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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Yash Chopra Death Anniversary: बॉलीवुड के 'किंग ऑफ रोमांस' कहे जाते थे यश चोपड़ा, इंडस्ट्री पर किया राज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/yash-chopra-known-as-bollywood-king-of-romance-and-reigned-over-industry]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 21 अक्तूबर बॉलीवुड के प्रतिभाशाली निर्देशक यश चोपड़ा का निधन हो गया था। उनको बॉलीवुड का 'किंग ऑफ रोमांस' कहा जाता था। यश चोपड़ा ने अपनी फिल्मों के जरिए रोमांस, जुदाई, प्यार और रिश्तों को पर्दे पर इस तरह से पेश किया कि उनकी फिल्में दर्शकों के दिलों में बस गईं। वह सिर्फ रोमांटिक फिल्में नहीं बताते थे, बल्कि अपनी कई फिल्मों में उन्होंने प्यार और सनक को भी बखूबी दिखाया है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर यश चोपड़ा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>पाकिस्तान के लाहौर में 27 सितंबर 1932 को यश चोपड़ा का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम यश राज चोपड़ा था। यश चोपड़ा को शुरूआत से फिल्मों में प्रति लगाव था और यही लगाव उनको फिल्म मेकिंग की दुनिया में ले आया। उन्होंने अपनी बड़े भाई बी.आर चोपड़ा के साथ काम किया और निर्देशन की बारीकियां सीखीं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/apj-abdul-kalam-india-11th-president-and-missile-man" target="_blank" rel="noopener">APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: भारत के 11वें राष्ट्रपति और मिसाइल मैन थे एपीजे अब्दुल कलाम, गरीबी में बीता था बचपन</a></p><h2>फिल्मी दुनिया में रखा कदम</h2><p>इसके बाद साल 1959 से यश चोपड़ा ने फिल्म 'धूल का फूल' से निर्देशन की शुरूआत की। फिर उन्होंने 'वक्त' और 'धर्मपुत्र' जैसी फिल्मों का निर्देशन किया। इन फिल्मों से यश चोपड़ा को एक प्रतिभाशाली निर्देशक के रूप में पहचान मिली। वहीं साल 1973 में उन्होंने अपना प्रोडक्शन हाउस यश राज फिल्म्स शुरू किया। इस प्रोडक्शन हाउस से उनकी फिल्म 'दाग' रिलीज हुई। फिर यश चोपड़ा ने 'कभी-कभी', 'त्रिशूल' 'दीवार' 'डर', 'दिल तो पागल है', 'वीर जारा' और 'काला पत्थर' जैसी फिल्मों का निर्देशक किया।</p><h2>सम्मान</h2><p>भारतीय सिनेमा में योगदान देने के लिए यश चोपड़ा को दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और पद्मभूषण से नवाजा गया। वहीं यश चोपड़ा ने फिल्म 'जब तक है जान' के निर्देशन को आखिरी फिल्म बताया था।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 21 अक्तूबर 2012 को यश चोपड़ा का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 15:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/yash-chopra-known-as-bollywood-king-of-romance-and-reigned-over-industry</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[APJ Abdul Kalam Birth Anniversary: भारत के 11वें राष्ट्रपति और मिसाइल मैन थे एपीजे अब्दुल कलाम, गरीबी में बीता था बचपन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/apj-abdul-kalam-india-11th-president-and-missile-man]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 15 अक्तूबर को भारत के 11वें राष्ट्रपति व मिसाइलमैन के नाम से मशहूर एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म हुआ था। डॉ कलाम को भारत के मिसाइल मैन के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने जब देश के सर्वोच्च पद यानी 11वें राष्ट्रपति की शपथ ली थी, तो हर एक वैज्ञानिक का सिर फख्र से ऊंचा हो गया था। वह एक साधारण परिवार से निकलकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद तक पहुंचे थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>तमिलनाडु के रामेश्वरम में स्थित धनुषकोडी में 15 अक्तूबर 1931 को एपीजे अब्दुल कलाम का जन्म हुआ था। वह एक मध्यमवर्ग मुस्लिम परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम जैनुलाब्दीन था। कलाम के जीवन में उनके पिता का बहुत प्रभाव रहा, हालांकि उनके पिता अधिक पढ़े-लिखे नहीं थे, लेकिन उनकी मेहनत, लगन और संस्कार अब्दुल कलाम के बहुत काम आए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/rk-narayan-renowned-english-language-writer-yet-he-failed-in-english" target="_blank" rel="noopener">R K Narayan Birth Anniversary: अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे R K Narayan, अंग्रेजी में हो गए थे फेल</a></p><h2>अखबार बेचने का किया काम</h2><p>अब्दुल कलाम के परिवार की आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं थी। ऐसे में उन्होंने अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए अखबार बेचने का काम किया। उन्होंने साल 1950 में मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलजी से अंतरिक्ष विज्ञान में स्नातक किया। फिर उन्होंने हावरक्राफ्ट परियोजना पर काम करने के लिये भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संस्थान में दाखिला लिया। साल 1962 में अब्दुल कलाम भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन में आए। यहां पर काम करते हुए उन्होंने सफलतापूर्वक कई उपग्रह प्रक्षेपण परियोजनाओं में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।</p><h2>भारत के 11वें राष्ट्रपति</h2><p>डॉ अब्दुल कलाम ने भारत के 11वें राष्ट्रपति के रूप में भी काम किया है। उनको 'पीपुल्स प्रेसिडेंट' कहा गया। इसके अलावा उन्होंने भारत के दो प्रमुख अंतरिक्ष अनुसंधान संगठनों- रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी कि इसरो के साथ काम किया। डॉ कलाम के नेतृत्व में अग्नि मिसाइल और पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण किया गया। उनकी देखरेख में साल 1998 में पोखरण में भारत ने अपना दूसरा सफल परमाणु परीक्षण किया था।</p><h2>सम्मान</h2><p>डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को भारत सरकार द्वारा कई पुरस्कारों से नवाजा गया। साल 1981 में भारत सरकार ने डॉ कलाम को पद्म भूषण, साल 1990 में पद्म विभूषण और साल 1997 में देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया था। वह भारत रत्न पाने वाले देश के तीसरे राष्ट्रपति थे।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 27 जुलाई 2015 को शिलांग के आईआईएम में एक व्याख्यान देने के दौरान गिरने के बाद पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम का निधन हो गया।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 15:04:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/apj-abdul-kalam-india-11th-president-and-missile-man</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Kishore Kumar Death Anniversary: संगीत की दुनिया के सरताज थे किशोर कुमार, जादुई आवाज से लाखों दिलों पर किया राज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/kishore-kumar-titan-music-world-ruled-over-millions-of-hearts-with-magical-voice]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बॉलीवुड के सदाबहार गायक किशोर कुमार का आज ही के दिन यानी की 13 अक्तूबर को निधन हो गया था। उन्होंने अपनी सुरीली आवाज से दुनिया को दीवाना बना दिया था। सिंगिंग के अलावा उन्होंने अभिनय और फिल्म निर्माण में भी हाथ आजमाया था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी इंसान थे। किशोर कुमार हरफनमौला थे और उनको किशोर दा भी कहा जाता था। सिंगिंक की दुनिया में अपना नाम अमर करने वाले किशोर कुमार ने कभी संगीत की शिक्षा नहीं ली। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>मध्य प्रदेश के खंडवा में एक बंगाली ब्राह्मण परिवार में 04 अगस्त 1929 को किशोर कुमार का जन्म हुआ था। इनका असली नाम आभास कुमार गांगुली था। वहीं इनके पिता का नाम कुंजालाल गांगुली था, जोकि एक फेमस वकील थे। वहीं मां गौरी देवी घरेलू महिला थां। बचपन से ही किशोर कुमार संगीत और हास्य-रस दोनों में रुचि रखते थे और उनको गाने और अभिनय का शौक था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/ghazal-samrat-jagjit-singh-devastated-by-his-son-death" target="_blank" rel="noopener">Jagjit Singh Death Anniversary: बेटे की मौत से टूट गए थे गजल सम्राट जगजीत सिंह, संगीत को मिली नई पहचान</a></p><h2>संगीत की शिक्षा लिए बने फेमस गायक</h2><p>किशोर कुमार, दिग्गज अभिनेता किशोर कुमार के भाई थे। अशोक कुमार ने बतौर अभिनेता इंडस्ट्री में अच्छी पहचान बना ली थी। वह चाहते थे कि उनके भाई किशोर भी एक अभिनेता के रूप में पहचान बनाएं। लेकिन किशोर अभिनेता की बजाय पार्श्वगायक बनने की चाहत थी। उन्होंने संगीत की शुरूआती शिक्षा नहीं ली थी। बिना किसी ट्रेनिंग के किशोर कुमार ने आगे चलकर संगीत की दुनिया में वह मुकाम हासिल किया, जो किसी दूसरे के लिए सपने की तरह हो सकता है।</p><p>सिंगिंग के साथ-साथ किशोर कुमार ने अभिनय में भी अपनी पहचान बनाई और वह धीरे-धीरे प्रोड्यूसर, लेखक और डायरेक्टर भी बन गए। वह एक मस्तमौला इंसान थे। उनका यह अंदाज इंडस्ट्री में अच्छा मुकाम हासिल करने के बाद भी बरकरार रहा। किशोर कुमार वही करते थे, जो उनका मन करता था।</p><h2>फिल्मी सफर</h2><p>इसके अलावा किशोर कुमार ने 'दूर गगन की छांव में', 'दोस्ती' और 'हकीकत' जैसी फिल्मों में काम किया। हालांकि फिल्म 'दूर गगन की छांव में' को लेकर बहुत उम्मीद थी। इस फिल्म में सिंगिंग और अभिनय दोनों के साथ-साथ उन्होंने निर्देशन भी किया था। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट रही और इसको दर्शकों का खूब प्यार मिला।</p><h2>पर्सनल लाइफ</h2><p>किशोर कुमार ने 4 शादियां की थीं। पहली शादी साल 1950 में गायिका रूमा गुहा ठाकुरता से की, जिससे उनको एक बेटा अमित कुमार था। हालांकि दोनों का रिश्ता साल 1958 में खत्म हो गया था। जिसके बाद साल 1960 में किशोर कुमार ने अभिनेत्री मधुबाला से शादी की थी। उस दौरान मधुबाला गंभीर रूप से बीमार थीं और साल 1969 में मधुबाला की मौत हो गई। जिसके बाद साल 1976 में किशोर कुमार ने योगिता बाली से शादी की, लेकिन शादी के दो साल बाद 1978 में उनका तलाक हो गया। फिर किशोर कुमार ने चौथी और आखिरी शादी साल 1980 में लीना चंद्रावरकर से की थी। जोकि आखिरी समय तक उनके साथ रहीं।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 13 अक्टूबर 1987 को किशोर कुमार का 58 साल की उम्र में हार्ट अटैक की वजह से किशोर कुमार का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 16:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/kishore-kumar-titan-music-world-ruled-over-millions-of-hearts-with-magical-voice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[R K Narayan Birth Anniversary: अंग्रेजी के प्रसिद्ध साहित्यकार थे R K Narayan, अंग्रेजी में हो गए थे फेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/rk-narayan-renowned-english-language-writer-yet-he-failed-in-english]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 10 अक्तूबर को मशहूर उपन्यासकार आरके नारायण का जन्म हुआ था। आरके नारायण के उपन्यास 'गाइड' पर सुप्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद ने इस पर अंग्रेजी में फिल्म बनाई थी। जोकि काफी ज्यादा चर्चित हुई थी। आरके नारायण ने मालगुडी नाम के एक काल्पनिक शहर को आधार बनाया और साल 1920 के बाद भारत में आने वाले बदलावों पर अपनी अधिकतर रचनाएं लिखी थीं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर आरके नारायण के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>चेन्नई में 10 अक्तूबर 1906 को आरके नारायण का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायण स्वामी था। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने ग्रेजुएशन में एडमिशन लिया। लेकिन वह अंग्रेजी की परीक्षा में फेल हो गए थे। हालांकि बाद में आरके नारायण ने फिर से परीक्षा की और पास हुए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/ghazal-samrat-jagjit-singh-devastated-by-his-son-death" target="_blank" rel="noopener">Jagjit Singh Death Anniversary: बेटे की मौत से टूट गए थे गजल सम्राट जगजीत सिंह, संगीत को मिली नई पहचान</a></p><h2>पहला उपन्यास</h2><p>कॉलेज के दिनों से ही आरके नारायण ने लिखना शुरूकर दिया था। साल 1935 में उनका पहला उपन्यास 'स्वामी एंड फ्रेंड्स' आया था। फिर साल 1935 में ही 'फाइनेंशियल एक्सपर्ट' नामक एक हास्य उपन्यास प्रकाशित हुआ था। इसके अलावा उनकी कई रचनाओं पर फिल्में और सीरियल बन चुके हैं।</p><p>फिल्म 'गाइड' देश-विदेश में काफी फेमस हुई और तमिल में आरके नारायण की 'मि. संपत लाल' पर फिल्म बन चुकी है। आरके नारायण के लोकप्रिय उपन्यास वेटिंग फॉर महात्मा, द गाइड, स्वामी एंड फ़्रेन्डस, द मैन इटर ऑफ मालगुडी, द वेंडर ऑफ स्वीट्स और द वर्ल्ड ऑफ नागराज आदि हैं।</p><h2>सम्मान</h2><p>आरके नारायण को उपन्यास 'गाइड' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार द्वारा साहित्य में उनके योगदान को देखते हुए आरके नारायण को पद्म भूषण और पद्म विभूषण से नवाजा गया। इसके बाद उनको राज्यसभा का सदस्या मनोनीत किया गया।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 13 मई 2001 को महान उपन्यासकार आरके नारायण का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 13:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/rk-narayan-renowned-english-language-writer-yet-he-failed-in-english</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jagjit Singh Death Anniversary: बेटे की मौत से टूट गए थे गजल सम्राट जगजीत सिंह, संगीत को मिली नई पहचान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/ghazal-samrat-jagjit-singh-devastated-by-his-son-death]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 10 अक्तूबर को गजल सम्राट कहे जाने वाले जगजीत सिंह का निधन हो गया था। जगजीत सिंह ने अपनी गजलों के जरिए लाखों लोगों के दिलों पर राज किया। आज भले ही वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन आज भी लोग उनकी गजलों को सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गजल किंग जगजीत सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>राजस्थान के श्री गंगानगर में 8 फरवरी 1941 को जगजीत सिंह का जन्म हुआ था। इनका पहले नाम जगजीवन सिंह था और बाद में उन्होंने इसको जगजीत सिंह कर लिया था। उन्होंने कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी से इतिहास में एमए की पढ़ाई शुरू की थी। वहीं करीब 2 साल तक इसकी कक्षाओं में जाने के बाद भी इसको कभी पूरा नहीं किया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/guru-dutt-shining-star-carved-niche-for-himself-in-film-industry" target="_blank" rel="noopener">Guru Dutt Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के चमकते सितारा थे गुरु दत्त, ऐसे बनाया था फिल्म इंडस्ट्री में मुकाम</a></p><h2>ऑल इंडिया रेडियो में गाने की शुरूआत</h2><p>साल 1961 में अपने करियर की शुरूआत ऑल इंडिया रेडियो में गाने से की थी। उन्होंने संगीत की शुरूआती शिक्षा पंडित छगन लाल शर्मा और उस्ताद जमाल खान से ली थी। फिर साल 1965 में वह अपने परिवार को बिना बताए मुंबई आ गए थे। काफी संघर्ष करने के बाद उनको हिंदी सिनेमा में गाने का मौका मिला। साल 1967 में जब जगजीत सिंह काम की खोज कर रहे थे, तो इस दौरान उनकी मुलाकात चित्रा दत्त से हुई थी। हालांकि उस दौरान चित्रा शादीशुदा थीं।</p><h2>बेटे की मौत का सदमा</h2><p>हालांकि इसके बाद भी दोनों एक-दूसरे को दिल दे बैठे। जगजीत और चित्रा एक साथ कॉन्सर्ट करते थे। फिर साल 1980 तक वह गजल किंग बन चुके थे। प्राइवेट एल्बम के साथ जगजीत सिंह ने कई फिल्मों में भी कई गजलें गाईं। इनमें प्रेम गीत, अर्थ, जिस्म, जॉगर्स पार्क, तुम बिन जैसी फिल्में शामिल हैं। जगजीत और चित्रा का एक बेटा विवेक हुआ। लेकिन विवेक की एक सड़क दुर्घटना में मौत हो गई थी। इस घटना ने जगजीत और चित्रा को अंदर तक तोड़ दिया था।</p><p>इस घटना के बाद जगजीत सिंह संगीत की दुनिया से दूर हो जाना चाहते थे। कई महीनों तक जगजीत ने कोई गाना नहीं गाया था। धीरे-धीर संगीत की दुनिया में जगजीत सिंह ने फिर वापसी की। सीने में बेटे की मौत का सदमा दबाए बैठे जगजीत सिंह ने जब वह गजल की दुनिया में वापस लौटे, तो उनकी आवाज में किसी को खोने का दर्द पहले से काफी ज्यादा था। लेकिन पत्नी चित्रा ने बेटे की मौत से दुखी होकर उन्होंने अपने रिटायरमेंट की घोषणा कर दी।</p><h2>सम्मान</h2><p>भारत सरकार द्वारा जगजीत सिंह को साल 2003 में 'पद्म भूषण' के सम्मान से नवाजा गया था।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं साल 2011 में यूके में जगजीत सिंह को गुलाम अली के साथ परफॉर्म करना था। लेकिन 23 सितंबर 2011 को ब्रेन हैमरेज के कारण जगजीत सिंह को मुंबई के लीलावती हॉस्पिटल में एडमिट किया गया था। वहीं करीब 2 सप्ताह तक वह कोमा में रहे और उनकी हालत बिगड़ती चली गई। वहीं 10 अक्तूबर 2011 को जगजीत सिंह ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 13:29:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Guru Dutt Death Anniversary: हिंदी सिनेमा के चमकते सितारा थे गुरु दत्त, ऐसे बनाया था फिल्म इंडस्ट्री में मुकाम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/guru-dutt-shining-star-carved-niche-for-himself-in-film-industry]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 10 अक्तूबर को भारतीय सिनेमा को बेहतरीन फिल्में देने वाले गुरु दत्त का निधन हो गया था। गुरु दत्त ने अपने छोटे फिल्मी करियर में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाया। अभिनेता होने के साथ-साथ गुरु दत्त फिल्ममेकर और निर्माता भी थे। हालांकि शुरूआत में वह संघर्ष करके अपने करियर के पीक पर पहुंचे। फिल्मी करियर के अलावा अभिनेता गुरु दत्त अपनी पर्सनल लाइफ को लेकर काफी चर्चा में रहे। तो आइए जानते हैं अभिनेता गुरु दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>बेंगलुरु में 09 जुलाई 1925 को गुरु दत्त का जन्म हुआ था। उनका असली नाम वसंत कुमार शिवशंकर पादुकोण था। बचपन में गुरु दत्त के साथ एक हादसा हुआ था। इस हादसे में उनको गंभीर चोट लगी थीं। जिस कारण उनको कई सप्ताह तक बुखार रहा था। जिसको एक संत ने अशुभ माना। बाद में उस संत ने परिवार को उनका नाम बदलने की सलाह दी। बताया जाता है कि उनका जन्म गुरुवार को हुआ था, इसलिए उनका नाम गुरु दत्त पादुकोण रखा था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/steve-jobs-became-legend-in-world-of-technology-started-apple-company" target="_blank" rel="noopener">Steve Jobs Death Anniversary: टेक्नोलॉजी की दुनिया में अमर हो गए Steve Jobs, ऐसे की थी 'Apple' कंपनी की शुरूआत</a></p><p>परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण वह कभी कॉलेज नहीं जा सके। फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले वह कलकत्ता में टेलीफोन ऑपरेटर रूप में काम किया करते थे। लेकिन उन्होंने जल्द ही यह काम छोड़ दिया। फिर वह पुणे चले गए अपने अपने अंकल के कहने पर प्रभात स्टूडियो में असिस्टेंट डांस निर्देशक की नौकरी करने लगे। इस दौरान उन्होंने डांस की बारीकियां सीखीं और फिल्म मेकिंग सीखा। स्टूडियो में काम करने के दौरान गुरु दत्त की देवानंद के साथ अच्छी दोस्ती हो गई।</p><h2>अभिनेता बने गुरु दत्त</h2><p>गुरु दत्त को अभिनेता देव आनंद की दोस्ती से लाभ हुआ और साल 1946 में प्रभात स्टू़डियो की फिल्म 'हम एक हैं' से गुरु ने बतौर कोरियोग्राफर इंडस्ट्री में अपना करियर शुरू किया। फिर उनको फिल्मों में काम करने का मौका मिला। गुरु दत्त ने 'जाल', 'सैलाब', 'बहरानी' और 'भरोसा' जैसी फिल्मों में काम किया।</p><h2>पर्सनल लाइफ</h2><p>गुरु दत्त जब अपने फिल्मी करियर के सबसे अच्छे दौर में थे, तो उनकी मुलाकात गीता दत्त से हुई। दोनों की दोस्ती हुई और फिर प्यार हुआ। साल 1953 में गुरु और गीता ने शादी कर ली। दोनों की शादीशुदा जिंदगी काफी अच्छी चल रही थी और करियर भी अच्छा चल रहा था। तभी गुरु की मुलाकात अभिनेती वहीदा रहमान से हुई। बताया जाता है कि गुरु और वहीदा एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे, लेकिन गुरु पहले से शादीशुदा थे। वहीं वहीदा रहमान को लेकर गुरु दत्त और गीता दत्त में काफी झगड़े होते थे। फिर साल 1957 में गुरु और गीता की शादीशुदा जिंदगी में दरार आ गई और आखिरकार दोनों अलग हो गए।</p><h2>दिवालिया हुए अभिनेता</h2><p>साल 1959 में अभिनेता गुरु दत्त की फिल्म 'कागज के फूल' रिलीज हुई। यह फिल्म फ्लॉप साबित हुई और इसका असर यह हुआ कि गुरु दिवालिया हो गए। वहीं एक ओर जहां गुरु एक्ट्रेस वहीदा रहमान को नहीं अपना पाए, तो वहीं उनकी शादी भी टूट चुकी थी। दूसरी तरफ फिल्म में होने वाले नुकसान के कारण गुरु दत्त टूट चुके थे।</p><h2>मृत्यु</h2><p>गुरु दत्त ने दो बार आत्महत्या की कोशिश की, लेकिन जब उन्होंने तीसरी बार ऐसा किया, तो उनकी जान चली गई। 10 अक्तूबर 1964 को अभिनेता गुरु दत्त अपने बेडरूम में मृत पाए गए। बताया जाता है कि उन्होंने खूब शराब पी रखी थी और इसके बाद कई नींद की गोलियां खा ली थीं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 13:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/guru-dutt-shining-star-carved-niche-for-himself-in-film-industry</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Steve Jobs Death Anniversary: टेक्नोलॉजी की दुनिया में अमर हो गए Steve Jobs, ऐसे की थी 'Apple' कंपनी की शुरूआत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/steve-jobs-became-legend-in-world-of-technology-started-apple-company]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 05 अक्तूबर को एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स का निधन हो गया था। स्टीव जॉब्स के इनोवेशन और दूरदर्शिता की वजह से 'Apple' दुनिया की बेहतरीन कंपनियों में शामिल है। उनके नेतृत्व में एप्पल ने टेक्नोलॉजी की दुनिया में एक नई क्रांति लाने का काम किया था। स्टीव जॉब्स की तकनीक में गहरी रुचि थी। वहीं उन्होंने किशोरावस्था से ही कंप्यूटरों के साथ नए-नए प्रयोग करने शुरूकर दिए थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर स्टीव जॉब्स के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>कैलिफोर्निया के सैन फ्रांसिस्को में 24 फरवरी 1955 को स्टीव जॉब्स का जन्म हुआ था। जब वह छोटे थे, तो वह और उनके पिता इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर काम किया करते थे। वह बचपन से ही तेज तर्रार और इनोवेटिव थिंकर थे। हाई स्कूल खत्म करने के बाद उन्होंने पोर्टलैंड के रीड कॉलेज में एडमिशन लिया। लेकिन उनका मन कॉलेज में नहीं लगा और उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया। इस दौरान उन्होंने डेढ़ साल क्रिएटिव क्लासेज को दिया। इस दौरान उनको टाइपोग्राफी से लगाव हो गया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mahatma-gandhi-proponent-of-truth-and-non-violence-became-father-of-nation" target="_blank" rel="noopener">Mahatma Gandhi Birth Anniversary: सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी कैसे बने देश के राष्ट्रपिता, जानिए रोचक बातें</a></p><h2>वीडियो गेम डिजाइनर</h2><p>फिर साल 1974 में स्टीव जॉब्स ने वीडियो गेम डिजाइनर की नौकरी कर ली। लेकिन कुछ महीनों बाद ही उन्होंने यहां भी नौकरी छोड़ दी। इस बीच वह भारत घूमने आए और यहां पर उनको साइकीडेलिक अनुभव मिला। स्टीव जॉब्स को भारत में करीब 7 महीने तक रहे थे।</p><h2>एप्पल की शुरूआत का आइडिया</h2><p>हाईस्कूल करने के दौरान स्टीव की मुलाकात स्टीव वोजनिएक से हुई थी। बाद में दोनों ने मिलकर एप्पल कंपनी शुरू करने की सोची। दोनों की इलेक्ट्रॉनिक्स में गहरी दिलचस्पी थी, इस कारण दोनों की पार्टनरशिप भी काफी लंबी चली। फिर साल 1976 में दोनों ने मिलकर एक कंपनी की शुरूआत की, इस कंपनी का नाम 'एप्पल कंप्यूटर' रखा गया। वहीं इस कंपनी का पहला हेडक्वार्टर स्टीव जॉब्स का फैमिली गैराज था। इसके बाद स्टीव जॉब्स और वोजनिएक ने एप्पल के लिए शुरूआती फंडिग जुटाई।</p><p>इस वेंचर को शुरू किए अधिक समय नहीं हुआ था, वहीं दोनों के जुनून ने टेक्नॉलजी इंडस्ट्री की किस्मत को ही बदल दिया। जॉब्स और वोजनिएक ने न सिर्फ टेक्नोलॉजी को डेमोक्रेटाइज किया बल्कि उनको सस्ती, छोटी और हर दिन के उपयोग के लिए भी तैयार किया। वोजनिएक ने यूजर फ्रेंडली पर्सनल कंप्यूटर्स की सीरीज के बारे में पहले ही सोच रखा था। ऐसे में वोजनिएक ने डिजाइन का हिस्सा और स्टीव ने मार्केटिंग का काम लिया। दोनों ने हर कंप्यूटर को शुरू में 666.66 डॉलर में बेचा। एप्पल के दूसरे मॉडल आने के बाद कंपनी की सेल्स 700% बढ़ गई। साल 1980 में एप्पल शेयर मार्केट में लिस्ट हुई और एक पब्लिक कंपनी बन गई।</p><h2>IBM से मिली टक्कर</h2><p>बाद में स्टीव जॉब्स ने पेप्सी कोला के मार्केटिंग एक्सपर्ट डॉन स्कूले को एप्पल का सीईओ बनने का ऑफर दिया। लेकिन इसके बाद एप्पल के अगले कुछ प्रोडक्ट्स को कुछ खामियों की वजह से काफी ज्यादा निगेटिव फीडबैक मिलने लगे। इस दौरान IBN ने एप्पल को पीछे करते हुए पर्सनल कम्प्यूटर के सेगमेंट में अपना दबदबा बनाया। फिर साल 1984 में एप्पल ने मैकिंटोश रिलीज किया, जोकि देखने में और काम करने में एक नंबर था। लेकिन इसके बाद भी एप्पल मैकिंटोश IBM के सामने टिक नहीं पाई। जिसका असर स्टीव जॉब्स की पोजिशन पर हुआ और कंपनी में उनको साइडलाइन कर दिया गया। ऐसे में साल 1985 में स्टीव ने एप्पल से इस्तीफा दे दिया।</p><h2>एप्पल में वापसी</h2><p>एप्पल छोड़ने के बाद स्टीव ने NeXT नाम की एक हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर कंपनी की शुरूआत की। जिस एप्पल से स्टीव ने इस्तीफा दिया था, साल 1996 में उसने ही NeXT को 429 मिलियन डॉलर में खरीद लिया। ऐसे में साल 1997 में एक बार फिर स्टीव एप्पल में एक नए मैनेजमेंट के साथ लौटे। वहीं स्टीव के वापस आते ही एक बार फिर एप्पल कंपनी दौड़ने लगे। आईमैक पर लोगों का काफी पॉजिटिव रिस्पॉन्स मिला। आने वाले सालों में एप्पल ने आईपॉड, मैकबुक एयर और आईफोन जैसे कई शानदार प्रोडक्ट रेंज में ऑफर किए। हालांकि कॉम्पिटिटर्स वैसे ही टेक्नोलॉजी के लिए खूब मेहनत कर रहे थे, लेकिन नतीजा नहीं निकाल सके। ऐसे में एप्पल आने वाले दिनों में टेक्नोलॉजी का चेहरा बन गई।</p><h2>मृत्यु</h2><p>हालांकि एप्पल सफलता की सीढ़ियां चढ़ रही थी, लेकिन धीरे-धीरे स्टीव की जिंदगी के दिन कम होते जा रहे थे। वहीं 05 अक्तूबर 2011 को कैंसर की वजह से 56 साल की उम्र में स्टीव जॉब्स का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 13:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/steve-jobs-became-legend-in-world-of-technology-started-apple-company</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mahatma Gandhi Birth Anniversary: सत्य और अहिंसा के पुजारी महात्मा गांधी कैसे बने देश के राष्ट्रपिता, जानिए रोचक बातें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mahatma-gandhi-proponent-of-truth-and-non-violence-became-father-of-nation]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 02 अक्टूबर को महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। उनका जीवन एक साधारण इंसान के आत्मसंघर्ष की कहानी है। प्यार से लोग महात्मा गांधी को बापू भी कहते हैं। देश की आजादी की लड़ाई में महात्मा गांधी का अहम योगदान रहा था। उनका पूरा जीवन देश सेवा में बीता और अंत में देश के लिए उनकी मृत्यु भी हुई। महात्मा गांधी ने देश को अंग्रेजों से आजादी दिलाने और देश को एक सूत्र में पिरोने का काम किया। जिसके लिए उनको कई बार जेल यात्रा भी करनी पड़ी। लेकिन इसके बाद भी उन्होंने देश को सर्वोपरि रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर महात्मा गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>गुजरात के पोरबंदर में 02 अक्टूबर 1869 को महात्मा गांधी का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। इनके पिता का नाम करमचंद गांधी था और मां का नाम पुतली बाई था। वहीं 13 साल की उम्र में उनका विवाह कस्तूरबा गांधी से हो गया था। जिसके बाद वह वकालत की पढ़ाई पूरी करने के बाद दक्षिण अफ्रीका कानून की प्रैक्टिस के लिए चले गए थे। वहीं दक्षिण अफ्रीका में रहते हुए महात्मा गांधी ने रंगभेद और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ 'सत्याग्रह' का पहला सफल प्रयोग किया था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/k-kamaraj-seasoned-politician-in-indian-politics-who-gave-country-two-pm" target="_blank" rel="noopener">K Kamaraj Death Anniversary: भारतीय राजनीति के मंझे हुए राजनेता थे के कामराज, देश को दिए थे दो प्रधानमंत्री</a></p><h2>ऐसे मिली महात्मा की उपाधि</h2><p>साल 1915 में दक्षिण अफ्रीका से वापस आने के बाद साल 1917 के चंपारण सत्याग्रह का सफल नेतृत्व करने के बाद टैगोर ने उनको 'महात्मा' की उपाधि दी थी। देश की स्वतंत्रता दिलाने के लिए साल 1920 में असहयोग आंदोलन, साल 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन और साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन का नेतृत्व किया था।</p><h2>देश के राष्ट्रपिता</h2><p>06 जुलाई 1944 को सुभाष चंद्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से संदेश देते हुए पहली बार महात्मा गांधी को 'राष्ट्रपिता' कहकर संबोधित किया था। जिसके बाद से उनको राष्ट्रपिता की पदवी मिली थी। बताया जाता है कि इस संबोधन के बाद देश उनको बापू कहने लगा था। महात्मा गांधी के जीवन का मूल दर्शन सत्य, अहिंसा और स्वराज था। महात्मा गांधी ने स्वदेशी, खादी, स्वच्छता और छुआछूत उन्मूलन पर विशेष जोर दिया था।</p><h2>देश की आजादी</h2><p>महात्मा गांधी के अहिंसक आंदोलन और जन-नेतृत्व के बल पर ही देश को 15 अगस्त 1947 को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी मिली थी। महात्मा गांधी ने यह साबित कर दिखाया था कि बिना किसी शस्त्र और हिंसा के सिर्फ जन आंदोलन और नैतिक शक्ति के बल पर सबसे बड़ी औपनिवेशक सत्ता को झुकाया जा सकता है।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्याकर दी थी।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 12:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mahatma-gandhi-proponent-of-truth-and-non-violence-became-father-of-nation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[K Kamaraj Death Anniversary: भारतीय राजनीति के मंझे हुए राजनेता थे के कामराज, देश को दिए थे दो प्रधानमंत्री]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/k-kamaraj-seasoned-politician-in-indian-politics-who-gave-country-two-pm]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>स्वतंत्र भारत के पहले 'किंगमेकर' और तमिलनाडु के पूर्व मुख्यमंत्री के. कामराज का 02 अक्टूबर को निधन हो गया था। वह कांग्रेस के सबसे ताकतवर नेता माने जाते थे। वहीं के कामराज को कांग्रेस के संगठन में सुधार के फॉर्मूले का जनक माना जाता था। मद्रास के सीएम पद पर रहते हुए उन्होंने कई ऐसे कार्य किए थे, जिनकी चर्चा आज भी की जाती है। के कामराज को बिना करिश्माई भाषण के जनसमर्थन हासिल करने और बिना पद के सत्ता पर प्रभाव डालने के लिए जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर के कामराज के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>तमिलनाडु के विरुधुनगर में 15 जुलाई 1903 को के कामराज का जन्म हुआ था। इनका पूरा नाम कामाक्षी कुमारस्वामी नादेर था। उन्होंने गांव से अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की। जब के कामराज 6 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में आर्थिक तंगी के कारण उनका पढ़ाई छोड़नी पड़ी और वह अपनी मां के काम में मदद करने लगे। इस दौरान वह अपने चाचा की दुकान में काम करते थे। यह वही समय था, जब के कामराज होम रूल आंदोलन से जुड़ा सार्वजनिक सभाओं और जुलूसों में हिस्सा लेने लगे थे।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/lal-bahadur-shastri-india-second-pm-gave-slogan-jai-jawan-jai-kisan" target="_blank" rel="noopener">Lal Bahadur Shastri Birth Anniversary: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री, दिया था 'जय जवान, जय किसान' का नारा</a></p><h2>आजादी की जिद</h2><p>के कामराज स्वतंत्रता सेनानी भी थे। उन्होंने नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। देश की आजादी की लड़ाई में के कामराज कई बार जेल भी गए। फिर साल 1920 में वह 18 साल की उम्र में कांग्रेस के पूर्णकालिक राजनीतिक कार्यकर्ता बन गए और उन्होंने राजनीति में एंट्री ली। साल 1921 में उन्होंने विरुधुनगर में कांग्रेस के नेताओं के लिए जनसभाएं आयोजित कीं और इस दौरान वह महात्मा गांधी से पहली बार मिले थे।</p><h2>पहली बार पहुंचे विधानसभा</h2><p>वहीं 34 साल की उम्र में साल 1937 के प्रांतीय चुनावों में मद्रास राज्य की सत्तूर सीट पर के कामराज को जीत मिली और इस तरह से वह पहली बार विधानसभा पहुंचे। लेकिन भारत के रक्षा नियमों के तहत भाषणों के लिए उनको साल 1940 में गिरफ्तार कर सेंट्रल जेल भेज दिया गया। इस दौरान वह जेल में रहते हुए विरुधुनगर के नगर पार्षद बने। साल 1946 के प्रांतीय चुनावों में वह दूसरी बाद मद्रास की सत्तूर सीट से जीते और विधानसभा पहुंचे। बाद में उनको भारतीय संविधान सभी के लिए चुना गया।</p><h2>किंगमेकर बने कामराज</h2><p>जब देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित नेहरू का निधन हुआ, तो के कामराज कांग्रेस के राष्ट्रीय अक्ष्यक्ष थे। उन्होंने अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए लाल बहादुर शास्त्री के नाम को प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ाया। फिर जब शास्त्री के निधन पर दोबारा राजनीतिक संकट खड़ा हुआ, तो कामराज के सामने प्रधानमंत्री बनने का मौका था। लेकिन हिंदी न आने के कारण उन्होंने यह पद ठुकरा दिया और कहा कि देश के प्रधानमंत्री को हिंदी आना जरूरी है।</p><h2>मद्रास के सीएम</h2><p>साल 1954 में के कामराज ने मद्रास स्‍टेट के मुख्‍यमंत्री का पद संभाला। वह आजाद भारत के शायद पहले ऐसे सीएम थे, जिनको अंग्रेजी नहीं आती थी। लेकिन मद्रास, वर्तमान में तमिलनाडु में अगले 9 साल के उनके कार्यकाल को बेहतरीन दौर के रूप में देखा जाता है। के कामराज के नेतृत्व में मद्रास में कृषि और औद्योगिक क्षेत्र में बड़े पैमाने पर विकास हुआ था। इसके अलावा उन्होंने मिड-डे-मील योजना, शिक्षा के क्षेत्र में क्रांति और औद्योगिकीकरण का विस्तार किया।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 02 अक्टूबर 1975 में के कामराज का निधन हो गया था। मरणोपरांत के कामराज को 'भारत रत्न' से सम्मानित किया गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 12:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/k-kamaraj-seasoned-politician-in-indian-politics-who-gave-country-two-pm</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Raja Ravi Varma Death Anniversary: आधुनिक भारतीय कला के जनक थे राजा रवि वर्मा, ऑयल पेंटिंग में हासिल थी महारथ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/raja-ravi-varma-father-of-modern-indian-art-and-mastered-oil-painting]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 02 अक्टूबर को भारतीय कला के इतिहास के सबसे महान चित्रकारों और कलाकारों में से एक राजा रवि वर्मा का निधन हो गया था। उन्होंने अपने काम के माध्यम से देवी-देवताओं के स्वरूप को घर-घर तक पहुंचाने का काम किया। राजा रवि वर्मा को आधुनिक भारतीय कला का जनक भी कहा जाता है। उनको ऑयल चित्रकला में महारत हासिल की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर राजा रवि वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>केरल के त्रावणकोर के किलिमन्नूर गांव में 29 अप्रैल 1848 को राजा रवि वर्मा का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम एझुमाविल नीलकंठन भट्टातिरीपाद था, जोकि संस्कृत और आयुर्वेद के विद्वान थे। उनकी माता उमा अम्बाबाई थंपुरट्टी था, वह एक कवियत्री और लेखिका थीं। उन्होंने महज 5 साल की छोटी उम्र से ही घर की दीवारों पर चॉक से पेंटिंग बनाया करते थे।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/lal-bahadur-shastri-india-second-pm-gave-slogan-jai-jawan-jai-kisan" target="_blank" rel="noopener">Lal Bahadur Shastri Birth Anniversary: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री, दिया था 'जय जवान, जय किसान' का नारा</a></p><p>राजा रवि वर्मा के चाचा ने उनकी इस कला को पहचाना। फिर उन्होंने रवि वर्मा को शुरूआती पेंटिंग की टेक्निक सिखाई और समझायी थी। फिर उनके चाचा उन्हें तिरुवनंतपुरम के महल ले गए। यहां पर राजा रवि वर्मा को पेंटिंग की टेक्निक्स और कलर्स को समझने का मौका मिला था।</p><h2>यूरोपियन तकनीक का उपयोग</h2><p>राजा रवि वर्मा ने ऑयल पेंटिंग डच आर्टिस्ट थिओडोर जेंसन से और वाटर कलर पेटिंग रामा स्वामी नायडू सीखी थी। वहीं रवि वर्मा ने जितने भी पोट्रेट बनाए थे, वह सभी भारतीय पुराणों के चरित्र पर बनाए थे। इस दौरान राजा रवि वर्मा ने पेंटिंग्स को बनाने के लिए ऑयल कलर और यूरोपीय टेक्नीक का इस्तेमाल किया था। यूरोपीय आर्ट और तकनीक के कारण राजा रवि वर्मा की पेंटिंग्स काफी रियल लगती हैं।</p><h2>विवादों में भी फंसे</h2><p>साल 1894 में राजा रवि वर्मा द्वारा लिथोग्राफिक प्रेस खरीदी गई थी। इसमें भगवान की पेंटिंग्स को कॉपी करके कम प्राइज में बेचने लगे थे। लेकिन कुछ समय बाद ही उनकी यह प्रेस बंद हो गई थी। दरअसल, उन्होंने न्यूज पेंटिंग्स बनाई थी, जिस कारण वह विवादों में फंस गए थे। राजा रवि वर्मा ने महाकाव्यों की अप्सराओं जैसे रंभा और उर्वशी की न्यूड तस्वीरें बनाई थीं। इन तस्वीरों का काफी ज्यादा विरोध हुआ था। वहीं रवि वर्मा की प्रेस भी चला दी गई थी।</p><p>इसके अलावा उनकी 130 साल पुरानी पेंटिंग यशोदा और कृष्ण नीलामी में करीब 176.20 करोड़ में बिकी थी। यह राजा रवि वर्मा की भारत की सबसे महंगी बिकने वाली पेंटिंग है। इस पेंटिंग को उन्होंने साल 1980 के दशक में बनाई थी। वह पहले ऐसे चित्रकार थे, जिन्होंने देवी-देवताओं और भगवान की पेंटिंग बनाई है।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 02 अक्तूबर 1906 को 58 साल की उम्र में राजा रवि वर्मा का निधन हो गया था। लेकिन उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी पेंटिंग करोड़ों में बिकती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 11:04:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/raja-ravi-varma-father-of-modern-indian-art-and-mastered-oil-painting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lal Bahadur Shastri Birth Anniversary: भारत के दूसरे प्रधानमंत्री थे लाल बहादुर शास्त्री, दिया था 'जय जवान, जय किसान' का नारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/lal-bahadur-shastri-india-second-pm-gave-slogan-jai-jawan-jai-kisan]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 02 अक्टूबर को भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का जन्म हुआ था। लाल बहादुर शास्त्री ने 'जय जवान, जय किसान' का नारा देकर देश के किसानों और सैनिकों का मान बढ़ाया था। वह एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखते थे, लेकिन उन्होंने अपनी लगन और ईमानदारी के दम पर देश के दूसरे प्रधानमंत्री पद तक का सफर तय किया था। इसके अलावा लाल बहादुर शास्त्री ने स्वतंतत्रा संग्राम में सक्रिया भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर लाल बहादुर शास्त्री के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>उत्तर प्रदेश के वाराणसी से 7 मील दूर स्थित मुगलसराय नाम के एक छोटे से रेलवे कस्बे में 02 अक्टूबर 1904 को लाल बहादुर शास्त्री का जन्म हुआ था। इनके पिता टीचर थे। जब लाल बहादुर शास्त्री डेढ़ साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। पति के निधन के बाद इनकी मां अपने तीनों बच्चों को लेकर मायके चली गईं और वहीं रहने लगीं। शास्त्री का बचपन गरीबी और संघर्ष में बीता। उन्होंने वाराणसी से हाई स्कूल की पढ़ाई की।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/madhavrao-scindia-missed-becoming-pm-charted-his-journey-jan-sangh-to-congress" target="_blank" rel="noopener">Madhavrao Scindia Death Anniversary: दो बार PM बनने से चूक गए थे माधवराव सिंधिया, ऐसे तय की थी जनसंघ से कांग्रेस तक की यात्रा</a></p><h2>असहयोग आंदोलन से जुड़े</h2><p>महज 11 साल की छोटी उम्र में वह देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजादी दिलाने के बारे में सोचते थे। फिर 16 साल की उम्र में उन्होंने पढ़ाई छोड़कर गांधीजी के असहयोग आंदोलन में शामिल होने का मन बना लिया। साल 1926 में उन्होंने वाराणसी के काशी विद्यापीठ से नैतिकता और दर्शनशास्त्र में फर्स्ट डिवीजन के साथ बैचलर डिग्री ली।</p><h2>जेल यात्रा</h2><p>साल 1930 में गांधी जी दांडी के लिए समुद्र तट पर पहुंचे और शादी नमक कानून तोड़ा। इस दौरान शास्त्री ने खुद को पूरी तरह से देश के स्वतंत्रता संग्राम में झोंक दिया था। शास्त्री कई विरोधी अभियानों में शामिल हुए और ब्रिटिश जेलों में 7 साल बिताए।</p><h2>देश के प्रधानमंत्री</h2><p>देश की स्वतंत्रता के बाद कांग्रेस सरकार ने लाल बहादुर शास्त्री को उनके गृह रास्य उत्तर प्रदेश में संसदीय सचिव नियुक्त किया। इसके बाद साल 1951 में केंद्रीय राजनीति में कदम रखकर उन्होंने वाणिज्य एवं उद्योग, परिवहन व संचार और गृह मंत्रालय का कार्यभार संभाला। वहीं भारत के पहले पीएम पंडित नेहरू के निधन के बाद पार्टी में आम सहमति के बाद 02 जून 1964 से लाल बहादुर शास्त्री को दल का नेता चुना गया। वहीं 09 जून 1964 को लाल बहादुर शास्त्री भारत के दूसरे प्रधानमंत्री बने।</p><h2>जय जवान-जय किसान का दिया नारा</h2><p>साल 1965 में पाकिस्तान से युद्ध के बाद देश में भयंकर सूखा पड़ गया। ऐसे में शास्त्री ने इन परिस्थितियों से निकलने के लिए एक दिन का व्रत करने का अनुरोध किया। इस दौरान उन्होंने 'जय जवान जय किसान' का नारा दिया। शास्त्री ने 'हरित क्रांति' को भी बढ़ावा दिया। जिसका मकसद मांग को बढ़ाना और भारत के खाद्य उत्पादन को गति देना था।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं प्रधानमंत्री बनने के 19 महीने बाद ही 11 जनवरी 1966 को लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 10:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/lal-bahadur-shastri-india-second-pm-gave-slogan-jai-jawan-jai-kisan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Madhavrao Scindia Death Anniversary: दो बार PM बनने से चूक गए थे माधवराव सिंधिया, ऐसे तय की थी जनसंघ से कांग्रेस तक की यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/madhavrao-scindia-missed-becoming-pm-charted-his-journey-jan-sangh-to-congress]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 30 सितंबर को पूर्व रेलमंत्री माधवराव सिंधिया की एक विमान हादसे में निधन हो गया था। माधवराव सिंधिया यूपी के मैनपुरी में आयोजित एक सभा को संबोधित करने के लिए जा रहे थे। माधवराव सिंधिया के साथ कुछ नेता और पत्रकार भी थे। वह ग्वालियर राजघराने से ताल्लुक रखते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर माधवराव सिंधिया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>मुंबई में 10 मार्च 1945 को माधवराव सिंधिया का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम जीवाजी राव सिंधिया और मां का नाम राजमाता विजयाराजे सिंधिया था। वह बचपन से ही खेलों और पढ़ाई में आगे रहे। माधवराव सिंधिया का जीवन विलासिता में शुरू जरूर हुआ था, लेकिन बाद का उनका जीवन अपनी पहचान बनाने में बीता।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/50000-songs-sung-in-36-languages-lata-mangeshkar-became-nightingale-of-india" target="_blank" rel="noopener">Lata Mangeshkar Birth Anniversary: 36 भाषाओं में गाए 50 हजार से ज्यादा गाने, ऐसे स्वर कोकिला बनीं लता मंगेशकर</a></p><h2>राजनीतिक जीवन</h2><p>माधवराव सिंधिया ने जनता के बीच जाकर राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। साल 1971 में उन्होंने जनसंघ से अपने सियासी सफर की शुरूआत की थी। माधवराव सिंधिया ने अपने पहले चुनाव में ही भारी मतों के अंतर से जीत हासिल की और देशभर में सुर्खियां बटोरीं।</p><h2>जनसंघ Vs कांग्रेस</h2><p>भले ही उन्होंने अपनी पारी जनसंघ से शुरू की थी, लेकिन बाद में माधवराव ने कांग्रेस का दामन थाम लिया। वहीं साल 1984 के आम चुनावों में माधवराव सिंधिया ने ग्वालियर से अटल बिहारी वाजपेयी को शिकस्त दी थी। माधवराव की यह जीत न सिर्फ कांग्रेस पार्टी के लिए बल्कि पूरे देश की राजनीति के लिए चर्चा का विषय बन गया था। जनसंघ और भाजपा का गढ़ माना जाने वाला ग्वालियर अचानक से सिंधिया के किले में तब्दील हो गया।</p><p>1984 से 1998 तक उन्होंने ग्वालियर से लगातार जीत दर्ज की. 1996 में कांग्रेस से अलग होकर भी उन्होंने भारी बहुमत से जीत हासिल की. दूसरी तरफ, उनकी मां राजमाता विजयाराजे सिंधिया गुना से लगातार भाजपा के टिकट पर चुनाव जीतती रहीं।</p><p>माधवराव सिंधिया राजनीति के साथ-साथ खेल, कला और संस्कृति से भी गहरा लगाव रखते थे. क्रिकेट, गोल्फ और घुड़सवारी उनके प्रिय शौक थे. वे न केवल खुद उम्दा खिलाड़ी थे, बल्कि बाद में क्रिकेट प्रशासक के रूप में भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी. कला और फिल्मों में भी उनकी गहरी रुचि थी. लोग अक्सर हैरान होते थे कि इतने शौकों के बावजूद वे राजनीति के लिए दिन में 12 घंटे से भी अधिक समय निकाल लेते थे.</p><h2>बुलेट ट्रेन का रखा था प्रस्ताव</h2><p>रेल मंत्री रहने के दौरान सबसे पहले माधवराव सिंधिया ने भारत में बुलेट ट्रेन का विचार सामने रखा था। यह सिंधिया की दूरदर्शिता का उदाहरण था। वहीं नरसिंह राव सरकार में जब सिंधिया सिविल एविएशन मंत्री बने थे, तो एक विमान दुर्घटना होने के एक साल के अंदर उन्होंने अपनी नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए अपने पद से इस्तीफा दे दिया। राजनीति में इस तरह की नैतिकता उनको एक अलग पहचान देती थी।</p><p>वहीं राजीव गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस और देश की जनता की निगाहें देश के अगले पीएम नेताओं पर टिक गई थीं। इनमें माधवराव सिंधिया और राजेश पायलट सबसे आगे माने जा रहे थे। माना जा रहा था कि राजीव गांधी की विरासत को माधवराव सिंधिया आगे ले जा सकते हैं। वहीं राजनीति के समीकरण बदल गए और बाद में नरसिंह राव प्रधानमंत्री बने थे।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 30 सितंबर 2001 को माधवराव सिंधिया की एक विमान दुर्घटना में मौत हो गई थी।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 13:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/madhavrao-scindia-missed-becoming-pm-charted-his-journey-jan-sangh-to-congress</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lata Mangeshkar Birth Anniversary: 36 भाषाओं में गाए 50 हजार से ज्यादा गाने, ऐसे स्वर कोकिला बनीं लता मंगेशकर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/50000-songs-sung-in-36-languages-lata-mangeshkar-became-nightingale-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 28 सितंबर को स्वर कोकिला लता मंगेशकर का जन्म हुआ था। भले ही लता मंगेशकर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी सुरीली आवाज आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। लता मंगेशकर की आवाज ही उनकी पहचान थी और वह हमेशा बनी रहेगी। उन्होंने बेहद छोटी उम्र से काम करना शुरूकर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर लता मंगेशकर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>इंदौर के मराठी परिवार में 28 सितंबर 1929 को लता मंगेशकर का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम पंडित दीनदयाल मंगेशकर और मां का नाम श्रीमती माई थी। इनके पिता रंगमंच के कलाकार और गायक थे, ऐसे में लता को भी संगीत विरासत में मिला था। वहीं उनकी अभिनय में भी दिलचस्पी थी। लता मंगेशकर ने 5 साल की उम्र में पहली बार एक नाटक में अभिनय किया था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/dev-anand-was-bollywood-first-fashion-icon-introduced-new-style-of-romance" target="_blank" rel="noopener">Dev Anand Birth Anniversary: बॉलीवुड के पहले Fashion Icon थे देव आनंद, पेश किया था रोमांस का नया अंदाज</a></p><h2>सिंगिंग करियर</h2><p>लता मंगेशकर के कंधों पर कम उम्र से ही परिवार की जिम्मेदारी आ गई थी। जब लता 13 साल की थीं, तो उनके पिता का निधन हो गया, ऐसे में 14 साल की उम्र से लता मंगेशकर ने फिल्मों में हीरो या हीरोइन की बहन का रोल करना शुरूकर दिया। इसके अलावा उन्होंने संगीत की शिक्षा भी जारी रखी। सिंगिंग करियर की बात करें, तो उन्होंने 13 साल की उम्र में फिल्म 'पहिली मंगलागौर' से अपना सफर शुरू किया था, जिसके लिए लता मंगेशकर को 25 रुपए मिले थे।</p><p>इसके बाद साल 1942 में उन्होंने मराठी फिल्म 'किता हसाल' के लिए गाना गया था। लेकिन उनको पहचान फिल्म 'महल' के गाने 'आएगा आने वाला' से मिली थी। उन्होंने दुनियाभर की करीब 36 भाषाओं में 50 हजार से ज्यादा गाने गाए थे।</p><h2>कभी स्कूल नहीं गईं लता मंगेशकर</h2><p>आपको जानकर हैरानी होगी कि लता मंगेशकर सिर्फ एक दिन के लिए स्कूल गई थीं। दरअसल, जब वह पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा भोसले को स्कूल लेकर गईं। तो टीचर ने आशा को स्कूल से यह कहकर निकाल लिया कि उनको भी फीस देनी होगी। ऐसे में लता ने निश्चय किया कि वह कभी स्कूल नहीं जाएंगी। हालांकि बाद में लता मंगेशकर को न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी सहित 6 यूनिवर्सिटीज में मानक उपाधि से नवाजा गया था।</p><h2>गिनीज बुक में दर्ज हुआ लता का नाम</h2><p>साल 1974 में लंदन के फेमस रॉयल अल्बर्ट हॉल में लता मंगेशकर को पहली भारतीय गायिका के रूप में गाने का मौका मिला था। साल 1974 में दुनिया में सबसे ज्यादा गीत गाने का 'गिनीज बुक रिकॉर्ड' लता मंगेशकर के नाम पर दर्ज किया गया था।</p><p>1974 में लंदन के सुप्रसिद्ध रॉयल अल्बर्ट हॉल में लता मंगेशकर को पहली भारतीय गायिका के रूप में गाने का अवसर प्राप्त हुआ। सन 1974 में दुनिया में सबसे अधिक गीत गाने का 'गिनीज बुक रिकॉर्ड' उनके नाम पर दर्ज किया गया था।</p><h2>लता मंगेशकर ने रखा था मौन व्रत</h2><p>60 के दशक में लता को वोकल कॉर्ड्स में तकलीफ के चलते वे गा नहीं पा रही थीं। तब उन्होंने कुछ महीनों का ब्रेक लिया और मौन व्रत रखा। लेकिन हेमंत कुमार को फिल्म 'बीस साल बाद' के लिए लता की आवाज चाहिए थी। जिसके लिए उन्होंने लता को राजी किया और इस फिल्म का गाना 'कहीं दीप जले, कहीं दिल' गाना सुपरहिट हुआ। इसके लिए लता मंगेशकर को बेस्ट फीमेल प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवॉर्ड भी मिला था।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 06 फरवरी 2022 में 92 साल की उम्र में लता मंगेशकर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 28 Sep 2026 14:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/50000-songs-sung-in-36-languages-lata-mangeshkar-became-nightingale-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ishwar Chandra Vidyasagar Birth Anniversary: बंगाल पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभ थे ईश्वरचंद्र विद्यासागर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/ishwar-chandra-vidyasagar-key-pillar-of-the-bengal-renaissance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 26 सितंबर को प्रसिद्ध समाज सुधारक, शिक्षा शास्त्री और स्वाधीनता संग्राम के सेनानी रहे ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म हुआ था। ईश्वरचंद्र विद्यासागर को दलितों और गरीबों का संरक्षक माना जाता था। उन्होंने विधवा विवाह और स्त्री शिक्षा के खिलाफ आवाज उठाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर ईश्वरचंद्र विद्यासागर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 26 सितंबर 1820 को ईश्वरचंद्र विद्यासागर का जन्म हुआ था। वह एक धार्मिक परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम ठाकुरदास बन्धोपाध्याय और माता का नाम भगवती देवी था। विद्यासागर का बचपन गरीबी में बीता। वह चीजों को जल्दी सीख लेते थे और पढ़ाई में अच्छे होने के कारण उनको कई संस्थानों से स्कॉलरशिप भी मिली थीं। वह बेहद विद्वान थे, जिस कारण उनको विद्यासागर की उपाधि मिली थी।</p><h2>शिक्षा पद्धति सुधारने की कोशिश</h2><p>साल 1839 में विद्यासागर ने कानून की पढ़ाई पूरी की और साल 1841 में वह फोर्ट विलियम कॉलेज में पढ़ाने लगे। 5 साल तक सेवा देने के बाद उन्होंने इसको छोड़ दिया और संस्कृत कॉलेज में सहायक सचिव के रूप में काम करने लगे। पहले साल शिक्षा पद्धति को सुधारने के लिए विद्यासागर ने प्रशासन को अपनी सिफारिशें सौंपी। जिसकी वजह से उनके और तत्कालीन कॉलेज सचिव के बीच तकरार हो गई। इस कारण विद्यासागर ने कॉलेज छोड़ दिया। साल 1849 में वह एक बार फिर साहित्य के प्रोफेसर के रूप में संस्कृत कॉलेज से जुड़े।</p><h2>महिला विद्यालयों की स्थापना</h2><p>ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 'मेट्रोपोलिटन विद्यालय' सहित अनेक महिला विद्यालयों की स्थापना की थी। इसके अलावा साल 1948 में उन्होंने वैताल पंचविंशति नामक बंगला भाषा की प्रथम गद्य रचना का प्रकाशन किया था। शिक्षाविद विद्यासागर का मानना था कि संस्कृत और अंग्रेजी भाषा के समन्वय से भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं के श्रेष्ठता को प्राप्त किया जा सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/dr-manmohan-singh-became-pm-without-contesting-election" target="_blank" rel="noopener">Dr Manmohan Singh Birth Anniversary: विरोधी भी थे मनमोहन सिंह के सरल स्वभाव के कायल, बिना चुनाव लड़े बने थे PM</a></p><p>जब विद्यासागर को संस्कृत कॉलेज का प्रोफेसर बनाया गया, तो उन्होंने सभी जाति के बच्चों के लिए कॉलेज के दरवाजे खोल दिए। यह विद्यासागर के लगातार प्रचार का नतीजा था कि साल 1856 में विधवा पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। उन्होंने अपने बेटे की शादी एक विधवा से कराई थी। इसके अलावा ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने बाल विवाह और बहुपत्नी विवाह के खिलाफ भी आवाज उठाई थी।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 19वीं सदी के महान समाज सुधारक, शिक्षाविद् और बंगाल पुनर्जागरण के प्रमुख स्तंभ रहे ईश्वरचंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई 1891 को निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 26 Sep 2026 12:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/ishwar-chandra-vidyasagar-key-pillar-of-the-bengal-renaissance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dr Manmohan Singh Birth Anniversary: विरोधी भी थे मनमोहन सिंह के सरल स्वभाव के कायल, बिना चुनाव लड़े बने थे PM]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/dr-manmohan-singh-became-pm-without-contesting-election]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज ही के दिन यानी की 26 सितंबर को भारत के पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस के सीनियर नेता डॉ. मनमोहन सिंह का जन्म हुआ था। वह साल 2004 से लेकर 2014 तक लगातार 10 साल देश के प्रधानमंत्री रहे। प्रधानमंत्री से पहले मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री भी रहे हैं। उनको भारत में बड़े आर्थिक सुधार का जनक भी कहा जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मनमोहन सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और शिक्षा</h2><p>अविभाजित भारत के पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में 26 सितंबर 1932 को मनमोहन सिंह का जन्म हुआ था। मनमोहन सिंह ने पंजाब विश्वविद्यालय और ब्रिटेन के कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा पूरी की थी। साल 1962 में उन्होंने ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में डी. फिल भी किया था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/visvesvaraya-creator-of-block-system-for-irrigation-became-bhagiratha-of-karnataka" target="_blank" rel="noopener">M Visvesvaraya Birth Anniversary: सिंचाई के लिए Block System बनाने वाले M Visvesvaraya कैसे बने कर्नाटक के भगीरथ</a></p><h2>शांत स्वभाव के लिए थे फेमस</h2><p>डॉ मनमोहन सिंह अपने सरल और शांत स्वभाव के लिए भी जाने जाते थे। यही कारण है कि उनकी पार्टी के विरोधी भी उनका सम्मान करते थे। वह भले ही शांत और कम बोलते थे, लेकिन उनका वह किस्सा आज भी लोग याद करते हैं, जब संसद में भाजपा नेत्री सुषमा स्वराज और मनमोहन सिंह के बीच शेरो-शायरी हुई थी। दोनों नेताओं ने शेरो-शायरी के जरिए एक-दूसरे को संसद में जवाब दिया था।</p><h2>आरबीआई के गवर्नर</h2><p>पूर्व पीएम राजीव गांधी की सरकार में मनमोहन सिंह साल 1985 से लेकर 1987 तक भारतीय योजना आयोग के प्रमुख के पद पर। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ काम किया। इसके साथ ही वह साल 1982 से लेकर 1985 तक आरबीआई के गवर्नर भी रहे। इस दौरान मनमोहन सिंह ने बैंकिंग के क्षेत्र में कई अहम सुधार किए।</p><p>फिर साल 1987 से लेकर 1990 तक उन्होंने संयुक्त राष्ट्र में दक्षिण आयोग के महासचिव के तौर पर जिम्मेदारी संभाली। साल 1991 में वह असम से राज्यसभा सदस्य निर्वाचित हुए। साल 1995, 2001, 2007 और 2013 में मनमोहन सिंह उच्च सदन के सदस्य रहे। जब साल 1998 से लेकर 2004 तक केंद्र में वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार थी, तो इस दौरान मनमोहन सिंह राज्यसभा में विपक्ष के नेता थे।</p><h2>PM बनने का रिकॉर्ड</h2><p>साल 1999 में मनमोहन सिंह ने दक्षिणी दिल्ली से चुनाव लड़ा, लेकिन उनको हार का सामना करना बड़ा। कांग्रेस ने साल 2009 का लोकसभा चुनाव मनमोहन सिंह के नेतृत्व में लड़ा था, लेकिन इस बार वह चुनावी मैदान में नहीं उतरे थे। राज्यसभा सदस्य रहते हुए उनका पीएम बनने का रिकॉर्ड आज भी मनमोहन सिंह के नाम दर्ज है।</p><h2>आर्थिक सुधारों में महत्वपूर्ण रोल</h2><p>देश में हुए आर्थिक सुधारों में डॉ. मनमोहन सिंह ने अहम रोल निभाया था। साल 1991 में नरसिम्हा राव की सरकार में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री रहे थे। उन्होंने बजट के दौरान वैश्विकरण, निजीकरण और उदारीकरण से जुड़े कई बड़े और अहम ऐलान किए थे। जिससे देश की अर्थव्यवस्था को गति मिली थी।</p><h2>सम्मान</h2><p>साल 1987 में मनमोहन सिंह को भारत के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।</p><p>साल 1993 में मनमोहन सिंह को वर्ष के सर्वश्रेष्ठ वित्त मंत्री के लिए एशिया मनी अवॉर्ड से सम्मानित किया गया।</p><p>साल 1995 में उनको जवाहरलाल नेहरू बर्थ सेंटेनरी अवॉर्ड ऑफ द इंडियन साइंस कांग्रेस से नवाजा गया।</p><p>साल 1956 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी का एडम स्मिथ पुरस्कार दिया गया।</p><h2>मृत्यु</h2><p>भारत के पूर्व पीएम डॉ मनमोहन सिंह का 26 दिसंबर 2024 में 92 साल की उम्र में निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 26 Sep 2026 12:25:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/dr-manmohan-singh-became-pm-without-contesting-election</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dev Anand Birth Anniversary: बॉलीवुड के पहले Fashion Icon थे देव आनंद, पेश किया था रोमांस का नया अंदाज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/dev-anand-was-bollywood-first-fashion-icon-introduced-new-style-of-romance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता रहे देव आनंद का 26 सितंबर को जन्म हुआ था। वह अपने खास अंदाज, शानदार अदाकारी और सदाबहार फिल्मों के जरिए हिंदी सिनेमा और दर्शकों के दिलों में अपनी खास पहचान बनाई थी। देव आनंद अभिनेता, लेखक, निर्माता, निर्देशक और राजनीति में भी एक्टिव रहे। देव आनंद ने अपने लंबे फिल्मी सफर में करीब 100 से ज्यादा फिल्मों में काम किया। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर अभिनेता देव आनंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>बता दें कि 26 सितंबर 1923 को देव आनंद का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम धर्मदेव पिशोरिमल आनंद था। वह फिल्मों में आने से पहले अंग्रेजों का खत पढ़ा करते थे। इसके अलावा उन्होंने एक अकाउंटेंसी फर्म में क्लर्क की नौकरी भी की थी, जिसके लिए उनको हर महीने 85 रुपए सैलरी मिला करती थी। इसके बाद देव आनंद ने मिलिट्री सेंसर ऑफिस में काम किया। फिर एक दिन उन्होंने नौकरी छोड़ दी औऱ फिल्मों में काम करने का मन बनाया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-literature-to-social-service-such-iconic-journey-of-meera-of-hindi" target="_blank" rel="noopener">Mahadevi Verma Death Anniversary: साहित्य से समाज सेवा तक, ऐसा रहा 'हिंदी की मीरा' का Iconic Journey</a></p><h2>फिल्म सफर</h2><p>कुछ साल स्ट्रगल करने के बाद उन्हें फिल्म 'हम एक हैं' में काम करने का मौका मिला, यहीं से देव आनंद के फिल्मी सफर की शुरूआत हुई थी। वह भारतीय सिनेमा के शानदार और सदाबहार अभिनेता थे। जिन्होंने अपनी यूनिक स्टाइल से बेहतरीन अभिनय ने दर्शकों के दिलों पर दशकों तक राज किया। देव आनंद ने 'बाजी', 'सीआईडी', 'टैक्सी ड्राइवर', 'हम दोनों', 'काला पानी', 'तेरे घर के सामने', 'ज्वेल थीफ', 'गाइड', 'जॉनी मेरा नाम' और 'हरे रामा हरे कृष्णा' जैसी बेहतरीन फिल्मों में काम किया।</p><h2>काले कपड़े पहनने पर लगी थी रोक</h2><p>देव आनंद फिल्मों में अपने अभिनय और खास फैशन के लिए भी जाने जाते थे। फिल्म 'काला पानी' की रिलीज के दौरान एक घटना के बाद अभिनेता को काले कपड़े पहनने से मना कर दिया गया था। दरअसल, बताया जाता है कि काले कपड़े में अभिनेता को देखने के लिए महिलाएं इमारत से कूद जाता करती थीं, जिस कारण एक महिला की जान चली गई थी।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 04 दिसंबर 2011 को देव आनंद का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 26 Sep 2026 12:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/dev-anand-was-bollywood-first-fashion-icon-introduced-new-style-of-romance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[एकात्म मानववाद के प्रणेता- पं. दीनदयाल उपाध्याय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/the-proponent-of-integral-humanism-pt-deendayal-upadhyaya]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>महान विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के मथुरा जनपद के नगला चंद्रभान नामक गाँव में हुआ था। दीन दयाल जी के पिता का नाम पंडित भगवती प्रसाद उपाध्याय था। उपाध्याय परिवार भारतीय संस्कृति और परम्परा में रचा बसा था। परिवारी जन बाल्यावस्था में दीनदयाल जी को दीना कहकर बुलाते थे। बालक दीना की मेधा बचपन से ही प्रबल थीं। यद्यपि दीना की शिक्षा अत्यंत विषम परिस्थितियों में हुई तथापि अप्रतिम मेधा का परिचय देते हुए उन्होंने अपनी हाईस्कूल से लेकर स्नातक तक की सभी परीक्षाएं प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करीं। बालक दीना छात्र जीवन में ही संघ से जुड़ गया और सामजिक जीवन में पूरे नाम दीन दयाल से पहचाना जाने लगा। दीन दयाल जी छात्रावास में लगने वाली शाखा में वे प्रतिदिन जाते थे और शाखा से प्राप्त संस्कारों से प्रेरित होकर उन्होंने अपना तन, मन और जीवन पूरी तरह से देश के लिए समर्पित कर दिया। दीन दयाल जी को संघ संस्थापक डा. केशवराम बलिराम हेडगेवार तथा &nbsp;वरिष्ठ प्रचारक भाऊराव देवरस जी का सानिध्य प्राप्त हुआ। उन्होंने अपने जीवन को पूरी रचनात्मक त्वरा और विश्लेषणात्मक गहराई से जिया। उनके पत्रकारिता जीवन के दौरान लिखे शब्द आज भी उपयोगी है।</p><p>दीन दयाल जी एकात्म मानववाद के प्रणेता हैं। उनके द्वारा प्रस्तुत एकात्म मानववाद मूलतः ऋग्वेद के पुरुष सूक्त पर आधारित है जिसमें संपूर्ण समाज की परिकल्पना एक विराट पुरुष के रूप में की गयी है। एकात्म मानववाद आज के युग में भी उतना ही प्रासंगिक है जितना उनके समय में था एकात्म मानववाद पर उनका कहना था, ”हमारे यहां समाज को स्वयंभू माना है”। राज्य एक संस्था के नाते है। राज्य की संस्थाएं भी समय- समय पर पैदा होती हैं।प्रत्येक व्यक्ति इनमें से प्रत्येक संस्था का सदस्य होता है। पंडित जी की तत्व दृष्टि थी कि सम्पूर्ण विश्व के समक्ष उपस्थित मार्ग विभ्रम का उत्तर भारतीय संस्कृति में निहित है। भारतीय संस्कृति समग्रतावादी है। यह सार्वभौमिक भी है। पश्चिम की दुनिया में हजारों वाद हैं। पूरा पश्चिमी जगत विक्षिप्त है। पश्चिम में सुस्पष्ट दर्शन का अभाव है। वही अभाव पश्चिम को भारत की ओर आकर्षित करता है। अमरीका का प्रत्येक व्यक्ति आनंद की प्यास में भारत की ओर टकटकी लगाये हुये है। भारत ने &nbsp;सम्पूर्ण सृष्टि रचना में एकत्व देखा है। भारतीय संस्कृति इसीलिए सनातन काल से एकात्मवादी है। पण्डितजी के अनुसार सृष्टि के एक- एक कण में &nbsp;परावलम्बन है। भारत ने इसे ही अद्वैत कहा है। भारत ने सभ्यता के विकास में परस्पर सहकार को ही मूल तत्व माना है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/pt-deendayal-upadhyaya-the-torch-of-ideas-that-remains-alight-to-this-day" target="_blank" rel="noopener">पं. दीनदयाल उपाध्यायः विचारों की वह मशाल जो आज भी प्रज्वलित है</a></p><p>भारतीय जनसंघ के शिखर पुरुष के रूप में उन्होंने राजनीति में शुचिता पर विशेष बल दिया। वह स्वयं ही इसका उदाहरण बने। 1962 के लोकसभा चुनाव के पश्चात जौनपुर संसदीय सीट से भारतीय जनसंघ के विजयी प्रत्याशी ब्रह्मजीत सिंह का आकस्मिक निधन हो गया। इस सीट पर उपचुनाव हुआ। उपचुनाव में जनसंघ की ओर से दीनदयाल उपाध्याय और कांग्रेस की ओर से राजवीर सिंह मैदान में उतरे। दोनों दलों के नेता अपनी -अपनी रणनीति बनाई। दीनदयाल जी ने जनसंघ की राजनीतिक तथा आर्थिक नीतियों की श्रेष्ठता तथा कांग्रेस की गलत नीतियों को आधार बनाकर चुनाव में जाने का निश्चय किया।चुनाव जीतने के लिए किसी भी प्रकार के छल कपट का सहारा न लेने का निर्णय लिया। वहां पर चुनावी चर्चा के दौरान लोगों ने कहा कि यह चुनाव क्षेत्र ब्राह्मण &nbsp;बहुल है अतः यदि दीनदयाल जी को ब्राह्मण प्रत्याशी कहकर उनका प्रचार किया जाए और उनके नाम के आगे पंडित जी लगा दिया जाए &nbsp;तो चुनाव जीतना आसान हो जाएगा। इस बात पर दीनदयाल जी ने कहा कि इस प्रकार जातीय भावना को भड़का कर चुनाव तो जीता जा सकता है लेकिन ऐसा करने से भारतीय जनसंघ का आदर्श हार जाएगा। उन्होंने कहा कि हमें भारतीय जनसंघ की जीत के लड़ना है न कि पंडित दीनदयाल की जीत के लिये।</p><p>वह सदा ही उच्च नैतिक मापदंडों की राजनीति के पक्षधर थे। राजनीति में उन्हें जाति एवं धर्म के नाम पर भेदभाव पसंद नहीं था। उनकी इस नीति का परिणाम यह रहा कि लोकसभा उपचुनाव में जौनपुर, अमरोहा एवं फर्रुखाबाद में विपक्ष का संयुक्त उम्मीदवार खड़ा किया गया और डा.लोहिया ने जनसंघ की राष्ट्रवादी नीति की सराहना की। जनसंघ ने लोहिया की फर्रुखाबाद और आचार्य जे बी कृपलानी की अमरोहा से उम्मीदवारी का समर्थन किया। कांग्रेस पार्टी ने उस समय भी छल -कपट का सहारा लिया। दुर्भाग्यवश दीनदयाल जी जौनपुर से हार गए जबकि अमरोहा से आचार्य जे. बी. कृपलानी तथा फर्रुखाबाद से डा. राम मनोहर लोहिया जीत गये। चुनाव परिणाम आने पर दीन दयाल जी ने कहा कि यह सुखद है कि क्योंकि हम अपनी नीतियों से नहीं कांग्रेस के छल कपट से हारे हैं।</p><p>दीनदयाल जी की पहचान एक उत्कृष्ट लेखक की भी है। एकात्म मानववाद, लोकमान्य तिलक की राजनीति, जनसंघ का सिद्धांत और नीति, राष्ट्र जीवन की समस्याएँ, राष्ट्रीय अनुभूति, कश्मीर, अखंड भारत, भारतीय राष्ट्र धारा का पुनः प्रवाह, भारतीय संविधान, इनको भी आजादी चाहिए, अमरीकी अनाज, भारतीय अर्थनीति, विकास की एक दिशा, बेकारी समस्या और हल, टैक्स या लूट, विश्वासघात दि ट्रू प्लान्स, डिबुलशन ए ग्रेटकाल आदि उनकी कुछ चर्चित कृतियाँ हैं। उनके लेखन का केवल एक ही लक्ष्य था भारत की विश्व पटल पर लगातार प्रतिष्ठा और विजय। उन्होंने संघ की अनेक पत्र- पत्रिकाओं का लम्बे समय तक संपादन भी किया। जिसमें लखनऊ से प्रकाशित राष्ट्रधर्म व दिल्ली से प्रकाशित पांचजन्य प्रमुख हैं। वे एक ऐसे महान कर्मयोगी थे कि पत्र को समय पर निकालने के लिये उन्होंने रातभर कम्पोजिंग का कार्य स्वयं किया। पण्डित जी ने मात्र एक ही दिन में सम्राट चन्द्रगुप्त व आद्य शंकराचार्य &nbsp;जैसे चरित्रों पर पुस्तक लिखकर भारतीय इतिहास के एक सांस्कृतिक निष्ठा वाले राज्य का चित्रण किया। निश्चित रूप से पण्डितजी शब्द और कृति की एकात्मकता के सर्जक थे। पण्डित जी ने राजनैतिक लेखन को भी दीर्घकालिक विषयों से जोड़कर रचना कार्य को सर्वकालिक बनाया।</p><p>दीनदयाल जी की आर्थिक मान्यता थी कि आर्थिक योजनाओं तथा आर्थिक प्रगति की माप समाज के सबसे निचले स्तर पर विद्यमान व्यक्ति से होनी चाहिए। अन्त्योदय को अंतिम लक्ष्य मानते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी &nbsp;के नेतृत्व में चल रही वर्तमान केंद्र सरकार व भाजपा शासित राज्य सरकारें दीनदयाल जी के अन्त्योदय की परिकल्पना को साकार करने का प्रयास कर रही हैं। 80 करोड़ की जनता को निःशुल्क राशन, उज्वला योजना, आयुष्मान भारत, नल से जल, जन-धन ऐसी ही अन्त्योदय से प्रेरित योजनाएं हैं। दीन दयाल जी स्वदेशी और स्वावलंबन के पक्षधर थे प्रधानमंत्री की स्टार्टअप इंडिया, विश्वकर्मा योजना जैसी योजनाएं &nbsp;तथा आत्मनिर्भर भरत व लोकल फॉर वोकल जैसे अभियान दीनदयाल जी के विचारों के अनुरूप हैं।</p><p>दीनयाल जी निष्कपट, चरित्रवान, प्रखर देशभक्त तथा लोकसंग्रही होने के साथ ही सादा जीवन तथा सनातन राष्ट्रधर्मिता से संपन्न थे। विश्व मानवता को भारत की पुण्य धरती के लाखों लाख ऋषियों के ज्ञान का तत्व एकात्म मानव दर्शन के रूप में पहुंचाने वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय शताब्दियों तक भारतीय राजनीति में ध्रुव तारे की तरह प्रकाशवान रहेंगे।</p><p>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 10:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/the-proponent-of-integral-humanism-pt-deendayal-upadhyaya</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Nanak Dev Death Anniversary: 22 सितंबर को Kartarpur में ली थी अंतिम सांस, दिया था एकता का संदेश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/guru-nanak-dev-death-anniversary-remembering-first-sikh-guru]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सिख धर्म के संस्थापक और सिखों के पहले गुरु, गुरु नानक देव का 22 सितंबर को निधन हो गया था। इस दौरान गुरुद्वारों में गुरुवाणी का पाठ किया जाता है और जगह-जगह पर लंगर का आयोजन होता है। गुरुनानक देव जी ने करतारपुर में अंतिम सांस ली थी। वह एक दार्शनिक थे, जिन्होंने यह भांप लिया था कि समाज में फैली कुरीतियां समाज को खोखला कर रही हैं और इससे व्यक्ति पतन की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने समाज को नई दिशा दिखाने का कार्य किया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सिख गुरु, गुरु नानक देव जी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p>वहीं 15 अप्रैल 1469 में कार्तिक माह की पू्र्णिमा को तलवंडी नामक स्थान पर नानक देव जी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम मेहता कालू और माता का नाम तृप्ता देवी था। नानक देव जी के साथ बचपन में कई चमत्कारी घटनाएं घटी थीं। इन घटनाओं ने नानक देव जी को आध्यात्म की ओर बढ़ने के लिए प्रेरित किया था। वह बचपन से ही धार्मिक प्रवृति के बालक थे और आगे जाकर वह सिख समाज के पहले गुरु बने थे।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba" target="_blank" rel="noopener">Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर</a></p><h2>सिखों के पहले गुरु</h2><p>माना जाता है कि गुरु नानक देव बचपन से ही चिंतनशील और शांत प्रवृत्ति के थे। जब नानक देव के साथी खेलकूद में व्यस्त रहते थे, तब वह साधना और ध्यान में लीन रहते थे। उनकी इस धार्मिक प्रवृत्ति की वजह से उनके माता-पिता परेशान रहते थे। ऐसे में नानक देव को बचपन में पढ़ने के लिए गुरुकुल भेजा गया था। लेकिन नानक देव के सवालों के आगे गुरु निरुत्तर हो गए। यहां तक कि जब उनको शिक्षा के लिए मौलवी के पास भेजा गया था, तब भी उनकी जिज्ञासा का कोई जवाब नहीं दे सका। सभी लोगों ने माना कि उनको ईश्वर ने स्वयं ज्ञाव देकर पृथ्वी पर भेजा है।</p><p>बाद में गुरु नानक देव घर-बार त्याग कर भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब देशों की यात्राओं पर निकल गए। वह जहां भी गए, उन्होंने समानता, प्रेम और ईश्वर के प्रति भक्ति का संदेश दिया। नानक देव ने पंजाब में करीब की निर्गुण उपासना का प्रचार किया था और समाज को एकता का संदेश दिया। इसी वजह से नानक देव सिखों के पहले गुरु के रूप में जाने गए।</p><h2>मक्का की यात्रा</h2><p>बता दें कि गुरु नानक देव जी ने अपने शिष्य मरदाना के साथ करीब 28 सालों में 2 उपमहाद्वीपों में 5 प्रमुख यात्राएं पैदल की थीं। जिनको उदासी कहा जाता है। इन 28 हजार किमी लंबी यात्राओं में गुरु नानक देव ने करीब 60 सालों का भ्रमण किया था। अपनी चौथी उदासी में नानक देव ने मक्का की यात्रा की। नानक देव ने हाजी का भेष रखा और अपने शिष्यों के साथ मक्का गए। कई हिंदू, जैन और बौद्ध धर्म के तीर्थ स्थलों की यात्रा की और फिर मक्का की यात्रा की।</p><h2>कुरीतियों का किया विरोध</h2><p>अपनी यात्राओं के दौरान गुरु नानक देव ने कई जगहों पर अपना डेरा जमाया और समाज में फैली कुरीतियों का विरोध किया। नानक देव जी ने मूर्ति पूजा को निर्थक माना और रुढ़िवादी सोच का भी विरोध किया।</p><h2>मृत्यु</h2><p>वहीं 22 सितंबर 1539 को पाकिस्तान के करतारपुर में गुरु नानक देव ने आखिरी सांस ली।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 12:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/guru-nanak-dev-death-anniversary-remembering-first-sikh-guru</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[M Visvesvaraya Birth Anniversary: सिंचाई के लिए Block System बनाने वाले M Visvesvaraya कैसे बने कर्नाटक के भगीरथ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/visvesvaraya-creator-of-block-system-for-irrigation-became-bhagiratha-of-karnataka]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देश के महान इंजीनियर रहे एम विश्वेश्वरैया का 15 सितंबर को जन्म हुआ था। वह देश के महान इंजीनियर, विद्वान और प्रशासक थे। उनको भारत के आधुनिक इंजीनियरिंग विकास के प्रमुख वास्तुकारों में गिना जाता है। उन्होंने भारतीय इंजीनियरिंग को नई दिशा देने का काम किया था। विश्वेश्वरैया ने सिंचाई के लिए ब्लॉक सिस्टम विकसित किया था, जिसको इंजीनियरिंग का अब तक का अद्भुत कारनामा माना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एम विश्वेश्वरैया के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</p><h2>जन्म और परिवार</h2><p><br>मैसूर राज्य के कोलार जिले के चिक्काबल्लापुर तालुक में 15 सितंबर 1860 को एम विश्वेश्वरैया का जन्म हुआ था। वह तेलुगु परिवार से ताल्लुक रखते थे। शुरूआती शिक्षा गांव से पूरी होने के बाद 1880 में उन्होंने बीए की पढ़ाई की। इसके बाद उन्होंने मैसूर सरकार की सहायता से पूना के साइंस कॉलेज से इंजीनियरिंग की पढ़ाई की और पहला स्थान हासिल किया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba" target="_blank" rel="noopener">Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर</a></p><h2>कर्नाटक का भगीरथ</h2><p><br>टॉरर होने के कारण महाराष्ट्र सरकार ने विश्वेश्वरैया को सहायक इंजीनियर के पद के लिए चुना। विश्वेश्वरैया के नाम मैसूर और कर्नाटक के क्षेत्रो में कृष्णराजसागर बांध सहित बहुत से निर्माण कार्य किए। जिसने कर्नाटक को एक नई ऊंचाइयों पर खड़ा कर दिया और आज भी विश्वेश्वरैया को कर्नाटक का भगीरथ भी कहा जाता है।</p><h2>उपलब्धियां</h2><p><br>वहीं कर्नाटक से बाहर विश्वेश्वरैया के नाम कम उपलब्धियां नहीं रही हैं। ग्वालियर का टिगरी डैम हो, सिंधु नदी से सुक्कुर कस्बे को पानी की आपूर्ति की योजना हो या साल 1952 में पटना में गंगा नदी पर राजेंद्र सेतु के निर्माण की योजना हो। विश्वेश्वरैया ने हर जगह अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया। उन्होंने सिर्फ देश ही नहीं बल्कि मिस्र, कनाडा, अदन, अमेरिका और रूस में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।</p><h2>नियोजन पर किताबें</h2><p><br>देश के शुरूआती विकास का आधार रही पंचवर्षीय योजनाओं को शुरू करने की प्रेरणा रूस की पंचवर्षीय योजना से ली गई थी। साल 1928 में रूस द्वारा ऐसी योजनाएं शुरू की थी। लेकिन इससे 8 साल पहले साल 1920 में उन्होंने रीकंस्ट्रक्टिंग इंडिया पर ऐसी योजनाओं का जिक्र किया था। वहीं साल 1935 प्लांड इकोनॉमी ऑफि इंडिया किताब लिखी।</p><p>विश्वेश्वरैया को लंबी और सेहतमंद उम्र के लिए भी जाना जाता है। 92 साल की उम्र में विश्वेश्वरैया ने पटना के राजेंद्र सेतु का निर्माण करवाया था। साल 1955 में उनको भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से नवाया गया था। जब विश्वेश्वरैया 100 साल के लिए तो उनके सम्मान में एक डाक टिकट जारी किया गया।</p><h2>मृत्यु</h2><p><br>वहीं 14 अप्रैल 1962 को 101 साल की उम्र में एम विश्वेश्वरैया का निधन हो गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 14:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/visvesvaraya-creator-of-block-system-for-irrigation-became-bhagiratha-of-karnataka</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Neem Karoli Baba Death Anniversary: जानिए Lakshman Narayan Sharma के Neem Karoli Baba बनने का सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नीम करौली बाबा का नाम सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बड़ी श्रद्धा के साथ लिया जाता है। आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को नीम करौली बाबा का निधन हो गया था। बाबा को एक दिव्य पुरुष, महान योगीराज और हनुमान जी का भक्त माना जाता है। वहीं नीम करौली बाबा के अनुयायी मानते हैं कि वह स्वयं हनुमान जी के अवतार थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाबा नीम करौली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद जिले के अकबरपुर गांव में करीब 1900 के आसपास नीम करौली बाबा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम लक्ष्मी नारायण शर्मा था। महज 11 साल की उम्र में लक्ष्मी नारायण शर्मा की शादी राम बेटी से हो गई थी। लेकिन इसके बाद भी उनका मन सांसारिक जीवन में नहीं लगा और आगे जाकर उन्होंने आध्यात्मिक मार्ग अपना लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>कब प्राप्त हुआ ज्ञान</h2><div>मान्यता है कि नीम करौली बाबा को महज 17 साल की उम्र में ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। उन्होंने साधु जीवन अपनाने के लिए घर छोड़ दिया था। लेकिन पिता और परिवार के आग्रह पर वह वापस वैवाहिक जीवन में लौट आए थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गांव के निर्विरोध प्रधान रहे बाबा</h2><div>बताया जाता है कि वह अपने गांव में करीब 40 सालों तक निर्विरोध ग्राम प्रधान रहे थे। साधारण जीवन जीने के बाद वह आध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रसिद्ध होते चले गए। धीरे-धीरे देश के अलग-अलग हिस्सों में उनकी लोकप्रियता फैलती चली गई और उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ती चली गई।</div><div><br></div><h2>ऐसे पड़ा 'नीम करौली' नाम</h2><div>लक्ष्मी नारायण शर्मा के नाम से जुड़ी सबसे चर्चित कहानियों में एक नीब करौरी गांव की घटना है। माना जाता है कि एक बार बाबा ट्रेन में सवार होकर जा रहे थे, लेकिन उन्होंने टिकट नहीं लिया था, जिस कारण उनको ट्रेन से उतार दिया गया था। जिसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी। जब बाबा को वापस ट्रेन में बैठाया गया, तो ट्रेन चल पड़ी। इसी घटना के बाद उनका नाम नीब करौरी बाबा के रूप में जाना जाने लगा।</div><div><br></div><h2>कैंची धाम</h2><div>बाबा नीम करौली का सबसे प्रसिद्ध आश्रम कैंची धाम है। साल 1964 में नैनीताल जिले के भवाली के पास क्षिप्रा नदी के किनारे नीम करौली बाबा ने कैंची धाम की स्थापना की थी। देश-विदेश में कैंची धाम बाबा के भक्तों के लिए प्रमुख आस्था का केंद्र बन चुका है। हर साल 15 जून को कैंची धाम स्थापना दिवस मनाया जाता है।</div><div><br></div><h2>बाबा के दरबार पहुंची जानी-मानी हस्तियां</h2><div>कैंची धाम की प्रसिद्धि सिर्फ भारत तक ही सीमित नहीं है। बल्कि देश दुनिया की कई जानी मानी हस्तियां भी उनसे प्रभावित रहीं। मेटा के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सह-संस्थापक स्टीव जॉब्स, और भारतीय क्रिकेटर विराट कोहली का नाम बाबा नीम करौली और कैंची धाम से जुड़ी चर्चाओं में आता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 11 सितंबर 1973 को नीम करौली बाबा वृंदावन में ब्रह्मलीन हुए थे। आज भारत समेत कई देशों में बाबा नीम करौली के आश्रम और मंदिर हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 13:04:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-journey-of-lakshman-narayan-sharma-becoming-neem-karoli-baba</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mahadevi Verma Death Anniversary: साहित्य से समाज सेवा तक, ऐसा रहा 'हिंदी की मीरा' का Iconic Journey]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-literature-to-social-service-such-iconic-journey-of-meera-of-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को हिंदी साहित्य की प्रमुख कवयित्री महादेवी वर्मा का निधन हो गया था। उनको छायावादी युग के चार स्तंभों में गिना जाता है। साहित्य में महादेवी वर्मा का योगदान बेहद अहम और व्यापक रहा है। इस वजह से उनको 'हिंदी साहित्य की मीरा' भी कहा जाता है। उन्होंने अपने लेखन में नारी की इच्छाएं, पीड़ाएं और उनके संघर्षों को सजीव रूप में प्रस्तुत करने का काम किया। वह कवियत्री और निबंधकार के अलावा समाजसेवी के रूप में भी प्रसिद्ध हुईं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महादेवी वर्मा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद जिले में 26 मार्च 1907 को महादेवी वर्मा का जन्म हुआ था। उनके परिवार की भारतीय संस्कृति के प्रति गहरी रुचि थी। महादेवी का बचपन से ही झुकाव कला और साहित्य की ओर रहा। उनकी शुरूआती शिक्षा उज्जैन से हुई और उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम.ए. किया। इसके अलावा वह लंबे समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement" target="_blank">Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba</a></h3><h2>साहित्यिक जीवन</h2><div>वह हिंदी साहित्य के छायावादी युग की प्रमुख कवियत्री थीं। महादेवी वर्मा की रचनाएं प्रेम, विरह, मानवीय संवेदनाओं और अध्यात्म की गहरी अनुभूतियों से भरी हैं। उनकी कविताओं में महिलाओं की पीड़ा, व्यथा और उनकी शक्ति का सूक्ष्म चित्रण है। महादेवी वर्मा की प्रसिद्ध काव्य कृतियों में 'सांध्यगीत', 'दीपशिखा और यामा' और 'नीरजा' आदि हैं, जिसके लिए उनको ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><div>उन्होंने सिर्फ कविताएं ही नहीं लिखीं, बल्कि कहानियां, निबंध और संस्मरण भी लिखे। महादेवी वर्मा की प्रमुख गद्य रचनाओं में 'पथ के साथी', 'स्मृति की रेखाएं' और 'अतीत के चलचित्र' आदि शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>उपलब्धियां</h2><div>महादेवी ने सिर्फ साहित्य के क्षेत्र में ही नहीं बल्कि समाज सेवा और शिक्षा के क्षेत्र में भी अहम योगदान दिया है।</div><div><br></div><div>उनको हिंदी साहित्य में योगदान के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया था।</div><div><br></div><div>भारत सरकार द्वारा महादेवी वर्मा को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><div>महादेवी वर्मा को काव्य संग्रह 'यामा' के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा गया था।</div><div><br></div><div>साल 1979 में महादेवी वर्मा को साहित्यिक सेवाओं के लिए साहित्य अकादमी का प्रतिष्ठित फैलोशिप से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><h2>महिलाओं के लिए उठाई आवाज</h2><div>उन्होंने अपने लेखन के जरिए महिलाओं की स्थिति, अधिकारों और स्वतंत्रता के बारे में आवाज उठाई थी। वह समाजसेवा में भी सक्रिय थीं और महिलाओ की शिक्षा और उनके अधिकारों के लिए भी काम किया था। महादेवी वर्मा ने 'प्रयाग महिला विद्यापीठ' की स्थापना की थी। महादेवी वर्मा का मानना था कि समाज में बदलाव के लिए महिलाओं का सशक्त होना बेहद जरूरी है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 11 सितंबर 1987 को इलाहाबाद में महादेवी वर्मा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-literature-to-social-service-such-iconic-journey-of-meera-of-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vinoba Bhave Birth Anniversary: काशी से Wardha तक, जानिए कैसे विनायक भावे बने भूदान आंदोलन के Saint Vinoba]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 11 सितंबर को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। विनोबा भावे महात्मा गांधी की विरासत को आगे ले जाने का काम करते दिखाई दिए। वह एक स्वतंत्रता सेनानी होने के अलावा प्रसिद्ध गांधीवादी समाज सुधारक नेता भी थे। विनोबा भावे को भूदान आंदोलन से पूरी दुनिया में बड़ी पहचान मिली थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर विनोबा भावे के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के कोंकण इलाके के गागोदा गांव में 11 सितंबर 1895 को विनोबा भावे का जन्म हुआ था। इनका असली नाम विनायक नरहरि भावे था। यह ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनकी मां रुकमणी बाई एक विदूषी महिला थीं। वहीं विनोबा भावे पर अपनी मां का गहरा प्रभाव था। विनोबा को अपनी मां से ही ईश्वर के प्रति आस्था और आध्यात्म के प्रति झुकाव मिला था। वहीं पिता से विज्ञान, गणित और अलग विलक्षण सोच और तार्किता मिली थी।</div><div><br></div><h2>आध्यात्मिक यात्रा</h2><div>विनोबा भावे परीक्षा देने के लिए मुंबई जाने वाली रेलगाड़ी में तो बैठे, लेकिन उनका मन वैराग्य में रमा हुआ था। ऐसे में वह बीच में ही दूसरी गाड़ी में बैठकर आध्यात्मिक यात्रा पर हिमालय की ओर निकल पड़े। वह ज्ञान की तलाश में बहुत भटके। वह काशी में भी लंबे समय तक रहे। वहीं समाचार पत्रों में महात्मा गांधी के बारे में पढ़कर उनको ऐसा लगा कि गांधीजी उनके लिए मार्गदर्शक हो सकते हैं। उस दौरान महात्मा गांधी दक्षिण अफ्रीका से लौटे थे। उन्होंने महात्मा गांधी को पत्र लिखा और जवाब में आमंत्रण मिलने पर वह फौरन अहमदाबाद रवाना हो लिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>गांधीजी से मुलाकात</h2><div>महात्मा गांधी और विनोबा भावे की पहली मुलाकात 07 जून 1916 में हुई थी। दोनों ही पहली मुलाकात के बाद एक-दूसरे के मुरीद हो गए। इसके बाद विनोबा भावे ने खुद को महात्मा गांधी के आश्रम के लिए समर्पित कर दिया। जब गांधीजी को लगा कि वह अहमदाबाद या कहीं और कितना भी बड़ा आश्रम बना लें। देशभर में अहिंसक सैनिक तैयार नहीं हो सकेंगे। ऐसे में उन्होंने विनोबा भावे को वर्धा भेजा, जहां पर महाराष्ट्र धर्म नाम से मराठी में प्रकाशित होने वाली उनकी पत्रिका काफी लोकप्रिय हुई थी।</div><div><br></div><h2>संत और आचार्य के रूप में जाने गए विनोबा भावे</h2><div>देश की आजादी तक विनोबा भावे संत और आचार्य के रूप में पहचान मिली थी। महात्मा गांधी के निधन के बाद उन्होंने गांधीजी की विरासत को कायम रखा। लेकिन वह अपने स्वभाव के मुताबिक इसको आध्यात्मिक रूप से ही आगे बढ़ाते रहे। साल 1951 में महाराष्ट्र में भूदान आंदोलन ने विनोबा भावे को दुनियाभर में मशहूर कर दिया था। यह एक स्वैच्छिक सुधार आंदोलन था, जिसमें रचनात्मक कार्यों और विचारों के प्रयोग से सामाजिक स्तर पर बदलाव की कोशिश की गई। उन्होंने सर्वोदय समाज की स्थापना की और आजादी के बाद अपना जीवन वर्धा के ब्रह्म विद्या मंदिर आश्रम में गुजारा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 15 नवंबर 1982 को अन्न जल त्याग कर विनोबा भाने ने समाधि मरण को अपना लिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-vinayak-bhave-became-saint-vinoba-of-the-bhoodan-movement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhupen Hazarika Birth Anniversary: 10 साल की उम्र में पहला Song, जानिए 'ब्रह्मपुत्र के कवि' का सांस्कृतिक प्रभाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/first-song-at-age-of-10-discover-cultural-impact-of-poet-of-the-brahmaputra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बेहतरीन गायक, गीतकार और संगीतकार रहे भूपेन हजारिका का 08 सितंबर को जन्म हुआ था। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और देश के सबसे ऊंचे नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानिक किया गया था। हजारिका असमिया भाषा के लेखक और असम संगीत के अच्छे जानकार थे। वहीं भूपेन हजारिका ने अपने गानों के अलावा अपनी निजी जिंदगी से भी खूब सुर्खियां बटोरी हैं। उनका नाम एक समय पर दिग्गज गायिका लता मंगेशकर के साथ जुड़ा था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर भूपेन हजारिका के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>असम के सादिया में 08 सितंबर 1926 को भूपेन हजारिका का जन्म हुआ था। वह 'ब्रह्मपुत्र के कवि' के नाम से भी मशहूर थे। हजारिका को संगीत विरासत में मिला था। उन्होंने महज 10 साल की उम्र में अपना पहला गाना लिखा था और उसको गाया था। वहीं 12 साल की उम्र में उन्होंने असमिया भाषा की फिल्म 'इंद्रमालती' में काम किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career" target="_blank">Asha Bhosle Birth Anniversary: Lata Mangeshkar से तल्खी और RD Burman का साथ, जानें Asha Bhosle का Iconic Career</a></h3><h2>असमिया भाषा से हिंदी तक का सफर</h2><div>उन्होंने खुद को सिर्फ असम तक ही सीमित नहीं रखा। वह इससे बाहर निकले और हिंदी में छा गए। हजारिका ने हिंदी में 'दिल हूम हूम करे' गाना गाया। इस गाने को लोगों द्वारा पसंद किया गया। इसके बाद उन्होंने 'ओ गंगा तू बहती है क्यों' गाया, जिससे हजारिका का जादू चला। फिर उन्होंने असमिया के अलावा हिंदी और बांग्ला समेत कई अन्य भाषाओं में गाने गाए। भूपेन हजारिका ने फिल्म 'गांधी टू हिटलर' में भजन 'वैष्णव जन' गाया था।</div><div><br></div><div>भूपेन हजारिका के सबसे फेमस गानों में 'ओ गंगा बहती हो क्यों', 'दिल हूम हूम करे', 'मोई एटी जाजाबर' और 'मानुहे मानुहर बाबे' सहित कई बेहतरीन गाने शामिल हैं। वह अपने गाने खुद लिखते थे और गाते थे। इसके अलावा उन्होंने फिल्मों या नाटकों के किरदारों को ध्यान में रख कर कई गीत लिखे थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 नवंबर 2011 को 85 साल की उम्र में भूपेन हजारिका ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 13:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/first-song-at-age-of-10-discover-cultural-impact-of-poet-of-the-brahmaputra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Asha Bhosle Birth Anniversary: Lata Mangeshkar से तल्खी और RD Burman का साथ, जानें Asha Bhosle का Iconic Career]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 08 सितंबर को सुरीली और शोख गायिका आशा भोसले का जन्म हुआ था। उन्होंने हजारों गीतों को अपनी आवाज से अमर बना दिया है। आशा भोसले को भारतीय सिनेमा जगत की महान गायिकाओं में गिना जाता है। उन्होंने हिंदी के अलावा गुजराती, बांग्ला, मराठी, भोजपुरी, तमिल, अंग्रेजी, मलयालम और रूसी भाषा में भी बहुत सारे गीत गाए हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर आशा भोसले के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के सांगली में 08 सितंबर 1933 को आशा भोसले का जन्म हुआ था। आशा के पिता का नाम दीनानाथ मंगेशकर था, जोकि एक शास्त्रीय गायक और मराठी थिएटर के फेमस अभिनेता थे। वहीं आशा की बड़ी बहन लता मंगेशकर भी गायिका थीं। ऐसे में आशा ने भी अपने पिता और बड़ी बहन के नक्शे कदम पर चलने का फैसला कर लिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize" target="_blank">Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर</a></h3><h2>प्लेबैक सिंगर</h2><div>सिर्फ 10 साल की छोटी उम्र में आशा भोशले ने प्लेबैक सिंगर के रूप में अपने करियर की शुरूआत की थी। आशा ने साल 1943 में अपना पहला मराठी फिल्म के लिए गाना रिकॉर्ड किया था। वहीं साल 1949 में 16 की उम्र में आशा ने हिंदी फिल्म 'रात की रानी' के लिए अपना पहला सोलो गाना रिकॉर्ड किया था।</div><div><br></div><h2>सेक्रेटरी से भागकर की शादी</h2><div>महज 16 साल की उम्र में आशा भोसले ने अपना घर बसा लिया था। कम उम्र में आशा ने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से भागकर शादी कर ली थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>16 साल की उम्र में ही आशा भोसले ने अपना घर भी बसा लिया था. दरअसल कम उम्र में ही दिग्गज गायिका ने अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से घर से भागकर शादी कर ली थी. क्योंकि उनका परिवार इस रिश्ते से खुश नहीं था. हैरानी की बात ये भी है कि गणपत राव उम्र में आशा से दोगुनी उम्र के थे. शादी के वक्त उनकी उम्र 31 साल थी. आशा के इस फैसले से नाराज होकर लता मंगेशकर और परिवार के अन्य लोगों ने उनसे बातचीत बंद कर दी थी.&nbsp;</div><div><br></div><h2>लता-आशा के रिश्ते में कड़वाहट</h2><div>जब आशा भोसले ने लता मंगेशकर के सेक्रेटरी से शादी की, तो इससे लता मंगेशकर काफी नाराज हुईं। इस घटना के बाद दोनों बहनों के बीच रिश्ते बिगड़ गए। आशा जी ने बताया था कि इस घटना के बाद आई दूरियों को भरने में सालों लग गए थे। क्योंकि लता मंगेशकर का मानना था कि गणपत राव आशा के लिए सही नहीं हैं।</div><div><br></div><h2>अलग हुए आशा और गणपत</h2><div>समय के साथ आशा और गणपत राव के रिश्ते में तल्खियां बढ़ने लगीं। आखिरकार 11 साल बाद यह शादी टूट गई और साल 1960 में आशा और गणपत अलग हो गए थे। दोनों के शादी के बाद 3 बच्चे थे।</div><div><br></div><h2>आर डी बर्मन से रचाई दूसरी शादी</h2><div>इसके बाद दिग्गज संगीतकार आर डी बर्मन से आशा भोसले ने दूसरी शादी रचाई। साल 1966 में आई फिल्म 'तीसरी मंजिल' के दौरान दोनों की मुलाकात हुई थी। धीरे-धीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और फिर साल 1980 में आशा भोसले और आरडी बर्मन ने शादी कर ली। हालांकि यह शादी भी इतनी आसान नहीं थी।</div><div><br></div><div>बर्मन ने खुद आशा भोसले के सामने शादी का प्रस्ताव रखा था। वहीं आशा ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया था, लेकिन आरडी बर्मन की मां इस रिश्ते से खुश नहीं थी। क्योंकि आशा तलाकशुदा होने के साथ-साथ 3 बच्चों की मां थी।</div><div><br></div><h2>आशा भोसले के पॉपुलर गाने</h2><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक आशा भोसले ने करीब 12 हजार से अधिक गाने गाए थे। आशा का बॉलीवुड में करियर करीब 70 साल से ज्यादा रहा था। उनके पॉपुलर गानों में 'दम मारो दम', 'आजा आजा मैं हू प्यार तेरा', 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को', 'इन आंखों की मस्ती के', 'पिया तू अब तो आजा', 'ये मेरा दिल प्यार का दीवाना' शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 12 अप्रैल 2026 को 92 साल की उम्र में आशा भोसले का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 11:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/strained-relations-with-lata-and-partnership-with-burman-look-asha-bhosle-career</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sarvepalli Radhakrishnan Birth Anniversary: Oxford Professor से Bharat Ratna तक, ऐसा था Dr Radhakrishnan का प्रेरणादायी सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-oxford-professor-to-bharat-ratna-dr-radhakrishnan-inspiring-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का जन्म हुआ था। वह एक फिलॉसफर, ऑथर और भारत के दूसरे राष्ट्रपति थे। स्टूडेंट्स डॉ राधाकृष्णन का बहुत सम्मान करते थे। वहीं साल 1954 में उनको भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और शिक्षा</h2><div>तमिनलाडु के तुर्माणी नाम के गांव में 05 सितंबर 1888 को हुआ था। वह एक गरीब ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता गांव के ज्ञानी पंडित थे। राधाकृष्णन ने एमए साइकोलॉजी की पढ़ाई की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize" target="_blank">Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर</a></h3><h2>बीएचयू के चांसलर</h2><div>वहीं महज 16 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई थी। उनके 5 बेटियां और 1 बेटा था। उन्होंने ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में भी पढ़ाया। इसके अलावा उन्होंने प्रेसिडेंसी कॉलेज, मद्रास से लेकर बीएचयू तक चांसलर के पद पर काम किया था।</div><div><br></div><h2>सियासी सफर</h2><div>वहीं देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के आग्रह पर डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने राजनीति में एंट्री की। फिर साल 1962 से लेकर 1967 तक वह भारत के दूसरे राष्ट्रपति बने। वहीं इससे पहले साल 1952 से लेकर 1962 तक भारत के पहले उपराष्ट्रपति के रूप में काम किया था।</div><div><br></div><div>जब डॉ राधाकृष्णन राष्ट्रपति बने थे, तो 10,000 वेतन मिलता था। लेकिन वह सिर्फ 2500 रुपए लेते थे, बाकी राशि वह हर महीने पीएम राष्ट्रीय राहत कोष में दान कर दी थी।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>वहीं डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन को साल 1954 में भारत रत्न से सम्मानित किया गया था। फिर साल 1961 में उनको जर्मन बुक ट्रेड के शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके बाद साल 1963 में उनको ऑर्डर ऑफ मेरिट और साल 1975 को टेम्पलटन पुरस्कार दिया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 17 अप्रैल 1975 को डॉ सर्वपल्ली राधाकृष्णन का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 11:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-oxford-professor-to-bharat-ratna-dr-radhakrishnan-inspiring-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mother Teresa Death Anniversary: मदर टेरेसा का कोलकाता की झुग्गियों से लेकर Nobel Prize तक का ऐतिहासिक सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 05 सितंबर को मदर टेरेसा का निधन हो गया था। उन्होंने अपना पूरी जीवन दीन-दुखियों की सेवा में लगा दिया था। वह बीमार, अनाथ, गरीब, असहाय लोगों की मदद और सेवा किया करती थीं। वह 19 साल की उम्र में भारत आ गई थीं। वह पहले शिक्षिका बनीं और फिर बाद में गरीबों और असहायों की सेवा और मदद करने लगीं। वहीं सेवा कार्यों के लिए उनको नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजा गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>यूगोस्लाविया में 26 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। इनका असली नाम नाम एग्नेस गोंझा बोयाजिजू था। वहीं 18 साल की उम्र में वह दीक्षा लेकर सिस्टर टेरेसा बनी थीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar" target="_blank">Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार</a></h3><h2>जब भारत आईं मदर टेरेसा</h2><div>साल 1929 में मदर टेरेसा भारत आईं और अध्यापन का कार्य करने लगी। वहीं कोलकाला में पढ़ाने के दौरान उन्होंने लोगों की गरीबी को देखा और कच्ची बस्तियों में जाकर सेवा कार्य करने लगीं। वहीं सेवा कार्य के लिए मदर टेरेसा ने 07 अक्तूबर 1950 को मिशनरीज ऑफ चैरिटी की स्थापना की। इसके जरिए वह लंबे समय तक बीमार, गरीब और अनाथ लोगों की सेवा में जुटी रहीं।</div><div><br></div><div>वहीं साल 1948 में मदर टेरेसा ने स्वेच्छा से भारत की नागरिकता ग्रहण की। उन्होंने अपनी मिशनरीज के जरिए उस दौरान समाज से बहिष्कृत समझे जाने वाले तपेदिक और कुष्ठ रोगियों की सेवा की।</div><div><br></div><h2>नोबेल शांति पुरस्कार</h2><div>मदर टेरेसा के सेवा कार्यों को देखते हुए साल 1979 में उनको नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। लेकिन उन्होंने प्राइज मनी लेने से इंकार कर दिया और इसको भारत के गरीब लोगों में दान करने के लिए कहा। साल 1980 में भारत सरकार द्वारा मदर टेरेसा को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया। इसके अलावा रोमन कैथोलिक चर्च ने भी उनको कलकत्ता की संत टेरेसा के नाम से नवाजा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 सितंबर 1997 को दिल का दौरा पड़ने से मदर टेरेसा निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 11:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-historic-journey-from-slums-of-kolkata-to-nobel-prize</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Ramdas Death Anniversary: 30 रागों में रचे 638 शब्द, सिखों के चौथे गुरु ने कैसे रखा Amritsar का आधार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिख धर्म के चौथे गुरु, गुरु रामदास का का 01 सितंबर को निधन हो गया था। वह सिख धर्म के चौथे गुरु थे। उन्होंने चार उपमाओं की रचना करके सिख धर्म को अधिक मजबूत करने का कार्य किया था। गुरु रामदास जी सात वर्षों तक सिखों के गुरु रहे थे। वह 01 सितंबर 1574 को सिखों के चौथे गुरु बने थे। इसके अलावा गुरु रामदास ने अमृतसर शहर बसाया था। इस शहर को पहले रामदासपुर के नाम से जाना जाता था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी पर गुरु रामदास के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>चूना मंडी में 24 सितंबर 1534 को गुरु रामदास का जन्म हुआ था। यह जगह वर्तमान समय में पाकिस्तान के लाहौर में है। इनके पिता का नाम हरिदास मल सोढी और मां का नाम अनूप देवी था। इनका असली नाम जेठा जी था। जब उनको गुरु पद मिला, तो उनको रामदास नाम मिला। इनके माता-पिता की मृत्यु बचपन में ही हो गई थी। जिसके बाद इनका पालन-पोषण नानी ने किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>तीसरे सिख गुरु से मिले</h2><div>जब जेठाजी अपनी नानी के पास रहते थे, तो वह पहली बार सिखों के तीसरे नानक, गुरु अमर दास से मिले थे। इस मुलाकात के दौरान वह इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने नानक अमरदास के पास रहकर उनकी सेवा का विचार बना लिया। वहीं गुरु अमरदास ने अपनी छोटी बेटी का विवाह रामदास से कराया था।</div><div><br></div><div>इसी दौरान जब गुरु अमरदास को यह एहसास हुआ कि उनको अब सिखों के अगले गुरु का चयन करना चाहिए, तो उन्होंने गुरु रामदास की परीक्षा ली। इस परीक्षा में गुरु रामदास सफल हुए।</div><div><br></div><h2>गुरु गद्दी पर बैठे रामदास</h2><div>जिसके बाद गुरु अमरदास ने बाबा बूढ़ा जी से रामदास का तिलक कराया और गुरुगद्दी सौंपी। इसके बाद गुरु अमरदास ने जेठा जी को संगत से परिचित कराते हुए बताया कि यह सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास हैं।</div><div><br></div><h2>अमृतसर शहर बसाया</h2><div>गुरु गद्दी पर बैठने के बाद रामदास ने सिख संगत की भलाई के लिए अनेकों कार्य किए थे। उन्होंने चक रामदास पुर नामक नगर बसाया। जिसको आज के समय में हम सभी अमृतसर शहर के नाम से जानते हैं। इसके अलावा उन्होंने नगर के बीचोबीच एक बड़े जल सरोवर का निर्माण कराया था। गुरु रामदास ने 'आनंद कारज' यानी की सिखों के विवाह में पढ़े जाने वाले फेरों की रचना की।</div><div><br></div><div>गुरु रामदास ने बताया कि अब से आनंद कारज की मर्यादा के तहत ही सिख विवाह किए जाएंगे। गुरु रामदास ने अपने पूरे जीवनकाल में 30 राहों में 638 शब्द लिखे। जिनमें 246 पौउड़ी, 136 श्लोक, 31 अष्टपदी और 8 वारां है। इन सभी को गुरु ग्रंथ साहिब में शामिल किया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 सितंबर 1581 को पंजाब के गोइंदवाल साहिब में सिखों के चौथे गुरु, गुरु रामदास का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 01 Sep 2026 18:59:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/638-hymns-composed-in-30-ragas-how-fourth-sikh-guru-laid-foundation-of-amritsar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mother Teresa Birth Anniversary: गरीबों की सांसों में बसने वाली संत थीं मदर टेरेसा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-was-a-saint-who-lived-in-the-very-breath-of-the-poor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मदर टेरेसा का नाम सुनते ही मानवता, करुणा और सेवा का पवित्र स्वरूप आंखों के सामने उभर आता है। उनका जीवन इस तथ्य का सबसे बड़ा प्रमाण है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के दुःख को दूर करने का संकल्प ही मनुष्य को वास्तविक अर्थों में महान बनाता है। 26 अगस्त 1910 को अल्बानिया के स्कोप्जे में एगनेस गोंझा बोयाज्यू के रूप में जन्मी इस नन्हीं बालिका ने बचपन से ही धर्म और सेवा के प्रति गहरी आस्था प्रकट की थी। जब वे केवल 12 वर्ष की थी, तभी उनके भीतर यह संकल्प जाग उठा था कि उनका जीवन केवल दूसरों की भलाई के लिए समर्पित होगा। यही संकल्प आगे चलकर उन्हें पूरी मानवता के लिए करुणा की मूर्ति बना गया।</div><div><br></div><div>18 वर्ष की आयु में उन्होंने ‘सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ से जुड़कर धार्मिक जीवन की ओर कदम बढ़ाए और 1929 में भारत आईं। कलकत्ता स्थित सेंट मैरी स्कूल में उन्होंने अध्यापिका के रूप में कार्य करना शुरू किया। अध्यापन कार्य के दौरान वे छात्रों को केवल पढ़ाई ही नहीं, अनुशासन और नैतिक मूल्यों का भी पाठ पढ़ाती थी किंतु धीरे-धीरे उनका मन स्कूल की चारदीवारी से बाहर रहने वाले निर्धन, रोगग्रस्त और बेसहारा लोगों की ओर अधिक खिंचने लगा। 1946 में दार्जिलिंग की यात्रा के दौरान उन्हें अपने जीवन का वास्तविक ध्येय मिला। उन्होंने महसूस किया कि उन्हें शिक्षण कार्य से ऊपर उठकर गरीबों और असहायों की सीधी सेवा करनी चाहिए। यह क्षण उनके जीवन की दिशा बदल देने वाला साबित हुआ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul" target="_blank">Mother Teresa Birth Anniversary: 'एक्नेस' से 'मदर' बनने का सफर, जब आत्मा की पुकार पर शुरू हुआ Mission of Charity</a></h3><div>कलकत्ता की झुग्गियों और गलियों में रहने वाले लोगों की असहनीय पीड़ा को देखकर उन्होंने 1950 में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। इस संस्था का मुख्य उद्देश्य था सबसे गरीब, सबसे लाचार और सबसे उपेक्षित लोगों की निःस्वार्थ सेवा करना। संस्था का ध्येय वाक्य ही था, ‘सबसे गरीबों में भी सबसे गरीब की सेवा।’ मदर टेरेसा ने सेवा की परिभाषा केवल भोजन और दवा देने तक सीमित नहीं रखी बल्कि उनके लिए सेवा का अर्थ था पीड़ित व्यक्ति को यह अनुभव कराना कि वह अकेला नहीं है, उसे प्यार और सम्मान मिला हुआ है। यही कारण था कि वे सदैव कहा करती थी, ‘हम बड़े-बड़े कार्य नहीं कर सकते लेकिन हम छोटे-छोटे कार्य बड़े प्रेम से कर सकते हैं।’</div><div><br></div><div>उनके आश्रमों में केवल भोजन या उपचार की सुविधा ही नहीं दी जाती थी बल्कि वहां पीड़ित व्यक्तियों को जीवन की गरिमा और आत्मसम्मान भी लौटाया जाता था। उन्होंने कुष्ठ रोगियों को समाज में सम्मान दिलाने के लिए आश्रम बनाए, अनाथ और परित्यक्त बच्चों के लिए घर खोले और मृत्युशैया पर पड़े लोगों को अंतिम क्षणों में भी प्रेम और स्नेह का अहसास कराया। उनकी संस्था धीरे-धीरे भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में फैल गई, जिसके सैंकड़ों केंद्र आज विभिन्न देशों में मानव सेवा का कार्य कर रहे हैं। मदर टेरेसा की असाधारण सेवाओं को देखते हुए उन्हें अनेक राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। 1962 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से अलंकृत किया और 1980 में ‘भारत रत्न’ प्रदान कर सर्वोच्च नागरिक सम्मान दिया। विश्व स्तर पर उन्हें 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। इसके अतिरिक्त अनेक देशों ने उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मानों से विभूषित किया किंतु इन सब पुरस्कारों और मान-सम्मानों के बीच भी वे सदैव विनम्र बनी रही और स्वयं को केवल ईश्वर का साधन मानती रही।</div><div><br></div><div>उनके जीवन और कार्यों की इतनी ऊंचाई होने के बावजूद वे आलोचनाओं से अछूती नहीं रही। कई बार उन पर धर्मांतरण के आरोप लगाए गए तो कई बार उनके आश्रमों में आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं की कमी की बात उठाई गई किंतु यह निर्विवाद सत्य है कि मदर टेरेसा ने लाखों असहायों को आशा, सहारा और जीवन का सम्मान प्रदान किया। उनके कार्यों का व्यापक प्रभाव इसी से समझा जा सकता है कि वे समाज की उस परत तक पहुंची, जिसे प्रायः शासन और व्यवस्था भी अनदेखा कर देती थी। 5 सितंबर 1997 को 87 वर्ष की आयु में जब उनका निधन हुआ, तब समूचे विश्व ने उन्हें खोने का दुःख अनुभव किया। उनके अंतिम संस्कार में दुनिया के अनेक देशों के नेता उपस्थित हुए और भारत ने उन्हें राजकीय सम्मान के साथ विदाई दी। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी संस्था ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ उसी निष्ठा से मानवता की सेवा में कार्यरत है। 2016 में पोप फ्रांसिस ने उन्हें संत की उपाधि प्रदान की, जिससे उनका जीवन एक वैश्विक आध्यात्मिक प्रेरणा का प्रतीक बन गया।</div><div><br></div><div>मदर टेरेसा का जीवन इस तथ्य को रेखांकित करता है कि वास्तविक महानता किसी पद, संपत्ति या शक्ति में नहीं बल्कि निस्वार्थ सेवा और करुणा में निहित है। उन्होंने यह साबित किया कि जब तक हम दूसरों के दुःख को अपना नहीं मानते, तब तक जीवन का सही अर्थ अधूरा रहता है। आज जब दुनिया हिंसा, असमानता और स्वार्थ की चपेट में है, तब मदर टेरेसा का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठता है। उन्होंने सिखाया कि प्रेम और करुणा ही वह शक्ति है, जो मानवता को जोड़ सकती है। उन्होंने धर्म, जाति और भाषा की सीमाओं से परे जाकर यह बताया कि इंसानियत ही सबसे बड़ा धर्म है। यही उनकी सबसे बड़ी विरासत है, जिसे आगे बढ़ाना हर व्यक्ति का कर्त्तव्य है। मदर टेरेसा की जयंती का अवसर केवल स्मरण का नहीं बल्कि आत्ममंथन का अवसर है, जो हमें यह सोचने पर विवश करता है कि हम अपने जीवन में कितना समय और कितनी संवेदनशीलता समाज के जरूरतमंदों के लिए समर्पित करते हैं। यदि हर व्यक्ति अपने आसपास के जरूरतमंदों के लिए थोड़ा-सा भी प्रयास करे तो समाज में फैली असमानता और पीड़ा काफी हद तक कम हो सकती है। मदर टेरेसा का जीवन हमें यही सिखाता है कि सच्चा धर्म केवल मानव सेवा है और सच्ची पूजा केवल करुणा है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mother-teresa-was-a-saint-who-lived-in-the-very-breath-of-the-poor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mother Teresa Birth Anniversary: 'एक्नेस' से 'मदर' बनने का सफर, जब आत्मा की पुकार पर शुरू हुआ Mission of Charity]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नोबेल पुरस्कार पाने वाली मदर टेरेसा का 26 अगस्त को जन्म हुआ था। उन्होंने अपना पूरा जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया था। वह साल 1929 में भारत आई थीं। उन्होंने जीवन के 68 साल भारत में रहकर लोगों की सेवा का काम किया था। हालांकि जहां उनको पूरी दुनिया में सम्मान मिला, तो वहीं उनके आलोचकों की भी कमी नहीं थी। लेकिन उन्होंने हमेशा खुद को मानव सेवा में लगाए रखा। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मदर टेरेसा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अल्बानिया के अच्छी आर्थिक स्थिति वाले परिवार में 16 अगस्त 1910 को मदर टेरेसा का जन्म हुआ था। मदर टेरेसा अपने परिवार की सबसे छोटी संतान थीं। वहीं 8 साल की उम्र में उनके सिर से पिता का साया उठ गया था। उनको बचपन से ही मिशिनरी जीवन और भारत के बंगाल की कहानियां बेहद प्रभावित करती थीं। उन्होंने सिर्फ 12 साल की उम्र में यह फैसला कर लिया था कि वह अपना पूरा जीवन धर्म को समर्पित करेंगीं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero" target="_blank">Neil Armstrong Death Anniversary: Korean War में मौत को मात देने वाले Neil Armstrong कैसे बने Moon Hero</a></h3><h2>मजबूत हुआ इरादा</h2><div>18 साल की उम्र में जब मदर टेरेसा विटिना लेटनाइस की ब्लैक मेडोना की समाधि पर प्रार्थना कर रही थीं, उसी दौरान उनका इरादा अधिक मजबूत हुआ। भारत आने के इरादे के बाद उन्होंने साल 1928 में आयरलैंड के इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी जाने का फैसला किया। यहां की सदस्यों को सिस्टर्स ऑफ लोरेटो कहा जाता है। यहां पर वह अंग्रेजी सीखने और मिशनरी बनने आई थीं।</div><div><br></div><div>आयरलैंड आने के बाद वह कभी अपने परिवार से नहीं मिलीं। साल 1929 में वह भारत आ गईं और दार्जलिंग में रहते हुए शुरूआती प्रशिक्षण कार्य किया। यहां पर उन्होंने बंगाली सीखी। साल 1931 में मदर टेरेसा ने धार्मिक प्रतिज्ञा ली। उनके बचपन का नाम एक्नेस था, लेकिन उन्होंने भारत आने के बाद टेरेसा चुना। क्योंकि वह संत थेरेस ऑस्ट्रेलिया और टेरेसा ऑफ अविला को सम्मान देना चाहती थीं।</div><div><br></div><h2>आत्मा की आवाज सुनी</h2><div>कलकत्ता में वह एनटैले में लोरेट कॉन्वेंट स्कूल में करीब 20 सालों तक पढ़ाती रहीं। साल 1944 में वह स्कूल की हेडमिस्ट्रेस बनीं। लेकिन वह कलकत्ता की गरीबी देख कर व्यथित हो जाती थीं। साल 1943 में बंगाल में आए अकाल और अगस्त 1946 में कौमी हिंसा से होने वाले हालातों को लेकर दुखी रहीं। इस दौरान जब वह दार्जलिंग जा रही थीं, तो आत्मा की आवाज ने उनको झझकोरा। इसके बाद उन्होंने गरीबों की सेवा करने का फैसला किया।</div><div><br></div><h2>गरीबों के लिए संघर्ष</h2><div>मदर टेरेसा के लिए गरीबों की सेवा करना आसान नहीं था। क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे, लेकिन वह दो साड़ियों में गरीबों के बीच पहुंच गईं। इसके अलावा वह झोपड़ी में रहते लगीं। लोगों का पेट भरने के लिए भीख मांगने से भी पीछे नहीं हटीं। वह खुद संघर्ष करती रहीं, लेकिन कॉन्वेंट वापस नहीं गईं।</div><div><br></div><h2>कारवां बनता गया</h2><div>लोग उनसे जुड़ते रहे और गरीबों में भी अतिगरीब लोगों की सेवा का अभियान शुरू हुआ। फिर सरकारी अधिकारी से लेकर चर्च तक का ध्यान मदर टेरेसा के ऊपर गया। उनको अपने कार्यों में मदद मिलने लगी। वहीं मदर टेरेसा को चर्च से मिशिनरीज ऑफ चैरिटी खोलने की परमिशन मिल गई। इसके बाद उन्होंने कोढ़ रोगियों के लिए सेवा केंद्र खोला, जिसको शांतिनगर नाम मिला।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>साल 1960 में मदर टेरेसा का काम विदेशों तक पहुंचा। साल 1979 में मदर टेरेसा को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 सितंबर 1997 को कोलकाता में मदर टेरेसा का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 13:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/journey-agnes-to-mother-when-mission-of-charity-began-in-response-to-call-soul</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Neil Armstrong Death Anniversary: Korean War में मौत को मात देने वाले Neil Armstrong कैसे बने Moon Hero]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 25 अगस्त को चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले इंसान नील आर्मस्ट्रॉन्ग का निधन हो गया था। अमेरिका के रियल हीरो रहे नील का यह बचपन का सपना था कि उनको स्पेस जाना है। वहीं चंद्रमा तक के सफर में उन्होंने खुद को साबित कर दिखाया। लेकिन इसके बाद उन्होंने खुद को प्रचार से दूर रखा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर नील आर्मस्ट्रॉन्ग के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>ओहियो के वापाकाओनेटा में 05 अगस्त 1930 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम स्टीफन कोयनिंग ओहिया राज्य सरकार में ऑडिटर थे। बचपन से ही नील को हवा में उड़ने का शौक था। उनको सिर्फ 6 साल की उम्र में दुनिया के सबसे लोकप्रिय विमान में उड़ने का अनुभव हुआ था। वह 15 साल की उम्र तक इतना अनुभव प्राप्त कर चुके थे कि वह खुद विमान उड़ा सकें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts" target="_blank">Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य</a></h3><h2>नेवी में एविएटर</h2><div>16 साल की उम्र में नील ने ड्राइविंग लाइसेंस प्राप्त करने से पहले स्टूडेंट फ्लाइट सर्टिफिकेट प्राप्त कर लिया था। इस दौरान उनको स्काउट में भी ईगल स्काउट की रैंक मिली और सिल्वर बफैलो अवार्ड मिला था। इसके बाद उन्होंने एरोनॉटिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई शुरू की। उन्होंने US नेवी में एविएटर के रूप में भी सेवा दी।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कोरिया युद्ध में बची जान</h2><div>साल 1950 में वह क्वालिफाइड नेवल एविएटर बने। इसके बाद उनको अनुभव के साथ फाइटर बॉम्बर भी उड़ाने का मौका मिला। साल 1951 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग को कोरिया युद्ध में टोही विमान उड़ाने की जिम्मेदारी मिली। उनको निचली दूरी पर उड़ान भरते हुए सेफ जगह में आकर विमान से कूदना पड़ा। वहीं इस हादसे में नील को कोई नुकसान नहीं हुआ।</div><div><br></div><h2>अंतरिक्ष यात्री बनने का सफर</h2><div>फिर आर्मस्ट्रॉन्ग यूनाइटेड स्टेट नेवी रिजर्व में एन्साइन बने। साल 1953 तक सक्रिय ड्यूटी करने के बाद वह 1960 तक रिजर्व में रहे। इस बीच उन्होंने कई तरह के विमानों को उड़ाने का अनुभव लिया। साल 1958 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग अमेरिकी एयर फोर्स के मैन इन स्पेस सूनेस्ट कार्यक्रम में चुने गए, लेकिन बाद में वह कार्यक्रम रद्द हो गया।</div><div><br></div><h2>अयोग्य थे नील</h2><div>सिविलयम टेस्ट पायलट होने के कारण वह अंतरिक्ष यात्री होने की योग्यता नहीं रखते थे। साल 1962 में प्रोजेक्ट जेमिनी के लिए आवेदन मांगे गए। जिसके लिए सिविलयन टेस्ट पायलटों को योग्य माना गया था। सितंबर 1962 में नील को नासा ने बुलासा और वह नासा एरोनॉट्सकॉर्प के लिए सिलेक्ट हुए। नील इस ग्रुप में चुने गए दो सिविलियन पायलट में से एक थे। फिर वह जेमिनी अभियान तीन बार अंतरिक्ष गए।</div><div><br></div><h2>चंद्रयात्रा के लिए सिलेक्शन</h2><div>अपोलो-1 अभियान के बाद नील 18 अंतरिक्ष यात्रियों के दल में शामिल हुए, जिनको चंद्रमा पर जाना था। एक बार लूनार लैंडिंग की प्रैक्टिस के दौरान जब उनका विमान उतर रहा था, तो सही समय पर पैराशूट खोलने के कारण वह बच गए थे। आर्मस्ट्रॉन्ग को अपोलो-11 के क्रू के लिए कमांडर चुना गया। वहीं 20 जुलाई 1969 को नील आर्मस्ट्रॉन्ग चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री बन गए। अपना मिशन पूरा करने के बाद वह 2 साल तक नासा पर रहे। फिर उन्होंने ओहियो में इंजिनियरिंग का शिक्षण कार्य किया था। लेकिन साल 1980 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने शिक्षण कार्य भी छोड़ दिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 25 अगस्त 2012 को 82 साल की उम्र में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने ओहिया में आखिरी सांस ली।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 25 Aug 2026 14:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/how-neil-armstrong-who-cheated-death-in-korean-war-became-moon-hero</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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