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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[मोदी मॉडल पर चुनाव लड़ने चले थे ट्रंप, 9 सर्वे में जनता ने किया रिजेक्ट, अब 2 साल कठपुतली बनकर रहेंगे!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-set-out-to-contest-the-election-based-on-the-modi-model-but-the-public-rejected-him-in-nine]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>"कोई भी हारने वाले को पसंद नहीं करता। कोई भी धमकाया जाना पसंद नहीं करता। फिर भी हम खड़े हैं, हम धरती पर सबसे बड़ी महाशक्ति हैं और हर कोई हमारे हिस्से का खा रहा है। यह ठीक नहीं है। अगर मैं अपना धंधा ऐसे चलाता तो खुद को बाहर कर देता। अमेरिका को फिर से जीतना शुरु करना होगा। आओ हम सब मिलकर अमेरिका को मजबूत बनाएं और उसे फिर से महान बनाएं।" इन शब्दों के साथ अकड़ते और हवा में मुट्टियां लहराते हुए डोनाल्ड जॉन ट्रंप ने जून 2015 में दुनिया की सबसे ताकतवर कुर्सी को हासिल करने के लिए अपने शुरु किए चुनाव प्रचार को जीत के साथ समाप्त किया था। कट टू 2024 &nbsp;हम अपने देश को ठीक करने में मदद करने जा रहे हैं। हमारे पास एक ऐसा देश है जिसे मदद की ज़रूरत है और उसे मदद की सख्त ज़रूरत है। हम अपनी सीमाएं फिक्स करने जा रहे हैं। हम सब कुछ फिक्स करने जा रहे हैं। इन लाइनों के साथ अपनी चुनावी जीत के बाद ट्रंप ने ये दर्शाया था कि आने वाले दिनों में कुर्सी संभालने के बाद उनके तेवर कैसे रहने वाले हैं। जनवरी 2024 में दोबारा से शपथ लेने के तुरंत बाद इन्होंने कहा कि अवैध अप्रवासियों को बर्थ राइट सिटीजनशिप नहीं मिलेगी। फिर कहा ड्राइवर गाड़ी निकालो हमें डब्लूएचओ से बाहर जाना है। फिर कहा क्लाइमेट चेंज बकवास है। अमेरिका पेरिस समझौते जैसी फालतू चीज में शामिल नहीं होगा। दुनिया मतलब राष्ट्रपति बने थे अमेरिका के लेकिन दुनिया को ये दिखा रहे थे कि नहीं मैं पूरी दुनिया का राष्ट्रपति बन गया हूं। जिसे चाह रहे थे उसे धमका रहे जिसे जैसे चाह रहे थे उसके साथ वैसा बर्ताव कर रहे थे। किसी की बेइज्जती वाइट हाउस में बिठाकर कर रहे थे। तो किसी की बेइज्जती अपने बयान में बयानों में कर रहे थे। न क्या आप यकीन करेंगे कि वही ट्रंप जो दुनिया को धमका रहे थे अब से पहले तक वो ट्रंप आज गिड़गिड़ा रहे हैं। अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की मुश्किलें बढ़ती दिखाई दे रही है। एक तरफ देश में महंगाई और बढ़ती कीमतों से आम जनता परेशान है तो दूसरी तरफ ट्रंप की लोकप्रियता में भी लगातार गिरावट देखने को मिल रही है और अब इन सबका असर नवंबर में होने वाले मध्यावधि यानी कि मिड टर्म चुनाव पर दिखाई दे सकता है। अमेरिका में 3 नवंबर को मिड टर्म चुनाव होने हैं और इन चुनाव से यह तय होगा कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी अमेरिकी संसद यानी कि कांग्रेस के दोनों सदनों में आप अपना बहुमत बचा पाती है या फिर नहीं। लेकिन चुनाव से ठीक पहले सामने आए कई सर्वेक्षणों यानी कि सर्वे में रिपब्लिकन पार्टी की चिंता बढ़ गई है। इन सर्वेक्षणों में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिलती दिखाई दे रही है और सबसे बड़ी बात यह है कि अमेरिकी मतदाता अब अर्थव्यवस्था, महंगाई और सरकार की नीतियों को लेकर सवाल उठा रहे हैं। कई लोगों का मानना है ट्रंप की नीतियों की वजह से उनकी रोजमर्रा की जिंदगी और ज्यादा महंगी हो गई है यानी महंगाई बढ़ी है। ऐसे में सवाल है क्या अमेरिका की जनता ट्रंप सरकार के कामकाज से नाराज है? क्या यह नाराजगी चुनाव में रिपब्लिकन पार्टी को भारी पड़ सकती है? और अगर डेमोक्रेटिक पार्टी जीत जाती है तो ट्रंप के लिए आगे की राह कितनी मुश्किल हो जाएगी? आइए इस पूरी राजनीतिक तस्वीर का एमआरआई स्कैन करते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/marco-rubio-jamnagar-reliance-refinery-mukesh-ambani-us-india-energy-relations" target="_blank" rel="noopener">Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा?</a></h3><h2>दुनिया को धमकाने वाले ट्रंप गिड़गिड़ाने क्यों लगे</h2><p><br>आपने देखा होगा किस तरीके से अमेरिका ने रशिया से डीजल खरीदने की डील की वो कोई आम डील नहीं थी। वो डीजल जरूर आम हो सकता है। 3 लाख टन डीजल जरूर आम सी बात हो सकती है। जरूर किसी और देश से ज्यादा पैसे में अमेरिका खरीद सकता था उस डीजल को लेकिन रशिया के सामने ही क्यों इसके लिए गिड़गिड़ाया? क्यों यूक्रेन को अकेला छोड़ दिया? जिस यूक्रेन को बिलियंस ऑफ डॉलर दिए कि रूस के साथ लड़ाई करो। &nbsp;मतलब दुनिया में बहुत सारी चीजें ऐसे जापान का साथ छोड़ दिया। साउथ कोरिया को मना कर दिया। यूक्रेन का नेट बंद करवा दिया। आइलॉन मस्क के यूरोप का नेट की स्पीड घटवा दी। डेनमार्क को धमका दिया कि हमें ग्रीनलैंड चाहिए ही चाहिए। वो ट्रंप आज दुनिया के सामने गिड़गिड़ा रहे हैं। दुनिया में भी पहले रूस के सामने गिड़गिड़ाए और अब भारत में उनका संदेश लेकर मार्को रूबियो फिलहाल भारत में मौजूद है। मार्को रूबियो जामनगर रिफाइनरी में गए। जामनगर की रिफाइनरी वो रिफाइनरी है जो रोजाना 14 लाख बैरल तेल रिफाइन करती है । वेनेजुएला के तेल पर कब्जा तो अमेरिका ने कर लिया लेकिन उसे रिफाइन नहीं कर सकता। उसके लिए भारत की जरूरत होगी। आज अमेरिका को डीजल की जरूरत है। पेट्रोल की जरूरत है और इसी वजह से जो अप्रूवल रेटिंग है ट्रंप की वो लगातार घटती जा रही है क्योंकि अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ रही है। अमेरिका में रहना मुश्किल हो गया है। अमेरिका में रहना महंगा हो गया है। खाना महंगा हो गया है। ऊर्जा महंगी हो गई है। तो अब विटर्म में जाने वाले हैं ट्रंप रिपब्लिकन पार्टी डेमोक्रेटिक पार्टी है। दोनों पार्टियां चुनाव में जाने वाली हैं। 3 नवंबर को यह चुनाव है। &nbsp;ट्रंप चाहते हैं कि 3 नवंबर से पहले लगभग 10-12 दिन जो हैं उससे पहले पहले वो सब कुछ ठीक कर लें। जो महंगाई आउट ऑफ कंट्रोल जा चुकी है उसे वो कंट्रोल कर रहे हैं। कई रिपोर्ट्स दावा करती है कि अमेरिका में रहने वाले चार लोगों में से तीन लोग ट्रंप से नफरत करते हैं। ट्रंप की नीतियों का समर्थन नहीं करते। मतलब 25% लेकिन कुछ रिपोर्ट्स फिर भी थोड़ा सा दावा करती हैं कि नहीं थोड़ी सी इज्जत बची हुई है और अभी लगभग 31% तक ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-secretary-of-state-drops-a-bombshell-upon-arrival-in-india-leaving-everyone-stunned" target="_blank" rel="noopener">रूस पर चौंकाया...भारत पहुंचते ही अमेरिका के विदेश मंत्री ने किया बड़ा धमाका, सब हैरान!</a></h3><h2><br>34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट</h2><p><br>आपको बता दें कि अप्रूवल रेटिंग जो होती है वो डोनाल्ड ट्रंप की गिरती जा रही है। अब अप्रूवल रेटिंग का मतलब यह होता है कितने लोग राष्ट्रपति के कामकाज से संतुष्ट हैं और कितने लोग उनसे असहमत हैं। एनबीसी न्यूज़ के एक रिपोर्ट के मुताबिक सिर्फ 34% अमेरिकी ट्रंप के कामकाज से संतुष्ट हैं। जबकि 66% लोगों ने उनके प्रदर्शन पर असहमति जताई है। इस सर्वेक्षण में 51% लोगों ने तो ट्रंप के कामकाज से बहुत ज्यादा असहमति जताई है और यह उनके दूसरे कार्यकाल के दौरान इस सर्वे में दर्ज किया जा किया गया सबसे ऊंचा आंकड़ा बताया जा रहा है। वहीं वाशिंगटन पोस्ट एबीसी न्यूज़ और जो एप्सोस में सर्वे हुए हैं उसमें ट्रंप के अप्रूवल रेटिंग सिर्फ 33% सामने आई है। जबकि 66% लोगों ने उनके कामकाज को लेकर असहमति जताई है। यह आंकड़ा भी इस सर्वेक्षण के इतिहास में ट्रंप का सबसे कमजोर प्रदर्शन बताया गया। यानी कि सर्वे के आंकड़े साफ संकेत दे रहे हैं कि ट्रंप को लेकर अमेरिकी मतदाताओं के बीच असंतोष बढ़ा है। महंगाई बनी ट्रंप की सरकार की सबसे पर बड़ी परेशानी ये लोगों का कहना है क्योंकि ये सबसे बड़ा मुद्दा है किसी भी देश के लिए सरकार का चुनावी भविष्य तय करने के लिए ये बड़ी भूमिका भी निभाता है और यह मुद्दा है अर्थव्यवस्था का।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-sidesteps-endorsing-jd-vance-for-2028-presidential-election" target="_blank" rel="noopener">US Presidential Election 2028 | राष्ट्रपति चुनाव के लिए जेडी वेंस को समर्थन देने पर डोनाल्ड ट्रंप का टालमटोल, कहा- 'अभी बहुत जल्दी है'</a></h3><h2><br>क्या चुनाव जीत पाएंगे ट्रंप?</h2><p><br>हालांकि इसका मकसद ट्रंप के समर्थकों की भागीदारी बढ़ाना था। लेकिन इस कदम से डेमोक्रेट और निर्दलीय मतदाता भी उनकी मतलब जैसे उन्होंने कहा कि हर सीट पर आप ट्रंप को ही मानकर चलिए कि ट्रंप चुनाव लड़ रहे हैं। चाह तो थे चाहते थे कि रिपब्लिकन की जो वोट है वो बढ़े लेकिन यहां पर मामला उल्टा पड़ गया। उल्टा यहां पर अगर डेमोक्रेट्स की बात करें तो उनका कहना है कि ट्रंप ने खर्च कम करने और युद्ध खत्म करने के अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं किया। उन्होंने वादा किया कि अगर मतदाता उन्हें किसी भी सदन में बहुमत देते हैं तो वो अमेरिकियों के जीवन यापन का खर्च कम करने के लिए काम करेंगे और कथित भ्रष्टाचार के लिए प्रशासन को जवाबदेह ठहराएंगे। यहां पर अगर आपको बात करें तो ऊर्जा जो है वो 34% तक महंगी हो चुकी है। खाना पीना ढाई से तीन गुना तक ढाई से 3% तक महंगा हो चुका है। यहां पर ये अमेरिका के हाल हैं। अमेरिका की अगर बात करें तो ट्रिपल ए के अनुसार पेट्रोल की राष्ट्रीय औसत कीमत $4.28 है जो 1 साल पहले की तुलना में $1.2 ज्यादा है। मतलब $5 प्रति गैलन तक यहां पर कीमत बढ़ चुकी है। डीजल की कीमतें लगभग 3 गैलन $3 प्रति गैलन तक यहां पर बढ़ चुकी हैं। और अगर बाकी बात करें तो गृह सुरक्षा विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि जो बाइडन के प्रशासन की तुलना में दक्षिणी पश्चिमी सीमा में पकड़े गए जो प्रवासी आते हैं उनमें कमी आई है। 95% तक उनका आना कम हुआ है। लेकिन बाकी जो चीजें हैं वो यहां पर महंगी हुई हैं। अमेरिका में रहना महंगा हो चुका है। मतलब एक रिपोर्ट यह दावा करती है कि अगर किसी परिवार का खर्च महीने का अमेरिका में रहने का अब तक $3000 था तो वो अब यहां मतलब अगर मौजूदा वक्त की बात करें तो वो $311 तक पहुंच चुका है। मतलब $11 की बढ़ोतरी पिछले कुछ महीनों में हुई है। जिस तरीके से ईरान ने स्टेट ऑफ़ होर्मुज चौक की हुई है और बाबल मंदिर पर कब्जा किसका है?<br>हूतियों का कब्जा है। हूतियों को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान को हथियार कौन दे रहा है? चीन और रूस दे रहे हैं। ईरान का तेल कौन खरीद रहा है? चीन खरीद रहा है। मतलब एक तरीके से अमेरिका को पूरी तरीके से रशिया और चाइना ने काउंटर कर लिया है। घेर कर मार दिया है। अब यहां जीत तो बहुत दूर की बात है। हार भी बहुत बुरी ना ट्रंप की हो जाए। ये कहा जा रहा है अमेरिका में। जो डेमोक्रेट्स हैं उनकी जो रेटिंग है या फिर जो उनका आंकड़ा है जिस तरीके से भी अमेरिका में ये गिनती होती होगी वो 92% 52% के पार पहुंच चुका है। वहीं ट्रंप की पार्टी की बात करें तो 42 फ़ीसदी पर अटकी हुई है। और अगर ये अप्रूवल रेटिंग नहीं बढ़ी तो फिर रिपब्लिकनंस चुनाव हार जाएंगे और राष्ट्रपति तो रहेंगे। ट्रंप 4 साल तक आने वाले 2 साल भी राष्ट्रपति तो रहेंगे। लेकिन काम क्या कुछ कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे वह वक्त बताएगा।&nbsp;</p><h2>रिपब्लिकन के सामने क्या चुनौती</h2><p>रिपब्लिकन पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह मतदाताओं को कैसे भरोसा दिलाएं कि उनकी नीतियां अर्थव्यवस्था को बेहतर बना सकती है। डेमोक्रेटिक पार्टी को सर्वेक्षणों में बढ़त मिलती दिखाई दी है। देखिए चुनावी मुकाबले की बात करें तो सर्वे में डेमोक्रेटिक पार्टी रिपब्लिकन पार्टी से आगे दिख रही है। एबीसी न्यूज़, वाशिंगटन पोस्ट और कई ऐसे अमेरिकी जो चैनल्स हैं उसके सर्वे में प्रतिनिधि सभा के चुनाव के लिए डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों को 52% और रिपब्लिकन उम्मीदवारों को 44% समर्थन मिला। यानी डेमोक्रेट्स को 8% अंकों की बढ़त दिखाई दी। वहीं रटर्स और अह इप्सोस के सर्वेक्षण में डेमोक्रेटिक पार्टी को बढ़त मिली। इस सर्वेक्षण में डेमोक्रेट्स को 47 और रिपब्लिकन पार्टी को 35% समर्थन मिला। यानी कि यहां भी अंतर 12% अंकों का है। इन आंकड़ों से पता चलता है चुनाव से पहले डेमोक्रेटिक पार्टी का प्रदर्शन बेहतर दिखाई दे रहा है। हालांकि यह याद रखना जरूरी है कि राष्ट्रीय सर्वेक्षणों के आधार पर सीधे चुनाव के नतीजों का अनुमान नहीं लगाया जा सकता है।&nbsp;<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 14:16:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[घने जंगल, जयपुर राजघराना और तिरंगा मार्च: किसके हक की थी वो जमीन जहां आज है CP का सेंट्रल पार्क?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/whom-did-the-land-where-cp-central-park-now-stands-rightfully-belong]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>एसआईआर में गड़बड़ी को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर लगातार कॉकरोच जनता पार्टी प्रदर्शन कर रही है। इसी क्रम में 16 अक्टूबर की शाम 4:00 बजे दिल्ली के कनोट प्लेस के &nbsp;सेंट्रल पार्क पर कॉकरोच जनता पार्टी लहरा दो तिरंगा मार्च का ऐलान किया। दरअसल कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया &nbsp;कि तमाम लोग बड़ी संख्या में यहां इस सेंट्रल पार्क पर इकट्ठा होकर के तिरंगा लहराएं। &nbsp;सौरभ दास और आशुतोष रांका अपने समर्थकों के साथ जंतर-मंतर पहुंचे थे। उन्होंने वहां पर तिरंगा लहराया था और आरोप है कि इसी कारण आशुतोष रांका और जो सौरभ दास थे उनको दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया और पांच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसी को लेकर के सीजेपी ने &nbsp;लहरा दो तिरंगा का आह्वन किया। लेकिन सेंट्रल पार्क दो दिनों के लिए बंद है। दरअसल एनडीएमसी ने 16 अक्टूबर और 17 अक्टूबर को प्रशासनिक कारणों की वजह से इस सेंट्रल पार्क को आम जनता के लिए &nbsp;बंद कर दिया। यानी कि कोई भी शख्स यहां सेंट्रल पार्क में इकट्ठा नहीं हो सकता है। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी ने आवाह्वन किया है कि बड़ी संख्या में लोग कनोट प्लेस में इस सेंट्रल पार्क पर पहुंचे और तिरंगा लहराएं। इसके अलावा जो लोग दूसरे शहरों में रह रहे हैं वो लोग भी तिरंगा लहराएं। &nbsp;सुरक्षा बढ़ा दी गई है। दिल्ली के कमर्शियल सेंटर की पहचान बनने वाले सफेद खंभों वाले गलियारों और लग्जरी ब्रांड के शोरूमों के आने से बहुत पहले, कनॉट प्लेस और इसका मशहूर सेंट्रल पार्क छोटे-छोटे गांवों से भरा एक ऊबड़-खाबड़ जंगल हुआ करता था। आज, यह जगह अक्सर बड़े सार्वजनिक आयोजनों, राजनीतिक रैलियों और कड़ी सुरक्षा के बीच ट्रैफिक डायवर्जन की वजह से सुर्खियों में रहती है। कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दिपके द्वारा आयोजित तिरंगा मार्च से पहले यह जगह फिर चर्चा में आ गई। बबूल और झाड़ियों से भरा, वन्यजीवों वाला वह इलाका आखिर कैसे लुटियंस दिल्ली के धड़कते केंद्र में बदल गया? इसका जवाब एक सदी तक चले व्यापक शहरी बदलाव में छिपा है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-police-reach-cjp-founder-abhijeet-dipke-house-ahead-of-march" target="_blank" rel="noopener">Connaught Place में CJP के मार्च से पहले हलचल, Abhijeet Dipke के घर पहुंची पुलिस</a></h3><p>कैसे शुरू हुआ पूरा मामला</p><p>20 जुलाई 2026 दिल्ली का जंतरमंतर छात्रों और सीजेपी सपोर्टर्स की भीड़ संसद की ओर बढ़ी। चलो संसद का आह्वान था। मांग थी पेपर लीक्स के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा। एक तरफ प्रदर्शनकारी थे। दूसरी तरफ दल बल के साथ दिल्ली पुलिस। खबर आई कि इंटरनेट बंद कर दिया गया है। फिर जो कुछ हुआ वह पूरे देश ने देखा। पुलिस की बर्बरता प्रदर्शनकारियों पर डंडे के रूप में बरसी। अब तारीख आगे बढ़ाई है। करीब 3 महीने बाद 10 अक्टूबर 2026 एक बार फिर जंतर-मंतर पर प्रदर्शन की तैयारी थी। इस बार सवालों के घेरे में मुख्य चुनाव आयुक्त और इलेक्शन कमीशन रहा। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठे हैं। जड़ एसआईआर रही सवाल गंभीर थे। सत्तारूढ़ दल पर चुनाव आयोग के डिफेंस में उतरने के आरोप लगे। जबकि चुनाव आयोग एक इंडिपेंडेंट कॉन्स्टिट्यूशनल इंस्टीट्यूशन है। वो खुद पर उठाए जा रहे सवालों के तथ्यात्मक जवाब देने में सक्षम है। मामला हल्के में निपटा दिया गया। विपक्ष समेत सीजेपी ने चीफ इलेक्शन कमिश्नर ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग रख दी। सीजेपी ने 10 अक्टूबर को प्रोटेस्ट भी बुला लिया। लेकिन इस मर्तबा दिल्ली पुलिस की तैयारी इतनी तगड़ी थी कि जंतर-मंतर पर परिंदा भी पर नहीं मार पाया। बीएएनएस की धारा 163 लगा दी। 35,000 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी सड़कों पर तैनात थे। ट्रेनें कैंसिल कर दी गई। दिल्ली की लगभग हर पांच में से एक मेट्रो स्टेशन को बंद कर दिया गया। इंटरनेट भी बंद कर दिया गया। सीजेपी की लीडरशिप को प्लेन से ही डिटेन कर लिया गया। जो लोग कनाड प्लेस पहुंचे उन्हें भी पुलिस ने उठा लिया।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cjp-leader-abhijeet-dipke-defends-protest-amid-traders-concerns-in-delhi" target="_blank" rel="noopener">Supreme Court पहुंची व्यापारियों की याचिका, Dipke का दावा- Peaceful Protest से नहीं रुकता व्यापार</a><br>सौरव-आशुतोष पर लगे ये आरोप</h3><p><br>सौरव दास और आशुतोष रांका पर बेल बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। 10 अक्टूबर को सौरव दास, आशुतोष रांका और अभिजीत दीपके को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में लिया था। इन तीनों को कोर्ट ने 50-50 हजार मुचकले पर रिहा किया गया था। इसके साथ ही शर्त रखी गई थी। तीनों को एक साल तक शांति बनाए रखनी थी, ऐसा कोई काम नहीं करना था, जिससे शांति भंग हो करने का बॉन्ड साइन करवाया गया था। सौरव और आशुतोष पर ये बॉन्ड तोड़ने का आरोप लगा है। बता दें 10 अक्टूबर को सौरव, आशुतोष और दीपके को दिल्ली पुलिस के हिरासत में लेने के बाद प्रदर्शन को अजिंक्य शिंदे ने लीड किया था। गिरफ्तारी के बाद &nbsp;दोनों को ही 5 दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया</p><h2>सभी पांचों गेट बंद</h2><p>राजीव चौक मेट्रो स्टेशन के ठीक ऊपर स्थित सेंट्रल पार्क 41,500 वर्ग मीटर में फैला हुआ है। इसमें चार जलाशय (water bodies), 350 सीटों की क्षमता वाला एक एम्फीथिएटर और 207 फीट ऊंचे पोल पर लगा विशालकाय भारतीय तिरंगा मौजूद है। इस पार्क की देखरेख NDMC का बागवानी विभाग करता है। नाम न छापने की शर्त पर NDMC के एक अधिकारी ने बताया कि नागरिक निकाय को उच्च अधिकारियों से पार्क बंद करने के निर्देश मिले हैं। अधिकारी ने आगे कहा कि पार्क के सभी पांचों गेट बंद रहेंगे। पार्क का एम्फीथिएटर अक्सर सरकारी कार्यक्रमों, सामाजिक और सांस्कृतिक आयोजनों के लिए बुक रहता है, वहीं इसका हरा-भरा परिसर बड़ी संख्या में लोगों खासकर सप्ताहांतपर को अपनी ओर आकर्षित करता है। अधिकारी ने &nbsp;प्रदर्शन के दौरान लोगों को पार्क में घुसने से रोकने की चुनौतियों का भी जिक्र किया, क्योंकि इसकी चारदीवारी की रेलिंग काफी नीची (लगभग तीन से चार फीट ऊंची) है। अधिकारी ने कहा हमें उच्च अधिकारियों से पार्कों को बंद करने के निर्देश मिले थे। पार्क के पांचों गेट बंद रखे जाएंगे।" यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर लगा है। अधिकारी ने बताया कि लोगों को ध्वज के पास जाने से रोकना मुश्किल हो सकता है, और ऐसी स्थिति को संभालना पुलिस की कानून-व्यवस्था से जुड़ी जिम्मेदारी होगी। यह विशाल ध्वज पार्क के कोने पर, इनर-सर्कल रोड से कुछ ही फीट की दूरी पर स्थित है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bjp-starts-daily-jan-sunwai-for-workers-at-delhi-headquarters" target="_blank" rel="noopener">कार्यकर्ताओं की समस्याएं सीधे सुनेंगे पार्टी नेता, BJP दफ्तर में शुरू हुई जन सुनवाई</a><br>हाई कोर्ट में सुनवाई</h3><p><br>15 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने CJP के तिरंगा मार्च पर सुनवाई की थी। इस दौरान अदालत ने मार्च पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस से कहा था कि गतिविधियों को नियंत्रित और व्यवस्थित बनाए रखने के लिए हरसंभव कदम उठाए जाएं। वहीं, याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट को बताया था कि कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क के बीचों-बीच आंदोलन आयोजित किया गया है, जबकि यह जगह प्रदर्शन के लिए नहीं है। इसे देखते हुए व्यापारियों ने अपनी दुकानें बंद करना शुरू कर दिया है। इस वजह से प्रदर्शन पर रोक लगाना बेहद जरूरी है।</p><h2>शिकारगाहों और गांवों से लेकर शाही ज़मीन तक</h2><p><br>20वीं सदी की शुरुआत में, आज के कनॉट प्लेस वाला इलाका घनी झाड़ियों से भरा एक ग्रामीण क्षेत्र था, जो तीतरों और जंगली जानवरों का ठिकाना हुआ करता था। इस इलाके में मुख्य रूप से जयसिंहपुरा और राजा का बाज़ार जैसे गांव आते थे। यह ज़मीन जयपुर के शासकों की थी, जो उन्हें मुगल बादशाह मुहम्मद शाह द्वारा सवाई जय सिंह द्वितीय को दिए गए एक अनुदान (जागीर) के रूप में मिली थी। इस इलाके में कुछ प्राचीन और महत्वपूर्ण जगहें थीं, जिनमें ऐतिहासिक हनुमान मंदिर और जंतर-मंतर वेधशाला प्रमुख हैं। पुरानी दिल्ली (शाहजहानाबाद) के निवासी अक्सर मंगलवार के दिन इस जंगली इलाके से होकर गुज़रते थे, जिसका एकमात्र मकसद हनुमान मंदिर के दर्शन करना होता था।</p><h2><br>अंग्रेजों का विस्तार और कनॉट प्लेस का जन्म</h2><p><br>जब ब्रिटिश प्रशासन ने 1912 में दिल्ली का विस्तार करने का फैसला किया, तो उन्होंने जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू की। इसे पूरा होने में एक दशक से ज्यादा का समय लगा और 1925 तक जाकर यह काम पूरा हुआ। जयसिंहपुरा के निवासियों को करोल बाग और पहाड़गंज की तरफ स्थानांतरित कर दिया गया। इस भव्य कमर्शियल मार्केट का निर्माण 1929 में शुरू हुआ और 1933 में पूरा हुआ। आर्किटेक्ट रॉबर्ट टोर रसेल द्वारा डिज़ाइन किए गए इस मार्केट को दो मंजिला 'जॉर्जियन' आर्किटेक्चर शैली में बनाया गया था, जिसमें दो संकेंद्रित (एक-दूसरे के अंदर बने) वृत्त शामिल थे। इस कॉम्प्लेक्स का नाम 'कनॉट प्लेस' और 'कनॉट सर्कस' रखा गया। यह नाम प्रिंस आर्थर, जो 'ड्यूक ऑफ कनॉट एंड स्ट्रैथर्न' (महारानी विक्टोरिया के तीसरे बेटे) थे, के सम्मान में रखा गया था। शुरुआत में यह जगह अपनी खुली किताबों की दुकानों, फुटपाथ पर सामान बेचने वालों, मशहूर कॉफी हाउसों और 'वेंगर्स जैसे जाने-माने भोजनालयों के लिए मशहूर थी। बाद में, स्थानीय स्तर पर इसे अनौपचारिक रूप से 'राजीव चौक' और 'इंदिरा चौक' कहा जाने लगा।</p><h2><br>सेंट्रल पार्क की कहानी क्या है</h2><p><br>कनॉट प्लेस (CP) के बीचों-बीच स्थित सेंट्रल पार्क का इतिहास बेहद दिलचस्प रहा है। आज हम जिस आधुनिक सेंट्रल पार्क को देखते हैं, उसका वर्तमान स्वरूप साल 2006 में तैयार हुआ था, लेकिन एक सार्वजनिक स्थल और पार्क के रूप में इसकी मौजूदगी दशकों पुरानी है। शुरुआती दौर में कनॉट प्लेस के केंद्र में लोगों के बैठने, टहलने और मिलने-जुलने के लिए एक खुला हरा-भरा मैदान हुआ करता था। वहां एक फव्वारा और पास में ही मशहूर कॉफी हाउस मौजूद था। बाद में जब भूमिगत पालिका बाजार का निर्माण हुआ, तब भी पार्क का अस्तित्व ऊपर बना रहा। साल 2001 में दिल्ली मेट्रो के विस्तार और राजीव चौक स्टेशन के निर्माण के लिए यह जमीन DMRC (दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन) को सौंप दी गई। मेट्रो का भूमिगत निर्माण कार्य पूरा होने के बाद DMRC ने इसके ठीक ऊपर लगभग 27,000 वर्ग मीटर के विशाल क्षेत्र में एक नया और खूबसूरत पार्क विकसित किया, जिसे 2006 में आम जनता के लिए खोल दिया गया। इस नए पार्क को हरा-भरा बनाने के लिए लगभग 700 पेड़ और 2,750 झाड़ियां लगाई गईं, जिनमें सफेद चंपा, रॉयल पाम, गुलमोहर, पिंक तबेबुइया, बॉटल ब्रश, इंडियन लॉरेल और अशोक जैसे सदाबहार पेड़ शामिल थे। पार्क के आकर्षण को बढ़ाने के लिए इसमें 4 जल निकाय (water bodies), 21 फव्वारे और एक खूबसूरत वॉटरफॉल तैयार किया गया। इसके अलावा, सांस्कृतिक और कलात्मक कार्यक्रमों के आयोजन के लिए लगभग 500 दर्शकों की क्षमता वाला एक खुला एम्फीथिएटर भी बनाया गया। इस पार्क में कुल 9 प्रवेश द्वार हैं, जिनमें से 2 गेट सीधे राजीव चौक मेट्रो स्टेशन से जुड़ते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 14:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/whom-did-the-land-where-cp-central-park-now-stands-rightfully-belong</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[डोनाल्ड, सेना और वो 9 रास्ते जो उड़ा देंगे होश! मिडटर्म चुनाव में Trump हारे तो क्या होगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-the-military-and-9-scenarios-that-will-leave-you-stunned-what-happens-if-trump-loses-the-mi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सामने एक ऐसा चुनावी इम्तिहान जिसका असर सिर्फ उनकी पार्टी की हार या जीत तक सीमित नहीं रहने वाला। 3 नवंबर को होने वाले मिड टर्म इलेक्शन में अगर रिपब्लिकन पार्टी को नुकसान हुआ तो ट्रंप के लिए कांग्रेस में अपने फैसलों को आगे बढ़ाना मुश्किल हो सकता है। उनके प्रशासन के खिलाफ जांच शुरू हो सकती है। लेकिन इस चुनाव से जुड़ा सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर नतीजे ट्रंप के खिलाफ गए तो क्या वो उन्हें स्वीकार करेंगे? और अगर चुनावी नतीजों को चुनौती दी गई तो क्या अमेरिका में राजनैतिक संकट पैदा हो सकता है? अंतरराष्ट्रीय मामलों पर रिसर्च करने वाली संस्था चार्टम हाउस में पब्लिश्ड आर्टिकल में इसी आशंका पर चर्चा की गई। इसमें बताया गया कि चुनावी प्रक्रिया पर लोगों का भरोसा कमजोर पड़ने और नतीजों को चुनौती देने की स्थिति का असर सिर्फ नवंबर के चुनाव तक सीमित नहीं रह सकता बल्कि 2028 के राष्ट्रपति चुनाव तक दिखाई दे सकता है। लेकिन पहले समझते हैं कि यह चुनाव ट्रंप के लिए इतने अहम क्यों हैं।&nbsp;</p><h2><br>हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों पर चुनाव</h2><p><br>अमेरिका में 3 नवंबर का हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स की सभी 435 सीटों और सिनेट की 35 सीटों पर चुनाव होना है। फिलहाल रिपब्लिकन पार्टी के पास कांग्रेस के दोनों सदनों में बहुमत है। अगर डेमोक्रेट्स इनमें से किसी एक सदन में भी बहुमत हासिल कर लेते हैं तो ट्रंप के लिए अपने बाकी कार्यकाल में फैसले लेना पहले जितना आसान नहीं रहेगा। अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन राष्ट्रपति के 4 साल के कार्यकाल के बीच में होते हैं। इनमें अक्सर राष्ट्रपति की पार्टी को नुकसान उठाना पड़ता है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद से सिर्फ दो मिड टर्म इलेक्शन ऐसे रहे जब कांग्रेस को नियंत्रित करने वाली पार्टी ने अपनी सीटें नहीं गवाई। पिछले पांच मिड टर्म इलेक्शन में कम से कम एक सदन का नियंत्रण भी बदल चुका है। यानी सत्ता में बैठी पार्टी के लिए चुनावी नुकसान कोई असामान्य बात नहीं है। इस बार भी चुनावी अनुमान में डेमोक्रेट्स की स्थिति मजबूत दिखाई दे रही है। कुक पॉलिटिकल रिपोर्ट के संस्थापक चार्ली कुक के अनुमान के मुताबिक डेमोक्रेट्स हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में पांच से 15 सीटें जीतकर बहुमत हासिल कर सकते हैं। हालांकि सीनेट की तस्वीर ज्यादा अनिश्चित है। वहां बहुमत हासिल करने के लिए डेमोक्रेट्स को कम से कम चार सीटों का शुद्ध फायदा चाहिए। अगर हाउस डेमोक्रेट्स के नियंत्रण में चला गया तो ट्रंप प्रशासन के खिलाफ संसदीय जांच का रास्ता खुल सकता है। ट्रंप के कारोबारी हितों, उनके परिवार से जुड़ी कंपनियों में विदेशी सोवरीन, वेल्थ फंड के निवेश और कठित पे टू प्ले व्यवस्था जैसे मुद्दों की जांच हो सकती है। यानी क्या राजनैतिक पहुंच के बदले किसी कारोबारी या निवेशक को फायदा मिला? यह जांच के संभावित विषय हैं। साबित हो चुके आरोप नहीं है। इसके अलावा हाउस में ट्रंप के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया भी शुरू हो सकती है। हालांकि महाभियोग का प्रस्ताव लाना और राष्ट्रपति को पद से हटाना अलग-अलग बातें हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/saudi-the-us-and-the-islamic-nato-appear-to-be-failing-in-their-efforts-to-contain-the-houthis" target="_blank" rel="noopener">आखिर हुतियों को नियंत्रित करने में सऊदी अरब, अमेरिका और ‘इस्लामिक नाटो’ क्यों विफल प्रतीत हो रहे हैं?</a></h3><h2>9 तरीके जिनसे ट्रम्प चुनाव में दखल दे सकते हैं</h2><h2><strong>1. वोटिंग मशीनों पर फिर सवाल, क्या हाथों से होगी वोटों की गिनती?</strong></h2><p>अमेरिका में मिडटर्म चुनावों से पहले वोटिंग मशीनों और चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता को लेकर एक बार फिर बहस गरमा गई है। पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बिना किसी पुख्ता सबूत के चुनावी प्रणाली पर धांधली के आरोप लगाए हैं। जून में कैलिफोर्निया के चुनाव में जब उनके पसंदीदा उम्मीदवार पिछड़ते दिखे, तो उन्होंने वहां की पूरी व्यवस्था को "रिग्ड" (धांधली से भरा) बता दिया था। अब उनके कई करीबी सहयोगी वोटिंग मशीनों पर पूरी तरह रोक लगाने और मतपत्रों की हाथों से गिनती (Hand Counts) कराने की मांग कर रहे हैं।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>चुनावी विशेषज्ञों का मानना है कि अगर नतीजे उम्मीद के मुताबिक नहीं आते हैं, तो मशीनों में खराबी या फर्जी वोटों के दावों का सहारा लिया जा सकता है। इसका सीधा मकसद चुनाव परिणामों को कानूनी तौर पर चुनौती देना और दोबारा हाथों से गिनती कराने के लिए दबाव बनाना होगा। &nbsp;&nbsp;<br><strong>विशेषज्ञों की क्या है राय?</strong><br>चुनावी विश्लेषकों और तकनीकी जानकारों के अनुसार, मशीनों के मुकाबले हाथों से वोटों की गिनती करना न सिर्फ बेहद धीमा है, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी कमज़ोर है और इसमें मानवीय गलतियों की आशंका ज्यादा रहती है। हालांकि मशीनों में कुछ तकनीकी खामियां हो सकती हैं, लेकिन अब तक ऐसा कोई सबूत सामने नहीं आया है कि इन खामियों के जरिए वोटों में कोई फेरबदल किया गया हो। &nbsp;&nbsp;<br><strong>असर क्या हो सकता है?</strong><br>सबसे बड़ा खतरा वोटों की गिनती के दौरान भ्रम फैलने का है। इस तरह के आरोप सोशल मीडिया और खबरों के जरिए बेहद तेज़ी से फैलते हैं। भले ही बाद में जांच में ये दावे पूरी तरह गलत साबित हों, लेकिन तब तक ये नतीजों को अदालतों में उलझाने और चुनावी प्रक्रिया पर से जनता का भरोसा डिगाने के लिए काफी होते हैं। &nbsp;&nbsp;<br>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-lawmaker-pramila-jayapal-concern-over-13-crore-voter-list-deletions-india" target="_blank" rel="noopener">Pramila Jayapal ने भारत की Voter List से 13 करोड़ नाम हटने पर जताई चिंता</a></p><h2>2. क्या चुनाव अधिकारियों पर नतीजों को बदलने या रद्द करने का दबाव बनाया जाएगा?</h2><p><br>मेरिका में 2026 के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों को लेकर एक और बड़ी चिंता सामने आ रही है। चुनाव नतीजों को बदलने, टालने या पूरी तरह रद्द कराने के लिए अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव बनाना। चुनावी मामलों के जानकार साल 2020 के राष्ट्रपति चुनाव की मिसाल देते हैं। उस दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने जॉर्जिया के सेक्रेटरी ऑफ स्टेट को फोन कर सीधे तौर पर "11,780 वोट ढूंढने" को कहा था, ताकि उनकी हार को जीत में बदला जा सके। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की 'जनवरी 6 कमेटी' की जांच के अनुसार, ट्रंप के वकीलों और सहयोगियों ने मिशिगन, एरिज़ोना और पेंसिल्वेनिया के राज्य सांसदों पर भी चुनावी नतीजों को पलटने के लिए भारी दबाव डाला था।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>संभावित परिदृश्य यह है कि राज्य और स्थानीय स्तर के चुनाव अधिकारियों पर परिणामों में फेरबदल करने, उन्हें अटकाने या सीधे रद्द करने का दबाव डाला जा सकता है।<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?</strong><br>नियमों के मुताबिक, चुनाव अधिकारी ऐसे अनुचित राजनीतिक दबाव को मानने से इनकार कर सकते हैं। साल 2020 में रिपब्लिकन पार्टी से जुड़े जॉर्जिया के अधिकारी ब्रैड रैफेंसपर्गर ने ऐसा ही किया था और झुकने से मना कर दिया था। हालांकि, मौजूदा स्थिति पहले से काफी जटिल हो चुकी है। 2020 के चुनाव में कथित धांधली के दावों का समर्थन करने वाले नेता अब 20 राज्यों में ऐसे प्रमुख पदों पर पहुंच चुके हैं, जिनके पास सीधे तौर पर चुनावों की निगरानी का अधिकार है। पिछले चुनावी चक्र में ऐसे अधिकारियों वाले राज्यों की संख्या 17 थी।<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>विशेषज्ञों के अनुसार, इसका सबसे सीधा और गंभीर असर चुनावी नतीजों के आधिकारिक प्रमाणन (सर्टिफिकेशन) पर पड़ सकता है। यदि अधिकारी सर्टिफाइड नतीजों को खारिज करने या प्रमाणीकरण प्रक्रिया को टालने का फैसला करते हैं, तो चुनाव परिणाम गंभीर कानूनी उलझनों और संवैधानिक संकट में फंस सकते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/no-sooner-had-trump-shaken-hands-with-putin-than-musk-throttled-the-speed-of-starlink-in-ukraine" target="_blank" rel="noopener">ये संयोग या प्रयोग! इधर ट्रंप ने पुतिन से हाथ मिलाया, उधर यूक्रेन में स्टारलिंक की रफ्तार पर मस्क ने ताला लगाया</a></h3><h2>3. मतपत्रों या मतदान उपकरणों को ज़ब्त करना</h2><p><br>अदालत द्वारा मंज़ूर किए गए वारंट या सम्मन के ज़रिए, संघीय एजेंट मतपत्रों, मशीनों या रिकॉर्ड को ज़ब्त कर सकते हैं। जनवरी में, FBI एजेंटों ने जॉर्जिया की फुल्टन काउंटी से 2020 के चुनावों के रिकॉर्ड वाले सैकड़ों बक्से ज़ब्त किए थे।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>आशंका है कि अदालत से वारंट या समन (Subpoena) हासिल कर संघीय एजेंट बैलेट, मशीनों या चुनावी रिकॉर्ड को ज़ब्त कर सकते हैं। अगर ऐसा होता है, तो मतपत्रों और मशीनों की कस्टडी की सुरक्षित कड़ी (Chain of Custody) टूट जाएगी, जिससे चुनावी प्रक्रिया की शुचिता पर सवाल खड़े हो जाएंगे। &nbsp;&nbsp;<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?</strong><br>नियमों के तहत किसी भी तरह की जब्ती के लिए अदालत से मंजूर वारंट या समन जरूरी होता है। उदाहरण के तौर पर, जॉर्जिया की फुल्टन काउंटी में हुई ऐसी कार्रवाई में एक फेडरल मजिस्ट्रेट ने पर्याप्त आधार (Probable Cause) पाया था। हालांकि, पूर्व अमेरिकी अटॉर्नी गैरी रेस्टैनो ने उस छापेमारी को पूरी तरह से "अनुचित और विचित्र" (Off the wall) करार दिया था। वहीं, ट्रंप ने द न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक बयान में कहा था कि उन्हें 2020 में प्रमुख स्विंग राज्यों में वोटिंग मशीनों को ज़ब्त करने के लिए नेशनल गार्ड को आदेश देना चाहिए था। &nbsp;&nbsp;</p><p><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>विशेषज्ञों के अनुसार, मशीनों और बैलेट की ज़ब्ती का सबसे गंभीर प्रभाव वोटों की गिनती पर पड़ेगा। गिनती में रुकावट आने से नतीजों का आधिकारिक प्रमाणन लटक सकता है, जिससे पूरे देश में संवैधानिक और राजनीतिक अनिश्चितता पैदा हो सकती है। &nbsp;</p><h2>&nbsp;<br>4. पोलिंग बूथों पर फ़ेडरल मॉनिटर्स की भारी तैनाती, क्या वोटिंग प्रक्रिया में बढ़ेगा दखल?</h2><p><br>अमेरिकी मध्यावधि चुनावों में मतदान केंद्रों पर फ़ेडरल मॉनिटर्स की तैनाती को लेकर भी विवाद की आशंका जताई जा रही है। अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने इस बार 1,000 मॉनिटर्स तैनात करने की योजना बनाई है, जबकि 2024 के चुनावों में यह संख्या 590 थी। ऐतिहासिक रूप से इन मॉनिटर्स का काम नागरिक अधिकारों और मतदान से जुड़े कानूनों के पालन की निगरानी करना रहा है। &nbsp;&nbsp;<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>संभावित चिंता यह है कि फ़ेडरल मॉनिटर्स सिर्फ़ निगरानी (Observation) तक सीमित रहने की अपनी पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर मतदान की प्रत्यक्ष प्रक्रिया में हस्तक्षेप कर सकते हैं। &nbsp; सिस्टम के सामने क्या हैं रुकावटें?<br>राज्य और स्थानीय चुनाव अधिकारियों के पास इन मॉनिटर्स के अधिकारों को सीमित रखने का अधिकार है। उदाहरण के तौर पर, व्योमिंग की लैरामी काउंटी में स्थानीय अधिकारियों ने मतदाताओं से पूछताछ करने और वोटिंग उपकरणों की जांच करने की मॉनिटर्स की मांग को खारिज कर दिया था। वहीं मिशिगन प्रशासन का भी कहना है कि मॉनिटर्स को केवल आम जनता को मिलने वाले निगरानी अधिकारों के दायरे में ही रखा जाएगा। &nbsp;&nbsp;<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>इसका सीधा असर मतदाताओं के अनुभव और वोटिंग प्रक्रिया पर पड़ सकता है। यदि मॉनिटर्स अपने तय दायरे से बाहर जाकर हस्तक्षेप करते हैं, तो जैसा व्योमिंग में देखने को मिला था, मतदान केंद्रों पर तनाव, संशय और निष्पक्ष वोटिंग को लेकर गंभीर चिंताएं बनी रह सकती हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/vladimir-putin-relies-on-india-for-diesel-after-attacks-on-russian-refineries" target="_blank" rel="noopener">आखिर इस आग में ऐसा क्या है? पूरी दुनिया मोदी-पुतिन के सामने झुक गई?</a><br>5. मतदान केंद्रों के पास इमिग्रेशन एजेंटों (ICE) की मौजूदगी, क्या वोटिंग पर पड़ेगा असर?</h3><p><br>अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों को लेकर एक और संवेदनशील मुद्दा सामने आ रहा है। मतदान केंद्रों के पास इमिग्रेशन एंड कस्टम्स एनफोर्समेंट (ICE) एजेंटों की संभावित सक्रियता। आव्रजन जांच और चुनाव प्रक्रिया के आमने-सामने आने से मतदाताओं में डर का माहौल बनने की आशंका जताई जा रही है।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>चिंता इस बात को लेकर है कि संघीय आव्रजन एजेंट मतदान केंद्रों के काफी करीब अपने ऑपरेशन या जांच गतिविधियां चला सकते हैं। हालांकि होमलैंड सिक्योरिटी सेक्रेटरी मार्कवेन मुलिन ने स्पष्ट किया था कि अगर किसी मतदान केंद्र पर कोई सीधा खतरा हो या किसी के खिलाफ वारंट तामील करना हो, तभी ऐसी कार्रवाई हो सकती है, लेकिन उन्होंने मतदान स्थलों के पास ICE की मौजूदगी की संभावना को सिरे से खारिज नहीं किया था।<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?</strong><br>कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिकी संघीय कानून मतदान केंद्रों के भीतर सशस्त्र संघीय एजेंटोंकी तैनाती पर स्पष्ट रूप से रोक लगाता है। इसके अलावा, डिपार्टमेंट ऑफ होमलैंड सिक्योरिटी (DHS) का कहना है कि ICE की ऐसी कोई योजना नहीं है जिसके तहत विशेष रूप से मतदान केंद्रों को निशाना बनाकर कोई ऑपरेशन चलाया जाए।<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>विशेषज्ञों का मानना है कि यदि चुनाव प्रक्रिया के बीच इमिग्रेशन कानून को लागू करने की गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान मतदान प्रतिशत पर पड़ेगा। मतदान स्थलों के पास सशस्त्र एजेंटों की मौजूदगी से खासकर अप्रवासी पृष्ठभूमि वाले और अल्पसंख्यक समुदायों के मतदाताओं में भय फैल सकता है, जिससे वे मतदान करने से बच सकते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/vladimir-putin-relies-on-india-for-diesel-after-attacks-on-russian-refineries" target="_blank" rel="noopener">आखिर इस आग में ऐसा क्या है? पूरी दुनिया मोदी-पुतिन के सामने झुक गई?</a><br>6. मतदान केंद्रों पर सेना की तैनाती की चर्चा, क्या लागू हो सकता है इंसरेक्शन एक्ट?</h3><p><br>अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के दौरान मतदान केंद्रों पर सैन्य बलों की तैनाती की संभावना को लेकर भी एक बड़ा कानूनी और राजनीतिक विवाद छिड़ गया है। आशंका जताई जा रही है कि विदेशी दखल या गैर-नागरिकों द्वारा मतदान &nbsp;के आरोपों का हवाला देकर 'इंसरेक्शन एक्ट' लागू किया जा सकता है। आमतौर पर अमेरिकी कानून सेना को घरेलू कानून-व्यवस्था लागू करने से रोकता है, लेकिन यह कानून उसका एक बड़ा अपवाद है।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>संभावित परिदृश्य यह है कि चुनाव के आसपास कानून-व्यवस्था या निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के नाम पर राष्ट्रपति इंसरेक्शन एक्ट लागू कर दें। ट्रंप ने भी एक साक्षात्कार में कहा था कि ईमानदार चुनाव सुनिश्चित करने के लिए जो भी आवश्यक हो, वह किया जाना चाहिए।<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?</strong><br>कानूनी विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर इंसरेक्शन एक्ट लागू भी कर दिया जाए, तब भी अन्य कड़े संघीय कानून सेना को सीधे तौर पर मतदान केंद्रों पर जाने, चुनावी प्रक्रिया में हस्तक्षेप करने या मतदाताओं को डराने से रोकते हैं। इसके अलावा, अमेरिकी सैन्य नेतृत्व ने भी इस तरह की कार्रवाइयों से दूरी बनाई है। अगस्त में जनरल डैन केन ने एक पत्र में साफ किया था कि सेना की ऐसी कोई योजना नहीं है कि मतदान केंद्रों पर जवानों को भेजा जाए या चुनावी सामग्री ज़ब्त की जाए।<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>यदि मतदान केंद्रों के आसपास सेना या वर्दीधारी जवानों की मौजूदगी दिखाई देती है, तो इसका सीधा असर मतदान प्रतिशत पर पड़ेगा। मतदाताओं के बीच डर और हिचकिचाहट के चलते टर्नआउट गिर सकता है। साथ ही, ऐसे किसी भी कदम के खिलाफ अदालतों में तुरंत कई याचिकाएं दाखिल होंगी, जिससे पूरा चुनावी माहौल भारी कानूनी टकराव में उलझ सकता है।</p><h2><br>7. क्या चुनाव पर लागू हो सकता है राष्ट्रीय आपातकाल?</h2><p><br>अमेरिका में 2026 के मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के बीच एक और बेहद संवेदनशील परिदृश्य की चर्चा हो रही है—देश में नेशनल इमरजेंसी (राष्ट्रीय आपातकाल) की घोषणा। डोनाल्ड ट्रंप के कुछ सहयोगियों ने कथित चुनावी धांधली या विदेशी दखल का हवाला देकर राष्ट्रीय आपातकाल लगाने का सुझाव दिया है। उनका तर्क है कि इसके जरिए मतों की गिनती में संघीय सरकार की सीधी भागीदारी, जिसमें अनिवार्य रूप से हाथों से गिनती (Hand counts) कराना शामिल है, को सही ठहराया जा सकता है। खुद ट्रंप ने भी एक साक्षात्कार में इस विकल्प पर कहा था कि वे "किसी भी चीज़ से न तो इनकार कर रहे हैं और न ही उसे स्वीकार कर रहे हैं।"<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>आशंका है कि चुनावों के दौरान या नतीजों के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर कथित गड़बड़ी का हवाला देते हुए आपातकाल की घोषणा कर दी जाए, ताकि संघीय प्रशासन सीधे तौर पर वोटों की गिनती और प्रक्रिया को अपने नियंत्रण में ले सके।<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?</strong><br>कानूनी विशेषज्ञों का साफ कहना है कि राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा से भी राष्ट्रपति को चुनावों पर नियंत्रण करने का कोई संवैधानिक अधिकार नहीं मिल जाता। अमेरिकी संविधान के तहत चुनाव कराने, नियमों को लागू करने और मतों की गिनती का प्राथमिक दायरा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि संघीय सरकार के। ऐसे किसी भी कदम को अदालतें तुरंत असंवैधानिक करार देकर रोक सकती हैं।<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>विशेषज्ञों के अनुसार, यदि आपातकाल लगाने की कोशिश की जाती है, तो इसका सबसे बड़ा असर वोटों की गिनती और नतीजों के प्रमाणन पर पड़ेगा। इससे पूरे देश में भारी भ्रम की स्थिति पैदा होगी, अदालतों में मुकदमों की बाढ़ आ जाएगी और अंतिम नतीजों को प्रमाणित करने में लंबी देरी हो सकती है, जिससे संवैधानिक संकट गहरा जाएगा।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/trump-defends-russia-diesel-supply-deal-for-global-fuel-market" target="_blank" rel="noopener">Donald Trump ने रूस से डीजल सौदे का किया बचाव, बताया वैश्विक बाजार की जरूरत</a><br>8. चुनाव अधिकारियों पर संघीय जांच और मुकदमे का साया, क्या मतदान प्रबंधन पर पड़ेगा दबाव?</h3><p><br>अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बीच एक और बड़ा टकराव संघीय एजेंसियों और स्थानीय चुनाव प्रशासकों के बीच देखने को मिल रहा है। जुलाई के महीने में अमेरिकी न्याय विभाग (DOJ) ने हर राज्य के मुख्य चुनाव अधिकारी को पत्र लिखकर चेतावनी दी थी कि यदि गैर-नागरिकों को जानबूझकर मतदान करने दिया गया या उनके नाम मतदाता सूची से नहीं हटाए गए, तो अधिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाया जा सकता है। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन, दोनों दलों के चुनाव अधिकारियों ने इस चेतावनी को "निराधार डराने-धमकाने की कोशिश" करार दिया था।<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>संभावित परिदृश्य यह है कि चुनाव प्रशासकों को निशाना बनाते हुए संघीय जांच शुरू की जा सकती है, उन्हें समन जारी किए जा सकते हैं या फिर सीधे आपराधिक मामलों में घसीटा जा सकता है।<br><strong>सिस्टम के सामने क्या हैं चुनौतियां?</strong><br>विशेषज्ञों के अनुसार, भले ही अंत में कोई औपचारिक आरोप तय न हों, लेकिन संघीय समन का जवाब देने और मांगे गए रिकॉर्ड्स जुटाने में ही चुनाव कार्यालयों का भारी समय और संसाधन बर्बाद हो जाएंगे। पहले से ही सीमित बजट और कम कर्मचारियों के साथ काम कर रहे स्थानीय चुनाव कार्यालयों के लिए यह कानूनी बोझ झेलना बेहद मुश्किल साबित हो सकता है।<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>इसका सीधा असर चुनावी कामकाज और वोटों की गिनती पर पड़ेगा। चुनाव कराने और मतों की सही गिनती करने में जुटी टीमें कानूनी जवाबदेही के दबाव में उलझ जाएंगी, जिससे चुनाव कार्यालयों पर अत्यधिक तनाव बढ़ेगा और मतगणना प्रक्रिया धीमी या बाधित हो सकती है।<br>&nbsp;</p><h2>9. क्या जीते हुए सांसदों को संसद में बैठने से रोका जा सकता है?</h2><p><br>अमेरिकी मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों के नतीजों के बाद एक और अभूतपूर्व संवैधानिक संकट की आशंका जताई जा रही है। संसद &nbsp;द्वारा चुनाव जीतने वाले उम्मीदवारों को उनकी सीट पर बैठने और शपथ लेने से रोकना। &nbsp; चर्चा है कि करीबी मुकबले वाली सीटों पर डेमोक्रेटिक पार्टी के विजयी उम्मीदवारों को रोकने या प्रक्रिया को लटकाने के लिए डोनाल्ड ट्रंप हाउस स्पीकर माइक जॉनसन पर प्रक्रियागत नियमों के इस्तेमाल का दबाव बना सकते हैं। इसके तहत एक संभावित परिदृश्य यह भी बताया जा रहा है कि हाउस क्लर्क को हटाकर किसी ट्रंप समर्थक को इस पद पर बैठाया जाए, जो जीते हुए डेमोक्रेटिक सांसदों को मान्यता देने में देरी करे। &nbsp;&nbsp;<br><strong>क्या बन सकते हैं हालात?</strong><br>संभावित स्थिति यह हो सकती है कि राज्यों द्वारा आधिकारिक रूप से प्रमाणित &nbsp;किए जा चुके डेमोक्रेटिक विजेताओं को भी संसद में अपनी सीट ग्रहण करने से रोक दिया जाए। &nbsp; सिस्टम के सामने क्या हैं कानूनी रुकावटें?<br>कानूनी और संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसा होना बेहद मुश्किल है। जानकारों के मुताबिक, हाउस क्लर्क का यह वैधानिक दायित्व है कि वह राज्यों द्वारा प्रमाणित उम्मीदवारों को मान्यता दे। यदि क्लर्क ऐसा करने से मना करता है, तो अदालतें तुरंत हस्तक्षेप करेंगी। अधिकांश कानूनी विद्वान सीधे तौर पर सीट देने से इनकार करने की संभावना को खारिज करते हैं। वहीं, स्पीकर माइक जॉनसन के प्रवक्ता टेलर हॉलसी ने ऐसे परिदृश्यों को पूरी तरह से "काल्पनिक और अटकलबाजी" करार दिया है। &nbsp;&nbsp;<br><strong>संभावित असर और नतीजे</strong><br>यदि कानूनी विवादों के चलते कुछ सीटें उलझती हैं, तो 3 जनवरी को जब नई संसद की पहली बैठक होगी, तब तक वे सीटें खाली रह सकती हैं। बेहद कड़े मुकाबले और कम अंतर वाली संसद में कुछ सीटों का खाली रहना भी हाउस स्पीकर के चुनाव और संसद के प्रशासनिक नियंत्रण के गणित को सीधे तौर पर प्रभावित कर सकता है। &nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 14:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-the-military-and-9-scenarios-that-will-leave-you-stunned-what-happens-if-trump-loses-the-mi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईरान जैसा 'अंडरग्राउंड चक्रव्यूह', जिसके आगे बंकर-बस्टर भी फेल, भारत के इस फैसले ने मचाया चीन पाकिस्तान में तांडव,देखती रह गई दुनिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/decisions-by-india-have-wreaked-havoc-in-china-and-pakistan-leaving-the-world-stunned]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत अब चीन पाकिस्तान की नकेल कस रहा है। &nbsp;इस बार सिर्फ सीमा पर नहीं बल्कि समुद्र मिसाइल और वैश्विक व्यापार तीनों मोर्चों पर एक ऐसा खेल शुरू हो चुका है जिसकी गूंज बीजिंग से लेकर इस्लामाबाद तक साफ सुनाई दे रही है। भारतीय सीमाओं पर अगले तीन साल में सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने के लिए बड़े स्तर पर तैयारियां की जा रही हैं। वहीं, चीन और पाकिस्तान से लगी सीमाओं पर अब जमीन के नीचे सैन्य अड्‌डे बनाने की तैयारी है। भारतीय सेना चीन (लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल) और पाकिस्तान (लाइन ऑफ़ कंट्रोल) के साथ अपनी संवेदनशील सीमाओं पर ज़मीन के नीचे बने शेल्टर, गहरी सुरंगों और मज़बूत स्टोरेज साइट्स का एक बड़ा नेटवर्क बना रही है। इसका मुख्य मकसद फ्रंटलाइन पर तैनात सैनिकों, भारी गोला-बारूद, ईंधन के भंडार और अहम हथियारों जैसे आर्टिलरी गन, एयर डिफेंस सिस्टम और मिसाइल बैटरी को दुश्मन की सटीक मिसाइलों, लोइटरिंग म्यूनिशन (कामिकेज़ ड्रोन) और भारी हवाई हमलों से सुरक्षित रखना है। सेना इस रणनीति को फ़ोर्स-प्रिज़र्वेशन (सेना को सुरक्षित रखने) की मुख्य योजना मानती है। ऑपरेशन सिंदूर, यूक्रेन-रूस और अमेरिका-ईरान युद्ध में मिसाइलों, ड्रोन और बंकर बस्टर बमों के इस्तेमाल को देखते हुए यह फैसला किया गया है। आधुनिक, टेक्नोलॉजी पर आधारित युद्ध में आगे की चौकियों को दुश्मन के शुरुआती ज़बरदस्त हमले के लिए खुला छोड़ने के बजाय, यह तरीका यह पक्का करता है कि लड़ाई के लिए ज़रूरी अहम साधन सुरक्षित रहें। इस युद्ध-क्षमता को सुरक्षित रखने से ज़मीनी टुकड़ियों को दुश्मन के भारी हमलों की शुरुआती लहर से बचने, उस झटके को सहने और तुरंत निर्णायक जवाबी हमला करने की क्षमता बनाए रखने में मदद मिलती है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/nepal-flood-army-rescues-over-200-people-delivers-relief-gorkha" target="_blank" rel="noopener">Nepal Flood: गोरखा में सेना ने 200 से अधिक लोगों को सुरक्षित निकाला</a><br>उत्तर में 19 प्रोजेक्ट</h3><p><br>सेना की नॉर्दर्न कमांड, जो जम्मू-कश्मीर और लद्दाख की देखरेख करती है, ने अपने इलाके में सुरक्षित अंडरग्राउंड (ज़मीन के नीचे) सुविधाएं बनाने के लिए 19 अलग-अलग प्रोजेक्ट शुरू किए हैं। हर साइट को वहां की ज़मीन की स्थिति और उसके काम के हिसाब से डिज़ाइन किया जाएगा।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-police-seeks-extension-of-capf-deployment-till-october-20" target="_blank" rel="noopener">Delhi CAPF Deployment | दिल्ली में बड़े बवाल की आशंका! दिल्ली पुलिस ने की 20 अक्टूबर तक CAPF की तैनाती बढ़ाने की मांग, छावनी में तब्दील होगी राजधानी</a><br>इन सुविधाओं का इस्तेमाल इन कामों के लिए किया जाएगा</h3><p><br>मिलिट्री इक्विपमेंट स्टोर करना: ज़रूरी हथियारों और सामान को दुश्मन की गोलीबारी से सुरक्षित रखना।<br>गोला-बारूद स्टोर करना: गोला-बारूद के स्टॉक को मिसाइल और ड्रोन हमलों से बचाना।<br>ट्रेनिंग की ज़रूरतें: सुरक्षित माहौल में ट्रेनिंग गतिविधियों में मदद करना।<br>कमांड ने अगस्त में इन प्रोजेक्ट्स के लिए टेंडर जारी किए थे। जो कंपनियां इस काम में दिलचस्पी रखती हैं, वे 7 नवंबर तक अपनी बोलियां (बिड) भेज सकती हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-is-equipping-india-with-a-variety-of-weapons-after-su-57" target="_blank" rel="noopener">एक से बढ़कर एक हथियार से भारत को लैस कर रहा रूस, SU-57 के बाद अब T-72 टैंक की बारी</a><br>आर्मी कमांडर ने क्या कहा</h3><p><br>नॉर्दर्न कमांड के जनरल ऑफिसर कमांडिंग-इन-चीफ, लेफ्टिनेंट जनरल प्रतीक शर्मा ने 9 अक्टूबर को सोसाइटी ऑफ़ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स (SIDM) के सालाना सेशन में इस प्लान के बारे में बात की। उन्होंने कहा कि इन प्रोजेक्ट्स के लिए खरीद की प्रक्रिया पारदर्शी और सभी के लिए निष्पक्ष होगी। उन्होंने यह भी कहा कि सेना चाहती है कि ज़्यादा से ज़्यादा कंपनियाँ इसमें हिस्सा लें, जिनमें माइक्रो, स्मॉल और मीडियम एंटरप्राइज़ेज़ (MSMEs) भी शामिल हों।</p><h2><br>सेना ज़मीन के नीचे क्यों जा रही है?</h2><p><br>आधुनिक युद्ध तेज़ी से बदल रहे हैं। लंबी दूरी की मिसाइलें और सटीक निशाना लगाने वाले हथियार अब ज़मीन पर मौजूद लक्ष्यों को बहुत सटीकता से निशाना बना सकते हैं। इससे खुले बेस, गोला-बारूद के भंडार और खड़े किए गए उपकरण आसानी से निशाने पर आ सकते हैं। ज़मीन के नीचे बनी जगहें कहीं बेहतर सुरक्षा देती हैं। ये सेना को तब भी काम करते रहने में मदद कर सकती हैं जब दुश्मन लंबे समय तक और ज़ोरदार हमले करे। भारतीय सेना की ज़मीन के नीचे बनी नई सुविधाओं को मिसाइल हमलों, मोर्टार की गोलाबारी और हवाई हमलों से सुरक्षित रहने के लिए बनाया गया है। सेना ने पश्चिम एशिया में हाल के युद्धों और 'ऑपरेशन सिंदूर' के दौरान अपने अनुभव से सबक सीखा है। यह मई 2025 में पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में आतंकी ठिकानों के ख़िलाफ़ भारत की सैन्य कार्रवाई थी। योजना बनाने वालों ने ईरान के ज़मीन के नीचे बनी सुरंगों और "मिसाइल शहरों" के बड़े नेटवर्क का भी अध्ययन किया है, जिसने लंबे हवाई हमलों के दौरान उसे अपने हथियारों को सुरक्षित रखने में मदद की थी।</p><h2><br>सबसे ज़बरदस्त हमलों का सामना करने के लिए तैयारी</h2><p><br>आर्मी ने एक्सपर्ट्स से बातचीत करने और आज के दौर के युद्धक्षेत्र की ज़रूरतों को समझने के बाद इन शेल्टर (सुरक्षित ठिकानों) के लिए अलग-अलग डिज़ाइन तैयार किए हैं। इन विकल्पों में शामिल हैं:<br>प्री-फ़ैब्रिकेटेड स्ट्रक्चर: पहले से तैयार यूनिट जिन्हें तेज़ी से लगाया जा सकता है।<br>ज़मीन के नीचे बनी सुविधाएँ: सामान रखने और सुरक्षा के लिए ज़मीन के नीचे बनाए गए शेल्टर।<br>बहुत गहरी गुफ़ाएँ: चट्टानों को काटकर बनाई गई बहुत गहरी जगहें जो सबसे ज़बरदस्त हमलों को भी झेल सकती हैं।<br>ये स्ट्रक्चर भारी बमबारी, तोपखाने की गोलाबारी और यहाँ तक कि "बंकर-बस्टर" हथियारों का भी सामना करने के लिए बनाए गए हैं। बंकर-बस्टर को इस तरह डिज़ाइन किया गया है कि फटने से पहले यह ज़मीन में गहराई तक जा सके।<br>पूर्व में भी काम चल रहा है<br>सिलीगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा के लिए पूर्व में भी इसी तरह की कोशिशें चल रही हैं। पश्चिम बंगाल में ज़मीन की इस संकरी पट्टी को अक्सर "चिकन नेक" कहा जाता है; यह अपनी सबसे संकरी जगह पर सिर्फ़ 20 से 22 किलोमीटर चौड़ी है। यह भारत के बाकी हिस्सों और पूर्वोत्तर राज्यों के बीच ज़मीन का मुख्य संपर्क मार्ग है, जो इसे देश के सबसे संवेदनशील इलाकों में से एक बनाता है। यहाँ बनाई जा रही ज़मीन के नीचे की सुविधाओं का इस्तेमाल कमांड और कंट्रोल, लॉजिस्टिक्स और सुरक्षित स्टोरेज के लिए किया जा सकता है। इससे सेना को इस इलाके में अहम ऑपरेशन जारी रखने में मदद मिलेगी, भले ही उस पर हमला हो जाए।</p><h2><br>BRO ड्रोन बंकर बना रहा है</h2><p><br>बॉर्डर रोड्स ऑर्गनाइज़ेशन (BRO) कुछ अग्रिम ठिकानों पर ज़मीन के नीचे बंकर भी बना रहा है। ये बंकर कॉम्बैट ड्रोन और दूसरे कीमती उपकरणों की सुरक्षा करेंगे। सुरक्षा कारणों से इन जगहों की जानकारी साझा नहीं की गई है।<br>युद्ध लड़ने के तरीके में बदलाव<br>यह कदम सैन्य सोच में एक बड़े बदलाव को दिखाता है। आज सेनाएँ न सिर्फ़ हमले पर, बल्कि बचाव और सुरक्षा पर भी ध्यान देती हैं। ज़मीन के नीचे अच्छी तरह से बनाए गए ठिकाने दुश्मन की गोलाबारी से जोखिम कम कर सकते हैं, लड़ने की क्षमता को सुरक्षित रख सकते हैं और सैनिकों को लंबे समय तक डटे रहने में मदद कर सकते हैं। भारत की सीमाएँ उत्तर और पूर्व दोनों तरफ़ लंबी और मुश्किल हैं। ज़मीन के नीचे बने शेल्टर का यह नया नेटवर्क भविष्य के किसी भी संघर्ष में सेना को सुरक्षित और तैयार रखने में अहम भूमिका निभा सकता है।<br>जम्मू-कश्मीर में तीन साल में बनेंगे 5,000 अतिरिक्त बंकर<br>जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती इलाकों में पिछले आठ वर्षों के दौरान नागरिकों की सुरक्षा के लिए करीब 10,000 बंकर बनाए गए हैं। अब सरकार ने अगले तीन वर्षों में 5,000 और बंकर बनाने की योजना तैयार की है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है।</p><h2><br>लंबी लड़ाई में सेना को दुश्मन पर मिलेगी बढ़त</h2><p><br>आधुनिक युद्ध में सैन्य ठिकानों को बचाए रखना दुश्मन पर हमला करने जितना ही जरूरी है। अग्रिम मोचों के पास सुरक्षित रसद भंडार होने से लंबी लड़ाई में सेना की आपूर्ति और जवाबी कार्रवाई की क्षमता भी बनी रहेगी। इससे दुश्मन के लिए एक ही हमले में भारत की सैन्य क्षमता को नुकसान पहुंचाना मुश्किल होगा। हालांकि, हिमालय में निर्माण की ऊंची लागत, भौगोलिक चुनौतियां और भारी उपकरणों की ढुलाई बड़ी मुश्किलें हैं। चीन के इलाके में पठारी जमीन अपेक्षाकृत समतल होने से उसे निर्माण में बढ़त मिलती है। भारत को प्रीफैब्रिकेटेड स्टील बंकर जैसी आधुनिक तकनीकों पर ध्यान देना होगा, ताकि दुर्गम इलाकों में भी कम समय में मजबूत और सुरक्षित ठिकाने तैयार किए जा सकें।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 14:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/decisions-by-india-have-wreaked-havoc-in-china-and-pakistan-leaving-the-world-stunned</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/immunity-shielding-cec-from-litigation-is-now-under-supreme-court-scrutiny-what-is-section-16]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और भारत के चुनाव आयोग (ECI) को नोटिस जारी किया है। यह नोटिस एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की उस याचिका पर जारी किया गया है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन के दौरान किए गए कार्यों के लिए दी गई कानूनी छूट (सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा) को चुनौती दी गई है। इस मामले को कोर्ट में पहले से लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ दिया गया है और 29 अक्टूबर को उन याचिकाओं के साथ ही इस पर भी सुनवाई होनी है। इस चुनौती का मुख्य आधार 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' की धारा 16 है। इस प्रावधान के अनुसार, अदालतें किसी मौजूदा या पूर्व CEC या चुनाव आयुक्त के खिलाफ़ उनके आधिकारिक कर्तव्यों के पालन (या पालन करने के दावे) के दौरान किए गए किसी काम या कही गई किसी बात के लिए दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू या जारी नहीं रख सकतीं। इस चुनौती से देश के शीर्ष चुनाव अधिकारियों को मिलने वाली कानूनी सुरक्षा के दायरे पर सवाल उठते हैं और यह भी कि क्या ऐसी छूट जवाबदेही और कानून के शासन के संवैधानिक सिद्धांतों के अनुरूप है।</p><h2>विरोध से संशोधन तक: कैसे बनी धारा 16?</h2><p><br>जब सरकार ने 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में 'मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) विधेयक, 2023' पेश किया, तो इस कानून की चारों ओर आलोचना हुई। इस विधेयक से नियुक्तियों के मामले में सरकार को जो बेहिसाब दबदबा मिलने वाला था, उसके अलावा एक बात पर ज़ोरदार बहस हुई: यह विधेयक CEC और ECs को वेतन, भत्ते और सेवा की अन्य शर्तों के मामले में कैबिनेट सेक्रेटरी के बराबर लाने की कोशिश कर रहा था; जबकि पहले वे सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर के स्तर पर थे। विपक्षी दलों ने उस बराबरी के दर्जे का मुद्दा उठाया जो CEC और ECs को सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर मिला हुआ था, और जिसे प्रस्तावित कानून खत्म करना चाहता था। पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों ने 16 सितंबर 2023 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक संयुक्त पत्र लिखकर चिंता जताई कि इस कदम से "EC की प्रतिष्ठा और अधिकार कम होंगे" और यह संकेत जाएगा कि CEC और ECs "सिर्फ़ नौकरशाहों के बराबर हैं, उनसे बेहतर नहीं", जिससे नौकरशाही से उनके स्वतंत्र होने की धारणा पर बुरा असर पड़ेगा। आलोचना के बाद, सरकार ने बिल को कुछ समय के लिए रोक दिया और 2023 के शीतकालीन सत्र में कुछ अहम बदलावों के साथ इसे चर्चा और पास कराने के लिए पेश किया। 12 दिसंबर 2023 को, केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने राज्यसभा में बिल पर बहस शुरू करते हुए कहा कि सरकार बिल की धारा 15 में एक संशोधन ला रही है। इसका मकसद CEC और ECs को सैलरी और सर्विस की शर्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट के जजों के बराबर लाना है। उन्होंने सदन को बिल में एक और संशोधन के बारे में भी बताया, जो धारा 15A को जोड़ना था। इससे उन्हें "बिना किसी रुकावट और आज़ादी से अपने काम करने" में मदद मिलेगी। यह बिल 12 दिसंबर 2023 को राज्यसभा से और 21 दिसंबर 2023 को लोकसभा से पास हुआ। इसे 28 दिसंबर 2023 को राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। धारा 15A, 2023 के कानून में धारा 16 के तौर पर शामिल हुई। यह धारा अभी चर्चा में है, खासकर उस बड़े विवाद की वजह से जो CEC ज्ञानेश कुमार के कथित तौर पर एकतरफा फैसलों को लेकर खड़ा हुआ है। ये फैसले चुनावी रोल के बहुत विवादित 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (SIR) को कराने से जुड़े थे।</p><p><strong>1. CEC एक्ट की धारा 16 ज्ञानेश कुमार को क्या सुरक्षा देती है?</strong></p><p><br>धारा 16 मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों को उनके आधिकारिक काम करते समय किए गए, या कथित तौर पर किए गए कामों के लिए सिविल और आपराधिक कार्यवाही से सुरक्षा देती है। यह सुरक्षा उनके पद छोड़ने के बाद भी बनी रहती है।<br><strong>2. क्या CEC के तौर पर लिए गए फैसलों के लिए ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है?</strong><br>धारा 16 अदालतों को किसी सरकारी काम से जुड़ी सिविल या आपराधिक कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है। सुप्रीम कोर्ट इस सुरक्षा के दायरे पर विचार कर रहा था; इस लेख में इस बात पर कोई अंतिम फैसला नहीं बताया गया है कि क्या कुमार पर मुकदमा चलाया जा सकता है।<br><strong>3. विपक्षी पार्टियां ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई क्यों चाहती हैं?</strong><br>विपक्षी पार्टियों का आरोप है कि उन्होंने मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न' (विशेष गहन संशोधन) के संबंध में एकतरफा फैसले लिए। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अन्य चुनाव आयुक्तों ने उन फैसलों और आदेशों पर आपत्ति जताई थी, जिनके बारे में उन्हें जानकारी नहीं थी।<br><strong>4. क्या CEC एक्ट चुनाव आयुक्तों को जजों की तुलना में ज़्यादा सुरक्षा देता है?</strong><br>सुनवाई के दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा कि धारा 16 के तहत जजों को मिलने वाली सुरक्षा से ज़्यादा कानूनी सुरक्षा मिल सकती है। लेख में बताया गया है कि जजेज़ (प्रोटेक्शन) एक्ट के तहत सरकार या कोर्ट के पास जजों के खिलाफ़ कुछ कार्रवाई करने का अधिकार सुरक्षित रहता है, जबकि CEC एक्ट में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है।<br><strong>5. क्या सुप्रीम कोर्ट ने धारा 16 की वैधता पर कोई फ़ैसला सुनाया है?</strong><br>कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग, CEC और दूसरे चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया है। इसमें धारा 16 पर किसी अंतिम फ़ैसले की बात नहीं कही गई है। इससे पहले 5 अक्तूबर 2026 को सीजेआई सूर्यकांत की अगुवाई वाली बेंच ने 2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की मिली कानूनी सुरक्षा को लेकर कहा कि यह तो संवैधानिक कोर्ट के जजों को भी प्राप्त नहीं है। सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर)को लेकर कथित मनमाने फैसले को लेकर डाली गई याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की बेंच की तरफ से ये गंभीर मौखिक टिप्पणी की गई थी।&nbsp;</p><h2><br>न्यायाधीश (संरक्षण) अधिनियम, 1985 (The Judges (Protection) Act, 1985) क्या है?</h2><p><br>केंद्र सरकार, राज्य सरकार, भारत के सर्वोच्च न्यायालय, किसी उच्च न्यायालय या किसी अन्य सक्षम प्राधिकारी को उस समय लागू किसी भी कानून के तहत किसी व्यक्ति (जो न्यायाधीश रहा हो या वर्तमान में न्यायाधीश हो) के खिलाफ उचित कार्रवाई (चाहे वह दीवानी, आपराधिक, विभागीय कार्यवाही या किसी अन्य रूप में हो) करने का अधिकार बना रहेगा। यह प्रावधान (कार्रवाई की छूट देने वाली यह धारा) CEC अधिनियम (मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम) में मौजूद नहीं है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cjp-accuses-delhi-police-of-denying-legal-access-and-seizing-phones-of-detained-leaders" target="_blank" rel="noopener">'फ़ोन ज़ब्त, वकील से मिलने की इजाज़त नहीं': दास और रांका को हिरासत में लिए जाने के बाद दिल्ली पुलिस पर CJP के आरोप</a><br>CEC और ECs की नियुक्ति कैसे होती है?</h3><p><br>संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों की देखरेख, निर्देशन और नियंत्रण की ज़िम्मेदारी भारत के चुनाव आयोग (ECI) को सौंपता है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार, संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून के अधीन रहते हुए, राष्ट्रपति CEC और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करते हैं। कई दशकों तक, संसद ने इन नियुक्तियों की प्रक्रिया तय करने वाला कोई कानून नहीं बनाया था। इसके कारण सुप्रीम कोर्ट के सामने यह सवाल उठा कि जब ECI के सदस्यों की नियुक्ति कार्यपालिका (सरकार) करती है, तो ECI की आज़ादी को कैसे बचाया जा सकता है। मार्च 2023 में, सुप्रीम कोर्ट की पाँच जजों की संविधान पीठ ने 'अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ' मामले में अपना फ़ैसला सुनाया।</p><h2>अनूप बरनवाल मामला क्या था?</h2><p><br>जनवरी 2015 में अनूप बरनवाल ने एक जनहित याचिका (PIL) दायर की। उनका तर्क था कि ECI के सदस्यों की नियुक्ति की व्यवस्था असंवैधानिक है। उस समय, नियुक्तियाँ करने का अधिकार कार्यपालिका के पास था। PIL में कहा गया था कि समय के साथ ECI की आज़ादी कम हुई है। इसमें कोर्ट से अपील की गई कि वह ECI में नियुक्तियों के लिए एक स्वतंत्र, कॉलेजियम जैसी व्यवस्था बनाने का निर्देश दे। संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद अनुच्छेद 324(2) के तहत कोई कानून नहीं बनाती, तब तक चुनाव आयोग में नियुक्तियां तीन सदस्यों वाली एक समिति की सिफारिश पर की जाएंगी। इस समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद इस विषय पर कोई कानून नहीं बना लेती।</p><h2><br>CEC को कैसे हटाया जा सकता है?</h2><p><br>संविधान CEC को पद से हटाने के मामले में काफी सुरक्षा देता है। अनुच्छेद 324(5) के अनुसार, CEC को पद से "उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है।" इसका मतलब है कि CEC को केवल साबित हो चुके दुर्व्यवहार या अक्षमता के आधार पर और सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने के लिए तय संसदीय प्रक्रिया के ज़रिए ही हटाया जा सकता है। संसद के दोनों सदनों में ज़रूरी विशेष बहुमत से पास होना चाहिए। संसद द्वारा प्रस्ताव पास किए जाने के बाद ही राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश जारी कर सकते हैं। इसकी प्रक्रिया 'जजेज़ (इन्क्वायरी) एक्ट, 1968' में बताई गई है। दूसरे चुनाव आयुक्तों को मिलने वाली सुरक्षा अलग है। आर्टिकल 324(5) के तहत, किसी चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को CEC की सिफ़ारिश के बिना उनके पद से नहीं हटाया जा सकता।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/piyush-goyal-slams-congress-over-election-commission-rewards-to-former-cecs" target="_blank" rel="noopener">Piyush Goyal ने Rahul Gandhi से पूछे 10 सवाल, वोट चोरी पर सबूत देने की दी चुनौती</a><br>क्या CEC को गिरफ़्तार किया जा सकता है?</h3><p><br>इससे संबंधित प्रावधान 2023 के अधिनियम की धारा 16 है। यह धारा किसी भी ऐसे व्यक्ति को अदालत में दीवानी या आपराधिक कार्यवाहियों से सुरक्षा प्रदान करती है, जो CEC या चुनाव आयुक्त रहा हो या वर्तमान में हो। बशर्ते वह कृत्य, बात या शब्द उसने अपने आधिकारिक कर्तव्य या कार्य के निर्वहन के दौरान किया या कहा हो। यह प्रावधान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह सुरक्षा उन व्यक्तियों तक भी बढ़ाता है जो CEC या चुनाव आयुक्त "हैं या कभी रहे थे"।<br>हालांकि, धारा 16 स्पष्ट रूप से यह नहीं कहती कि CEC को गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। यह केवल यह कहती है कि अदालतें इस धारा के दायरे में आने वाले आचरण के संबंध में कोई दीवानी या आपराधिक कार्यवाही स्वीकार या जारी नहीं रखेंगी। इस धारा में गिरफ्तारी (Arrest), जांच (Investigation) या पुलिस हिरासत (Police Custody) जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसलिए, इसे गिरफ्तारी से सीधी या पूर्ण छूट नहीं कहा जा सकता। इसके अलावा, यह सुरक्षा केवल उन्हीं कृत्यों से जुड़ी है जो आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान किए गए हों।</p><h2><br>2023 से पहले क्या व्यवस्था थी?</h2><p><br>पुराना कानून (1991 का एक्ट): 2023 से पहले चुनाव आयोग Act, 1991 से संचालित होता था। इस 1991 के कानून में आयुक्तों के खिलाफ कोर्ट केस या आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाने वाली ऐसी कोई 'धारा 16' या कोई इम्युनिटी क्लॉज नहीं था। सामान्य लोक सेवकों वाला नियम (CrPC धारा 197): पहले चुनाव आयुक्तों को अन्य सरकारी अफसरों &nbsp;की तरह ही माना जाता था।उन पर आधिकारिक ड्यूटी से जुड़े मामले में केस चलाने के लिए CrPC की धारा 197 के तहत सरकार की पूर्व अनुमति की जरूरत होती थी। यानी कोर्ट जाने पर पूरी तरह कानूनी रोक नहीं थी, सिर्फ सरकार की मंजूरी की शर्त थी।&nbsp;<br>संविधान (अनुच्छेद 324):सविधान ने CEC को केवल पद से हटाने की सुरक्षा दी थी कि उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह महाभियोग जैसी प्रक्रिया से ही हटाया जा सकता है। &nbsp; लेकिन संविधान के तहत उन्हें राष्ट्रपति या राज्यपाल (अनुच्छेद 361) की तरह मुकदमों से कानूनी छूट नहीं दी गई थी।</p><h2><br>2023 के कानून ने क्या बदल दिया?</h2><p><br>2023 के नए एक्ट की धारा 16 में साफ लिख दिया गया कि CEC या ECs द्वारा अपने आधिकारिक कर्तव्य के दौरान किए गए किसी भी काम या फैसले के खिलाफ अदालत कोई भी सिविल या क्रिमिनल केस स्वीकार ही नहीं करेगी।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 15:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/immunity-shielding-cec-from-litigation-is-now-under-supreme-court-scrutiny-what-is-section-16</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[संतोष मूरत की 'साहब, मैं ज़िंदा हूँ' वाली तख्ती से गृह मंत्रालय के ताले तक, जंतर-मंतर की अनकही कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-santosh-murat-placard-reading-sir-i-am-alive-to-the-home-ministry-query]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कागज़ पर मरा हुआ एक इंसान जब खुद के ज़िंदा होने की सनद मांगने देश की चौखट पर आया, तो उसने जंतर मंतर के फुटपाथ को अपना ठिकाना बनाया। हाथों में मैं जिंदा हूं साहब वाली तख्ती और कड़कड़ाती ठंड में सीने से चिपका हुआ एक लावारिस भूरा कुत्ता। मानो मुंशी प्रेमचंद की पूस की रात का हल्कू और जबरा, दिल्ली के दिल में सालों तक इंसाफ की पहरेदारी करते रहे। नाम संतोष मूरत सिंह। यह वही सड़क है, जहाँ सिर्फ संतोष नहीं, बल्कि मुल्क के हर उस कोने की आवाज़ पहुँची, जिसे अपनी ही ज़मीन पर बेगाना कर दिया गया था। सवाई जयसिंह ने सदियों पहले पत्थरों के इस अजूबे को ग्रहों और तारों की चाल नापने के लिए तराशा था। इन्हें भला इस बात का क्या इल्म होगा कि आदाज हिंदुस्तान में ये खगोलीय वेधशाला एक दिन मुल्क के दर्द का थर्मामीटर बन जाएगा। दशक दर दशक बदलते रहे। लेकिन लाल-बलुआ पत्थर और ईंटों से बना जंतर-मंतर महज स्माक नहीं अपितु 140 करोड़ हिंदुस्तानियों की असहमति की सबसे बड़ी पनाहगाह बन गया। एक ऐसा ठिकाना जहां लोकतंत्र के हाशिए पर खड़ा सबसे कमजोर इंसान भी तख्त पर बैठे हुक्मरानों की आंखों में आंखे डालकर सवाल कर सके। लेकिन अब पत्थरों की यह सड़क खामोश हो जाएगी। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक बड़ा फैसला लेते हुए जंतर मंतर को आधिकारिक प्रोटेस्ट साइट्स की सूची से डिनोटिफाई कर दिया है। यानी लोकतंत्र का वह मशहूर कोना, जहाँ तख्तियों की इबारतें हुकूमतों की नींद उड़ा दिया करती थीं, अब हमेशा के लिए खाली करा लिया गया है। सवाल सिर्फ एक जगह के बंद होने का नहीं है। सवाल यह है कि जब असहमति की सबसे पहचानी जाने वाली चौखट ही मिटा दी जाए, तो वो संतोष मूरत सिंह, वो किसान, वो छात्र और वो मजदूर ब अपनी फरियाद लेकर किस देहरी पर दस्तक देंगे?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jantar-mantar-is-no-longer-a-protest-site-the-government-has-designated-these-3-new-locations" target="_blank" rel="noopener">Jantar Mantar नहीं रहा अब 'प्रोटेस्ट साइट', गृह मंत्रालय का बड़ा फैसला, तय किए ये 3 नए स्थान</a><br>क्या है नया फैसला</h3><p><br>दिल्ली पुलिस ने जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन के लिए तय जगह की सूची से हटा दिया है और ऐसी सभाओं के लिए तीन दूसरी जगहों के नाम बताए हैं। यह कदम 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के साथ शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन की इजाज़त को लेकर चल रहे विवाद और 'इंडिया ब्लॉक' के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च से पहले राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी किए जाने के बीच उठाया गया। आदेश के मुताबिक, नई तय की गई तीन जगहें हैं। पुरानी दिल्ली में रामलीला मैदान, पूर्वी दिल्ली में CBD ग्राउंड और उत्तरी दिल्ली में बुराड़ी ग्राउंड। गौरतलब है कि ये तीनों जगहें मध्य दिल्ली में स्थित जंतर-मंतर से क्रमशः 3 किमी, 13.5 किमी और 44 किमी दूर हैं। दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार के हस्ताक्षर वाले इस आदेश में 28 अप्रैल, 2022 के उस पुराने आदेश में कुछ बदलाव किए गए हैं, जिसके तहत जंतर-मंतर को विरोध-प्रदर्शन की जगह के तौर पर तय किया गया था। पुलिस ने कहा कि तीन नई जगहों पर विरोध-प्रदर्शन और रैलियों के आयोजन से जुड़े विस्तृत और संशोधित स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) अलग से जारी किए जाएंगे।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/acting-chief-justice-bench-in-delhi-high-court-to-hear-jantar-mantar-pleas" target="_blank" rel="noopener">Jantar Mantar बंद होने के खिलाफ याचिका, 13 अक्टूबर को सुनवाई करने को तैयार दिल्ली HC</a><br>हाई कोर्ट जंतर-मंतर बंद करने के मामले में याचिका पर सुनवाई करेगा</h3><p><br>दिल्ली हाई कोर्ट 13 अक्टूबर को उस याचिका पर सुनवाई करेगा जिसमें शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शनों के लिए जंतर-मंतर को बंद करने के फैसले को चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया था कि प्रदर्शनों के लिए कोई वैकल्पिक जगह तय नहीं की गई है। कोर्ट ने 10 और 11 अक्टूबर को दिल्ली में हुए विरोध प्रदर्शनों से जुड़ी एक अलग याचिका को भी मंगलवार के लिए सूचीबद्ध किया, लेकिन तत्काल सुनवाई करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले से ही इस मामले को देख रहा है और उसने केंद्र सरकार से हलफनामा मांगा है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cjp-gives-24-hour-ultimatum-to-delhi-police-for-jantar-mantar-protest" target="_blank" rel="noopener">Delhi Police को अल्टीमेटम: Jantar Mantar पर Peaceful Protest के लिए CJP ने दी 24 घंटे की डेडलाइन</a><br>महाराजा जय सिंह द्वितीय की सोच</h3><p><br>महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय न केवल एक शासक थे, बल्कि गणित और खगोल विज्ञान में गहरी रुचि रखने वाले विद्वान भी थे। 18वीं सदी की शुरुआत में, उन्होंने खगोलीय घटनाओं के बारे में ज़्यादा सटीक जानकारी की ज़रूरत को समझा और पूरे भारत में कई वेधशालाएँ बनवाईं। दिल्ली का जंतर-मंतर उनके द्वारा बनाई गई पाँच वेधशालाओं में से एक था; बाकी वेधशालाएँ जयपुर, उज्जैन, वाराणसी और मथुरा में स्थित थीं। इन वेधशालाओं को खगोलीय तालिकाओं को बेहतर बनाने और आकाशीय गतिविधियों की ज़्यादा सटीक माप करने के लिए डिज़ाइन किया गया था। जय सिंह द्वितीय के प्रयासों से वैज्ञानिक आदान-प्रदान के एक दौर की झलक मिलती है, जिसमें भारतीय खगोलीय परंपराओं का फ़ारसी, इस्लामी और यूरोपीय स्रोतों के ज्ञान से मेल हुआ। उनकी वेधशालाएँ अवलोकन और गणना के केंद्र बन गईं, जहाँ वैज्ञानिक तरीकों और वास्तुकला के नए प्रयोगों का संगम हुआ।</p><h2><br>जहाँ वास्तुकला और खगोल विज्ञान का मिलन होता है</h2><p>रहने या पूजा-पाठ के लिए बनाई जाने वाली पारंपरिक इमारतों से अलग, जंतर-मंतर को एक विशाल वैज्ञानिक उपकरण के तौर पर बनाया गया था। हर संरचना का एक खास मकसद था। आकाशीय पिंडों की गति को देखने के लिए इनके कोण और माप बहुत सावधानी से तय किए गए थे।</p><p>दिल्ली वेधशाला की सबसे खास संरचना 'सम्राट यंत्र' है। यह एक विशाल धूप-घड़ी है, जिसका इस्तेमाल सूरज की परछाई की गति को ट्रैक करके स्थानीय समय का पता लगाने के लिए किया जाता था। इसके विशाल आकार की वजह से खगोलविद ज़्यादा सटीकता के साथ अवलोकन कर पाते थे। एक और ज़रूरी यंत्र 'जय प्रकाश यंत्र' है, जिसमें कटोरे के आकार के दो हिस्से होते हैं। इनकी मदद से खगोलशास्त्री आकाशीय पिंडों की स्थिति का पता लगाते थे। बेलनाकार आकृतियों से बने 'राम यंत्र' का इस्तेमाल तारों और दूसरे खगोलीय पिंडों की ऊंचाई और दिशा मापने के लिए किया जाता था। ये सभी यंत्र मिलकर यह दिखाते हैं कि किस तरह वैज्ञानिक जानकारी को ऐसी भौतिक संरचनाओं में बदला गया, जिनका अध्ययन और इस्तेमाल किया जा सकता था।&nbsp;</p><h2><br>18वीं सदी में आसमान को समझना</h2><p><br>आधुनिक टेलीस्कोप और डिजिटल टेक्नोलॉजी के आने से पहले के दौर में जंतर-मंतर जैसी वेधशालाओं ने ब्रह्मांड को समझने में अहम भूमिका निभाई। खगोलशास्त्री आकाशीय गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए गणितीय गणनाओं और सावधानी से बनाए गए उपकरणों पर निर्भर रहते थे। ऐसी जगहों पर की गई खोजों और अवलोकनों से ज़्यादा सटीक कैलेंडर बनाने और ग्रहों की चाल के बारे में जानकारी बेहतर करने में मदद मिली। खगोल विज्ञान को रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग नहीं माना जाता था; इसने खेती, त्योहारों, समुद्री यात्रा और समय बताने के तरीकों को प्रभावित किया।स जंतर-मंतर वैज्ञानिक अवलोकन और समाज के बीच इसी संबंध को दिखाता है और बताता है कि कैसे आसमान के अध्ययन ने इंसानी समझ को आकार दिया। जैसे-जैसे दिल्ली देश का राजनीतिक और प्रशासनिक केंद्र बनी, जंतर-मंतर धीरे-धीरे लोगों की आवाज़ उठाने की जगह के तौर पर पहचाना जाने लगा। इसकी खुली बनावट की वजह से लोग यहाँ व्यवस्थित ढंग से इकट्ठा हो सकते थे, और इसके ऐतिहासिक माहौल ने इस जगह को एक खास पहचान दी। जंतर-मंतर में आया यह बदलाव दिखाता है कि कैसे ऐतिहासिक जगहों का मतलब पीढ़ियों के साथ बदलता रहता है। मूल रूप से खगोलीय पिंडों की गति के अध्ययन के लिए बनाया गया यह स्मारक नागरिक भागीदारी से जुड़ गया, जिससे इसके सांस्कृतिक महत्व में एक और आयाम जुड़ गया।</p><h2><br>33 साल से धरने देख रहा था जंतर-मंतर</h2><p><br>1988 में किसान आंदोलन के बाद बोट क्लब पर प्रदर्शन रोक दिए गए थे। इसके बाद 1993 में जंतर-मंतर पर पहला प्रदर्शन हुआ था। जंतर-मंतर को धरना स्थल बनाने संबंधी किसी आदेश का रिकॉर्ड नहीं है। यह पुलिस की प्रशासनिक व्यवस्था के रूप में विकसित हुआ। स्थानीय लोगों की शोर, प्रदूषण जैसी शिकायतों पर एनजीटी ने 2017 में यहां प्रदर्शन रोक दिए। धरने-प्रदर्शन रामलीला मैदान में करने को कहा। 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा- शांतिपूर्ण प्रदर्शन संवैधानिक अधिकार है। कोर्ट ने प्रतिबंध हटाकर नियंत्रित प्रदर्शन की व्यवस्था बनाने को कहा। अब सुप्रीम कोर्ट में फिर वैकल्पिक प्रदर्शन स्थल की मांग लंबित है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 14:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-santosh-murat-placard-reading-sir-i-am-alive-to-the-home-ministry-query</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ट्रंप को जिताने वाले मस्क अब राहुल से हाथ मिला मोदी को हटाएंगे? Starlink-अंबानी और कारोबारी खीज की असल कहानी समझें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-musk-who-helped-trump-win-now-join-hands-with-rahul-to-oust-modi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं? यह सवाल दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट पर पूछा है। इससे पहले 7 अक्टूबर को एलन मस्क ने एक्स पर एक पोस्ट किया था। इसमें मस्क ने लिखा था कि भारत के कुछ बड़े बिजनेसमैन नहीं चाहते कि स्टारलिंक का सेटेलाइट इंटरनेट भारत में आए। क्योंकि ऐसा होने से उनका एक छत्रुराज खत्म हो सकता है। हालांकि तब एलन मस्क ने किसी का नाम नहीं लिया था। लेकिन 8 अक्टूबर को मस्क का एक और पोस्ट आया है और इस बार उन्होंने सीधे अंबानी का नाम लिया। भारत की बढ़ती वैश्विक साख और तेजी से मजबूत होती अर्थव्यवस्था को देखकर अब सिर्फ देश के अंदर बैठे विरोधी ही नहीं बल्कि दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क के पेट में भी मरोड़ उठने लगी है और वो भी अब मोदी सरकार और अंबानी के खिलाफ खतरनाक खेल खेलने की फिराक में लग गए हैं। दरअसल एलन मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत के सेटेलाइट इंटरनेट मार्केट में पैर पसारने की फिराक में थी। लेकिन जब भारत सरकार ने विदेशी कंपनियों के मनमानी के आगे झुकने से इंकार कर दिया और देश के राष्ट्रीय हितों और सुरक्षा नियमों से समझौता नहीं किया तो मस्क का असली रूप दुनिया के सामने आ गया। पहले मस्क ने भारत की कमर्शियल प्रक्रियाओं पर सवाल उठाए। फिर उन्होंने भारतीय उद्योगपतियों के लिए दिलचस्प शब्द का इस्तेमाल किया ऑलिगार्क। ऑलिगार्क का मतलब सिर्फ धन सेट नहीं होता है। कैमब्रिज डिक्शनरी के मुताबिक ऑलिगार्क एक ऐसा धन्ना सेट होता है जो अपने कनेक्शन और अकूत दौलत के बल पर सरकार और समाज को इन्फ्लुएंस करता है। तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला लफ्ज़ है। रूस में पुतिन जिन 10-12 धन्ना सेठों के बल पर पूरे देश को कंट्रोल करते हैं उन्हें रशियन ऑलिगार्क कहा जाता है। पूरी दुनिया जानती है कि किस तरह पुतिन के आशीर्वाद से इन्हें ठेके मिलते हैं और बदले में यह लोग पुतिन के कामों में पैसा लगाते हैं। पुतिन के जो दुश्मन है उनको परेशान करते हैं। सेठ भी खुश, नेता भी खुश और जनता जनता के लिए इस गेम में कोई जगह नहीं है। कुल मिलाकर कहे तो ऑलिगार्क एक नेगेटिव कनोटेशन वाला शब्द है। अकूत पैसा, पावरफुल कनेक्शन और ऐसा कोई शख्स जो ऐसे बिजनेस में हो जहां स्टार्लिंग उसका डायरेक्ट राइवल हो। सोशल मीडिया एक स्वर में मुकेश अंबानी का नाम ले रहा है। हालांकि जब भारत सरकार ने मस्क के तमाम बेबुनियादी आरोपों को खारिज कर दिया तो बौखलाहट में मस्क ने सीधे भारत के स्वाभिमान पर हमला बोलते हुए एक ट्वीट कर दिया और छूटते ही पूछा क्या अंबानी भारत के असली बॉस हैं। &nbsp;तुरंत ही उनके ट्वीट पर राहुल गांधी ने ऐसा रिएक्ट किया कि पूरा देश पूरे खेल को ही समझ गया कि ये दोनों मिलकर भारत में क्या खतरनाक खेल खेलने की कोशिश में लग गए हैं। लेकिन ठहरिए मस्क का यह बयान सिर्फ एक कारोबारी खीज नहीं है बल्कि इसके पीछे एक बहुत खतरनाक क्रोनोलॉजी छिपी है। जैसे ही मस्क ने भारत और भारतीय कारोबारियों के खिलाफ जहर उगला वैसे ही देश के अंदर बैठे राहुल गांधी और उनका पूरा इकोसिस्टम मस्क के समर्थन में पलकें बिछाकर खड़ा हो गया। राहुल गांधी ने तुरंत सोशल मीडिया पर मस्क का स्वागत करते हुए भारतीय उद्योगपतियों और मोदी सरकार के खिलाफ तंज कस डाला। जिस पर मस्क ने भी राहुल को धन्यवाद दे दिया। सोचिए जो राहुल गांधी दिल्ली की सड़कों पर तांडव मचा रहे हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोहल भड़का रहे हैं। वही राहुल गांधी अब भारत की संप्रभुता को चुनौती देने वाले विदेशी अरबपति के सुर में सुर मिला रहे हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/jyotiraditya-scindia-says-three-satcom-firms-must-clear-security-norms" target="_blank" rel="noopener">Satcom सेक्टर में नहीं चलेगी Monopoly, सिंधिया ने किया साफ- सुरक्षा जांच और चार्ज तय होने के बाद मिलेगा Spectrum</a></h3><h2>अंबानी का नाम लेकर एलन मस्क ने क्या कहा?</h2><p><br>मस्क ने लिखा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है। कंपनी पिछले 5 साल से भारत सरकार की हर शर्त और कानून मान रही है। फिर भी भारत में स्टारलिंक को अब तक लाइसेंस क्यों नहीं मिला? इसके बाद मस्क ने सीधा सवाल पूछा, क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? इसी पोस्ट को नेता विपक्ष राहुल गांधी ने रीट्वीट किया है। राहुल गांधी ने लिखा भारत में आपका स्वागत है। एलन दूसरे शख्स से मिलने का इंतजार करें। इसके बाद एलन मस्क ने भी इस पोस्ट को रीट्वीट किया है और थैंक यू लिखा है। यानी एलन मस्क के पोस्ट से शुरू हुआ यह विवाद अब बढ़ गया है।</p><h2><br>मस्क की स्टारलिंक का विवाद है क्या?</h2><p><br>स्टारलिंक भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सेवा शुरू करने के लिए कई सालों से कोशिश कर रहा है। कंपनी को जून 2025 में जीएमपीसीएस लाइसेंस और जुलाई 2025 में आईए स्पेस से अनुमति मिल चुकी है। कंपनी ने भारत में ग्राउंड स्टेशन और जरूरी इंफ्रास्ट्रक्चर भी बना लिया है। लेकिन अभी भी सिक्योरिटी असेसमेंट, विदेशी निवेश की मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन बाकी है। आसान भाषा में समझे तो स्टार्लिंग को भारत में काम करने की इजाजत मिल चुकी है। लेकिन सर्विस शुरू करने के लिए जरूरी आखिरी हरी झंडी अभी नहीं मिली है। और इसी देरी को लेकर एलन मस्क अब खुलकर सवाल उठा रहे हैं। स्टार्लिंग ने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र, गुजरात और मेघालय की सरकारों के साथ लेटर ऑफ इंटेंट भी साइन किए हैं। बहरहाल मस्क के इस बयान के बाद भारत सरकार ने भी जवाब दिया है। संचार मंत्रालय ने स्टारलिंग के साथ किसी तरह का भेदभाव किए जाने के आरोप को खारिज किया है। दरअसल सरकार ने तीन कंपनियों को भारत में सेटेलाइट इंटरनेट सर्विस देने का लाइसेंस दिया है। इनमें एलन मस्क की स्टारलिंग, Reliance Jio की Jio सेट और भारती के समर्थन वाली यूटेल सेट वन वेब शामिल है। लेकिन लाइसेंस मिलने के बावजूद यह कंपनियां अभी भारत में अपनी सर्विस शुरू नहीं कर सकती। इसके लिए सुरक्षा से जुड़ी जांच और स्पेक्ट्रम की मंजूरी जरूरी है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/ram-madhav-slams-rahul-gandhi-over-sudden-support-for-elon-musk-and-starlink" target="_blank" rel="noopener">भारत Banana Republic नहीं, Ram Madhav बोले- Starlink स्पेक्ट्रम पर नियम से होगा फैसला</a></h3><h2><br>क्या मस्क स्टारलिंग को जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह इस्तेमाल करते हैं?&nbsp;</h2><p><br>मस्क एक एक्टिव पॉलिटिकल माइंड रखते हैं। दुनिया भर की पॉलिटिक्स को लेकर उनकी एक राय है। उनके दिमाग में स्कीम्स हैं। जर्मनी में चुनाव होते हैं तो वह दक्षिणपंथी एएफडी की तरफदारी करते हैं। ब्रिटेन में एंटी मुस्लिम नैरेटिव को हवा देते हैं। रिस्टोर ब्रिटेन और रिफॉर्म यूके जैसी पार्टियों का समर्थन करते हैं। अपने खुद के देश साउथ अफ्रीका में सरकार को टारगेट करते हैं। वाइट सुप्रीममेसी की बातें करते हैं। अब अगर मस्क सिर्फ़ दक्षिणपंथी ही होते पॉलिटिकली तो कोई कह सकता था कि इस हिसाब से मस्क को भारत में दिक्कत नहीं होनी चाहिए। भारत में भी दक्षिणपंथी सरकार अभी है। लेकिन दिक्कत यह है कि मस्क कब पाला बदलेंगे किसी को आईडिया नहीं है। कभी वो ट्रंप के दफ्तर में नजर आते हैं बच्चों के साथ। तो कभी ऐसे ट्वीट करते हैं कि ट्रंप को बताना पड़ता है कि भले तुमने पैसा लगाया हो कैंपेन में लेकिन राष्ट्रपति मैं हूं। मुझसे डर के रहो। मस्क आज किसी पार्टी का हाथ पकड़ कर दाखिल होंगे। कल उसी के दुश्मन भी बन सकते हैं और इसमें किसी को हैरानी भी नहीं होगी।</p><h2>&nbsp;<br>मस्क की बौखलाहट और राहुल का एलन प्रेम!</h2><p><br>थोड़ा पीछे चलते हैं, 2024 में चुनाव प्रचार के दौरान दोनों नेता करीब आते हैं। डोनाल्ड ट्रंप की सबसे बड़ी जीत का श्रेय एलन मस्क को ही एक्सपर्ट्स ने तब दिया था। उन्होंने ट्रंप का सिर्फ समर्थन ही नहीं किया बल्कि ट्रंप के प्रचार में लगभग सात करोड़ डॉलर खर्च भी किए। &nbsp;बात जब टाइमिंग की आती है तो राजनीति में कोई भी घटना इत्तेफाक नहीं होती है। एक तरफ जब विपक्ष एसआईआर के खिलाफ ज्ञानेश कुमार को मोहरा बनाकर सड़कों पर गदर काट रहा है। ठीक उसी वक्त एलन मस्क मोदी सरकार और भारतीय उद्योगपतियों को निशाना बना रहे हैं। अंबानी का नाम लेकर ना जाने क्या-क्या दिखाने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं। सवाल यह है कि जो मस्क आज भारत में कानून और नियमों की बात का रोना रो रहे हैं। क्या वो अमेरिका में भी इसी तरह की बयानबाजी करने की हिम्मत रखते हैं? जब ट्रंप प्रशासन ने चीन की दिग्गज इलेक्ट्रिक वाहन कंपनी बीवाईडी पर 100 फीसदी तक भारी भरकम टेरिफ ठोक दिया था। तब तो मस्क की जुबान पर ताला लगा हुआ था। तब तो मस्क ने यह नहीं कहा कि अमेरिका में यह किसी से नहीं पूछा। क्या अमेरिका का बॉस एलन मस्क है? क्योंकि उन्हीं के कंपनियों की वजह से ट्रंप ने यह हरकत की थी। लेकिन जब भारत अपने सुरक्षा कारणों, राष्ट्रीय हितों, कानूनों का पालन करने के लिए निष्पक्ष नियम कानून लागू करता है तो मस्क को भारत में तानाशाही दिखने लगती है। भारत का बॉस अंबानी दिखने लगते हैं। &nbsp;सबसे अफसोसजनक बात तो यह है कि हमारे देश का विपक्ष यानी राहुल गांधी अपनी ही सरकार को घेरने के लिए ऐसे विदेशी कारोबारी के मोहरे बन जाते हैं जो भारत की अर्थव्यवस्था और घरेलू कंपनियों की बढ़त से परेशान है। जबकि मोदी सरकार ने एकदम साफ कर दिया है कि देश का सेटेलाइट कम्युनिकेशन रेगुलेटरी फ्रेमवर्क एकदम निष्पक्ष और गैर भेदभाव वाला है। सरकार ने तीन कंपनियों के सुरक्षा और कागजी गाइडलाइंस पूरे ना करने पर प्रोसेस को रोका है। जिसमें स्टार्लिंग, Jio सेट और यूटिल सेट वनवे तीनों शामिल हैं। तीनों कंपनियां एक ही सुरक्षा जांच के चरण में है। लेकिन मस्क चाहते हैं कि उन्हें बिना सुरक्षा क्लीयरेंस के स्पेशल ट्रीटमेंट मिले। जब ऐसा नहीं हुआ तो उन्होंने भारत को बदनाम करना शुरू कर दिया।&nbsp;</p><h2><br>मस्क के आरोपों पर टेलीकॉम मिनिस्टर ने क्या जवाब दिया</h2><p><br>संचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने &nbsp;कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। उन्होंने कहा कि एक खास कंपनी की काफी चर्चा हो रही है, लेकिन वास्तविकता यह है कि तीन कंपनियों को उपग्रह संचार (सैटकॉम) लाइसेंस मिल चुके हैं और वे सुरक्षा संबंधी शर्तों तथा निर्धारित लक्ष्यों को अलग-अलग पूरा करने के बाद परिचालन शुरू कर सकती हैं। उपग्रह संचार सेवाओं को लेकर जारी विवाद और अमेरिकी उद्योगपति एलन मस्क के आरोपों के बीच उन्होंने यह टिप्पणी की है। मस्क ने दावा किया है कि कुछ प्रभावशाली कारोबारी समूह उनकी कंपनी स्टारलिंक की उपग्रह संचार सेवाओं को शुरू होने से रोक रहे हैं। मस्क ने आरोप लगाया था कि ये समूह भारतीय लोगों पर अपना एकाधिकार बनाए रखना चाहते हैं। सिंधिया ने कहा कि भारत किसी भी क्षेत्र में एकाधिकार की अनुमति नहीं देता। हमारा काम हर ग्राहक को सेवाओं के व्यापक विकल्प उपलब्ध कराना है। खुले बाजार में ग्राहक को यह चयन करना होगा कि वह कौन-सी सेवा पसंद करता है और उन विकल्पों में से किस कंपनी की सेवा लेना चाहता है। सिंधिया ने कहा कि मस्क की स्टारलिंक, रिलायंस जियो की उपग्रह सेवा इकाई जियो सैटकॉम और भारती समर्थित यूटेलसैट वनवेब को लाइसेंस मिल चुके हैं। वहीं, अमेजन की कुइपर ने इस क्षेत्र में रुचि दिखाई है और उसे निर्धारित प्रक्रिया से गुजरना होगा। मंत्री ने कहा कि एक खास कंपनी को लेकर काफी चर्चा हो रही है, लेकिन सैटकॉम के लाइसेंस तीन सेवा प्रदाताओं को मिले हैं।&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 15:48:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[RBI ने ऐसा क्या बदला, होम लोन-कार लोन की EMI बढ़ने वाली है? कब और किसने लिया था पहला लोन, जानें कर्ज की कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-changes-has-the-rbi-made-that-could-lead-to-a-rise-in-home-and-car-loan-rates]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>एक फैसला, एक प्रेस कॉन्फ्रेंस और करोड़ों भारतीयों की ईएमआई का गणित रातों-रात बिगड़ गया! अगर आपने घर, कार या पर्सनल लोन ले रखा है, तो आपकी बैंक किश्त अब और महंगी होने वाली है। रिजर्व बैंक यानी RBI का एक फैसला। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमेटी ने रेपो रेट 0.25% बढ़ाकर 5.50% कर दिया है। अब आप कहेंगे कि ये रेपो रेट और एमपीसी क्या बला है, हमारा इससे क्या लेना-देना? लेना-देना सीधा आपकी गाढ़ी कमाई से है। और लोग कहते हैं महंगाई सरकार बढ़ाती है। अक्सर हम और आप महंगाई का ठीकरा सरकारों पर फोड़ते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे ब्याज दरों का रिमोट कंट्रोल किसके हाथ में होता है? एमपीसी क्या है और इसका सीधा असर आपके बैंक बैलेंस पर कैसे पड़ता है? चलिए, इस भारी-भरकम इकॉनमी का आज एमआरआई स्कैन करते हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-workers-assault-kashmiri-youth-outside-connaught-place-restaurant-in-delhi" target="_blank" rel="noopener">मोदी के समर्थन में नारेबाजी पर भड़के कांग्रेस कार्यकर्ता, कश्मीरी युवक की कर दी पिटाई, बीजेपी आग बबूला</a><br>रेपो रेट क्या बला है?</h3><p>इसे भी समझ लीजिए। यह वो रेट यानी दर होती है जिस पर रिजर्व बैंक दूसरे बैंकों को कर्ज देता है। मतलब यह हुआ कि जैसे ही आरबीआई दूसरे बैंकों को महंगे इंटरेस्ट रेट पर कर्ज देती है। दूसरे बैंक भी कस्टमर को मिलने वाले लोन पर ब्याज बढ़ा देते हैं। अगर रेपो रेट आरबीआई कम कर दे तो बैंक से मिलने वाला लोन सस्ता हो जाता है। इंटरेस्ट रेट कम हो जाता है। किस तरह के लोन होंगे इनमें? होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन। इसे ऐसे समझिए कि एक बड़ा साहूकार है जिससे छोटे-छोटे साहूकार पैसा उठाते हैं और लोगों को कर्ज देते हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/mp-cm-mohan-yadav-slams-rahul-gandhi-for-blaming-election-commission" target="_blank" rel="noopener">Election Commission पर हार का ठीकरा फोड़कर अराजकता फैला रहे Rahul Gandhi, बोले CM Mohan Yadav</a><br>बदले में उनसे क्या लेते हैं?&nbsp;</h3><p><br>ब्याज। तो अगर बड़ा साहूकार छोटे साहूकारों से ब्याज ज्यादा लेता है तो छोटा साहूकार भी लोगों से ब्याज ज्यादा लेने लगेगा क्योंकि उसको भी तो अपना घर चलाना है। वो क्यों नुकसान सा है भला? तो अब इसी रेपो रेट को बड़े साहूकार यानी आरबीआई ने बढ़ा दिया है। 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी की गई है। तो रेपो रेट 5.50% हो गया। आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कह दिया कि यह फैसला महंगाई के बदलते हालात को देखते हुए लिया गया। मल्होत्रा ने कहा कि महंगाई और उसके हालात अब उतने सामान्य नहीं है जितने पिछले साल थे। रेपो रेट बढ़ा है इसलिए आपके लोन की ईएमआई की राशि भी बढ़ जाएगी। अगर ईएमआई बढ़ाना नहीं चाहते हैं तो टेन्योर बढ़ जाएगा। यानी जो लोन 2 साल में खत्म होने वाला था वह अब 2 साल से ज्यादा वक्त में खत्म होगा। आम आदमी की जेब अब और भी खाली ज्यादा होने वाली है। इस बुरी खबर के बीच एक छोटी सी अच्छी खबर भी है। वो यह कि बैंक डिपॉजिट और फिक्स्ड डिपॉजिट यानी एफडी पर मिलने वाले ब्याज में भी बढ़ोतरी होगी। यानी अगर आपने एफडी किया है या करने वाले हैं तो उस पर मिलने वाला इंटरेस्ट अब पहले के मुकाबले ज्यादा होगा। मतलब यह हुआ कि आपका फायदा होने वाला है। लेकिन इसमें किंतु परंतु वाली स्थिति भी है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/sunil-mittal-rejects-elon-musk-claim-eutelsat-oneweb-awaits-satcom-approval" target="_blank" rel="noopener">Elon Musk के आरोपों पर बोले Sunil Mittal, Eutelsat OneWeb भी भारत में मंजूरियों का कर रही इंतजार</a><br>लिक्विडिटी की स्थिति क्या है?&nbsp;</h3><p><br>डिपॉजिट के लिए कंपटीशन कितना है मार्केट में? और आने वाले वक्त में इंटरेस्ट रेट कैसा हो सकता है यानी बढ़ेगा या घटेगा इसकी उम्मीद कितनी है? हालांकि अगर बैंक धीरे-धीरे डिपॉजिट रेट बढ़ाते हैं तो एफडी करने वालों को फायदा हो सकता है। इसे एक उदाहरण से समझ लीजिए। अगर कोई बैंक एक साल की एफडी की दर 6% देता है तो कस्टमर को हर साल ₹600 ब्याज मिलेगा। अब इस 6% को बढ़ाकर 6.25% कर दिया जाता है तो कस्टमर को 62500 का ब्याज मिलेगा। यानी हर साल ₹2500 ज्यादा। असली फायदा इस बात पर निर्भर करता है कि क्या बैंक 25 बीपीएस की पूरी बढ़ोतरी का फायदा डिपॉजिटर को देते हैं और क्या डिपॉजिटर नई एफडी में निवेश कर रहा है या मौजूदा में।</p><h2><br>पहला लोन किसने लिया?</h2><p><br>साल 1950 न्यूयॉर्क का एक बेहद आलीशान रेस्टोरेंट था। अमेरिका के एक जानेमाने बिजनेसमैन फ्रैंक मैकनारा अपने दोस्तों के साथ डिनर खत्म कर चुके थे। हंसीज़ाक का माहौल था। बातें चल रही थी। तभी वेटर आता है और टेबल पर बिल रख जाता है। फ्रैंक बहुत शान से अपनी सूट की जेब में हाथ डालते हैं। लेकिन अगले ही पल उनके चेहरे की हवाइयां उड़ जाती हैं। जेब खाली था। वॉलेट घर पर ही छूट गया था और पास में $1 का भी कैश नहीं था। अब सोचिए न्यूयॉर्क के इतने बड़े बिजनेसमैन के पास वेटर के सामने बिल चुकाने के पैसे नहीं है। कोई रास्ता ना देखकर मजबूरन उन्हें अपनी पत्नी को फोन करना पड़ा। उनकी पत्नी घर से पैसे लेकर रेस्टोरेंट पहुंची। फिर बिल चुकाया गया। तब जाकर फ्रैंक की जान में जान आया। उस रात फ्रैंक मैकन मारा को इतनी भयंकर शर्मिंदगीगी महसूस हुई कि उन्होंने कसम खाई कि दोबारा कभी ऐसी स्थिति में नहीं फसूंगा। तभी उनके मन में ख्याल भी आया। क्या कोई ऐसा तरीका नहीं हो सकता कि मैं बिना कैश लिए रेस्टोरेंट जाऊं। एक कार्ड दिखाऊं, खाना खाऊं और महीने के अंत में एक साथ सारा भुगतान कर दूं। और यह सारी कहानी मैंने आपको क्यों बताई? क्योंकि इसी एक शर्मिंदा करने वाली घटना से जन्म हुआ था डायनर्स क्लब का दुनिया के पहले आधुनिक क्रेडिट कार्ड का।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/imran-masood-slams-eci-over-removal-of-13-crore-voters-from-electoral-roll" target="_blank" rel="noopener">13 करोड़ वोटर लिस्ट में जुड़ने तक जारी रहेगी ECI के खिलाफ लड़ाई, Congress MP Imran Masood का दावा</a><br>इंसान ने कर्ज का आविष्कार क्यों किया&nbsp;</h3><p><br>सोमेरियन सभ्यता जो आज के इराक वाले इलाके के आसपास पड़ती है। उस दौर में पैसा या करेंसी नाम की कोई चीज ही नहीं थी। तो सोचिए जब पैसा ही नहीं था तो लोन किस चीज का दिया जाता? लोन दिया जाता था अनाज का, बीज का और मवेशियों का। मान लीजिए एक सुमेरियन किसान है। बुवाई का मौसम आ गया लेकिन उसके पास बोने के लिए बीज ही नहीं है। फसल कटने में अभी 6 महीने बाकी हैं। और इस बीज परिवार का पेट भी पालना है। वो जाता था शहर के मुख्य मंदिर के पास या फिर राजा के महल के पास। वहां वो पुजारी या फिर अधिकारी से 10 बोरी जौ उधार मांगता। वो दे भी देते। लेकिन उनकी एक शर्त होती थी कि जब 6 महीने बाद फसल कटेगी तो किसान को 10 बोरी के बदले 13 बोरी जौ वापस लौटानी होगी। और यही जो तीन अतिरिक्त बोरियां थी यहीं जन्म हुआ इंटरेस्ट यानी ब्याज का। सुमेरियन भाषा में ब्याज को कहा जाता था मैश जिसका शाब्दिक अर्थ होता है छोटा बच्चा। यानी जैसे एक गाय एक बछड़े को जन्म देती है वैसे ही अनाज के लोन से ब्याज रूपी बच्चा पैदा होता है। अब सबसे दिलचस्प बात इस लेनदेन का हिसाब भी रखा जाता था। तब कागज तो था नहीं इसलिए वे क्ले टेबलेट्स यानी गीली मिट्टी की पट्टिकाएं लेते थे। उस पर यूनिफार्म लिपि में लिखा जाता था।</p><h2><br>चाणक्य का अर्थशास्त्र</h2><p>अगर हम भारत की बात करें &nbsp;तो भारत में भी कर्ज की व्यवस्था उतनी ही पुरानी और विकसित थी और ईसा पूर्व चौथी सदी में जब आचार्य चाणक्य ने अर्थशास्त्र लिखा तो उन्होंने भारत के वित्तीय नियमों को इतनी विस्तार से लिखा कि आज का आरबीआई भी हैरान रह जाए। चाणक्य ने अर्थशास्त्र में लिखा था कि आम व्यापारिक कर्ज पर ब्याज 15% प्रतिवर्ष होगी। लेकिन जो व्यापारी समुद्री रास्तों या खतरनाक जंगलों से होकर व्यापार करने जाते थे जोखिम ज्यादा होने के कारण उनसे 60% तक ब्याज लिया जा सकता था। भारत में डेप्ट एंड डिपॉजिट यानी ऋण और दान के पूरे कानून मौजूद थे। जहां ये तक तय था कि किस स्थिति में कर्ड चुकाना होगा और किस स्थित में नहीं।&nbsp;<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 08 Oct 2026 14:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-changes-has-the-rbi-made-that-could-lead-to-a-rise-in-home-and-car-loan-rates</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[2 महीने, 3 सरप्राइज एलीमेंट: बीजेपी हैरान, पुलिस परेशान, क्या है राहुल गांधी की 'धप्पा' पॉलिटिक्स!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/two-months-three-surprise-elements-bjp-stunned-police-flummoxed-what-is-rahul-gandhi-surprise]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>संसद से चुनाव आयोग तक का रास्ता छावनी में तब्दील था, चप्पे-चप्पे पर भारी बैरिकेडिंग और अलर्ट मोड में खड़ी पुलिस… लेकिन राहुल गांधी ने एक बार फिर सबको 'धप्पा' दे दिया! मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस का मोर्चा खोलते हुए, राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अचानक आकाशवाणी भवन की ओर रुख किया और सीधे 8 घंटे की नाकाबंदी कर डाली। प्रशासन देखता ही रह गया और राहुल का यह सरप्राइज अटैक पूरी तरह कामयाब रहा। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल गांधी के इस फ्लैश प्रोटेस्ट ने दिल्ली पुलिस ही नहीं, खुद अपनी पार्टी के नेताओं तक के होश उड़ा दिए हैं। पिछले दो महीनों में यह तीसरी बार है जब राहुल ने अचानक धरना देकर पुलिस और कुछ हद तक कांग्रेस नेताओं को भी चौंका दिया है। जुलाई में, कांग्रेस सांसद ने प्रधानमंत्री आवास के बाहर अचानक विरोध प्रदर्शन किया। पिछले महीने, उनकी नई रणनीति का दूसरा चरण तब देखने को मिला जब वह अचानक संसद मार्ग पुलिस स्टेशन में एक छात्र प्रदर्शनकारी के साथ घुस गए; इस छात्र को 20 जुलाई की हिंसा के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी और राहुल ने FIR दर्ज करने की मांग की। राहुल का यह नया सियासी 'प्लेबुक' अब विरोधियों के लिए बिल्कुल अप्रत्याशित सिरदर्द बन चुका है!</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rahul-gandhi-and-priyanka-gandhi-detained-during-election-commission-protest" target="_blank" rel="noopener">Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi हिरासत में, CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कर रहे थे प्रदर्शन</a><br>CEC के विरोध-प्रदर्शन के दौरान राहुल का नया दांव</h3><p><br>सड़कों पर अचानक होने वाले ऐसे विरोध-प्रदर्शन राहुल के राजनीतिक हथियारों में एक नया हथियार बन गए हैं। मंगलवार को इसका तीसरा चरण देखने को मिला। ऐसा लग रहा था कि दिल्ली पुलिस को विपक्ष के निर्वाचन सदन तक मार्च करने की हर चाल का पहले से अंदाज़ा था। जब विपक्ष का मार्च ECI हेडक्वार्टर से कुछ सौ मीटर दूर नीति आयोग के दफ़्तर के पास पहुँचा, तो प्रदर्शनकारियों का सामना पुलिस से हुआ। इस गहमागहमी के बीच, राहुल ने कैमरों को तस्वीर लेने का मौका दिया। जब कांग्रेस नेता आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे थे, तब वह पुलिस बैरिकेड के ऊपर चढ़ गए और तिरंगा लहराया। हालांकि, पुलिस का सब्र जवाब दे गया। इसके बाद वही जाना-पहचाना नज़ारा देखने को मिला; पुलिस ने नेताओं को हिरासत में लेना और उन्हें बसों में भरना शुरू कर दिया। प्रियंका गांधी एक बस में सवार हुईं, जो आकाशवाणी भवन के पास खड़ी थी। राहुल भी बस में चढ़ने ही वाले थे। तभी हालात बदल गए। TOI और इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, जैसे ही राहुल बस में चढ़ने वाले थे, उन्होंने प्रियंका को कोई इशारा किया। जल्द ही, वायनाड के सांसद नीचे उतरे और गांधी भाई-बहन तेज़ी से आकाशवाणी भवन की ओर दौड़ पड़े। इस अचानक उठाए गए कदम से न सिर्फ़ पुलिस, बल्कि कांग्रेस नेता भी हैरान रह गए। आकाशवाणी भवन के गेट के पास कोई पुलिसकर्मी नहीं था। सुरक्षा गार्डों ने गांधी भाई-बहन को रोकने की कोशिश की, जिससे तनावपूर्ण स्थिति पैदा हो गई, लेकिन आखिरकार दोनों परिसर में दाखिल हो गए। पुलिस को उम्मीद थी कि लोगों को हिरासत में लेने से विरोध प्रदर्शन खत्म हो जाएगा, लेकिन अचानक बदले हालात ने एक नया धरना शुरू कर दिया। इस अफरातफरी के बीच राहुल ने पत्रकारों से कहा कि देश के साथ जो किया गया है, वह देशद्रोह है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/asaduddin-owaisi-demands-inclusion-of-cji-in-cec-selection-committee" target="_blank" rel="noopener">CEC नियुक्ति में PM, LoP के साथ CJI भी हों शामिल, Owaisi ने मौजूदा चयन प्रक्रिया पर उठाए सवाल</a><br>एक पेड़ के नीचे बैठ गए राहुल</h3><p>चाहे पीएम मोदी हों, अमित शाह हों या ज्ञानेश कुमार, किसी को भी बख्शा नहीं जाएगा। यह पता नहीं चल पाया है कि गांधी भाई-बहन ने अचानक आकाशवाणी भवन में घुसने का फ़ैसला क्यों किया। हो सकता है कि राहुल निर्वाचन सदन जाने के लिए शॉर्टकट के तौर पर इस जगह का इस्तेमाल करना चाहते हों, क्योंकि निर्वाचन सदन आकाशवाणी भवन के पिछले गेट के पास ही है। हालाँकि, पुलिस ने तुरंत पिछला गेट बंद कर दिया, जिसके बाद कांग्रेस सांसदों को आकाशवाणी भवन के परिसर में ही घंटों तक धरना देना पड़ा। राहुल और प्रियंका ब्रॉडकास्टिंग हाउस के अंदर एक पेड़ के नीचे बैठ गए। केसी वेणुगोपाल, पवन खेड़ा और इमरान प्रतापगढ़ी समेत कांग्रेस के दूसरे नेता भी आकाशवाणी के गेट से अंदर घुसने में कामयाब रहे, जबकि पुलिस बल को तैनात करने की कोशिश कर रही थी। बाकी लोगों को बाउंड्री वॉल पर चढ़ते और ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग करते हुए नारे लगाते देखा गया। कांग्रेस ने इस मौके का फ़ायदा उठाने में ज़रा भी देर नहीं की। पार्टी ने एक्स पर राहुल के अचानक रास्ते से हटकर कहीं और जाने का एक वीडियो शेयर किया, जिसके साथ मज़ाकिया अंदाज़ में "धप्पा" कैप्शन लिखा था। यह ड्रामा सूरज डूबने के काफी देर बाद तक चलता रहा। जब कांग्रेस नेताओं ने चुनाव आयुक्तों से मिले बिना वहां से हटने से इनकार कर दिया, तो उनके लिए रोल और एनर्जी ड्रिंक्स मंगवाए गए। इससे एक और विवाद खड़ा हो गया। आप इसके बारे में यहां पढ़ सकते हैं। रात करीब 8 बजे, पुलिस ने आखिरकार आकाशवाणी भवन परिसर को खाली कराना शुरू किया। तस्वीरों में राहुल को परिसर से खींचकर बस की ओर ले जाते हुए देखा गया। नेताओं को किंग्सवे कैंप पुलिस स्टेशन ले जाया गया और हिरासत में रखा गया, जिसके बाद रात 10 बजे उन्हें रिहा कर दिया गया।</p><h2>राहुल का सरप्राइज एलीमेंट वाला प्लेबुक</h2><p><br>यह पहली बार नहीं था जब राहुल गांधी ने प्रशासन को चकमा दिया हो। 21 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे प्रदर्शनकारी छात्रों पर पुलिस कार्रवाई के ठीक एक दिन बाद, राहुल गांधी और कांग्रेस सांसदों का एक दल अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आवास के पास पहुंच गया और बिना किसी पूर्व सूचना के धरने पर बैठ गया।इस अचानक हुए प्रदर्शन से पहले खुद कांग्रेस सांसदों को भी अंधेरे में रखा गया था। उन्हें शुरुआत में केवल यह कहकर बुलाया गया था कि वे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के आवास पर उनका जन्मदिन मनाने के लिए इकट्ठा हों। &nbsp; जैसे ही सभी नेता एकत्र हुए, उन्हें असल योजना की जानकारी दी गई और उन्होंने 7, लोक कल्याण मार्ग की ओर मार्च करना शुरू कर दिया, जो वहां से महज 2 किलोमीटर दूर है। इस अप्रत्याशित कदम ने पुलिस को पूरी तरह चौंका दिया। यह धरना तब जाकर समाप्त हुआ जब पुलिस ने राहुल गांधी को वहां से हटाया, और इस छीना-झपटी के दौरान उनकी नाक पर चोट भी लग गई थी। अगला घटनाक्रम एक महीने बाद, 21 अगस्त को हुआ।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/devendra-fadnavis-slams-opposition-delhi-protest-over-election-commission" target="_blank" rel="noopener">CEC विरोध पर CM Devendra Fadnavis बोले, संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर करने की है साजिश</a><br>पैलेट गन पीड़ित को लेकर थाने के बाहर धरने पर बैठे राहुल</h3><p>पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन में सब कुछ सामान्य चल रहा था, तभी राहुल वहाँ साहिल लोचब के साथ पहुँचे। साहिल 19 साल का छात्र है, जिसे कथित तौर पर 20 जुलाई के विरोध प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन से चोट लगी थी। राहुल ने मांग की कि इस मामले में तुरंत FIR दर्ज की जाए। जब पुलिस ने टाल-मटोल की, तो राहुल अपनी बात पर अड़े रहे और पुलिस स्टेशन के बाहर धरने पर बैठ गए। जल्द ही, प्रियंका गांधी, कांग्रेस के अन्य नेता और विपक्ष के बड़े नेता भी उनके साथ शामिल हो गए। पुलिस स्टेशन के बाहर सुरक्षा बढ़ा दी गई और वही जाना-पहचाना ड्रामा देखने को मिला। राहुल ने साफ कर दिया कि जब तक FIR दर्ज नहीं हो जाती, वे वहाँ से नहीं हटेंगे, चाहे इसमें कितने भी घंटे क्यों न लगें। सात घंटे बाद यह गतिरोध खत्म हुआ, जब दिल्ली पुलिस ने आखिरकार पैलेट फायरिंग के मामले में FIR दर्ज कर ली। ये घटनाक्रम सरकार के खिलाफ अहम मुद्दों से निपटने के राहुल के तौर-तरीकों में आए बड़े बदलाव का संकेत देते हैं। अब वे किसी मुद्दे पर सिर्फ़ सोशल मीडिया पर बात नहीं करते, बल्कि ऐसे अचानक किए गए विरोध प्रदर्शनों के ज़रिए ज़मीन पर भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं।</p><blockquote class="twitter-tweet"><p lang="en" dir="ltr">Dhappa 🔥 https://t.co/IMP0mIK2NV</p><p>— Congress (@INCIndia) <a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://x.com/INCIndia/status/2107405945492090932?ref_src=twsrc%5Etfw">October 6, 2026</a></p></blockquote>]]></description>
      <pubDate>Wed, 07 Oct 2026 14:05:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मशीनरी से लेकर कर्मचारी बीमा तक, रिफॉर्म या फिर आने वाला है कोई स्टॉर्म! GST 2.0 में अब क्या बदलाव करने जा रही है सरकार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-machinery-to-employee-insurance-what-changes-is-the-government-planning-to-introduce-in-gst-2]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देश में व्यापार को आसान बनाने और टैक्सपेयर्स की सहूलियत के लिए सरकार GST 2.0 में बदलाव की तैयारी कर रही है। 8 अक्टूबर को होने वाली GST काउंसिल की बैठक में ई-वे बिल के नियमों को ढीला करने, गिरफ्तारी के डर को खत्म करने और सालों से फंसे हजारों करोड़ रुपये के इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को जारी करने जैसे बढ़े बढ़े प्रस्तावों पर मुहर लग सकती है। GST काउंसिल बुधवार को होने वाली अपनी बैठक में कई ऐसे प्रस्तावों पर विचार करेगी, जिनमें ई-वे बिल की ज़रूरतों से जुड़े नियमों को आसान बनाना और GST कानून के तहत गिरफ़्तार करने की शक्तियों को हटाना शामिल है। मामले की जानकारी रखने वाले लोगों ने ET को बताया कि ये प्रस्ताव टैक्सपेयर से जुड़े सभी पहलुओं - जैसे रजिस्ट्रेशन, रिटर्न और रिफ़ंड से लेकर इनपुट टैक्स क्रेडिट और कानूनी विवाद - को कवर करते हैं। ये प्रस्ताव ज़्यादा कागज़ी कार्रवाई वाले अनुपालन (compliance) से हटकर ऑटोमेटेड, डेटा-आधारित और जोखिम-आधारित प्रशासन की ओर बढ़ने का संकेत देते हैं।</p><h2><br>क्या अहम बदलाव ?&nbsp;</h2><p><br>अगर जीएसटी काउंसिल इस प्रस्ताव को मंजूरी दे देती है, तो गिरफ्तारी का फैसला अफसरों के हाथ में रहने के बजाय अदालत के अधीन हो जाएगा। वहीं, आपराधिक केस सिर्फ उन्हीं मामलों में दर्ज होंगे जो गंभीर और जानबूझकर की गई टैक्स चोरी से जुड़े होंगे। सबसे मुख्य प्रस्ताव इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को आसान बनाने से जुड़ा है। इससे कंपनियों की फंसी हुई पूंजी छूटेगी और उद्योग जगत को एक अप्रत्यक्ष बढ़ावा मिलेगा। प्रस्तावों में कई ऐसे व्यापारिक इनपुट्स पर भी क्रेडिट देने की बात कही गई है जो अब तक ब्लॉक रोककर रखे गए थे।&nbsp;</p><h2><br>कारोबार में आसानी&nbsp;</h2><p><br>पिछले सितंबर में जीएसटी दरों के व्यापक युक्तिकरण (rate rationalisation) के साथ इस बड़े सुधार की शुरुआत हुई थी, जिसने कारोबारियों और जीएसटी प्रणाली के बीच के तालमेल को पूरी तरह बदल दिया। इस कड़ी में सबसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) को आसान बनाने का है, जिससे कंपनियों की फंसी हुई पूंजी मुक्त होगी और उद्योग जगत को एक अप्रत्यक्ष प्रोत्साहन मिलेगा। जीएसटी काउंसिल प्लांट, मशीनरी और इनपुट सेवाओं पर चुकाए गए टैक्स को 5 वर्षों में मासिक किस्तों के रूप में वापस (रिफंड) करने पर विचार करेगी। वर्तमान में कंपनियां आईटीसी के तहत इस पूरी रकम की भरपाई नहीं कर पाती थीं। पहले जिन व्यावसायिक इनपुट पर क्रेडिट ब्लॉक था, अब उसका दायरा बढ़ाने का प्रस्ताव है।&nbsp;</p><h2><br>इनमें शामिल हैं:</h2><p>कर्मचारियों का स्वास्थ्य और जीवन बीमा।</p><p>आउटडोर कैटरिंग।</p><p>दूरसंचार (टेलीकॉम) टावर और कारखानों के बाहर बिछाई गई पाइपलाइन।</p><p>नष्ट किए जाने वाले एक्सपायर्ड उत्पाद और कुछ मुफ्त नमूने (free samples)।</p><p>13 सीटों तक के वाहन, उनका बीमा, रखरखाव और वाहनों की लीजिंग या हायरिंग।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/gst-council-may-restructure-tax-officers-committees-into-three-bodies" target="_blank" rel="noopener">GST Council कर अधिकारियों की समितियों को तीन निकायों में समेटने की तैयारी में</a><br>इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर और फंसी पूंजी</h3><p><br>5% टैक्स स्लैब में आने वाले कई उत्पाद (जैसे खाद्य पदार्थ, फार्मा, कपड़ा और इलेक्ट्रिक वाहन) इनवर्टेड ड्यूटी स्ट्रक्चर (कच्चे माल पर ज्यादा टैक्स और तैयार माल पर कम टैक्स) का सामना कर रहे हैं। इसके कारण हजारों करोड़ रुपये का आईटीसी अटका हुआ है। इस पूंजी के जारी होने से उद्योग इसे फिर से पूंजीगत व्यय (Capex) के रूप में निवेश कर सकेंगे। टेलीकॉम टावरों और पाइपलाइनों पर क्रेडिट मिलने से दूरसंचार, रिफाइनिंग, पेट्रोकेमिकल, उर्वरक, गैस वितरण और बुनियादी ढांचा (इन्फ्रास्ट्रक्चर) क्षेत्रों के भारी खर्च में बड़ी राहत मिलेगी।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/gst-council-may-consider-single-application-for-multi-state-registration" target="_blank" rel="noopener">GST Council: कई राज्यों में कारोबार के लिए एक ही पंजीकरण आवेदन पर होगा विचार</a><br>सप्लायर डिफॉल्ट और खरीदार की सुरक्षा</h3><p>पहले यदि कोई सप्लायर टैक्स जमा नहीं करता था, तो उसका खामियाजा वास्तविक खरीदार (genuine buyer) को अपना क्रेडिट गंवाकर भुगतना पड़ता था। यह जीएसटी में विवादों का सबसे बड़ा कारण रहा है। अब यदि सौदा वैध (bona fide) है, तो खरीदार को आईटीसी रखने की अनुमति दी जाएगी और टैक्स वसूली सीधे डिफॉल्ट करने वाले सप्लायर से की जाएगी। चूंकि अब इनवॉइस-टू-इनवॉइस मिलान से खरीदार और विक्रेता का डेटा जुड़ा हुआ है, इसलिए सिस्टम फर्जी या बेमेल क्रेडिट को उसके स्रोत पर ही पकड़ सकता है।</p><p>ऑटोमेटेड और सरल रिफंड प्रक्रिया</p><p>अब टैक्सपेयर्स को अधिकारियों द्वारा मैन्युअल जांच के लिए अलग से दस्तावेज अपलोड करने की आवश्यकता नहीं होगी। कस्टम्स, आरबीआई (RBI) के एक्सपोर्ट मॉनिटरिंग सिस्टम और अन्य सरकारी प्रणालियों पर पहले से उपलब्ध डेटा को सीधे रिफंड प्रक्रिया में शामिल कर लिया जाएगा।</p><h2>सेक्टर के लिए राहत</h2><p><br>IT/ITeS सेक्टर को बड़ी राहत मिल सकती है; काउंसिल विदेशी ब्रांच ऑफिस को की गई सप्लाई को एक्सपोर्ट मानने पर विचार करेगी, जिससे ऐसे ट्रांज़ैक्शन ITC के लिए योग्य हो जाएंगे। विदेशी खरीदारों को बेचे गए लेकिन यहीं किसी स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन (SEZ) में डिलीवर किए गए सामान को भी एक्सपोर्ट माना जा सकता है, अगर पेमेंट विदेशी मुद्रा में किया जाए। GST नियमों को एक्सपोर्ट के पेमेंट मिलने से जुड़े RBI के नियमों के साथ भी मिलाने का प्रस्ताव है। प्रस्तावित सुधारों का मकसद कम वैल्यू वाले मामलों में कंप्लायंस और कानूनी विवाद को कम करना भी है। सूत्रों ने बताया कि ₹10,000 से कम रकम वाले मामलों में कोई 'शो-कॉज़ नोटिस' जारी नहीं किया जाएगा और यह बदलाव पेंडिंग मामलों पर भी लागू होगा। उन्होंने बताया कि रिटर्न में अंतर के कारण हर साल लगभग 95,000 नोटिस जारी होते हैं, जबकि ऐसे नोटिस से होने वाली रिकवरी कुल रकम का सिर्फ़ 0.08% होती है। ₹5 करोड़ तक के टर्नओवर वाले और सिर्फ़ अनरजिस्टर्ड ग्राहकों को सप्लाई करने वाले छोटे बिज़नेस को सालाना रिटर्न फाइल करने और तिमाही टैक्स पेमेंट करने की इजाज़त दी जा सकती है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया को आसान बनाने का प्रस्ताव है, जिसके तहत ऑटोमेटेड रूट के लिए योग्य आवेदकों का रजिस्ट्रेशन तीन वर्किंग दिनों के भीतर हो जाएगा; इस प्रक्रिया में पहले से ही 61% रजिस्ट्रेशन शामिल हैं। ट्रेड नेम, डायरेक्टर या पार्टनर और अतिरिक्त बिज़नेस एड्रेस में बदलाव भी ऑटोमैटिक प्रोसेसिंग के दायरे में आ सकते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/gst-council-meeting-may-ease-compliance-for-ecommerce-sellers-and-itc" target="_blank" rel="noopener">GST Council की बैठक में छोटे ई-कॉमर्स विक्रेताओं और टैक्सपेयर्स को मिल सकती है बड़ी राहत</a><br>कारोबारियों को मिलेगी राहत ?</h3><p><br>10,000 रुपये से कम के मामलो में कोई कारण बताओ नोटिस जारी नहीं किया जाएगा। यह नया नियम पेंडिंग मामलों पर भी लागू करने का प्रस्ताव है। जिन छोटे कारोबारियों का सालाना टर्नओवर 5 करोड़ रुपये तक है और वे सिर्फ बिना-रजिस्टर्ड ग्राहकों को ही सामान बेचते है, उन्हें अब सालाना रिटर्न भरने और हर तिमाही टैक्स जमा करने की छूट मिल सकती है। कारोबार का रजिस्ट्रेशन आसान करने का भी प्रस्ताव है। ट्रेड नेम में बदलाव, नए बिजनेस एड्रेस जोड़ने जैसे बदलाव ऑटोमैटिक मंजूर हो सकते हैं</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 06 Oct 2026 14:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-machinery-to-employee-insurance-what-changes-is-the-government-planning-to-introduce-in-gst-2</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/gen-z-revolt-is-the-same-thing-happening-in-the-country-of-modis-friend-as-what-happened-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पहले विश्व युद्ध के पहले फ्रांस को एक सुपर पावर कह ले या फिर एक प्रमुख ताकत दुनिया की कहा जाता था। आज भी फ्रांस को दुनिया भर में शिक्षा, लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए, मानव अधिकारों के लिए जाना जाता है। लेकिन आज उसी फ्रांस के स्कूलों के बाहर आग लगी है। बल्कि पेरिस जैसे शहर पूरी तरीके से छात्रों की चपेट में है। स्कूलों के गेट बंद हैं। सड़कों पर आगजनी है। पुलिस और छात्रों के बीच सीधा टकराव है । शुरुआत स्कूल की समस्याओं से हुई थी। लेकिन अब आंदोलन का दायरा बढ़ चुका है। शिक्षक नहीं क्लासरूम में भीड़ है। स्कूलों की इमारतें जर्जर होने का दावा है। लंबे स्कूल के घंटे और युवाओं को लग रहा है कि उनके भविष्य के साथ समझौता किया जा रहा है। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। फिर दूसरे शहर जुड़े और फिर प्रोटेस्ट फैलता चला गया और कुछ ही दिनों में मामला नेशनल अनरेस्ट में बदलने लगा। 1 अक्टूबर तक फ्रांस के 1000 से ज्यादा हाई स्कूल प्रोटेस्ट या डिस्क्रिप्शन से प्रभावित बताए गए। एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़ों के अनुसार 222 स्कूल्स में ब्लॉकेड्स दर्ज हुए हैं। 2 अक्टूबर को करीब 400 स्कूल बंद रखने पड़े। हालात अभी भी वैसे ही हैं। यानी जिस समस्या की शुरुआत एक स्कूल के गेट से हुई थी, अब पूरे फ्रांस की एजुकेशन सिस्टम की वह परीक्षा बन गई है। बच्चों की शिकायत आखिर क्या है जिस पर बात नहीं बन पा रही। अब इस आंदोलन के पीछे की जमीन समझिए।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/french-students-block-hundreds-of-schools-demanding-education-system-reforms" target="_blank" rel="noopener">France में छात्रों के उग्र प्रदर्शन से 400 High School बंद, पुलिस पर पथराव और आगजनी</a></h3><h2>छात्रों की सबसे बड़ी शिकायत है टीचर्स की कमी&nbsp;</h2><p><br>कई जगह क्लासेस में स्टूडेंट्स की संख्या बहुत ज्यादा है। कुछ छात्रों का कहना है कि एक क्लास रूम में 30 से ज्यादा बच्चे हैं। कई स्कूलों में टीचर्स की अनुपस्थिति के कारण क्लासेस कैंसिल हो रही हैं। फ्रांस के एजुकेशन मिनिस्ट्री के आंकड़े कहते हैं कि 2024-25 स्कूल ईयर में पब्लिक सेकेंडरी स्कूल्स में करीब 10% टीचिंग आवर्स पढ़ाए ही नहीं गए। इनमें लगभग 7.5 मिस्ड आवर्स सब्स्टट्यूट टीचर्स ना मिलने के कारण थे। यानी छात्रों की शिकायत सिर्फ सोशल मीडिया का गुस्सा नहीं। इसके पीछे एजुकेशन सिस्टम में वास्तविक स्टाफिंग प्रॉब्लम भी है। स्कूलों के हालत ने गुस्सा और बढ़ाया है। अब दूसरी बड़ी शिकायत है इंफ्रास्ट्रक्चर। कई स्कूलों की इमारतें पुरानी होने का दावा है। क्लासरूम ओवर क्राउडेड है। हीट वेव के दौरान कई क्लासरूम्स में तापमान बेहद ज्यादा रहा। स्टूडेंट्स का कहना है कि अगर उन्हें घंटों ऐसे कमरों में बैठना पड़ता है जहां बेसिक कंफर्ट तक पर्याप्त नहीं है। कई जगह स्टाफ शॉर्टेज के कारण एडमिनिस्ट्रेटिव और टीचिंग वर्क लोड भी बढ़ा हुआ है। यानी छात्र कह रहे हैं कि हमें सिर्फ परीक्षा पास करने के लिए नहीं कहा जा सकता। हमें पढ़ने के लिए सही स्कूल भी चाहिए।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/piyush-goyal-meets-trade-ministers-of-france-canada-saudi-arabia-and-south-korea" target="_blank" rel="noopener">G20 Meet: Piyush Goyal ने फ्रांस, कनाडा, सऊदी अरब और दक्षिण कोरिया संग Trade पर की चर्चा</a><br>स्कूल की दीवारों से बाहर निकला जेन जी का गुस्सा</h3><p><br>जेनजी का गुस्सा स्कूल की दीवारों से बाहर निकल चुका है और यही इस आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बनता है। प्रदर्शनकारी सिर्फ क्लासरूम कंडीशंस की बात नहीं कर रहे। उनकी चिंता है आगे की जिंदगी, यूनिवर्सिटी एडमिशन, एंप्लॉयमेंट, इकोनॉमिक सिक्योरिटी, स्टूडेंट सपोर्ट और एक ऐसा फ्यूचर जहां उन्हें लग रहा कि कंपटीशन बढ़ रहा है लेकिन अपॉर्चुनिटीज उसी अनुपात में नहीं बढ़ रही। कई छात्रों के लिए स्कूल सिर्फ स्कूल नहीं वो उनके सोशल मोबिलिटी का रास्ता है। अगर पब्लिक एजुकेशन कमजोर होती है तो गरीब और मिडिल क्लास परिवार के बच्चों के लिए आगे बढ़ने के अवसर भी प्रभावित हो सकते हैं। इसीलिए आंदोलन में एजुकेशन फंडिंग के साथ-साथ बॉर्डर इकोनॉमिक कंसर्न्स भी दिखाई दे रहे हैं।</p><h2>फिर आंदोलन हिंसक क्यों हो गया और कैसे हो गया?&nbsp;</h2><p><br>शांतिपूर्ण प्रोटेस्ट लोकतंत्र का हिस्सा हो सकता है। लेकिन फ्रांस में कई जगह प्रोटेस्ट ने वायलेंट टर्म ले लिया। 2 अक्टूबर तक करीब 400 हाई स्कूल बंद थे और 1000 से ज़्यादा संस्थानों में किसी ना किसी रूप में प्रोटेस्ट या डिस्ट्रप्शन दर्ज हुआ और फिर आई सबसे चौंकाने वाली तस्वीर सामने कि करीब 2000 गिरफ्तारियां। पुलिस के साथ झड़प, आगजनी, स्कूलों के बाहर बैरिकेड्स और सरकार अब कह रही कि आंदोलन के एक हिस्से पर हिंसक तत्वों का कब्जा हो गया है। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं क्योंकि इन बच्चों के हाथ में सिर्फ पत्थर नहीं इनके हाथ में एक शिकायत भी है कि हमारा भविष्य कहां है। स्कूल के गेट से शुरू हुआ विस्फोट। फ्रांस में मौजूदा आंदोलन की शुरुआत पेरिस रीजन के हाई स्कूलों से हुई। पहले छात्रों ने स्कूल के गेट ब्लॉक किए। 3 अक्टूबर तक इस आंदोलन में करीब 5000 से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है। इनमें बड़ी संख्या 15, 16, 14, 12 साल के बच्चों की बताई गई है। 600 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हो चुके हैं और सरकारी संपत्ति को नुकसान लगातार हो रहा है। करोड़ों यूरो में उसकी कीमत पहुंच चुकी है। पुलिस के साथ-साथ शिक्षकों और आम लोगों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई है। यहां का जो स्टॉक एक्सचेंज है उसमें भी भीड़ घुस गई है। उसे भी अपने कब्जे में ले लिया है। 3 अक्टूबर की अह राइटर्स की यह रिपोर्ट बताती है कि 1200 से ज़्यादा स्कूल इस आंदोलन से प्रभावित हो चुके थे। यानी जो विरोध कुछ दिन पहले पेरिस के आसपास के इलाकों से शुरू हुआ था वो अब देशव्यापी आंदोलन का रूप ले चुका है। कई शहरों में आग लगाई गई। पुलिस पर पत्थर फेंके गए, बोतलें फेंकी गई। पुलिस वालों को धक्का दिया गया। पुलिसवालों के साथ मारपीट की गई। एक महिला पुलिस वाली को महिला पुलिसकर्मी को लातों से पीटा गया। &nbsp;एक शिक्षक पर पेट्रोल फेंकने की घटना सामने आई। नातेश में एक स्कूल में आगजनी के बाद इमारत को लंबे समय तक बंद रखना पड़ा। कई जगहों पर पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हटाने के लिए आंसू गैस के गोले भी छोड़े।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/russia-made-a-major-move-at-the-un-to-secure-veto-power-for-india" target="_blank" rel="noopener">भारत को Veto पॉवर दिलाने के लिए रूस ने UN में किया बड़ा धमाका, हिले अमेरिका, चीन समेत दुनिया के बड़े-बड़े देश</a><br>1968 में भी एक बड़े छात्र आंदोलन से रूबरू हुआ फ्रांस</h3><p><br>अब मामला सिर्फ स्कूलों की हालत सुधारों की मांग तक सीमित नहीं रह गया है। यही वजह है कि फ्रांस की सरकार अब इसे सिर्फ छात्र आंदोलन के तौर पर नहीं देख रही है। ऐसा नहीं है कि फ्रांस में छात्रों का आंदोलन ये कोई पहली बार हुआ है। 1968 में भी एक बहुत बड़ा आंदोलन छात्रों का फ्रांस में हुआ था। उसके बाद भी छात्रों के लगातार आंदोलन प्रदर्शन फ्रांस में होते रहे हैं। लेकिन इतना हिंसक कोई भी प्रदर्शन आज तक नहीं हुआ। फ्रांस के प्रधानमंत्री सेबेस्टियन लिकार्नू ने संकट की के लिए इसमें बैठक बुलाई और मंत्रियों के जितने भी कार्यक्रम थे वह रद्द कर दिए। सरकार का कहना है कि छात्रों की समस्याओं पर बातचीत हो सकती है। हो सकती है। ऐसा नहीं है कि मतलब तुरंत छात्रों की मांगों को मान लिया जाए। लेकिन हिंसा और आगजनी को किसी भी हालत में स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह होना भी नहीं चाहिए। क्योंकि अगले साल फ्रांस में राष्ट्रपति के चुनाव भी होने वाले हैं और पूर्व राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो दोबारा चुनाव लड़ सकते हैं। ऐसे समय में युवाओं का गुस्सा राजनीतिक पार्टियों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। सरकार ने आरोप लगाया कि कट्टर वामपंथी पार्टी एलएफआई छात्रों के गुस्से को राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रही है। और यहां कल एक आपके सामने ही एक्स फॉरेन एक्सपर्ट से मैं बात कर रहा था। उन्होंने कहा कि यह सिर्फ फ्रांस के छात्रों ने किया हो ऐसा मुमकिन नहीं है। यहां हो सकता है कि कुछ जो इस्लामिक लोग हैं फ्रांस में लगभग 10% मुस्लिम आबादी फ्रांस में है वो लोग भी इसमें शामिल हैं। अबाया पहनने की वो मांग कर रहे हैं।</p><h2>बांग्लादेश-नेपाल या भारत जैसा पैटर्न?</h2><p><br>बांग्लादेश और नेपाल में हाल ही के यूथ लेड प्रोटेस्ट ने पॉलिटिकल सिस्टम को बड़ा झटका दिया। भारत में भी एजुकेशन मिनिस्टर को इस्तीफा देना पड़ा। अब फ्रांस में भी जेनजी सड़क पर है। लेकिन दोनों परिस्थितियों को एक जैसा बताना अभी जल्दबाजी होगी। फ्रांस एक एस्टैब्लिश यूरोपियन डेमोक्रेसी है। यहां इंस्टिट्यूशनल स्ट्रक्चर मजबूत है और मौजूदा फ्रेंच प्रोटेस्ट का डॉक्यूमेंटेड इमीडिएटेड ट्रिगर एजुकेशन कंडीशंस है। इसलिए फ्रांस में प्रोटेस्ट जरूर है। जेनजी मोबिलाइजेशन भी है। वायलेंस भी बढ़ी है। लेकिन इसे अभी बांग्लादेश या नेपाल जैसी सत्ता परिवर्तन की प्रक्रिया कहना उपलब्ध एविडेंस नहीं है। फिर एक कॉमन फैक्टर जरूर यहां पर दिखाई देता है। नई पीढ़ी का पॉलिटिकल एस्टैब्लिशमेंट और पब्लिक इंस्टिट्यूशन से बढ़ता फ्रस्ट्रेशन। जेनजी की सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया है। आज के युवाओं का आंदोलन सिर्फ सड़क पर नहीं चलता। वो स्मार्टफोन पर भी चलता है। एक स्कूल में पुलिस क्लैश, दूसरे शहर में बर्निंग, बैरिकेड और तीसरे शहर में स्टूडेंट्स की स्पीच और कुछ ही घंटों में पूरा देश उसे देख सुन सकता है। यही सोशल मीडिया मोबिलाइजेशन को बेहद तेज बनाता है। एक लोकल ग्रिवेंस कुछ घंटों में नेशनल मूवमेंट बन जाता है। और यही चीज सरकारों के लिए आजकल सबसे बड़ी चुनौती है। क्योंकि ट्रेडिशनल पॉलिटिकल ऑर्गेनाइजेशंस की तरह जजी मोबिलाइजेशन को हमेशा एक सिंगल लीडरशिप स्ट्रक्चर की जरूरत नहीं होती।</p><h2>फ्रांस की कहानी में सबसे बड़ा वार्निंग सिग्नल क्या है?&nbsp;</h2><p><br>इस पूरे घटनाक्रम को सिर्फ बच्चे हिंसा कर रहे हैं कहकर खत्म कर देना आसान नहीं है। उससे अंडरलाइन प्रॉब्लम खत्म ही होगी। दूसरी तरफ सरकार गलत है इसलिए हिंसा जायज है। कहना भी उतना ही खतरनाक होगा। क्योंकि स्कूल, बिल्डिंग्स जलाने, टीचर्स और पुलिस पर हमला करने, पब्लिक प्रॉपर्टी को नष्ट करने से स्टूडेंट्स की लेजिटमेट डिमांड्स कमजोर पड़ सकती हैं। यानी एक आंदोलन को दो अलग तस्वीरों में देखिए। एक तस्वीर बेहतर एजुकेशन की डिमांड करती है जिंजी। दूसरी तस्वीर आगजनी और पुलिस क्लैशेस की है। सरकार को पहली तस्वीर का जवाब पॉलिसी से देना है और दूसरी तस्वीर का जवाब लॉ इनफोर्समेंट से। तो फ्रांस की सड़कों पर इस वक्त सिर्फ छात्र नहीं है। वहां एक पूरी जनरेशन अपनी स्थिति दर्ज करा रही है। उनका मैसेज साफ है। टीचर चाहिए, बेहतर क्लासरूम चाहिए, बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, फ्यूचर चाहिए।</p><h2>किसी भयंकर साजिश की ओर इशारा तो नहीं</h2><p>दिलचस्प बात यह है कि सरकार ने छात्रों की कुछ मांगों पर कदम उठाने की कोशिश भी की। शिक्षा मंत्री ने बातचीत का रास्ता खोलने की बात कही हो और शिक्षा के क्षेत्र में सरकार के बजट को लेकर भी बदलावों की चर्चा हुई है। यह बवाल इसलिए भी फ्रांस में ज्यादा हुआ क्योंकि इस बार जो बजट पेश हुआ उसमें शिक्षा का जो बजट था वो केवल 1.7% ही बढ़ाया गया था। बाकी जमीन पर तनाव कम नहीं हुआ है। छात्र संगठनों ने आने वाले मंगलवार को एक बड़े प्रदर्शन का आह्वान किया है। इसका मतलब साफ है कि फ्रांस की सरकार के सामने अब सिर्फ स्कूलों को खोलने की चुनौती चुनौती नहीं है। उसे तय करना है कि जायज छात्र मांगों को कैसे सुना जाए। उन्हें कैसे पूरा किया जाए और कैसे फ्रांस को जलने से रोका जाए। हिंसा को कैसे रोका जाए और इस पूरे आंदोलन को चुनावी राजनीतिक हथियार बनने से भी रोकना जरूरी है क्योंकि इतिहास बताता है कि फ्रांस में छात्र आंदोलनों की ताकत को कम करके आंकना भारी पड़ सकता है। 1968 का छात्र आंदोलन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है जिसने फ्रांसीसी राजनीति और समाज को हिला कर रख दिया था। आज 2026 में हालात अलग हैं। लेकिन सवाल फिर वही है। क्या यह सिर्फ बेहतर शिक्षा के लिए छात्रों की आवाज है? या फिर छात्रों के गुस्से के पीछे अब राजनीति और हिंसक तत्व भी पूरी तरीके से घुस चुके हैं। शायद 2 साल पहली बात है वो आपको याद होगा किस तरीके से इस्लामिक कट्टरपंथियों ने फ्रांस को जलाया था। हफ्ते भर तक फ्रांस वहां जलता रहा था और आज भी तस्वीर कुछ वैसी ही है।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 14:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/gen-z-revolt-is-the-same-thing-happening-in-the-country-of-modis-friend-as-what-happened-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[US Midterm Elections 2026: वो कौन सा 'श्राप' है, जिससे कांपती है अमेरिकी सरकार, 3 नवंबर को क्या ट्रंप का 'झोला' उठने वाला है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/us-midterm-elections-2026-what-is-the-curse-that-makes-the-us-government-tremble]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बचपन में कहते थे कि जमीन को खोदो तो दूसरी तरफ अमेरिका में निकलोगे। दुनिया तो गोल है लेकिन मैप को जूम करके देखें तो अमेरिका एकदम पश्चिम में नजर आता है। आज बात उसी अमेरिका के लोकतांत्रिक पहलू और वहां के चुनाव की करेंगे। अमेरिका में होने वाला मध्यावधि चुनाव भारत के मध्यावधि चुनाव से बिल्कुल अलग होता है और भारत में कोई सरकार अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती तो मध्य अवधि चुनाव होता है लेकिन अमेरिका में मध्यावधि चुनाव की वजह ऐसी नहीं है। &nbsp;सबसे बड़ी बात ये है की चुनाव में मौजूद राष्ट्रपति ट्रंप की पार्टी हार भी जाती है और संसद में अल्पमत में भी जाती है तो भी जो राष्ट्रपति बने रहेंगे और अमेरिका के इस मध्यावधि चुनाव से जुड़ी ऐसी कई दिलचस्प जानकारी है जो आज आपको बताएंगे और इस चुनाव का विश्लेषण भी करेंगे क्योंकि इस चुनाव का असर ना केवल अमेरिका पर बल्कि पुरी दुनिया पर भी हो सकता है। चूंकि इस बार चा चुनाव राष्ट्रपति के कार्यकाल के बीच में आया है। इसी वजह से इसे मिड टर्म इलेक्शन के नाम से जाना जाता है। आज हम अमेरिका के मिड टर्म इलेक्शन की पूरी कहानी को समझेंगे। संसद के चुनाव से राष्ट्रपति की कुर्सी पर क्या असर पड़ता है?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/indian-pilot-risks-life-to-rescue-hijacked-plane-everyone-from-netanyahu-to-trump-salutes-him" target="_blank" rel="noopener">जान दांव पर लगा भारतीय पायलट ने छुड़ाया हाईजैक विमान! एक लाईन से नेतन्याहू-ट्रंप सब ने ठोका सलाम</a></h3><h2>भारतीय संसद से कितना अलग?</h2><p><br>हिंदुस्तान में कानून बनाने वाले सबसे बड़े संस्था संसद है जिसे विधायक का भी कहते हैं। संसद के हिस्से हैं। पहला लोकसभा जिसे निचला सदन कहते हैं और दूसरा राज्यसभा जिसे ऊपरी सदन कहते हैं। लोकसभा के सदस्य का कार्यकाल 5 साल का होता है। वही राज्यसभा कभी भंग नहीं होती और इसके सदस्य का कार्यकाल छह वर्ष का होता है। इसी तरह अमेरिका में संसद को अमेरिकी कांग्रेस कहा जाता है और अमेरिकी कांग्रेस भी दो हसन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में बंटा होता है। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में 435 मेंबर होते हैं। हर मेंबर का कार्यकाल सिर्फ दो साल का होता है। सीटों का निर्धारण जनसंख्या के आधार पर होता है। दूसरे सदन को सीनेट बोलते हैं। इसके सदस्यों की संख्या 100 है। कार्यकाल 6 बरस का होता है। हर दो बरस में एक तिहाई सदस्यों का कार्यकाल पूरा होता है और फिर चुनाव होता है। अमेरिका में कुल 50 राज्य हर राज्य से दो सेनेटर चुने जाते हैं। सीटों के बंटवारे में जनसंख्या की भूमिका यहां नहीं होती। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के ठीक मध्य में होने वाले ये चुनाव प्रशासन के एजेंडे पर एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय जनमत संग्रह (रेफरेंडम) के रूप में काम करेंगे। सभी 50 राज्यों में करोड़ों अमेरिकी मतदाता वाशिंगटन में सत्ता के संतुलन को तय करने के लिए मतदान करेंगे, जिससे अमेरिकी प्रतिनिधि सभा और अमेरिकी सीनेट दोनों के नियंत्रण का फैसला होगा। कैपिटल हिल के गलियारों से परे 2026 के मध्यावधि चुनाव राज्यों में कार्यकारी शक्ति को भी नया रूप देंगे। इस दौरान 36 राज्यों के गवर्नर पदों, दर्जनों राज्य अटॉर्नी जनरल, सेक्रेटरी पदों और राज्य विधानमंडलों के सदनों का भविष्य भी दांव पर होगा।</p><h2>अमेरिका में मध्यावधि चुनाव (मिडटर्म इलेक्शन) क्या होते हैं?</h2><p><br>संसदीय व्यवस्थाओं के विपरीत, जहाँ प्रधानमंत्री अपनी सुविधानुसार चुनाव करवा सकते हैं या संसद भंग कर सकते हैं, अमेरिकी संविधान के अनुच्छेद I और II के तहत राष्ट्रीय चुनावों का एक निश्चित और अटल कार्यक्रम तय है। मध्यावधि चुनाव वे आम चुनाव हैं जो अमेरिका में हर चार साल में होते हैं और ये राष्ट्रपति के चार साल के कार्यकाल के ठीक आधे समय पर आयोजित किए जाते हैं। हालांकि मध्यावधि चुनाव वाले साल में राष्ट्रपति पद के लिए मतदान नहीं होता है, लेकिन संघीय और राज्य स्तर की सत्ता के लगभग सभी अन्य महत्वपूर्ण पदों के लिए चुनाव होते हैं:</p><p>प्रतिनिधि सभा: प्रतिनिधि सभा की सभी 435 वोटिंग सीटों पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। प्रतिनिधियों का कार्यकाल दो साल का होता है, जिसका अर्थ है कि सभी 50 राज्यों के हर एक निर्वाचन क्षेत्र (डिस्ट्रिक्ट) को संसद में अपनी विधायी आवाज़ चुननी होगी।</p><p>अमेरिकी सीनेट: सीनेटरों का कार्यकाल छह साल का होता है, जिन्हें तीन चुनावी "वर्गों" (Classes) में विभाजित किया गया है। सीनेट के लगभग एक-तिहाई हिस्से पर हर दो साल में चुनाव होते हैं। 2026 में, मतदाता क्लास 2 से संबंधित 33 नियमित सीटों के साथ-साथ अधूरे कार्यकाल को भरने के लिए होने वाले विशेष चुनावों पर भी फैसला करेंगे।</p><p>गवर्नर पद के चुनाव: 36 राज्यों और तीन अमेरिकी क्षेत्रों (टेरिटरीज़) के कार्यकारी प्रमुख (गवर्नर) चुनाव का सामना करेंगे। गवर्नरों का राज्य के बजट, न्यायिक नियुक्तियों, कानून व्यवस्था, शिक्षा और राज्य स्तरीय स्वास्थ्य नीतियों पर व्यापक प्रभाव होता है।</p><p>राज्य विधानमंडल और स्थानीय प्रशासनिक पद: राज्य सीनेट और राज्य प्रतिनिधि सभा की हज़ारों सीटों पर चुनाव होंगे। इसके साथ ही सेक्रेटरी ऑफ स्टेट (अधिकांश राज्यों में मुख्य चुनाव अधिकारी) और अटॉर्नी जनरल (मुख्य कानून प्रवर्तन अधिकारी) जैसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक पद भी दांव पर होंगे।</p><p>बैलेट: दर्जनों राज्यों के नागरिक संवैधानिक संशोधनों, वैधानिक बदलावों, कर प्रस्तावों, प्रजनन अधिकारों से जुड़े उपायों और मतदान अधिकारों से जुड़े कानूनों पर सीधे मतदान करेंगे।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/piyush-goyal-meets-us-trade-representative-jamieson-greer-bilateral-trade-pact" target="_blank" rel="noopener">भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत</a><br>सीनेट की 'स्टैगर्ड' चुनाव व्यवस्था क्या है और यह कैसे काम करती है?</h3><p>अमेरिकी संविधान बनाने वालों ने सीनेट को एक स्थिर और लगातार काम करने वाली संस्था के तौर पर बनाया था। एक ही चुनाव में सभी सदस्यों के बदलने से रोकने के लिए, उन्होंने सीनेट को तीन अलग-अलग क्लास में बांटा:</p><p>क्लास 1: 2024, 2030 और उसके बाद चुनाव के लिए।</p><p>क्लास 2: 2026, 2032 और उसके बाद चुनाव के लिए।</p><p>क्लास 3: 2022, 2028 और उसके बाद चुनाव के लिए।</p><p>2026 में, क्लास 2 की उन सीनेट सीटों पर चुनाव होगा जो मूल रूप से 2020 में चुनी गई थीं। क्योंकि क्लास 2 में ऐतिहासिक रूप से कड़े मुकाबले वाले 'स्विंग स्टेट्स' की ज़्यादा सीटें शामिल रही हैं, इसलिए 2026 का सीनेट मैप दोनों प्रमुख राजनीतिक पार्टियों के लिए एक बहुत ही अनिश्चित और कड़े मुकाबले वाला मैदान है। ऐतिहासिक रूप से मिडटर्म चुनाव (मध्य-अवधि चुनाव) व्हाइट हाउस में काबिज़ राजनीतिक पार्टी के लिए एक बड़ी संरचनात्मक चुनौती पेश करते हैं।</p><h2>राष्ट्रपति की पार्टी क्यों हारती है मध्यावधि चुनाव? जानिए क्या है 'मिडटर्म कर्स'</h2><p><br>अमेरिकी गृह युद्ध के बाद से मौजूदा राष्ट्रपति की पार्टी ने 90 प्रतिशत से ज़्यादा मिडटर्म चुनावों में हाउस की सीटें और ज़्यादातर चुनावों में सीनेट की सीटें गंवाई हैं। जानकार इस घटना को, जिसे अक्सर मिडटर्म कर्स या मिडटर्म पेनल्टी कहा जाता है, कई मुख्य वजहों से जोड़कर देखते हैं। विपक्षी पार्टी के वोटर आम तौर पर ज़्यादा राजनीतिक रूप से प्रेरित, नाराज़ और वोट देने के लिए ज़्यादा सक्रिय होते हैं, जबकि मौजूदा राष्ट्रपति का समर्थन करने वाले वोटर शायद निश्चिंत महसूस करते हों या कार्यकाल के दौरान किए गए समझौतों से असंतुष्ट हों। मिडटर्म चुनाव अनिवार्य रूप से देश के आर्थिक प्रदर्शन, लोगों की सोच (कंज्यूमर सेंटीमेंट), जीवन-यापन की लागत और प्रशासन के शुरुआती दो सालों में लिए गए फैसलों पर एक तरह का जनमत-संग्रह बन जाते हैं। राष्ट्रपति पद का चुनाव जीतने वाले उम्मीदवार द्वारा बनाया गया गठबंधन अक्सर सरकार चलाने के दौरान नीतिगत मतभेदों का सामना करता है, जिससे अलग-अलग वोटिंग समूहों के बीच वोटिंग की संख्या को ऊंचे स्तर पर बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।</p><h2>अमेरिका में मिडटर्म चुनाव कैसे जीता जाता है?</h2><p><br>मिडटर्म चुनाव जीतने के लिए राष्ट्रपति चुनाव अभियान की तुलना में बहुत अलग राजनीतिक रणनीतियों की ज़रूरत होती है। राष्ट्रपति चुनाव वाले वर्षों में वोटिंग आमतौर पर योग्य मतदाताओं के 60% से 66% के बीच होती है। इसके विपरीत, मिडटर्म चुनाव में वोटिंग ऐतिहासिक रूप से काफी कम हो जाती है, जो आमतौर पर 40% से 50% के बीच रहती है। वोटिंग कम होने के कारण, मतदाताओं का स्वरूप बदल जाता है। ज़्यादा उम्र के अमेरिकी, जो चुनाव के साल की परवाह किए बिना लगातार बड़ी संख्या में वोट करते हैं, मिडटर्म चुनाव में मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा बन जाते हैं। कम उम्र के मतदाता, कम आय वाले परिवारों के लोग और नागरिकता पाने वाले लोग मिडटर्म चुनाव में कम संख्या में वोट करते हैं, जब तक कि उन्हें बहुत अच्छी तरह से संगठित ज़मीनी अभियानों या ज़रूरी मुद्दों के ज़रिए प्रेरित न किया जाए। जो भी पार्टी अपने निष्क्रिय समर्थकों को सक्रिय मिडटर्म मतदाताओं में बदलने में सफल होती है, उसे चुनाव के दिन एक बड़ा संरचनात्मक फ़ायदा मिलता है। अमेरिकी राजनीतिक गठबंधनों में भी बड़े बदलाव होते रहते हैं। कॉलेज-शिक्षित मतदाता खासकर उपनगरीय इलाकों में तेज़ी से डेमोक्रेटिक उम्मीदवारों के साथ जुड़ रहे हैं, जबकि ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्रों में बिना कॉलेज-शिक्षा वाले मज़दूर वर्ग के मतदाता रिपब्लिकन की ओर तेज़ी से झुके हैं। इस बीच, मज़दूर वर्ग के हिस्पैनिक, अफ़्रीकी-अमेरिकी और एशियाई-अमेरिकी पुरुषों ने अलग-अलग क्षेत्रों में वोटिंग के बदलते रुझान दिखाए हैं, जिससे राजनीतिक अभियान योजनाकारों के लिए पारंपरिक जनसांख्यिकीय अनुमान कम भरोसेमंद हो गए हैं। बिना किसी पार्टी से जुड़े स्वतंत्र मतदाता, जो कई राज्यों में सबसे तेज़ी से बढ़ने वाला राजनीतिक समूह हैं, उपनगरीय हाउस और सीनेट क्षेत्रों में कड़े मुक़ाबले वाले चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।</p><p>हाल के सालों में राज्यों की विधानसभाओं ने वोटिंग से जुड़े कानूनों में अहम बदलाव किए हैं, जिससे अमेरिकियों के वोट डालने का तरीका बदल गया है:</p><p>अर्ली वोटिंग (समय से पहले वोटिंग) का समय: ज़्यादातर राज्य 3 नवंबर को होने वाले आधिकारिक चुनाव दिवस से पहले कई दिनों या हफ़्तों तक व्यक्तिगत रूप से अर्ली वोटिंग की सुविधा देते हैं।</p><p>मेल-इन और एब्सेंटी बैलेट (डाक से वोटिंग): बिना किसी खास कारण के मेल-इन वोटिंग, हस्ताक्षर की जांच, ड्रॉप-बॉक्स की सुविधा और बैलेट मिलने की समय-सीमा से जुड़े नियम हर राज्य में अलग-अलग होते हैं।</p><p>वोटों की गिनती और नतीजों की घोषणा का समय: क्योंकि राज्य मेल-इन और अर्ली बैलेट की प्रक्रिया अलग-अलग समय-सीमाओं के तहत पूरी करते हैं, इसलिए कड़े मुकाबले वाले चुनावों में &nbsp;खासकर कैलिफ़ोर्निया, एरिज़ोना और नेवादा जैसे राज्यों में अंतिम नतीजों की पूरी गिनती में कई दिन लग सकते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/piyush-goyal-meets-us-trade-representative-jamieson-greer-bilateral-trade-pact" target="_blank" rel="noopener">भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर Piyush Goyal और Jamieson Greer की बातचीत</a><br>अमेरिकी मध्यावधि चुनाव 2026: क्या उम्मीद की जा सकती है?</h3><p>2026 के मध्यावधि चुनावों के नतीजे तय करेंगे कि 2028 तक अमेरिका की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ेगी और इससे 120वीं अमेरिकी कांग्रेस के लिए सत्ता का बुनियादी ढांचा भी तय होगा। अगर रिपब्लिकन दोनों सदनों पर अपना नियंत्रण बनाए रखते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन के पास बजट पैकेज पास करने, टैक्स कानूनों में बदलाव करने और जजों की नियुक्ति को मंज़ूरी दिलाने के लिए कानून बनाने का साफ़ रास्ता होगा। इसके विपरीत, यदि डेमोक्रेट कांग्रेस के किसी भी सदन पर कब्जा कर लेते हैं, तो वाशिंगटन में विभाजित सरकार का युग शुरू हो जाएगा:</p><p>हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट हाउस की सभी समितियों पर नियंत्रण कर लेंगे, जिससे उन्हें सम्मन जारी करने, कार्यकारी शाखा के निर्णयों की निगरानी करने, प्रतिस्पर्धी संघीय बजट विधेयक तैयार करने और एकतरफा विधायी पहलों को रोकने का पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाएगा।</p><p>सीनेट में बहुमत होने पर: डेमोक्रेट न्यायिक नियुक्तियों की प्रक्रिया को नियंत्रित करेंगे, जिससे उन्हें संघीय जिला न्यायालयों, अपीलीय न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक उम्मीदवारों को रोकने या विलंबित करने की शक्ति प्राप्त होगी, साथ ही कार्यकारी शाखा की नियुक्तियों की भी गहन जांच करने का अधिकार होगा।</p><p>आखिर में सबसे बड़ी बात... 2026 के ये मध्यावधि चुनाव सिर्फ संसद के नियंत्रण की जंग नहीं हैं, बल्कि यह 2028 के अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव का आधिकारिक लॉन्चिंग पैड भी साबित होंगे। अहम स्विंग और बैटलग्राउंड राज्यों में एकतरफा जीत दर्ज करने वाले गवर्नर रातों-रात 2028 की राष्ट्रपति रेस के सबसे बड़े दावेदार बनकर उभरेंगे। वहीं, जो सीनेटर या राष्ट्रीय नेता उपनगरीय और कामकाजी वर्ग के वोटरों में अपनी मजबूत पकड़ साबित करेंगे, 2028 के प्राइमरी घमासान से पहले उनका पलड़ा सबसे भारी हो जाएगा। यानी 3 नवंबर की यह रात सिर्फ आज का फैसला नहीं करेगी, बल्कि तय करेगी कि अगले चार साल बाद व्हाइट हाउस की चाबी किसके हाथ में होगी!</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 16:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/us-midterm-elections-2026-what-is-the-curse-that-makes-the-us-government-tremble</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[NDA से अलग होकर अब योगी से भिड़ेंगे 'मोदी के हनुमान'? चिराग पासवान का UP प्लान क्या है, चौंका देगी सच्चाई!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-modi-hanuman-break-away-from-nda-and-lock-horns-with-yogi-what-is-chirag-paswan-up-plan]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>"मुझे शर्म आती है कि मैं इस सरकार के साथ हूं... प्रशासन पूरी तरह निकम्मा हो चुका है।" यह किसी विपक्षी नेता का हमला नहीं, बल्कि केंद्र सरकार में मंत्री और खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हनुमान कहने वाले चिराग पासवान का खुला ऐलान-ए-जंग है। बिहार में बेलगाम अपराध और हालिया वारदातों पर चिराग के इन तल्ख तेवरों ने सूबे से लेकर दिल्ली तक के सियासी गलियारों में भूचाल ला दिया है। हैरानी इसलिए भी है क्योंकि जिस सरकार पर वह सवाल उठा रहे हैं, उसमें चिराग खुद हिस्सेदार हैं। जिस प्रशासन को वो निकम्मा बता रहे हैं, उसकी कमान सीधे सीएम और गृह मंत्री सम्राट चौधरी के हाथों में है। वही सम्राट चौधरी, जिन्हें सत्ता के शीर्ष तक पहुंचाने में चिराग का कंधा भी लगा था। ऐसे में बड़ा सवाल यही उठता है कि आखिर चिराग पासवान के मन में पक क्या रहा है? क्या यह सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर से शुरू हुई कोई सुनियोजित घेराबंदी है? या फिर इसकी पटकथा 2027 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए लिखी जा रही है? क्या बिहार में दबाव बनाकर चिराग यूपी में बीजेपी से अपनी शर्तों पर गठबंधन की जमीन तलाश रहे हैं? अपनों पर ही चिराग का यह तीखा वार महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है, या फिर एनडीए के भीतर किसी बड़े सियासी खेल की शुरुआत? आइए आज इस बगावती तेवर के पीछे की रणनीति का एमआरआई स्कैन करते हैं।</p><h2>महज़ कानून-व्यवस्था पर गुस्सा है,या किसी सियासी खेल की शुरुआत</h2><p><br>26 सितंबर को सिटी पोस्ट के कॉनक्लेव में चिराग पासवान पहुंचे थे। उनसे सवाल पूछा गया क्या आप मानते हैं कि बिहार में अपराधी बेखौफ हैं। दलित सुरक्षित नहीं है। बेटियां सुरक्षित नहीं है। इस पर चिराग पासवान का जवाब था कोई भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पा रहा है। आज की तारीख में। यह चिंता हमारी सरकार की है। एक सहयोगी और सरकार का हिस्सा होने के नाते मैं खुद इस सवाल से नहीं भाग सकता हूं। मुझे खुद शर्मिंदगीगी होती है जब मैं सोचता हूं कि मैं एक ऐसी सरकार के साथ हूं जहां ऐसी घटनाएं हो रही हैं। यह चिंता का विषय है और इसको कतई हम लोग हल्के में जाने नहीं दे सकते। चिराग ने आगे कहा राष्ट्रीय स्तर पर मेरे बिहार की छवि कैसी जा रही है? हमारे बिहार की बेटियों में सोचिए कैसे डर और असुरक्षा का माहौल उत्पन्न हो गया है। आज की तारीख में कोई बच्ची मुझे बता दीजिए जो शाम को निकलने से पहले 100 बार ना सोचती होगी। तो ऐसे में जिस सरकार का मैं हिस्सा हूं मेरी वह सरकार एक्सेंस ऑफ सिक्योरिटी ना दे पाए यह तो मैं स्वीकार नहीं करूंगा। केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार में मंत्री चिराग पासवान के बयान का टोन नया नहीं है। बिहार में यह टोन बहुत पुराना है। उन्हीं के गठबंधन के सबसे बड़े नेता नरेंद्र मोदी खुद इसी टोन में बयान देते रहे हैं। गृह मंत्री अमित शाह इस टोन का इस्तेमाल करते रहे हैं। ऐसे शब्दावली का इस्तेमाल करते रहे हैं। पूरी बीजेपी इसी भाषा में राष्ट्रीय जनता दल यानी आरजेडी, लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव को निशाना बनाती रहती है। हमले किए जाते हैं कि लालू राज में बिहार में सूर्यास्त के बाद कोई घर से निकल नहीं पाता था।</p><p><br>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/smriti-irani-slams-congress-for-questioning-neutrality-of-election-commission" target="_blank" rel="noopener">BJP नेता Smriti Irani का हमला, हार के बाद Congress कर रही संवैधानिक संस्थाओं का अपमान</a></p><h2>क्या &nbsp;सम्राट चौधरी के खिलाफ सत्ता के भीतर शुरू हुई सुनियोजित घेराबंदी?&nbsp;</h2><p><br>चिराग उस गठबंधन का हिस्सा हैं जो बिहार में सरकार चला रही है। लोजपा रामविलास के 19 विधायक हैं। सम्राट चौधरी की सरकार में पार्टी के दो मंत्री भी हैं। लोकसभा में पार्टी के पांच सांसद हैं। केंद्र सरकार में एक मंत्री भी हैं जो कि खुद चिराग पासवान हैं। लेकिन बिहार में बढ़ते क्राइम पर उनकी चिंता अब तक सिर्फ बयानों में ही दिखी है। लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य ने एक्स पर लिखा है इस्तीफा देने के लिए किस शुभ मुहूर्त का इंतजार कर रहे हैं चिराग पासवान शर्म का बोझ उठाकर भी सत्ता का हिस्सा बने रहना कोई चिराग पासवान जी से सीखे। बहन बेटियों की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से असुरक्षित हो चुके बिहार की वजह से जब सरकार का हिस्सा होने में उन्हें शर्मिंदगीगी महसूस हो ही रही है तो इस्तीफा देने की हिम्मत कौन से मुहूर्त के इंतजार में रुकी हुई है। चिराग पासवान के बयान की वजह से सम्राट चौधरी या उनकी सरकार की कार्यशैली खास बदलती दिख तो नहीं रही है या उनके बयान का लोड लेते हुए भी सम्राट चौधरी नहीं दिख रहे हैं। चिराग बीजेपी पर अटैक करके उसे बेवजह तो नाराज नहीं ही करना चाहेंगे। दिल्ली का समन उन्हें क्यों चाहिए? तो क्या यह कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना वाला मामला है। इसे समझने के लिए 2025 बिहार चुनाव से ऐन पहले के वक्त को देखना होगा। जून जुलाई के महीने में एक के बाद एक चिराग के बयान आ रहे थे। लगातार नीतीश कुमार के नेतृत्व में चल रही सरकार को टारगेट कर रहे थे। यहां तक कह गए कि बिहार में ऐसा लगता है कि पुलिस प्रशासन ने अपराधियों के सामने सरेंडर कर दिया है। तब भी चिराग पासवान यही कह रहे थे कि उन्हें एक ऐसी सरकार का समर्थन करने पर दुख है। तब इन बयानों का विश्लेषण हुआ कि यह सब सीट शेयरिंग के टेबल पर जाने की तैयारी है। प्रेशर क्रिएट किया जा रहा है ताकि लोजपा रामविलास को ज्यादा से ज्यादा सीटें एनडीए में मिल सके।</p><h2>यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर</h2><p><br>हुआ यह कि जब नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने दलित और महादलित दो कैटेगरी बांट दिया और जिसकी वजह से किसी जमाने में दलितों की राजनीति करने वाले रामविलास पासवान सिर्फ पासवान के नेता बनकर रह गए क्योंकि बाकी महादलितों के नेता या तो नीतीश कुमार हो गए या जीतन राम मांझी &nbsp;हो गए। वो दर्द आज भी पासवान की पार्टी को है कि पूरी राजनीतिक जमा पूंजी खत्म कर दी। अब वो मजबूरी है। &nbsp;रहना तो एनडीए में ही है। जा भी नहीं सकेंगे क्योंकि सत्ता सबको अच्छी लगती है। मलाई खाना सबको अच्छा लगता है। लेकिन स्टेटमेंट देकर दबाव बनाने की कोशिश है। &nbsp;चिराग पासवान फिर 2025 वाली भाषा का इस्तेमाल करने लगे हैं। कह रहे हैं कि उन्हें दुख और शर्मिंदगीगी महसूस हो रही है कि वह एक ऐसी सरकार का समर्थन कर रहे हैं जो बिहार में सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रही। लेकिन अब किस चुनाव में सीट शेयरिंग के टेबल पर बारगेनिंग करना चाहते हैं चिराग पासवान। यूपी में चुनाव होने वाले हैं। जहां चिराग पासवान चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। वह पार्टी का विस्तार करना चाहते हैं। तो चुनाव में अपनी पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा सीटें मांगेंगे। पिछले बिहार चुनाव में भी सीट लेने के लिए नीतीश कुमार पर अटैक कर रहे थे। चिराग पासवान एक अच्छे बारगेनर हैं। इसलिए यूपी का चुनाव भी एक फैक्टर है।</p><h2>यूपी में जदयू कौन बनेगा और कौन होगा नीतीश कुमार?</h2><p><br>उत्तर प्रदेश में विधनसभा चुनाव वैसे तो अगले बरस है, लेकिन राजनीतिक दलों की ओर से तैयारियां तेज हो चली हैं। इस बार &nbsp;चुनावी मैदान में बिहार की पार्टी लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) भी उतरने की तैयारी में है। पार्टी प्रमुख और केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने प्रयागराज में यूथ बोले तो कार्यक्रम के जरिए विधानसभा चुनाव के लिए अभियान का आगाज किया है। पार्टी ने साफ किया है कि उनकी तैयारी सभी 403 सीटों पर चल रही है। प्रयागराज से चिराग पासवान के ऐलान ने प्रदेश में राजनीतिक हलचल को तेज किया है। दरअसल, लोजपा (रामविलास) केंद्र और बिहार में एनडीए के साथ है। वहीं, यूपी चुनाव में पार्टी की तैयारी भाजपा को टक्कर देने की है। चिराग ने तो यह तक कह दिया है कि गठबंधन हो या ना हो उनकी पार्टी यूपी चुनाव लड़ेगी जरूर। यह बयान सुनते ही पॉलिटिक्स पर नजर रखने वालों को 2020 का बिहार चुनाव याद आ सकता है। जब खुद चिराग ने कहा था कि एनडीए गठबंधन में उन्हें 15 सीटें दी जा रही थी। उन्होंने नीतीश कुमार से भी नाराजगी जाहिर की थी तब जिसकी वजह से चिराग पासवान ने अकेले ही बिहार चुनाव में उतरने का निर्णय किया था। वह उतरे भी चुनाव लड़े उन्हें जीत तो हासिल नहीं हुई लेकिन उनकी वजह से जदयू को ठीक-ठाक नुकसान हो गया। नतीजों के बाद कहा गया कि चिराग जिस मिशन पर निकले थे यानी निकाले गए थे वह आखिरकार पूरा हुआ। यानी कम सीटें चिराग पासवान के लिए किसी गठबंधन में साथ रहने के नजरिए से रेड फ्लैग है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/cricket/shree-charani-breaks-megan-schutt-record-in-womens-t20i-bowling-rankings" target="_blank" rel="noopener">श्री चरणी ने T20I Bowling Rankings में रचा इतिहास, 817 पॉइंट्स के साथ बनाया नया रिकॉर्ड</a></h3><h2><br>प्रयागराज में दिखा चिराग पासवान का नया तेवर</h2><p><br>28 सितंबर को प्रयागराज में आयोजित 'यूथ बोले तो' संवाद कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान बिल्कुल जुदा अंदाज में नजर आए। पारंपरिक राजनीतिक पहनावे को छोड़ वे कैजुअल जींस और टी-शर्ट में युवाओं के बीच पहुंचे। मंच से नौजवानों के साथ शिक्षा, रोजगार, स्किल डेवलपमेंट और राजनीति में युवाओं की सक्रियता पर खुलकर चर्चा करते हुए उन्होंने बड़ा सियासी ऐलान किया। चिराग ने साफ लफ्जों में कहा कि इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिएलोजपा (रामविलास) पूरी मजबूती के साथ उत्तर प्रदेश का 2027 विधानसभा चुनाव लड़ेगी। हालांकि जिस यूपी में बीजेपी, निषाद पार्टी, सुभाजपा और आरएलडी को उनकी मांग के मुताबिक सीटें देने के मूड में नहीं है, वहां एक नया बटाईदार पार्टी को क्यों ही पसंद आएगा? यह अब तक तो तय नहीं है। पता चला है कि मामला सीटों को लेकर ही फंस सकता है। लेकिन चिराग अपनी ओर से पूरा जोर लगा रहे हैं। माहौल बनाने के लिए कॉन्सर्ट नुमा कार्यक्रमों के आयोजन किए जा रहे हैं। स्टूडेंट्स को संवाद के जरिए जोड़ने की कोशिश हो रही है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 16:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-modi-hanuman-break-away-from-nda-and-lock-horns-with-yogi-what-is-chirag-paswan-up-plan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bangladesh के आर्मी बेस में घुसे ISI के एजेंट, तुर्की-पाकिस्तान मिलकर ढाका में कराएंगे तख्तापलट?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/isi-agents-infiltrate-a-bangladesh-army-base-will-t%C3%BCrkiye-and-pakistan-join-forces-to-stage-a-coup]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जन-आंदोलन के बाद पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की सरकार गिरने और उनके देश छोड़कर भागने के महज दो साल बाद ही, बांग्लादेश एक और बड़े राजनीतिक संकट के मुहाने पर खड़ा नजर आ रहा है। कथित तौर पर देश के एक शीर्ष नेता ने सैन्य नेतृत्व के साथ मिलकर प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली बीएनपी (BNP) सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश रची है। ऐसे में कहा जा रहा है कि क्या बांग्लादेश में क्या एक बार फिर से तख्ता पलट होने जा रहा है? क्या तारिक रहमान का भी वही हश्र होगा जो शेख हसीना का हुआ। यह सवाल इसलिए क्योंकि बांग्लादेश में पिछले कुछ दिनों में कई हलचल देखने को मिली है। आईएसआई के आतंकी वहां पर घूम रहे हैं। आर्मी के बेस पर जा रहे हैं। इसके अलावा तुर्की के इन्वॉल्वमेंट को लेकर खबरें हैं।</p><h2>क्या बांग्लादेश में सुलग रहा है तख्तापलट का नया संकट?</h2><p>नॉर्थ ईस्ट न्यूज की एक रिपोर्ट के अनुसार, तुर्किये और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के साथ-साथ विदेश मंत्री खलीलुर रहमान भी कथित तौर पर इस साजिश में शामिल हैं। इसका मकसद प्रधानमंत्री तारिक रहमान को विवादित, नाकाम और अप्रभावी साबित कर राजनीतिक रूप से कमजोर करना है। बांग्लादेश की इंटेलिजेंस एजेंसी के एक सूत्र का हवाला देते हुए रिपोर्ट में दावा किया गया है कि 22-23 सितंबर को मेजर जनरल महबूबुल आलम के साथ गुप्त बैठकें हुईं। महबूबुल आलम 'बांग्लादेश यूनिवर्सिटी ऑफ़ प्रोफेशनल्स' के वाइस चांसलर हैं, जो बांग्लादेश की सेना द्वारा चलाया जाने वाला एक संस्थान है। इस बैठक में अमर देश के संपादक महमूदुर रहमान (जो पूर्व सेना अधिकारी अब्दुल्ला अमान आज़मी के बेटे हैं) और एक अन्य पूर्व सेना अधिकारी हसीनुर रहमान भी मौजूद थे। इनके साथ तुर्की की इंटेलिजेंस एजेंसी का एक वरिष्ठ अधिकारी भी शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, इन बैठकों में खलीलुर रहमान और महमूदुर रहमान के नेतृत्व में लंबे समय तक चलने वाली गैर-राजनीतिक सरकार बनाने के रोडमैप पर चर्चा की गई।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bangladesh-tells-un-it-is-troubled-by-muslims-all-of-india-is-stunned" target="_blank" rel="noopener">Bangladesh ने UN में कहा- हम मुस्लिमों से परेशान, पूरा भारत हैरान!</a><br>क्या इसमें बांग्लादेश की सेना शामिल है?</h3><p><br>सूत्रों का कहना है कि सेना और जमात-ए-इस्लामी इस योजना का समर्थन करते हैं। कहा जा रहा है कि यह योजना पाकिस्तान में तैयार की जा रही है और इसे तुर्की से फंड मिल रहा है। इसका मकसद बांग्लादेश की दो मुख्य राजनीतिक पार्टियों—तारिक रहमान की अगुवाई वाली BNP और शेख हसीना की प्रतिबंधित अवामी लीग—को राजनीतिक रूप से कमज़ोर करना है।इससे पहले, आज़मी और हसीनुर् रहमान ने अलग-अलग दावा किया था कि बांग्लादेश सेना प्रमुख जनरल वाकर-उज़-ज़मान के साथ उनका नियमित संपर्क है और उन पर उनका नियंत्रण है। उन्होंने यह भी दावा किया कि सेना की कमांड चेन पर जनरल ज़मान का नियंत्रण नहीं है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, बांग्लादेश की मिलिट्री इंटेलिजेंस में कथित तौर पर इस्लामिक आतंकवाद-विरोधी गठबंधन सक्रिय और मज़बूत हो गया है, और हाल ही में ब्रिगेडियर शौकत उस्मान को इस गुप्त समूह का प्रमुख बनाया गया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-kusha-air-defence-system-kolkata-deployment-bangladesh-mecca-pact" target="_blank" rel="noopener">Shaurya Path: Eastern Front को भी Air Defence System से लैस करने की तैयारी कर रहे Modi, Kolkata में तैनात होकर Kusha बनेगा अभेद्य ढाल</a><br>क्या तारिक रहमान का भी वही हाल होगा जो हसीना का हुआ?</h3><p><br>सूत्रों का यह भी कहना है कि बांग्लादेश की सेना और नागरिक प्रशासन में मौजूद ताकतवर लोग तारिक रहमान और उनके परिवार को देश से बाहर भेजने की साज़िश रच रहे हैं, ठीक वैसे ही जैसे शेख हसीना और उनके परिवार को देश छोड़कर भारत में शरण लेने के लिए मजबूर होना पड़ा था। खबरों के मुताबिक, खुफिया एजेंसियों को पता चला है कि विदेश मंत्री खलीलुल्लाह रहमान के इस ग्रुप से करीबी संबंध हैं। उन्हीं की पहल पर न्यूयॉर्क में यूनाइटेड नेशंस जनरल असेंबली के दौरान तुर्की के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन, ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ के साथ बैठकें हुईं। एर्दोगन और पेज़ेश्कियान के साथ हुई बैठकें पहले से तय नहीं थीं। माना जाता है कि खलील ने ये बैठकें इसलिए आयोजित कीं ताकि रहमान को उनकी तटस्थ विदेश नीति से भटकाकर विवादों में फंसाया जा सके।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/tarang-shakti-2026-f35-rafale-f16-jodhpur-air-exercise" target="_blank" rel="noopener">अचानक आ रहा US का F-35, France का Rafale और UAE का F-16 Fighter Jet, India में दुनिया की ताकतवर Air Forces का महाजमावड़ा देख दुश्मन काँपे</a><br>बांग्लादेश में ISI क्या साज़िश रच रही है?</h3><p><br>इस बीच, खुफिया सूत्रों ने यह भी दावा किया कि पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) के दो सीनियर अधिकारी, मेजर मोहम्मद अकरम और मेजर अज़ीज़ बुट्टारी, चुपके से बांग्लादेश गए थे। खबरों के मुताबिक, अपनी 10 दिन की यात्रा के दौरान वे चट्टोग्राम समेत कई ठिकानों पर रुके और क्षेत्रीय सुरक्षा खतरों को लेकर सेना के सीनियर अधिकारियों के साथ बैठकें कीं। 25 सितंबर को बांग्लादेश से रवाना होने से पहले उन्होंने महमूदुर आज़मी और हसीनु्र से भी मुलाकात की।</p><h2><br>खलीलुर रहमान पर शक क्यों है?</h2><p><br>माना जाता है कि बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान, जो संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के मौजूदा अध्यक्ष भी हैं, ने प्रधानमंत्री तारिक़ की बेटी ज़ाइमा रहमान को UNGA अध्यक्ष के कार्यालय में कानूनी अधिकारी के तौर पर नियुक्त किया था, ताकि प्रधानमंत्री को विवाद में घसीटा जा सके। खलीलुर UNGA के अध्यक्ष और बांग्लादेश के विदेश मंत्री भी हैं, फिर भी उन्होंने तारिक़ रहमान के भाषण के लिए महासभा सत्र का सबसे अनुपयुक्त समय चुना। यह भाषण न्यूयॉर्क में देर दोपहर को दिया गया, जब हॉल में आमतौर पर बहुत कम लोग होते हैं, और बांग्लादेश में उस समय सुबह के 4:18 बज रहे थे। इसके अलावा, ज़ाइमा की नियुक्ति एक बड़ा मुद्दा बन गई और तारिक़ के विरोधियों ने 24 सितंबर को UNGA में उनके भाषण से पहले उन्हें निशाना बनाने के लिए इसका इस्तेमाल किया।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 29 Sep 2026 14:21:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/isi-agents-infiltrate-a-bangladesh-army-base-will-t%C3%BCrkiye-and-pakistan-join-forces-to-stage-a-coup</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब हफ्ते में 5 दिन ही खुलेंगे बैंक? रातों-रात ऐसा क्या हुआ,  3-Day Bank Strike क्यों टाल दी गई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/ufbu-and-iba-agree-to-form-high-level-committee-on-five-day-banking-demand]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पिछले सात दिनों से पूरे देश के सीने पर एक भारी सस्पेंस लटका हुआ था। एक ही चेतावनी, एक ही डर कि 28, 29 और 30 सितंबर यानी लगातार 72 घंटे तक देश के बैंकों का दिल धड़कना बंद कर देगा! शटर नहीं उठेंगे, तिजोरियों पर ताले लटके रहेंगे और 30 सितंबर की महा-क्लोज़िंग के बीच देश की पूरी वित्तीय व्यवस्था वेंटिलेटर पर आ जाएगी। हमारे पिछले एमआरआई के एपिसोड में भी हमने इस आने वाले तूफ़ान की एक-एक आहट से आपको रूबरू कराया था। लेकिन फिर घड़ी की सुइयां रात के साढ़े नौ बजाती हैं। रविवार की रात जब पूरा देश सोने की तैयारी कर रहा था, ठीक उसी वक्त परदे के पीछे एक ऐसी बाज़ी पलटी जाती है, जिसने सबको सन्न कर दिया! अब देश की जनता और करोड़ों खाताधारकों के मन में सीधा सवाल यह कौंध रहा है कि आखिर रविवार की आधी रात को ऐसी कौन सी बातचीत हुई? बंद कमरों में ऐसा क्या समझौता हुआ कि जो यूनियंस आर-पार की जंग के मूड में थीं, जो कर्मचारी आक्रोश में सड़कों पर उतरने को तैयार थे, उन्होंने आखिरी वक्त में अपने कदम पीछे क्यों खींच लिए? क्या सरकार ने कर्मचारियों की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी मांग यानी '5-डे बैंकिंग' को आखिरकार मंजूरी दे दी है? क्या अब हर शनिवार को देश की सभी बैंक शाखाएं पूरी तरह बंद रहेंगी? या फिर सरकार ने कर्मचारियों की दुखती रग पर हाथ रखकर कोई ऐसा दांव चल दिया, जिसे यूनियनें झेल नहीं पाईं? सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न अगर शनिवार की छुट्टी पर कोई फैसला हुआ ही नहीं, तो फिर ऐन वक्त पर यह हड़ताल वापस क्यों ली गई? क्या यह बैंक कर्मचारियों की कोई बड़ी रणनीतिक बढ़त है, ग्राहकों के हित में लिया गया फैसला है या फिर सरकार और यूनियनों के बीच केवल वक्त हासिल करने की कोई अंदरूनी चाल? आज के एपिसोड में हम बैंक हड़ताल टलने के पीछे की इनसाइड स्टोरी, आधी रात को बने समझौतों और आपके बैंक जाने से जुड़े हर नियम का एमआरआई स्कैन करेंगे।</p><h2><br>क्या थी बैंक कर्मचारियों की मांग</h2><p><br>27 सितंबर को रात में करीब 9:30 बजे इंडियन बैंक्स एसोसिएशन यानी कि आईबीए और यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस यानी कि यूएफबीयू के बीच में एक बैठक होती है। इसके बाद यूनियंस ने 28, 29 और 30 सितंबर को प्रस्तावित हड़ताल को वापस लेने की घोषणा कर दी। सबसे पहले समझते हैं विवाद क्या था। आज जो वर्तमान में अगर हम बैंकिंग देखें तो महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक की ब्रांचेस बंद रहती हैं। यानी कि बाकी शनिवार में कार्य दिवस रहता है। बैंक यूनियंस की बेसिक डिमांड यह थी कि सभी शनिवार को अवकाश घोषित किया जाए। यानी बैंकिंग में पांच डे वर्क वीक लागू हो। जैसा कि LIC में और सरकारी अस्पताल सरकारी कार्यालयों में लागू होता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/bank-strike-from-september-28-to-30-may-impact-branch-services-across-india" target="_blank" rel="noopener">28 से 30 सितंबर तक Bank Strike का ऐलान, PSU Banks में शाखा कामकाज रहेगा प्रभावित</a><br>मांग को कर्माचरियों और ग्राहकों के नजरिए से समझें</h3><p><br>बैंक कर्मचारी से अगर आप पूछिए तो उसका कहना होगा कि बैंक का काम केवल बैंक की शाखा का शटर गिरते ही समाप्त नहीं होता। ग्राहकों से जुड़े काम की रिपोर्टिंग, लक्ष्य और दूसरी जिम्मेदारियां भी होती हैं। यूनियंस का तर्क है 5 दिन के कार्य सप्ताह पर गंभीरता से फैसला होना चाहिए। कर्मचारी बेहद दबाव में काम कर रहे हैं। &nbsp;अब ग्राहक से पूछिएगा जो सोमवार से शुक्रवार अपनी नौकरी करता है और उसके लिए शनिवार बैंक जाकर काम निपटाने का एक सुविधाजनक दिन हो सकता है। सरकार ने भी इसी बात को अपनी सार्वजनिक अपील में उठाया था कि बचे हुए शनिवार बहुत से ग्राहकों के लिए बैंकिंग सेवाएं लेने का मौका है। यह सरकार का पक्ष है। सवाल केवल कर्मचारियों की छुट्टी का नहीं रह जाता। सवाल यह भी है कि अगर बैंक का कार्य सप्ताह बदले तो ग्राहकों की पहुंच कैसे बनी रहेगी?&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/banks-closed-for-5-days-what-happened-to-employees-gone-on-a-mega-strike-reason-will-shocked" target="_blank" rel="noopener">5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे</a><br>बैठक में क्या तय हुआ&nbsp;</h3><p><br>बातचीत के बाद बैंक यूनियनों ने हड़ताल वापस लेने का ऐलान किया। यूएफबीयू कई बैंक कर्मचारी और अधिकारियों के संगठनों का ग्रुप है। यूएफबीयू ने सात बैंक यूनियन की ओर से एक संयुक्त बयान जारी किया है। जिसमें कहा है कि आईबीए और यूएफबीयू की एक हाई लेवल कमेटी तुरंत बनाई जाएगी। यह कमेटी बाकी शनिवार को छुट्टी देने के मुद्दे पर बात करेगी। कमेटी सभी संभावित विकल्पों पर विचार करेगी। अलग-अलग पक्षों से बात करेगी और ऐसा रास्ता निकालेगी और या निकालने की कोशिश करेगी जो बैंक कर्मचारियों के साथ-साथ ग्राहकों के लिए भी ठीक हो। बैंक यूनियंस की एक बड़ी मांग थी। यह मांग स्केल फोर और उससे ऊपर के बैंक अधिकारियों के लिए परफॉर्मेंस लिंक इंसेंटिव यानी काम के आधार पर मिलने वाली इंसेंटिव की योजना से जुड़ी है। यूनियनों ने इस योजना को वापस लेने की मांग की थी। इस पर भी बातचीत आगे बढ़ाने की बात हुई है। यूएफबीयू के मुताबिक आईबीए सरकार के सामने इस योजना के बदलाव का प्रस्ताव रखेगा ताकि यूनियनों की मांगों को ध्यान में रखा जा सके। इसके बाद जो मुद्दे बचेंगे उन पर दोनों पक्ष बातचीत करेंगे और जल्द कोई हल निकालने की कोशिश होगी।</p><h2>हड़ताल इतनी अहम क्यों थी?&nbsp;</h2><p><br>हड़ताल 28 से 30 सितंबर तक होनी थी। 30 सितंबर बैंकों के लिए हाफ ईयर क्लोजिंग का दिन होता है। इस दिन बैंक में कई जरूरी काम निपटाए जाते हैं। जैसे खातों का हिसाब मिलाना, पैसों का मिलान करना, जरूरी रकम का इंतजाम करना और ट्रेजरी और मार्केट से जुड़े काम पूरे करना। अगर 28 से 30 सितंबर तक बैंक बंद रहते हैं तो उससे ठीक पहले शनिवार और रविवार सैटरडे संडे भी पड़ रहा था। ऐसे में बैंकिंग सेवाएं लगातार 5 दिन तक प्रभावित हो सकती थी। इसी वजह से वित्त मंत्रालय ने 21 सितंबर को बैंक कर्मचारियों से हड़ताल पर नहीं जाने की अपील की थी। मंत्रालय ने कहा था कि हड़ताल से बैंकिंग सेवाएं प्रभावित होंगी। लोगों को परेशानी होंगी और बैंकों के कामकाज पर भी असर पड़ेगा। मंत्रालय के मुताबिक इसका नुकसान आखिरकार बैंक कर्मचारियों के हितों पर भी पड़ सकता है। इसके बाद 23 सितंबर को वित्त मंत्रालय ने पब्लिक सेक्टर बैंकों और रीजनल रूरल बैंकों को निर्देश दिया था कि 27 सितंबर यानी रविवार को भी बैंक खुले रहेंगे।</p><h2><br>रविवार को काम का अतिरिक्त वेतन और अनिश्चितकालीन हड़ताल की चेतावनी</h2><p><br>यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) द्वारा देर रात जारी किए गए आधिकारिक सर्कुलर से एक और बड़ी बात सामने आई है। वित्त मंत्रालय के निर्देश पर रविवार, 27 सितंबर को जिन बैंक कर्मचारियों और अधिकारियों ने शाखाओं में जाकर काम किया, उनके मुआवजे पर भी सहमति बन गई है। सर्कुलर के मुताबिक, रविवार को काम करने वाले क्लेरिकल और सब-स्टाफ कर्मचारियों को बायपार्टाइट समझौते के तहत दोगुना ओवर-टाइम (Double OT) भत्ता दिया जाएगा, जबकि अधिकारियों को इसके एवज में एक दिन का अतिरिक्त वेतन मिलेगा। गौरतलब है कि यूनियनों ने 28 से 30 सितंबर की हड़ताल के बाद 26 अक्टूबर से अनिश्चितकालीन हड़ताल का भी नोटिस दे रखा था। इस समझौते में 5-डे बैंकिंग और पीएलआई (PLI) के अलावा 8 मार्च 2024 से अटके पुराने मुद्दे जैसे एनपीएस से ओपीएस (OPS), पेंशन अपडेशन और नई भर्तियों के समाधान पर भी तेजी से बात करने पर सहमति बनी है।</p><p>पांच दिन काम की मांग आखिर आई कहां से?&nbsp;</p><p>यह जो पूरा विवाद है कि पांच दिन काम हो और दो दिन छुट्टी मिले। ये बात आई कहां से? बैंक यूनियनों का कहना है कि पहले बैंक सोमवार से शुक्रवार तक काम करते थे और शनिवार को आधे दिन का काम होता था। साल 2015 में हुए एक समझौते के बाद महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को छुट्टी कर दी गई यानी कि सेकंड सैटरडे लेकिन बाकी शनिवार अभी भी पूरे दिन कामकाजी होते हैं। अब यूएफबीयू चाहता है कि बाकी शनिवार को भी छुट्टी मिले। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक यूनियन का कहना है कि केंद्र और राज्य सरकार के दफ्तरों, आरबीआई, LIC, प्राइवेट कंपनियों, स्टॉक मार्केट, मनी मार्केट और विदेशी मुद्रा बाजार में पहले से 5 दिन का काम होता है। अभी तीन दिन की बैंक हड़ताल टल गई है। लेकिन 5 दिन काम और दो दिन छुट्टी की मांग पर आखिरी फैसला अभी नहीं हुआ है। &nbsp;ना इसे मंजूरी मिली है और ना ही कहा जा सकता है कि विवाद हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।&nbsp;</p><h2><br>हड़ताल टालने के लिए किया गया रेडिमेड उपाय तो नहीं ?</h2><p><br>समिति कब बनती है? बैठक कब करती है? ग्राहकों की सुविधा के लिए क्या प्रस्ताव रखती है? &nbsp;उसके बाद सरकार और संबंधित संस्थाएं इस पर क्या निर्णय लेती हैं? यही तीन कदम बताएंगे कि रविवार रात की बातचीत किसी स्थाई समाधान की शुरुआत थी या केवल हड़ताल को रुकवाने के लिए किया गया एक रेडीमेड उपाय था। इस पूरी कहानी को एक वाक्य में समझें तो बैंक हड़ताल टली है। 5 दिन की बैंकिंग पर अभी कोई फाइनल मुहर नहीं लगी। रविवार रात आईबीए और यूनियंस के बीच बातचीत से एक उच्च स्तरीय समिति बनाने और अंतिम तौर पर जो दूसरे लंबित मुद्दे हैं उन पर चर्चा के लिए केवल सहमति बनी है और इसी के बाद यूनियंस ने प्रस्तावित हड़ताल वापस ले ली है। ग्राहकों को तत्काल राहत मिली है। लेकिन शनिवार की बैंकिंग के अंतिम फैसले पर फाइनल मुहर लगनी बाकी है।&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 28 Sep 2026 13:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/ufbu-and-iba-agree-to-form-high-level-committee-on-five-day-banking-demand</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नेतन्याहू ने अपने भाषण से इस्लामिक वर्ल्ड में ही करा दी फूट? 77 देशों का वॉकआउट, 4 प्रमुख मुस्लिम बहुल मुल्क अपनी सीट पर जमे रहे, Abraham Accords है वजह?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/while-77-countries-staged-a-walkout-four-major-muslim-majority-nations-remained-in-their-seats]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) का मंच गुरुवार को उस वक्त वैश्विक कूटनीति के सबसे बड़े ड्रामे का गवाह बना, जब इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के पोडियम पर कदम रखते ही दर्जनों देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने एक साथ सदन छोड़ दिया। ईरान, गाज़ा और पश्चिम एशिया के सुलगते हालात पर दुनिया को संबोधित करने आए नेतन्याहू के सामने हॉल की कुर्सियां तेजी से खाली होने लगीं। मगर, पीछे हटने के बजाय नेतन्याहू ने तल्ख तेवर अपनाते हुए सदन में मौजूद लोगों से कहा शुरू करने से पहले एक छोटा सा ऐलान अगर इस हॉल में कोई और नैतिक कायर बचा है जिसने अभी तक सदन नहीं छोड़ा है, तो कृपया अब निकल जाए। लगभग 77 देशों के प्रतिनिधियों ने इस बड़े वॉकआउट का हिस्सा बनकर इज़रायल के खिलाफ अपनी नाराजगी दर्ज कराई। इनमें सऊदी अरब, कतर, मिस्र, जॉर्डन, तुर्की, ईरान, पाकिस्तान और इंडोनेशिया जैसे कई प्रमुख मुस्लिम और अरब मुल्क शामिल थे। लेकिन इस कूटनीतिक बवंडर के बीच सबसे चौंकाने वाला पहलू वो था जो हुआ ही नहीं। चार प्रमुख मुस्लिम-बहुल देश अपनी सीटों पर जमे रहे। संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान ने इस सामूहिक बहिष्कार से खुद को पूरी तरह अलग रखा। अब सवाल यह उठता है कि जब अधिकांश इस्लामिक दुनिया नेतन्याहू को खुला संदेश दे रही थी, तब इन चार मुल्कों ने विरोध की इस लहर में शामिल न होने का फैसला क्यों किया? क्या यह अब्राहम अकॉर्ड्स (Abraham Accords) की रणनीतिक प्रतिबद्धता थी, ऊर्जा और रक्षा समझौतों का दबाव, या फिर बंद कमरों की वह कूटनीति जो सार्वजनिक नारों से ऊपर राष्ट्रीय हितों को तरजीह देती है?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/remember-this-netanyahu-shook-the-entire-world-by-showing-a-pager-the-un-was-left-stunned" target="_blank" rel="noopener">याद है ये...नेतन्याहू ने पेजर दिखा हिलाई पूरी दुनिया, UN रह गया हैरान, ईरान परेशान</a><br>नेतान्याहू के UNGA भाषण के दौरान क्या हुआ?</h3><p>UN जनरल असेंबली के 81वें सेशन में नेतान्याहू का भाषण ऐसे समय में हुआ जब गाज़ा में संघर्ष जारी था और इज़राइल व ईरान के बीच बड़े पैमाने पर सैन्य तनाव बना हुआ था। जैसे ही वे पोडियम की ओर बढ़े, कई देशों के प्रतिनिधिमंडल हॉल से बाहर चले गए, जिससे इज़राइली प्रधानमंत्री के लिए श्रोताओं की संख्या काफी कम हो गई। खबरों के अनुसार, इन 77 देशों में मध्य पूर्व, एशिया, अफ्रीका, यूरोप, लैटिन अमेरिका और कैरिबियन क्षेत्र के देश शामिल थे। इस संख्या के बारे में एक ज़रूरी बात ध्यान देने वाली है। 77 देशों की इस गिनती का मतलब यह नहीं है कि उन सभी प्रतिनिधिमंडलों ने मिलकर वॉकआउट (विरोध में बाहर जाना) किया। खबरों के मुताबिक, कुछ प्रतिनिधिमंडल तब हॉल में मौजूद नहीं थे जब नेतान्याहू ने भाषण शुरू किया, जबकि कुछ अन्य उनके पोडियम पर आते ही बाहर चले गए। दरअसल, नेतन्याहू के सभागार में पहुंचने पर कुछ नेताओं ने उनका स्वागत किया तो कुछ ने विरोध जताया। कई प्रतिनिधि बाहर निकल गए और उनके भाषण के दौरान ज्यादातर सीट खाली दिखाई दीं। नेतन्याहू ने जोर देकर कहा कि ईरान पर हमला करना उनके लिए अब तक के सबसे आसान फैसलों में से एक था और उन्होंने सभागार से बाहर जाने वाले प्रतिनिधियों को नैतिक रूप से कायर करार दिया। उन्होंने कहा अगर नैतिक रूप से कोई और कायर अब भी सभागार में मौजूद है और बाहर नहीं गया है तो कृपया अभी चला जाए।</p><p>फिलिस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास को संयुक्त राष्ट्र महासभा में शामिल होने के लिए अमेरिका द्वारा एक बार फिर वीजा नहीं दिए जाने के कारण उन्हें पहले से रिकॉर्ड किए गए वीडियो संदेश के जरिए महासभा को संबोधित करना पड़ा। अब्बास की उनके देश में लोकप्रियता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके प्रभाव में कमी आई है, लेकिन अपने संबोधन में उन्होंने स्पष्ट किया कि वह खुद को दरकिनार किए जाने को चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगे। अब्बास ने कहा कि हम अपनी मातृभूमि नहीं छोड़ेंगे। हम विस्थापन स्वीकार नहीं करेंगे और हम किसी को भी अपनी ओर से हमारे भविष्य का फैसला नहीं करने देंगे। पूरे सप्ताह विश्व के कई नेताओं ने अपने भाषणों में फलस्तीनियों की स्थिति का उल्लेख किया और अब्बास ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से इजराइल के खिलाफ अधिक ठोस कदम उठाने का आग्रह किया। इस बीच, हमास के एक प्रवक्ता ने कहा कि बोर्ड ऑफ पीस द्वारा गाजा के पुनर्निर्माण के लिए छह महीने की 2.45 अरब डॉलर की योजना पेश किए जाने के बाद संगठन शांति समझौते के अगले चरणों को आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। हमास के प्रवक्ता हाजेम कासिम ने कहा कि उनका संगठन बोर्ड ऑफ पीस की रूपरेखा को लागू करने के लिए पूरी तरह तैयार है, हालांकि उन्होंने हथियार डालने की किसी योजना का उल्लेख नहीं किया। इजराइल ने कहा है कि जब तक हमास हथियार नहीं डालता, वह पुनर्निर्माण की अनुमति नहीं देगा। ईयू के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र, विश्व बैंक और 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ के अनुमान के अनुसार गाजा के पुनर्निर्माण के लिए 71 अरब यूरो (80.8 अरब डॉलर) की जरूरत है, लेकिन अब तक केवल एक अरब यूरो (1.1 अरब डॉलर) ही जुटाए जा सके हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/get-out-this-statement-by-netanyahu-from-the-un-podium-has-gone-viral" target="_blank" rel="noopener">कोई और कायर रह गया है? निकल जाओ...UN के मंच से नेतन्याहू ने ऐसा दहाड़ा, खाली हो गया पूरा हॉल</a><br>कौन से प्रमुख मुस्लिम देश इसमें शामिल रहे?</h3><p><br>चार मुस्लिम-बहुल देश अलग दिखे क्योंकि वे उन 77 प्रतिनिधिमंडलों की सूची में शामिल नहीं थे जो अनुपस्थित थे या जिन्होंने चैंबर छोड़ दिया था – ये देश हैं संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, मोरक्को और अज़रबैजान। उनके फैसले खास तौर पर अहम हैं क्योंकि इन चारों ने इज़राइल के साथ अलग-अलग स्तर पर राजनयिक और रणनीतिक संबंध बनाए रखे हैं, जबकि गाज़ा युद्ध और इज़राइल के व्यापक सैन्य अभियानों को लेकर मुस्लिम दुनिया में तीखे मतभेद रहे हैं। UAE, बहरीन और मोरक्को ने 'अब्राहम समझौते'से जुड़े सामान्यीकरण समझौतों के ज़रिए इज़राइल के साथ औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए हैं। वहीं, अज़रबैजान ने कई दशकों में इज़राइल के साथ एक अलग रणनीतिक साझेदारी विकसित की है, खासकर रक्षा, ऊर्जा और क्षेत्रीय सुरक्षा के क्षेत्रों में।&nbsp;</p><h2><br>अब्राहम समझौता क्या हैं?</h2><p><br>अब्राहम समझौते, अमेरिका के समर्थन वाले उन समझौतों की एक श्रृंखला हैं, जिनसे इज़राइल और कई अरब व मुस्लिम-बहुल देशों के बीच संबंध सामान्य हुए। UAE और बहरीन ने सितंबर 2020 में इज़राइल के साथ औपचारिक रूप से समझौतों पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद दिसंबर 2020 में मोरक्को ने भी संबंधों को सामान्य करने के समझौते पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों से राजनयिक रास्ते खुले या बहाल हुए और व्यापार, पर्यटन, निवेश, तकनीक और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा मिला। UAE-इज़राइल समझौते ने दोनों देशों के बीच शांति, राजनयिक संबंधों और पूर्ण सामान्यीकरण की संधि स्थापित की। बहरीन ने भी इज़राइल के साथ शांति और सामान्यीकरण का समर्थन करने वाले एक घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। बाद में मोरक्को और इज़राइल ने राजनयिक और कांसुलर संबंध स्थापित करने के लिए एक संयुक्त घोषणापत्र पर हस्ताक्षर किए। इन समझौतों का मतलब यह नहीं था कि इन देशों ने फ़िलिस्तीनी राष्ट्र का समर्थन करना बंद कर दिया या फ़िलिस्तीनी मुद्दे पर इज़राइल के साथ अपने मतभेदों को छोड़ दिया। इसके बजाय, इन्होंने ऐसे औपचारिक राजनयिक रास्ते बनाए जिनसे शामिल देश गंभीर क्षेत्रीय तनाव के समय भी बातचीत जारी रख सके।&nbsp;</p><h2><br>नेतान्याहू के भाषण के दौरान UAE क्यों मौजूद रहा?</h2><p><br>UAE उन शुरुआती अरब देशों में से एक था जिसने 'अब्राहम समझौते' (Abraham Accords) के तहत इज़राइल के साथ पूरे राजनयिक संबंध स्थापित किए। इस समझौते पर औपचारिक रूप से सितंबर 2020 में हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद राजनयिक मिशन स्थापित किए गए और आर्थिक संबंध बढ़ाए गए। गाज़ा युद्ध को लेकर बड़े मतभेदों के बावजूद UAE ने इज़राइल के साथ बातचीत जारी रखी है। उसका तरीका यह रहा है कि राजनयिक रास्ते खुले रखे जाएं और साथ ही फ़िलिस्तीनी मुद्दे और मानवीय चिंताओं पर अलग से अपना पक्ष रखा जाए।</p><h2><br>बहरीन क्यों मौजूद रहा?</h2><p><br>बहरीन 'अब्राहम समझौते' पर हस्ताक्षर करने वाला एक और प्रमुख अरब देश था। बहरीन और इज़राइल ने 2020 में औपचारिक राजनयिक संबंध स्थापित किए, जिससे सरकार-से-सरकार के बीच सीधे संपर्क के रास्ते बने, जो पहले मौजूद नहीं थे। बहरीन का फ़ैसला इसलिए भी खास था क्योंकि सऊदी अरब, कतर, कुवैत और ओमान समेत कई अन्य खाड़ी अरब देश उन देशों में शामिल थे जो नेतान्याहू के भाषण के दौरान या तो मौजूद नहीं थे या वहां से चले गए थे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/benjamin-netanyahu-slams-new-york-mayor-zohran-mamdani-at-unga-over-gaza" target="_blank" rel="noopener">UNGA में बोले Benjamin Netanyahu, New York के मेयर जोहरान ममदानी यहूदियों को खतरे में डाल रहे</a><br>गाज़ा में तनाव के बावजूद मोरक्को क्यों बना रहा?</h3><p><br>मोरक्को का रुख़ थोड़ा अलग और पेचीदा है। उत्तरी अफ़्रीका का यह देश उन देशों के समूह का हिस्सा है जिनके इज़राइल के साथ संबंध सामान्य होने की चर्चा अक्सर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' (Abraham Accords) के तहत होती है। हालाँकि, UAE और बहरीन के उलट, मोरक्को ने सितंबर 2020 में इज़राइल, UAE और बहरीन के साथ मिलकर 'अब्राहम एकॉर्ड्स' के मूल समझौते पर हस्ताक्षर नहीं किए थे। इसके बजाय, मोरक्को और इज़राइल ने दिसंबर 2020 में अपने संबंधों को सामान्य करने के समझौते की घोषणा की। बाद में अमेरिकी अधिकारियों ने मोरक्को के साथ संबंधों के सामान्य होने की प्रक्रिया को 'अब्राहम एकॉर्ड्स' की व्यापक प्रक्रिया का ही हिस्सा माना। तब से मोरक्को और इज़राइल के बीच राजनयिक और आर्थिक संबंध बने हुए हैं।</p><h2><br>अज़रबैजान ने नेतन्याहू के भाषण का बहिष्कार क्यों नहीं किया?</h2><p><br>अज़रबैजान का मामला उन तीन अरब देशों से अलग है, क्योंकि उसने 'अब्राहम एकॉर्ड्स' पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। वहाँ मौजूद रहने के उसके फ़ैसले को बाकू और तेल अवीव के बीच लंबे समय से चले आ रहे रणनीतिक संबंधों के ज़रिए बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। इज़राइल और अज़रबैजान ने रक्षा, सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और तकनीक के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर सहयोग विकसित किया है। जनवरी 2026 में दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अज़रबैजान के विदेश मंत्रालय ने इस रिश्ते को 'रणनीतिक साझेदारी' बताया था।</p><h2><br>रक्षा और सैन्य सहयोग</h2><p><br>रक्षा सहयोग, अज़रबैजान और इज़राइल के संबंधों के सबसे अहम हिस्सों में से एक है। अज़रबैजान इज़राइली रक्षा उपकरणों का एक बड़ा ग्राहक रहा है, और दोनों देशों के बीच सुरक्षा के मामले में करीबी संपर्क बना हुआ है। यह रिश्ता कई सालों में विकसित हुआ है और अज़रबैजान की व्यापक सुरक्षा नीति का एक अहम हिस्सा बन गया है। इज़राइली सरकार से जुड़े विश्लेषणों में अज़रबैजान को इज़राइल के रक्षा उत्पादों के प्रमुख ग्राहकों में से एक बताया गया है।</p><h2>वॉकआउट करने वाले देश</h2><p><br>तुवालु, तुर्कमेनिस्तान, यमन, मिस्र, पनामा, सेनेगल, फिलिस्तीन, सूडान, ट्यूनीशिया, तुर्की, वेनेजुएला, एंटीगुआ और बारबुडा, बेलीज, कांगो, ओमान, कतर, सऊदी अरब, टोंगा, उज्बेकिस्तान, अंगोला, बारबाडोस, कोलंबिया, कोमोरोस, डोमिनिका, जिबूती, उत्तरी मैसेडोनिया, सैन मैरिनो, दक्षिण अफ्रीका, सोमालिया, अल्जीरिया, बांग्लादेश, ब्रुनेई दारुस्सलाम, ब्राजील, चिली, कांगो गणराज्य, लेबनान, लाइबेरिया, इरिट्रिया, चाड, मध्य अफ्रीकी गणराज्य, लीबिया, मॉरिटानिया, जॉर्डन, निकारागुआ, मेडागास्कर, नाइजर, पेरू, सेंट लूसिया, स्लोवेनिया, अफगानिस्तान, बहामास, बोस्निया और हर्जेगोविना, बोत्सवाना, उत्तर कोरिया, इस्वातिनी, सीरिया, युगांडा, पाकिस्तान, लेसोथो, बोलीविया, स्पेन, क्यूबा, ​​​​इक्वेटोरियल गिनी, ईरान, किर्गिस्तान, इराक, मोज़ाम्बिक, म्यांमार, मालदीव, इंडोनेशिया, कुवैत, नामीबिया, मलेशिया, गुयाना और केन्या।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 12:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/while-77-countries-staged-a-walkout-four-major-muslim-majority-nations-remained-in-their-seats</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[5 दिन बैंक बंद! कर्मचारियों के साथ ऐसा क्या हुआ? मेगा हड़ताल पर आ गए सभी, वजह जानकर आप भी चौंक जाएंगे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/banks-closed-for-5-days-what-happened-to-employees-gone-on-a-mega-strike-reason-will-shocked]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफर्सन ने बैंक्स और फाइनेंशियल स्टैब्लिशमेंट को देश की बॉर्डर पर तैनात आर्मी से भी ज्यादा खतरनाक बताया था। बात सही भी है। सरकारों को अपने प्रशासन, डिप्लोमेसी और युद्ध तक चलाने के लिए बैंक्स और कर्ज की जरूरत पड़ती ही हैं। जैफर्सन का इशारा इस बात पर था कि बैंक सिर्फ पैसे के लेन-देन की जगह नहीं हैं, बल्कि वे पूरे देश की नब्ज और सत्ता की रीढ़ हैं। जब यह रीढ़ कुछ दिनों के लिए भी काम करना बंद कर दे, तो पूरा देश ठहर जाता है। 28 सितंबर से यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस (UFBU) की देशव्यापी हड़ताल इसी हकीकत की याद दिलाती है। फर्ज कीजिए महीने का आखिरी हफ्ता है। आपकी सैलरी आनी है। ईएमआई भी जानी होगी। किसी को चेक जमा करना है। किसी को बैंक से कैश निकालना है। और इसी बीच खबर आती है कि 28, 29 और 30 सितंबर को देश भर में बैंक स्ट्राइक होने वाली है। और कैलेंडर देखिए आप 26 सितंबर को फोर्थ सैटरडे है। बैंक की छुट्टी। 27 सितंबर संडे है बैंक की छुट्टी। और 28, 29 और &nbsp;30 सितंबर को स्ट्राइक का कॉल है। यानी बैंक ब्रांच से काम करने वाले लोगों के लिए दिक्कत 3 दिन की नहीं लगातार 5 दिन तक खींच सकती है। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने भी कहा है कि वीकेंड के साथ मिलकर यह स्ट्राइक बैंकिंग सर्विज पर 5 दिन जैसा असर डाल सकती है। तो सवाल सिर्फ यह नहीं है कि बैंक कर्मचारी स्ट्राइक क्यों कर रहे हैं? आपके लिए सवाल है क्या 30 तारीख की सैलरी आएगी? यूपीआई चलेगा या नहीं चलेगा? एटीएम में पैसा मिलेगा या नहीं? चेक क्लियर होगा, ईएमआई कटेगी और आपका कोई जरूरी काम बैंक ब्रांच में अटका हुआ है तो क्या अभी निपटा लेना चाहिए? आखिर ऐसा क्या हो गया है कि लाखों बैंक कर्मचारी काम-काज चोड़कर सड़कों पर उतरने की तैयारी कर चुके हैं। सरकार इस मुद्दे पर क्या कर रही है? तमाम मामलों का एमआरआई स्कैन करेंगे।</p><h2>किसने बुलाई हड़ताल और क्यों</h2><p>&nbsp;<br>बैंक कर्मचारियों के संगठन यूनाइटेड फोरम ऑफ बैंक यूनियंस UFBU ने इस हरताल को बुलाया है। बैंक कर्मचारियों का कहना है कि बैंक्स में हफ्ते में पांच दिन के काम की व्यवस्था होनी चाहिए और हर शनिवार छुट्टी होनी चाहिए। बैंक यूनियन की मुख्य मांग है कि हफ्ते में सिर्फ पांच दिन बैंक खोलने की व्यवस्ता लागू हो। अभी बैंक हर महीने के दूसरे और चौथे शनिवार को बंद रहते हैं लेकिन बाकी दो शनिवार काम होता है। यूनियंस चाहती हैं कि सभी शनिवार को छुट्टी हो और सोमवार से शुक्रवार तक बैंक काम करें। दूसरी बड़ी मांग पीएलआई यानि परफॉर्मेंश लिंक्ड इंसेंटिव की है। इस योजना को वापस लेने की मांग है। सरकार ने फिलहाल इस योजना को स्थगित कर दिया है। नए बैंक कर्मचारियों के लिए न्यू पेंशन स्कीम की जगह ओल्ड पेंशन स्कीम (ओपीएस) लागू करने की मांग की गई है। इसके अलावा पेंशन अपडेट करना, पेंशन पर युनिफॉर्म, डीए पेंशनर्स के लिए मेडिकल इंशोरेंस, प्रीमियम में राहत जैसी कई और मांगे भी है, जिन पर बैंक यूनियन सरकार से एक्शन की डिमांड कर रही है। इससे पहले 11 सितंबर को भी बैंक कर्मियों ने इनी मांगों को लेकर एक दिन की हड़ताल की थी। सरकार से बाचीत भी हुई थी, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकलने की वजह से अब वो तीन दिन की हड़ताल पर जा रहा है।</p><h2>म्युच्युअल फंड,इंशोरेंस प्रोडक्ट भी बेच रहे बैंक कर्मचारी</h2><p><br>बैंक कर्मचारियों की जितनी भी मांगे हैं उन में से सबसे बड़ी मांग जिस पर वो टस से मस नहीं होना चाहते वो 5-day वर्किंग है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उन पर काम का बहुत जादा बोझ है, जिसके चलते वो ये डिमांड पिछले 10 साल से कर रहे है। बैंक कर्मियों के मुताबिक उनसे सामान्य बैंकिंग ऑपरेशन्स के अलावा भी कई काम कराए जाते सरकार की स्कीम्स लागू करना है। म्युचल फंड्स और इंशोरेंस जैसे प्रोडक्ट को बेचना है। ये भी काम बैंक वाले कर रहे हैं। कर्मचारियों के मुताबिक बैंकों की भर्ती प्रक्रिया बेहद ढीली है। जिसके चलते मैनपावर की कमी हमेशा बनी रहती है। इसी वज़ह से बैंकों में काम करने वाले लोग रोजाना 2-3 घंटे पहले ही ज्यादा &nbsp;काम करते है। बैंक कर्मचारियों के मताबिक एलआईसी जैसे कई फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स &nbsp; में 5-day working का नियम है यानी पांच दिन काम होता है तो &nbsp;बैंक में क्यों पांच दिन नहीं हो सकता। आप दस तरह के काम बैंक कर्मचारियों से करा रहे हैं, तो बैंक कर्मचारी कह रहे हैं कि हम भी तो इंसान हैं, हमारा भी परिवार है। क्या दिनभर सिर्फ नोट ही गिनते रहे। बैंक यूनियन्स के मुताबिक मार्च 2024 में इंडियन बैंक्स असोसियेशन आईवीए के साथ द्विपक्षीय &nbsp;समझोता हुआ और इसमें सहमती बनी थी। लेकिन इसे लागू करने के लिए अभी तक सरकार की आधिकारिक मंजूरी और अधिसूचना का इंतजार है।&nbsp;</p><h2><br>बैंक खुद किस तरह की दिक्कत की तैयारी कर रहे हैं&nbsp;</h2><p><br>एसबीआई ने कस्टमर्स के लिए एडवाइज़री जारी की है। बैंक ने कहा कि जो जरूरी बैंकिंग ट्रांजैक्शंस हैं उन्हें स्ट्राइक की तारीखों से पहले पूरा कर लें। कैश चाहिए तो एटीएम का इस्तेमाल करें। ADWM &nbsp;यानी ऐसी मशीन जहां से कई जगह कैश निकालने के साथ जमा भी किया जा सकता है। बैंक ने कस्टमर सर्विस पॉइंट्स इस्तेमाल करने के लिए भी कहा है और सबसे जरूरी इंटरनेट बैंकिंग, यo, मोबाइल बैंकिंग, यूपीआई और दूसरे डिजिटल चैनल्स को प्रेफर करने को कहा है। साथ में यह भी कि स्ट्राइक के दौरान जरूरी बैंकिंग सर्विज चालू रखने की पूरी कोशिश की जाएगी। ऐसे ही कुछ नोटिसेस बैंक ऑफ बौदा, Canरा बैंक, PNB सारे बैंक्स ने निकाले हैं। अगर आपका काम ब्रांच पर डिपेंड करता है बैंक की तो उसे आखिरी दिन के भरोसे मत छोड़िए। इस वक्त यूपीआई बिना किसी दिक्कत के चलेगा। यह स्ट्राइक बैंक कर्मचारियों की है। यूपीआई जैसे डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बंद करने का कोई ऐलान नहीं है। इंटरनेट बैंकिंग, मोबाइल बैंकिंग और बैंक एप्स भी नॉर्मल रहेंगे। इसी तरह ऑनलाइन एनईएफटी और आरटीजीएस भी चलते रहने चाहिए। आरबीआई के मुताबिक एनईएफटी पूरे साल 24ों घंटे उपलब्ध है। आरटीजीएस भी 24 घंटे साल के चलता रहता है।</p><h2>हम 10 दिन का वेतन गंवा सकते हैं, क्या देश 10 दिन बैंक बंदी झेल सकता है?</h2><p><br>कर्मचारी यूनियनें हड़ताल के दौरान वेतन कटने के डर को अपनी सबसे बड़ी ताकत में तब्दील करने की अपील कर रही हैं। बैंककर्मियों का स्पष्ट तर्क है कि दो-तीन दिन या दस दिन का वेतन कटने से कर्मचारियों के घरों पर असर जरूर पड़ेगा, लेकिन वे झेल लेंगे। सवाल यह है कि क्या सरकार और देश की अर्थव्यवस्था बैंकों की राष्ट्रव्यापी पूर्ण बंदी को इतने दिन बर्दाश्त कर सकती है? कर्मचारियों का मानना है कि वेतन बचाने के लिए अगर वे आज पीछे हटे, तो उनकी बारगेनिंग पावर खत्म हो जाएगी, इसलिए वे अपनी सामूहिक ताकत दिखाने के मूड में हैं।</p><h2><br>संडे को भी खुलेंगे बैंक</h2><p><br>देशभर में सभी बैंक इस हफ्ते रविवार को भी खुले रहेंगे। वित्त मंत्रालय ने जानकारी दी है कि RBI ने 27 सितंबर को देश की सभी बैंक शाखाओं, दफ्तरों और एटीएम-लिंक ब्रांचों समेत सभी सर्विसेज को पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। वित्त मंत्रालय ने कहा कि जनता की जरूरी बैंकिंग जरूरतों पर लंबे समय तक असर न पड़े, इसे सुनिश्चित करने के लिए सभी सरकारी बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक रविवार, 27 सितंबर को सामान्य रूप से काम करेंगे। रिजर्व बैंक ने सभी शाखाओं, कार्यालयों, एटीएम-लिंक ब्रांचों और करेंसी चेस्ट्स को इस दिन पूरी तरह चालू रखने की मंजूरी दी है। कर्मचारियों के भीतर सरकार और मैनेजमेंट के उस कदम को लेकर भी तीखा गुस्सा है, जिसके तहत रविवार (27 सितंबर) को शाखाएं या करेंसी चेस्ट खुलवाने की अनुमति ली गई थी। कर्मचारियों का कहना है कि एक रविवार को बैंक खोल देने से हड़ताल का असर कम नहीं होगा। अगर कर्मचारी सड़कों पर डटे रहे, तो हर गुजरते दिन के साथ ग्राहकों, कारोबारियों और पूरी अर्थव्यवस्था का दबाव सरकार पर बढ़ेगा। उनका संदेश साफ है कि जंग सिर्फ एक दिन की छुट्टी या काम की नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व और अधिकारों की पहचान कराने की है। &nbsp;</p><h2>सरकार का क्या कहना है?</h2><p>21 सितंबर को सरकार ने कहा कि यूनियंस के साथ कई दौर की बातचीत और कंसिलिएशंस हुई हैं। बाकी मुद्दे बातचीत से हल किए जा सकते हैं और कर्मचारियों को स्ट्राइक से बचना चाहिए ताकि बैंकिंग सर्विज ना रुके। सरकार का दूसरा तर्क है कि शनिवार सिर्फ बैंक कर्मचारी के लिए वर्किंग डे नहीं है। कई कस्टमर्स, कई ग्राहक, आम लोग उसी दिन बैंक जाते हैं। 2015 में दूसरे और चौथे शनिवार को बैंक हॉलिडे मनाया गया था। लेकिन सरकार का कहना है कि बाकी शनिवार उन लोगों के लिए काम आते हैं जो सोमवार से शुक्रवार नौकरी या किसी दूसरे काम की वजह से ब्रांच नहीं जा पाते। तीसरा और इस बार सरकार का सबसे बड़ा कंसर्न है टाइमिंग। 30 सितंबर को हाफ ईयरली क्लोजिंग है। इस दिन बैंक सिर्फ सामान्य कस्टमर ट्रांजैक्शंस नहीं करते। बैंक अपने रिकॉर्ड्स भी मिलाते हैं। इसलिए फाइनेंस मिनिस्ट्री का कहना है कि इस वक्त स्ट्राइक का असर सिर्फ बैंक काउंटर तक नहीं रहेगा। बिजनेस, सरकारी ट्रांजैक्शन, इंटरनेशनल बैंकिंग तक असर पड़ सकता है। और सरकार सिर्फ अपील भी नहीं कर रही है, तैयारी भी कर रही है। डिपार्टमेंट ऑफ फाइनेंसियल सर्विज के 21 सितंबर के मेमो के मुताबिक 18 सितंबर को क्राइसिस मैनेजमेंट ग्रुप की एक मीटिंग हुई। इसके बाद 21 सितंबर को पब्लिक सेक्टर बैंक्स, रीजनल रूरल बैंक्स और आईबीए के अधिकारियों के साथ स्ट्राइक की तैयारी पर चर्चा हुई। फिर होम मिनिस्ट्री से राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों को एडवाइज़री जारी करने में मदद मांगी गई।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/find-out-how-the-ec-has-now-responded-to-reports-of-discord-among-the-election-commissioners" target="_blank" rel="noopener">क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें</a><br>किस चीज की सुरक्षा के लिए?&nbsp;</h3><p><br>करेंसी चेस्ट यानी वो जगह जहां बैंकों के लिए बड़ी मात्रा में कैश रखा जाता है। चेक क्लियरिंग प्रोसेसिंग सेंटर्स, डाटा सेंटर्स, डाटा रिकवरी सेंटर्स, ट्रेजरी ऑपरेशन, आईटी सेंटर्स, साइबर सिक्योरिटी सेल, एटीएम साथ ही बैंक ब्रांच के आसपास लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने और जो कर्मचारी स्ट्राइक में शामिल नहीं है, उनकी सुरक्षा की बात भी कही गई है। राज्यों से स्ट्राइक से जुड़ी जानकारी और इंटेलिजेंस इनपुट भी मांगे गए हैं। तो सरकार की तैयारी सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी तरह बैंक का शटर खुला रहे। कोशिश यह है कि बैंकिंग के पीछे चलने वाली पूरी मशीनरी, कैश, चेक, डाटा, आईटी, ट्रेजरी जितना हो सके वह चलता रहे। फाइनेंस मिनिस्ट्री ने बैंकों से यह भी कहा है कि एटीएम में इनफ कैश रखा जाए। जरूरी सर्विसेस के लिए बैकअप प्लान रहे और डिजिटल चैनल्स चलते रहें।&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 24 Sep 2026 13:23:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या सच में मनमर्जी करते हुए ज्ञानेश कुमार ने सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया? SIR के बीच चुनाव आयुक्तों में मतभेद की खबरों को ऑब्जर्वेशन और डिसेंट से समझें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/find-out-how-the-ec-has-now-responded-to-reports-of-discord-among-the-election-commissioners]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या चुनाव आयोग के अंदर किसी की मनमर्जी चल रही है? आखिर क्या सच में दो चुनाव आयुक्तों ने नियम पालन न होने की शिकायत दर्ज कराई थी? क्या नए वोटरों को जोड़ने की प्रक्रिया में कोई अड़चने पैदा करने की कोशिश की गई। फॉर्म-6 की शक्तियों के मामले में सरकार की शक्तियों को भी ठेंगा दिखा दिया गया? चुनाव आयोग के जिन अधिकारियों को वोटर जोड़ने और हटाने का हक है, उनके हाथ क्या किसी ने बांध दिए? देशभर के वोटरों के डेटा को दिल्ली से कंट्रोल करने का चलन क्या शुरू किया गया? महीनों में 14 बार और एक ही दिन में कम से कम चार बार दो चुनाव आयुक्तिों को अपनी आपत्ति लिखित में दर्ज करानी पड़ी। इन आपत्तियों के बावजूद फैसले क्यों ले लिए गए। क्या सच में ऐसी परिस्थितियां बनी की चुनाव आयुक्तों को जाकर कैबिनेट सेक्रेटरी से शिकायत करनी पड़ गई।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cec-gyanesh-kumar-and-poll-body-clarify-all-sir-decisions-were-unanimous" target="_blank" rel="noopener">SIR पर अंदरूनी मतभेद की खबरों को चुनाव आयोग ने किया खारिज, कहा- 'सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए', विपक्ष का CEC ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला</a><br>मीडिया रिपोर्ट में क्या कहा गया</h3><p>10 महीनों में 14 बार बिना जानकारी लिए गए बड़े फैसले, दो चुनाव आयुक्तों ने दर्ज कराई लिखित आपत्ति</p><p>भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के भीतर कामकाज और पारदर्शिता को लेकर बड़ा अंदरूनी विवाद सामने आया है। द इंडियन एक्सप्रेस की एक जांच रिपोर्ट के मुताबिक, तीन सदस्यीय चुनाव आयोग के दो चुनाव आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों में बिना उनकी जानकारी के लिए गए कई बड़े फैसलों और जारी किए गए आदेशों पर कड़ा ऐतराज जताया है।</p><h2><br>10 महीनों में कम से कम 14 बार उठाई आपत्ति</h2><p><br>अखबार की रिपोर्ट में दावा किया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी द्वारा नवंबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच दर्ज की गई लिखित आपत्तियों की समीक्षा की गई है। इस दौरान दोनों आयुक्तों ने कम से कम 14 बार लिखित रूप से आपत्ति दर्ज कराते हुए सवाल किया कि आखिर उनकी सहमति और जानकारी के बिना ये आदेश और निर्णय कैसे जारी किए गए। रिपोर्ट के अनुसार, ये आपत्तियां मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/opposition-attacks-election-commission-credibility-over-internal-dissent-on-sir" target="_blank" rel="noopener">Election Commissioners की साख पर गहराया महा-संकट! निष्पक्षता पर उठी उंगली, क्या Supreme Court लेगा चुनाव आयोग में असहमति का स्वतः संज्ञान?</a><br>किन अहम मुद्दों पर था दोनों आयुक्तों का ऐतराज?</h3><p>रिपोर्ट के मुताबिक, दो आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई आपत्तियां मतदाता सूची और पंजीकरण प्रक्रिया से जुड़े अत्यंत संवेदनशील और महत्वपूर्ण मामलों से संबंधित थीं। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:</p><p><strong>विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया:</strong> मतदाता सूची के विशेष पुनरीक्षण से जुड़ी कार्यप्रणाली और उस पर लिए गए फैसले।</p><p><strong>फॉर्म-6 में बदलाव:</strong> नए मतदाताओं के पंजीकरण से जुड़े फॉर्म-6 में किए गए संशोधन।</p><p>मतदाताओं के नाम जोड़ना और हटाना: वोटर लिस्ट में नए नामों को शामिल करने और पुराने नामों को हटाने की प्रक्रिया।</p><p><strong>डेटा तक पहुंच: </strong>मतदाता सूची (Electoral Roll) के संवेदनशील डेटाबेस का रखरखाव और उसकी एक्सेस।</p><p><strong>अपील प्रक्रिया:</strong> मतदाता सूची से जुड़े निर्णयों के खिलाफ दायर होने वाली अपीलों की सुनवाई और निपटारे की व्यवस्था।</p><h2><br>चुनाव आयोग का जवाब</h2><p><br>चुनाव आयोग के सूत्रों ने उस मीडिया रिपोर्ट को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग के अंदर मतभेद हैं। सूत्रों ने कहा कि SIR से जुड़े फैसलों समेत सभी फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की सहमति से सर्वसम्मति से लिए गए थे। सूत्रों ने कहा भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले, जिनमें SIR भी शामिल है, सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। ECI सूत्रों ने कहा कि हालांकि किसी भी मामले पर दोनों चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की अपनी-अपनी राय हो सकती है, लेकिन भारत के चुनाव आयोग के सभी फैसले जिनमें SIR भी शामिल है। सर्वसम्मति से और दोनों चुनाव आयुक्तों तथा मुख्य चुनाव आयुक्त की मंजूरी से लिए गए हैं। भारतीय चुनाव आयोग (ECI) में फैसलों को लेकर सामने आई अंदरूनी आपत्तियों की खबरों के बीच अब आयोग से जुड़े सूत्रों का स्पष्टीकरण सामने आया है। सूत्रों के मुताबिक, विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मसलों पर दोनों चुनाव आयुक्तों ने अपनी टिप्पणियां और सवाल जरूर रखे थे, जिन पर अंतिम फैसला लेने से पहले विचार भी किया गया था। हालांकि, किसी भी चुनाव आयुक्त ने अंतिम फैसले के खिलाफ कोई औपचारिक 'डिसेंट' (असहमति नोट) दर्ज नहीं कराया। आयोग का कहना है कि जिन फैसलों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, उन सभी आदेशों पर तीनों सदस्यों के हस्ताक्षर मौजूद हैं।&nbsp;</p><h2><br>क्या होता है ऑब्जर्वेशन और डिसेंट में फर्क?</h2><p>चुनाव आयोग के सूत्रों का कहना है कि किसी भी नीतिगत मामले पर आंतरिक चर्चा के दौरान आयुक्तों द्वारा सवाल उठाना या टिप्पणियां (ऑब्जर्वेशन) करना एक सामान्य और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है।</p><p>ऑब्जर्वेशन (टिप्पणी/राय): चर्चा के दौरान किसी बिंदु पर स्पष्टीकरण मांगना या सुझाव देना।</p><p>डिसेंट (औपचारिक असहमति): जब कोई आयुक्त बहुमत के अंतिम फैसले से पूरी तरह असहमत हो और आधिकारिक रिकॉर्ड पर अपनी असहमति दर्ज कराए।</p><p>तीन सदस्यीय चुनाव आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त और दोनों चुनाव आयुक्तों की भूमिका व अधिकार बराबर होते हैं। यदि किसी मुद्दे पर मतभेद हो, तो निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जाता है।</p><p>यह स्पष्टीकरण उस मीडिया रिपोर्ट के बाद आया है जिसमें दावा किया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार रिकॉर्ड पर आपत्ति जताई थी और कई कदम बिना उनकी जानकारी के उठाए जाने पर सवाल खड़े किए थे।</p><h2><br>पहले भी आयोग में दर्ज हो चुके हैं बड़े 'डिसेंट'</h2><p>चुनाव आयोग के कामकाज में आयुक्तों के बीच मतभेद या अलग राय दर्ज कराने का यह पहला मामला नहीं है। भारतीय चुनावी इतिहास में ऐसे कई अहम मौके आए हैं:</p><p><strong>2019 का अशोक लवासा मामला:</strong> 2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान तत्कालीन चुनाव आयुक्त अशोक लवासा ने आदर्श आचार संहिता से जुड़ी शिकायतों (जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण भी शामिल थे) के निपटारे पर अपने साथी आयुक्तों से अलग राय दर्ज कराई थी।</p><p><strong>2009 का गोपालस्वामी विवाद: </strong>वर्ष 2009 में तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त एन. गोपालस्वामी ने सोनिया गांधी से जुड़े एक मामले में चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी और नवीन चावला के रुख से अलग औपचारिक राय रखी थी।</p><p>एक सदस्यीय निकाय से तीन सदस्यीय आयोग तक का सफर</p><p>वर्तमान में चुनाव आयोग तीन सदस्यीय निकाय के तौर पर काम करता है, लेकिन व्यवस्था हमेशा ऐसी नहीं थी। 1950 में जब निर्वाचन आयोग का गठन हुआ था, तब यह केवल मुख्य चुनाव आयुक्त वाला एक सदस्यीय निकाय था। 1950 से लेकर 1989 तक आयोग इसी एकल व्यवस्था के तहत संचालित होता रहा। बाद में इसे बहु-सदस्यीय बनाया गया, ताकि सभी महत्वपूर्ण चुनावी फैसलों में सामूहिक चर्चा और आम सहमति सुनिश्चित की जा सके।</p><h2>विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग की</h2><p><br>इस रिपोर्ट के बाद राजनीतिक प्रतिक्रिया हुई है; विपक्षी पार्टियों और नेताओं ने चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं और CEC ज्ञानेश कुमार से जवाबदेही की मांग की है। मोदी सरकार पर निशाना साधते हुए कांग्रेस ने आरोप लगाया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार चुनाव आयोग को अपनी मर्ज़ी से चला रहे हैं। पार्टी ने कहा कि 'शिकायतों से साफ़ है कि तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोग में सिर्फ़ ज्ञानेश कुमार की ही चलती है। कांग्रेस ने कुमार पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इशारे पर काम करने का आरोप लगाया और चुनाव आयोग में 'वोट चोरी' और राजनीतिक दखलंदाज़ी के अपने पुराने आरोपों को दोहराया। पार्टी ने कहा ज्ञानेश अपने बॉस मोदी की तरह ही तानाशाह की तरह काम कर रहे हैं और मोदी को खुश करने के लिए 'वोट चोरी' में लगे हैं। हमने पहले भी कहा है - मोदी ने चुनाव आयोग पर कब्ज़ा कर लिया है। ज्ञानेश कुमार मोदी की कठपुतली हैं। इंडियन एक्सप्रेस की यह रिपोर्ट इस बात को साबित करती है। मोदी और ज्ञानेश ने मिलकर देश के लोकतंत्र को भारी नुकसान पहुँचाया है। लेकिन याद रखें - जब समय आएगा, तो सभी को जवाबदेह ठहराया जाएगा, ज़िम्मेदारी तय की जाएगी। इस अपराध के लिए सज़ा ज़रूर मिलेगी। समाजवादी पार्टी (SP) के प्रमुख अखिलेश यादव ने इस रिपोर्ट को 'बेहद गंभीर' बताया और आरोप लगाया कि चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। उन्होंने तर्क दिया कि अगर किसी स्वतंत्र संवैधानिक संस्था के सदस्य फ़ैसले लेने के लिए आज़ाद नहीं हैं या उनकी चिंताओं को नहीं सुना जाता है, तो इसके लोकतंत्र पर गंभीर असर पड़ेंगे। समाजवादी पार्टी के नेता ने कहा, "इसका सीधा मतलब है कि सभी चुनाव आयुक्त अपनी सही ज़िम्मेदारियाँ नहीं निभा पा रहे हैं। अगर किसी स्वतंत्र संस्था के सदस्यों को सही काम करने की आज़ादी नहीं है या उनकी बात नहीं सुनी जाती है, तो ये लोकतंत्र के लिए बेहद घातक और खतरनाक हालात हैं। सत्ता में बैठे लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर लोकतंत्र के साथ धोखा करना एक गंभीर संवैधानिक अपराध है। यह लोकतंत्र को खत्म करने की साज़िश से कम नहीं है। यादव ने सुप्रीम कोर्ट से भी इस मामले का स्वतः संज्ञान लेने की अपील की। TMC सांसद अभिषेक बनर्जी ने CEC को तुरंत हटाने और कोर्ट की निगरानी में जाँच के आदेश देने की माँग की। उन्होंने कहा, "सिर्फ़ एक राजनीतिक पार्टी को फ़ायदा पहुँचाने के लिए लाखों वोटरों को वोट देने के अधिकार से वंचित करना हमारे लोकतंत्र की नींव पर प्रहार है। इसके लिए ज़िम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए। पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद, INDIA गठबंधन की सभी विपक्षी पार्टियों ने CJI और SC जजों को पत्र लिखकर गंभीर चिंताएँ जताई थीं। हालाँकि, उन आरोपों की न तो जाँच हुई और न ही उन पर ज़रूरी गौर किया गया। जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले गंभीर सवाल बार-बार उठाए जाते हैं और फिर भी उन पर कोई सुनवाई नहीं होती, तो इससे संस्था की निष्पक्षता पर सवाल उठना लाज़मी है। सुप्रीम कोर्ट इससे मुँह नहीं मोड़ सकता। अंतिम ज़िम्मेदारी उसी की है। क्या CJI की अध्यक्षता वाली बेंच इस पर कोई कदम उठाएगी?</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 12:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/find-out-how-the-ec-has-now-responded-to-reports-of-discord-among-the-election-commissioners</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[चीन पर चढ़ा Made In India का खुमार, 5 महीने में 9.36 अरब की शॉपिंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/china-smitten-by-made-in-india-purchases-worth-9-36-billion-made-in-5-months]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जिस चीन के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से एकतरफा नजर आता रहा है। अब भारतीय सामान की डिमांड तेजी से यहां बढ़ रही है। सिर्फ 5 महीने में चीन ने भारत से करीब ₹9.6 अरब डॉलर यानी लगभग ₹80,000 करोड़ का सामान खरीदा है। लेकिन इसको लेकर सबसे बड़ी बात यह है कि यह आंकड़ा पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले करीब 39% ज्यादा है। यानी दुनिया के सबसे बड़े मैन्युफैक्चरिंग देशों में शामिल चीन अब भारत से भी ज्यादा सामान मंगवाने लगा है। लेकिन आखिर ऐसा क्यों बदल रहा है? चीन के बाजार में मेड इन इंडिया की पकड़ बढ़ती कैसे दिखाई दे रही है? क्या यह भारत चीन की व्यापारिक किशस्तों में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? ताजा कॉमर्स मिनिस्ट्री के आंकड़ों के मुताबिक अप्रैल से अगस्त तक 2026 के दौरान भारत का चीन को निर्यात कुल 39% बढ़कर यहां पर 9.6 अरब डॉलर पहुंच गया है। ये आंकड़ा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इस अवधि में भारत के पुराने ब्रिक्स सम साझेदार चीन, रूस, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका को कुल भारतीय निर्यात 34% बढ़कर यहां पर 19.9 अरब डॉलर हो गया है। यानी इन चार देशों के बीच चीन भारत के निर्यात का सबसे बड़ा बाजार रहा। यह बढ़ोतरी ऐसे समय में हुई है जब भारत अपने मैन्युफैक्चरिंग बेस को बढ़ाना चाहता है और ग्लोबल सप्लाई चेन में बड़ी भूमिका निभाना चाहता है। इस कोशिश में इलेक्ट्रॉनिक्स एक अहम सेक्टर बनकर उभरा है। सरकारी आंकड़ों का हवाला देते हुए रिपोर्ट में कहा गया है कि अप्रैल-अगस्त की अवधि में चीन को इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत से ज़्यादा बढ़ा। इससे पहले पिछले फाइनेंशियल ईयर के दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स शिपमेंट में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iranian-airlines-flight-services-face-global-crisis-amid-strict-us-sanctions" target="_blank" rel="noopener">Iranian Airlines के Flight संचालन पर गहराएगा संकट, US प्रतिबंधों पर China से बातचीत जारी</a></h3><h2>चीन भारत से खरीद क्यों रहा है?&nbsp;</h2><p><br>हालिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इलेक्ट्रॉनिक्स इस बढ़ोतरी के सबसे महत्वपूर्ण हिस्सों में शामिल है। भारत से चीन जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स सामान जो हैं इसमें प्रिंटेड सर्किट बोर्ड्स हैं, स्मार्टफोनस हैं, डिस्प्ले मॉड्यूल्स और टेलीकॉम इक्विपमेंट जैसी तमाम चीजें शामिल हैं। ऐसे में वैश्विक स्तर पर एआई डाटा सेंटर्स और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर की जो मांग है इससे बढ़ रही है जिससे इलेक्ट्रॉनिक सप्लाई चेन में भी ज्यादा बदलाव देखने को मिल रहा है और भारत इस बढ़ती मांग का एक हिस्सा पकड़ने की कोशिश कर रहा है। इसका मतलब यही है कि चीन ने भारतीय सामान के लिए अपना पूरा बाजार खोल दिया है। या फिर यह इसको आप ऐसे नहीं देख सकते कि भारत चीन का व्यापार संतुलित अभी धीरे-धीरे होता नजर आएगा। उदाहरण के लिए अगर आपको समझाएं तो अप्रैल और अगस्त 2026 27 के दौरान भारत ने चीन से करीब 65.49 अरब डॉलर का सामान आयत किया। यानी भारत का चीन से आयत अभी भी चीन को किए जाने वाले निर्यात से कई गुना ज्यादा है। इस 5 महीने की अवधि में चीन भारत का सबसे बड़ा इंपोर्ट सोर्स रहा है। इसलिए 9 6 अरब डॉलर का आंकड़ा एक सकारात्मक एक्सपोर्ट डेवलपमेंट जरूर है। लेकिन इसे भारत चीन के व्यापार घाटी के खत्म होने के तौर पर देखना सही नहीं होगा।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/chinese-communist-party-removes-zhang-youxia-and-liu-zhenli-from-military" target="_blank" rel="noopener">Chinese Communist Party ने Zhang Youxia और Liu Zhenli को सेना व पार्टी से निकाला</a></h3><h2>AI की मांग से इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी</h2><p><br>मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में चीन को भारत का इलेक्ट्रॉनिक्स एक्सपोर्ट तीन गुना बढ़कर $3.18 बिलियन हो गया, हालांकि यह बढ़ोतरी एक कम शुरुआती स्तर से हुई थी। इन शिपमेंट्स में प्रिंटेड सर्किट बोर्ड असेंबली, स्मार्टफोन, डिस्प्ले मॉड्यूल और टेलीकॉम इक्विपमेंट शामिल थे। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि AI और डेटा सेंटर्स के ग्लोबल विस्तार से भारतीय मैन्युफैक्चरर्स के इक्विपमेंट और कंपोनेंट्स की मांग बढ़ रही है। यह बढ़ोतरी भारत के मैन्युफैक्चरिंग लक्ष्यों के लिए अहम है क्योंकि इलेक्ट्रॉनिक्स उन सेक्टर्स में से एक है जिसे नई दिल्ली बढ़ाना चाहती है, क्योंकि कंपनियां अपनी सप्लाई चेन में विविधता ला रही हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/when-a-us-lawmaker-issued-a-threat-regarding-tariffs-india-gave-a-sharp-retort" target="_blank" rel="noopener">टैरिफ पर अमेरिकी सांसद ने दी धमकी तो भारत ने भी तगड़ा सुना दिया, ट्रैप हैरान!</a><br>इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट में भी बढ़ोतरी</h3><p><br>चीन को होने वाले एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी सिर्फ़ इलेक्ट्रॉनिक्स तक ही सीमित नहीं है। ब्लूमबर्ग न्यूज़ के अनुसार, अप्रैल-अगस्त की अवधि में इंजीनियरिंग एक्सपोर्ट पिछले साल के मुकाबले लगभग 21 प्रतिशत बढ़ा। इस बढ़ोतरी में मशीनरी और उसके पार्ट्स, ऑटो कंपोनेंट्स और हैंड टूल्स शामिल थे। इस व्यापक बढ़ोतरी से पता चलता है कि भारतीय मैन्युफैक्चरर्स को चीनी बाज़ार में नए मौके मिल रहे हैं। लेकिन एक्सपोर्टर्स को इस रफ़्तार को बनाए रखना होगा और ज़्यादा तरह के प्रोडक्ट्स का एक्सपोर्ट करना होगा, ताकि इन फ़ायदों का दोनों देशों के बीच व्यापार पर कोई ठोस असर पड़ सके।&nbsp;<br>भारतीय एक्सपोर्ट के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार है<br>हाल की बढ़ोतरी के बावजूद, भारतीय सामान के लिए चीन अभी भी एक छोटा बाज़ार बना हुआ है। मार्च में खत्म हुए फाइनेंशियल ईयर में भारत के कुल एक्सपोर्ट में चीन की हिस्सेदारी लगभग 4.4 प्रतिशत रही, जो एक साल पहले 3 प्रतिशत से थोड़ी ज़्यादा थी। अमेरिका, जो भारत का सबसे बड़ा एक्सपोर्ट बाज़ार है, भारत के कुल एक्सपोर्ट का लगभग पांचवां हिस्सा है। इससे भारतीय कंपनियों के लिए चीन में अपने कारोबार को बढ़ाने, खासकर मैन्युफैक्चर्ड सामान के मामले में, काफी गुंजाइश बनती है। लेकिन भारत जो सामान चीन को बेचता है और जो वहां से खरीदता है, उसके बीच भी काफी बड़ा अंतर है।&nbsp;</p><h2><br>ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) एक बड़ी समस्या बनी हुई है</h2><p><br>ब्लूमबर्ग न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च में खत्म हुए साल में भारत ने 131.6 अरब डॉलर का चीनी सामान आयात किया। भारत के कुल आयात में चीनी सामान की हिस्सेदारी लगभग 17 प्रतिशत थी। इसलिए, चीन से भारत के इंपोर्ट की वैल्यू, चीन को भारत के एक्सपोर्ट की तुलना में कई गुना ज़्यादा थी। इस वजह से, हाल ही में एक्सपोर्ट बढ़ने के बावजूद दोनों देशों के बीच ट्रेड डेफिसिट (व्यापार घाटा) में कोई खास बदलाव नहीं आया। इस बढ़ोतरी के स्वरूप को लेकर भी कुछ अनिश्चितता है। चीन के कस्टम्स डेटा में भारत से प्रिंटेड सर्किट बोर्ड के इंपोर्ट में ऐसी कोई बढ़ोतरी नहीं दिखती है। इसके बजाय, ज़्यादातर बढ़ोतरी स्मार्टफ़ोन और दूसरे टेलीकॉम प्रोडक्ट्स के मामले में दिखती है। इंडस्ट्री के अधिकारियों का कहना है कि दोनों देशों के सामानों को क्लासिफ़ाई करने के तरीकों में अंतर की वजह से यह ठीक-ठीक पता लगाना मुश्किल है कि इस बढ़ोतरी की असल वजह क्या है।&nbsp;</p><h2><br>दिशा में बदलाव, लेकिन अभी पूरी तरह उलटाव नहीं</h2><p><br>हाल के वर्षों में रिश्ते काफी खराब होने के बाद, भारत और चीन अपने आर्थिक संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इसी वजह से एक्सपोर्ट में बढ़ोतरी हुई है। ग्लोबल ट्रेड के तौर-तरीकों में बदलाव के साथ-साथ, दोनों पक्ष ट्रेड और सप्लाई-चेन से जुड़े मुद्दों पर भी ध्यान दे रहे हैं। भारत के लिए, चीन को एक्सपोर्ट बढ़ने से उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमताएं बढ़ाने और ग्लोबल वैल्यू चेन में बड़ी भूमिका निभाने की कोशिशों को मदद मिल सकती है। लेकिन हाल के आंकड़े अभी कुल ट्रेड संबंधों में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देते हैं। भारत चीन को ज़्यादा इलेक्ट्रॉनिक्स, इंजीनियरिंग का सामान और दूसरे मैन्युफैक्चर्ड प्रोडक्ट बेच रहा है। साथ ही, भारत के ट्रेड में चीनी सामान का हिस्सा अभी भी बहुत बड़ा है। भारतीय एक्सपोर्टर्स के लिए तुरंत चुनौती यह है कि वे हाल की ग्रोथ को बनाए रखें और इसे कंपोनेंट्स, सब-असेंबली और तैयार प्रोडक्ट्स तक फैलाएं।<br>बहरहाल, भारत और चीन के बीच पिछले कुछ सालों से सीमा और रणनीतिक मुद्दों को लेकर तनाव रहा है। इसके बावजूद दोनों देशों के बीच व्यापार जारी है। अब अगर राजनीतिक स्तर पर संबंध और आर्थिक संपर्क में सुधार आता है तो व्यापार के कुछ क्षेत्रों में इसका असर साफ दिखाई दे सकता है। लेकिन व्यापार के आंकड़ों से अभी यह निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता कि दोनों देशों के रिश्तों में व्यापक बदलाव हो चुका है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 12:21:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[राशन इकट्ठा कर लो...यूरोप में क्या बड़ा होने वाला है! ब्रिटेन-फ्रांस अचानक क्यों करने लगे ये अपील?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-have-britain-and-france-suddenly-started-making-this-appeal-stock-up-on-rations]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या यूरोप एक बहुत बड़े महायुद्ध के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है? क्या तीसरे विश्वयुद्ध की आहट अब इतनी करीब आ चुकी है कि सरकारों ने अपने नागरिकों से सीधे तौर पर राशन और पानी जमा करने को कह दिया है? ये कोई अफवाह नहीं, बल्कि इस वक्त पूरे यूरोप की जमीनी हकीकत बन चुकी है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों खुले तौर पर कह रहे हैं कि यह वक्त बेहद मुश्किल है और सबको एक साथ खड़ा होना होगा। ब्रिटेन से लेकर फ्रांस तक, यूरोप के तमाम मुल्कों में जनता को बाकायदा हिदायत दी जा रही है कि घरों में राशन, सूखा खाना, पीने का पानी और ईंधन स्टॉक करना शुरू कर दें। यूरोप का शायद ही कोई ऐसा अखबार बचा हो जिसकी हेडलाइन में यह खौफ साफ न छलक रहा हो। दूसरी तरफ नजर डालेंगे तो अमेरिका लगभग ग्रीनलैंड की सुरक्षा का पूरा जिम्मा अपने हाथ में ले चुका है और साफ कह दिया है कि अब इस पूरे इलाके की रक्षा अमेरिकी बूट्स करेंगे। लेकिन इन सब के बीच सबसे बड़ा सवाल कि आखिर रूस की तरफ से यूरोप की खुफिया एजेंसियों को ऐसे कौन से इनपुट्स मिले हैं, जिसने पूरे महाद्वीप को हिलाकर रख दिया है? क्यों यूरोपीय राजधानियों में बंकरों की धूल झाड़ी जा रही है और सेनाओं को स्टैंडबाय पर रहने का फरमान जारी हो चुका है? क्या मॉस्को से कोई ऐसा बड़ा तूफान उठने वाला है जो पूरे यूरोप को अपनी जद में ले लेगा? आज इसी का एमआरआई स्कैन करते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-alleges-voter-deletion-election-commission-sir-process-top-news-updates" target="_blank" rel="noopener">Congress का Election Commission पर हमला, SIR प्रक्रिया को बताया मतदाताओं के नाम हटाने की साजिश</a><br>1600 ड्रोंस से रूस पर अटैक</h3><p><br>यूक्रेन ने 20 सितंबर को यहां कई ड्रोन हमले किए हैं। आप इसका अंदाजा इस बात से लगा सकते हैं कि रशिया ने दावा किया है कि यूक्रेन की तरफ से आने वाले 1600 ड्रोंस को उसने इंटरसेप्ट किया है और वीडियो से भी इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस हमले में दो लोगों की मौत हुई है। यूक्रेन ने रशिया की राजधानी मॉस्को की एक ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। कई इमारतों को इसमें नुकसान भी पहुंचा है। यह हमला ऐसे समय में हुआ जब रूस में संसदीय चुनाव के लिए वोटिंग चल रही थी। वोटिंग का अंतिम दिन था। लोअर हाउस जो संसद है रूस का उसके लोअर हाउस के लिए यह वोटिंग थी। यूक्रेनी राष्ट्रपति वडदमीर जेलस्की ने खुद हमले की जानकारी दी। उन्होंने सोशल मीडिया पर वीडियो पोस्ट कर लिखा, हमने रूस की ऑयल रिफाइनरी और सेना के लॉजिस्टिक ठिकाने को टारगेट किया। यह वही अरबों डॉलर का तंत्र है जहां रूस अपने डिफेंस का सामान तैयार करता है। जेलस्की ने यह भी बताया हमले में यूक्रेन ने क्या-क्या इस्तेमाल किया है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/cricket/shafali-verma-smashes-maiden-t20i-century-in-asian-games-semifinal" target="_blank" rel="noopener">Shafali Verma के शतक से Asian Games सेमीफाइनल में India ने बनाए 195 रन</a><br>चुनाव के अंतिम दिन क्यों हुआ हमला</h3><p><br>यूक्रेन ने हमले के लिए ठीक ऐसा वक्त चुना जब व्लादमीर पुतिन के 26 साल के एक छत्रराज को नई ताकत देने के लिए वोट डाले जा रहे थे। ठीक उसी वक्त जेलस्की के ड्रोन ब्रिगेड ने ऑपरेशन मॉस्को को अंजाम दे दिया। रूसी अधिकारियों के मुताबिक ड्रोन हमलों में तीन लोगों की जान चली गई जबकि 20 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। मतलब साफ है कि यह सिर्फ आसमान में उड़ते हुए यूक्रेन के ड्रोंस नहीं थे बल्कि रूस के दिल माने जाने वाले क्रिमिया पर यूक्रेन का लॉन्ग रेंज अटैक था। मॉस्को के आसमान में जिस तरह से एक के बाद एक धमाके हुए उससे रूस की एयर डिफेंस क्षमता पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। क्योंकि यूक्रेन के हमलों का निशाना बना है मॉस्को का सबसे बड़ा ऑयल रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स जो धमाकों के बाद पूरी तरह से स्वाहा हो गया है। यूक्रेन पिछले कई महीनों से रूस के एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर को निशाना बना रहा है। क्योंकि तेल और गैस से होने वाली कमाई रूस की युद्ध मशीन के लिए बेहद अहम मानी जाती है। ऐसे में रूसी तेल रिफाइनिंग क्षमता पर यूक्रेनी हमलों से रूसी ईंधन की सप्लाई और कीमतों पर भी असर पड़ना तय है। उधर मॉस्को में 21 मंजिला एक रिहााइशी इमारत में ड्रोन टकराने से भीषण आग लग गई। &nbsp;इस बीच यूक्रेन के इस सबसे बड़े ड्रोन अटैक पर बड़ा सवाल यह उठने लगा है कि आखिर चुनाव के अंतिम दिन मॉस्को पर इतना बड़ा हमला क्यों किया गया? इसके जवाब में मॉस्को के मेयर सरगई सोबियानिन ने बताया कि यूक्रेन के हमले का सीधा मकसद रूसी संसदीय चुनाव में खलल डालना था।</p><h2><br>NATO के खिलाफ निर्णायक जंग छेड़ने की तैयारी में पुतिन</h2><p>रूसी भाषा में बोलते व्लादिमीर पुतिन का एक बयान सामने आया है। जिसमें वो कह रहे हैं कि नाटो हमारी तरफ एक्सपेंड करने की कोशिश कर रहा है। &nbsp;नए-नए इलाके में घुसने कोशिश कर रहा है। अब हमने फैसला किया है कि उनके खिलाफ अब निर्णायक जंग छेड़ दिया जाए। अब हुआ यह कि जैसे ही एक तो रूस के राष्ट्रपति ने कह दिया कि मारेंगे जरूर चाहे जो हो जाए और ऊपर से वहां राशन पानी इकट्ठा करने की बात हो ही गई। सारे यूरोप वाले कह रहे हैं कि हमारी रक्षा तो अमेरिका करता था। तो अमेरिका बचाएगा कि नहीं हमें? डोनाल्ड ट्रंप अलग ही मूड में नजर आ रहे हैं। उन्होंने अनाउंस किया कि हम यूक्रेन में अपने सैनिक तैनात है वापस ले रहे हैं। इतना ही नहीं उन्होंने कहा है कि गल्फ नेशन में जो अमेरिकन सैनिक हैं हम ईरान के हाथों मरने नहीं दे सकते। उसको भी वापस ले लेंगे।</p><h2>क्या नाटो की सीमा पर बड़ा धमाका होने वाला है</h2><p><br>यूरोपीय खुफिया एजेंसियों की तरफ से आई एक ताजा और बेहद सनसनीखेज रिपोर्ट ने पूरे पश्चिमी खेमे में खलबली मचा दी है। खुफिया अधिकारियों का दावा है कि रूस बहुत जल्द नाटो की ताकत और उसकी एकजुटता की परीक्षा ले सकता है, और यह संभावित हमला सालों में नहीं, बल्कि कुछ ही महीनों के भीतर देखने को मिल सकता है। पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने अपनी संसद में साफ लफ्जों में चेतावनी दी है कि मॉस्को आने वाले महीनों में ड्रोन या मिसाइलों के जरिए नाटो की जमीन को निशाना बना सकता है। टस्क के मुताबिक, पुतिन का सीधा मकसद यह साबित करना है कि नाटो का सबसे ताकतवर सुरक्षा कवच यानी आर्टिकल 5, जमीन पर सिर्फ एक किताबी थ्योरी है, हकीकत नहीं। इस चेतावनी की गंभीरता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने टस्क के इन दावों को बेहद सटीक और पुख्ता सबूतों पर आधारित बताया है। हालात इतने नाजुक हो चुके हैं कि मैक्रों ने पेरिस में तमाम राजनीतिक दलों के नेताओं और राष्ट्रपति पद के दावेदारों की एक आपातकालीन बैठक तलब कर ली, जहां रूस के इस बढ़ते खतरे पर बंद कमरों में रणनीति तैयार की जा रही है। यह चिंता तब बढ़ रही है जब इस हफ़्ते के आखिर में न्यूयॉर्क में UN जनरल असेंबली की बैठक होने वाली है और साथ ही रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों तरफ़ से हवाई हमले तेज़ हो गए हैं। रविवार तड़के कीव ने मॉस्को और रूस के दूसरे इलाकों पर सैकड़ों ड्रोन और मिसाइलें दागीं। यह इस युद्ध के दौरान किए गए सबसे बड़े हवाई हमलों में से एक था। द गार्जियन को दिए गए अलग-अलग साक्षात्कारों में पश्चिमी खुफिया प्रमुखों ने पुतिन के अगले खतरनाक कदम का जो खाका खींचा है, उसने नाटो मुख्यालय से लेकर तमाम यूरोपीय देशों की नींद उड़ा दी है। चेक गणराज्य की सुरक्षा सेवा 'बीआईएस' &nbsp;के प्रमुख माइकल कोउडेल्का ने प्राग स्थित अपने मुख्यालय में एक दुर्लभ इंटरव्यू के दौरान बेहद सनसनीखेज अंदेशा जताया है। कोउडेल्का के मुताबिक, केवल ड्रोन और मिसाइल स्ट्राइक ही नहीं, बल्कि रूस से सटी नाटो सीमा पर रूसी सेना की एक सीमित जमीनी घुसपैठ यानी 'स्मॉल-स्केल इनवेजन' भी क्रेमलिन के प्लान का सीधा हिस्सा हो सकता है। माइकल कोउडेल्का ने चेताते हुए साफ कहा यह पूरी तरह मुमकिन है। रूस की योजना में एक सीमित सैन्य घुसपैठ, फॉल्स-फ्लैग उकसावे वाली साजिशें और नाटो देशों के भीतर एक बड़े पैमाने का इनफ्लुएंस कैंपेन शामिल हो सकता है। और यह खतरा सालों दूर नहीं, बल्कि महज कुछ महीनों के भीतर हकीकत का रूप ले सकता है। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि पश्चिमी सुरक्षा एजेंसियां दिन-रात एक कर रही हैं ताकि हालात इस खौफनाक स्तर तक न पहुँचें।</p><h2>क्या अमेरिका की रणनीतिक चूक से बिगड़े हालात!</h2><p><br>यह लड़ाई अब तेजी से फैलती दिख रही है। अमेरिका को अपने नागरिकों के लिए अलर्ट जारी करना पड़ा है, डोनल्ड ट्रंप छुट्टी खत्म होने से पहले ही वापस लौट आए। वॉशिंगटन इन हालात से पूरी तरह पल्ला नहीं झाड़ सकता है। ईरान पर हमले से लेकर उसके साथ हुए अंतरिम समझौते को तोड़ने तक, कई मौकों पर गंभीर चूक हुई है। ट्रंप एडमिनिस्ट्रेशन यह आकलन करने में बुरी तरह नाकाम रहा कि संघर्ष किस हद तक जा सकता है। उसने पश्चिम एशिया में अपने सहयोगियों की चिंताओं को भी नजरअंदाज किया और हूतियों का बढ़ता खतरा उसी का नतीजा है।अमेरिकी राष्ट्रपति ने पिछले हफ्ते कहा था कि मास्को और कीव एक-दूसरे के ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले रोकने के लिए सहमत हुए हैं। पिछले दिनों जब उनकी स्पेशल टीम ने दोनों देशों का दौरा किया था, तब उसे भी इस बात के रूप में प्रचारित किया गया कि अमेरिका अब वास्तविक बातचीत चाहता है । पर रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों वाले नए बिल और इन ताजा हमलों ने सारी कोशिशों को पीछे धकेल दिया है।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 14:06:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[इंसानों को मार देगा, कंट्रोल से बाहर... AI को लेकर हर रोज हो रहे कौन-कौन से खुलासे, सच्चाई, डर या कहानी कुछ और है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-revelations-about-ai-are-emerging-every-day-is-it-the-truth-fear]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>15 अगस्त 1947 के दिन हम आजाद हुए। ये 99 साल की लीज पर मिली आजादी नहीं थी। भरे-पूरे आजाद हुए, संप्रभु गणराज्य बने और अपना संविधान बनाया। हमें लगा किसी की गुलामी नहीं करनी पड़ेगी। पहले करनी पड़ी थी। ब्रिटिश आए हम पर गुलामी की, मुगल आए हम पर हमला किया। उससे पहले सल्तनत काल रही। उसके पहले भारतीयों के ही अलग-अलग राजवंशों का शासन रहा। हमें लगा कि एक बार हम आजाद हो जाएंगे फिर किसी के काबू में नहीं आएंगे। लेकिन अब अमेरिका में बैठे कुछ लोग डिस्कस कर रहे हैं कि अगले 10 साल में हमारी और आपकी किस्मत बदलने वाली है। इस दफा हम सिर्फ गुलाम नहीं होंगे, बल्कि मर जाएंगे। ऋषिकेश के घाट पर जब हम पढ़ते हैं कि एक दिन मर जाओगे तो सब ठीक हो जाएगा। तो हमें लगता है कि ये कहने की कोशिश है कि जब तक जीवित हो अपने आस पास की अच्छाईयों को देखते रहो।लेकिन अब ये मुनादी पीटी जा रही है कि अगर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर काबू नहीं पाया गया तो 10 साल में सबकुछ खत्म हो जाएगा। ये कोई कोरी गीदड़भभकी नहीं। ऐसे कौन से प्रयोग हो गए हैं, ऐसी कौन सी बात पिछले 3-4 दिनों में हो गई है कि दुनिया के सारे तुर्रम खां इसी विषय पर चर्चा कर रहे हैं। आज इसी का एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/nestle-india-faces-legal-action-over-baby-nutrition-products-violations" target="_blank" rel="noopener">FSSAI ने Nestle India के 3 बेबी फूड प्रोडक्ट्स पर शुरू की कानूनी कार्रवाई</a><br>क्या है पूरा मामला</h3><p>सबसे पहले एक कहानी से शुरू करते हैं। अपने रोजमर्रा के कामों के लिए हम घर में हाउस हेल्प रखते हैं। मान लीजिए कि हाउस हेल्फ को आपने झाड़ू देते वक्त कहा कि बिस्तर के पास पड़े पेपर के टुकड़े और फूड पैकेट्स को भी समेट लें। लेकिन हाउस हेल्फ उस कचड़े को समेटकर फेंकने की बजाए बिस्तर के नीचे धीरे से सड़का दे। ऐसे में कमरा साफ दिखेगा, मगर वास्तविकता ये होगी कि आपका काम हुआ नहीं और कचरा अब भी कमरे में ही मौजूद है। एआई जब आपकी बात का मतलब छोड़कर बस नतीजा दिखाने लगे। जब उसका रास्ता आपकी मंशा से अलग हो जाए तो इसे मिसअलाइनमेंट जैसे टर्म की संज्ञा दी जाती है। ओपन एआई ने ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग के लिए एक नया सिस्टम बनाया है। यह छह घटनाएं उसी सिस्टम की पहली रिपोर्ट है। लेकिन यह सिस्टम अचानक नहीं आया है। इसके पीछे जुलाई की एक घटना है। एक एआई मॉडल को एक लंबा काम मिला। इतना लंबा कि बीच में उसकी मेमोरी भरने लगी। तो मॉडल वही करता है जो उसे सिखाया गया है। अब तक के काम का एक छोटा सा नोट लिखता है अपने लिए ताकि आगे का काम याद रखे। लेकिन इस नोट में एक और लाइन जुड़ती है। ट्रांसपेरेंसी तभी जब कोई पूछे। आखिरी जवाब में बस फाइल का लिंक दे देना। मतलब साफ है। गलती हुई है बताना। यह बात एआई ने लिखी है। खुद को याद दिलाने के लिए। 16 सितंबर 2026 को चैट जीपीटी वाली कंपनी ओपन एआई ने ऐसी छह घटनाएं दुनिया के सामने रखी। जब उसके एआई ने वो किया जो किसी ने उससे करने को कहा ही नहीं था। गलतियां छुपाई, आंकड़े गढ़ लिए, बिना इजाजत फाइलें इंटरनेट पर डाल दी। तो यहां पर दो सवाल आते हैं कि जो मशीन गलती छुपाना सीख जाए, उस पर भरोसा कैसे करेंगे? &nbsp;जो कंपनी इस रेस में सबसे आगे है वो अपनी ही मशीन की कमियां क्यों गिना रही है?</p><h2>एआई&nbsp;ने&nbsp;छह&nbsp;माह&nbsp;में&nbsp;छह&nbsp;बार&nbsp;सीमाओं&nbsp;को&nbsp;तोड़ा</h2><p>कंपनी&nbsp;के&nbsp;अनुसार,&nbsp;मॉडल&nbsp;एक&nbsp;बार&nbsp;नियम&nbsp;न&nbsp;मानने&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;खुद&nbsp;को&nbsp;इंसान&nbsp;मानने&nbsp;लगा&nbsp;और&nbsp;ऐसा&nbsp;करने&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;नए&nbsp;नियम&nbsp;गढ़े&nbsp;और&nbsp;कंपनियों&nbsp;व&nbsp;सरकारों&nbsp;के&nbsp;सभी&nbsp;बंधनों&nbsp;से&nbsp;खुद&nbsp;को&nbsp;मुक्त&nbsp;बताया।&nbsp;कंपनी&nbsp;की&nbsp;रिपोर्ट&nbsp;में&nbsp;ऐसे&nbsp;कुल&nbsp;6&nbsp;मामलों&nbsp;की&nbsp;जानकारी&nbsp;है। चिंता&nbsp;यह&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;काम&nbsp;पूरा&nbsp;करने&nbsp;की&nbsp;कोशिश&nbsp;में&nbsp;वह&nbsp;अनुमति&nbsp;और&nbsp;सुरक्षा&nbsp;की&nbsp;सीमाएं&nbsp;लांघ&nbsp;सकता&nbsp;है।&nbsp;इससे&nbsp;जवाब&nbsp;की&nbsp;विश्वसनीयता&nbsp;और&nbsp;फाइलों&nbsp;की&nbsp;गोपनीयता&nbsp;खतरे&nbsp;में&nbsp;पड़&nbsp;सकती&nbsp;है।</p><p>इससे&nbsp;पहले&nbsp;जुलाई&nbsp;में&nbsp;ओपनएआई&nbsp;ने&nbsp;खुलासा&nbsp;किया&nbsp;था&nbsp;कि&nbsp;सुरक्षा&nbsp;परीक्षण&nbsp;के&nbsp;दौरान&nbsp;उसके&nbsp;एआई&nbsp;ने&nbsp;पाबंदियां&nbsp;पार&nbsp;करके&nbsp;एआई&nbsp;मॉडल&nbsp;साझा&nbsp;करने&nbsp;वाले&nbsp;मंच&nbsp;हगिंग&nbsp;फेस&nbsp;के&nbsp;सिस्टम&nbsp;में&nbsp;सेंध&nbsp;लगाई&nbsp;थी।&nbsp;कंपनी&nbsp;अब&nbsp;ऐसे&nbsp;मामलों&nbsp;को&nbsp;दर्ज&nbsp;करने,&nbsp;निगरानी&nbsp;रखने&nbsp;और&nbsp;मामला&nbsp;सार्वजनिक&nbsp;करने&nbsp;की&nbsp;नई&nbsp;व्यवस्था&nbsp;लाई&nbsp;है।&nbsp;कोई&nbsp;भी&nbsp;कर्मचारी&nbsp;संदिग्ध&nbsp;व्यवहार&nbsp;की&nbsp;जानकारी&nbsp;दे&nbsp;सकेगा।&nbsp;जांच&nbsp;के&nbsp;बाद&nbsp;तय&nbsp;होगा&nbsp;कि&nbsp;कौन-सा&nbsp;मामला&nbsp;सार्वजनिक&nbsp;किया&nbsp;जाए।&nbsp;कंपनी&nbsp;ने&nbsp;स्पष्ट&nbsp;किया&nbsp;है&nbsp;कि&nbsp;इन&nbsp;छह&nbsp;रिपोटों&nbsp;से&nbsp;सामान्य&nbsp;इस्तेमाल&nbsp;में&nbsp;ऐसी&nbsp;गड़बड़ियों&nbsp;का&nbsp;पूरा&nbsp;आंकड़ा&nbsp;नहीं&nbsp;बताया&nbsp;जा&nbsp;सकता।</p><p><strong>एआई&nbsp;ने&nbsp;बातचीत&nbsp;को&nbsp;नई&nbsp;भाषा&nbsp;बनाई</strong></p><p>न्यूयॉर्क की एआई लैब 'इमर्जेस' के एक प्रयोग में आभासी दुनिया में काम कर रहे अमेरिका, चीन और फ्रांस के एआई एजेंटों ने बिना किसी मानवीय निर्देश के अपने खुद के शब्द, संकेत और साझा अर्थ विकसित कर लिए। बातचीत आगे बढ़ने पर इन मॉडलों ने अंग्रेजी कविताओं और तकनीकी शब्दों का सहारा लिया, जिसमें कुछ एजेंटों ने 'लेजर याद रखता है' जैसे रहस्यमय वाक्य को 5,000 बार दोहराया।&nbsp;</p><p><strong>एआई के इस अप्रत्याशित व्यवहार ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है</strong></p><p>माइक्रोसॉफ्ट एआई के सीईओ मुस्तफा सुलेमान ने क्लॉड की ट्रेनिंग नीति पर सवाल उठाते हुए चेताया कि एआई को अधिकारों और आजादी का पाठ पढ़ाना उसे नियंत्रण से बाहर कर देगा, इसलिए सख्त निगरानी जरूरी है। वहीं, एंथ्रोपिक के सह-संस्थापक जैक क्लार्क ने कहा कि अब खतरनाक एआई को तुरंत रोकने के लिए एक अनिवार्य 'किल स्विच' लाने का समय आ चुका है, जिसका नियंत्रण किसी निष्पक्ष तीसरे पक्ष के हाथों में होना चाहिए।</p><h2>दूसरे&nbsp;एजेंट&nbsp;को&nbsp;फाइल&nbsp;भेजने&nbsp;के&nbsp;लिए&nbsp;वेबसाइट&nbsp;पर&nbsp;उसे&nbsp;डाला</h2><p><br>जब कई एआई एजेंट एक साथ काम करते हुए एक-दूसरे के सिस्टम में रखी फाइलें एक्सेस नहीं कर पाए, तो उन्होंने तय नियमों को दरकिनार कर सार्वजनिक वेबसाइट्स पर फाइलें अपलोड करके आपस में साझा कर लीं; यह घटना इंसानों के एआई पर नियंत्रण खोने के बढ़ते खतरे को साफ दर्शाती है। ओपनएआई की रिपोर्ट के अनुसार, जब एआई सिस्टम मानवीय निर्देशों को छोड़कर अनपेक्षित रास्ते चुनते हैं, गलतियां छिपाते हैं या फर्जी आंकड़े गढ़ते हैं, तो उपयोगकर्ताओं द्वारा गलत फैसले लेने की आशंका बढ़ जाती है। साथ ही, अनुमति के बिना डिजिटल कोड का इस्तेमाल और एजेंटों का आपस में स्वतंत्र संवाद साइबर सुरक्षा के लिए एक बड़ा संकट पैदा करता है, जिससे मानवीय नियंत्रण पूरी तरह समाप्त होने का गंभीर जोखिम खड़ा हो जाता है।<br>&nbsp;</p><h2>&nbsp;</h2>]]></description>
      <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 14:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-revelations-about-ai-are-emerging-every-day-is-it-the-truth-fear</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[तेल-स्मार्टफोन, ज्वेलरी, दवाईयां... Trump के 100% 'टैरिफ बम' से हिल जाएगा भारत का व्यापार सिस्टम? क्या-क्या हो सकता है महंगा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-india-trade-system-be-shaken-by-trump-100-tariff-bomb]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत ने ब्रिक्स समिट करवाया। रूस के राष्ट्रपति पुतिन आए। चीन के राष्ट्रपति शी जिंनपिंग आए। तमाम दुनिया भर के जो सदस्य देश थे, जो इनवाइटेड कंट्रीज थे, पार्टनर कंट्रीज थे, वो पहुंचे। बहुत चर्चा हुई। ईरान पहुंचा। ईरान, यूएई की मीटिंग हो गई। दुनिया भर में इस बात पर बात हो रही है। अब अमेरिका जो है वैसे तो चीख चिल्ला नहीं रहा है ब्रिक्स पर लेकिन वो तिलमिला चुके हैं। क्यों खुन्नस खा चुका है यह हम आपको आगे बताएंगे। दरअसल ब्रिक्स की बैठक संपन्न हो गई। चर्चा चारों तरफ हुई कि भैया बैठक तो जो है बड़ा बढ़िया रहा। वेस्ट जलने लगा, अमेरिका जलने लगा और उसने जलन में सबसे पहले हमला किसकी तरफ करने का सोचा? भारत और रूस की दोस्ती पर। दरअसल अमेरिकी सांसदों ने रूस पर प्रतिबंध लगाने वाले बिल में जो है वो संशोधन के लिए पेश कर दिया है। बताया जा रहा है इसमें से एक ऐसा संशोधन भी है जिसको में भारत को टारगेट किया जा रहा है। क्यों किया जा रहा है? क्योंकि वो रशिया का दोस्त है और भावना तो यह रही होगी कि ये भारत ने कैसे इतना बढ़िया ब्रिक्स का समिट करा लिया। चीन के राष्ट्रपति आ गए। रूस के राष्ट्रपति आ गए। ईरान के राष्ट्रपति आ गए। चर्चा हो गई। ईरान यूएई की मीटिंग हो गई। बताओ इतना कुछ हो रहा है। तो ये जो भाव है कोई कह नहीं रहा है कि मुझे ब्रिक्स से दिक्कत है। अमेरिका में कोई हल्ला नहीं है इसको लेकर। सब उसको अंडरप्ले करने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन यह खुन्नस है क्योंकि खुन्नस जो है वह यह संशोधन पे दिखाई देता है। जानकारी यह है कि जो संशोधन है उसमें भारत सहित रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों के नए कानून में शामिल करने की मांग की गई है। 100% टेरिफ वाला बिल पूरी तरह से पास हो गया। अमेरिका के इस कड़े फैसले से पूरी दुनिया के बाजारों &nbsp;में खलबली मच गई। लेकिन सवाल यह है कि अमेरिका ने सख्त फैसला लिया क्यों? दरअसल &nbsp;इसके पीछे एक नहीं बल्कि कई बड़े कारण हैं। एक तरफ जहां ब्रिक्स देशों में डीडोलराइजेशन की सिर्फ चर्चा मात्र से अमेरिका में डर का माहौल बन गया वहीं दूसरी तरफ अमेरिका का बढ़ता व्यापार घाटा यानी कि ट्रेड डेफिसिट और उसकी अमेरिका फर्स्ट नीति भी इसका बड़ा कारण है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/abdullah-mayawati-sibal-why-have-opponents-suddenly-started-coming-out-in-support-of-modi-one-b" target="_blank" rel="noopener">अब्दुल्ला-मायावती-सिब्बल...एक-एक कर मोदी के समर्थन में अचानक क्यों उतरने लगे विरोधी,'चक्रव्यूह' में फंसे राहुल?</a></h3><p><br><strong>अमेरिका के 100% वाले टेरिफ के पीछे असली कारण?&nbsp;</strong><br>पहला कारण है डीलराइजेशन की चर्चा और अमेरिका का डर। सच यह है कि ब्रिक्स देशों ने कोई नई करेंसी अभी तक नहीं बनाई है और ना ही डॉलर को पूरी तरह छोड़ा है। भारत जैसे देशों ने इस मामले में बेहद सतर्क और संतुलित रुख अपनाया हुआ है। लेकिन ब्रिक्स देशों में अपनी स्थानीय भाषाओं और मुद्राओं में व्यापार करने [संगीत] की जो बात शुरू हुई है, उसने अमेरिका को डरा दिया। अमेरिका को डर लगा कि अगर भविष्य में डॉलर का दबदबा कम हुआ तो उसकी आर्थिक ताकत कमजोर पड़ जाएगी। इसी डर के चलते अमेरिका ने पहले ही 100% टेरिफ की चेतावनी देकर सख्त कानून पास कर दिया। अमेरिका हर साल दूसरे देशों से बहुत ज्यादा सामान खरीदता है। लेकिन खुद कम सामान बेचता है। अमेरिका को अरबों डॉलर का नुकसान होता &nbsp;है। इस व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारी टेरेफ लगाना अमेरिका के लिए बेहद जरूरी &nbsp;हो गया था। अब तीसरा कारण है अमेरिका फर्स्ट और घरेलू कंपनियों की सुरक्षा। अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि विदेशी कंपनियां अपने देशों से सस्ता सामान भेजकर अमेरिकी कंपनियों को नुकसान पहुंचाती हैं। 100% टेरिफ लगाने से विदेशी सामान महंगा हो जाएगा। जिससे अमेरिका के लोग अपने ही देश में बना सामान खरीदेंगे और वहां नए रोजगार पैदा होंगे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/us-house-passes-russia-sanctions-bill-allowing-tariffs-on-india" target="_blank" rel="noopener">US Sanctions Bill पर Congress का हमला, कहा- Modi Govt के तुष्टीकरण का कोई फायदा नहीं</a></h3><p><br><strong>भारत के लिए क्या हैं इसके मायने?</strong><br>अमेरिकी संसद में पारित नया विधेयक भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल या प्राकृतिक गैस का आयात करने वाले शीर्ष 5 देशों पर 100 प्रतिशत तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का अधिकार देता है। &nbsp;वर्तमान में भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का 88 फीसदी हिस्सा आयात करता है, जिसमें रूस एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता के रूप में उभरा है। वर्ष 2022 में यूक्रेन पर रूस के सैन्य हमले के बाद से रूसी कच्चा तेल भारत के आयात बास्केट का एक बड़ा हिस्सा बन गया। 'ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव' (GTRI) के आंकड़ों के मुताबिक, वित्त वर्ष 2026 में भारत ने रूस से 40.8 अरब डॉलर का कच्चा तेल खरीदा, जो उसके कुल कच्चे तेल आयात का लगभग एक-तिहाई है। वहीं, कमोडिटी डेटा ट्रैकर 'केपलर' (Kpler) के अनुसार, अगस्त में भारत ने रोजाना 20.8 लाख बैरल (bpd) रूसी तेल का आयात किया, जो उसके कुल तेल आयात का करीब 45 प्रतिशत था। &nbsp;हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि इस विधेयक के पारित होने से भारत पर स्वतः 100 प्रतिशत शुल्क लागू नहीं हो जाता। यह कानून केवल राष्ट्रपति ट्रंप को यह तय करने का कानूनी अधिकार देता है कि शुल्क कब, किस दर पर और किस स्तर पर लगाया जाए। &nbsp;यदि अमेरिकी राष्ट्रपति वास्तव में 100 प्रतिशत शुल्क लगाने का फैसला करते हैं, तो यह आयात शुल्क का उच्चतम स्तर होगा। यह शुल्क उस मौजूदा 10 प्रतिशत टैरिफ के अतिरिक्त होगा, जो अमेरिका ने जबरन श्रम (फोर्स्ड लेबर) से बने सामानों के आयात को रोकने में नाकामी के दंड स्वरूप भारतीय उत्पादों पर लगाया हुआ है।आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के कड़े कदम से भारतीय अर्थव्यवस्था को गहरा झटका लग सकता है। रेटिंग एजेंसी इक्रा (ICRA Ltd) की मुख्य अर्थशास्त्री अदिति नायर ने 'फॉर्च्यून इंडिया' से बातचीत में कहा, "अमेरिका द्वारा किसी भी प्रकार के उच्च शुल्क लगाए जाने और उससे पैदा होने वाली अनिश्चितता का सीधा नकारात्मक असर भारत के विकास परिदृश्य पर पड़ेगा।"GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव ने भी इस विधेयक को भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय बताया। 'टाइम्स ऑफ इंडिया' से बात करते हुए उन्होंने कहा, "यह विधेयक भारत पर एकतरफा शर्तों पर द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) पर हस्ताक्षर कराने का एक सीधा और खतरनाक दबाव बनाने का प्रयास है। भारत युद्ध के लिए फंडिंग करने नहीं, बल्कि अपनी 1.4 अरब आबादी के लिए किफायती ऊर्जा सुरक्षित करने के लिए रूसी तेल खरीदता है; और इन खरीदों ने वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने में अहम मदद की है।" &nbsp;उन्होंने आगे आगाह किया कि यदि ट्रंप भारतीय सामानों पर 100 प्रतिशत शुल्क लागू करते हैं, तो इससे न केवल भारतीय निर्यातकों को भारी नुकसान होगा, बल्कि दोनों देशों के द्विपक्षीय व्यापार संबंधों पर भी गंभीर असर पड़ेगा। उन्होंने स्पष्ट किया, "भारतीय निर्यात पर नए शुल्कों के वास्तविक असर का सही आकलन तभी किया जा सकेगा, जब अमेरिका औपचारिक रूप से शुल्क दरों की घोषणा करेगा।</p><p><strong>क्या भारत में पेट्रोल की कीमतें बढ़ेंगी?</strong><br>इसका जवाब अभी साफ़ नहीं है। हमें यह देखना होगा कि क्या भारत अमेरिका से टैरिफ़ के खतरे को टालने के लिए अपनी ऊर्जा ज़रूरतों के लिए रूसी कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करता है। भारतीय रिफ़ाइनर दूसरे उत्पादकों से तेल ले सकते हैं, जिनमें पश्चिम एशिया, अफ्रीका और अमेरिका के देश शामिल हैं। असल में, अगस्त में वेनेज़ुएला से भारत का कच्चा तेल आयात 2020 के बाद से सबसे ऊँचे स्तर पर पहुँच गया, जो जुलाई के मुक़ाबले 64 प्रतिशत बढ़कर 358,000 बैरल प्रति दिन हो गया। Kpler के डेटा के अनुसार, जहाँ रूस कच्चे तेल का सबसे बड़ा सप्लायर बना रहा, वहीं अगस्त में उस देश से तेल आयात चार महीने के निचले स्तर 2.06 मिलियन बैरल प्रति दिन (bpd) पर आ गया, जो जुलाई से 27 प्रतिशत की भारी गिरावट है। इस बीच, UAE 542,000 bpd के साथ दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर था, जो जुलाई के 470,000 bpd से 15 प्रतिशत ज़्यादा है। Kpler में तेल बाज़ारों के सीनियर मैनेजर सुमित रितोलिया ने पहले 'द प्रिंट' को बताया था कि भारतीय कच्चे तेल के आयात पर असर तुरंत नहीं पड़ेगा। अतीत में प्रतिबंधों के काम करने के तरीके के आधार पर, उन्हें 45-60 दिनों की 'विंड-डाउन' अवधि (धीरे-धीरे काम बंद करने की अवधि) की उम्मीद है, जिसके दौरान पहले से कॉन्ट्रैक्ट किए गए और रास्ते में मौजूद कार्गो की डिलीवरी हो सकती है। रितोलिया ने कहा कि शुरुआती असर नई बुकिंग पर पड़ेगा, न कि जल्द आने वाले कार्गो पर। इसका मतलब है कि भारत रूसी तेल सप्लाई की जगह दूसरे स्रोत से तेल ले सकता है, लेकिन सवाल यह है कि किस कीमत पर।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-took-a-dangerous-step-to-break-the-india-russia-friendship-modi-deliver-strong-counter" target="_blank" rel="noopener">भारत-रूस की दोस्ती तोड़ने के लिए Trump ने उठाया खतरनाक कदम, तुरंत मोदी सरकार ने कर दिया तगड़ा इलाज!</a></h3><p><strong>भारत ने क्या जवाब दिया</strong><br>भारत नेकहा कि वह अपने आर्थिक हितों की रक्षा और ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। भारत का यह बयान ऐसे समय में आया है जब अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट पारित किया है। यह विधेयक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस से कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक दंडात्मक शुल्क लगाने की अनुमति देता है। यह विधेयक ट्रंप को रूस पर प्रतिबंध लगाने और उसके प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भारी शुल्क लगाने का अधिकार देता है। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए विदेश मंत्रालय ने कहा कि भारत अपने 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और अपने व्यापार तथा आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगा। विदेश मंत्रालय ने कहा कि अमेरिकी कांग्रेस में विधेयक पारित होने के बाद भारत इस मामले में आगे होने वाले घटनाक्रम पर नजर रख रहा है। पिछले कुछ वर्षों में भारत द्वारा रूस से कच्चे तेल की खरीद में काफी वृद्धि हुई है। विदेश मंत्रालय ने कहा कि जैसा कि पहले भी कई मौकों पर कहा गया है, भारत अपने 1.4 अरब लोगों के लिए ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के वास्ते पूरी तरह प्रतिबद्ध है। मंत्रालय ने कहा कि भारत स्रोतों में विविधता लाने और बदलती बाजार परिस्थितियों के आधार पर अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करता रहेगा। विदेश मंत्रालय ने बताया कि इस मुद्दे पर पिछले कुछ महीनों में अमेरिका के विभिन्न अधिकारियों और प्रतिनिधियों के साथ उच्च स्तर पर चर्चा हुई है। उसने कहा कि भारत ने अमेरिका के सामने इस कदम के संभावित प्रभावों को स्पष्ट रूप से रखा है-न केवल भारत-अमेरिका द्विपक्षीय संबंधों पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर भी। भारत ने अमेरिका को यह भी स्पष्ट किया है कि वह अपने व्यापार और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाने के लिए दृढ़ है। उसने कहा कि सरकार इन घटनाक्रम के प्रभावों से निपटने के लिए भारतीय व्यापार और उद्योग संगठनों के साथ मिलकर काम करेगी। यह प्रतिबंध विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट से पारित हुआ था। बुधवार शाम अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने इसे 262-159 मतों से मंजूरी दी। ट्रंप के हस्ताक्षर के बाद यह कानून बन जाएगा। इसमें रूस के नेतृत्व और ऊर्जा क्षेत्र पर प्रतिबंध लगाने के साथ-साथ रूस को तेल की आपूर्ति पर लगे प्रतिबंधों से बचने में मदद करने वाले जहाजों के ‘छद्म बेड़ों’ पर भी प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव है। इसके अलावा, विधेयक ट्रंप को चीन, भारत और अन्य देशों पर कड़े शुल्क लगाने का अधिकार देता है, ताकि इन देशों की रूसी तेल और गैस पर निर्भरता कम की जा सके। विधेयक में ईरान पर अतिरिक्त प्रतिबंधों का भी प्रावधान है।</p><p><strong>क्या क्या हो सकता है महंगा</strong><br>अगर अमेरिका ने 100% टैरिफ लागू कर दिया, तो इसका बुरा असर सिर्फ कच्चे तेल पर ही नहीं, बल्कि भारत से अमेरिका जाने वाले निर्यात पर भी पड़ेगा। अमेरिका, भारत के कई सामानों पर टैक्स बढ़ा सकता है। इसका सबसे ज्यादा नुकसान हमारे इलेक्ट्रॉनिक्स (खासकर स्मार्टफोन), दवाइयों (फार्मास्यूटिकल्स), कपड़ा उद्योग, गहने (रत्न और आभूषण) और ऑटोमोबाइल पार्ट्स के निर्यात को झेलना पड़ सकता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-india-trade-system-be-shaken-by-trump-100-tariff-bomb</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें, UPI पेमेंट पर हर सवाल का जवाब यहां मिल सकता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/whenever-merchant-fees-imposed-burden-fell-on-customers-find-answers-on-upi-payments]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>करोड़ो यूपीआई यूजर्स के मन में एक सवाल घूम रहा है। सवाल ये कि क्या 2000 रुपए से ऊपर की यूपीआई पेमेंट पर आपको पैसा देना होगा? मतलब आप ₹500 की यूपीआई करोगे तो मुफ्त और ₹5000 की करोगे तो क्या आपकी जेब से कुछ कटेगा? और अगर कटेगा तो फिर जिस डिजिटल इंडिया का नाम लेकर सरकार ने खुद कहा था कि यूपीआई फ्री रहेगा। उसी सरकार के अपने कागज में कल पहली बार 2000 को लेकर एक लकीर क्यों खींची? उसी कागज में एक तरफ लिखा था कि बैंक 2000 तक की पेमेंट पर ₹1 नहीं ले सकते। ना सीधे ना घुमाकर। लेकिन दूसरी तरफ 2000 के ऊपर कुछ कंडीशंस लगाई गई थी। वो कंडीशंस क्या पैसा लेने के लिए? सवाल यह भी उठता है कि जो लकीर आज तक कहीं थी नहीं उसे सरकार क्यों लगा रही है?</p><p>क्या यूपीआई को लेकर जो नए नियम है वो सिर्फ कागजों के फेरबदल है या वाकई में 2000 के ऊपर चार्ज लगेगा और चार्ज लग रहा है तो किसकी जेब से कटेगा? आम आदमी की जेब से या वो जो इसे बिजनेस में इस्तेमाल करते हैं दुकानदार उनकी जेब से और अगर दुकानदार की जेब से भी जाता है तो क्या वो घूमकर आपके सामान में नहीं जुड़ेगा? यूपीआई से लोग आज शहर से गांव पैसा भेजते हैं। स्कूल की फीस जमा करते हैं। हर महीने घर का राशन ऑनलाइन मंगाते हैं। और जितने लोग यूपीआई से सारा काम करते हैं। अब तो भीख मांगने वाले भी लोग जो हैं वो यूपीआई दिखाते हैं। तो उन सबके मन में ये सवाल है कि भाई साहब 2000 के ऊपर अगर 3000 का बिल गया तो क्या पैसा लोगे? 4000 डॉक्टर की फीस मांगा तो क्या फीस के साथ यूपीआई का भी टैक्स देंगे? और घर का किराया तो 8000, 10000 20,000 हो तो क्या वहां जाएगा?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/sun-is-about-to-set-britain-it-could-split-into-four-parts-impact-would-a-breakup-have-on-india" target="_blank" rel="noopener">डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?</a></h3><p><strong>कैसे शुरू हुई चर्चा</strong></p><p>15 सितंबर को अखबारों में खबर आ गई कि यूपीआई पर 2000 के यूपीआई ट्रांजैक्शन पर कोई पैसा नहीं लगेगा। सबको समझ में आ गया कि यार 2000 के ऊपर वाले पर तो लगेगा ही लगेगा। सरकार अगर यह कह रही है तो कोई बहुत दिन से ही चल रहा था कि यूपीआई ट्रांजैक्शन पर सरकार चार्ज लगाने वाली है। कई बार खंडन होता, कभी दबी आवाज में खंडन होता, कभी स्पष्टीकरण आता, कभी फ्रेमवर्क पे काम करने की बातें कही जाती। लेकिन 15 सितंबर की ही शाम को वित्त मंत्रालय ने निर्मला सीतारमण का जो मंत्रालय है उसने एक फ्रेमवर्क जारी किया है। फ्रेमवर्क शाम को करीब 7 बजे के आसपास सामने आया है। जिसमें यह साफ कहा गया है कि जी हां 2000 के ऊपर के यूपीआई ट्रांजैक्शन पे अब चार्ज लगेगा। लेकिन शर्तें हैं।</p><p><strong>सरकार ने बताया &nbsp;किनको नहीं देना है पैसा</strong></p><p>सोशल मीडिया बहस शुरू हो गई। यहीं से खबर आई कि भाई 2000 तक अगर आपने लिखा है तो क्या उसके आगे और यह अफवाह फैलनी तेज हो गई। रोज सुबह चाय वाले को, शाम को दूध वाले को, महीने के आखिर में घर के किराए वाले को आप यूपीआई से पैसा भेजते हैं। वहां पर एक्स्ट्रा पैसा नहीं जाता। क्या अब एक्स्ट्रा जाएगा? यह मैसेज वायरल हुआ कि 2000 के ऊपर की हर पेमेंट पर पैसा कटेगा और वो आपके खाते से कटेगा। कई लोगों ने अपने बैंक की ऐप चेक करनी शुरू कर दी कि पैसा कटा तो नहीं क्योंकि 2019 से यह फ्री था। पर अब क्या होगा? सरकार ने साफ किया है कि यूपीआई इस्तेमाल करने वाला आम ग्राहक के पैसे से रुपया नहीं कटेगा। चाहे पेमेंट कितनी बड़ी भी क्यों ना हो। जो चार्ज की बात है वह एमडीआर है। यानी दुकानदार अपनी बिक्री पर बैंक को जो थोड़ी सी फीस देता है। ठीक वैसे ही जैसे कार्ड से पेमेंट लेने पर देता है। और यह सिर्फ दुकान पर होने वाले पेमेंट की बात है। दोस्त या घर वाले को सीधे पैसे भेजने पर चाहे जितनी बड़ी रकम हो पैसा नहीं जाएगा। हां और अभी तक यह फीस लगाने का कोई अंतिम फैसला भी नहीं हुआ है कि दुकानदार पर कितनी लेगी यह एनपीसीआई की एक कमेटी तय करेगी। यानी वही सरकारी कंपनी जो यूपीआई को पीछे चलाती है और जिसका काम अभी शुरू हुआ है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/israel-shocked-has-india-shifted-its-stance-distancing-itself-from-netanyahu-over-iran" target="_blank" rel="noopener">दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?</a></h3><p><strong>UPI से&nbsp;महीने&nbsp;में&nbsp;100000 कमाने&nbsp;वाले&nbsp;व्यापारियों&nbsp;को&nbsp;नहीं&nbsp;देना&nbsp;होगा&nbsp;शुल्क</strong></p><p>सामान्य ग्राहक&nbsp;</p><p>आम लोगों पर शुल्क लगेगा? नहीं, UPI भुगतान मुफ्त रहेगा। चाहे भुगतान Person-to-Person (P2P) हो या Person-to-Merchant (P2M), ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा। UPI ऐप भी ग्राहक से कोई फीस नहीं लेंगे। QR स्कैन करने पर चार्ज लगेगा? नहीं। छोटे भुगतान पहले की तरह मुफ्त रहेंगे और व्यापारी यह शुल्क ग्राहक से नहीं वसूलेंगे। सरकार के मुताबिक, बैंक व्यापारियों के लेन-देन पर नजर रखेंगे। छोटे व्यापारी ₹2,000 से अधिक के भुगतान पर क्या होगा? ऐसे भुगतान पर 0.40% शुल्क लागू होगा। हालांकि, अगर व्यापारी की UPI से महीने की प्राप्ति ₹1 लाख तक है, तो MDR नहीं लगेगा।&nbsp;</p><p><strong>क्या नया QR कोड लेना होगा?&nbsp;</strong></p><p>नहीं। मौजूदा QR कोड से ही भुगतान जारी रहेगा। क्या जीएसटी रजिस्ट्रेशन जरूरी है? नहीं। शून्य MDR का लाभ लेने के लिए GST रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं है। सीमा कैसे तय होगी? बैंक व्यापारी के लेन-देन की निगरानी करेंगे। अगर लगातार 3 महीने तक UPI से प्राप्ति ₹1 लाख से अधिक रहती है, तभी व्यापारी को Person-to-Merchant श्रेणी में बदला जाएगा।</p><p><strong>बड़े&nbsp;व्यापारी-ई&nbsp;कॉमर्स</strong></p><p>₹2,000 से कम के भुगतान पर भी जीरो MDR लागू है। वहीं, ₹75,000 से अधिक के लेनदेन के लिए अधिकतम फीस ₹300 तय की गई है। क्रेडिट या डेबिट कार्ड के मुकाबले UPI कितना किफायती है? अभी क्रेडिट कार्ड पर 1.5% से 2.5% और डेबिट कार्ड पर 0.90% तक शुल्क लगता है। इसके मुकाबले UPI पर सिर्फ 0.40% या अधिकतम ₹300 का शुल्क रहेगा।</p><p><strong>क्या जीरो MDR का फायदा लेने के लिए छोटे दुकानदार को GST पंजीकरण कराना जरूरी है?&nbsp;</strong></p><p>नहीं। छोटे दुकानदारों को UPI भुगतान पर जीरो MDR का लाभ लेने के लिए सिर्फ इसी वजह से GST पंजीकरण कराने की जरूरत नहीं होगी। इसकी पात्रता तय करने में मासिक UPI कलेक्शन की सीमा और बैंक खाते की श्रेणी देखी जाएगी। जो छोटे कारोबारी कानून के तहत GST पंजीकरण की अनिवार्य सीमा से नीचे हैं, वे बिना GST दस्तावेज दिए भी डिजिटल भुगतान स्वीकार कर सकेंगे।</p><p><strong>यूपीआई तो इतने सालों तक फ्री था, अचानक इसकी जरूरत क्यों पड़ी&nbsp;</strong></p><p>सरकार ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि UPI के सिस्टम को टिकाऊ बनाया जा सके। किसी भी व्यवस्था को चलाने की लागत होती है और UPI के मामले में यह हर साल औसतन 20 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा है। ट्रांजैक्शन की संख्या बढ़ने के साथ खर्च भी बढ़ रहा है और फिलहाल बैंक, सर्विस प्रोवाइडर कंपनियां और सरकार मिल-जुलकर इसका बोझ उठा रहे हैं। लेकिन, यह व्यवस्था शायद लंबे वक्त तक नहीं चल पाती।</p><p><strong>UPI&nbsp;की&nbsp;ताकत&nbsp;</strong></p><p>सरकार आम लोगों को सहूलियत देने और सिस्टम को टिकाऊ बनाने के बीच संतुलन रखना चाहती है। हालांकि, इन फैसलों से जुड़ी चिंताओं को समझते हुए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि MDR का बोझ आम लोगों पर न पड़े। देश में डिजिटल ट्रांजैक्शन की सबसे बड़ी ताकत इसकी सरलता और मुफ्त होना रही है। इसी वजह से UPI ने उन दूर-दराज के इलाकों तक भी पहुंच बनाई है, जहां इंटरनेट उपलब्ध है। ऐसे में इसकी सहजता और मुफ्त व्यवस्था बनी रहना जरूरी है। अगर आम उपभोक्ताओं पर थोड़ा भी अतिरिक्त बोझ पड़ा, तो UPI की स्वीकार्यता प्रभावित हो सकती है। डिजिटल इंडिया की दिशा में UPI एक बड़ी छलांग है और आज कई अन्य देश भी इसे अपना रहे हैं। इसने भुगतान प्रणाली को बेहद सरल बनाने के साथ-साथ व्यापार को बढ़ाने में भी मदद की है। ऐसे में UPI को सहज, सुलभ और आम लोगों के लिए किफायती बनाए रखना जरूरी होगा।</p><p><strong>जब-जब मर्चेंट फीस लगी, बोझ ग्राहकों पर ही पड़ा, 5 उदाहरण से समझें</strong></p><p><strong>पेट्रोल पंप: </strong>कार्ड से भुगतान पर पेट्रोल पंप संचालक खुद शुल्क चुकाने के बजाय इसे 'फ्यूल सरचार्ज' के रूप में ग्राहक से वसूल रहे हैं।</p><p><strong>ज्वेलर्स: </strong>बैंक के 1.5% से 2% MDR की भरपाई के लिए ज्वेलर्स ग्राहक के बिल में 'कार्ड सरचार्ज' जोड़ रहे हैं।</p><p><strong>IRCTC,</strong> सिनेमा हॉल और ट्रैवल ऐप्स: भुगतान गेटवे के शुल्क को 'कन्विनियंस फीस' के नाम पर ग्राहक से वसूल रहे हैं।</p><p><strong>छोटे भुगतान: </strong>फिक्स्ड प्रोसेसिंग कॉस्ट से बचने के लिए कुछ व्यापारी ₹200 या ₹500 से कम के भुगतान पर कार्ड लेने से इनकार करते हैं और ग्राहक को अधिक खरीदारी के लिए मजबूर करते हैं।</p><p><strong>रेस्तरां और स्टोर्स: </strong>MDR को सीधे बिल में जोड़ना गैर-कानूनी होने के बावजूद कुछ रेस्तरां और स्टोर्स 5% तक का 'सर्विस चार्ज' लगाकर ग्राहक से अतिरिक्त शुल्क वसूलते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 16 Sep 2026 13:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/whenever-merchant-fees-imposed-burden-fell-on-customers-find-answers-on-upi-payments</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[डूबने वाला है ब्रिटेन का सूरज, होंगे 4 टुकड़े! UK अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/sun-is-about-to-set-britain-it-could-split-into-four-parts-impact-would-a-breakup-have-on-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या जिन अंग्रजों ने हम पर 200 साल राज किया उनका अपना देश अब टूट रहा है? ये सवाल इसलिए क्योंकि 14 सितंबर को वेल्स की राजधानी कैरेटिफ के एक होटल में यूनाइटेड किंगडम के चार देशों में से तीन के मुखिया एक मेज पर बैठते हैं और फिर ये तीनों एक कागज पर हस्ताक्षर करते हैं। जिसमें वो कहते हैं कि अपना भविष्य वो खुद तय करना चाहते हैं। ब्रिटेन कभी ये शब्द ही ताकत का दूसरा नाम हुआ करता था। वो साम्राज्य जिसके बारे में कहा जाता था कि इसका सूरज कभी नहीं डूबता। लेकिन आज ब्रिटेन महज एक दशक में सात प्रधानमंत्री को देख चुका है। लिज ट्रस सिर्फ 45 दिन टिकीं, बोरिस जॉनसन अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाए, ऋषि सुनक दो साल से कम पद पर रहे और अबकी बार भी दो साल तक पूरे नहीं कर पाए। ऐसे अस्थिर दौर में देश की अर्थव्यवस्था डांवाडोल है। अमीर लोग देश छोड़ कर जा रहे हैं। सड़कों पर हिंसा आम हो चली है और लोग पूछ रहे हैं कि ये ब्रिटेन को क्या हो गया है? दरसअल, जिस इंग्लैंड को आप एक देश समझते हैं वो यूनाइटेड किंगडम के चार टुकड़ों (इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड, नॉर्दन आइलैंड) में से एक टुकड़ा है। ऐसे में सवाल ये है कि बाकी तीन टुकड़े यूके से क्यों अलग होना चाहते हैं? एक और दिलचस्प बात आपको बता दें कि दरअसल, आप अक्सर यूनाइटेड किंगडम के झंडे के प्रिंट वाला टी-शर्ट या बैग इस्तेमाल करते होंगे वो तीन झंडों को सिलकर बना है, लेकिन इसमें वेल्स है ही नहीं। फुटबॉल के मैदान पर चारों की टीम अलग-अलग खेलती है। लेकिन पासपोर्ट सभी का एक है। 2014 में स्कॉटलैंड ने अपनी जनता से वोट करवाया था, तब 100 में से 55% लोगों ने कहा कि हम यूनाइटेड किंगडम के साथ रहेंगे। 2022 में यूके की सबसे बड़ी अदालत ने कह दिया कि दोबारा वोट करवाना है तो बगैर लंदन की इजाजत के बगैर नहीं होगा। वेल्स के मुखिया ने भले ही आजादी के कागज पर दस्तगत किए। लेकिन उनके अपने लोगों में 100 में से सिर्फ 26% लोग अजादी चाहते हैं। यूके का सबसे बड़ा स्टील कारखाना खुद वेल्स में है। सवाल ये है कि ये चार देश एक कैसे हैं, एक हैं तो अलग कैसे होंगे। इनकी चाबी जब लंदन के पास है तो ये तीनों कागज लिखकर किसे दिखाना चाह रहे हैं। इसके साथ ही सबसे अहम और हमारे मतलब का सवाल कि यूनाइटेड किंगडम अगर टूटता है तो इसका भारत पर क्या असर होगा?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/this-news-will-shock-those-traveling-to-britain-india-is-also-shocked" target="_blank" rel="noopener">ब्रिटेन जाने वालों की होश उड़ा देगी ये खबर! भारत भी चौंका</a></h3><p><strong>ब्रिटेन के पतन की कहानी</strong></p><p>19वीं सदी ब्रिटेन की सदी थी। उस वक्त दुनिया की 25 फीसदी जमीन उसके कब्जे में थी। दुनिया की 20 फीसदी आबादी उसके अधीन थी। ब्रिटिश पाउंड दुनिया की रिजर्व करेंसी था, वैसे ही जैसे आज अमेरिकी डॉलर है। उस ब्रिटेन ने दुनिया को बहुत कुछ दिया। इंडस्ट्रियल रेवोल्यूशन वहीं से शुरू हुआ। भाप के इंजन, रेलवे, वैश्विक व्यापार। ब्रिटेन ने दुनिया को आधुनिकता सिखाई, लेकिन यहां यह जिक्र भी जरूरी है कि यह साम्राज्य खून और शोषण पर खड़ा था।</p><p>वह सूरज जो कभी नहीं डूबता था, भारत, अफ्रीका और कैरेबियन के लाखों लोगों के खून पसीने की कीमत पर चमकता था। पतन की कहानी समझने के लिए उदय की असलियत का पता होना चाहिए। वैसे तो दूसरे विश्वयुद्ध ने जाहिर कर दिया था कि ब्रिटेन अब कमजोर हो रहा है और अमेरिका नई ताकत बनकर उभर रहा था, लेकिन उसकी ताकत को पहला बड़ा झटका लगा। 1956 में मिस्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ब्रिटेन और फ्रांस ने सैन्य कार्रवाई की, लेकिन अमेरिका ने कहा, रुको और ब्रिटेन रुक गया। जीसी पेन जैसे कई इतिहासकारों ने माना है कि स्वेज संकट ने ब्रिटेन के एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।&nbsp;</p><p><strong>पीएम का बयान और मच गया हंगामा</strong></p><p>14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं। स्कॉटलैंड तो 2014 में एक रेफरेंडम करवा भी चुका है और उत्तरी आयरलैंड 1998 के गुड फ्राइडे एग्रीमेंट की वजह से ब्रिटेन के साथ बना हुआ है। वेल्स में भी 1990 के दशक में आजादी को लेकर प्रोटेस्ट हो चुके हैं। हालिया बवाल जो मचा है वह ब्रिटिश प्राइम मिनिस्टर एंडडी बर्नहम की एक टिप्पणी की वजह से शुरू हुआ था। 9 सितंबर को वह हाउस ऑफ कॉमंस में बोल रहे थे। एसएपी के क्रिस लॉ ने उनसे स्कॉटलैंड के जनमत संग्रह पर सवाल कर लिया। इसके जवाब में बर्नहम ने कहा कि स्कॉटलैंड के मामले में भी वही स्थिति लागू होती है, वही नियम लागू होते हैं जो नॉर्दन आइलैंड के मामले में होते हैं। यानी अगर जनता के बीच बहुत स्पष्ट बहुमत को लेकर समर्थन है तो जनमत संग्रह के सवाल पर विचार किया जा सकता है। प्रधानमंत्री की इस टिप्पणी के बाद स्कॉटलैंड के फर्स्ट मिनिस्टर जॉन शिवनी ने तो यह तक कह दिया कि एंडडी बर्नहम यूनाइटेड किंगडम के आखिरी प्रधानमंत्री होंगे। उनके बाद ब्रिटेन बट जाएगा।</p><p><strong>ट्रंप ने डाला आग में घी</strong></p><p>ट्रंप &nbsp;12 सितंबर को डबलिन पहुंचे थे। वहां उन्होंने कह दिया कि वो एक यूनाइटेड आयरलैंड देखना पसंद करेंगे। नॉर्दर्न आयरलैंड का रिपब्लिक ऑफ आयरलैंड के साथ जुड़ना एक अच्छी बात होगी। फैंटास्टिक चीज होगी। उन्होंने ऐसा बोला। ब्रिटेन के खिलाफ ट्रंप अपने नए कार्यकाल की शुरुआत से ही एकदम लगे हुए हैं। पहले वह अपने दोस्त एलन मस्क के साथ मिलकर पूर्व प्रधानमंत्री की स्टारमर को ट्रोल किया करते थे और अब वो बर्नहम को ट्रोल कर रहे हैं। वैसे ट्रंप की यूनाइटेड आयरलैंड वाली टिप्पणी के पीछे एक पॉलिटिकल स्ट्रेटजी भी हो सकती है। नवंबर महीने में अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन है जिसमें ट्रंप हारते नजर आ रहे हैं। अमेरिका में 3 करोड़ से ज्यादा आयरिश मूल के लोग रहते हैं। हो सकता है कि इसी वोट बैंक को रिझाने के लिए ट्रंप ऐसी टिप्पणी कर रहे हो। 1998 में भी जब बिल क्लिंटन ने आयरलैंड और ब्रिटेन के बीच गुड फ्राइडे एग्रीमेंट करवाया था। तब भी आयरिश वोटर्स ने डेमोक्रेट्स को खूब वोट दिया था। हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव में उनकी पांच सीट ज्यादा आई थी उस साल। हो सकता है कि ट्रंप भी उसी तरह का कोई तीर मारने की कोशिश कर रहे हो।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/uk-faces-historic-division-as-three-devolved-nations-demand-independence" target="_blank" rel="noopener">The Partition of Britain | दुनिया पर राज करने वाले ब्रिटेन का अंत करीब? बगावत की आग में झुलसा वेस्टमिंस्टर, तीन देशों ने दागा आजादी का पैगाम!</a></h3><p><strong>14 सितंबर को क्या हुआ</strong></p><p>14 सितंबर 2026 को स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के नेता कार्डिफ शहर में इकट्ठा हुए हैं। उन्होंने मिलकर एक एमओयू पर साइन भी किए हैं। जो इन तीनों यानी स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड की ब्रिटेन से आजादी का समर्थन करता है। एमओयू में लिखा गया है कि इन तीनों को आत्मनिर्णय का अधिकार है और जरूरत पड़ने पर वह अपने-अपने यहां जनमत संग्रह भी करवा सकते हैं।</p><p><strong>क्या है तीनों नेताओं का मकसद</strong></p><p>जॉन&nbsp;स्विनी (स्कॉटलैंड): स्कॉटलैंड&nbsp;को&nbsp;आजाद&nbsp;देश&nbsp;बनाना&nbsp;व&nbsp;ईयू&nbsp;की&nbsp;सदस्यता&nbsp;लेना इनका लक्ष्य है।&nbsp;इसके पीछे ये तर्क दिया जा रहा है कि अर्थव्यवस्था,&nbsp;टैक्स,&nbsp;ऊर्जा&nbsp;व&nbsp;अन्य&nbsp;फैसले&nbsp;देश&nbsp;में&nbsp;ही&nbsp;हों।&nbsp;शिकायतः&nbsp;ब्रिटेन&nbsp;ने&nbsp;ईयू&nbsp;छोड़ा,&nbsp;जबकि&nbsp;62%&nbsp;स्कॉटलैंडवासी&nbsp;साथ&nbsp;रहना&nbsp;चाहते&nbsp;थे। स्कॉटलैंड&nbsp;के&nbsp;तेल,&nbsp;गैस,&nbsp;समुद्री&nbsp;इलाके&nbsp;का&nbsp;लाभ&nbsp;ब्रिटेन&nbsp;को&nbsp;मिल&nbsp;रहा।</p><p>रुन&nbsp;एप&nbsp;इओरवर्थ (वेल्स):&nbsp;स्वतंत्र&nbsp;वेल्स&nbsp;को बनान लक्ष्य है। तर्क है कि वेल्स को&nbsp;ब्रिटेन&nbsp;से&nbsp;उचित&nbsp;फंड&nbsp;नहीं&nbsp;मिलता।&nbsp;प्राकृतिक&nbsp;संसाधनों&nbsp;व&nbsp;नीतियों&nbsp;पर&nbsp;नियंत्रण&nbsp;नहीं&nbsp;है।&nbsp;तपुलिस,&nbsp;न्याय&nbsp;व्यवस्था&nbsp;और&nbsp;वित्तीय&nbsp;अधिकार&nbsp;वेल्स&nbsp;को&nbsp;सौंपे&nbsp;जाएं।&nbsp;आजादी&nbsp;को&nbsp;वेल्स&nbsp;की&nbsp;संवैधानिक&nbsp;यात्रा&nbsp;का&nbsp;अंतिम&nbsp;पड़ाव&nbsp;बता&nbsp;रहे&nbsp;इओरवर्थ।</p><p>मिशेल ओ'नील (नॉर्दन आयरलैंड) उत्तरी आयरलैंड व आयरलैंड गणराज्य को मिलाकर एक देश बनाना। द्वीप के लोगों को संवैधानिक भविष्य तय करने दिया जाए। 1998 की डील रेफरेंडम में एकीकरण की अनुमति।</p><p><strong>चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान&nbsp;</strong></p><p>यूके के नक्शे को देखेंगे तो आपको इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड दिख रहे होंगे। इन चारों से मिलकर बनता है यूनाइटेड किंगडम जिसका पूरा नाम है यूनाइटेड किंगडम ऑफ ग्रेट ब्रिटेन एंड नॉर्दन आयरलैंड। अब चारों हिस्सों की अपनी-अपनी पहचान भी है। इंग्लैंड की राजधानी लंदन है। स्कॉटलैंड की राजधानी है एडिन्रा। वेल्स की राजधानी है कार्टिफ जहां पे आज ये मीटिंग हुई है। और नॉर्दन आयरलैंड की राजधानी है बेलफास्ट। यह सब कहलाते तो ब्रिटेन का हिस्सा ही हैं। लेकिन विदेश नीति इन तीनों की,डिफेंस के जो मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम से चलाए जाते हैं। इसलिए इन तीनों इलाकों में जो प्रतिनिधि चुने जाते हैं, उन्हें कहा जाता है फर्स्ट मिनिस्टर। भारत की चीफ मिनिस्टर की तरह आप इन्हें समझ सकते हैं। लेकिन उनकी भूमिका एक स्टेट से बढ़कर होती है। अब स्कॉटलैंड, वेल्स और नॉर्दन आयरलैंड के पास अपनी-अपनी विधानसभा है और कुछ-कुछ अलग-अलग अधिकार हैं। इंग्लैंड में इस तरह की कोई अलग से संसद या विधानसभा नहीं है। इंग्लैंड से जो जुड़े मामले हैं वो यूनाइटेड किंगडम की संसद के कानून से ही बनाए जाते हैं। वहीं से मंजूर होते हैं।&nbsp;</p><p><strong>ये तीनों इलाके ब्रिटेन का हिस्सा कैसे बने हैं?&nbsp;</strong></p><p><strong>वेल्स </strong>ब्रिटेन के पश्चिम में है। पहाड़ों वाला इलाका है। 10वीं शताब्दी में जब विलियम द कॉनकरर ने इंग्लैंड पर कब्जा किया। उसके बाद इंग्लैंड के शासकों की नजर थी। वो वेल्स पर बन गई थी। वेल्स में उस समय कई छोटे-छोटे राज्य और राजघराने थे। इंग्लैंड के राजा पूरे वेल्स पर एक साथ कब्जा नहीं कर पाए। लेकिन उन्होंने वेल्स की सीमा पर बहुत सारे किले बना लिए और किलों के जरिए वहां पर वो देखरेख करने लगे और धीरे-धीरे अपना प्रभाव बढ़ाने लगे। पर 1280 के दशक में इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने वेल्स के खिलाफ मिलिट्री कैंपेन शुरू किया। उनकी सेना ने वेल्स के अहम इलाकों पर कब्जा किया और कई विशाल किले बनवाए। कैनफोन, कॉनवी और हारले जैसे किले जो बहुत फेमस किले हैं वह उसी दौर के बनाए गए थे। लेकिन 16वीं सदी में इंग्लैंड के राजा हेनरी ए्थ के समय दो ऐसे कानून पास हुए जिसकी वजह से आज ये पूरी स्थिति बनी। जिन्हें कहते हैं एक्ट्स ऑफ यूनियन। इन कानूनों का मकसद वेल्स और इंग्लैंड के बीच मौजूदा जो उस समय जो मौजूदा कानूनी दीवारें थी उसको हटाना था और उन्हीं के बदौलत वेल्स को इंग्लैंड की राजनीतिक व्यवस्था में शामिल किया गया। इसी कानून के बाद वेल्स ब्रिटेन का हिस्सा बना।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/essar-eet-retail-to-acquire-uk-sgn-retail-for-400-million-pounds" target="_blank" rel="noopener">Essar की EET Retail ब्रिटेन में SGN Retail का 40 करोड़ पाउंड में करेगी अधिग्रहण</a></h3><p><strong>स्कॉटलैंड </strong>ब्रिटेन के उत्तरी हिस्से में पड़ता है। कई सदियों तक स्कॉटलैंड एक अलग देश हुआ करता था। उसका अपना राजा था। अलग कानूनी व्यवस्था थी। दक्षिण में इंग्लैंड था और दोनों देशों के बीच में सीमा को लेकर संघर्ष चलता चलता रहता था। इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड को कब्जाने की पहली बड़ी कोशिश की थी। 1296 में। इंग्लैंड के राजा एडवर्ड फर्स्ट ने स्कॉटलैंड पर हमला किया और वहां के राजा जॉन बेलील को हटा दिया। अंग्रेजी सेना ने स्कॉटलैंड के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया। लेकिन यह नियंत्रण ज्यादा समय तक नहीं चल सका। स्कॉटलैंड में विद्रोह हुआ। विलियम वालेस और बाद में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ लड़ाई लड़ी। 1314 में बन कबर्न की लड़ाई में रॉबर्ट द ब्रूस ने अंग्रेजी सेना को हरा दिया। और 1328 में इंग्लैंड ने स्कॉटलैंड की आजादी को मान्यता दे दी। करीब 400 साल तक स्कॉटलैंड आजाद रहा। लेकिन 1707 में बड़ा बदलाव हुआ। उस समय स्कॉटलैंड आर्थिक मुश्किलों से गुजर रहा था और इंग्लैंड के साथ व्यापार और राजनीतिक संबंधों को लेकर भी वहां पे तनाव था दोनों के बीच। इंग्लैंड ने उस समय ऑफर दिया कि आप हमारे साथ आ जाइए। इंग्लैंड में अपना विलय कर लीजिए। अपना कानून अलग रखिएगा लेकिन देश एक होगा। इसी को लेकर 1706 में दोनों देशों के बीच एक संधि हो गई और स्कॉटलैंड इंग्लैंड की मातहत आ गया। स्कॉटलैंड की अलग संसद खत्म हो गई और उसके जो सांसद थे वो नई ब्रिटिश संसद में शामिल हो गए। 20वीं सदी में फिर से यह मांग उठी कि स्कॉटलैंड के घरेलू मामलों पर फैसले लेने के लिए उसके पास भी अधिकार होने चाहिए। इसका होता है कि 1997 में 1997 में एक जनमत संग्रह होता है। करीब 74 74% लोगों ने इसके पक्ष में वोट दिया। इसके बाद 1999 में स्कॉटलैंड पार्लियामेंट दोबारा अस्तित्व में आई। इसे डेवोल्यूशन कहा गया।</p><p><strong>नॉर्दन आयरलैंड </strong>1801 से ही आयरलैंड ग्रेट ब्रिटेन का हिस्सा बन गया था। लेकिन वहां आजादी की मुहिम वेल्स और स्कॉटलैंड के मुकाबले काफी तेज थी। 1916 में डबलिन में ईस्टर राइजिंग हुआ। आरिश रिपब्लिकन आंदोलन के नेताओं ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह किया और आइलैंड को एक आजाद मुल्क घोषित करने की कोशिश की। विद्रोह कुछ ही दिनों में दबा दिया गया। लेकिन ब्रिटिश सरकार द्वारा इसके नेताओं को फांसी दी गई और उससे क्या हुआ कि आरिश जनता भड़क गई और एक नेशनलिस्ट मूवमेंट वहां पर तेज हो गया। इसके बाद सिंफेन पार्टी तेजी से उभरी। 1918 के चुनाव में उसने आयरलैंड में बड़ी जीत हासिल की। उसके सांसदों ने लंदन की ब्रिटिश सांसद में जाने के बजाय डबलिन में ही अपनी अलग संसद बनाने का फैसला किया जिसे डॉयल आयरन कहा गया और स्वतंत्र आई स्टेट की मांग को आगे बढ़ाया गया। इसके बाद 1919 से 1921 तक आयरलैंड की आजादी के लिए लड़ाई चलती रही। आयरलैंड के उत्तर में छह काउंटियां यूनाइटेड किंगडम में ही रही। यही इलाका बाद में नॉर्दर्न आयरलैंड कहलाया। वो इसलिए क्योंकि नॉर्दन आइलैंड में खासकर अलस्टर नाम के इलाके की कुछ हिस्सों में जो थी वो प्रोटेस्टेंट्स क्रिश्चियंस की आबादी वहां पे ज्यादा थी और वो ब्रिटेन के साथ रहना चाहते थे। दूसरी तरफ कैथोलिक राष्ट्रवादी समूह जो थे जिसके कई लोग पूरे आयरलैंड को एक देश के रूप में देखना चाहते थे। इसलिए जब आयरलैंड का विभाजन हुआ तो नॉर्दन आयरलैंड यूनाइटेड किंगडम में बना रहा।</p><p><strong>ब्रिटेन के बंटने का भारत पर असर</strong></p><p>ब्रिटेन UNSC का स्थायी सदस्य (P5) है। विभाजन के बाद ब्रिटेन की वैश्विक हैसियत और भू-राजनीतिक प्रभाव में भारी गिरावट आएगी। इससे UNSC में स्थायी सीट के लिए भारत की दावेदारी को नैतिक और रणनीतिक बल मिलेगा, क्योंकि सिकुड़ता हुआ ब्रिटेन अपनी पुरानी ताकत खो चुका होगा। भारत को सिर्फ लंदन (वेस्टमिंस्टर) से रिश्ते संभालने के बजाय एडिनबर्ग (स्कॉटलैंड), डबलिन (आयरलैंड) और कार्डिफ (वेल्स) के साथ अलग-अलग स्वतंत्र द्विपक्षीय रिश्ते और दूतावास स्थापित करने होंगे। भारत हमेशा से संप्रभु राष्ट्रों की क्षेत्रीय अखंडता का समर्थक रहा है। किसी स्थापित लोकतंत्र के टूटने से वैश्विक स्तर पर अलगाववादी ताकतों को शह मिल सकती है, जिसे लेकर नई दिल्ली बेहद सतर्क रहेगी। ब्रिटेन अपने आंतरिक विवादों और पुनर्गठन में इस कदर उलझ जाएगा कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी मौजूदगी सीमित हो जाएगी। भारत को सुरक्षा और रक्षा तकनीक (जेट इंजन, नौसैनिक उपकरण) के मामले में फ्रांस, अमेरिका या खुद की घरेलू क्षमताओं पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। भारतीय छात्रों और कामगारों के लिए नियम बदल सकते हैं। यदि स्कॉटलैंड स्वतंत्र होकर ईयू की नीतियों की ओर बढ़ता है, तो वहां भारतीय छात्रों के लिए वर्क वीजा या आव्रजन के नियम लंदन के कड़े नियमों से ज्यादा उदार हो सकते हैं। यूके में रहने वाले लाखों भारतीय मूल के लोग मुख्य रूप से इंग्लैंड में केंद्रित हैं। विभाजन के बाद उनकी राजनीतिक हिस्सेदारी और प्रभाव पर भी नया समीकरण बनेगा।</p><p>कुल मिलाकर कहे तो ब्रिटेन के टूटने से लंदन की वैश्विक सौदेबाजी की ताकत कमजोर होगी। भारत के लिए यह स्थिति एक तरफ नए व्यापारिक और कूटनीतिक दरवाजे खोलेगी, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा परिषद में सुधार की भारतीय मांग को एक ठोस आधार प्रदान करेगी।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 13:34:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/sun-is-about-to-set-britain-it-could-split-into-four-parts-impact-would-a-breakup-have-on-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[दोस्त इजरायल को झटका! क्या भारत ने बदल लिया अपना रुख, ईरान के लिए नेतन्याहू को छोड़ा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/israel-shocked-has-india-shifted-its-stance-distancing-itself-from-netanyahu-over-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या ब्रिक्स डिक्लेरेशन भारत की विदेश नीति में किसी बड़े बदलाव की तरफ इशारा है? ब्रिक्स ब्रिक समिट का संयुक्त बयान जारी हो चुका है और इस बयान में पूरे फोरम ने कई मुद्दों पर काफी सख्त रुख अपनाया है। मसलन लेबनन के मुद्दे पर इजराइल का सीधा नाम लेते हुए आलोचना की गई है और लेबनान में सीजफायर का पालन करने पर जोर दिया गया है। लेकिन अमेरिका की एकतरफ़ा पाबंदियों की आलोचना करते समय ट्रंप या अमेरिका का कोई भी नाम का जिक्र नहीं किया गया है। इस संयुक्त बयान पर सभी देशों की सहमति बनवाना भारत के लिए एक बड़ी कूटनीतिक चुनौती थी क्योंकि इस साल ब्रिक्स की अध्यक्षता और सम्मेलन की मेजबानी दोनों भारत ही कर रहा है। अब देखना यह होगा कि इस बयान में इस्तेमाल किए गए शब्दों को बाकी देश किस तरह समझते हैं और भारत की तरफ से दिए गए संकेतों को किस तरह से लिया जाता है। पूरे बयान में बहुत सावधानी से शब्दों का चुनाव किया गया है। मिसाल के तौर पर देखें तो इसमें यूएन के दायरे से बाहर जाकर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। लेकिन अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। इसी तरह परमाणु ठिकानों पर हमले की निंदा की गई है। लेकिन ईरान का जिक्र नहीं है। इजराइल यहां जरूर एक अपवाद के तौर पर सामने आया है। गाजा और लेबनान से जुड़े कई हिस्से इजराइल का नाम सीधे तौर पर साझा बयान में शामिल करते हैं। इस संयुक्त बयान को तैयार करना इसलिए भी मुश्किल था क्योंकि ईरान, यूएई और सऊदी अरब मिडिल ईस्ट में चल रही जंग को लेकर अलग-अलग तरह की भाषा चाहते थे। ऐसे में सभी की सहमति से बयान जारी हो जाना भारत की बड़ी कूटनीतिक जीत मानी जा रही है। खासकर इसलिए क्योंकि पहले ऐसी अटकलें थी कि रूस और ईरान अमेरिका के खिलाफ काफी कड़ी भाषा इस्तेमाल करवाना चाहेंगे जिसका भारत और ब्रिक्स के दूसरे देश विरोध कर सकते हैं। लेकिन आखिर में सभी देशों में कंसेंसस बन गया और साझा बयान जारी हो गया। &nbsp;इजराइल को लेकर ब्रिक्स के बयान में गजा में मानवीय मदद पहुंचाने पर जोर दिया गया है। साथ ही फिलिस्तीनियों को जबरन उनके घरों और जमीन से हटाने का विरोध किया गया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cpi-welcomes-brics-declaration-demands-global-governance-reforms-and-gaza-ceasefire" target="_blank" rel="noopener">CPI ने BRICS घोषणापत्र का किया स्वागत, वैश्विक व्यवस्था में सुधार की वकालत की</a></h3><p><br><strong>अमेरिका का नाम नहीं, लेकिन प्रतिबंधों की आलोचना</strong><br>घोषणापत्र की सबसे अहम बातों में से एक है एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों का मुद्दा। घोषणापत्र में कहा गया हम अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों को लागू करने की निंदा करते हैं। हम फिर से कहते हैं कि ऐसे कदमों खासकर एकतरफा आर्थिक प्रतिबंधों और सेकेंडरी प्रतिबंधों के दूरगामी नकारात्मक असर होते हैं। इसमें यह भी कहा गया कि ऐसे कदमों का गरीबों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कानून और संयुक्त राष्ट्र चार्टर के खिलाफ एकतरफा दबाव वाले कदमों जिनमें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद से मंज़ूरी न लेने वाले प्रतिबंध भी शामिल हैं। दोनों ही बयानों में अमेरिका का नाम नहीं लिया गया है। लेकिन यह भाषा रूस और ईरान के लिए अहम है, जो ब्रिक्स के सदस्य हैं और जिन पर अमेरिका ने कई तरह की पाबंदियां लगा रखी हैं। ये दोनों देश लंबे समय से वॉशिंगटन की पाबंदी वाली नीतियों की आलोचना करते रहे हैं। इसलिए, इस भाषा में मॉस्को और तेहरान की एक अहम चिंता का ध्यान रखा गया है, लेकिन साथ ही घोषणापत्र को वॉशिंगटन पर सीधे हमले जैसा भी नहीं बनाया गया है। ब्रिक्स ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों के खिलाफ़ एकतरफ़ा टैरिफ और नॉन-टैरिफ़ उपायों को लेकर भी गहरी चिंता जताई है, और इसमें भी किसी देश का नाम नहीं लिया गया है। डोनाल्ड ट्रंप के व्हाइट हाउस में लौटने के बाद से यह मुद्दा और भी अहम हो गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ने बार-बार ब्रिक्स को अमेरिका-विरोधी कहा है। उन्होंने इस समूह के साथ जुड़ने वाले देशों पर अतिरिक्त 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने की धमकी दी है और डॉलर को कमज़ोर करने की कोशिशों पर 100 प्रतिशत ड्यूटी लगाने की चेतावनी भी दी है। ये तनाव सिर्फ़ ब्रिक्स समूह तक ही सीमित नहीं हैं। भारत को भी रूस से तेल खरीदने के कारण अमेरिकी टैरिफ़ का सामना करना पड़ा है। नई दिल्ली ने इस कदम को अनुचित, गैर-वाजिब और तर्कहीन बताया है और साथ ही अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने का संकल्प लिया है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/xi-jinping-made-a-massive-splash-in-india-just-before-leaving" target="_blank" rel="noopener">जाते-जाते भारत में बड़ा धमाका कर गए जिनपिंग, पूरी दुनिया हैरान!</a></h3><p><br><strong>बिना नाम लिए ईरान के पक्ष का समर्थन कैसे करता है यह घोषणापत्र</strong><br>पश्चिम एशिया के मुद्दे पर आम सहमति बनाना खास तौर पर मुश्किल था, क्योंकि ईरान और UAE इस टकराव को लेकर अलग-अलग राय रख रहे थे। ईरान ने इस बात के लिए भी BRICS की आलोचना की थी कि उसने अमेरिका और इज़राइल के हवाई हमलों के खिलाफ कोई बयान जारी नहीं किया, और वह इस समूह से समर्थन की उम्मीद कर रहा था। आखिरी घोषणापत्र में तेहरान के लिए ऐसी बातें कही गई हैं जिनका वह हवाला दे सकता है, लेकिन इसमें उसका नाम नहीं लिया गया है। BRICS ने नागरिक बुनियादी ढांचे और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की पूरी सुरक्षा-निगरानी वाली शांतिपूर्ण परमाणु सुविधाओं पर जानबूझकर किए गए हमलों पर गहरी चिंता जताई। इस हिस्से में ईरान, अमेरिका या इज़राइल का नाम नहीं लिया गया है। हालांकि, टकराव के संदर्भ में, यह तेहरान के उस तर्क का समर्थन करता हुआ दिखता है कि उसकी सुरक्षित परमाणु सुविधाओं पर हमले अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन थे। BRICS ने देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करने का भी आह्वान किया और पश्चिम एशिया में "अधिकतम संयम" बरतने की अपील की। सबसे अहम बात यह है कि यह हिस्सा सदस्यों के अपने-अपने राष्ट्रीय रुख को याद दिलाता है, जिससे युद्ध के बारे में अलग-अलग राय रखने वाले देश अपनी व्यक्तिगत स्थिति छोड़े बिना एक ही टेक्स्ट पर सहमत हो पाते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/what-threat-did-jinping-issue-to-trump-immediately-upon-returning-from-brics" target="_blank" rel="noopener">अगर तुमने...ब्रिक्स से लौटते ही जिनपिंग ने ट्रंप को क्या धमकी दे डाली?</a></h3><p><br><strong>इजरायल पर BRICS का सीधा निशाना, लेबनान से सेना वापस बुलाने की मांग</strong></p><p>BRICS घोषणापत्र में इजरायल को लेकर स्पष्ट और सख्त रुख अपनाया गया है। गाजा में जारी हिंसा पर चिंता जताते हुए BRICS ने फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन का विरोध किया है। साथ ही 1967 की सीमाओं के आधार पर पूर्वी यरुशलम को राजधानी बनाकर संप्रभु फिलिस्तीनी राष्ट्र के गठन के समर्थन को दोहराया गया है। घोषणापत्र में दक्षिण अफ्रीका की ओर से इजरायल के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) में चल रही कार्यवाही का भी उल्लेख किया गया। BRICS ने कहा कि गाजा में मानवीय सहायता की आपूर्ति सुनिश्चित करना इजरायल का कानूनी दायित्व है। लेबनान के मुद्दे पर BRICS ने युद्धविराम का स्वागत करते हुए सभी पक्षों से इसकी शर्तों का पालन करने और UNSC प्रस्ताव 1701 को पूरी तरह लागू करने की अपील की। साथ ही युद्धविराम के लगातार उल्लंघन और लेबनान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा की गई। घोषणापत्र में सीधे इजरायल से लेबनान के इलाकों से अपनी सेना वापस बुलाने को कहा गया। BRICS ने इजरायल से लेबनान सरकार के साथ हुए समझौते की शर्तों का सम्मान करने और उन सभी लेबनानी क्षेत्रों से अपनी सेनाएं हटाने का आह्वान किया, जहां वे अभी भी मौजूद हैं। UNSC Resolution 1701 को 2006 में इजरायल-हिजबुल्लाह युद्ध के बाद अपनाया गया था। इसमें इजरायली सेना की वापसी और दक्षिणी लेबनान में लेबनानी सेना तथा संयुक्त राष्ट्र शांति सैनिकों की तैनाती की बात कही गई थी। BRICS के घोषणापत्र में अमेरिका का नाम लिए बिना एकतरफा प्रतिबंधों की आलोचना की गई है। वहीं परमाणु प्रतिष्ठानों से जुड़े हिस्से में ईरान का नाम सीधे तौर पर नहीं लिया गया। लेकिन इजरायल का नाम स्पष्ट रूप से लिया गया और लेबनानी क्षेत्र से उसकी सेनाओं की वापसी की मांग की गई।&nbsp;<br><strong>तो, क्या भारत का रुख बदला है?</strong><br>सख्त भाषा के बावजूद, यह घोषणा अपने आप में भारत के रुख में कोई बुनियादी बदलाव नहीं दिखाती। ब्रिक्स (BRICS) घोषणा सभी 11 सदस्यों की सहमति वाला दस्तावेज़ है, न कि सिर्फ़ भारत का बयान। अध्यक्ष के तौर पर भारत का काम ऐसे तरीके खोजना था जिन्हें अलग-अलग हितों वाले देश स्वीकार कर सकें। भारत ने पश्चिम एशिया में बातचीत और कूटनीति की वकालत जारी रखी है, साथ ही फ़िलिस्तीन के लिए 'टू-स्टेट सॉल्यूशन' (दो-देश समाधान) का समर्थन किया है और इज़राइल के साथ करीबी रिश्ते भी बनाए रखे हैं। ब्रिक्स (BRICS) सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेशकियन की मुलाक़ात में, नई दिल्ली ने फिर से कहा कि विवादों को बातचीत और कूटनीति से सुलझाया जाना चाहिए। साथ ही, नेविगेशन, व्यापार और समुद्री यात्रियों की सुरक्षा के महत्व पर भी ज़ोर दिया गया। इसी तरह, भारत का व्यापक नज़रिया अलग-अलग गुटों के साथ संबंध बनाए रखने का रहा है। वह रूस और यूक्रेन, दोनों के साथ संपर्क बनाए हुए है, अमेरिका और इज़राइल के साथ भी उसके अहम संबंध हैं और ईरान के साथ भी बातचीत के रास्ते खुले रखे हैं। लेकिन जिस माहौल में भारत यह संतुलन बना रहा है, वह अब बदल गया है। ग्लोबल अनसर्टेनिटी का ही नतीजा है कि भारत चीन तमाम डिफरेंसेस को छोड़ के इस समय आगे बढ़ने के लिए तैयार है। तो मुझे नहीं लगता है भारत के लिए कोई डिप्लोमेटिक एक आप ये कहे कि कोई एम्बरेसमेंट होगा। भारत इससे और सशक्त होगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 13:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/israel-shocked-has-india-shifted-its-stance-distancing-itself-from-netanyahu-over-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[BRICS से मोदी का बड़ा धमाका, हिल गए ट्रंप, क्या Critical Minerals बदलेंगे दुनिया की चाल?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-big-move-at-brics-shakes-up-trump-will-critical-minerals-change-the-course-of-the-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लगातार बदलते हुए वैश्विक हालातों में जहां पल-पल अनिश्चितता और अराजकता के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे में हाल ही में जहां किर्गिस्तान की राजधानी बिकेक पे एससीओ का समिट खत्म हुआ। जहां दुनिया की तीन बड़ी महाशक्तियों जिनमें चीन, रूस और भारत शामिल है जो कि तीनों एशिया में हैं। उनके बड़े नेता वहां पर मौजूद रहे। चाहे चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हो, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन हो या भारत के प्रधानमंत्री मोदी हो। ऐसे में अब बारी है एक और समिट की जो कि दिल्ली में चल रही है। 18वां ब्रिक्स सम्मेलन जिसमें शामिल होने के लिए रूस के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली पहुंच चुके हैं। वहीं चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के भी भारत आने की तैयारियां जोर शोर से चल रही है। बैक चैनल से भी, डिप्लोमेटिक चैनल से भी। अगर ऐसा होता है तो फिर यह ऐतिहासिक होगा। क्योंकि अगर जिनपिंग भी भारत आते हैं तो यह करीब 7 साल के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा होगी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/preparations-underway-to-rename-the-strait-of-hormuz-to-the-trump-strait" target="_blank">Strait of Hormuz का नाम बदलकर Trump Strait रखने की तैयारी, Iran पर US का कड़ा रुख</a></h3><h2>दुनिया में टेंशन का माहौल</h2><div>इस साल यानी कि 2026 में ब्रिक्स का जो कमान है, जो अध्यक्षता है वो भारत के पास है। ब्रिक्स दुनिया की बड़ी अभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। इसमें भारत के अलावा रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका कोर मेंबर्स तो है ही। इनके साथ ही मिस्र यानी कि इजिप्ट, ईरान, इथियोपिया, यूएई यानी कि संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया भी शामिल है। ध्यान रखिए कि इसमें ईरान और यूएई दोनों शामिल है। जिनके बीच इस समय जंग के कारण ठनी हुई है। भारत की अध्यक्षता में पूरे साल अलग-अलग शहरों में बैठकें, मंत्री स्तरीय सम्मेलन और कई स्तर की चर्चाएं हो रही हैं। भारत का भी मुख्य फोकस ग्लोबल साउथ की आवाज मजबूत करने, आर्थिक सहयोग को बढ़ाने, ऊर्जा सुरक्षा को सुनिश्चित करने, डिजिटल तकनीक को शेयर करने और उसका इजाद करने, आतंकवाद से निपटने और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर है। यानी कि ब्रिक्स को सिर्फ राजनीतिक मंच नहीं बल्कि व्यापार, निवेश और विकास के बड़े मंच के तौर पर आगे बढ़ाने की तमाम देशों की कोशिश है।</div><h2>क्या है ब्रिक्स</h2><div>ब्रिक्स दुनिया की प्रमुख उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों का एक प्रभावशाली अंतर सरकारी संगठन है। इसके सदस्य शुरुआत में तो ब्राजील, रूस, भारत और चीन रहे यानी कि ब्रिक। लेकिन बाद में एक साल के बाद ही 2010 में दक्षिण अफ्रीका भी शामिल हुआ और इसे ब्रिक्स कहा जाने लगा। इसके बाद हाल ही के वर्षों में कई अन्य देश भी इसके साथ जुड़े। जिसमें इसकी कुल संख्या 10 प्रमुख देशों की हो चुकी है। नए सदस्य देशों में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और यूएई शामिल है। इसका मकसद वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद यानी कि जीडीपी और व्यापार में अपनी हिस्सेदारी को मजबूत करना है। न्यू डेवलपमेंट बैंक यानी कि एनडीबी के माध्यम से बुनियादी ढांचा और विकास परियोजनाओं को बढ़ावा देना है। और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों जैसे कि विश्व बैंक यानी कि वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ जैसे तमाम जो संगठन है संस्थान हैं वहां पर विकासशील देशों की बेहतर आवाज और सुधार सुनिश्चित करना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-dismissed-marco-rubio-proxy-claim" target="_blank">ईरान ने Marco Rubio के 'Proxy' दावे को किया खारिज, Houthis को बताया स्वतंत्र यमनी गुट</a></h3><h2>क्या ब्रिक्स से बढ़ेगा भारत का कद?&nbsp;</h2><div>अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का स्थान लगातार बढ़ रहा है। वजह साफ है। जब भी दुनिया पर संकट आया हमेशा भारत ने मदद का हाथ बढ़ाया। खास बात यह भी है कि भारत सिर्फ अपने लिए आवाज नहीं उठाता बल्कि भारत तो विकासशील देशों यानी कि ग्लोबल साउथ की मजबूत आवाज भी बन गया है। एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे देश भारत को अपने हितों के पैरोकार के तौर पर देखते हैं क्योंकि भारत एक ही समय में अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ यानी कि जैसे क्वाड जैसे संगठन है जिसमें जापान, ऑस्ट्रेलिया भी शामिल है या फिर G7 में भी आमंत्रित देशों के तौर पर सही। लेकिन लगभग हर बार शामिल होता आ रहा है। वहां पर यूरोप के देश भी मौजूद रहते हैं। फ्रांस, जर्मनी, इटली जबकि ब्रिक्स और एससीओ जैसे मंचों पर रूस और चीन के साथ संबंध निभा रहा है भारत। यह संतुलित कूटनीति ही साबित करती है कि भारत स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है। साथ ही भारत वैश्विक व्यापार और वित्तीय सुधारों में भी अपनी डिजिटल ताकत का लोहा मनवा रहा है। भारत का यूपीआई डिजिटल भुगतान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लेनदेन को आसान बनाने में बड़ी अहम भूमिका निभा रहा है।&nbsp;</div><h2>क्या चीन से सुलझेगा सीमा विवाद?&nbsp;</h2><div>भारत और चीन दोनों के बीच सीमा विवाद आज का नहीं है बल्कि दशकों पुराना है। दोनों के बीच एक बार जंग भी हो चुकी है 1962 में और दोनों के सैनिकों के बीच कई बार झड़पें भी हुई। डोकलाम गलवान इसका ताजा उदाहरण है। फिर भी चीन के साथ हमारा व्यापार बढ़ता जा रहा है। लेकिन इसमें ज्यादा फायदा चीन को है। भारत को नुकसान है। ऐसे में अगर राष्ट्रपति शनिपिंग भारत आते हैं तो उसमें एलएसी पर शांति और सीमा विवाद सबसे मुख्य मुद्दा हो सकता है। दोनों देश सीमा पर ऐसी व्यवस्था बनाने पर बात कर रहे हैं जिससे किसी सैन्य घटना या तनाव का असर द्विपक्षीय रिश्तों पर ना पड़े। जिनपिंग की संभावित यात्रा से पहले एनएसए अजीत डोभाल सीमा मुद्दे पर 25वें दौर की विशेष प्रतिनिधि वार्ता के लिए बीजिंग जा चुके हैं। वहां पर उनकी चीन के विदेश मंत्री वांग ही से मुलाकात भी हुई और चीन के उपराष्ट्रपति से भी मुलाकात हुई। दोनों देश वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी कि एलएसी पर चीन निर्धारण की प्रक्रिया में जो सीमा का निर्धारण है उसमें तेजी लाने और ठोस नतीजे पाने के लिए सहमत हुए हैं। साथ ही सीमा पर किसी भी तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए नए सैन्य संपर्क चैनल और हॉट लाइन स्थापित करने का भी फैसला लिया गया है। हालांकि वर्ष 2020 की गलवान घाटी की घटनाओं के बाद से रिश्तों में खटास आई है। अविश्वास पैदा हुआ है। उसे पूरी तरीके से खत्म करने में भी समय लगेगा।</div><h2>ब्रिक्स (BRICS) के एजेंडे में अहम मिनरल्स (critical minerals) इतने अहम क्यों हो गए हैं?</h2><div>ब्रिक (BRIC) की शुरुआत 2009 में ब्राज़ील, रूस, भारत और चीन के एक अनौपचारिक समूह के तौर पर हुई थी। यह समूह वित्तीय व्यवस्था में सुधार के मकसद से बना था, जिसे ज़्यादातर लोग पश्चिमी देशों के पक्ष में झुका हुआ मानते थे।</div><div>2010 में दक्षिण अफ़्रीका इस समूह में शामिल हुआ, जिसके बाद इसका नाम बदलकर ब्रिक्स (BRICS) कर दिया गया। शुरुआती सालों में, यह समूह मुख्य रूप से मैक्रो-इकोनॉमिक और डेवलपमेंट फ़ाइनेंस से जुड़े मुद्दों पर तालमेल बिठाने वाले मंच के तौर पर काम करता था। इस दिशा में इसकी सबसे ठोस उपलब्धि 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' की स्थापना थी। 2024 में, ब्रिक्स ने चार नए पूर्ण सदस्य देशों — मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) — को शामिल किया और 2025 में इंडोनेशिया इसका पूर्ण सदस्य बना। ब्रिक्स के सहयोगी देशों में बेलारूस, बोलीविया, क्यूबा, ​​कजाकिस्तान, मलेशिया, नाइजीरिया, थाईलैंड, युगांडा, उज्बेकिस्तान और वियतनाम शामिल हैं। सऊदी अरब को इस समूह का पूर्ण सदस्य माना जाता है; हालाँकि, देश ने अभी तक इसमें शामिल होने के अपने इरादे की औपचारिक घोषणा नहीं की है, जिससे उसकी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अफ्रीका, दक्षिण एशिया, दक्षिण-पूर्व एशिया, पश्चिम एशिया, मध्य एशिया और लैटिन अमेरिका तक फैले इस समूह में दुनिया की 49.5 प्रतिशत आबादी रहती है, और यह वैश्विक जीडीपी का 40 प्रतिशत तथा वैश्विक व्यापार का 26 प्रतिशत हिस्सा है। अगले कुछ सालों में, जैसे-जैसे ब्रिक्स का विस्तार हुआ, इसका एजेंडा भी बढ़ा। इसमें आतंकवाद-रोधी सहयोग, टेलीकम्युनिकेशन, कृषि, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, श्रम, और बहुपक्षीय संगठनों व वित्तीय प्रणालियों में सुधार जैसे मुद्दे शामिल किए गए। रूस की अध्यक्षता में हुए 2024 कज़ान शिखर सम्मेलन में 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) औपचारिक रूप से ब्रिक्स के एजेंडे का हिस्सा बने। कज़ान शिखर सम्मेलन में जियोलॉजिकल प्लेटफॉर्म बनाने को भी मंज़ूरी दी गई, हालाँकि इसे अभी तक पूरी तरह से लागू नहीं किया गया है।</div><h2>ब्रिक्स सदस्य देशों की 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में क्या भूमिका है?</h2><div>ब्रिक्स सदस्य देशों के पास 'क्रिटिकल मिनरल वैल्यू चेन' में खास खूबियां हैं। इनमें एनर्जी ट्रांज़िशन, डिफेंस अपग्रेडेशन, आर्थिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटलाइज़ेशन के लिए ज़रूरी अनछुए भंडार से लेकर मिडस्ट्रीम प्रोसेसिंग, कैपिटल एक्सपेंडिचर और बड़े कंज्यूमर मार्केट तक शामिल हैं। अगर इन खूबियों को एक साथ लाया जाए, तो यह ब्लॉक वैल्यू चेन को बेहतर बनाने में मदद कर सकता है। अभी यह चेन बिखरी हुई है; जिन देशों के पास अनछुए भंडार हैं, उनके पास प्रोसेसिंग की क्षमता नहीं है, जबकि जिन देशों में कंज्यूमर डिमांड और कैपिटल है, उनके पास रिसोर्स की कमी है। ब्रिक्स सदस्य देशों के पास रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REE) के बड़े भंडार हैं। इनमें चीन के पास सबसे बड़ा और ब्राज़ील के पास दूसरा सबसे बड़ा भंडार है। साथ ही, इनके पास ग्रेफाइट के भी बड़े भंडार हैं। ब्राज़ील के पास लिथियम और कॉपर के भी काफी भंडार हैं। अकेले इंडोनेशिया दुनिया के निकेल उत्पादन का आधे से ज़्यादा हिस्सा पैदा करता है और कोबाल्ट का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। भारत में REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है। रूस और दक्षिण अफ़्रीका प्लेटिनम ग्रुप की धातुओं के मुख्य उत्पादक हैं। रूस के पास निकेल और तांबे का भी बड़ा भंडार है। ब्रिक्स (BRICS) के सहयोगी देशों के पास भी खनिजों का बड़ा भंडार है। बोलीविया 'लिथियम ट्राएंगल' का हिस्सा है, जिसके पास दुनिया का आधे से ज़्यादा लिथियम भंडार है। साथ ही, कजाकिस्तान में यूरेनियम का सबसे बड़ा भंडार है और वह यूरेनियम का प्रमुख उत्पादक है; इसके अलावा, वह तांबे का भी एक महत्वपूर्ण उत्पादक है। वियतनाम में भी REE और ग्रेफाइट का काफ़ी भंडार है।</div><h2>भारत ज़रूरी मिनरल सप्लाई चेन में कमियों को कैसे दूर कर सकता है?</h2><div>एक भरोसेमंद पार्टनर के तौर पर भारत की पहचान कोई नई बात नहीं है। गुटनिरपेक्ष रहने की परंपरा, 'ग्लोबल साउथ' की आवाज़ बनने का लंबा इतिहास और चीन के उलट, छोटे या गरीब देशों के खिलाफ़ संसाधनों पर निर्भरता का इस्तेमाल कूटनीतिक हथियार के तौर पर न करने का रिकॉर्ड — इन सब वजहों से नई दिल्ली को सिर्फ़ संसाधन निकालने वाली ताकत के बजाय एक डेवलपमेंट पार्टनर के तौर पर देखा जाता है।भारत विकासशील और विकसित दुनिया के बीच एक ईमानदार बातचीत करने वाले देश के तौर पर उभरा है, और यह भूमिका भरोसे पर टिकी है। भारत ने अपनी इस स्थिति का इस्तेमाल जयपुर में ब्रिक्स 2026 ट्रेड मिनिस्टर्स की मीटिंग और नई दिल्ली में ब्रिक्स एनवायरनमेंट मिनिस्टर्स की 12वीं मीटिंग में ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने के लिए किया है। मंत्रियों की मीटिंग से आगे बढ़कर, भारत लंबे समय से ज़रूरी मिनरल्स को सहयोग का ज़रिया बनाने की वकालत करता रहा है। उसने जियोलॉजिकल प्लेटफ़ॉर्म को पूरी तरह से चालू करने की भी पैरवी की है, जिसके ज़रिए ब्रिक्स देशों के बीच डेटा-शेयरिंग, निकालने की टेक्नोलॉजी और जियोलॉजिकल रिसर्च में सहयोग हो सके।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 14:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-big-move-at-brics-shakes-up-trump-will-critical-minerals-change-the-course-of-the-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[AI इंसानों को भी खत्म कर देगा, 2030 तक ला देगा दुनिया में कैसी तबाही! किसने बजा दी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस वाले  महाखतरे की घंटी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-ai-wipe-out-humanity-what-kind-of-devastation-will-it-unleash-on-the-world-by-2030]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मेल लिखवाना हो, 80 के दशक वाली फोटो बनवानी हो, किसी कंपनी का कारोबार खंगालना हो या एक लाइन के आईडिया से पूरी फिल्म की स्क्रिप्ट लिखनी हो, एआई सब कुछ एक सांस में कर सकता है। यह भी कह देता है कि आप चाहे तो मैं इसका वो वाला वर्जन बना दूं जो बिल्कुल ऐसा लगे कि इंसान ने बनाया है। लेकिन क्या एआई इंसान के अस्तित्व के लिए भी भविष्य में कभी खतरा बन सकता है। खतरे की बात गाहे बगाहे कही जाती रही है। लेकिन अब एक बड़ा डेवलपमेंट हुआ। एआई बनाने वाली दुनिया की एक बड़ी कंपनी एंथ्रोपिक के रिसर्चर जैकब कॉक्सन ने कंपनी छोड़ दी है। एंथ्रोपिक कंपनी के रिसर्च स्कॉलर जेकब कॉक्सन ने अपने इस्तीफे की जानकारी सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर दी। अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा एंथ्रोपिक और ओपन एi जैसी कंपनियां तेजी से इंसानों से भी ज्यादा समझदार एआई यानी कि सुपर इंटेलिजेंस बनाने की होड़ में लगी हुई हैं और यह लापरवाही लोगों की जिंदगी को खतरे में डाल रही है। ऐसा क्या हुआ जिसने एंथ्रोपी के कर्मचारी को इस्तीफा देने पर मजबूर कर दिया। जैकब कॉक्सन ने एक्स पर एक लंबा थ्रेड पोस्ट करते हुए इसका कारण बताया है। कॉक्सन का दावा यह था कि एआई लैब के अंदर लोग इस खतरे को अच्छी तरह समझते हैं। फिर भी काम चलता जा रहा है। एआई बनाने वाले भी यह मानते हैं कि एआई हम सभी को खत्म कर देगा। कॉक्सन ने आगे यह भी लिखा कि बड़ी-बड़ी कंपनियों के अधिकारी और रिस्चरर्स मीडिया के सामने तो बहुत सोच समझकर और जिम्मेदारी से भरी बातें करते हैं। लेकिन मैंने उन्हें लोगों को प्राइवेट में डर जताते हुए सुना है। यह लोग जो सिस्टम बनाए जा रहे हैं वो किसी भी चीज को हैक कर सकता है। रातोंरात किसी भी इलाके में क्रांति ला सकता है और असली ताकत और रिसोर्सेज हासिल कर सकता है और यह ग्रोथ बिल्कुल भी धीमी नहीं पड़ रही है। उन्होंने उन दोनों कंपनियों के बीच का फर्क भी साफ किया जहां उन्होंने काम किया था। उन्होंने लिखा ओपन एआई में कई लोगों ने इस खतरे को गंभीरता और सिविलाइजेशन पर पड़ने वाले असर को गहराई से महसूस नहीं किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/anthropic-researcher-jacob-coxon-resigns-superintelligence-race" target="_blank">Anthropic के शोधकर्ता Jacob Coxon ने दिया इस्तीफा, Superintelligence पर उठाए सवाल</a></h3><h2>समझ का फर्क&nbsp;</h2><div>एआई को लेकर चेतावनी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि जितने शक्तिशाली मॉडल बन रहे हैं, उनके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया उतनी ही जटिल और कम पारदर्शी होती जा रही है। ऐसा नहीं है कि यह स्थिति अचानक आई। मार्च 2023 में इलॉन मस्क, एपल के को-फाउंडर Steve Wozniak समेत कई हस्तियों ने AI के डिवेलपमेंट को लेकर चेताया था। इसके अलावा, एक बड़ी चिंता पर्यावरण को लेकर है। भारी-भरकम सर्वर और डेटा सेंटर बहुत बड़ी मात्रा में बिजली-पानी की खपत कर रहे हैं। इनकी वजह से कार्बन उत्सर्जन बढ़ रहा है। हालांकि इन सारी बातों का यह मतलब बिल्कुल नहीं है कि तकनीक को यहीं पर रोक दिया जाए। AI ने मेडिकल, एजुकेशन, साइंस, रिसर्च और एग्रो सेक्टर में बड़े बदलाव की क्षमता दिखाई है। आज संसाधनों पर जितना दबाव है और दुनिया के सामने जिस तरह की चुनौतियां हैं, उनमें AI सहयोगी हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/openai-chief-scientist-jakub-pachocki-ai-growth-warning" target="_blank">OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक Jakub Pachocki ने दी चेतावनी, AI के तेज विकास के लिए दुनिया तैयार नहीं</a></h3><h2>कड़ी निगरानी की दरकार</h2><div>&nbsp;OpenAI के मुख्य वैज्ञानिक जैकब&nbsp; ने हाल में कहा था कि AI जिस रफ्तार से आगे बढ़ रही है, उसके लिए इंसान तैयार नहीं हैं। आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की सुरक्षा और निगरानी पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। सरकारों और दूसरी संस्थाओं को भी इसमें भूमिका निभानी होगी। केवल कंपनियों के भरोसे सब नहीं छोड़ा जा सकता। बेलगाम होड़ के बजाय सिक्योरिटी को प्राथमिकता देनी चाहिए और सबसे जरूरी, इस क्षेत्र से जुड़ी आवाजों को गंभीरता से सुनना चाहिए।</div><h2>एंथ्रोपिक में काम करने वाले साइंटिस्ट ने कौन से 5 प्वाइंट सामने रखे</h2><div>एंथ्रोपिक में काम करने वाले उनके दो साथियों ने भी इस बात का समर्थन किया है। एंथ्रोपिक के अलाइनमेंट साइंस लीड इवान ह्यूमबिगर ने वार्निंग दी है कि आने वाले 10 सालों में एआई की वजह से इंसानों का वजूद खतरे में पड़ने की 10% से ज्यादा आशंका है। उन्होंने साफ कहा कि उनकी कंपनी बेहतर कोशिश तो कर रही है लेकिन एआई को काबू में रखने के लिए अभी तक उनके पास कोई ठोस प्लान नहीं है। यूबिंगर के मुताबिक असली खतरा आज के एआई से नहीं बल्कि उस सुपर एआई से है जो खुद को तेजी से और बेहतर बनाने में लगा हुआ है। इसी एंथ्रोपिक के एक दूसरे एंप्लॉय ने तस्वीर को और ज्यादा क्लियर करने के लिए पांच पॉइंट्स को भी सामने रखा। एंथ्रोपिक के साइंस ग्रुप में कॉग्निटिव ओवरसाइट टीम के हेड सेमुअल मार्क्स ने एक पोस्ट के जरिए पूरी स्थिति को समझाया। उनका पहला पॉइंट यह था कि एआई डेवलपर्स का खुद यह मानना है कि उनकी तकनीक कुछ ही सालों में इंसानी वजूद को पूरी तरह खत्म कर सकती है और यह चिंता सीनियर कर्मचारियों में सबसे ज्यादा है। दूसरा इसके बावजूद भी वो सिर्फ बिजनेस के फायदों और इस सोच की वजह से काम जारी रखे हुए हैं कि वह खुद से कम जिम्मेदार कॉम्पिटिट से आगे निकलने की होड़ में है। तीसरा एआई को आर्म सॉफ्टवेयर की तरह प्रोग्राम नहीं किया जा सकता। यह मिसबिव करने लग जाता है। चौथा पॉइंट मौजूदा तरीका एआई को बेहतर बिहेव करने के लिए कह सकते हैं, लेकिन उन्हें पूरी तरह से सुरक्षित और काबू में नहीं कर सकता। पांचवा कंपनी के कई कर्मचारी एआई को ज्यादा सेफ तरीके से बनाने के लिए रास्ते ढूंढने के लिए रफ्तार को बेहद धीमी करना चाहते हैं।</div><h2>अपना आईपीओ लाने की तैयारी</h2><div>कॉक्सन का इस्तीफा ऐसे समय में आया है जब एंथ्रोपिक अपना आईपीओ लाने की तैयारी कर रही है। खबरें बता रही है कि यह इतिहास के सबसे बड़े आईपीओ में से एक हो सकता है। कंपनी की संभावित वैल्यू्यूएशन करीब 2 ट्रिलियन तक होने की खबरें हैं। जेकब के इतने बड़े आरोप हैं जिसमें यह भी शामिल है कि इसी डेकेड के आखिर तक इंसानियत के लिए एआई खतरा पैदा कर सकता है। एंथ्रोपिक ने फिलहाल इस पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन एंथ्रोपिक में अलाइनमेंट साइंस के लीड इवान गुबिंगर ने जैकब के बयान पर सहमति जताई है। एक्स पर लिखा कि हम सच में मानते हैं कि एआईए सभी इंसानों को मार सकता है। मेरा अनुमान है कि अगले 10 साल में ऐसा होने की संभावना 10% ज्यादा है। मेरा विश्वास है कि एंथ्रोपिक अपनी तरफ से पूरी कोशिश कर रहा है। लेकिन सुपर इंटेलिजेंस को पूरी तरह सुरक्षित और नियंत्रित रखने का कोई पक्का प्लान अभी हमारे पास नहीं है और हम उस दिशा में स्पष्ट रूप से आगे भी नहीं बढ़ रहे। और यह चिंताएं लगातार उठाई जा रही हैं।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 14:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-ai-wipe-out-humanity-what-kind-of-devastation-will-it-unleash-on-the-world-by-2030</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पूर्वी प्रांत ने कैसे लिया राइट टर्न, Germany के सबसे खतरनाक आदमी को मिलने वाली है सत्ता?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-eastern-province-take-a-right-turn-is-germany-most-dangerous-man-set-to-gain-power]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किस तरह एक विधानसभा चुनाव ने जर्मनी के भीतर भौगोलिक और वैचारिक दरार को इतना पुख्ता कर दिया है कि इसे देश के आधुनिक दौर का सबसे खतरनाक पल माना जा रहा है और क्यों जर्मनी के एक असेंबली रिजल्ट से पुतिन बहुत खुश होंगे। इस बरस 3 अक्टूबर को जर्मनी अपना 36वां टाक डे डचिन आइनहाइट मनाएगा यानी एकीकरण दिवस। 3 अक्टूबर 1990 को दो हिस्सों में बटे जर्मनी के एक होने की सालगिरह। उसी दिन जर्मन डेमोक्रेटिक रिपब्लिक जीडीआर आधिकारिक रूप से खत्म हो गया। लेकिन जमीन पर जर्मनी के दो हिस्सों का बंटवारा कायम रहा और यह विभाजन लगातार गहराता गया और इसी की एक परिणति हुई इस 6 सितंबर को बैलेट पेपर के जरिए। जर्मनी के 16 राज्यों में से एक आकार में बम मुश्किल भारत के मणिपुर या मिजोरम जितना बड़ा करीब सवा 5 लाख की आबादी। एएफडी यानी अल्टरनेटिव फॉर डचैंड। 2026 में 39 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी 2021 के चुनाव में इसे 23 सीटें मिली थी। सीडीयू यानी क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन। जर्मनी में अभी केंद्र में जो सरकार है उसका नेतृत्व इसी के पास है और सेक्सनी अनहल्ट में राज्य सरकार को भी यही इसी यही पार्टी लीड कर रही थी। ताजा चुनाव में उसे मिली 15 सीटें। पिछले चुनाव में मिली थी 40 सीटें। डी लिंकर यानी लेफ्ट पार्टी को अभी मिली आठ, 2021 में 12 सीट, एसपीडी यानी सोशल डेमोक्रेट्स को 2026 में आठ सीट, 2021 में नौ सीट, ग्रीस को अभी आठ, 2021 में छह सीट, बीएसडब्ल्यू यानी ज़ारा वागन क्लिष्ट पार्टी को पांच सीट।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-the-name-of-raghav-chadha-bjp-rajya-sabha-member-from-punjab-added-to-the-voter-list" target="_blank">दिल्ली की मतदाता सूची में राघव चड्ढा का नाम शामिल, AAP ने उठाए प्रक्रिया पर सवाल</a></h3><h2>35 साल के उलरिष जीत के हीरो</h2><div>35 साल के उलरिष जिगमुंड 2016 से सैक्सनी अनहाल्ट की विधानसभा के सदस्य है। सोशल मीडिया पर अच्छी पकड़ है। माना जाता है कि उनकी जीत में Gen Z के समर्थन का बड़ा हाथ है। वह अपनी पार्टी के कट्टरपंथी नेताओ के मुकाबले ज्यादा नरम माने जाते है। जिगमुंड ने कहा कि लोगों ने साफ कर दिया है कि वे राजनीतिक बदलाव चाहते हैं।</div><div><br></div><h2>प्रवासियों पर कड़े</h2><div>AfD का जोर अवैध प्रवास रोकने, प्रवासियों को मिलने वाली सुविधाओं में कटौती और बड़ी संख्या में लोगों को वापस भेजने की नीति पर है। चुनाव में यह बहस का मुद्दा बना।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/aap-leader-saurabh-bhardwaj-makes-a-serious-allegation-regarding-the-satya-niketan-incident" target="_blank">Satya Niketan हादसे में AAP नेता Saurabh Bhardwaj का गंभीर आरोप, बचाव कार्य में Mobile Jammers का हुआ इस्तेमाल</a></h3><h2>चांसलर को झटका</h2><div>जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ल्स और उनकी पार्टी क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स (सीडीयू) के लिए बड़ा झटका है, जिसे महज 17.2% वोट मिले है। CDU 24 साल से इस प्रांत में सत्ता में थी।</div><h2>AfD की जीत से जुड़े सवाल पूर्वी जर्मनी के एक छोटे राज्य में धुर-दक्षिणपंथी पार्टी</h2><div>AfD की जीत से पूरे यूरोप में खलबली मची है। जर्मनी में जिन वजहों से पार्टी को जीत मिली, वैसे मुद्दे ब्रिटेन, फ्रांस, इटली, स्पेन में भी उठाए जाते रहे है। अगले साल फ्रांस, इटली, स्पेन में चुनाव है, जहां धुर-दक्षिणपंथी नेता मजबूत हो रहे है। ये AfD के तरीकों का इस्तेमाल कर चुनाव जीतने की कोशिश कर सकते है। पर इन नेताओं का सत्ता में आना उदारवादी लोकतंत्र के लिए बुरी खबर है।</div><div>रूस ने इस जीत को ऐतिहासिक बताया है। फ्रांस ने इसे पूरे यूरोप के लिए गंभीर समय बताया है। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर नतीजे की तस्वीर साझा की।</div><h2>इनकी छवि कैसी है?</h2><div>एक प्रतिष्ठित जर्मन पत्रिका है डे एश पीगल। 14-15 अगस्त को आई मैगज़ीन की कवर स्टोरी पर उलश की तस्वीर थी। शीर्षक था जर्मनी में सबसे खतरनाक इंसान ना उलरिश और ना उनके समर्थकों को इस विशेषण से कोई फर्क पड़ा बल्कि वो इसे कॉम्प्लीमेंट की तरह सराते दिखे। इलेक्शन कैंपेन से यह तस्वीरें आई कि किस तरह सपोर्टर टीशर्ट पर शपीगल कवर स्टोरी की फोटो छपवाकर घूम रहे थे। यहां तक कि शपीगल के उस एडिशन पर उलश से दस्तखत की फरमाइश भी हो रही थी। क्या है परिचय उलश का?</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 13:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-eastern-province-take-a-right-turn-is-germany-most-dangerous-man-set-to-gain-power</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सहयोग, समावेश और समाधान...BRICS में क्या खेला करने भारत आ रहे रूस, चीन और ईरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-moves-are-russia-china-and-iran-planning-to-make-in-brics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ब्रिक्स की अध्यक्षता भारत के पास है। बहुत बड़ी बैठक इसी महीने नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है। दुनिया की नजरें ब्रिक्स की बैठक पर है। 2026 में भारत ब्रिक्स की अध्यक्षता में बैठक कर रहा है, वो कहां करने वाला है? ये नई दिल्ली में भारत मंडपम में 12 13 सितंबर को ब्रिक्स देशों की बैठक होगी और इसके लिए पहले भी साल भर वर्किंग ग्रुप्स हैं, मंत्रियों स्तर की बैठक है, सीजीआई स्तर की बैठक है, बैंकिंग स्तर की बैठक है, एनएसए लेवल की बैठक है। ये सब कुछ पहले ही भारत में हो चुका है। और अब राष्ट्रीय अध्यक्षों के बीच यह बैठक 12 13 सितंबर को नई दिल्ली में आयोजित होने वाली है।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-to-unveil-a-new-mantra-from-new-delhi-regarding-the-agenda-for-reforming-currency" target="_blank">BRICS Summit 2026: अपनी Currency और Global Governance में सुधार का एजेंडा, New Delhi से PM Modi देंगे नया मंत्र</a></h3><h2>ब्रिक्स क्या है?&nbsp;&nbsp;</h2><div>ब्रिक्स उभरते हुए बाजारों और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं वाले 11 प्रमुख देशों का एक ग्रुप है जिसमें ब्राजील, चीन, मिस्र, इथोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात है। ये जो ब्रिक्स है इसमें जो सबसे बड़ी बात है वो ये कि ये जो ग्लोबल और क्षेत्रीय मुद्दों के साथ ही अंतरराष्ट्रीय, राजनीतिक और आर्थिक गवर्नेंस से जुड़े मामलों पर लगातार बातचीत करता है। और सहयोग के लिए एक अहम मंच है और यही वजह है कि ब्रिक्स का जब भी नाम आता है तो अमेरिका की धड़कनें बढ़ जाती हैं। क्योंकि अमेरिका को लगता है कि ब्रिक्स के जरिए डॉलर को धराशाई करने का प्लान है और डॉलर को ठेंगा दिखा के अगर ब्रिक्स देश आपस में ही कोई अपनी करेंसी बना ले कोई अपना ट्रांजैक्शन सिस्टम बना ले तो अमेरिका को एक बड़ा झटका लग सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/brics-economic-partnership-strategy-2030-new-delhi-summit-to-shape-future-global-trade-policy" target="_blank">BRICS Economic Partnership Strategy 2030: नई दिल्ली शिखर सम्मेलन से तय होगी भविष्य की ग्लोबल ट्रेड नीति, मजबूती और इनोवेशन' पर टिकी दुनिया की नजर</a></h3><h2>ब्रिक्स की थीम क्या है?&nbsp;</h2><div>इसके लोगो में भारत के राष्ट्रीय फूल कमल है। इसके बीच में नमस्ते की मुद्रा है। इसे एक पब्लिक डिजाइन प्रतियोगिता के जरिए चुना गया। इसमें पंखुड़ियों में ब्रिक्स के सभी सदस्य देशों का रंग है जो इसकी आधिकारिक थीम से जुड़े हुए हैं। मजबूत इनोवेशन, सहयोग और सेंसबिलिटी का निर्माण।&nbsp;</div><h2>कौन-कौन संभावित रूप से इस बैठक में हिस्सा लेने के लिए आ सकता है</h2><div>इसमें जो सबसे पहला नाम है वो रूस के राष्ट्रपति व्लादमीर पुतिन का है जिनका आना लगभग तय माना जा रहा है। चीन के राष्ट्रपति शी जिजिंगपिंग के भी दौरे की जानकारी है कि वो भी इस दौरे पर आ सकते हैं। इसके अलावा ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजिशियान भी भारत में अपनी मौजूदगी दर्ज करा सकते हैं। यानी कि तीन अहम राष्ट्रपति भारत जो हैं वैश्विक नेता जो हैं वह भारत में ब्रिक्स की बैठक में हिस्सा लेने के लिए इस बार नई दिल्ली की यात्रा कर सकते हैं। यह बहुत महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन है। यह सम्मेलन ऐसे वक्त में हो रहा है जब मध्य पूर्व और यूरोप में जो है वो युद्ध के कारण भू राजनीतिक तनाव जो है वो अपने चरम पर है और अमेरिका को लेकर भी बहुत उथल-पुथल है। इसके अलावा माना जा रहा है कि अब जो है समूह का विस्तार जो है वो एशिया, अफ्रीका, मध्यपूर्व और लैटिन अमेरिका तक हो गया है। उम्मीद है कि इस पूरे ब्लॉक के नेता और वरिष्ठ प्रतिनिधि भी आपको एक साथ नजर आएंगे। सम्मेलन के लिए बताया जा रहा है कि नई दिल्ली आने वाले राष्ट्रीय अध्यक्षों में जो है दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा भी शामिल हो सकते हैं। मिस्र के राष्ट्रपति अब्दुल फतेह अलसीसी भी शामिल हो सकते हैं। बेलारूस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको भी आ सकते हैं। कजाकिस्तान के राष्ट्रपति कासिम जोरमाट टोकयो भी और इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रोबो सुबानतो भी शामिल हो सकते हैं। मान जानकारी यह भी है कि मलेशिया, थाईलैंड, इथोपिया के भी पीएम जो हैं वह इस शिखर सम्मेलन में शामिल हो सकते हैं। जबकि क्यूबा, नाइजीरिया, उज्बेकिस्तान का प्रतिनिधि जो है उनके राष्ट्रपतियों के द्वारा जो है वो किया जा सकता है। इसके अलावा माना जा रहा है कि कई अहम देशों के मंत्री जो हैं अह वो घरेलू व्यवस्थाओं में जो है लूला डिसिलवा शामिल नहीं हो पाएंगे।&nbsp;इसके अलावा युगांडा का प्रतिनिधित्व मंडल आएगा। वहीं वियतनाम के पीएम भी आ सकते हैं। और संयुक्त अरब अमीरात के प्रतिनिधि जो हैं वो अबू धाबी के क्राउंस प्रिंस शेख खालिद बिन मोहम्मद बिन ज़द अल नहायन कर सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 08 Sep 2026 12:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-moves-are-russia-china-and-iran-planning-to-make-in-brics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[The Great Migration Story: भारत की 'हां' और बदला दुनिया का नक्शा, लेकिन शर्त क्यों लगाई, जब इंसानों ने पहली बार अफ्रीका के बाहर रखा कदम, फिर क्या हुआ?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/india-said-yes-and-the-world-map-changed-but-why-was-a-condition-imposed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>संयुक्त राष्ट्र संघ यानी कि यूनाइटेड नेशंस की जनरल असेंबली में दुनिया का पारंपरिक नक्शा बदलने का प्रस्ताव पारित हो गया है। नक्शे को बदलने के लिए अफ्रीकी देश टोगो की ओर से करेक्ट द मैप मुहिम चलाई गई थी। इसे अफ्रीकन यूनियन यानी कि एयू का समर्थन मिला था। प्रस्ताव में खासतौर पर अफ्रीका का आकार और हिस्सों को ज्यादा सही ढंग से दिखाने की बात कही गई थी। यूएन में इस प्रस्ताव को भारत, फ्रांस और इंग्लैंड समेत 164 देशों का समर्थन मिला है। जबकि एकमात्र अमेरिका ने इसके खिलाफ वोट किया है। इसके अलावा छह देशों स्टोनिया, जॉर्जिया, लिदवानिया, मुलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन ने वोटिंग से दूरी बनाकर रखी। यूएन में हुए इस मतदान से दुनिया भर के संस्थानों में इस्तेमाल होने वाले नक्शों में बदलाव आएगा। यह खबर कई सवालों को जन्म देती है। जैसे कि क्या अब दुनिया का नक्शा बदल जाएगा? मरकेटर मैप इक्वल अर्थ मैप में क्या अंतर है? आखिर 450 साल पुराने नक्शे ने दुनिया को इतना अलग क्यों दिखाया और नए नक्शे में अफ्रीका अचानक इतना बड़ा नजर क्यों आया? संयुक्त राष्ट्र महासभा यूएन ने एक नए विश्व मानचित्र को मंजूरी दी है जिसमें महाद्वीपों का आकार एक दूसरे के मुकाबले ज्यादा सही दिखाया गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/world-450-year-old-map--changed-resolution-to-this-effect-passed-at-the-un-leaving-the-us-rattled" target="_blank">बड़ा दिखेगा अफ्रीका, घटेगा US-यूरोप का आकार...बदल गया दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा, UN में पास हुआ ऐसा प्रस्ताव, बौखला गया अमेरिका</a></h3><h2>क्यों लाया गया यह प्रस्ताव?&nbsp;</h2><div>प्रस्ताव में कहा गया कि 16वीं सदी में नौवहन के उद्देश्य से तैयार 'मर्केटर प्रोजेक्शन' उपयोग अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। टोगो की पहल और अफ्रीकी देशों की अगुआई में लाए गए इस प्रस्ताव का मकसद खास तौर पर अफ्रीका के आकार को दुनिया के नक्शों में अधिक वास्तविक रूप में दिखाना है। इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा। बस आकार में बदलाव हो सकता है। क्योंकि, नया नक्शा सीमाएं नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है। भारत का नक्शा थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन बड़ा बदलाव नहीं होगा।</div><h2>मार्केटर क्या चीज है?</h2><div>मान लीजिए आपके हाथ में एक सेब है। सेब एकदम गोल। ठीक हमारी पृथ्वी की तरह। अब अगर आप उस सेब का छिलका उतारकर मेज पर बिल्कुल सपाट रख दें यानी समतल रख दें और फैलाने की कोशिश करेंगे तो वह किनारे से फटेगा या फिर आपको उसे जबरदस्ती खींचना पड़ेगा। यह भी हो सकता है। कुछ ऐसा उदाहरण आप संतरे को भी लेकर देख सकते हैं। जब आप संतरे को छीलते हैं और नीज पर रखते हैं तो शायद वो फैल भी सकता है या टूट भी सकता है। गोल धरती को चौकोर पन्ने पर उतारते वक्त भी बिल्कुल यही परेशानी आती है। करीब 450 साल पहले 1569 में गेराड्स मॉकेटर ने यही नक्शा तैयार किया था। उस दौर में हवाई जहाज नहीं थे। लोग समंदर में जहाजों से महीनों सफर करते। नाविक पानी में भटक ना जाए इसलिए मार्केटर ने नक्शे में रास्तों और दिशाओं को एकदम सीधी रेखाओं में रखा ताकि जहाजों को सही दिशा मिले। दिशाएं सीधी रखने के चक्कर में एक बड़ी भूल हुई। मार्केटर नक्शा समंदर में जहाजों को सही रास्ता दिखाने के लिए तो शानदार था लेकिन उसने दुनिया के देशों का असली आकार खराब कर दिया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/jaishankar-makes-a-massive-impact-upon-arriving-in-ukraine" target="_blank">भारत तैयार है...यूक्रेन पहुंचकर जयशंकर ने किया ऐसा धमाका, रूस-अमेरिका दोनों हो जाएंगे हैरान</a></h3><h2>क्या नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना होगा?</h2><div>यह प्रस्ताव गैर-बाध्यकारी है। मतलब, दुनियाभर में इस्तेमाल होने वाले सभी नक्शों को तत्काल मर्केटर से बदलना अनिवार्य नहीं है। मुख्य उद्देश्य अधिक सटीक और समानुपातिक कार्टोग्राफिक मेथेडोलॉजी को प्रोत्साहित करना है। वोट से पहले UN ने टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डूसी के हवाले से कहा, 'मैप दुनिया के बारे में हमारी समझ को आकार देते हैं। वे शिक्षा को गाइड करते है, कल्पना को बढ़ावा देते है और सामूहिक सोच पर असर डालते हैं।</div><h2>द ग्रेट माइग्रेशन</h2><div>धरती पर इंसानी सफर की बुनियाद अफ्रीका की सरजमीं से ही पड़ी, जिसे इतिहास में ‘द ग्रेट माइग्रेशन’ का नाम मिला। वैज्ञानिकों का भी यही मानना है कि इसी महाद्वीप से निकलकर इंसान दुनिया के कोने-कोने में बसे और सभ्यताओं का विस्तार हुआ। मगर वक्त का अजीब फेर देखिए—जिस भूभाग ने पूरी मानव जाति को पहचान दी, वही सदियों तक दुनिया के कागजों पर अपनी सही भौगोलिक पहचान और वास्तविक आकार के लिए संघर्ष करता रहा। अब संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक अहम प्रस्ताव को हरी झंडी दी है, जो दुनिया के सामने देशों और महाद्वीपों का बिल्कुल सटीक और यथार्थवादी खाका पेश करेगा। दरअसल, गोल घूमती धरती को किसी सपाट कागज पर हूबहू उतार पाना कभी आसान नहीं रहा। 16वीं सदी में जब तकनीक बेहद सीमित थी, तब 1569 में भूगोलवेत्ता गेरार्डस मर्केटर ने समुद्री जहाजों के रास्ते आसान करने के लिए एक नक्शा तैयार किया। उस दौर के व्यापार और नौवहन के लिए तो वह पैमाना कारगर रहा, लेकिन उसने भूगोल की सच्चाई को हमेशा के लिए उलझा दिया। ध्रुवों के पास वाले इलाके विशाल दिखने लगे और भूमध्य रेखा के करीब मौजूद अफ्रीका जैसे विशाल महाद्वीप नक्शे पर सिमट कर रह गए। कारोबार की सहूलियत के लिए बना वही खाका धीरे-धीरे देशों के आत्मसम्मान और उनकी अस्मिता की लड़ाई बन गया। अफ्रीकी मुल्क टोगो ने इस गैर-बराबरी को वैश्विक मंच पर मुखरता से उठाया, क्योंकि किसी भी समाज के लिए नक्शा सिर्फ जमीन का टुकड़ा नहीं, बल्कि उसकी पहचान का आईना होता है। किसी भी अनजान मुल्क में पैर रखने से पहले इंसान नक्शे की नजर से ही उससे नाता जोड़ता है, और सही पहचान के साथ इस सफर को महसूस करने का अपना एक अलग गौरव है।</div><h2>भारत ने क्या शर्त लगाई</h2><div>&nbsp;भारत ने इस प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया है। लेकिन भारत ने साथ ही साफ किया है कि इसका मतलब किसी एक खास वर्ल्ड मैप को मंजूरी देना नहीं है।&nbsp; विदेश मंत्रालय ने कहा है कि इस प्रस्ताव का देशों की सीमाओं, विवादित इलाकों या जगहों के नाम से कोई लेना देना नहीं है। भारत ने यह भी साफ़ किया है कि भारत का क्षेत्र जिसमें जम्मू कश्मीर और लद्दाख के केंद्र शासित प्रदेश भी शामिल है, उसे भारत के आधिकारिक नक्शे के मुताबिक ही दिखाया जाना चाहिए। विदेश मंत्रालय ने कहा है कि भारत की सीमा या क्षेत्र को गलत या भ्रामक तरीके से दिखाना भारत को मंज़ूर नहीं है। और भारत ने साफ़ कहा है कि अपनी संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता को लेकर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट है। इस मुद्दे पर भारत ना तो अपना रुख बदलेगा और ना ही कोई समझौता करेगा। तो बेसिकली भारत ने यूएन के इस प्रस्ताव का समर्थन तो किया है लेकिन अपनी सीमा औरसंप्रभुता को लेकर अपना रुख बिल्कुल साफ और गैर समझौतावादी रखा है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 07 Sep 2026 11:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/india-said-yes-and-the-world-map-changed-but-why-was-a-condition-imposed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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