<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[किस देवता के नाम पर बना है हॉर्मुज? हवा के 'जिन्न' से बचने के लिए महिलाएं मूंछों जैसा पहनती नकाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/after-which-hindu-deity-is-hormuz-named]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>स्टेट ऑफ होर्मुज वो समुद्री इलाका जिसकी वजह से दुनिया आज तीसरे विश्व युद्ध के मुहाने पर खड़ी है। सबसे पहले बात करते हैं स्टेट ऑफ हॉर्मोस की चौहद्दी की। यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री रास्तों में से एक है। जहां से वैश्विक तेल सप्लाई का बड़ा हिस्सा गुजरता है। यह स्टेट ईरान और ओमान के बीच मौजूद है। आज के समय में इसकी अहमियत इतनी ज्यादा है कि इसे दुनिया की ऑयल लाइफ लाइन कहा जाता है। अब बात करते हैं प्राचीन काल की। प्राचीन काल में होर्मुज फारस की खाड़ी तक पहुंच को कंट्रोल करने वाला एक अहम समुद्री व्यापार केंद्र था। यह भारत, चीन और मिडिल ईस्ट के बीच माल के आदानप्रदान के बीच एक संपर्क सूत्र का काम करता था। मूल रूप से यह 10वीं शताब्दी में मीनाब के पास मौजूद एक मुख्य भूमि बंदरगाह था। लेकिन आक्रमणकारियों से बचने के लिए लगभग 1300 में इसे रणनीतिक जारून द्वीप यानी होर्मुज&nbsp;द्वीप में बदल दिया गया और यह एक मशहूर व्यापारिक केंद्र बन गया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/did-trump-sever-one-of-mojtaba-khamenei-legs" target="_blank">Trump ने काट दी मोजतबा खामनेई की एक टांग? न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा</a></h3><h2>होर्मुज नाम की उत्पत्ति कैसे हुई</h2><div>माना जाता है कि होर्मुज नाम की उत्पत्ति फारसी देवता अहूरा माजदा और स्थानीय बोली के व्याख्यांश खुरमोग यानी खजूर वाली जमीन से लिया गया है जो इसकी फारसी जड़ों को दर्शाता है। अहूरा मजदा पारसी धर्म के सर्वोच्च देवता, सृष्टिकर्ता और ज्ञान के प्रतीक हैं। जिन्हें बुद्धिमान देवता कहा जाता है। ऐतिहासिक रूप से अहूरा मजदा को वैदिक देवता वरुण से जोड़ा जाता है। जो ब्रह्मांडीय नियम का पालन करता है। अवस्था भाषा में अहूरा का अर्थ होता है स्वामी। जो संस्कृत के शब्द असुर के समान है। अब आते हैं मध्यकाल में। फारस की खाड़ी किंगडम ऑफ होर्मुज नाम का एक शक्तिशाली व्यापारिक राज्य हुआ करता था। यह राज्य 13वीं से 17वीं सदी के बीच बेहद समृद्ध था और एशिया, अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापार का एक बड़ा केंद्र बन चुका था। यहीं से शुरू होता है भारत और होर्मुज का कनेक्शन। उस समय भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात, कोंकण और मालाबार क्षेत्र दुनिया के बड़े व्यापारिक केंद्र थे। भारतीय व्यापारी मसाले, रेशम, कपड़े और कीमती पत्थर लेकर हॉर्मू जाते थे। बदले में वहां से घोड़े, मोती और दूसरे कीमती सामान भारत लाया करते थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/who-is-setting-fire-to-oil-refineries-across-six-countries-including-india" target="_blank">भारत समेत 6 देशों के तेल रिफाइनरी में कौन लगा रहा है आग...साजिश किसकी?</a></h3><h2>शैतानी हवाएं और महिलाओँ का नकाब</h2><div>होर्मुज में रहने वाले लोगों की जिंदगी और उनके जीने का अनूठा अंदाज कौतूहल पैदा करता है। खनिजों से भरपूर यहां की रेत लाल, गुलाबी, नारंगी जैसे चमकते हैं। जमीन जितनी विविधरंगी और मनमोहक है, उतने ही आकर्षक लोग, संस्कृति और पारंपरिक विश्वास-आस्था है। ईरानी फोटोग्राफर होदा अफशार ने यहां की संस्कृति और आस्था-मान्यताओं को बखूबी बताया है। कुछ को अंधविश्वास मान सकते हैं, लेकिन यही उनका जीवन है। यह हवा की बुरी आत्माओं से बचने का जतन है। दरअसल, मान्यता है कि कुछ हवाएं शैतानी या जिन्न वाली होती हैं, जबकि कुछ भली। 'जार' नाम की हवा के बारे में कहा जाता है कि वह शरीर में घुस सकती है। बेचैनी या बीमारी दे सकती है। ये नकाब 'जार' को धोखा देने के लिए पहना जाता है। मकसद यह कि महिला, पुरुष जैसी दिखे। मान्यता के मुताबिक महिलाएं 'जार' के प्रति ज्यादा असुरक्षित होती हैं।</div><h2>कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं</h2><div>केश्म और होर्मुज के कुछ लोग पेड़ों पर ही रहते हैं, क्योंकि ऐसी मान्यता है कि कुछ तरह के पेड़ों के नीचे सोने से शैतानी आत्मा पकड़ लेगी। यानी हवा की शक्ति व्यक्ति पर हावी हो सकती है। अफशार ने अपनी किताब 'स्पीक द विंड' में केश्म और होमुंज की अनूठी मान्यताओं और आस्थाओं के बारे में बताया है। अफशार बताती हैं कि कई निवासी अफ्रीकी मूल के हैं। पर यह पहचान अक्सर छिपाई जाती है या नकारी जाती है। वजह-लंबे समय की सामाजिक श्रेणियां हैं। जर्मनी के बर्लिन में रह रहीं अफशार बताती हैं कि अब टुकड़ों में वहां की खबरें मिलती हैं। भारी सैन्य मौजूदगी। बमबारी। वह बताती हैं कि एक रिश्तेदार ने बमों के असर को ऐसे बयान किया, 'यह भूकंप की तरह शरीर के आर-पार गुजरने जैसा लगता है। बमों-बारूदों से बचने की दुआएं करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/ship-bound-for-india-seized-action-against-iran-intensifies" target="_blank">भारत आने वाले जहाज पर कब्जा, ईरान पर एक्शन तेज!</a></h3><h2>पुर्तगाल ने होर्मुज पर किया कब्जा</h2><div>भारत और होर्मुज के बीच गहरा व्यापारिक रिश्ता था। लेकिन यह रिश्ता केवल व्यापार तक ही सीमित था। शासन या राजनीतिक नियंत्रण तक नहीं। फिर आया 16वीं सदी का कालखंड जब पुर्तगाल ने होर्मुज पर कब्जा कर लिया। तब भारत में उसका मुख्य केंद्र गोवा हुआ करता था। क्योंकि गोवा भी पुर्तगाल के नियंत्रण में था और हॉर्मूस भी। उस समय हॉर्मूस पर गोवा में मौजूद पोर्तुगीज़ इंडिया रूल कर रहा था। इतिहास के इसी चैप्टर की वजह से हॉर्मूस को भारत का हिस्सा होने का दावा किया गया। लेकिन हकीकत तो यह है कि दोनों ही क्षेत्र एक विदेशी शक्ति पुर्तगाल के अधीन थे। डायरेक्ट भारत के नहीं। बाद में ईरानी सल्तनत सफविद अंपायर ने पुर्तगालियों को हराकर होर्मुज पर कंट्रोल कर लिया। शाह अब्बास प्रथम की अगुवाई में और अंग्रेज ईस्ट इंडिया कंपनी की सहायता से सफाविद साम्राज्य ने पुर्तगालियों से हॉर्मोस पर अपनी फतेह हासिल कर ली। अप्रैल 1622 को फारस की खाड़ी में एक सदी से ज्यादा समय तक चले पुर्तगाली नियंत्रण को समाप्त कर दिया गया और अंतिम समर्पण भी पूरी कर दी गई। इसके बाद यह क्षेत्र फारस यानी आज के ईरान के प्रभाव में आ गया। तो साथियों साफ है कि इतिहास में होर्मुज पर कई ताकतों का प्रभाव रहा लेकिन भारत का सीधा शासन कभी नहीं रहा। हां यह जरूर है कि इस धरती से होर्मुज पर रूल जरूर किया गया।&nbsp;</div><div>पिछले 100 सालों से ज्यादा समय से यह एक स्वतंत्र व्यापारिक जलमार्ग के तौर पर मौजूद है। इस समय जब अमेरिका और इजराइल की ईरान के साथ सीधी जंग चल रही है तो ऐसे में स्टेट ऑफ हॉर्मोस की अहमियत और भी ज्यादा बढ़ जाती है। ईरान इस पर अपना एकाधिकार करना चाहता है। वहीं अमेरिका की ओर से भी नाकेबंदी की बात कही जा रही है। यह सिर्फ एक जलमार्ग नहीं बल्कि वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और ऊर्जा सुरक्षा का केंद्र बन चुका है। भारत भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए इस रास्ते पर काफी ज्यादा निर्भर है। इसलिए इसकी अस्थिरता भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। साथियों यह था स्टेट ऑफ हार्मोस का इतिहास। बाकी इसका भविष्य इसका मुस्तकबिल ही तय करेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 14:23:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/after-which-hindu-deity-is-hormuz-named</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/24/hindu_large_1423_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कोल्ड ड्रिंक से केला तक No Entry, भारत से सामान लाने से अब नेपाल की बालेन शाह सरकार को क्या परेशानी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-trouble-does-bringing-goods-from-india-now-pose-for-nepal-balen-shah-government]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक मां अपने बच्चों के लिए चिप्स का एक पैकेट लेकर बॉर्डर क्रॉस कर रही है। भारत से नेपाल जा रही है और बॉर्डर पर खड़े आर्म्ड पुलिस फोर्स के जवान उसे रोक लेते हैं। कहते हैं यह पैकेट ₹100 से ऊपर का है। कस्टम ड्यूटी लगेगी। वो महिला पूछती है बच्चों के लिए चिप्स का पैकेट भी अब स्मगलिंग है। यह सीन किसी फिल्म का नहीं है। यह एक रियल वीडियो है जो नेपाल के नेपालगंज बॉर्डर से आया है और पूरे सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है और इस एक वीडियो ने एक ऐसे रूल पर स्पॉट लाइट डाल दी है जिसने नेपाल के बॉर्डर एरियाज में रहने वाले लाखों लोगों की जिंदगी मुश्किल कर दी है। तो आज इस पूरे मामले का एमआरआई स्कैन करते हैं। नेपाल और भारत के बीच रोटी और बेटी का संबंध है। दोनों मुल्क के नेताओं को अगर भारत-नेपाल संबंध पर दो शब्द बोलना पड़े तो, भाषण ही इसी मुहावरे से शुरु होता है। लेकिन रोटी-बेटी के इस मुहावरे पर धीरे-धीरे ग्रहण लगता जा रहा है और भारत-नेपाल दोस्ती में दरार पड़ती नजर आ रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-home-minister-sudan-gurung-resigns" target="_blank">Nepal के Home Minister Sudan Gurung का इस्तीफा, बोले- मेरे लिए पद से बड़ी है नैतिकता</a></h3><h2>भारत से 100&nbsp; रुपए से ज्यादा के सामान पर कस्टम ड्यूटी</h2><div>नेपाल गवर्नमेंट ने एक डायरेक्टिव जारी किया है जिसके तहत अगर कोई नेपाली नागरिक भारत से 100 नेपाली रुपए से ज्यादा का सामान लेकर नेपाल में एंटर करता है तो उसे कस्टम ड्यूटी देनी होगी। अब 100 नेपाली रुपए का मतलब समझिए। इंडियन करेंसी में यह करीब 62 से ₹63 बनते हैं। मतलब आप इंडिया से ₹63 का सामान भी लेकर गए तो आपको बॉर्डर पर रुक कर ड्यूटी भरनी पड़ेगी। अब यह रूल नया नहीं है। नेपाल के कस्टम एक्ट में यह प्रोविजन पहले से था। लेकिन सालों से इसे कोई सीरियसली इंप्लीमेंट नहीं करता था। बॉर्डर एरियाज में लोग इंडिया से छोटा-मोटा सामान लाते थे। दवाइयां, कपड़े, राशन, सब्जी और कोई उन्हें नहीं रोकता था। लेकिन अब नेपाल की नई गवर्नमेंट ने इसे स्ट्रिक्टली इनफोर्स करने का फैसला किया है और इनफोर्समेंट भी ऐसा कि बॉर्डर पर माहौल ही बदल गया है। नेपाल की आर्म्ड पुलिस फोर्स यानी कि एपीएफ के जवान अब बॉर्डर पॉइंट्स पर लाउडस्कर लगाकर अनाउंसमेंट कर रहे हैं। यह ₹100 से ऊपर का कोई भी सामान डिक्लेअ करना होगा। झापा से लेकर कंचनपुर तक, पूर्व से पश्चिम तक हर कस्टम पॉइंट पर क्रैकडाउन चल रहा है। लोगों के बैग खोले जा रहे हैं। साइकिल पर आने वाले लोगों का सामान चेक हो रहा है। लंबी-लंबी लाइनें लग रही हैं। कस्टम डिपार्टमेंट, रेवेन्यू इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन, नेपाल पुलिस और एपीएफ की जॉइंट मॉनिटरी टीमें बनाई गई हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-turns-against-its-own-pm-over-india" target="_blank">भारत के लिए अपने PM पर टूट पड़ा नेपाल! बालेन शाह के खिलाफ लोगों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा</a></h3><h2>झोले और थैलियां चेक कर रहे कस्टम अधिकारी</h2><div>नेपाल के कस्टम अधिकारी और बॉर्डर पर तैनात पुलिसकर्मी इस पार से उस पार जाने वाले लोगों के झोले और थैलियां चेक कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर इन तस्वीरों के साथ अब यह चर्चा हो रही है और कहा जा रहा है कि केला से कोल्ड ड्रिंक तक अपना भारत से नेपाल ले जाने की इजाजत नहीं है। तस्वीरों में ऐसा ही कुछ दिखाई दे रहा है। भारत नेपाल बॉर्डर पर तैनात नेपाली पुलिस के जवान सख्ती से चेकिंग में जुटे हैं और उन्हें जो चीज भी रोकनी होती है उसे निकाल दे रहे हैं। दरअसल ये सब कुछ हो रहा है नेपाल सरकार की नई बालन शाह सरकार के आदेश पर जिसके तहत नई नीति&nbsp; सीमा शुल्क के मुताबिक अब 100 नेपाली रुपए से अधिक मूल्य के सामान पर 5% से लेकर 80% तक शुल्क सख्ती से वसूला जाएगा।&nbsp;</div><h2>थोड़ा बैकग्राउंड समझना जरूरी है</h2><div>भारत और नेपाल के बीच करीब 10715 किमी लंबी ओपन बॉर्डर है। 1950 की शांति और मैत्री संधि के तहत दोनों देशों के नागरिक बिना पासपोर्ट और वीजा के एक दूसरे के देश में आ जा सकते हैं। इस रिश्ते को रोटी बेटी का रिश्ता कहा जाता है। मतलब खाने और शादियों के जरिए दोनों देशों के लोग इतने गहराई से जुड़े हुए हैं कि बॉर्डर सिर्फ नक्शे पर है। जमीन पर नहीं है। नेपाल पांच भारतीय राज्यों से बॉर्डर शेयर करता है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल और सिक्किम। अब इस ओपन बॉर्डर की वजह से नेपाल के बॉर्डर एरियाज के लोग दशकों से इंडिया के बाजारों पर डिपेंडेंट रहे हैं। खासकर मधेश प्रदेश के आठ जिलों में जो सीधे इंडिया की सीमा से लगते हैं। वहां के लोग इंडिया से दवाइयां, कपड़े, साड़ी, धोती, बिस्किट, सीमेंट, मसाले, सब्जी, दूध सब कुछ खरीद रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/samrat-choudhary-government-faces-first-acid-test-in-bihar-nda-big-floor-test-on-april-24" target="_blank">Bihar में Samrat Choudhary सरकार की पहली अग्निपरीक्षा, 24 April को NDA का बड़ा Floor Test</a></h3><h2>भारत-नेपाल सीमा व्यापार पर असर!</h2><div>इसका सीधा असर सीमावर्ती भारतीय बाजारों और नेपाली उपभोक्ताओं पर पड़ा है। जिससे दोनों ओर छोटे व्यापारियों और आम लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार के नेपाल सीमा से सटे जिलों में अब इस नई नीति का असर साफ दिखाई दे रहा है। नेपाल द्वारा सख्ती बढ़ाए जाने के बाद भारत से नेपाल जाने वाले रोजमर्रा के सम्मान जैसे दाल, चीनी, रिफाइंड, तेल, कपड़े आदि की कीमत से 15 से 20% तक की बढ़ोतरी हो गई है। जबकि बिक्री 15 से 25% तक घट गई है। यूपी का सिद्धार्थ नगर, महाराजगंज, कुशीनगर, सनौली जैसे इलाकों में दुकानों की बिक्री 15 से 25% तक घट गई है। वहीं बिहार के बघार, रक्कसोल और जयनगर जैसे बाजारों में यह गिरावट 50% तक पहुंच गई है। इन बाजारों का बड़ा हिस्सा नेपाली ग्राहकों पर निर्भर है। ऐसे में छोटे दुकानदारों के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण बन गई है। नेपाल के कई इलाके खासकर वीरगंज और आसपास के क्षेत्रों में इस फैसले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए हैं। स्थानीय लोगों और संगठनों का कहना है कि नेपाल भारत के बीच सदियों पुराना रोटी बेटी का रिश्ता रहा है। जिसमें सीमाओं के बावजूद लोगों का आना-जाना और व्यापार सहज रहा है। लोगों का आरोप है कि अब कोल्ड ड्रिंक, चिप्स और बिस्किट जैसे छोटे सामानों को ले जाने पर भी नेपाली सशस्त्र पुलिस द्वारा वसूली या जब्ती की जा रही है। जिससे आम नागरिकों को परेशानी हो रही है।&nbsp; विशेषज्ञों का मानना है कि यदि नेपाल सरकार ने इस नीति में कोई नरमी नहीं दिखाई तो इसका असर लंबे समय तक बना रहता है। इससे ना केवल सीमावृत्ति व्यापार प्रभावित होगा बल्कि दोनों देशों के पारंपरिक, सामाजिक और आर्थिक संबंधों पर भी असर पड़ सकता है। नेपाल इंडिया ओपन बॉर्डर इंटरेक्शन ग्रुप ने भी गवर्नमेंट से मांग की है कि घरेलू इस्तेमाल के सामान पर जीरो कस्टम ड्यूटी हो।</div><h2>इस रूल में कोई लॉजिक है?&nbsp;</h2><div>&nbsp;स्मगलिंग रोकना जरूरी है। रेवेन्यू बचाना भी जरूरी है। लेकिन ₹100 की लिमिट जो इंडियन करेंसी में मात्र ₹63 भी नहीं बनते। नेपाल के प्रो कॉमर्स सेक्रेटरी पुरुषोत्तम ओझा कहते हैं कि लीगली तो गवर्नमेंट के पास ये अधिकार है। लेकिन सवाल यह है कि इतनी कम लिमिट कारगर होगी या नहीं? अगर लोगों को बॉर्डर पार जाकर काफी पैसा बचता है तो वह रास्ता निकालते रहेंगे। सिर्फ इनफोर्समेंट से समस्या हल नहीं होगी। उनका सुझाव है कि गवर्नमेंट को अपने डोमेस्टिक मार्केट्स को कंपेटिव बनाना चाहिए। इंफ्रास्ट्रक्चर सुधारना चाहिए और जरूरी सामान पर टारगेटेड सब्सिडी देनी चाहिए।&nbsp; अब वापस उस मां के पास चलते हैं जिसके हाथ से चिप्स का पैकेट छीना गया। वो अब भी पूछ रही है कि बच्चों के लिए चिप्स लाना भी अब गुनाह है और यह सवाल सिर्फ उस एक मां का नहीं है। यह सवाल नेपाल के बॉर्डर एरियाज में रहने वाले लाखों लोगों का है। दशकों से, पीढ़ियों से और अब एक रूल ने यह सब कुछ बदल दिया। देखना है कि बालन शाह की गवर्नमेंट बढ़ते दबाव में इस पॉलिसी पर दोबारा विचार करती है या नहीं।</div><h2>भारत पर कितना निर्भर है नेपाल&nbsp;</h2><div>भारत से पेट्रोलियम उत्पाद, चावल दवाइयों का आयात</div><div>विदेशी निवेश में भारत की 30% से ज्यादा हिस्सेदारी&nbsp;</div><div>भारत की बैंकिंग, बीमा, शिक्षा, पर्यटन से जुड़ी 150 कंपनियां नेपाल में&nbsp;</div><div>भारत में 20 से 25 लाख नेपाली नागरिक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 09:37:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-trouble-does-bringing-goods-from-india-now-pose-for-nepal-balen-shah-government</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/23/india_large_0937_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्यों अचानक ईरान के इशारों पर नाचने लगे ट्रंप? फोन के टॉक टाइम खत्म होने से पहले रिचार्ज सरीखा सीजफायर बढ़ाने की असली वजह 'TACO' है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-suddenly-start-dancing-to-iran-real-story-behind-the-ceasefire-extension]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ चल रहे युद्ध विराम यानी सीज फायर को बढ़ाने का ऐलान किया है। इससे पहले सीज फायर की जो समय सीमा दी गई थी वो आज यानी 22 अप्रैल को खत्म हो रही थी। उससे पहले ट्रंप ने सीज फायर बढ़ाने की जानकारी सार्वजनिक कर दी। एकदम वैसे जैसे फोन का टॉक टाइम खत्म होने से पहले ठीक पहले रिचार्ज करा लिया जाता है। यह टैक्टिकल सीज फायर एक्सटेंशन ट्रंप ने किसके कहने पर किया है यह भी बताते हैं। भारत के पड़ोस में एक देश है पाकिस्तान जिसे आतंकवाद का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर माना जाता है। फिल वक्त वही पाकिस्तान पीस मैसेंजर ऑफ द ईयर बना हुआ है। ट्रंप का कहना है कि इसी पाकिस्तान के आर्मी चीफ वसीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के अनुरोध पर उन्होंने सीजफायर आगे बढ़ाने का फैसला किया है। लेकिन क्या सच में ऐसा है या फिर ईरान ने अपनी शर्तों पर ट्रंप को यू टर्न लेने पर मजबूर कर दिया है। आज हम पूरे मामले का एमआरआई स्कैन करेंगे। ट्रुथ सोशल पर जारी बयान में ट्रंप ने कहा है कि ईरान की सरकार बुरी तरह बिखरी हुई है। यह कोई नई बात नहीं है। पाकिस्तान के फील्ड मार्शल असीम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के कहने पर हमने ईरान पर हमला फिलहाल टाल दिया है। जब तक ईरान के नेता एकमख होकर कोई ठोस प्रस्ताव नहीं लाते तब तक हमारा ब्लॉकेट जारी रहेगा। सेना पूरी तरह तैयार है। हम सीज फायर को आगे बढ़ा रहे हैं। सीज फायर को बढ़ा रहे हैं। यानी सीज फायर बढ़ाने के बावजूद ट्रंप ने ईरान पर दबाव कम नहीं किया है। उन्होंने अमेरिकी सेना को साफ आदेश दिए हैं कि ईरान के खिलाफ चल रही नाकेबंदी को जारी रखा जाए। लेकिन यहां पर एक बात गौर करने वाली सामने आती है जो ट्रंप पहले मैक्सिमम प्रेशर की नीति चला&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">रहे थे। हालांकि ट्रंप के इस नए दांव को शांति की पहल तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता। देखिए सीज फायर बढ़ाया है लेकिन ब्लॉकेट जारी है। मतलब ईरान पर आर्थिक दबाव और सैन्य तैयारियां दोनों बरकरार हैं। शांति की असली पहल में दोनों तरफ से कुछ रियायतें दी जाती हैं। यहां सिर्फ हमला टाला गया है। ट्रंप ने अपने बयान में ईरान की सरकार को सीरियसली फ्रैक्चरर्ड यानी गंभीर रूप से विभाजित या बिखरी हुई भी बताया है। जानकार इसे रणनीतिक दबाव का हिस्सा बता रहे हैं।&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/iran-strength-remains-intact-america-weapons-are-reduced-is-this-why-trump-extended-the-ceasefire" target="_blank">ईरान की ताकत बरकरार, अमेरिका के घटे हथियार! क्या इसी वजह से ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम?</a></h3><h2>सीज़फ़ायर की समयसीमा बढ़ने के साथ ही आरोप-प्रत्यारोप भी बढ़े</h2><div>दो क्षेत्रीय अधिकारियों ने मंगलवार को एसोसिएटेड प्रेस को बताया कि अमेरिका और ईरान ने संकेत दिया है कि वे बातचीत का एक नया दौर आयोजित करेंगे। पाकिस्तान के नेतृत्व वाले मध्यस्थों को इस बात की पुष्टि मिली कि शीर्ष वार्ताकार - वैंस और ईरान की संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर ग़ालिबफ़ अपनी-अपनी टीमों का नेतृत्व करेंगे। लेकिन मंगलवार देर रात, ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि बातचीत में शामिल होने के बारे में कोई अंतिम निर्णय"नहीं लिया गया है। प्रवक्ता इस्माइल बघाएई ने सरकारी टीवी को बताया कि निर्णय न ले पाने का कारण अमेरिकियों की ओर से मिले विरोधाभासी संदेश और अस्वीकार्य कार्य थे, विशेष रूप से ईरान की अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी। इस बीच, वैंस ने पाकिस्तान की अपनी यात्रा रद्द कर दी, जबकि पाकिस्तानी नेता बातचीत को बचाने की कोशिश में तेज़ी से जुट गए। 0000 GMT की समय सीमा नज़दीक आते ही, ट्रंप ने घोषणा की कि संघर्ष विराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ा दिया जाएगा। ट्रंप ने कहा कि उन्होंने यह कदम पाकिस्तान के अनुरोध पर उठाया है और इस मामले में किसी निर्णय पर न पहुँच पाने के लिए उन्होंने ईरान के गंभीर रूप से बिखरे हुए नेतृत्व को दोषी ठहराया। उन्होंने कहा कि पाकिस्तान ने उनसे तब तक इंतज़ार करने को कहा था, जब तक कि ईरान के नेता "कोई एकमत प्रस्ताव लेकर नहीं आ जाते।" फिर भी, उन्होंने कहा कि अमेरिका की नाकेबंदी जारी रहेगी। भले ही पाकिस्तान किसी बैठक का इंतज़ाम कर ले, फिर भी स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़ के भविष्य, ईरान के परमाणु कार्यक्रम और नाकेबंदी को लेकर गंभीर चुनौतियाँ बनी हुई हैं। इस सप्ताहांत ईरान ने स्ट्रेट में जहाज़ों को निशाना बनाया। अमेरिका ने भी एक ईरानी जहाज़ पर हमला किया और उस पर कब्ज़ा कर लिया, जिसने स्ट्रेट में अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी से बचकर निकलने की कोशिश की थी - जिससे यह संकेत मिलता है कि स्थिति अभी भी अस्थिर बनी हुई है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास रांची ने भी नौसैनिक घेराबंदी को एक्ट ऑफ वॉर करार दिया है। यानी ट्रंप अपनी डील मेकर इमेज बचाने की कोशिश में लगे हैं। नया नवेला शांतिदूत पाकिस्तान दुनिया के नक्शे में अपनी अहमियत बढ़ा रहा है और ईरान है कि हार मानने को तैयार नहीं है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/muslim-mp-who-abused-india-was-unceremoniously-thrown-out-of-parliament" target="_blank">भारत को गाली देने वाली मुस्लिम MP को संसद से ऐसे उठाकर फेंका, चौंक गए सभी</a></h3><h2>कमजोर शांति समझौते के टूटने का खतरा</h2><div>अमेरिका और इस्राइल ने 28 फरवरी को जंग शुरू की थी। छह हफ्ते तक चली इस लड़ाई ने तेल की कीमतें बढ़ा दीं और पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला कर रख दिया। ईरान, इस्राइल और अमेरिका के बीच मौजूदा युद्धविराम (शांति समझौता) 8 अप्रैल को लागू हुआ था। इससे पहले ट्रंप ने कई बार डेडलाइन (अल्टीमेटम) दी थी और एक बार तो उन्होंने ईरान की "सभ्यता" को ही खत्म करने की धमकी दे डाली थी। पिछले शुक्रवार को इस्राइल और लेबनान में ईरान के समर्थन वाले लड़ाकू गुट 'हिजबुल्लाह' के बीच भी युद्धविराम लागू हो गया। मोटे तौर पर देखा जाए तो अभी तक ये दोनों ही समझौते टिके हुए हैं। इससे पहले, 11 अप्रैल को पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का एक दौर चला था, जो अगले दिन सुबह-सुबह तक चला। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद अमेरिका और ईरान के बीच यह सबसे बड़े लेवल की बातचीत थी। इसमें जेडी वेंस ने हिस्सा लिया था, लेकिन यह बातचीत बिना किसी समझौते या नतीजे के ही खत्म हो गई थी। इस वीकेंड से ही इस्लामाबाद के अधिकारियों ने वैसी ही तैयारियां फिर से शुरू कर दी हैं, जैसी पहली बातचीत के समय की गई थीं। इससे यह इशारा मिलता है कि जल्द ही दोनों देशों के बीच बातचीत का एक और दौर होने वाला है।</div><h2>नाज़ुक संघर्ष-विराम में दरार पड़ने का खतरा</h2><div>अमेरिका और इज़राइल ने 28 फरवरी को युद्ध शुरू किया, जो छह हफ़्ते तक चला। इस युद्ध के कारण तेल की कीमतें बढ़ गईं और वैश्विक अर्थव्यवस्था हिल गई। ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच मौजूदा संघर्ष-विराम 8 अप्रैल को शुरू हुआ। इससे पहले ट्रंप ने कई समय-सीमाएं तय की थीं, जिनसे एक समय तो ईरान की "सभ्यता" पर ही खतरा मंडराने लगा था। पिछले शुक्रवार को, इज़राइल और लेबनान में मौजूद ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह आतंकवादी समूह के बीच भी एक संघर्ष-विराम लागू हुआ। ये दोनों संघर्ष-विराम मोटे तौर पर कायम रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का एक पिछला दौर पाकिस्तान में 11 अप्रैल से शुरू होकर अगले दिन तड़के तक चला। वेंस ने 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के बीच हुई अब तक की सबसे उच्च-स्तरीय बातचीत में हिस्सा लिया, जो बिना किसी समझौते के ही खत्म हो गई। इस सप्ताहांत से इस्लामाबाद के अधिकारियों ने वैसी ही तैयारियां की हैं जैसी पहले दौर की बातचीत के दौरान की गई थीं। इससे यह संकेत मिलता है कि बातचीत का एक और दौर जल्द ही शुरू होने वाला है।</div><h2>होर्मुज जलडमरूमध्य लगभग बंद है</h2><div>होरमुज़ जलडमरूमध्य, जो फ़ारसी खाड़ी का एक संकरा मुहाना है और जिससे दुनिया की 20% प्राकृतिक गैस और तेल गुज़रता है, जलमार्ग में ईरानी हमलों के कारण लगभग बंद पड़ा है। इसमें शनिवार को हुए कुछ हमले भी शामिल हैं। इस बात का भी डर है कि ईरान ने जलडमरूमध्य के उस हिस्से में बारूदी सुरंगें बिछा दी हैं, जिसका इस्तेमाल शांति काल में जहाज़ों के गुज़रने के लिए किया जाता था। युद्ध शुरू होने के बाद से, ख़बरों के मुताबिक, ईरान जहाज़ों को वहाँ से गुज़रने की अनुमति देने के बदले प्रति जहाज़ 20 लाख डॉलर तक की रक़म वसूल रहा है। जलडमरूमध्य को फिर से खोलना बातचीत का एक अहम मुद्दा बना हुआ है और वॉशिंगटन के ख़िलाफ़ तेहरान का सबसे मज़बूत दाँव है; ख़ास तौर पर ऐसे समय में, जब दुनिया भर के देशों ने ऊर्जा की राशनिंग शुरू कर दी है और जेट ईंधन की कमी की चेतावनी दे रहे हैं। इस बीच, संयुक्त राज्य अमेरिका ने ईरानी बंदरगाहों से आने वाले जहाज़ों को रोकना शुरू कर दिया है। अमेरिकी नौसेना ने इस सप्ताहांत एक ईरानी कंटेनर जहाज़ पर हमला किया, जिसने अमेरिकी नाकेबंदी को तोड़कर आगे बढ़ने की कोशिश की थी; इस दौरान अमेरिकी मरीन हेलीकॉप्टरों से रस्सी के सहारे उस जहाज़ पर उतरे थे। ईरान ने इस घटना की निंदा करते हुए इसे "समुद्री डकैती" और अंतरराष्ट्रीय क़ानून का उल्लंघन बताया है।</div><h2>ईरान का परमाणु भंडार देश के भीतर ही मौजूद है</h2><div>ईरान का सारा अत्यधिक संवर्धित यूरेनियम देश के भीतर ही मौजूद है; संभवतः यह उन संवर्धन स्थलों के मलबे के नीचे दबा हुआ है, जिन पर पिछले जून में चले 12-दिवसीय युद्ध के दौरान अमेरिका ने बमबारी की थी। तब से ईरान ने यूरेनियम का संवर्धन नहीं किया है, लेकिन उसका यह दावा बरक़रार है कि उसे शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए ऐसा करने का अधिकार है, और वह परमाणु हथियार बनाने की कोशिश करने के आरोप से इनकार करता है। ट्रंप ने, इज़रायल के साथ मिलकर, ईरान से अपने परमाणु कार्यक्रम को पूरी तरह से समाप्त करने और अपने परमाणु भंडार को त्याग देने की माँग की है। ईरान ने युद्ध को समाप्त करने के लिए पेश किए गए अपने 10-सूत्रीय प्रस्ताव में इस माँग को ख़ारिज कर दिया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-and-russia-shatter-all-friendship-records-moscow-doubles-oil-supplies" target="_blank">भारत-रूस ने तोड़ डाले दोस्ती के सारे रिकॉर्ड, मॉस्को ने डबल की तेल की सप्लाई</a></h3><h2>ट्रंप पर टाको होने का आरोप लग रहा</h2><div>ट्रम्प ने एक तरफफ़ा घोषणा की थी कि इस्लामाबाद में दूसरे दौर की शांति वार्ता होगी। पाकिस्तान के आर्मी चीफ ने तेहरान फोन घुमाकर एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन ईरान नहीं पहुंचा। ईरान की मांग साफ थी जब तक होर्मुज की नाकेबंदी नहीं हटती बातचीत नहीं होगी। नतीजा ईरान अपनी बात पर अड़ा रहा और ट्रंप को एक तरफ़ा सीज फायर का ऐलान करना पड़ा। सअमेरिका के अंदर एक बार फिर ट्रंप पर टाको होने का आरोप लग रहा है। टाको यानी ट्रंप ऑलवेज चिकन साउथ। वो नेता जो अंत में आकर घुटने टेक देता है। ट्रंप ने बार-बार धमकी दी थी कि अगर वार्ता नहीं हुई तो ईरान के नागरिक ढांचों को बम से उड़ा देंगे। लेकिन आखिर में ट्रंप फिर पीछे हट गए। सबूत नंबर तीन शर्तों का टूटना और ईरान का दबदबा। ईरान ने पहले ही सीज फायर की शर्तें तोड़ दी थी। ट्रंप ने कहा था कि ईरान होमूस का रास्ता खोलेगा। ईरान ने शुरू में ऐसा किया भी लेकिन जब अमेरिका ने अपनी ओर से रास्ता नहीं खोला तो ईरान ने भी दोबारा हरमूस बंद कर दिया। हैरानी की बात देखिए ईरान शर्तों को नहीं मान रहा। फिर भी ट्रंप दूसरे सीज फायर का ऐलान कर रहे हैं। इससे साफ है कि अपर हैंड किसका है। जिस वक्त अमेरिका इस्लामाबाद में ईरान का इंतजार कर रहा था उसी वक्त तेहरान की सड़कों पर गदर बैलेस्टिक मिसाइल का प्रदूषण हो रहा था। बीबीसी रिपोर्ट के मुताबिक तेहरान के मुख्य चौराहे पर हजारों लोग अमेरिकी मुर्दाबाद का नारा लगा रहे थे और अपनी सेना से इजराइल पर हमले की मांग कर रहे थे। यह ईरान का अमेरिका को सीधा जवाब था। ट्रंप के ऐलान के बाद ईरान की प्रतिक्रिया देखिए। वहां कोई नरमी नहीं है। ईरानी संसद के सदस्य महमूद नबवियान ने इसे बेमतलब और नुकसानदायक बताया। वहीं स्पीकर के सलाहकार ने तो यहां तक कह दिया हारने वाले शर्त तय नहीं कर सकते। ट्रंप कह रहे हैं कि जब तक ईरान एकीकृत प्रस्ताव नहीं लाता हमले रुके रहेंगे। लेकिन हकीकत यह है कि ईरान झुकने को तैयार नहीं है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-suddenly-start-dancing-to-iran-real-story-behind-the-ceasefire-extension</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/22/trump_large_1219_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दो भाई, दोनों तबाही...क्या है भारत-रूस का RELOS समझौता? चीन-पाक और US की हेकड़ी निकली]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-india-russia-relos-agreement-china-pakistan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दो भाई और दोनों तबाही। चीन, पाकिस्तान और यूएस की हेकड़ी निकाल दी। एक पैक्ट, एक समझौता जो हुआ है भारत और रूस के बीच। भारत और रूस के बीच बढ़ते द्विपक्षीय संबंधों और गहराते डिफेंस कोऑपरेशन को दर्शाते हुए एक अहम समझौता औपचारिक रूप से लागू कर दिया गया है। भारत और रशिया के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इस फैक्ट के तहत दोनों देश एक दूसरे की टेरिटरी में अधिकतम 3000 मिलिट्री पर्सनल तैनात कर सकेंगे। सिर्फ सैनिक ही नहीं इस एग्रीमेंट के तहत शिप्स और एयरक्राफ्ट को भी एक दूसरे के क्षेत्र में तैनात करने की अनुमति दे दी गई है। यह समझौता रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स एग्रीमेंट यानी रेलोस से जुड़ा हुआ है। जिसमें जॉइंट मिलिट्री एक्सरसाइजज़, ट्रेनिंग और ह्यूमैनिटेरियन मिशनंस जैसे पहलू भी शामिल हैं। हाल ही में भारत दौरे से पहले रूसी राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन ने इस इंटर गवर्नमेंटल एग्रीमेंट को रटिफाई करने वाले कानून पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस एग्रीमेंट का मकसद भारत और रूस के बीच मिलिट्री डिप्लॉयमेंट, पोर्ट्स पर वॉरशिप्स की डॉकिंग और मिलिट्री एयरक्राफ्ट के लिए एयर स्पेस और एयर फील्ड इंफ्रास्ट्रक्चर के इस्तेमाल के लिए एक क्लियर फ्रेमवर्क तैयार करना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/ukraine-major-announcement-following-india-russia-military-deal" target="_blank">3000 सैनिक,5 युद्धपोत,10 विमान...भारत-रूस की मिलिट्री डील के बाद यूक्रेन का बड़ा ऐलान</a></h3><h2>क्या है यह रेलॉस एग्रीमेंट?</h2><div>द इंडियन रशियन रेसिप्रोकल एक्सचेंज ऑफ लॉजिस्टिक्स सपोर्ट एग्रीमेंट। इस एग्रीमेंट के तहत जरूरत पड़ने पर भारतीय सेना रशिया के कुछ चुनिंदा सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएगी। ठीक वैसे ही रशिया भी जरूरत पड़ी तो भारत के कुछ सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेगा। यह समझौता कुछ कुछ-कुछ वैसा ही है जैसे अमेरिका मित्र देशों के सैन्य ठिकानों को अपने मिशन के लिए इस्तेमाल करता है। ठीक वैसे ही भारत और रशिया समय आने पर इसी तरह से एक दूसरे की जमीन का इस्तेमाल करेंगे अगर युद्ध में जरूरत पड़ती। जब दुनिया की दूसरी और चौथी सबसे ताकतवर सेनाएं एक साथ मिलकर खड़ी होंगी तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें रोक नहीं पाएगी। रूस और भारत ने अपनी दोस्ती को एक कदम आगे ले जाते हुए एक ऐसी रणनीतिक साझेदारी की है जिसे देखकर दुनिया की कई महाशक्तियों के माथे पर सिकन नजर आने लगी है। भारत और रूस ने एक ऐसा समझौता किया जिससे दोनों देश एक दूसरे के सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे और इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्कटिक क्षेत्र तक और रूस की पहुंच हिंद महासागर तक हो जाएगी। इन दोनों ताकतवर देशों ने पल-पल बदल रही वैश्विक परिस्थितियों और जंग के माहौल के बीच यह समझौता अमल में लाकर दुश्मनों को परेशान कर दिया है। भारत और रूस के बीच द रेलॉस एग्रीमेंट हुआ है। इसके तहत भारत और रूस एक दूसरे के सैन्य ठिकानों पर अस्थाई बेस बना सकेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-deploys-troops-and-warships-to-india-us-stunned-by-massive-preparations" target="_blank">Russia ने भारत में उतारे सैनिक और वॉरशिप! बड़ी तैयारी से चौंका US, दुश्मनों में खलबली</a></h3><h2>अमेरिका ने कई देशों में बनाए अपने सैन्य ठिकाने</h2><div>ईरान युद्ध में हमने देखा कि हवाई हमलों के लिए अमेरिका ने यूरोपीय देशों में बने अपने सैन्य ठिकानों की मदद ली। अमेरिका से सीधे ईरान पर हमले करना खर्चीला है और समय भी काफी लगता है। इसी वजह से अमेरिका ने मिडिल ईस्ट के अपने ऑपरेशंस के लिए यूरोपीय देशों और मिडिल ईस्ट के भी कई देशों में अपने सैन्य ठिकाने बनाए हैं। इनमें कुछ स्थाई है और कुछ अस्थाई। ठीक वैसे ही अब से भारत और रूस एक दूसरे के सैनिक ठिकानों का इस्तेमाल कर पाएंगे। भारत के लिए रिलोस एग्रीमेंट रणनीतिक रूप से काफी फायदेमंद है। इससे भारतीय सेना की पहुंच आर्थिक क्षेत्र तक हो जाएगी। दुनिया की लगभग सभी महाशक्तियां जैसे अमेरिका, रूस और चाइना इस क्षेत्र में अपनी मौजूदगी बढ़ा रहे हैं। अभी तक भारत और रूस एक दूसरे के किन सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करेंगे इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी गई है। लेकिन एक्सपर्ट्स के मुताबिक इस समझौते के बाद भारतीय सेना रूस के एक बड़े पोर्ट मुरबंस और नॉर्दन प्लीट के मुख्यालय सिविरो म्स पर अपनी तैनाती कर सकता है। अगर ऐसा हुआ, तो इससे भारतीय नौसेना की वैश्विक मौजूदगी बढ़ेगी और दूरदराज के सैन्य ऑपरेशन आसान हो जाएंगे। युद्ध की स्थिति में युद्धपोतों को बार-बार भारत वापस नहीं आना पड़ेगा। इसके अलावा चाइना के पास ब्लादी बोस्टोक पर भी भारतीय सैनिक तैनात किए जा सकते हैं। इसके अलावा कामचटका पर भी भारतीय सेना की रणनीतिक मौजूदगी हो सकती है। यह भी महत्वपूर्ण ठिकाना होगा। इसके अलावा रूस भी भारतीय सैन्य ठिकानों पर अपनी मौजूदगी से हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के साथ मिलकर दबदबा बढ़ा सकता है।&nbsp;</div><h2>5 वर्षों तक के लिए किया गया समझौता</h2><div>इस पूरे क्षेत्र पर दोनों देशों की मौजूदगी से अमेरिका और चाइना जैसे देशों को काउंटर करने में मदद मिलेगी। यह समझौता एक बार में 5 वर्षों तक के लिए किया गया है और इसके बाद दोनों देश इसे अगले 5 वर्षों तक के लिए बढ़ा सकते हैं। हालांकि भारत ने अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, सिंगापुर, जापान और दक्षिण कोरिया से भी लॉजिस्टिकल सपोर्ट से जुड़े समझौते किए हैं। लेकिन इन सभी देशों के साथ रूस जैसा समझौता नहीं है। इन समझौतों के तहत भारतीय सेना को इन देशों की तरफ से लॉजिस्टिक सपोर्ट तो मिलेगा लेकिन इसमें सैनिकों की तैनाती की बात नहीं है। जबकि रेलॉस एग्रीमेंट के तहत भारतीय सेना रूस में भी सैनिक रख सकती है। पिछले साल आई सिपली की रिपोर्ट के मुताबिक भारत दुनिया में हथियारों का दूसरा सबसे बड़ा खरीदार है और रूस भारत के लिए हथियारों का सबसे बड़ा सप्लायर है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 14:12:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-india-russia-relos-agreement-china-pakistan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/21/russia_large_1412_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[होर्मुज की उथल-पुथल के बीच अचानक मोदी से मिले कोरियाई राष्ट्रपति, चीन की उल्टी गिनती शुरू?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-the-turmoil-in-the-strait-of-hormuz-south-korean-president-meets-modi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चीन ने भारत के खिलाफ अग्रेसिव रुख लेते हुए भारत के अरुणाचल प्रदेश के कुछ एरियाज के नाम बदल दिए थे। उसके बाद भारत ने एक डिप्लोमेसी अपनाई थी जिसके तहत भारत ने भी चीन के कुछ एरियाज के नाम बदले थे। अमेरिका के नजदीक जैसे-जैसे भारत जाने लगा तो चीन से दूरियां हमारी बढ़ना लाजमी है। अब भारत ने चीन के अगेंस्ट एक ऐसा कदम लिया है जो कि डिप्लोमेटिकली उसे वर्ल्ड ऑर्डर में चीन से बहुत आगे रख देगा। भारत ने अपनी एक्ट ईस्ट पॉलिसी लुक ईस्ट पॉलिसी से आगे जाते हुए दक्षिण कोरिया के साथ अपने रिलेशंस को अच्छे करने के लिए दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति को भारत में इनवाइट किया। वो 19 से लेकर 21 तारीख तक तीन दिन की राष्ट्रीय विजिट पर भारत में आए हैं।&nbsp; भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की साउथ कोरिया के राष्ट्रपति ली जे म्युंग के साथ बेहद अहम बैठक हुई। लगभग एक दशक तक, नई दिल्ली (भारत) और सियोल (दक्षिण कोरिया) के बीच विशेष रणनीतिक साझेदारी ज़मीनी हकीकत से ज़्यादा कागज़ों पर ही नज़र आई। हालांकि दोनों देशों के बीच व्यापार जारी रहा, लेकिन 2018 में दक्षिण कोरिया के पूर्व राष्ट्रपति मून जे-इन की यात्रा के दौरान जो राजनीतिक उत्साह दिखा था, वह धीरे-धीरे फीका पड़ गया। भारत और दक्षिण कोरिया के रिश्ते कभी टूटे नहीं थे, लेकिन दोनों देशों की अपनी-अपनी तात्कालिक रणनीतिक मजबूरियों के कारण ये अक्सर पीछे छूट गए। दक्षिण कोरिया मुख्य रूप से उत्तर कोरिया के मुद्दों, अमेरिका के साथ अपने गठबंधन को संभालने और चीन पर अपनी भारी आर्थिक निर्भरता में उलझा रहा। इसके अलावा, वहाँ की बदलती घरेलू राजनीति और राष्ट्रपति के लिए केवल एक कार्यकाल वाले सिस्टम ने लंबी अवधि की रणनीतियों को बनाए रखना मुश्किल कर दिया। वहीं दूसरी ओर, भारत हिमालयी सीमा पर चीन के साथ तनाव को संभालने, पाकिस्तान से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं और अन्य बड़ी महाशक्तियों के साथ अपने कूटनीतिक एजेंडे में व्यस्त था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/south-korean-president-lees-visit-to-india" target="_blank">South Korea के राष्ट्रपति Lee का भारत दौरा, PM Modi संग AI-Semiconductor पर होगी मेगा डील!</a></h3><h2>आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी को मज़बूत करने पर ज़ोर</h2><div>नई दिल्ली स्थित हैदराबाद हाउस में दोनों देशों के शीर्ष नेताओं के बीच एक अहम द्विपक्षीय बैठक हुई। इस बातचीत के दौरान मुख्य फोकस वैश्विक स्तर पर मची उथल-पुथल—खासकर ईरान और इज़राइल-अमेरिका के बीच चल रहे संघर्ष—पर ही रहा। दोनों नेताओं ने इस बात पर गहराई से विचार-विमर्श किया कि युद्ध और तनाव के इस मौजूदा दौर में भारत और दक्षिण कोरिया अपने आर्थिक और रणनीतिक रिश्तों को और अधिक मज़बूत कैसे बना सकते हैं। बैठक के बाद, पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति के प्रति अपनी संवेदनशीलता का संदेश देते हुए दोनों नेताओं ने मिलकर एक पौधा भी लगाया। प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से भी इस महत्वपूर्ण मुलाकात की झलकियां साझा की गई हैं। इस मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों देशों के ऐतिहासिक संबंधों का ज़िक्र करते हुए कहा कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हज़ारों सालों पुराना सांस्कृतिक जुड़ाव है। उन्होंने याद दिलाया कि 2000 साल पहले अयोध्या की राजकुमारी सूरीरत्ना और कोरियाई राजा किम-सुरो के बीच हुआ विवाह हमारी साझा और गौरवशाली विरासत का प्रतीक है। पीएम मोदी ने यह भी कहा कि आधुनिक दौर में भी यह जुड़ाव कायम है—जहाँ एक तरफ भारत में 'के-पॉप' (K-Pop) और 'के-ड्रामा' (K-Drama) की दीवानगी तेज़ी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर दक्षिण कोरिया के लोग भी भारतीय सिनेमा और संस्कृति को खूब पसंद कर रहे हैं।</div><h2>50 अरब का सपना: CEPA को अपग्रेड करना</h2><div>दोनों देशों के आपसी रिश्तों में सबसे बड़ी रुकावटों में से एक व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता (सीईपीए) रहा है। 2009 में साइन किया गया और 2010 में लागू हुआ यह समझौता अब काफी पुराना माना जाता है। भारत अक्सर दक्षिण कोरिया के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को लेकर अपनी चिंता ज़ाहिर करता रहा है। दोनों देशों ने 2030 तक आपसी व्यापार को $50 अरब तक पहुँचाने का एक बड़ा लक्ष्य तय किया है। क्या यह दौरा इस लक्ष्य को पाने के लिए ज़रूरी 'ऑक्सीजन' दे पाएगा? अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का मानना ​​है कि इसके लिए राजनीतिक दबाव तो ज़रूरी है, लेकिन उसके बाद बारीकी से काम को अंजाम देना भी उतना ही ज़रूरी है। यह दौरा राजनीतिक दबाव तो दे सकता है, लेकिन सिर्फ़ अपने दम पर नहीं। ऊँचे स्तर के दौरे इसलिए मायने रखते हैं, क्योंकि वे निवेशकों की अनिश्चितता को कम करते हैं। सरकारी अधिकारियों की गंभीरता का संकेत देते हैं और इंडस्ट्री को सिर्फ़ बातचीत से आगे बढ़कर काम को अंजाम देने के लिए बढ़ावा देते हैं। अगर दोनों नेता इस दौरे का इस्तेमाल सीईपीए से जुड़ी रुकावटों को दूर करने, समय-सीमा तय करने और कुछ खास क्षेत्रों की पहचान करने के लिए करते हैं, तो 2030 तक $50 अरब का लक्ष्य ज़्यादा भरोसेमंद हो जाता है। लेकिन असली परीक्षा यह मुख्य लक्ष्य नहीं है; असली परीक्षा यह है कि क्या दोनों पक्ष अपने व्यापारिक संबंधों को ज़्यादा संतुलित, व्यापक और कुछ चुनिंदा निर्मित वस्तुओं पर कम निर्भर बना पाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-2-0-busan-freeze-policy-make-america-china-friendly-again" target="_blank">Trump 2.0 की बुसान फ्रीज पॉलिसी, जो बनाएगी मेक अमेरिका 'चाइना-फ्रेंडली' अगेन</a></h3><h2>2026 में अब क्या बदल गया है?</h2><div>हालाँकि, 2018 की तुलना में 2026 के हालात पूरी तरह से अलग हैं। महामारी के बाद की दुनिया और अर्थव्यवस्थाओं द्वारा जोखिम कम करने की नीतियों ने दक्षिण कोरिया को दोबारा सोचने पर मजबूर कर दिया है। एशिया अब केवल विकास की उम्मीदों पर नहीं चल रहा है। अब यह सप्लाई-चेन (आपूर्ति श्रृंखला) की असुरक्षा, समुद्री विवादों, तकनीकी होड़ और उत्पादन के लिए केवल चीन पर निर्भर न रहने के दबाव से तय हो रहा है। इसके अलावा भारत अपने बड़े बाज़ार, मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने, डिजिटल विस्तार और 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) में अपने कूटनीतिक प्रभाव के कारण इन नई रणनीतियों के बिल्कुल केंद्र में आ गया है। वहीं दक्षिण कोरिया का मौजूदा नेतृत्व भी अब अमेरिका और चीन के बाज़ारों पर अपनी पुरानी निर्भरता से आगे देख रहा है। यही कारण है कि दक्षिण कोरियाई राष्ट्रपति ली की यह ताज़ा यात्रा अब केवल प्रतीकात्मक (दिखावे की) नहीं, बल्कि एक बहुत ही महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम मानी जा रही है।</div><div>ग्लोबल साउथ' (विकासशील देशों) तक पहुँचने के लिए एक 'पुल' के रूप में भारत</div><div>राष्ट्रपति ली के नेतृत्व में दक्षिण कोरिया दुनिया में अपनी एक नई और बड़ी पहचान बनाने की रणनीति पर तेज़ी से काम कर रहा है। इसका एक बहुत अहम हिस्सा ग्लोबल साउथ के साथ जुड़ना है। 2023 में भारत की G20 अध्यक्षता के बाद से, 'ग्लोबल साउथ' शब्द एक तरह से भारत के मज़बूत नेतृत्व की पहचान बन चुका है। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार वी सुंग-राक ने हाल ही में बताया था कि उनकी इस रणनीति को आगे बढ़ाने में भारत की यात्रा एक मुख्य स्तंभ है।</div><div>दक्षिण कोरिया को 'ग्लोबल साउथ' के लिए भारत की ज़रूरत क्यों है?</div><div>विकासशील देशों के बीच अपनी कूटनीति बढ़ाने में भारत, दक्षिण कोरिया की बहुत मदद कर सकता है। भारत की विकासशील दुनिया में जो गहरी पकड़, सम्मान और राजनीतिक वैधता है, वह दक्षिण कोरिया के पास अभी उस स्तर पर नहीं है। भारत को अब केवल एक एशियाई ताकत के तौर पर नहीं देखा जाता। भारत एक ऐसा देश बन गया है जो अफ्रीका, हिंद महासागर के देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया और लैटिन अमेरिका (दक्षिण अमेरिका) के देशों के साथ सीधे जुड़ सकता है। भारत इन देशों के साथ विकास, उनकी क्षमता बढ़ाने और आज़ाद रणनीतिक सोच के मुद्दों पर उनकी ही भाषा में बात कर सकता है। दक्षिण कोरिया अब तक मुख्य रूप से अपने पुराने गठबंधनों और केवल अमीर देशों के बाज़ारों तक ही सीमित रहा है। अब जब वह अपनी कूटनीतिक और व्यापारिक पहुँच को दुनिया के अन्य हिस्सों में बढ़ाना चाहता है, तो भारत उसके लिए एक बेहद मूल्यवान और ज़रूरी साथी बन जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Apr 2026 16:00:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-the-turmoil-in-the-strait-of-hormuz-south-korean-president-meets-modi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/20/hormuz_large_1600_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिंदी Ban, हिजाब Allowed, Lenskart के वायरल डॉक्यूमेंट पर क्या विवाद चल रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-controversy-surrounding-lenskart-viral-document]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अभी टाटा&nbsp; कंसलटेंसी सर्विज यानी टीसीएस से जुड़ा विवाद पूरी तरह थमा भी नहीं था कि एक और बड़ी कंपनी को लेकर कंट्रोवर्सी सामने आने लगी है। इस बार मामला सिर्फ एक कंपनी तक सीमित नहीं है बल्कि उस सवाल का है जो हम सबके वर्क प्लेस से सीधे जुड़ा है। मामला है ड्रेस कोड पॉलिसी का। क्या एक कंपनी यह तय कर सकती है कि आप अपनी रिलीजियस आइडेंटिटी कैसे दिखाएं? या अपनी रिलीजियस आइडेंटिटी को दिखाना जरूरी है भी? क्या ऑफिस में आपकी धार्मिक पहचान और उससे जुड़े पर्सनल बिलीफ आपकी अपनी चॉइस होगी या कंपनी की पॉलिसी उसे तय करेगी? तमाम विवाद चश्मे बनाने वाली पॉपुलर कंपनी लेंस कार्ड से जुड़ा है। क्या है लेंस कार्ड से जुड़ी कंट्रोवर्सी और क्यों हो रही है इसकी इतनी चर्चा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran" target="_blank">Trump का 'धर्मयुद्ध', ईरान के लिए US प्रेसिडेंट से क्यों भिड़ गए पोप</a></h3><div>दरअसल, लेंस कार्ड की 27 पन्नों की गाइड बुक में तमाम ऐसे नियम है जिन्हें लेकर कंट्रोवर्सी हो रही है। वैसे लेंस कार्ड के सीईओ पीयूष बंसल ने इन नियमों को पुराना बताया है। लेकिन ट्रोल्स का कहना है कि गाइडलाइन पुरानी हो या फिर नई हो है तो आपकी ही। पहले जानेंगे कि किन नियमों को लेकर विवाद है और फिर जानेंगे कि पीयूष बंसल का क्या कहना है।</div><h2>लेंसकार्ट स्टाफ यूनिफार्म एंड ग्रूमिंग गाइड पर एक्स यूजर ने उठाए सवाल</h2><div>शुरुआत एक एक्स पोस्ट से हुई। 15 अप्रैल को शेफाली वैद नाम की एक्स यूजर ने लेंस कार्ड को टैग करते हुए कुछ फोटो शेयर की। इन तस्वीरों को लेंस कार्ट स्टाफ यूनिफार्म एंड ग्रूमिंग गाइड का हिस्सा बताया जा रहा है। तस्वीर में दिखाए गए नियम के हिसाब से कंपनी की वर्कर्स एक पर्टिकुलर लेंथ का हिजाब पहन सकती हैं। लेकिन किसी भी कलर की बिंदी, स्टोन या फिर कलावा नहीं पहन सकती। सिंदूर को लेकर भी नियम बताया गया कि इसे मिनिमम लगाना है और इस तरह से लगाना है कि माथे पर नहीं आए। इस तरह के और भी कई सारे नियमों का जिक्र किया गया। इस फोटो को शेयर करते हुए यूजर ने लिखा मैं नियमों को कंफर्म कर रही हूं। पीयूष बंसल अपने वर्कर्स को यही बताते हैं कि हिजाब ओके है लेकिन बिंदी तिलक क्या कलावा ओके नहीं है। यह ऐसी कंपनी है जो हिंदू बहुल देश भारत में है। जिसके अधिकतर वर्कर्स और कस्टमर हिंदू हैं। आप इस पर क्या कहेंगे?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida" target="_blank">Noida में क्यों हिंसक हुआ कर्मचारियों का प्रोटेस्ट, आंदोलन या साज़िश?</a></h3><h2>डॉक्यूमेंट में क्या-क्या है?</h2><div>वायरल डॉक्यूमेंट में कई तरह के ड्रेस कोड निर्देश दिए गए थे। इसमें कहा गया था कि अगर कोई कर्मचारी पगड़ी पहनता है तो उसका रंग काला होना चाहिए। इसी तरह हिजाब पहनने की अनुमति थी लेकिन उसके लिए भी काले रंग की शर्त रखी गई थी। साथ ही यह भी कहा गया था कि हिजाब का कवरेज सीमित हो। वहीं स्टोर में बुर्का पहनने की अनुमति नहीं दी गई थी। विज़िबल टैटू से बचने की सलाह दी गई थी ताकि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत ना हो। इसके अलावा मेहंदी लगाने पर भी रोक थी और अगर किसी खास मौके पर लगानी हो तो पहले से अनुमति लेनी होगी और वह भी सीमित समय के लिए। सबसे ज्यादा विवादित हिस्सा वो था जिसमें धार्मिक प्रतीकों को लेकर निर्देश दिए गए थे। जैसे कि तिलक, बिंदी या किसी भी तरह का धार्मिक स्टीकर पहनने की अनुमति नहीं थी।</div><h2>हिंदू संस्कृति और परंपराओं को किया जा रहा टारगेट?</h2><div>यह नियम लेंस कार्ट स्टाइल गाइड के पेज नंबर 11 में लिखा है। इस फोटो को शेयर करते हुए एक और यूजर ने लिखा, क्या सच में यह हिंदू बहुसंख्यक या सेकुलर देश है? हिंदुओं के साथ भेदभाव किया जाता है और अल्पसंख्यक मुसलमानों को वर्क प्लेस में अपनी धार्मिक पहचान का पालन करने की इजाजत दी जाती है। लेंस कार्ट यह रवैया हिंदू संस्कृति और परंपराओं को टारगेट कर रहा है। ऐसे ही और सारे कमेंट्स आए तो पीयूष बंसल ने जवाब भी दिया।</div><h2>लेंसकार्ट के सीईओ ने क्या कहा</h2><div>पीयूष ने लिखा कि हर साल नियमों में बदलाव होता है। हमारी कंपनी में अलग-अलग धर्म के हजारों लोग काम करते हैं। कोई डिस्क्रिमिनेशन नहीं होता। इसके आगे पीयूष ने जो लिखा हम शब्दशा बता देते हैं। पीयूष ने लिखा, मैंने देखा है कि लेंस कार्ड का गलत पॉलिसी डॉक्यूमेंट वायरल हो रहा है। मैं बताना चाहता हूं कि यह डॉक्यूमेंट हमारे वर्तमान दिशा निर्देशों को नहीं दिखाता। हमारी पॉलिसी में धार्मिक अभिव्यक्ति पर कोई रोक नहीं है। इसमें बिंदी और तिलक भी शामिल है। हम नियमित रूप से अपने दिशा निर्देशों को रिव्यू करते रहते हैं। हमारी ग्रूमिंग पॉलिसी समय के साथ विकसित हुई है और इसके पुराने नियम आज हमारी पहचान को सही ढंग से नहीं दिखाते हैं। आपको जो कंफ्यूजन हुआ उसके लिए हम माफी चाहते हैं। एक कंपनी के रूप में हम लगातार सीखते और आगे बढ़ते हैं। हमारी भाषा या नीतियों में खामियों को दूर किया गया है और आगे भी किया जाता रहेगा। भारत में हमारे हजारों कर्मचारी जो हमारे स्टोर्स में अपने धर्म और संस्कृति को गर्व से दिखाते हैं। यही लेंस कार्ड है। लेंस कार्ड भारत में बना था भारतीयों द्वारा और भारतीयों के लिए। हमारे लोगों की हर परंपरा हमारी कंपनी की पहचान का हिस्सा है। मैं कभी भी इसे खतरे में नहीं पड़ने दूंगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/place-from-where-india-was-conquered-do-you-know-story-of-strait-of-hormuz" target="_blank">जहां से हुआ था भारत पर कब्जा, ट्रेड रूट बंद करना था कारण, Strait of Hormuz की ये कहानी क्या आपको पता है?</a></h3><h2>डॉक्यूमेंट नया हो या पुराना इसे स्वीकारा क्यों गया?</h2><div>यूजर ने पीयूष के जवाब पर क्रॉस क्वेश्चन किया। लिखा कि सॉरी, इस सफाई का कोई मतलब नहीं है। ये डॉक्यूमेंट फरवरी 2026 का है। अगर ये नियम आज की गाइडलाइन को नहीं दिखाते तो प्लीज नए वाले शेयर कर दीजिए। भले ही यह पुराना डॉक्यूमेंट हो तो उस समय भी इसे क्यों स्वीकार किया जाता था। हिजाब और पगड़ी की इजाजत थी लेकिन बिंदी, सिंदूर और कलावा की नहीं। इसके पीछे क्या लॉजिक था? अपने वकील से कहिए इस तरह का कमजोर स्पष्टीकरण तैयार करने के बजाय बेहतर तरीके से काम करें। इसके बाद इस खबर को रिकॉर्ड किए जाने तक पीयूष का कोई जवाब सामने नहीं आया।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 13:30:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-controversy-surrounding-lenskart-viral-document</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/17/lenskart_large_1330_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Trump का 'धर्मयुद्ध', ईरान के लिए US प्रेसिडेंट से क्यों भिड़ गए पोप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान के साथ जारी तनाव के बीच डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन इस जंग को एक 'धर्म युद्ध' की तरह पेश कर रहा है, जिसमें ट्रम्प को एक मसीहा के रूप में दिखाया जा रहा है। अमेरिकी सेना के अंदर से ऐसी खबरें आ रही हैं कि कमांडर्स सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार करने हेतु बाइबल और 'दुनिया के अंत' जैसी धार्मिक बातों का सहारा ले रहे हैं। जहाँ एक तरफ व्हाइट हाउस में पास्टर्स ट्रंप की शक्ति के लिए प्रार्थना कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कैथोलिक धर्मगुरु पोप लियो ने इस युद्ध को नेताओं का अहंकार बताकर इसकी कड़ी निंदा की है। इस वैचारिक मतभेद के कारण ट्रंप और पोप के बीच जुबानी जंग भी तेज हो गई है, जिससे यह पूरा संघर्ष अब राजनीति से हटकर धर्म के केंद्र पर आ टिका है। यह स्थिति दिखाती है कि कैसे आधुनिक युद्ध को धार्मिक कट्टरता और 'आर्मागडन' जैसी प्राचीन मान्यताओं से जोड़ा जा रहा है। डोनाल्ड ट्रंप की वो ट्रुथ सोशल वाली पोस्ट जिसमें उन्होंने खुद को एक मसीहा की तरह दिखाया।&nbsp; प्रेयर्स में कहा गया हम आपकी यानी ईश्वर की कृपा और हमारे सैनिकों की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करते हैं और हमारी सशस्त्र सेनाओं में सेवा दे रहे हमारे सारे पुरुषों और महिलाओं के लिए भी हे परमपिता ईश्वर हम प्रार्थना करते हैं कि आप हमारे राष्ट्रपति ट्रम्प को वो ताकत देते रहे जिसकी उन्हें जरूरत है ताकि वो हमारे महान राष्ट्र का नेतृत्व कर सकें। ओवल ऑफिस से शायद ही पहले किसी युद्ध के बीच इस तरह का वीडियो पब्लिक डोमेन में आया हो। जैसा ट्रंप के लिए प्रार्थना का वीडियो ईरान से जंग के बीच आया।&nbsp;</div><h2>मुस्लिम मुल्क के खिलाफ जंग में अलग नैरेटिव गढ़ने की कोशिश&nbsp;</h2><div>द गार्डियन की रिपोर्ट में लिखा है अमेरिकी सेना के सैन्य कमांडर्स ईरान वॉर में शामिल होने को सही ठहराने के लिए सैनिकों के सामने बाइबल के एंड टाइम्स यानी दुनिया के अंत से जुड़ी कट्टर ईसाई बयानबाजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। एक निगरानी संस्था के पास आई शिकायतों में यह आरोप कमांडर्स पर लगाया गया है। संगठन का नाम मिलिट्री रिलीजियस फ्रीडम फाउंडेशन यानी एमआरएफएफ है। एमआरएफएफ का कहना है कि उसे यूएस आर्म्ड फोर्सेस के अलग-अलग हिस्सों से 200 से ज्यादा शिकायतें मिली हैं। जिनमें मरींस, एयर फोर्स और स्पेस फोर्स के सदस्य भी शामिल हैं। इसमें यूएस मिलिट्री के एक नॉन कमिश्ंड ऑफिसर यानी एनसीओ के हवाले से बड़ा आरोप लगाया गया। एनसीओ ने अपनी शिकायत में बताया हमसे कहा गया है कि प्रेसिडेंट ट्रंप को जीसस ने ईरान में सिग्नल फायर जलाने के लिए चुना है ताकि आर्मागडन हो और धरती पर उनकी यानी ईसा मसीह की वापसी हो। इसके अलावा जब धार्मिक प्रभाव को लेकर अमेरिकी रक्षा मंत्रालय से सवाल किया जाता है तो सोर्सेज और समर्थक जवाब देते हैं। जंग में तो हमेशा से ही धर्म और आस्था के जरिए फौजियों का हौसला बढ़ाया जाता रहा है। इसी तरह धार्मिक कट्टरपंथी के आरोप अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के अगवा यूएस डिफेंस सेक्रेटरी पीट हेग्ज़ेथ पर भी लगते रहे हैं। रिलीजियस एक्सट्रीमिज्म के स्कॉलर मैथ्यू डी टेलर ने इस बारे में कहा पीट हेगथ की लीडरशिप में अमेरिका जानबूझकर एक मुस्लिम मुल्क के खिलाफ जंग में जा रहा है। ये उसी तरह की सिचुएशन है जिसके बारे में मेरे जैसे लोग इलेक्शन और पीठ के अपॉइंटमेंट से पहले से ही वार्म करते आ रहे हैं। इससे पहले रक्षा मंत्री पीट हेक्सेथ ये भी कह चुके हैं कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका एक क्रिश्चियन देश है और वही हमारा देश आज भी फॉलो करता है। इसके अलावा एक और शब्द पर गौर कीजिए। आर्मागडन जिसका जिक्र यूएस के नॉन कमिश्नंड ऑफिसर ने अपनी शिकायत में किया था। यह शब्द ईसाई धार्मिक ग्रंथ बाइबल से आता है। बाइबल में आर्मागडन का मतलब उस आखिरी जंग से है जो बुराई और अच्छाई के बीच होगी। अब इसी शब्द का इस्तेमाल अमेरिका में ईरान के खिलाफ जंग के लिए किया जा रहा है।</div><h2>धर्म युद्ध की तरह ईरान वॉर को दिखाने की कोशिश</h2><div>अमेरिकन अथॉरिटीज या तो इसे एक धर्म युद्ध की तरह खुद देख रही है या फिर दिखाने की कोशिश कर रही हैं। लेकिन अगर कैथोलिक क्रिश्चियन के सबसे बड़े धर्मगुरु पोप लियो की बातों पर गौर करें तो वो साफ-साफ इस युद्ध के खिलाफ हैं। यही वजह है कि डॉनल्ड ट्रंप और उनका प्रशासन खुले शब्दों में पोप लियो के खिलाफ बोल रहा है। इस तकरार की शुरुआत पहले ही हो चुकी थी लेकिन 11 अप्रैल को ये एक बड़े स्तर पर पहुंच गई। तब पोप लियो ने एकदम कड़े शब्दों में कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजराइल की जंग सर्वशक्तिमान होने के भ्रम की वजह से बढ़ाई जा रही है। ट्रंप की ओर इशारा था शायद और उन्होंने इस सोच की निंदा की। साथ ही पोप लियो ने अमेरिकी नेताओं से जंग रोकने और शांति के लिए बातचीत का रास्ता अपनाने की मांग की।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/putin-will-come-to-india-for-the-brics-summit-modi-will-go-to-russia" target="_blank">BRICS Summit के लिए Putin आएंगे India, Modi जाएँगे Russia, दोनों पक्के दोस्त मिलकर बदलेंगे वैश्विक समीकरण!</a></h3><h2>हथियार नहीं इंसाफ और करुणा से ही आएगी शांति</h2><div>पोप लियो XIV ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट करते हुए कहा कि दुनिया को युद्ध और हिंसा की सोच से बाहर निकलना होगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि आज दुनिया को जो संदेश सुनने की जरूरत है”, वह शांति और संवाद का है। कैमरून की यात्रा पर रवाना लियो ने पोप के विशेष विमान में संवाददाताओं से बातचीत में यह टिप्पणी की। हालांकि, उन्होंने न तो ट्रंप के हालिया सोशल मीडिया पोस्ट का जिक्र किया और न ही अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस के इस सुझाव का कि पोप को धर्मशास्त्र के बारे में बोलते समय “सावधानी बरतनी चाहिए।” लियो ने सवालों के जवाब देने से भी परहेज किया। इसके बजाय उन्होंने अल्जीरिया की अपनी यात्रा और हिप्पो के संत ऑगस्टीन की शिक्षाओं के बारे में बात की, जो उनके आध्यात्मिक प्रेरणास्रोत थे। हालांकि, लियो ने कुछ ऐसी टिप्पणियां भी कीं, जिनसे संकेत मिलता है कि उन्होंने ईरान युद्ध को लेकर शांति की अपनी अपील को लेकर ट्रंप प्रशासन की ओर से की गई आलोचनाओं को नजरअंदाज नहीं किया है। ट्रंप ने पिछले कुछ दिनों में पोप पर लगातार तीखे हमले किए हैं। उन्होंने लियो पर अपराध के खिलाफ कमजोर रुख अपनाने और वामपंथियों के प्रभाव में होने का आरोप लगाया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/multi-million-dollar-us-drone-destroyed-in-the-strait-of-hormuz" target="_blank">जिसे बताया लापता, उसे ईरान ने ठोका, होर्मुज में करोड़ों का US ड्रोन स्वाहा</a></h3><h2>ट्रंप ने पोप के रुख को बताया वास्तविकता से दूर</h2><div>डोनाल्ड ट्रंप ने पोप के इस रुख पर कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने दावा किया कि ईरान ने हाल के महीनों में हजारों निहत्थे प्रदर्शनकारियों को मार दिया है और ऐसे देश को परमाणु हथियार हासिल करने देना पूरी तरह अस्वीकार्य है। ल ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रूथ सोशल पर पोप की टिप्पणी की आलोचना करते हुए कहा कि पोप का रुख वास्तविकता से दूर है। ट्रंप ने पहले भी पोप की आलोचना करते हुए उन्हें कमजोर बताया था और माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया था। उन्होंने कहा कि वे पोप की राय से सहमत नहीं हैं और अपनी नीतियों पर कायम रहेंगे।</div><div>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 17:40:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-holy-war-why-did-the-pope-clash-with-us-president-over-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/16/trump_large_1741_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Noida में क्यों हिंसक हुआ कर्मचारियों का प्रोटेस्ट, आंदोलन या साज़िश?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले तीन-चार दिन से हम देख रहे हैं कि श्रमिक हड़ताल कर रही हैं। प्रोटेस्ट कर रही हैं। उनकी मांग है कि उनका वेतन बढ़ाया जाए। उनकी मांग है कि ओवरटाइ का उनको पैसा दिया जाए। उनकी मांग है कि उनको वीकली ऑफ दिया जाए और सम्मानित तरीके से उनको काम करने दिया जाए। उनका शोषण ना हो। उनकी सुरक्षा का ध्यान रखा जाए। 13 अप्रैल को सुबह-सुबह यानी अगर आज सुबह का मैं जिक्र करूं तो देखते ही देखते नोएडा के अलग-अलग क्षेत्रों में ये जो साइलेंट प्रोटेस्ट चल रहा था, यह अचानक से उग्र हो गया। कितना उग्र हो गया? गाड़ियां जला दी गई। जो तस्वीरें सामने आई है उसको देखने के बाद अंदाजा लगाया जा सकता है। जोर-जोर से नारे लगाए जा रहे हैं। यह प्रदर्शन देखते ही देखते उग्र हो गया। जो लोग अपने ऑफिसों के लिए निकले थे वो अपने ऑफिस नहीं जा पाए। पुलिस बल वहां पर तैनात कर दिया गया और स्थिति को कुछ ऐसा दिखाने की कोशिश की गई कि सब कुछ आउट ऑफ कंट्रोल है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/after-noida-now-it-delhi-turn-imd-issues-yellow-alert-increased-risk-of-heavy-rain-thunderstorms" target="_blank">Noida के बाद अब Delhi की बारी? IMD का Yellow Alert, तेज आंधी-पानी का बढ़ा खतरा</a></h3><h2>कर्मचारियों की जो प्रमुख मांगे हैं&nbsp;</h2><div>प्रदर्शनकारी लंबे समय से वेतन वृद्धि और कामकाज की जो परिस्थितियां है उसमें सुधार करने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि महंगाई के दौर में मौजूदा वेतन पर्याप्त नहीं है जिससे उनका जीवन यापन प्रभावित हो रहा है। कर्मचारियों की जो प्रमुख मांगे हैं उसमें मिनिमम जो सैलरी है वह 13,000 से बढ़ाकर 20,000 करने को कहा गया है। साथ ही साथ ओवरटाइ का पेमेंट किया जाए और छुट्टियों के लिए अलग से प्रोविजन को शामिल किया जाए। यह उनकी प्रमुख मांगे हैं। व स्थिति बिगड़ने पर पुलिस और प्रशासन जो है वह हरकत में आया। मौके पर भारी पुलिस बल को तैनात कर दिया गया है और प्रदर्शनकारियों को शांत करने की कोशिश की गई। हालांकि जब भीड़ काबू से बाहर होती नजर आई तो पुलिस ने हल्का बल प्रयोग करके भीड़ को तितर-बितर किया। इस दौरान आंसू गैस के गोले का भी इस्तेमाल किया गया। कई स्थानों पर हालात धीरे-धीरे अब सामान्य होने लगे हैं। लेकिन तनाव अब भी बना हुआ है। एक दिन पहले जिला प्रशासन, पुलिस और प्राधिकरण के अधिकारियों ने कर्मचारियों के जो प्रतिनिधि हैं उनके साथ एक मीटिंग की थी। इस मीटिंग में उनकी मांगों पर विचार करने और समाधान निकालने का आश्वासन दिया गया था। इसके बावजूद भी कर्मचारियों का गुस्सा शांत नहीं हुआ और आंदोलन ने उग्र रूप ले लिया। फिलहाल प्रशासन स्थिति पर नजर बनाए हुए है और लोगों से शांति बनाए रखने की अपील की जा रही है। अधिकारी का कहना है कि किसी भी प्रकार की हिंसा बर्दाश्त नहीं की जाएगी और दोषियों के खिलाफ सख्त कारवाई की जाएगी।</div><h2>प्रशासन ने की शांति की अपील</h2><div>इससे पहले 12 अप्रैल को गौतम बुद्ध नगर की डीएम मेधा रूपम ने नोएडा प्राधिकरण में एक मीटिंग ली थी जिसमें प्रमुख सचिव श्रम और यूपी के जो लेबर कमिश्नर हैं वह भी इसमें वर्चुअली शामिल हुए थे। इस मीटिंग में जो कर्मचारी हैं उनके हितों की सुरक्षा, ओवरटाइ का दुगना भुगतान, बोनस, वीकली ऑफ और वर्क बेस, सेफ्टी और सिक्योरिटी को लेकर बातचीत की गई थी। इसके बाद कर्मचारियों से अपील करते हुए डीएम मेधा रूपम ने एक वीडियो भी पोस्ट किया था। आपको सुनवाते हैं। सभी श्रमिक भाई बहनों से यह मेरी अपील है कि आप सब शांति पूर्वक अपने अपने कार्यस्थल पर जाएं और कार्य करें। साथ में आपसे यह भी अपील है कि जिले का सौहार्द बनाए रखें व कानून व्यवस्था भी बनाए रखें। इसके साथ-साथ आपसे यह भी अपील है कि किसी भी प्रकार की अफवाहों से प्रभावित नहीं हो। हालांकि प्रशासन के आश्वासन के बाद भी नोएडा में कर्मचारियों की मांगे अब भी बरकरार हैं। अभी भी कोई समाधान नहीं निकला है। जिसकी वजह से सोमवार को यह जो प्रोटेस्ट है वो हिंसक हो गया और आगजनी जगह-जगह की गई है। इससे पहले हरियाणा के गुरुग्राम में भी आधा दर्जन से ज्यादा कंपनियों के जो कर्मचारी हैं प्राइवेट कंपनी उनके कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर हड़ताल की थी। बाद में हरियाणा सरकार की तरफ से मिनिमम वेतन या जो कि मिनिमम वेजेस होते हैं उनकी दरों में करीब 35% का इजाफा करने की बात कही गई थी जो कि 1 अप्रैल से एप्लीकेबल होगा। इसके तहत अनस्किल्ड वर्कर का वेतन ₹11,275 से बढ़ाकर ₹15,220 किया गया। सेमी स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹12,430 से बढ़ाकर ₹16,780, स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹13,704 से बढ़ाकर ₹18,500 और हाईली स्किल्ड वर्कर का वेतन ₹14,389 से बढ़ाकर ₹19,425 करने की बात कही। यही मांग नोएडा में भी जो कर्मचारी हैं, वह कर रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cm-yogi-said-on-the-violent-protests-in-noida" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: Noida में उग्र प्रदर्शन पर बोले CM Yogi, 'श्रमिकों को उनका अधिकार मिलना चाहिए मगर अराजकता बर्दाश्त नहीं होगी'</a></h3><h2>श्रमिकों का वेतन को लेकर योगी का ऐलान</h2><div>औद्योगिक इकाइयों में कार्यरत श्रमिकों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने समय पर और सम्मानजनक पैसे देने के निर्देश दिए हैं। शनिवार देर शाम आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में मुख्यमंत्री ने प्रदेश के कुछ औद्योगिक क्षेत्रों में श्रमिकों के बीच उभर रहे असंतोष और हालिया प्रदर्शनों का संज्ञान लिया। उन्होंने निर्देश दिए कि सभी औद्योगिक विकास प्राधिकरण अगले 24 घंटे के भीतर औद्योगिक संगठनों, उद्योग प्रतिनिधियों और इकाई प्रबंधन से सीधा संवाद स्थापित करें और समस्याओं का समाधान संवाद के माध्यम से प्राथमिकता पर सुनिश्चित करें। साथ ही उन्होंने सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए सभी जनपदों में श्रम कानूनों का पालन सुनिश्चित कराने के निर्देश दिए । उन्होंने स्पष्ट कहा कि प्रत्येक श्रमिक को सुरक्षित, सम्मानजनक और मानवीय कार्य वातावरणमिलना चाहिए। उनके अधिकारों से किसी भी प्रकार का समझौता स्वीकार्य नहीं होगा। कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण, स्वच्छ पेयजल, शौचालय, विश्रामगृह, स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना प्रत्येक औद्योगिक इकाई की अनिवार्य जिम्मेदारी है।&nbsp; योगी जी ने यहां तक कहा है कि भाई सारे कंपनियों के प्रतिनिधियों के साथ बैठक की थी और ये कहा था कि आप अपने यहां वर्क आवर कम कीजिए। लेबर लॉस का पालन कीजिए। यह सब हुआ है। उसके बाद ये प्रोटेस्ट शुरू हुआ।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h2>नोएडा आंदोलन पर क्या बोले अखिलेश</h2><div>समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने मेरठ के सेंट्रल मार्केट में हो रही तोड़फोड़ के साथ आंदोलन और नोएडा में श्रमिकों की हिंसा को लेकर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और सरकार पर बड़ा हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार सिर्फ पूंजीपतियों का पोषण कर रही है और श्रमिकों, छोटे व्यापारियों का शोषण कर रही है। अखिलेश यादव ने कहा कि भाजपा का 'भ्रष्टाचार का पेट सुरसा के मुंह जैसा है' और जो व्यापारी आज भाजपा के साथ खड़े हैं, वे भी जल्द ही इनकी गलत नीतियों का शिकार बनेंगे। अखिलेश यादव ने 1857 की क्रांति का जिक्र करते हुए कहा कि मेरठ एक बार फिर इतिहास दोहराएगा। कहा कि 1857 के बाद अब मेरठ से एक और स्वतंत्रता आंदोलन जन्मेगा, जो आज के साम्राज्यवादी सत्ताधारी गिरोह के खिलाफ होगा। सपा प्रमुख ने आरोप लगाया कि भाजपा ने पहले काले कानूनों से खेती-किसानी खत्म करने की कोशिश की और अब मल्टीनेशनल कंपनियों के इशारे पर भारत का परंपरागत व्यापार खत्म कर रही है ताकि अर्थव्यवस्था पर चंद खरबपतियों का कब्जा हो जाए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 15:23:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-employees-protest-turn-violent-in-noida</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/13/violent_large_1523_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जहां से हुआ था भारत पर कब्जा, ट्रेड रूट बंद करना था कारण, Strait of Hormuz की ये कहानी क्या आपको पता है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/place-from-where-india-was-conquered-do-you-know-story-of-strait-of-hormuz]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान अब स्टेट ऑफ हॉर्मोस के मैनेजमेंट को नए स्तर पर ले जाएगा। ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर आयतुल्ला अली खामिनई की मौत के बाद देश में 40 दिनों का शोक था। 9 अप्रैल को 40 दिन पूरे हुए और इसी दिन नए सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनेई का मैसेज टीवी पर ब्रॉडकास्ट हुआ। उन्होंने यह साफ किया है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस का मैनेजमेंट अब नई तरह से होगा और यह बदलाव खुद ईरान करेगा। मुस्तफा खामेनई के इस मैसेज से पहले भी ईरान इस बात का संकेत दे चुका है कि स्टेट ऑफ हॉर्मोस अब पहले जैसा नहीं होगा। नए स्टेटमेंट से यह और भी क्लियर हो चुका है कि ईरान अब कंट्रोल के साथ-साथ उसका मैनेजमेंट भी बहुत मजबूत करने वाला है। इसकी तैयारी में है। यह भी आशंका जताई जा रही है कि ईरान स्टेट ऑफ हॉर्मोस को लेकर और कड़े प्रतिबंध जारी कर सकता है। मोजतबा ने ईरान की जनता से एकजुट रहने और ऐसे मीडिया आउटलेट से दूर रहने की सलाह दी है जो अमेरिका या इजराइल को सपोर्ट करते दिखे। उन्होंने कहा, भले ही 40 दिनों का शोक पूरा हो गया है, लेकिन दुश्मन से बदला लेने का जज्बा खत्म नहीं होना चाहिए। ईरान जंग नहीं चाहता, लेकिन वह अपने अधिकारों को नहीं छोड़ेगा। ईरान अपने मरहूम सुप्रीम लीडर अली खामिनई और अपने शहीदों का बदला लेने के लिए पक्का इरादा रखता है। ईरान अभी भी अपने साउथ के पड़ोसियों से एक सही रिएक्शन का इंतजार कर रहा है ताकि वह अपना भाईचारा दिखा सके।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistan-is-beaten-between-america-and-iran" target="_blank">America Iran के बीच पिटा पाकिस्तान, अब इजरायल करेगा हमला</a></h3><h2>केप ऑफ गुड होप को पार करके भारत के तट पर पहुंचा जहाज</h2><div>साल 1498 वास्कोडि गामा अपने जहाजों के साथ भारत के तट पर पहुंचे। कालीकट जो आज केरल में कोजीकोट है। यह पहली बार था कि कोई यूरोपियन समुद्री रास्ते से भारत पहुंचा था। अफ्रीका केप ऑफ गुड होप को पार करते हुए उस जमाने में भारत से आने वाले मसाले यूरोप में सोने जितने कीमती थे। काली मिर्च, लौंग, दालचीनी, जायफल यह सब चीजें भारत से अरब व्यापारियों के जरिए जमीनी रास्ते से पहले फारस की खाड़ी या लाल सागर तक जाती थी। फिर वहां से मिस्र और इटली के वेनिस शहर तक। वेनिस के व्यापारी इन मसालों को पूरे यूरोप में बेचते थे। इस पूरी सप्लाई चेन में अरब व्यापारी और वेनिस के सौदागर बिचोलिए थे और यह बिचोलिए इतना मुनाफा कमाते थे कि जब तक मसाले यूरोप पहुंचते उनकी कीमत कई गुना बढ़ चुकी होती थी। वास्कोडिगामा की यात्रा ने पुर्तगाल की राजधानी लिसबन को एक आईडिया दिया। लिसबन को यह समझ आ गया कि अगर वह समुद्री रास्ते पर कंट्रोल कर ले तो बिचौलियों को काटकर सीधे मसालों का व्यापार किया जा सकता है। और इसके लिए उसे जमीन पर राज करने की जरूरत भी नहीं है। बस समुद्र के कुछ अहम ठिकानों पर कब्ज़ा चाहिए था।&nbsp;</div><h2>तीनों जगह समुद्री रास्तों पर कंट्रोल</h2><div>पुर्तगाल के राजा मैनुअल ने 1505 में एक प्लान बनाया और इस प्लान में तीन जगहें थी। पहला अदन जो लाल सागर के मुहाने पर है ताकि मिस्र और अलेक्जेंड्रिया जाने वाले व्यापार को रोका जा सके। दूसरा था होर्मुज जो फारस की खाड़ी के मुहाने पर है ताकि बैरूद और फारस जाने वाला रास्ता बंद हो और तीसरा मलक्का जो आज के मलेशिया में है ताकि चीन के साथ होने वाले व्यापार पर कंट्रोल हो सके। तीनों जगह समुद्री रास्तों के चोक पॉइंट थी। मतलब ऐसे तंग रास्ते जहां से होकर गुजरे बिना कोई जहाज आगे नहीं जा सकता। इन तीनों पर कब्जा करो तो हिंद महासागर का पूरा व्यापार तुम्हारे हाथ में। और इन तीनों में सबसे अहम था होर्मुज। होर्मुज एक छोटा सा टापू है फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच। आज यह ईरान का हिस्सा है। लेकिन उस जमाने में यह एक अलग छोटी सी सल्तनत थी जिसका अपना राजा था। यह राजा सफाविद ईरान के शाह इस्माइल को टैक्स देता था। हॉर्मूस उस वक्त दुनिया के सबसे अमीर व्यापारिक ठिकानों में से एक था और एक फारसी कहावत थी कि अगर दुनिया एक अंगूठी है तो होर्मुज उसमें जड़ा हीरा है और इसकी वजह भी थी कि यहां से बहुत सारी चीजें गुजरती थी। भारत से आने वाले मसाले, कपड़े, इंडोनेशिया से आने वाली लौंग और जायफल, फारस से जाने वाला रेशम, बहरीन से आने वाली मोती और सबसे जरूरी अरब और फारस से भारत जाने वाले युद्ध के घोड़े। यह घोड़े वाला हिस्सा बहुत अहम है क्योंकि इसका संबंध सीधे भारत से है। उस जमाने में भारत के दक्कन में कई सल्तनतें थी। बहमनी सल्तनत जो बाद में पांच छोटी सल्तनतों में बंट गई और विजयनगर साम्राज्य इन सबको लड़ाई के लिए अच्छी नस्ल के घोड़े चाहिए थे। भारत में जो देसी नस्ल के घोड़े मिलते थे, वह दक्कन की भीषण गर्मी में भारी भक्तबंद सिपाही को लेकर ज्यादा देर तक नहीं दौड़ सकते थे। अरबी और फारसी घोड़े इस काम के लिए कहीं बेहतर थे। तो भारत के राजा भारी कीमत देकर अरब और फारस से घोड़े मंगाते थे। पुर्तगाली व्यापारी नूनीस ने लिखा है कि 16वीं सदी के पहले हिस्से में विजयनगर का राजा हर साल होर्मुज के रास्ते से करीब 13,000 घोड़े इंपोर्ट करता था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-makes-a-strong-offer-to-india-ready-to-give-a-huge-discount-on-lng" target="_blank">भारत को रूस ने दिया तगड़ा ऑफर, LNG पर बंपर छूट देने को तैयार !</a></h3><h2>पुर्तगालियों ने हॉर्मूज पर करीब 107 साल राज किया</h2><div>पुर्तगालियों ने हॉर्मूज पर सीधा राज नहीं किया। लोकल राजा अपनी जगह बना रहा लेकिन असली कंट्रोल पुर्तगालियों के पास था। राजा को टैक्स देना होता था। शुरू में सालाना सोने के सिक्के दिए जाते थे। बाद में पुर्तगालियों ने पूरी कस्टम ड्यूटी ही अपने हाथ में ले ली और सबसे अहम चीज थी कार्तताज़ सिस्टम। कार्तताज़ एक तरह का लाइसेंस था या यूं कहें कि समुद्री पासपोर्ट। हिंद महासागर में कोई भी जहाज चलाना हो तो उसे पुर्तगालियों से यह कारतताज़ लेना पड़ता था। । पुर्तगालियों ने हॉर्मूस पर करीब 107 साल राज किया। लेकिन धीरे-धीरे उनकी पकड़ कमजोर होती गई। एक तरफ ऑटोमन साम्राज्य ने&nbsp; में हॉर्मूस पर हमला किया। हालांकि वह हमला नाकाम रहा। दूसरी तरफ सफाविद ईरान के शाह अब्बास जो 1588 से 1629 तक सत्ता में रहे उन्होंने पुर्तगालियों से बहुत नाराजगी रखी। 1615 में बंदर आवास जो हॉर्मूस के सामने सामुद्रिक तट पर था वो भी ले लिया गया। लेकिन हॉर्मूस लेने के लिए शाह अब्बास को नेवी चाहिए थी और सफावेद ईरान के पास मजबूत नेवी नहीं थी। यही एंट्री होती है ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की। अंग्रेज उस वक्त फारस के रेशम के व्यापार में दिलचस्पी रखते थे।</div><h2>भारत की सैन्य ताकत की सप्लाई लाइन</h2><div>होर्मुज सिर्फ मसालों का रास्ता नहीं था। यह भारत की सैन्य ताकत की सप्लाई लाइन भी थी। जो भी हॉर्मोंस को कंट्रोल करेगा वो भारत जाने वाले घोड़ों को भी कंट्रोल कर सकता था। मसालों को भी, रेशम को भी और सोना चांदी के फ्लो को भी। पुर्तगालियों ने यह बात बहुत अच्छे से समझ ली थी और साल 1507 जुलाई का महीना आया। अफोंसो द अल्बुकरर्क नाम का एक पुर्तगाली जनरल छह जहाजों और 500 सिपाहियों के साथ हॉर्मूस की तरफ निकला। अल्बुकरर्क एक तजुर्बेकार फौजी था जिसने अपनी जिंदगी के 10 साल उत्तरी अफ्रीका में मुस्लिमों के खिलाफ लड़ते हुए बिताए थे। होर्मुज पहुंचने से पहले उसने ओमान के तट पर कई शहरों को लूटा। कुरयात, मस्कट, सुहार सब पर हमला किया। कुछ ने हार मान ली, कुछ ने लड़ाई की, लेकिन नतीजा एक ही रहा। सितंबर 1507 में अल्बुकरर्क हॉर्मूस पहुंचा। गोवा को लेकर अल्बूकर्क ने पुर्तगालियों का मुख्यालय बनाया जिसे अस्तादो द इंडिया कहा गया यानी पुर्तगाली भारत की राजधानी। 1511 में उसने मलक्का पर कब्जा किया जो दक्षिण पूर्व एशिया का सबसे बड़ा व्यापारिक बंदरगाह था। 500 साल पहले पुर्तगालियों ने हॉर्मूस इसलिए लिया क्योंकि भारत का व्यापार यहीं से गुजरता था। आज भी भारत अपने तेल का बड़ा हिस्सा फारस की खाड़ी से इंपोर्ट करता है। हॉर्मोस बंद होने का मतलब है भारत की एनर्जी सप्लाई पर सीधा असर।&nbsp;</div><h2>होर्मुज पर ईरान का नया प्लान क्या है?</h2><div>शुरुआत में तो यह जंग ईरान के लिए सर्वाइवल की लड़ाई थी। लेकिन अब ईरान इसे एक बड़े मौके की तरह देख रहा है। यही वजह है कि ईरान अब स्टेट ऑफ हॉर्मोस पर अपना दबदबा बढ़ाकर इसका फायदा उठाना चाहता है। इस हफ्ते पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत होने वाली है। लेकिन दोनों देशों के बीच भरोसे की भारी कमी है। ईरान का मानना है कि पहले ही दिन इजराइल ने शर्तों को तोड़ दिया। अमेरिका अब यह कह रहा है कि ईरान यूरेनियम इनरचमेंट नहीं कर सकता। जबकि ईरान के प्रपोजल में ऐसा कुछ भी नहीं था। 10 अप्रैल को दोनों पक्ष पाकिस्तान में होंगे। परमानेंट सीज फायर और डील पर बात होगी। वाइट हाउस ने यह कंफर्म कर दिया है कि अमेरिका की तरफ से वाइस प्रेसिडेंट जेडी वंस मिडिल ईस्ट में अमेरिका के राजदूत स्टीवट कॉफ और ट्रंप के दामाद जेरिट कुशनर होंगे। ईरान की तरफ से संसद के अध्यक्ष मोहम्मद बागेर कालबा का नाम सामने आ रहा है। इस मीटिंग को पाकिस्तान होस्ट कर रहा है। पाकिस्तान के मीडिएटर होने पर भी कई वजह गिनाई जा रही हैं। जैसे वो ईरान के साथ 900 कि.मी. सीमा शेयर करता है। ईरान के बाद दुनिया भर में सबसे ज्यादा शिया मुस्लिम जो है वो पाकिस्तान में रहते हैं। पाकिस्तान में अमेरिका का कोई मिलिट्री बेस नहीं है जो ईरान के लिए ट्रेडिबल स्पेस बताया जा रहा है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 13:40:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/place-from-where-india-was-conquered-do-you-know-story-of-strait-of-hormuz</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/10/india_large_1340_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका के लिए ईरान से अहम ये छोटा देश, शांतिवार्ता छोड़ जहां प्रचार करने पहुंचे वेंस, इस चुनाव पर रूस-EU दोनों की नजर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/small-nation-holds-greater-significance-for-the-us-than-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका के उपराष्ट्रपति जे डी वांस हंगरी पहुंचे हैं, जहां जल्द ही बड़ा चुनाव होने वाला है। वे वहां के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बान का समर्थन करने गए हैं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और उनकी टीम चाहते हैं कि ऑर्बान चुनाव क्योंकि वे उनकी सोच, राष्ट्रवाद, सख्त इमीग्रेशन&nbsp; और पारंपरिक मूल्यों के करीब है। विक्टर ऑर्बान, ने 2010 से सत्ता में है और मजबूत नेता माने जाते है। पीटर माज्यार, जो पहले ऑर्बान के करीबी थे, पर अब उनके खिलाफ खड़े हैं। मैग्यार के मुद्दे पर जनका का समर्थन जुटा रहे हैं। हंगरी का चुनाव न केवल उस देश के लिए, बल्कि पूरे यूरोप और वैश्विक राजनीति के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। प्रधानमंत्री विक्टर ओर्बान की नीतियों के कारण हंगरी का यूरोपीय संघ (EU) के साथ अक्सर टकराव रहता है। उन पर लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर करने का आरोप है, जिसकी वजह से EU ने हंगरी की अरबों डॉलर की फंडिंग रोक दी है। यदि चुनाव के बाद वहां सत्ता परिवर्तन होता है, तो हंगरी और यूरोप के संबंधों में नई गर्माहट आ सकती है और रुकी हुई आर्थिक मदद मिलने का रास्ता साफ हो सकता है, जिससे पूरे यूरोप की एकता मजबूत होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy" target="_blank">कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?</a></h3><h2>नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है हंगरी</h2><div>रूस-यूक्रेन युद्ध के नजरिए से भी यह चुनाव काफी अहमियत रखता है। हंगरी, जो कि नाटो और ईयू दोनों का सदस्य है, ओर्बान के नेतृत्व में रूस के प्रति थोड़ा नरम रुख अपनाता रहा है। उन्होंने कई बार यूक्रेन को दी जाने वाली सैन्य मदद और रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों में अड़ंगा डाला है। ऐसे में चुनाव का परिणाम यह तय करेगा कि भविष्य में यूक्रेन को मिलने वाली यूरोपीय मदद कितनी आसान होगी। अगर नई सरकार आती है, तो हंगरी का झुकाव पूरी तरह पश्चिम की ओर हो सकता है, जो रूस के लिए एक कूटनीतिक झटका होगा।</div><h2>ट्रंप क्यों चाहते है ऑर्वान जीतें?</h2><div>टूप और उनकी टीम मानती है कि ऑर्बान ने एक ऐसा मॉडल बनाया है जिसमें मजबूत नेता, कम इमिग्रेशन और 'नेशनलिस्ट' सोच होती है। वे चाहते हैं कि यूरोप मे ऐसे ही और नेता आएँ। इसलिए अमेरिका (ट्रंप के प्रभाव वाला पक्ष) ऑर्बान को जिताना चाहता है।</div><h2>ऑर्वाच की जीत में रूस</h2><div>रूस भी चाहता है कि ऑर्बान सत्ता में रहे, क्योंकि वे रूस के खिलाफ कड़े कदम (जैसे पाबंदिया) रोकते रहे है। यूक्रेन को मिलने वाली मदद में अड़चन डालते है। रूस के लिए ऑर्बान यूरोप के अंदर एक मजबूत साथी है। वैश्विक स्तर पर हंगरी की राजनीति अब अमेरिका और रूस जैसी बड़ी शक्तियों के बीच शक्ति संतुलन का केंद्र बन गई है। एक तरफ जहां रूस और चीन हंगरी के जरिए यूरोप में अपना प्रभाव बनाए रखना चाहते हैं, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगी चाहते हैं कि हंगरी पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों और पश्चिमी गठबंधन का साथ दे। सरल शब्दों में कहें तो, इस चुनाव का नतीजा केवल हंगरी की किस्मत नहीं बदलेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि यूरोप की सुरक्षा और कूटनीति में रूस का हस्तक्षेप कितना कम या ज्यादा होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan" target="_blank">ट्रंप ने दिया मौका, भारत के गहरे दोस्त देश में घुसने की तैयारी में चीन, अपना Airspace अचानक इस बड़े प्लान के लिए किया बंद?</a></h3><h2>यूक्रेन और यूरोप क्या चाहते है?</h2><div>यूक्रेन चाहता है कि ऑर्बान हारे, क्योकि वे उसके खिलाफ बोलते रहे है। यूरोपियन यूनियन (EU) भी उनसे परेशान है, क्योंकि ऑर्बान कई फैसलों में रुकावट डालते है। अगर माज्यार जीतते है, तो ईयू और यूक्रेन को राहत मिलेगी।</div><h2>चुनाव में तनाव क्यों है?</h2><div>जासूसी और लीक के आरोप लग रहे है गैस पाइपलाइन के पास विस्फोट जैसी घटनाएं हुई है सरकार और विपक्ष एक-दूसरे पर साजिश के आरोप लगा रहे है। ऑर्बान ने 16 साल में सिस्टम को अपने हिसाब से मजबूत किया है और वे कभी नहीं हारे। अगर वे हारते है और सत्ता छोड़ने से मना करते है, तो बड़ा राजनीतिक संकट हो सकता है। इसलिए यह चुनाव अमेरिका, रूस, यूक्रेन के लिए भी अहम है।</div><div>बहरहाल, चुनाव का नतीजा यह तय करेगा कि हंगरी अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को सुधारकर EU के साथ तालमेल बिठाएगा या अपनी अलग राह पर चलते हुए गठबंधन में दरार पैदा करेगा। यदि नई सरकार आती है, तो रूस पर प्रतिबंध लगाने और यूक्रेन को सैन्य सहायता देने के यूरोपीय फैसलों में आने वाली बाधाएं खत्म हो सकती हैं। विक्टर ओर्बान के सत्ता में बने रहने से रूस को यूरोप के भीतर एक भरोसेमंद सहयोगी मिलता रहेगा, जबकि सत्ता परिवर्तन मास्को के कूटनीतिक प्रभाव को कमजोर कर देगा। हंगरी का चुनाव यह निर्धारित करेगा कि पश्चिमी सैन्य गठबंधन (NATO) में एकता बनी रहेगी या हंगरी के "रूस-हितैषी" रुख के कारण अमेरिका को अपनी सुरक्षा रणनीति बदलनी पड़ेगी। सत्ता में बदलाव से हंगरी को EU से मिलने वाली अरबों यूरो की रुकी हुई फंडिंग मिल सकती है, जिससे न केवल हंगरी की अर्थव्यवस्था संभलेगी बल्कि पूरे यूरोप की आर्थिक एकजुटता भी बढ़ेगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:06:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/small-nation-holds-greater-significance-for-the-us-than-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/9/significance_large_1306_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप&nbsp; ने जो डेडलाइन दी थी वो तो गुजर चुकी है। जिस हमले को लेकर उन्होंने दावा किया था वो हमला भी नहीं हुआ। बैकफुट पर वो आ गए हैं और सब की नजरें इस वक्त उन देशों पर टिकी हुई हैं जो देश युद्ध में इनवॉल्व हैं। अमेरिका का क्या रुख होगा? डॉनल्ड ट्रंप अब कौन सा फैसला लेंगे। हर कोई इसी पर नजर गड़ाए हुए हैं। बहरहाल जब डेडलाइन क्रॉस होनी थी आज सुबह 5:30 बजे तक उससे पहले एक बड़ी खबर आई और वो ये कि ईरान के ऑयल अब खारक आइलैंड पर हमला किया गया है। गल्फ कंट्रीज में इस वक्त बवाल मचा हुआ है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान को धमकी दी थी कि अगर उसने डील नहीं की और होर्मुज समुद्री मार्ग नहीं खोला तो ईरान पर इतने हमले करेंगे कि वह पाषाण युग में चला जाएगा। लेकिन कुछ ही घंटे बाद अचानक से सीजफायर का ऐलान हो जाता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-finally-agreed-only-after-china-intervened" target="_blank">China ने मनाया तब जाकर माना ईरान, पाकिस्तान नहीं जिनपिंग के दखल से हुआ सीजफायर</a></h3><h2>कभी कुछ न करके भी देखो</h2><div>आज आपको 2019 में चर्चित हुए एक ऐड की याद दिलाते हैं। इस विज्ञापन में दिखाया गया है कि युवक कैडबरी 5स्टार चॉकलेट बार का आनंद ले रहा है, तभी महिला उससे अपनी छड़ी उठाने के लिए कहती है जो उससे गलती से गिर गई थी, जिस पर वह हां कह देता है लेकिन कुछ नहीं करता। फिर बुजुर्ग महिला छड़ी उठाने के लिए उठती है। ठीक उसी क्षण, एक विशाल पियानो उस बेंच पर गिरता है जहाँ वह कुछ देर पहले बैठी थी। इसके बाद वह युवक को धन्यवाद देती है कि उसने कुछ नहीं किया, क्योंकि इसी वजह से उसकी जान बच गई। विज्ञापन चॉकलेट उत्पाद की नई टैगलाइन के साथ समाप्त होता है- कभी कुछ न करके भी देखो&nbsp; और 5 स्टार खाओ। कुछ मत करो। ऐसा ही कुछ नजारा इन दिनों एक देश और उसके राष्ट्रपति के साथ मैच कर रहा है। न उस देश ने अपनी फौज उतारी, न कोई बमबारी की और न ही कोई बड़ा बयान देकर फालतू का हो हल्ला मचाया। दुनिया ईरान के मामले में उलझी रही, लेकिन चीन ने चालाकी से किनारे होकर ईरान से सस्ते दाम पर तेल खरीदना जारी रखा। सच तो यह है कि अगर कोई एक देश है जिसने खुद को इस लड़ाई-झगड़े से पूरी तरह दूर रखा है, तो वो चीन ही है। चीन की इसी चुपचाप बैठकर तमाशा देखो वाली नीति की आजकल पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। मशहूर मैगजीन द इकोनॉमिस्ट ने तो इसे अपने कवर पेज पर छापा है। उन्होंने चीन की इस चाल को एक पुरानी कहावत के जरिए समझाया है: जब आपका दुश्मन खुद अपनी बर्बादी का रास्ता चुन रहा हो या गलती कर रहा हो, तो उसे टोककर उसकी गलती सुधारने की कोशिश कभी मत करो। चीन बस वही कर रहा है। दूसरों को उलझते देख रहा है और खुद चुपचाप अपना फायदा निकाल रहा है।</div><h2>जिनपिंग ने खुलकर कुछ नहीं बोला</h2><div>जब मिडिल ईस्ट में अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच जंग तेज हुई, तो सबको लगा था कि दुनिया की बड़ी ताकतें भी इसमें कूदेंगी। लेकिन चीन ने खुद को इससे बिल्कुल दूर रखा। उसकी प्रतिक्रिया बहुत ठंडी रही; यहाँ तक कि राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने इस लड़ाई पर सार्वजनिक रूप से एक शब्द भी नहीं कहा। वह बस चुपचाप बैठकर तमाशा देखते रहे। अमेरिका को लगा था कि वह ईरान की सरकार बदल देगा और उसके परमाणु प्रोग्राम को रोक देगा, लेकिन उल्टा वह खुद एक कभी न खत्म होने वाली जंग में फंस गया। नतीजा क्या निकला? अमेरिका पर युद्ध का भारी कर्ज चढ़ गया, खाड़ी देशों के साथ उसके रिश्तों में खटास आ गई और अपने ही साथी (नाटो) देशों के साथ अनबन शुरू हो गई। चीन के लिए इससे बेहतर स्थिति और क्या हो सकती थी!&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/germans-were-speaking-english-putin-snapped-at-them" target="_blank">अंग्रेजी बोल रहे थे जर्मनी के लोग, पुतिन ने हड़काया, क्यों चौंक गया भारत!</a></h3><h2>चीन पर 'द इकोनॉमिस्ट' का कवर</h2><div>इस बात को 'द इकोनॉमिस्ट' के कवर पर बहुत ही शानदार ढंग से दिखाया गया है। इसकी हेडलाइन असल में एक ऐसा कथन है, जिसका श्रेय आमतौर पर फ्रांसीसी सम्राट नेपोलियन बोनापार्ट को दिया जाता है। सैन्य संदर्भ में, इसका मूल अर्थ यह है कि जब आपका विरोधी कोई गलती कर रहा हो या कोई भारी पड़ने वाला कदम उठा रहा हो, तो ऐसे में बीच में दखल देने के बजाय, चुपचाप उसे देखते रहना ही ज़्यादा समझदारी होती है। कवर इमेज भी प्रतीकात्मक है। इसमें चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग एकदम साफ़ दिखाई दे रहे हैं, जबकि डोनाल्ड ट्रंप की इमेज धुंधली है। यह इस बढ़ती हुई वैश्विक सोच को दिखाता है कि एक अस्थिर दुनिया में बीजिंग को फ़ायदा हो सकता है, जबकि वॉशिंगटन मध्य-पूर्व की उथल-पुथल में उलझा हुआ है। जब ट्रंप ने यह टकराव शुरू किया था, तब उनके मन में यह बात नहीं थी। अमेरिका के राष्ट्रपति का मानना ​​है कि तेल के बहाव को कंट्रोल करने से दुनिया के मंच पर ताक़त मिलती है। वेनेज़ुएला में राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को पकड़ने और देश के विशाल कच्चे तेल के भंडार पर कब्ज़ा करने के लिए उनका साहसी ऑपरेशन इस बात के काफ़ी संकेत देता है। ईरान के ऊर्जा बहाव को अमेरिका के कंट्रोल में लाना उनकी लिस्ट में अगला काम था। ट्रंप इसका इस्तेमाल चीन के साथ सौदेबाज़ी के लिए एक हथियार के तौर पर कर सकते थे, जो ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। दोनों नेताओं के बीच अगले महीने बीजिंग में एक मुलाक़ात तय है। लेकिन ईरान ज़्यादा मज़बूत साबित हुआ। उसने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बंद करके अपना सबसे बड़ा तुरुप का पत्ता खेल दिया है; यह एक ऐसा अहम जलमार्ग है जिससे दुनिया का पाँचवाँ हिस्सा तेल और गैस गुज़रता है। इस तरह, ईरान ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को बंधक बना लिया है।</div><h2>ऑयल क्राइसिस से बीजिंग ने खुद को कैसे बचाया&nbsp;</h2><div>अगर हॉर्मुज जलडमरूमध्य बंद भी हो जाए, तो चीन को उससे खास फर्क नहीं पड़ेगा। ईरान का खास दोस्त होने के नाते चीन को पिछले कुछ हफ्तों में 'शैडो फ्लीट्स' (पुरानी और बिना बीमा वाली जहाजों की फौज) के जरिए लाखों बैरल ईरानी तेल मिला है। यही नहीं, चीन ने समझदारी दिखाते हुए आठ अलग-अलग देशों से तेल खरीदना शुरू कर दिया है, जिसका उसे अब बड़ा फायदा मिल रहा है। असल में, बीजिंग सालों से ऐसे ही बुरे वक्त की तैयारी कर रहा था। उसने तेल का बड़ा भंडार जमा कर लिया है, अपने देश में उत्पादन बढ़ा दिया है और साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी (सौर और पवन ऊर्जा) में भी भारी निवेश किया है। चीन के इस बढ़ते तेल भंडार के पीछे 'टीपॉट' रिफाइनरियों का बड़ा हाथ है। ये छोटी और निजी रिफाइनरियां हैं, जिनका इस्तेमाल चीन अमेरिकी पाबंदियों से बचने के लिए ईरान और रूस से सस्ता कच्चा तेल मंगाने के लिए करता है। ये रिफाइनरियां सरकारी कंपनियों से अलग, स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच, इन्हीं छोटी रिफाइनरियों ने चीन की अर्थव्यवस्था को डगमगाने नहीं दिया। इसके अलावा, चीन की अर्थव्यवस्था दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और वहाँ बिकने वाली नई कारों में से आधी इलेक्ट्रिक गाड़ियाँ (EVs) हैं। इस वजह से चीन को पेट्रोल-डीजल की उतनी किल्लत महसूस नहीं हो रही है और उसके फ्यूल पंपों पर कोई दबाव नहीं पड़ा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-takes-major-action-amidst-the-war-entire-world-is-stunned" target="_blank">युद्ध के बीच चीन का बड़ा एक्शन! पूरी दुनिया हैरान!</a></h3><h2>चीन का मौन रिएक्शन</h2><div>इस तरह, इस उथल-पुथल से खुद को अलग रखकर, चीन ने खुद को एक स्थिर विकल्प के तौर पर पेश किया है। वह एक लंबी चाल चल रहा है। उसने इस संघर्ष में अमेरिका या इज़रायल को सीधे तौर पर हमलावर भी नहीं बताया है। चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने पिछले महीने कहा था, ताकत से ही सही साबित नहीं होता। विशेषज्ञों के मुताबिक, इसके पीछे की सोच यह है कि भू-राजनीतिक तनावों से ऐसे अवसर पैदा होने दिए जाएं, जिनका इस्तेमाल चीन बाद में अपनी स्थिति को मज़बूत करने के लिए कर सके। शायद इसी स्थिर छवि की वजह से पाकिस्तान जो अमेरिका और ईरान के बीच एक अप्रत्याशित मध्यस्थ के तौर पर उभरा है—अपने 'हर मौसम के दोस्त' चीन का समर्थन पाने के लिए तुरंत उसके पास पहुँचा। इससे चीन को शांतिदूत की भूमिका निभाने का एक मौका मिल गया। हालाँकि, शेखी बघारने वाले बयानों के बजाय, चीन ने युद्धविराम और 'स्ट्रेट ऑफ़ होर्मुज़' को फिर से खोलने के लिए पाँच-सूत्रीय योजना जारी की। बीजिंग ने न तो वॉशिंगटन का सामना किया और न ही उसकी आलोचना की। उसने एक व्यावहारिक अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी बने रहना चुना। तब से, चीन ने अपनी कूटनीति को और तेज़ कर दिया है, जिससे अमेरिका को काफ़ी नागवारी गुज़री है। एक लंबा युद्ध चीन के लिए भी फ़ायदेमंद नहीं है। तेल संकट के कारण अस्थिर हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था, दुनिया भर में चीन की सामान बेचने की क्षमता पर गंभीर चोट पहुँचाएगी।</div><h2>चीन अब दुनिया पर राज करेगा?</h2><div>सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस लड़ाई ने अमेरिका का ध्यान ईस्ट एशिया (चीन के पड़ोस) से भटका दिया है। अगर ईरान का संकट इसी तरह चलता रहा, तो अमेरिका को अगले कई सालों तक खाड़ी देशों की 'आग बुझाने' में ही अपनी ताकत लगानी पड़ेगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अमेरिका 'इंडो-पैसिफिक' इलाके (जहाँ चीन अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है) पर उतना ध्यान नहीं दे पाएगा। साथ ही, हॉर्मुज जलडमरूमध्य का भविष्य क्या होगा, यह कोई नहीं जानता। ऐसे में जो देश अपनी ऊर्जा सुरक्षा को लेकर डरे हुए हैं, वे मजबूरी में चीन की 'ग्रीन टेक्नोलॉजी' (सोलर और इलेक्ट्रिक तकनीक) की ओर खिंचे चले आएंगे। चीन के लिए ईरान के झगड़े में पड़ने से कहीं ज्यादा जरूरी यह है कि भविष्य की दुनिया पर उसका कब्जा हो। बीजिंग, अमेरिका के इस अंधाधुंध सैन्य हमले का इस्तेमाल भारत और ब्राजील जैसे 'ग्लोबल साउथ' के देशों को एक कड़ा संदेश देने के लिए भी कर सकता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि वाशिंगटन (अमेरिका) सिर्फ अपनी दादागिरी चलाना जानता है और दूसरों के मामलों में दखल देकर तबाही मचाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 13:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/8/us_large_1343_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ट्रंप ने दिया मौका, भारत के गहरे दोस्त देश में घुसने की तैयारी में चीन, अपना Airspace अचानक इस बड़े प्लान के लिए किया बंद?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया अभी ईरान, इजराइल और अमेरिका के जंग की गवाह बनी हुई है। इस युद्ध को एक महीना से ज्यादा बीत चुका है। लेकिन कहीं से राहत की कोई अच्छी खबर नहीं आ रही। इस बीच चीन ने चौंकाते हुए बिना कोई वजह बताए 40 दिनों के लिए समुद्र के ऊपर के हवाई क्षेत्र के एक बड़े हिस्से को बंद कर दिया है। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या चीन ने मिडिल ईस्ट का फायदा उठाकर ताइवान को घेरने की तैयारी कर ली है? ताइवान पर कब्जा करने की तैयारी कर ली है। क्योंकि बता दें कि अचानक 40 दिनों के लिए चाइना ने अपना एयर स्पेस बंद करने का ऐलान किया है। ताइवान के पास युद्धपोत देखे गए हैं और बिना किसी ऐलान के यह सैन्य हलचल हो रही है। क्या यह सिर्फ एक अभ्यास है या फिर किसी बड़े एक्शन की तैयारी। सबसे बड़ा अलार्म जो है वो यह है कि चीन ने समुद्र के ऊपर एक बड़े हिस्से का एयर स्पेस लगभग 40 दिनों के लिए बंद करने का ऐलान कर दिया है और यह कोई सामान्य बात नहीं है। आमतौर पर बता दें कि एक से 3 दिन के छोटे अभ्यास होते हैं। लेकिन 40 दिन ये सीधे-सीधे इशारा करता है बड़े पैमाने पर सैन्य अभ्यास या फिर नई मिसाइल या फिर वॉर टेक्नोलॉजी टेस्ट का और यह नोटम जो है यानी कि नोटिस टू एयर मिशनंस के जरिए जारी किया गया है जो पायलट्स को खतरे की चेतावनी देता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/did-china-steal-iran-uranium-right-under-the-noses-of-the-us-and-israel" target="_blank">दम है तो बीजिंग आकर ले जाओ! अमेरिका-इजरायल की नाक के नीचे से चीन उठा ले गया ईरान का यूरेनियम?</a></h3><h2>40 दिनों के लिए अपना एयर स्पेस बंद किया</h2><div>रिपोर्ट्स के मुताबिक ईरान युद्ध के बीच चीन ने 27 मार्च से 6 मई तक 40 दिनों के लिए अपना एयर स्पेस बंद किया है। यह इलाका ताइवान से भी बड़ा है और शंघाई के उत्तर दक्षिण में फैला हुआ है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या चीन का यह कदम ताइवान पर कब्जे की चीन की कोई कोशिश तो नहीं है? एक अमेरिकी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक चीन का यह कदम असामान्य लग रहा है। आमतौर पर एयर शो या छोटे अभ्यासों के लिए एक से तीन दिन के लिए एयर स्पेस को ब्लॉक रखा जाता है। लेकिन 40 दिन तक के लिए ऐसा करना किसी बड़े पैमाने पर युद्धाभ्यास या नई मिसाइल तकनीक के परीक्षण की ओर भी इशारा करता है। वहीं मीडिया रिपोर्ट्स यह भी बता रहे हैं कि ताइवान के राष्ट्रीय रक्षा मंत्रालय ने भी कुछ ऐसी हरकतें देखी हैं जिससे चीन पर अविश्वास बढ़ गया है।</div><h2>अमेरिका के लिए आई नई मुश्किल</h2><div>रिपोर्ट्स के मुताबिक ताइवान के रक्षा मंत्रालय को स्थानीय समय अनुसार सोमवार सुबह 6:00 बजे तक अपने क्षेत्रीय जल के आसपास चीन के तीन फाइटर जेट्स, छह नौसैनिक जहाजों और दो सरकारी जहाजों के आने की जानकारी भी मिली। हालांकि बीजिंग ने इस इलाके में किसी भी तरह के योद्धाभ्यास के ऐलान का जिक्र नहीं किया है। जिससे अनिश्चितता और बढ़ गई है। वहीं इसे अमेरिका के लिए एक नई मुश्किल भी माना जा रहा है। चीन का एयर स्पेस बंद होने से जासूसी विमान और मिलिट्री फ्लाइट्स प्रभावित हो सकते हैं। यह सब तब हो रहा है जब अमेरिका ईरान से भीड़ों में लगा हुआ है। चीन के इस कदम से अमेरिकी सेना को अब एशिया में भी नई चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। जितना अनिश्चित</div><div>डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका हो चुका है, उससे कई गुना ज्यादा अनिश्चित चीन पहले से है। शी चिनफिंग ने इस संशय को और बढ़ाया है। फिर भी बहुत कुछ ईरान युद्ध के परिणामों पर निर्भर करेगा। और ईरान में क्या होगा, अभी कुछ कहना मुश्किल है, पर इतना साफ है कि इस युद्ध ने अमेरिका को पश्चिम एशिया में इस कदर फंसा दिया है, जिससे हिंद महासागर अशांत है और इंडो-पैसिफिक में एक वैक्यूम बनता दिख रहा है। स्वाभाविक है कि चीन इसका लाभ उठाने की कोशिश करेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/balochs-declare-that-if-they-become-independent-they-will-give-india-three-amazing-things" target="_blank">बलोचों का ऐलान, अगर हुए आजाद तो भारत को देंगे 3 जबरदस्त चीजें !</a></h3><h2>ताइवान को अपना हिस्सा मानता है चीन</h2><div>ताइवान को अपना हिस्सा मानता है। जबकि ताइवान खुद को अलग देश की तरह चलाता है। और यह विवाद बता दें चाइना और ताइवान का यह नया नहीं है। 1949 यानी कि 1949 से दोनों के रास्ते अलग हुए। लेकिन चीन का लक्ष्य कभी नहीं बदला। रीयनिफिकेशन यानी ताइवान को अपने साथ जोड़ना। रिपोर्ट्स यह कहती है कि चीन 2027 तक इस मिशन को पूरा करना चाहता है। और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या चीन युद्ध की तैयारी कर रहा है? संकेत काफी खतरनाक है। एयर स्पेस को ब्लॉक कर देना, नेवी की तैनाती एयरफोर्स एक्टिव बिना घोषणा के मूवमेंट्स हुई जा रही है। एक्सपर्ट्स यह मानते हैं कि यह जॉइंट ऑपरेशन ड्रिल हो सकती है। जहां एयर, नेवी और मिसाइल फोर्स एक साथ काम कर रहे हो। यानी असल युद्ध से पहले की रिहर्सल। सबसे बड़ी बात जो है वो इसकी टाइमिंग है। जब दुनिया का ध्यान मिडिल ईस्ट पर है। अमेरिका ईरान में उलझा हुआ है और तभी चीन ने यह कदम उठाया है। यानी डिस्ट्रैक्शन का फायदा चाइना यहां पर उठाना चाहता है। और अब चुपचाप पोजीशन मजबूत करना भी उसका लक्ष्य है। तो क्या चीन सच में ताइवान को घेरने की तैयारी में है या यह सिर्फ दबाव बनाने की एक रणनीति चाइना ने अपनाई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-nuclear-agenda-has-increased-tension-amid-the-war" target="_blank">जंग के बीच चीन के न्यूक्लियर एजेंडे ने बढ़ाई टेंशन, मची दुनिया में खलबली!</a></h3><h2>ताइवान के अंदरूनी मतभेद का फायदा उठाने की कोशिश</h2><div>राजनीतिक विभाजन ताइवान में भी है, जिसका फायदा चीन उठा सकता है। ताइवान में सत्तारूढ़ डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी को चीन अलगाववादी मानता है, जबकि विपक्षी कुओमिंतांग के साथ बेहतर संबंधों की चाह रखता है। हालांकि माओ त्से तुंग की सारी लड़ाई कुओमिंतांग से थी। समय दुश्मन और दोस्त की मनोदशा बदल देता है। अगर चुनाव में कुओमिंतांग सत्ता पाती है तो तनाव कम हो सकता है, लेकिन यदि डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव पार्टी जीतती है तो जोखिम बढ़ेगा। 2027 में अमेरिका और ताइवान में चुनाव होंगे, जबकि चिनफिंग अपने चौथे कार्यकाल के अंत की ओर खिसक रहे होंगे। 79 वर्ष की उम्र तक पहुंचते-पहुंचते वह ताइवान मुद्दे पर निर्णायक कदम उठाने के लिए अधीर हो सकते हैं। हां, यह प्रश्न तब भी प्रासंगिक हो सकता है कि क्या चीन के पास ताइवान पर सफल आक्रमण करने की क्षमता है? चीन में भी सब कुछ अच्छा नहीं है। हाल ही में उन 5 शीर्ष जनरलों को हटा दिया गया, जो 2022 में ही नियुक्त किए थे।&nbsp;</div><div>बहरहाल, एक अमेरिकी पत्रिका में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि ताइवान को अपनी लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा के लिए चीन के बढ़ते खतरे के बीच सेल्फ डिटरेंस यानी आत्मनिरोधक क्षमता विकसित करनी होगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि यह रणनीति सैन्य आक्रामकता बढ़ाने की नहींबल्कि संभावित हमले की लागत इतनी बढ़ाने की है कि चीन कम्युनिस्ट पार्टी के लिए ताइवान पर हमला करना बेहद महंगा और जोखिम भरा हो जाए। देखना होगा कि चीन ने जो अपना एयर स्पेस बंद किया है वो किस मकसद से किया है और जल्द ही चीन के इस कदम का खुलासा भी हो जाएगा।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 13:23:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/china-preparing-to-enter-india-close-friend-country-suddenly-closed-airspace-for-big-plan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/7/china_large_1323_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कोरिया से वियतनाम, अफगानिस्तान से ईरान...किसी मोड़ पे हारा, किसी मोड़ पे जीत गया, अमेरिका के युद्धनीति  वाले इतिहास का एक और दौड़ बीत गया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-korea-to-vietnam-from-afghanistan-to-iran-us-war-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया का रहनुमा, लोकतंत्र का प्रहरी, आतंकवाद का दुश्मन और खुद को सुपरपॉवर मुल्क मानने वाले देश के लुट-पिट कर लौटने की दास्तां है। कोरिया के पहाड़ों से लेकर वियतनाम के जंगलों और मध्य पूर्व के तपते रेगिस्तानों तक, अमेरिकी सेना की भूमिका हमेशा चर्चा और विवाद का केंद्र रही है। अक्सर यह बहस छिड़ती है कि इन लड़ाइयों का असली मकसद लोकतंत्र की रक्षा था या फिर अपने भू-राजनीतिक दबदबे को बनाए रखना। अमेरिका का इतिहास सैन्य हस्तक्षेपों और रणनीतिक संघर्षों की एक लंबी गाथा रहा है। दुनिया भर के तमाम युद्धों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराना अमेरिका की विदेश नीति का एक अभिन्न हिस्सा बन चुका है। अमेरिका का दूसरे देशो में दखलअंदाज और भूमिका को लेकर सवाल अमेरिका के भीतर और बाहर, दोनों जगह भी उठते रहे है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/kashmiris-donations-worth-crores-will-not-go-to-iran" target="_blank">सोना, जेवर और बर्तन...ईरान नहीं जाएगा कश्मीरियों का करोड़ों का चंदा, हिल गई दुनिया !</a></h3><h2>कोरिया युद्ध में मारे गए 33,000 से ज्यादा यूएस सोल्जर्स</h2><div>25 जून नॉर्थ कोरिया पीपल जमी यानी बक 75000 सोल्जर्स 38 पैरेलल को क्रॉस करके साउथ कोरिया पर आक्रमण कर देते हैं और यही से कोल्ड वॉर की पहली मिलिट्री तस्सेल की शुरुआत होती है है इसकी इंटेंसिटी को देखकर ऐसा लगता है की मानो इसको तीसरे विश्व युद्ध में तब्दील होने से कोई नहीं रोक पाएगा। यहां एक तरफ था नॉर्थ कोरिया जिसको यूएसएसआर का सपोर्ट हासिल था तो दूसरी तरफ साउथ कोरिया जिसको उस सपोर्ट कर रहा था। कोल्ड वॉर एशिया में कोरियन पेनिनसुला के बीच से होकर गुजारा रहा था। सोवियत संघ चाहता था की कम्युनिज्म नॉर्थ कोरिया से आगे बढ़कर जापान साउथ ईस्ट एशिया और बाकी पूरे एशिया में फैल जाए। लेकिन अमेरिका को ये किसी भी कीमत पर मंजूर नहीं था। अमेरिका और यूएसएसआर की इसी जद्दोजहदका नतीजा हमें सबसे पहले कोरियन वॉर के रूप में देखने को मिला। अगस्त 1945 में अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर एटॉमिक बॉन्ब गिरा दिए और जापान इस न्यूक्लियर हमले से पुरी तरह टूट गया। इसी के साथ वर्ल्ड वॉर 2 में जापान ने सरेंडर कर दिया और ये वॉर खत्म हो गई। जापान को कोरियर समेत अपनी सभी कॉलोनी को छोड़ना पड़ा। अब कोरिया जापान के चंगुल से तो आजाद हो गया, लेकिन उसके लिए तो असली युद्ध अब शुरू होने जा रहा था। असल में जैसे ही जापान ने कोरिया में सरेंडर किया वैसे ही सोवियत संघ ने नॉर्थ की तरफ से और अमेरिका ने साउथ की तरफ से आकर इसको कैप्चर कर लिया। इन दोनों ने अपनी सहमति से इस पेनिनसुला को 38 पैरेलल के अगेंस्ट दो हिस्सों में बांट दिया। नार्थ वाला हिस्सा सोवियत और साउथ वाला अमेरिका के पास चला गया। यह केवल 5 सालों के लिए एक टेंपरेरी अरेंजमेंट किया गया कमीशन के हाथों में सौंप दिया गया 1943 में हुई गए कॉन्फ्रेंस में ही यह तय कर लिया गया था की 5 साल बाद कोरिया को आजाद कर दिया जाएगा।1948 में नॉर्थ कोरिया यानी डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कोरिया और साउथ कोरिया यानी रिपब्लिक ऑफ कोरिया के नाम से दो अलग-अलग नेशंस में डिवाइड हो गए नॉर्थ कोरिया में कम्युनिज्म की सपोर्टर किम एल्सन और साउथ कोरिया में केपीटलाइज्म की सपोर्टर सिंह मैन रे प्रेसिडेंट बने। इन दोनों ही लीडर्स को अमेरिका और सोवियत संघ के द्वारा जानबूझकर चुना गया था और दोनों ने ही इन लीडर्स को अपने अपने रीजंस में हीरो की तरफ प्रमोट किया। धीरे-धीरे अमेरिकन और सोवियत ट्रूप्स को यहां से विद्रोह कर लिया गया। लेकिन यह स्ट्रगल अभी भी खत्म नहीं हुआ था। अमेरिका ने दक्षिण कोरिया की मदद के लिए सेना भी भेजी। माना जाता है कि करीब 17,89,000 अमेरिकी सैनिको ने इसमें हिस्सा लिया। एक आकड़े के मुताबिक 33,000 से ज्यादा अमेरिकी सैनिक मारे गए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/how-did-the-american-pilot-survive-for-24-hours-in-iran" target="_blank">7000 फीट की ऊंची पहाड़ी...अमेरिकी पायलट ईरान में 24 घंटे कैसे जिंदा रहा?</a></h3><h2>वियतनाम संग 20 सालों तक चली जंग, 2 हजार टन बम गिराए&nbsp;&nbsp;</h2><div>1955 में उत्तरी वियतनाम ने जब दक्षिणी भाग पर सैन्य जमावड़ा शुरू किया तो अमेरिका ने कम्युनिज्म के फैलने से रोकने के लिहाजे से सैन्य कार्रवाई छेड़ दी। 1967 तक वियतनाम में अमेरिकी फौजियों की संख्या 5 लाख को पार कर गई। लेकिन 1969 आते-आते घरेलू दबाव की वजह से अमेरिकी ने वियतनाम से बाहर निकलने का मन बना लिया। 20 सालों की जंग के दौरान कई बार संधि पर समझौते हुए और सब बेकार हो गए। 1972 में अमेरिका और उत्तरी वियतनाम के बीच एक बार फिर बातचीत हुई और वो भी बेनतीजा रही। अमेरिकी सैनिकों पर बमबारी के बाद उसने भी अपने बी -52 विमान को मैदान में उतार दिया था। अमेरिका के 200 बी-52 विमानों ने 12 दिनों के भीतर उत्तरी वियतनाम पर 2 हजार टन बम गिराए थे। इसे अमेरिकी वायु सेना का अब तक का सबसे भीषण और चौंकाने वाला हमला माना जाता है, जिसे ऑपरेशन लाइनरबैकर-II का नाम दिया गया था। जनवरी 1973 में पेरिस में अमेरिका, उत्तरी वियतनाम और दक्षिण वियतनाम व वियतकॉन्ग के बीच एक शांति समझौता हुआ। इसी समझौते की आड़ में अमेरिकी वियतनाम से अपनी सेना हटाना चाहता था। इसके बाद वियतनाम में भी वही हुआ जैसा कि एक साल पहले अफगानिस्तान में देखने को मिला। अमेरिकी फौज के पूरी तरह से निकलने से पहले ही 29 मार्च 1973 को उत्तरी वियतनाम ने दक्षिणी वियतनाम पर हमला बोल दिया। दो साल बाद 1975 में 30 अप्रैल को कम्युनिस्ट वियतनाम की फौज साइगॉन में घुस गई और वहां बचे अमेरिकियों को आनन-फानन में भागना पड़ा।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/america-blew-up-its-own-mc-130j-aircraft-the-enemy-had-fun" target="_blank">America ने उड़ा दिए अपने ही MC-130J एयरक्रॉफ्ट, दुश्मन ने लिए मजे</a></h3><h2>इराक युद्ध एक 'रणनीतिक भूल'&nbsp;</h2><div>1990 और 2003 के इराक युद्ध अमेरिकी विदेश नीति के दो सबसे अलग और विवादास्पद अध्याय हैं। जहाँ पहला युद्ध अंतरराष्ट्रीय सहमति पर आधारित था, वहीं दूसरा युद्ध 'अधूरे तथ्यों' और 'अति-महत्वाकांक्षा' की भेंट चढ़ गया। 1990 के खाड़ी युद्ध में सद्दाम हुसैन के कुवैत पर कब्जे के बाद, इराक पीछे नहीं हटा और अमेरिका ने ऑपरेशन डेजर्ट स्टॉर्म शुरू किया। इसका खर्च अरब देशों ने भी उठाया। लेकिन साल 2003 में जॉर्ज बुश प्रशासन ने 2003 में इराक पर अटैक किया। कहा गया कि सद्दाम के पास सामूहिक विनाश के हथियार है और उसके अल कायदा से भी रिश्ते बताए गए। हालाकि ऐसा कुछ भी नहीं निकला। एक बार अमेरिकी प्रशासन आलोचना का शिकार हुआ। इराक में पैदा हुए सत्ता के शून्य&nbsp; का फायदा उठाकर कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हुईं। जानकारों का मानना है कि आईएसआईएस (इस्लामिक स्टेट) की जड़ें इसी युद्ध के बाद फैली अराजकता में थीं। इस युद्ध ने न केवल इराक को बर्बाद किया, बल्कि पूरे मध्य पूर्व में ईरान के प्रभाव को बढ़ा दिया, जिसे अमेरिका अपना सबसे बड़ा प्रतिद्वंदी मानता है।</div><h2>अफगानिस्तान से लुट-पिट कर पहली फुर्सत में रुकसत</h2><div>दो दशकों तक अफगानिस्तान में सैन्य अभियान छेड़ने वाले अमेरिका ने साल 2021 में वहां के हालात से पल्ला झाड़ लिया। अफगानिस्तान से अमेरिकी सैनिकों की हड़बड़ी में हुई वापसी के बाद पैदा हुए हालात ने लोगों को 1975 के वियतनाम युद्ध की याद दिला दी है। पूर्वी एशिया के इस देश में अमेरिका कम्युनिज्म के खात्मे के दाखिल तो हुआ लेकिन परिस्थिति ऐसी बनी कि उसे उल्टे पांव भागना पड़ा। 29 फरवरी 2020 को दुनिया की एक बड़ी ताकत, दुनिया के दरोगा की हैसियत रखने वाला अमेरिका ने दुनिया के एक छोटे से भूभाग में तालिबान के आगे घुटने टेक दिए। अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौते पर मुहर लग गई। समझौते के बाद अमेरिका का लक्ष्य होगा कि वो चौदह महीने के अंदर अगानिस्तान से सभी बलों को वापस बुला ले। 14 अप्रैल को अमेरिका सेना की वापसी का ऐलान किया गया था। उसके बाद अब 15 अगस्त को यानी 124 दिनों में तालिबान ने अफगान सरकार को घुटनों पर ला दिया। तालिबान ने ही फिर काबुल की सत्ता पर कब्जा कर लिया। माना जाता है कि इस युद्ध में $2.313 ट्रिलियन डॉलर खर्च हुए और 243,000 लोगों की जान गई। इसके अलावा अमेरिका ने खुद को सोमालिया, यमन और लीबिया जैसे युद्धों के बीच भी खुद को पाया। राष्ट्रपति ट्रंप ने अपने प्रचार के दौरान कहा था कि वो अंतहीन युद्धों के खिलाफ है। लेकिन अब लगता है कि उनकी अगुआई में अमेरिका ऐसे ही एक युद्ध में फिर उलझ गया है, जहा से निकासी का रास्ता भी नहीं दिख रहा।</div><div>बहलहाल, जहाँ 'खाड़ी युद्ध' ने उसकी सैन्य शक्ति का लोहा मनवाया, वहीं वियतनाम और अफगानिस्तान जैसे संघर्षों ने यह साबित कर दिया कि केवल आधुनिक हथियारों के दम पर किसी देश की विचारधारा या जमीनी हकीकत को नहीं बदला जा सकता। अंततः, ये युद्ध न केवल अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर बोझ बने, बल्कि दुनिया भर में उसकी नैतिक साख पर भी एक बड़ा सवालिया निशान छोड़ गए हैं। आज भी यह सवाल बरकरार है कि क्या अमेरिका दुनिया का 'चौकीदार' बनने की कोशिश में खुद को और दुनिया को और अधिक संकट में डाल रहा है?</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 13:09:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-korea-to-vietnam-from-afghanistan-to-iran-us-war-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/6/afghanistan_large_1309_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Iran में तो नहीं, लेकिन ट्रंप के White House में जरूर हो रहा रिजीम चेंज, जानिए कैसे?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/not-in-iran-but-regime-chang-is-definitely-happening-in-the-white-house-know-how]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विनय सितापति की लिखी किताब हॉफ लॉयन में एक वाक्या का जिक्र है&nbsp; जब पीवी नरसिंह राव आर्थिक सुधारों को लेकर डॉ. मनमोहन सिंह से कहते हैं अगर हम सफल होते हैं, तो श्रेय मुझे मिलेगा और अगर हम असफल होते हैं, तो आपको जाना पड़ेगा। ऐसा ही कुछ भारत से किलोमीटर दूर अमेरिका के व्हाइट हाउस में देखने को मिला। जब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि यदि ईरान के साथ समझौता सफल होता है तो उसका श्रेय वह खुद लेंगे, लेकिन अगर बातचीत असफल रहती है तो उसकी जिम्मेदारी जेडी वेंस पर डाली जाएगी। यह बयान ऐसे समय आया है जब जेडी वेंस बैकचैनल बातचीत (गोपनीय कूटनीतिक संपर्क) और संघर्ष विराम (सीज़फायर) के प्रयासों में अधिक सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। लेकिन इन सब से इथर अमेरिका में इस वक्त अलग ही उथल पुथल का माहौल है। करना था ईरान में रिजीम चेंज लेकि ऐसा मालूम पड़ता है कि ये सब अमेरिका के व्हाइट हाउस में होने लगा। युद्ध के बीच अमेरिका के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रडी जॉर्ज को हटा दिया गया वही नहीं कई सारे टॉप जनरल हटा दिए गए। क्या ट्रंप अभी से इसकी तैयारी कर रहे हैं कि अगर ईरान से लड़ाई लंबी चली हार का सामना करना पड़ गया तो अमेरिका की पब्लिक का सामना कैसे करेंगे इसलिए बहाने खोजे जा रहे हैं कि नए जनरल लाए जा रहे हैं जो अब ट्रंप के आदेशों का पालन करेंगे और युद्ध में जीत दिलाएंगे। बदलाव ट्रंप की कैबिनेट में भी हो रहा है। कई लोगों के हटाने की चर्चाएं चल रही हैं। लेकिन पहले बात सेना की करते हैं। क्या अमेरिका के राष्ट्रपति और सेना के बीच ईरान पर हमला को लेकर एक राय नहीं थी। जमीनी चढ़ाई को लेकर एक राय अब भी नहीं। अमेरिका की सेना मोर्चे पर है और मुख्यालय में अलग ही मोर्चा खुल गया है। जिसका काम था ईरान में लीडरशिप चेंज करना। उसी के भीतर लीडरशिप चेंज का गेम खुल गया है। यह व्हाइट हाउस की चीफ ऑफ स्टाफ सूजी वाइल्स हैं। ट्रंप के सहयोगियों से अपील कर रही हैं कि अमेरिका की जनता क्या सोच रही है इसके बारे में राष्ट्रपति को सच बताओ। उन्हें गुलाबी तस्वीरें दिखाना बंद करो कि इस युद्ध का आर्थिक और राजनीतिक असर नहीं है। आलम ये है कि&nbsp; जब अमेरिकी सैन्य प्रमुख रैंडी जॉर्ज समेत कई अधिकारियों को हटाए जाने को रिजीम चेंज करार दिया है। दक्षिण अफ्रीका में मौजूद ईरान एम्बेसी ने एक इन सभी अधिकारियों की तस्वीरों पर क्रास का चिन्ह लगातार लिखा कि 'रिजीम चेंज हैपन्ड सक्सेसफुली'। इसके साथ ही उन्होंने मागा और एक हंसने वाला इमोजी भी बनाया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/balochs-declare-that-if-they-become-independent-they-will-give-india-three-amazing-things" target="_blank">बलोचों का ऐलान, अगर हुए आजाद तो भारत को देंगे 3 जबरदस्त चीजें !</a></h3><h2>ट्रंप के खिलाफ 50 शहरों में नो किंग्स प्रोटेस्ट</h2><div>50 शहरों में ट्रंप के खिलाफ नो किंग्स प्रदर्शन हुए। 80 लाख से अधिक लोग जमा हुए। क्या तब भी ट्रंप को पता नहीं चला कि लोग उनसे नाराज हैं? आम जनता के बीच उनकी रेटिंग लगातार गिर रही है। इकोनॉमिस्ट के सर्वे के अनुसार पिछले हफ्ते के मुकाबले 1.1% और गिर गई। अमेरिका के कितने सैनिक घायल हुए इसका सटीक आंकड़ा स्पष्ट नहीं है। उन्हें भी यह बात परेशान कर रही है कि घायलों की संख्या कहीं ज्यादा तो नहीं। अगर सही संख्या सामने आएगी तो ईरान के सामने अमेरिका की सेना के कमजोर पड़ने की तस्वीरें साफ-साफ दिखने लग जाएंगी। अमेरिका का ही अखबार है इंटरसेप्ट। इसके पत्रकार नेक्टर्स की रिपोर्ट है कि खाड़ी में हुए युद्ध में अब तक 750 सैनिक या तो हताहत हुए हैं या घायल हुए हैं। लेकिन पेंटागन मानने को तैयार नहीं। घायलों की संख्या कम बताई जा रही है। इंटरसेप्ट के अनुसार 27 मार्च को सऊदी अरब के प्रिंस सुल्तान एयरबेस पर ईरान के हमले में कम से कम 15 अमेरिकी सैनिक घायल हुए। ईरान की सेना दावा करती है कि उसके हमलों में 800 अमेरिकी सैनिकों की मौत हुई है। ट्रंप ने राष्ट्र के नाम संबोधन में 13 सैनिकों के मारे जाने की बात कही। गौर करने वाली बात ये है कि घायलों या मरने वालों की संख्या की स्वतंत्र जांच नहीं हो पा रही। अमेरिका के लड़ाकू विमानों पर हमला होता है तब भी अमेरिका स्वीकार नहीं करता कि ईरान ने टारगेट किया। कुवैत का मान लेता है कि उसने गलतफहमी में उसके तीन-तीन विमान गिरा दिए। लेकिन ईरान का स्वीकार नहीं करता। कुछ दिन पहले एनबीसी ने रिपोर्ट किया कि युद्ध की अपडेट के नाम पर ट्रंप को रोजाना हमले की हाईलाइट का 2 मिनट लंबा वीडियो दिखाया जाता है। जिन हमलों को लेकर ट्रंप इतनी बड़े-बड़े दावे करते हैं। अमेरिका की सेना मोर्चे पर है और वाशिंगटन में सेना के भीतर अलग मोर्चा खुल गया है। रक्षा सचिव पीट हेक्सेथ चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ रडीए जॉर्ज को बाहर का रास्ता दिखा देते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-major-statement-the-downing-of-us-aircraft-will-not-affect-talks-with-iran" target="_blank">Donald Trump का बड़ा बयान: अमेरिकी विमानों के गिरने से ईरान के साथ बातचीत पर नहीं पड़ेगा असर</a></h3><h2>ट्रंप के इन 2 सिपहसालारों को पद से क्यों धोना पड़ा हाथ</h2><div>राष्ट्रपति ट्रंप अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में अपने करीबियों को निकालने के पक्ष में नहीं थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि ऐसा करने से विरोधियों की जीत होगी। लेकिन ईरान के साथ युद्ध, इमिग्रेशन विवाद और गिरती अप्रूवल रेटिंग उन्हें फैसला बदलने पर मजबूर कर दिया। युद्ध के दबाव और गिरती रेटिंग के कारण ट्रंप अब उन लोगों को हटा रहे हैं जो जनता की नजरों में विवादित बन चुके हैं, ताकि वो अपनी गिरती साख को बचा सकें।</div><div><b>1. क्रिस्टी नोएम (पूर्व होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी)-</b> उनके कार्यकाल में ICE एजेंटों द्वारा एलेक्स प्रेट्टी और रेनी गुड नाम के अमेरिकी नागरिकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई। नोएम ने संवेदनशीलता दिखाने के बजाय उन्हें 'घरेलू आतंकवादी' कह दिया, जिससे जनता में भारी गुस्सा फैल गया। जुलाई 2025 में टेक्सास की बाढ़ और चक्रवात हेलेन के दौरान उनके विभाग का काम बहुत खराब रहा, जिससे सरकार की काफी किरकिरी हुई। उन पर आरोप लगा कि उन्होंने ट्रंप की अनुमति के बिना अपने करीबियों को 220 मिलियन डॉलर (करीब 1800 करोड़ रुपये) का विज्ञापन कॉन्ट्रैक्ट दे दिया। 5 मार्च, 2026 को उन्हें पद से हटा दिया गया।</div><div><b>2. पाम बोंडी (पूर्व अटॉर्नी जनरल)- </b>उन्होंने न्याय विभाग की पूरी तस्वीर को ही बदल कर रख दिया और उनका मुख्य फोकस ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन के दुश्मनों को टारगेट करना था। ईरान युद्ध के बाद ट्रंप की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई (नेगेटिव 23% तक)। ऐसे में ट्रंप को अपनी छवि सुधारने के लिए प्रशासन में बड़े बदलाव करने पड़े और बोंडी जैसे 'आक्रामक' चेहरों को किनारे करना पड़ा।&nbsp; हालांकि, द इकोनॉमिस्ट की एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रम्प के पुराने विरोधियों, जैसे कि पूर्व एफबीआई निदेशक जेम्स कोमी और न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिटिया जेम्स (दोनों ही मामलों में अमेरिकी अदालतों ने मुकदमा खारिज कर दिया था) पर मुकदमा चलाने में बोंडी की विफलता और एपस्टीन फाइलों के जारी होने के बाद उत्पन्न स्थिति को संभालने में उनकी अक्षमता ने व्हाइट हाउस में बढ़ते असंतोष को जन्म दिया। अंततः, 2 अप्रैल, गुरुवार को ट्रम्प ने पाम बोंडी को बर्खास्त कर दिया, जिससे वह एक महीने के भीतर पद से हटाई जाने वाली दूसरी कैबिनेट सदस्य बन गईं।&nbsp;</div><h2>ट्रंप के पर्ज की इनसाइड स्टोरी</h2><div>अमेरिका के रक्षा सचिव पीट हेगसेथ का मानना है कि अमेरिकी सेना अपनी असली ताकत खो रही थी क्योंकि वह 'डाइवर्सिटी' और 'इक्विटी' जैसे सामाजिक मुद्दों पर ज्यादा ध्यान दे रही थी। उनका मानना है कि सेना का एकमात्र लक्ष्य युद्ध जीतना होना चाहिए, न कि सामाजिक बदलाव लाना। इसी सोच के तहत उन्होंने जनरल सीक्यू ब्राउन और एडमिरल लिसा फ्रेंचेती जैसे अधिकारियों को हटाया, जिन्हें वह उदारवादी नीतियों का चेहरा मानते थे। हेगसेथ का तर्क है कि सेना को सॉफ्ट अफसरों की नहीं, बल्कि कठोर योद्धाओं की जरूरत है। उन्होंने न केवल जनरलों को बर्खास्त किया, बल्कि अश्वेत, महिला और अल्पसंख्यक अधिकारियों की पदोन्नति&nbsp; पर भी रोक लगा दी है। आंकड़ों के मुताबिक, इस 'सफाई अभियान' ने रक्षा विभाग के ऊपरी स्तरों पर विविधता को काफी कम कर दिया है ताकि एक खास तरह की आक्रामक लीडरशिप तैयार की जा सके। ईरान के साथ चल रहे युद्ध में अमेरिका को वह सफलता नहीं मिल रही है जिसकी उसे उम्मीद थी। ऐसे में ट्रंप और हेगसेथ को ऐसे अधिकारियों की जरूरत है जो उनके आदेशों का बिना किसी सवाल के पालन करें। 3 अप्रैल, 2026 को आर्मी चीफ ऑफ स्टाफ जनरल रैंडी जॉर्ज और अन्य वरिष्ठ अफसरों को हटाना इसी रणनीति का हिस्सा था। हेगसेथ सेना में ऐसे वफादार लोगों को बैठाना चाहते हैं जो उनके और राष्ट्रपति ट्रंप के विजन को आंख मूंदकर लागू करें। पेंटागन के कुछ लोग हेगसेथ को डम्ब मैकनामारा कह रहे हैं, क्योंकि उन्हें डर है कि युद्ध के बीच में इतने अनुभवी जनरलों को हटाना सेना के मनोबल को तोड़ सकता है। लेकिन हेगसेथ के लिए यह 'शुद्धिकरण' (पर्ज) जरूरी है। दरअसल, रॉबर्ट मैकनामारा 1960 के दशक में (वियतनाम युद्ध के दौरान) अमेरिका के रक्षा सचिव थे। उन्हें एक अत्यधिक बुद्धिमान लेकिन जिद्दी व्यक्ति माना जाता था।</div><h2>किन अधिकारियों पर गिरी गाज?<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h2><table class="table table-bordered"><tbody><tr><td>&nbsp;<b>अधिकारी<span style="white-space: pre;">	</span></b></td><td>&nbsp;<b>पद<span style="white-space: pre;">	</span></b></td><td>&nbsp;<b>हटाने का मुख्य कारण</b></td></tr><tr><td>&nbsp;जनरल सीक्यू ब्राउन</td><td>&nbsp;ज्वाइंट चीफ्स चेयरमैन</td><td>&nbsp;'Woke' सेना का प्रतीक माने जाना।</td></tr><tr><td>&nbsp;जनरल रैंडी जॉर्ज</td><td>&nbsp;थल सेना प्रमुख</td><td>&nbsp;स्वतंत्र सैन्य सलाह के बजाय वफादार लीडर की तलाश।</td></tr><tr><td>&nbsp;जनरल विलियम ग्रीन जूनियर</td><td>आर्मी टॉप चैपलिन</td><td>&nbsp;सेना के नैतिक और धार्मिक नेतृत्व को विचारधारा के अनुसार ढालना।</td></tr><tr><td>जनरल जेफरी क्रूस</td><td>&nbsp;DIA प्रमुख</td><td>&nbsp;खुफिया जानकारी को प्रशासन की युद्ध नीतियों के साथ सिंक करना।</td></tr></tbody></table><h2>ट्रंप के निशाने पर अगला कौन?</h2><div>क्रिस्टी नोएम और पाम बोंडी की बर्खास्तगी वाशिंगटन डीसी में व्यापक उथल-पुथल की शुरुआत मात्र हो सकती है। द अटलांटिक, पॉलिटिको और द गार्जियन की रिपोर्टों से संकेत मिलता है कि ट्रंप के कई और वफादारों को जल्द ही बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है। एक अज्ञात प्रशासनिक अधिकारी ने पॉलिटिको को बताया वह बहुत गुस्से में हैं और लोगों को हटाने वाले हैं। जिन लोगों के निशाने पर होने की आशंका है, उनमें एफबीआई निदेशक काश पटेल (जिनके निजी खातों को हाल ही में ईरान से जुड़े एक समूह ने हैक कर लिया था), श्रम सचिव लोरी चावेज़-डेरेमर, वाणिज्य सचिव हॉवर्ड लटनिक, सेना सचिव डैनियल ड्रिस्कॉल और राष्ट्रीय खुफिया निदेशक तुलसी गैबार्ड शामिल हैं। दो वरिष्ठ हस्तियों ने ट्रंप के सीधे गुस्से का सामना किया है। 31 मार्च, 2026 को राष्ट्रपति ने व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव कैरोलिन लीविट की ओर एक ब्रीफिंग के दौरान रुख किया और सीधे तौर पर उनसे कहा कि आप बहुत बुरा काम कर रही हैं और साथ ही मजाक में पूछा कि क्या उन्हें रखना चाहिए। बाद में उन्होंने कहा कि शायद फिलहाल वह उन्हें रख लेंगे। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, ट्रंप ने मजाक में ईरान के साथ युद्ध समाप्त करने के लिए तेहरान के साथ समझौते में धीमी प्रगति के लिए उपराष्ट्रपति जेडी वैंस को दोषी ठहराया और चेतावनी दी अगर ऐसा नहीं होता है, तो मैं जेडी वैंस को दोषी ठहराऊंगा।</div><div>बहरहाल, मध्यावधि चुनाव नजदीक आ रहे हैं और ईरान युद्ध लंबा खिंचता जा रहा है, ऐसे में सत्ता परिवर्तन की रफ्तार धीमी होने के कोई संकेत नहीं दिख रहे हैं। ऐसा लगता है कि आखिरकार सत्ता परिवर्तन हो ही गया है, लेकिन ईरान में नहीं ट्रंप के वाशिंगटन डीसी में।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:41:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/not-in-iran-but-regime-chang-is-definitely-happening-in-the-white-house-know-how</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/4/iran_large_1241_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मॉस्को में तय होगा खाड़ी युद्ध का भविष्य, पुतिन का मास्टरस्ट्रोक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/future-of-the-gulf-war-will-be-decided-in-moscow-putin-masterstroke]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मिडिल ईस्ट में जो जंग जारी है उसमें भले तीन देश उलझे हुए हैं। ईरान, इजराइल और अमेरिका। साथ ही साथ खारी के देश भी उलझे हुए हैं। लेकिन इसका सबसे बड़ा विनर सबसे बड़ा बाजीकर्ता जो कहते हैं यानी बाजीगर वो रूस है। उसके सबसे बड़ा फायदा जो है व्लादमीर पुतिन को मिल रहा है। व्लादमीर पुतिन जो चार से पांच साल से यूक्रेन में जंग लड़ रहे हैं और जो धैर्य दिखा रहे थे युद्ध खत्म नहीं हो रहा था। अमेरिका यूक्रेन की मदद कर रहा था। अब ऐसा लग रहा है कि बदला लेने की बारी जो है पुतिन की है। यानी क्या पुतिन तय करेंगे कि ईरान, इजराइल जंग किस ओर जाएगा और ट्रंप क्या करेंगे? यानी कि जो दूसरा विश्व युद्ध या तीसरा विश्व युद्ध कहा जा रहा था या जिसे तीसरा शीत युद्ध कहा जा रहा था उसके बाजीगर जो है पुतिन है। अब वो नियम डिसाइड करेंगे कि किधर जाने वाला है और ट्रंप का भविष्य क्या होगा। ट्रंप के सामने पुतिन ने वह शर्त रखी है जिसके बारे में कहा जा रहा है कि ट्रंप के लिए मना करना मुश्किल है और ट्रंप शायद वह मान भी गए हैं। हालांकि इतनी जल्दी वो नहीं मानेंगे समय लगेगा लेकिन उन्हें आखिरकार ट्रंप की वो बात माननी ही होगी जो पिछले हफ्ते पुतिन ने अपने दूत के हवाले से दिया था।&nbsp; ट्रंप ईरान में हमले करके या जंग छेड़ के बुरी तरीके से फंस गए हैं। उनको बाहर निकलने का मौका नहीं मिल रहा है। एक फेस सेविंग नहीं मिल रही है कि कैसे इस जंग से बाहर निकले। वो सत्ता में जब दूसरी बार आए थे तो अपने कैंपेन में अपने मेगा सपोर्टर्स को यह कह करके आए थे कि वो दूसरी जंग या कोई नई जंग की शुरुआत नहीं करेंगे। लेकिन जिस तरीके से इजराइल के कहने पर ईरान पे हम उन्होंने हमले किए और उसके बाद जब स्टेट ऑफ हार्मोस बंद हुआ लगातार उनकी जो आपूर्ति गोला बारूद की है मिसाइल की है उनके जो सहयोगी देश है खारी के उन पे हमले शुरू हुए चीखें निकली तो इससे निकलने का मौका नहीं मिल रहा है आखिर बूट्स ऑन द ग्राउंड करेंगे तो उसके भी बॉडी बैग्स तो आएंगे जो इराक में हुआ था अफगानिस्तान में हुआ था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/who-shot-down-the-russian-plane-on-the-iranian-border-putin-found-out" target="_blank">ईरान बॉर्डर पर किसने गिराया था रूस का विमान? पुतिन को पता चल गया, तगड़ा एक्शन शुरू</a></h3><h2>ईरान जंग रुकवाने को रूस तैयार</h2><div>क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने गुरुवार को कहा कि रूस ईरान संघर्ष के समाधान में योगदान देने के लिए तैयार है और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन क्षेत्रीय नेताओं से बातचीत जारी रखे हुए हैं। पेस्कोव ने पत्रकारों से कहा कि राष्ट्रपति इन संपर्कों को जारी रखे हुए हैं, और यदि किसी भी तरह हमारी सेवाओं की आवश्यकता होती है, तो हम निश्चित रूप से यह सुनिश्चित करने में अपना योगदान देने के लिए तैयार हैं कि सैन्य स्थिति जल्द से जल्द शांतिपूर्ण मार्ग पर अग्रसर हो। पेस्कोव अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के ईरान युद्ध पर राष्ट्र के नाम दिए गए भाषण और नाटो से अमेरिका को बाहर निकालने पर विचार करने संबंधी उनके अलग बयान के बारे में पूछे गए एक प्रश्न का उत्तर दे रहे थे।</div><div>पेस्कोव ने कहा कि रूस नाटो को एक शत्रुतापूर्ण गठबंधन के रूप में देखता है।</div><h2>पुतिन की क्या शर्ते हैं</h2><div>ईरान की जो युद्ध लड़ने की कला है अब ड्रोन पे की गई है। वर्टिकल युद्ध ईरान ने शुरू कर दिया है। उसके बाद कहा जा रहा है कि ट्रंप और पुतिन के बीच में जो है उनके दूतों के माध्यम से बातचीत हुई है और पुतिन ने कुछ शर्तें रखी हैं। पुतिन ने क्विट प्रोक वाली नीति अपनाई है। यह वो नीति है जिसके तहत एक हाथ दो दूसरे हाथ लो। यानी कि कुछ तुम दो कुछ हम दें। इसके तहत ईरान में जो रूस मदद कर रहा है ईरान को वह मदद मदद बंद कर देगा। अगर ट्रंप&nbsp; यूक्रेन की मदद करना बंद कर देते हैं। यानी कि पुतिन ने कहा कि आप यूक्रेन जंग से हाथ पीछे खीचेंगे। फंडिंग-हथियार देना बंद करेंगे। तो हम भी ईरान को मदद करना बंद करेंगे।&nbsp; ईरान की जो सैन्य ताकत है बहुत हद तक खत्म हो गई है। जिस तरीके से ईरान इजराइली अमेरिकी जहाज फाइटर जेट्स धरले से जाते हैं बिना रडार की नजर में आए हुए बमबारी करते हैं और वापस चले जाते हैं। ईरान को पता तक नहीं चलता क्योंकि उसका एयर डिफेंस सिस्टम पहले ही जून में खत्म हो गया था। इस बार भी पहले ही दिन खत्म हो गया 28 फरवरी को।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/saudi-arabia-upset-with-trump-outspokenness-calls-russia" target="_blank">बड़बोले ट्रंप से बिदका सऊदी अरब, रूस को किया फोन</a></h3><h2>रूस कैसे कर रहा ईरान की मदद</h2><div>वलोडिमिर ज़ेलेंस्की का कहना है कि उनके पास इस बात के सबूत हैं कि रूस ने ईरान को मिसाइल या ड्रोन हमले के लिए उस विमान के सटीक निर्देशांक मुहैया कराए थे, ग्रॉसफेल्ड ने यह बात बताई। ज़ेलेंस्की ने एनबीसी न्यूज़ को राफ सांचेज़ के साथ एक वीडियो इंटरव्यू में बताया कि ईरान द्वारा हमले से कुछ दिन पहले रूस ने सऊदी अरब में प्रिंस सुल्तान बेस की तीन बार सैटेलाइट तस्वीरें ली थीं। लंदन के किंग्स कॉलेज में रूस द्वारा पश्चिम के खिलाफ चलाए जा रहे गुप्त युद्ध और विश्वव्यापी खुफिया अभियानों की एक प्रमुख विशेषज्ञ एलेना ग्रॉसफेल्ड कई प्रभावशाली लेख लिखे हैं, का कहना है कि रूस के इमेजिंग सैटेलाइट AWACS पर ईरानी हमले के लिए सटीक निर्देशांक प्रदान कर सकते थे। चार हफ्ते पहले सऊदी अरब के Prince Sultan Air Base पर हुए एक हमले में अमेरिकी सेना के 26 वर्षीय जवान बेंजामिन पेनिंगटन की मौत हो गई। वे U.S. Army Space and Missile Defense Command में तैनात थे और 1 मार्च को हमले में गंभीर रूप से घायल हो गए थे, जिसके एक सप्ताह बाद उनका निधन हो गया। पेनिंगटन को Global War on Terrorism Service Medal से सम्मानित किया गया था और वे 10 जून 2025 को 1st Space Battalion, 1st Space Brigade में नियुक्त हुए थे।</div><h2>स्पेसएक्स-स्टारलिंक सिस्टम निशाने पर</h2><div>विशेषज्ञ ग्रॉसफेल्ड के अनुसार रूस और ईरान के बीच रक्षा और हथियार तकनीक को लेकर कई दशकों से सहयोग रहा है, खासकर ईरान के मिसाइल विकास कार्यक्रम में। हालांकि अभी तक ऐसा कोई ठोस सबूत नहीं है कि रूसी विशेषज्ञ ईरान को ICBM या एंटी-सैटेलाइट मिसाइल बनाने में सीधे मदद कर रहे हैं, लेकिन अमेरिका सरकार इन बढ़ते रक्षा संबंधों पर नजर बनाए हुए है। अमेरिकी विदेश विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, यूक्रेन पर रूस के हमलों के बाद ईरान ने रूस को ड्रोन, गाइडेड बम, तोपखाने का गोला-बारूद और कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें भेजीं, जिसके बदले रूस ने ईरान को मिसाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स और एयर डिफेंस तकनीक में अभूतपूर्व सहयोग देना शुरू किया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रूस और ईरान मिलकर ऐसे हथियार प्लेटफॉर्म विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं जो SpaceX Starlink सैटेलाइट सिस्टम को निशाना बना सकें।</div><h2>इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक</h2><div>ईरान में अवैध रूप से तस्करी करके लाए गए स्टारलिंक टर्मिनल रखने या इस्तेमाल करने वालों को कड़ी सजा, यहां तक कि मौत की सजा तक का सामना करना पड़ सकता है। ये टर्मिनल उन लोगों के लिए इंटरनेट का जरिया बन रहे हैं जो सरकार द्वारा लगाए गए इंटरनेट ब्लैकआउट के बावजूद दुनिया से जुड़ना चाहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, रूस ने ईरान की मदद की है ऐसे ड्रोन विकसित करने में जो छतों पर छिपाए गए Starlink उपकरणों का पता लगा सकें, साथ ही इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर तकनीक भी दी है जिससे सैटेलाइट और जमीन पर मौजूद रिसीवर के बीच सिग्नल को जाम किया जा सके। विशेषज्ञ ग्रॉसफेल्ड का मानना है कि अगर ईरान इस तकनीक में सफल होता है, तो रूस भी यूक्रेन में अपने युद्ध के दौरान Starlink सिस्टम को निशाना बनाने के लिए इन्हीं तरीकों का इस्तेमाल कर सकता है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 13:53:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/future-of-the-gulf-war-will-be-decided-in-moscow-putin-masterstroke</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/3/gulf_large_1353_19.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईसा मसीह भारतीय मूल के थे?  Shroud of Turin क्या है, DNA रिपोर्ट में हुआ कौन सा बड़ा खुलासा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-shroud-of-turin-what-is-the-major-revelation-in-the-dna-report]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इटली की एक चर्च में रखा है एक सूती कपड़ा। मान्यता है कि यह कपड़ा ईसा मसीह का पवित्र कफ़न है। अब वैज्ञानिकों ने इस कपड़े के जरिए डीएनए टेस्ट किया है। टेस्ट रिपोर्ट की मानें तो इसमें भारतीय पुरुष के अंश पाए गए हैं। जिसके बाद एक सवाल पर नए सिरे से बहस छिड़ गई है। ईसा मसीह कहां के थे? खबर आते ही सोशल मीडिया एक शब्द से पट गया है। शाउट ऑफ टूरिन। आखिर यह श्राउड ऑफ टूरिन या पवित्र कफ़न क्या है? क्या इसमें वाकई ईसा मसीह की शक्ल दिखाई देती है? क्या ईसा मसीह भारतीय मूल के थे? तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करते हैं। टूरिन श्राव जिसे हिंदी में टूरिन का कफ़न कहा जाता है। सूती कपड़े का लंबा टुकड़ा है लगभग 4.4 मीटर लंबा और 1.1 मीटर चौड़ा। ईसाई धर्म के लोगों की मान्यता है कि यह वही कपड़ा है जिसमें सूली पर चढ़ाए जाने के बाद ईसा मसीह के शरीर को लपेटा गया था। दावा किया जाता है कि इस कपड़े पर एक धुंधला डिजाइन दिखता है जो शरीर पर चोट खाए किसी पुरुष जैसा लगता है। यह दावा है। मान्यता यह है कि यह ईसा मसीह का शरीर है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/a-friend-sitting-8000-kilometers-away-will-open-a-treasure-trove-for-india" target="_blank">8000 KM दूर बैठा दोस्त भारत के लिए खोलेगा खजाना! इस गरीब देश से मोदी ने गैस भंडार की कौन सी डील कर ली?</a></h3><h2>भारत कनेक्शन</h2><div>सबसे चौंकाने वाली खोज कपड़े (शराउड) पर पाए गए मानव डीएनए से जुड़ी थी। पौधों और जानवरों के अलावा, यह कपड़ा वर्षों में कई लोगों के संपर्क में आया था। शोध टीम ने पाया कि इस पर कई व्यक्तियों का डीएनए मौजूद है, जिनमें 1978 की शोध टीम भी शामिल है, जिन्होंने इस कपड़े का परीक्षण किया था। शोधकर्ताओं ने लिखा, यह शराउड कई लोगों के संपर्क में आया है, इसलिए इसके मूल डीएनए की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। दिलचस्प बात यह है कि कपड़े पर पाए गए लगभग 40% मानव डीएनए भारतीय वंश (Indian lineage) से संबंधित पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह ऐतिहासिक संपर्कों के कारण हो सकता है या संभव है कि रोमन काल में सिंधु घाटी&nbsp; के आसपास के क्षेत्रों से लिनेन (कपड़ा) आयात किया गया हो। बारकाच्चिया और उनकी टीम ने लिखा ट्यूरिन के शराउड पर मिले डीएनए संकेत देते हैं कि यह कपड़ा भूमध्यसागरीय क्षेत्र में व्यापक रूप से इस्तेमाल या संपर्क में रहा हो सकता है, और संभव है कि इसका धागा भारत में तैयार किया गया हो।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-gabbar-sits-at-the-door-of-tears-america-is-scared-by-this-trump-card" target="_blank">आंसुओं के दरवाजे पर बैठा ईरान का गब्बर, इस तुरुप के इक्के से घबरा गया अमेरिका, Bab al-Mandeb बंद हुआ तब तो मंदी छा जाएगी…</a></h3><h2>डीएनए जांच से मिले नए सुराग</h2><div>ट्यूरिन का कफन हमेशा से एक रहस्य रहा है। कई लोग इसे ईसा मसीह का दफन वस्त्र मानते हैं। हाल ही में हुए डीएनए विश्लेषण ने इसके इतिहास को और भी रोमांचक बना दिया है। वैज्ञानिकों ने जब इस 4.4 मीटर लंबे और 1.1 मीटर चौड़े कपड़े की जांच की, तो उन्हें इस पर इंसानों, जानवरों और पौधों के डीएनए पाए गए। नई रिसर्च में पता चला कि इस कपड़े पर मध्यकाल से लेकर आधुनिक काल तक के डीएनए मौजूद हैं। इसका मतलब है कि दुनिया भर के अलग-अलग लोग और चीजें इस कपड़े के संपर्क में आईं। सबसे चौंकाने वाली बात इस पर मिले पौधों के निशान थे। कपड़े पर इनके डीएनए मिले हैं। इनमें गाजर, टमाटर और आलू जैसी सब्जियों के अलावा अनाज और मिर्च शामिल हैं। इनमें से कई चीजें (जैसे टमाटर और आलू) यूरोप में तब आईं जब खोजकर्ताओं ने अमेरिका और एशिया की यात्राएं शुरू कीं। इससे यह पता चलता है कि यह कपड़ा समय के साथ दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के संपर्क में रहा है और इस पर मौजूद गंदगी या निशान केवल एक जगह के नहीं हैं। आसान शब्दों में कहें तो, इस कपड़े पर मिली 'जेनेटिक मैटेरियल' यह बताती है कि यह सदियों से दुनिया भर में घूमा है या दुनिया भर के लोग इसके पास आए हैं। यह केवल एक प्राचीन वस्तु नहीं, बल्कि इतिहास की एक ऐसी किताब है जिस पर हर दौर ने अपना निशान छोड़ा है।</div><h2>ट्यूरिन के कफ़न का रहस्य</h2><div>कफ़न का इतिहास सदियों से रहस्य बना हुआ है। वैज्ञानिक और शोधकर्ता इसकी उत्पत्ति का सटीक पता लगाने में एकमत नहीं हैं। आनुवंशिकी, पुरातत्व और फोरेंसिक विज्ञान के विशेषज्ञों के साथ-साथ ईसाई अध्ययन के विशेषज्ञ भी इस विषय पर शोध कर रहे हैं। ट्यूरिन का कफ़न आज भी गहन वैज्ञानिक और ऐतिहासिक बहस का विषय है। 2025 के एक अध्ययन में ऐसे ठोस प्रमाण मिले हैं कि कफ़न किसी वास्तविक व्यक्ति के शरीर के संपर्क से नहीं बना था, बल्कि वास्तव में मध्ययुगीन धार्मिक कला के रूप में तैयार किया गया था। हाल ही में हुए इस कफ़न के अध्ययन में एक्स-रे विश्लेषण और डीएनए परीक्षण का उपयोग किया गया। शोधकर्ता रेमंड रोजर्स ने निष्कर्ष निकाला कि वैनिलिन परीक्षण से कफ़न की आयु 1300 से 3000 वर्ष के बीच होने का अनुमान लगाया गया है। पडुआ विश्वविद्यालय में यांत्रिक और तापीय मापन के प्रोफेसर गिउलिओ फैंटी ने स्पेक्ट्रोस्कोपिक और तन्यता परीक्षणों का उपयोग किया, जिससे उन्हें भी इसी तरह के निष्कर्ष प्राप्त हुए।</div><div>हालांकि, हालिया शोध कफ़न की आयु निर्धारित करने में सहायक नहीं हो सका। रिसर्च में कहा गया कि फिर भी, हमारे निष्कर्ष इस क्षेत्र में एक नया और महत्वपूर्ण योगदान देते हैं, जो सदियों से चले आ रहे सामाजिक, सांस्कृतिक और पारिस्थितिक जुड़ाव द्वारा छोड़े गए जैविक निशानों को पूरी तरह से स्पष्ट करते हैं।</div><h2>सोशल मीडिया पर आए अलग-अलग रिएक्शन</h2><div>सोशल मीडिया ने इस घटनाक्रम को तुरंत नोटिस किया और इंटरनेट पर तीखी प्रतिक्रियाओं की बाढ़ आ गई। एक यूजर ने लिखा, उस समय भारत का अस्तित्व ही नहीं था, और ट्यूरिन का कफ़न ईसा मसीह का कफ़न है। कपड़े के रेशे लेनिन के हैं, जो संभवतः हड़प्पा (किले) से आए थे, जो आज पाकिस्तान में स्थित है। एक अन्य यूजर ने लिखा कि अब अखंड भारत इटली तक फैल जाएगा। एक अन्य यूजर ने लिखा कि क्या ईसा मसीह भारतीय थे? यह भी समझ में आता है कि इज़राइल और भारत के बीच सबसे लंबे ऐतिहासिक संबंध हैं। एक यूजर ने पूछा कि तो कफ़न यीशु का नहीं है, जैसा कि सच्चे ईसाई धर्मग्रंथों के अनुसार कहते हैं। यीशु न तो भारतीय थे और न ही उन्होंने भारत में समय बिताया।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 13:12:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-shroud-of-turin-what-is-the-major-revelation-in-the-dna-report</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/2/shroud_large_1312_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[8000 KM दूर बैठा दोस्त भारत के लिए खोलेगा खजाना! इस गरीब देश से मोदी ने गैस भंडार की कौन सी डील कर ली?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/a-friend-sitting-8000-kilometers-away-will-open-a-treasure-trove-for-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान अमेरिका जंग शांत होने की जगह आग पकड़ती जा रही है। पूरी दुनिया में इस वक्त दो समुद्री ट्रेड रूट्स को लेकर बवाल मचा है। स्टेट ऑफ होर्मूज के पास चल रही जंग से दुनिया पहले ही परेशान थी। लेकिन ईरान के समर्थन में यमन के हूती विद्रोहियों ने भी जंग में कदम रख दिया है। जिसकी वजह से रेड सी में मौजूद बाब अल मंदेव स्ट्रेट के बंद होने का खतरा भी पैदा हो गया है। आपको बता दें कि बाब अल मदेब स्ट्रेट बंद हो गया तो पूरा यूरोप बर्बाद हो सकता है। यह शिपिंग लिंक ही एशिया को यूरोप से जोड़ता है। बाब अल मंदेब स्टेट भारत के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि रूस से आने वाला ज्यादातर तेल यहीं से भारत पहुंचता है। लेकिन जिस वक्त इन दोनों समुद्री रास्तों को लेकर दुनिया दहशत में है। ठीक उसी वक्त भारत ने एक ऐसा रणनीतिक और कूटनीतिक दांव खेल दिया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। भारत अफ्रीका के एक गरीब मगर नेचुरल रिसोर्सेज से भरे देश में ऐसा खेल कर आया है जिसके बारे में एक-एक भारतीय को पता होना चाहिए। भारत ने एक तरफ तो एलपीजी और पेट्रोल की सप्लाई को जारी रखने का शानदार जुगाड़ ढूंढ लिया है। लेकिन इसी के साथ भारत ने दो बेहतरीन ट्रेड रूट्स भी तैयार कर लिए हैं। सबसे पहले जानते हैं कि भारत अब किस नए रूट से एलपीजी गैस ला रहा है। भारत ने एलपीजी गैस के लिए अफ्रीका महाद्वीप में एक नया कतर ढूंढ लिया है। भारत की सरकारी कंपनियां अफ्रीकी देश अंगोला की सरकारी कंपनी सुनानगोल से एलपीजी इंपोर्ट्स शुरू करने जा रही है। अंगोला अफ्रीका का एक गरीब देश जरूर है लेकिन इस देश के पास 11 ट्रिलियन क्यूबिक फीट नेचुरल गैस के भंडार हैं। भारत पहले से ही अंगोला के साथ थोड़ा बहुत गैस और तेल व्यापार करता रहा है। जिससे दोनों देशों के बीच कनेक्शन बना रहे। अब यही कनेक्शन भारत के काम आ रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bangladesh-cries-before-america-help-us-like-india" target="_blank">भारत की तरह हमारी मदद करो, अमेरिका के आगे रोने लगा बांग्लादेश</a></h3><h2>भारत ने नए रास्तों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया</h2><div>भारत का 90% एलपीजी आयात ठप होने की कगार पर है। दिल्ली के गलियारों में हलचल तेज हो गई है। पीएम मोदी खुद मोर्चा संभाले हुए हैं। स्थिति कंट्रोल में रहे उसके लिए लगातार मोदी सरकार काम कर रही है। तमाम देशों से बातचीत चल रही है। पर्दे के पीछे ईरान से बातचीत कर हॉर्मूज से धीरे-धीरे गेट खुलवाकर भारत के जहाज निकलवाए जा रहे हैं। लेकिन क्या तीन से चार चार से पांच जहाजों का आना काफी है? बिल्कुल नहीं। वहीं दूसरी तरफ युद्ध थमता नजर नहीं दिख रहा है बल्कि और भी भयानक होता जा रहा है। अब सवाल यह है कि क्या भारत के करोड़ों घरों के चूल्हे ठंडे पड़ जाएंगे या फिर भारत ने इस संकट का कोई ऐसा मास्टर प्लान तैयार कर लिया है जो दुनिया को हैरान करे। क्योंकि अब भारत की नजरें खाड़ी देशों से हटकर एक नए और अनजान दोस्त पर आकर टिक गई है। दरअसल जब हॉर्मूज के दरवाजे बंद हुए तो भारत ने अपने पुराने दोस्तों और नए रास्तों की ओर हाथ बढ़ाना शुरू कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/dhurandhar-the-revenge-nears-1500-crore-at-the-box-office-in-13-days" target="_blank">बॉक्स ऑफिस पर Dhurandhar: The Revenge का कोहराम! 13 दिनों में ₹1,500 करोड़ के करीब, तोड़े पहले भाग के सभी रिकॉर्ड</a></h3><h2>अर्जेंटीना से लेकर अमेरिका और नॉर्वे तक से गैस मंगाना शुरू</h2><div>भारत ने अर्जेंटीना से लेकर अमेरिका और नॉर्वे से लेकर रूस तक से गैस मंगानी शुरू कर दिया। लेकिन इसमें दूरी और समय बहुत बड़ी चुनौती है। अमेरिका से गैस आने में हफ्तों लग जाते हैं। जब देश में मांग चरम पर है। इतनी दूरी से आने वाली सप्लाई ऊंट के मुंह में जीरे जैसा सामान है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक और चौथा सबसे बड़ा एलएनजी आयातक है। तो ऐसे में सरकार की पूरी मशीनरी इस कोशिश में जुटी है कि किसी भी कीमत पर सप्लाई चेन टूटने ना पाए। कतर और सऊदी अरब जैसे पारंपरिक ठिकानों से संपर्क कटने के बाद भारत की तेल कंपनियां इंडियन ऑयल, बीपीसीएल, एचपीसीएल और गेल अब ग्लोबल मार्केट में एक ऐसे पार्टनर की तलाश कर रही हैं जो संकट के इस समय में भारत की ढाल बन सके। और यहीं से शुरू होता है एक नया अध्याय। एक ऐसा नाम जो अब तक सिर्फ तेल और हीरों के लिए जाना जाता था। लेकिन अब वो भारत की रसोई का रखरखाव करने जा रहा है। इस पूरे संकट के बीच एंट्री हुई है अफ्रीका के दिग्गज देश अंगोला की। जी हां, वही अंगोला जो नाइजीरिया के बाद अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल निर्यातक है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/aviation-fuel-prices-skyrocketing-and-a-significant-increase-in-the-price-of-commercial-lpg" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: Iran War का बड़ा असर, हवाई ईंधन के दाम आसमान पर, Commercial LPG की कीमत में भी भारी वृद्धि</a></h3><h2>अंगोला की सरकारी कंपनी के साथ बातचीत&nbsp;</h2><div>भारतीय ऊर्जा कंपनियां अब अंगोला की सरकारी कंपनी सोनान गोल के साथ हाई लेवल बातचीत कर रही हैं। और यह डील साधारण नहीं होगी। अगर यह बातचीत सफल हो जाती है तो अंगोला भारत को कुकिंग गैस सप्लाई करने वाला पहला मध्य अफ्रीकी देश बन जाएगा। लेकिन अंगोला ही क्यों? इसका जवाब छिपा है भूगोल और गणित। एक्सपर्ट का मानना है उत्तरी अमेरिका के मुकाबले अंगोला से भारत तक गैस पहुंचने में 10 से 15 दिन कम लगेंगे। यह 15 दिन भारत के लिए किसी वरदान से कम नहीं होंगे। अंगोला के पास 4.6 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है। आपको जानकर हैरानी होगी कि वित्त वर्ष 2025 में अंगोला ने भारत को पहले ही 924 मिलियन की एलएजी सप्लाई की है। अब इसी दोस्ती को एलपीजी तक ले जाने की तैयारी है। यह सिर्फ एक बिजनेस रील नहीं है बल्कि एक कूटनीतिक जीत है। जहां एक तरफ हॉर्मूज में बारूद बरस रहा है। हॉर्मूज का रास्ता बंद पड़ा है। तो वहीं दूसरी तरफ भारत ने हजारों मील दूर अफ्रीका में अपनी ऊर्जा सुरक्षा का नया किला तैयार कर लिया है। 8000 किमी की दूरी है हवाई। तो सोचिए कितना डिस्टेंस पड़ रहा है। भारत और अंगोला का रिश्ता आज का नहीं है। इसकी जड़े 1985 में जमी थी। आज अंगोला में करीब 8000 भारतीय वहां की अर्थव्यवस्था की रीड बने हुए हैं। चाहे वो रिटेल हो, खेती हो या हॉस्पिटिलिटी। भारत आज अंगोला का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और दोनों के बीच 4.2 अरब डॉलर का द्विपक्षीय व्यापार भी होता है। हम उनसे सिर्फ गैस ही नहीं ले रहे हैं बल्कि हम उन्हें डिफेंस दवाएं कृषि तकनीक भी दे रहे हैं। हम साथ मिलकर अंतरिक्ष और माइनिंग के क्षेत्र में इतिहास रचने जा रहे हैं।&nbsp;</div><h2>क्या भारत इस युद्ध के स्थाय से बाहर निकल पाएगा?&nbsp;</h2><div>हालात तो यही बता रहे हैं कि अब भारत में स्थिति नॉर्मल हो जाएगी। हालांकि नॉर्मल स्थिति करने के लिए मोदी सरकार लगातार काम कर रही है। लोगों तक सप्लाई भी पहुंचा रही है। लेकिन संकट खड़ा ना हो। यही वजह है कि मोदी सरकार की डायवर्सिफिकेशन की नीति रंग ला रही है क्योंकि हॉरमूज बंद होने से भारत पर जो संकट खड़ा हो सकता है अंगोला उसका मरहम बनता दिख रहा है। भारत ने दुनिया को दिखा दिया है कि संकट कितना भी बड़ा क्यों ना हो अगर हौसला और विज़न सही हो तो रास्ते समंदर के बीच से ही निकल आते हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 13:17:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/a-friend-sitting-8000-kilometers-away-will-open-a-treasure-trove-for-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/4/1/treasure_large_1317_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आंसुओं के दरवाजे पर बैठा ईरान का गब्बर, इस तुरुप के इक्के से घबरा गया अमेरिका, Bab al-Mandeb बंद हुआ तब तो मंदी छा जाएगी…]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-gabbar-sits-at-the-door-of-tears-america-is-scared-by-this-trump-card]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>साल 1987 का दौर जब ट्रंप जब अमेरिका के राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक अमीर बिजनेसमैन हुआ करते थे। उस दौरान वो ईरान पर हमले की बात करते नजर आए। ट्रंप ने कहा कि हमें ईरान पर हमला करके उनके ऑयल रिजर्व्स पर कब्जा करना चाहिए। जब इंटरव्यू कर रही महिला पत्रकार उनसे पूछती हैं कि आप ये करेंगे कैसे? क्या सीधा हमला होगा? इस पर ट्रंप कहते हैं हां हमला होगा। मिडिल ईस्ट में एक जंग छिड़ेगी और अमेरिका को ना केवल ईरान के ऑयल रिजर्व पर कब्जा करना है बल्कि उस कब्जे को बनाकर भी रखना है ताकि उससे वसूली किया जा सके। उस नुकसान की वसूली जो ईरान ने अमेरिका का किया। यानी इससे साफ होता है कि&nbsp; ट्रंप के दिल में ईरान पर चढ़ाई का विचार हमेशा से था। अब जब वो राष्ट्रपति बन गए हैं तो जैसा पैसा आने पर आदमी बचपन के सपने पूरे करने की कोशिश करता है। गैर जरूरी चीजें भी खरीदता है कि बचपन में नहीं ले पाया अब खरीदूंगा पैसा है। वैसे ही ट्रंप भी ट्राई कर रहे हैं क्योंकि अब पावर है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/person-trump-publicly-abused-called-modi-and-then-this-happened" target="_blank">ट्रंप ने जिसे दी सरेआम गाली, उसने मिलाया मोदी को फोन, फिर ये हुआ...</a></h3><h2>जंग में कौन उतरा, अमेरिका घबराया</h2><div>ट्रंप की दिक्कतें भी बढ़ रही हैं। बेंजामिन नेतन्याहू के अलावा कोई साथ आ नहीं रहा है। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि ट्रंप से पूछेंगे कि ऑब्जेक्टिव क्या है? कारण जाने बिना ऑस्ट्रेलिया हाथ नहीं जलाना चाहता। यही काम नेटो ने भी ट्रंप के साथ किया है। सीधे मना करने की हिम्मत उनमें नहीं है। लेकिन वो भी फिगर आउट ही कर रहे हैं कि ट्रंप करना क्या चाहते हैं। तो एक तरफ ट्रंप की टीम में कोई आ नहीं रहा और दूसरी तरफ ईरान की टीम में उस खिलाड़ी की एंट्री हो चुकी है जिसका ईरान को इंतजार था। 29 मार्च को यमन की हूती सरकार जंग में शरीक हो गई। उसने इजराइल पर मिसाइलें दागना शुरू कर दिया। 29 मार्च को इस सरकार के प्रवक्ता याया सरी ने जंग में आधिकारिक तौर पर शामिल होने की घोषणा की। यह भी बताया कि उन्होंने इजराइल पर क्रूज मिसाइल से हमला किया है और आने वाले दिनों में हमले जारी रहेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/will-the-bodies-of-american-soldiers-be-scattered-on-kharg-island" target="_blank">Kharg Island में बिछेंगी अमेरिकी सैनिकों की लाशें? अपने खजाने को बचाने के लिए ईरान ने बना लिया प्लान</a></h3><h2>ईरान का एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस</h2><div>हूती यमन के अल्पसंख्यक शिया समुदाय ज़दी के हथियारबंद लड़ाके का एक गुट है। 1990 में यह गुट बना था। 2014 में हूतियों ने यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। जिसके बाद वहां की सरकार को देश छोड़कर भागना पड़ा। तब से यमन में गृह युद्ध जारी है। आज के समय में यमन के बड़े हिस्से में हूती विद्रोहियों का कब्जा है। इसमें मुख्य तौर पर पश्चिमी इलाके हैं। इन हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन हासिल है। ईरान इनके जरिए यमन में प्रॉक्सी वॉर भी लड़ता आया है। ईरान ने हूती&nbsp; विद्रोहियों की तरह पूरे पश्चिमी एशिया में ऐसे घुटों का एक नेटवर्क खड़ा कर रखा है। इसे एक्सेस ऑफ रेजिस्टेंस कहा जाता है। हूतियों के अलावा फिलिस्तीन का हमास और लेबनान का हिजबुल्ला इसमें शामिल है। ईरान की तरह ही इन तीनों गुटों का मुख्य दुश्मन इजराइल और अमेरिका है। अब इस वक्त इजराइल ने ईरान के साथ लिबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ भी जंग झेल रखी है। लगातार उसके ठिकानों पर हमला कर रहा है। वहीं 7 अक्टूबर 2023 के हमले के बाद इजराइल ने हमास के खिलाफ जो मिलिट्री ऑपरेशन शुरू किया था, उसमें हमास की लगभग पूरी लीडरशिप को खत्म किया जा चुका है। गजा में उसके नेटवर्क को तबाह कर दिया गया था। इस दौरान इसराइल ने हूतियों को भी नुकसान पहुंचाया। उनके प्रधानमंत्री से लेकर चीफ ऑफ स्टाफ तक को खत्म कर दिया गया। लेकिन इजराइल हूतियों के प्रमुख अब्दुल मलिक अलूती को अब तक ढूंढ नहीं पाया है।&nbsp;</div><h2>ईरान की इस नई चाल से दुनिया के सामने संकट क्यों खड़ा हो सकता है?</h2><div>ईरान अमेरिका के बीच 28 फरवरी से शुरू हुई जंग में अब तक हूती नहीं उतरे थे। ईरान ने खुद मोर्चा संभाल रखा था। उधर हिजबुल्ला और इजराइल भिड़े हुए हैं। लेकिन पहली बार 29 मार्च को इस जंग में हूतियों ने एंट्री मारी। इजराइल पर मिसाइलें और ड्रोन दागे।&nbsp; नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था पॉलिसी ऑफ़ अ स्टेट लाइफ इन इट्स ज्योग्राफी। यानी किसी राज्य की नीति उसकी ज्योग्राफी से तय होती है। ईरान के मामले में यह बात एकदम सटीक बैठती है। ईरान की मिलिट्री ताकत से कहीं ज्यादा है उसकी ज्योग्राफी की ताकत। यह बात उसने स्ट्रीट ऑफ हॉर्मोस को बंद करके साबित भी कर दी है। जहां उसने केवल कुछ माइंस और ड्रोंस के जरिए दुनिया के सबसे क्रिटिकल शिपिंग रूट को एक महीने से बंद कर रखा है। अब इसी ज्योग्राफी के कारण ईरान समर्थित हुती विद्रोही पूरी दुनिया पर इससे भी बड़ा संकट खड़ा कर सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-open-warning-to-iran-regarding-kharg-island" target="_blank">डील नहीं हुई तो मैं इसे ले लूंगा...खर्ग द्वीप को लेकर ट्रंप की ईरान को खुली चेतावनी</a></h3><h2>क्यों कहा जाता है आंसुओं का दरवाजा</h2><div>असली कहानी जो है इन मिसाइल से बहुत बड़ी है क्योंकि हूतियों के पास एक ऐसा हथियार है जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। बाबल मंदप आंसुओं का दरवाजा। यह दुनिया का सबसे अहम ट्रेड रूट है। लाल सागर को हिंद महासागर से जोड़ता है। यूरोप से एशिया का वही शॉर्टकट है जिस पर सुएस कैनाल है इजिप्ट में। बाब अल-मंदब एक अरबी नाम है, जिसका मतलब होता है “आंसुओं का दरवाजा”। यह एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग (स्ट्रेट) है, जो लाल सागर को अदन की खाड़ी और आगे हिंद महासागर से जोड़ता है। लगभग 100 किलोमीटर लंबा और 30 किलोमीटर चौड़ा यह जलमार्ग यमन को अफ्रीका के हॉर्न क्षेत्र के देशों जिबूती और इरिट्रिया से अलग करता है। एशिया से यूरोप जाने वाले जहाजों को स्वेज नहर तक पहुंचने के लिए इसी रास्ते से गुजरना पड़ता है, इसलिए इसका रणनीतिक और आर्थिक महत्व बहुत अधिक है। दुनिया के कुल तेल और प्राकृतिक गैस के लगभग 10–12% शिपमेंट इसी मार्ग से गुजरते हैं। इसके अलावा, वैश्विक व्यापार का करीब 12% हिस्सा और स्वेज नहर से गुजरने वाले लगभग 40% कंटेनर ट्रैफिक भी इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है। इसी वजह से बाब अल-मंदब को दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में गिना जाता है।</div><h2>बाबल मंदब में ब्लॉकेट कैसा होगा?</h2><div>हूतियों के पास यमन की सेना के वॉर रिजर्व्स का बड़ा हिस्सा है। इन्हीं के दम पर उन्होंने गजा पर इजराइली हमले के दौरान बाबल मंदिर में इंटरनेशनल शिपिंग को टारगेट किया था। तब रास्ता पूरी तरह बंद बिल्कुल नहीं हुआ था। लेकिन ढेर सारा ट्रैफिक अफ्रीका घूम कर जा रहा था। हफ्ते भर में एक जहाज पर एक मिसाइल दागनी है हूतियों को या समंदर में माइन बिछानी है, ड्रोन से अटैक करना है। इतना काफी होगा पूरी शिपिंग को पैरालाइज करने के लिए क्योंकि एक के साथ होगा तो कोई दूसरी कंपनी रिस्क नहीं लेना चाहेगी और जैसे ही शिपिंग अफेक्ट होगी वैश्विक व्यापार के एक बड़ी नस पे प्रेशर पड़ जाएगा। जैसे ईरान के लिए तुरप का पत्ता हॉर्मूज है, वैसे ही हूतियों के लिए बाबेल मंदब है और तुरप का पत्ता ऐसे ही नहीं चला जाता है। अगर ट्रंप वाकई हॉर्मूज के आइलैंड्स पर खून बहाने का रिस्क लेंगे और अगर वह खार्ग&nbsp; पर कब्जा ही कर लेंगे तब एक बारगेनिंग चिप की जरूरत ईरान को पड़ेगी। वरना ईरान को बिना किसी रिजल्ट के पीछे हटना होगा।&nbsp; ईरान और हुती जब तक बहुत जरूरी नहीं होगा। बाबल मंदब को एक तरह की धमकी&nbsp; तरह इस्तेमाल करेंगे ब्लॉकेज उनका लास्ट ऑप्शन होगा।&nbsp;</div><h2>भारत के लिए कितना अहम है बाब अल-मंदब</h2><div>बाब अल-मंदब भारत के लिए बेहद रणनीतिक और आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से आयात करता है, और तेल-गैस की बड़ी खेप इसी रास्ते से होकर आती है। अगर इस मार्ग पर किसी तरह की रुकावट या तनाव पैदा होता है, तो ईंधन की सप्लाई में देरी हो सकती है, आयात महंगा हो सकता है और इसका सीधा असर उद्योगों, परिवहन लागत और आम लोगों के खर्च पर पड़ सकता है। इसके अलावा, यूरोप के साथ भारत का व्यापार भी काफी हद तक इसी समुद्री रास्ते पर निर्भर करता है। यह मार्ग एशिया और यूरोप के बीच कनेक्टिविटी का अहम हिस्सा है, इसलिए इसमें किसी भी तरह की बाधा वैश्विक सप्लाई चेन और व्यापार को प्रभावित कर सकती है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 13:28:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-gabbar-sits-at-the-door-of-tears-america-is-scared-by-this-trump-card</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/31/iran_large_1328_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नो करप्शन, नो फियर, बालेन इज हियर! छात्र राजनीति पर रोक, एग्जाम भी खत्म, नए PM के 5 बड़े फैसले ने हिलाया नेपाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/student-politics-banned-exams-scrapped-new-pm-5-major-decisions-shake-nepal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी शिक्षा व्यवस्था में बसती है। और जब कोई युवा नेतृत्व उस आत्मा को राजनीति के चंगुल से छुड़ाने का संकल्प ले ले तो इतिहास रचा जाता है। नेपाल में कुछ ऐसा ही हुआ है। प्रधानमंत्री बालन शाह ने सत्ता संभालते ही वह कर दिखाया जिसकी हिम्मत दशकों से कोई नहीं कर पाया। शिक्षा के मंदिर को राजनीति का अखाड़ा बनाने वाले संगठनों को 60 दिन का अल्टीमेटम दे दिया गया है। विदेशी नामों वाली मैकाले पद्धति पर प्रहार हुआ है और बचपन को परीक्षा के बोझ से आजाद कर दिया गया है। क्या है बालेन का यह 100 दिवसीय एक्शन प्लान जिसको लेकर पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है। छात्र राजनीति पर पूर्ण प्रतिबंध। 60 दिन में दफ्तर खाली करने के आदेश।&nbsp; अब विदेशी षड्यंत्र का शिक्षा से खात्मा। ऑक्सफोर्ड सेंट जेवियर्स को बदलने होंगे नाम। अब नेपाल में होगा परीक्षा मुक्त बचपन। कक्षा पांच तक कोई पारंपरिक परीक्षा नहीं। नेपाल की राजधानी काठमांडू से उठी क्रांति की लहर अब पूरे देश की शिक्षा व्यवस्था को बदलने जा रही है। प्रधानमंत्री बालेन शाह ने अपने 100 दिवसीय एक्शन प्लान के जरिए शिक्षा के उस पुराने ढांचे पर प्रहार किया जो दशकों से राजनीति के दीमक का शिकार थी। सबसे बड़ा और कड़ा फैसला है छात्र राजनीति पर पूर्ण प्रतिबंध। अब नेपाल की स्कूलों और विश्वविद्यालयों में किसी भी राजनीतिक दल के झंडे नहीं दिखेंगे।</div><div>बालेन कैबिनेट ने साफ कर दिया कि शिक्षण संस्थान केवल ज्ञान के केंद्र होंगे। नेताओं के अखाड़े नहीं। अगले 60 दिनों के भीतर सभी राजनीतिक संगठनों को कैंपस से अपना बोरिया बिस्तर समेटना होगा। दलगत राजनीति की जगह वॉइस ऑफ स्टूडेंट का उदय। अगले 90 दिनों में बनेगा गैर राजनीतिक लोकतांत्रिक तंत्र। छात्रों की वास्तविक समस्याओं का होगा समाधान। प्रोपेगेंडा का नहीं। शिक्षा के कैलेंडर को राजनीति के कारण नहीं रुकने दिया जाएगा। अक्सर देखा गया है कि छात्र राजनीति के नाम पर युवा किसी एक विचारधारा के पीछे आंख मूंद कर चल देते हैं। बालन शाह का मानना है कि इससे मौलिक चिंतन और शोध की क्षमता मर जाती है। जेएनयू और डीयू जैसे संस्थानों में जो गंध मची है नेपाल उससे बचना चाहता है। बालेन ने विकल्प दिया स्टूडेंट काउंसिल। यह कोई राजनीतिक विंग नहीं बल्कि छात्रों की समस्याओं को सुनने वाला एक पारदर्शी मंच होगा। इसका मकसद है छात्रों को फॉलोअर्स बनाने की बजाय सीकर यानी कि खोजी बनाना। जब छात्र किसी पूर्वाग्रह से मुक्त होकर चिंतन करेगा तभी वह समाज को कुछ नया दे पाएगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-communist-party-enraged-over-kp-sharma-olis-arrest" target="_blank">केपी शर्मा ओली की गिरफ्तारी पर भड़की नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी, बताया राजनीतिक प्रतिशोध</a></h3><h2>ग्रेजुएशन के लिए नेपाली नागरिकता जरूरी नहीं</h2><div>सरकार ने निर्देश दिया है कि जिन स्कूलों और कॉलेजों के नाम विदेशी हैं। उन्हें इसी साल के भीतर नाम बदलने होंगे और नेपाली नाम रखना होगा। सरकार ने यह भी कहा है कि ग्रेजुएशन तक पढ़ाई के लिए नेपाली नागरिकता अनिवार्य नहीं होगी।</div><h2>तीन प्रधानमंत्रियों की संपत्ति की जांच होगी</h2><div>नेपाल सरकार ने मनी लॉन्डिंग मामले में तीन पूर्व प्रधानमंत्रियों (देउवा, ओली और प्रचंड) समेत दो मंत्री और उनके परिवार की संपत्ति की जांच तेज कर दी है। वहीं, केपी ओली और गृह लेखाक की हिरासत पर मंत्री अदालती सुनवाई जारी है।</div><h2>नेताओं-अफसरों की संपत्ति की जांच होगी</h2><div>सरकार के प्लान के मुताबिक 15 दिनों के भीतर एक कमेटी बनाई जाएगी, जो 2006 के बाद बड़े पदों पर रहे नेताओं और अफसरों की संपत्ति की जांच करेगी। इसके बाद 1991 से 2006 के बीच के मामलों को भी देखा जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-pm-balen-shah-responded-to-pm-modi-congratulations" target="_blank">PM Modi की बधाई का Nepal के PM Balen Shah ने दिया जवाब, बोले- साथ काम करने को उत्सुक</a></h3><h2>नेपाली कांग्रेस के नेता दीपक खड्‌का गिरफ्तार</h2><div>नेपाली कांग्रेस के नेता और पूर्व मंत्री दीपक खड्‌का को रविवार सुबह बुढानीलकंठ स्थित उनके घर से गिरफ्तार किया गया। उन्हें नेपाल पुलिस के सेंट्रल इन्वेस्टिगेशन ब्यूरो (सीआईबी) ने मनी लॉन्डिंग जांच विभाग के निर्देश पर हिरासत में लिया।</div><div>जेन-जी आंदोलन में मृतकों के परिवार को सरकारी नौकरी</div><div>नेपाल की सरकार ने देश में सुशासन (गुड गवर्नेस) लाने के लिए 100-पॉइंट वर्क प्लान जारी किया है। यह फैसला बलेंद्र शाह सरकार की पहली कैबिनेट बैठक में लिया गया। काठमांडू पोस्ट के अनुसार, प्रशासन ने शिक्षा, स्वास्थ्य और भ्रष्टाचार पर बड़े सुधारों की रूपरेखा तय की गई। 15 दिनों के भीतर एक कमिटी बनाई जाएगी, जो 2006 के जनआंदोलन के बाद से अब तक ऊंचे पदों पर रहे नेताओं और अधिकारियों की संपत्ति की जांच करेगी। इसके बाद दूसरे चरण में 1991 से 2006 तक के पदाधिकारियों की भी जांच होगी। सितंबर में हुए 'Gen Z आंदोलन' के बाद प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास, रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की भी योजना बनाई गई है। 100 दिनों के भीतर एक पूरा पुनर्वास पैकेज लागू करने की बात कही गई है। रिपोर्ट के अनुसार, जान गंवाने वाले 27 लोगों के करीबी परिजन को सरकारी नौकरी देने का फैसला भी हुआ है। 15 दिनों के अंदर राज्य उन समुदायों के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय और भेदभाव को आधिकारिक रूप से स्वीकार करेगा और उनके लिए&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">सामाजिक न्याय का ढांचा तैयार करेगा। </span></div><h2><span style="font-size: 1rem;">सभी दलों से बनेगा 'नैशनल कमिटमेट'</span></h2><div>सरकार एक 'नैशनल कमिटमेंट' बनाएगी, जिसमें सभी राजनीतिक दल और हितधारक होंगे। फेडरल सिविल सर्विस बिल का मसौदा 45 दिनों के भीतर तैयार किया जाएगा। इस कार्ययोजना का मकसद यह है कि जांच रिपोर्ट सिर्फ फाइलों में दबकर न रह जाएं। अब 30 दिनों के अंदर पुरानी रिपोर्टों की सिफारिशों को लागू किया जाएगा। इसके लिए सरकार जरूरी कानूनी और प्रशासनिक कदम उठाएगी, जैसे सिस्टम में सुधार, ढांचे में बदलाव और नियमों का सख्ती से पालन कराना।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 15:17:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/student-politics-banned-exams-scrapped-new-pm-5-major-decisions-shake-nepal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/30/pm_large_1521_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Modi लेकर आए ऐसा तगड़ा कानून, अर्बन नक्सलियों की पूरी प्रॉपर्टी हो जाएगी सीज!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-has-brought-such-a-strong-law-that-the-entire-property-of-urban-naxalites-will-be-seized]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में जितने भी ऐसे एनजीओ चल रही हैं या जो सो कॉल्ड सामाजिक संस्थाएं चल रही हैं जो विदेशों से पैसा लेती हैं, उन सब पर अब सरकार का बड़ा प्रहार होने जा रहा है। कैसे? सारी रिपोर्ट देनी होगी फंडिंग की। एक-एक चीज का ब्यौरा देना होग। इसीलिए एफसीआरए अमेंडमेंट बिल पेश किया गया है। विधेयक में एफसीआरए लाइसेंस रद होने या समाप्त होने की स्थिति में विदेशी अनुदान से बनाई गई संपत्तियों जब्त करने और उनकी देख-रेख के लिए केंद्र और राज्य के स्तर पर नई अथॉरिटी बनाने का प्रविधान है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amid-the-deteriorating-situation-in-west-asia-the-modi-cabinet-held-an-important-meeting" target="_blank">West Asia में बिगड़ते हालात के बीच हुई Modi Cabinet की अहम बैठक, लिये गये बड़े फैसले, सबको मिलेगा लाभ</a></h3><h2>विपक्ष ने क्या कहा?</h2><div>विपक्ष की ओर विधेयक को 'खतरनाक' बताकर पेश करने का विरोध का जवाब देते हुए गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि यह वास्तव में उन लोगों के लिए 'खतरनाक' है जो विदेशी योगदान का इस्तेमाल जबरन धर्मांतरण के लिए या व्यक्तिगत लाभ करते हैं।</div><h2>एफसीआरए क्या है?</h2><div>एफसीआरए का फुल फॉर्म Foreign Contribution Regulation Act जिसे हिंदी में&nbsp; विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम&nbsp; कहा जाता है। विदेशी दान को नियंत्रित करता है और यह सुनिश्चित करता है कि ऐसे योगदान आंतरिक सुरक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालते हैं। पहली बार 1976 में अधिनियमित किया गया था, इसे 2010 में संशोधित किया गया था जब विदेशी दान को विनियमित करने के लिए कई नए उपायों को अपनाया गया था। एफसीआरए उन सभी संघों, समूहों और गैर सरकारी संगठनों पर लागू होता है जो विदेशी चंदा प्राप्त करना चाहते हैं। इन संस्थाओं के लिए एफसीआरए के तहत पंजीकरण करवाना अनिवार्य है। शुरुआत में यह पंजीकरण पांच वर्षों के लिए होता है, जिसे सभी मानदं<span style="font-size: 1rem;">डों को पूरा करने पर रिन्यू करवाए जाने का प्रावधान है।</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/finance-bill-2026-passed-by-lok-sabha-fm-nirmala-said-the-government-is-running-on-determination" target="_blank">लोकसभा से Finance Bill 2026 पास, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण बोलीं- संकल्प से चल रही है सरकार</a></h3><h2>एफसीआरए का इतिहास</h2><div>समय समय पर भारत सरकार ने देश में विदेशी सहायता के प्रवाह को कंट्रोल और नियमबद्ध करने का प्रयास किया है। सबसे पहले 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी सरकार ने घरेलू राजनीति में विदेशी भागीदारी को सीमित करने के उद्देश्य से विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम को पारित किया था। 2010 में, विदेशी निवेश पर कुछ अंकुश लगाने के लिए कानून में संशोधन किया गया था। 2015 में, नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के एक साल बाद राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए फोर्ड फाउंडेशन सहित कुछ प्रमुख धार्मिक समूहों पर प्रतिबंधों को कड़ा कर दिया। पिछले साल सितंबर में भारत सरकार ने फिर से इस कानून में संशोधन लाकर विदेशों से मिल रहे चंदे को और कड़ा कर दिया।</div><h2>कानून में हो रहे इन बदलावों को आप आसान भाषा में इस तरह समझ सकते हैं:</h2><div><b>1.</b> पहला बड़ा बदलाव सजा और जांच के तरीके में है। सरकार ने इस कानून के उल्लंघन पर होने वाली जेल की सजा को 5 साल से घटाकर सिर्फ 1 साल कर दिया है। इसके पीछे सोच यह है कि छोटी गलतियों पर अपराधी बनाने के बजाय संस्थाओं को नियम सुधारने का मौका दिया जाए। साथ ही, अब किसी भी संस्था के खिलाफ पुलिस सीधे जांच शुरू नहीं कर पाएगी; इसके लिए पहले केंद्र सरकार की मंजूरी लेनी होगी। जानकारों का मानना है कि इससे अधिकारियों की मनमानी कम होगी और समाजसेवी संस्थाएं बिना डरे काम कर सकेंगी।</div><div><b>2.</b> दूसरा बदलाव संस्था चलाने वाले लोगों की जिम्मेदारी से जुड़ा है। अब सरकार ने मुख्य पदाधिकारियों का दायरा बढ़ा दिया है। इसका मतलब है कि अब संस्था के केवल बड़े अफसरों ही नहीं, बल्कि ट्रस्टी, पार्टनर और कमिटी के अन्य महत्वपूर्ण सदस्यों पर भी कड़ी नजर रहेगी। अगर इनमें से किसी का भी पिछला रिकॉर्ड खराब है या उन पर कोई केस चल रहा है, तो उस संस्था को विदेशी चंदा लेने का लाइसेंस नहीं मिलेगा। आसान शब्दों में कहें तो, सरकार ने सजा तो कम कर दी है, लेकिन संस्था चलाने वाले लोगों की ईमानदारी की जांच का घेरा और चौड़ा कर दिया है।</div><h2>मोदी सरकार का एफसीआरए अमेंडमेंट बिल 2026?</h2><div>विदेशी फंडिंग सिस्टम पर नियंत्रण और सख्त होगा। विदेशी धन और संपत्तियों की निगरानी के लिए अलग से अथॉरिटी बनेगी। एनजीओ का रजिस्ट्रेशन रिन्यू नहीं हुआ तो सारी संपत्ति अथॉरिटी के पास चली जाएगी। एनजीओ का लाइसेंस रद्द हुआ तब भी सारी संपत्ति अथॉरिटी के पास जाएगी। विदेशी फंड से जुड़ी किसी भी संपत्ति को बेचने से पहले सरकार की अनुमति लेनी होगी। अगर कोई संस्था सस्पेंड है तब भी वह संपत्ति का लेनदेन नहीं कर सकती। गड़बड़ी पर पदाधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। फॉरेन फंड्स की जांच के लिए केंद्र की अनुमति लेनी होगी और कोई भी गड़बड़ी एनजीओ में अगर पाई जाती है तो अथॉरिटी के अधिकारी व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार होंगे। 2018 में राजनाथ सिंह ने सिर्फ एक लाइन कहा कि जो विदेशों से आप पैसा प्राप्त करते हैं ना वो एसबीआई के अकाउंट में लीजिए। नई दिल्ली वाला एसबीआई का अकाउंट पता चला कि 506000 एनजीओ बंद हो गए। आपका एसबीआई अकाउंट है जो फॉरेन फंडिंग है सिर्फ वहां से ले लीजिए। वहीं मंगवा लीजिए। बंद हो गए। सरकार ने कहा कि यह बंद क्यों हो गए? जितना पैसा आप विदेश से प्राप्त करते हैं वो तो समाज सेवा के नाम पर आप प्राप्त करते हैं। तो उसका सिर्फ आप 30% प्रशासनिक खर्चे में जैसे कि अपने एनजीओ के कर्मचारियों को सैलरी देना हो गया। अगर कहीं ऑफिस खोल के रखा है तो उसका रेंट देना हो गया। वो 30% यहां खर्च कीजिए। लेकिन 70% तो उस काम के लिए खर्च कीजिएगा ना जिसके लिए पैसा प्राप्त किया है। तो उन्होंने कहा एक कैप लगा दिया कि 30% ही प्रशासनिक खर्चे कर सकते हैं। बाकी आपको जिस काम के लिए पैसे लिए हैं वो करने होंगे। पता चला कि 1.5 लाख एनजीओ फिर बंद।&nbsp;</div><h2>प्रविधानों का उल्लंघन</h2><div>विधेयक को पेश करते हुए नित्यानंद राय ने कहा कि मोदी सरकार विदेशी फंडिंग के किसी भी दुरुपयोग को बर्दाश्त नहीं करेगी और ऐसे तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करेगी। वहीं, प्रस्तावित विधेयक में सजा को भी कम किया गया है। एफसीआरए के प्रविधानों का उल्लंघन कर विदेशी योगदान प्राप्त करने वाले व्यक्ति के लिए पहले पांच वर्ष की सजा का प्रविधान था, जिसे घटाकर एक वर्ष कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील निपुन सक्सेना ने द प्रिंट के साथ बातचीत में बिल की बारिकियों को समझाते हुए कहा कि प्रस्तावित धारा 14B कहती है कि यदि किसी एनजीओ का प्रमाणपत्र उसकी समाप्ति तिथि से पहले रिन्यू नहीं किया जाता है, तो उसे एक्सपायर्ड माना जाएगा। सक्सेना का कहना है कि यह प्रावधान सरकार को एक प्रकार का पॉकेट वीटो दे देता है, जिसे किसी भी चरण पर प्रयोग कर, केवल प्रशासनिक देरी के कारण, एनजीओ की वैधता समाप्त की जा सकती है। भले ही एनजीओ अन्य सभी नियमों का पालन कर रहा हो। एफसीआरए (एफसीआरए) के तहत जारी प्रमाणपत्र अक्सर समय पर नहीं मिलते और नवीनीकरण के लिए लंबी कतारें लगती हैं। ऐसे में प्रस्तावित धारा 14B उन मामलों में भी वैधता समाप्त कर सकती है, जहाँ एनजीओ ने समय पर आवेदन कर दिया हो, लेकिन मंजूरी अभी तक नहीं मिली हो। ऐसी स्थिति में,उस एनजीओ के खाते में मौजूद संपत्ति या धन स्वतः सरकार/प्राधिकरण में निहित हो सकते हैं। प्रस्तावित धारा 16A यह भी कहती है कि कोई संपत्ति, चाहे वह आंशिक रूप से विदेशी चंदे और आंशिक रूप से अन्य स्रोतों से बनाई गई हो, वह भी निर्दिष्ट प्राधिकरण के अधिकार में जा सकती है। हालांकि, संगठन को यह अधिकार दिया गया है कि वह प्राधिकरण के समक्ष आवेदन कर यह साबित कर सके कि संपत्ति का कोई स्पष्ट हिस्सा अन्य (घरेलू) स्रोतों से बनाया गया था और उसे वापस किया जाना चाहिए। सक्सेना का कहना है कि यह प्रावधान एनजीओ की लगभग सभी संपत्तियों को प्रशासक के अधिकार क्षेत्र में ले आता है। संवैधानिक दृष्टि से देखें तो यह मूल कानून की भावना से अलग है, जिसका उद्देश्य केवल विदेशी चंदे को नियंत्रित करना था।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 27 Mar 2026 12:09:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-has-brought-such-a-strong-law-that-the-entire-property-of-urban-naxalites-will-be-seized</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/27/modi_large_1213_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[2 लाख महिलाओं से रेप, 3,000,000 की हत्या, आज ही के दिन हुआ ऐसा नरसंहार, कांप उठी थी दुनिया, PM ने किया चौंकाने वाला खुलासा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/a-massacre-that-shook-the-world-on-this-day-the-pm-made-a-shocking-revelation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><b>"हेलो अब्दुल्ला मैं गंधर्व बोल रहा हूं। उधर से आवाज आती है गंधर्व तुम कहां हो। जवाब मिलता है मैं ढाका के बाहर खड़ा हूं और तुम्हारे सरेंडर का इंतजार कर रहा हूं।"</b> यह दो दोस्तों के बीच की बातचीत थी। दो कोर्समेट जिन्होंने एक साथ आर्मी जवाइन की एक ढाका में पाकिस्तानी आर्मी के हेड क्वार्टर में था और दूसरा ढाका के बाहर अपनी 3000 सैनिकों की टुकड़ी के साथ मीरपुर ब्रिज पर। यह एक विजय योद्धा और हारे हुए जनरल के बीच की बातचीत थी। ये भारतीय सेना के मेजर जनरल गंधर्व सिंह नागरा और पाकिस्तान आर्मी के लेफ्टिनेंट जनरल अमीर अब्दुल्ला खान नियाजी के बीच की बातचीत थी। थोड़ी देर बाद मेजर जनरल नागरा, जनरल नियाजी के ऑफिस में थे। भारतीय सैन्य अधिकारियों के सामने पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल नियाजी रो रहे थे पाकिस्तानी सेना ने घुटने टेक दिए भारतीय सेना के ईस्टर्न कमांड के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा और चीफ ऑफ स्टाफ मेजर जनरल जेएफ आर जैकब ढाका पहुंच चुके थे शाम 431 पर पाकिस्तानी आर्मी के लेफ्टनंट जनरल नियाजी ने आत्मसमर्पण के कागजों पर दस्तखत किए। भारतीय सेना की ओर से लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा ने इसे रिसीव किया। ढाका के रेस कोर्स मैदान में इकट्ठी हजारों लोगों की भीड़ नारे लगा रही थी। मुक्ति वाहिनी जिंदाबाद, तोमार आमार ठिकाना, पद्मा मेघना जमुना। यह मुक्ति का घोष था। पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों से, बांगला भाषियों की मुक्ति का तारीख 16 दिसंबर 1971 थी।&nbsp; बांग्लादेश&nbsp; स्वतंत्र देश था ढाका इस स्वतंत्र देश की स्वतंत्र राजधानी 13 दिन तक चले युद्ध के बाद भारतीय सेना ढाका में थी पाकिस्तान दो टुकड़ों में बट चुका था पूर्वी पाकिस्तान का अस्तित्व खत्म हो चुका था लेकिन यह केवल 13 दिन की लड़ाई नहीं थी यह भाषाई भेदभाव और सैन्य अत्याचारों के खिलाफ करीब ढाई दशक का संघर्ष था। लेकिन बांग्लादेश के बनने से पहले नरसंहार की वो काली रात की कहानी का जिक्र बहुत कम होता है। जिसने पूरी मानवता को शर्मशार कर दिया था। बांग्लादेश में 25 मार्च 1971 को नरसंहार दिवस के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट के नाम पर तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान ने निहत्थे लोगों का कत्लेआम किया था। 2017 को शेख हसीना की सरकार के कार्यकाल में बांग्लादेश की संसद ने सर्वसम्मति से इसे नरसंहार दिवस घोषित किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/bjp-has-chosen-a-new-yogi-for-bengal-a-direct-voice-against-muslim-appeasement" target="_blank">भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज, बंगाल के लिए बीजेपी ने चुन लिया नया 'योगी'</a></h3><h2>बांग्लादेश के इतिहास का शर्मनाक दिन</h2><div>बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान ने 25 मार्च को मनाए जाने वाले 'नरसंहार दिवस' के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की है। यह दिवस 1971 में पाकिस्तानी कब्ज़ा करने वाली सेनाओं द्वारा मूल बंगाली लोगों के खिलाफ किए गए अकल्पनीय अत्याचारों और हत्याओं की याद में मनाया जाता है। एक्स पर जारी एक आधिकारिक बयान में, रहमान ने 25 मार्च, 1971 को बांग्लादेश के इतिहास के सबसे काले दिनों में से एक बताया। यह वह दिन था जब पाकिस्तानी कब्ज़ा करने वाली सेनाओं ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया था, जिसके तहत उन्होंने ढाका विश्वविद्यालय, पिलखाना, राजारबाग पुलिस लाइन्स और अन्य स्थानों पर रात के अंधेरे में निहत्थे नागरिकों, छात्रों, शिक्षकों और बुद्धिजीवियों का सुनियोजित नरसंहार किया था। रहमान ने लिखा कि हालाँकि, 25 मार्च की रात को चटोग्राम में स्थित 8वीं पूर्वी बंगाल रेजिमेंट ने ‘हम विद्रोह करते हैं’ का नारा लगाकर नरसंहार के विरुद्ध औपचारिक रूप से सशस्त्र प्रतिरोध की शुरुआत की। इस नरसंहार के प्रतिरोध से ही नौ महीने लंबा सशस्त्र मुक्ति युद्ध शुरू हुआ। पाकिस्तानी सेना द्वारा पूर्वी पाकिस्तान (जिसे उस समय बांग्लादेश कहा जाता था) के बंगाली लोगों के विरुद्ध किए गए क्रूर नरसंहार ने नौ महीने लंबे बांग्लादेश मुक्ति युद्ध को जन्म दिया, जो दिसंबर 1971 में स्वतंत्रता के साथ समाप्त हुआ। रहमान ने नागरिकों से लोकतांत्रिक और समृद्ध बांग्लादेश के निर्माण के दौरान नई पीढ़ी में समानता, मानवीय गरिमा और सामाजिक न्याय की भावना को स्थापित करने का आग्रह किया। उन्होंने शहीदों की आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की।</div><div>बांग्लादेश आधिकारिक तौर पर 25 मार्च को नरसंहार दिवस के रूप में मनाता है, ताकि उन अत्याचारों के पीड़ितों को श्रद्धांजलि दी जा सके, जिनमें अनुमानित तौर पर लाखों लोगों की जान गई, जिनमें से अधिकांश नागरिक थे। रहमान ने पोस्ट किया, आइए हम सब मिलकर एक न्यायपूर्ण, विकसित, समृद्ध, आत्मनिर्भर और लोकतांत्रिक बांग्लादेश का निर्माण करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-clear-message-by-missile-fire-on-little-india-israel-now-use-samson-option" target="_blank">लिटिल इंडिया पर मिसाइल दाग ईरान ने दिया मैसेज या कर दी बड़ी भूल, अब Samson Option का इजरायल करेगा इस्तेमाल? सब हो जाएगा खत्म</a></h3><h2>मौलाना अबुल कलाम ने पहले ही जता दी थी आशंका</h2><div>इंडियन एक्सप्रेस में छपे एक आर्टिकल में प्रसिद्ध बांग्लादेशी कवि दाऊद हैदर लिखते हैं अप्रैल 1946 में ही मौलाना अबुल कलाम आजाद ने इसकी आशंका जाहिर कर दी थी। एक कश्मीरी पत्रकार को दिए इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि बंगाल बाहरी प्रभुत्व और सत्ता के आगे झुकने वाला नहीं है। देर सवेर बंगाली विरोध करेंगे। मेरा मानना है कि पूर्वी पाकिस्तान कभी भी पश्चिमी पाकिस्तान के वर्चस्व को बर्दाश्त नहीं कर सकता और यही हुआ भी ।बंगबंधु शेख मुजीबुर रहमान ने पश्चिमी पाकिस्तान के वर्चस्व को चुनौती देनी शुरू की मार्च 1966 में आवामी लीग ने रैलियां शुरू कर दी आंदोलन फैलने लगा मुजीबुर रहमान को गिरफ्तार कर लिया गया अयूब खान की सरकार ने आंदोलनकारियों पर अगरतला षड्यंत्र का आरोप लगाया। आरोप यह कि वे भारत के साथ मिलकर पूर्वी पाकिस्तान को तोड़ने की साजिश कर रहे हैं। हालांकि बांगला भाषी एकजुट होकर मुजीबुर रहमान की रिहाई के लिए अड़ गए। इसी बीच 1970 में आम चुनाव हुए यह पाकिस्तान का पहला चुनाव था। कुल 300 सीटों में से 160 सीटें आवामी लीग यानी शेख मुजीब रहमान के हिस्से आई। शेख मुजीब के पास पूर्ण बहुमत था। लेकिन सभी सीटें पूर्वी पाकिस्तान की थी। पश्चिमी पाकिस्तान के मिलिट्री जनरल्स और नेताओं को यह मंजूर नहीं था कि कोई बंगाली उन पर शासन करें।</div><h2>करीब 2 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार</h2><div>पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति याया खान ने आवामी लीग को सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया। 7 मार्च 1971 को मुजीबुर रहमान ने किसी भी कीमत पर बांग्लादेश को आजाद कराने का आवाहन किया। उन्होंने कहा कहा कि यह लड़ाई हमारी आजादी के लिए है जिसके बाद पूर्वी पाकिस्तान में आंदोलन शुरू हो गया। मुजीबुर रहमान को फिर से जेल में बंद कर दिया गया। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना का अत्याचार शुरू हो गया। 25-26 मार्च की रात को पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी आर्मी ने भयानक नरसंहार किया महिलाओं बच्चों किसी को भी नहीं बख्शा गया। लोगों को घरों से गांव से बाहर निकालकर आर्मी ने खुलेआम गोलियां बरसाई। महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। भारत की ओर भाग रहे शरणार्थियों को घेर कर फायरिंग की गई। बांग्लादेशी अथॉरिटीज के आंकड़ों के मुताबिक पाकिस्तानी आर्मी ने 30 लाख लोगों की हत्या और करीब 2 लाख महिलाओं के साथ बलात्कार किया। यह मानव इतिहास के जघन्य समम अपराधों में से एक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/us-plan-establish-christian-state-india-dhurander-operation-by-raw-kgb-defeated-cia" target="_blank">भारत से सटे इलाकों में ईसाई राज्य बनाने का अमेरिकी प्लान, RAW और KGB के धुरंधर ऑपरेशन ने कैसे CIA को दी मात</a></h3><h2>पाकिस्तानी सेना के लिए बड़ा झटका</h2><div>तारिक रहमान का बयान पाकिस्तान की सेना के लिए एक बड़े झटके के तौर पर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार के दौरान ढाका में पाकिस्तान ने तेजी से अपनी पकड़ मजबूत की थी। यूनुस के कार्यकाल में पाकिस्तानी सेना और खुफिया एजेंसी आईएसआई को बांग्लादेश की राजधानी ढाका में अपेक्षाकृत अधिक पहुंच मिली थी। ऐसे में तारिक रहमान की हालिया टिप्पणी को विशेषज्ञ पाकिस्तान के लिए एक ‘रेड फ्लैग’ के रूप में देख रहे हैं। किंग्स कॉलेज लंदन की सीनियर फेलो आयशा सिद्दीका ने भी इस मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित किया है। रहमान के बयान को रीपोस्ट करते हुए उन्होंने कहा कि इस समय इस्लामाबाद अन्य मामलों में इतना व्यस्त है कि शायद वह अपने ही रणनीतिक साझेदार के संकेतों को गंभीरता से नहीं ले रहा है।</div><h2>जब भारत के सामने घुटनों पर आया पाकिस्तान</h2><div>पूर्वी पाकिस्तान से लाखों की संख्या में शरणार्थी जान बचाकर भारत की सीमाओं में घुस रहे थे। भारत ने पाकिस्तानी सेना के अत्याचारों का प्रतिकार करने की। अपील पूरी दुनिया से की। पाकिस्तान ने भारत पर गृह युद्ध भड़काने का आरोप लगाया। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध तय माना जा रहा था। इसी बीच 4 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने भारत पर हमला कर दिया। पाकिस्तान को पश्चिमी देशों और चीन से मदद की उम्मीद थी।&nbsp; लेकिन ना तो यह उम्मीदें और ना ही पाकिस्तान की सेना ज्यादा दिन तक टिक पाई। 13 दिन तक युद्ध चला। 16 दिसंबर 1971 को शाम 4:30 बजे हजारों लोगों की मौजूदगी में ढाका के रेस कोर्स मैदान पर पाकिस्तानी सेना के 93000 सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया। ढाका से करीब 1900 किमी दूर नई दिल्ली में लोकसभा का सत्र चल रहा था। शाम करीब 5:30 पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक अहम अनाउंसमेंट करने के लिए खड़ी हुई। उन्होंने कहा ढाका अब स्वतंत्र बांग्लादेश की स्वतंत्र राजधानी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 25 Mar 2026 12:58:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/a-massacre-that-shook-the-world-on-this-day-the-pm-made-a-shocking-revelation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/25/massacre_large_1301_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज, बंगाल के लिए बीजेपी ने चुन लिया नया 'योगी']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/bjp-has-chosen-a-new-yogi-for-bengal-a-direct-voice-against-muslim-appeasement]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>संयासी का भगवा वस्त्र, हिंदू अस्मिता की बातें, मुस्लिम तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी आवाज और राजनीति में कदम रखकर हिंदुओं की रक्षा का वादा। जब हम भारतीय राजनीति में भगवा और सत्ता के मिलन की बातें करते हैं तो सबसे पहला नाम उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का आता है। कारण सीधा सा है कि एक संयासी और मठ के प्रमुख से लेकर देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री तक का सफर तय करके भारतीय राजनीति में हिंदुत्व की एक नई परिभाषा लिखी। अब ठीक वैसा ही प्रयोग भाजपा पश्चिम बंगाल के चुनावी समर में कर रही है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा नाम उभर रहा है जो योगी आदित्यनाथ की याद दिलाता है। ये नाम उत्पल महाराज का है। मूल नाम&nbsp;</span>स्वामी ज्योतिर्मयानंद। वह भारत के सेवा आश्रम संघ के प्रमुख चेहरे रहे हैं। लेकिन अब उन्होंने संघ से निष्कासित होने के बाद भाजपा की टिकट स्वीकार कर ली है और वह उत्तर दिनाजपुर जिले की कालियागंज सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। यह कोई छोटा फैसला नहीं है। भाजपा ने जानबूझकर इस चेहरे को चुना है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/who-broke-the-idol-of-lord-ram-in-west-bengal" target="_blank">West Bengal में श्रीराम की मूर्ति किसने तोड़ी, नंदीग्राम इलाके में मचा हड़कंप</a></h3><h2><span style="font-size: 1rem;">हिंदूवादी छवि और संगठनात्मक अनुभव</span></h2><p><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span>उत्पल महाराज को टिकट देने का मुख्य कारण उनकी हिंदूवादी छवि और संगठनात्मक अनुभव है। वे भारत सेवाश्रम संघ के माध्यम से लंबे समय से लोगों की सेवा कर रहे थे। जिससे उनके स्थानीय स्तर पर जबरदस्त पकड़ है। भाजपा को उम्मीद है कि उत्पल महाराज के आने से ना केवल कालियागंज बल्कि आसपास की सीटों पर भी हिंदू मतदाताओं का भी भाजपा की ओर झुकाव होगा। अब जब भाजपा ने एक हिंदुत्ववादी नेता को टिकट दे ही दिया है तो सवाल उमड़ना लाजमी है कि क्या उत्पल महाराज बंगाल में पार्टी की हिंदुत्ववादी छवि के प्रमुख नेता बन सकते हैं? जैसे उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ माने जाते हैं। तो इस सवाल का जवाब उत्पल महाराज के बयानों और भाजपा की रणनीति में मिलता है। जिस तरह से वे ममता बनर्जी सरकार पर हिंदुओं को हाशिए पर धकेलने का आरोप लगाते हैं उससे साफ है कि भाजपा उन्हें बंगाल में अपने सबसे बड़े हिंदूवादी चेहरे में से एक के रूप में पेश करना चाहती है।&nbsp;&nbsp;</p><h2>संघ ने किया किनारा</h2><p>हालांकि, बीते दिनों जारी एक आंतरिक पत्र में संघ ने राजनीति में उतरने के कारण उन्हें संघ से निष्कासित करने की घोषणा की। उत्पल महाराज ने इंडियन एक्सप्रेस को बताया कि उन्होंने संघ के अधिकारियों को चुनाव लड़ने के अपने निर्णय के बारे में सूचित कर दिया था, लेकिन जब वे सहमत नहीं हुए, तो उन्होंने अपनी उम्मीदवारी की घोषणा के एक दिन बाद, 17 मार्च को अपना इस्तीफा सौंप दिया, जिसे स्वीकार कर लिया गया। आपको शायद पता होगा कि स्वामी ज्योतिर्मयानंद राजनीति के जाल में फंस गए हैं, आश्रम छोड़कर एक राजनीतिक दल में शामिल हो गए हैं। यह खबर मिलते ही संघ के अधिकारियों ने मुख्यालय में शासी निकाय की आपातकालीन बैठक बुलाई और उन्हें निष्कासित करने का निर्णय लिया। भारत सेवाश्रम संघ पूरी तरह से गैर-राजनीतिक, सामाजिक सेवा और धार्मिक संगठन है। संघ के महासचिव स्वामी विश्वत्मानंद ने पत्र में लिखा किसी भी परिस्थिति में संघ का कोई संन्यासी, ब्रह्मचारी या आश्रम निवासी किसी भी राजनीतिक गतिविधि में शामिल नहीं हो सकता। उन्होंने आगे कहा कि यदि कोई व्यक्ति किसी राजनीतिक दल के प्रभाव या प्रलोभन में आ जाता है, तो उसका धार्मिक जीवन पूरी तरह नष्ट हो जाता है। यह उसे त्याग के गौरव से विमुख कर देता है और सांसारिक सुखों की लत में डुबो देता है… जबकि हमें संसार के कल्याण के लिए काम करना चाहिए, सांसारिक ऐश्वर्य की ओर लौटने के लिए अपनी अंतरात्मा और वैराग्य का त्याग करना कभी भी उचित नहीं है।</p><h2>बताया क्यों लिया संयासी बनने का फैसला</h2><p>दक्षिण दिनाजपुर जिले के बलुरघाट में जन्मे उत्पल महाराज ने बताया कि वे 2000 में इस संगठन में शामिल हुए और चार साल बाद स्थानीय कॉलेज से इतिहास में स्नातक की डिग्री पूरी की। उन्होंने कहा कि मैं बचपन से ही संन्यासी जीवन से बहुत प्रभावित था, क्योंकि मैंने आश्रम के छात्रावास में रहकर पढ़ाई की। तभी मैंने संन्यासी बनने का फैसला किया था। 1917 में स्थापित यह संघ राजनीति से दूर रहता है और परोपकारी कार्यों तथा आपदा राहत कार्यों में संलग्न रहता है, साथ ही यह देश भर में हिंदू मिलन मंदिरों का एक नेटवर्क भी संचालित करता है। उत्पल महाराज का दावा है कि इनका उद्देश्य हिंदुओं को एकजुट करना है। हिंदुओं की सेवा करते हुए मैंने महसूस किया कि राजनीति के कारण यह समुदाय खतरे में है। एक विशेष समुदाय को खुश करने की कोशिशों के कारण हिंदू पीड़ित हैं। आजकल रथ यात्रा या राम नवमी के अवसर पर पूजा-अर्चना करने के लिए भी हिंदुओं को पुलिस की विशेष अनुमति लेनी पड़ती है। हिंदुओं की समस्याओं का समाधान किसी आध्यात्मिक संगठन के माध्यम से नहीं किया जा सकता। तृणमूल कांग्रेस के पूर्व नेता हुमायूं कबीर और वरिष्ठ टीएमसी नेता फिरहाद हकीम की टिप्पणियों का जिक्र करते हुए उत्पल महाराज ने कहा कि मंदिरों में प्रार्थना करने का समय समाप्त हो गया है। उन्होंने कहा कि भले ही संघ ने उन्हें निष्कासित कर दिया हो, लेकिन वे इसे हमेशा अपने दिल और दिमाग में रखेंगे और संगठन के संन्यासियों के साथ संपर्क में रहेंगे। उन्होंने कहा कि मैं कालियागंज में रहता हूँ और इस इलाके की हर गली से वाकिफ हूँ। मैं यहाँ के लोगों को जानता हूँ और उनकी भावनाओं को समझता हूँ। वे कह रहे हैं कि उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था कि मैं उम्मीदवार बनूँगा। एक भिक्षु होने के नाते मेरा अपने परिवार से कोई संपर्क नहीं है, लेकिन मैं एक भिक्षु के रूप में ही अपना जीवन व्यतीत करता रहूँगा।</p><h2>भाजपा की रणनीति बदल रही है</h2><p>बंगाल में पिछले चुनावों में पार्टी को असफलता मिली। 2016 और 2021 में बड़े सपने देखे गए। लेकिन ममता बनर्जी की ताकत के सामने टिक नहीं पाई। अब भाजपा की रणनीति बदल रही है। स्थानीय हिंदूवादी अत्याधुनिक चेहरों को भाजपा आगे लाने का काम कर रही है। उत्पल महाराज ठीक वैसा ही चेहरा हैं। वो कहते हैं कि हिंदुओं की सेवा आध्यात्मिक संगठन से नहीं हो पा रही है। रथ यात्रा रामनवमी पर पुलिस की मदद लेनी पड़ रही है। टीएमसी के गुंडे पूजा तक नहीं करने देते। मुस्लिम तुष्टीरण की वजह से हिंदू हाशिये पर हैं। राजनीति में आकर ही इन समस्याओं का हल निकलेगा और यह बातें सीधे ममता बनर्जी की राजनीति पर प्रहार है। ममता की ताकत एक बड़ा आधार अल्पसंख्यक वोट है उनकी ताकत का। उनकी छवि तुष्टीरण की नहीं बल्कि सभी के लिए न्याय की रही है। लेकिन उत्पल महाराज जैसे चेहरे के आने के बाद हिंदू वोटरों में एक नई ऊर्जा आ सकती है। खासकर उत्तर बंगाल में उत्तर दिनाजपुर दक्षिण दिनाजपुर अलीपुर द्वार जैसे इलाकों में जहां हिंदू मुस्लिम समीकरण संवेदनशील है। भाजपा पहले ही वहां अपनी पकड़ बढ़ा रही है। उत्पल महाराज का योगी जैसा स्टाइल, सन्यासी होने का वादा, हिंदू एकीकरण की बात, तुष्टीकरण के खिलाफ सीधी चुनौती यह सब हिंदू अस्मिता को जगा सकता है। लेकिन अब सवाल यह है कि ममता दीदी को इससे क्या नुकसान हो सकता है? तो इसका जवाब है इससे दीदी का सबसे बड़ा नुकसान हिंदू वोट का विभाजन है। उत्तर बंगाल में हिंदू वोटर पहले ही भाजपा की तरफ झुक रहे हैं। अब एक सन्यासी चेहरा जो खुद कह रहा है कि हिंदू खतरे में है पूजा नहीं करने देते। यह संदेश सीधे दिल में उतर सकता है। और इतना ही नहीं इससे ममता बनर्जी की छवि पर सवाल उठेंगे कि क्या वह हिंदुओं की अनदेखी कर रही हैं? क्या तुष्टीरण की वजह से हिंदू हाशिए पर हैं? और यह सवाल वोट में तब्दील हो सकता है।&nbsp;</p><p>खैर इन संतों में सबसे बड़ा नाम उत्पल बाबा के लिए राह जितनी आसान लग रही है असल में है नहीं। उनके विरोधी और टीएमसी उम्मीदवार नितई वैश्य ने महाराज के राजनीति में आने पर आश्चर्य जताया है। वैश्य का कहना है वे पहले महाराज का बहुत सम्मान करते थे। लेकिन उनके राजनीति में आने से उनके आध्यात्मिक कद को ठेस पहुंची है। अभी जो दिख रहा है वो भाजपा की सी सदी हुई चाल है और यह ममता दीदी की ताकत पर सीधा प्रहार है। और देखिए बंगाल की राजनीति में यह एक नया टर्निंग पॉइंट हो सकता है। लेकिन सवाल यह भी है कि क्या उत्पल महाराज भाजपा के योगी साबित होंगे या ममता दीदी इसे भी संभाल लेंगी?&nbsp;&nbsp;</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 24 Mar 2026 13:19:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/bjp-has-chosen-a-new-yogi-for-bengal-a-direct-voice-against-muslim-appeasement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/24/bjp_large_1322_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[लिटिल इंडिया पर मिसाइल दाग ईरान ने दिया मैसेज या कर दी बड़ी भूल, अब Samson Option का इजरायल करेगा इस्तेमाल? सब हो जाएगा खत्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-clear-message-by-missile-fire-on-little-india-israel-now-use-samson-option]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">किसी भी चरण का युद्ध बेहद गंभीर मामला होता है। खासकर जब इसमें इज़राइल और अमेरिका शामिल हों। लेकिन ईरान पर थोपा गया यह युद्ध पिछले 48 घंटों में अंतिम चरण की ओर बढ़ रहा है। अब स्थिति पूरी तरह से नियंत्रण से बाहर हो रही है। पिछले 48 घंटों में दो बड़ी घटनाएं घटी हैं, जिनसे पता चलता है कि यह युद्ध पूरी तरह से बेकाबू हो गया है। इसके वैश्विक परिणाम भी अब स्पष्ट हो गए हैं। पहली बात, इस युद्ध में अब परमाणु शब्द का इस्तेमाल होने लगा है। खुद को विजेता घोषित करने के बाद, डोनाल्ड ट्रम्प ने एक और अल्टीमेटम दिया है और यह अल्टीमेटम बेहद हताशा भरा है। अगर ईरान इस अल्टीमेटम को स्वीकार नहीं करता है, तो आप समझ सकते हैं कि अगले 24-48 घंटों में भारी उथल-पुथल मच सकती है।ईरान ने इजराइल के दक्षिणी इलाके में मौजूद डिमोना और अराद में मिसाइल अटैक किया है। 100 लोगों के घायल होने की खबर है। डिमोना वो जगह है जहां से 13 किमी की दूरी पर नेगेव रेगिस्तान है। नेगेव रेगिस्तान जहां पर इजराइल का नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर है। इस रिसर्च सेंटर को तो कोई नुकसान नहीं पहुंचा है। लेकिन इस लोकेशन के इतने करीब मिसाइल को इंटरसेप्ट ना कर पाना इजराइल की बड़ी चूक मानी जा रही है। सबसे पहले, परमाणु मुद्दे पर बात करते हैं। इस पर काफी हंगामा मचा हुआ है। अगर आप मीडिया पर गौर करें तो आपको लगेगा कि ईरान ने इज़राइल के परमाणु संयंत्र पर हमला किया है। लेकिन ऐसा नहीं है। हो सकता है कि यह हमला जानबूझकर न किया गया हो। डिमोना के पास स्थित शिमोन पेरेस परमाणु अनुसंधान संयंत्र पर हमला नहीं हुआ है। बल्कि डिमोना शहर पर हमला हुआ है, जहां उस संयंत्र में काम करने वाले लोग रहते होंगे। यह हमला जवाबी कार्रवाई के तौर पर किया गया है... ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका ने नतान्ज़ पर फिर से हमला किया। जवाबी कार्रवाई में ईरान ने इज़राइल के परमाणु संयंत्र के पास स्थित डिमोना शहर पर हमला कर दिया। और यह हमला एक संदेश देने के उद्देश्य से क्यों किया गया? अराद पर भी हमला किया गया है, लेकिन डिमोना पर हुआ यह हमला इतना खास क्यों है? मिसाइल इंटरसेप्ट में हुई चूक पर इजराइल क्या बोला और डेमोना का भारत से क्या ताल्लुक है? इसे लिटिल इंडिया क्यों कहते हैं? आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे।</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/millions-of-shia-muslims-came-to-attack-pakistan-india-came-into-action" target="_blank">Pakistan पर हमला करने आए लाखों शिया मुस्लिम, एक्शन में आया भारत</a></h3><h2>ईरान ने क्लीयर मैसेज देने की की कोशिश</h2><div>अगर किसी परमाणु संयंत्र पर हमला नहीं होता, तो यह इतना खास क्यों है? ज़रा सोचिए, अगर कोई देश आकर हमारे भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र के पास हमला कर दे, तो हमारे देश की क्या प्रतिक्रिया होगी? क्योंकि भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र की तरह ही डिमोना में भी उनका एक परमाणु संयंत्र है। इसी अनुसंधान केंद्र ने इज़राइल को पहले 13 परमाणु हथियार मुहैया कराए थे। वहीं से यूरेनियम का उत्पादन हुआ था और वहीं से, मुझे लगता है 1967 में, इज़राइल को परमाणु हथियार मिले थे। आज जवाबी कार्रवाई के तौर पर उसी संयंत्र के पास एक बम गिराया गया। ईरान का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है। कि अगर हमारे परमाणु संयंत्रों पर हमला होता है, तो आपके परमाणु संयंत्र भी हमारी पहुंच से बाहर नहीं हैं।</div><h2>अराद में खिड़की-दरवाजे उखड़े</h2><div>अराद शहर में ईरानी मिसाइल गिरने के बाद तबाही का भारी मजर देखने को मिला। रिहायशी इमारतो के बीच हुए इस धमाके में कई लोग घायल हो गए। जेरुशलम पोस्ट के मुताबिक, एक व्यक्ति ने बताया, अलर्ट के बाद हम शेल्टर में गए थे। कुछ देर बाद जोरदार धमाका हुआ, पूरा घर हिल गया। बाहर निकलने पर घर के खिड़की दरवाजे उखड़े नजर आए। सामान टूटकर बिखरा मिला। वही, राहतकर्मियों ने बताया, घायलों को अस्पताल भेजा गया, जहां कई की हालत गंभीर बनी हुई है। अधिकारियों के मुताबिक कम से कम तीन इमारतों को भारी नुकसान पहुंचा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/for-our-own-benefit-only-iran-is-ours-expert-exposes-china-strategy" target="_blank">रूस-पाक के लिए तो दे देंगे जान, खुद के मतलब के लिए सिर्फ 'अपना' है ईरान, Expert ने खोल दी चीन की स्ट्रैर्जी की पूरी पोल-पट्टी</a></h3><h2>आईएईए ने क्या कहा?</h2><div>इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी जो दुनिया भर में न्यूक्लियर प्रोग्राम्स पर नजरें रखती है। उसने अपने पोस्ट में लिखा आईएईए को इजराइल के डिमोना शहर में मिसाइल हमले की जानकारी है। नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर को किसी भी तरह के नुकसान की कोई खबर नहीं है। आसपास के देशों से मिली जानकारी के मुताबिक रेडिएशन का स्तर सामान्य है और कोई भी एब्नॉर्मल रेडिएशन की सूचना अभी तक हमें नहीं मिली है। इन हालातों पर हमारी बारीकी से नजर है। डायरेक्टर जनरल राफेल ग्रासी ने कहा है कि दोनों पक्षों को सैन्य संयम बरतना चाहिए। खासकर परमाणु केंद्रों के आसपास के इलाके में। जानकारी के लिए बता दें कि डिमोना के पास मौजूद नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर को डिमोना रिएक्टर नाम से भी जाना जाता है। माना जाता है कि यहां इसराइल ने अपने परमाणु हथियार छिपा रखे हैं। पर यह अनडिक्लेयर्ड है। इसकी पुष्टि नहीं हुई है। आधिकारिक तौर पर यह कहा जाता है कि यहां केवल रिसर्च प्रोग्राम चलता है।&nbsp;</div><h2>लिटिल इंडिया क्यों इतना अहम</h2><div>डिमोना इस्राइल का परमाणु केंद्र है। साथ ही भारतीय-यहूदी समुदाय की बड़ी आबादी के चलते इसे लिटिल इंडिया भी कहा जाता है। तुर्किये की अनादोलु न्यूज एजेंसी के अनुसार, ईरान के एक वरिष्ठ सैन्य अधिकारी ने कहा कि अगर अमेरिका और इस्राइल युद्ध बढ़ाते हैं, तो डिमोना रिएक्टर को निशाना बनाया जाएगा। डिमोना रिएक्टर को शिमोन पेरेस नेगेव न्यूक्लियर रिसर्च सेंटर कहा जाता है। यह इजरायल के परमाणु कार्यक्रम की रीढ़ माना जाता है। यह दक्षिणी इजरायल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित है। परिसर करीब 36 वर्ग किलोमीटर में फैला है। करीब 2700 वैज्ञानिक और तकनीशियन काम करते हैं।</div><h2>इजरायल के पास SO से ज्यादा परमाणु हथियार</h2><div>1950 के दशक में इजरायल ने परमाणु कार्यक्रम शुरू किया और 1957 में फ्रांस की मदद से रिएक्टर बनाया। 1963 के आसपास यह चालू हुआ। डिमोना में इस्तेमाल हो चुके ईंधन को प्रोसेस कर प्लूटोनियम तैयार किया जाता है, जो परमाणु हथियार बनाने में इस्तेमाल होता है। 1967 तक अमेरिकी रिपोर्ट से संकेत मिल गए थे कि इजरायल के पास परमाणु बम है। 1986 में तकनीशियन मोर्देखाई वनुनु ने इस रिएक्टर से जुड़े कई राज उजागर किए थे। इसके बावजूद इजरायल ने हमेशा अपने परमाणु हथियारों को लेकर अस्पष्ट नीति रखी है। इजरायल ने परमाणु हथियार प्रतिबंध संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। SIPRI के अनुसार, उसके पास 50 से ज्यादा परमाणु हथियार हो सकते हैं। मिडिल ईस्ट में इजराइल इकलौता ऐसा देश है जिसके पास न्यूक्लियर हथियार है। ऐसे में इस लोकेशन के आसपास भी हमला बेहद गंभीर बात है। 21 मार्च को ईरान ने दावा किया था कि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर उसके नताज यूरेनियम एनरचमेंट फैसिलिटी पर हमला किया था।</div><h2>सोनपापड़ी, गुलाब जामुन और भेलपुरी</h2><div>को इजरायल के 'लिटिल इंडिया' के नाम से जाना जाता है, जहां बड़ी संख्या में भारतीय-यहूदी समुदाय रहता है। करीब 30% आबादी भारतीय मूल की है और मराठी भाषा आम बोलचाल में इस्तेमाल होती है। दुकानों में सोनपापड़ी, गुलाब जामुन, पापड़ी चाट और भेलपुरी मिल जाती है।</div><h2>इजराइल के आसमानी कवच क्यों हो गए फेल</h2><div>ईरानी सरकारी मीडिया ने डिमोना में हुए हमले को जवाबी कारवाई के तौर पर पेश किया है। ईरान के संसद में स्पीकर ने चेतावनी तक दी है। पोस्ट में लिखा है कि अगर इजराइल अपने सबसे सुरक्षित इलाके डिमोना में मिसाइल इंटरसेप्ट नहीं कर पा रहा है तो रणनीतिक तौर पर इसका मतलब यह है कि जंग अब नए चरण में पहुंच चुकी है। इजराइल के आसमान में अब कवच नहीं रहा। अब ऐसा लगता है कि पहले से जो हमने प्लान तैयार कर रखा है उसे जमीनी स्तर पर लागू करने का वक्त आ गया है। इजराइली सेना के प्रवक्ता ने बताया कि हमलों के दौरान इजराइल का एयर डिफेंस सिस्टम एक्टिव तो हुआ लेकिन वो कुछ मिसाइलों को रोकने में नाकाम रहा। हैरानी की बात यह है कि यह अलग तरह की मिसाइलें नहीं थी जिन्हें रोका नहीं जा सकता था।</div><h2>क्या अब सैमसन विकल्प का इजरायल करेगा इस्तेमाल</h2><div>अगर इज़राइल खुद को अलग-थलग नहीं पाता है, तो वह सामरिक बम गिराने के लिए उतड़प उठेगा और यह सारा मामला खत्म हो जाएगा। यहाँ एक गणना, एक विचार प्रक्रिया है जिसे सैमसन ऑप्शन कहा जाता है। वह सैमसन विकल्प क्या है? यह विकल्प यह है कि अगर इज़राइल को लगता है कि उसका अस्तित्व खतरे में है अगर उस पर हमला होता है, तो वह परमाणु जवाबी कार्रवाई का सहारा ले सकता है। इज़राइल परमाणु जवाबी कार्रवाई इसलिए भी करना चाह सकता है क्योंकि लोगों को फिलहाल कोई दूसरा विकल्प नज़र नहीं आता। लेबनान और गाजा में उसने जो क्रूरता बरती है, उससे उसे परमाणु हथियार इस्तेमाल करने का विकल्प मिल सकता है। लेकिन क्या वह इस विकल्प का इस्तेमाल कर सकता है? क्या अंतरराष्ट्रीय समुदाय उसे अलग-थलग कर देगा? शायद इसीलिए अभी इसका इस्तेमाल नहीं हो रहा है। इस हमले का बदला इजरायल कैसे लेगा?&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 23 Mar 2026 13:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/iran-clear-message-by-missile-fire-on-little-india-israel-now-use-samson-option</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/23/iran_large_1317_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत से सटे इलाकों में ईसाई राज्य बनाने का अमेरिकी प्लान, RAW और KGB के धुरंधर ऑपरेशन ने कैसे CIA को दी मात]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/us-plan-establish-christian-state-india-dhurander-operation-by-raw-kgb-defeated-cia]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>13 मार्च 2026 कोलकाता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस इंटरनेशनल एयरपोर्ट शाम का वक्त था। नॉर्थ ईस्ट से लौटा एक अमेरिकी नागरिक वापसी की फ्लाइट पकड़ने की कोशिश कर रहा था। लेकिन जैसे ही काउंटर पर उसके डॉक्यूमेंट्स स्कैन होते हैं तो इमीग्रेशन अधिकारी को कुछ ऐसा दिखता है कि उसे तुरंत हिरासत में ले लिया जाता है और गिरफ्तारी के बाद उसे एनआईए नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी के हवाले कर दिया जाता है। लेकिन उस शाम वो इकलौता शख्स नहीं था जिसे एनआईए ने गिरफ्तार किया था। लखनऊ और दिल्ली एयरपोर्ट पर छह और लोगों को कस्टडी में लिया गया था और हैरान करने वाली बात यह थी कि यह सभी लोग विदेशी नागरिक थे। जिनमें से एक अमेरिकी और छह यूक्रेन के सिटीजन थे। लेकिन ये गिरफ्तारियां हुई क्यों? इसका जवाब मिला 15 मार्च को। जब एनआईए ने इन सभी पकड़े गए सातों विदेशी नागरिकों को दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट में पेश किया। पकड़े गए इन सातों लोगों में एक अमीरकी शख्स ऐसा है जिसकी पहचान उजागर होते ही जांच एजेंसियों में खलबली मच गई है। एक ऐसा शख्स जो दुनिया के हर कॉन्फ्लिक्ट ज़ोन में नजर आता है। फिर चाहे वो लीबिया से लेकर सीरिया में चल रहा गृह युद्ध हो या यूक्रेन में हो रही जंग हो। यहां तक कि वेनेजुएला में भी यह शख्स दिखाई दिया था। यानी यह शख्स हर उस जगह मौजूद रहता है जहां कोई ना कोई जंग चल रही हो। इस अमेरिकी नागरिक का नाम है मैथ्य बेंडिक जिसे कोई सीआईए का आदमी बताता है तो कोई भाड़े का सैनिक। लेकिन सवाल यह है कि यह शख्स आखिर है कौन? जिस वक्त ईरान, इजराइल में जंग छिड़ी हुई है, अफगानिस्तान, पाकिस्तान आपस में भिड़े हुए हैं। उस बीच भारत से एक बेहद चौंकाने वाली खबर सामने आती है। खबर ये कि एनआईए ने छापेमारी करते हुए छह यूक्रेनी और एक अमेरिकी नागरिक को गिरफ्तार किया है। यह लोग वो थे जो सीआईए के एजेंट बताए जा रहे हैं और भारत को तोड़ने की कोशिश रच रहे थे। ऐसे आरोप लग रहे हैं। खुलासा यह हो रहा है कि यह चीन और म्यांमार के विद्रोहियों को ट्रेनिंग दे रहे थे, हथियार दे रहे थे और भारत के विद्रोही गुटों से मिले हुए थे। आखिर सीआईए का मिशन क्या है और भारत के खिलाफ कितनी बड़ी साजिश रची जा रही थी जिसको एनआईए ने कुचल कर रख दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-diverts-7-oil-ships-bound-for-china-to-india" target="_blank">China जा रहे तेल के 7 जहाज रूस ने मोड़कर भारत भेजा, जिनपिंग को मोदी ने दिया बड़ा सदमा</a></h3><h2>रूस का इंटेल और एनआईए का एक्शन</h2><div>13 मार्च को नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी एनआईए ने छह यूक्रेनियन सिटीजन को और एक यूएसए के सिटीजन को गिरफ्तार किया है और उनके ऊपर आरोप है कि वो इंडिया के मिजोरम स्टेट के रिस्ट्रिक्टेड एरिया से क्रॉस कर म्यांमार गए थे और वहां पर इंसर्जेंट ग्रुप्स के साथ उन्होंने इंगेज किया। उनके ऊपर आरोप यह भी है कि वह ऐसी एक्टिविटीज को प्लान करने वाले थे जिससे टेररिज्म को बढ़ावा मिले। ड्रोंस की सप्लाई करने वाले थे, वेपंस की सप्लाई करने वाले थे और इन्हीं सारे आरोपों के आधार पर एनआईए ने उन्हें गिरफ्तार किया है। इस मामले में एक रूस का नया एंगल आ रहा है कि ये सारे जो भी इनपुट्स आए हैं इंडिया को वो रूस की तरफ से आए हैं। यानी रूस ने ये इंफॉर्मेशन साझा की थी। उसके बाद भारत ने गिरफ्तार किया गया। गिरफ्तार किया।&nbsp; इन्हें लखनऊ, दिल्ली और कोलकाता के एयरपोर्ट से इन्हें गिरफ्तार किया गया था और फिर इन्हें दिल्ली के कोर्ट में पेश किया गया। वहां से 27 मार्च तक की कस्टडी मिल गई है। तो रूस का एंगल यही है कि जानकारी यह है कि रूस ने यह इंटल भारत को दी थी।&nbsp;</div><h2>यूक्रेन ने पूरे मामले पर क्या कहा</h2><div>जाहिर तौर पर यूक्रेन का यही चिंता है। इसके अलावा यूक्रेन ने इन आरोपों को सीधे तौर पर खारिज किया है कि उसके नागरिक आतंकी गतिविधियों में इंडल्स थे।&nbsp; यूक्रेन का कहना है कि वो खुद आतंकवाद से पीड़ित है तो वो कैसे आतंकवाद का साथ दे सकता है ये कहना है। इसके अलावा यूक्रेन ने पीएम मोदी की अगस्त 204 में जब वो यूक्रेन गए थे उस यात्रा का भी हवाला दिया है और कहा है कि तब दोनों देशों के बीच संयुक्त बयान में ये कहा गया था आतंकवाद की निंदा की गई थी। आतंकवाद के खिलाफ बयान दिया गया था। तो हम कैसे ये कर सकते हैं? इसके बाद यूक्रेन ने जो है मांग की है कि इस पूरे मामले की जो है निष्पक्ष तरीके से जांच हो। ट्रांसपेरेंट तरीके से जांच हो। वहीं इस पूरे मामले पर यूक्रेन ने रूस पर आरोप लगाया है। यूक्रेन का कहना है कि रूस जो है भारत और यूक्रेन के बीच दरार डालने की कोशिश कर रहा है। ये ऐसी प्लांट कर रहा है। यह इंटल दे रहा है। जिससे जो भारत और यूक्रेन के संबंध है आगे बढ़ रहे हैं। दोस्ती आगे बढ़ रही है। वो खराब हो जाए। उसमें दरार पैदा हो जाए। यानी यूक्रेन एक तरह से इसे साजिश कहना चाह रहा है। रूस पर इस साजिश का आरोप लगा रहा है और साथ ही यह भी कहा है कि हम इस जांच में भारत का सहयोग करने के लिए तैयार हैं। लेकिन निष्पक्ष होनी चाहिए और दोनों देशों के सहयोग से होनी चाहिए। यानी यूक्रेन का सीधा-सीधा यह कहना है कि ये रूस की साजिश है। भारत और यूक्रेन के संबंधों को तोड़ने के लिए, यूक्रेन को बदनाम करने के लिए और यूक्रेन के नागरिक आतंकी गतिविधि में नहीं है और यूक्रेन निष्पक्ष जांच चाहता है और उसमें सहयोग करने के लिए तैयार है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-was-shaken-by-india-secret-operation-the-vehicle-created-a-stir" target="_blank">भारत का सीक्रेट ऑपरेशन देखकर हिल गया रूस, गाड़ी ने मचाया तहलका</a></h3><h2>भारत से सटे इलाकों में ईसाई राज्य बनाने का अमेरिकी प्लान</h2><div>बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना जब सत्ता में थी तब भी उन्होंने अमेरिका पर आरोप लगाया था कि वह भारत से सटे इलाकों में एक ईसाई राज्य बनाना चाहता है। नॉर्थ ईस्ट में पहले से ही काफी इंसजेंसी थी जिस पर भारत सरकार ने वक्त के साथ काबू पाया है। आज भी मणिपुर, नागालैंड, अरुणाचल प्रदेश और असम के कुछ हिस्सों में अपस्पा आर्म्ड फोर्स स्पेशल पावर एक्ट लागू है। इसलिए यहां होने वाली सारी गतिविधियों पर एजेंसियां पैनी नजर रखती हैं। अमेरिकी नागरिक मैथ्य वेंडिक पहले से ही एक विवादित कैरेक्टर रहा है जिसकी इंसलजेंसी और युद्धग्रस्त क्षेत्र से विवादित नाता है। ऐसे में इसके देश में एंट्री के साथ ही एजेंसियां मॉनिटरिंग कर रही होंगी। जिसके चलते पूरा जाल बिछाकर इन्हें एयरपोर्ट से गिरफ्तार किया गया। रेडिट और एक्स पर चल रही चर्चा में कुछ मैथ्यू को भाड़े का फौजी बताते हैं कुछ सीआईए का एजेंट। अपनी वेबसाइट में मैथ्य वेंडिक ने खुद को डॉक्यूमेंट्री फिल्म मेकर, डिफेंस एक्सपर्ट, वॉर रिपोर्टर और फ्रीडम फाइटर बता रखा है। उम्र करीब 46 साल है। अमेरिका के बाल्टीमोर में जन्मा पॉलिटिकल साइंस में बैचलर्स किया और जॉर्ज टाउन यूनिवर्सिटी से सिक्योरिटीज स्टडी में मास्टर्स। अपनी वेबसाइट में मैथ्यू दावा करता है कि इस कोर्स में एडमिशन पाने वाला वो सबसे कम उम्र का शख्स है। उसके मास्टर्स कोर्स का थीसिस था ओबामा बिन लादेन की लीडरशिप वाला अलकायदा अमेरिका को क्यों निशाना बनाता है। साल 2007 में अरब में हो रही उठापटक से प्रभावित होकर मैथ्य ने अफ्रीका से मिडिल ईस्ट तक बाइक राइड की थी। उसने कावासाकी के एलआर 650 बाइक से 3 साल तक टूर किया। जिसमें मोरक्को, मोरिटेनिया, ट्यूनेशिया, लीबिया, इजिप्ट, जॉर्डन, सीरिया, तुर्की को कवर करते हुए इराक में अपना सफर खत्म किया था। मैथ्यू की वेबसाइट के मुताबिक उसने साल 2009 में वॉर रिपोर्टर के तौर पर काम करना शुरू किया।&nbsp;</div><h2>असद के खिलाफ विद्रोहियों के साथ</h2><div>बाल्टीमोर एग्जामिनर नाम के एक अखबार के लिए उसने इराक में वॉर कवर किया और इस दौरान अमेरिकी सेना के साथ लंबा वक्त बिताया। द प्रिंट की रिपोर्ट के मुताबिक 2010 में वेंडेट एक कथित प्रोजेक्ट के लिए अफगानिस्तान गया। जहां उसने लंबे वक्त तक अमेरिकी सेना के साथ वक्त बिताया। इस दौरान उसने अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना के सबसे इंटीरियर ठिकाने फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस्ड डायलॉग में भी वक्त बिताया था। मैथ्यू दावा करता है कि वो ओसीडी से पीड़ित है। ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर से। एक ऐसा मेंटल स्टेट जिसमें किसी इंसान को बार-बार अवांछित विचार आते हैं। एक तरीके से ऑब्सेशन की तरह वो उस इंसान को किसी चीज को बार-बार करने के लिए मजबूर करता है। 2010 में वेंडिक्ट ने अरब देशों में दूसरी बार मोटरसाइकिल जर्नी की थी। इस बार वेंडिक्ट मशहूर फोटोग्राफर डेनियल ब्रिट के साथ इराक से अफगानिस्तान होते हुए ईरान तक बाइक के जरिए यात्रा की। साल 2011 में वेंडिक्ट पहली बार बड़े स्तर पर चर्चा में आए। जब लीबियन वॉर में उनकी एंट्री हुई थी। 2011 में वेंडिक्ट लीबिया चले गए और वहां के लीडर मुअमर गद्दाफी के खिलाफ लड़ रहे विद्रोहियों के साथ विदेशी लड़ाके के तौर पर लड़ाई करने लगे। हालांकि उन्हें जून में गिरफ्तार कर लिया गया और त्रिपोली के कुख्यात अबू सलीम जेल में सॉलिटरी कनफाइनमेंट में रखा गया। बाद में विद्रोहियों ने जब त्रिपोली पर कब्जा किया तो वेंडिक्ट जेल से छूट गए और वापस से लड़ाई में शामिल हो गए। साल 2012 में वेंडिक्ट की सीरिया सिविल वॉर में भी एंट्री हुई। वो बशर अल असद के खिलाफ विद्रोहियों के साथ देने लगा। उन्हें ट्रेनिंग देने लगा। जिन पर वेंडिक्ट ने बकायदा एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बना रखी है। इस दौरान असद रिजीम ने वेंडिक्ट को आतंकी घोषित कर दिया था।</div><h2>वैनडाइक है मास्टरमाइंड, लीबिया में विद्रोही लड़ाकों का मददगार</h2><div>वैनडाइक खुद को सुरक्षा विश्लेषक, डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्माता और युद्ध संवाददाता बताता है। उसका जन्म बाल्टीमोर में हुआ और उसने जॉर्जटाउन यूनिवर्सिटी से सिक्योरिटी स्टडीज में ग्रेजुएशन किया है। युद्ध के अनुभवों पर आधारित डॉक्यूमेंट्री का निर्देशन किया है।</div><div>सन्स ऑफ लिबर्टी इंटरनेशनल नामक संगठन के जरिए उन समूहों को सैन्य प्रशिक्षण और रणनीतिक सहायता प्रदान करता है जो तानाशाह के खिलाफ लड़ रहे हैं।</div><div>2011 के लीबिया गृहयुद्ध के दौरान वहां के विद्रोही लड़ाकों के साथ शामिल रहा। इस दौरान उसे बंदी बना लिया गया था।</div><div>प्रशिक्षण मॉड्यूल में मुख्य रूप से गुरिल्ला युद्ध कौशल, ड्रोन संचालन और आधुनिक युद्ध रणनीतियां शामिल हैं।</div><h2>उग्रवादी गुटों तक पहुंचा रहे हथियार</h2><div>मिजोरम म्यांमार सीमा पर लंबे समय से अस्थिरता बनी है। यहां चिन स्टेट (म्यांमार का हिस्सा, जो मिजोरम से सटा है), अराकान आर्मी (राखाइन में) और अन्य सशस्त्र जातीय संगठन जैसे चिन नेशनल आर्मी, चिन नेशनल फ्रंट आदि सैन्य जुटा के खिलाफ लड़ रहे हैं। भारत के लिए चिंता चिंता इसलिए है कि इनमें से कई गुट भारत के उग्रवादी संगठनों जैसे उल्फा (आई), एनएससीएन के कुछ गुटों, कुकी नेशनल आर्मी आदि से जुड़े हुए हैं। ये ग्रुप्स हथियार, ड्रग्स और अब ड्रोन टेक्नोलॉजी का आदान-प्रदान करते हैं। आरोपी कई बार ट्रेनिंग देने आ चुके हैं। इस बार वे गुवाहाटी पहुंचे और फिर मिजोरम से अवैध रूप से म्यांमार में घुसे, जहां ट्रेनिंग दी। भारत लौटने पर एनआईए ने 13 मार्च 2026 को उन्हें पकड़ा।3 यूक्रेनी नई दिल्ली एयरपोर्ट और अन्य 3 लखनऊ के चौधरी चरण सिंह अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से पकड़े गए। जबकि अमेरिकी नागरिक मैथ्यू एरॉन वैनडाइक को कोलकाता एयरपोर्ट से पकड़ा। अब इनकी डिजिटल फुटप्रिंट और पिछले महीनों की गतिविधियां ट्रैक की जा रही हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 20 Mar 2026 13:08:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/us-plan-establish-christian-state-india-dhurander-operation-by-raw-kgb-defeated-cia</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/20/us_large_1311_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kim Jong Un को जिन्होंने वोट नहीं किया उनका क्या होगा? जानें- उत्तर कोरिया में कैसे होते हैं चुनाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-will-happen-to-those-who-did-not-vote-for-kim-jong-un]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>फर्ज कीजिए कि किसी देश में चुनाव हो और लोग लाइन लगाकर धड़ाधड़ वोट देने पहुंच जाते हैं। मानों की धुरंधर-2 फिल्म की फ्री स्क्रिनिंग रखी गई हो और उसका टिकट पाने के लिए पहले मैं-पहले मैं करके कतार में लोग मारा-मारी करते नजर आए। अब माहौल ऐसा होगा तो मतदान का प्रतिशत भी ऊपर जाएगा। कितना? 99.99 प्रतिशत मानो इतने नंबर अगर परीक्षा में आ जाएं तो देश के बड़े से बड़े कॉलेज-यूनिवर्सिटी में दाखिला झट से मिल जाए। अब अगर वोटिंग टर्न आउट 100 प्रतिशत के करीब रहा हो तो हैरत तो हर किसी को होगी। लेकिन रूको जरा, अभी तो और भी ट्विस्ट बाकी है। इस 99.99 % वोटिंग टर्न आउट में जीतने वाली पार्टी को 99.93 प्रतिशत वोट प्राप्त होते हैं। आप कहेंगे कि ऐसा कैसे हो सकता है। हो सकता है जब देश नॉर्थ कोरिया हो तो सब हो सकता है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/kim-jong-un-suddenly-became-enraged-and-fired-a-missile" target="_blank">हो गया सबसे बड़ा धमाका! अचानक भड़का किम जोंग, दाग दी मिसाइल</a></h3><h2>सात साल बाद चुनाव</h2><p>उत्तर कोरिया में रविवार 15 मार्च को संसदीय चुनाव हुए। वोटिंग के दौरान पोलिंग बूथों को खूब सजाया गया। लोग इनके बाहर नाचना गाना भी कर रहे थे। देश में 7 साल बाद इलेक्शन हो रहे थे तो बाकी देशों को भी बुलबुलाहट थी कि इस बार क्या होगा? मगर किस्सा वही ढाक के तीन पात। नतीजों का ऐलान हुआ तो बताया गया कि सुप्रीम लीडर किम जोंग उन की पार्टी और गठबंधन को 99.93% वोट मिले हैं। इसके साथ ही देश की संसद जिसको सुप्रीम पीपल्स असेंबली कहते हैं, उसकी हर सीट वर्कर्स पार्टी ऑफ कोरिया के हिस्से चली गई। हालांकि ये आंकड़े देखकर यह हैरत भी होती है कि नॉर्थ कोरिया में आखिर किम जोंग उन के खिलाफ वोट करने वाले यह 0.07% कौन से दिलेर लोग थे। खासकर इसलिए क्योंकि पहली बार किम जोंग उनके खिलाफ वोट पड़ने की खबरें आई हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि देश में विपक्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विपक्षी पार्टियां भी मौजूद हैं और लोग अपने मन मुताबिक वोट डालते भी हैं। मगर यहां बीच में आ जाता है इलेक्शन का प्रोसेस।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-took-advantage-of-the-opportunity-in-the-iran-us-war-surrounded-taiwan" target="_blank">Iran-US War में चीन को मिल गया मौका, ताइवान की घेराबंदी? ट्रंप हैरान!</a></h3><h2>उत्तर कोरिया में कैसे होते हैं चुनाव</h2><p>उत्तर कोरिया में चुनाव का मतलब वह नहीं है जो हम आम तौर पर समझते हैं। यहाँ चुनाव जनता की पसंद चुनने के लिए नहीं, बल्कि सरकार की ताकत और एकता दिखाने के लिए आयोजित किए जाते हैं। आइए समझते हैं कि आखिर इस देश में वोटिंग कैसे होती है।&nbsp;</p><h2>चुनावी प्रक्रिया</h2><p>उत्तर कोरिया के हर निर्वाचन क्षेत्र में केवल एक ही उम्मीदवार खड़ा होता है। इस उम्मीदवार का चयन पहले ही सत्तारूढ़ पार्टी द्वारा कर लिया जाता है। वोटिंग के दिन, मतदाता को एक बैलेट पेपर दिया जाता है जिस पर उसी इकलौते उम्मीदवार का नाम लिखा होता है।</p><h2>वोट देने का तरीका</h2><p>यहाँ वोट देना बहुत आसान है, लेकिन विरोध करना बेहद मुश्किल।</p><p>अगर आप उम्मीदवार के पक्ष में हैं, तो आपको बस वह कागज बिना किसी बदलाव के बॉक्स में डाल देना है।</p><p>लेकिन अगर आप विरोध करना चाहते हैं, तो आपको अधिकारियों की नजरों के सामने उम्मीदवार के नाम को काटना होगा।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/election-commission-has-ordered-the-removal-of-the-chief-secretary-of-west-bengal-from-his-post" target="_blank">West Bengal में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल! Election Commission ने राज्य के मुख्य सचिव को पद से हटाने का दिया आदेश</a></h3><h2>निगरानी और रिस्क</h2><p>हाल के वर्षों में कुछ छोटे बदलाव जरूर किए गए हैं।जैसे कुछ स्थानों पर ‘हाँ’ और ‘नहीं’ के लिए अलग-अलग मतपेटियाँ रखी गईं। लेकिन मूल व्यवस्था अभी भी वही बनी हुई है। हर सीट पर पहले से तय एक ही उम्मीदवार होता है और मतदाताओं के पास केवल समर्थन या विरोध जताने का विकल्प रहता है। इस प्रक्रिया में यह भी सुनिश्चित किया जाता है कि अधिकारियों को यह जानकारी रहे कि किसने समर्थन में वोट दिया और किसने विरोध में। ऐसे माहौल में विरोध दर्ज कराना काफी जोखिम भरा हो सकता है, क्योंकि मतदाताओं पर निगरानी रखी जाती है और उनके खिलाफ कार्रवाई की आशंका बनी रहती है। मतदान लगभग अनिवार्य होता है। स्थानीय प्रशासन मतदाताओं की पूरी सूची तैयार रखता है, जो किसी हद तक जनगणना का भी काम करती है। जो लोग मतदान नहीं कर पाते—जैसे समुद्र में कार्यरत नाविक या विदेश में रहने वाले नागरिक उन्हें भी आधिकारिक आँकड़ों में शामिल किया जाता है। हाल के आँकड़ों के अनुसार, केवल 0.0037% लोग ही मतदान नहीं कर सके, जबकि मात्र 0.00003% लोगों ने स्वेच्छा से मतदान से दूरी बनाई।</p><h2>नतीजे और भविष्य</h2><p>चुनाव के बाद नई असेंबली बुलाई जाती है, जिसका काम केवल किम जोंग-उन की नीतियों पर मुहर लगाना होता है। इस बार चर्चा है कि किम की बहन, किम यो-जोंग को और भी बड़ी जिम्मेदारी मिल सकती है। साथ ही, किम जोंग-उन का अपनी बेटी के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखना यह संकेत देता है कि उन्हें भविष्य के उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जा रहा है। 99.93% समर्थन का आँकड़ा भले ही असाधारण लगे, लेकिन उत्तर कोरिया में यह कोई नई बात नहीं है। 2019 के चुनावों में भी लगभग ऐसे ही परिणाम सामने आए थे, जहाँ मतदान प्रतिशत 99.99% बताया गया था। पूरी चुनावी प्रक्रिया एक सुनियोजित प्रदर्शन जैसी होती है, जिसमें एकता दिखाने पर जोर दिया जाता है। वास्तव में न तो कोई प्रतिस्पर्धा होती है, न ही विपक्ष की कोई प्रभावी भूमिका, और इस पूरी प्रक्रिया की स्वतंत्र निगरानी भी संभव नहीं होती।</p><p>अब आगे क्या</p><p>&nbsp;मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक किम जोंग उन अपनी बेटी को उत्तराधिकारी बनाने का फैसला भी कर चुके हैं। यौनहप न्यूज़ एजेंसी ने हालिया चुनाव के बारे में बताया था कि पिछली बार की तुलना में इस बार 70% पदाधिकारियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाएगा। यानी पावर स्ट्रक्चर में ताबड़तोड़ बदलाव किए जाएंगे। इन चुनावों में किम जोंग की बहन किम यो जोंग भी संसद पहुंची हैं। कोरियन सेंट्रल न्यूज़ एजेंसी के मुताबिक सदन अब एक बैठक करेगा और किम जोंग उनको देश का सुप्रीम लीडर चुन लिया जाएगा। दक्षिण कोरिया के साथ संबंधों को लेकर संविधान में बदलाव करने हैं या नहीं, विदेश नीति पर कुछ फैसले करने हैं या नहीं? ऐसे तमाम मुद्दों पर फैसले किए जाएंगे।&nbsp; अब नई चुनी गई संसद जल्द ही बैठक करेगी, जहाँ सरकार की नीतियों को औपचारिक मंजूरी दी जाएगी। इसमें किम जोंग-उन की पाँच वर्षीय आर्थिक योजना और परमाणु कार्यक्रम जैसे अहम मुद्दे शामिल हैं। उनकी बहन किम यो-जोंग को लेकर यह कयास लगाए जा रहे हैं कि चुनाव के बाद उन्हें और बड़ी जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। वहीं हाल के समय में किम जोंग-उन अपनी बेटी के साथ कई सार्वजनिक कार्यक्रमों में नजर आए हैं, जिसे संभावित उत्तराधिकारी के रूप में देखा जा रहा है।<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 19 Mar 2026 13:04:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-will-happen-to-those-who-did-not-vote-for-kim-jong-un</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/19/kim-jong-un_large_1306_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अहुर-असुर से आर्य-वेद तक, भारत-ईरान का वो रिश्ता जो अमेरिका-इजरायल चाहकर भी नहीं तोड़ सकते]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/india-iran-relationship-that-america-and-israel-cannot-break-even-if-they-wanted-to]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान-इजराइल युद्ध में भारत एक ऐसे तटस्थ देश की भूमिका निभा रहा है जो ना तो खुलकर तेल अवीव की मिसाइलों वाली बोली के समर्थन में है और न ही पूरी तरह तेहरान की तरफ झुका हुआ है। भारत और ईरान के रिश्ते हजारों साल पुराने हैं। वहीं इजरायल ने विभिन्न संकट की घड़ी में मददगार के रूप में भारत का साथ दिया है। अब आप सोचेंगे कि जब इजराइल से हमारी इतनी गहरी दोस्ती है तो हम ईरान को लेकर इतने फिक्रमंद क्यों हैं? क्या यह सिर्फ कच्चे तेल की सप्लाई या चाबहार बंदरगाह के व्यापार का मामला है? तो जवाब है बिल्कुल नहीं। भारत और ईरान का रिश्ता आज की कूटनीति कच्चे तेल या व्यापार की पैदाइश नहीं है। अगर आपको भारत का यह बैलेंसिंग एक्ट समझना है तो आज से हजारों साल पीछे जाना होगा। दरअसल हमारा और ईरान का रिश्ता किसी कागजी समझौते का नहीं बल्कि खून और सभ्यता का रिश्ता है। ईरान का अर्थ ही है आर्यों का देश। आर्यों की ही एक शाखा ने इधर भारत में वेदों की रचना की थी। आज हम अहुर-असुर से आर्य-वेद तक के सफर का एमआरआई स्कैन करेंगे। बताएंगे कि ईरान और भारत के ऐतिहासिक संबंध कैसे थे। और ये भी कि एरनम के फारस और फिर ईरान होने की कहानी क्या है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-israel-iran-war-day-18-updates-navroz-greetings-gift-of-missiles-by-israel" target="_blank">US-Israel-Iran War Day 18 Updates: इधर नवरोज की शुभकामनाएं, उधर मिसाइलों का तोहफा, मिडिल ईस्ट में चल रहा वॉर अनोखा</a></h3><h2>दोनों की सीमाएं हजारों साल से साथ ही थी</h2><div>सबसे पहले शुरूआत नक्शे से करते हैं। उस दौर में पाकिस्तान है बना ही नहीं था तो आप कल्पना कर सकते हैं कि भारत और ईरान दरअसल पड़ोसी देश थे। दोनों की सीमाएं हजारों साल से साथ ही थी। जाहिर है तब आज की तरह कोई एक सरकार नहीं होती थी। जनजातियां थी, अलग-अलग छोटे-छोटे कबीले थे, राज्य भी कह सकते हैं। लेकिन अगर आप सांस्कृतिक दृष्टि से इस जिसे हम आर्यावर्त कहते रहे हैं और ईरान तो इनकी सीमा तो ऐसी ही मिलती रही है और जाहिर है दोनों एक दूसरे को प्रभावित भी करते रहे क्योंकि तब कोई वीजा तो था नहीं। कोई आपका पासपोर्ट तो लगता नहीं था। तो यहां से आदमी कब इधर चला जाए अपनी भेड़े चराते या घोड़े दौड़ाते या इधर से इधर आ जाए यह कहा नहीं जा सकता और इसलिए दोनों के जो दोनों की संस्कृतियां हैं उस पर काफी एक दूसरे का प्रभाव दिखता है। 2000 से 3000 ईसा पूर्व के बीच भारत और ईरान के लोग एक ही परिवार का हिस्सा थे। अगर आप आधुनिक इराक, दक्षिणी ईरान और उत्तर पश्चिमी भारत के नक्शे को एक साथ रखकर देखें तो आपको पता चलेगा कि यह पूरा इलाका कभी एक ही विशाल सांस्कृतिक और जन सांख्यिकी यानी डेमोग्राफिक क्षेत्र हुआ करता था। सिर्फ यही नहीं हमारी सिंधु घाटी सभ्यता ईरान और मेसोपोटामिया की समकालीन सभ्यताओं के बीच जो गहरे व्यापारिक संबंध थे वो आज भी जमीन की खुदाई में मिलते हैं। हजारों साल पहले हमारे पूर्वज एक दूसरे के शहरों में आते जाते थे। व्यापार करते थे और एक दूसरे के रीति-रिवाजों को मानते थे। यह दोनों सभ्यताएं एक दूसरे से पूरी तरह जुड़ी हुई थी। इसका एक सबसे बड़ा जिंदा सबूत आज भी मौजूद है। पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में ब्राहूई नाम का एक कबीला रहता है। यह लोग शक्ल, सूरत और नस्ल से बिल्कुल ईरानी लगते हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इनकी बोली दक्षिण भारत की द्रविड़ भाषाओं जैसे तमिल या तेलुगु से काफी मिलती जुलती है। यह कोई इत्तेफाक नहीं है। बल्कि इस बात का पक्का सबूत है कि हमारी जड़े एक ही जमीन से जुड़ी हैं और आधुनिक सीमाएं बनने से&nbsp; पहले हम एक ही थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-took-a-surprising-stance-on-iran-193-countries-were-surprised" target="_blank">सुनो UN ये तरीका बदल लो...ईरान पर भारत ने गजब ही रुख दिखाया, 193 देश हैरान</a></h3><h2>एक ही कबीले में रहते थे भारतीय-ईरानी</h2><div>इंडो आर्यन और ईरानी लोगों के साझे अतीत को वैज्ञानिक भाषा में कुर्गन परिकल्पना या कुर्गन हाइपोथेसिस और बीएमएसी यानी बैक्टीरिया मार्गना आर्कियोलॉजिकल कॉम्प्लेक्स के नाम से जाना जाता है। इस थ्योरी के मुताबिक हजारों साल पहले मध्य एशिया के यूरेशियन स्टेपीज इलाके में एक बहुत बड़ा घुमंतु समूह यानी नोमेडिक ग्रुप रहता था। यह लोग घोड़ों की सवारी करने और रथ चलाने में माहिर थे। यह वो लोग थे जो एक ही भाषा बोलते थे और एक ही जैसी संस्कृति को मानते थे। लेकिन वक्त के साथ चारगाहों और नई जमीन की तलाश में इन लोगों ने वहां से दक्षिण की तरफ अपना सफर शुरू किया। यही वो ऐतिहासिक सफर था जिसने दुनिया का भूगोल हमेशा के लिए बदल दिया। प्रवास के इस लंबे रास्ते में यह विशाल इंडो ईरानी भाषी समूह दो अलग-अलग शाखाओं में बट गए। इस समूह की पहली शाखा ने हिंदू कुश के ऊंचे पहाड़ों को पार किया और भारतीय उपमहाद्वीप के सिंधु और गंगा के उपजाऊ मैदानी इलाकों में आकर बस गए। इन्हें ही इतिहास में इंडो आर्यंस कहा जाता है। जबकि दूसरी शाखा पहाड़ों के पार नहीं गई। वो ईरानी पठार जो ईरानियन प्लेटो हैवहां रुक गई। उन्होंने वहीं अपनी सभ्यता का विस्तार किया और वो आगे चलकर प्राचीन फारसी या ईरानी कहलाए। यानी जो आज के भारतीय हैं और जो ईरानी हैं वह असल में हजारों साल पहले एक ही कबीले में रहते थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uae-calls-india-amidst-the-war-a-big-game-is-played-on-hormuz" target="_blank">कहर ढा रहा है ईरान...जंग के बीच UAE ने मिलाया भारत को फोन, होर्मुज पर हो गया बड़ा खेल!</a></h3><h2>अहुर और असुर, यस्न और यज्ञ</h2><div>पारसी धर्म में सर्वोच्च भगवान अहुर मज़्दा हैं। वे निराकार, रंगहीन, लिंगहीन और परम बुद्धिमान सत्ता हैं। अहुर का अर्थ है स्वामी या दिव्य। अब, यदि आप अहुर के 'ह' को 'स' से बदल दें, तो आपको वैदिक संस्कृति का 'असुर' शब्द मिल जाएगा। ऋग्वेद में 'असुर' शब्द का प्रयोग दिव्य प्राणियों के लिए किया जाता था, और इसका इस्तेमाल वरुण और इंद्र जैसे देवताओं के लिए होता था। पारसी-ज़ोरोस्ट्रियन संस्कृति और इतिहास के अनुसंधान और संरक्षण के लिए समर्पित संगठन की निदेशक शेर्नाज़ कहती हैं कि पारसी धर्म में अच्छाई का मतलब अहुर मज़्दा से है, जो रोशनी और बुद्धि की शक्ति हैं। वहीं, बुराई की ताकत अंग्र मैन्यू है, जो अंधेरे और नकारात्मकता का प्रतीक है। अहुर मज़्दा, मित्र और सात 'अमेशा स्पेंटा' की शक्तियां, असुर वरुण और आदित्यों के समान ही हैं। ऋग्वेद में आदित्यों को सूर्य-देवताओं का एक समूह माना गया है। जो देवता कभी दोनों संस्कृतियों में पूजे जाते थे, बाद में पारसियों ने उन्हें मानना छोड़ दिया, लेकिन वैदिक परंपरा में उन्हें माना जाता रहा। और इसी तरह, वैदिक परंपरा के कुछ देवता पारसी परंपरा में भी बदल गए। लंदन की एसओएएस यूनिवर्सिटी के मारियानो एरिचिएलो उस सिद्धांत के बारे में बताते हैं कि कैसे मध्य एशियाई मैदानों में रहने वाली 'हिंद-ईरानी' आबादी अलग हो गई। वह कहते हैं, इस सिद्धांत की शुरुआत 19वीं सदी में उन भाषाविदों ने की थी जिन्होंने संस्कृत, अवेस्तान और अन्य हिंद-यूरोपीय भाषाओं की तुलना की थी। बाद में कुछ विद्वानों ने यह राय दी कि किसी धार्मिक विवाद के कारण ये दोनों लोग अलग हुए होंगे। मारियानो बताते हैं कि कैसे दोनों परंपराओं में कुछ पवित्र शब्दों का अर्थ उल्टा हो गया। वह समझाते हैं, "मिसाल के तौर पर, पारसी धर्म में अहुर मज़्दा सबसे बड़े भगवान हैं, जबकि वैदिक परंपरा में 'असुर' शब्द का मतलब धीरे-धीरे खराब या नकारात्मक हो गया। यह बदलाव इशारा करता है कि शायद कोई धार्मिक बदलाव हुआ होगा, जिसमें पहले के कुछ देवताओं को छोड़ दिया गया था। न केवल रीति-रिवाज और देवता, बल्कि पारसियों और हिंदुओं के पवित्र ग्रंथों अवेस्ता और ऋग्वेद में सुरक्षित भौगोलिक यादें भी एक साझा हिंद-ईरानी सांस्कृतिक दुनिया की ओर इशारा करती हैं। इन ग्रंथों में मध्य एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप में नदी प्रणालियों और भूभागों के समान विवरण मिलते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-offered-cheap-oil-to-pakistan-but-this-work-will-have-to-be-done" target="_blank">Russia ने पाकिस्तान को दिया सस्ते तेल का ऑफर, लेकिन करना होगा ये काम!</a></h3><h2>अवेस्ता को ऋग्वेद के चश्मे से समझें</h2><div>विशेषज्ञों के अनुसार भारतीय और फारसी सभ्यताएँ कज़िन कल्चर यानी एक ही जड़ से जुड़ी हुई हैं। ऋग्वेद के मंत्र और जरथुस्त्र की गाथाएँ छंद और विचारों में काफी मिलती-जुलती हैं। क्योंकि वैदिक संस्कृत पहले से सुरक्षित और अच्छी तरह समझी गई थी, इसलिए उसी के सहारे अवेस्ता की भाषा, कथाएँ और रीति-रिवाज़ समझना आसान हुआ। दोनों परंपराओं में कुछ प्राचीन देवता भी समान हैं जैसे मित्र (वचन और समझौते के देव), अपाम नपत (जल के स्रोत), वायु (हवा) और सोम/होमा (पवित्र पौधा)। यज्ञ और यास्ना जैसे अग्नि-पूजन भी दोनों धर्मों में मिलते हैं, जो दिखाते हैं कि 3000 साल से भी ज्यादा समय से ये परंपराएँ लगातार चली आ रही हैं। सभ्यताओं का सफर अक्सर रॉबरक्ट फ्रोस्टकी “दो अलग रास्तों” जैसा होता है। जहाँ पारसी परंपरा में अग्नि को ज्ञान और प्रकाश का प्रतीक मानकर सिर्फ पूजा तक सीमित रखा गया, वहीं हिंदू परंपरा में बाद में मृतकों का अंतिम संस्कार अग्नि में किया जाने लगा। फिर भी अग्नि दोनों में पवित्रता का प्रतीक रही। जैसे सीता की अग्निपरीक्षा इसका उदाहरण है। समय के साथ इंडो-आर्यों ने स्थानीय देवताओं को भी अपनाया और अपने देवताओं की संख्या बढ़ाई। जैसे पारसियों में अहुरा माज्दा सर्वोच्च देव बने, वैसे ही भारत में विष्णु (और उनके अवतार राम व कृष्ण) और शिव प्रमुख देवता बन गए। हजारों साल का यह साझा रिश्ता समय के साथ कमजोर पड़ता गया, खासकर जब ज़रथुष्ट्र धर्म वाला फारस आगे चलकर इस्लामिक देश बन गया।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अगर हम पूरी तस्वीर को एक साथ देखें तो समझ आता है कि भारत और ईरान का रिश्ता आता है कि भारत और ईरान का रिश्ता सिर्फ आज के तेल या किसी एक नेता के रहने या ना या ना रहने का मोहताज नहीं है।&nbsp; यह वो रिश्ता है जिसकी जड़े इंडो ईरानी भाषाओं, वेद अवस्था के मंत्रों और मुगलाई खानपान में बहुत गहराई तक घंसी हुई हैं। पारसियों का भारत का भारत के दूध में शक्कर की तरह घुल जाना कोई मामूली बात नहीं है। सुप्रीम लीडर मामूली बात नहीं है। सुप्रीम लीडर खामेनई खामेनई की मौत और इजराइल, ईरान युद्ध ने कूटनीति कूटनीति के सारे समीकरण पलट दिए हैं। लेकिन भारत और ईरान का यह सांस्कृतिक और आर्थिक ताना-बाना 21वीं सदी के सबसे खौफनाक तूफान को भी झेल जाने के लिए तैयार है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 18 Mar 2026 13:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/india-iran-relationship-that-america-and-israel-cannot-break-even-if-they-wanted-to</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/18/india-iran_large_1306_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अपनी पुरानी गलतियों की वजह से अब ट्रंप NATO को दोबारा खड़ा नहीं कर पाएंगे, हॉर्मुज का कंट्रोल अब भारत संभालेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/due-to-his-past-mistakes-trump-will-not-be-able-to-revive-nato]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ब्रिक्स को खत्म करने चला था अमेरिका। अब नाटो को बचाने के लाले पड़ गए हैं। नाटो खत्म होने की कगार पर है और हॉर्मोज स्ट्रीट पर जयशंकर साहब ने अमेरिका को नसीहत दे डाली है। ताकत के नशे में अंधे ट्रंप ने दुनिया को ऐसे अंधेरे में धकेल दिया जिससे बाहर निकलने का दम ट्रंप नहीं रखते। अब गेंद ईरान के पाले में है और ईरान ने ट्रंप के सामने शर्त रख दी है। आज की दुनिया में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। जहाज रुक गए हैं और अमेरिका ईरान युद्ध ने सबको परेशानी में डाल दिया है। मुख्य समस्या है हॉर्म स्टेट। यह एक संकरी नदी जैसी जगह है। 33 कि.मी. चौड़ी है और फ़िलहाल यह ईरान के कब्जे में है। यहां से दुनिया का 20% तेल गुजरता है। भारत की जरूरत की ऊर्जा भी लगभग 85% इसी रास्ते से आती है। कल्पना कीजिए कि कोई मुख्य चीज ही अगर बंद हो जाए तो फिर क्या हो? यहां ईरान ने दावा ऐसा किया है कि वो तब तक इस इसे बंद रखेंगे जब तक उसकी शर्तों को अमेरिका नहीं मान लेता और तब तक कच्चे तेल की कीमतें $200 को पार कर सकती हैं। यहां पर इससे महंगाई बढ़ेगी दुनिया में फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी। मतलब दुनिया किस अंधेरे में चली जाएगी उसका अंदाजा शायद ट्रंप को था नहीं। ईरान ने इस हाईवे को अमेरिका और उसके दोस्तों के लिए पूरी तरीके से बंद कर दिया है। ईरान कहता है कि हमारे दुश्मनों के जहाज यहां से नहीं गुजरेंगे। लेकिन बाकी देशों के लिए खुला है। बस हमारे साथ बात करो। साथ में यह भी कहा गया है कि जो तेल यहां से लेकर आप गुजरेंगे, जो गैस आप यहां से लेकर गुजरेंगे, उसका पेमेंट चीनी करेंसी युवान में होना चाहिए। हमारे साथ बात करके समन्वय करके आप आराम से यहां से निकल सकते हैं। लेकिन अमेरिका, इजराइल और उसके दोस्तों के लिए दोस्त वो दोस्त जो युद्ध में उसका साथ दे रहे हैं उनके लिए पूरी तरीके से रास्ता बंद है। नतीजा यह हुआ कि 25% तक तेल के दाम अमेरिका में बढ़ चुके हैं। इजराइल के पास इंटरसेप्टर मिसाइलें खत्म हो चुकी हैं। आयरन डोम सिस्टम उसका लगभग कमजोर है और अमेरिका उस इन इंटरसेप्टर की जो खेप है वो इजराइल में भेज नहीं रहा है। फरवरी 2026 से अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर हमले शुरू किए। ईरान ने जवाब में हॉर्म स्ट्रेट में माइंस बिछा दी। मतलब समुद्र में एक बमों का जाल बिछा दिया। बम से कोई भी जहाज टकराएगा तो वहीं पर उसी समंदर में समा जाएगा। अमेरिका ने दावा किया कि उसने 60 ईरानी जहाजों को डूबा दिया जो माइंस बिछा रहे थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/after-shivalik-now-nanda-devi-92700-metric-tonnes-of-lpg-has-arrived-in-india" target="_blank">शिवालिक के बाद अब नंदा देवी ने गुजरात के तट पर डाला डेरा, 92700 मीट्रिक टन LPG आ गया भारत</a></h3><h2>नाटो गठबंधन के रूप में क्यों नहीं लड़ रहा है?</h2><div>वर्तमान युद्ध के मापदंड नाटो के चार्टर के तहत निर्धारित नियमों का उल्लंघन दर्शाते हैं। चार्टर के अनुच्छेद 1 के अनुसार, सदस्य देशों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय विवाद को शांतिपूर्ण तरीके से हल करने के लिए प्रतिबद्ध होना चाहिए, जिससे अंतरराष्ट्रीय शांति, सुरक्षा और न्याय को खतरा न हो। सदस्य देशों से यह भी अपेक्षा की जाती है कि वे संयुक्त राष्ट्र के उद्देश्यों के विपरीत बल प्रयोग या धमकी का उपयोग करने से बचें। वर्तमान संघर्ष इस प्रथा का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसका प्रभाव वैश्विक स्तर पर फैल रहा है। अनुच्छेद 5 का प्रयोग, जो किसी सदस्य देश पर हमले की स्थिति में जवाबी कार्रवाई को अनिवार्य बनाता है, भी केवल रक्षा उपाय के रूप में, सशस्त्र हमले के जवाब में किया जा सकता है। 9/11 के बाद, अन्य सहयोगी देश अफगानिस्तान में अमेरिकी आक्रमण में शामिल होने के लिए बाध्य नहीं थे, बल्कि उन्होंने अमेरिका द्वारा गठित 'सहयोगी देशों के गठबंधन' में शामिल होने का विकल्प चुना, जिसमें अलग-अलग सहयोगी देशों ने अपना समर्थन देने का वादा किया। ब्रेनन सेंटर फॉर जस्टिस द्वारा चार्टर की व्याख्या के अनुसार, सहयोगी देश सैन्य कार्रवाई में भाग लेने के बदले में आर्थिक या मानवीय सहायता देने का वादा कर सकते हैं। भूगोल भी एक सीमित कारक है। नाटो के चार्टर के अनुच्छेद 6 के तहत, गठबंधन के सामूहिक रक्षा दायित्व केवल विशिष्ट क्षेत्रों पर लागू होते हैं। व्यापक रूप से, यूरोप और उत्तरी अमेरिका में सदस्य देशों के क्षेत्र, तुर्की और कर्क रेखा के उत्तर में स्थित उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र, जिसमें भूमध्य सागर में उनकी सेनाएँ और पोत शामिल हैं। ईरान और उसके आसपास चल रहा वर्तमान संघर्ष इन सीमाओं से पूरी तरह बाहर है। इन शर्तों को ध्यान में रखते हुए, नाटो सैन्य प्रतिक्रिया के लिए उच्च मानक निर्धारित करता है। इसलिए, इसके किसी भी सैन्य अड्डे या सदस्य देशों से संबंधित मिसाइलों पर हमला स्वतः ही अनुच्छेद 5 को लागू नहीं करता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/after-shivalik-nanda-devi-good-news-for-lpg-users-tankers-reaching-the-sea-in-quick-succession" target="_blank">मोदी ने गारंटी पूरी की...LPG वालों के लिए खुशखबरी, समुद्र का सीना चीरकर कैसे धड़ाधड़ पहुंच रहे टैंकर</a></h3><h2>वर्तमान स्थिति</h2><div>अब तक, गठबंधन ने अनुच्छेद 5 का हवाला दिए बिना, रसद और मिसाइल रक्षा जैसी सहायक सहायता तक ही अपनी भूमिका सीमित रखी है। युद्ध की शुरुआत में नाटो के महासचिव रुट्टे ने इस बात पर ज़ोर दिया था कि नाटो के शामिल होने की बिल्कुल कोई योजना नहीं है सिवाय इसके कि सहयोगी देश मिलकर इज़राइल के साथ जो कर रहे हैं, उसमें सहयोग करने के लिए अपनी तरफ से हर संभव प्रयास करें। कई यूरोपीय देशों ने नौसैनिक सुदृढ़ीकरण के लिए ट्रंप के आह्वान को अस्वीकार कर दिया है। जर्मन रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस ने कहा कि देश मौजूदा संघर्ष के लिए राजनयिक समाधान तलाश रहा है। उन्होंने 16 मार्च को कहा कि यह हमारा युद्ध नहीं है; हमने इसे शुरू नहीं किया है।" उन्होंने आगे कहा कि "क्षेत्र में और युद्धपोत भेजने से शायद वह लक्ष्य हासिल करने में मदद नहीं मिलेगी। सहयोगी देशों ने अपनी-अपनी मर्जी से हस्तक्षेप करने का फैसला किया है। ईरान द्वारा ड्रोन हमले के संदेह के बाद ब्रिटेन ने साइप्रस में स्थित अपने कुछ सैन्य ठिकानों का इस्तेमाल करने की अनुमति अमेरिका को दे दी है। हालांकि साइप्रस नाटो का सदस्य नहीं है, लेकिन ब्रिटेन है। ब्रिटिश प्रधानमंत्री कीर स्टारमर ने सोमवार को कहा कि ब्रिटेन के "हजारों सैनिक साइप्रस में तैनात हैं", साथ ही लड़ाकू विमानों के तीन स्क्वाड्रन और ड्रोन रोधी टीमें भी हैं जो ईरानी हमलों को रोकने में मदद करती हैं। अन्य सहयोगी देशों ने भी इस क्षेत्र में अपनी सैन्य तैनाती बढ़ा दी है। ग्रीस ने फ्रिगेट और एफ-16 विमान भेजे हैं, जबकि फ्रांस ने साइप्रस में लैंगडॉक फ्रिगेट तैनात किया है। नाटो बलों ने तुर्की के इंसिरलिक वायु सेना अड्डे के पास ईरानी ड्रोन और मिसाइलों को भी रोका है। अब तक, गठबंधन के पूर्वी हिस्से ने संघर्ष के प्रभावों को झेला है, हालांकि नाटो ने स्वयं औपचारिक रूप से युद्ध में प्रवेश करने से परहेज किया है।</div><h2>नाटो के प्रति ट्रंप की शिकायतें</h2><div>अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल से ही डोनाल्ड ट्रंप का दावा रहा है कि नाटो के अन्य सदस्य देशों ने गठबंधन के साझा रक्षा बजट में अमेरिका जितना योगदान नहीं दिया है। 2006 से, प्रत्येक सदस्य देश से यह अपेक्षा की जाती रही है कि वह अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का कम से कम 2% रक्षा पर खर्च करे, जबकि 2014 में एक औपचारिक घोषणा में कहा गया था कि जो देश इस लक्ष्य को पूरा नहीं कर रहे हैं, वे "एक दशक के भीतर 2% के दिशानिर्देश की ओर बढ़ने का लक्ष्य रखेंगे। नाटो के आंकड़ों के अनुसार, 2024 में कुल रक्षा खर्च में अमेरिकी रक्षा खर्च का हिस्सा 63% था, जो 2016 में 72% था, जब ट्रंप पहली बार राष्ट्रपति चुने गए थे। हालांकि दोनों आंकड़े काफी अच्छे हैं, फिर भी रक्षा पर खर्च किए गए सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के मामले में अमेरिका छठे स्थान पर है। इस जनवरी में दावोस में, ट्रंप ने गलत दावा किया कि 2% की शर्त के बावजूद, उनके आने से पहले "अधिकांश देश कुछ भी भुगतान नहीं कर रहे थे"। गैर-अमेरिकी सदस्यों द्वारा कुल रक्षा व्यय 2016 में 292 अरब डॉलर से बढ़कर 2024 में 482 अरब डॉलर हो गया। 2024 में नाटो के 31 सदस्यों में से 18 ने 2% रक्षा व्यय लक्ष्य को पूरा किया, जो 2016 में चार और 2020 में आठ सदस्यों से अधिक है। सैन्य खर्च में यह वृद्धि आंशिक रूप से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध से प्रेरित थी, जो फरवरी 2022 में शुरू हुआ था। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 5 का प्रयोग केवल एक बार किया गया है, 11 सितंबर, 2001 के आतंकवादी हमले के बाद अमेरिका द्वारा दी गई सहायता के लिए। कई नाटो सदस्य अफगानिस्तान में सैन्य हस्तक्षेप करने के लिए एक साथ आए। जब अमेरिका 2021 में इससे बाहर निकला, तब देश में नाटो के लगभग 10,000 सैनिक थे (जिनमें से 2,500 अमेरिकी थे), जो 2011 में 100,000 से अधिक थे। ब्रिटेन और अन्य यूरोपीय देशों के सैनिक इराक और अफगानिस्तान में लड़ते हुए शहीद हो गए। इस अवधि के दौरान अकेले डेनमार्क ने 18,000 सैनिक भेजे थे, और प्रति व्यक्ति मृत्यु दर के मामले में डेनमार्क सबसे उच्च देशों में से एक था, जहां 2002 से 2014 के बीच 43 सैनिकों की मृत्यु हुई। कई यूरोपीय नेताओं ने 2003 में इराक पर हुए आक्रमण को एक महंगी गलती के रूप में देखा है, जो तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश की गलत खुफिया जानकारी के कारण हुई थी।</div><h2>होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने के लिए आगे आएं दूसरे देश</h2><div>ट्रंप चाहते हैं कि नाटो और दूसरे देश भी होर्मुज स्ट्रेट को खुलवाने के लिए आगे आएं। उन्होंने जापान, दक्षिण कोरिया, चीन, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और फ्रांस का नाम लिया है। हालांकि किसी भी देश ने इसमें दिलचस्पी नहीं दिखाई। ऑस्ट्रेलिया ने तो साफ तौर पर इनकार कर दिया है, जबकि जापान ने कानूनों का हवाला दिया है। इस बेरुखी पर ट्रंप ने नाटो को धमकी दी है, तो पेइचिंग को याद दिलाया है कि होर्मुज स्ट्रेट से होकर उसका '90% तेल' जाता है, और उनकी चीन यात्रा टल भी सकती है। दूसरों को इस लड़ाई में खींचने की बेताबी बताती है कि ट्रंप फंसा महसूस कर रहे हैं। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के खिलाफ एकतरफा युद्ध तब शुरू किया, जब समझौते को लेकर बातचीत चल रही थी और माना जा रहा था कि इस बार कोई रास्ता निकल सकता है। इस एकतरफा फैसले का ही असर था कि ब्रिटेन ने शुरू में अपने सैन्य अड्डे इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं दी थी, जिसे लेकर ट्रंप आज तक नाराज बताए जाते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 17 Mar 2026 12:39:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/due-to-his-past-mistakes-trump-will-not-be-able-to-revive-nato</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/17/trump_large_1242_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चित्तरंजन दास से लेकर PM मोदी तक: 10 लाख लोगों ने ऐतिहासिक ब्रिगेड मैदान में आकर 'नोतुन बांग्ला' की क्रांति का बिगुल बजा दिया? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/10-lakh-people-gathered-at-the-historic-brigade-ground-and-sounded-the-bugle-of-the-notun-bangla]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले, प्रधानमंत्री मोदी ने कोलकाता में भाजपा की ऐतिहासिक रैली में विशाल जनसभा को संबोधित किया। बंगाल के पत्रकारों की माने तो पिछले 40 सालों में यह सबसे बड़ी भीड़ थी और भीड़ को रोकने के लिए ममता बनर्जी के प्रशासन ने अपनी पूरी शक्ति झोंक दी। जगह-जगह पोस्टर फाड़े गए। बसों को रोका गया। इसके बावजूद अगर 10 लाख से अधिक लोगों ने जनसभा में जुटकर इसे ऐतिहासिक बना दिया है। कहा जा रहा है कि&nbsp; ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। सिंगूर और नंदी्राम के दौरान भी ऐसी भीड़ नहीं जुटी थी। ऐसे में कई सवाल उठ रहे हैं कि क्या यह भीड़ बदलाव का संकेत है? बीजेपी का संगठनिक कौशल है या फिर कोई और कारण है? ब्रिगेड परेड ग्राउंड भारतीय इतिहास में एक विशेष स्थान रखता है और कई महत्वपूर्ण अवसरों पर यहाँ कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-stalin-modi-and-rahul-face-off-elections-in-four-states-will-change-the-country-politics" target="_blank">कौन जीतेगा चुनावी महाभारत? क्या बंगाल में होगा बदलाव? क्या केरल में आखिरी किला बचा पाएंगे वामपंथी?</a></h3><h2>ऐतिहासिक है ब्रिगेड मैदान</h2><div>यह ग्राउंड भारतीय सेना के पूर्वी कमान मुख्यालय के नियंत्रण में है और इसके पीछे प्रतिष्ठित विक्टोरिया मेमोरियल स्थित है। प्रारंभिक रूप से, प्लासी की लड़ाई में विजय प्राप्त करने के बाद फोर्ट विलियम में तैनात ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की सेनाओं के लिए इस ग्राउंड को परेड ग्राउंड के रूप में इस्तेमाल किया जाना था। औपनिवेशिक भारत के शासनकाल के दौरान देशबंधु चित्तरंजन दास ने रॉलेट एक्ट के खिलाफ मैदान पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। भारत की स्वतंत्रता के बाद, प्रधानमंत्री नेहरू ने ब्रिगेड परेड ग्राउंड में सोवियत नेताओं निकिता ख्रुश्चेव और निकोलाई बुल्गानिन के लिए एक सार्वजनिक स्वागत समारोह आयोजित किया था। इसके बाद, पाकिस्तान के विरुद्ध भारत की विजय के फलस्वरूप बांग्लादेश स्वतंत्र राज्य बना। इस अवसर पर बांग्लादेश के प्रधानमंत्री मुजीबुर रहमान ने भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निमंत्रण पर एक कार्यक्रम को संबोधित किया। रहमान ने अपने देश की स्वतंत्रता के लिए भारतीय सैनिकों द्वारा किए गए बलिदानों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए "जय भारत, जय बांग्ला" का नारा लगाया। उस समय पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे का उदय हुआ। कम्युनिस्टों ने मैदान में कई रैलियां आयोजित कीं और पूरा स्थल खचाखच भर दिया।</div><div>ब्रिगेड परेड ग्राउंड के क्रांतिकारी इतिहास के अनुरूप, ममता बनर्जी ने नवंबर 1992 में युवा कांग्रेस की नेता के रूप में एक ऐतिहासिक रैली का आयोजन किया। 19 साल बाद, वह पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनीं। कई वर्षों बाद, प्रधानमंत्री मोदी ने ‘परिवर्तन’ की महक से भरे वातावरण में एक जनसभा को संबोधित किया। ऐसा प्रतीत होता है कि भाजपा ब्रिगेड परेड ग्राउंड के उल्लेखनीय इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ने के लिए तैयार है। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम से लेकर कम्युनिस्ट रैलियों तक की विशाल रैलियों का गवाह रहा यह मैदान&nbsp; 'जय श्री राम' के नारों से गूंज रहा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/election-commission-has-ordered-the-removal-of-the-chief-secretary-of-west-bengal-from-his-post" target="_blank">West Bengal में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल! Election Commission ने राज्य के मुख्य सचिव को पद से हटाने का दिया आदेश</a></h3><h2>क्या ममता सरकार ने रैली में खड़ी की बाधाएं?</h2><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस रैली को संबोधित करते हुए गुंडागर्दी, ममता बनर्जी के राज सब पर कहा। सबसे पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्या कुछ कहा है? वो जान लेते हैं। मोदी ने कहा कि बंगाल सरकार अपराधियों की मदद से चल रही है। तृणमूल कांग्रेस के शासनकाल में बड़े पैमाने पर घुसपैठ की वजह से जनसांख्यिकी बदल गई है। कोलकाता के ब्रिगेड परेड ग्राउंड में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा, बंगाल में बदलाव अब दीवारों पर भी लिखा जा चुका है और बंगाल के लोगों के दिलों में भी छप चुका है। अब बंगाल से निर्मम सरकार का अंत होकर रहेगा और महाजंगलराज का खात्मा होगा। बंगाल में महाजंगलराज लाने वालों का काउंटडाउन शुरू हो चुका है। वो दिन दूर नहीं जब बंगाल में फिर से कानून का राज होगा। जो कानून तोड़ेगा और जो अत्याचार करेगा, उसे किसी भी कीमत पर छोड़ा नहीं जाएगा। चुन चुनकर जुल्मों का हिसाब लिया जाएगा। मोदी ने आरोप लगाया कि रैली को रोकने के लिए राज्य सरकार ने हरसंभव कोशिश की। रैली में लोगों को आने से रोकने के लिए प्रशासनिक स्तर पर कई बाधाएं खड़ी की गई। पुल बंद करवा दिए गए, गाड़ियों को रोका गया, ट्रैफिक जाम कराया गया और बीजेपी के झंडे और पोस्टर तक हटवा दिए गए। कोलकाता के मध्य इलाके में शनिवार को मोदी की रैली से करीब आधे घंटे पहले तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और बीजेपी समर्थकों के बीच जोरदार झड़प हो गई। इस हिंसक टकराव में एक पुलिस अधिकारी और बीजेपी के एक नेता घायल हो गए। मोदी ने बंगाल में 18,680 करोड़ रुपये की परियोजनाओं की शुरुआत की।</div><h2>क्या है चुनावी मुद्दे ?</h2><div>कानून-व्यवस्था, राजनीतिक हिंसा के साथ ही बीजेपी अवैध घुसपैठ को यहां बड़ा मुद्य बना रही है। वहीं, तृणमूल कांग्रेस एसआरआई को लेकर केंद्र सरकार पर लगातार आरोप जड़ रही है और वोट चोरी का आरोप लगा रही है। बीजेपी जहां बेरोजगारी, उद्योगों की खराब स्थिति की बात कर रही है साथ ही कह रही है कि यहां की खराब स्थिति की वजह ये युवा पढ़ने और नौकरी करने के लिए यहां से पलायन कर रहे हैं।</div><div>वहीं, तृणमूल कांग्रेस अपनी सरकार के कामों की बात कर रही है, साथ ही बंगाल की अस्मिता का मुद्दा बना रही है और केंद्र सरकार पर बंगाल के साथ अन्याय करने का भी आरोप लगा रही है। बीजेपी यह कह रही है कि तृणमूल कांग्रेस की वजह से केंद्र सरकार की योजनाओं का बंगाल के लोगों को फायदा नहीं मिल पा रहा है।</div><h2>ये है अहम पार्टियां ?</h2><div>यहां मुख्य मुकाबला तृणमूल कांग्रेस और बीजेपी के बीच ही दिख रहा है। तृणमूल कांग्रेस यहां 2011 से लगातार सत्ता में है। 2021 के चुनाव के बाद बीजेपी राज्य की मुख्य विपक्षी ताकत बनकर उभरी। इसके अलावा वाम मोर्चा और कांग्रेस भी मैदान में होगी।</div><h2>पिछले चुनाव का नतीजा</h2><div>पश्चिम बंगाल में विधानसभा की कुल 294 सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस ने 213 सीटों पर कब्जा किया। बीजेपी को 77 सीटें मिलीं।</div><div>बंगाल की राजनीति पर करीब से नजर रखने वालों का मानना है कि शुरुआत में लग रहा था कि शायद ममता बनर्जी आराम से बंगालजीत रही हैं। ममता बनर्जी की योजनाएं, महिलाओं को जो उन्होंने पैसा दिया वह सब लेकिन इसके बावजूद पश्चिम बंगाल में एक अंडर करंट है और ऐसा अनुमान जताया जा रहा है कि पश्चिम बंगाल के 70% हिंदू एकजुट हो चुके हैं। ह ऐतिहासिक है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ। ना देश के बंटवारे के समय हुआ। ना जब कांग्रेस सरकार उखाड़ फेंकी गई तब हुआ। ना जब ममता बनर्जी आई तब हुआ।&nbsp;</div><h2>बनारस से भी बड़ी रैली का दावा</h2><div>2013 में जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की के नाम की घोषणा हुई थी, राजनाथ सिंह ने घोषणा की थी, तो बनारस में एक रैली हुई थी और दावा यह किया जाता है कि उस रैली में 5 लाख से ज्यादा लोग जुटे थे। आसपास के जिलों से पैदल लोग जुट रहे थे। लेकिन कोलकाता के ब्रिगेड मैदान की रैली ने वह सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए। 10 लाख से ज्यादा का दावा किया जा रहा है। 10 लाख बंगाल के लिहाज से भी बहुत बड़ा दावा है। चलिए मान लें कि 10 लाख से ज्यादा नहीं जुटे होंगे। 5 लाख या 6 लाख भी जुटे होंगे। फिर भी उस लिहाज से यह रैली ऐतिहासिक है। इसे बंगाल की राजनीति का अंडर करंट कहा जा रहा है। आपको याद होगा अभी कुछ दिन पहले की ही बात है राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू आई उनको प्रोटोकॉल नहीं दिया गया। उसका भी असर देखने को मिल सकता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 16 Mar 2026 12:43:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/10-lakh-people-gathered-at-the-historic-brigade-ground-and-sounded-the-bugle-of-the-notun-bangla</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/16/brigade_large_1246_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तेल संकट के बीच PM मोदी ने चीन को दिया ऐसा ऑफर, चौंक गए ट्रंप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/amid-the-oil-crisis-pm-modi-made-such-an-offer-to-china-that-trump-was-shocked]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की अर्थव्यवस्था को रफ्तार देने के लिए मोदी सरकार ने एक बड़ा और अहम फैसला लिया है। सरकार ने चीन से आने वाले निवेश को लेकर कुछ शर्तों में ढील देने का फैसला किया है। यानी अब चीन की कंपनियों के लिए भारत में निवेश करना पहले से आसान हो सकता है। आपको बता दें सरकार का मानना है कि इससे देश में निवेश बढ़ेगा। रोजगार के नए अवसर बनेंगे और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को भी मजबूती मिलेगी। लेकिन इस फैसले को लेकर राजनीतिक और रणनीतिक बहस भी शुरू हो चुकी है। तो आखिर जानते हैं क्या है मोदी कैबिनेट का यह बड़ा फैसला। चीन को भारत में निवेश की अनुमति क्यों दी जा रही है?&nbsp; इससे भारत को फायदा होगा या खतरा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-launches-spy-plane-to-teach-trump-a-lesson" target="_blank">ट्रंप को सबक सिखाने का प्लान, चीन ने उतार दिया जासूसी जहाज</a></h3><h2>क्या है मोदी कैबिनेट का बड़ा फैस</h2><div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में यह फैसला हुआ। इसके तहत, अप्रैल 2020 में बनी प्रेस नोट 3 (PN3) की व्यवस्था में बदलाव को मंजूरी दी गई। सरकारी बयान के मुताबिक, इससे इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, कैपिटल गुड्स और सोलर सेल की मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा मिलेगा।' कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर जैसे चुनिंदा सेक्टरों और गतिविधियों में निवेश के प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर निर्णय कर दिया जाएगा। दरअसल 2020 में लद्दाख के गलवान संघर्ष के बाद भारत ने चीन सहित पड़ोसी देशों से आने वाले निवेश पर कड़ी निगरानी और सख्त मंजूरी की शर्तें लागू कर दी थी। उस समय सरकार का मकसद था कि भारत की कंपनियों पर किसी तरह का विदेशी नियंत्रण ना हो सके। लेकिन अब सरकार का मानना है कि अगर निवेश नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से आता है तो इससे भारतीय उपभोग को फायदा हो सकता है।</div><h2>क्या है अहम बदलाव?&nbsp;</h2><div>सरकार ने तय किया है कि इन देशों से कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कैपिटल गुड्स, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट्स, पॉलीसिलिकॉन और इंगट-वेफर जैसे चुनिंदा सेक्टरों और गतिविधियों में निवेश के प्रस्तावों पर 60 दिनों के भीतर निर्णय कर दिया जाएगा। सेक्टरों की लिस्ट में बाद में बदलाव भी किया जा सकता है। कहा गया कि निवेश करने वाली इकाई पर नियंत्रण और उसमें बहुमत हिस्सेदारी रेजिडेंट इंडियन सिटिजन या ऐसी रेजिडेंट इंडियन यूनिट के पास होनी चाहिए, जिस पर हर समय भारतीय नागरिक का नियंत्रण हो। इसके अलावा, 10 प्रतिशत तक के "गैर-नियंत्रणकारी एलबीसी लाभकारी स्वामित्व" वाले निवेशकों को स्वतः ही मंजूरी दे दी जाएगी। आमतौर पर 49% तक के इक्विटी स्वामित्व को "गैर-नियंत्रणकारी" माना जाता है, जबकि लाभकारी स्वामी किसी संस्था का स्वामी और नियंत्रक होता है। राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताओं को ध्यान में रखते हुए, पीएन3 प्रतिबंध में ढील देने का राजनीतिक निर्णय आर्थिक सर्वेक्षण 2023-24 के बाद लिया गया, जिसमें भारत की निर्यात प्रतिस्पर्धात्मकता को मजबूत करने के लिए चीनी कंपनियों से निवेश आकर्षित करने की प्रबल वकालत की गई थी। नीति आयोग के सदस्य राजीव गाबा की अध्यक्षता वाली एक उच्च स्तरीय समिति ने भी विनिर्माण क्षेत्र के हित में चीनी निवेश पर लगे प्रतिबंधों को हटाने की सिफारिश की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-orders-investigation-against-india-drags-16-countries-into-it" target="_blank">भारत के खिलाफ ट्रंप ने दिया जांच का आदेश, 16 देशों को भी घसीटा</a></h3><h2>क्या है बेनेफिशियल ओनरशिप?&nbsp;</h2><div>बेनेफिशियल ओनरशिप की परिभाषा में भी बदलाव किया गया है। बेनेफिशियल ओनरशिप निवेश करने वाली इकाई के स्तर पर देखी जाएगी। जिन कंपनियों में इन देशों के निवेशकों की बेनेफिशियल ओनरशिप 10% तक</div><div>होगी, उनके एफडीआई प्रस्ताव ऑटोमैटिक रूट से मंजूर किए जाएंगे। अभी तक किसी कंपनी में इन देशों का एक भी शेयरधारक होने पर एफडीआई के लिए भारत सरकार के शीर्ष स्तर से मंजूरी की जरूरत होती थी। हालांकि है इस छूट के बावजूद विभिन्न सेक्टरों में एफडीआई की जो सीमा तय की गई है, वह लागू होगी।</div><h2>क्यों लगाया था PN3?&nbsp;</h2><div>भारत ने एफडीआई के मामले में 17 अप्रैल 2020 को प्रेस नोट 3 की व्यवस्था बनाई थी। इसके तहत जिन देशों से भारत की थल सीमा जुड़ती है, अगर वहां के शेयरहोल्डर किसी कंपनी में हों, तो ऐसी कंपनी को भारत के किसी भी सेक्टर में निवेश के लिए सरकार से मंजूरी लेने की बात तय की गई थी। कोविड के दौरान कंपनियों का वैल्यूएशन काफी घट जाने के बीच उनमें निवेश के जरिए उनका स्वामित्व विदेशी हाथों में न चला जाए, इसे रोकने के लिए यह कदम उठाया गया था। हालांकि उसी साल जून में गलवान घाटी में भारतीय और चीनी सैनिकों के रक्तरंजित संघर्ष के बाद कड़ाई और बढ़ा दी गई।</div><h2>क्या है मकसद?&nbsp;</h2><div>सरकारी बयान में कहा गया पॉलिसी में बदलाव का उद्देश्य स्टार्टअप्स और डीप टेक्नालॅजी स्टार्टअप्स के लिए ग्लोबल फंड्स से ज्यादा एफडीआई लाना और कारोबारी सहूलियत बढ़ाना है। दरअसल भारत तेजी से मैन्युफैक्चरिंग हब बनने की कोशिश कर रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो पार्ट्स और टेक्नोलॉजी सेक्टर में भारी निवेश की जरूरत है। ऐसे में चीन की कई बड़ी कंपनियां भारत में फैक्ट्री लगाने और निवेश करने की इच्छुक बताई जा रही है। तो इसलिए सरकार का मानना है कि अगर सही नियमों और सुरक्षा जांच के साथ निवेश की अनुमति दी जाए तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा मिल सकता है।</div><h2>क्यों उठ रहे सवाल</h2><div>हालांकि इस फैसले को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के साथ रणनीतिक और सुरक्षा संबंधी चिंताओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वहीं सरकार का कहना है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े सेक्टर में किसी भी तरह की ढील नहीं दी जाएगी। सिर्फ उन क्षेत्रों में निवेश को बढ़ावा दिया जाएगा जहां भारत को तकनीक और पूंजी की जरूरत है। अगर यह नीति लागू होती है तो भारत में बड़े पैमाने पर विदेशी निवेश आ सकता है। इससे नई फैक्ट्रियां लगेंगी। रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और भारत वैश्विक सप्लाई चेन में और मजबूत हो सकता है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत आर्थिक फायदे और रणनीति सुरक्षा के बीच संतुलन बना पाएगा? चीन के निवेश को लेकर मोदी सरकार का यह कदम आने वाले समय में भारत की अर्थव्यवस्था और राजनीति दोनों पर असर डाल सकता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-friendly-takeover-plan-has-caused-a-stir-worldwide" target="_blank">Trump के 'फ्रेंडली टेकओवर' प्लान ने दुनियाभर में मचाया हड़कंप! वेनेजुएला-ईरान के बाद अब इस देश से अमेरिका करेगा 64 साल पुराना हिसाब बराबर</a></h3><div>बहरहाल,&nbsp;मोदी सरकार का चीनी निवेश नियमों (पीएन3) में ढील देने का फैसला एक व्यावहारिक लेकिन चुनौतीपूर्ण कदम है। भारत को ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग हब बनने और रोजगार बढ़ाने के लिए विदेशी पूंजी और तकनीक की सख्त जरूरत है। लेकिन, दूसरी ओर चीन के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हमारा मानना है कि यह फैसला सरकार की आर्थिक कूटनीति का एक बड़ा परीक्षण है। अगर 'नियंत्रित निवेश' और 'सुरक्षा' के बीच यह मुश्किल संतुलन साध लिया जाता है, तो यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक गेम-चेंजर साबित होगा। हालांकि, इसकी असली सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जमीनी स्तर पर इन सुरक्षा मानकों और शर्तों को कितनी कड़ाई और पारदर्शिता के साथ लागू किया जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 13 Mar 2026 13:18:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/amid-the-oil-crisis-pm-modi-made-such-an-offer-to-china-that-trump-was-shocked</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/13/modi_large_1320_19.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Trump के 'फ्रेंडली टेकओवर' प्लान ने दुनियाभर में मचाया हड़कंप! वेनेजुएला-ईरान के बाद अब इस देश से अमेरिका करेगा 64 साल पुराना हिसाब बराबर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-friendly-takeover-plan-has-caused-a-stir-worldwide]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मिडिल ईस्ट के युद्ध का आज तेरहवां दिन है। लेकिन 2026 ऐसा साल बन चुका है जहाँ एक संकट खत्म नहीं होता कि दूसरा सामने खड़ा मिल जाता है। अब सवाल उठ रहा है कि क्या अगला मोर्चा क्यूबा बनने वाला है? डोनाल्ड ट्रंप के बयान ने इस चर्चा को और तेज कर दिया है। ट्रंप इसे “फ्रेंडली टेकओवर” यानी शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन बता रहे हैं। लेकिन जमीन पर जो हालात बन रहे हैं, वो किसी भी तरह से शांतिपूर्ण नहीं दिखते। जनवरी से अमेरिका ने क्यूबा पर जो आर्थिक घेराबंदी शुरू की है, उसका असर अब साफ दिखने लगा है। पिछले महीने एक चौंकाने वाली बात सामने आई। क्यूबा को एक भी बैरल तेल नहीं मिला। स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि कई हवाई जहाज़ क्यूबा में उतरने से बच रहे हैं, क्योंकि वहाँ उन्हें वापस उड़ान भरने के लिए पर्याप्त ईंधन नहीं मिल रहा। अस्पतालों ने भी मजबूरी में गैर-जरूरी ऑपरेशन और इलाज रोक दिए हैं। लेकिन यहाँ एक बड़ा सवाल भी है। पिछले 50 सालों से बार-बार कहा गया कि क्यूबा की सरकार गिरने वाली है,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">लेकिन हर बार यह भविष्यवाणी गलत साबित हुई। अब जब अमेरिका पहले से ही मिडिल ईस्ट के युद्ध में उलझा हुआ है, तो क्या वाकई वह क्यूबा में नया सैन्य मोर्चा खोल सकता है? आज हम अमेरिका और क्यूबा के रिश्तों का एमआरआई स्कैन करेंगे। ये कब बिगड़ने शुरू हुए, क्या ये हमेशा से ऐसे थे? मौजूदा स्थिति क्या है?&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/hero-or-villain-how-was-ayatollah-ali-khamenei-in-the-eyes-of-india" target="_blank">शियाओं के 'इमाम', तो कश्मीर पर दिए थे विवादित बयान, हीरो या विलेन, आयतुल्ला अली खामेनेई भारत की नजर में कैसे थे?</a></h3><h2>ट्रंप का फ्रेंडली टेक ओवर</h2><div>जनवरी में जब क्यूबा की स्थिति पर चर्चा हुई थी, तब मामला वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी से जुड़ा था। उस समय भी क्यूबा की हालत बहुत खराब थी। रोज़ लंबे ब्लैकआउट, चरमराती अर्थव्यवस्था और कई बार पूरे देश का बिजली ग्रिड गिर जाना। सरकार हर बार किसी तरह अस्थायी मरम्मत करके स्थिति संभाल रही थी। लेकिन असली झटका तब लगा जब वेनेजुएला से आने वाला तेल बंद हो गया। यहीं से क्यूबा की ऊर्जा संकट की असली शुरुआत हुई। दिलचस्प बात यह है कि पिछले साल मैक्सिको क्यूबा का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बन गया था। मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शेनबाम ने कहा था कि वे पहले से हुए तेल समझौतों को निभाएँगी। उन्होंने इसे मानवीय और संप्रभुता का मामला बताया था। मैक्सिको की राष्ट्रपति क्लाउडिया शेनबाम ने कहा था कि वे पहले से हुए तेल समझौतों को निभाएँगी। उन्होंने इसे मानवीय और संप्रभुता का मामला बताया था। लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं। अमेरिका की रणनीति साफ दिख रही है। क्यूबा के पास आने वाला हर डॉलर, हर बैरल तेल और हर रास्ता बंद कर देना।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/china-russia-left-muslim-ummah-not-even-agree-why-was-iran-left-alone" target="_blank">चीन-रूस जैसे मित्र देशों ने छोड़ा साथ, मुस्लिम उम्माह के नाम पर भी नहीं बनी बात, अकेला महाशक्तियों से लड़ता-मरता ईरान इतिहास में अपना नाम दर्ज करा जाएगा?</a></h3><h2>क्यूबा और अमेरिका की दुश्मनी की कहानी</h2><div>डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका के एकलौते राष्ट्रपति नहीं हैं जो क्यूबा पर सख्त हो रहे हैं। क्यूबा और अमेरिका के बीच की दुश्मनी कई दशकों पुरानी है। 1898 में अमेरिका ने स्पेन को हराया। जिसके बाद स्पेन ने क्यूबा पर अपने सभी दावों को छोड़ दिया। इसे अमेरिका को सौंप दिया। साल 1902 में क्यूबा स्वतंत्र हुआ और टॉमस इस्ट्राडा पाल्मा इसके पहले राष्ट्रपति बने। लेकिव प्लैट संशोधन के कारण द्वीप अमेरिकी संरक्षण में रहा और इसके कारण अमेरिका को क्यूबाई मामलों में हस्तक्षेप करने का अधिकार मिला। कुछ साल बाद क्यूबा की राजनीति फिर उथल-पुथल में फँस गई। राष्ट्रपति इस्ट्राडा को इस्तीफा देना पड़ा और होजे मिगुएल गोमेज़ के नेतृत्व में हुए विद्रोह के बाद अमेरिका ने क्यूबा में हस्तक्षेप कर दिया। इसके बाद 1909 में अमेरिका की निगरानी में चुनाव कराए गए, जिनमें होजे मिगुएल गोमेज़ राष्ट्रपति बने। लेकिन उनका कार्यकाल भी विवादों से घिर गया और उन पर जल्द ही भ्रष्टाचार के आरोप लगने लगे। 1912 में जब क्यूबा में नस्लीय भेदभाव के खिलाफ़ अश्वेत समुदाय ने विरोध प्रदर्शन शुरू किए, तो हालात संभालने के लिए अमेरिकी सेना एक बार फिर क्यूबा में उतरी और आंदोलन को दबाने में मदद की। इसके कुछ साल बाद, 1933 में क्यूबा की राजनीति में एक और बड़ा मोड़ आया। सेना के अफसर फुलगेन्सियो बतिस्ता के नेतृत्व में तख्तापलट हुआ और तत्कालीन राष्ट्रपति जेरार्डो मचाडो को सत्ता से हटा दिया गया। बतिस्ता का शासन लंबे समय तक चला, लेकिन इसके खिलाफ असंतोष बढ़ता गया। 1953 में फ़िदेल कास्त्रो ने बतिस्ता सरकार के खिलाफ विद्रोह की शुरुआत की, हालांकि यह पहली कोशिश सफल नहीं हो पाई। विदेश नीति के विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका और क्यूबा के बीच असली टकराव की शुरुआत 1959 में हुई। उसी साल फ़िदेल कास्त्रो की क्रांति सफल हुई और उन्होंने अमेरिका समर्थित सरकार को सत्ता से हटा दिया। शुरुआत में अमेरिका ने कास्त्रो की नई सरकार को स्वीकार कर लिया था। लेकिन हालात तब बदलने लगे जब क्यूबा ने अमेरिका के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी सोवियत संघ से रिश्ते मजबूत करने शुरू किए और उसके साथ व्यापार बढ़ाया। इसके साथ ही क्यूबा सरकार ने अमेरिकी कंपनियों की संपत्तियों को अपने नियंत्रण में ले लिया और अमेरिकी उत्पादों पर भारी टैक्स लगा दिया। यहीं से दोनों देशों के रिश्तों में गहरी दरार पड़ गई और अमेरिका-क्यूबा दुश्मनी की नींव मजबूत हो गई।</div><h2>जब क्यूबा ने अमेरिका की तख़्तापलट की कोशिश नाकाम कर दी</h2><div>1961 में अमेरिका ने क्यूबा में फ़िदेल कास्त्रो की सरकार गिराने के लिए एक बड़ा सैन्य अभियान चलाया। इस ऑपरेशन को इतिहास में “बे ऑफ़ पिग्स इनवेज़न” के नाम से जाना जाता है। अमेरिका ने कास्त्रो सरकार के विरोध में मौजूद क्यूबाई विद्रोहियों और निर्वासित लोगों को सैन्य प्रशिक्षण, हथियार और आर्थिक मदद दी। योजना यह थी कि ये विद्रोही क्यूबा में हमला करेंगे और जनता का समर्थन मिलते ही कास्त्रो की सरकार गिर जाएगी। लेकिन यह योजना पूरी तरह फेल हो गई। इस असफलता की एक बड़ी वजह यह भी थी कि अमेरिका की ओर से वादा की गई हवाई सहायता समय पर नहीं पहुंच सकी। उस समय अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन एफ. कैनेडी थे और इस नाकामी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अमेरिका की छवि को बड़ा झटका लगा। इस घटना के बाद क्यूबा ने अपनी सुरक्षा के लिए सोवियत संघ से नज़दीकियां और बढ़ा लीं। सोवियत संघ को क्यूबा में गुप्त रूप से परमाणु मिसाइलें तैनात करने की अनुमति दे दी गई। अक्टूबर 1962 में अमेरिकी जासूसी विमानों ने इन मिसाइलों का पता लगा लिया। इसके बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच तनाव अचानक बहुत बढ़ गया और दुनिया परमाणु युद्ध के बेहद करीब पहुंच गई। करीब 13 दिनों तक चले इस संकट के बाद आखिरकार सोवियत नेता निकिता ख्रुश्चेव ने क्यूबा से मिसाइलें हटाने पर सहमति दे दी। क्यूबा के आम लोगों ने विद्रोहियों का साथ नहीं दिया और कास्त्रो की सेना ने बेहद तेजी से जवाबी कार्रवाई की। सिर्फ तीन दिनों के भीतर ही इस पूरे अभियान को कुचल दिया गया। इसके बदले में अमेरिकी राष्ट्रपति कैनेडी ने क्यूबा पर हमला न करने का वादा किया और साथ ही तुर्की में तैनात अमेरिकी मिसाइलें हटाने पर भी सहमति दी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/will-nandigram-history-repeat-itself-in-mamata-banerjee-stronghold-bhawanipur" target="_blank">ममता के गढ़ भवानीपुर में भी नंदीग्राम वाला इतिहास दोहराएगा? ये हुआ तो बंगाल चुनाव का पूरा गेम ही बदल जाएगा</a></h3><h2>अमेरिका इसलिए है दुनिया का दादा</h2><div><b>विदेशों में 200 से ज्यादा बेस</b></div><div>पेटागन की बेस स्ट्रक्बर रिपोर्ट और कुछ स्वतंत्र सैन्य विशेषज्ञों के आंकड़ों के अनुसार अमेरिका के पास दुनिया का सबसे बड़ा विदेशी सैन्य नेटवर्क है। पेंटागन आधिकारिक तौर पर केवल प्रमुख चेसों की गिनती बताता है। इनकी संख्या करीब 200 के आसपास हो सकती है। लेकिन यदि छोटे पैड्स और लॉजिस्टिक ठिकानों को जोड़ लिया जाए तो विदेशों में यह संख्या 600 के पार पहुंच जाती है। ये बेस दुनिया के लगभग 80 देशों और क्षेत्रों में फैले हुए हैं। सबसे ज्यादा बेस जापान, जर्मनी और दक्षिण कोरिया में हैं।&nbsp;</div><div><b>13 लाख सक्रिय सैनिक</b></div><div>थल सेना : 4,54,000</div><div>नौ सेना : 3,34,000</div><div>वायु सेना 3,28,000</div><div>मरीन कॉप्स 1,72,300</div><div>कॉस्ट गार्ड : 50,000</div><div>स्पेस फोर्स 10,400</div><div>रिजर्व बल 7,90,000</div><h2>हथियारों का सबसे बड़ा जखीरा</h2><div><b>कई तरह के उनत हथियारों से लैस है अमेरिकी सेना</b></div><div><b>परमाणु शक्ति: </b>अमेरिका उन चुनिंदा देशों में से है जिसके पास जमीन, हवा और समुद्र तीनों जगहों से परमाणु हमला करने की क्षमता है। सिपरी ईवरचुक के अनुसार इसके पास कुल मिलाकर 5,177 परमाणु वॉरहेड है (2025 में)।</div><div><b>वायु शक्ति: </b>अमेरिका के पास करीब 13,200 सैन्य विमान हैं, जिनमें 2,800 फाइटर प्लेन हैं। दुनिया का सबसे शक्तिशाली स्टील्थ फाइटर प्लेन एफ-22 रैप्टर, एफ-15 ईशल, एफ-18 सुपर हॉर्नेट (नेवी के लिए) जैसे जेट शामिल।</div><div><b>समुद्री शक्ति: </b>इसके पास करीब 290 सक्रिय युद्धपोत हैं। इनके अलावा 11 एपक्राफ्ट कैरियर हैं (एक कैरियर पर 90 से ज्यादा विमान रह सकते हैं)। सगभग 70 से ज्यादा डिस्ट्रॉपर्स और अनेक पनडुब्बियां भी हैं।</div><div><b>बल शक्ति: </b>अमेरिका के पास हजारों की संख्या में मुद्धक टैंक हैं। इनमें मुख्य युद्धक टैंक M1A2 Abrams को संख्या करीच 1,500 हो सकती है। इसे दुनिया के सबसे भारी और अभेद्य टैंकों में से एक माना जाता है।</div><div><b>मिसाइल डिफेंस सिस्टम इसका सबसे लोकप्रिय</b></div><div>मिसाइत डिफेंस सिस्टम है पेट्टिवीट (PAC-3) जो कम एवं मध्यम दूरी की मिसाइलों और डॉन से रक्षा करता है। 'धाड' लंबी दूरी की मिसाइलों को रोकने में सक्षम है।</div><h2>ट्रंप और बाइडन प्रशासन का क्यूबा पर रुख़</h2><div>इसके बाद अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति बने और उनका पहला कार्यकाल शुरू हुआ। ट्रंप ने क्यूबा को लेकर बराक ओबामा सरकार के ज़्यादातर फैसलों को पलट दिया। उन्होंने क्यूबा पर फिर से सख़्ती बढ़ा दी।</div><div>क्यूबा की सेना से जुड़ी कंपनियों के साथ व्यापार पर रोक लगा दी गई, अमेरिकी नागरिकों के अकेले क्यूबा यात्रा करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, और क्रूज़ जहाज़ों के साथ-साथ ज़्यादातर उड़ानों को भी बंद कर दिया गया। 2019 में ट्रंप प्रशासन ने क्यूबा को फिर से आतंकवाद का समर्थन करने वाला देश घोषित कर दिया। इसी दौरान एक और रहस्यमयी मामला सामने आया। क्यूबा में तैनात अमेरिकी और कनाडाई दूतावास के कई कर्मचारियों को अजीब तरह की स्वास्थ्य समस्याएँ होने लगीं। कुछ लोगों को सुनाई देना कम हो गया, तो कुछ को गंभीर दिमाग़ी परेशानी होने लगी। बाद में इस रहस्यमयी बीमारी को “हवाना सिंड्रोम” नाम दिया गया। इसके बाद जो बाइडन अमेरिका के राष्ट्रपति बने। बाइडन प्रशासन ने क्यूबा को लेकर कुछ नियमों में आंशिक ढील दी। क्यूबा में रहने वाले परिवारों को अमेरिका से ज़्यादा पैसे भेजने की अनुमति दी गई, क्यूबा के लिए और अधिक उड़ानें शुरू की गईं। लेकिन 2021 में क्यूबा के अंदर हालात फिर बिगड़ गए।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">खाने-पीने की चीज़ों, दवाओं और बिजली की भारी कमी से परेशान होकर हजारों लोग सड़कों पर उतर आए और सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। सरकार ने इन प्रदर्शनों को सख़्ती से दबाया,&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">कई लोगों को गिरफ्तार किया गया और इंटरनेट सेवाएँ भी बंद कर दी गईं। इन घटनाओं के बाद बाइडन प्रशासन ने क्यूबा पर कुछ नए प्रतिबंध भी लागू कर दिए।</span></div><div><br></div><div>कुल मिलाकर कहें तो इतिहास में जब भी किसी सरकार को जनता के दबाव से गिरते देखा गया है, तो एक कॉमन चीज जो नजर आती है वो हथियार थामने वाले ये तय कर लेते हैं कि अब उनके लिए आदेश देने वाले नेताओं के लिए जान देना जरूरी नहीं रह गया है। इसके अलग अलग पहलु हो सकते हैं। कहीं यह व्यक्तिगत स्वार्थ की वजह से होता है, कहीं विचारधारा या धर्म के प्रति निष्ठा प्रमुख कारक होता है। कहीं परिस्थितियाँ ही लोगों को ऐसा कदम उठाने पर मजबूर कर देती हैं। लेकिन एक बात साफ है कि जब तक किसी राज्य के पास ऐसे लोग हैं जो हथियार उठाकर उसे बचाने के लिए तैयार हैं, तब तक वह सरकार काफी मजबूत स्थिति में रहती है। अब मान लीजिए कि क्यूबा वॉशिंगटन के साथ “ज़ीरो डे” तक कोई समझौता नहीं कर पाता, तो सबसे बड़ी परीक्षा उन लोगों की होगी जो वहाँ बंदूकें पकड़े खड़े हैं। यानी सेना और सुरक्षा बलों की वफादारी की असली परीक्षा। अंत में यही तय करेगा कि आगे क्या होगा? क्या क्यूबा में शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन होगा,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">या फिर एक नई क्रांति शुरू होगी, या फिर यह स्थिति एक और सैन्य हस्तक्षेप की जमीन तैयार करेगी।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 12 Mar 2026 13:32:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-friendly-takeover-plan-has-caused-a-stir-worldwide</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/3/12/trump_large_1334_19.webp" />
    </item>
  </channel>
</rss>