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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[UP Politics के 'बाबूजी' और Good Governance के प्रतीक Kalyan Singh: जिनके सुशासन की आज भी दी जाती है मिसाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/kalyan-singh-a-towering-figure-of-indian-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय राजनीति के युगपुरुष, श्रेष्ठ राजनीतिज्ञ, कोमल हृदय एवं संवेदनशील व्यक्तित्व, वज्रबाहु राष्ट्रप्रहरी, भारतमाता के सच्चे सपूत तथा भारतीय राजनीति में भगवान श्रीराम के हनुमान कहे जाने वाले हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह जी उन विरल नेताओं में थे, जिन्होंने भारतीय राजनीति में अनेक ऐतिहासिक मिसालें प्रस्तुत कीं। उनका राजनीतिक एवं व्यक्तिगत जीवन सदैव निष्कलंक, सिद्धांतनिष्ठ और प्रेरणास्पद रहा। कुशल प्रशासन, दृढ़ निर्णय क्षमता और जनहित के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता की मिसालें तब तक दी जाती रहेंगी, जब तक यह संसार रहेगा। कल्याण सिंह जी ने राजनीति को सत्ता नहीं, बल्कि सेवा का माध्यम माना और जमीन से जुड़कर ‘जनता के नेता’ के रूप में जन-जन के हृदय में अपनी अमिट छवि स्थापित की। वे बच्चों, युवाओं, महिलाओं, बुजुर्गों और सभी वर्गों में समान रूप से लोकप्रिय थे। देश का प्रत्येक हिंदू युवा और बालक उन्हें अपना आदर्श मानता था। उनका व्यक्तित्व हिमालय के समान विराट, अडिग और तेजस्वी था। भारतीय राजनीति में वे स्नेह और सम्मान के साथ ‘बाबूजी’ के नाम से विख्यात रहे। उनका संपूर्ण जीवन सादगी, राष्ट्रभक्ति और मूल्यों की राजनीति का अनुपम उदाहरण है। उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया और हर परिस्थिति में राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखा। भारतीय राजनीति और समाज के लिए उनका योगदान युगों-युगों तक प्रेरणास्रोत बना रहेगा। हिंदू हृदय सम्राट कल्याण सिंह जी का नाम इतिहास के स्वर्णिम पृष्ठों पर सदैव अमर रहेगा।</div><div><br></div><div>उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह का जन्म 5 जनवरी सन् 1932 को उत्तर प्रदेश के अलीगढ जनपद की अतरौली तहसील के मढ़ौली ग्राम के एक सामान्य किसान परिवार में हुआ। कल्याण सिंह के पिता का नाम तेजपाल सिंह लोधी और माता का नाम सीता देवी था। कल्याण सिंह में बचपन से ही नेतृत्व करने की क्षमता थी। कल्याण सिंह बचपन में ही राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ गए थे और राष्ट्रीय स्वंय सेवक संघ की शाखाओं में भाग लेने लगे थे। कल्याण सिंह ने विपरीत परिस्थितियों में कड़ी मेहनत कर अपनी उच्च शिक्षा प्राप्त की। इसके बाद कल्याण सिंह ने अध्यापक की नौकरी की। और साथ-साथ राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ से जुड़ कर राजनीति के गुण भी सीखते रहे। कल्याण सिंह राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ में रहकर गांव-गांव जाकर लोगों में जागरुकता पैदा करते रहे। कल्याण सिंह का विवाह रामवती देवी से हुआ। कल्याण सिंह के दो संतान है। एक पुत्र और एक पुत्री, पुत्र का नाम राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया है और पुत्री का नाम प्रभा वर्मा है। कल्याण सिंह के पुत्र राजवीर सिंह उर्फ राजू भैया वर्तमान में उत्तर प्रदेश की एटा लोकसभा सीट से संसद सदस्य हैं। कल्याण सिंह ने अपना पहला विधानसभा चुनाव अतरौली से जीतकर 1967 में उत्तर प्रदेश विधानसभा पहुंचे। कल्याण सिंह 1967 से लगातार 1980 तक उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच देश में आपातकाल के समय कल्याण सिंह 1975-76 में 21 महीने जेल में रहे। इस बीच कल्याण सिंह को अलीगढ़ और बनारस की जेलों में रखा गया। आपातकाल समाप्त होने के बाद 1977 में रामनरेश यादव को उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनाया गया। जिसमें कल्याण सिंह को स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। सन् 1980 के उत्तर प्रदेश के चुनावों में कल्याण सिंह विधानसभा का चुनाव हार गये। भाजपा के गठन के बाद कल्याण सिंह को उत्तर प्रदेश का संगठन महामंत्री बनाया गया। इस बीच कल्याण सिंह ने गाँव-गाँव, घर-घर जाकर भाजपा को उत्तर प्रदेश में पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair" target="_blank">Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey</a></h3><div>कल्याण सिंह 1985 से लेकर 2004 तक लगातार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य रहे। इस बीच कल्याण सिंह दो बार भाजपा के उत्तर प्रदेश से प्रदेश अध्यक्ष रहे। इस बीच राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन चलाया गया। इस आंदोलन में कल्याण सिंह ने भी अहम भूमिका निभाई। राम मंदिर आंदोलन की वजह से उत्तर प्रदेश सहित पूरे देश में भाजपा का उभार हुआ। और जून 1991 में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत से सरकार बनायी। जिसमे कल्याण सिंह की अहम भूमिका रही। और कल्याण सिंह को मुख्यमंत्री बनाया गया। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री रहते कारसेवकों द्वारा अयोध्या में विवादित बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया। कल्याण सिंह ने बाबरी मस्जिद विध्वंस की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए 6 दिसम्बर 1992 को मुख्यमंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। यहीं से भाजपा को कल्याण सिंह के रूप में हिंदुत्ववादी चेहरा मिल गया। इसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में अनेक आयाम छुए। 1993 के उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में कल्याण सिंह अलीगढ के अतरौली और एटा के कासगंज से विधायक निर्वाचित हुये। इन चुनावों में भाजपा कल्याण सिंह के नेतृत्व में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी। लेकिन सपा-बसपा ने मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व में गठबन्धन सरकार बनायी। और उत्तर प्रदेश विधान सभा में कल्याण सिंह विपक्ष के नेता बने। इसके बाद कल्याण सिंह 1997 से 1999 तक पुनः दूसरी बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने। कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल में कानून व्यवस्था एकदम मजबूत थी। इसलिए आज तक उत्तर प्रदेश में लोग कल्याण सिंह के मुख्यमंत्री काल की मिसाल देते हैं। 1998 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने उत्तर प्रदेश में कल्याण सिंह के नेतृत्व में 58 सीटें जीती।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>1999 में भाजपा से मतभेद के कारण कल्याण सिंह ने भाजपा छोड़ दी। कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय क्रांति पार्टी का गठन किया। 2002 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव अपने दम पर राष्ट्रीय क्रांति पार्टी से लड़ा और राष्ट्रीय क्रांति पार्टी के चार विधायक चुने गए और कल्याण सिंह ने बड़े स्तर पर पूरे प्रदेश में भाजपा को नुकसान पहुँचाया। इसके बाद उत्तर प्रदेश की जमीन पर भाजपा कई वर्षो तक कल्याण सिंह की उथल पुथल का और भाजपा के नकारा नेताओं की साजिश का शिकार बनी रही। लेकिन इसका फायदा न कल्याण सिंह को मिल पाया न भगवा पार्टी को।&nbsp; भाजपा और कल्याण सिंह दोनों उत्तर प्रदेश&nbsp; की राजनीति में हाशिये पर चले गए। 2004 में कल्याण सिंह ने पूर्व प्रधानमंत्री भारत रत्न अटल बिहारी वाजपेयी के आमंत्रण पर भाजपा में वापसी तो कर ली लेकिन, उनको वो पॉवर नहीं मिली जो मंदिर आन्दोलन के समय उनके पास थी। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने बुलन्दशहर से भाजपा के उम्मीदवार के रूप में पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा। और कल्याण सिंह पहली बार बुलंदशहर लोकसभा सीट से संसद पहुंचे। 2007 का उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव भाजपा ने कल्याण सिंह के नेतृत्व में लड़ा। कहने को भाजपा ने 2007 में कल्याण सिंह को भाजपा की तरफ से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार तो बना दिया लेकिन नाम का, जिसके पास ना तो उम्मीदवार तय करने की पावर थी और ना ही उनके अंडर में उत्तर प्रदेश का चुनाव प्रबंधन था। इसलिए वो चुनाव में कुछ अच्छा नहीं कर सके। इसके बाद 2009 में पुनः अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते हुए मतभेदों के कारण भाजपा का दामन छोड़कर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव से नजदीकियां बढ़ा लीं। 2009 के लोकसभा चुनावों में एटा लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से निर्दलीय सांसद चुने गये। फिर 2009 लोकसभा चुनाव खत्म होते ही मुलायम ने कल्याण से नाता तोड़ लिया। क्योंकि कल्याण सिंह की बजह से मुस्लिम समुदाय के लोग उनसे नाता तोड़ चुके थे। इसके बाद कल्याण सिंह ने राष्ट्रीय जनक्रान्ति पार्टी का गठन किया जो कि 2012 के विधानसभा चुनाव में कुछ विशेष नहीं कर सकी। लेकिन मुलायम के परम्परागत वोट उनके पास वापस आ गए। इसके बाद 2013 में कल्याण सिंह की भाजपा में पुनः वापसी हुई और कल्याण सिंह का परंपरागत लोधी-राजपूत वोट भी भाजपा से जुड़ गया। और 2014 के लोकसभा चुनावों में नरेंद्र मोदी के कहने पर कल्याण सिंह ने उत्तर प्रदेश में भाजपा का खूब प्रचार किया। भाजपा ने अकेले अपने दम पर 80 लोकसभा सीटों से 71 लोकसभा सीटें जीतीं। और नरेंद्र मोदी देश के यशस्वी प्रधानमंत्री बनें। इसके बाद किसी समय देश के भावी प्रधानमंत्री कहे जाने वाले कल्याण सिंह को राष्ट्रपति ने केंद्र सरकार की सिफारिश पर सितंबर 2014 में राजस्थान का राज्यपाल बनाया। इसके बाद कल्याण सिंह को जनवरी 2015 से अगस्त 2015 तक हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल का अतिरिक्त कार्यभार सौंपा गया। लेकिन राजस्थान का राज्यपाल रहते हुए भी कल्याण सिंह का दखल उत्तर प्रदेश की राजनीति में रहा। कल्याण सिंह ने राजस्थान के राज्यपाल के रूप में अपना 05 साल का कार्यकाल पूरा किया और 08 सितम्बर 2019 तक कल्याण सिंह राजस्थान के राज्यपाल रहे। इसके बाद कल्याण सिंह ने 09 सितम्बर 2019 को लखनऊ में भाजपा की पुनः सदस्यता ली और फिर से भाजपाई हो गए।</div><div>&nbsp;</div><div>उत्तर प्रदेश में 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कल्याण सिंह जी का अप्रत्यक्ष रूप से प्रभावी दखल रहा। 2017 के विधानसभा और 2019 के लोकसभा चुनावों में पार्टी के अधिकांश प्रत्याशी कल्याण सिंह जी का आशीर्वाद लेने जयपुर राजभवन जाते रहे। इससे सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि कल्याण सिंह जी जनमानस में कितने लोकप्रिय थे। आज भी लोग कल्याण सिंह सरकार के कार्यकाल की मिसाल देते हैं, क्योंकि जब कल्याण सिंह जी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, तब प्रदेश में सुशासन, विकास और व्यवस्था में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिले थे। यही कारण है कि उनकी लोकप्रियता समाज के विभिन्न वर्गों में व्यापक रही। स्वयं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अपने अनेक भाषणों में कल्याण सिंह सरकार के कुशल प्रशासन और सुशासन की मिसाल देते रहे हैं। कल्याण सिंह जी अपने समय में उत्तर प्रदेश के सर्वमान्य हिंदुत्ववादी नेताओं में गिने जाते थे। अपनी सशक्त राजनीतिक शैली, कुशल प्रशासन और हिंदुत्ववादी छवि के लिए प्रसिद्ध भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त कल्याण सिंह जी ने 21 अगस्त 2021 को 89 वर्ष की आयु में अपनी अंतिम सांस ली। उनके निधन से भारतीय राजनीति में एक युग का अवसान हुआ, लेकिन उनके विचार, आदर्श, सुशासन और राष्ट्रभक्ति की विरासत सदैव प्रेरणा देती रहेगी।</div><div><br></div><div>श्रीराम जन्मभूमि आंदोलन के अग्रणी योद्धा, धर्म और राष्ट्र के लिए सत्ता का त्याग करने वाले उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री तथा राजस्थान एवं हिमाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल, श्रद्धेय श्री कल्याण सिंह जी की आज 5वीं पुण्यतिथि है। उनका जीवन भारतीय राजनीति में त्याग, साहस और सिद्धांत निष्ठा का अनुपम उदाहरण है। जब-जब धर्म, आस्था और कर्तव्य के लिए किए गए त्याग की चर्चा होगी, तब-तब श्री कल्याण सिंह जी का नाम विशेष सम्मान और गौरव के साथ स्मरण किया जाएगा। अयोध्या में आज भव्य और दिव्य रामलला के मंदिर की जो ऐतिहासिक परिकल्पना साकार हुई है, उसमें स्वर्गीय श्री कल्याण सिंह जी का योगदान सदैव अविस्मरणीय रहेगा। उन्होंने अपने पद, सत्ता और राजनीतिक भविष्य की परवाह किए बिना धर्म और जनभावनाओं की रक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी। उनका दृढ़ संकल्प, अडिग नेतृत्व और राष्ट्रहित के प्रति निष्ठा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत बना रहेगा। श्रद्धेय बाबूजी का जीवन और कृतित्व भारतीय इतिहास के स्वर्णिम अध्यायों में सदैव अंकित रहेगा।</div><div>&nbsp;</div><div>- डॉ. ब्रह्मानंद राजपूत</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 15:10:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/kalyan-singh-a-towering-figure-of-indian-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bismillah Khan Death Anniversary: शहनाई को 'बेगम' मानने वाले Bharat Ratna की वो धुनें जो आज भी हैं अमर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/immortal-melodies-of-bharat-ratna-who-regarded-shehnai-as-his-begum]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया को शहनाई की सुरीली तान से परिचित कराने वाले उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का 21 अगस्त को निधन हो गया था। बिस्मिल्लाह खां ने अपना पूरा जीवन संगीत- साधना में लगा दिया था। वह शहनाई को अपना बेगम कहा करते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उस्ताद बिस्मिल्लाह खां के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बिहार प्रदेश के डुमरांव के ठठेरी बाजार में 21 मार्च 1916 बिस्मिल्लाह खान का जन्म हुआ था। वहीं 8 साल की उम्र में बिस्मिल्लाह खां वाराणसी आ गए और फिर यहीं के होकर रह गए। वह संगीत घराने से ताल्लुक रखते थे। उनके चाचा अली बक्श वाराणसी के मंदिर काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाया करते थे। इसी दौरान उन्होंने ठान लिया कि वह अपने चाचा की तरह शहनाई बजाएंगे। फिर उन्होंने अपने चाचा को अपना गुरु बना लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny" target="_blank">Rajiv Gandhi Birth Anniversary: आधुनिक भारत के निर्माता Rajiv Gandhi का वो विजन जिसने बदली देश की तकदीर</a></h3><h2>मां सरस्वती के साधक</h2><div>बिस्मिल्लाह खां मुस्लिम थे, लेकिन वह मां सरस्वती की पूजा करते थे। संगीत साधना से पहले मां सरस्वती से अपनी कला को बेहतर बनाने की प्रार्थना करते थे। बिस्मिल्लाह खां ने कभी किसी भी धर्म में भेद नहीं करते थे। वहीं मां सरस्वती की कृपा बिस्मिल्लाह खां पर हमेशा बनी रही।</div><div><br></div><h2>बनारस के घाट पर सीखा शहनाई बजाना</h2><div>बिस्मिल्लाह खां ने अपने चाचा अली बख्श के साथ बनारस चले गए थे। यहीं पर गंगा किनारे बैठकर वह शहनाई बजाना सीखते थे। बिस्मिल्लाह खां काशी विश्वनाथ मंदिर में शहनाई बजाते थे। कुछ ही दिनों बाद उस्ताद बिस्मिल्लाह खां को ऑल इंडिया म्यूजिक कॉन्फ्रेंस कलकत्ता में संगीत के महारथियों के सामने शहनाई बजाने का मौका मिला था।</div><div><br></div><h2>आजादी के जश्न में शहनाई की तान</h2><div>उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की शहनाई का पूरा देश ही कायल था। वहीं 15 अगस्त 1947 को जब देश को आजाद हुआ था। तो जश्न-ए-आजादी में भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने बिस्मिल्लाह खां को बुलावा भेजा। बिस्मिल्लाह खां की जादुई शहनाई से जश्न-ए-आजादी की रौनक बढ़ गई थी।</div><div><br></div><h2>सम्मान</h2><div>वहीं संगीत की दुनिया में अपना योगदान देने के लिए बिस्मिल्लाह खां को भारत रत्न, पद्म भूषण, पद्म विभूषण और पद्म श्री जैसे सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।</div><div><br></div><h2>निधन</h2><div>वहीं 21 अगस्त 2006 को उस्ताद बिस्मिल्लाह खां ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 15:07:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rajiv Gandhi Birth Anniversary: आधुनिक भारत के निर्माता Rajiv Gandhi का वो विजन जिसने बदली देश की तकदीर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 20 अगस्त को देश के पूर्व पीएम रहे राजीव गांधी का जन्म हुआ था। वह भारत के सबसे युवा प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी भारत को 21वीं सदी में ले जाने का सपना देखते थे। हालांकि उनको राजनीति में दिलचस्पी नहीं थी। लेकिन जिस तेजी के साथ राजीव गांधी का राजनीतिक जीवन शुरू हुआ था, उतना ही दर्दनाक और भयावह स्थिति में उसका अंत भी हुआ। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पूर्व पीएम राजीव गांधी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 20 अगस्त 1944 को राजीव गांधी का जन्म हुआ था। वह एक ऐसे परिवार में पले-बढ़े थे, जहां पर राजनीति और सत्ता देश के इतिहास का हिस्सा थी। उनकी मां देश की पहली महिला पीएम इंदिरा गांधी थीं। वहीं उनके पिता का नाम फिरोज गांधी थी। राजीव गांधी के नाना पंडित जवाहरलाल नेहरू आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री थे। राजीव गांधी का बचपन दिल्ली स्थित तीन मूर्ति भवन में बीता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair" target="_blank">Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey</a></h3><h2>पायलट बनना चाहते थे राजीव</h2><div>राजीव की शुरूआती जिंदगी राजनीति से अलग थी। उन्होंने देहरादूर के दून स्कूल से पढ़ाई की और फिर ब्रिटेन चले गए। वहां पर ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज में पढ़ाई शुरू की। इसके बाद राजीव गांधी ने लंदन के इंपीरियल कॉलेज में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की। राजीव की दिलचस्पी तकनीक और विज्ञान में थी। वह पायलट बनना चाहते थे।</div><div><br></div><div>इसके लिए राजीव गांधी ने दिल्ली फ्लाइंग क्लब की परीक्षा पास की। उन्होंने कमर्शियल पायलट का लाइसेंस प्राप्त किया। फिर वह इंडियन एयरलाइंस के पायलट बने। वह राजनीति से दूर अपना जीवन जी रहे थे। तभी साल 1980 के विमान दुर्घटना में राजीव के छोटे भाई संजय गांधी की मौत हो गई। ऐसे में राजीव को मजबूरन सियासत में आना पड़ा।</div><div><br></div><h2>राजनीति में एंट्री</h2><div>राजीव गांधी ने अमेठी से लोकसभा उपचुनाव लड़ा और जीत हासिल की। धीरे-धीरे राजीव कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय होत गए। वहीं 31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या कर दी गई और कांग्रेस नेतृत्व के सामने बड़ा संकट खड़ा हो गया। जिसके बाद राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री पद संभाला। इसके बाद उन्होंने आम चुनाव का ऐलान कर दिया। इस चुनाव में कांग्रेस को ऐतिहासिक जीत मिली और पार्टी ने 508 में से 401 लोकसभा सीटें प्राप्त कीं।</div><div><br></div><h2>आधुनिक भारत की नींव</h2><div>राजीव गांधी के सामने देश को संभालने की चुनौती थी, तो वह आधुनिक भारत की नींव मजबूत करने की महत्वाकांक्षी थे। वह तकनीक के क्षेत्र में भारत को आगे लेकर जाना चाहते थे। वह 21वीं सदी के भारत का सपना देखते थे। राजीव गांधी के कार्यकाल में भारत में सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार के विस्तार की दिशा आगे बढ़ी। वही बाद के वर्षों में राजीव गांधी को कंप्यूटर और तकनीक क्रांति को बढ़ावा देने वाले नेता के रूप में जाना गया।</div><div><br></div><h2>आखिरी सफर</h2><div>जिस तरह से राजीव गांधी के जीवन के रूख अचानक से राजनीति की ओर मुड़ा था। उस तरह एक बेहद भयावह घटना ने उसको हमेशा के लिए रोक दिया। 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की हत्याकर दी गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/vision-of-rajiv-gandhi-architect-of-modern-india-that-transformed-nation-destiny</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Peshwa Bajirao I Birth Anniversary: मुगलों के खिलाफ कभी नहीं हारी बाजी, 41 युद्धों के महानायक की वीरगाथा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/never-lost-battle-against-mughals-heroic-saga-of-legendary-commander-of-41-wars]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 18 अगस्त को पेशवा बाजीराव प्रथम का जन्म हुआ था। वह एक बेहतरीन घुड़सवार, कुशल तलवारबाजी और कमाल के सेनापति थे। बाजीराव प्रथम युद्ध में माहिर थे। उन्होंने मुगलों की कमर तोड़ दी थी। बाजीराव प्रथम अपनी जिंदगी में एक भी युद्ध नहीं हारे थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर पेशवा बाजीराव के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>18 अगस्त 1700 को पेशवा बाजीराव का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम बालाजी विश्वनाथ और मां का नाम राधाबाई था। इनके पिता छत्रपति शाहू के प्रथम पेशवा थे। बाजीराव का एक छोटा भाई चिमाजी अप्पा था। बाजीराव अपने पिता के साथ हमेशा सैन्य अभियानों में जाया करते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>बाजीराव प्रथम</h2><div>पेशवा बाजीराव को बाजीराव प्रथम भी कहा जाता है। वह मराठा साम्राज्य के एक महान पेशवा थे। पेशवा का अर्थ प्रधानमंत्री होता है। वह मराठा छत्रपति राजा शाहू के चौथे प्रधानमंत्री थे। बाजीराव ने अपना प्रधानमंत्री पद साल 1720 से लेकर मृत्यु तक संभाला था।</div><div><br></div><div>बाजीराव घुड़सवारी करते हुए लड़ने में माहिर थे। यह माना जाता है कि उनसे अच्छा घुड़सवार सैनिक देश में आज तक नहीं देखा गया। उनके 4 घोड़े थे- गंगा, नीला, सारंगा और औलख आदि। जिनकी वह खुद देखभाल किया करते थे। बाजीराव 6 फुट ऊंचे थे और वह न्यायप्रिय सफेद या हल्के रंग के कपड़े पहनना पसंद करते थे। बाजीराव पूरी सेना को अनुशासन में रखते थे।</div><div><br></div><div>बता दें कि 20 साल की उम्र में बाजीराव पेशवा के पद पर नियोजित हुए थे। उनके पेशवा बनते ही छत्रपति शाहू नाम मात्र के शासक रह गए थे। वह एक महान योद्धा थे। मोहम्मद बंगश, निजाम से लेकर मुगलों और पुर्तगालियों तक को वह कई-कई बार शिकस्त देते। बाजीराव इतिहास के अकेले ऐसे योद्धा थे, जिन्होंने 41 लड़ाइयां लड़ी थीं और एक भी लड़ाई नहीं हारी। बाजीराव की बिजली की गति से तेज आक्रमण शैली का इस्तेमाल कर रहे थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>बाजीराव पेशवा की 28 अप्रैल 1740 को 39 साल की उम्र में मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 17:33:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/never-lost-battle-against-mughals-heroic-saga-of-legendary-commander-of-41-wars</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Vilasrao Deshmukh Death Anniversary: जमीनी राजनीति से Maharashtra CM की कुर्सी तक का अद्भुत Journey]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 14 अगस्त को विलासराव देशमुख का निधन हो गया था। वह महाराष्ट्र के दो बार मुख्यमंत्री बने थे। वह राजनीति के मंझे हुए राजनेता थे। उन्होंने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत पंचायत चुनाव से की थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर विलासराव देशमुख के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के लातूर जिले के बाभालगांव में 26 मई 1945 विलासराव देशमुख का जन्म हुआ था। उन्होंने पुणे विश्वविद्यालय से विज्ञान और ऑर्ट्स दोनों में ग्रेजुएशन किया था। उन्होंने पुणे के इंडियन लॉ सोसाइटी लॉ कॉलेज से कानूनी शिक्षा ली। उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरूआत पंचायत चुनावों से की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule" target="_blank">Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>उन्होंने अपने सियासी सफर की शुरूआत&nbsp; साल 1974 से अपने पैतृक गांव से की थी। वह साल 1974 से लेकर 1979 तक सरपंच की भूमिका निभाई। फिर साल 1980 में वह पहली बार महाराष्ट्र की विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ें। विधायक बनने से पहले विलासराव देशमुख लातूर तालुका पंचायत समिति का सभापति, उस्मानाबाद जिला परिषद सदस्य, उस्मानाबाद युवक कांग्रेस अध्यक्ष और उस्मानाबाद जिला कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में अपनी अच्छी-खासी पहचान बना चुके थे।</div><div><br></div><div>फिर साल 1985 से लेकर 1990 में वह राज्यमंत्री के रूप में उभरे। लेकिन साल 1995 के विधानसभा चुनाव में उनको हार का सामना करना पड़ा। वहीं साल 1999 में भाजपा और शिवसेना गठबंधन की सरकार में थी। वहीं भाजपा और शिवसेना को रोकने के लिए एनसीपी और कांग्रेस ने मिलकर लड़ाई लड़ी। इसमें विलासराव को उम्मीद दिखी। उन्होंने साल 1999 में कांग्रेस की ओर से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की।</div><div><br></div><h2>महाराष्ट्र के सीएम</h2><div>इसके बाद 18 अक्तूबर 1999 को विलासराव देशमुख महाराष्ट्र के सीएम बने। फिर साल 2004 में एक बार फिर वापसी करते हुए वह महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बने। लेकिन दूसरी पारी ज्यादा दिनों तक नहीं चल पाई।&nbsp; दरअसल, 26 नवंबर 2008 को आतंकवादी हमला हुआ। जिसके बाद देशमुख को मंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा।</div><div><br></div><div>देशमुख साल 2009 में लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते थे। लेकिन कुछ कारणों से वह लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सके। वहीं बाद में कांग्रेस ने विलासराव देशमुख को राज्यसभा सदस्य बनाया और 28 मई 2009 को केंद्र सरकार में उद्योग मंत्री बने। फिर जनवरी 2011 से जुलाई 2011 तक केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे। फिर जुलाई 2011 में उनको विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री बनाया गया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 14 अगस्त 2012 को लिवर और किडनी की बीमारी के कारण विलासराव देशमुख का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 12:39:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/an-extraordinary-journey-from-grassroots-politics-to-maharashtra-cm-chair</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bhikaji Cama Death Anniversary: वो वीरांगना जिसने Germany में लहराया भारत का तिरंगा और British Rule को ललकारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 13 अगस्त को स्वतंत्रता संग्राम की वीरांगना भीकाजी कामा का निधन हो गया था। उन्होंने न सिर्फ भारत बल्कि विदेश में स्वतंत्रता की अलख जगाई थी। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय तिरंगे को गर्व के साथ फहराया। भीकाजी कामा ने अपने साहस और बलिदान से इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर भीकाजी कामा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में 24 सितंबर 1861 को भीकाजी कामा का जन्म हुआ था। वह एक समृद्ध पारसी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। इनके पिता का नाम सोराबजी फ्रामजी पटेल था, जोकि एक प्रसिद्ध व्यापारी थे। भीकाजी कामा ने अंग्रेजी और फ्रेंच भाषा में महारत हासिल की थी। भीकाजी कामा की शादी रुस्तम कामा से हुई। लेकिन यह रिश्ता सफल नहीं रहा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts" target="_blank">Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य</a></h3><h2>क्रांतिकारी जीवन</h2><div>भीकाजी कामा का क्रांतिकारी जीवन तब शुरू हुआ, जब साल 1869 में प्लेग महामारी फैली। तब भीकाजी कामा पीड़ितों की सेवा में जुट गईं। इस दौरान अंग्रेजी शासन की क्रूरता और भारतीयों के प्रति भेदभाव को देखकर भीकाजी कामा का मन विद्रोह से भर उठा। साल 1905 में वह सेहत कारणों की वजह से लंदन चली गईं। यहां पर वह दादाभाई नौरोजी और श्यामजी कृष्ण वर्मा जैसे क्रांतिकारियों से मिलीं। इसके बाद वह श्यामजी के 'इंडिया हाउस'&nbsp; में भारतीय संग्राम से जुड़ गईं।</div><div><br></div><h2>अंतरराष्ट्री मंच पर फहराया तिरंगा</h2><div>भीकाजी का ऐतिहासिक योगदान 22 अगस्त 1907 को जर्मनी के स्टटगार्ड में हुआ। यहां पर भीकाजी ने अंतरराष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भारत की तिरंगा फहराया। इस झंडे में लाल, हरा और केसरिया रंग था। उन्होंने अपने भाषण में ब्रिटिश शासन की बर्बरता का खुलासा किया। साथ ही उन्होंने भारत की आजादी की मांग को विश्व मंच पर रखा।</div><div><br></div><h2>ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा</h2><div>भीकाजी 'वंदे मातरम' नामक पत्रिका की संपादक रहीं। जो भारतीय स्वतंत्रता के विचारों को फैलाने का माध्यम बनीं। भीकाजी के क्रांतिकारी लेख और भाषण ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा बन चुके थे। जिस कारण उनकी गिरफ्तारी का आदेश जारी हुआ। लेकिन भीकाजी ने हार नहीं मानी और वह पेरिस चली गईं। वह पेरिस से क्रांतिकारी गतिविधियों को संचालित करती रहीं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं साल 1935 में उनकी सेहत खराब रहने लगीं और वह भारत लौट आईं। वहीं 13 अगस्त 1936 को भीकाजी कामा का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:28:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/heroine-who-hoisted-india-tricolour-in-germany-and-challenged-british-rule</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sridevi Birth Anniversary: एक फिल्म के लिए 1 करोड़ चार्ज करने वाली Legend की Success Story और अनकहे किस्से]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/success-story-and-untold-anecdotes-of-legend-charged-1-crore-for-film]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा की महिला सुपरस्टार रही अभिनेत्री श्रीदेवी का 13 अगस्त को जन्म हुआ था। आज भी एक्ट्रेस के अभिनय, खूबसूरती और व्यक्तित्व का प्रभाव सिनेमा प्रेमियों के दिलों में बसा है। अपनी बेहतरीन अदाकारी और डेडिकेशन के दम पर श्रीदेवी बॉलीवुड की 'सुपरस्टार' बन गई थीं। उन्होंने बहुत कम उम्र से ही फिल्मों में काम करना शुरू कर दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस श्रीदेवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>तमिलनाडु के मीनमपट्टी गांव में 13 अगस्त 1963 को श्रीदेवी का जन्म हुआ था। इनका असली नाम जिस उम्र में बच्चे स्कूल जाना शुरू करते हैं या अपना बचपन जीते हैं। उस छोटी सी 4 साल की उम्र से श्रीदेवी कैमरे के सामने एक्टिंग कर रही थीं। उन्होंने तमिल फिल्म 'कंधन करुणई' में एक बाल कलाकार के रूप में काम किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training" target="_blank">Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड</a></h3><h2>हिंदी फिल्मों का सफर</h2><div>तमिल फिल्मों में सफल होने के बाद श्रीदेवी ने 9 साल की उम्र में हिंदी फिल्म 'रानी मेरा नाम' से बॉलीवुड में एंट्री की। उनकी बचपन से ही एक्टिंग में पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह किरदार में पूरी तरह से ढल जाती थीं।</div><div><br></div><h2>सुपरस्टारडम की शुरुआत</h2><div>बता दें कि साल 1979 में श्रीदेवी ने फिल्म 'सोलहवां सावन' से खुद को हिंदी सिनेमा में स्थापित कर लिया था। लेकिन एक्ट्रेस को असली पहचान फिल्म 'हिम्मतवाला' से मिली थी। इस फिल्म में दर्शकों ने उनकी एक्टिंग को खूब सराहा। इसके बाद 80 और 90 का दशक श्रीदेवी के नाम रहा। श्रीदेवी की मौजूदगी फिल्मों के हिट होने की गारंटी मानी जाती थी।</div><div><br></div><h2>हीरो से बड़ी स्टार</h2><div>अभिनेत्री को न सिर्फ दर्शकों का प्यार मिला, बल्कि इंडस्ट्री में भी उनको एक अलग दर्जा मिला। उस दौर में जब हीरो को हमेशा फिल्मों का केंद्र माना जाता था, तब श्रीदेवी ने ऐसी कई फिल्में कीं, जिसमें कहानी पूरी उनके ही इर्द-गिर्द घूमती थी।</div><div><br></div><h2>1 करोड़ रुपए की फीस पाने वाली पहली एक्ट्रेस</h2><div>80 और 90 के दशक में जब एक्ट्रेसेस को मेल एक्टर्स से कम फीस मिलती थी, तो इस मिथक को श्रीदेवी ने तोड़ा। वह बॉलीवुड की पहली एक्ट्रेस थीं, जिनको एक फिल्म के लिए 1 करोड़ रुपए तक फीस दी गई। उस समय यह बड़ी उपलब्धि थी। जो श्रीदेवी के स्टारडम और प्रभाव का प्रतीक था।</div><div><br></div><h2>फेमस फिल्में</h2><div>एक्ट्रेस श्रीदेवी ने अपने फिल्मी करियर में करीब 300 फिल्मों में काम किया है। उन्होंने 'लम्हे', 'सदमा', 'चांदनी', 'चालबाज', 'नगीना', 'खुदा गवाह', 'मिस्टर इंडिया', 'जुदाई', 'इंग्लिश विंग्लिश', 'बंजारन' और 'मॉम' जैसी फिल्मों में काम किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 24 फरवरी 2018 को दुबई में श्रीदेवी की मृत्यु हो गई थी।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:26:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/success-story-and-untold-anecdotes-of-legend-charged-1-crore-for-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vikram Sarabhai Birth Anniversary: Dr Vikram Sarabhai ने कैसे रखा भारत के Space Program का आधार, जानिए रोचक तथ्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 12 अगस्त को विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उन्होंने भारत देश में इसरो की शुरूआत की थी। विक्रम साराभाई भौगोलिक वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री थे। उन्होंने भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान और परमाणु ऊर्जा को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>गुजरात के अहमदाबाद में 12 अगस्त 1919 को विक्रम साराभाई का जन्म हुआ था। उनकी शुरूआती शिक्षा भारत में हुई। बाद में उच्च शिक्षा के लिए वह कैंब्रिज यूनिवर्सिटी के सेंट जॉन्स कॉलेज गए। यहां से उन्होंने डॉक्टरेट की उपाधि ली और कास्मिक किरण अनुसंधान में महत्वपूर्ण योगदान दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem" target="_blank">Rabindranath Tagore Death Anniversary: जानिए भारत के पहले Nobel Laureate और राष्ट्रगान के रचयिता का महान जीवन</a></h3><h2>इसरो की नींव</h2><div>संयुक्त राज्य अमेरिका से वापसी के बाद डॉ विक्रम साराभाई ने नवंबर 1947 में उन्होंने भारत के अहमदाबाद में भौतिक अनुसंधान प्रयोगशाला की स्थापना की थी। हालांकि शुरूआत में PRL ने अनुसंधान पर ध्यान दिया। फिर डॉ विक्रम साराभाई के घर से ही रिट्रीट की शुरूआत की। इसने भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की नींव रखने का काम किया था।</div><div><br></div><h2>अंतरिक्ष में योगदान</h2><div>विक्रम साराभाई ने अहमदाबाद में अंतरिक्ष अनुप्रयोग केंद्र की स्थापना की। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए जरूरी पल था। उनकी कोशिशों के जरिए भी भारत का पहला कृत्रिम उपग्रह आर्यभट्ट को विकसित करने में महत्वपूर्ण योगदान निभाया था। साल 1962 में साराभाई की सलाह पर भारत सरकार ने इंडियन नेशनल स्पेस कमेटी फॉर स्पेस रिसर्च की स्थापना की।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 दिसंबर 1971 को केरल के तिरुवनंतपुरम में डॉ विक्रम साराभाई का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:08:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/vikram-sarabhai-father-of-indian-space-program-discover-interesting-facts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rabindranath Tagore Death Anniversary: जानिए भारत के पहले Nobel Laureate और राष्ट्रगान के रचयिता का महान जीवन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 07 अगस्त को रवींद्रनाथ टैगोर का निधन हो गया था। वह राष्ट्रगान 'जन गण मन अधिनायक' के रचयिता थे। रवींद्रनाथ टैगोर एक बहुआयामी प्रतिभा के मालिक थे। उन्होंने साहित्य, कविता, दर्शन, नाटक, संगीत और चित्रकारी समेत कई विधाओं में अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर रवींद्रनाथ टैगोर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पश्चिम बंगाल के कोलकाता में 07 मई 1861 को रवींद्रनाथ टैगोर का जन्म हुआ था। वह 13 भाई-बहनों में सबसे छोटे थे। टैगोर का पालन-पोषण उनके पिता ने किया था। उनको बचपन से लिखने का शौक था। महज 8 साल की उम्र से ही उन्होंने कविताओं की रचनाएं शुरूकर दी थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak</a></h3><h2>बंगाल में हुए फेमस</h2><div>साल 1980 तक रवींद्रनाथ टैगोर ने कई कविताएं, उपन्यास और कहानियां लिखी थीं। इसको बंगाल के पब्लिशर्स ने पब्लिश किया था। इसके बाद वह बंगाल में काफी फेमस हो गए थे। टैगोर की रचनाओं के कारण से उनको हर कोई जानने लगा था। टैगोर ने अपनी रचनाओं के जरिए समाज की गलत रिवाजों और कुरीतियों के बारे में लोगों को जागरुक किया था।</div><div><br></div><h2>राष्ट्रगान के रचियता</h2><div>रवींद्रनाथ टैगोर को राष्ट्रगान के रचयिता के रूप में भी जाना जाता है। उन्होंने भारत के अलावा बांग्लादेश का राष्ट्रगान 'आमार सोनार बांग्ला' की भी रचना की थी। वहीं श्रीलंका के राष्ट्रगान को भी टैगोर की कविता से प्रेरित माना जाता है। टैगोर ने करीब 2,230 गीतों की रचना की थी।</div><div><br></div><h2>फेमस रचनाएं और सम्मान</h2><div>टैगोर की कुछ फेमस रचनाएं, 'काबुलीवाला', 'क्षुदिता पश्न', 'हैमांति' और 'मुसलमानिर गोल्पो' हैं। वहीं उनके फेमस उपन्यास 'नौकादुबी', 'चतुरंगा, गोरा', 'जोगजोग' और 'घारे बायर' है। रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा लिखी 'गीतांजलि' नामक कविता ने सबसे ज्यादा उपलब्धि हासिल की है। यह उनकी आखिरी रचना थी। वहीं साल 1913 में उनको नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। वह नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले गैर-यूरोपीय थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 07 अगस्त 1941 को रवींद्रनाथ टैगोर ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 16:29:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/discover-life-of-india-first-nobel-laureate-and-composer-of-national-anthem</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Marilyn Monroe Death Anniversary: ग्लैमरस छवि के पीछे छिपा था गहरा Struggle, आज भी Mystery है एक्ट्रेस की मौत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हॉलीवुड की सबसे फेमस एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो का 05 अगस्त को निधन हो गया था। जब भी मर्लिन का जिक्र किया जाता है, तो आंखों के सामने एक्ट्रेस की उड़ती सफेद ड्रेस वाली तस्वीर आती है। वह 20वीं सदी की सबसे फेमस अमेरिकी एक्ट्रेस, मॉडल और सिंगर थीं। अपनी चमकदार और ग्लैमरस छवि के पीछे मर्लिन एक ऐसी महिला थीं, जो लगातार लोगों की नजरों में बने रहने और आलोचनाओं के बीच अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रही थीं। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मर्लिन मुनरो के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मर्लिन मुनरो का जन्म 01 जून 1926 को हुआ था। उनका असली नाम नॉर्मा जीन मॉर्टेनसन था। मर्लिन का बचपन अस्थिरता, संघर्षों और पालन-पोषण केंद्र में बीता। मर्लिन ने कम उम्र में ही यह महसूस कर लिया था कि महिलाओं को उनके व्यक्तित्व से ज्यादा बाहरी छवि के आधार पर जज किया जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training" target="_blank">Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड</a></h3><h2>मॉडलिंग का सफर</h2><div>मर्लिन ने अपना करियर मॉडलिंग से शुरू किया था। वहीं जल्द ही वह हॉलीवुड की एक ग्लैमरस और मोहक एक्ट्रेस की इमेज में ढल गईं। कई फिल्मों ने एक्ट्रेस को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई थी। वह जल्द ही हॉलीवुड की सबसे बड़ी सितारों की लिस्ट में शामिल हो गईं। हालांकि एक्ट्रेस की सफलता के साथ उनके लिए एक चुनौती भी थी कि मर्लिन को अक्सर एक ही तरह की भूमिकाएं दी जाने लगीं। जिस कारण उनकी अभिनय क्षमता का पूरा प्रदर्शन नहीं हो सका।</div><div><br></div><h2>संवेदनशील महिला</h2><div>पर्दे पर ग्लैमरस और चुलबुली दिखने वाली मर्लिन मुनरो बेहद संवेदनशील और बौद्धिक सोच रखने वाली महिला थीं। वह अभिनय की गंभीरता से सीखना चाहती थीं। इसके अलावा उनको राजनीति, साहित्य, मनोविज्ञान और कला जैसे विषयों में गहरी रुचि थी।</div><div><br></div><h2>स्वतंत्र और मुखर एक्ट्रेस</h2><div>साल 1954 में एक्ट्रेस ने अपना खुद का प्रोडक्शन हाउस शुरू किया। उस समय में यह एक साहसिक कदम था। क्योंकि उस दौर में फिल्म स्टूडियो कलाकारों के करियर और फैसलों पर अपना कंट्रोल रखते थे। एक्ट्रेस ने उचित वेतन, बेहतर रोल और रचनात्मक स्वतंत्रता की मांग की। ऐसे में कई बार मर्लिन ने ऐसे रोल करने से इंकार कर दिया, जो उनको पसंद नहीं थे। एक्ट्रेस के इस कदम ने उनको हॉलीवुड की स्वतंत्र और मुखर अभिनेत्रियों में शुमार किया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 05 अगस्त 1962 में मात्र 36 वर्ष की उम्र में मुनरो ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया। वह अपने फ्लैट में रहस्यमई तरीके से मृत पाई गई थीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 17:40:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/deep-struggle-lay-hidden-behind-glamorous-image-actress-death-remains-mystery</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Kishore Kumar Birth Anniversary: बिना किसी Music Training के 8 Filmfare Awards जीतने वाले इस Legend का अनूठा रिकॉर्ड]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा के इतिहास के फेमस गायक किशोर कुमार का 04 अगस्त को जन्म हुआ था। वह एक मल्टी टैलेंटेड कलाकार थे। वह एक बेहतरीन गायक होने के साथ-साथ एक्टर, राइटर और फिल्म प्रोड्यूसर भी थे। उन्होंने 2678 फिल्मों में गाने गाए और करीब 88 फिल्मों में बतौर अभिनेता काम किया था। किशोर कुमार ने 8 फिल्मफेयर अवॉर्ड अपने नाम किए थे। आज की फिल्मों में भी किशोर कुमार के गानों में रीमेक किया जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर सिंगर किशोर कुमार के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मध्य प्रदेश में 04 जुलाई 1929 को किशोर कुमार का जन्म हुआ था। इनका असली नाम आभास कुमार था। जब वह फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बने, तो उनका नाम किशोर पड़ा। उन्होंने फिल्म इंडस्ट्री में आने से पहले कोई म्यूजिक ट्रेनिंग नहीं ली थी। उनके भाई ने एक बार बताया था कि किशोर की आवाज बचपन में फंटे बांस की तरह थी, लेकिन जब उन्होंने गाना शुरू किया, तो उन्होंने अपनी आवाज से लोगों को अपना दीवाना बना लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful" target="_blank">Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक</a></h3><h2>बिना प्रैक्टिस गाते थे किशोर</h2><div>गायक किशोर कुमार ने अपने सिंगिंग करियर में करीब 15 सौ से ज्यादा गाने गाए थे। वह कई बार अपनी गायकी के अंदाज से म्यूजिक डायरेक्टर्स को भी हैरान कर देते थे। उनकी गायिकी पर इतनी अच्छी और बारीक पकड़ थी कि अक्सर वह बिना प्रैक्टिस के रिकॉर्डिंग करवाते थे। किशोर कुमार की काबिलियत का अंदाजा आप इस बात से भी लगा सकते हैं कि वह बिना किसी गलती के एक टेक में ओके हो जाता था।</div><div><br></div><h2>शानदार सिंगर और अभिनेता थे किशोर कुमार</h2><div>वह इतने बड़े सिंगर थे कि वह लड़की की आवाज में भी गा लेते थे। उनके फेमस गानों में से एक गाना 'एक लड़की भीगी भागी सी' में सिंगर किशोर कुमार ने लड़की की आवाज दी थी। वह एक बेहतरीन सिंगर होने के साथ-साथ अभिनेता भी थे। उन्होंने फिल्मों में अपनी शर्तों पर काम किया। साल 1946 में फिल्म 'शिकारी' से किशोर कुमार ने फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखा था। इस फिल्म में लीड अभिनेता अशोक कुमार थे।</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>किशोर कुमार की पर्सनल लाइफ भी सुर्खियों में रही थी। किशोर कुमार ने 4 शादियां की थीं। साल 1951 में पहली शादी रुमा गुहा से की थी। दूसरी शादी फेमस एक्ट्रेस मधुबाला से हुई। तीसरी शादी उन्होंने योगिता बाली से की थी और चौथी शादी लीना चंदावरकर से की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 13 अक्टूबर 1987 को दिल का दौरा पड़ने से किशोर कुमार की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 14:49:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/unique-record-of-this-legend-won-8-filmfare-awards-without-any-music-training</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bal Gangadhar Tilak Death Anniversary: पत्रकारिता के जरिए ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिलाने वाले Bal Gangadhar Tilak]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 01 अगस्त को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था। वह 'लोकमान्य' के नाम से फेमस थे। तिलक सिर्फ एक स्वतंत्रता सेनानी नहीं बल्कि पत्रकार, प्रखर विचारक और समाज सुधारक भी थे। बाल गंगाधर तिलक ने 'स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा' का नारा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के रत्नागिरी में 23 जुलाई 1856 को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। उनका पूरा नाम केशव गंगाधर तिलक था। उन्होंने शुरूआती शिक्षा पूरी करने के बाद साल 1877 में पुणे के डक्कन कॉलेज से बीए की पढ़ाई की और फिर बाद में कानून की पढ़ाई की।</div><div><br></div><div>बाल गंगाधर तिलक एक बेहतरीन शिक्षक थे। उन्होंने साल 1884 में अपने साथियों के साथ मिलकर 'डक्कन एजुकेशन सोसाइटी' की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य युवाओं को राष्ट्रवाद और आधुनिक शिक्षा देना था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer" target="_blank">Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर</a></h3><h2>पत्रकारिता</h2><div>बता दें कि तिलक ने मराठी पेपर 'केसरी' और 'मराठा' नामक दो अखबार शुरू किए थे। इन अखबारों के जरिए बाल गंगाधर तिलक ब्रिटिश सरकार की नीतियों की आलोचना करते और भारतीयों में राष्ट्रवाद की भावना को जगाते थे।</div><div><br></div><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>वहीं साल 1905 के बंग-भंद आंदोलन में बाल गंगाधर तिलक ने सक्रिय भूमिका निभाई थी। वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के गरम दल के नेता थे। इसके अलावा तिलक ने एनी बेसेंट के साथ मिलकर 'होम रूल लीग' की स्थापना की थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 अगस्त 1920 को 64 साल की उम्र में बाल गंगाधर तिलक की मृत्यु हो गई थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 16:16:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bal-gangadhar-tilak-who-shook-foundations-of-british-rule-through-journalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Meena Kumari Birth Anniversary: 'Tragedy Queen' का फिल्मी सफर जितना सफल, असल जिंदगी उतनी दर्दनाक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की दिग्गज एक्ट्रेस मीना कुमारी की 01 अगस्त को जन्म हुआ था। मीना कुमारी को 'ट्रैजडी क्वीन' कहा जाता था। उनका जीवन दुखों से भरा था और अंत भी दर्दनाक रहा था। एक्ट्रेस ने कम उम्र में ही फिल्मों में काम करना शुरूकर दिया था। जिम्मेदारियों के कारण मीना न तो अपना बचपन जी पाईं और न दी जवानी। वहीं जब वह सफल एक्ट्रेस बन गईं, तो उनको शराब की लत लग गई। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर एक्ट्रेस मीना कुमारी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में</div><h2><br>जन्म और परिवार</h2><div>मीना कुमारी की जन्म 10 अगस्त 1933 को हुआ था। इनके पिता का नाम अली बक्स और मां का नाम इकबाल बेगम था। मीना के पैदा होने पर उनके पिता उन्हें अनाथालय में छोड़ दिया, क्योंकि वह बेटा चाहते थे। लेकिन कुछ घंटों बाद उनके पिता उनको वापस ले गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum" target="_blank">Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी</a></h3><h2>पहली फिल्म</h2><div>मीना को कभी फिल्मों का शौक नहीं रहा। लेकिन उनके माता-पिता काम के मौके पर उनको फिल्म स्टूडियो ले जाया करते थे। मीना कुमारी को निर्देशक विजय भट्ट ने फिल्म 'लेदरफेस' में कास्ट किया। इसके लिए उनको 25 रुपए मिले थे। जोकि मीना कुमारी की पहला फिल्मी कमाई थी। इसके बाद उन्होंने 'अधूरी कहानी', 'एक ही भूल' और 'पूजा' जैसी फिल्मों में काम किया।</div><div><br></div><div>फिल्मों में एक्टिंग के अलावा मीना कुमारी ने गाने भी गाए थे। इनमें 'पिया घर आजा', 'दुनिया एक सराय' और 'बिछड़े बालम' आदि शामिल हैं। वहीं साल 1940 के आखिरी तक एक्ट्रेस ने अपना ध्यान काल्पनिक या पौराणिक फिल्मों की ओर कर दिया था। लेकिन एक्ट्रेस को असली पहचान फिल्म 'बैजू बावरा' से मिली थी। एक्ट्रेस को 'आरती', 'पाकीजा', 'साहिब बीबी और गुलाम', 'परिणीता', 'मैं चुप रहूंगी', और 'सांझ और सवेरा' जैसी फिल्मों के लिए याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>जीवन में इतना सफल होने के बाद भी मीना कुमारी के जीवन के कीमती साल गरीबी और परेशानी में बीते। उन्होंने अपने जीवन में जिससे भी प्यार किया, अंत में सबने उनका साथ छोड़ दिया था। वहीं 31 मार्च 1972 में 38 साल की उम्र में एक्ट्रेस मीना कुमारी ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 15:59:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/as-successful-as-the-film-journey-of-tragedy-queen-her-real-life-equally-painful</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mohammad Rafi Death Anniversary: फकीर की नकल से 'Shahenshah-e-Tarannum' बनने की अनसुनी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा को एवरग्रीन गाने देने वाले मोहम्मद रफी का 31 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी लोग उनके गानों को सुनना और गुनगुनाना पसंद करते हैं। रफी के नाम करीब 26 हजार गाने गाए जाने का रिकॉर्ड है। उनको 'शहंशाह-ए-तरन्नुम' भी कहा जाता था। रफी ने अपने गांव में फकीर के गानों की नकल करके गाना गाना सीखा था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर मोहम्मद रफी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>अमृतसर के कोटला सुल्तान सिंह गांव में 24 दिसंबर 1924 को मोहम्मद रफी का जन्म हुआ था। घरवाले इनको प्यार से फिको कहते थे। फकीर को गली में गाते देख रफी नकल करके खुद भी गाना गाने लगे। वहीं जब वह 9 साल के थे, तो परिवार अमृतसर आकर बस गया। पढ़ाई में दिलचस्पी न होने की वजह से पिता ने उनको बड़े भाई के साथ खानदानी नाई की दुकान में लगा दिया।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor" target="_blank">Mehmood Ali Death Anniversary: कभी Director के ड्राइवर थे महमूद, फिर ऐसे बने Bollywood के सबसे महंगे Actor</a></h3><div><br></div><div>9 साल के रफी नाई बन चुके थे। साल 1933 में संगीतकार पंडित जीवनलाल नाई की दुकान पहुंचे। यहां पर उन्होंने रफी को गुनगुनाते देखा और रेडियो चैनल के ऑडिशन के लिए बुला लिया। जिसके बाद जीवनलाल ने उनको गायिकी की ट्रेनिंग दी और इस तरह से वह रेडियो में गानों को अपनी आवाज देने लगे।</div><div><br></div><h2>बत्ती जाने से फेमस हुए रफी</h2><div>वहीं साल 1937 में जब स्टेज पर बिजली न होने से पॉपुलर सिंगर कुंदनलाल सहगल ने गाने से मना कर दिया। तब 13 साल के रफी ने अपनी आवाज से समां बांध दिया। दर्शकों में बैठे सहगल भी रफी से काफी प्रभावित हुए। फिर प्रोड्यूसर और नजीर ने 100 रुपए और टिकट भेजकर रफी को मुंबई बुला लिया। इसके बाद रफी ने पहली बार 'पहले आप के लिए हिदुंस्तान के हम हैं' का गाना रिकॉर्ड किया। साल बीता और मोहम्मद रफी के गाने देशभर में मशहूर होने लगे। फिल्म बैजू बावरा के फिल्म के गानों के बाद मोहम्मद रफी स्टार बन गए और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1980 को हार्ट अटैक से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:18:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/the-untold-story-of-how-fakir-became-shahenshah-e-tarannum</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Udham Singh Death Anniversary: Jallianwala Bagh का बदला लेने London पहुंचे उधम सिंह, Michael O'Dwyer को किया ढेर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 31 जुलाई को क्रांतिकारी उधम सिंह को फांसी दी गई थी। उन्होंने जलियांवाला बाग नरसंहार का बदला लेने के लिए अपनी जिंदगी न्योछावर कर दी थी। उधम सिंह को जलियांवासला बाग हत्याकांड ने झझकोर कर रख दिया था। वहीं उधम सिंह की हिम्मत ने अंग्रेजों को हिलाकर रख दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर उधम सिंह के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के संगरूर में 11 मई 1899 को उधम सिंह का जन्म हुआ था। इनके बचपन का नाम शेर सिंह था। छोटी उम्र में उधम सिंह के माता-पिता और भाई की मृत्यु हो गई थी। जिसके बाद वह अमृतसर के खालसा अनाथालय में पले पढ़े थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen" target="_blank">Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story</a></h3><h2>भगत सिंह के शागिर्द</h2><div>उधम सिंह भगत सिंह से काफी ज्यादा प्रभावित थे। भगत सिंह से प्रेरित होकर उन्होंने क्रांतिकारी आंदोलन में कदम रखा। साल 1927 में वहीं हथियार और देशद्रोही साहित्य के आरोप में जेल गए। जेल से रिहाई के बाद उन्होंने लंदन की राह पकड़ी। यहां पर उन्होंने जलियांवाला बाग के जिम्मेदार माइकल ओ डायर को सबक सिखाने की सोची। 13 मार्च 1940 को उधम सिंह लंदन के कैक्सटोन हॉल पहुंचे।</div><div><br></div><div>इस दौरान उन्होंने किताब में छिपाए रिवॉल्वर से ओ डायर को गोली मारकर मौत के घाट उतार दिया। उधम सिंह द्वारा लिया गया यह बदला जलियांवाला बाग हत्याकांड के घाव का प्रतीक थी। जिसके बाद उधम सिंह को गिरफ्तार कर लिया गया। मुकदमे में उधम सिंह ने गर्व से कहा कि उन्होंने यह अपने देश के लिए किया है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को लंदन की पेंटनविले जेल में फांसी दी गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 13:12:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/udham-singh-reached-london-to-revenge-jallianwala-bagh-killed-michael-o-dwyer</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Munshi Premchand Birth Anniversary: जब गरीबी में बेचना पड़ा था कोट, जानें 'कलम के सिपाही' के संघर्षों की अनसुनी Life Story]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उपन्यास और कहानियों के सम्राट मुंशी प्रेमचंद का 31 जुलाई को जन्म हुआ था। उन्होंने कई उपन्यास और कहानियों की रचना की थी। वह एक ऐसी शख्सियत थे, जिन्होंने अपने आसपास जो देखा, उसको कहानी और उपन्यास में उतारा। आज भी मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उपन्यास हमारे इर्दगिर्द नजर आते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुंशी प्रेमचंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में लमही गांव में 31 जुलाई 1980 को प्रेमचंद का जन्म हुआ था। उनके पिता का नाम मुंशी अजायबराय था, जोकि लमही में डाक मुंशी थे और मां का नाम आंनदी देवी था। मुंशी प्रेमचंद का असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। जब मुंशी 7 साल के थे, तो उनकी मां की मृत्यु हो गई थी। वहीं 15 साल की उम्र में उनका विवाह हो गया और 16 की उम्र में उनके पिता का निधन हो गया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth" target="_blank">JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार</a></h3><h2>संघर्ष में बीता बचपन</h2><div>प्रेमचंद के जीवन में परेशानी तब शुरू हुई, जब उनके कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई। आर्थिक तंगी इतनी थी कि उनको अपना खर्च चलाने के लिए अपना कोट तक बेचना पड़ा था। घर का खर्च चलाने के लिए उन्होंने अपनी पुस्तकें तक बेच दी थी।</div><div><br></div><h2>नहीं छोड़ा कलम का साथ</h2><div>कठिन परिस्थितियों में भी प्रेमचंद ने कलम का दामन नहीं छोड़ा। उनको पढ़ने-लिखने का काफी शौक था। वह 10वीं तक पढ़े थे और प्रेमचंद आगे पढ़ाई पूरी करके वकील बनना चाहते थे। लेकिन गरीबी के कारण उनकी पढ़ाई छूट गई। फिर गरीबी के कारण पत्नी भी छोड़कर चली गई। वहीं साल 1905 में प्रेमचंद ने दूसरी शादी कर ली। इसके बाद वह साहित्य सेवा में लग गए।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुंशी प्रेमचंद ने 5 कहानियों का संग्रह 'सोज़े वतन' लिखा था, जोकि साल 1907 में प्रकाशित हुआ था। यह प्रेमचंद का पहला उर्दू कहानियों का संग्रह था। जिसको उन्होंने 'नवाब राय' के नाम से छपवाया था। उन्होंने करीब 300 कहानियां और करीब आधा दर्जन उपन्यास और एक नाटक भी लिखा। उन्होंने उर्दू और हिंदी दोनों ही भाषाओं में लिखा। मुंशी प्रेमचंद ने अधिकतर मजदूर, नारीवाद, पूंजीवाद, गांधीवाद, किसान, बेमेल विवाह, पत्रकारिता, धार्मिक पाखंड और राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन आदि विषयों पर लिखा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 11:57:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/poverty-forced-to-sell-coat-untold-story-of-struggles-of-soldier-of-pen</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[JRD Tata Birth Anniversary: एयरलाइंस से स्टील तक, कैसे JRD Tata ने रखा आधुनिक भारत की Economic Growth का मजबूत आधार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जेआरडी टाटा का नाम भारतीय इंडस्ट्री के इतिहास में अमर है। जेआरडी टाटा ने देश को आर्थिक रूप से संपन्न बनाने में अहम भूमिका निभाई थी। आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। जेआरडी की गिनती दुनिया के सबसे महान उद्योगपतियों में की जाती है। उन्होंने भारत को पहली विमानन कंपनी दी थी। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर जेआरडी टाटा के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फ्रांस में 29 जुलाई 1904 को जेआरडी टाटा का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम रतनजी दादाभाई टाटा और मां का नाम सुजैन ब्रियर था। जेआरडी टाटा का पूरा नाम जहांगीर रतनजी दादाभाई टाटा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail" target="_blank">Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश</a></h3><h2>भारत लौटे JRD TATA</h2><div>साल 1925 में जेआरडी टाटा भारत वापस आए। इसके बाद वह बतौर इंटर्न टाटा टिस्को में काम करने लगे। पिता के निधन के फौरन बाद जेआरडी टाटा 'टाटा ग्रुप' की प्रमुख कंपनी टाटा संस के बोर्ड में शामिल हो गए। 1929 में जेआरडी टाटा ने फ्रांसीसी नागरिकता त्याग कर भारत की नागरिकता अपनाई।</div><div><br></div><h2>कमर्शियल पायलट</h2><div>वह भारत के पहले कमर्शियल पायलट थे। जिनको साल 1929 में लाइसेंस मिला था। इसके एक साल बाद उन्होंने हवाई डाक सेवा शुरू करने की सोची और यहीं से टाटा एयरलाइंस की नींव पड़ी। साल 1932 में टाटा एविशन सर्विस ने पहली उड़ान भरी। भारतीय विमानन इतिहास की पहली उड़ान कराची के ड्रिघ रोड से जेआरडी टाटा के कंट्रोल में एक पुस मॉथ के साथ शुरू हुई। साल 1935 तक JRD ने इस विमानन कंपनी को बुलंदियों तक पहुंचा दिया।</div><div><br></div><h2>टाटा ग्रुप के चेयरमैन</h2><div>साल 1938 में जेआरडी टाटा ने सर नौरोजी से टाटा समूह के अध्यक्ष पद ग्रहण किया था। वहीं साल 1938 से लेकर 1991 तक जेआरडी टाटा ने 50 सालों तक टाटा समूह का नेतृत्व किया। वह टाटा ग्रुप के सबसे लंबे समय तक चेयरमैन रहने वाले व्यक्ति थे।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 नवंबर 1933 को जेआरडी टाटा का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:00:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/airlines-to-steel-how-jrd-tata-laid-foundation-for-modern-india-economic-growth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gayatri Devi Death Anniversary: जब Indira Gandhi ने राजमाता को कहा 'शीशे की गुड़िया', तिहाड़ जेल तक पहुंची थी रंजिश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 29 जुलाई को पूर्व सांसद व जयपुर के पूर्व राजघराने की सदस्य गायत्री देवी का निधन हो गया था। उन्होंने 90 साल की उम्र में अंतिम सांस ली थी। पहले वह राजकुमारी से महारानी बनीं और फिर राजमाता। बताया जाता है कि वह किसी भी मामले में पूर्व पीएम इंदिरा गांधी से कम नहीं थी। वहीं इंदिरा गांधी के साथ गायत्री देवी का विवाद हमेशा रहा। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गायत्री देवी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>लंदन में 23 मई 1919 को गायत्री देवी का जन्म हुआ था। उनके पिता राजकुमार जितेन्द्र नारायण कूच बिहार के युवराज के छोटे भाई थे। उनकी मां बड़ौदा की राजकुमारी इंदिरा राजे थीं। उन्होंने पहले शांतिनिकेतन और फिर लंदन और स्विट्जरलैंड में अपनी शिक्षा पूरी की। महज 12 साल की उम्र में उन्होंने जयपुर के महाराजा सवाई मानसिंह (द्वितीय) से हुआ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire" target="_blank">Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: बंगाल की कुरीतियों को मिटाने वाले महान Social Reformer, जिनकी विरासत आज भी है प्रेरणा</a></h3><h2>राजनीतिक सफर</h2><div>गायत्री देवी ने साल 1962 में लोकसभा चुनाव जीता था। फिर साल 1967 और 1972 का चुनाव जीता। इस दौरान वह स्वतंत्र पार्टी से जुड़ी। गायत्री देवी इंदिरा गांधी की कट्टर विरोधी थीं। साल 1975 में आपातकाल के दौरान उनको तिहाड़ जेल जाना पड़ा था। उन्होंने इंदिरा गांधी से सीधी टक्कर ली, लेकिन समझौता नहीं किया। गायत्री देवी को लालच, धमकी दोनों दी गईं। लेकिन वह झुकी नहीं।</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि संसद में इंदिरा गांधी को गायत्री देवी की मौजूदगी रास नहीं आती थी। इंदिरा गांधी ने उनको 'शीशे की गुड़िया' कह दिया था। गायत्री देवी और इंदिरा गांधी के बीच यह रंजिश आजीवन चलती रही। हालांकि बाद में गायत्री देवी ने राजनीति छोड़ दी थी।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं गायत्री देवी का साल 2009 में 90 साल की उम्र में निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 13:47:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/when-indira-gandhi-called-queen-mother-glass-doll-feud-reached-tihar-jail</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ishwar Chandra Vidyasagar Death Anniversary: बंगाल की कुरीतियों को मिटाने वाले महान Social Reformer, जिनकी विरासत आज भी है प्रेरणा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>19वीं सदी के महान दार्शनिक, समाज सुधारक, शिक्षाविद और लेखक ईश्वर चंद्र विद्यासागर का 29 जुलाई को निधन हो गया था। उन्होंने भारत में विधवा विवाह कानून बनवाने में अहम योगदान दिया था। उनको सामाजिक योगदान के लिए भारत के महान समाज सुधारकों में गिना जाता है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ईश्वर चंद्र विद्यासागर के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...&nbsp;</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>बंगाल के मेदिनीपुर में 26 सितंबर 1820 को विद्यासागर का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम ईश्वरचंद्र बन्दोपाध्याय था। दर्शऩ और संस्कृत में उनके विशारद होने की वजह से उनको छात्र जीवन में विद्यासागर कहा जाने लगा। साल 1839 में उन्होंने कानून की पढ़ाई की। फिर साल 1841 में वह फोर्ट लयम कॉलेज में संस्कृत विभाग के प्रमुख के रूप में काम करने लगे। फिर वह कलकत्ता के संस्कृत कॉलेज में संस्कृत के प्रोफेसर बने। इसके बाद उसी कॉलेज के प्रिंसिपल बन गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/he-lived-free-and-died-free-brave-man-whom-no-one-capture-while-he-alive" target="_blank">Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: 'आजाद' रहे और 'आजाद' ही मरे, वो वीर जिसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सका</a></h3><h2>कुरीतियों के खिलाफ उठाई आवाज</h2><div>वैसे तो पूरे भारत में 19वीं सदी में महिलाओं की स्थिति बेहद बुरी थी। लेकिन बंगाल में हालात काफी ज्यादा खराब थे। यहां पर काफी धार्मिक कुरीतियां थीं, जो हिंदू समाज में कलंक की तरह थीं। सती प्रथा पर कानून बन चुका था, लेकिन बाल विवाह और विधवाओं पर होने वाले अत्याचार बदस्तूर जारी थी।</div><div><br></div><h2>विधवा विवाह के लिए प्रस्ताव</h2><div>विधवा विवाह के लिए किए गए विद्यासागर के प्रयासों को आज भी सराहा जाता है। उन्होंने तत्कालीन सरकार को एक याचिका दी, जिसमें विधवाओं के पुनर्विवाह के लिए कानून बनाने की मांग की। साल 1856 में उनकी कोशिशें रंग लाईं और विधवा पुनर्विवाह कानून पारित हुआ। लेकिन इसके बाद भी लोगों में इस कानून के प्रति जागरुकता नहीं दिखी, तो उन्होंने दोस्त की शादी 10 साल की विधवा से कराई। इसके बाद अपने बेटे की शादी भी विधवा से करा दी।</div><div><br></div><h2>नारी उत्थान के लिए प्रयास</h2><div>ईश्वर चंद्र विद्यासागर ने महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा और समाज में स्थान दिलाने के लिए लगातार कोशिशें की। नारी शिक्षा के लिए की गई उनकी कोशिशों को आज भी याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 29 जुलाई 1891 को ईश्वर चंद्र विद्यासागर का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 13:45:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/great-social-reformer-who-eradicated-evils-of-bengal-legacy-continues-to-inspire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mehmood Ali Death Anniversary: कभी Director के ड्राइवर थे महमूद, फिर ऐसे बने Bollywood के सबसे महंगे Actor]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब भी बॉलीवुड के सबसे बेहतरीन और सफल कॉमेडियन का जिक्र होता है। तो महमूद अली का नाम सबसे पहले आता है। बड़े पर्दे पर करोड़ों लोगों को हंसाने वाले महमूद अली की पर्सनल लाइफ चुनौतियों और कठिन परिस्थितियों से भरी हुई थी। उन्होंने अपने करियर के शुरूआती दिनों में गुजारा करने के लिए न जाने कितने छोटे-मोटे काम किए। आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को महमूद अली का निधन हो गया था। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर महमूद अली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>वहीं 29 सितंबर 1932 को महमूद अली का जन्म हुआ था। फिल्मों में आने से पहले वह एक्ट्रेस मीना कुमारी के टेनिस कोच थे। वह डायरेक्टर पीएल संतोषी के ड्राइवर भी रहे। उन्होंने दिग्गज एक्ट्रेस मीन कुमारी की बहन मधु से शादी की।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years" target="_blank">Mukesh Birth Anniversary: 10वीं के बाद छोड़ी पढ़ाई, फिर 40 साल तक Bollywood Music पर चला मुकेश का जादू</a></h3><h2>एक्टिंग में रखा कदम</h2><div>उनकी कॉमेडी की सबसे खास बात यह है कि उनका हैदराबादी उर्दू लहजा था। जिसको दर्शकों ने काफी पसंद किया। उन्होंने अपने 'सीआईडी' से अपने फिल्मी सफर की शुरूआत की थी। महमदू ने 4 दशकों से ज्यादा लंबे करियर में 300 से ज्यादा फिल्मों में अपनी एक्टिंग का जादू बिखेरा है। महमूद की शानदार एक्टिंग का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि उनको 25 बार फिल्मफेयर में नामांकित किया गया।</div><div><br></div><div>उस समय कॉमेडी में पुरस्कार बाद में शुरू हुए थे। फिर भी उन्होंने कई बार इस ट्ऱॉफी को अपने नाम किया था। महमूद अली ने अपनी पॉपुलैरिटी के चरम पर हिंदी फिल्मों के मुख्य अभिनेताओं से ज्यादा फीस लेते थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>आखिरी अलविदा</h2><div>80 के दशक में जब फिल्म इंडस्ट्री में नए कॉमेडियन आए। तो महमूद की फिल्मों की संख्या काफी कम होती चली गई। अंदाज अपना-अपना में उनका जॉनी की रोल एक्टर के रूप में उनकी आखिरी और सबसे हिट भूमिका साबित हुई। जीवन के आखिरी समय में महमूद लगातार दिल की बीमारियों से जूझते रहे। वहीं बेहतर इलाज की उम्मीद में महमूद अमेरिका गए थे। वहीं 23 जुलाई 2004 को पेंसिल्वेनिया में नींद के दौरान महमूद अली ने दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mehmood-once-director-driver-then-became-bollywood-most-expensive-actor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chandrashekhar Azad Birth Anniversary: 'आजाद' रहे और 'आजाद' ही मरे, वो वीर जिसे जीते जी कोई नहीं पकड़ सका]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/he-lived-free-and-died-free-brave-man-whom-no-one-capture-while-he-alive]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को चंद्रशेखर आजाद का जन्म हुआ था। चंद्रशेखर आजादी के ऐसे दीवाने थे कि नाम के आगे भी आजाद लगा लिया। चंद्रशेखर आजाद से अंग्रेज थर-थर कांपते थे। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे चर्चित क्रांतिकारियों में थे। वह साहसी और तेज निर्णय लेते थे। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर चंद्रशेखर आजाद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मध्य प्रदेश के अलीराजपुर जिले के भाबरा गांव में 23 जुलाई 1906 को चंद्रशेखर का जन्म हुआ था। वह एक ब्राह्मण परिवार से ताल्लुक रखते थे। उन्होंने कम उम्र में अपने देश प्रेम के बारे में परिवार को बता दिया था। आजाद का निशाना काफी सटीक था। इसके पीछे बचपन का अभ्यास, धैर्य, मजबूत शरीर, सतर्कता और कठिन परिस्थितियों में शांत रहने की क्षमता थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper" target="_blank">Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: संस्कृत के विद्वान जिन्होंने Kesari अखबार के जरिए जगाई 'पूर्ण स्वराज' की अलख</a></h3><h2>पास रखते थे पिस्तौल और गोलियां</h2><div>जब आजाद क्रांतिकारी आंदोलन से जुड़े, तो परिस्थितियां बदल गईं। अंग्रेजी शासन के खिलाफ उनका संघर्ष बेहद कठिन था। पुलिस, खुफिया तंत्र और सरकारी बल लगातार क्रांतिकारियों की खोज में रहते थे। इस स्थिति में क्रांतिकारियों को अपनी रक्षा करनी होती थी। इसलिए आजाद ने अपने साथ तीर-कमान और पिस्तौल और गोलियां रखना शुरू किया।</div><div><br></div><h2>आजाद की दो ख्वाहिश</h2><div>देश को आजाद कराने के लिए चंद्रशेखर आजाद रूस जाकर स्टालिन से मिलना चाहते थे। लेकिन रूस की यात्रा के लिए उनके पास पर्याप्त रुपए नहीं थे। वहीं उनकी दूसरी ख्वाहिश थी कि अपने साथी क्रांतिकारी भगत सिंह को फांसी से बचाना चाहते थे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वाराणसी में बने 'आजाद'</h2><div>साल 1921 में जब जलियांवाला बाग की घटना ने देशवासियों के अंदर आक्रोश भर दिया था। अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ गांधी जी ने असहयोग आंदोलन छेड़ दिया था। क्रांतिकारियों के गढ़ बनारस में छात्रों का एक गुट विदेशी कपड़ों की दुकान के बाहर प्रदर्शन कर रहा था। तभी वहां पर पुलिस ने छात्रों पर लाठीचार्ज कर दिया। तभी आजाद ने एक दरोगा के सिर पर पत्थर मार दिया।</div><div><br></div><div>आजाद पकड़े गए और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। इस दौरान उन्होंने अपनी मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता और जेल को अपना घर बताया। मजिस्ट्रेट ने उनको 15 कोड़े मारने की सजा सुनाई। जेल से बाहर आने के बाद उनकी बहादुरी की चर्चा पूरे बनारस में थी। इसके बाद एक सभा में चंद्रशेखर तिवारी का नाम चंद्रशेखर आजाद किया गया।</div><div><br></div><h2>नहीं आऊंगा जिंदा हाथ</h2><div>एक बार स्वतंत्रता सेनानियों की बैठक में आजाद ने कहा था कि अंग्रेज मुझे कभी जिंदा नहीं पकड़ सकते हैं। वहीं प्रयागराज के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी 1931 को अंग्रेजों ने आजाद को घेर लिया। तब उन्होंने अंग्रेजों का जमकर सामना किया। लेकिन जब चंद्रशेखर आजाद के पास आखिरी गोली बची, तो उन्होंने अपनी कनपटी पर पिस्तौल से गोली चलाकर स्वयं को खत्म कर लिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:11:31 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bal Gangadhar Tilak Birth Anniversary: संस्कृत के विद्वान जिन्होंने Kesari अखबार के जरिए जगाई 'पूर्ण स्वराज' की अलख]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 23 जुलाई को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। वह भारत के प्रमुख नेता, स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक और लोकप्रिय नेता थे। उनके नाम के आगे 'लोकमान्य' लगाया जाता था। उन्होंने सबसे पहले ब्रिटिश राज के दौरान पूर्ण स्वराज की मांग उठाई थी। इस कारण बाल गंगाधर तिलक को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का जनक कहा जाता है। उन्होंने 'स्वराज हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है' का नारा दिया था। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर बाल गंगाधर तिलक के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>महाराष्ट्र के रत्नागिरी में 13 जुलाई 1856 को बाल गंगाधर तिलक का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम गंगाधर रामचंद्र तिलक था, वह संस्कृत के विद्वान और शिक्षक थे। मां का नाम पार्वती बाई था। साल 1877 में तिलक ने पुणे के डेक्कन कॉलेज से संस्कृत और गणित विषय की डिग्री हासिल की। इसके बाद मुंबई के सरकार लॉ कॉलेज से LLB पास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math" target="_blank">Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य</a></h3><h2>शिक्षकों से मतभेद</h2><div>पढ़ाई पूरी करने के बाद बाल गंगाधर तिलक ने पुणे के एक निजी स्कूल में गणित और अंग्रेजी के शिक्षक बन गए। स्कूल के अन्य शिक्षकों से उनके मतभेद हो गए। ऐसे में 1880 में उन्होंने पढ़ाना छोड़ दिया था। दरअसल, बाल गंगाधर तिलक अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली के आलोचक थे। तिलक स्कूलों में ब्रिटिश स्टूडेंट्स की तुलना में भारतीय स्टूडेंट्स के साथ हो रहे दोगले व्यवहार का विरोध करते थे।</div><div><br></div><div>बाल गंगाधर तिलक ने समाज में फैली छुआछूत के खिलाफ भी आवाज उठाई थी। तिलक ने दक्खन शिक्षा सोसायटी की स्थापना की। इसकी स्थापना का उद्देश्य भारत में शिक्षा के स्तर को सुधारना है। वहीं तिलक ने मराठी भाषा में मराठा दर्पण और केसरी नामक दो अखबार शुरू किए, जो उस समय काफी ज्यादा लोकप्रिय हुए थे। स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनकर तिलक ने ब्रिटिश हुकूमत का विरोध किया और पूर्ण स्वराज की मांग की। केसरी अखबार में छपने वाले लेखों के कारण वह कई बार जेल भी गए।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 01 अगस्त 1920 को लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 12:08:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/sanskrit-scholar-who-raised-slogan-of-purna-swaraj-through-kesari-newspaper</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mukesh Birth Anniversary: 10वीं के बाद छोड़ी पढ़ाई, फिर 40 साल तक Bollywood Music पर चला मुकेश का जादू]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी सिनेमा के महान गायकों में शामिल मुकेश का 22 जुलाई को जन्म हुआ था। आज भी लोग मुकेश के गाने सुनना पसंद करते हैं। उन्होंने अपने दर्द भरे गीतों से भारतीय संगीत को एक नई पहचान दी थी। अपने चार दशक लंबे सिंगिंग करियर में मुकेश ने कई ऐसे गीत गाए, जो आज भी सदाबहार माने जाते हैं। तो आइए जानते हैं उनकी बर्थ एनिवर्सरी के मौके पर मुकेश के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुकेश का जन्म 22 जुलाई 1923 को हुआ था। इनका असली नाम मुकेश चंद माथुर था। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखते थे। इनके पिता का नाम जोरावर चंद माथुर था, जोकि पेशे से इंजीनियर थे। मुकेश को बचपन से ही संगीत से लगाव था। 10वीं के बाद उन्होंने पढ़ाई करना छोड़ दी थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom" target="_blank">Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द</a></h3><h2>फिल्मी करियर</h2><div>मुकेश की जिंदगी में सबसे बड़ा और अहम मोड़ तब आया। जब उन्होंने अपने रिश्तेदार और अभिनेता मोतीलाल की बहन की शादी में गाना गाया। मुकेश की आवाज से प्रभावित होकर मोतीलाल उनको मुंबई ले आए। यहां पर मुकेश ने संगीत की ट्रेनिंग ली। यहीं से मुकेश के फिल्मी सफर की शुरूआत हुई थी।</div><div><br></div><h2>पहला गाना और अभिनय</h2><div>मुकेश ने अपना पहला गीत 'दिल ही बुझा हुआ हो तो' गाया था। अपने पहले गाने से उन्होंने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया था। सिंगिंग के अलावा उन्होंने एक्टिंग में भी हाथ आजमाया था। उन्होंने माशूका, आह, अनुराग और दुल्हन जैसी फिल्मों में एक्टिंग की थी। लेकिन मुकेश को सबसे ज्यादा सफलता पार्श्व गायन में मिली थी। उन्होंने 'मेरा जूता है जापानी', 'आवारा हूं', 'जीना यहां मरना यहां', 'दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई', 'दोस्त-दोस्त न रहा' और 'कहता है जोकर' जैसे कई सदाबहार गीत गाए।</div><div><br></div><div>मुकेश की आवाज राज कपूर की फिल्मों की पहचान बन गई। मुकेश और राज कपूर की जोड़ी ने हिंदी सिनेमा को कई यादगार गीत दिए। मुकेश ने अपने 40 साल के लंबे करियर में 200 से ज्यादा गाने गाए। उन्होंने सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश में भी अपनी सिंगिंग का जादू बिखेरा।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 27 अगस्त 1976 को अमेरिका में एक स्टेज शो के दौरान दिल का दौरा पड़ने से मुकेश की मृत्यु हो गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 18:15:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/mukesh-magic-continued-to-dominate-bollywood-music-for-40-years</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bruce Lee Death Anniversary: महज 32 की उम्र में दुनिया छोड़ गया Martial Arts का यह सबसे बड़ा Superstar]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/this-biggest-martial-arts-superstar-passed-away-at-age-of-32]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मार्शल आर्ट के बेहतरीन योद्धा ब्रूस ली का 20 जुलाई को निधन हो गया था। उनको मार्शल आर्ट में माहिर माना जाता था। मार्शल आर्ट के अलावा ब्रूस ली फिल्मों में भी सक्रिय रहे। वह रोजाना इसकी प्रैक्टिस किया करते थे। इस कारण ब्रूस ली मार्शल आर्ट में पूरी तरह से माहिर हो चुके थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर ब्रूस ली के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>सैन फ्रांसिस्को में 27 नवंबर 1940 को ब्रूस ली का जन्म हुआ था। उनके बचपन का नाम ली जुन-फैन था। वह बचपन से ही मार्शल आर्ट की ओर आकर्षित थे और इसमें कुछ बड़ा करना चाहते थे। 18 साल की उम्र में उन्होंने वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी में एडमिशन ले लिया। यूनिवर्सिटी की फीस भरने के लिए उन्होंने लोगों को कुंग फू सिखाना शुरू कर दिया। इसी बीच साल 1962 को ब्रूस ली ने एक फाइट की, जिसमें उन्होंने 11 सेकेंड के अंदर अपने विरोधी को 15 पंच मार दिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom" target="_blank">Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द</a></h3><div><br></div><h2>ब्रूस ली का करियर</h2><div>वहीं ब्रूस ली अपनी दो उंगलियों से पुश अप लगा लेते थे। ब्रूस ली की किक की रफ्तार इतनी तेज होती थी कि शूटिंग के दौरान एक शूट को 34 फ्रेम स्लो करना पड़ता था। वह 18 की उम्र में 20 फिल्मों में एक्टिंग कर चुके थे। अपनी फिल्मों में ब्रूस ली के कई मार्शल कलाकारों के साथ काम किया, जो बाद में बड़े सितारे बने।</div><div><br></div><div>बता दें कि वह गामा पहलवान और बॉक्सर मोहम्मद अली के बड़े फैन थे। ब्रूस ली मोहम्मद अली के साथ एक फाइट लड़ना चाहते थे। वहीं ब्रूस ली ने अपने करियर में सिर्फ 7 हॉलीवुड फिल्मों में काम किया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>बताया जाता है कि ब्रूस ली को पानी से नफरत थी और उनको तैराकी भी नहीं आती थी। वहीं 20 जुलाई 1972 को महज 32 साल की उम्र में ब्रूस ली ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 16:08:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/this-biggest-martial-arts-superstar-passed-away-at-age-of-32</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Geeta Dutt Death Anniversary: महज 42 की उम्र में दुनिया छोड़ गई गीता दत्त, झेला Stardom का दर्द]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कई फेमस गानों को अपनी सुरीली आवाज से सजाने वाली गीता दत्त का 20 जुलाई को निधन हो गया था। आज भी गीता दत्त की आवाज संगीत जगत में महका करती है। गीता दत्त की गायिकी में वह जादू था कि उनके संगीत में प्यार, दर्द और तकलीफ जैसे जज्बात उभरकर आते थे। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर गीता दत्त के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>फरीदपुर में 23 नवंबर 1930 को गीता दत्त का जन्म हुआ था। वह जमींदार के परिवार से ताल्लुक रखती थीं। गीता दत्त का पूरा परिवार 40 के दशक में कोलकाता आ गया और फिर मुंबई चला गया। गीता दत्त का संगीत से रिश्ता बचपन से जुड़ गया था। उनकी मां एक कवियत्री थीं और पिता मुकुल रॉय संगीतकार थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka" target="_blank">Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़</a></h3><h2>पहला ब्रेक</h2><div>गीता दत्त को साल 1946 में पहला ब्रेक मिला था, तब वह 16 साल की थीं। फिल्म 'भक्त प्रह्लाद' के एक गाने में गीता ने दो लाइनें गाई थीं। इसके बाद फिल्म 'दो भाई' के गाने में अपनी आवाज दी। उन्होंने अपने सिंगिंग करियर में 'आंखों ही आंखों', 'चिन चिन चू', 'जाने कहां मेरा जिगर गया जी', 'बाबू जी धीरे चलना', 'पिया ऐसो जिया में समाय गयो रे', 'मुझे जान न कहो मेरी जान', 'वक्त ने किया क्या हसीं सितम' और 'ये लो मैं हारी पिया' जैसे तमाम हिट गाने दिए। लोग आज भी इन गानों को सुनना पसंद करते थे। गीता दत्त ने अपने सिंगिंग करियर में ओ.पी. नैय्यर, स.डी. बर्मन और हेमंत कुमार जैसे बड़े संगीतकारों के साथ काम किया।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>गीता दत्त की शादी मशहूर फिल्म निर्माता गुरुदत्त से हुई थी। गुरु और गीता की पहली मुलाकात फिल्म 'बाजी' के सेट पर हुई थी। दोनों का प्यार परवान चढ़ा और दोनों ने शादी का फैसला किया। लेकिन गीता का परिवार इस रिश्ते के खिलाफ था। लेकिन 26 जुलाई 1953 को गीता और गुरु ने शादी कर ली। शादी के बाद उनके बच्चे अरुण दत्त, तरुण दत्त और नीना दत्त हुए।</div><div><br></div><div>शादी के बाद गुरु दत्त ने गीता पर बंदिशें लगा दीं कि वह सिर्फ उनकी फिल्मों में गाना गाएंगी। शादी के बाद गुरु दत्त और वहीदा रहमान के अफेयर की खबर आने लगी। ऐसे में गीता दत्त अपने बच्चों के साथ माता-पिता के घर चली गईं। इस दौरान गीता दत्त को नशे की लत लग गई और वह शराब की आदी हो गईं।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं लिवर की बीमारी के कारण 20 जुलाई 1972 में 42 साल की उम्र में गीता दत्त ने इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 16:03:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/geeta-dutt-passed-away-at-age-of-42-having-endured-pain-of-stardom</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nelson Mandela Birth Anniversary: दक्षिण अफ्रीका से दुनिया तक गूंजती इंसाफ की आवाज थे नेल्सन मंडेला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/nelson-mandela-was-a-voice-for-justice-that-resonated-from-south-africa-to-the-entire-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नेल्सन मंडेला, एक ऐसा नाम, जो समस्त विश्व समुदाय के लिए मानवता, साहस, सहिष्णुता और संघर्ष का प्रतीक बन गया है। प्रतिवर्ष 18 जुलाई को ‘नेल्सन मंडेला अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ मनाया जाता है, जो न केवल इस महान नेता को श्रद्धांजलि देने का दिन है बल्कि यह पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि परिवर्तन लाने के लिए केवल शब्द नहीं बल्कि कर्म आवश्यक हैं। यह दिन हमें स्मरण करााता है कि समाज में बदलाव लाने के लिए हम सभी की भूमिका होती है और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में दूसरों के लिए कुछ कर सकता है। नेल्सन मंडेला का जन्म 18 जुलाई 1918 को दक्षिण अफ्रीका के म्वेजो नामक गांव में हुआ था। वे थेम्बू कुल की एक शाखा ‘मदिवा’ जनजाति से थे और उनका मूल नाम ‘रोहिलाहला मंडेला’ था, जिसका अर्थ होता है ‘शरारती’। उन्हें ‘नेल्सन’ नाम उनके स्कूल शिक्षक ने अंग्रेजी नामों की परंपरा के तहत दिया था। उनका जीवन एक सामान्य अफ्रीकी बच्चे की तरह शुरू हुआ लेकिन उनके भीतर असाधारण नेतृत्व क्षमता और अन्याय के प्रति गहरी संवेदना थी, जिसने उन्हें बाद में एक क्रांतिकारी नेता बना दिया।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला की शिक्षा की शुरुआत क्लार्कबरी मिशनरी स्कूल से हुई। आगे की पढ़ाई के लिए उन्होंने फोर्ट हेयर यूनिवर्सिटी और जोहान्सबर्ग स्थित विटवाटरस्रैंड विश्वविद्यालय में दाखिला लिया, जहां उन्होंने कानून की पढ़ाई की। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने रंगभेद नीति और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू कर दी थी। दक्षिण अफ्रीका में उस समय श्वेत अल्पसंख्यक सरकार द्वारा ‘अपरथाइड’ नामक नस्लीय भेदभाव की क्रूर नीति लागू थी, जिसके अंतर्गत अश्वेतों को बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा गया था। उन्हें वोट देने, जमीन रखने, शिक्षा प्राप्त करने, अस्पतालों में इलाज करवाने और बसों-रेस्तरां जैसी सार्वजनिक सेवाओं का समान उपयोग करने का अधिकार नहीं था। मंडेला ने इन्हीं अन्यायपूर्ण नीतियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया। वे 1944 में अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस से जुड़ गए और जल्द ही संगठन के युवा विंग के संस्थापक बन गए। अहिंसा और शांतिपूर्ण आंदोलनों के जरिये उन्होंने सरकार पर दबाव बनाना शुरू किया लेकिन जब उन्हें लगा कि सरकार की दमनकारी नीति अहिंसात्मक विरोध को कुचलने पर आमादा है तो उन्होंने ‘उमखोंतो वे सिजवे’ नामक एक सशस्त्र संगठन की स्थापना की, जो दक्षिण अफ्रीका में क्रांति का आरंभ था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka" target="_blank">Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़</a></h3><div>1962 में मंडेला को गिरफ्तार कर लिया गया और उन पर देशद्रोह, हिंसा भड़काने और विदेशी सहायता प्राप्त करने के आरोप लगाए गए। उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और उन्होंने अपना अधिकांश समय कुख्यात रोबेन द्वीप की जेल में बिताया। यह सजा कुल 27 वर्षों की लंबी यातना बन गई परंतु जेल की कोठरी में रहते हुए भी मंडेला की आत्मा आजाद रही। वे न टूटे, न झुके और न डरे। जेल में उन्होंने पढ़ाई की, दूसरे कैदियों को शिक्षित किया और अपना संघर्ष जारी रखा। इस दौरान दक्षिण अफ्रीका और दुनियाभर में मंडेला की रिहाई की मांग उठने लगी। अंततः सरकार झुकी और 11 फरवरी 1990 को नेल्सन मंडेला को जेल से रिहा किया गया। यह क्षण इतिहास में आज भी जीवंत है, जब एक अश्वेत नेता, जिसे वर्षों तक आतंकवादी करार दिया गया था, अब स्वतंत्रता और न्याय का प्रतीक बन चुका था। रिहाई के बाद मंडेला ने अपने सभी विरोधियों को माफ कर दिया। उन्होंने न केवल अफ्रीकन नेशनल कांग्रेस को फिर से संगठित किया बल्कि देश को भी एकजुट किया। उन्होंने विभाजन नहीं बल्कि मेल-मिलाप की राजनीति की। उनकी इसी दूरदृष्टि और अहिंसा के पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा ने दक्षिण अफ्रीका को नस्लीय संघर्ष से निकालकर लोकतंत्र की ओर अग्रसर किया।</div><div><br></div><div>दक्षिण अफ्रीका में 1994 में पहली बार बहुजातीय आम चुनाव आयोजित हुए, जिसमें हर नागरिक को मतदान का अधिकार मिला और परिणामस्वरूप नेल्सन मंडेला देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने। यह महज एक राजनीतिक जीत नहीं थी, यह एक युग परिवर्तन था। मंडेला ने अपने राष्ट्रपति काल में सुलह, सामाजिक समरसता और आर्थिक पुनर्निर्माण की नीति को अपनाया। उन्होंने जातीय द्वेष के बजाय सहयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने ‘सत्य और मेलमिलाप आयोग’ की स्थापना की, जहां पीड़ित और अपराधियों दोनों को एक साथ लाया गया ताकि सच्चाई सामने आ सके और समाज नई शुरुआत कर सके। नेल्सन मंडेला की सोच ‘उबुन्टु’ दर्शन से प्रभावित थी, जो अफ्रीकी संस्कृति में मानवीय संबंधों और सह-अस्तित्व की भावना को महत्व देती है। मंडेला ने यह दिखा दिया कि बदले की भावना से कोई देश नहीं बनता बल्कि माफी और मेल-मिलाप की भावना से स्थायी शांति संभव है।</div><div><br></div><div>उनके जीवन के योगदान को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान मिला। 1993 में उन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। 1990 में उन्हें भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किया और वे यह सम्मान पाने वाले पहले विदेशी व्यक्ति बने। इसके अलावा उन्हें संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका, रूस, फ्रांस जैसे अनेक देशों और संस्थाओं ने सर्वोच्च नागरिक सम्मान प्रदान किया। 2009 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 18 जुलाई को ‘नेल्सन मंडेला अंतर्राष्ट्रीय दिवस’ घोषित किया ताकि लोग उनके जीवन से प्रेरणा लेकर समाज के लिए स्वयं को समर्पित कर सकें। इस दिन दुनियाभर में सामाजिक सेवा, मानवाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समानता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। संयुक्त राष्ट्र का संदेश है कि हर व्यक्ति इस दिन कम से कम 67 मिनट समाजसेवा को समर्पित करे, जो मंडेला के सार्वजनिक जीवन के 67 वर्षों के प्रतीक हैं।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला का जीवन केवल दक्षिण अफ्रीका तक सीमित नहीं था। उन्होंने दुनिया को यह सिखाया कि सच्चे नेता वह होते हैं, जो अपने कष्टों को व्यक्तिगत नहीं मानते बल्कि उसे जनकल्याण की प्रेरणा बना देते हैं। उन्होंने यह भी दिखाया कि नेतृत्व का अर्थ अधिकार नहीं, जिम्मेदारी है। वे जब राष्ट्रपति बने तो केवल एक कार्यकाल तक सत्ता में रहे जबकि वे चाहते तो आजीवन शासन कर सकते थे पर उन्होंने सत्ता को साध्य नहीं, साधन माना। 5 दिसंबर 2013 को 95 वर्ष की आयु में नेल्सन मंडेला ने अंतिम सांस ली। उनके निधन पर पूरी दुनिया ने उन्हें श्रद्धांजलि दी। लाखों लोगों ने उन्हें ‘दक्षिण अफ्रीका का गांधी’ कहा तो कई लोगों ने उन्हें ‘मानवता का प्रकाश स्तंभ’ बताया। उनके सम्मान में कई देशों में राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया। आज उनकी मूर्तियां, नाम पर बने संस्थान और उनके विचारों पर आधारित योजनाएं दुनियाभर में उनकी विरासत को जीवित रखे हुए हैं।</div><div><br></div><div>नेल्सन मंडेला का जीवन उन लोगों के लिए आदर्श है, जो दुनिया को बेहतर बनाना चाहते हैं। उनका जीवन संघर्षों का था लेकिन उन्होंने कभी भी अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया। उन्होंने दिखाया कि किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई अहिंसा और नैतिक साहस से भी लड़ी जा सकती है। नेल्सन मंडेला ने कहा था, ‘मैंने पाया कि साहस डर की अनुपस्थिति नहीं है बल्कि उस पर विजय पाना है। बहादुर वह नहीं होता, जो डरता नहीं है बल्कि वह होता है, जो डर को हराता है।’ यह कथन आज के विश्व पर भी उतना ही लागू होता है, जितना उनके समय पर था। आज जब दुनिया असहिष्णुता, नस्लवाद, असमानता और युद्ध की चपेट में है, तब मंडेला जैसे नेताओं की सोच, दृष्टि और प्रेरणा पहले से कहीं अधिक जरूरी हो गई है। वे हमारे समय के ऐसे प्रेरणास्तंभ हैं, जो आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाते रहेंगे कि अंधकार चाहे जितना भी गहरा क्यों न हो, एक मोमबत्ती उसे चीर सकती है। उनकी यह बात हमारे लिए मार्गदर्शक हो सकती है, ‘एक अच्छा दिमाग और एक अच्छा दिल हमेशा एक विजयी संयोजन होता है।’ इसलिए यदि हम आज भी दुनिया को बदलना चाहते हैं तो हमें अपने भीतर की मानवता, संवेदना और साहस को जगाना होगा, यही नेल्सन मंडेला को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:32:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/nelson-mandela-was-a-voice-for-justice-that-resonated-from-south-africa-to-the-entire-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Rajesh Khanna Death Anniversary: Bollywood सुपरस्टार की वो दीवानगी, जब 'Kaka' की एक झलक को तरसती थी भीड़]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बॉलीवुड के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना की 18 जुलाई को मृत्यु हो गई थी। राजेश खन्ना कैंसर जैसी घातक बीमारी से जूझ रहे थे। जीवन के आखिरी पड़ाव में दवाइयों ने भी अपना असर करना बंद कर दिया था। अभिनेता के स्टारडम का वह आलम था कि वह जिस भी गली से निकलते थे, वहां पर लड़कियों की भीड़ लग जाया करती थी। उनकी हर फिल्म सुपरहिट होती थी। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर सुपरस्टार राजेश खन्ना के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>पंजाब के अमृतसर में 29 दिसंबर 1942 को राजेश खन्ना का जन्म हुआ था। इनका असली नाम जतिन खन्ना था। जतिन को बचपन से ही थिएटर में रुचि थी। उन्होंने एक टैलेंट कॉन्टेस्ट जीतकर मुंबई में कदम रखा। वहीं फिल्मों में आने के बाद उन्होंने अपना नाम राजेश खन्ना रख लिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math" target="_blank">Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य</a></h3><h2>फिल्मी सफर</h2><div>बता दें कि राजेश खन्ना ने कुल 180 फिल्मों और 163 फीचर फिल्मों में काम किया था। उन्होंने 128 फिल्मों में मुख्य रोल किया था। साल 1969 में आई फिल्म 'आराधना' ने अभिनेता के फिल्मी करियर की दिशा बदल दी। 3 सालों में राजेश खन्ना ने लगातार 15 हिट फिल्में दी थीं। जोकि अपने आप में एक रिकॉर्ड है।</div><div><br></div><div>जब राजेश खन्ना से उनका स्टारडम संभाले नहीं संभला तो वह यह सोचने लगे थे कि उनकी कुछ फिल्में फ्लॉप हो जाएं। अभिनेता ने 'अपना देश', 'मेरे जीवन साथी', 'कटी पतंग', 'अमर प्रेम', 'नमक हराम' और 'आप की कसम' जैसी कई सुपरहिट फिल्में दी थीं।</div><div><br></div><div>1970 के दशक में राजेश खन्ना के बंगले पर लड़कियों के इतने खत आते थे कि काका को खतों को पढ़ने के लिए अलग से एक शख्स रखना पड़ा था। जिनमें कई खत तो खून से लिखे होते थे। लड़कियां काका की फिल्में देखने से पहले सजने-संवरने के लिए ब्यूटी पार्लर जाया करती थीं।</div><div><br></div><h2>पर्सनल लाइफ</h2><div>अभिनेता की पर्सनल लाइफ काफी उतार-चढ़ाव भरी रही। साल 1973 में उन्होंने एक्ट्रेस डिंपल कपाड़िया से शादी की थी। उनकी दो बेटी ट्विंकल और रिंकी हुई। लेकिन 80 के दशक की शुरूआत में दोनों अलग रहने लगे थे। हालांकि उन्होंने कभी कानूनी तौर पर डिवोर्स नहीं लिया।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 18 जुलाई 2012 को सुपरस्टार राजेश खन्ना ने 69 साल की उम्र में इस दुनिया को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Jul 2026 12:27:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/bollywood-superstar-craze-when-crowd-yearned-for-glimpse-of-kaka</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Swami Vivekananda Death Anniversary: स्वामी विवेकानंद ने 39 साल में क्यों ली थी महासमाधि, जानें Belur Math का वो रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के महान आध्यात्मिक चिंतक, राष्ट्रनिर्माता और युवाओं के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानंद का 04 जुलाई को निधन हो गया था। उन्होंने विश्व मंच पर वेदांत, भारतीय संस्कृति और सनातन दर्शन को नई पहचान दिलाई थी। स्वामी विवेकानंद का मानना था कि किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति उसके युवा होते हैं। स्वामी विवेकानंद ने अपने जीवन में जो भी कार्य किए, उसका प्रभाव आज भी पूरी दुनिया महसूस करती है। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर स्वामी विवेकानंद के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>कोलकाता में 12 जनवरी 1863 को स्वामी विवेकानंद का जन्म हुआ था। उनका असली नाम नरेंद्र नाथ दत्त था। वह एक संपन्न बंगाली परिवार से ताल्लुक रखते थे। उनके पिता का नाम विश्वनाथ दत्त था, जोकि एक फेमस वकील थे। वहीं उनकी मां का नाम भुवनेश्वरी देवी था। जो एक धार्मिक विचारों वाली महिला थीं। नरेंद्रनाथ बचपन से ही जिज्ञासु और बुद्धिमान थे। वह शास्त्र, वेद और भारतीय संस्कृति के बारे में रुचि रखते थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey" target="_blank">Dadabhai Naoroji Death Anniversary: गणित के Professor से British Parliament तक, Dadabhai Naoroji का प्रेरक सफर</a></h3><h2>रामकृष्ण परमहंस से मुलाकात</h2><div>साल 1881 में पहली बार स्वामी विवेकानंद की रामकृष्ण परमहंस की मुलाकात हुई और वह उनके शिष्य बन गए। रामकृष्ण परमहंस की शिक्षाओं ने स्वामी विवेकानंद के जीवन को पूरी तरह से बदल दिया था। परमहंस ने विवेकानंद को भारतीय संस्कृति, आत्मज्ञान और जीवन के उद्देश्य को समझने में मार्गदर्शन किया था। रामकृष्ण परमहंस की शिक्षा के आधार पर स्वामी विवेकानंद ने आत्मा की शक्ति, समाज सुधार और धार्मिक सहिष्णुता के विषय में गहरे विचार किए।</div><div><br></div><h2>शिकागो विश्व धर्म महासभा</h2><div>साल 1893 में स्वामी विवेकानंद की पहचान पूरी दुनिया में शिकागो विश्व धर्म महासभा में उनके प्रसिद्ध भाषण से हुई। उन्होंने अपने भाषण में धार्मिक सहिष्णुता, भारतीय संस्कृति और मानवता के महत्व पर जोर दिया था। स्वामी विवेकानंद का यह भाषण आज भी धार्मिक एकता और सामाजिक एकता के रूप में याद किया जाता है।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं पश्चिम बंगाल के बेलूर मठ में 04 जुलाई 1902 को 39 साल की उम्र में स्वामी विवेकानंद का निधन हो गया था। स्वामी विवेकानंद के अनुयायियों का मानना था कि जीवन के अंतिम समय में बेलूर मठ में ध्यान लगाते लिए उन्होंने अपनी इच्छा से महासमाधि प्राप्त की थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Jul 2026 14:31:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/why-swami-vivekananda-attain-mahasamadhi-at-age-of-39-know-secret-of-belur-math</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Dadabhai Naoroji Death Anniversary: गणित के Professor से British Parliament तक, Dadabhai Naoroji का प्रेरक सफर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज ही के दिन यानी की 30 जून को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के संस्थापकों में से एक दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था। वह ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में चुने जाने वाले पहले भारतीय थे। भारतीय स्वतंत्रता में दादाभाई नौरोजी ने महत्वपूर्ण योगदान दिया था। दादाभाई नौरोजी न सिर्फ स्वतंत्रता आंदोलन के कई नेताओं के आदर्श रहे, बल्कि उनको ब्रिटेन तक में सम्मान मिला। तो आइए जानते हैं उनकी डेथ एनिवर्सरी के मौके पर दादाभाई नौरोजी के जीवन से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में...</div><div><br></div><h2>जन्म और परिवार</h2><div>मुंबई में एक पारसी परिवार में 04 सितंबर 1825 को दादा भाई नौरोजी का जन्म हुआ था। इनके पिता का नाम नौरोजी पलांजी डोरडी था और मां का नाम मनेखबाई था। जब दादाभाई सिर्फ 4 साल के थे, तो उनके पिता का निधन हो गया था। ऐसे में दादाभाई का पालन पोषण उनकी मां ने किया था। अनपढ़ होने के बाद भी उनकी मां ने उनकी पढ़ाई का विशेष ध्यान रखा। पढ़ाई पूरी करने के बाद दादा भाई नौरोजी 27 साल की उम्र में गणित और भौतिक शास्त्र के प्राध्यापक बन गए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/chanakya-of-politics-who-became-pm-of-country-after-leaving-politics" target="_blank">PV Narasimha Rao Birth Anniversary: सियासत के वो 'चाणक्य' जो राजनीति छोड़ते-छोड़ते बन गए देश के Prime Minister</a></h3><h2>इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष</h2><div>साल 1851 में दादा भाई नौरोजी ने गुजराती भाषा में रस्त गफ्तार साप्ताहिक शुरू किया। साल 1885 में बंबई विधान परिषद के सदस्य बने और साल 1886 में फिन्सबरी क्षेत्र से पार्लियामेंट के लिए निर्वाचित हुए थे। दादाभाई लंदन के विश्वविद्यालय में गुजराती के प्रोफेसर भी बने और फिर साल 1869 में वह भारत वापस आ गए। जिसके बाद साल 1886 और 1906 में दादाभाई नौरोजी इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष बने।</div><div><br></div><div>उन्होंने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस दौरान कांग्रेस में विचारधारा के आधार को दो गुट बन गए। जिनको 'नरम दल' और 'गरम दल' कहा जाता था। दोनों दलों की कार्यशैली उनके नाम के अनुरूप थी। साल 1906 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन की तैयारियां जोरों पर चल रही थीं। दोनों दल अध्यक्ष पद को हथियाने के लिए रणनीति बना रहे थे, जिससे कि पार्टी में उनके पक्ष का दबदबा बढ़ सके। इस वजह से यह पूरी आशंका बन गई कि इस बार का अधिवेशन बिना झगड़े के खत्म नहीं होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए दो बार कांग्रेस अध्यक्ष रह चुके दादाभाई को चुना गया। स्थितियों को देखते हुए वह तैयार हो गए और 71 साल की उम्र में वह तीसरी बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने। इस दौरान उनकी सबसे बड़ी जिम्मेदारी दोनों दलों को एक साथ रखने की थी। वहीं दादाभाई नौरोजी दोनों दलों को समझाने में सफल रहे और दोनों दल दादाभाई का सम्मान करते थे, इसलिए दोनों दलों ने उनकी बात को सुना और समझा।</div><div><br></div><div>दोनों ही दलों को एक-दूसरे की विचारधारा को समझने की जरूरत महसूस हुई। इस तरह से टूटने की कगार पर पहुंची कांग्रेस में दादाभाई नौरोजी ने एकता स्थापित की। उनको 'ग्रैंड ओल्ड मैन ऑफ इंडिया' भी कहा जाता था। साल 1906 में दादाभाई नौरोजी ने स्व-शासन की मांग सार्वजनिक रूप से व्यक्त की थी। उन्होंने देश को सबसे पहले 'स्वराज' का नारा दिया था।</div><div><br></div><h2>मृत्यु</h2><div>वहीं 30 जून 1917 को दादाभाई नौरोजी का निधन हो गया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 30 Jun 2026 14:11:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/personality/from-mathematics-professor-to-british-parliament-know-dadabhai-naoroji-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[संत कबीर: भारतीय चेतना के महासूर्य और अमर गायक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-the-great-sun-of-indian-consciousness-and-an-immortal-singer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संत परंपरा में यदि किसी एक संत ने धर्म, समाज, अध्यात्म और मानवीय चेतना को सबसे अधिक झकझोरा, तो वह नाम है-संत कबीर। वे केवल एक कवि, संत या समाज-सुधारक नहीं थे, बल्कि भारतीय आत्मा की उस जागृत चेतना के प्रतीक थे, जिसने मनुष्य को मनुष्य के रूप में देखने की दृष्टि दी। कबीर भारतीय अध्यात्म के ऐसे महासूर्य हैं, जिनकी वाणी आज भी उतनी ही प्रासंगिक, प्रेरक और क्रांतिकारी है, जितनी छह सौ वर्ष पूर्व थी। आज जब संसार हिंसा, युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, सामाजिक विभाजन, उपभोक्तावाद, मानसिक तनाव और नैतिक पतन जैसी चुनौतियों से जूझ रहा है, तब कबीर की वाणी मानवता के लिए आशा की किरण बनकर सामने आती है। कबीर का समूचा चिंतन मनुष्य को स्वयं से जोड़ने, समाज को समरस बनाने और धर्म को आडंबरों से मुक्त कर उसके मूल स्वरूप तक पहुंचाने का प्रयत्न है।</div><div><br></div><div>कबीर का अवतरण ऐसे समय में हुआ, जब भारतीय समाज अनेक प्रकार की रूढ़ियों, कर्मकांडों, जातीय विभाजनों और धार्मिक पाखंडों में उलझा हुआ था। एक ओर मुस्लिम शासकों की धर्मांधता थी, दूसरी ओर हिंदू समाज कर्मकांड और बाह्याचार के बोझ तले दबा हुआ था। धर्म का वास्तविक स्वरूप कहीं खो गया था। ऐसे संक्रमणकाल में कबीर ने निर्भीक स्वर में उद्घोष किया- ‘पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय।’ कबीर ने स्पष्ट किया कि धर्म का सार ज्ञान, प्रेम, करुणा और आत्मानुभूति में है, न कि बाहरी कर्मकांडों में। उन्होंने मंदिर और मस्जिद दोनों की सीमाओं को पार करते हुए मनुष्य के भीतर स्थित परमात्मा की खोज का संदेश दिया। कबीर की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे अनुभव के संत थे। उन्होंने स्वयं कहा- ‘मैं कहता आंखन की देखी, तू कहता कागद की लेखी।’ उनकी वाणी किसी ग्रंथ, शास्त्र या परंपरा की दास नहीं थी। उन्होंने जो कहा, अपने अनुभव के आधार पर कहा। यही कारण है कि उनकी वाणी में अद्भुत प्रामाणिकता और जीवन-सत्य का तेज दिखाई देता है। कबीर निरंतर आत्म-परीक्षण के पक्षधर थे। उनका प्रसिद्ध दोहा-’बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय।’ आज के समय में भी उतना ही सार्थक है। वर्तमान समाज में दूसरों की आलोचना, निंदा और दोषारोपण की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कबीर हमें आत्मनिरीक्षण और आत्मशोधन का मार्ग दिखाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/saint-kabir-biggest-symbol-of-hindu-muslim-unity-know-interesting-facts" target="_blank">Kabirdas Jayanti 2026: हिंदू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े Symbol थे संत कबीर, जानिए रोचक बातें</a></h3><div>संत कबीर सर्वधर्म समभाव के सशक्त प्रवक्ता थे। उन्होंने हिंदू और मुसलमान दोनों समुदायों की संकीर्णताओं की आलोचना की, लेकिन किसी धर्म का विरोध नहीं किया। उनका विरोध केवल अंधविश्वास, पाखंड और कट्टरता से था। उन्होंने कहा-’कंकर-पत्थर जोड़ि के मस्जिद लई बनाय। ता चढ़ि मुल्ला बांग दे, बहरा हुआ खुदाय।’ और दूसरी ओर-’पाहन पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूं पहार। ताते तो चाकी भली, पीस खाय संसार।’ इन दोहों का उद्देश्य किसी धर्म विशेष की आलोचना नहीं, बल्कि मनुष्य को बाहरी आडंबरों से ऊपर उठाकर आंतरिक साधना की ओर ले जाना था। आज जब धार्मिक असहिष्णुता और सांप्रदायिक तनाव विश्व के अनेक देशों में संकट का कारण बने हुए हैं, तब कबीर का संदेश-’अव्वल अल्लाह नूर उपाया, कुदरत के सब बंदे’ मानवता के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>कबीर ने जाति-पांति की संकीर्णता को भारतीय समाज की बड़ी कमजोरी माना। उन्होंने सामाजिक समानता और मानवीय गरिमा की स्थापना का प्रयत्न किया। उनका प्रसिद्ध दोहा-’जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिए ज्ञान। मोल करो तलवार का, पड़ा रहन दो म्यान।’ आज भी सामाजिक समरसता का आधार बन सकता है। कबीर ने मनुष्य की पहचान उसके कर्म, ज्ञान और चरित्र से करने की बात कही। उन्होंने यह सिद्ध किया कि आध्यात्मिक ऊंचाई किसी जाति या वर्ग की बपौती नहीं है। एक सामान्य जुलाहा होकर भी वे भारतीय संत परंपरा के शिखर पुरुष बने। कबीर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि आध्यात्मिकता केवल जंगलों, आश्रमों और मठों तक सीमित नहीं है। उन्होंने गृहस्थ जीवन जीते हुए उच्चतम आध्यात्मिक उपलब्धियां प्राप्त कीं। उन्होंने संसार से पलायन नहीं किया, बल्कि संसार में रहकर सत्य, सादगी, श्रम, ईमानदारी और संतत्व को साधा। आज जब जीवन में तनाव, प्रतिस्पर्धा और भौतिकता बढ़ती जा रही है, तब कबीर का जीवन-संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है कि परिवार और समाज के बीच रहते हुए भी आध्यात्मिक जीवन जिया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इक्कीसवीं सदी का मनुष्य तकनीकी रूप से समृद्ध होने के बावजूद भीतर से असुरक्षित, अकेला और तनावग्रस्त है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल क्रांति और उपभोक्तावाद के इस युग में मनुष्य अपने भीतर की शांति खोता जा रहा है। ऐसे समय में कबीर का यह संदेश नई दिशा देता है-’माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर। कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर।’ कबीर हमें बाहरी उपलब्धियों से अधिक आंतरिक परिवर्तन का महत्व समझाते हैं। वे बताते हैं कि वास्तविक क्रांति मनुष्य के भीतर घटित होती है। पर्यावरण संकट, हिंसा, असहिष्णुता और नैतिक पतन के इस दौर में कबीर की करुणा, सह-अस्तित्व और सादगी की जीवन-दृष्टि मानव सभ्यता को नई राह दिखा सकती है। कबीर की वाणी किसी एक युग की नहीं, बल्कि समस्त मानवता की धरोहर है। उनकी साखियां, सबद, रमैनी, बीजक और उलटबांसियां आज भी करोड़ों लोगों को प्रेरणा देती हैं। उनकी भाषा सहज, लोकजीवन से जुड़ी और अत्यंत प्रभावशाली है। कबीर स्वयं अशिक्षित माने जाते हैं, किंतु उनकी वाणी में जीवन का ऐसा गहन दर्शन है, जो बड़े-बड़े विद्वानों को भी विस्मित कर देता है। इसीलिए उन्हें ‘ज्ञान का सूरज’ कहा गया है। उनकी वाणी केवल पढ़ने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए है। वह मनुष्य को भीतर तक झकझोरती है, उसके अहंकार को तोड़ती है और उसे सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।</div><div><br></div><div>कबीर के देहावसान के समय उनके पार्थिव शरीर को लेकर हिंदू और मुसलमानों में विवाद हुआ। किंवदंती है कि जब चादर हटाई गई तो वहां शरीर के स्थान पर फूल मिले। यह घटना प्रतीक है कि कबीर किसी एक धर्म, संप्रदाय या समुदाय के नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के संत थे। संत कबीर ने अपने जीवन और वाणी से यह सिद्ध किया कि मनुष्य का वास्तविक धर्म प्रेम, सत्य, करुणा और आत्मबोध है। उन्होंने समाज को नई दृष्टि, धर्म को नई दिशा और अध्यात्म को नया आयाम दिया। आज, संत कबीर जयंती के अवसर पर आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल उनके दोहों का पाठ न करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में उतारें। यही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी। सचमुच, कबीर भारतीय अध्यात्म के महासूर्य हैं, जिनकी ज्ञान-किरणें युगों-युगों तक मानवता का मार्ग आलोकित करती रहेंगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 29 Jun 2026 12:25:19 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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