किसी दूसरे संवेदनशील स्थान पर घटना करके भी भय का वातावरण बनाया जा सकता है। इसी कारण इस बार रेलवे हब और अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर भी निगरानी बढ़ाई गई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>छठा, राष्ट्रीय पर्व इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था पहले से दिखाई देती है: यह एक दिलचस्प विरोधाभास है। 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सुरक्षा सबसे ज्यादा होती है—लेकिन उसी कारण सुरक्षा की तैनाती, रास्ते, समारोह का स्थान और समय जैसी बहुत-सी चीजें सार्वजनिक रूप से ज्ञात भी होती हैं। इसलिए सुरक्षा एजेंसियां केवल समारोह स्थल की सुरक्षा नहीं करतीं, बल्कि पूरे शहर में layered security बनाती हैं। इस साल दिल्ली पुलिस ने बड़े पैमाने पर पुलिस बल, CCTV, ड्रोन, वाहन जांच और अन्य निगरानी उपाय बढ़ाए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां, असली खतरा सिर्फ “बड़ा हमला” नहीं है: आज आतंकवाद की रणनीति भी बदल रही है। बड़े संगठित समूहों के बजाय छोटे, बिखरे हुए सेल, स्थानीय मददगार, डिजिटल संपर्क और कम लागत वाले हमले ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं। UN की हालिया रिपोर्ट में भी AQIS के बारे में छोटे और बिखरे हुए नेटवर्क तथा क्षेत्रीय लॉजिस्टिक/वित्तीय नेटवर्क की चिंता व्यक्त की गई है। इसका मतलब है कि केवल Red Fort की अभेद्य सुरक्षा पर्याप्त नहीं है। Intelligence + cyber monitoring + financial tracking + border intelligence + local policing + community intelligence—इन सभी को जोड़ना पड़ेगा।</div><div><br></div><div>लेकिन एक महत्वपूर्ण बात यह है कि अक्सर यह कहना सही नहीं होगा कि “हर 15 अगस्त या 26 जनवरी को दिल्ली पर हमला होने वाला है।” राष्ट्रीय पर्वों के आसपास सुरक्षा एजेंसियों द्वारा खतरे की आशंका को गंभीरता से लेना एक precautionary security doctrine है। 2026 में भी हाई अलर्ट और व्यापक सुरक्षा व्यवस्था इसी सावधानी का हिस्सा है। लेकिन नवंबर 2025 के Red Fort हमले और अब UN की AQIS attribution के बाद यह जरूर कहा जा सकता है कि दिल्ली के प्रतीकात्मक स्थलों को लेकर आतंकवादी संगठनों की रुचि को केवल काल्पनिक खतरा मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><h2># समझिए सबसे बड़ा सवाल और जानिए जवाब</h2><div><br></div><div>मेरे विचार से असली प्रश्न यह नहीं है कि “आतंकी दिल्ली को क्यों चुनते हैं?” बल्कि असली प्रश्न यह है कि- क्या भारत की राजधानी को केवल राष्ट्रीय पर्वों पर ही नहीं, बल्कि वर्ष के 365 दिनों में ऐसी बहुस्तरीय सुरक्षा मिल रही है जिसमें आतंकियों की योजना बनने से पहले ही उसका पता चल जाए? क्योंकि आतंकवाद के खिलाफ सबसे बड़ी जीत हमला होने के बाद हमलावर पकड़ना नहीं, बल्कि हमला होने से पहले साजिश को तोड़ देना है।0और 2026 में दिल्ली के संदर्भ में यही सबसे महत्वपूर्ण सुरक्षा चुनौती है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 14:32:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/find-out-why-delhi-remains-a-target-for-terrorists</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Putin के Kuril Islands पहुँचते ही भड़क उठीं Sanae Takaichi, Japan-Russia के बीच जोरदार भिड़ंत से दुनिया हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/putin-iturup-visit-kuril-islands-japan-russia-tensions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>रूस और जापान के बीच दशकों से चला आ रहा कुरिल द्वीप विवाद एक बार फिर भड़क उठा है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के विवादित इतुरुप द्वीप पहुंचते ही टोक्यो भड़क गया। जापान की प्रधानमंत्री साने ताकाइची ने इस यात्रा को “बिल्कुल अस्वीकार्य” बताते हुए कहा कि इससे जापानी जनता की भावनाओं को ठेस पहुंची है। लेकिन मॉस्को के लिए यह सिर्फ एक यात्रा नहीं, बल्कि साफ शक्ति-प्रदर्शन है। पुतिन ने दुनिया को दिखा दिया कि रूस इन विवादित द्वीपों पर अपने नियंत्रण को किसी चुनौती से पीछे हटने वाला नहीं है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि इतुरुप जिसे जापान एतोरोफु कहता है, वह कुरिल श्रृंखला के उन चार दक्षिणी द्वीपों में शामिल है, जिन पर जापान अपना दावा करता है और जिन्हें टोक्यो ‘नॉर्दर्न टेरिटरीज’ कहता है। द्वितीय विश्वयुद्ध के अंतिम दिनों में सोवियत संघ ने इन द्वीपों पर कब्जा कर लिया था और करीब 17000 जापानी निवासियों को वहां से विस्थापित कर दिया गया। यही विवाद आज तक रूस और जापान के बीच औपचारिक शांति संधि के रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन बना हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/novorossiysk-naval-base-hit-by-ukraine-drone-attack" target="_blank">Russia के नोवोरोस्सियस्क नौसैनिक अड्डे पर हमले का Zelenskyy का दावा, बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त</a></h3><div>जापानी प्रधानमंत्री ताकाइची ने दो टूक कहा कि ये द्वीप जापान के “ऐतिहासिक और अंतरराष्ट्रीय कानून” के तहत अभिन्न क्षेत्र हैं। विदेश मंत्री तोशिमित्सु मोतेगी ने भी रूस के खिलाफ कड़ा विरोध दर्ज कराया और टोक्यो ने रूसी राजदूत निकोलाई नोजद्रेव को तलब किया। लेकिन मॉस्को ने जापान की आपत्ति को लगभग ठेंगा दिखाते हुए साफ कर दिया कि इतुरुप समेत पूरा कुरिल क्षेत्र रूस का अभिन्न हिस्सा है। रूसी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता मारिया जखारोवा ने जापानी प्रतिक्रिया को “अस्वीकार्य” बताया, जबकि रूसी दूतावास ने कहा कि रूसी राष्ट्रपति अपने देश के भीतर जहां चाहें यात्रा कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>यहीं से मामला महज पुराने क्षेत्रीय विवाद से निकलकर शक्ति राजनीति का रूप ले लेता है। पुतिन ने इतुरुप में स्कूल, अस्पताल और मछली प्रसंस्करण संयंत्र का दौरा किया तथा स्थानीय लोगों से बातचीत की। मछली के अंडे का स्वाद लेने और द्वीप के मौसम की तुलना रिसॉर्ट से करने वाली उनकी तस्वीरें और टिप्पणियां भी सामने आईं। लेकिन इन दृश्यों के पीछे संदेश कहीं ज्यादा कठोर है। संदेश यह है कि रूस इन द्वीपों को सिर्फ सैन्य चौकी नहीं, बल्कि सामान्य रूसी भूभाग के रूप में पेश कर रहा है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो रणनीतिक दृष्टि से कुरिल द्वीपों की अहमियत बेहद बड़ी है। ये द्वीप जापान के होक्काइडो और रूस के कामचात्का प्रायद्वीप के बीच स्थित हैं और प्रशांत महासागर तथा ओखोत्स्क सागर के बीच समुद्री पहुंच को प्रभावित करते हैं। रूस पिछले एक दशक में यहां अपनी सैन्य मौजूदगी लगातार मजबूत करता रहा है। इतुरुप क्षेत्र में उसका प्रमुख सैन्य हवाई अड्डा है और द्वीपों के आसपास नियमित सैन्य अभ्यास होते रहे हैं।</div><div><br></div><div>और यही वह बिंदु है जहां इस विवाद का असली सामरिक चेहरा सामने आता है। कुरिल रूस के लिए प्रशांत बेड़े, कामचात्का और ओखोत्स्क सागर की सुरक्षा का हिस्सा हैं। जापान के लिए ये उसके उत्तरी समुद्री और हवाई सुरक्षा घेरे के ठीक सामने स्थित संवेदनशील क्षेत्र हैं। ऐसे में पुतिन का इतुरुप पहुंचना केवल संप्रभुता का प्रदर्शन नहीं, बल्कि जापान की बढ़ती सैन्य क्षमता और अमेरिका के साथ उसके गठजोड़ के सामने शक्ति संतुलन का प्रदर्शन भी है।</div><div><br></div><div>मामला इसलिए भी विस्फोटक है क्योंकि रूस अकेला नहीं है। पिछले महीने रूसी और चीनी युद्धपोतों ने कुरिल द्वीपों के बीच एक जलडमरूमध्य से संयुक्त गश्त की थी। इसी बीच रूसी और चीनी राजदूतों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के परिणामों को बदलने के प्रयासों और एशिया-प्रशांत के पुनःसैन्यीकरण के खिलाफ संयुक्त बयान दिया। यह भाषा सीधे जापान की बढ़ती रक्षा तैयारियों पर निशाना साधती दिखाई देती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ उत्तर कोरिया का हालिया मिसाइल प्रक्षेपण और अमेरिका-दक्षिण कोरिया के बड़े सैन्य अभ्यासों का माहौल इस पूरे घटनाक्रम को और खतरनाक बनाता है। यानी जापान के चारों ओर सुरक्षा दबाव एक साथ बढ़ रहा है। उत्तर कोरिया से मिसाइल खतरा, चीन से समुद्री और सैन्य दबाव और अब रूस की कुरिल में खुली शक्ति प्रदर्शनी।</div><div><br></div><div>इसका समय भी संयोग नहीं माना जा सकता। पुतिन का दौरा जापान के द्वितीय विश्वयुद्ध में आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ से ठीक पहले हुआ। ऐसे समय में कुरिल की रूसी संप्रभुता का सार्वजनिक प्रदर्शन इतिहास, राष्ट्रवाद और वर्तमान भू-राजनीति, तीनों को एक ही मंच पर ला खड़ा करता है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 2022 में यूक्रेन पर रूस के पूर्ण पैमाने के हमले के बाद जापान ने पश्चिमी देशों के साथ मिलकर मॉस्को पर प्रतिबंध लगाए थे। इससे पहले शांति संधि और आर्थिक सहयोग की दिशा में जो भी सीमित उम्मीदें थीं, वे लगभग खत्म हो गईं। पुतिन की यात्रा उस दरवाजे पर भी ताला जड़ती दिखाई देती है। रूस के पूर्व राष्ट्रपति दिमित्री मेदवेदेव ने भी बयान को और जहरीला बनाते हुए कहा कि ये द्वीप रूसी जमीन “थे, हैं और रहेंगे”। उन्होंने जापान को समझने की सलाह दी कि इस वास्तविकता को चुनौती देने वालों को “भयानक परिणाम” भुगतने पड़ सकते हैं।</div><div><br></div><div>अब असल कहानी यही है कि कुरिल द्वीपों पर रूस-जापान का पुराना विवाद अब नए एशियाई शक्ति-संघर्ष का अग्रिम मोर्चा बन रहा है। पुतिन ने इतुरुप पर उतरकर सिर्फ जमीन पर कदम नहीं रखा है। उन्होंने जापान की सुरक्षा नीति, अमेरिका के साथ उसके गठबंधन और एशिया-प्रशांत में बदलते शक्ति-संतुलन को सीधे चुनौती दी है। टोक्यो के लिए अब सवाल केवल चार द्वीपों का नहीं है। सवाल यह है कि क्या वह रूस-चीन-उत्तर कोरिया के बढ़ते दबाव के बीच अपनी उत्तरी सुरक्षा सीमा को कितनी तेजी से मजबूत कर सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, कुरिल का विवाद इसलिए खतरनाक है क्योंकि यहां इतिहास हथियार है, भूगोल मोर्चा है और सैन्य शक्ति संदेश। पुतिन ने अपनी चाल चल दी है। अब जापान के सामने सिर्फ विरोध दर्ज कराने का विकल्प नहीं, बल्कि यह तय करने की चुनौती है कि वह इस नई एशियाई शतरंज में कितनी दूर तक जवाबी चाल चलेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 12:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/putin-iturup-visit-kuril-islands-japan-russia-tensions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/parliament-monsoon-session-2026-19-percent-lok-sabha-39-17-percent-rajya-sabha-productivity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>संसद का मॉनसून सत्र पूरी तरह बर्बाद हो गया जिसके चलते कई सवाल उठे हैं। सबसे पहला सवाल यह है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है, जहां संसद का पूरा सत्र ही हंगामे की भेंट चढ़ जाए? सवाल उठता है कि विपक्ष का काम सरकार को घेरना है या सदन को ही ठप कर देना? 20 जुलाई से शुरू हुआ मानसून सत्र 13 अगस्त को खत्म हो गया, लेकिन सवाल यह है कि इस पूरे सत्र में बहस कितनी हुई और हंगामा कितना? सवाल उठता है कि संसद में नारे लगना ज्यादा जरूरी है या जनता के मुद्दों पर सवाल-जवाब होना जरूरी है? सवाल उठता है कि जब सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो विपक्ष ने संसद चलने क्यों नहीं दी?</div><div><br></div><div>आंकड़ों को देखें तो राज्यसभा की उत्पादकता महज 39.17 प्रतिशत रही और सभापति के अनुसार सदन में कुल 37 घंटे 49 मिनट ही काम हो सका। वहीं लोकसभा की उत्पादकता करीब 19 प्रतिशत रही। क्या यह प्रतिशत किसी परीक्षा के लिहाज से सामान्य पास प्रतिशत भी माना जाएगा? जो Gen Z युवा सड़कों पर उतरकर अपने सवाल और अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे थे, क्या वे यह नहीं देख रहे होंगे कि देश की संसद में कामकाज का स्तर आखिर कैसा है? सवाल उठ रहा है कि सांसदों को जनता ने संसद में बहस, सवाल और जवाब के लिए भेजा था या वेल में नारे लगाने के लिए?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution" target="_blank">संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान</a></h3><div>सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या विपक्ष यह भूल गया कि संसद सरकार को जवाबदेह बनाने का सबसे बड़ा मंच है? अगर सरकार छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के मुद्दे पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के जवाब के लिए तैयार थी, तो विपक्ष ने सदन को चलने क्यों नहीं दिया? क्या राम मंदिर में कथित चढ़ावा चोरी, छात्रों पर कार्रवाई और प्रधानमंत्री से माफी की मांग को एक साथ जोड़कर सदन को अनिश्चितकाल तक बाधित करना ही लोकतांत्रिक संघर्ष का तरीका है? क्या विपक्ष सरकार को जवाब देने के लिए मजबूर करना चाहता था या सरकार को जवाब देने का मौका ही नहीं देना चाहता था?</div><div><br></div><div>क्या जनता यह नहीं जानना चाहती थी कि छात्रों पर कार्रवाई क्यों हुई? क्या राम मंदिर से जुड़े आरोपों पर सरकार से जवाब नहीं मांगा जाना चाहिए था? क्या प्रधानमंत्री और गृह मंत्री से सवाल पूछने का अधिकार विपक्ष का नहीं है? लेकिन क्या विपक्ष ने हंगामा करके खुद ही वह मंच नहीं गंवा दिया, जहां उसके सवाल देश के सामने दर्ज हो सकते थे? अगर सरकार जवाब देने को तैयार थी, तो फिर विपक्ष ने सरकार को वॉकओवर क्यों दिया?</div><div><br></div><div>क्या संसद में बैठे हर सांसद के क्षेत्र की अपनी समस्याएं नहीं हैं? क्या बेरोजगारी, सड़क, रेल, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों और स्थानीय विकास से जुड़े सवाल पूछने का अधिकार सांसदों को नहीं है? जब प्रश्नकाल ही नहीं हुआ, शून्यकाल भी नहीं हो सका, तो क्या हजारों-लाखों मतदाताओं की आवाज सदन के भीतर दब नहीं गई? अपने क्षेत्र की समस्याओं को उठाने की तैयारी के साथ रोज सदन में आने वाले सांसदों से पूछा जाना चाहिए कि उनके संसदीय अधिकारों के इस्तेमाल का अवसर उनसे आखिर किसने छीना?</div><div><br></div><div>राज्यसभा में 285 तारांकित प्रश्न पूछे जाने थे, शून्यकाल में 380 विषय और विशेष उल्लेख के जरिए 380 मुद्दे उठाए जाने थे, लेकिन क्या यह लोकतंत्र की विडंबना नहीं कि इनमें से केवल 16 प्रश्न, 52 शून्यकाल के विषय और 93 विशेष उल्लेख ही सदन में लिए जा सके? क्या बाकी सवाल पूछने वाले सांसदों और उन सवालों के जवाब की प्रतीक्षा कर रही जनता को इसका हिसाब नहीं मिलना चाहिए?</div><div><br></div><div>और सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सांसदों के लिए भी ‘नो वर्क, नो पे’ का सिद्धांत नहीं होना चाहिए? अगर कोई कर्मचारी काम नहीं करता तो वेतन और जवाबदेही का सवाल उठता है, ऐसे में जनता के पैसे से चलने वाली संसद में लगातार व्यवधान डालने वालों पर ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं होनी चाहिए? क्या सांसदों को यह अधिकार मिलना चाहिए कि वे सदन को चलने न दें और फिर भी अपने कार्यकाल का पूरा लाभ लेते रहें?</div><div><br></div><div>हंगामे के बीच विधेयक पारित हुए, लेकिन क्या विपक्ष खुद से पूछेगा कि अगर वह संसद चलने देता तो इन विधेयकों पर और विस्तृत चर्चा नहीं हो सकती थी? लोक परीक्षा कानून में संशोधन, न्यायाधिकरण सुधार, केरल के नाम परिवर्तन, सहकारी विकास निगम, बैंककार बही साक्ष्य और खान एवं खनिज से जुड़े विधेयकों पर व्यापक बहस होती तो क्या जनता को इनके प्रभाव और प्रावधानों की अधिक स्पष्ट जानकारी नहीं मिलती? क्या लोकतंत्र में विधेयक पास होना ही पर्याप्त है या यह भी जरूरी नहीं कि विपक्ष अपनी आपत्तियां सदन के रिकॉर्ड पर दर्ज कराए?</div><div><br></div><div>सरकार कह रही है कि 12 विधेयक पारित हुए, लेकिन बहस और चर्चा के लिहाज से सत्र सफल नहीं रहा, तो क्या यह सत्ता पक्ष के लिए भी आत्ममंथन का विषय नहीं होना चाहिए? क्या सरकार को यह सुनिश्चित नहीं करना चाहिए कि महत्वपूर्ण विधेयक पर्याप्त चर्चा के बाद ही पारित हों? और क्या विपक्ष को यह नहीं समझना चाहिए कि चर्चा रोककर वह सरकार को ही नहीं, खुद को भी कमजोर करता है?</div><div><br></div><div>एफसीआरए संशोधन विधेयक को विस्तृत समीक्षा और सुझावों के लिए संयुक्त समिति के पास भेजा गया, तो क्या यह प्रमाण नहीं कि संसदीय प्रक्रिया में असहमति के लिए रास्ते मौजूद हैं? फिर हर मुद्दे का रास्ता हंगामा क्यों? क्या विरोध का अर्थ सदन बंद करना है या बहस को और धारदार बनाना?</div><div><br></div><div>और क्या संसद सत्र से पहले राहुल गांधी के विदेश दौरों को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब भी सार्वजनिक विमर्श में नहीं आना चाहिए? क्या विपक्ष के सबसे बड़े नेता की संसद के प्रति उपस्थिति और सक्रियता पर सवाल पूछना गलत है? क्या विपक्ष यह बताएगा कि संसद के महत्वपूर्ण सत्रों से पहले उसकी राजनीतिक रणनीति क्या होती है और क्या जनता को इसका स्पष्ट जवाब नहीं मिलना चाहिए?</div><div><br></div><div>क्या विपक्ष अराजकता की ऐसी स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जहां सरकार को काम ही न करने दिया जाए? क्या सत्ता पक्ष भी इस गतिरोध को तोड़ने के लिए पर्याप्त राजनीतिक पहल नहीं कर सकता था? क्या दोनों पक्षों की जिम्मेदारी नहीं थी कि टकराव के बीच भी संसद को चलाया जाता? और अगर दोनों पक्ष विफल रहे, तो इसकी कीमत कौन चुकाएगा? सांसद या वही जनता, जिसके टैक्स के पैसे से संसद चलती है?</div><div><br></div><div>क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ बहुमत से कानून बनाना है? क्या लोकतंत्र का अर्थ सिर्फ विरोध करना है? क्या लोकतंत्र का असली अर्थ सवाल पूछना, जवाब सुनना, तर्क देना, असहमति दर्ज करना और फिर निर्णय तक पहुंचना नहीं है? अगर प्रश्नकाल नहीं होगा, शून्यकाल नहीं होगा, बहस नहीं होगी और विधेयक हंगामे के बीच पारित होंगे, तो फिर संसद और राजनीतिक अखाड़े में फर्क क्या रह जाएगा? अंत में एक बार फिर सवाल उठता है कि क्या यही संसदीय लोकतंत्र है? और अगर नहीं, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों कब अपनी-अपनी जिम्मेदारी स्वीकार करेंगे?</div><div><br></div><div>सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों को मिलकर यह सोचना होगा कि संसदीय लोकतंत्र में जनता का विश्वास कैसे कायम रखा जाए। आखिर संसद की हर बैठक पर देश के लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं और जब जनता अपनी आंखों के सामने सदनों को बार-बार हंगामे और व्यवधान के कारण ठप होते देखती है, तो उसके मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि उसके पैसे और उसके जनादेश का कितना सम्मान हो रहा है। अगर यही तस्वीर लगातार बनी रही, तो कहीं आम जनता का भरोसा संसदीय लोकतंत्र की पूरी व्यवस्था से ही न डिग जाए?</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 15:54:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/parliament-monsoon-session-2026-19-percent-lok-sabha-39-17-percent-rajya-sabha-productivity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बोफोर्स कांडः एक झूठ के शापित होने का सच ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-bofors-scandal-the-truth-behind-the-curse-of-a-lie]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक झूठ के बल पर खड़ा हुआ बोफोर्स कांड सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद अब फाइलों में बंद हो गया। केस चालीस साल चला। इस पर 250 करोड़ रूपये व्यय हुए। इतना सब होने और चालीस साल की जीतोड़ कवायद के बाद भी बोफार्स खरीद में रिश्वत लेने की सच्चाई सामने नही आई। केस तो खत्म हो गया किंतु यह ये नहीं हो पाया कि इस प्रकरण में रिश्वत ली गई या नहीं। कोर्ट के केस खारिज करने के बाद भी रिश्वत लेने का आरोप आज भी अपनी जगह खड़ा है। इस कांड का पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी एवं अन्य आरोपियों के माथे पर लगा बेइमानी का दाग कभी खत्म नहीं हो पाएगा? क्या उनके परिवार माथे पर लगे इस कलंक से मुक्त हो पाएंगे? क्या उनके परिवार के सम्मान की हुई क्षति की कभी पूर्ति हो सकेगी? पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह के बार−बार बोले जाने वाले बोफोर्स खारीद में रिश्वत ने जनता के मन में तक जमाये झूठ के कारण राजीव गांधी से जनता दूर हो गई और उन्हें अपनी सरकार तक गंवानी पड़ी।&nbsp;</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>सुप्रीम कोर्ट ने हिंदुजा ब्रदर्स को बरी करने वाले दिल्ली हाईकोर्ट के 2005 के फैसले के खिलाफ दायर अंतिम अपील को भी खारिज कर दिया है। इसके साथ ही भारत के सबसे चर्चित और लंबे समय तक चलने वाले भ्रष्टाचार के मामलों में से एक बोफोर्स कांड का कानूनी अध्याय हमेशा के लिए बंद हो गया है।</div><div><br></div><div>मामले में जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विनोद के. चंद्रन की बेंच ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता की स्थगन की मांग को ठुकराते हुए मामले की आखिरी याचिका को खारिज कर दिया। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) ने भी इस मामले में अपील की थी। इस अपील को भी सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में ही देरी के आधार पर खारिज कर दिया था। 1986 में हुए इस रक्षा सौदे का विवाद लगभग 40 साल तक अदालतों और भारतीय राजनीति के केंद्र में रहा और अंत में समाप्त हो गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uproar-over-purification-after-kharge-rally-priyanka-asks-what-kind-of-politics-is-this" target="_blank">खड़गे की रैली के बाद 'शुद्धिकरण' पर बवाल: Priyanka Gandhi ने पूछा - यह कैसी Politics?</a></h3><div>पूरा मामला 24 मार्च 1986 को भारत सरकार और स्वीडिश कंपनी एबी बोफोर्स के बीच हुए 1,437 करोड़ रुपये के उस समझौते से जुड़ा है। इसके तहत भारतीय सेना के लिए 400 हॉवित्जर तोपें खरीदी जानी थीं। साल 1987 में स्वीडिश रेडियो ने यह सनसनीखेज खुलासा किया कि इस सौदे को हासिल करने के लिए भारतीय राजनेताओं और रक्षा अधिकारियों को अवैध कमीशन दिए गए थे। इस खुलासे ने भारतीय राजनीति में तहलका मचा दिया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>कांग्रेस छोड़ने के बाद, विश्वनाथ प्रताप (वीपी) सिंह ने खुद को एक 'ईमानदार नेता' (मिस्टर क्लीन) के रूप में स्थापित किया। उन्होंने राष्ट्रीय मोर्चा (जनता दल) का गठन किया। 1989 के लोकसभा चुनाव अभियान के दौरान वीपी सिंह अपनी रैलियों में बेहद आक्रामक रहे। वह अक्सर मंचों से अपनी जेब से एक सफेद पर्ची निकालकर लहराते थे। उनका दावा था कि उस पर्ची पर बोफोर्स घोटाले के पुख्ता सबूत, दलाली की रकम पाने वालों के नाम और राजीव गांधी के कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। कथित स्विस बैंक खातों के नंबर लिखे हैं। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। बोफोर्स घोटाले को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर वीपी सिंह ने विपक्ष को एकजुट किया। इस आक्रामक अभियान ने जनता के बीच राजीव गांधी सरकार के खिलाफ भारी आक्रोश पैदा किया। उनकी बेइंतहा छवि खराब की। राजीव गांधी सरकार पर गंभीर सवाल उठे और 1989 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक बड़ा कारण माना गया। प्रधानमंत्री बनते ही वीपी सिंह ने बोफोर्स कंपनी पर भारत के साथ भविष्य के किसी भी रक्षा सौदे के लिए प्रतिबंध लगा दिया। उन्होंने मामले की जांच के लिए अधिकारियों की एक विशेष टीम भी गठित की।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारी वादों और दावों के बावजूद, झूठ के बल पर बनी वीपी सिंह की सरकार केवल 11 महीने चली। सकार बनने के बाद वीपी सिंह 11 महीने की आपनी सरकार के कार्यकाल में कोई भी सबेत नही दे सके। स्विस बैंक का खाता भी नही बता पाए। ये सरकार राजीव गांधी के खिलाफ सीधे तौर पर कोई ठोस कानूनी सबूत पेश नहीं कर सकी। आलोचकों का कहना है कि चुनावी रैलियों में जिस पर्ची का दावा किया गया था, उसका सच कभी पूरी तरह सामने नहीं आ सका।</div><div><br></div><div>स्विस रेडियो&nbsp; की एक घोषणा और वीवी सिंह द्वारा बार−बार रिश्वत खाने के लगाए आरोप ने इस महत्वपूर्ण शस्त्र सौदे को नुकसान पंहुचाया। इस पर प्रतिबंध लगाया। यही बोफोर्स तोप कारगिल युद्ध में सबसे मारक शस्त्र बनी। अगर ये सौदा रद्द न होता तो देश की सेना और ज्यादा मजबूत होतीं। एक बात और इस तरह के आरोप लगाने के बाद अधिकारी और ज्यादा सचेत हो जाते हैं। वे देश और सेना के लिए महत्वपूर्ण और अतिआवश्यक उपकरण भी लेते बचते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इन कांड की सीबीआई ने जांच की। सीबीआई ने जनवरी 1990 में एफआईआर दर्ज की। अक्तूबर 2000 में दायर की गई सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हिंदुजा बंधुओं (श्रीचंद, गोपीचंद और प्रकाश हिंदुजा) का नाम भी शामिल किया गया था। दिल्ली हाईकोर्ट ने 31 मई 2005 को अपने फैसले में हिंदुजा ब्रदर्स और स्वीडिश फर्म एबी बोफोर्स के खिलाफ चल रही सभी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया था। साथ ही, हाईकोर्ट ने सीबीआई की कार्यशैली पर सवाल उठाते हुए यह भी टिप्पणी की थी कि इस जांच पर सरकारी खजाने के करीब 250 करोड़ रुपये खर्च हो चुके हैं।</div><div><br></div><div>सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस मामले के लंबे खिंचने पर हैरानी जताई। जब याचिकाकर्ता के वकील ने कुछ मृत प्रतिवादियों के नाम हटाने के लिए चार हफ्ते का समय मांगा, तो जस्टिस पारदीवाला ने सख्त रुख अपनाते हुए कहा, 'हिंदुजा ब्रदर्स और सीबीआई को लेकर यह सब क्या चल रहा है? सभी कार्यवाही रद्द हो चुकी हैं, यह क्या है? कितने साल बीत चुके हैं?' वहीं, वकील द्वारा यह याद दिलाने पर कि यह सौदा 1986 में हुआ था, बेंच ने स्पष्ट कर दिया कि अब इस मामले में और देरी या सुनवाई की कोई गुंजाइश नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के इस अंतिम निर्णय के साथ ही बोफोर्स पे-ऑफ केस से जुड़ी सभी कानूनी लड़ाइयां अब आधिकारिक रूप से समाप्त हो गई हैं।</div><div><br></div><div>इस विवाद के कारण तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी की सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान हुआ। वर्ष 1989 के आम चुनावों में कांग्रेस पार्टी की हार का इसे एक प्रमुख कारण माना गया। इस मामले में ओत्तावियो क्वात्रोची और हिंदुजा बंधुओं जैसे नाम लंबे समय तक कानूनी और राजनीतिक बहसों का केंद्र रहे। लगभग चार दशकों तक चली कानूनी प्रक्रिया के बाद, न्यायालय ने इस मामले से जुड़ी आखिरी याचिकाओं को खारिज कर दिया। स्विस&nbsp; सरकार द्वारा कराई जांच भी&nbsp; आरोप सिद्ध&nbsp; नही कर सकी।</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर अब ये केस सदा−सदा के लिए बंद हो गया। एक आरोप की जांच पर सीबीआई ने 250 करोड़ के आसपास व्यय किए। न्यायालय का लंबा समय बरबाद किया। न्यायालय भी केस का सच नही बता पाया। 40 साल चले केस में भी यह ये नहीं हुआ कि बोफार्स खरीद में रिश्वत ली गई या नहीं। इस&nbsp; सबके बाबजूद आरोप तो आज भी वैसा ही खड़ा है, जैसा पहले था। 40 साल में यह आरोप अखबार और फाइलों के लाखों पन्नों पर छप गया। जनता में मन में यह धारणा इतनी पक्की हो गई, कि ये कभी खत्म नहीं होगी। आने वाली पीढ़ियों तक इसे नहीं भूल पाएंगी। क्या आरोपी परिवारों के भंग हुए सम्मान की भरपाई हो पाएगी। यदि आरोप न आता तो हो सकता था कि राजीव गांधी की सरकार और चलती। बोफार्स कांड बंद हो गया किंतु राजीव गांधी और उनके तथा अन्यों के परिवार के माथे पर एक बार−बार बोले जाने वाले झूठ के बल पर लगा रिश्वतखोरी का कलंक कभी खत्म हो पाएगा? कभी नहीं। हिटलर ने कहा था कि एक झूठ का बार−बार बोलिए, वह सच बन जाएगा। ऐसा ही इस बोफोर्स कांड में हुआ। बोफार्स की खरीद में रिश्वतखोरी का आरोप इतनी बार लगा कि यह हिटलर का सच बन गया।</div><div><br></div><div>- अशोक मधुप</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:34:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-bofors-scandal-the-truth-behind-the-curse-of-a-lie</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA['आजाद' होते ही Balochistan बोला, "Thank You Hindustan", Republic of Balochistan को मान्यता देने की भारत से की माँग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/balochistan-independence-day-mir-yar-baloch-india-pakistan-strategic-challenge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सोशल मीडिया इस समय ऐसे वीडियोज से भरा पड़ा है, जिनमें बलूचिस्तान के लोग अपनी आजादी का जश्न मनाते हुए नजर आ रहे हैं। 11 अगस्त को बलूचिस्तान के स्वतंत्रता दिवस के तौर पर मनाए गए कार्यक्रमों के बीच बलूच अलगाववादी नेतृत्व ने अब अपने अभियान को एक नया राजनीतिक मोड़ देने की कोशिश भी की है। बलूच नेता मीर यार बलूच ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से “रिपब्लिक ऑफ बलूचिस्तान” को स्वतंत्र देश के रूप में मान्यता देने की अपील की है। साथ ही भारत की ओर से पाकिस्तान के कब्जे वाले क्षेत्रों में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर उठाई गई आवाज की खुलकर सराहना की है।</div><div><br></div><div>मीर यार बलूच ने एक्स पर जारी अपने संदेश में भारतीय मीडिया का विशेष रूप से आभार जताया। उनका कहना था कि भारतीय मीडिया ने 11 अगस्त को बलूचिस्तान में मनाए गए स्वतंत्रता दिवस को प्रमुखता से उठाया। उन्होंने विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल के उस बयान का भी स्वागत किया, जिसमें पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर और उसके नियंत्रण वाले अन्य क्षेत्रों में गंभीर मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की जरूरत पर जोर दिया गया था। हालांकि जायसवाल ने बलूचिस्तान का सीधे तौर पर उल्लेख नहीं किया था, लेकिन बलूच नेतृत्व ने भारत के इस व्यापक मानवाधिकार रुख को अपने पक्ष में महत्वपूर्ण संकेत के तौर पर पेश किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/balochistan-independence-declaration-august-11-pakistan" target="_blank">Jan Gan Man: 'आजादी' का जश्न मनाते हुए झूम उठा पूरा Balochistan ! बीच-बीच में बाधा डाल रहा है Pakistan</a></h3><div>यही वह बिंदु है जो इस पूरे घटनाक्रम को केवल बलूचिस्तान के भीतर चल रहे अलगाववादी आंदोलन से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना देता है। बलूच नेतृत्व अब अपने आंदोलन को अंतरराष्ट्रीय वैधता दिलाने की दिशा में ले जाने का दावा कर रहा है। उसके संदेश में संयुक्त राष्ट्र, आसियान, अफ्रीकी संघ, इस्लामिक सहयोग संगठन और यूरोपीय देशों से बलूचिस्तान के पक्ष में आवाज उठाने की अपील की गई है। संगठन का दावा है कि अब लड़ाई केवल स्वतंत्रता दिवस मनाने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वतंत्रता की कानूनी, राजनीतिक, कूटनीतिक और नैतिक मान्यता हासिल करने की है।</div><div><br></div><div>बलूच नेतृत्व ने 11 अगस्त की तारीख को भी ऐतिहासिक आधार देने की कोशिश की है। उसका दावा है कि ब्रिटिश शासन के अंत और भारतीय उपमहाद्वीप के विभाजन से ठीक पहले 11 अगस्त 1947 को बलूचिस्तान ने स्वतंत्रता की घोषणा की थी। इसी ऐतिहासिक दावे को आधार बनाकर मौजूदा अभियान को अंतरराष्ट्रीय मान्यता की लड़ाई बताया जा रहा है। हालांकि पाकिस्तान और अंतरराष्ट्रीय समुदाय बलूचिस्तान की स्वतंत्रता के इस दावे को मान्यता नहीं देते और बलूचिस्तान को पाकिस्तान का एक प्रांत माना जाता है।</div><div><br></div><div>वैसे इस अभियान का अगला चरण और भी महत्वपूर्ण है। बलूच समूह ने दावा किया है कि भविष्य के स्वतंत्र राष्ट्र के लिए विदेश नीति, रक्षा, अर्थव्यवस्था, राजनीति और कूटनीति से जुड़े ढांचे तैयार किए जा रहे हैं। उसने पासपोर्ट, अपनी मुद्रा, मीडिया संस्थानों, व्यापारिक संस्थाओं और विदेशों में राजनयिक मिशनों की तैयारी का भी दावा किया है। साथ ही अलग-अलग बलूच राजनीतिक धाराओं को एकजुट करने की कोशिश की बात कही गई है।</div><div><br></div><div>बलूच नेतृत्व ने पाकिस्तान पर दमन का भी गंभीर आरोप लगाया है। उसके मुताबिक 50 हजार से अधिक बलूच लोग अब भी यातना केंद्रों में अमानवीय परिस्थितियों का सामना कर रहे हैं। बलूचों ने जबरन गुमशुदगी, हिरासत और लक्षित हत्याओं जैसे मुद्दों को भी उठाया है। बलूचों के समूह ने यह भी आरोप लगाया कि स्वतंत्रता दिवस समारोह रोकने के लिए मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं बंद की गईं, सैन्य छावनियों और पुलिस प्रतिष्ठानों के आसपास खाइयां खोदी गईं तथा ड्रोन, हेलीकॉप्टर और सैन्य विमानों से निगरानी की गई।</div><div><br></div><div>रणनीतिक रूप से देखें तो बलूचिस्तान पाकिस्तान के लिए बेहद संवेदनशील भूभाग है। क्षेत्रफल के लिहाज से यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है और प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध माना जाता है। बलूच नेतृत्व का दावा है कि स्वतंत्र बलूचिस्तान अपने संसाधनों के जरिये स्वास्थ्य, शिक्षा और मानवीय सहायता के क्षेत्र में योगदान दे सकता है। यही संसाधन, भौगोलिक स्थिति और लंबे समय से जारी विद्रोह इसे पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के साथ-साथ क्षेत्रीय भू-राजनीति का भी अहम मुद्दा बनाते हैं।</div><div><br></div><div>भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि बलूचिस्तान का मुद्दा पाकिस्तान के उस नैरेटिव को चुनौती देता है, जिसमें वह जम्मू-कश्मीर को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगातार उठाता रहा है। बलूच नेतृत्व का भारत की मीडिया और विदेश मंत्रालय के बयानों को अपने पक्ष में उद्धृत करना पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश है। हालांकि भारत की ओर से बलूचिस्तान की स्वतंत्रता को मान्यता देने की कोई घोषणा इन स्रोतों में नहीं है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, बलूचिस्तान में चल रहा संघर्ष अब केवल बंदूक और सुरक्षा बलों के बीच की लड़ाई नहीं रह गया है। यह इतिहास, मानवाधिकार, संसाधनों, अंतरराष्ट्रीय मान्यता और सूचना युद्ध, इन सभी मोर्चों पर लड़ी जा रही लड़ाई बनता जा रहा है। और जिस तरह बलूच नेतृत्व भारत का सार्वजनिक रूप से आभार जता रहा है, उससे साफ है कि वह इस संघर्ष को पाकिस्तान की सीमाओं से बाहर निकालकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मैदान में ले जाना चाहता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 11:50:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/balochistan-independence-day-mir-yar-baloch-india-pakistan-strategic-challenge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को', आकाश आनंद के नये नारे ने उड़ा दी UP में सारे राजनीतिक दलों की नींद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/akash-anand-bsp-up-election-2027-youth-rally-mayawati-bjp-akhilesh-yadav]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में जो लोग बहुजन समाज पार्टी (बसपा) को हल्के में लेकर चल रहे थे, उन्हें अब अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है। बसपा के राष्ट्रीय संयोजक आकाश आनंद चुनावी मैदान में पूरी ताकत के साथ उतर चुके हैं और उनकी सभाओं में उमड़ रही भीड़, खासकर युवाओं की मौजूदगी, पार्टी के लिए नई उम्मीद पैदा कर रही है। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी आकाश आनंद ने बसपा की रैलियों में बड़ी भीड़ आकर्षित की थी, हालांकि इसका चुनावी परिणाम पार्टी के लिए शून्य रहा। लेकिन लोकसभा और विधानसभा चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और इसी अंतर को समझते हुए आकाश आनंद इस बार बसपा के लिए जमीन तैयार करने में जुटे हैं।</div><div><br></div><div>पिछले दिनों बसपा के भीतर हुई राजनीतिक उठापटक और संगठनात्मक चुनौतियों के बीच आकाश आनंद का यह आक्रामक अभियान इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले विधानसभा चुनाव में बसपा महज एक सीट पर सिमट गई थी। ऐसे में आगामी विधानसभा चुनाव बसपा और खुद आकाश आनंद के लिए राजनीतिक अस्तित्व तथा प्रभाव की बड़ी परीक्षा माना जा रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/up-politics-yogi-vs-akhilesh-brahmin-politics-pda-formula" target="_blank">ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात</a></h3><div>हम आपको बता दें कि सोमवार को हाथरस के सादाबाद विधानसभा क्षेत्र में पार्टी प्रत्याशी अविन शर्मा के समर्थन में आयोजित कार्यकर्ता सम्मेलन में आकाश आनंद ने योगी आदित्यनाथ सरकार पर रोजगार, शिक्षा और कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर तीखे हमले किए। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार से पिछले दस वर्षों के कामकाज का हिसाब मांगा जाना चाहिए। आनंद का आरोप था कि सरकार ने अपनी कमियों को छिपाने के लिए पिछले एक दशक में विज्ञापनों पर 7,000 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए।</div><div><br></div><div>युवाओं के मुद्दे को केंद्र में रखते हुए उन्होंने दावा किया कि राज्य में चार लाख से अधिक सरकारी पद खाली पड़े हैं और कई प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं हुई हैं। उनका कहना था कि यदि विज्ञापन पर खर्च होने वाली रकम का इस्तेमाल परीक्षाओं और रोजगार के लिए किया जाता तो बड़ी संख्या में युवाओं को सरकारी नौकरियां मिल सकती थीं। आनंद ने रोजगार के सरकारी आंकड़ों पर भी सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि सप्ताह में एक दिन नाश्ता बेचने या सड़क किनारे ठेला लगाने वाले व्यक्ति को भी रोजगार के आंकड़ों में शामिल कर दिया जाता है।</div><div><br></div><div>शिक्षा व्यवस्था पर हमला बोलते हुए आनंद ने दावा किया कि प्रदेश में 25 हजार से अधिक सरकारी स्कूल बंद किए गए हैं। उन्होंने झांसी मेडिकल कॉलेज में शिशुओं की मौत का भी जिक्र किया और सरकार से शिक्षा तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर जवाब मांगा। विकास परियोजनाओं की गुणवत्ता पर भी उन्होंने सवाल उठाए। उन्होंने लखनऊ-कानपुर एक्सप्रेसवे का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया कि उद्घाटन के एक महीने के भीतर ही उसके कुछ हिस्सों में सड़क धंसने लगी। साथ ही उन्होंने मायावती सरकार के कार्यकाल में बने यमुना एक्सप्रेसवे को भी उदाहरण के तौर पर सामने रखा।</div><div><br></div><div>कानून-व्यवस्था के मुद्दे पर आनंद ने अपराध और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सरकार को घेरा। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ वाली छवि पर भी उन्होंने तंज कसा और पूछा कि सरकार के दावों के बावजूद अपराध तथा महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति क्या है।</div><div><br></div><div>आकाश आनंद का हमला केवल भाजपा तक सीमित नहीं रहा। कांग्रेस पर निशाना साधते हुए उन्होंने भाजपा और कांग्रेस को ‘एक ही सिक्के के दो पहलू’ करार दिया। उनका आरोप था कि कांग्रेस संविधान और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा की बात करती है, लेकिन जिन राज्यों में वह सत्ता में है, वहां भी कई मामलों में वही नीतियां अपनाती है जिनके लिए वह भाजपा पर हमला करती है।</div><div><br></div><div>समाजवादी पार्टी और अखिलेश यादव भी उनके निशाने पर रहे। आनंद ने सपा के PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक फॉर्मूले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया कि यह फॉर्मूला बदलता रहता है। उन्होंने अखिलेश यादव और राहुल गांधी को ‘अंकल’ कहकर सभा में माहौल भी हल्का किया। अखिलेश को लेकर उन्होंने कहा कि वह 30 साल के हैं जबकि अखिलेश 50 के, इसलिए उन्हें ‘भैया’ नहीं बल्कि ‘अंकल’ कहना स्वाभाविक है।</div><div><br></div><div>हालांकि आनंद के भाषण का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश युवाओं और सत्ता परिवर्तन को लेकर था। दिल्ली समेत देश के विभिन्न हिस्सों में हुए Gen Z के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि युवाओं का सड़क पर उतरना गलत नहीं है, लेकिन केवल भाषण और प्रदर्शन से व्यवस्था नहीं बदलती। उनके मुताबिक एक व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को लाने से न नीति बदलती है, न प्रक्रिया और न ही अधिकारी।</div><div><br></div><div>आनंद ने कहा कि वास्तविक बदलाव के लिए सरकार और सत्ता में बैठे लोगों को बदलना होगा। उन्होंने इस संदर्भ में कांशीराम और मायावती की राजनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि दोनों नेताओं ने हमेशा बहुजन समाज को सत्ता हासिल करने और अपना भविष्य स्वयं लिखने के लिए प्रेरित किया।</div><div><br></div><div>उन्होंने युवाओं को आरक्षण के खिलाफ बनाए जा रहे कथित प्रचार से भी सावधान किया। आनंद ने कहा कि आरक्षण गरीबी हटाने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता दूर करने का संवैधानिक माध्यम है। उन्होंने अपने समर्थकों से आगामी विधानसभा चुनाव को अधिकारों की लड़ाई का अवसर मानते हुए सक्रिय होने की अपील की।</div><div><br></div><div>इसी रणनीति के तहत आनंद ने नया नारा भी दिया, ‘इस बार वोट हाथी को, अपने पुराने साथी को’। साथ ही उन्होंने मतदाताओं से मायावती को पांचवीं बार मुख्यमंत्री बनाने की अपील की। साफ है कि बसपा इस बार चुनावी लड़ाई को केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि अपने राजनीतिक आधार की वापसी की लड़ाई बनाना चाहती है। आकाश आनंद की आक्रामकता और युवाओं की भीड़ ने इस लड़ाई में फिलहाल एक नई हलचल जरूर पैदा कर दी है। अब देखना यह होगा कि रैलियों में दिखाई दे रहा यह उत्साह वोटों में कितना बदलता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 14:01:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/akash-anand-bsp-up-election-2027-youth-rally-mayawati-bjp-akhilesh-yadav</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-modi-nitin-nabin-bjp-mission-up-2027-election-strategy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ सुनाई देने लगी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले सप्ताहांत दिल्ली दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन से मुलाकात कर उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण और रणनीति पर चर्चा की। प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद योगी ने इसे ‘सुशासन के मार्ग पर लगातार आगे बढ़ने’ के लिए प्रेरणा देने वाला बताया, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इस मुलाकात को सिर्फ शिष्टाचार भेंट के तौर पर नहीं देखा जा रहा।</div><div><br></div><div>दिल्ली में शीर्ष नेतृत्व से मुलाकात के साथ ही उत्तर प्रदेश भाजपा ने संगठन को चुनावी मोड में डालते हुए नई नियुक्तियों का ऐलान कर दिया है। पार्टी ने छह संगठनात्मक क्षेत्रों और विभिन्न मोर्चों के प्रभारियों की घोषणा की है। नई टीम में करीब 60 फीसदी नए चेहरों को जगह दी गई है। साफ है कि भाजपा अब मिशन 2027 को केवल नारों तक सीमित रखने की बजाय बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक संगठन को सक्रिय करने की तैयारी में है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-narendra-modi-pays-tribute-to-quit-india-movement-heroes" target="_blank">PM Modi ने 'भारत छोड़ो आंदोलन' के वीरों को किया याद, साहस को बताया हर भारतीय की प्रेरणा</a></h3><div>नई व्यवस्था में प्रदेश महामंत्री दिलीप पटेल को अवध, अभिजात मिश्रा को गोरखपुर, प्रदेश उपाध्यक्ष रमेश सिंह को काशी और गीता शाक्य को बृज क्षेत्र की जिम्मेदारी दी गई है। राम प्रताप चौहान को पश्चिम तथा शंकर लोधी को कानपुर-बुंदेलखंड क्षेत्र का प्रभारी बनाया गया है। भाजपा ने इस बार सात की जगह आठ प्रदेश महामंत्री बनाए हैं। इसमें राजेश चौधरी को युवा मोर्चा, संजय राय को ओबीसी मोर्चा, धर्मेंद्र सिंह को अनुसूचित मोर्चा, कामेश्वर सिंह को महिला मोर्चा, प्रियंका रावत को अनुसूचित जनजाति मोर्चा, देवेश कोरी को अल्पसंख्यक मोर्चा और शंकर गिरि को किसान मोर्चे की जिम्मेदारी दी गई है।</div><div><br></div><div>यह बदलाव महज संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा। भाजपा की रणनीति साफ तौर पर हर सामाजिक वर्ग और हर क्षेत्र में अपनी राजनीतिक पकड़ को चुनाव से पहले मजबूत करने की दिखाई दे रही है। मोर्चों और क्षेत्रीय समितियों के जरिए पार्टी अपने संदेश को गांव और बूथ तक पहुंचाने की तैयारी में है। नौ अगस्त से शुरू हुई तिरंगा यात्रा को भी इसी व्यापक जनसंपर्क अभियान की कड़ी के रूप में देखा जा रहा है। लखनऊ में आयोजित तिरंगा यात्रा में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने भाजपा के चुनावी सक्रियता के संकेत और मजबूत कर दिए हैं।</div><div><br></div><h2>अब टिकट पर भाजपा का ‘परफॉर्मेंस टेस्ट’</h2><div><br></div><div>संगठन के बाद अगला बड़ा सवाल उम्मीदवारों का है। पार्टी के भीतर विधानसभा सीटों पर संभावित उम्मीदवारों को लेकर शुरुआती मंथन आरम्भ हो चुका है। खास तौर पर मौजूदा विधायकों का रिपोर्ट कार्ड तैयार कराया जा रहा है। उनके कामकाज, क्षेत्र में सक्रियता और जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता का आकलन सर्वे के जरिए किए जाने की बात सामने आ रही है।</div><div><br></div><div>यानी सिर्फ विधायक होना टिकट की गारंटी नहीं होगा। जिस विधायक के खिलाफ स्थानीय स्तर पर नाराजगी होगी या जिसका प्रदर्शन कमजोर माना जाएगा, उसके स्थान पर नया चेहरा उतारने का विकल्प खुला रहेगा। भाजपा इस बार युवाओं को बड़ी संख्या में मौका देने की तैयारी में बताई जा रही है और इनमें महिलाओं की भी महत्वपूर्ण हिस्सेदारी हो सकती है। यही वजह है कि आने वाले महीनों में कई मौजूदा विधायकों के टिकट पर संशय बना रह सकता है।</div><div><br></div><div>इसी बीच भाजपा के भीतर एक और दिलचस्प सवाल उठ रहा है। एक-दो लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जता रहे हैं, जबकि कुछ सांसद अपने परिजनों के लिए टिकट मांग रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने परिवारवाद से खुद को दूर रखने की चुनौती भी होगी।</div><div><br></div><h2>एनडीए में सीटों का ‘गणित’ भी आसान नहीं</h2><div><br></div><div>उम्मीदवारों के साथ ही एनडीए के भीतर सीट बंटवारे का सवाल भी जल्द महत्वपूर्ण होने वाला है। भाजपा के सहयोगी दलों को मोटे तौर पर अपने संभावित हिस्से का अंदाजा पहले से है, लेकिन पिछली बार चुनाव बाद एनडीए में शामिल हुए सुभासपा प्रमुख ओम प्रकाश राजभर के साथ सीटों को लेकर औपचारिक बातचीत अहम होगी। राजभर की पार्टी पहले ही ज्यादा सीटों पर अपनी दावेदारी के संकेत देती रही है।</div><div><br></div><div>एनडीए के दूसरे सहयोगी भी अपनी राजनीतिक ताकत के आधार पर अधिक सीटों के लिए मोलभाव करना चाह रहे हैं। ऐसे में भाजपा के सामने चुनौती यह होगी कि सहयोगियों को पर्याप्त राजनीतिक स्पेस देते हुए अपनी सीटों और संगठनात्मक वर्चस्व में संतुलन कैसे कायम रखा जाए। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन पहले ही साफ कर चुके हैं कि भाजपा 2027 का चुनाव एनडीए सहयोगियों के साथ लड़ेगी और गठबंधन को मजबूत रखते हुए सत्ता में वापसी का लक्ष्य है।</div><div><br></div><h2>योगी के चेहरे पर ही दांव</h2><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भाजपा ने नेतृत्व को लेकर कोई भ्रम नहीं छोड़ा है। नितिन नबीन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि 2027 के विधानसभा चुनाव में योगी आदित्यनाथ ही भाजपा का चेहरा होंगे और पार्टी उनके नेतृत्व में लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरेगी।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि योगी भी सत्ता में हैट्रिक लगाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में नया इतिहास रचने के लिए पूरी ताकत झोंकते दिखाई दे रहे हैं। देखा जाये तो भाजपा के लिए यह चुनाव केवल सरकार बचाने की लड़ाई नहीं बल्कि योगी मॉडल को जनादेश दिलाने की परीक्षा भी है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर समाजवादी पार्टी लगातार पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीति के जरिए भाजपा को चुनौती देने की कोशिश कर रही है। ऐसे में भाजपा भी संगठन में ओबीसी, दलित, महिला, युवा और किसान मोर्चों को सक्रिय करके सामाजिक समीकरणों को साधने की तैयारी में है। चुनावी राजनीति जैसे-जैसे गर्म होगी, संवेदनशील मुद्दों पर भाजपा और विपक्ष के बीच टकराव भी बढ़ने के आसार हैं।</div><div><br></div><h2>नवरात्रि से बढ़ेगा ‘मोदी फैक्टर’</h2><div><br></div><div>भाजपा की रणनीति केवल संगठन और टिकट तक सीमित नहीं रहने वाली। बताया जा रहा है कि शारदीय नवरात्रि से उत्तर प्रदेश में केंद्रीय मंत्रियों के दौरे बढ़ाए जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भी राज्य में अधिक से अधिक कार्यक्रम कराने की योजना है। यानी आने वाले महीनों में यूपी भाजपा का चुनावी अभियान संगठन, सरकार और केंद्रीय नेतृत्व, तीनों मोर्चों पर एक साथ दिखाई देगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो राजनीतिक संदेश बिल्कुल स्पष्ट है कि भाजपा 2027 की लड़ाई को समय से पहले शुरू करना चाहती है। संगठन में नए चेहरों की एंट्री, विधायकों का रिपोर्ट कार्ड, संभावित टिकटों पर सर्वे, युवाओं और महिलाओं को अवसर, एनडीए में सीटों का गणित और मोदी-योगी की जोड़ी को केंद्र में रखकर अभियान, इन सभी कड़ियों को जोड़ें तो भाजपा की चुनावी रणनीति की तस्वीर सामने आती है।</div><div><br></div><div>अब असली परीक्षा यह होगी कि भाजपा अपने संगठनात्मक अनुशासन और सामाजिक समीकरणों को कितनी कुशलता से वोट में बदल पाती है। विपक्ष की पीडीए राजनीति के सामने भाजपा का सामाजिक विस्तार कितना असरदार साबित होता है, सहयोगी दल कितनी सीटों पर संतुष्ट होते हैं और मौजूदा विधायकों में कितनों को दोबारा मौका मिलता है, इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में उत्तर प्रदेश की चुनावी पटकथा तय करेंगे।</div><div><br></div><div>फिलहाल इतना तय है कि योगी के दिल्ली दौरे और भाजपा की नई संगठनात्मक नियुक्तियों के साथ उत्तर प्रदेश में मिशन-2027 की उलटी गिनती तेज हो चुकी है। अब लखनऊ से लेकर दिल्ली तक हर राजनीतिक कदम की निगाह 2027 के लखनऊ पर होगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 11:44:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-modi-nitin-nabin-bjp-mission-up-2027-election-strategy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chhatron Ki Goonj क्या वोटों की गूंज में परिवर्तित होगी? पर-नाना नेहरू और दादा फिरोज की धरती Prayagraj से Rahul Gandhi कितना असर छोड़ पाये?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rahul-gandhi-prayagraj-chhatron-ki-goonj-up-politics-2027]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राहुल गांधी का प्रयागराज आकर छात्रों से संवाद करना अपने आप में कोई असामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। लोकतंत्र में विपक्ष के नेता का युवाओं के बीच जाना, उनकी समस्याएं सुनना और सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन राजनीति में किसी कार्यक्रम का समाचार बन जाना और उसका चुनावी प्रभाव पैदा करना, ये दो बिल्कुल अलग बातें हैं। यही अंतर उत्तर प्रदेश की राजनीति के संदर्भ में राहुल गांधी के प्रयागराज कार्यक्रम ‘छात्रों की गूंज’ को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस ने इस कार्यक्रम को पेपर लीक, बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं और युवाओं की समस्याओं के खिलाफ एक बड़े अभियान के रूप में पेश किया है। प्रयागराज का चयन भी प्रतीकात्मक है, क्योंकि यह देश के प्रमुख शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षा केंद्रों में गिना जाता है। कांग्रेस का दावा है कि वह छात्रों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर पर उठाना चाहती है। लेकिन यहां पहला राजनीतिक सवाल खड़ा होता है कि क्या प्रयागराज में छात्रों की एक बड़ी सभा को पूरे उत्तर प्रदेश के युवा मतदाताओं के राजनीतिक रुझान का संकेत मान लिया जाए?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution" target="_blank">संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान</a></h3><div>देखा जाये तो राजनीति में भीड़ और वोट के बीच संगठन नाम की एक चीज होती है। किसी नेता के कार्यक्रम में हजारों लोग आ सकते हैं, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल हो सकते हैं और मीडिया में कई घंटे तक बहस हो सकती है, लेकिन विधानसभा चुनाव 403 सीटों पर लड़ा जाता है। वहां उम्मीदवार चाहिए, स्थानीय नेतृत्व चाहिए, बूथ स्तर का संगठन चाहिए, चुनाव प्रबंधन चाहिए और सबसे महत्वपूर्ण, ऐसा स्थायी मतदाता आधार चाहिए जो मतदान के दिन पार्टी के साथ खड़ा हो। यहीं कांग्रेस की सबसे बड़ी चुनौती दिखाई देती है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को केवल दो सीटें मिली थीं और उसका वोट शेयर लगभग 2.33 प्रतिशत रहा था। यह आंकड़ा किसी सामान्य चुनावी उतार-चढ़ाव का नहीं, बल्कि राज्य में कांग्रेस के संगठनात्मक पतन का संकेत था। हां, 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उल्लेखनीय वापसी की। कांग्रेस ने छह लोकसभा सीटें जीतीं और उसका प्रदर्शन 2022 की तुलना में स्पष्ट रूप से बेहतर हुआ। लेकिन इस सफलता का कारण समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ INDIA गठबंधन में शामिल होना था। दोनों दलों ने मिलकर चुनाव लड़ा और विपक्षी वोटों का एक बड़ा हिस्सा एकजुट हुआ। इसलिए 2024 के परिणाम को सीधे-सीधे कांग्रेस के स्वतंत्र उत्तर प्रदेश जनाधार का प्रमाण मानना राजनीतिक रूप से जल्दबाजी होगी।</div><div><br></div><div>और यही सवाल 2027 के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। अगर कांग्रेस वास्तव में उत्तर प्रदेश में अपने दम पर इतनी मजबूत हो चुकी है, तो फिर उसके अपने ही सांसदों और नेताओं को समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन जल्द तय करने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? अभी एक दिन पहले ही तमाम समाचार रिपोर्टों में कांग्रेस के उत्तर प्रदेश के सांसदों द्वारा 2027 के चुनाव के लिए समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन को जल्द अंतिम रूप देने की मांग सामने आई है। साथ ही, प्रदेश कांग्रेस के भीतर गठबंधन को लेकर मतभेदों की खबरें भी आती रही हैं। इसलिए राहुल गांधी से एक सीधा सवाल पूछा जा सकता है कि अगर कांग्रेस का अपना जनाधार इतना मजबूत है, तो 2027 में उसे समाजवादी पार्टी के सहारे की जरूरत क्यों है?</div><div><br></div><div>वैसे यह सवाल गठबंधन के खिलाफ नहीं है। गठबंधन लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। लेकिन तब 2024 की सफलता को कांग्रेस की अकेले की ताकत बताना भी उचित नहीं होगा। यदि सफलता गठबंधन की संयुक्त ताकत से आई है, तो उसका श्रेय भी ईमानदारी से साझा करना होगा। यही कारण है कि प्रयागराज का ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कांग्रेस के लिए राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन इसे 2027 के चुनाव की दिशा बदल देने वाला कार्यक्रम मानने के लिए अभी बहुत कुछ साबित होना बाकी है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस को यह बताना होगा कि प्रयागराज की सभा के बाद वह कितने छात्रों को अपने साथ जोड़ पाती है। कितने जिलों में उसका छात्र संगठन सक्रिय है? कितने विधानसभा क्षेत्रों में उसका मजबूत स्थानीय संगठन है? कितनी सीटों पर वह अपने दम पर चुनाव लड़ने की वास्तविक स्थिति में है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या छात्रों के मुद्दे को लेकर उसका अभियान चुनाव तक लगातार जमीन पर दिखाई देगा या यह भी दूसरे राजनीतिक अभियानों की तरह कुछ दिनों की सुर्खियों तक सीमित रह जाएगा? साथ ही कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि राहुल गांधी अब तक छात्रों की गूंज के जितने कार्यक्रम कर चुके हैं उसमें उमड़ी भीड़ में से कितने लोगों ने कांग्रेस की सदस्यता ली?</div><div><br></div><div>यहां एक और महत्वपूर्ण बात है। कांग्रेस के लिए युवाओं और छात्रों का मुद्दा उठाना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक है, लेकिन केवल सरकार की आलोचना करने से कोई पार्टी युवाओं का स्थायी राजनीतिक विकल्प नहीं बन जाती। छात्रों को भाषण नहीं, समाधान चाहिए। उन्हें समय पर परीक्षा चाहिए, पारदर्शी भर्ती चाहिए, पेपर लीक से सुरक्षा चाहिए, परिणाम और नियुक्ति में अनावश्यक देरी से मुक्ति चाहिए और ऐसी शिक्षा चाहिए जो उन्हें रोजगार के योग्य बनाए। इसलिए कांग्रेस से सवाल है कि वह केवल यह नहीं बताए कि सरकार ने क्या गलत किया, बल्कि यह भी बताए कि कांग्रेस सत्ता में होती तो क्या अलग करती? कांग्रेस को सिर्फ सरकार की आलोचना करने की बजाय बताना चाहिए कि पेपर लीक रोकने के लिए उसका मॉडल क्या है? परीक्षा एजेंसियों की जवाबदेही कैसे तय होगी? भर्ती कैलेंडर को कानूनी या प्रशासनिक रूप से कैसे सुनिश्चित किया जाएगा? परीक्षा और परिणाम के बीच समय सीमा क्या होगी? और अगर किसी परीक्षा में अनियमितता साबित होती है तो छात्रों के नुकसान की भरपाई का उसका मॉडल क्या होगा?</div><br><div>इसके अलावा, सरकार पर सवालों की बौछार कर रही कांग्रेस से भी उसकी ऐतिहासिक राजनीतिक जिम्मेदारी पर सवाल पूछा जाना चाहिए। देश और उत्तर प्रदेश में लंबे समय तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज शिक्षा व्यवस्था की हर समस्या पर इस तरह बोल नहीं सकती जैसे उसका इस व्यवस्था के निर्माण और उसकी कमियों से कोई संबंध ही नहीं रहा। इसलिए असली सवाल यह है कि “कांग्रेस ने दशकों तक देश और उत्तर प्रदेश में शासन किया। अगर आज शिक्षा व्यवस्था में इतनी गंभीर कमियां हैं, तो क्या कांग्रेस अपने लंबे शासन की ऐतिहासिक जिम्मेदारी स्वीकार करती है?” कांग्रेस से यह सवाल भी पूछा जाना चाहिए कि “अगर उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल है, जैसा कांग्रेस अपने राजनीतिक अभियान में बताती है, तो स्वतंत्र ASER के आंकड़ों में पिछले वर्षों में कई बुनियादी learning outcomes में सुधार कैसे दिखाई दे रहा है?”&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाये तो प्रयागराज में राहुल गांधी का कार्यक्रम इसलिए राजनीतिक रूप से दिलचस्प है क्योंकि यह केवल छात्र संवाद नहीं है। कांग्रेस स्वयं इसे 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों से पहले युवाओं के बीच अपनी जगह बनाने के प्रयास के रूप में देख रही है। लेकिन कांग्रेस के लिए चुनौती यह है कि छात्र और युवा मतदाता एकसमान राजनीतिक समूह नहीं हैं। किसी परीक्षा में पेपर लीक से नाराज छात्र जरूरी नहीं कि उसी कारण से विधानसभा चुनाव में किसी खास पार्टी को वोट दे। बेरोजगारी एक बड़ा मुद्दा हो सकती है, लेकिन उसके साथ कानून-व्यवस्था, जातीय समीकरण, कल्याणकारी योजनाएं, स्थानीय उम्मीदवार, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री की लोकप्रियता, महिला मतदाता, किसान और क्षेत्रीय मुद्दे भी चुनावी व्यवहार को प्रभावित करते हैं। इसलिए ‘छात्रों की गूंज’ को 2027 के चुनाव का निर्णायक संकेत मान लेना जल्दबाजी होगी। हम आपको यह भी याद दिला दें कि दो-तीन महीने पहले कांग्रेस ने रायबरेली में भी एक बड़ी जनसभा की थी और उसमें राहुल गांधी ने बड़ी हुंकार भरी थी लेकिन क्या उससे यूपी में कोई राजनीतिक समीकरण बना या बिगड़ा?</div><div><br></div><div>राहुल गांधी का प्रयागराज कार्यक्रम कांग्रेस को मीडिया की सुर्खियां दे सकता है। छात्रों के बीच राजनीतिक चर्चा पैदा कर सकता है। सरकार पर दबाव भी बना सकता है। लेकिन इससे अपने आप यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि इससे उत्तर प्रदेश का चुनावी गणित बदल गया है। 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव किसी एक सभा, किसी एक भाषण या किसी एक नेता की लोकप्रियता से तय नहीं होगा। वह बूथ पर तय होगा, विधानसभा क्षेत्र के सामाजिक समीकरणों पर तय होगा, स्थानीय उम्मीदवारों की स्वीकार्यता पर तय होगा और सबसे बढ़कर इस बात पर तय होगा कि कौन-सा गठबंधन किस वोट को वास्तविक मतदान में बदल पाता है। इसलिए मुद्दा यह नहीं है कि “प्रयागराज के कार्यक्रम का क्या राजनीतिक असर होगा?” मुद्दा यह है कि 403 विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस का संगठन कितना बड़ा है? और कांग्रेस के पास शिक्षा और रोजगार से जुड़ी समस्याओं का अपना ठोस व समयबद्ध समाधान क्या है?&nbsp;</div><div><br></div><div>साथ ही प्रयागराज के चयन को केवल छात्रों के मुद्दे तक सीमित करके देखना भी शायद पूरी तस्वीर नहीं होगी। इसके पीछे पूर्वांचल की राजनीति में कांग्रेस की अपनी पुरानी राजनीतिक स्मृतियों को फिर से सक्रिय करने और उस भूगोल में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश भी देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी 2014 में वाराणसी को अपनी संसदीय राजनीति का प्रमुख आधार बनाया था और उसके बाद पूर्वांचल राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया। वाराणसी और प्रयागराज स्टेशनों के बीच मात्र एक जंक्शन की दूरी है। ऐसे में प्रयागराज का चयन पूर्वांचल के राजनीतिक प्रभाव क्षेत्र में एक प्रतीकात्मक जवाब देने की कोशिश के रूप में भी देखा जा सकता है। एक तरफ मोदी का वाराणसी, दूसरी तरफ नेहरू-गांधी परिवार की इलाहाबाद-प्रयागराज की ऐतिहासिक स्मृति। साथ ही यह संयोग भी महत्वपूर्ण है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने इलाहाबाद सीट 40 साल बाद वापस जीती थी। कांग्रेस के उज्ज्वल रमण सिंह ने भाजपा के नीरज त्रिपाठी को 58,795 मतों से हराया था और 1984 में अमिताभ बच्चन की जीत के बाद पहली बार कांग्रेस इस सीट पर लौटी। उल्लेखनीय है कि जवाहरलाल नेहरू इलाहाबाद की फूलपुर संसदीय सीट से चुनाव लड़ते थे। इसके साथ ही प्रयागराज में नेहरू परिवार से जुड़ी स्मृतियां जैसे कि आनंद भवन और स्वराज भवन आदि हैं और राहुल गांधी के दादा फिरोज जहांगीर गांधी की कब्र भी यहीं है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, प्रयागराज के सफल कार्यक्रम के बाद अब सवाल यह है कि क्या यह विरासत आज के युवा मतदाता को उसी तरह राजनीतिक रूप से आंदोलित कर सकती है जैसे वह कांग्रेस के पुराने दौर में करती थी?&nbsp;</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 21:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rahul-gandhi-prayagraj-chhatron-ki-goonj-up-politics-2027</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[नशे के विरुद्ध एक अभियान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-campaign-against-substance-abuse]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश को नक्सलवाद-माओवाद के आतंक से मुक्ति दिलाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने&nbsp; दो नये अहम अभियान प्रारंभ किये हैं- पहला, भारत को घुसपैठियों से मुक्त करना तथा दूसरा है, युवाओं को नशे की लत से मुक्ति दिलाना। भारत के किशोरों तथा युवाओं को हर प्रकार के नशे से मुक्ति दिलाने के लिए 2 अगस्त 2026 को प्रधानमंत्री मोदी ने “नशा मुक्त युवा, विकसित भारत संकल्प अभियान“ का प्रारंभ&nbsp; करते हुए एक वीडियो संदेश जारी किया है। अपने सन्देश में प्रधानमंत्री मोदी ने कहाकि जो युवा नशे से लड़कर बाहर निकलते हैं वे कमजोर नहीं, बल्कि असली योद्धा होते हैं। समाज को उनका सम्मान करना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि भारत में ड्रग्स की सप्लाई दुश्मन देशों की आतंकी साजिश का ही एक हिस्सा है। दुश्मन देश भारतीय युवाओं को नशे के जाल में धकेलना चाहते हैं ताकि भारत कभी भी एक सशक्त एवं विकसित देश के रूप में स्थापित न हो सके। इस साजिश को हम सबको मिलकर नाकाम करना होगा। विकसित भारत का लक्ष्य तभी पूरा होगा जब देश का युवा शारीरिक और मानसिक रूप से स्वस्थ होने के साथ ही नशे से भी दूर रहेगा। अगले 100 सप्ताह तक हर रविवार को कला, संस्कृति, खेल और अन्य गतिविधियों के माध्यम से नशामुक्ति का संदेश देश भर में पहुंचाया जाएगा। नशे की लत युवाओं के सपनों और परिवार दोनों को ही तोड़ देती है। नशा केवल व्यक्ति या परिवार को ही नहीं बल्कि राष्ट्र की ताकत को भी कमजोर करता है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution" target="_blank">संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान</a></h3><div>इस अभियान का उद्देश्य युवाओं को नशे से दूर रहने के लिए प्रेरित करना और उन्हें अपने समाज में बदलाव लाने के लिए आगे बढ़ाना है। प्रत्येक रविवार को देशभर में अलग-अलग कार्यक्रम होंगे जिसमें वॉकाथन और दौड़, खेल प्रतियोगिताएं,योग और ध्यान सत्र, सांस्कृतिक कार्यक्रम, नुक्कड़ नाटक, नशा विरोधी जागरूकता अभियान, चर्चा और संवाद कार्यक्रम, पेंटिग्स व आर्ट्स प्रतियोगिताएं तथा सामुदायिक सहभागिता कार्यक्रम आयोजित किये जाएंगे। यह अभियन 125 से अधिक आध्यात्मिक,सामाजिक तथा सरकारी संगठनों के सहयोग से आयोजित किया जा रहा है। ब्रहमकुमारी ईश्वरीय विश्वविद्यालय, आर्ट ऑफ़ लिविंग, गायत्री परिवार, इस्कॉन से लेकर माताअमृतानंदमयी मठ जैसे संगठन इस अभियान से जुड़ कर कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का वैचारिक संगठन विश्व हिंदू परिषद पहले से ही व्यापक स्तर पर नशामुक्ति अभियान चला रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>युवाओं में नशे के विरुद्ध जागरूकता लाने के साथ ही गृहमंत्री अमित शाह ने भी नशे की जड़ों पर प्रहार करने का युद्ध छेड़ रखा हैं। ड्रग्स माफियाओं पर कार्रवाई कई गुना बढ़ गई है। तस्करी करके बड़ी मात्रा में विदेशों से आने वाली ड्रग्स की जब्ती बंदरगाहों तथा एयरपोर्ट्स की जा रही है और उसे नष्ट किया जा रहा है। वर्ष 2021 में 2988 किलो हेरेाइन, 2022 में 927 किलो गांजा, 2023 में 122 किलो मेफेड्रोन, 2024 में 770 किलो मेथाफाटेमाइन और 2026 में फिर 522 किलो गांजा बरामद किया जा चुका है। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के अनुसार 2020 से मई 2025 तक तक 116 बड़े मामलों में कार्रवाई करते हुए 1,09,318 किलोग्राम नशीले पदार्थ जब्त किए गए हैं और उनको नष्ट किया गया है।</div><div><br></div><div>वर्तामन समय में नशे का सबसे बड़ा केन्द्र पंजाब तथा पूर्वोत्तर के कई छोटे राज्य हैं। विदेशी आतंकी संगठनों द्वारा जम्मू-कश्मीर व पूर्वोत्तर के युवाओं को नशे की लत में धकेलने का प्रयास लगातार किया जा रहा है हैं। अपने कुत्सित प्रयासों को सफल बनाने के लिये ये लोग स्थानीय स्तर के अपराधियों व बिगडैल युवाओं का सहारा लेते हैं। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब में नशे के संकट पर चिंता जताते हुए कहा था कि नशा राज्य के अस्तित्व पर खतरा बन सकता है। संगठित गिरोहों की जांच में पुलिस प्रशासन के साथ ही अदालत को भी सतर्क रहना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत में ड्रग्स की खेप कई रास्तों से आती है। बांग्लादेश-पाकिस्तान तथा नेपाल सीमा से ड्रग्स आसानी से आ-जा रहा है। गुजरात के समुद्री तट से भी नशे का कारोबार कंटेनर और समुद्री मार्ग से चलता आ रहा है हालांकि, सरकार के प्रयासों से कुछ रोकथाम हुई है किंतु खतरा बरकरार है। म्यामांर से भी ड्रग्स की तस्करी हो रही है। यही नहीं छोटे-छोटे देश मलेशिया, सिंगापुर, थाईलैंड, मालदीव, हांगकांग सहित तमाम देशों से ड्रग्स की सप्लाई अनेक प्रकार से हो रही है। पाक परस्त आतंकी संगठन ड्रोन आदि के माध्यम से सीमावर्ती क्षेत्रों में ड्रग्स, हथियार व धन को गिराते रहते हैं। इस प्रकार नशे की सप्लाई अनेक तरीकों से होती है और उन्हें भारत के किशोरों तथा युवाओं तक विभिन्न तरीकों से पहुंचाया जाता है। वर्ष 2025 में एम्स के सर्वे में पाया गया कि 11 से 14 वर्ष की उम्र में ही किशोर नशीले पदार्थों के संपर्क मे आ गए थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>इन विषम परिस्थितियों को देखते हुए यह वृहद अभियान प्रारंभ किया गया है। नशे से आतंकवाद को पनपने में बहुत मदद मिलाती है इसलिए, यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी बड़ा खतरा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संबोधन के बाद 28 हजार से अधिक स्थानों पर एक करोड़ से अधिक युवाओं ने भाग लिया और एक साथ नशा मुक्त भारत की शपथ ली। नशामुक्ति का यह अभियान राजनीति से दूर रहकर चलना चाहिए तभी भारत के किशोर, युवा और परिवार तथा बहन-बेटियां सुरक्षित जीवन जी सकेंगी और वर्ष-2047 तक भारत विकसित भारत बनकर उभर सकेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 16:35:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/a-campaign-against-substance-abuse</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[उपचुनावों का जनादेश: क्या बदल रहा है मतदाता का मिजाज?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-mandate-of-the-by-elections-is-the-voter-mood-shifting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लोकतांत्रिक राजनीति में कई बार छोटे चुनाव भी बड़े संदेश दे जाते हैं। विधानसभा उपचुनावों को लंबे समय तक केवल रिक्त सीटों को भरने की औपचारिक प्रक्रिया माना जाता रहा है। सामान्य धारणा यही रही कि जिस राज्य में जिस दल की सरकार होती है, प्रशासनिक बढ़त, संगठनात्मक शक्ति और सत्ता के प्रभाव के कारण वही दल उपचुनाव आसानी से जीत जाता है। इसी कारण उपचुनावों के परिणामों को व्यापक राजनीतिक संकेतक के रूप में कम ही देखा जाता था किंतु पिछले कुछ वर्षों में यह धारणा तेजी से बदली है। अब उपचुनाव केवल एक सीट का फैसला नहीं करते बल्कि जनता के तत्कालीन मनोभाव, सरकार के प्रति संतोष-असंतोष, संगठन की मजबूती, नेतृत्व की स्वीकार्यता और भविष्य की राजनीतिक दिशा के संकेत भी देते हैं। बिहार के बांकीपुर, मध्य प्रदेश के दतिया और गुजरात के मांझलपुर विधानसभा उपचुनावों ने भी यही संदेश दिया है। तीन सीटों में से दो पर भाजपा की हार और केवल एक पर जीत ने राजनीतिक विश्लेषकों को यह सोचने पर विवश कर दिया है कि क्या ये केवल स्थानीय परिस्थितियों का परिणाम हैं अथवा भाजपा के सामने उभर रही नई राजनीतिक चुनौतियों का प्रारंभिक संकेत? उपचुनाव सत्ता परिवर्तन का जनादेश नहीं होते किंतु वे जनता के बदलते मानस की पहली आहट अवश्य होते हैं और यही कारण है कि इन परिणामों को गंभीरता से समझने की आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>सबसे अधिक चर्चा बिहार की बांकीपुर सीट की रही। यह सीट केवल एक विधानसभा क्षेत्र नहीं थी बल्कि भाजपा की राजनीतिक प्रतिष्ठा का प्रतीक मानी जाती थी। लगभग तीन दशक से यह भाजपा का अभेद्य दुर्ग रहा। पहले भाजपाध्यक्ष नितिन नवीन के पिता और बाद में स्वयं नितिन नवीन लगातार यहां विजय प्राप्त करते रहे। नितिन नवीन के राज्यसभा सदस्य बनने के बाद यह सीट रिक्त हुई और भाजपा को अटूट विश्वास था कि उसका यह गढ़ सुरक्षित रहेगा किंतु जन सुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने न केवल भाजपा का यह किला ध्वस्त कर दिया बल्कि बिहार की राजनीति में नए विकल्प की संभावनाओं को भी मजबूत कर दिया। यह परिणाम केवल भाजपा की हार नहीं बल्कि उसकी रणनीतिक चूक का भी परिणाम माना जा रहा है। उम्मीदवार चयन में अंतिम समय तक बना भ्रम, स्थानीय कार्यकर्ताओं की असंतुष्टि और अत्यधिक आत्मविश्वास ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया। लंबे समय तक किसी सीट पर लगातार जीत कभी-कभी संगठन में आत्मसंतोष पैदा कर देती है। यही स्थिति बांकीपुर में दिखाई दी। भाजपा ने शायद मान लिया था कि उसका पारंपरिक वोट बैंक और संगठनात्मक नेटवर्क किसी भी परिस्थिति में जीत सुनिश्चित कर देगा जबकि मतदाता पहले की तुलना में अधिक सजग और स्वतंत्र निर्णय लेने वाला बन चुका है। बांकीपुर का परिणाम प्रशांत किशोर के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। चुनावी रणनीतिकार के रूप में अनेक दलों को सफलता दिलाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार स्वयं चुनावी परीक्षा में उतरे और सफल हुए। हालांकि विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी पूरी तरह विफल रही थी किंतु इस विजय ने सिद्ध कर दिया कि यदि कोई दल लगातार जनता के बीच बना रहे और स्थानीय मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठाए तो वह स्थापित राजनीतिक समीकरणों को चुनौती दे सकता है। यह जीत बिहार में तीसरे राजनीतिक विकल्प की संभावनाओं को भी बल देती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks" target="_blank">आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!</a></h3><div>दूसरी ओर मध्य प्रदेश की दतिया सीट भाजपा के लिए और अधिक चिंता का विषय है। भाजपा की यह हार केवल विपक्ष की सफलता नहीं बल्कि भाजपा संगठन के भीतर असंतोष की अभिव्यक्ति भी मानी जा रही है। पूर्व गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा का टिकट काटे जाने के बाद उनके समर्थकों की नाराजगी चुनाव अभियान के दौरान लगातार चर्चा में रही। चुनावी राजनीति में उम्मीदवार केवल पार्टी का प्रतिनिधि नहीं होता बल्कि स्थानीय संगठन की भावनाओं का केंद्र भी होता है। जब कार्यकर्ता स्वयं उत्साहहीन हो जाएं या भीतरघात की स्थिति उत्पन्न हो जाए तो मजबूत संगठन भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाता। दतिया का परिणाम इसी सत्य की पुष्टि करता है। मध्य प्रदेश भाजपा लंबे समय तक शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व में अत्यंत मजबूत संगठनात्मक ढांचे के लिए जानी जाती रही। संगठन, सरकार और जनता के बीच संवाद की जो परंपरा विकसित हुई थी, नेतृत्व परिवर्तन के बाद उसे उसी प्रभावशीलता से बनाए रखना नई सरकार के लिए चुनौती बना हुआ है। उपचुनावों ने संकेत दिया है कि केवल सत्ता में होना पर्याप्त नहीं, संगठन की एकजुटता और स्थानीय नेतृत्व की स्वीकार्यता भी उतनी ही आवश्यक है।</div><div>&nbsp;</div><div>गुजरात के मांझलपुर में भाजपा ने जीत दर्ज कर अपनी संगठनात्मक क्षमता का प्रदर्शन अवश्य किया किंतु मतों के अंतर में आया परिवर्तन संकेत देता है कि वहां भी विपक्ष धीरे-धीरे अपनी जमीन मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। यद्यपि गुजरात में भाजपा की स्थिति अभी भी सुदृढ़ है, फिर भी चुनावी आंकड़े बताते हैं कि किसी भी राजनीतिक दल के लिए आत्मसंतोष उचित नहीं हो सकता। इन उपचुनावों की चर्चा का एक महत्वपूर्ण पक्ष ‘जेन-जी आंदोलन’ भी रहा। चुनाव 30 जुलाई को ऐसे समय हुए, जब प्रतियोगी परीक्षा, पेपर लीक, रोजगार, अवसरों की कमी, प्रशासनिक जवाबदेही इत्यादि युवाओं से जुड़े मुद्दे राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में थे। निश्चित रूप से यह कहना कठिन होगा कि केवल इसी आंदोलन ने चुनाव परिणामों को प्रभावित किया क्योंकि प्रत्येक उपचुनाव में स्थानीय समीकरण, उम्मीदवार की लोकप्रियता और संगठनात्मक स्थिति कहीं अधिक निर्णायक भूमिका निभाते हैं। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि युवाओं के बीच बढ़ती असंतुष्टि का व्यापक राजनीतिक वातावरण पर प्रभाव पड़ता है। यदि युवा मतदाता किसी सरकार के प्रति निराशा महसूस करता है तो उसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव चुनावी व्यवहार पर भी दिखाई दे सकता है। आज का मतदाता (विशेषकर युवा वर्ग) केवल जातीय या पारंपरिक राजनीतिक पहचान के आधार पर मतदान नहीं कर रहा, रोजगार, शिक्षा, भ्रष्टाचार, पारदर्शिता, सुशासन, अवसरों की समानता और प्रशासनिक उत्तरदायित्व जैसे मुद्दे उसकी प्राथमिकता बनते जा रहे हैं। सोशल मीडिया और डिजिटल संचार ने भी मतदाता को पहले से अधिक जागरूक बनाया है। अब सरकारों के लिए केवल विकास के दावे पर्याप्त नहीं, उनके ठोस परिणाम भी दिखाई देने चाहिए।</div><div><br></div><div>भाजपा के लिए इन परिणामों से सबसे बड़ा सबक उम्मीदवार चयन को लेकर है। पिछले कुछ वर्षों में कई राज्यों में देखा गया है कि टिकट वितरण को लेकर स्थानीय स्तर पर असंतोष उत्पन्न हुआ है। संगठन की राय, कार्यकर्ताओं की भावनाओं और स्थानीय लोकप्रियता की उपेक्षा कभी-कभी चुनावी नुकसान का कारण बन जाती है। यदि पार्टी समय रहते इस पहलू पर गंभीरता से विचार नहीं करती तो भविष्य के बड़े चुनावों में भी ऐसी स्थितियां उत्पन्न हो सकती हैं। भाजपा को यह भी समझना होगा कि कोई भी राजनीतिक गढ़ स्थायी नहीं होता। लोकतंत्र में जनता समय-समय पर अपने निर्णय बदलती है और वही दल लंबे समय तक सफल रहता है, जो निरंतर आत्म-मूल्यांकन करता रहे। उपचुनावों ने भाजपा को यही संदेश दिया है कि संगठन की मजबूती, नेतृत्व की विश्वसनीयता और जनता के साथ सतत संवाद बनाए रखना पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। हालांकि इन परिणामों के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण पूरी तरह बदल रहा है। तीन विधानसभा सीटों के परिणाम किसी सरकार की लोकप्रियता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकते, फिर भी लोकतंत्र में छोटे संकेतों की उपेक्षा करना भी राजनीतिक दृष्टि से उचित नहीं माना जाता क्योंकि यही छोटे संकेत आगे चलकर बड़े राजनीतिक परिवर्तनों की भूमिका तैयार करते हैं।</div><div><br></div><div>विपक्ष के लिए ये परिणाम आशा का संदेश हैं किंतु यह आशा तभी सार्थक होगी, जब वह केवल सत्ता विरोधी वातावरण पर निर्भर रहने के बजाय विश्वसनीय नेतृत्व, स्पष्ट वैकल्पिक नीति और मजबूत संगठन प्रस्तुत कर सके। वहीं जन सुराज जैसे नए राजनीतिक दलों के लिए यह अवसर भी है और परीक्षा भी। एक सीट की सफलता को व्यापक जनविश्वास में बदलना कहीं अधिक कठिन कार्य होगा। इन उपचुनावों का सबसे महत्वपूर्ण संदेश यही है कि मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक जागरूक, अधिक अपेक्षाकारी और अधिक स्वतंत्र निर्णय लेने वाला हो चुका है। अब चुनाव केवल संगठनात्मक शक्ति या पुराने राजनीतिक समीकरणों से नहीं जीते जा सकते। जनता नेतृत्व की विश्वसनीयता, उम्मीदवार की स्वीकार्यता, स्थानीय मुद्दों के समाधान और भविष्य की स्पष्ट दृष्टि को भी उतना ही महत्व देती है। लोकतंत्र में सबसे बड़ी शक्ति अंततः जनता ही होती है और जनता समय-समय पर छोटे चुनावों के माध्यम से भी बड़े संदेश देना कभी नहीं भूलती।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:57:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-mandate-of-the-by-elections-is-the-voter-mood-shifting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA['अगर ऐसा है तो मैं खुद को सांप्रदायिक कहने से नहीं हिचकूंगी', संसद में ऐसा कह कर सुषमाजी ने सबको हैरान कर दिया था]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sushma-swaraj-death-anniversary-political-journey-legacy-article-370-last-tweet]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज जब पूरा देश पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित कर रहा है, तब हर भारतीय के मन में उनकी मुस्कुराती छवि, ओजस्वी आवाज़ और मानवीय संवेदनाओं से भरा व्यक्तित्व एक बार फिर जीवंत हो उठता है। देखा जाये तो भारतीय राजनीति में ऐसे नेता विरले ही हुए हैं, जिनकी लोकप्रियता केवल अपनी पार्टी तक सीमित न रहकर राजनीतिक सीमाओं को भी पार कर गई हो। सुषमा स्वराज उन्हीं असाधारण नेताओं में थीं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, संसद हो या अंतरराष्ट्रीय मंच, उनके शब्दों में दृढ़ता थी, विचारों में स्पष्टता थी और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी, जिसने उन्हें हर दल के नेताओं और करोड़ों भारतीयों का सम्मान दिलाया। छह अगस्त 2019 को 67 वर्ष की आयु में उनके निधन ने भारतीय राजनीति को एक ऐसी आवाज़ से वंचित कर दिया, जिसकी कमी आज भी महसूस की जाती है।</div><div><br></div><div>सुषमा स्वराज का अंतिम सार्वजनिक संदेश भी उनके राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी वैचारिक प्रतिबद्धताओं में से एक का प्रतीक बन गया। छह अगस्त 2019 की शाम 7:23 बजे उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टैग करते हुए ट्वीट लिखा था, "धन्यवाद प्रधानमंत्री जी। मैं अपने जीवनकाल में इस दिन को देखने की प्रतीक्षा कर रही थी।" यह संदेश जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के ऐतिहासिक निर्णय पर उनकी प्रतिक्रिया थी। भारतीय जनता पार्टी वर्षों से जिस संकल्प को लेकर आगे बढ़ रही थी, उसे पूरा होते देखना उनके जीवन की सबसे बड़ी राजनीतिक इच्छाओं में शामिल था। विडंबना देखिए कि इस ऐतिहासिक क्षण पर खुशी व्यक्त करने के कुछ ही घंटों बाद उन्हें हृदयाघात हुआ और उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। यह संयोग उनके जीवन को एक भावनात्मक पूर्णविराम देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks" target="_blank">आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!</a></h3><div>हरियाणा के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी सुषमा स्वराज ने ऐसे दौर में राजनीति में अपनी पहचान बनाई, जब यह क्षेत्र लगभग पूरी तरह पुरुषों के वर्चस्व वाला माना जाता था। हरियाणा में मात्र 25 वर्ष की आयु में वह भारत की सबसे युवा कैबिनेट मंत्री बनीं और 27 वर्ष की उम्र में राज्य में जनता पार्टी की प्रदेश अध्यक्ष का दायित्व संभाला। बाद के वर्षों में वह लोकसभा सांसद, राज्यसभा सांसद और दिल्ली की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं, लोकसभा में विपक्ष की दूसरी महिला नेता रहीं और भारत की पहली पूर्णकालिक महिला विदेश मंत्री बनने का गौरव भी हासिल किया। उनका राजनीतिक सफर केवल पदों की सूची नहीं था, बल्कि उन तमाम सामाजिक और राजनीतिक बाधाओं को तोड़ने की कहानी था, जिन्हें लंबे समय तक महिलाओं के सामने अजेय माना जाता रहा।</div><div><br></div><div>सुषमा स्वराज की सबसे बड़ी पहचान उनकी अद्भुत वक्तृत्व कला थी। संसद में उनके भाषण केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप नहीं होते थे, बल्कि उनमें इतिहास, संस्कृति, तर्क और संवेदना का अनूठा संगम दिखाई देता था। वर्ष 1996 में लोकसभा में दिया गया उनका "धर्मनिरपेक्षता" पर भाषण आज भी भारतीय संसदीय इतिहास के सबसे चर्चित भाषणों में गिना जाता है। उन्होंने पूरे आत्मविश्वास से कहा था कि यदि वंदे मातरम् का सम्मान करना, राष्ट्रीय ध्वज की गरिमा की रक्षा करना, अनुच्छेद 370 को समाप्त करने की मांग करना और समान नागरिक संहिता की वकालत करना सांप्रदायिकता है, तो वे स्वयं को सांप्रदायिक कहने से नहीं हिचकेंगी। लेकिन इसी भाषण में उन्होंने धर्मनिरपेक्षता की अपनी परिभाषा भी दी कि एक अच्छा हिंदू, अच्छा मुसलमान, अच्छा सिख और अच्छा ईसाई वही है, जो अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरे धर्मों का भी समान सम्मान करे। उनके इस दृष्टिकोण ने वैचारिक बहस को नई दिशा दी और विरोधी दलों के कई नेताओं ने भी उनकी तार्किक क्षमता की सराहना की।</div><div><br></div><div>भारतीय संस्कृति की उनकी व्याख्या भी उतनी ही प्रभावशाली थी। जब संसद में भारतीयता की अवधारणा पर प्रश्न उठे, तब उन्होंने भांगड़ा से भरतनाट्यम तक, राजमा-चावल से इडली-दोसा तक और अमरनाथ से रामेश्वरम तक की सांस्कृतिक यात्रा का उल्लेख करते हुए बताया कि विविधताओं के बीच यही एकता भारत की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यही वह संस्कृति है, जिसमें कश्मीर का श्रद्धालु अमरनाथ का जल लेकर रामेश्वरम में भगवान शिव का अभिषेक करता है। उनके इन शब्दों ने भारतीय सांस्कृतिक एकता की ऐसी तस्वीर प्रस्तुत की, जिसे आज भी याद किया जाता है।</div><div><br></div><div>हालांकि सुषमा स्वराज की सबसे अलग पहचान विदेश मंत्री के रूप में बनी। वर्ष 2014 में जब उन्होंने विदेश मंत्रालय की जिम्मेदारी संभाली, तब कई लोगों को लगा कि विदेश नीति का पूरा केंद्र प्रधानमंत्री कार्यालय ही रहेगा। लेकिन उन्होंने अपने काम और संवेदनशीलता से यह धारणा बदल दी। उन्होंने विदेश मंत्रालय को आम भारतीय के जीवन से जोड़ दिया। सोशल मीडिया मंच ट्विटर को उन्होंने केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संकट में फंसे भारतीयों के लिए जीवनरेखा बना दिया। दुनिया के किसी भी कोने में कोई भारतीय मुश्किल में होता, तो लोग सीधे उन्हें टैग करते और कुछ ही समय में उनकी ओर से प्रतिक्रिया आ जाती। चाहे जर्मनी के शरणार्थी शिविर में फंसी गुरप्रीत कौर हों, पाकिस्तान में जबरन विवाह का शिकार बनी उज्मा हों, मूक-बधिर गीता की स्वदेश वापसी हो या पाकिस्तान में फंसे हमीद अंसारी का मामला, हर जगह सुषमा स्वराज ने मानवीय संवेदनाओं के साथ हस्तक्षेप किया।</div><div><br></div><div>उनकी कार्यशैली इतनी सक्रिय थी कि उन्होंने स्वयं कहा था, "मैं न सोती हूँ और न ही भारतीय दूतावासों के अधिकारियों को सोने देती हूँ।" उनके एक संदेश पर दुनिया के किसी भी देश में भारतीय दूतावास तत्काल सक्रिय हो जाता था। यही कारण था कि भारतीय राजनयिक अपने मोबाइल फोन हर समय चालू रखते थे। विदेश मंत्रालय को उन्होंने पहली बार ऐसा मानवीय चेहरा दिया, जहां फाइलों से पहले इंसान की पीड़ा को महत्व मिला। उनकी हाजिरजवाबी भी लोगों को बेहद पसंद थी। एक बार किसी व्यक्ति ने ट्विटर पर खराब रेफ्रिजरेटर की शिकायत कर दी, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "भाई, मैं रेफ्रिजरेटर के मामले में आपकी मदद नहीं कर सकती। मैं इस समय संकट में फंसे इंसानों की मदद में बहुत व्यस्त हूँ।"</div><div><br></div><div>विदेश नीति के स्तर पर भी उनके कार्यकाल में भारत ने कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल कीं। कुलभूषण जाधव मामले में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में भारत की कानूनी सफलता, डोकलाम विवाद के दौरान संतुलित कूटनीति, मालदीव संकट और नेपाल से जुड़े चुनौतीपूर्ण हालात का प्रबंधन, इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) की बैठक में मुख्य अतिथि के रूप में भारत का प्रतिनिधित्व तथा पाकिस्तान के विरोध के बावजूद वहां भारत की प्रभावशाली उपस्थिति, ये सभी उपलब्धियां उनके नेतृत्व की गवाही देती हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख विदेश यात्राओं की पृष्ठभूमि तैयार करने में भी उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। न्यूयॉर्क के मैडिसन स्क्वायर गार्डन से लेकर चीन और किर्गिस्तान तक, उन्होंने परदे के पीछे रहकर भारतीय कूटनीति को मजबूती प्रदान की।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सुषमा स्वराज को केवल एक सफल राजनेता या कुशल प्रशासक के रूप में याद करना उनके व्यक्तित्व के साथ न्याय नहीं होगा। वह ऐसी जननेता थीं, जिन्होंने राजनीति को मानवीय संवेदना से जोड़ा। उनकी वाणी में ओज था, विचारों में स्पष्टता थी, निर्णयों में राष्ट्रहित सर्वोपरि था और व्यवहार में ऐसी आत्मीयता थी कि राजनीतिक विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। शायद यही कारण था कि अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने भी उन्हें भारत की सबसे लोकप्रिय नेताओं में शुमार किया। आज उनकी पुण्यतिथि पर देश उन्हें केवल एक पूर्व विदेश मंत्री के रूप में नहीं, बल्कि उस जननेता के रूप में याद कर रहा है, जिसने राजनीति को सेवा का माध्यम बनाया और करोड़ों भारतीयों के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 13:43:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sushma-swaraj-death-anniversary-political-journey-legacy-article-370-last-tweet</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर बांकीपुर उपचुनाव भाजपा क्यों, कैसे और किसके चलते हारी? पूछता है बिहार!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बांकीपुर उपचुनाव 2026 में भाजपा की हार अब हर किसी को नहीं पच रही है। इसलिए लोग एक दूसरे से पूछ रहे हैं कि भाजपा क्यों हारी? कैसे पराजित हुई? और किसके चलते यह राजनीतिक दुर्दिन देखना पड़ा? बिहार वासी जानना चाहते हैं! क्योंकि 9 माह पहले ही तो उन्होंने जदयू नीत एनडीए गठबंधन को अभूतपूर्व बहुमत दिया था! अटकलें हैं कि क्या जदयू नेता और पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ हुई 'सियासी बदतमीजी' के बाद भाजपा अआखिर ब अकेले नहीं चल पाएगी, क्योंकि टीम नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी के हवा-हवाई रणनीतिकारों को असली राजनीतिक जमीन पर तगड़ी पटकनी दिला डाली है!&nbsp;</div><div><br></div><div>जानकारों की मानें तो चाहे चिराग पासवान हों, जीतनराम मांझी हों या उपेंद्र कुशवाहा हों, या मुंह फुलाए सवर्ण भाजपाई, सबकी खामोशी या राजनीतिक बकवास दोनों भाजपा पर भारी पड़ गई। वह हो गया, जिसकी कल्पना शायद ही किसी ने की होगी! इसलिए ज्वलंत प्रश्न उठता है कि क्या "भाजपा केवल अपने सहयोगियों और सहयोगी दलों दोनों के भितरघात की वजह से हारी" है? क्योंकि ऐसे मतदान केंद्र जहां सहयोगी दल परंपरागत रूप से मजबूत रहे हैं, फिर भी वहां भाजपा को असामान्य रूप से कम वोट मिले हैं। खुद पार्टी और गठबंधन के नेताओं द्वारा दबी जुबान में ये बातें कहीं जा रही हैं, ताकि उनका महत्व बढ़े।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling" target="_blank">बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले</a></h3><div>लिहाजा, सुलगते सवाल उठने लगे कि आखिर बिहार में पहली बार भाजपा का मुख्यमंत्री (CM) बनने के बाद हुए पहले ही बांकीपुर उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी उम्मीदवार को जिस प्रकार की तगड़ी शिकस्त का सामना करना पड़ा, वह पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंतरिक युगलबंदी के खिलाफ किसी अंदरूनी राजनीतिक साजिश का द्योतक तो नहीं है!&nbsp;</div><div><br></div><div>चर्चा तो यहां तक हो रही है कि आनन-फानन में जिस तरह से पार्टी उम्मीदवार बदला गया, उस साजिश के पीछे केंद्रीय मंत्री अमित शाह की टीम में उपजे अंतर्विरोधों और आरएसएस से जुड़े दिग्गजों की परोक्ष भूमिका तो कहीं नहीं है, जो कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन की अव्यवहारिक पैराशूट नियुक्ति के बाद से ही अंदर ही अंदर खफा चल रहे थे और मौका मिलते ही उन्हें, उनकी ही जमीन पर असली जातीय और पार्टीगत दोनों राजनीतिक औकात दिखा दी!&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा इसलिए कि जो पार्टी दुर्लभ से दुर्लभतम चुनाव जीत जाती है, वह आखिर अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा छोड़ी हुई इकलौती सीट, जिस पर गत 30 वर्षों से 'पिता-पुत्र' का कब्जा रहा हो, वह अचानक हार जाए। खुद पटना के पीढ़ी दर पीढ़ी वाले भाजपा समर्थक संभ्रांत लोग भी अचंभित रह गए हैं कि ये क्या हो गया? क्या 'लालू की नीति' दबे पांव वेश बदलकर उनके पुत्र तेज प्रताप यादव के शह पर पटना में आ गई? क्या सहयोगी दलों के कार्यकर्ताओं को अपेक्षित स्तर पर सक्रिय नहीं किया गया? क्या स्थानीय स्तर पर असंतोष या गुटबाजी को शांत नहीं किया गया? क्या उम्मीदवार चयन को लेकर नाराज़गी नहीं भांपी जा सकी? क्या विपक्ष के प्रभावी ध्रुवीकरण का अंदाजा भाजपा रणनीतिकार नहीं लगा पाए? क्या स्थानीय मुद्दे और सत्ता-विरोधी भावना प्रबल रही और मतदान प्रबंधन यानी बूथ मैनेजमेंट में कमी बरती गई?</div><div><br></div><div>उनका सीधा सवाल यह भी है कि आखिर पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा सांसद रविशंकर प्रसाद, जदयू सांसद और केंद्रीय मंत्री राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, पूर्व केंद्रीय मंत्री डॉ सी पी ठाकुर (सांसद विवेक ठाकुर के पिता), राज्य सरकार के मंत्री रामकृपाल यादव और अशोक चौधरी के मोहल्लों से जुड़े मतदान केंद्रों पर भी भाजपा प्रत्याशी कैसे पिछड़े और प्रशांत किशोर वहां भी बढ़त बनाए रहे। राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के बूथ की भी यही स्थिति रही। आखिर यह सब सियासी प्रपंच कैसे और क्यों संभव हुआ? क्या मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को बदलने के लिए इतना बड़ा आत्मघाती षड्यंत्र सवर्णों के नेताओं ने अपने ही खिलाफ रच दिया? क्या किसी ने इस हेतु नई दिल्ली और नागपुर से इशारा भी किया था? बात पचने वाली तो बिल्कुल भी नहीं है।</div><div><br></div><div>सवाल है कि क्या आरएसएस और भाजपा के जमीनी तालमेल की कमी ही भाजपा के खराब प्रदर्शन का मुख्य कारण है। क्या भाजपा और उसके वैचारिक-संगठनात्मक नेटवर्क के बीच स्थानीय स्तर पर समन्वय में कमी रही? क्या उम्मीदवार चयन या स्थानीय असंतोष का प्रभाव पड़ा?</div><div>क्या विपक्ष ने नए सामाजिक और राजनीतिक समीकरण बनाए? क्या कम मतदान का असर भाजपा के पारंपरिक मतदाता आधार पर पड़ा?</div><div><br></div><div>सवाल यह भी है कि क्या जदयू के पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपने द्वारा ही बनवाए हुए भाजपाई मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी से सियासी बदला ले लिया गया है? या फिर पूर्वमुख्यमंत्री व कृषि मंत्री विजय कुमार सिन्हा, और पूर्व कानून मंत्री व सांसद रविशंकर प्रसाद के अलावा ऋतुराज सिन्हा और संजय मयूख जैसे दिग्गज कायस्थ नेताओं ने निजी कारणों से भितरघात किया/कराया है? क्या लोजपा रामविलास के नेता व केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान का भी भाजपा को दिली सहयोग नहीं मिला? क्या उपेंद्र कुशवाहा की चुप्पी और जीतनराम मांझी और नागमणि जैसों के विषैले बोलों की कीमत भाजपा ने चुकाई है।</div><div><br></div><div>वहीं, राजनीतिक पंडितों का मानना है कि यूजीसी बिल विवाद, ओबीसी/दलितों को ज्यादा कानूनी तरजीह दिए जाने, हिंदुत्व को गफलत में रखने और राम मंदिर चंदा चोरी प्रकरण के अलावा भरत तिवारी एनकाउंटर प्रकरण आदि ने सवर्णों के बीच भाजपा की राजनीतिक साख को गहरी चोट पहुंचाई है। आलम यह बताया गया है कि ओबीसी/दलित वोट बैंक भाजपा के साथ पूरी तरह से नहीं जुटा पाया है,जबकि सवर्णों का सजग तबका अपने बच्चों के भविष्य के खातिर भाजपा से दूर चला जा रहा है, या विकल्प ढूंढ रहा है। क्या जन सुराज पार्टी में वह विकल्प दिखाई दे चुकी है? क्या सवर्णों ने बीजेपी को धोखा दिया या ओबीसी और दलितों ने या फिर तीनों वर्गों के समृद्ध तबके ने?</div><div><br></div><div>देखा जाए तो बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में जन सुराज पार्टी के सूत्रधार प्रशांत किशोर ने शोषित, दलित, पिछड़ों, अल्पसंख्यक समाज की राजनीति को धार देने की कोशिश तो की थी, पर कामयाबी नहीं मिली। लिहाजा, इस चुनाव में उन्होंने न केवल मुद्दे बदलते, बल्कि मोदी-शाह-सम्राट पर सीधे निशाना साधकर ही सफलता के इस मुकाम तक पहुंचे हैं। राजनीतिक पंडितों के मुताबिक, बिहार में भाजपा के लिए जन सुराज पार्टी अब एक वास्तविक चुनावी चुनौती बन चुकी है, जिसको राष्ट्रीय विस्तार पाते देर नहीं लगेगी। क्योंकि राष्ट्रीय राजनीतिक परिस्थिति यही चुगली कर रही है।</div><div><br></div><div>बांकीपुर उपचुनाव को प्रशांत किशोर ने व्यक्तिगत अभियान में बदल दिया था। उनकी पार्टी जन सुराज ने इस चुनाव को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया और प्रशांत किशोर ने स्वयं मैदान में उतरकर इसे हाई-प्रोफाइल मुकाबला बना दिया। इससे&nbsp;</div><div>विपक्षी वोटों का ध्रुवीकरण हुआ और भाजपा विरोधी मत नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव के राजद प्रत्याशी की ओर न जाकर अपेक्षाकृत अधिक एक दिशा में गए जिससे जनसुराज को विजयश्री मिली और भाजपा को नुकसान&nbsp; हुआ।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक एंटी-इनकंबेंसी की बात है तो बांकीपुर लंबे समय से भाजपा का गढ़ था, जहां लगातार एक ही दल के प्रतिनिधित्व से कुछ मतदाताओं में बदलाव की इच्छा पैदा हो गई प्रतीत होती है। इस चुनाव में स्थानीय मुद्दे भी हावी रहे। विपक्ष ने पूर्व घोषित उम्मीदवार के अकस्मात बदलाव, बूथ प्रबंधन, स्थानीय संगठन और मतदान प्रतिशत जैसे कारक को भी उछाला, जो निर्णायक भूमिका निभाए। जबकि शहरी मतदाता का बदलता रुझान भाजपा पर भारी पड़ गया। शिक्षित और युवा मतदाताओं ने परिवर्तन के पक्ष में मतदान किया, क्योंकि यूजीसी बिल का सर्वाधिक प्रभाव उन्हीं पर पड़ता। इसलिए इन बातों का प्रभाव परिणाम पर पड़ा है।</div><div><br></div><div>पहले सीजेपी द्वारा केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे स्वीकार करवाना और अब जेएसपी के प्रशांत किशोर द्वारा भाजपा का मजबूत गढ़ तोड़ दिया जाना बहुत कुछ संकेत दे रहा है, जो यह साबित करता है कि उनकी पार्टी केवल वैचारिक मंच नहीं, बल्कि चुनाव जीतने की क्षमता भी रखती है। वहीं, अब बिहार और देश की राजनीति में त्रिकोणीय मुकाबले की संभावना बढ़ चुकी है, क्योंकि जन सुराज पार्टी अब एक स्थायी ताकत बन चुकी है। भविष्य के चुनावों में मुकाबला केवल एनडीए बनाम महागठबंधन तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि तीसरा गुट भी बनेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>यही नहीं, भाजपा को अब अपने पारंपरिक शहरी और सवर्ण वोट बैंक की समीक्षा भी करनी पड़ेगी, क्योंकि उसके शहरी गढ़ में ही सेंध लगी है। लिहाजा पार्टी यह जानने का प्रयास अवश्य करेगी कि क्या पराजय का कारण&nbsp; उम्मीदवार बदलने से उपजा अंदरूनी रोष, संगठन की अंदरूनी खींचातानी, स्थानीय मुद्दे या मतदाताओं की प्राथमिकताओं में बदलाव तो नहीं था। क्या बिहार में संगठन बनाम चेहरे की बहस तेज होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>यहां पर यह चर्चा भी होगी कि क्या मजबूत संगठन हमेशा निर्णायक है, या प्रभावशाली स्थानीय नेतृत्व और अभियान भी स्थापित दलों को चुनौती दे सकते हैं? क्या भाजपा 2030 के विधानसभा चुनाव की रणनीतियाँ बदल सकती है? क्या सभी प्रमुख दल उम्मीदवार चयन, सामाजिक समीकरण, शहरी मतदाताओं और युवा वोटरों को लेकर अपनी अपनी रणनीति की समीक्षा करेंगे? इसलिए, बांकीपुर का परिणाम केवल एक सीट का परिणाम नहीं माना जाएगा; बल्कि इसे बिहार की बदलती राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के संकेत के रूप में भी देखा जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>भाजपा की हार के पीछे निम्नलिखित संभावित कारण हो सकते हैं, जैसे: एक, परंपरागत भाजपा मतदाताओं के एक हिस्से का जन सुराज की ओर जाना। दो, शहरी, युवा और बदलाव चाहने वाले मतदाताओं का रुझान बदलना। तीन, कम मतदान प्रतिशत का भाजपा के संगठनात्मक लाभ को कम कर देना। और चार, उम्मीदवार, स्थानीय मुद्दे और चुनावी रणनीति का प्रभाव। चूंकि एग्जिट पोल और कुछ चुनाव-पूर्व विश्लेषणों में यह दावा किया गया था कि सवर्ण मतों का एक हिस्सा प्रशांत किशोर की ओर जाने के संकेत हैं, वह बात अब सच प्रतीत होती है।</div><div><br></div><div>बताया जाता है राष्ट्रीय अध्यक्ष की सोच व समझ पर भी इस चुनाव का असर पड़ेगा, क्योंकि बांकीपुर जैसी लंबे समय से भाजपा की सीट के उनके हाथ से निकलते ही संगठन की चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और स्थानीय नेतृत्व पर सवाल उठ चुके हैं। लेकिन केवल एक उपचुनाव की हार से राष्ट्रीय अध्यक्ष की स्थिति पर बड़ा असर पड़ना तय नहीं माना जाता। पार्टी आमतौर पर कई चुनावों के समग्र प्रदर्शन के आधार पर ही संगठनात्मक निर्णय लेती है।</div><div><br></div><div>जहाँ तक मुख्यमंत्री पर असर की बात है तो, चूँकि यह चुनाव राज्य सरकार के कार्यकाल के दौरान हुआ है, इसलिए विपक्ष इसे सरकार के कामकाज पर जनमत के रूप में पेश कर सकता है। चूंकि हार का अंतर बड़ा है और भाजपा के पारंपरिक क्षेत्रों में भी गिरावट दिखी है, इसलिए सरकार की रणनीति, संगठन और सामाजिक समीकरणों की समीक्षा हो सकती है।</div><div><br></div><div>वहीं आगामी बिहार विधानसभा चुनाव पर भी इसका असर पड़ेगा, क्योंकि यह परिणाम व्यापक जनरुझान का संकेत प्रतीत होता है, जो भाजपा और एनडीए को उम्मीदवार चयन, सामाजिक गठबंधन, स्थानीय मुद्दों और चुनावी संदेश में बदलाव करने की जरूरत की चुगली कर रहा हैं। वहीं, यदि इसे केवल स्थानीय परिस्थितियों वाला परिणाम माना जाता है, तो इसका प्रभाव सीमित भी रह सकता है।</div><div><br></div><div>इसलिए बांकीपुर के परिणाम ने राजनीतिक संदेश अवश्य दिया है, लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष या मुख्यमंत्री की स्थिति पर उसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टी नेतृत्व इस हार के कारणों का क्या आकलन करता है और आने वाले चुनावों में उसका प्रदर्शन कैसा रहता है। इतना तय है कि भाजपा की चुनावी हार आमतौर पर कई सामाजिक, राजनीतिक और संगठनात्मक कारणों के संयुक्त प्रभाव के चलते हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि भाजपा का पारंपरिक वोट अपेक्षा से कम निकला है, इसलिए संगठनात्मक समन्वय, बूथ प्रबंधन और कार्यकर्ताओं की सक्रियता पर सवाल उठते हैं। भाजपा ने बूथ स्तर पर व्यापक संगठनात्मक तैयारी की थी और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को लगाया था। फिर भी इस चुनाव में कम मतदान, त्रिकोणीय मुकाबला, युवा मतदाताओं का रुझान, स्थानीय मुद्दे और विपक्ष की रणनीति जैसे कई अन्य कारकों के चलते उसे पराजय का सामना करना पड़ा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 18:10:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/after-all-why-how-and-because-of-whom-did-the-bjp-lose-the-bankipur-by-election-bihar-asks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ब्राह्मण वोट बैंक के लिए योगी और अखिलेश आमने-सामने, अखिलेश के 'PD मतलब पंडित' वाले बयान ने बिछाई नई सियासी बिसात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/up-politics-yogi-vs-akhilesh-brahmin-politics-pda-formula]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले योगी बनाम अखिलेश की सियासत अब सीधे जातीय समीकरणों के अखाड़े में उतर चुकी है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जहां समाजवादी पार्टी के PDA की नई-नई राजनीतिक व्याख्याएं गढ़ते हुए कभी इसे "परिवार डेवलपमेंट अथॉरिटी" तो कभी "प्रोडक्शन हाउस ऑफ दंगाई एंड अपराधी" बताते हैं, वहीं अब अखिलेश यादव ने उसी PDA का नया अर्थ निकालकर भाजपा को उसी के अंदाज में जवाब दिया है। अखिलेश ने तंज कसते हुए कहा कि "PDA में PD का मतलब पंडित है।" यानी जिस नारे को भाजपा लगातार निशाने पर ले रही थी, उसे सपा प्रमुख ने ब्राह्मण राजनीति के नए दरवाजे में बदलने की कोशिश कर दी।</div><div><br></div><div>दरअसल, समाजवादी नेता जनेश्वर मिश्र की जयंती पर लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध समाज सम्मेलन श्रद्धांजलि से ज्यादा राजनीतिक संदेश का मंच बन गया। अखिलेश यादव ने जनेश्वर मिश्र को समाजवादी आंदोलन का बड़ा चेहरा बताते हुए ब्राह्मण समाज को सम्मान देने का संदेश दिया और साफ संकेत दिया कि 2027 की लड़ाई में सपा सिर्फ पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यकों तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ब्राह्मण मतदाताओं को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/yogi-lashes-out-over--uproar-in-legislative-assembly-sp-has-no-faith-in-constitution" target="_blank">विधानसभा में बवाल पर भड़के योगी, बोले- सपा को संविधान पर भरोसा नहीं, राम मंदिर विवाद पर कही बड़ी बात</a></h3><div>अखिलेश ने योगी सरकार पर कई मोर्चों से हमला बोला। उन्होंने बिना नाम लिए विकास दुबे एनकाउंटर का जिक्र करते हुए कहा कि "जिस दिन गाड़ी पलटी थी, उस दिन गाड़ी नहीं, सरकार पलटने से बच गई थी।" इतना ही नहीं, उन्होंने दावा किया कि समय आने पर "सैटेलाइट इमेज" सामने आएगी, जिससे पूरी कहानी साफ हो जाएगी। राम मंदिर में चढ़ावे के कथित गड़बड़ी के मुद्दे को उठाते हुए भी उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि हिंदू धर्म में दान की रसीद नहीं मांगी जाती, लेकिन अब रसीदों की राजनीति हो रही है। स्वास्थ्य व्यवस्था, प्रशासनिक कार्यशैली और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को भी उन्होंने भाजपा सरकार के खिलाफ हथियार बनाया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ब्राह्मणों को लेकर अखिलेश का यह नया दांव इसलिए भी अहम माना जा रहा है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में यह वर्ग लंबे समय तक सत्ता की धुरी रहा है। आजादी के बाद शुरुआती दशकों में ब्राह्मण मतदाता मुख्य रूप से कांग्रेस के साथ रहे। मंडल-कमंडल की राजनीति के दौर में उनका बड़ा हिस्सा भाजपा की ओर चला गया और राम मंदिर आंदोलन ने इस रिश्ते को और मजबूत किया। हालांकि 2007 में मायावती ने "ब्राह्मण-दलित सोशल इंजीनियरिंग" के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाकर यह साबित कर दिया था कि ब्राह्मण वोट पूरी तरह किसी एक दल की स्थायी जागीर नहीं हैं। लेकिन राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उभार के बाद से ही यह वर्ग भाजपा के साथ रहा लेकिन तमाम कारणों के चलते ब्राह्मण भाजपा से नाराज बताये जा रहे हैं जिसके चलते अब एक बार फिर यही वर्ग सभी राजनीतिक दलों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि बहुजन समाज पार्टी भी इस मुकाबले में पीछे नहीं है। मायावती पहले ही ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट देने और उन्हें सम्मानजनक भागीदारी देने की रणनीति का ऐलान कर चुकी हैं। उनका दावा है कि ब्राह्मणों सहित सवर्ण समाज के हित सबसे सुरक्षित बसपा में हैं और 2007 जैसा समीकरण दोबारा बन सकता है। ऐसे में साफ है कि 2027 के चुनाव में ब्राह्मण वोटों के लिए भाजपा, सपा और बसपा के बीच त्रिकोणीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा देखने को मिलेगी।</div><div><br></div><div>उधर, उत्तर प्रदेश विधानसभा का मानसून सत्र भी इसी राजनीतिक तल्खी की भेंट चढ़ गया। विपक्ष के लगातार हंगामे के बीच सदन अनिश्चितकाल के लिए स्थगित हो गया। सत्र समाप्त होने के बाद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समाजवादी पार्टी पर लोकतंत्र और विकास विरोधी राजनीति करने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि विपक्ष ने अनुपूरक बजट, शिक्षामित्रों और अनुदेशकों के मानदेय बढ़ाने जैसे जनहित के मुद्दों पर चर्चा तक नहीं होने दी। योगी ने दावा किया कि उनकी सरकार ने शिक्षामित्रों और अनुदेशकों का मानदेय बढ़ाने के साथ पांच लाख रुपये तक की कैशलेस स्वास्थ्य सुविधा भी उपलब्ध कराई है, लेकिन विपक्ष का मकसद केवल व्यवधान पैदा करना था।</div><div><br></div><div>बहरहाल, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब नारे भी हथियार हैं और उनकी परिभाषाएं भी। योगी हर मौके पर PDA की नई व्याख्या गढ़कर सपा पर हमला बोल रहे हैं, तो अखिलेश उसी PDA में "पंडित" जोड़कर भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगाने की कोशिश कर रहे हैं। मायावती भी ब्राह्मण कार्ड खेल चुकी हैं। ऐसे में यह साफ है कि अगले साल का विधानसभा चुनाव सिर्फ विकास और कानून-व्यवस्था पर नहीं, बल्कि नारों, जातीय समीकरणों और राजनीतिक प्रतीकों की जंग पर भी लड़ा जाएगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:29:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/up-politics-yogi-vs-akhilesh-brahmin-politics-pda-formula</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर की जीत के सियासी मायने चौंकाने वाले]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जन सुराज पार्टी के संस्थापक व मशहूर चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार नीरज कुमार को लगभग 19 हजार वोटों से तगड़ी शिकस्त देकर न केवल चुनाव जीता, बल्कि राजनीतिक पंडितों को भी चौंका दिया। प्रशांत किशोर की यह जीत केवल एक सीट की जीत नहीं मानी जा रही, बल्कि बिहार की राजनीति में एक महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखी जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा इसलिए कि प्रशांत किशोर ने भाजपा के तीन दशक से अधिक पुराने गढ़ में अकल्पनीय जीत दर्ज की है और अपनी जन सुराज पार्टी को पहली बड़ी चुनावी सफलता दिलाई है। हालांकि, एक उपचुनाव के परिणाम के आधार पर पूरे राज्य के चुनाव के जनादेश का संकेत मान लेना एक बड़ी सियासी गलतफहमी होगी। फिर भी, उनकी यह जीत कई कारणों से महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि जन सुराज पार्टी के सुप्रीमो प्रशांत किशोर ने बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार को 18,953 वोटों के भारी अंतर से हराया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/bihar-bypoll-message-for-bjp-core-vote-bank-prashant-kishor-bankipur-analysis" target="_blank">Core Vote Bank पाला बदलने पर यूँ ही मजबूर नहीं होता, ये बात BJP को समझ आ गयी होगी</a></h3><div>लिहाजा, बांकीपुर उपचुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह है कि, बिहार की राजनीति अब केवल एनडीए बनाम महागठबंधन की दोध्रुवीय प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि जन सुराज ने स्वयं को एक संभावित तीसरे विकल्प के रूप में स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा बड़ा संदेश यह कि, जनसुराज पार्टी की नई जीत जहाँ भाजपा नीत एनडीए के लिए इस अकल्पनीय पराजय के बाद संगठन और रणनीति की समीक्षा का गहरा अवसर पैदा करता है। वाकई प्रशांत किशोर की जीत भाजपा के लिए स्पष्ट चेतावनी भी है, क्योंकि बांकीपुर जैसी भाजपा की पारंपरिक सीट का उसके हाथ से एक झटके में निकल जाने से यह साफ संकेत मिलता है कि चुनाव जीतने के लिए केवल संगठनात्मक मजबूती ही पर्याप्त नहीं है; बल्कि स्थानीय मुद्दे, उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और मतदाता की अपेक्षाएं भी निर्णायक हो सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा बड़ा संदेश यह कि, इस अकल्पनीय जीत से जन सुराज पार्टी को राजनीतिक वैधता मिली है। अब जन सुराज को केवल एक अभियान नहीं, बल्कि चुनाव जीतने में सक्षम राजनीतिक दल के रूप में देखा जाएगा। वाकई जिस चुनौती भरे सियासी परिदृश्य में प्रशांत किशोर ने अपनी जीत का परचम लहराया है और भाजपा के लंबे समय से सुरक्षित माने जाने वाले बांकीपुर के गढ़ में 30 साल बाद ही सही, पर सेंध लगा डाली है; वह नवोदित पार्टी के लिए एक अहम उपलब्धि है। इससे भाजपा का मनोबल टूटने के पुष्ट संकेत मिले हैं।</div><div><br></div><div>चौथा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी की पहली चुनावी जीत का सेहरा खुद पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर के सिर पर ही बंधा है और वो अपना पहला चुनाव लड़कर ही विधायक बनकर विधान सभा पहुंच चुके हैं, जिससे बिहार की राजनीति में नई हलचल पैदा करने के उनके मिशन को काफी बल मिला है। यही वजह है कि प्रशांत किशोर की नई भूमिका की चर्चा अब शुरू हो चुकी है, क्योंकि चुनावी रणनीतिकार से विधायक बनने के बाद उन्हें विधानसभा के भीतर अपनी राजनीति और वैकल्पिक नीतियों को सीधे प्रस्तुत करने का अवसर मिलेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां बड़ा संदेश यह कि, जहाँ तक 2026 में हुए बांकीपुर बिहार विधानसभा उप चुनाव के मनोवैज्ञानिक प्रभाव की बात है तो यह परिणाम जन सुराज पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाएगा और आगामी चुनावों में उम्मीदवारों व समर्थकों को आकर्षित कर सकता है। चूंकि वर्ष 2025 के विधानसभा चुनावों में शुरुआती धमाल मचाने के बाद प्रशांत किशोर की रणछोड़ रणनीतिकार और बुजदिल राजनेता वाली जो छवि बनी थी, अब उससे उन्हें मुक्ति मिली है और वह एक जुझारू राजनेता के रूप में उभरे हैं।</div><div><br></div><div>छठा बड़ा संदेश यह कि, जन सुराज पार्टी और प्रशांत किशोर के इस सियासी उभार से एक नई युवा और शहरी राजनीति के संकेत मिले हैं, क्योंकि चुनाव प्रचार में रोजगार, शिक्षा और सुशासन जैसे मुद्दों पर विशेष जोर दिया गया। इस प्रकार यदि यह रुझान अन्य क्षेत्रों में भी दिखता है, तो इससे बिहार की चुनावी राजनीति में मुद्दा-आधारित प्रतिस्पर्धा और मजबूत हो सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां बड़ा संदेश यह कि, विपक्षी राजनीति भी अब एक नई करवट लेगी। उसे एक नया सकारात्मक विकल्प मिलेगा। बांकीपुर उपचुनाव में जिस तरह से राजद नीत महागठबंधन का वोट बैंक जनसुराज की ओर यकायक शिफ्ट हुआ, यह उसके समक्ष भी अपने जनाधार को मजबूत बनाए रखने की एक तगड़ी चुनौती समुपस्थित करता है। इससे राजद और महागठबंधन के सामने भी अब एक नई चुनौती खड़ी होगी, क्योंकि यदि जन सुराज पार्टी आगे भी विपक्षी मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करती है, तो इससे राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के लिए विपक्ष का निर्विवाद केंद्र बने रहना कठिन हो सकता है। ऐसा इसलिए भी कि बांकीपुर में राजद तीसरे स्थान पर रही।</div><div><br></div><div>आठवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार जैसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील प्रांत में भाजपा की यह पराजय उसके नेताओं की आपसी रस्साकशी का निराशाजनक परिणाम तो है ही, लेकिन उलजुलूल समीकरणों को साधने की उसकी राजनीतिक फितरत, और इसके चक्कर में बिगड़ैल बोलों पर बरती गई रणनीतिक खामोशी का यह साइड इफ़ेक्ट्स भी समझा जा सकता है। यह घटनाक्रम पुनः भाजपा को खुली नसीहत देता है कि यदि बनावटी 'ओबीसी राजनीति' के चक्कर में वह अपनी मूल राजनीतिक सवर्ण सियासी पूंजी भी न गंवा बैठे, जो कि कांग्रेस की ऐसी ही क्षुद्र सियासत से आजिज आकर भाजपा की ओर 1990 के दशक में शिफ्ट हुआ था, और अब विकल्प मिलते ही भाजपा की क्षुद्र सियासी चाल को भी नया राजनीतिक पाठ पढ़ाने पर आमादा दिखता है।</div><div><br></div><div>नवां बड़ा संदेश यह कि, बिहार में सत्ता मिलते ही नवभाजपाइयों यानी राजद से भाजपा में आए नागमणि जैसे सामाजिक विषधर नेताओं ने राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को धत्ता बताकर बैकवर्ड-फॉरवर्ड की जो लोहियावादी सियासत परवान चढ़ानी चाही, उसका साइड इफेक्ट्स भी&nbsp;</div><div>बांकीपुर उपचुनाव में दिखा है। क्योंकि भरत तिवारी एनकाउंटर को जातिवादी नजरिए से देखना और वैसी ही गोलबंदी को परोक्ष शह देकर बैकफुट पर लौटने से सवर्णों के बीच गलत संदेश गया है। इसलिए भाजपा के ओबीसी-दलित नेताओं को धुर सवर्ण विरोधी मानसिकता से बचना होगा, अन्यथा प्रतिक्रिया वश सवर्ण यदि ओबीसी की राजद और दलितों की लोजपा रामविलास को सियासी शह दे देंगे तो भाजपा के ओबीसी-दलित नेता न घर के रहेंगे, न घाट के।</div><div><br></div><div>दसवां बड़ा राजनीतिक संदेश और स्वाभाविक सवाल यह है कि भाजपा के 'पैराशूट' राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन द्वारा खाली की गई इस प्रतिष्ठित सीट पर बीजेपी चुनाव कैसे और क्यों हारी? क्या इसके पीछे भी उसकी कोई बड़ी रणनीति है या फिर अपने बड़े नेताओं के खिलाफ हुई भितरघात की वजह से भाजपा को यह शर्मनाक पराजय झेलनी पड़ी। चूंकि ऐसा माना जाता है कि कोई भी सत्ताधारी पार्टी प्रायः उपचुनाव नहीं हारती है, इसलिए यदि भाजपा हारी है तो इससे भी कई बड़े सवाल उपजते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या बांकीपुर में हुई चुनावी हार भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार की हार नहीं, बल्कि राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी, पूर्वमुख्यमंत्री नीतीश कुमार, और बड़बोले केंद्रीय मंत्री गण चिराग पासवान, जीतनराम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा की संयुक्त हार है, क्योंकि सबने एक दूसरे के साथ सियासी घात-प्रतिघात किया है, ताकि सूबाई राजनीति में गठबंधन साथियों की प्रासंगिकता बनी रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस नजरिए से यह एनडीए के उन सूबाई सहयोगियों की भी हार है जो भाजपा के आधार वोट बैंक से अपने चुनाव दर चुनाव तो जीतते हैं, और फिर जीत के बाद मंत्री बनकर भी भाजपा के ही कोर सवर्ण वोटर्स को चिढ़ाने वाली (राजद/कॉंग्रेस वाली) भड़काऊ टिप्पणी शुरू कर देते हैं, जिस पर भाजपा की खामोशी उसकी ओबीसी-दलित परस्त राजनीति के समक्ष घुटने टेकते प्रतीत होती है। इससे उसका प्रतिबद्ध सवर्ण कैडर इधर उधर भागने के विकल्प ढूंढता है और वह मिलते ही भाजपा को उसकी असली सियासी औकात समझा देता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि महज एक उपचुनाव के परिणाम से आप पूरे बिहार विधानसभा चुनाव 2030 का पूर्वानुमान नहीं लगा सकते; बल्कि इसके व्यापक निष्कर्ष के लिए आगे के संसदीय आम चुनाव 2029 के चुनावी रुझानों को भी देखना समझना दिलचस्प होगा।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 18:20:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/political-implications-of-prashant-kishor-victory-in-the-bankipur-by-election-are-startling</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बृजभूषण शरण सिंह के बाइज्जत बरी होने से उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में कई सारे समीकरण बदलने वाले हैं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/brij-bhushan-sharan-singh-acquitted-delhi-court-wfi-case]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>करीब तीन वर्षों तक देश की राजनीति, खेल जगत और मीडिया के केंद्र में रहे पूर्व भारतीय कुश्ती महासंघ (डब्ल्यूएफआई) अध्यक्ष एवं पूर्व भाजपा सांसद बृजभूषण शरण सिंह को आखिरकार दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत से बड़ी राहत मिल गई। महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में अदालत ने उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया। वैसे बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों के समर्थन में जिस तरह तमाम विपक्षी नेता खड़े हो गये थे उसके चलते यह सब कुछ शुरू से ही राजनीतिक षड्यंत्र नजर आ रहा था। उल्लेखनीय है कि जंतर मंतर पर पहलवानों का धरना प्रदर्शन कराया गया था और धरने के मंच पर तमाम बड़े विपक्षी नेता पहुँचे थे और मंच से दिये गये भाषणों के जरिये भाजपा को महिला विरोधी बताया जा रहा था। साथ ही बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ देशभर में माहौल बनवाने और मीडिया ट्रायल के जरिये उनकी छवि बिगाड़ने के तमाम प्रयास किये गये थे। आरोप लगाने वाले पहलवानों ने अपने मेडल गंगा में बहाने तक की नौटंकी भी की थी ताकि जनता की सहानुभूति अर्जित की जा सके और हरियाणा विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को जिताया जा सके। लेकिन साच का आंच नहीं वाली कहावत सही सिद्ध हुई और बृजभूषण सभी आरोपों से बाइज्जत बरी हो गये।</div><div><br></div>
<div>हम आपको बता दें कि दिल्ली की राउज एवेन्यू अदालत ने महिला पहलवानों द्वारा दर्ज यौन उत्पीड़न मामले में बृजभूषण शरण सिंह और तत्कालीन डब्ल्यूएफआई सहायक सचिव विनोद तोमर को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। इस फैसले ने न केवल तीन वर्षों से चल रहे कानूनी विवाद का एक महत्वपूर्ण अध्याय समाप्त किया है, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में भी नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है।</div>
<h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/first-opposition-to-the-ram-mandir-now-questions-over-donations-yogi-slams-sp-double-standards" target="_blank">पहले Ram Mandir विरोध, अब चंदे पर सवाल! Yogi ने SP के दोहरे रवैये पर बोला हमला</a></h3><div>उधर, फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह ने कहा कि उन्हें शुरू से अपने ऊपर लगे आरोपों पर भरोसा नहीं था। उन्होंने कहा कि उनकी पहली प्रतिक्रिया यही थी कि यदि आरोप सही साबित हुए तो वह स्वयं फांसी पर चढ़ जाएंगे, लेकिन आज का दिन उनके लिए प्रसन्नता का विषय है। वहीं, सरकारी पक्ष ने कहा है कि विस्तृत निर्णय मिलने के बाद उसका अध्ययन किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर उच्च अदालत में आगे की कानूनी कार्रवाई पर विचार किया जाएगा।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि यह मामला अप्रैल 2023 में तब शुरू हुआ था, जब दिल्ली के कनॉट प्लेस थाने में छह महिला पहलवानों की शिकायत पर एफआईआर दर्ज की गई थी। इसी दौरान एक नाबालिग की शिकायत पर पॉक्सो कानून के तहत भी अलग मामला दर्ज हुआ था। जून 2023 में दिल्ली पुलिस ने करीब 1500 पन्नों की चार्जशीट दाखिल की थी, जिसमें चार राज्यों के 22 गवाहों के बयान शामिल थे। बाद में नाबालिग शिकायतकर्ता और उसके पिता ने अपने आरोप वापस ले लिए थे। पुलिस ने अदालत से पॉक्सो मामला समाप्त करने का अनुरोध किया था जिसे मई 2025 में अदालत ने स्वीकार कर लिया था।</div><div><br></div><div>मई 2024 में अदालत ने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की संबंधित धाराओं के तहत आरोप तय किए थे। मुकदमे के दौरान अभियोजन पक्ष ने कुल 32 गवाह पेश किए। बचाव पक्ष ने अदालत में दलील दी कि शिकायतकर्ताओं के बयानों में समय, स्थान और घटनाओं को लेकर कई बदलाव हुए तथा कुछ घटनाओं के समय आरोपी घटनास्थल पर मौजूद ही नहीं थे। बचाव पक्ष ने शिकायत दर्ज कराने में सात-आठ वर्ष की देरी का मुद्दा भी उठाया।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, अभियोजन पक्ष का कहना था कि पीड़िताओं के बयान मुकदमे के दौरान लगातार एक जैसे रहे और अन्य गवाहों ने भी उनका समर्थन किया। शिकायतकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता रेबेका जॉन ने अदालत में तर्क दिया कि शक्ति के असंतुलन और खेल संघ के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति के प्रभाव के कारण शिकायत दर्ज कराने में देरी स्वाभाविक थी। हालांकि, अंततः अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर बृजभूषण शरण सिंह और विनोद तोमर को बरी कर दिया।</div><div><br></div><div>यूपी चुनाव पर क्या हो सकता है असर?</div><div><br></div><div>उधर, इस फैसले का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं माना जा रहा। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला पहलवानों के आंदोलन और बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों ने भाजपा को असहज स्थिति में ला दिया था। पार्टी को विपक्ष के लगातार हमलों का सामना करना पड़ा और अंततः कैसरगंज से बृजभूषण की जगह उनके पुत्र करण भूषण सिंह को चुनाव मैदान में उतारा गया था। अब अदालत से बरी होने के बाद भाजपा के लिए यह फैसला राजनीतिक दृष्टि से राहत देने वाला माना जा रहा है, खासकर ऐसे समय में जब अगले वर्ष उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं।</div><div></div><div>हम आपको बता दें कि बृजभूषण शरण सिंह का प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र के कई जिलों में लंबे समय से माना जाता है। गोण्डा, बहराइच, बलरामपुर, श्रावस्ती तथा आसपास के क्षेत्रों में उनकी मजबूत राजनीतिक पकड़, सामाजिक नेटवर्क और शैक्षणिक संस्थानों के माध्यम से व्यापक जनसंपर्क रहा है। ऐसे में उनके बरी होने के बाद इन क्षेत्रों में भाजपा की चुनावी संभावनाएं और मजबूत होने की चर्चा राजनीतिक हलकों में शुरू हो गई है। माना जा रहा है कि उनके समर्थकों में नया उत्साह आएगा और इसका लाभ भाजपा उम्मीदवारों को मिल सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, इस फैसले के बाद भाजपा नेतृत्व के सामने एक नई चुनौती भी उभर सकती है। माना जा रहा है कि अदालत के फैसले के बाद बृजभूषण शरण सिंह का राजनीतिक प्रभाव देवीपाटन मंडल और अवध क्षेत्र में और बढ़ेगा इसके चलते विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों के चयन में उनकी राय और पसंद को भी महत्व देना पड़ सकता है। स्थानीय राजनीति में उनका प्रभाव देखते हुए पार्टी के लिए संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों की नजर एक और पहलू पर भी है। हाल ही में उत्तर प्रदेश मंत्रिमंडल विस्तार के दौरान बृजभूषण शरण सिंह ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जताई थी क्योंकि उनके विधायक पुत्र प्रतीक भूषण सिंह को मंत्री नहीं बनाया गया था। अब अदालत से राहत मिलने के बाद यह अटकलें भी तेज हो सकती हैं कि भविष्य में संगठन या सरकार में उनके परिवार की राजनीतिक भूमिका और मजबूत हो। हालांकि, इस संबंध में भाजपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दिल्ली की अदालत का यह फैसला केवल एक चर्चित आपराधिक मुकदमे का निष्कर्ष नहीं है, बल्कि उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीतिक तस्वीर का भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। जहां कानूनी मोर्चे पर बृजभूषण शरण सिंह को बड़ी राहत मिली है, वहीं इसके राजनीतिक प्रभावों पर अब सभी दलों की नजरें टिकी रहेंगी।</div><div></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 14:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/brij-bhushan-sharan-singh-acquitted-delhi-court-wfi-case</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[जानिए, भारत ने पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में हो रहे सरकारी दमन के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप और जवाबदेही तय करने का आह्वान क्यों किया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/key-diplomatic-implications-of-the-steps-taken-regarding-the-ongoing-movement-in-pok]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत द्वारा पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK/PoJK) में कथित सरकारी दमन पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय से हस्तक्षेप और जवाबदेही की अपील केवल एक मानवीय बयान नहीं, बल्कि एक बहु-स्तरीय कूटनीतिक रणनीति भी मानी जा रही है। हाल के दिनों में भारत ने पाकिस्तान से क्षेत्र में नागरिकों के साथ हुए कथित दमन पर जवाबदेही तय करने की मांग की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल किसी भी तानाशाह देश में जब चुनाव भरोसे का संकट बन जाए, तो जनता का उद्वेलित होना स्वाभाविक है। पाक अधिकृत कश्मीर/जम्मू-कश्मीर में आजकल यही हो रहा है।वहां पर इन दिनों एक ही नारा गूंज रहा है, वह यह कि&nbsp; "Justice for PoJK, End Our Exile!" अर्थात "POJK के लिए न्याय, हमारा निर्वासन समाप्त करो!" यही वजह है कि भारत ने पाक अधिकृत कश्मीर (PoK/PoJK) में सरकारी दमन रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय से&nbsp; अपील की है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/zubair-baloch-shot-in-karachi-lyari-gang-war" target="_blank">Dhurandhar Style में Lyari की सड़कों पर बहा खून, Gangster Uzair Baloch के भाई Zubair को गोलियों से भून डाला</a></h3><div>भारत की यह अपील वहां के हालात के मद्देनजर बिल्कुल सही वक्त पर उठाया हुआ उचित कदम है। इससे वहां के आंदोलनकारियों को कूटनीतिक ऑक्सीजन मिली है। यदि बलूच विद्रोहियों का उन्हें साथ मिल जाये तो सोने पर सुहागा समझिए। भारत की सहानुभूति दोनों पक्षों से है। हालांकि, अंतर्राष्ट्रीय कूटनीतिक मर्यादा के चलते भारत खुलकर इनका साथ नहीं दे सकता है, जबकि मानवता और लोकतंत्र के नाम पर वह पाकिस्तानी हुक्मरानों को घेर सकता है। इसलिए भारत ने वही किया है, जो सबके लिए उचित है।</div><div><br></div><div>वैश्विक दुनियादारी के नकाबपोशों के नकाब उतारने के लिए भारत ने अंतर्राष्ट्रीय विरादरी से साफ कहा है कि पाकिस्तानी सरकार की कार्रवाई में PoK में 40 नागरिकों की मौत हुई है, जबकि वहां लोग शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे थे। उल्लेखनीय है कि यह मामला वहां हो रहे चुनावों से जुड़ा है। पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में 45 सीटों के लिए असेंबली इलेक्शन हो रहे हैं। ये चुनाव तीन चरणों में कराए जा रहे हैं, जो 10 अगस्त को पूरे होंगे। यहां विधानसभा की 53 सीटें हैं। इनमें से 45 पर सीधा चुनाव होता है, जबकि 8 सीटें महिलाओं, टेक्नोक्रैट्स और धर्मगुरुओं के लिए आरक्षित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी चुनाव में हुई जबरदस्त धांधली के बाद पीओके की जनता भड़क गई है। गत 27 जुलाई को पहले चरण का चुनाव हुआ, जिसमें पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज) ने 13 में से 9 सीटें जीतीं, बाकी 4 सीटें पाकिस्तान पीपल्स पार्टी को मिलीं। इस चरण में जबरदस्त धांधली हुई। यह बात भी किसी से छिपी हुई नहीं है कि पाकिस्तान ने इस क्षेत्र की हमेशा से ही उपेक्षा की है। लिहाजा वहां प्रदर्शन हो रहे हैं। दरअसल, ये प्रदर्शन उन 12 सीटों को लेकर हो रहे हैं, जो प्रवासियों के लिए आरक्षित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसकी अगुआई जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) नाम का सिविल सोसाइटी ग्रुप कर रहा है। जॉइंट अवामी एक्शन कमिटी (JAAC) का कहना है कि इस्लामाबाद सरकार इन सीटों पर धांधली कर अपने लोग बिठाती है ताकि पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) असेंबली पर उसका कंट्रोल बना रहे। इस आरोप में दम है क्योंकि जो पार्टी पाकिस्तान पर हुकूमत करती है, वही अक्सर पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) चुनाव जीतती है। ,चूंकि पिछले दो महीने से पाक अधिकृत कश्मीर (PoK) में जबरदस्त आर्थिक परेशानी बढ़ी। इसलिए पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में लोगों के गुस्से बढ़े हुए हैं।</div><div><br></div><div>वास्तव में, इसकी वजहें सिर्फ चुनावी धांधली ही नहीं हैं, बल्कि आर्थिक दुश्वारियों की वजह से भी उनका गुस्सा परवान चढ़ा हुआ है। चूंकि स्थानीय लोगों के अधिकार और भी सीमित किए जा रहे हैं, इसलिए भी लोग बौखलाए हुए हैं। खबरें तो ये भी हैं कि सरकारी बंदिशों की वजह से ही इलाके में लोगों को सब्सिडाइज्ड गेहूं और जरूरी दवाइयां नहीं मिल पा रही हैं। वहीं, बिजली कटौती को लेकर भी लोगों में गुस्सा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पाक अधिकृत कश्मीर की नदियों पर बने हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट्स से जो बिजली बनती है, वह यहां के लिए जरूरी 400 मेगावॉट से कहीं अधिक है। इसके बावजूद इलाके में 15-20 घंटों तक बिजली काटी जाती है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय समुदाय को तुरंत दखल देकर पाकिस्तान सरकार के दमन पर रोक लगानी चाहिए।</div><div><br></div><h2># भारत के इस कदम के प्रमुख कूटनीतिक मायने इस प्रकार हैं:-</h2><div><br></div><div>पहला, नैरेटिव का पलटवार: पाकिस्तान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जम्मू-कश्मीर का मुद्दा उठाता रहा है। भारत अब PoK में मानवाधिकार और शासन के प्रश्नों को प्रमुखता देकर यह संदेश दे रहा है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान पाकिस्तान के नियंत्रण वाले क्षेत्र की स्थिति पर भी जाना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, मानवाधिकार आधारित कूटनीति: भारत अपनी बात को केवल क्षेत्रीय दावे तक सीमित न रखकर मानवाधिकार, नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों के मुद्दे से जोड़ रहा है। इससे उसकी अपील व्यापक अंतरराष्ट्रीय विमर्श में अधिक स्वीकार्य बनाने का प्रयास दिखता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, पाकिस्तान पर अंतरराष्ट्रीय दबाव: यदि प्रमुख देश, संयुक्त राष्ट्र या मानवाधिकार संस्थाएं इस मुद्दे पर अधिक सक्रिय होती हैं, तो पाकिस्तान पर राजनीतिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है। हालांकि किसी बड़े अंतरराष्ट्रीय कदम की संभावना कई देशों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगी।</div><div><br></div><div>चौथा, PoK के लोगों के प्रति संदेश: भारत यह संकेत भी देता है कि वह PoK के निवासियों के अधिकारों और उनकी स्थिति पर सार्वजनिक रूप से आवाज उठा रहा है। इससे वहां के घटनाक्रम को लेकर भारत की आधिकारिक रुचि प्रदर्शित होती है।</div><div><br></div><div>पांचवां, द्विपक्षीय से वैश्विक विमर्श की ओर: यह रुख दर्शाता है कि भारत केवल भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संदर्भ में नहीं, बल्कि वैश्विक मानवाधिकार और जवाबदेही के मानकों के आधार पर भी इस विषय को प्रस्तुत करना चाहता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, इस रणनीति की सीमाएं भी हैं। कश्मीर से जुड़े मुद्दों पर अधिकांश देश संतुलित रुख अपनाते हैं और दोनों पक्षों से संयम की अपेक्षा करते हैं। इसलिए भारत की अपील से तत्काल कोई अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई होना निश्चित नहीं माना जा सकता, लेकिन इससे पाकिस्तान पर कूटनीतिक दबाव और वैश्विक चर्चा अवश्य बढ़ सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सुलगता सवाल है कि आखिर इस मसले पर दुनिया दखल क्यों दे, क्योंकि यह तो पहले ब्रिटिश और अब अमेरिकी शासकों द्वारा रचा गया और प्रोत्साहित किया गया खेल है, ताकि एशियाई देश परस्पर संघर्षरत रहें और अमेरिकी-यूरोपीय दाल यहां गलती रहे। पहले सोवियत संघ और अब रूस-चीन से अमेरिकी-यूरोपीय देशों को जो संयुक्त चुनौती मिल रही है, उसके दृष्टिगत भारत जैसे तटस्थ देश की नहीं, बल्कि पाकिस्तान जैसे दोगले देश की जरूरत अमेरिका को है, जो चीन के साथ मिलकर रूस/भारत के खिलाफ भी उसे भड़काता रहता है, क्योंकि यही अमेरिकी-यूरोपीय एजेंडा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>खासबात यह है कि भारत भले ही खुद को गुटनिरपेक्ष बताए, लेकिन अमेरिका-यूरोपीय देश उसे रूस का वफादार मित्र तथा चीन का चिर शत्रु समझते हैं। शायद इसी चीनी शत्रुता को भड़काकर वो अपना मकसद भी साधना चाहते हैं। लेकिन यहां भी भारत सधी चाल चलकर सबको हैरत में डाल देता है। इसलिए अब भारत को पीओके के बहाने घेरने की दुनियावी चाल चली गई है, जिसका अमेरिका-चीनी कुचक्र से गहरा नाता है। इस समस्या का समाधान अनुनय विनय से नहीं बल्कि शौर्य प्रदर्शन से किया जाना ही श्रेयस्कर होगा, ताकि पाकिस्तान-बंगलादेश से विदेशी खूंटों को उखाड़ फेंका जा सके।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 14:23:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/key-diplomatic-implications-of-the-steps-taken-regarding-the-ongoing-movement-in-pok</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आंदोलन की संस्कृतिः अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी आवश्यक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/culture-of-movement-not-just-rights-responsibility-is-also-necessary]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का लोकतंत्र केवल चुनावों की व्यवस्था नहीं है, बल्कि संवाद, असहमति और संवैधानिक मर्यादाओं का जीवंत तंत्र है। इस व्यवस्था में प्रत्येक नागरिक को अपनी मांगों और विचारों को शांतिपूर्ण ढंग से रखने का अधिकार प्राप्त है। संविधान ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार दिया है, लेकिन यह अधिकार कभी भी हिंसा, अराजकता, सार्वजनिक संपत्ति के विनाश या सुरक्षा बलों पर हमले का लाइसेंस नहीं बन सकता। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि वह विरोध को भी सम्मान देता है, किंतु विरोध की भी अपनी सीमाएं और जिम्मेदारियां होती हैं। हाल के वर्षों में कुछ आंदोलनों ने यह गंभीर प्रश्न खड़ा किया है कि क्या लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में कानून और व्यवस्था को चुनौती देना स्वीकार्य हो सकता है? यदि कोई प्रदर्शन बैरिकेड तोड़ने, पुलिस पर हमला करने, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाने अथवा संसद जैसे सर्वोच्च लोकतांत्रिक संस्थान की ओर जबरन बढ़ने का प्रयास करे, तो सरकार और सुरक्षा एजेंसियों से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे केवल मूकदर्शक बनी रहें। राज्य का पहला दायित्व नागरिकों की सुरक्षा और संवैधानिक संस्थाओं की रक्षा करना है।</div><div><br></div><div>सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पैलेट गन के उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने से इनकार करते हुए यह कहना कि असाधारण परिस्थितियों में इसका प्रयोग किया जा सकता है, इसी संतुलित दृष्टिकोण का परिचायक है। न्यायालय ने किसी भी प्रकार के असीमित बल प्रयोग को उचित नहीं ठहराया, बल्कि यह स्पष्ट संकेत दिया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए राज्य के पास आवश्यक साधन भी होने चाहिए। यदि सुरक्षा बलों से हर प्रभावी उपाय छीन लिया जाएगा, तो हिंसक भीड़ पर नियंत्रण कैसे स्थापित होगा? यह प्रश्न केवल सरकार का नहीं, बल्कि पूरे समाज का है। इसका अर्थ यह नहीं कि पुलिस या सुरक्षा एजेंसियों को असीमित अधिकार मिल जाने चाहिए। लोकतंत्र में प्रत्येक कार्रवाई न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही के दायरे में रहती है। यदि कहीं बल प्रयोग आवश्यकता से अधिक हुआ हो, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार तथ्य होने चाहिए, पूर्वाग्रह नहीं। जिस प्रकार प्रदर्शनकारियों की पीड़ा सुनी जानी चाहिए, उसी प्रकार घायल हुए पुलिसकर्मियों और सुरक्षा बलों का पक्ष भी उतनी ही गंभीरता से सुना जाना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-political-significance-of-the-nda-mps-mangal-milan-session" target="_blank">एनडीए सांसदों के सत्रीय 'मंगल मिलन' के सियासी मायने</a></h3><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि आंदोलन की संस्कृति पर पुनर्विचार किया जाए। स्वतंत्रता आंदोलन के समय महात्मा गांधी ने सत्याग्रह की ऐसी परंपरा विकसित की थी, जिसमें नैतिक बल सबसे बड़ा हथियार था। सत्याग्रह में विरोध था, परंतु वैमनस्य नहीं। संघर्ष था, परंतु हिंसा नहीं। दृढ़ता थी, परंतु अराजकता नहीं। दुर्भाग्य से आज कुछ आंदोलनों में संवाद की जगह टकराव, संयम की जगह उग्रता और तर्क की जगह भीड़ की शक्ति को महत्व दिया जाने लगा है। यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। युवा पीढ़ी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में परिवर्तन सड़क पर पत्थर फेंकने से नहीं, बल्कि विचार, संगठन, जनजागरण और संवैधानिक प्रक्रियाओं से आता है। यदि हर असहमति हिंसक रूप ले लेगी, तो सबसे अधिक नुकसान उन्हीं युवाओं का होगा, जिनके भविष्य के नाम पर आंदोलन किए जाते हैं। लोकतंत्र की रक्षा भावनाओं से नहीं, बल्कि अनुशासन और उत्तरदायित्व से होती है।</div><div><br></div><div>यदि यह मान लिया जाए कि किसी राजनीतिक दल या उसके समर्थकों द्वारा आयोजित आंदोलन में कुछ असामाजिक और हिंसक तत्वों ने प्रवेश कर उसे अराजक दिशा देने का प्रयास किया, तो ऐसी स्थिति में सरकार का प्राथमिक दायित्व कानून-व्यवस्था, संवैधानिक संस्थाओं और आम नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करना होता है। समय रहते प्रशासन द्वारा की गई कार्रवाई, भले ही उससे कुछ अप्रिय घटनाएं हुई हों, व्यापक अराजकता और राष्ट्रीय संस्थानों को संभावित क्षति से बचाने के उद्देश्य से देखी जा सकती है। साथ ही, लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह भी अपेक्षित है कि विपक्ष जनभावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हुए हिंसा और तोड़फोड़ से स्पष्ट दूरी बनाए तथा वैध मांगों के समर्थन और अवैध कृत्यों के विरोध के बीच स्पष्ट रेखा खींचे। लोकतंत्र तभी सुदृढ़ होता है जब सरकार कानून के शासन का पालन करे, विपक्ष जिम्मेदार आचरण करे और आंदोलन संविधान की मर्यादाओं एवं शांतिपूर्ण तरीकों के भीतर संचालित हों।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। किसी भी दल का यह दायित्व है कि वह जनभावनाओं को सकारात्मक दिशा दे। यदि कोई राजनीतिक संगठन या उसके समर्थक आंदोलन के दौरान हिंसा, तोड़फोड़ या कानून हाथ में लेने को प्रोत्साहित करते हैं, तो उसकी लोकतांत्रिक विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। विपक्ष लोकतंत्र का अनिवार्य अंग है, लेकिन उसका धर्म केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत करना भी है। यदि किसी भी पक्ष द्वारा जनआंदोलनों का उपयोग केवल राजनीतिक लाभ के लिए किया जाता है, तो अंततः लोकतंत्र ही कमजोर होता है। सरकारों को भी यह आत्ममंथन करना चाहिए कि जनआक्रोश की स्थितियां क्यों बनती हैं। संवाद के द्वार हमेशा खुले रहने चाहिए। पारदर्शी निर्णय, समय पर संवाद और शिकायतों के समाधान की प्रभावी व्यवस्था अनेक आंदोलनों को उग्र होने से पहले ही शांत कर सकती है। लोकतंत्र में शासन का अर्थ केवल कानून लागू करना नहीं, बल्कि विश्वास अर्जित करना भी है।</div><div><br></div><div>भविष्य के लिए कुछ स्पष्ट सिद्धांत निर्धारित किए जाने चाहिए। प्रत्येक बड़े आंदोलन के लिए पूर्व अनुमति, निर्धारित मार्ग, आयोजकों की स्पष्ट जवाबदेही, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, हिंसा की स्थिति में त्वरित पहचान और दोषियों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई सुनिश्चित हो। साथ ही पुलिस को भी भीड़ नियंत्रण के आधुनिक, वैज्ञानिक और न्यूनतम आवश्यक बल के सिद्धांतों पर निरंतर प्रशिक्षित किया जाए। इससे नागरिक अधिकारों और कानून-व्यवस्था के बीच बेहतर संतुलन स्थापित होगा। लोकतंत्र का सौंदर्य इस बात में नहीं कि कितनी जोर से नारे लगाए गए, बल्कि इस बात में है कि कितनी गंभीरता से संवाद हुआ। संसद जनता की आकांक्षाओं का मंदिर है। यदि कोई समूह अपनी बात संसद तक पहुंचाना चाहता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए, लेकिन संसद पर दबाव बनाने या उसे घेरने की संस्कृति लोकतांत्रिक परंपराओं को कमजोर करती है। लोकतंत्र में जनमत सर्वोपरि है, भीड़तंत्र नहीं।</div><div><br></div><div>आज भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ विश्वगुरु बनने की दिशा में भी अग्रसर है। ऐसे समय में हमें विरोध की भी ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी जो विश्व के सामने अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत करे। हमारे आंदोलन व्यवस्था को तोड़ने के नहीं, व्यवस्था को बेहतर बनाने के माध्यम बनें। हमारे प्रदर्शन राष्ट्र को विभाजित करने के नहीं, लोकतांत्रिक चेतना को समृद्ध करने के साधन बनें। अंततः यह स्मरण रखना होगा कि अधिकार और कर्तव्य एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। अधिकारों की रक्षा तभी संभव है जब कर्तव्यों का भी समान रूप से पालन किया जाए। यदि आंदोलन संविधान की मर्यादाओं में रहकर होंगे, तो सरकार भी अधिक उत्तरदायी बनेगी और लोकतंत्र भी अधिक सशक्त होगा। भारत को ऐसे आंदोलनों की आवश्यकता है जो व्यवस्था को चुनौती देने के बजाय उसे सुधारने की प्रेरणा दें। जो युवाओं को उग्रता नहीं, उत्तरदायित्व सिखाएं और जो राष्ट्रहित को दलगत हितों से ऊपर रखकर लोकतंत्र को और अधिक परिपक्व, अनुशासित तथा जनोन्मुख बनाने का मार्ग प्रशस्त करें।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 18:10:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/culture-of-movement-not-just-rights-responsibility-is-also-necessary</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Abhijeet Dipke, Saurav Das, Richa Chadha अनजाने में मर्यादा की सीमा लांघ रहे हैं या फिर जानबूझकर बदतमीजी कर रहे हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/abhijeet-dipke-saurav-das-richa-chadha-controversial-statements-pm-modi-editorial]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना हर नागरिक का अधिकार है और सत्ता की आलोचना भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ताकत मानी जाती है। लेकिन जब विरोध की भाषा शालीनता की सीमा लांघकर व्यक्तिगत अपमान में बदल जाए, जब तर्क और तथ्यों की जगह गाली-गलौज और कटाक्ष ले लें, और जब वरिष्ठों के सम्मान जैसी बुनियादी सामाजिक मर्यादाओं का भी मजाक उड़ाया जाने लगे, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह लोकतांत्रिक विरोध है या फिर अभिव्यक्ति की आज़ादी की आड़ में सभ्य संवाद की संस्कृति को कमजोर करने की कोशिश है?</div><div><br></div><div>हाल के दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक अभिजीत दिपके, उसके प्रवक्ता सौरव दास और अभिनेत्री रिचा चड्ढा के बयानों ने इसी बहस को जन्म दिया है। तीनों के बयान अलग-अलग संदर्भों में आए, लेकिन उनकी भाषा और दृष्टिकोण में जो समानता दिखाई देती है वह है व्यक्तिगत कटाक्ष, वरिष्ठों के प्रति असम्मान और मर्यादा की सीमाओं को लांघने की प्रवृत्ति।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dialogue-alone-will-resolve-youth-discontent" target="_blank">संवाद से ही सुलझेगा युवा असंतोष</a></h3><div>अभिजीत दिपके ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के छात्रों के लिए जारी वीडियो संदेश पर टिप्पणी करते हुए लिखा कि "आपकी त्वचा देश के भविष्य से ज्यादा चमकदार है।" यह टिप्पणी ऐसे समय आई जब प्रधानमंत्री ने परीक्षा प्रणाली को विश्वसनीय बनाने और पेपर लीक पर अंकुश लगाने के लिए पारित कानून को विद्यार्थियों के हित में एक महत्वपूर्ण कदम बताया था। देखा जाये तो कोई भी व्यक्ति सरकार की नीतियों की आलोचना कर सकता है, कानून की प्रभावशीलता पर सवाल उठा सकता है या सरकार से जवाब मांग सकता है। लेकिन किसी के व्यक्तित्व या शारीरिक स्वरूप पर टिप्पणी करना क्या स्वस्थ लोकतांत्रिक आलोचना कहलाएगी? क्या इससे छात्रों की समस्या का कोई समाधान निकलता है?</div><div><br></div><div>यह भी एक बड़ा प्रश्न है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग पूरी होने के बाद क्या दिपके और उनके सहयोगी इतने आत्ममुग्ध हो गए हैं कि अब देश के निर्वाचित प्रधानमंत्री के लिए भी घटिया और व्यक्तिगत भाषा का इस्तेमाल सामान्य मानने लगे हैं? जिस नेता को दुनिया में सबसे अधिक वोट प्राप्त कर लोकतांत्रिक जनादेश मिला हो, उसके साथ असहमति पूरी तरह स्वीकार्य हो सकती है, लेकिन क्या उसका अपमान लोकतांत्रिक अधिकार की श्रेणी में रखा जा सकता है?</div><div><br></div><div>सौरव दास का बयान इस बहस को और गंभीर बना देता है। जब उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत माता के खिलाफ इस्तेमाल हुई अपमानजनक भाषा पर सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि उन्हें इसमें कुछ भी आपत्तिजनक नहीं लगता और लोकतंत्र में "जोक" को स्वीकार करना चाहिए। देखा जाये तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का आधार है, लेकिन किसी दिवंगत व्यक्ति या किसी के परिवार के प्रति अपमानजनक टिप्पणियों का समर्थन करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, बल्कि सार्वजनिक संवाद के स्तर को गिराना माना जायेगा। लोकतंत्र में तीखी आलोचना की पूरी गुंजाइश है, लेकिन व्यक्तिगत अपमान और विशेषकर दिवंगत परिजनों को निशाना बनाना स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं माना जाता।</div><div><br></div><div>भारत के मतदाताओं ने बार-बार यह संकेत दिया है कि वे नीतियों पर बहस चाहते हैं, लेकिन व्यक्तिगत अभद्रता को पसंद नहीं करते। राजनीतिक इतिहास में अनेक उदाहरण हैं जहां तीखी व्यक्तिगत टिप्पणियों की तुलना में मुद्दों पर आधारित राजनीति को अधिक स्वीकार्यता मिली। ऐसे में यह मान लेना कि अपमानजनक भाषा ही जनभावना का प्रतिनिधित्व करती है, वास्तविकता से दूर आकलन है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, अभिनेत्री रिचा चड्ढा का हालिया सोशल मीडिया पोस्ट भी इसी मानसिकता की झलक देता है। उन्होंने वरिष्ठ नागरिकों के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा कि केवल उम्र के आधार पर सम्मान नहीं मिलना चाहिए और अपनी बात को स्थापित करने के लिए उन्होंने ऐसे शब्दों और उपमाओं का प्रयोग किया जोकि अपमानजनक और असंवेदनशील थीं। किसी व्यक्ति का सम्मान केवल उम्र से नहीं, उसके आचरण से भी जुड़ा हो सकता है, यह तर्क अपनी जगह है। लेकिन क्या इस विचार को व्यक्त करने के लिए पूरे वरिष्ठ वर्ग का उपहास उड़ाना, उनकी शारीरिक स्थिति पर कटाक्ष करना और उन्हें अपमानित करने वाली भाषा का प्रयोग करना उचित माना जा सकता है? रिचा चड्ढा को यह पता होना चाहिए कि भारतीय समाज में बुजुर्गों का सम्मान केवल परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक संतुलन का महत्वपूर्ण आधार रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि रिचा चड्ढा इससे पहले भी कई विवादित बयानों को लेकर सुर्खियों में रह चुकी हैं। ऐसे में यह धारणा भी मजबूत होती है कि फिल्म और मनोरंजन जगत के कुछ कलाकार अपनी नई फिल्म या वेब सीरीज के रिलीज़ से पहले चर्चा में बने रहने और लाइमलाइट हासिल करने के लिए जानबूझकर विवादित बयान देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सरकारों से सवाल पूछना आवश्यक है, आंदोलनों का होना भी लोकतंत्र का हिस्सा है और सार्वजनिक हस्तियों की आलोचना भी पूरी तरह वैध है। लेकिन यदि आलोचना की भाषा ही अपमान में बदल जाए, यदि असहमति की जगह व्यक्ति और उसके परिवार को निशाना बनाया जाए और यदि वरिष्ठों के प्रति सम्मान को ही पिछड़ापन बताने की कोशिश होने लगे, तो यह केवल राजनीतिक या वैचारिक बहस नहीं रह जाती, बल्कि सामाजिक संस्कारों के क्षरण का संकेत बन जाती है।</div><div><br></div><div>आखिरकार लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, बल्कि जिम्मेदारियों से भी चलता है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जितनी महत्वपूर्ण है, उतनी ही महत्वपूर्ण संवाद की मर्यादा भी है। असहमति का अधिकार लोकतंत्र को मजबूत करता है, लेकिन अभद्रता और व्यक्तिगत अपमान किसी भी लोकतांत्रिक समाज को मजबूत नहीं, बल्कि कमजोर ही करते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:52:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/abhijeet-dipke-saurav-das-richa-chadha-controversial-statements-pm-modi-editorial</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[प्रियंका द्वारा गौमूत्र का उपहास कांग्रेस की हिन्दू विरोधी मानसिकता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/priyanka-mockery-of-cow-urine-reflects-the-congress-party-anti-hindu-mindset]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कांग्रेस पार्टी की सांसद प्रियंका गांधी की योग्यता का जिक्र करते हुए अकसर राजनीतिक विश्लेषक एक बात का अवश्य जिक्र करते हैं कि उनकी छवि, विशेषकर नाक अपनी दादी श्रीमती इंदिरा गांधी से मिलती है। लेकिन अब दोनों दादी-पोतियों का एक और समान गुण सामने आया है, इंदिरा गांधी ने 7 नवम्बर, 1966 को संसद भवन के सामने हजारों गोभक्तों पर गोलियां चलवाईं थी और लगभग उसी मानसिकता का परिचय देते हुए अब प्रियंका वाड्रा गांधी ने संसद के भीतर गोमूत्र का उपहास उड़ाया है। शर्मनाक बात है कि जब प्रियंका इस तरह का दुष्कर्म कर रही थी तो विपक्षी बैंचों पर बैठे कांग्रेसी सांसद भी खिलखिला रहे थे। हिन्दू विरोध से उपजी कांग्रेसियों की यह हंसी कौरवसभा में द्रौपदी चीरहरण के समय कपटी दुर्योधन द्वारा लगाए गए अट्टाहस की तरह हर हिन्दू के मनों को बींध गई।</div><div><br></div><div>संसद में मंगलवार को उस समय काफी हंगामा मचा जब प्रियंका वाड्रा ने पेपर लीक मामले पर सरकार द्वारा बनाई गई कमेटी में शामिल एक सदस्य की योग्यता उनके गोमूत्र विशेषज्ञ होने को बताई। लोकसभा में शिक्षा संबंधी मुद्दों पर चर्चा के दौरान कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने केंद्र सरकार द्वारा पेपर लीक को लेकर गठित उच्च स्तरीय कार्यबल पर तंज कसते हुए कहा कि इसमें एक गौमूत्र विशेषज्ञ भी शामिल हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/priyanka-gandhi-and-kalyan-banerjee-discuss-makar-dwar-mention-rajiv-gandhi-and-mamata-banerjee" target="_blank">प्रियंका गांधी-कल्याण बनर्जी की मकर द्वार पर चर्चा, राजीव गांधी-ममता का हुआ जिक्र, जानें पूरा मामला</a></h3><div>हालांकि चर्चा के दौरान प्रियंका गांधी ने किसी का नाम नहीं लिया। लेकिन उनका इशारा आईआईटी मद्रास के निदेशक प्रोफेसर वी. कामाकोटि की ओर माना जा रहा है, जो इंफोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाली इस टास्क फोर्स का हिस्सा हैं। 2025 में प्रो. कामाकोटि ने दावा किया था कि गोमूत्र में एंटीबैक्टीरियल और पाचन संबंधी गुण होते हैं। प्रो. वी. कामकोटि देश के जाने-माने वैज्ञानिक हैं। जनवरी, 2025 को चेन्नई की एक गौशाला में माटू पोंगल कार्यक्रम में बोलते हुए, कामकोटी ने देशी गाय और जैविक खेती के बारे में कहा। इस दौरान उन्होंने बताया कि गाय के मूत्र में जीवाणुरोधी, कवकरोधी और पाचन सम्बन्धी गुण होते हैं। उन्होंने एक तपस्वी से जुड़ी कहानी भी साझा की, जिन्होंने गौमूत्र पीकर अपना बुखार ठीक कर लिया था। इस ब्यान के कारण उस समय भी प्रो. कामकोटि वामपंथी व जिहादी ताकतों के निशाने पर आ गए थे और प्रियंका ने भी अब उन जख्मों को पुन: कुरेद दिया है।</div><div><br></div><div>गोमूत्र का उपहास उड़ाने वालों को जानना चाहिए कि हिन्दू धर्म में कोई भी विश्वास अवैज्ञानिक नहीं हैं, गोमूत्र के औषधीय गुण विज्ञान द्वारा प्रमाणित हैं। भारत के वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद और नागपुर के गोविज्ञान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से किए गए शोध पर आधारित गोमूत्र के गुणों को अमेरिकी पेटेंट मिल चुका है। गोमूत्र के अर्क पर पहला महत्वपूर्ण अमेरिकी पेटेंट (नंबर 6410059) एंटीबायोटिक और एंटीफंगल दवाओं के असर को बढ़ाने के लिए 2002 में मिला था। इसके बाद कैंसर रोधी दवाओं के प्रभाव को तेज करने और डीएनए सुरक्षा से जुड़े अन्य पेटेंट (पेटेंट नंबर 6896907 और 7718360) भी संयुक्त रूप से भारत के शोधकर्ताओं द्वारा अमेरिका में दर्ज कराए गए। गोमूत्र व अन्य प्राकृतिक चीजों से बने कीटनाशकों को भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता और पेटेंट प्राप्त हुआ है।</div><div><br></div><div>आयुष राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) श्री श्रीपाद येसो नाइक ने लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में बताया था कि वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनुसार, इसकी घटक प्रयोगशाला, केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पादप संस्थान (सीआईएमएपी), लखनऊ ने नागपुर के गो-विज्ञान अनुसंधान केंद्र के सहयोग से किए गए एक अध्ययन में गाय के मूत्र के आसवन (कामधेनु अर्क) का एक नया उपयोग खोजा है। यह आसवन संक्रमणरोधी और कैंसररोधी एजेंटों सहित जैवसक्रिय अणुओं की सक्रियता बढ़ाने और उपलब्धता को सुगम बनाने में सहायक है। गाय के मूत्र के आसवन में कैंसररोधी प्राकृतिक एजेंट टैक्सोल (पैक्लिटैक्सेल) की जैव-संवर्धन क्षमता पाई गई है, जो यू वृक्ष (टैक्सस एसपीपी.) द्वारा सूक्ष्म मात्रा में उत्पादित होता है। गाय के मूत्र का आसवन, जीवाणुओं पर विभिन्न एंटीबायोटिक दवाओं की निष्फलता क्षमता बढ़ाने के अलावा, स्तन कैंसर कोशिका लाइन एमसीएफ-7 के विरुद्ध पैक्लिटैक्सेल की कोशिका विभाजन अवरोधक गतिविधि को भी बढ़ा सकता है। इसके अलावा, गाय के मूत्र के आसवन से तैयार किए गए एक सफेद क्रिस्टलीय अवक्षेप ने भी गाय के मूत्र के आसवन के समान सक्रियता दिखाई। इस शोध निष्कर्ष पर अमेरिका का पेटेंट भी प्राप्त कर लिया गया है।</div><div><br></div><div>लेकिन अल्पसंख्यक तुष्टिकरण की पराकाष्ठा की सीमा भी लांघ चुकी कांग्रेस पार्टी ने लगता है कि अपनी पुरानी बीमारी के चलते हिन्दू आस्था के साथ-साथ विज्ञान का भी उपहास उड़ाना शुरू कर दिया है।</div><div><br></div><div>वैसे प्रियंका के गोमूत्र के उपहास उड़ाने के प्रयास को देख कर किसी को आश्चर्य भी नहीं होना चाहिए, क्योंकि इनकी दादी पूर्व प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी गोअष्टमी के दिन 7 नवम्बर, 1966 को संसद भवन के सामने निहत्थे गोभक्तों, संतों व गोमाता पर गोलियां चलवा कर दिल्ली की सडक़ों को रक्तरंजित करने का पराक्रम दिखा चुकी हैं। केरल में यूथ कांग्रेस के प्रदर्शनकारी सार्वजनिक रूप से एक बछड़े की हत्या कर उसके मांस की दावत उड़ा चुके हैं। अच्छा होगा कि प्रियंका गांधी अपने किए अपराध के लिए समूचे देश से माफी मांगें अन्यथा यह न भूलें कि हिन्दू समाज गोरक्षा व गोसम्मान के लिए 1857 में अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र क्रान्ति कर चुका है। गोरक्षा व गोसम्मान हिन्दू आस्था से ही नहीं हिन्दू अस्तित्व से जुड़ा प्रश्न है।</div><div><br></div><div>- राकेश सैन</div><div>32 खण्डाला फार्म कालोनी,</div><div>ग्राम एवं डाकखाना रंधावा मसंदां</div><div>जालंधर।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 18:21:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/priyanka-mockery-of-cow-urine-reflects-the-congress-party-anti-hindu-mindset</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[साथियों को भूखे मरता छोड़ खुद जीत का जश्न बनाती कॉकरोच जनता पार्टी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/cjp-celebrating-its-own-victory-while-leaving-its-comrades-to-starve-to-death]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गिद्धों का भी एक धर्म होता है, वो जिंदा जानवरों का मांस नहीं खातीं। वह प्रतीक्षा करती हैं उसके मरने की और प्राण छोडऩे के बाद ही लोथड़ों को नोचती हैं। लेकिन आज का इंसान गिद्ध से भी ज्यादा विभत्स हो गया लगता है। नीट पेपर लीक को लेकर देश भर में प्राण गंवाने वाले 21 युवाओं के पोस्टर लगा कर दिल्ली के जंतर मंतर पर धरना देने वाली कॉकरोच जनता पार्टी के नेता इन युवाओं का शोक मनाना तो दूर बल्कि केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के तुरंत बाद फाइव स्टार होटलों में कुल्हे मटकाते और बोतलों के ढक्कन खोलते दिखे। पेपर लीक मामले में केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का त्यागपत्र हो गया और लगभग एक महीने से दिल्ली के जंतर मंतर पर लोकतंत्र की नई-नई रखवाली कॉकरोच जनता पार्टी का धरना भी खत्म हो गया पर दो दिनों के भीतर ही इन नए नवेले लोकतंत्र के रखवालों का असली चेहरा सामने आने लगा है। नीट पेपर लीक होने के आक्रोश में मारे गए जिन युवाओं के पोस्टर लगा कर कोहराम मचाने वाली कॉकरोच जनता पार्टी के नेताओं ने इतना तमाशा किया वो अपने साथियों को भूखे मरता छोड़ खुद फाइव स्टार होटलों में ठुमके लगाते और बीयर पार्टी करते हुए दिखाई दिए। लाशों के मंच पर लग रहे ठुमके और उड़ रही शराब की दुर्गंध इस बात की साक्षी है कि इस तरह की हरकत करने वालों के मनों में कितनी सड़ांध भरी होगी।</div><div><br></div><div>केवल आम जनता ही नहीं बल्कि खुद सीजेपी के आंदोलन से जुड़े लोगों ने इसे शर्मनाक बताया है। सीजेपी के मंच पर भूख हड़ताल पर बैठे एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक ने वायरल वीडियो को लेकर कहा है कि जीत के साथ विनम्रता भी होनी चाहिए। सोनम ने कहा कि सफलता पाने के साथ-साथ सम्मान और विनम्रता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। सीजेपी समर्थकों ने भी पार्टी के वीडियो की आलोचना की है। ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के संस्थापक सदस्य और कमेंटेटर-यूट्यूबर मेघनाद ने सीजेपी नेताओं पर तीखा हमला बोला है। उन्होंने कहा कि जब विरोध प्रदर्शन खत्म होने के बाद दर्जनों प्रदर्शनकारी सडक़ों पर बेघर और भूखे रह गए थे तब ये नेता पार्टी कर रहे थे। इंस्टाग्राम पोस्ट में मेघनाद ने कहा कि उन्होंने और कुछ अन्य लोगों ने उन दर्जनों प्रदर्शनकारियों के लिए यात्रा और भोजन का इंतजाम किया जो सीजेपी नेताओं के साथ एक महीने से ज्यादा समय से जंतर-मंतर पर डेरा डाले हुए थे। मेघनाद ने सीजेपी पार्टी के वीडियो के बारे में लिखा, ‘मैं यह सुबह 4 बजे देख रहा हूं। मैंने और कुछ लोगों ने पिछले दो दिनों में अपने पैसे से सीजेपी के उन वॉलंटियर्स और प्रदर्शनकारियों को घर भेजा है जिन्हें बेसहारा और भूखा छोड़ दिया गया था। मैं कुछ नहीं कहने वाला था लेकिन मैंने यह वीडियो देखा और मुझे बहुत गुस्सा आ रहा है।’ उन्होंने सीजेपी के लिए कड़े शब्दों के साथ अपनी पोस्ट खत्म की, ‘जब आप पार्टी कर रहे थे तब दिल्ली में 70 से ज्यादा प्रदर्शनकारी और छात्र भूखे रह गए क्योंकि आपने परवाह न करने का फैसला किया था। बधाई हो सीजेपी आखिरकार आप भी एक और राजनीतिक पार्टी बन ही गए।’</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-will-be-strengthened-by-dialogue-not-by-violence" target="_blank">संवाद से सशक्त होगा लोकतंत्र, हिंसा से नहीं</a></h3><div>ऐसा शायद पहली बार हुआ है कि किसी आंदोलन के खत्म होने के दो दिनों बाद ही उसमें फूट पड़ती दिख रही हो। आखिर पड़े भी क्यों ना, कुछ लोगों ने देश के युवाओं के आक्रोश का लाभ उठाया और देखते ही देखते वे दुनिया में अभियानवादियों के स्टार बन गए। उनकी कही बातें अब इंटरनेशनल मीडिया में गूंज रही हैं और उनकी भाव भंगिमा ऐसी है मानो उन्होंने बहुत बड़ा मार्का मार लिया हो। लेकिन क्या फाइव स्टार होटलों में गुलछर्रे उड़ाने वाले जेन-जी नेता बताएंगे कि आंदोलन के दौरान कितनी बार पेपर लीक के मृतकों को याद किया गया। केंद्रीय मंत्री के इस्तीफे के बाद काक्रोचों ने अहंकारमयी मुद्रा में आकर कहा कि ‘झुकती है दुनिया झुकाने वाला चाहिए।’ सीजेपी के नेता जीत के जश्न में उन लोगों को क्यों भूल गए जिन्होंने अपनी जानें दीं। उन परिवारों को क्यों नहीं बुलाया गया जिन्होंने अपने बच्चों को खोया। असल में कुछ अभियानवादियों ने इन 21 युवाओं की लाशों का मंच की तरह उपयोग किया और अपना कद बड़ा कर चलते बने। कहने को ये जेन-जी वाले शिक्षा नीति में सुधार का नारा लेकर आए थे परंतु इनका असली नारा यही दिखता है कि ‘अपना काम है बनता-भाड़ में जाए जनता।’ ऐसे मुर्दाखोर आंदोलनकारियों पर तो शायद गिद्धों को भी शर्म आ जाए।</div><div><br></div><div>- राकेश सैन</div><div>32 खण्डाला फार्म कालोनी,</div><div>ग्राम एवं डाकखाना रंधावा मसंदां,</div><div>जालन्धर।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:53:36 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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