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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Cheeni Kum hai! एथनॉल का असर या त्योहारों का, अचानक क्यों आसमान छूने लगे चीनी के दाम? 10 लाइन में समझें पूरा मामला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-sugar-prices-suddenly-skyrocketed-understand-whole-issue-in-10-lines]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जिस देश में दिन की शुरुआत सुबह की चाय से होती है, जहां त्यौहार मिठाई के बगैर अधूरे लगते हैं। जहां घर से लेकर दुकान तक चीनी रोजमर्रा की जरूरत है। वहां चीनी की कीमत सिर्फ एक कमोडिटी का रेट नहीं बल्कि घर के बजट का सवाल है। लेकिन इस बीच चीनी के दाम अचानक ऐसे भागे हैं कि बाजार में सवाल सिर्फ यह नहीं कि चीनी कितनी महंगी हुई बल्कि सवाल यह है कि आखिर चीनी इतनी महंगी क्यों हुई? सबसे बड़ा सवाल क्या आने वाले दिनों में इस महंगाई की मिठास और कड़वी होने वाली है? जिस चीनी के दाम कुछ समय पहले तक लगभग ₹45 किलो के आसपास थे उसमें बहुत कम समय में जबरदस्त उछाल आया है। चीनी के दाम बीते 20 दिनों में ₹22 तक की बढ़ोतरी हुई है।&nbsp; हालात तो यहां तक पहुंच गए हैं कि दुनिया भर को चीनी बेचने वाला भारत अब इसके आयात की तैयारी कर रहा है। जमाखोरी रोकने की तरकीबें निकाली जा रही हैं और आपातकालीन स्टॉक को मार्केट में उतारने की तैयारियां की जा रही हैं। ऐसे में आज के एमआरआई में हम चीनी के इसी कड़वे अर्थशास्त्र को डिकोड करेंगे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/did-you-hear-this-statement-by-a-bihar-government-minister-regarding-rising-sugar-prices" target="_blank">आजकल सब डायबिटीज के शिकार हो रहे हैं...चीनी की बढ़ती कीमतों पर बिहार सरकार के मंत्री का ये बयान सुना आपने?</a></h3><h2>1. 12 दिन के भीतर 21% दाम बढ़े</h2><div>सबसे पहले ग्राउंड रियलिटी यानी दामों की बात करते हैं। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक 18 अगस्त 2026 को देश में चीनी का औसत रिटेल दाम 52.3 प्रति किलो था। पिछले साल के मुकाबले 13% ज्यादा। लेकिन यह तो सिर्फ एक सरकारी औसत है। असली कहानी तो गली मोहल्ले की दुकानों पर चल रही है। महज 12 दिन के भीतर यानी 7 अगस्त से लेकर 1920 अगस्त के बीच प्रमुख शहरों में चीनी के दाम 19 से 21% तक बढ़ चुके हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिटेल मार्केट में जो चीनी ₹52 किलो बिक रही थी, वह अब ₹62 तक पहुंच गई है। महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिसे चीनी व्यापार के एक बड़े सेंटर के तौर पर जाना जाता है। वहां थोक चीनी के दाम अगस्त की शुरुआत से अब तक करीब 20% बढ़कर ₹5350 प्रति क्विंटल के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गए हैं। पंजाब के रिटेल मार्केट में चीनी ₹65 प्रति किलो तक बिक रही है। वहीं मुंबई और भोपाल जैसे शहरों में भी कीमतें 58 से ₹63 प्रति किलो के बीच झूल रही हैं। मार्केट के जानकारों का मानना है कि आगे वाले दिनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं। ऐसे में सवाल है कि जिस देश ने 2021-22 में 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी दुनिया भर में बेची, जो लगातार दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक रहा है, वहां अचानक चीनी कम कैसे पड़ गई?&nbsp;</div><h2>2. देश में चीनी की मांग और सप्लाई का असली खेल क्या है?</h2><div>भारत में सालाना करीब 2.83 करोड़ टन चीनी की घरेलू मांग रहती है। मौजूदा सीजन में देश 7 लाख टन चीनी का निर्यात भी कर चुका है। ऐसे में मौजूदा उत्पादन का स्तर घरेलू जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ निर्यात की मांग संभालने के लिए नाकाफी साबित हो रहा है, जिससे मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ गया है।</div><h2>3. इथेनॉल की बढ़ती मांग है क्या सबसे बड़ा विलन?</h2><div>भारत ने गन्ने का इस्तेमाल इथेनॉल बनाने में बढ़ा दिया है, क्योंकि वह आयातित कच्चे तेल पर अपनी निर्भरता कम करना चाहता है और E20 का लक्ष्य हासिल करना चाहता है। सरकार ने हाल के वर्षों में इस मकसद से कई डिस्टिलरी बनाने पर ज़ोर दिया है। ऑल इंडिया डिस्टिलर्स एसोसिएशन (AIDA) के मुताबिक, इससे इथेनॉल बनाने की क्षमता बढ़कर 2025 के मध्य तक 499 जगहों पर सालाना लगभग 1,822 करोड़ लीटर हो जाएगी। AIDA की ओर से इंडिया टुडे&nbsp; के साथ शेयर किए गए आंकड़ों के अनुसार, इथेनॉल बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले कच्चे माल (फीडस्टॉक) में गन्ने की हिस्सेदारी लगभग 30-35% है, जबकि बाकी हिस्सा मक्का और चावल से आता है। इस बदलाव का असर चीनी बाज़ार पर पड़ा है। लखनऊ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर और कृषि विशेषज्ञ सुधीर पंवार ने इंडिया टुडे&nbsp; को बताया एथेनॉल बनाने के लिए गन्ने का इस्तेमाल दूसरी तरफ़ मोड़ने की वजह से भारत में चीनी की कीमतें बढ़ गई हैं। पंवार का कहना है कि चीनी बाज़ार में इतनी ज़्यादा तंगी नहीं होनी चाहिए थी और उन्हें शक है कि कीमतों में इस उछाल के पीछे उत्पादन के अलावा और भी वजहें हैं। उन्होंने कहा चीनी के लिए बाज़ार का अनुमान इतना बुरा नहीं था, जिससे चीनी का स्टॉक रखने वालों और रिटेलर्स द्वारा बाज़ार में हेरफेर का संकेत मिलता है। उन्होंने आगे कहा, अगर गन्ने को एथेनॉल बनाने के काम में नहीं लगाया जाता, तो कीमतें काबू में रहतीं। उनकी मुख्य चिंता यह है कि भारत की ईंधन नीति खाने-पीने की चीज़ों की कीमतों की कीमत पर नहीं होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश योजना आयोग के पूर्व सदस्य पंवार ने बताया, गन्ने को इथेनॉल की ओर मोड़ने का काम चीनी की कीमत पर नहीं होना चाहिए और इससे खाने-पीने की चीज़ों के दाम भी नहीं बढ़ने चाहिए। हमें भारत में गन्ने के उत्पादन और चीनी की ज़रूरतों, साथ ही अंतरराष्ट्रीय हालात और चीनी की कीमतों के सही अनुमान की ज़रूरत है। फसल की बीमारी से सप्लाई की स्थिति पर भी असर पड़ा है। 2025-26 में, खासकर उत्तर प्रदेश में, फसल की बीमारी के कारण गन्ने की उत्पादकता और चीनी की रिकवरी में गिरावट आई। यह तब हुआ जब गन्ने की खेती का रकबा बढ़ा था। द टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई में गन्ने की खेती का रकबा धान, दाल, कपास और तिलहन जैसी अन्य फसलों की तुलना में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले 1.5% ज़्यादा था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/focus-on-sugar-stocks-what-instructions-has-the-government-issued-in-its-notification" target="_blank">चीनी के स्टॉक पर नजर, सरकार ने अपने नोटिफिकेशन में क्या निर्देश दिए हैं?</a></h3><h2>4. भारत चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी क्यों कम कर रहा है?</h2><div>सरकार की नीति से पता चलता है कि हालात कितनी तेज़ी से बदले हैं। ब्राज़ील के बाद भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा चीनी निर्यातक देश है। यह 1960 से चीनी का निर्यात कर रहा है और 2021-22 में इसने सबसे ज़्यादा, यानी 12 मिलियन टन से ज़्यादा चीनी का निर्यात किया था। लेकिन देश की निर्यात नीति धीरे-धीरे सख़्त होती गई क्योंकि सरकार ने घरेलू स्तर पर चीनी की उपलब्धता को प्राथमिकता दी। 2025-26 के चीनी सीज़न के लिए, भारत ने लगभग 2 मिलियन मीट्रिक टन का निर्यात कोटा मंज़ूर किया है, जो 2021-22 में निर्यात किए गए 12 मिलियन टन से कहीं कम है। इसके बाद 2026 में भारत ने 13 मई से 30 सितंबर तक चीनी के एक्सपोर्ट पर तुरंत रोक लगा दी। सरकार का मकसद घरेलू सप्लाई को सुरक्षित रखना, कीमतों को कंट्रोल करना और प्रोडक्शन तथा ग्लोबल कमोडिटी मार्केट में अनिश्चितता के लिए तैयारी करना था। यह रोक इसलिए अहम है क्योंकि इससे पहले भारत ने लंबे समय के लिए आम शिपमेंट पर पूरी तरह रोक लगाने के बजाय एक्सपोर्ट पर पाबंदियां, कोटा और मात्रा की सीमाएं तय करने का तरीका अपनाया था। पहले की पाबंदियों के दौरान भी, अमेरिका और यूरोपीय संघ जैसे देशों को छोटे कोटा-आधारित और खास प्राथमिकता वाले शिपमेंट जारी रहे थे। इन उपायों के बावजूद, घरेलू कीमतें लगातार बढ़ती रही हैं। ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन (AISTA) के अनुसार, मौजूदा 2025-26 मार्केटिंग ईयर में फरवरी तक भारत ने 2,01,547 टन चीनी का एक्सपोर्ट किया, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (UAE) सबसे बड़ा डेस्टिनेशन बनकर उभरा। अब, रिपोर्ट्स के मुताबिक, सरकार चीनी पर इंपोर्ट ड्यूटी कम करने के अगले कदम पर विचार कर रही है। इस कदम से लगभग एक दशक में पहली बार विदेश से चीनी भारत आ सकती है, जिससे त्योहारों के मौसम की शुरुआत में घरेलू सप्लाई में आसानी हो सकती है।</div><h2>5. देश में चीनी का बफर स्टॉक कम हो रहा?</h2><div>रेटिंग एजेंसी इकरा (ICRA) के अनुमान के मुताबिक, सितंबर 2026 तक देश में चीनी का क्लोजिंग स्टॉक घटकर महज 43 लाख टन रह जाने की संभावना है, जो पिछले साल इसी अवधि में 53 लाख टन था। चिंता की बात यह है कि 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की सिर्फ दो महीने की घरेलू खपत की भरपाई करने के लिए ही पर्याप्त है। सितंबर 2026 तक देश में क्लोजिंग चीनी स्टॉक घटकर करीब 43 लाख टन रहने का अनुमान। पिछले साल यह स्टॉक 53 लाख टन था, जिसमें करीब 10 लाख टन की गिरावट आई है। 43 लाख टन का यह बफर स्टॉक देश की महज 2 महीने की घरेलू जरूरत के बराबर है।</div><h2>6. सरकार अचानक चीनी को लेकर क्यों घबराई हुई है?</h2><div>चीनी की कीमतों में यह उछाल रातों-रात नहीं आया है। भारत में चीनी की खुदरा कीमतें 2023 की शुरुआत में लगभग ₹40-45 प्रति किलोग्राम थीं, जो अगस्त 2026 तक बढ़कर ₹50 प्रति किलोग्राम से ज़्यादा हो गईं। हालांकि, राज्यों, चीनी की क्वालिटी और बाज़ार के हिसाब से कीमतों में काफी अंतर होता है। कीमतों में तेज़ी हाल के महीनों में आई है। अगस्त 2026 के मध्य तक, पूरे भारत में चीनी की औसत कीमत लगभग ₹51.7-52.3 प्रति किलोग्राम तक पहुँच गई थी। यह एक महीने में लगभग 7-8% और अगस्त 2025 के मध्य में लगभग ₹46.3 प्रति किलोग्राम की कीमत के मुकाबले साल-दर-साल आधार पर लगभग 12-13% की बढ़ोतरी है। लेकिन त्योहारों के मौसम से ठीक पहले कीमतों में आए इस उछाल ने केंद्र सरकार को कदम उठाने पर मजबूर कर दिया है। इसलिए अधिकारी सिर्फ़ आयात (इंपोर्ट) के बारे में ही नहीं सोच रहे हैं। वे थोक व्यापारियों द्वारा जमा की जा सकने वाली चीनी की मात्रा पर पाबंदी लगाने पर भी विचार कर रहे हैं, ताकि जमाखोरी और स्टॉक जमा करने से कमी और न बढ़े।&nbsp;</div><h2>7. सरकार ने कीमतें नियंत्रित करने के लिए क्या नियम बनाए हैं?</h2><div>सरकार ने चीनी व्यापारियों और डीलरों पर स्टॉक रखने की सीमा लागू कर दी है। नए नियमों के तहत महीने में 10 मीट्रिक टन से अधिक चीनी का कारोबार करने वाले डीलर 15 दिन से अधिक की खपत का स्टॉक जमा करके नहीं रख सकते। चीनी के आयात को टैक्स फ्री भी कर दिया है। निर्यात पर 30 सितंबर 2026 तक रोक लगा दी है।</div><h2>8. चीनी संकट को लेकर सरकार को झेलनी पड़ रही राजनीतिक आलोचना</h2><div>चीनी की बढ़ती कीमतों पर अब राजनीतिक विरोध भी शुरू हो गया है। एक्टिविस्ट और टीम भारत के संस्थापक तहसीन पूनावाला ने आरोप लगाया कि गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की ओर मोड़े जाने के कारण यह संकट पैदा हुआ है। इसके साथ ही उन्होंने इस नीति से लाभ उठाने वालों पर भी सवाल खड़े किए हैं। सोशल मीडिया मंच एक्स पर जारी एक वीडियो संदेश में पूनावाला ने कहा कि भारत ने भारी मात्रा में चीनी का निर्यात किया। लेकिन गन्ने को एथेनॉल उत्पादन की तरफ मोड़े जाने से स्थिति ऐसी हो गई कि भारत को निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। इस फैसले से चीनी के दाम तेजी से बढ़े और अब सरकार चीनी पर आयात शुल्क हटाने की योजना बना रही है। पूनावाला ने यह आरोप भी लगाया कि इस स्थिति से राजनेताओं और उनके परिवारों को फायदा हुआ है। उन्होंने घोषणा की कि उनका संगठन टीम भारत, जो E20 पेट्रोल के तेजी से लागू होने को लेकर विरोध प्रदर्शन कर रहा है और सरकार से बातचीत में जुटा है, 22 और 23 अगस्त को नई दिल्ली के जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन और भूख हड़ताल करेगा। सरकार के लिए फिलहाल सबसे तात्कालिक चुनौती यह सुनिश्चित करना है कि देश के सबसे बड़े त्योहारी खरीदारी सीजन की शुरुआत में यह रोजमर्रा की आवश्यक वस्तु आम जनता की पहुंच से बाहर न हो जाए। हालांकि, इस मामले से जुड़ा व्यापक नीतिगत सवाल अधिकारियों के लिए सुलझाना काफी अधिक चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।</div><h2>9. चीनी शेयरों में पैसा लगाने वाले निवेशकों के लिए क्या रिस्क है?</h2><div>सबसे बड़ा रिस्क सरकारी दखल है। चीनी के दाम जितने ज्यादा बढ़ेंगे, सरकार कीमतें घटाने के सख्त कदम उठाएगी। इससे मिलों का मार्जिन अचानक घट सकता है। अगर कंपनियों का मार्जिन घटेगा तो शेयरों में आई तेजी गिरावट में बदल सकती है।</div><h2>10. रॉ शुगर का आयात 1 अक्‍टूबर तक ड्यूटी फ्री</h2><div>घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई सुधारने और बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाते हुए रॉ-शुगर का आयात टैक्‍स फ्री कर दिया है।&nbsp; विदेश व्यापार महानिदेशालय (DGFT) के नोटिफिकेशन के मुताबिक, सरकार ने 10 लाख मीट्रिक टन कच्ची चीनी के ड्यूटी फ्री आयात को मंजूरी दी है। इस फैसले के बाद अब बिना कोई आयात शुल्क चुकाए विदेशों से 10 लाख टन रॉ-शुगर भारत मंगाई जा सकेगी, जिससे स्थानीय बाजारों में चीनी की उपलब्धता बढ़ेगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 14:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-sugar-prices-suddenly-skyrocketed-understand-whole-issue-in-10-lines</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जयपुर से लेकर भोपाल और गया से उन्नाव तक...Gen Z तो झांकी थी, पूरी पिक्चर दिखा रहे Gen अल्फा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/jaipur-to-bhopal-gaya-to-unnao-move-over-gen-z-a-gen-alpha-wave-of-protests]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कहीं क्लॉस रूम में पंखा नहीं चलता, कहीं पीने का पानी नहीं है। कहीं टॉयलेट इस्तेमाल करने लायक नहीं है। कहीं शिक्षक नहीं है तो कहीं मिड-डे मील में कीड़े मिलने की शिकायत है। अब इन सब के खिलाफ स्कूलों के बच्चे आवाज उठा रहे हैं। जेन जी के बाद अब जेन एल्फा भी अपने हक के लिए सड़कों पर उतरते दिख रहे हैं। बीते कुछ हफ्तों में देश के कई राज्यों से स्कूल-कॉलेज के बच्चों के प्रदर्शन की तस्वीर सामने आ रही है। इन प्रोटेस्ट में एक कहानी राजस्थान के जयपुर की है, जहां मूक-बधिर छात्रों ने प्रदर्शन किया और सरकार ने एक्शन भी लिया। वहीं उत्तर प्रदेश में तो जेन एल्फा ने विधायक का काफिला तक रोक दिया।&nbsp;इन सभी जगहों पर मुद्दे अलग-अलग थे। स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को बुनियादी सुविधाओं के लिए आखिर सड़क पर क्यों उतरना पड़ रहा है? जेन जी के दौर में शिक्षा और परीक्षाओं को लेकर बड़े-बड़े विरोध देखने को मिले। अब जेन एल्फा भी उसी रास्ते पर आगे बढ़ते दिख रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि यह बच्चे छोटे हैं, स्कूल में हैं, लेकिन अपनी मांग को लेकर बिल्कुल साफ हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/after-the-cji-pm-modi-statement-has-now-sparked-the-creation-of-a-new-party" target="_blank">CJI के बाद अब PM मोदी के बयान ने कौन सी नई पार्टी बनवा दी, दनादन जुड़ गए लाखों लोग, कॉकरोच जैसा क्रेज!</a></h3><h2>स्कूल जाने के लिए पक्की सड़क की मांग को लेकर बच्चे कलेक्ट्रेट पहुंचे</h2><p>11 अगस्त को, उत्तर प्रदेश के हमीरपुर ज़िले की चंदू पुर ग्राम पंचायत के छात्र और ग्रामीण तिरंगा यात्रा के ज़रिए लगभग 5 किलोमीटर दूर अपने स्थानीय कलेक्ट्रेट पहुंचे। बच्चों ने अपने स्कूल तक जाने के लिए पक्की सड़क की मांग की। उन्होंने कहा कि उन्हें कीचड़ से होकर गुज़रना पड़ता है, खासकर बारिश के मौसम में और आज़ादी के बाद से इस इलाके में कोई पक्की सड़क नहीं बनी है। वे ज़िला मजिस्ट्रेट के दफ़्तर के गेट पर बैठ गए और कहा कि जब तक काम शुरू नहीं होगा, वे वहीं डटे रहेंगे। प्रशासन ने बताया कि सड़क बनाने का प्रोजेक्ट, जिसकी लागत लगभग 1 करोड़ रुपये आंकी गई है, कई सालों से अटका हुआ था। एक अधिकारी ने बताया कि वन विभाग से NOC मिल गई है और प्रस्ताव सरकार को भेज दिया गया है; मंज़ूरी मिलने के बाद टेंडर निकाला जाएगा। हालांकि, हमीरपुर के इस विरोध-प्रदर्शन ने बच्चों के इस आंदोलन से जुड़ा एक अहम सवाल भी खड़ा कर दिया। यह आंदोलन कितना बच्चों की अपनी पहल है और कितना उनके आस-पास के बड़ों की वजह से हो रहा है? हमीरपुर के ADM ने आरोप लगाया कि कुछ असामाजिक तत्व बच्चों को आगे करके इस मामले को तूल दे रहे हैं।हालांकि, प्रदर्शनकारी सड़क का काम शुरू करने की मांग करते रहे।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-new-ceo-of-the-ram-mandir-be-a-brahmin" target="_blank">शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा?</a></h3><h2>यूपी, एमपी, महाराष्ट्र, बिहार और राजस्थान में नई पीढ़ी का विरोध-प्रदर्शन</h2><p>28 जुलाई को उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। किशनपुर कस्बे के सर्वोदय इंटर कॉलेज के करीब 1,500 छात्र अपनी क्लास से बाहर निकल आए और कॉलेज की सुविधाओं के खिलाफ विरोध-प्रदर्शन किया। उनकी मांगों में सही डेस्क और बेंच, टॉयलेट, पीने का पानी, मिड-डे मील और लाइब्रेरी व कंप्यूटर लैब जैसी सुविधाओं की कमी को दूर करना शामिल था। स्कूल प्रशासन को झुकना पड़ा। अधिकारियों ने कहा कि मांगों को पूरा किया जाएगा, जिसमें हर क्लास में चार पंखे लगाना, बिजली की वायरिंग ठीक करना और मिड-डे मील की व्यवस्था करना शामिल है। बच्चे बुनियादी सुविधाओं की मांग कर रहे थे, और लगभग हर जगह यही पैटर्न देखने को मिला। बिहार में गया के सिमुआरा मिडिल स्कूल के करीब 40-50 छात्र SDM से सीधे बात करने के लिए लगभग चार किलोमीटर पैदल चलकर उनके ऑफिस पहुंचे। जूनियर अधिकारियों से नहीं, बल्कि सीधे बड़े अधिकारी से। उनकी शिकायतों में खाने लायक मिड-डे मील देना, गंदे टॉयलेट की सफाई, क्लास में पंखे, टूटी बेंच बदलना और खराब हैंडपंप की मरम्मत करवाना शामिल था। प्रशासन ने जांच के आदेश दिए और हेडमास्टर को शिकायतों को दूर करने के लिए समय-सीमा दी। राजस्थान के बाड़मेर में, छात्रों ने टीचर की खाली पोस्ट को लेकर सरकारी स्कूलों के गेट पर ताला लगा दिया। यह विरोध तब तक जारी रहा जब तक ज़िला शिक्षा अधिकारी ने छात्रों को भरोसा नहीं दिलाया कि तुरंत तीन टीचर तैनात किए जाएंगे। जालौर में भी छात्रों ने टीचर की कमी को लेकर इसी तरह विरोध किया। मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा में एक रेजिडेंशियल स्कूल के छात्रों ने मेस के खाने की क्वालिटी को लेकर विरोध किया। उनका आरोप था कि दाल और सब्ज़ी में बार-बार कीड़े मिल रहे थे। वहीं, महाराष्ट्र में छात्रों ने टॉयलेट, पानी की सप्लाई और टीचर के स्कूल न आने को लेकर विरोध किया। कई छात्रों ने बोर्ड परीक्षा से पहले टीचर की मांग की। अलग-अलग राज्य, लेकिन बुनियादी सुविधाओं के लिए एक जैसा संघर्ष। जेन अल्फा अपने शिक्षण संस्थानों को जवाब देने के लिए मजबूर करने के वास्ते एकजुटता का इस्तेमाल कर रहे हैं। वे शिकायत करने के पारंपरिक तरीके से आगे बढ़कर अपनी समस्याओं को सड़कों पर ला रहे हैं।</p><h2>डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने किया प्रदर्शन</h2><p>जयपुर के सरकारी सेठ आनंदी लाल पोदार हायर सेकेंडरी स्कूल फॉर डेफ एंड म्यूट के छात्रों ने स्कूल की बदहाल हालत के खिलाफ प्रदर्शन किया। बच्चों की शिकायतें सिर्फ एक दो नहीं थी। स्कूल के टॉयलेट खराब थे। पीने के पानी में दिक्कत थी। की बिल्डिंग की हालत जजर थी और कई दूसरी बुनियादी सुविधाएं भी ठीक नहीं थी। स्टूडेंट्स ने साइन लैंग्वेज के जरिए अपनी बात रखी और सोशल मीडिया में इस प्रोटेस्ट से जुड़े कई वीडियो भी वायरल हुए। स्कूल में 12वीं तक के छात्र पढ़ते हैं। यहां 17 क्लासरूम्स हैं। 592 छात्र हैं और शिक्षकों के 76 पद मंजूर हैं। लेकिन बच्चों की शिकायत थी कि स्कूल की हालत लगातार खराब होती जा रही है। टॉयलेट इतने खराब थे कि उनका इस्तेमाल करना भी मुश्किल हो गया था। पीने के पानी की व्यवस्था भी ठीक नहीं थी। स्कूल की दीवारों और क्लासरूम में दरारें थी जिससे बच्चों की सुरक्षा को लेकर सवाल खड़े हो रहे थे। स्कूल बस भी खराब हालत में थी। सफाई के नाम पर जगह-जगह कचरा पड़ा था। मामला सामने आने के बाद सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के प्रतिनिधि स्कूल पहुंचे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/who-is-general-rezaei-whom-mojtaba-appointed-as-iran-security-boss" target="_blank">सिर के बदले सिर! कौन है जनरल रेजाई, जिसे मोजतबा ने बनाया ईरान का 'सिक्योरिटी बॉस'</a></h3><h2>हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में रोका एलएलए का काफिला</h2><p>उत्तर प्रदेश के फतेहपुर में 28 जुलाई को करीब 1500 स्टूडेंट्स स्कूल से बाहर निकल आए। किशनपुर के सर्वोदय इंटर कॉलेज में छठी से 12वीं तक के छात्रों ने 5 से 6 घंटे तक धरना दिया। उनकी शिकायत थी कि क्लासरूम में बिजली और पंखे नहीं है। कहीं पंखों से करंट लगने की शिकायत है। डेस्क बेंच कम है। टॉयलेट गंदे हैं। पीने का पानी सुरक्षित नहीं है। मिड डे मील तय मेन्यू के हिसाब से नहीं मिलता और स्कूल में लाइब्रेरी, कंप्यूटर लैब और खेल की सुविधाएं भी नहीं है। प्रिंसिपल ने बाद में ज्यादातर मांगे मानने की बात कही। यूपी के ही पीलीभीत के जवाहर नवोदय विद्यालय में भी 10वीं और 11वीं और साथ ही साथ 12वीं के छात्रों ने प्रदर्शन किया। हमीरपुर, उन्नाव के बाद अब बस्ती में MLA का काफिला स्कूली बच्चों ने रोक लिया. बच्चों ने विधायक से जर्जर सड़क बनवाने की मांग की। इस पर विधायक ने अफसरों से बात कर जल्द ही सड़क बनवाने का आश्वासन देकर शांत कराया है।</p><h2>जेन ज़ी से सीख रही है&nbsp; जेन अल्फा&nbsp;</h2><p>हाल के इन विरोध-प्रदर्शनों में हिस्सा लेने वाले अधिकांश बच्चे इतने छोटे हैं कि उन्हें अभी वोट देने का अधिकार भी नहीं है। उनके पास कोई औपचारिक राजनीतिक ताकत नहीं है। वे किसी चुनाव के जरिए सरकार नहीं बदल सकते और ज्यादातर मामलों में, जिन संस्थानों के खिलाफ वे खड़े हैं, उन पर भी उनका प्रभाव बेहद सीमित है। इसके बावजूद, उन्होंने प्रभाव डालने का एक नया जरिया विजिबिलिटी का ढूंढ निकाला है और इसे असरदार बनाने के लिए सोशल मीडिया उनका सबसे मजबूत हथियार बनकर उभरा है। सड़क पर तख्तियां थामे मार्च करते या किसी सरकारी दफ्तर के बाहर धरने पर बैठे स्कूली बच्चों के समूह को नजरअंदाज करना प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल हो जाता है, खासकर तब जब इन प्रदर्शनों के वीडियो इंटरनेट पर तेजी से वायरल होने लगते हैं। ये बच्चे जेन ज़ी को बिल्कुल इसी तौर-तरीके और भाषा का इस्तेमाल करते हुए देखकर बड़े हो रहे हैं, और ऐसा लगता है कि जेन अल्फा ने यह सबक वक्त से पहले ही सीख लिया है। सड़क की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन कर रहे बच्चों का वीडियो री-शेयर करते हुए सीजेपी (CJP) प्रदर्शन के नेताओं में से एक, सौरव दास ने लिखा शाबाश जेन अल्फा! हमें यही करने की जरूरत है अपने भविष्य की जिम्मेदारी खुद संभालना।</p><h2>जेन अल्फा की मांगें क्यों अहम हैं</h2><p>उनकी मांगों से कुछ खास बातें भी पता चलती हैं। पहले की पीढ़ियों के छात्र अक्सर खराब इंफ्रास्ट्रक्चर, टीचरों की कमी, सुविधाओं की कमी और अनियमित सेवाओं को रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा मानकर स्वीकार कर लेते थे। आज विरोध करने वाले बच्चे क्लासरूम में पंखे न होने, टीचर न होने और स्कूल तक सड़क न होने जैसी चीज़ों को सामान्य मानने को तैयार नहीं हैं। वे ऐसे भारत में बड़े हो रहे हैं जहाँ फ़ोन पर ही यह जानकारी मिल जाती है कि दूसरी जगहों पर चीज़ें कैसे काम करती हैं। वे देख सकते हैं कि वे किन चीज़ों से वंचित रह रहे हैं, और इसीलिए, 'अल्फा' पीढ़ी में गुस्सा है। इन बच्चों के आस-पास मौजूद बड़े लोग ज़ाहिर तौर पर इनमें से कुछ विरोध-प्रदर्शनों को आकार देंगे। लेकिन इससे जेन अल्फा की शिकायतें कम वास्तविक नहीं हो जातीं।</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 14:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/jaipur-to-bhopal-gaya-to-unnao-move-over-gen-z-a-gen-alpha-wave-of-protests</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[CJI के बाद अब PM मोदी के बयान ने कौन सी नई पार्टी बनवा दी, दनादन जुड़ गए लाखों लोग, कॉकरोच जैसा क्रेज!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/after-the-cji-pm-modi-statement-has-now-sparked-the-creation-of-a-new-party]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कॉकरोच जनता पार्टी के बाद अब एक नई पार्टी उतरी है। नाम है दिमागी नक्सल पार्टी। तरीका वही कॉकरोच पार्टी की तरह एक स्टेटमेंट से उपजी है। कॉकरोच जनता पार्टी का उदय भी एक कमेंट से ही आया था। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ने कथित तौर पर युवाओं की तुलना कॉकरोच से की थी। इसके तुरंत बाद कॉकरोच जनता पार्टी नाम का इंस्टाग्राम हैंडल तैयार हुआ। देखते ही देखते कुछ दिनों कॉकरोच जनता पार्टी के पेज पर करोड़ों यूजर्स आ गए। आलम ये हुआ की 10 दिन के अंदर CJP के फॉलोअर्स 20 मिलियन से भी ज्यादा हो गए। इसी तरह अब पीएम मोदी के रिमार्क पर किसी ने दिमागी नक्सल जनता पार्टी के नाम से पेज बना दिया है और ये लगातार फॉलोअर्स बटोर रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-the-pakistani-embassy-have-to-issue-a-warning-to-its-own-citizens" target="_blank">50 सेकंड के Video ने मचाया भारत में तहलका, पाकिस्तान के दूतावास को अपने ही नागरिकों के लिए क्यों जारी करनी पड़ी चेतावनी?</a></h3><h2>क्या है दिमागी नक्सली पार्टी</h2><div>समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांतिभांति के दांव कर रहे हैं। इन दिमागी नक्सलियों को पहचानना होगा। इन दिमागी नक्सलियों को आइसोलेट करना होगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 15 अगस्त के इस भाषण में इस्तेमाल किए गए दिमागी नक्सल शब्द ने राजनीतिक बहस के साथ-साथ सोशल मीडिया पर भी नई हलचल पैदा कर दी है। इसी शब्द को आधार बनाकर सोशल मीडिया पर दिमागी नक्सल पार्टी नाम से एक नई डिजिटल पार्टी सामने आई है। दावा है कि इंस्टाग्राम पर इस पेज ने महज 24 घंटे में 1 लाख से ज्यादा और 2 दिनों के अंदर 2 लाख से ज्यादा फॉलोअर्स जुटा लिए। हालांकि यह कोई अधिकारी या चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल नहीं है। इसे फिलहाल प्रधानमंत्री के भाषण में इस्तेमाल किए गए शब्द पर व्यंग और राजनीतिक प्रतिक्रिया के तौर पर उभरी सोशल मीडिया पहल के रूप में देखा जा रहा है। दिमागी नक्सल पार्टी नाम से इंस्टाग्राम पर सामने आए पेज ने कम समय में बड़ी संख्या में यूज़र्स का ध्यान खींचा। पार्टी का एक्स अकाउंट भी दिमागी नक्सल जनता पार्टी नाम से सक्रिय है जिसके हजारों फॉलोवर्स हैं। सोशल मीडिया प्रोफाइल के मुताबिक इस डिजिटल पहल का कथित नारा है सोचो रिसर्च करो विरोध करो।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/putin-chose-india-as-his-first-partner-country-leaving-china" target="_blank">China को छोड़ पुतिन ने भारत को चुना पहला पार्टनर देश, हिला अमेरिका!</a></h3><h2>दिमागी नक्सली को लेकर पीएम मोदी ने क्या कहा?</h2><div>15 अगस्त को लाल किले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भाषण में एक शब्द ने सोशल मीडिया पर अलग ही हलचल पैदा कर दी। प्रधानमंत्री ने कहा कि जंगलों में हथियार उठाने वाले नक्सलियों के खिलाफ देश ने बड़ी सफलता हासिल की है, लेकिन अब भी ऐसे ‘दिमागी नक्सली’ मौजूद हैं, जो विचारधारा के जरिए देश में अशांति फैलाने के मौके तलाश रहे हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को पहचानने और अलग-थलग करने की बात कही।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पार्टी के पीछे कौन चेहरा?</h2><div>इंस्टाग्राम बायो में संस्थापक को एक दिमागी भारतीय और सह संस्थापक को 56 इंच वाले के तौर पर बताया गया है। हालांकि इन नामों के पीछे वास्तविक व्यक्ति कौन है? इसकी स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हुई है। पार्टी के इंस्टाग्राम पोस्ट में खुद को शहीद&nbsp; भगत सिंह की विचारधारा का अनुयाय बताया गया है। एक पोस्ट में कहा गया है कि संगठन खुद को भगत सिंह की सोच से जोड़ता है और अगर उसके सोशल मीडिया अकाउंट्स को बंद करने या उसके सदस्यों को देशद्रोही बताने की कोशिश की जाती है तो इसे भगत सिंह की विचारधारा का अपमान माना जाएगा। हालांकि इस डिजिटल पहल के संस्थापक या संचालकों की आधिकारिक पहचान अब तक सामने नहीं आई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक इसका एक्स अकाउंट अगस्त 2026 में बनाया गया था। दिमागी नक्सल पार्टी का इंस्टाग्राम अकाउंट कई चर्चित और मुखर सार्वजनिक हस्तियों को फॉलो करता है। इनमें कॉमेडियन कुणाल कामरा, वेंकार श्याम रंगीला, यूबर ध्रुव राठी, अभिनेता प्रकाश राज, फिल्मकार अनुराग कश्यप, अभिनेत्री सुनाक्षी सिन्हा, सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक और पत्रकार रवश कुमार जैसे नाम शामिल है। इसी वजह से सोशल मीडिया पर इसकी तुलना हाल में चर्चा में कॉकरोच जनता पार्टी से भी की जाने लगी है।&nbsp;</div><h2>प्रधानमंत्री के बयान पर विपक्ष ने भी तीखी प्रतिक्रियाएं दी&nbsp;</h2><div>कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय गृह मंत्री पी चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर लिखा है कि उन्हें दिमागी नक्सल कहे जाने पर गर्व है। उन्होंने इस शब्द को अर्बन नक्सल आंदोलनजीवी और टुकड़े-टुकड़े गैंग जैसे राजनीतिक विश्लेषणों की कड़ी का नया रूप बताया। वहीं कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भी प्रधानमंत्री के बयान को लेकर हमला बोला और इसे सरकार की राजनीतिक हताशा का संकेत दिया। या दिमागी नक्सल दिमागी नक्सल कौन है जो इनका विरोध करते हैं यही तो दिमागी नक्सल ने मांग की थी ना जाती जनगणना होनी चाहिए 4 साल तक कहा नहीं होगा नहीं होगा नहीं होगा यह अर्बन नक्सल सोच है पर एक साल पहले अप्रैल 30 2025 को उन्होंने घोषणा की कि जातीय जनगणना होगा तो ये सब बदनाम करने में प्रधानमंत्री बहुत माहिर हैं। सीजेपी के प्रवक्ता सौरव दास ने अपनी पोस्ट में पीएम मोदी के तंज पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा प्रधानमंत्री जी, दिमागी नक्सल या ऐसी कोई भी बात काम नहीं आएगी। आप पढ़े-लिखे युवाओं को नक्सली कैसे कह सकते हैं? सिर्फ इसलिए कि वे आपकी सरकार से सवाल पूछते हैं? यह सरासर अहंकार है। उनकी समस्याओं को हल करने में पूरी तरह नाकामी है। बदलाव की घंटी बज चुकी है। जागने का समय आ गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/shot-yet-they-didnt-let-go-of-the-flag-women-who-staked-everything-for-the-tricolour" target="_blank">गोली लगी फिर भी झंडा नहीं छोड़ा...वो महिलाएं जिन्होंने तिरंगे के लिए सब दांव पर लगा दिया</a></h3><h2>बीजेपी ने समझाया कि दिमागी नक्सल है कौन?</h2><div>बीजेपी की तरफ से इस पर क्लेरिफिकेशन आया है। राज्यसभा सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने एक टीवी डिबेट में समझाया कि दिमागी नक्सल है कौन? 1.8 और 2% ग्रोथ रेट जिसे हिंदू ग्रोथ रेट कहा जाता था। उसमें देश बड़ा सुंदर और सामंजस्यपूर्ण लगता था। 7.4% की वर्ल्ड की फास्टेस्ट ग्रोथ रेट में उसे सामंजस्य नजर नहीं आता है। उसको दिमागी नक्सल कहा जाता है। सीएए में जिसको यह नजर आता था कि ये नागरिकता लेने का कानून है। आज 5 साल लागू हो गए हो गए। किसी मुस्लिम की नागरिकता नहीं गई। उसमें नक्सल उसके दिमाग को दिमागी नक्सल कहा जा सकता है। जिसको जय श्री राम में वॉर क्राई नजर आता हो मगर सर तन से जुदा हो जाने के बाद भी उसमें सेुकुलर संगीत नजर आता हो तो उसको दिमागी नक्सल कहा जाता है।&nbsp;</div><h2>दिमागी नक्सल पार्टी के रूल्स क्या है?</h2><div>वेबसाइट पर लिखा है दिमागी बनो बेवकूफ नहीं। डीएनजेपी दिमागी नक्सल जनता पार्टी ने अपने बारे में बताया कि ना तो हम कांग्रेस हैं ना आम आदमी पार्टी ना समाजवादी पार्टी और ना ही कोई कॉकरोच पार्टी। फिर भी इसे इन सभी के साथ चलने में कोई परहेज नहीं है। बस एक ही नियम है सवाल पूछा जाए। पार्टी का अपना एक मेनिफेस्टो भी है।&nbsp; छह नियम है। पहला चाहे सरकार कोई भी हो, पार्टी कोई भी हो, सवाल पूछा जाना चाहिए। बस यही इसका मकसद है। दूसरा, हम आपसे अपनी पार्टी बदलने को नहीं कह रहे हैं। हम बस इतना कह रहे हैं कि हर तरह के सवाल पूछने वाले लोग एक दूसरे को दुश्मन समझना बंद करें।&nbsp; डीएनजेपी के पास ना कोई झंडा है ना कोई तय फॉनट और ना ही प्रेस कॉन्फ्रेंस करने वाला कोई फाउंडर है। जिस आंदोलन को जिंदा रहने के लिए किसी स्पोक पर्सन की जरूरत पड़े वो आंदोलन नहीं महज एक बैठक है। आप इसे गाली की तरह इस्तेमाल करेंगे। हम दोपहर तक इसे अपना नारा बना लेंगे।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 18:30:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/after-the-cji-pm-modi-statement-has-now-sparked-the-creation-of-a-new-party</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[भक्ति कर दरिया में डाल...7000 मीट्रिक टन कचरा छोड़ किसने हरिद्वार को कूड़ाद्वार बना डाला? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/who-turned-haridwar-into-koodadwar-by-dumping-7000-metric-tonnes-of-waste]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का कैलेंडर 12 महीने उनमें से एक महीना सावन मोटा-मोटी बारिश का महीना तभी तो इस पर गाना भी बना है सावन का महीना पवन करे शोर। सावन का महीना भगवान शिव का महीना माना जाता है इसलिए इस महीने शिवभक्त निकलते हैं एक यात्रा पर।&nbsp; 28 दिन की यात्रा यानि 4 हफ्ते में चार सोमवार सोमवार के व्रत की कोशिश रहती है कि उनकी यात्रा मंडे के दिन शिव मंदिर पहुंचे सावन के सोमवार को कावड़ यात्रा सबसे ज्यादा एक्टिव रहती है।&nbsp; लेकिन इतनी बड़ी धार्मिक यात्रा का असर सिर्फ घाटों और सड़कों पर दिखने वाली भीड़ तक सीमित नहीं रहता। कुछ ही दिनों के लिए किसी भी शहर की पॉपुलेशन अचानक कई गुना बढ़ जाए तो उसके रोड्स, पार्किंग, टॉयलेट, सैनिटेशन और वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम हर चीज की कैपेसिटी टेस्ट होती है। 30 जुलाई 2026 से शुरू हुई इस साल की कावड़ यात्रा 11 अगस्त को खत्म हुई। करीब 14 दिनों तक हरिद्वार में करोड़ों कावड़ यात्री पहुंचे और उनके लौटने के बाद शहर के सामने अब एक नई चुनौती हजारों टन वेस्ट को साफ करना है। सावन में 4 करोड़ शिव भक्त हरिद्वार पहुंचे थे। मतलब एक छोटा सा कुंभ। गंगा जी से जल लेने। घाट पर कमरे बने थे माताओं बहनों के कपड़े बदलने के लिए। जब सफाई की गई तो उसके अंदर जानते हैं क्या निकला? पेशाब भरी बोतलें। अब हरकी पैड़ी पर जो लोग झाड़ू लेकर वहां सफाई कर रहे हैं, कूड़े के पहाड़ को दिखा रहे हैं। हमें उनके दुख दर्द को भी समझना पड़ेगा। हालत यह हो गई कि निगम के अपने कर्मचारी कम पड़ गए। इतना कूड़ा था। हजार कर्मचारी बाहर से बुलाने पड़े।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bareilly-kanwar-yatra-tractor-trolley-accident-kills-one-in-up" target="_blank">Bareilly में कांवड़ यात्रियों की ट्रैक्टर-ट्रॉली पलटी, 1 की मौत और 24 लोग घायल हुए</a></h3><h2>कावड़ यात्रा की कहानी</h2><div>कुछ मान्यताओं के अनुसार भगवान राम पहले कावड़िया थे उन्होंने बिहार के सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल भर बाबाधाम यानि बैजनाथ में शिवलिंग का जलाभिषेक किया था पुराणों में यह कहानी भी आती है कि समुद्र मंथन से निकले विष को जब भगवान शिव अपने कंठ में धारण कर लिया तो उसके प्रभावों को दूर करने के लिए देवताओं ने भगवान शिव पर पवित्र नदियों का जल चढ़ाया तभी से गंगाजल लाकर सावन में शपथ समर्पित करने का ऑपरेशन शुरू हुआ। एक अन्य कहानी ये भी है कि शिव भक्त रावण ने विशेष शिव को राहत देने के लिए कांवड़ में जल भरकर पर जो कि यूपी में है के पुरा महादेव शिवमंदिर में शिवजी का जलाभिषेक किया इसके बाद कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई तीसरी कहानी कुछ जगह वाले कहानी रिपीट होती है मगर करता के व्यक्ति के साथ मंदिर और जल चढ़ाना सेम लेकिन रावण की जगह पर उस राम जो जलाभिषेक के लिए गढ़मुक्तेश्वर में बह रही गंगा नदी से जल लाए। एक कहानी त्रेता युग वाली कहानी भगवान राम वाला यह होता है तथा योग उसमें अपने दृष्टिहीन माता-पिता को तीर्थ यात्रा कराने के लिए श्रवण कुमार हिमाचल के ऊना क्षेत्र से मायापुर हरिद्वार में गंगा स्नान करवाने लाइफ है इसके लिए उन्होंने एक कावड़ बनाई और अपने माता-पिता को उसमें बिठाया माता-पिता को स्नान करवाने के बाद वापसी में अपने साथ गंगा जल ले आए यहीं से कावड़ यात्रा की शुरुआत हुई।&nbsp;</div><h2>7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट</h2><div>मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक इस साल करीब 4.8 करोड़ कावड़ यात्री हरिद्वार पहुंचे। वहीं यात्रा खत्म होने के बाद करीब 7000 से 8000 मेट्रिक टन वेस्ट होने की बात सामने आई है। अब सवाल यह है कि आखिर इतना कचरा आया कहां से? क्या इसका एक बड़ा कारण किसी शहर की कैपेसिटी से कई गुना ज्यादा लोगों का कुछ ही दिनों में वहां पहुंचना है या फिर इसमें लोगों के सिविक सेंस की भी भूमिका है? अगर पिछले कुछ सालों का डाटा देखें तो हरिद्वार में कावड़ यात्रियों की संख्या लगातार बढ़ी है। 2023 में करीब 4.07 करोड़, 2024 में 4.14 करोड़ और 2025 में करीब 4.52 करोड़ कावड़ यात्री यहां पहुंचे थे। इस साल यह संख्या बढ़कर करीब 4.8 करोड़ बताई जा रही है। यानी फुटफॉल लगातार बढ़ रहा है और जैसे-जैसे फुटफॉल बढ़ता है, वैसे-वैसे शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर पर प्रेशर भी बढ़ता है। इस साल के वेस्ट आंकड़े को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स में अलग-अलग नंबर्स मिलते हैं। इंडिया टुडे ने म्यनिसिपल ऑफिशियल के हवाले से करीब 7000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की बात कही है। वहीं टाइम्स ऑफ इंडिया ने हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के नंदन कुमार के हवाले से करीब 8000 मेट्रिक टन वेस्ट कलेक्ट होने की रिपोर्ट की है। 8000 मेट्रिक टन कचरा यानी करीब 80 लाख किलो कचरा। नेशनल मिशन फॉर क्लीन गंगा यानी एनएमसीजी के वेस्ट मैनेजमेंट फ्रेमवर्क में भी सोर्स सेग्रगेशन, कलेक्शन, ट्रांसपोर्टेशन और डेजिग्नेटेड डिस्पोजेबल पर जोर दिया गया है। लेकिन इस साल की कावड़ यात्रा के दौरान कलेक्ट हुए करीब 7000 से 8000 टन वेस्ट का कितना हिस्सा रिसाइकल हुआ, कितना प्रोसेस हुआ और कितना डिस्पोजल के लिए भेजा गया, इसका डिटेल ब्रेकअप फिलहाल पब्लिक नहीं किया गया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-rain-and-kanwar-yatra-cause-heavy-traffic-jams-across-capital" target="_blank">Delhi Rain: बारिश और कांवड़ यात्रा से कई सड़कों पर लगा जाम, AQI रहा 78</a></h3><h2>आखिर इतना कचरा आया कहां से?</h2><div>मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक क्लीनअप के दौरान बड़ी मात्रा में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड और गंदे कपड़े, प्लास्टिक बॉटल्स, स्लीपर्स और कुछ दूसरे तरह का कचरा मिला। कुछ रिपोर्ट्स में फूड वेस्ट और रोटन फूड का भी जिक्र है। वहीं कुछ चेंजिंग रूम्स में ऐसी बॉटल्स मिलने की बात सामने आई जिन्हें रिपोर्ट्स में यूरिन कंटेनिंग बॉटल्स बताया गया है। यानी यहां सिर्फ प्लास्टिक का कचरा नहीं था। लोगों के इस्तेमाल के बाद छोड़े गए कपड़े, फुटवेयर, बॉटल्स, खानेपीने से जुड़ा वेस्ट और दूसरी डिस्कारेड चीजें भी क्लीन अप का हिस्सा थी। कुछ जगहों पर यह कचरा सिर्फ रोड्स या मार्केट तक सीमित नहीं था। यानी जिस इलाके में इतनी बड़ी संख्या में लोग कुछ दिनों तक लगातार आते-जाते रहे, वहां हर तरफ सैनिटेशन सिस्टम पर प्रेशर पड़ा। हरिद्वार म्यनिसिपल कॉरपोरेशन के मुताबिक इस वेस्ट में प्लास्टिक शीट्स, डिस्कारेड कपड़े और दूसरे मटेरियल शामिल थे और सफाई पूरे कावड़ मेला एरिया में की गई थी।&nbsp;</div><h2>हर साल का रिवाज बन गया</h2><div><span style="font-size: 1rem; color: inherit; font-family: inherit;">हम मां गंगा कहते हैं और उसी के किनारे पन्नी फेंकते, कपड़ा फेंकते, कूड़ा कचरा, खाने, टिफिन, चप्पल। यह भक्ति नहीं हो सकती है। यहां पर फिर यह संदेह उठता है कि यह गलत हरकत क्यों है? और यह हमें सिखाया क्यों नहीं जाता कि हमें अपनी मां गंगा को गंदा नहीं करना है। और यह पहली बार नहीं हुआ है। पिछले साल भी मेले के बाद करीब इतना ही कूड़ा यहां पर था 7000 टन। उसके पहले भी यही था। यानी यह इस बार हुआ हादसा नहीं है। यह हमारे यहां हर साल का रिवाज बन गया है।&nbsp;</span></div><h2>जापान में मैच के बाद स्टैंड्स में नहीं छोड़ी गंदगी</h2><div>फीफा विश्व कप 2026 में जापान ने अपना पहला मुकाबला नीदरलैंड्स के खिलाफ खेला। ग्रुप एफ का यह मुकाबला 2-2 से ड्रॉ रहा। नीदरलैंड्स के खिलाफ मैच की आखिरी सीटी बजने बाद जापान के फैंस ने स्टैंड्स में मौजूद कचड़ा उठाना शुरू कर दिया। बाहर निकलने से पहले ब्लू बैग में फैंस ने वहां मौजूद कचड़ा उठा लिया। सोशल मीडिया इसका फोटो और वीडियो काफी तेजी से वायरल हो रहा है। इस काम के लिए दुनिया भर में जापान की तारीफ हुई। मतलब जापान में थैली लेकर आते हैं कि अपना कचरा समेटेंगे और वो तो मैच देखने गए थे। कोई पूजा पाठ करने नहीं आते। लेकिन हम और&nbsp; आप मां गंगा से आशीर्वाद लेने आते हैं। उसके बाद भी वहां कचरा फैला कर आते हैं। याद कीजिए 2019 का प्रयागराज कुंभ करोड़ों लोग आए और उसी कुंभ में प्रधानमंत्री ने झुककर सफाई कर्मियों के पैर छुए थे। क्यों? क्योंकि वह सफाई का मतलब समझ रहे थे। यह समझना पड़ेगा कि शिव भी कौन थे भगवान भोलेनाथ कौन थे आप कथा याद कीजिए मां गंगा आसमान से उतरी पूरी की पूरी पूरे वेग से धरती कांप जाती संभाला किसने था भगवान शिव ने जटा में एक बूंद नीचे नहीं गिरने दी समुद्र मंथन में जहर निकला कोई नहीं पी रहा था वह भी भगवान शिव ने संभाला कंठ में रख लिया। यानी भगवान भोलेनाथ की पूरी कहानी संभालने की है। और हम और आप शिव जी के भक्त। हम अपनी पन्नी नहीं संभाल पाते, टिफिन नहीं संभाल पाते, अपने कपड़े नहीं संभाल पाते और पेशाब करके बोतल रख दिए गए। जिस गंगा से करोड़ों लोग आस्था के साथ जल लेने आते हैं, उसके किनारे कचरा ना छोड़ना भी उसी आस्था और जिम्मेदारी का हिस्सा होना चाहिए। क्योंकि इतनी बड़ी गैदरिंग्स को संभालने के लिए सिर्फ ज्यादा रोड्स, ज्यादा टॉयलेट्स या ज्यादा सैनिटेशन वर्कर्स नहीं चाहिए। एक तरफ मजबूत प्लानिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए तो दूसरी तरफ रिस्पांसिबल पब्लिक बिहेवियर।&nbsp;</div><h2>1000 सफाई कर्मचारी बाहर से बुलाए</h2><div>अब कूड़े को ज्वालापुर स्थित सराय में कूड़ा ट्रीटमेंट प्लांट में रीसाइकिल के लिए भेजा जा रहा है। यहां से कूड़ा अलग-अलग करके आगे प्राइवेट कंपनियों को बेचा जाएगा और कुछ के कपड़े बनाए जाएंगे। नगर निगम दिन-रात अभियान चलाकर सफाई में जुटा है। सफाईकर्मियों का समूह सबसे पहले घाटों पर सफाई कर रहा है। पिछले साल करीब 4 करोड़ 52 लाख कांवड़िए जल लेकर गए थे। तब 8 हजार मीट्रिक टन कूड़ा गंगा घाटों से हटाया गया था। नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत, जिला पंचायत और सभी ग्राम पंचायतों के अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में युद्धस्तर पर सफाई अभियान चलाने के आदेश दिए गए हैं। नियमित कर्मचारियों के अलावा 1000 आउटसोर्स सफाई कर्मचारियों और 80 से ज्यादा वाहनों को कूड़ा परिवहन में लगाया गया।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 14:13:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/who-turned-haridwar-into-koodadwar-by-dumping-7000-metric-tonnes-of-waste</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शिखा है, जनेऊ पहनते हैं? PM ने राम के मर्म को अयोध्या में समझाया, वो क्या इंटरव्यूअर्स को समझ नहीं आया, मंदिर का नया CEO ब्राह्मण ही बनेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-new-ceo-of-the-ram-mandir-be-a-brahmin]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>25 नवंबर 2025 के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अयोध्या में थे। राम मंदिर का ध्वजारोहण कार्यक्रम था। यही प्रधानमंत्री ने कहा हम सब जानते हैं कि हमारे राम भेद से नहीं भाव से जुड़ते हैं। उनके लिए व्यक्ति का कुल नहीं उसकी भक्ति महत्वपूर्ण है। उन्हें वंश नहीं मूल्य प्रिय है। आज हम भी उसी भावना उसी आदर्श और उसी समर्थता के मार्ग पर आगे बढ़ रहे हैं। जहां श्रेष्ठता जन्म से नहीं चरित्र से तय होती है। प्रधानमंत्री ने राम का मर्म समझाया। उन्हीं राम के मंदिर के प्रबंधन के लिए बने श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के सीईओ पद की प्रक्रिया जारी है। जिसके लिए बीते दिनों इंटरव्यूज लिए गए। जिन अभ्यर्थियों ने भर्ती प्रक्रिया के तहत आवेदन किया था, उनमें से निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार कुछ उम्मीदवारों को शॉर्टलिस्ट किया गया और बाद में उनका इंटरव्यू लिया गया। मीडिया में सामने आई खबरों के मुताबिक, इंटरव्यू के दौरान कुछ उम्मीदवारों से उनकी धार्मिक आस्था और व्यक्तिगत जीवनशैली से जुड़े सवाल पूछे जाने की बात कही जा रही है—जैसे कि वे जनेऊ पहनते हैं या नहीं, मांसाहारी भोजन करते हैं या नहीं और चोटी रखते हैं या नहीं। यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट में सीईओ के चयन की प्रक्रिया ऐसे समय में चल रही है, जब मंदिर के चढ़ावे और दान में कथित चोरी व हेराफेरी के आरोपों की जांच एक विशेष जांच दल (SIT) द्वारा की जा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-changes-his-approach-following-the-neet-ug-controversy-advises" target="_blank">NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह</a></h3><h2>अगले महीने कोर्ट में दाखिल होगी रिपोर्ट</h2><div>जांच 90 दिनों में पूरी होनी है और अगले महीने के आखिर तक कोर्ट में चार्जशीट दाखिल करनी है। एसआईटी की शुरुआती रिपोर्ट 23 जून को जमा होने के बाद एफआईआर दर्ज की गई और आठ लोगों को गिरफ्तार भी किया गया। बाद में पुलिस ने बताया कि आरोपियों के पास से कैश, सोना, चांदी और विदेशी करेंसी बरामद हुई है। जिसमें एक आरोपी के पास से 20.3 लाख रुपए भी शामिल है।&nbsp;</div><h2>आखिर कट्टर हिंदू क्या होता है?</h2><div>खैर, अब आइए नए सीईओ के इंटरव्यू और उससे पूछे जाने वाले सवालों पर जो सिर्फ एक बजट प्रशासन या मंदिर के मैनेजमेंट तक सीमित नहीं रहे। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार इंटरव्यू में कैंडिडेट से एक सवाल पूछा गया कि क्या आप कट्टर हिंदू हैं? इस सवाल से एक सवाल उठता है कि आखिर कट्टर हिंदू क्या होता है? इंटरव्यूअर्स को ही स्पष्ट करना चाहिए कि उनके हिसाब से कट्टर हिंदू की परिभाषा क्या होती है? क्या शर्तें हैं जो किसी को सिर्फ हिंदू से आगे बढ़कर कट्टर हिंदू बनाती है। रिपोर्ट के मुताबिक इंटरव्यू में दूसरा सवाल पूछा गया कि आप नॉनवेज खाते हैं या नहीं?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cp-radhakrishnan-responds-to-mallikarjun-kharge-in-rajya-sabha" target="_blank">Rajya Sabha में बोले सभापति सीपी राधाकृष्णन, मैं हमेशा खरगे के ही दबाव में रहता हूं</a></h3><h2>शिखा और जनेऊ पर भी सवाल</h2><div>सूत्रों के मुताबिक, इंटरव्यू में भगवान राम के प्रति आस्था, समर्पण, रामानंदी परंपरा, मंदिर प्रबंधन और लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ के बीच क्राउड मैनेजमेंट से जुड़े सवाल पूछे गए। उम्मीदवारों से यह भी पूछा गया कि वे शिखा रखते हैं या नहीं और जनेऊ पहनते हैं या नहीं। शराब के सेवन और नॉनवेज खाने को लेकर भी सवाल किए गए। दूसरे दिन 3 रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारियों के अलावा पुलिस और सेना के रिटायर्ड अधिकारी भी इंटरव्यू के लिए पहुंचे। इनमें एक रिटायर्ड ब्रिगेडियर भी शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक, इंटरव्यू में चढ़ावा राशि की चोरी के मामले को लेकर कोई सवा सवाल नहीं पूछा गया।&nbsp; शिखर रखने और जनेऊ पहनने की परंपरा आमतौर पर ब्राह्मण जाति में ही है। सवाल है कि क्या अगर कोई कैंडिडेट जन्म से मिली जाति में ब्राह्मण नहीं हुआ तो उसे सीईओ नहीं बनाया जा सकता है? क्या फिर उसकी प्रशासनिक क्षमता को भी इग्नोर करके इस ओर ही ध्यान दिया जाएगा कि वह कट्टर हिंदू है या नहीं। नॉनवेज खाता है या नहीं खाता? शाक्य परंपरा के ब्राह्मणों का क्या होगा जो जनेऊ भी पहनते हैं, मांस भी खाते हैं।&nbsp;</div><h2>10 उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए आए</h2><div>बता दें कि श्री राम जन्मभूमि तीर्थ ट्रस्ट क्षेत्र के लिए स्थाई सीईओ का सिलेक्शन प्रोसेस 11 अगस्त 2026 को शुरू हुआ। जिसमें पहले दिन 10 उम्मीदवार इंटरव्यू के लिए आए। इन सभी को 10 अगस्त की देर रात अयोध्या बुलाया गया था। इस इंटरव्यू से पहले सभी उम्मीदवारों से एक Google फॉर्म भरवाया गया था। जिसमें उनके प्रशासनिक अनुभव के साथ-साथ धार्मिक मान्यताओं और निजी जीवन के बारे में जानकारी मांगी गई थी। इंटरव्यू के दौरान पैनल के सदस्यों ने उनके सीवी को दी गई जानकारी को भी देखा और उनसे उनकी नापसंद लोगों के साथ घुलने मिलने की क्षमता और व्यवहार के बारे में सवाल पूछे। यह सब हो रहा है राम मंदिर के कथित चंदा चोरी का मामला सामने आने के बाद।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rajya-sabha-adjourned-over-ram-temple-theft-issue-raised-by-kharge" target="_blank">Rajya Sabha 2 बजे तक स्थगित, Ram Temple चढ़ावा चोरी मुद्दे पर विपक्ष का हंगामा</a></h3><h2>राम मंदिर ट्रस्ट के CEO इंटरव्यू में पहुंचे पूर्व अफसर</h2><div>पूर्व आईपीएस अधिकारी राजेश पांडेय का दूसरी बार साक्षात्कार लिया गया। साथ ही बिहार के पूर्व पुलिस महानिदेशक परेश सक्सेना भी साक्षात्कार दे रहे है। सूत्रों ने कहा कि चयन समिति की ओर से 3 नामों को छांटे जाने की संभावना है जिसमें से अंतिम नियुक्ति ट्रस्ट की ओर से की जाएगी। राम मंदिर में चंदे के गबन के आरोपों के बाद पूर्णकालिक सीईओ की नियुक्ति करने का निर्णय लिया गया। सूत्रों के मुताबिक, हाई कोर्ट के पूर्व जस्टिस प्रमोद कोहली की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय चयन समिति में लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) विष्णुकांत चतुर्वेदी और सुरेश हवारे शामिल है। इंटरव्यू देने वालों को मंदिर परिसर का दौरा भी कराया जा रहा है।</div><h2>भारत में 52.5% हिंदू पुरुष और 40.7% हिंदू महिलाएं नॉनवेज खाती हैं</h2><div>5 जनवरी 2024 को इंडिया टुडे में छपी सम्राट शर्मा की एक रिपोर्ट के मुताबिक नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे 5 2019-21 के अनुसार भारत में 52.5% हिंदू पुरुष और 40.7% हिंदू महिलाएं नॉनवेज खाती हैं। लगभग आधी आबादी। जहां तक बात शिख और जनेऊ की है तो इसे लेकर भी सोशल इकोनॉमिक्स समझना जरूरी है। शिख हिंदू धर्म में ज्यादातर ब्राह्मण रखते हैं या फिर वो लोग जो दीक्षा लेने के लिए कहीं ना कहीं धार्मिक शास्त्रों की पढ़ाई करते हैं। जैसे अगर कोई वाराणसी के किसी वेद विद्यालय में पढ़ाई करने जाता है तो वहां पहली ही शर्त है कि बच्चे का जनेऊ संस्कार हुआ हो और बच्चा शिखा रखा हो। बिहार और यूपी के कुछ इलाकों में यह चलन भी है कि क्षत्रिय और वैश्य समाज के लोग परिवार के किसी सदस्य के निधन पर बाल मुंडाते हैं तब शिख रखते हैं।</div><div>बहरहाल, अगले साल उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को देखते हुए भी मुद्दा ज्यादा गर्म हो गया है। क्योंकि उत्तर प्रदेश विधानसभा स्पीकर जैसे नेताओं के बयानों पर बवाल भी खूब मचा है। ऐसे में चुनाव के मद्देनजर राम मंदिर में सुरक्षा के लिहाज से विश्वास पाना भाजपा के लिए किसी भी हाल में जरूरी हो गया है। बहुत हद तक यह कारण है कि अब ट्रस्ट की ओर एक अस्थाई सीईओ ढूंढा जा रहा है। फिलहाल तो किसी खास नाम का रिवील नहीं हुआ है। लेकिन कैटेगरी बांटकर दायरा राम के प्रति भाव वालों का दायरा जरूर कम कर दिया गया है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 12:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-new-ceo-of-the-ram-mandir-be-a-brahmin</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या था माओ का 5 फिंगर प्लान, जिसे फॉलो करते हुए जिनपिंग बढ़ा सकते हैं भारत की टेंशन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-was-mao-five-finger-plan-jinping-adherence-to-it-could-increase-indias-concerns]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1958 का वो दौर, जब बीजिंग के तियानमेन स्क्वायर से माओ त्से-तुंग ने भारत की सीमाओं पर अपने विस्तारवादी मंसूबों की पहली लकीर खींची थी। माओ ने तिब्बत को चीन के दाहिने हाथ की हथेली बताया और लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान व अरुणाचल प्रदेश को उसकी पाँच उंगलियां। उन्होंने साफ लफ्जों में कहा था कि ये पाँचों इलाके या तो भारत के कब्जे में हैं या उसके सीधे असर मे और इन्हें 'आजाद' कराकर चीन की हथेली से दोबारा जोड़ना बीजिंग का ऐतिहासिक धर्म है। एक ऐसा खतरनाक और अघोषित ब्लूप्रिंट, जिसे चीन ने कभी किसी सरकारी दस्तावेज में दर्ज तो नहीं किया, लेकिन 1962 की जंग से लेकर डोकलाम और गालवान घाटी की हिंसक झड़पों तक भारत को घेरने की हर चीनी चाल के पीछे इसी 'फाइव फिंगर्स ऑफ तिब्बत पॉलिसी' का साया रहा है। आज जब ड्रैगन हमारी सीमाओं पर आँखें दिखा रहा है, तो सवाल उठता है कि क्या चीन आज भी माओ के उसी 68 साल पुराने सपने को पूरा करने की साजिश रच रहा है? आज हम एमआरआई स्कैन करेंगे चीन की उसी सबसे बड़ी और सबसे पुरानी उस गुप्त रणनीति से, जो भारत की संप्रभुता के लिए आज भी सबसे बड़ा खतरा बनी हुई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/despite-starvation-destitution-bankruptcy-pakistan-ranked-number-1-and-india-13th" target="_blank">भुखमरी, कंगाली और दिवालीयपन के बावजूद पाकिस्तान आया नंबर-1, भारत 13वें नंबर पर, लेकिन किसमें?</a></h3><h2>PPA की रिपोर्ट ने क्या दावा किया</h2><div>अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के ताक्सिंग इलाके से बेहद चिंताजनक खबर सामने आई है। क्षेत्रीय दल पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल (PPA) की एक फैक्ट-फाइंडिंग कमेटी ने अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया है कि चीन की पीपल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) ने भारतीय सैनिकों को ताक्सिंग के रणनीतिक और अहम पेट्रोलिंग पॉइंट्स तक जाने से रोक दिया है। इतना ही नहीं, 'द अरुणाचल टाइम्स' की रिपोर्ट के मुताबिक, पूर्व मंत्री और PPA के मुख्य सलाहकार काहफा बेंगिया की अगुवाई वाली चार सदस्यीय टीम ने जब 10 जुलाई को ताक्सिंग का दौरा किया, तो पाया कि एलएसी (LAC) के पास भारतीय चरवाहों और स्थानीय शिकारियों के पारंपरिक इलाकों पर चीनी सेना धीरे-धीरे अपना अवैध कब्जा बढ़ा रही है। एएनआई की रिपोर्ट के अनुसार, अरुणाचल प्रदेश में चीन की ओर से कोई धीरे-धीरे कब्ज़ा नहीं हो रहा है, जैसा कि कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में दावा किया गया है। रिपोर्ट में भारत-चीन सीमा विवाद के इतिहास और 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' (एलएसी) पर गतिविधियों पर नज़र रखने के लिए उठाए जा रहे कदमों का भी ज़िक्र किया गया है। एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ऐतिहासिक रूप से अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहा है और इस इलाके को "दक्षिणी तिब्बत" कहता है। यह दावा 1960 में भारत-चीन सीमा वार्ता के दौरान किया गया था, जब चीन ने कथित तौर पर मौजूदा राज्य के लगभग 69,000 वर्ग किलोमीटर इलाके पर अपना दावा जताया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/game-is-up-is-the-us-buying-russian-oil-itself-after-stopping-india" target="_blank">हो गया खेल! भारत को रोककर खुद रूसी तेल खरीद रहा अमेरिका?</a></h3><h2>चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया</h2><div>अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन को भारत ने एक बार फिर दो टुक जवाब दिया है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि अरुणाचल प्रदेश पर उसका रुख बिल्कुल स्पष्ट और साथ ही चीन के किसी भी दावे या आपत्ति से जमीन पर मौजूद हकीकत नहीं बदलने वाली। तो हुआ यह है कि चीन ने अरुणाचल प्रदेश की 27 जगहों को भारत के नक्शे में आधिकारिक तौर पर दिखाने पर आपत्ति जताई थी। लेकिन भारत ने साफ कर दिया है कि चीन की इस आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश की स्थिति पर कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। मंगलवार 11 अगस्त को विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न और अटूट हिस्सा है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि इस हकीकत को कोई नहीं बदल सकता। अरुणाचल प्रदेश भारत का एक अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है और यह एक प्रकार से एक स्वय सिद्ध तथ्य भी है और कोई भी चीज इस निर्वाद निर्विवाद वास्तविकता को बदल नहीं सकता। दरअसल विवाद की शुरुआत तब हुई जब भारत ने अरुणाचल प्रदेश के 27 जगहों और दूसरे ज्योग्राफिकल फीचर्स को उनके आधिकारिक नामों के साथ अपने सरकारी नक्शे में दर्ज किया। इसके एक दिन बाद चीन ने अपनी आपत्ति जताई। चीन अरुणाचल प्रदेश को जांगनान यानी कि साउथ तिब्बत कहता है। बीजिंग का दावा है कि यह इलाका चीन का हिस्सा है। चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता गो जियाकुन ने भारत के इस कदम को गैरकानूनी बताया। उन्होंने अरुणाचल प्रदेश को तथाकथित अरुणाचल प्रदेश कहते हुए कहा कि जगहों के नाम बदलने या तय करने से चीन का दावा नहीं बदलेगा। भारत हमेशा से चीन के इस दावे को खारिज करता रहा है। इस बार भी भारत ने साफ-साफ कहा कि चीन की आपत्ति से अरुणाचल प्रदेश के स्टेटस पर कोई असर नहीं पड़ेगा। अब सवाल यह है कि भारत ने आखिर इन 27 जगहों को आधिकारिक नक्शे में दर्ज क्यों किया है? सरकार की तरफ से कहा गया है कि इसका मकसद बॉर्डर को फिर से तय करना नहीं है। बस इन जगहों की सही पहचान और सही नाम सरकारी नक्शे में दर्ज करना है ताकि लोगों को कभी भी इन जगहों के बारे में सही जानकारी मिल सके। तो क्या भारत और चीन के बीच इस मुद्दे पर सिर्फ बयानबाजी ही चल रही है? ऐसा नहीं है। दोनों देशों के बीच सीमा पर शांति बनाए रखने के लिए बातचीत भी जारी है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के मुताबिक 6 अगस्त को नई दिल्ली में भारत चीन सीमा मामलों पर काम करने वाले वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड कोऑर्डिनेशन यानी कि डब्ल्यूएमसीसी की 36वीं बैठक हुई। इसमें एलएसी यानी कि लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल की स्थिति, बॉर्डर मैनेजमेंट, सीमा के बंटवारे से जुड़े मुद्दों और दोनों देशों के बीच बॉर्डर पर सहयोग पर चर्चा हुई। भारत ने इस बैठक में भी साफ कहा कि सीमा पर शांति और स्थिरता दोनों देशों के रिश्तों को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है।</div><h2>माओ का फाइव फ‍िंगर प्‍लान क्‍या है?</h2><div>1949 के बाद कम्युनिस्ट पार्टी दुनिया को अलग नजरिए से देखती है। कम्युनिस्ट पार्टी चाइना के जितने भी प्रेसिडेंट बने हैं सब महत्वाकांक्षी रहे हैं। ये महत्वाकांक्षी लोग ये चाहते हैं कि हमारा कब्जा बना रहे। पूरी दुनिया में अलग-अलग क्षेत्रों पर कब्जा करना चाहते हैं तो ठीक उसी वजह से क्या होता है कि संबंध बिगड़ने लग जाते हैं। 1949 में चीनी गणराज्य के फाउंडर नेता माओ से तुंग ने कहा कि हथेली और पांच उंगलियों को चीन को कब्जे में कर लेना चाहिए यहीं से चीन की पड़ोसियों के प्रति नीति बदल गई। दरअसल माओ से तुंग ने कहा था कि हथेली और पांच उंगलियों पर कब्जा कर लेना चाहिए तो इसमें शामिल क्या-क्या है इस पे भी नजर डालनी जरूरी हो जाता है। दरअसल तिब्बत जिसको इसने शुरुआत में ही अपने कब्जे में ले लिया था तो उसे ये कहता है कि ये हमारी हथेली है वहीं इसके आसपास की अलग-अलग ट्रीटज को ये कहता है कि ये हमारी पांच उंगलियां हैं। तो तिब्बत इसकी हथेली हुई इसके अलावा पांच उंगलियों में लद्दाख, नेपाल, सिक्किम, भूटान और अरुणाचल प्रदेश शामिल है। अगर इन पांचों उंगलियों को समझे तो हमें यह भी पता लगता है कि तीन हिस्से भारत की मुख्य भूमि में शामिल है जिनके ऊपर चाइना की सीधी नजर है। लद्दाख में पहले अक्साई चीन बसा हुआ है अब अक्साई चीन के वजह से हम देखते हैं कि पहले ही दिक्कतें हैं और अभी भी वो लद्दाख को लेकर के अपनी मंशा छोड़ता नहीं है। अरुणाचल प्रदेश को पहले ही कहता है कि वो अरुणाचल प्रदेश नहीं है बल्कि जांग नान है और ये चीन का हिस्सा है। तो ये स्थिति है तो इस प्रकार से ये इसकी हथेली और पांच उंगलियां बन जाती है। इन इलाकों को 'आजाद' कराना या उन पर अपना प्रभाव जमाना चीन का रणनीतिक कर्तव्य माना जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:57:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/what-was-mao-five-finger-plan-jinping-adherence-to-it-could-increase-indias-concerns</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[सिर के बदले सिर! कौन है जनरल रेजाई, जिसे मोजतबा ने बनाया ईरान का 'सिक्योरिटी बॉस']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/who-is-general-rezaei-whom-mojtaba-appointed-as-iran-security-boss]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आंख के बदले आंख नहीं सिर के बदले सिर काटा जाएगा और अमेरिका को पूरी तरह खाड़ी छोड़नी पड़ेगी। अमेरिका को यह खुली चेतावनी देने वाले और यह ऐलान करने वाले कि जंग सिर्फ और सिर्फ ईरान की शर्तों पर खत्म होगी। मेजर जनरल मोहसीन रिजाई एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में हैं। रिजाई ने साफ कहा था कि इस बार ईरान का जवाब सिर्फ जैसे को तैसा वाला नहीं होगा बल्कि उससे भी कहीं आगे जाएगा। और अब इस बेहद आक्रामक सैन्य रणनीतिकार को ईरान में एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप दी गई। सुप्रीम लीडर मोजतबा खामेनई द्वारा सैन्य सलाहकार नियुक्त किए जाने के बाद अब उन्हें देश की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में सुप्रीम लीडर का आधिकारिक प्रतिनिधि बनाया गया है।&nbsp;</div><h2>कौन है मोहसीन रिजाई और क्यों कांपता है उनसे पश्चिमी देश</h2><div>मिडिल ईस्ट में बढ़ते भारी तनाव और अमेरिका इसराइल के साथ जारी इस महासंग्राम के बीच मेजर जनरल मोहसिन रिजाई की यह नई नियुक्ति बेहद रणनीतिक मानी जा रही है। राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी देश की सबसे अहम संस्था सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल में सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि के रूप में रिजाई अब ईरान की विदेशी सैन्य और सुरक्षा नीतियों के सीधे रणनीतिकार होंगे। यह फैसला ऐसे वक्त में आया। जब ईरान अपनी रक्षात्मक नीति छोड़कर आरपार के मूड में नजर आ रहा है। मोहसीन रिजाई ईरान की सत्ता व्यवस्था के सबसे अनुभवी और प्रभावशाली कट्टरपंथी चेहरों में गिने जाते हैं। 1979 की ईरानी क्रांति से पहले वे इस्लामी गोरिल्ला संगठनों के साथ जुड़े रहे। क्रांति के बाद उन्होंने रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉप्स यानी आईआरजीसी की खुफिया शाखा बनाई और 20 सितंबर 1981 को महज 27 साल की उम्र में वे आईआरजीसी के कमांडर इन चीफ बन गए। ईरान इराक युद्ध के दौरान पूरे 8 साल तक उन्होंने मोर्चे पर रहकर सेना की कमान संभाली थी।</div><h2>16 साल तक किया आईआरजीसी का नेतृत्व</h2><div>करीब 16 साल तक आईआरजीसी का नेतृत्व भी किया था। 1986 में वे ईरान के सुप्रीम डिफेंस काउंसिल के भी सदस्य रहे हैं। 1997 में सैन्य कमान छोड़ने के बाद रिजाई राजनीतिक और देश की नीतियों को गढ़ने में लग गए। वे लगातार देश के राष्ट्रपति चुनाव की रेस में रहे। साल 2009, 2013 और 2021 चुनाव में इब्राहिम रही के बाद करीब 34 लाख वोटों के साथ वे दूसरे स्थान पर रहे। सैन्य मामलों के अलावा रिजाई अर्थशास्त्र और सरकारी नीतियों पर भी मजबूत पकड़ रखते हैं। वे 2021 से 2023 तक ईरान के उपराष्ट्रपति रहे हैं और फिलहाल एक्सपीडिएंसी डिसर्नमेंट काउंसिल के सदस्य होने के साथ-साथ सुप्रीम काउंसिल फॉर इकोनमिक कोऑर्डिनेशन के सचिव का पद भी संभाल रहे हैं। जानकारों का मानना है कि रजाई जैसे अनुभवी और बेहद सख्त मिजाज जनरल को सुरक्षा परिषद में सर्वोच्च प्रतिनिधि नियुक्त करने का मतलब साफ है। ईरान अब पश्चिमी ताकतों के सामने झुकने के मूड में बिल्कुल नहीं। रिजाई ना केवल सैन्य मोर्चे की बारियों को समझते हैं बल्कि आर्थिक पाबंदियों के निपटने और रणनीतिक समझ रखने में महारत हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-threat-then-a-quick-secret-flight-did-trump-flee-turkey-covertly" target="_blank">ईरान के डर से अपना एयरफोर्स-1 विमान छोड़-छाड़  झट से ली सीक्रेट फ्लाइट, Turkey से गुप्त तरीके से भागे ट्रंप?</a></h3><h2>मोजतबा ने अपने घेरे को कैसे किया मजबूत</h2><div>28 फरवरी 2026 को अमेरिकी-इजराइली हमलों में अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत के बाद सत्ता संभालने वाले नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने शुरुआती हमलों में घायल होने के बावजूद अपने भरोसेमंद प्रतिनिधियों के जरिए काम करते हुए सेना और सुरक्षा तंत्र पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली है। इसी रणनीतिक फेरबदल के तहत उन्होंने ईरान-इराक युद्ध के अनुभवी रेजाई को अपने शीर्ष सैन्य गुट में शामिल किया है, वहीं आर्म्ड फोर्सेज जनरल स्टाफ (AFGS) प्रमुख मेजर जनरल अली अब्दुल्लाही अलियाबादी को AFGS और 'खातम ओल-अंबिया' (KOACH) का विलय पूरा करने के निर्देश दिए हैं ताकि नियमित सेना (आर्तेश) और IRGC के बीच का मतभेद खत्म हो सके। अमेरिकी-इजराइली हमलों में पूर्व IRGC प्रमुख मोहम्मद पाकपूर और AFGS प्रमुख अब्दुल रहीम मूसावी जैसे शीर्ष कमांडरों के मारे जाने के बाद, अब अहमद वहीदी, अलियाबादी और रेजाई मिलकर इस संकट के दौर में ईरान के केंद्रीय कमान नेटवर्क को पूरी तरह स्थिर और सुचारू करने में जुटे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-hits-back-sharply-at-iran-300-billion-demand" target="_blank">ईरान की 300 अरब डॉलर की मांग पर Trump का तीखा पलटवार, कहा- मारे गए लोगों के लिए हर्जाना दे Tehran</a></h3><h2>ईरान-अमेरिका शांति समझौते में क्या ताज़ा जानकारी है?</h2><div>रेज़ाई की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब तेहरान होर्मुज़ जलडमरूमध्य के आसपास बहुत अहम और जोखिम भरे घटनाक्रमों से निपट रहा है। यह समुद्र का एक संकरा रास्ता है जहाँ से दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत पेट्रोलियम गुज़रता है। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अरागची ने सप्ताहांत में कहा कि होर्मुज़ जलडमरूमध्य से होकर एक रेगुलेटेड शिपिंग कॉरिडोर बनाने के लिए मस्कट की मध्यस्थता में हो रही बातचीत एक समझौते के बहुत करीब है। हालाँकि, अरागची ने वाशिंगटन के साथ सीधी बातचीत की संभावना को साफ तौर पर खारिज कर दिया और अमेरिका पर कुछ समय के लिए हुए अंतरिम समझौता ज्ञापन (MOU) का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। तेहरान ने होर्मुज़ जलडमरूमध्य को बिना किसी रोक-टोक के कमर्शियल तेल की आवाजाही के लिए पूरी तरह से फिर से खोलने पर सहमत होने से पहले पाँच स्पष्ट शर्तें रखी हैं।</div><h2>क्या है ये शर्तें</h2><div>नौसैनिक घेराबंदी से राहत: ईरान के कमर्शियल और तेल-निर्यात करने वाले बंदरगाहों पर लगी अमेरिकी नौसैनिक घेराबंदी को तुरंत खत्म करना।</div><div>सैनिकों की वापसी: फारस की खाड़ी इलाके से अमेरिकी आक्रामक सैन्य साधनों (assets) को वापस बुलाना।</div><div>प्रतिबंध हटाना: 2025-2026 के संघर्ष के दौरान फिर से लगाए गए या बढ़ाए गए आर्थिक और ऊर्जा प्रतिबंधों से बड़ी राहत।</div><div>संपत्ति को फ्रीज़-मुक्त करना: विदेशी बैंकों में रखी ईरान की सरकारी वित्तीय संपत्तियों को पूरी तरह से जारी करना।</div><div>युद्ध का हर्जाना: युद्ध के दौरान ईरान के आम नागरिकों और ऊर्जा से जुड़े बुनियादी ढांचे को हुए नुकसान के लिए औपचारिक वित्तीय मुआवज़ा।</div><h2>पश्चिम एशिया के हालात कैसे हैं?</h2><div>रेज़ाई की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब क्षेत्र में कई मोर्चों पर संघर्ष चल रहा है, जिसमें क्षेत्रीय सहयोगी, प्रॉक्सी और पड़ोसी खाड़ी देश शामिल हैं। पड़ोसी देश इराक में, संघीय अधिकारियों ने ईरानी समर्थित मिलिशिया की गतिविधियों पर रोक लगाने के लिए कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, ताकि इराकी धरती पर और जवाबी हमले न हों। इराकी खुफिया अधिकारियों ने इस महीने की शुरुआत में सऊदी सुरक्षा प्रतिनिधिमंडल से मुलाकात की और सऊदी क्षेत्र को निशाना बनाने वाले ड्रोन और मिसाइल हमलों को रोकने का वादा किया। यह सुरक्षा सहयोग 2 अगस्त को हुए ड्रोन हमले के बाद हुआ है, जिसका आरोप हथियार छोड़ने का विरोध करने वाले कट्टरपंथी इराकी मिलिशिया गुटों पर लगा था — इस हमले में बगदाद के उत्तर में कैंप ताजी में अमेरिका द्वारा दिए गए गोला-बारूद का भंडार नष्ट हो गया था। खुफिया विश्लेषकों का मानना ​​है कि यह हमला मिलिशिया के कट्टरपंथियों द्वारा इराकी सैन्य उपकरणों को नष्ट करने की कोशिश थी, जिनका इस्तेमाल गैर-सरकारी सशस्त्र समूहों के खिलाफ किया जा सकता था।</div><div>दक्षिणी अरब में हूथी बलों और रॉयल सऊदी सशस्त्र बलों के बीच छोटे-मोटे संघर्ष भी फिर से शुरू हो गए हैं। खबरों के अनुसार, सऊदी अरब नौसैनिक और सीमित ज़मीनी अभियानों की तैयारी को अंतिम रूप दे रहा है, जिनका मकसद रेड सी (लाल सागर) में शिपिंग लेन को सुरक्षित करना और अपने पश्चिमी तट पर सऊदी कच्चे तेल के निर्यात में हूथी द्वारा पैदा की जा रही बाधाओं को खत्म करना है।</div><h2>अब ईरान के लिए आगे क्या?</h2><div>सैन्य फैसलों के साथ-साथ, देश की अर्थव्यवस्था को बचाए रखना भी ईरान के नेतृत्व के लिए एक ज़रूरी प्राथमिकता बनी हुई है। सरकारी मीडिया ने पुष्टि की है कि पेज़ेशकियन ने खामेनेई के साथ एक लंबी बैठक की, जिसमें देश के सैन्य बजट, विदेशी मुद्रा भंडार और ऊर्जा आवंटन की समीक्षा की गई। सरकारी टेलीविज़न ने बताया कि इस बातचीत का मुख्य मकसद संसाधन जुटाना, रियाल और ऊर्जा पर होने वाले खर्च को संभालना और विदेशी साझेदारों के साथ आपातकालीन आर्थिक सहयोग स्थापित करना था, क्योंकि देश उस स्थिति से गुज़र रहा है जिसे सरकारी मीडिया तीसरा थोपा गया युद्ध बताता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 14:16:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/who-is-general-rezaei-whom-mojtaba-appointed-as-iran-security-boss</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[फिर शुरू होगा 'कैश' वाला जमाना! UPI पेमेंट पर आपको नहीं देना होगा चार्ज, लेकिन क्या मर्चेंट ट्रांजैक्शन का असर  ग्राहकों पर पड़ सकता है? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/cash-era-is-set-to-return-wont-have-to-pay-charges-upi-but-could-merchant-transaction-fees-impact]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>चाय की टपरी पर 5 रुपये की कटिंग से लेकर बड़े-बड़े मॉल्स में हज़ारों का सामान खरीदने तक'स्कैन किया और पे किया'ये अब हमारे आम दिन चर्या का हिस्सा बन चुका है। आज सब्जी की रेहड़ी वाला भी छुट्टे पैसे मांगने की जगह सीधा क्यूआर कोड (QR Code) आगे बढ़ा देता है। डिजिटल इंडिया ने हमारी जेब से कैश का झंझट तो खत्म कर दिया, लेकिन क्या यह आराम अब ज़्यादा दिन का मेहमान नहीं है? भारत फिर से कैश वाले ज़माने में लौट रहा है! भारत-पे के पूर्व को-फाउंडर अशनीर ग्रोवर ने सोशल मीडिया पर ऐसा ही कुछ दावा करके पूरे देश में खलबली मचा दी है। सुनने में अजीब ज़रूर लगेगा, पर जिस रफ्तार से नियम बदल रहे हैं और पेमेंट्स पर पेंच फंस रहे हैं, वो दिन दूर नहीं जब आपको अपनी जेब में फिर से गांधी जी के नोटों की गड्डी सजानी पड़ जाए! क्या सच में मुफ़्त यूपीआई का ज़माना जाने वाला है? क्या आपके गूगल पे, फोनपे और पेटीएम से अब पैसे कटने वाले हैं या फिर यह सिर्फ दुकानदारों का नया सिरदर्द है? आइए, यूपीआई पर चार्ज के इस पूरे गणित का पर्दाफाश करते हैं!</p><h2>एमडीआर आखिर होता क्या है?&nbsp;</h2><p>जब आप किसी दुकान पर कार्ड या डिजीटल पेमेंट से पैसा देते हैं तो पेमेंट सिस्टम को चलाने वाली कंपनियों और बैंकों को एक फीस मिलती है। इसी फीस को&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">एमडीआर यानी मर्चेंट डिस्काउंट रेट कहा जाता है। फिलहाल यूपीआई पूरी तरह फ्री है। इसका मतलब है कि बैंकों और कंपनियों को इसे चलाने के लिए अपनी जेब से पैसा खर्च करना पड़ता है। इस पूरे विवाद की जड़ में है टैक्सेशन एंड अदर लॉ अमेंडमेंट बिल 2026। 6 अगस्त 2026 को लोकसभा में हंगामे के बीच बगैर चर्चा ध्वनि मत से इस बिल को पारित किया गया। यह बिल पेमेंट एंड सेटलमेंट सिस्टम एक्ट 2007 में संशोधन करता है। अब तक कानून यह था कि यूपीआई और रुपए डेबिट कार्ड के जरिए होने वाले भुगतान पर कोई भी बैंक या सर्विस प्रोवाइडर कोई शुल्क माने एमडीआर नहीं वसूल कर सकता है। पुराने कानून की धारा 10 ए स्पष्ट रूप से बैंकों को ऐसे चार्ज लगाने से रोकती थी। लेकिन नए संशोधन ने सरकार को यह अधिकार दे दिया है कि वह भविष्य में नोटिफिकेशन के जरिए यह तय कर सकें कि किन डिजिटल पेमेंट मोड पर शुल्क लगाया जा सकता है और किन्हें मुफ्त रखा जाना चाहिए। आसान भाषा में कहें तो अब तक जो कानूनी गारंटी थी कि यूपीआई मुफ्त रहेगा वो खत्म हो गई है।&nbsp;&nbsp;</span></p><h2>लोकसभा पास कर चुकी है बिल</h2><p>वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले हफ्ते लोकसभा में टैक्सेशन एंड अदर लॉज ( अमेंडमेंट) बिल 2026 पेश किया था, जिसे लोकसभा पास कर चुकी है। यह बिल सरकार को UPI और रूपे कार्ड से होने वाले ट्रांजैक्शंस पर जीरो MDR की व्यवस्था में बदलाव करने का कानूनी आधार देता है। अभी बैंक और पेमेंट सर्विस देने वाली कंपनियां यूपीआईऔर रूपे डेबिट कार्ड के जरिए पेमेंट के लिए यूजर्स से कोई चार्ज नहीं ले सकती हैं। मंत्रालय ने बयान में कहा, 'इस बिल के संसद से पास होने के बाद UPI और अन्य सेवाओं पर NPCI की अध्यक्षता वाली कमिटी तय करेगी कि कोई एमडीआर लगेगा या नहीं।&nbsp;</p><h2>सरकार ने साफ की तस्वीर</h2><p>सरकार यह स्पष्ट रूप से बताना चाहती है कि यूजर्स के लिए कोई चार्ज नहीं होगा। पेमेंट करने वाले उपभोक्ताओं पर कोई ट्रांजैक्शन चार्ज नहीं लगेगा। सभी पर्सन टु पर्सन ट्रांजैक्शन भी बिना किसी चार्ज के होते रहेंगे। मर्चेंट्स के बारे में मंत्रालय ने कहा कि एमडीआर चार्जेज जब भी लागू होंगे, ये कुछ ही मर्चेट ट्रांजैक्शंस पर लगेंगे।&nbsp;</p><h2>संशोधन की जरूरत क्यों पड़ी?</h2><p>मंत्रालय ने कहा कि हकीकत में यह संशोधन इस बात का प्रावधान करने के लिए है, जिससे यूपीआई लंबे समय तक चलता रहे, टेक्नॉलजी बेहतर हो सके और जो भी जोखिम उभरे, उनका अच्छी तरह से सामना किया जा सके। मंत्रालय ने कहा कि यूपीआई से बढ़ते लेनदेन को देखते हुए साइबर सिक्योरिटी और इंफ्रास्ट्रक्चर को मजबूत करने की जरूरत है। साथ ही, ज्यादा कंपनिया अपना कामकाज बढ़ा सकें, इसके लिए प्रतिस्पर्द्धा बढ़ाने की जरूरत भी है। इसके लिए आत्मनिर्भर रेवेन्यू मॉडल की जरूरत है।&nbsp;</p><h2>&nbsp;आरबीआई गवर्नर ने भी दिलाया भरोसा</h2><p>आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने इस मुद्दे पर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा पेमेंट जैसे पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश जरूरी है और इसके लिए किसी ना किसी को तो पेमेंट करना ही होगा। हमारे सामने आसान विकल्प है। या तो आम जनता टैक्स के जरिए इसके लिए पेमेंट करें या फिर यूजर पे मॉडल को अपनाते हुए मर्चेंट डिस्काउंट रेट एमडीआर लागू करें। अभी सरकार हमारे लिए संशोधन ला रही है। लागत का पेमेंट तो किसी ना किसी को करना ही होगा। द हिंदू में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार सरकारी आंकड़े कहते हैं कि सरकार ने पेमेंट कंपनियों को नुकसान से बचाने के लिए अब तक लगभग 11349 करोड़ की सब्सिडी दी है। लेकिन यूपीआई का दायरा इतना बढ़ गया है कि अब सरकार के लिए हर साल हजारों करोड़ की सब्सिडी देना मुश्किल हो रहा है। जुलाई 2026 में ही यूपीआई ने 23.6 अरब ट्रांजैक्शन किए जिनकी कीमत 29.9 ट्रिलियन थी। इतनी बड़ी व्यवस्था को सुरक्षित रखने के लिए भारी निवेश की जरूरत है।&nbsp;</p><h2>बाहरी दबाव वाला दावा कितना सही?</h2><p>इस पूरे फैसले पर कांग्रेस ने सवाल उठाए हैं। 6 अगस्त को कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने एक लंबा चौड़ा ट्वीट किया जिसमें दावा किया कि मोदी सरकार द्वारा लाया गया&nbsp;'टैक्सेशन एंड अदर लॉज़ (अमेंडमेंट) बिल, 2026 उस वैधानिक गारंटी को समाप्त कर देता है जो अब तक यूपीआई लेने देन को शुल्क मुफ्त बनाए हुए था।&nbsp;उन्होंने कहा था कि 'यह कदम अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि की 2026 की उस रिपोर्ट के बाद उठाया गया है, जिसमें यूपीआई और RuPay के शुल्क-मुक्त होने की आलोचना की गई थी और आरोप लगाया गया था कि उन्होंने Visa और मास्टरकार्ड जैसे अमेरिकी पेमेंट प्लेटफॉर्मों को बाजार से बाहर कर दिया है। क्या सरकार अपने अच्छे मित्र डॉनल्ड ट्रंप के दबाव में डिजिटल भुगतान क्षेत्र को अमेरिकी कपनियों के लिए खोलना चाहती है? इस आरोप पर मंत्रालय ने कहा यह आधारहीन, पूरी तरह झूठ और गुमराह करने वाली बात है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">वित्त मंत्री ने कहा कि एमडीआर का पैसा ग्राहकों से नहीं बल्कि मर्चेंट से लिया जाता है। इससे बैंक और फिनटेक कंपनियां यूपीआई की तकनीक, सुरक्षा और इंफ्रास्ट्रक्चर पर ज्यादा निवेश कर सकेंगी जिसका फायदा सभी यूपीआई यूज़र्स को मिलेगा।&nbsp;</span></p><h2>मर्चेंट ट्रांजक्शन का असर आखिरकार ग्राहकों पर पड़ सकता है?<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h2><p>जयराम रमेश ने इसका जवाब दिया। उनका कहना है कि सरकार भले ही यह कह रही हो कि एमडीआर दुकानदार से लिया जाएगा। ग्राहक से नहीं लेकिन इसका असर आखिरकार ग्राहकों पर ही पड़ सकता है। उनका तर्क है कि दुकानदार अपनी लागत निकालने के लिए सामान की कीमत बढ़ा सकते हैं या अलग-अलग पेमेंट तरीकों के लिए अलग-अलग कीमत रख सकते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि मर्चेंट सिर्फ बड़े कारोबारी नहीं होते। इसमें छोटे दुकानदार, किराना स्टोर और रे पटरी वाले भी शामिल हैं। यानी अगर कोई चार्ज आया तो उसका असर छोटे कारोबारियों पर भी पड़ सकता है। यानी सरकार और विपक्ष के बीच असली सवाल यही है कि अगर भविष्य में यूपीआई और एमडीआर आता है तो उसका बोझ आखिर किस पर पड़ेगा?&nbsp;</p><p><br></p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 14:38:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/cash-era-is-set-to-return-wont-have-to-pay-charges-upi-but-could-merchant-transaction-fees-impact</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आ गई बुरी खबर! भारत पर फूटने ही वाला है ट्रंप का ये खतरनाक 'बम', 10 प्वाइंट में इसके असर को समझें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-100-tariff-bomb-is-about-to-hit-india]-understand-its-impact-in-10-points]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस सेनट से पारित हुआ है। भारत समेत 5 देश ऐसे हैं, जहां पर 100 % टैरिफ वाला बिल, यूएस में पास हो गया है। रूस से तेल खरीदने वाले देशों पर 100 % टैरिफ अब यूएस लगाएगा। 31 अगस्त को यूएस हाउस ओफ रिप्रेजेंटेटिव में रखा जाएगा, लेकिन अमेरिकी सीनेट से ये पारित हो गया है। 86 जो सीनेट के सदस्य हैं, यानि संसद उन्हों ने इसके समर्थन में वोट किया। इसके पारित होने के बाद पांच देशों के खिलाफ 100 %&nbsp; तक का टैरिफ लगाया जा सकता है। हालांकि कि ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को होगा, लेकिन अगर ये बिल पारित हो जाता है, तो भारत और वैसे देश जो रूस से सबसे अधिक मात्रा में तेल आयात करते हैं, उन पर संकट पैदा हो सकता है।लेकिन ये पूरा अधिकार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप&nbsp; को होगा, लेकिन भारत के लिए ये ऐसा बिल है, जो आने वाले वक्त में भारत को मुश्किलों में डाल सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/historic-agreement-between-iran-and-oman-regarding-the-strait-of-hormuz" target="_blank">Strait of Hormuz पर Iran-Oman के बीच ऐतिहासिक समझौता, US Sanctions के बीच क्या बदलेगी दुनिया की सूरत?</a></h3><h2>यह विधेयक (Bill) क्या है?</h2><div>अमेरिकी सेनेट ने 86-11 के भारी बहुमत से "लिंडसे ओ. ग्राहम सेंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 पारित किया है।&nbsp; इस द्विपक्षीय विधेयक का नाम दिवंगत रिपब्लिकन सीनेटर लिंडसे ग्राहम के नाम पर रखा गया है, जो इसके मुख्य वास्तुकारों में से एक थे।&nbsp; बिल का मुख्य उद्देश्य रूस और ईरान पर आर्थिक दबाव बढ़ाना और उन देशों पर शिकंजा कसना जो मॉस्को (रूस) के साथ बड़े पैमाने पर ऊर्जा व्यापार जारी रखे हुए हैं। यह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति को उन देशों से आयात होने वाले सामानों पर 100% तक का सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है, जो रूसी तेल या प्राकृतिक गैस के दुनिया के शीर्ष 5 खरीदारों में शामिल हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h2>इस विधेयक में और कौन से प्रतिबंध प्रस्तावित हैं?</h2><div>यह विधेयक सिर्फ रूसी तेल खरीदारों पर शुल्क लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कई अन्य कठोर प्रतिबंध शामिल हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, वरिष्ठ राजनीतिक और सैन्य अधिकारियों, और कुलीन वर्गों पर सीधे प्रतिबंध। रूस के बैंकों, वित्तीय संस्थानों और युद्ध प्रयासों को वित्तपोषित करने वाली संस्थाओं पर पाबंदी। रूस द्वारा मौजूदा प्रतिबंधों से बचने और तेल निर्यात से कमाई जारी रखने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले पुराने और दूसरे देशों के झंडे वाले तेल टैंकरों पर प्रतिबंधों का विस्तार।&nbsp; इसके तहत ईरान के ऊर्जा और हथियार क्षेत्रों पर प्रतिबंधों को आगे बढ़ाया गया है। रूस की अर्थव्यवस्था और उसके सैन्य अभियान को मिलने वाली फंडिंग को रोकना।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-will-never-possess-nuclear-weapons-oil-prices-will-fall-through-negotiations-jd-vance-claims" target="_blank">Iran के पास कभी नहीं होंगे Nuclear Weapons, बातचीत से गिरेंगे Oil Prices, जेडी वेंस का दावा</a></h3><h2>भारत के सामने जल्द क्या चुनौती आ सकती है?</h2><div>यदि यह विधेयक पूरी तरह से कानून बनता है, तो राष्ट्रपति के पास शीर्ष 5 रूसी तेल खरीदारों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100% शुल्क लगाने की शक्ति होगी। भारत और चीन दुनिया में रूसी कच्चे तेल के सबसे बड़े खरीदारों में से हैं। इस कानून की संरचना ऐसे की गई है कि देशों को अमेरिका के साथ व्यापार बनाए रखने और रूस से सस्ता तेल खरीदने में से किसी एक को चुनना पड़े।&nbsp; डार्लीन ग्राहम (दिवंगत सीनेटर की बहन) ने कहा कि यह विधेयक रूस की अर्थव्यवस्था को संभाले रखने वाले प्रमुख देशों को एक सरल लेकिन महत्वपूर्ण विकल्प चुनने के लिए मजबूर करता है – अमेरिका के साथ व्यापार करने का विकल्प या रूस से सस्ता तेल खरीदने का विकल्प।</div><h2>भारत चर्चा में क्यों है?</h2><div>2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद से भारत ने रियायती दरों पर रूसी कच्चा तेल खरीदना काफी बढ़ा दिया है। रूस पहले भारत के लिए तेल का कोई बड़ा सप्लायर नहीं था, लेकिन मॉस्को और यूक्रेन के बीच युद्ध शुरू होने और यूरोप द्वारा रूसी कच्चा तेल खरीदना बंद करने के बाद, यह भारत के लिए भारी छूट पर उपलब्ध हो गया। इस बदलाव से भारतीय रिफाइनरों को कच्चे तेल की लागत कम करने और ग्लोबल एनर्जी मार्केट में रुकावटों के बावजूद सप्लाई सुनिश्चित करने में मदद मिली है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) से शिपिंग में रुकावटों के बीच रूसी तेल पर निर्भरता और भी महत्वपूर्ण हो गई है, क्योंकि इन रुकावटों ने मध्य पूर्व से ऊर्जा की सप्लाई को प्रभावित किया है।</span></div><div>नई दिल्ली ने बार-बार कहा है कि उसकी ऊर्जा खरीद राष्ट्रीय हित, ऊर्जा सुरक्षा और किफायती व भरोसेमंद सप्लाई सुनिश्चित करने की ज़रूरत से तय होती है।</div><h2>भारत पहले से ही टैरिफ़ के दबाव का सामना कर रहा है</h2><div>यह प्रस्तावित कानून तब आया है जब वाशिंगटन पहले ही रूस से तेल खरीदने के लिए भारत पर अतिरिक्त शुल्क लगा चुका है। हालाँकि, पहले उठाए गए कदमों से भारतीय रिफाइनर रूस से कच्चा तेल खरीदने से तुरंत नहीं रुके।</div><div>मध्य पूर्व में चल रहे संघर्ष से ऊर्जा बाज़ार प्रभावित हो रहे हैं और इस क्षेत्र से होने वाली सप्लाई को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, ऐसे में भारतीय रिफाइनरों के लिए रूसी कच्चा तेल एक महत्वपूर्ण स्रोत बना हुआ है। एक रिपोर्ट में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, अकेले जून 2026 में भारत का रूसी तेल का आयात 34% बढ़ गया।</div><h2>अमेरिका ने 100% टैरिफ लगा दिया तो क्या होगा?</h2><div>अगर बड़े पैमाने पर 100% टैरिफ लगाया जाता है, तो अमेरिकी इंपोर्टर्स के लिए भारतीय सामान काफी महंगे हो जाएंगे। इसका असर खास तौर पर इंजीनियरिंग के सामान, फार्मास्यूटिकल्स, केमिकल्स, टेक्सटाइल्स और ऑटो पार्ट्स जैसे एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड सेक्टर पर पड़ सकता है। अगर भारतीय प्रोडक्ट्स काफी महंगे हो जाते हैं, तो अमेरिकी खरीदार दूसरे देशों में वैकल्पिक सप्लायर्स की तलाश कर सकते हैं। नतीजतन, भारतीय एक्सपोर्टर्स को कम डिमांड, कम मार्जिन या कॉम्पिटिटिव बने रहने के लिए अतिरिक्त लागत का कुछ हिस्सा खुद उठाने की ज़रूरत का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे टैरिफ का खतरा भारतीय कंपनियों को अपने एक्सपोर्ट मार्केट में विविधता लाने और पॉलिसी बनाने वालों पर वाशिंगटन के साथ बातचीत करने का दबाव बढ़ाने के लिए भी प्रेरित कर सकता है।</div><h2>कुछ अमेरिकी सांसद क्यों इसके विरोध में हैं?</h2><div>हालांकि बिल को सीनेट का भारी समर्थन मिला, लेकिन कुछ सांसदों ने ट्रंप को टैरिफ लगाने के लिए व्यापक अधिकार देने पर चिंता जताई है। आलोचकों का तर्क है कि टैरिफ से अमेरिकी कंज्यूमर्स और बिज़नेस के लिए लागत बढ़ सकती है, ऐसे समय में जब परिवारों को पहले से ही रहने-सहने के ऊंचे खर्चों का सामना करना पड़ रहा है। सीनेटर रॉन वाइडेन ने कहा कि अमेरिका में ऐसे लोग हैं जो आर्थिक रूप से बहुत मुश्किल हालात (आर्थिक तंगी) से गुज़र रहे हैं। रिपब्लिकन सीनेटर रैंड पॉल और वाइडेन द्वारा नए टैरिफ अधिकार को हटाने के लिए लाए गए एक संशोधन को सीनेट ने खारिज कर दिया। सीनेटर राफेल वार्नॉक, जिन्होंने टैरिफ प्रावधानों पर चिंता जताई थी, ने कहा कि उन्हें ट्रंप प्रशासन से सुरक्षा उपायों के बारे में लिखित आश्वासन मिला है। वार्नॉक ने कहा हमें पुतिन की आक्रामकता पर रोक लगाने और इस राष्ट्रपति के टैरिफ सिस्टम पर रोक लगाने के बीच चुनाव नहीं करना चाहिए।" अगर ट्रंप "अपनी शक्तियों का गलत इस्तेमाल करते हैं, तो हम उन्हें कोर्ट में देखेंगे।</div><h2>विधेयक में ईरान को भी निशाना क्यों बनाया गया है?</h2><div>यह विधेयक ईरान सेंक्शन एक्ट ऑफ 1996 की अवधि को बढ़ाकर 2031 तक करने का प्रस्ताव रखता है। इसका मुख्य उद्देश्य ईरान के ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बनाए रखना है। यह विधेयक वॉशिंगटन (अमेरिका) के दो सबसे बड़े भू-राजनीतिक विरोधियों रूस और ईरान को एक साथ निशाना बनाता है।</div><h2>छूट किसे और कैसे मिल सकती है?</h2><div>विधेयक में कुछ शर्तों के तहत देशों को प्रतिबंधों या टैरिफ से छूट देने का प्रावधान है। जैसे यदि कोई देश रूस के कुल प्राकृतिक गैस निर्यात का 15% से कम आयात करता है और रूसी ऊर्जा पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कदम उठा रहा है, तो वह छूट का पात्र हो सकता है। अमेरिकी राष्ट्रपति के पास यह अधिकार होगा कि यदि उन्हें लगता है कि ऐसा करना अमेरिका के राष्ट्रीय हित में है, तो वे किसी भी देश पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों या शुल्कों को टाल या माफ कर सकते हैं।&nbsp;</div><h2>आगे क्या होगा?&nbsp;</h2><div>सेनेट से पारित होने के बाद यह विधेयक अब अमेरिकी संसद के निचले सदन 'हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स' में जाएगा। अगस्त के अंत में जब सांसद छुट्टियों से वापस लौटेंगे, तब इस पर विचार होने की संभावना है।&nbsp; इस बिल को कानून बनने और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के पास हस्ताक्षर के लिए भेजने से पहले निचले सदन द्वारा पास किया जाना अनिवार्य है। इसका मतलब है कि नया टैरिफ लागू होने से पहले अभी भी एक महत्वपूर्ण विधायी और राजनयिक प्रक्रिया बाकी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 13:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/trump-100-tariff-bomb-is-about-to-hit-india]-understand-its-impact-in-10-points</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बलूचिस्तान का 70% क्षेत्र गंवाया, खैबर को तालिबान ने कब्जाया, PoK में गोलियों से आवाज को दबाया, किस पाकिस्तान पर हुकूमत कर रहे मुनीर-शहबाज?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pok-to-balochistan-munir-pakistan-army-losing-control]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजनीतिक अनिश्चितता, सीमा पार से बढ़ता आतंकवाद और सड़कों पर भड़कता जन-आक्रोश पाकिस्तान इस वक्त एक साथ कई मोर्चों पर गंभीर संकट से जूझ रहा है। तस्वीर साफ़ है। एक कब्जे वाले इलाके में कराया गया दिखावटी चुनाव, खून-खराबे में तब्दील होते सड़कों के विरोध-प्रदर्शन, पुलिस थानों पर बरसाती गोलियों वाले सिरफिरे आतंकी, और सेना के इशारों पर नाचती सरकार की धज्जियां उड़ाते विद्रोही! गजब की बात तो यह है कि कभी जिनके दम पर पाकिस्तान उछलता था, आज वही पुराने दोस्त उसके सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं। सोने पर सुहागा यह कि जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री की एक आवाज पर आज भी सड़कों पर हुजूम उमड़ पड़ता है और हालत यह आ चुकी है कि खुद सरकार भी मान रही है कि सिस्टम पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। कहानी की शुरुआत करते हैं पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) से करते हैं।&nbsp; इस्लामाबाद की सरकार ने सोचा था कि 10 अगस्त तक निपटाने के लिए यहाँ एक ढर्रे वाला लोकल इलेक्शन करा देंगे। लेकिन नेताओं की रैलियों की जगह, पाकिस्तान के गैर-कानूनी कब्जे में पिस रही जनता ने यह पूरी गर्मी सड़कों के उग्र आंदोलनों में बिता दी। इस पूरे बवाल के केंद्र में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JAC) खड़ा है। शुरुआत बहुत सीधी-सादी मांगों सस्ती बिजली, सब्सिडी वाला आटा, टैक्स में छूट और शासन में सही नुमाइंदगी से हुई थी। लेकिन अब यह चिंगारी पूरे पाकिस्तान के लिए ऐसा नासूर बन चुकी है, जिसे बुझाना इस्लामाबाद के बस के बाहर की बात दिख रही है!</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/tewolde-gebremariam-was-set-to-become-the-pia-chief-but-the-tata-group-won-the-race" target="_blank">Tewolde Gebremariam बनने वाले थे PIA चीफ, लेकिन Tata Group ने मारी बाजी, अब संभालेंगे Air India</a></h3><h2>बगावत की आवाज को गोलियों से दबाने की कोशिश</h2><div>समय के साथ, इसकी मांगें एक बहुत बड़ी राजनीतिक चुनौती बन गईं। सबसे विस्फोटक मांग थी। स्थानीय विधानसभा में बाहरी शरणार्थियों के लिए आरक्षित 12 सीटों को खत्म करना। JAC का तर्क है कि इन सीटों से पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में रहने वाले लोगों की राजनीतिक आवाज़ कमजोर होती है। बढ़ते गुस्से पर इस्लामाबाद की प्रतिक्रिया मजबूरी में आई है। सुरक्षा बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर स्नाइपर से गोलीबारी की है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में कम से कम 90 लोग मारे गए हैं और सैकड़ों घायल हुए हैं। हाल के हफ्तों में कर्फ्यू, रास्ते बंद करने और कार्यकर्ताओं की बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियों के साथ सख्ती और बढ़ गई है। अशांति और सख्ती के इसी माहौल में इस्लामाबाद अब पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में स्थानीय चुनाव करा रहा है। लेकिन वोटिंग पूरी होने से पहले ही, स्थानीय कार्यकर्ता इन चुनावों को धांधली वाला बता रहे हैं। वे JAC को आतंकवादी संगठन घोषित किए जाने को गलत कदम मानते हैं। लेकिन सड़कों पर उतरे आम लोगों के लिए, सरकार के रवैये ने इस संकट को और गहरा कर दिया है। राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों को अब आतंकवादी बताया जा रहा है। उनका कहना है कि इस लेबल का इस्तेमाल उनके विरोध को आपराधिक ठहराने के लिए किया जा रहा है।&nbsp;</div><h2>बलूचिस्तान का एक तिहाई हिस्सा पाक ने गंवाया</h2><div>पाकिस्तान के सबसे बड़े सूबे क्वेटा बलूचिस्तान का इलाका वैसे तो लगभग 45% क्षेत्र में फैला है। ईरान से इसकी सीमा भी लगती है। बलूचिस्तान में दूर दूर तक खाली मैदान और रेगिस्तान हैं। यहां की वीरानगी में इन दिनों बागी तेवर और तेज हो गए हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) के लड़ाके अलग देश की मांग कर रहे हैं। हालात ये हैं कि बलूच लड़ाकों और पश्तून (पठान) विद्रोहियों का बलूचिस्तान सूबे के लगभग 70% हिस्से पर कब्जा है। अब सवाल केवल यह नहीं है कि पाकिस्तानी सुरक्षा बल कितने विद्रोहियों को ढेर करते हैं या गिरफ्तार करते हैं। असली सवाल यह है कि क्या पाकिस्तानी सरकार पुलिस स्टेशन खुले रख सकती है, हाईवे पर यातायात चला सकती है, बाजार और कारोबार सामान्य रख सकती है और लोगों को बिना डर के यात्रा करने की सुरक्षा दे सकती है? बलूचिस्तान के कई इलाकों में हथियारबंद लड़ाके क्वेटा, खुजदार और मसतुंग जैसे शहरों में घुसकर पुलिस थानों और सरकारी दफ्तरों पर हमले करते हैं। बीएलए के लड़ाके और पश्तून गुट सड़कों पर अस्थायी चौकियां बना रहे हैं और वाहनों की तलाशी लेते हैं। खुलेआम वसूली भी होती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/rushkar-ahmed-an-accused-in-a-grooming-gang-case-who-absconded-after-securing-bail-from-uk-police" target="_blank">UK Police से ज़मानत लेकर फरार Grooming Gang का आरोपी, Rushkar Ahmed अब PoK Assembly में बैठेगा</a></h3><h2>खनिज और पोर्ट पर चीन-अमेरिका का कब्जा</h2><div>बलूचिस्तान को पाकिस्तान की खनिजों की खदान भी कहते हैं। बात शुरू की तो खुजदार शहर के युवक मोमिन का पाक सरकार पर गुस्सा फूट पड़ा। मोमिन कहते हैं यहां के ग्वादर पोर्ट पर चीन का कब्जा है। चीन ने सीपैक के नाम पर यहां लगभग 3 लाख करोड़ रुपए का निवेश किया है। ग्वादर पोर्ट पर चीन की फिशिंग बोट्स का कब्जा है। स्थानीय बलूच मछुआरों को चीनी बोट्स खदेड़ देती हैं। इनकी बोट्स बड़ी और ज्यादा पावर वाली होती हैं। ज्यादातर बलूच मछुआरों के पास अब भी पालदार नौकाएं हैं। बलूच बेरोजगार हो रहे हैं। 55 साल के असलम का कहना है कि यहां के रेअर अर्थ मिनरल पर अमेरिका का कब्जा है। पाक आर्मी चीफ मुनीर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प के सामने मिनरल की नुमाइश करते हैं। इस खजाने पर केवल बलूचों का हक है।</div><h2>खैबर पर तालिबानी शरिया वाली सरकार ने जमाया कब्जा</h2><div>खैबर पख्तूनख्वा पाकिस्तान का फ्रंटियर यानी सरहदी इलाका है। डूरंड लाइन पाक और अफगानिस्तान को अलग करती है। अफगानिस्तान में तालिबान सरकार के पांच साल में खैबर के अधिकांश इलाके में इन्हीं का दबदबा है। 2 अगस्त को पाकिस्तान के उत्तर-पश्चिमी खैबर पख्तूनख्वा (KP) प्रांत में आतंकवाद-विरोधी रैली के दौरान हुए आत्मघाती बम धमाके में कम से कम 17 लोगों की मौत हो गई और दो दर्जन से ज़्यादा लोग घायल हो गए। मरने वालों में ज़्यादातर आम नागरिक और पुलिस अधिकारी थे। यह हमला प्रांत की स्वात घाटी के काबल शहर में हुआ, जहाँ प्रदर्शनकारी एक पुलिस स्टेशन के पास जमा होकर नारे लगा रहे थे और घाटी में शांति और अमन की मांग कर रहे थे। 'स्वात पीस रैली' नाम की इस रैली का आयोजन स्थानीय आदिवासी परिषद 'स्वात अमन जिरगा' ने किया था। यह बम धमाका पाकिस्तान के लिए आंतरिक सुरक्षा और जान-माल के नुकसान के लिहाज़ से बेहद गंभीर रहे साल की एक और घटना है। 'डॉन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पाकिस्तान सशस्त्र बलों के एक प्रवक्ता ने शुक्रवार (31 जुलाई) को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि 2026 में पाकिस्तान में आतंकवाद की 3,145 घटनाएं हुईं, जिनमें से 1,971 घटनाएं KP में हुईं। जुलाई 2026 तक, आतंकवादी घटनाओं में 800 से ज़्यादा पाकिस्तानी मारे जा चुके हैं, जिनमें 300 से ज़्यादा सुरक्षाकर्मी शामिल हैं। खैबर में पाक सरकार के कानून नहीं तालिबान का शरिया चलता है। दरअसल, इस इलाके में विभाजन के समय से ही कबिलाई व्यवस्था लागू रही है। स्वात, सैदू, मिंगोरा और मर्दन में 'लोया जिरगा' के जरिए ही कानून चलता है। ये जिस जगह असल में शरिया कानून को लागू करती है। अफगान तालिबान इसका है। इमरान खान की सरकार ने 2021 में टीटीपी के साथ सुलह की कोशिश की, लेकिन इमरान की गद्दी जाते ही टीटीपी ने खैबर में अपने दबदबे को और बढ़ा लिया है। खैबर के वजीरिस्तान में पाकिस्तान सेना कई सैन्य ऑपरेशन कर चुकी है, लेकिन यहां अब टीटीपी काबिज है। आए दिन टीटीपी के हमलों के कारण स्कूल और कॉलेज बंद रहते हैं। खैबर पख्तूनख्वा में टीटीपी के आए दिन होने वाले हमलों से पाक सेना में खौफ है। इस साल टीटीपी फौज पर 145 से ज्यादा हमले कर चुकी है, इनमें 48 सैनिक मारे गए। खैबर में डूरंड लाइन पर अभी पाक सेना की 50 फौजी चौकियां खाली हैं। 22 पोस्ट पर ही पाक फौज तैनात है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 14:23:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pok-to-balochistan-munir-pakistan-army-losing-control</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[जुबान बिगड़ी हुई थी उदयनिधि की, पहली बार मिला सवा शेर, सत्ता में आते ही विजय ने धरा थलापति अवतार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/udhayanidhi-had-a-foul-tongue-but-for-the-first-time-he-met-his-match]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1989 की 25 मार्च को तमिलनाडु विधानसभा में बजट पेश किया जा रहा था। जयललिता की पार्टी एआईएडीएमके ने हाल के ही विधानसभा चुनाव में 27 सीटें जीती थीं और तमिलनाडु की विधानसभा को विपक्ष में एक महिला नेता मिली थी। उस वक्त डीएमके सरकार में थी और मुख्यमंत्री थे एम करुणानिधी। सदन में जैसे ही बजट भाषण पढ़ा जाना शुरू हुआ जयललिता और उनकी पार्टी के नेताओं ने विधानसभा में हंगामा शुरू कर दिया। हंगामा इतना बढ़ा कि एआईएडीएमके के किसी नेता ने करुणानिधी की तरफ फाइल फेंकी जिससे उनका चश्मा गिरकर टूट गया। जययलिता ने जब देखा कि हंगामा ज्यादा बढ़ रहा है तो वो सदन से बाहर जाने लगी। तभी मंत्री दुरई मुरगन आ गए और उन्होंने जयललिता को बाहर जाने से रोका और उनकी साड़ी खींची जिससे उनकी साड़ी फट गई और वो खुद भी जमीन पर गिर गईं। सत्ता पक्ष यानी डीएमके और विपक्ष यानी एआईएडीएमके के सदस्यों के बीच विधानसभा में हाथा-पाई हुई। अपनी फटी हुई साड़ी के साथ जयललिता विधानसभा से बाहर आ गईं। यही वो दिन था जब जयललिता ने सदन से निकलते हुए कहा था कि वो मुख्यमंत्री बनकर ही इस सदन में वापस आएंगी वरना कभी नहीं आएंगी।कई बार जिंदगी में हुई घटना बहुत कुछ बदलकर रख देती है। कई बार इतिहास की घटनाएं ऐसी होती हैं जिसे कभी भुलाया नहीं जा सकता। अब एक बार फिर तमिलनाडु की राजनीति में एक महिला का नाम चर्चा में है। इस बार विवाद अभिनेत्री तृषा कृष्णन से जुड़ा है। बयान जो सीधे तौर पर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के लिए था लेकिन इसमें नाम जुड़ा है एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का भी। पूरा मामला समझ लेते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pk-to-owaisi-how-these-lone-warriors-are-single-handedly-changing-the-course-of-politics" target="_blank">सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये 'लोन वॉरियर्स'</a></h3><div>3 अगस्त 2026 यानी बीते सोमवार की बात है। जब सुर्खियों में बांकीपुर और दतिया के उपचुनाव के परिणामों की चर्चा थी तब तमिलनाडु के थंजाऊर में किसानों का एक प्रदर्शन चल रहा था। कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कावेरी नदी के पानी को लेकर विवाद है। कावेरी नदी का पानी कर्नाटक से होकर तमिलनाडु पहुंचता है। तमिलनाडु का आरोप है कि कर्नाटक की सरकार पानी ही नहीं छोड़ती। जिसकी वजह से राज्य के किसानों को मुसीबत का सामना करना पड़ रहा है। सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी नहीं मिल पाता। यह है मुद्दा। इसे ही लेकर तमिलनाडु में किसान संगठन प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रदर्शन का नेतृत्व किसान नेता अय्या कन्नू कर रहे हैं। इस समय प्रदर्शन तेज इसलिए हुआ है क्योंकि तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा वाले इलाके में कुरवाई फसल बोई गई है। यह धान की ही फसल होती है जिसकी बुवाई जून जुलाई और सितंबर अक्टूबर में होती है। बुवाई के वक्त चाहिए होता है भरपूर पानी क्योंकि कर्नाटक ने तमिलनाडु के लिए कावेरी का पानी नहीं छोड़ा है। तो प्रदर्शन शुरू हो गया है। द प्रिंट की एक रिपोर्ट के मुताबिक कन्नू ने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री विजय से सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करने और राज्य के किसानों के लिए ₹1 लाख करोड़ के मुआवजे की मांग करने की अपील की है। कन्नू का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक सरकार को हर महीने तमिलनाडु के लिए पानी छोड़ने का निर्देश दिया था। अब तक कर्नाटक के पास 80 टीएमसी यानी 1000 मिलियन क्यूबिक फीट से ज्यादा पानी है। कर्नाटक के सीएम डी के शिव कुमार ने तमिलनाडु के लिए 3500 क्यूसेक पानी छोड़ने से इंकार कर दिया। अगर वे पानी नहीं छोड़ते हैं तो वे कर्नाटक में नुकसान करेंगे और वे अपने लोगों और राज्य को बचाने के लिए 25,000 क्यूसेक पानी छोड़ रहे हैं। हमारे सीएम जोसेफ विजय को सुप्रीम कोर्ट में मुकदमा दायर करके कर्नाटक से ₹1 लाख करोड़ की मुआवजे की मांग करनी चाहिए। प्रोटेस्ट के निशाने पर कर्नाटक सरकार के साथ-साथ तमिलनाडु की विजय सरकार भी है। तो विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और मुख्य विपक्षी पार्टी डीएमके के नेता उदयनिधि स्टालिन पहुंच गए थपुर जहां प्रोटेस्ट जारी था। प्रोटेस्ट के दौरान उदयनिधि स्पीच देना शुरू करते हैं।&nbsp;</div><h2>उदयनिधि ने&nbsp; क्या कह दिया, जो पुलिस उठा ले गई?&nbsp;</h2><div>लगातार सरकार और सीएम विजय पर निशाना साधते हैं। जब उदयनिधि बोल रहे थे तब मंच के सामने मौजूद लोग एक्ट्रेस त्रिशा कृष्णन का नाम चिल्लाने लगते हैं। उदयनिधि चुप हो जाते हैं। फिर पानी के ही रेफरेंस से एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हैं। मंच पर मौजूद और सामने खड़े लोग हंसने लगते हैं। फिर उदयनिधि एक पॉज लेते हुए कहते हैं, मैं कावेरी नदी के पानी की बात कर रहा हूं। जिसने इस बात पर मुहर ही लगा दी कि उदयनिधि के बयान को जिस तरह से समझा जा रहा है, वह असल में वही कहना भी चाह रहे थे। बयान आया तो विवाद शुरू हुआ। विजय की पार्टी टीवी ने उदयनिधि को निशाने पर ले लिया। पूर्व बीजेपी नेता के अन्नामलई ने भी इस बयान की आलोचना की। उन्होंने कहा जब मैं कल वैगई नदी की सफाई कर रहा था तो मैंने सोचा क्या इससे भी बुरा प्रदूषण कहीं हो सकता है। फिर मैंने उदयनिधि स्टालिन का भाषण सुना। उदयनिधि के बयान के खिलाफ तमिलनाडु पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया। द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक थवरुर ईस्ट पुलिस ने बीएएनएस की धारा 196, 192, 352, 79, 296 बी 61, 3512 और आईटी एक्ट की धारा 67 के तहत मुकदमा दर्ज किया है। मुकदमा दर्ज होने के बाद 4 अगस्त को तमिलनाडु पुलिस की एक टीम उदयनिधि के आवास पर पहुंच गई। पहले उनकी लीगल टीम और पुलिस के बीच बातचीत होती रही। कारवाई टालने की कोशिश हुई। लेकिन आखिरकार पुलिस ने उदयनिधि को हिरासत में ले लिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain" target="_blank"> स्पेन में जबरन क्यों घुसे हजारों मुस्लिम? डरा देगी इसके पीछे की कहानी, मेलोनी ने दी धमकी, मोदी हुए अलर्ट</a></h3><h2>उदयनिधि को पहली बार सवा शेर मिला</h2><div>दरअसल जब तमिलनाडु में डीएमके की सरकार थी तो उदयनिधि स्टालिन कुछ भी बोलकर निकल जाते थे। कभी सनातन को डेंगू-मलेरिया कहा और इसका खात्मा करने की बात की, तो कभी हिन्दी भाषा को लेकर विवादित बयान दिया। अपनी सरकारी मशीनरी और कानूनी पेचिदगियों का इस्तेमाल कर वे हर बार निकल जाते थे। लेकिन इस बार मामला उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री सी जोसेफ विजय के खिलाफ निजी टिप्पणी का था। विपक्ष के नेता उदयनिधि स्टालिन की जुबान एक बार फिर बिगड़ी और इस बार नतीजा पहले से कहीं ज्यादा कठोर निकला. चेन्नई स्थित उनके घर से पुलिस ने उन्हें उठा लिया। पूर्व सीएम के बेटे उदयनिधि को पहली बार 'सवा शेर' मिला। सीएम विजय ने इस पर तत्काल कार्रवाई की और 24 घंटे से कम समय में भी एक्शन लिया। उन्होंने साफ संदेश दे दिया कि बड़बोले बयानों का जवाब अब सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि पुलिस कार्रवाई भी हो सकती है। यह घटना सिर्फ कानूनी कार्रवाई नहीं, बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। विजय की सरकार ने साफ दिखाया कि विपक्ष के नेता होने के बावजूद कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत टिप्पणियों और अभद्र बयानों से ऊपर नहीं है।</div><h2>CM विजय पर गुस्साए स्टालिन</h2><div>डीएम के नेता उदयनधि स्टालिन की गिरफ्तारी के बाद उनके पिता और डीएम के प्रमुख एमके स्टालिन ने सीएम विजय और उनकी सरकार पर जमकर निशाना साधा। उन्होंने कहा अहंकार हमेशा विनाश का रास्ता दिखाता है। एमके स्टालिन ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लंबा चौड़ा पोस्ट लिखकर सरकार पर कई गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि जिस वक्त उदयनिधि को हिरासत में लिया गया वो तंजाबुर में कावेरी नदी के पानी के मुद्दे पर सरकार के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे। उनके मुताबिक उदयनिधि किसानों के हक की बात उठा रहे थे और सरकार की नाकामी को लोगों के सामने रख रहे थे। शालिनी ने कहा कि सीएम विजय कावेरी जल विवाद का कोई समाधान नहीं निकाल पाए हैं। इतना ही नहीं मेघदातू बांध के मुद्दे पर भी सरकार कोई ठोस कदम नहीं उठा सकी। इसका सबसे ज्यादा नुकसान किसानों को हो रहा है। उन्होंने तंज कसते हुए कहा किसान पानी के लिए परेशान हैं। उनकी फसलें सूख रही है। लेकिन मंत्री सीएम की फिल्म देखकर भावुक हो रहे हैं। इस बयान के जरिए उन्होंने सरकार की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। एम के स्टालिन ने यह भी आरोप लगाया कि उदयनिधि की गिरफ्तारी का असली मकसद उन्हें विधानसभा के बजट सत्र से दूर रखना था। उनका कहना है कि 5 अगस्त को बजट सत्र शुरू होना है और सरकार नहीं चाहती कि उदयनिधि उसमें हिस्सा ले। उन्होंने पूछा कि अगर पुलिस को सिर्फ पूछताछ ही करनी थी तो चेन्नई में भी यह काम हो सकता था। फिर उदयनिधि को तंजाबुर क्यों ले जाया गया। स्टालिन का कहना है कि इससे साफ पता चलता है कि कारवाई राजनीतिक वजहों से की गई। एम के स्टालिन ने यह भी दावा किया कि मद्रास हाईकोर्ट ने कहा है कि उदयनिधि को उसी दिन रिहा किया जाए। उनके मुताबिक अदालत का यह आदेश सरकार के रवैया पर बड़ा झटका है और दिखाता है कि गिरफ्तारी को लेकर सवाल उठ रहे हैं। उन्होंने सीएम विजय पर हमला बोलते हुए कहा कि सत्ता में आने के बाद से उनकी सरकार विरोधियों को निशाना बनाने में ज्यादा व्यस्त है। स्टालिन का आरोप है कि सरकार लोकतांत्रिक तरीके से विरोध की आवाज सुनने की बजाय विपक्ष के नेताओं को गिरफ्तार कराने का रास्ता अपना रही है। उदयनिधि के बयान को लेकर भी एम के स्टालिन ने उनका बचाव किया। उन्होंने कहा कि उदयनिधि ने अपने भाषण में किसी का नाम नहीं लिया था और ना ही कोई अश्लील बात कही थी। उनका कहना है कि बयान को गलत तरीके से पेश किया जा रहा है। स्टालिन ने यह भी कहा कि अगर कभी उदयनिधि से कोई गलती होती है तो वो बिना देर किए माफी मांग लेते हैं। इसीलिए इस पूरे&nbsp; मामले को बेवजह बड़ा बनाया जा रहा है।&nbsp;</div><h2>मद्रास कोर्ट में क्या-क्या हुआ?</h2><div>इसके बाद मामला मद्रास हाई कोर्ट पहुंचा जहां उनकी अग्रिम जमानत पर सुनवाई हुई। सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील विजय नारायण ने अदालत को बताया कि उदयनिधि स्टालिन को औपचारिक रूप से गिरफ्तार किया गया है और उन्हें तंजावुर ले जाया जाएगा, लेकिन उन्हें हिरासत में रखने का कोई इरादा नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि पूछताछ पूरी होने के बाद उन्हें जमानत पर रिहा कर दिया जाएगा।</div><h2>जमानत मिलने के बाद क्या बोले उदयनिधि?</h2><div>जमानत मिलने के बाद उदयनिधि स्टालिन ने पुलिस की कार्रवाई पर भी गंभीर आरोप लगाए। प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि तमिलनाडु सरकार मद्रास कोर्ट में कह रही थी कि मुझे गिरफ्तार करने का कोई इरादा नहीं है, लेकिन पूछताछ के नाम पर करीब 3,000 पुलिसकर्मी तैनात कर दिए गए। मुझे चेन्नई से तंजावुर सड़क मार्ग से ऐसे ले जाया गया, जैसे मैं कोई आतंकवादी हूं।</div><h2>महिलाओं को लेकर पहले भी विवादों में रहे हैं उदयनिधि</h2><div>तृषा कृष्णन को लेकर हुआ यह विवाद कोई पहला मौका नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन महिलाओं पर दिए गए बयानों से फंसे हों। इससे पहले भी वह कई बार ऐसे बयानों के कारण आलोचना झेल चुके हैं। कुछ समय पहले जब वह मुख्यमंत्री जोसेफ विजय पर हमला बोल रहे थे, तब उन्होंने विजय की पत्नी संगीता सोर्नालिंगम का नाम भी बीच में घसीट लिया था। उन्होंने उनके निजी जीवन से जुड़ी खबरों को अपने राजनीतिक भाषण का मुख्य हिस्सा बनाया था। उस समय भी विपक्ष ने उन पर यह गंभीर आरोप लगाया था कि वह अपनी राजनीतिक लड़ाई जीतने के लिए परिवार की महिलाओं को बीच में लेकर आते हैं। इससे पहले 2021 के विधानसभा चुनाव के दौरान भी ऐसा ही देखने को मिला था।</div><h2>परिस्थितियाँ भिन्न, मगर सोच वही पुरानी</h2><div>वर्ष 1989 में तमिलनाडु विधानसभा के भीतर जयललिता के साथ हुई बदसलूकी और हाल ही में तृषा कृष्णन पर हुई विवादित छींटाकशी—दिखने में ये दोनों घटनाएँ बिल्कुल अलग हैं। एक तरफ जहाँ लोकतांत्रिक सदन की मर्यादा तार-तार हुई थी और सीधा शारीरिक हमला हुआ था, वहीं दूसरी तरफ एक राजनीतिक मंच से सरेआम घटिया और अमर्यादित बयानबाज़ी की गई। इन दोनों घटनाओं के दौर, स्थान और तरीके भले बदल गए हों, लेकिन इनके पीछे की मानसिकता रत्ती भर नहीं बदली। ये दोनों मामले घूम-फिरकर एक ही कड़वे और गंभीर सवाल पर लाकर खड़ा करते हैं—आखिर तमिलनाडु के सियासी अखाड़े में बार-बार महिलाओं को ही सॉफ्ट टारगेट क्यों बनाया जाता है? अपनी राजनीतिक रंजिशों और गंदे शह-मात के खेल में आख़िर कब तक महिलाओं के सम्मान को ढाल बनाया जाता रहेगा?</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 05 Aug 2026 14:24:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/udhayanidhi-had-a-foul-tongue-but-for-the-first-time-he-met-his-match</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सिर्फ एक बंदा काफ़ी है: PK से ओवैसी तक...कैसे अकेले दम पर राजनीति का रुख बदलने में लगे ये 'लोन वॉरियर्स']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/from-pk-to-owaisi-how-these-lone-warriors-are-single-handedly-changing-the-course-of-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार में जिस सीट पर प्रशांत किशोर की जीत हुई है, यह वो सीट है जिसको लेकर दबी जुबान में अक्सर बीजेपी वाले कहते थे कि यहां कुत्ता बिल्ली भी चुनाव लड़ा देंगे तो वो जीत जाएगा। और वो गलत नहीं कहते थे। हां, क्योंकि यह बांकीपुर था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन का अपना घर जिस सीट से वह एक दो बार नहीं लगातार पांच बार जीते थे और यहीं से जीतकर वह दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी के अध्यक्ष बन गए। 15 साल से यहां कमल का बटन लगातार दब रहा था और नतीजा पहले से ही लिखा था और ताना उस आदमी को मारा जा रहा था जिसने 243 सीटों पर लड़कर शून्य जीता था। जिसको लेकर बिहार में मीम भी वायरल हुए थे। प्रशांत तब खुलकर कहते थे कि मैं मरा नहीं हूं अभी अभी जिंदा हूं। अभी मैं मरा नहीं हूं। अभी नहीं मरा हूं। जब मर जाऊंगा तो फिर लिखना अभी मरा नहीं हूं। अब इस लाइन का मतलब समझ में आ रहा है। पटना के गिनती वाले हॉल में राउंड द राउंड वही मजाक भारी पड़ता गया जैसे पंचायत में आपको याद होगा। विधायक जी हार गए थे और सामने वाली पार्टी जीत गई थी। प्रशांत किशोर के समर्थक भी वैसे ही डांस कर रहे हैं। कह रहे हैं कि आज सावन के सोमवार के दिन बाबा का आशीर्वाद मिल गया। पीके ने केवल एक सीट का चुनाव नहीं जीता है। बांकीपुर बीजेपी की प्रतिष्ठा से जुड़ी सी और 1995 से ये सीट बीजेपी के पास रही थी। पहले पटना वेस्ट और फिर 2008 के परिसीमन के बाद बांकीपुर से पांच बार नितिन और उससे पहले उनके पिता नवीन प्रसाद सिन्हा तीन बार इस सीट से विधायक रहे। प्रशांत किशोर ने इस सिलसिले को तोड़ दिया है। बिहार के बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में जन सुराज के संस्थापक प्रशांत किशोर की जीत ने देश की राजनीति में एक नए ट्रेंड को रेखांकित किया है। भले ही प्रशांत किशोर, चंद्रशेखर आजाद (आजाद समाज पार्टी), असदुद्दीन ओवैसी (AIMIM) और जयराम महतो (JLKM) जैसे नेता अपनी-अपनी पार्टियों के अकेले सांसद या विधायक हों, लेकिन संसद और विधानसभाओं से लेकर जनता के बीच इनकी आवाज और राजनीतिक प्रभाव किसी बड़ी पार्टी से कम नहीं है। ऐसे में आइए जानते हैं कि कैसे&nbsp; एकल राजनीतिक चेहरे अपने मुद्दों, सोशल मीडिया पकड़ और बेबाक नेतृत्व के दम पर पारंपरिक बहुदलीय व्यवस्था के बीच अपनी एक मजबूत और असरदार पहचान बना रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/priyanka-gandhi-says-people-are-bored-of-bjp-after-upchunav-results" target="_blank">उपचुनाव नतीजों पर Priyanka Gandhi बोलीं, भाजपा से ऊब चुके हैं लोग</a></h3><h2>प्यादे से वजीर को मात देने वाला दांव हुआ फेल</h2><div>पटना का दिल है बांकीपुर गांधी मैदान से सटा इलाका पढ़े लिखे लोग दुकानदार नौकरी पेशा वो इलाका जहां शाम को चाय की दुकान पर राजनीति उबलती है और वोट हमेशा एक तरफ गिरता है। 2010 से यहां एक ही चेहरा जीतता है नितिन नवीन सफेद कुर्ता माथे तिलक पटना की गलियों में जाना पहचाना आदमी और उससे पहले उनके पिताजी यही जीतते थे यानी यह सीट पार्टी के लिए सीट थोड़ी थी घर की बैठक थी कि यहां यहां तो हम जीते यहां कौन सा टेंशन है? फिर हुआ यह कि नितिन नवीन की किस्मत अचानक से उछाल मार दी गई। पार्टी ने उन्हें राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया। राज्यसभा चले गए और फिर पीछे ये सीट खाली। भाजपा तो ये मान के बैठी थी कि भाई घर है हमारा। 15 साल का रिकॉर्ड है। जीत पक्की है।&nbsp; बीजेपी ने प्रशांत किशोर के विरुद्ध एक मंडल कार्यकर्ता नीरज कुमार सिन्हा को उम्मीदवार बनाया। बीजेपी के रणनीतिकार&nbsp; बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की पंक्ति को अर्थ देने की कोशिश की- चौराहे पर लुटता चीर, प्यादे से पिट गया वजीर...! वर्ष 2025 विधानसभा के चुनावी जंग में बुरी तरह पिटे प्रशांत किशोर के लिए बांकीपुर किसी कोरामीन से कम नहीं।&nbsp; बीजेपी की रणनीति थी कि एक साधारण कार्यकर्ता से प्रशांत किशोर को पराजित कर उनकी आखिरी उम्मीद को ध्वस्त किया जाए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/nitin-navin-bankipur-datia-bypoll-result-review" target="_blank">BJP अध्यक्ष नितिन नवीन ने Bankipur और Datia उपचुनाव नतीजों पर कही यह बात</a></h3><h2>चंद्रशेखर आज़ाद</h2><div>किशोर से पहले, भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद 2024 के लोकसभा चुनावों में अपनी पार्टी 'आज़ाद समाज पार्टी (कांशीराम)' के टिकट पर उत्तर प्रदेश की नगीना सीट से सांसद चुने गए थे। उन्होंने बीजेपी उम्मीदवार को 1.51 लाख वोटों से हराया था। 38 वर्षीय आज़ाद, जो दलितों के एक प्रमुख नेता हैं, ने 2022 में गोरखपुर अर्बन सीट से यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के खिलाफ अपना पहला चुनाव लड़ा था, लेकिन वे हार गए और उन्हें सिर्फ़ 3% वोट मिले। सांसद चुने जाने के बाद, आज़ाद संसद के अंदर और बाहर दलितों और मुसलमानों की एक बड़ी आवाज़ बनकर उभरे हैं। उन्हें लोकसभा में अलग-अलग मुद्दों पर बहस में हिस्सा लेने का समय मिलता है, साथ ही संसद के बाहर अपने आंदोलन के दौरान उन्हें सांसद का प्रोटोकॉल भी मिलता है। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा उपचुनाव में उनकी पार्टी के उम्मीदवार दामोदर यादव तीसरे स्थान पर रहे। सोमवार को घोषित नतीजों में कांग्रेस उम्मीदवार घनश्याम सिंह ने बीजेपी के आशुतोष तिवारी को 6,016 वोटों से हराया, जबकि दामोदर को 22,527 वोट मिले।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-jibe-at-bjp-a-30-year-old-fortress-crumbled-in-just-30-days" target="_blank">Prashant Kishor का BJP पर तंज: 30 साल का किला सिर्फ 30 दिनों में ढहा</a></h3><h2>जयराम महतो</h2><div>जयराम महतो, जिन्हें 'टाइगर' के नाम से भी जाना जाता है, झारखंड विधानसभा में अपनी पार्टी 'झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा' (JLKM) के अकेले विधायक हैं। उन्होंने 2024 का लोकसभा चुनाव गिरिडीह से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लड़ा था और उन्हें 3.47 लाख वोट मिले थे। इसके बाद, नवंबर 2024 के विधानसभा चुनावों से पहले चुनाव आयोग ने JLKM को मान्यता दी, जिसमें वे डुर्मी सीट से चुने गए। उन्होंने बेरमो से भी चुनाव लड़ा था, लेकिन वहां वे दूसरे स्थान पर रहे। 31 साल के महतो OBC कुडमी समुदाय के उभरते हुए नेता हैं और झारखंड के युवाओं के बीच काफी लोकप्रिय हैं। सोशल मीडिया पर उनके वीडियो को बहुत ज़्यादा लोग देखते हैं। इन वीडियो में वे राजनीतिक जागरूकता, राजनीतिक नेताओं द्वारा जमा की गई संपत्ति, लोगों की गरीबी और इस बात पर बात करते हैं कि कैसे झारखंड में बाहरी लोगों को सरकारी नौकरियां मिलती हैं। अपने चुनावी नामांकन हलफनामे में उन्होंने YouTube को अपनी आय का स्रोत बताया था। महतो, आज़ाद और किशोर में एक आम बात यह है कि वे अपनी-अपनी पार्टियों के युवा संस्थापक हैं और उन्होंने बदलाव और न्याय तथा नई राजनीति के अपने एजेंडे से लोगों के बीच अपनी पहचान बनाई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-dismantles-bjp-35-year-stronghold-in-bankipur-historic-victory-for-jan-suraaj" target="_blank">Prashant Kishor ने Bankipur में BJP के 35 साल के गढ़ को ध्वस्त किया, Jan Suraaj की ऐतिहासिक जीत</a></h3><h2>असदुद्दीन ओवैसी</h2><div>AIMIM के प्रमुख और हैदराबाद से पांच बार सांसद रहे 57 वर्षीय असदुद्दीन ओवैसी लोकसभा में अपनी पार्टी के अकेले सदस्य हैं। देश में मुसलमानों की एक अहम आवाज़ के तौर पर उभरने के कारण उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिली है। वे संसद और दूसरे सार्वजनिक मंचों पर बड़े राष्ट्रीय मुद्दे उठाने के लिए जाने जाते हैं, जिनमें मुस्लिम समुदाय से जुड़े मुद्दे भी शामिल हैं। हालांकि AIMIM एक पुरानी पार्टी है, लेकिन ओवैसी ने इसके विस्तार की अगुवाई की है। अब तेलंगाना, बिहार और महाराष्ट्र समेत कई राज्यों में पार्टी के कई विधायक और पार्षद हैं।</div><div><br></div><div><br></div><div><br></div><div><br></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 04 Aug 2026 13:43:04 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ स्पेन में जबरन क्यों घुसे हजारों मुस्लिम? डरा देगी इसके पीछे की कहानी, मेलोनी ने दी धमकी, मोदी हुए अलर्ट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गरीबी और राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं टकराती हैं तब सीमाओं के मानचित्र धुंधले पड़ जाते हैं। और जब कोई देश मानव आबादी को एक जियोपॉलिटिकल हथियार की तरह इस्तेमाल करने लगे तो मंजर वही होता है जो इस वक्त स्पेन के अफ्रीकी एनक्लेव सोटा में नजर आ रहा है। भूमध्य सागर का वो मुहाना जो अफ्रीका और यूरोप के बीच व्यापार का सेतु होना चाहिए था। पिछले 24 घंटों में एक अंतहीन मानवीय और सुरक्षा संकट का गवाह बन चुका है। नागरिक तैर कर बाढ़ फांदकर चट्टानों को पार कर स्पेनिश सरजमी पर दाखिल हो चुके हैं। कम से कम 34 जिंदगियां समुद्र के खारे पानी में खामोश हो गई। सड़कें इस वक्त सहमी हुई है। दुकानें बंद हैं और स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांजेस को इसे देश की प्रादेशिक अखंडता पर हमला करार देकर सेना उतारनी पड़ी। लेकिन सवाल सिर्फ हजारों प्रवासियों का नहीं है। सवाल यह है कि आखिर क्या वजह है कि मोरक्को की सीमा से अचानक इतनी बड़ी इंसानी लहर स्पेन में उमड़ पड़ी? क्या यह महज बेहतर जिंदगी की तलाश है या फिर यूरोप की दहलीज पर खेला जा रहा एक बड़ा जिओपॉलिटिकल गेम। आंकड़ों को ध्यान से देखिए। सोटा की कुल आबादी है 83,000 के आसपास और सिर्फ एक दिन के भीतर वहां 60,000 लोग घुस आते हैं। यानी शहर की कुल आबादी का 70%। समुद्र के रास्त मीलों दूर तक तैर कर आते युवा चट्टानों के सहारे आगे बढ़ते बच्चे और महिलाएं और फिर थिएटर के बाजारों में पसरती दहशत। वहां के लोकल्स का कहना है कि उन्होंने अपने जीवन में ऐसा उग्र और अनकंट्रोल्ड मंजर पहले कभी नहीं देखा। अस्पताल के सुरक्षाकर्मियों से लेकर आम नागरिकों तक में डर का माहौल है। स्पेन की सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में एक फैसला दिया था कि समुद्र में रोके गए प्रवासियों को बिना कानूनी प्रक्रिया के तुरंत मुरक्को वापस नहीं भेजा जा सकता। और इसी फैसले की आड़ में आपराधिक नेटवर्क और अफवाहों ने ऐसा तहलका मचाया कि हजारों लोग एक साथ सीमा पर टूट पड़े।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pok-roads-stained-red-with-blood-piles-of-bodies-internet-services-suspended-across-entire-region" target="_blank">खून से लाल हुई PoK की सड़कें, लाशों का लगा अंबार, पूरे इलाके में इंटरनेट सेवाएँ बंद</a></h3><h2>स्पेन में क्यों बने इमरजेंसी जैसे हालात?</h2><div>मोरक्को के तटीय शहर फनीदेक से स्पेन की जो दूरी है यह सिर्फ 3 से 5 किमी है। एक तरफ मोरक्को है जहां पर बेरोजगारी है, भुखमरी है, बदहाली है। वहीं दूसरी तरफ थोड़ी ही दूरी पर ताकतवर यूरोपीय संघ और विकसित देश स्पेन मौजूद है। स्पेन में इस टाइम पर आपको बता दें कि इमरजेंसी जैसी सिचुएशन बन चुकी है। हजारों लोग स्विमिंग करते हुए स्पेन के कोस्टल टाउन की तरफ पहुंच रहे हैं ताकि वह बॉर्डर्स के अंदर घुसकर सीधे यूरोपियन यूनियन में फैल सके। फेवरेबल वेदर का फायदा उठाकर यह लोग धड़ल्ले से समंदर पार कर रहे हैं। इस दौरान कई लोग डूबे भी हैं। लेकिन भीड़ की रफ्तार जो है यह कम नहीं हो रही। इसमें से कई सारे लोग मोरक्को के हैं। कई अफ्रीकी युवा भी शामिल हैं। इन्हें यह सही वक्त क्यों लगता है बॉर्डर पार करने के लिए? अब आप उसे समझिए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ऑफ स्पेन ने हाल ही में एक रूलिंग पास की थी कि जो भी लोग समंदर के रास्ते आ रहे हैं स्पेन के अंदर आप उनको तुरंत के तुरंत वापस नहीं भेजोगे। आपको बकायदा लीगल प्रोसेस देना होगा। बस अदालत की इसी फैसले ने इन घुसपैठियों के लिए खुला दरवाजा खोल दिया। स्थाई लोग यह कह रहे हैं कि लीडर्स नेशनल इमरजेंसी लगाओ। हम इन माइग्रेंट्स को हैंडल नहीं कर सकते हैं। हमारे पास रिसोर्सेज खत्म हो चुके हैं। दबाव 1000% बढ़ चुका है। लेकिन स्पेन की सरकार कोई स्ट्रांग एक्शन क्यों नहीं ले पा रही है? अब आप उसे समझिए क्योंकि वहां है कोलीजन गवर्नमेंट।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/jordan-air-defense-intercepts-iranian-missiles-as-us-saudi-forces-strike-iraq-militias" target="_blank">जॉर्डन ने हवाई रक्षा प्रणाली से ईरानी मिसाइलें गिराईं, अमेरिका और सऊदी अरब ने इराक में किए हमले</a></h3><h2>48 घंटे के अंदर 8000 से ज्यादा माइग्रेंट्स</h2><div>यूरोप में&nbsp; पहले भी देखा गया है मई 202 में 2021 में ऐसा हुआ था कि 48 घंटे के अंदर 8000 से ज्यादा माइग्रेंट्स पहुंच गए यानी कि पहले भी इस तरीके से ओवरवेल्म हो चुका है। वहां का जो पूरा सिस्टम है, जो अपरेटस है वो बहुत ज्यादा ओवरवेल्म हो चुका है। लॉ एंड ऑर्डर की सिचुएशन बन चुकी है। जो हुवा जीसस हैं उन्होंने भी ये इस बार भी अपील करी है कि फोर्सेस को भेजा जाए। यानी कि एक सिक्योरिटी फोर्सेस को भेजकर एक आर्म्ड उनको मदद दी जाए ताकि कोई सुरक्षा को लेकर कोई स्थिति ना बने। अगर इस तरीके से मोरक्को के रास्ते लोग आते हैं तो दिक्कत हो सकती है। इस बीच स्पेन के जो प्राइम मिनिस्टर हैं पेड्रो सशेस उन्होंने भी एक्स पर एक पोस्ट किया है। उन्होंने बताया है कि जो गवर्नमेंट है स्पेन की वो पूरी तरीके से कमिटेड है में जो स्थिति बनी है उस पर एक इमीडिएट रिस्पांस देने के लिए। उन्होंने बताया है कि जितने भी जरूरी रिसोर्सेज हैं उन्हें मोबिलाइज कर दिया गया है। मुरक्को के साथ में भी बातचीत चल रही है। इंटरनेशनल अथॉरिटीज के साथ में बातचीत चल रही है और जैसी जरूरत पड़ेगी नॉर्मल को इस्टैब्लिश करने की उसके लिए कदम उठाए जाएंगे।&nbsp;</div><h2>स्पेन के पड़ोसी देशों की उड़ी नींद</h2><div>सोशलिस्ट पार्टी लेफ्ट और सेंटर लेफ्ट सब ने मिलकर यहां पर सरकार बना रखी है सबके अपने-अपने ओपिनियंस हैं। इसका खामियाजा भुगत रहे हैं वहां के नागरिक नेटिव्स। उधर पोलैंड जैसे देश का रवैया भी अलग है। पोलैंड साफ यह कहता है कि हम माइग्रेशन को अपने देश के खिलाफ हथियार नहीं बनने देंगे। बेलारूस बॉर्डर पर उसने इलेक्ट्रिफाइड सर्विलांस और आर्मी बिठा रखी है। कहा है कि ड्रामा यहां पर नहीं चल सकता। लेकिन स्पेन के इस कोहराम को देखकर यूरोप के जो बाकी देश हैं इनकी नींदें उड़ चुकी। इटली के प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने सीधा अल्टीमेटम दे दिया है स्पेन को। मेलोनी ने यह साफ कहा है ट्वीट करते हुए कि अगर स्पेन बॉर्डर संभालने में नाकामयाब रहा तो इटली यहां पर मुख दर्शक बनकर नहीं रहेगा। जरूरत पड़ी तो स्पेन के साथ जो एग्रीमेंट हुआ है एरिया की व्यवस्था को संभालने का उसे यह निलंबित भी कर सकते हैं। आखिर सेटा इतना अहम क्यों है उसे समझिए क्योंकि यह अफ्रीका और यूरोप के बीच का इकलौता लैंड बॉर्डर है। इस बार हजारों की संख्या में युवा और नाबालिक बॉर्डर के गेट को तोड़ते हुए स्पेन के अंदर घुस आए हैं। कुछ ने मोरको की तरफ से वाटर कैनन का सामना भी किया तो कुछ ने समंदर में लाशों के बीज तैर कर अपनी जान को जोखिम में डालकर बॉर्डर पार। रिपोर्ट्स जो कहती है उसके मुताबिक इस रूट पर दर्जनों लोगों की जान अब तक जा चुकी है। लेकिन इसके बावजूद भी यह स्पेन में घुस रहे हैं।&nbsp;</div><h2>स्पेन इन सब में मजबूर क्यों है?</h2><div>स्पेन की जो जन दर दुनिया में है वो सबसे कम है और हर साल 1 लाख ज्यादा लोग जो हैं वो यहां पर रिटायर हो रहे हैं। कृषि पर्यटन और निर्माण क्षेत्रों को जिंदा रखने के लिए स्पेन को हर साल लाखों विदेशी कामगारों की जरूरत पड़ती है। यहां के जो प्रधानमंत्री हैं इनकी जो सरकार है यह प्रवासियों को कानूनी दर्जा और वर्क परमिट देने की योजना पर काम कर रही है ताकि देश की जो अर्थव्यवस्था है यह ठप ना पड़े। एक तरफ अपनी इकॉनमी को बचाने के लिए स्पेन मजबूर है तो दूसरी तरफ बेकाबू होती हुई यह भीड़ और टूटती हुई सीमाएं। सवाल यह है कि क्या यूरोप अपनी नीतियों के चक्कर में खुद अपने ही विनाश का रास्ता खोल रहा है या फिर स्पेन का यह नर्क से स्वर्ग वाला खेल यूरोप के बाकी देशों को भी तबाह कर देगा।&nbsp;</div><h2>मेलोनी ने दी स्पेन को धमकी</h2><div>सेउटा संकट पर इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने स्पेन के साथ शेंगेन फ्री-ट्रैवेल (बिना वीजा यात्रा) को रोकने दी धमकी दे डाली। मेलोनी ने कहा कि सेउटा से आ रही तस्वीरें चौंकाने वाली हैं और एक बार फिर यह दिखाती हैं कि बेकाबू आप्रवासन यूरोप की सीमाओं के लिए एक ठोस खतरा है।&nbsp;</div><h2>भारत के लिए अलर्ट रहने की जरूरत</h2><div>भारत के संदर्भ में असम और पश्चिम बंगाल दोनों राज्य लंबे समय से अवैध घुसपैठ की समस्या से प्रभावित रहे हैं। स्पेन के इस घटनाक्रम से सीख लेते हुए भारत को इन राज्यों के लिए विशेष सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। पश्चिम बंगाल और असम की बांग्लादेश से लगी अंतरराष्ट्रीय सीमा का एक बड़ा हिस्सा नदियों, दलदल और जंगलों से घिरा है। यहाँ भौतिक रूप से कंटीली बाड़ लगाना कठिन होता है, जिससे घुसपैठियों और मानव तस्करों को घुसपैठ का आसान अवसर मिल जाता है। उत्तर-पूर्व भारत को शेष भारत से जोड़ने वाला सिलीगुड़ी कॉरिडोर पश्चिम बंगाल के पास स्थित है। इस क्षेत्र के आसपास अनियंत्रित घुसपैठ भारत की अखंडता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। स्पेन का संकट यह संदेश देता है कि घुसपैठ केवल एक मानवीय या क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर राष्ट्रीय संप्रभुता से जुड़ा विषय है। भारत को असम और बंगाल की सीमाओं पर स्मार्ट फेंसिंग, ड्रोन निगरानी, BSF का सशक्तिकरण और अवैध दस्तावेजों पर सख्त कार्रवाई के जरिए सीमा तंत्र को अभेद्य बनाने की आवश्यकता है।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 13:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/why-did-thousands-of-muslims-forcibly-enter-spain</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[5 अगस्त को क्या बड़ा होने वाला है?  डोभाल की एंट्री, गेम सेट,  40 मिनट में कैसे पलट दिया पूरा गेम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-major-event-is-set-to-unfold-on-august-5-doval-entry-game-set]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>5 अगस्त की तारीख से पहले देश के सुरक्षा और रणनीतिक चक्रव्यूह में एक बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। दिल्ली में उच्चस्तरीय बैठकों का दौर लगातार जारी है। इस हलचल के दो बड़े मायने निकाले जा रहे हैं-पहला यह कि क्या सरकार किसी बहुत बड़े नीतिगत या रणनीतिक कदम की तैयारी में है? या फिर खुफिया इनपुट्स के आधार पर किसी बड़ी चुनौती को नाकाम करने के लिए यह आपातकालीन मीटिंग्स बुलाई जा रही हैं? इंटेलिजेंस एजेंसियों का अलर्ट और बैठकों की यह रफ्तार बता रही है कि आने वाले दिनों में कुछ बड़ा होने वाला है। इस रणनीतिक हलचल का सबसे बड़ा सबूत तब देखने को मिला, जब संसद भवन के अंदर टॉप लीडरशिप की यह महा-बैठक शुरू हुई। दरअसल, जिस वक्त संसद के भीतर बवाल अपने चरम पर था। विपक्ष के सांसद वेल तक पहुँच चुके थे, ज़ोरदार नारेबाजी हो रही थी और स्पीकर बार-बार शांति की अपील कर रहे थे। एंटी-पेपर लीक बिल पर किसी भी तरह चर्चा आगे बढ़ाने की कोशिश हो रही थी और पूरा देश अपने टीवी स्क्रीन पर इस राजनीतिक शोर-शराबे को टकटकी लगाए देख रहा था। लेकिन ठीक उसी पल कैमरे के फ़्रेम में एक ऐसी एंट्री होती है, जिसने लुटियंस दिल्ली के बड़े-बड़े सियासी पंडितों से लेकर विदेशी खुफिया एजेंसियों के कान खड़े कर दिए! देश के सबसे बड़े 'जेम्स बॉन्ड'—यानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल बिल्कुल खामोशी से संसद भवन में दाखिल होते हैं। बाहर से देखने पर यह बेहद सामान्य-सी रूटीन विजिट लग रही थी, जिसे सरकारी सूत्रों ने भी सामान्य दौरा ही बताया। लेकिन... जो लोग अजीत डोभाल की कार्यशैली और उनके ट्रैक रिकॉर्ड को जानते हैं, उन्हें यह समझने में एक सेकंड भी नहीं लगा कि इस हंगामे के शोर के पीछे किसी बहुत बड़े, बेहद सीक्रेट कोवर्ट ऑपरेशन की फ़ाइल पर मोहर लग रही है!असल में संसद के वेल में हो रहा हंगामा सिर्फ एक राजनीतिक ड्रामा था। जबकि असल एक्शन संसद भवन के एक बंद कमरे के अंदर चल रहा था। यह कमरा देश के गृह मंत्री अमित शाह का था। जंतर-मंतर पर हुआ हालिया विरोध प्रदर्शन और उसके अंदर भड़की सोची समझी हिंसा के बाद में अमित शाह ने एक मैराथन सिक्योरिटी मीटिंग बुलाई थी। करीब 40 मिनट तक चली इस हाई लेवल मीटिंग के अंदर इंटेलिजेंस ब्यूरो यानी कि आईबी के चीफ, केंद्रीय गृह सचिव और तमाम पैरामिलिट्री फोर्सेस के डायरेक्टर जनरल मौजूद थे। इसके तुरंत बाद अमित शाह और अजीत डोभाल की एक एकांत मुलाकात भी हुई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/supreme-court-directs-centre-for-russia-ukraine-war" target="_blank">Supreme Court का निर्देश: Russia Ukraine War पीड़ितों की सहायता के लिए नोडल अधिकारी नियुक्त हो</a></h3><h2>पहली बार आईबी चीफ को दिल्ली की कमान</h2><div>द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, इस बैठक में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल शामिल हुए हैं। इनके अलावा बैठक में उपस्थित रहने वाले अन्य मंत्रियों में स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा, पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी और वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल शामिल हैं। यह बैठक किस विषय पर हो रही है, यह अभी स्पष्ट नहीं है। नीट (NEET) के प्रश्नपत्र लीक के विरोध में छात्रों के प्रदर्शन से पूरा देश दहल उठा था। जनमत के भारी दबाव के चलते शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा। इस माहौल में सरकार पर दबाव बनाए रखने के लिए विपक्ष भी पूरी तरह मताबिभूत है। आंदोलनकारी छात्रों पर पुलिसिया बर्बरता और दमन का आरोप लगाते हुए विरोधी सांसद लगातार विरोध-प्रदर्शन कर रहे हैं। इस पूरे घटनाक्रम में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से माफी मांगने की मांग भी उठी है। इस पूरे घटनाक्रम से पहले अगर थोड़ा पीछे जाएं तो 21 जुलाई को कमिश्नर ऑफ पुलिस दिल्ली चेंज होते हैं और पहली बार दिल्ली की पुलिस की हिस्ट्री में एक आईबी का ऑफिसर पुलिस कमिश्नर बनता है। अचानक दिल्ली में एक आवश्यकता पड़ी ऐसे चीफ की जिसके पास में इंटेलिजेंस का बैकअप है।&nbsp; दिल्ली हमेशा से एक टारगेट रही है आतंकवाद का। क्योंकि जिसने दिल्ली में एक सनसनी पैदा कर दी उसने पूरे भारत को हिला दिया और पूरे भारत को हिला दिया।&nbsp;</div><h2>अचानक संसद क्यों पहुंचे NSA अजीत डोभाल</h2><div>डोभाल का वहां होना कोई इत्तेफाक नहीं था। भारत का एजुकेशन सिस्टम और उसके अंदर होने वाली सेंधमारी अब सीधे तौर पर इंटरनल सिक्योरिटी का मामला बन चुकी है। विदेशी ताकतें और उनके लोकल प्यादे अच्छी तरीके से जानते हैं कि अगर भारत के युवाओं को भड़काना है तो उन्हें उनके भविष्य को लेकर के डरा दिया जाए। पेपर लीक माफिया सिर्फ पैसे नहीं कमा रहा है बल्कि वो अनजाने में ही देश के भीतर फ्रस्ट्रेशन और गुस्से का एक ऐसा बारूद तैयार कर रहा है जिससे कोई भी विदेशी टूलकिट एक माचिस की तिल्ली से उड़ा सकती है। दोस्तों युवाओं के अंदर असंतोष फैला करके उन्हें सड़कों पर उतारने की साजिशों को रोकने के लिए यह एंटी पेपर लीक बिल एक ब्रह्मास्त्र की तरह लाया गया है।</div><h2>सुप्रीम कोर्ट से भी नहीं मिली उपद्रवियों को राहत</h2><div>सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर पब्लिक प्रॉपर्टी को जलाना, हिंसा करना और कानून तोड़ना किसी भी हाल के अंदर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दंगाई चाहे किसी भी विचारधारा का हो उसे रियायत नहीं मिलेगी। कोर्ट के इस स्पष्ट आदेश के बाद में सीजीपी के वो नेता जो मंच से सीना ठोक के कह रहे थे कि हम एक-एक प्रदर्शनकारी के ऊपर से केस वापस करवा लेंगे वो अचानक से गायब हो चुके हैं। अब हालात यह हैं कि जोश में आकर के गालियां देने वाले युवा स्टेशनों के चक्कर काट रहे हैं, रो रहे हैं, माफी मांग रहे हैं और उनका पूरा करियर दांव पर लग चुका है। उन्हें समझ में आ गया है कि उनके राजनीतिक आकाओं ने सिर्फ अपने एजेंडे के लिए उनका इस्तेमाल किया और अब उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया है।&nbsp;</div><h2>खुफिया एजेंसियों के हाथ ऐसा कौन सा डिजिटल सबूत लग गया है?</h2><div>मोदी सरकार और अजीत डोभाल का गेम प्लान सिर्फ सड़क पर पत्थर फेंकने वाले मोहरों तक सीमित नहीं है। असली स्ट्राइक उन लोगों पर हो रही है जो एयर कंडीशन कमरों के अंदर बैठकर के पूरी हिंसा की स्क्रिप्ट लिख रहे थे। इसी कड़ी के अंदर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल यानी कि आईएफएसओ ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने डिजिटल दुनिया के अंदर तहलका मचा दिया है। Facebook, एक्स, YouTube और Instagram जैसी दुनिया की सबसे बड़ी सोशल मीडिया कंपनियों को दिल्ली पुलिस ने सीधा और कड़ा अल्टीमेटम भेजा है। रिपोर्ट्स और इंटेलिजेंस इनपुट इशारा कर रहे हैं कि जंतरमंतर की हिंसा और देश भर के अंदर फैलाए जा रहे फैक्ट नैरेटिव के पीछे एक बहुत बड़ा इंटरनेशनल मनी ट्रेल है। करोड़ों रुपए की विदेशी फंडिंग के जरिए एक खास इकोसिस्टम इंटरनेट के ऊपर भ्रामक वीडियोस और हेट स्पीच की बाढ़ ला रहा है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 14:37:30 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या CJP प्रदर्शन के उपद्रवियों की FIR सरकार वापस ले सकती है? कानून का चौंकाने वाला जवाब!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/can-the-government-withdraw-firs-against-cjp-protest-agitators-the-law-surprising-answer]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सड़कों पर ऐसा हंगामा मचा कि लगा देश की राजधानी दिल्ली नहीं, बल्कि किसी बॉलीवुड की फुल-ऑन एक्शन फिल्म का सेट बन गई हो! मामला नीट पेपर लीक का था और मैदान में उतरी थी अपनी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी)। मांगने तो आए थे शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा और अपनी तमाम शर्तें पूरी कराने की जिद्द, लेकिन सोमवार 20 जुलाई को कहानी में ऐसा ट्विस्ट आया कि सीधे सुरक्षा की धज्जियां उड़ गईं। प्रशासन ने सीधे-सादे तरीके से जंतर-मंतर पर धरना देने की परमिशन क्या दी, सीजेपी के सुरमों को लगा कि पूरी दिल्ली ही उनकी है! जैसे ही संसद का मानसून सत्र शुरू होने वाला था, इन लोगों ने 'बैरिकेड तोड़ो, आगे बढ़ो' का नारा पकड़ लिया और हाई-सिक्योरिटी वाले नो-एंट्री इलाके में संसद घेराव करने के लिए कूच कर दिया। फिर क्या था? शांतिपूर्ण प्रदर्शन का चोला उतरा और सड़कों पर पत्थरबाजी, खींचतान और सुरक्षाकर्मियों के साथ जबरदस्त एक्शन मोड ऑन हो गया।&nbsp; दिन-दहाड़े राजधानी की सड़कों पर ऐसा गदर काटा गया कि सरकार से लेकर आम जनता तक, सब थम-से गए। सीजेपी के नेता अपनी जिद पर अड़े रहे, उपद्रवी सड़कें जाम करके सरकार की नाक में दम करते रहे और आखिर में केंद्र सरकार को घुटने टेककर उनकी सारी शर्तें मानने का वादा करना पड़ा। जंतर-मंतर के शांत कोने से शुरू होकर संसद के दरवाजे तक पहुँचने वाले इस 'हाई-वोल्टेज पॉलिटिकल थ्रिलर' ने पूरे देश को सन्न करके रख दिया!</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/become-an-influencer-you-are-doing-well-abhijit-dipke-jibe-at-pm-modi" target="_blank">इन्फ्लुएंसर बन जाइए, आप अच्छा कर रहे हैं, अभिजीत दिपके का PM मोदी पर तंज</a></h3><h2>बिहार और असम की सरकारेंप्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी FIR वापस लेने का दिया भरोसा&nbsp;</h2><div>नोटिफिकेशन में कहा गया है कि हिरासत में लिए गए या गिरफ्तार लोगों को रिहा कर दिया जाएगा और 26 जुलाई को शाम 6 बजे से पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल लोगों के खिलाफ कोई और सख्त कार्रवाई नहीं की जाएगी।&nbsp; बिहार सरकार के गृह विभाग द्वारा जारी नोटिफिकेशन में कहा गया है, पूरे राज्य में 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले विरोध प्रदर्शन में शामिल किसी भी व्यक्ति के खिलाफ सरकार द्वारा कोई दंडात्मक या प्रतिशोधात्मक कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। साथ ही, उक्त विरोध प्रदर्शनों में भाग लेने के कारण 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले लोगों के खिलाफ दर्ज सभी मौजूदा FIR, आपराधिक शिकायतों या कारण बताओ नोटिस को वापस लेने की कानूनी प्रक्रिया तुरंत शुरू की जाएगी। इसके अलावा, 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले दर्ज मामलों के सिलसिले में गिरफ्तार या हिरासत में लिए गए सभी लोगों को तुरंत रिहा किया जाएगा। आखिर में, स्पेशल सेक्रेटरी क्षत्रनील सिंह के हस्ताक्षर वाले नोटिफिकेशन में यह भी कहा गया है कि 26.07.2026 को शाम 6 बजे से पहले दर्ज इन सभी मामलों में, भविष्य में भी ऐसे लोगों के खिलाफ सीधे या परोक्ष रूप से कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। बिहार सरकार ने कहा कि CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ FIR वापस लेने का उसका कदम, परीक्षा और उच्च शिक्षा के क्षेत्रों में जवाबदेही और सुधार की मांग को लेकर हाल ही में हुए विरोध-प्रदर्शनों के जवाब में उठाया गया था। गौरतलब है कि बिहार पुलिस ने विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा—जिसमें पत्थरबाजी और आगजनी शामिल थी—के सिलसिले में लगभग 694 लोगों को हिरासत में लिया था। पुलिस के अनुसार, CJP प्रदर्शनकारियों की वजह से 91 पुलिसकर्मी और 13 आम नागरिक घायल हुए, जबकि 15 सरकारी वाहनों को नुकसान पहुंचा। विरोध-प्रदर्शन के दौरान हुई हिंसा में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी की एक आंख चली गई। बिहार में विरोध प्रदर्शन ऑल-इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) और रिवोल्यूशनरी यूथ एसोसिएशन (RYA) ने नई दिल्ली में CJP के विरोध प्रदर्शन के समर्थन में आयोजित किए थे। 28 जुलाई को जारी एक अलग प्रेस विज्ञप्ति में, असम के गृह और राजनीतिक विभाग ने घोषणा की कि वह CJP प्रदर्शनकारियों के खिलाफ सभी मामले और अन्य कानूनी कार्यवाही वापस ले लेगा। विभाग ने बताया कि कुल पांच मामले दर्ज किए गए थे और 13 प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया गया था। जंतर-मंतर पर 36 दिन तक चले आंदोलन को खत्म करने के लिए हुई बातचीत के दौरान, BJP के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने CJP से जो वादा किया था, उसी के तहत BJP सरकारें FIR वापस लेने का भरोसा दे रही हैं। बिहार और असम सरकारों की ओर से ये नोटिफ़िकेशन तब जारी किए गए, जब CJP के राष्ट्रीय प्रवक्ता आशुतोष रंका ने दावा किया कि पुलिस कार्रवाई न करने के समझौते का “उल्लंघन” किया जा रहा है। उन्होंने प्रदर्शनकारियों के ख़िलाफ़ दर्ज FIR को तुरंत वापस लेने की मांग की और चेतावनी दी कि ऐसा न होने पर “हम फिर से विरोध-प्रदर्शन करने को मजबूर होंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/parliament-street-police-directed-to-issue-a-dd-number-upon-receiving-a-complaint" target="_blank">Delhi High Court का बड़ा फैसला, Parliament Street Police को शिकायत पर DD Number देने का दिया निर्देश</a></h3><h2>क्या CJP और उसके प्रदर्शनकारी कानून से ऊपर हैं?</h2><div>CJP नेताओं की एक मांग यह थी कि सरकार किसी भी प्रदर्शनकारी के खिलाफ कोई सख्त कार्रवाई न करे। उन लोगों के खिलाफ भी नहीं जिन्होंने विरोध-प्रदर्शन के दौरान पुलिसकर्मियों पर हमला किया, हंगामा किया और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया और ऐसे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पहले से दर्ज FIR वापस ले ले। साफ है कि पार्टी उन उपद्रवियों को बचाने की कोशिश कर रही थी जिन्होंने हिंसा के जरिए सरकार पर दबाव बनाने में उसकी मदद की थी, जिसकी वजह से सुरक्षाकर्मियों को बल प्रयोग करना पड़ा। जंतर-मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के विरोध-प्रदर्शन में और उसके आसपास मौजूद लोगों की दिल्ली पुलिस द्वारा की गई जांच में पाया गया कि भीड़ में शामिल बड़ी संख्या में लोगों का पहले से आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। हैरानी की बात है और देश के आम, कानून का पालन करने वाले नागरिकों के लिए निराशाजनक भी, कि केंद्र सरकार ने इस मांग को भी मान लिया। सरकार के इस फैसले से देश के आम नागरिकों के मन में कई सवाल उठते हैं, जैसे: क्या देश की चुनी हुई सरकार को उपद्रवियों के सामने इस कदर ब्लैकमेल किया जा सकता है? क्या सड़कों को बंधक बनाने वाले, सरकारी संपत्ति को फूंकने वाले और समाज के ताने-बाने को तार-तार करने वाले हुड़दंगियों को यूं ही साफ़-साफ़ बाइज्जत बरी होने दिया जाएगा? और अगर किताबी-कानूनी भाषा में बात करें, तो क्या देश की कार्यपालिका के पास इतनी ताकत है कि वो एक बार शुरू हो चुकी कानूनी प्रक्रिया का गला घोंट दे? क्या सरकार के पास वाकई यह कानूनी अधिकार या वीटो पावर है कि वो उन असामाजिक तत्वों के खिलाफ दर्ज FIR वापस ले ले, जिन्होंने पूरे देश की राजधानी को ब्लैकमेल करके रख दिया था? आइए, इन सवालों के कानूनी जवाब तलाशने के लिए कानून की किताबों के पन्ने पलटते हैं!</div><h2>अपराध केवल व्यक्ति नहीं राज्य के खिलाफ भी माना जाता है</h2><div>आपराधिक कानून किसी अपराध को सिर्फ़ एक व्यक्ति के खिलाफ़ नहीं, बल्कि पूरे समाज के खिलाफ़ गलत काम मानता है। यही वजह है कि जब भी कोई अपराध होता है, तो राज्य अपराधी पर मुकदमा चलाने के लिए कदम उठाता है। यह नियम एक कानूनी सुरक्षा के तौर पर काम करता है, जिसका मकसद कमज़ोर पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा करना और समाज में शांति और व्यवस्था बनाए रखना है। इस कानूनी सुरक्षा का ही एक हिस्सा यह नियम भी है कि एक बार जब कानूनी प्रक्रिया शुरू हो जाती है, तो इसे अदालत की मंज़ूरी के बिना रोका नहीं जा सकता। कानूनी प्रक्रिया शुरू करने का एक तरीका है अपराध के बारे में FIR दर्ज कराना। एक बार जब किसी अपराध के लिए FIR दर्ज हो जाती है, तो इसे अदालत की मंज़ूरी के बिना रद्द या वापस नहीं लिया जा सकता। इस नियम के पीछे मकसद यह है कि पीड़ित पर किसी प्रभावशाली या ताकतवर अपराधी के खिलाफ़ कानूनी कार्रवाई न करने का दबाव न डाला जा सके। मौजूदा हालात में भले ही सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ़ दर्ज सभी FIR वापस लेने का वादा किया हो, लेकिन वह सीधे ऐसा नहीं कर सकती। हालाँकि, कुछ ऐसे कानूनी प्रावधान हैं जिनके तहत FIR वापस ली जा सकती है या कानूनी कार्यवाही रोकी जा सकती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/is-a-movement-like-the-cjp-one-brewing-in-pakistan-why-is-general-asim-munir-wary-of-gen-z" target="_blank">Pakistan में होने वाला है CJP जैसा आंदोलन? क्यों 'Gen Z' से घबराए हुए हैं जनरल असीम मुनीर!</a></h3><h2>कोर्ट के बाहर समझौता</h2><div>भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 में एक कानूनी प्रावधान है जो आपराधिक मुकदमे में शामिल पक्षों को कोर्ट के बाहर या पूरे मुकदमे की प्रक्रिया से गुज़रे बिना मामले को 'सुलझाने' की इजाज़त देता है। हालाँकि, यह सुविधा केवल कुछ छोटे अपराधों के लिए ही मिलती है, जिनका असर आमतौर पर निजी हितों पर पड़ता है और जिन्हें BNSS के तहत 'कंपाउंडेबल' (समझौता-योग्य) अपराधों की श्रेणी में रखा गया है। कंपाउंडेबल अपराधों की सूची BNSS की धारा 359 में दी गई है और वे इसी धारा के तहत आते हैं। कंपाउंडेबल अपराधों के कुछ उदाहरण हैं - मामूली चोट पहुँचाना, धोखाधड़ी, घर में बिना इजाज़त घुसना (house-trespass), गलत तरीके से रोकना (wrongful restraint) के कुछ मामले और चोरी। रेप, हत्या, दंगा और डकैती जैसे गंभीर अपराध कंपाउंडेबल नहीं होते हैं। जहाँ कुछ कंपाउंडेबल अपराधों में कोर्ट की इजाज़त के बिना समझौता किया जा सकता है, वहीं कुछ मामलों में कोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी होती है। सरकार इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं कर पाएगी क्योंकि CJP विरोध-प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा की घटनाएँ - जैसे सुरक्षाकर्मियों पर हमला, पत्थरबाज़ी, और पुलिस की गाड़ियों व सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना - निश्चित रूप से कंपाउंडेबल अपराधों की श्रेणी में नहीं आती हैं।</div><h2>FIR रद्द करना या वापस लेना</h2><div>अच्छी बात यह है कि एक बार FIR दर्ज होने के बाद, उसे या मामले को वापस लेना एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) के अधिकार क्षेत्र से बाहर होता है। FIR दर्ज होने के बाद, मामला न्यायपालिका के हाथ में आ जाता है। एग्जीक्यूटिव संबंधित पुलिस स्टेशन को FIR वापस लेने का आदेश नहीं दे सकता और न ही संबंधित कोर्ट या मजिस्ट्रेट को FIR के आधार पर आगे की कार्रवाई न करने का निर्देश दे सकता है। यह व्यवस्था पीड़ित और यहां तक ​​कि कमजोर राज्य को भी ताकत के दम पर किए जाने वाले दबाव या जबरदस्ती के आगे झुकने से बचाती है। इससे यह सवाल उठता है कि अगर कानून एग्जीक्यूटिव (कार्यपालिका) को FIR रद्द करने या वापस लेने की ताकत नहीं देता है, तो सरकार ने हिंसक प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज सभी FIR वापस लेने का वादा क्यों किया? खैर, एक और तरीका है जिससे आरोपी को बरी किया जा सकता है या केस बंद किया जा सकता है, और वह है पुलिस की क्लोजर रिपोर्ट।</div><h2>क्लोजर रिपोर्ट</h2><div>जांच पूरी होने के बाद पुलिस BNSS की धारा 193 के तहत क्लोजर रिपोर्ट या फाइनल रिपोर्ट दाखिल करती है। यह रिपोर्ट उन मामलों में दाखिल की जाती है जिनमें पुलिस को FIR में बताए गए अपराध के होने का कोई शुरुआती सबूत नहीं मिलता, आरोपी का पता नहीं चल पाता, या शिकायत झूठी पाई जाती है। सिर्फ़ इतना ही नहीं। क्लोज़र रिपोर्ट फ़ाइल करने से ही केस बंद नहीं हो जाता; यह इस बात पर निर्भर करता है कि कोर्ट क्लोज़र रिपोर्ट को स्वीकार करता है या आगे जांच का आदेश देता है। अगर कोर्ट पुलिस की जांच से संतुष्ट है, तो वह क्लोज़र रिपोर्ट स्वीकार कर सकता है और केस बंद कर सकता है। ऐसे में FIR रिकॉर्ड पर बनी रहती है, लेकिन केस बंद हो जाता है। लेकिन अगर कोर्ट पुलिस की जांच के नतीजों से संतुष्ट नहीं है, तो वह आगे जांच का आदेश दे सकता है।&nbsp;</div><div>सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र जांच पर विचार कर रहा है</div><div>इस बीच, सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए साफ कहा है कि सीजेपी विरोध प्रदर्शनों के दौरान जिन लोगों ने कानून अपने हाथ में लिया, उन्हें कानून का सामना करना ही होगा। कोर्ट ने एक अंतरिम आदेश जारी कर अधिकारियों को पहले से दर्ज FIR की जांच जारी रखने की अनुमति दे दी है। भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों, दोनों के खिलाफ लगे आरोपों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए। हालांकि, शीर्ष अदालत ने उन राज्यों को निर्देश दिया जहां ऐसे विरोध प्रदर्शन हुए थे कि वे बिना किसी आपराधिक रिकॉर्ड वाले प्रदर्शनकारियों को रिहा कर दें। सर्वोच्च न्यायालय का यह रुख CJP नेतृत्व को पसंद नहीं आया, जो ऐसा व्यवहार करते हैं मानो वे और उनके गुंडे कानून से ऊपर हों। CJP उन गुंडों के लिए छूट चाहता था जिन्होंने विरोध प्रदर्शनों के दौरान भारी उपद्रव मचाया था और सरकार के प्रभाव का इस्तेमाल करके उन्हें कानून की पकड़ से बचाना चाहता था। यह कहने की जरूरत नहीं है कि गुंडों को उनके गैर-कानूनी कामों के लिए बख्श देने की CJP की मांग का न तो कोई कानूनी आधार है और न ही कोई नैतिक आधार।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 14:14:26 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Pakistan में होने वाला है CJP जैसा आंदोलन? क्यों 'Gen Z' से घबराए हुए हैं जनरल असीम मुनीर!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/is-a-movement-like-the-cjp-one-brewing-in-pakistan-why-is-general-asim-munir-wary-of-gen-z]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कॉकरोच जनता पार्टी के नेतृत्व में हुए Gen Z के प्रदर्शनों के आगे आखिरकार सरकार को झुकना पड़ा है। शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और शिक्षा सुधारों के वादे के साथ ही यह जन-आंदोलन तो थम गया, लेकिन भारत भी दक्षिण एशिया के उन देशों की फेहरिस्त में शामिल हो गया है जहाँ छात्रों और युवाओं के आंदोलन ने सियासी कुर्सी को हिला कर रख दिया। साल 2022 से 2025 के बीच छात्रों के आंदोलन से बांग्लादेश और नेपाल में में सरकारें गिरी, इंडोनेशिया में मंत्रियों की वीआईपी सुविधाएं छीनी गई, कई रिफॉर्म हुए। अब भारत में कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफा भी हो गया। लेकिन छात्रों के इन आंदोलनों से अछूता रहा । हमारा पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान, लेकिन भला क्यों? आखिर श्रीलंका से लेकर भारत तक दक्षिण एशिया को मथ देने वाली यह 'युवा क्रांति' रेडक्लिफ रेखा के उस पार जाकर क्यों थम जाती है? क्यों पाकिस्तान में छात्र आंदोलन उस तरह इतिहास नहीं बदल पा रहे हैं जैसे उसके पड़ोसियों में हुआ? आइए समझते हैं इस खामोशी की असली वजह।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/having-lost-faith-in-the-us-why-did-kuwait-after-being-trounced-by-iran-rush-to-pakistan" target="_blank">अमेरिका से उठा भरोसा, ईरान से पिटने वाला कुवैत क्यों दौड़ा पाकिस्तान?</a></h3><h2>इतिहास पर गौर करना जरूरी</h2><div>7 जनवरी 1953 में करांची में छात्रों ने अपनी मांगों को लेकर बड़ा प्रदर्शन आयोजित किया था। पाकिस्तान को बने अभी तीन साल ही गुजरे थे। ये पाकिस्तान का पहला बड़ा छात्रों का प्रदर्शन था। इसलिए सरकार ने इस पर अलग से नजर बनाई हुई थी। छात्रों की मांगे बहुत साधारण सी थी। शिक्षा का बजट बढ़ाया जाए, यूनिवर्सिटी की फीस कम की जाए और छात्रों को कैंपस में बेहतर सुविधाएं दी जाए। इन प्रदर्शन को पाकिस्तान का उस वक्त का वामपंथी डेमोक्रेटिक स्टूडेंट फेडरेशन (डीएसएफ) लीड कर रहा था। चूंकि पाकिस्तान का पहला इतना बड़ा छात्रों का प्रदर्शन था तो भारी संख्या में पुलिस तैनाती हुई। जिस बात की सबसे ज्यादा आशंका थी वही हो गया। प्रदर्शन के दौरान हिंसा हुई। पुलिस की गोली चली और करीब सात छात्रों की जान चली गई। इसलिए हर 7 जनवरी को दिन को स्टूडेंट्स मार्टियर डे के रूप में न&nbsp; किया जाने लगा। इस आंदोलन ने डीएसएफ को सरकार की नजर में ला दिया था। वो कोल्ड वॉर का दौर था और पाकिस्तान अमेरिका के करीब जा रहा था। वामपंथी विचारधारा के प्रति सरकार बेहद सख्त&nbsp; सरकार का आरोप था कि डीएसएफ के कई नेताओं के शब्द कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान से हैं औऱ संगठन वामपंथी राजनीति पाकिस्तान में फैला रहा है। इसलिए 1954 में सरकार ने डीएसएफ पर प्रतिबंध लगा दिया। डीएसएफ पर प्रतिबंध के बाद उसके कार्यकर्ताओं ने हार नहीं मानी और 1956 में नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन (एनएसएफ) की स्थापना की।&nbsp;</div><div>1968 में अयूब खान के दौर में पाकिस्तान में सरकार के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हुए तो उनमें सबसे आगे नेशनल स्टूडेंट्स फेडरेशन था। प्रदर्शन की वजह से एनएसएफ के कई छात्र जेल भी गए। लेकिन इन प्रदर्शनों की वजह से जनरल अयूब खान की सरकार चली गई। इसलिए बाद में जाकर जब जिया उल हक की सरकार आई तो उन्होंने कोई रिस्क ही नहीं लिया। पहले&nbsp; तो एनएसएफ को बैन किया। इसके अलावा पूरे पाकिस्तान में छात्र राजनीति पर बट्टा लगा दिया गया। यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में स्टूडेंट यूनियन पर बैन लग गया। ये बैन आज तक लगा हुआ है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/people-of-pok-enemies-of-pakistan-like-india-khawaja-asif-statement-on-killing-of-14-civilians" target="_blank">PoK के लोग भारत की तरह पाकिस्तान के दुश्मन, 14 नागरिकों की हत्या पर ख्वाजा आसिफ का शर्मनाक बयान</a></h3><h2>पाकिस्तान की कमज़ोर छात्र राजनीति</h2><div>दक्षिण एशिया के ज़्यादातर देशों के उलट, पाकिस्तान में छात्र राजनीति की कोई मज़बूत परंपरा नहीं है। यह भारत और बांग्लादेश जैसे देशों से बिल्कुल अलग है, जहाँ बड़ी राजनीतिक पार्टियाँ अपने असरदार छात्र और युवा संगठन बनाए रखती हैं। ये संगठन राजनीतिक गतिविधियों को संगठित और सक्रिय करने का काम करते हैं और हाल के युवा-नेतृत्व वाले विरोध प्रदर्शनों में इन्होंने अहम भूमिका निभाई है। माइकल कुगेलमैन के अनुसार, इसकी जड़ें काफी हद तक जनरल ज़िया-उल-हक के सैन्य शासन की विरासत से जुड़ी हैं, जिसने छात्र राजनीति पर रोक लगा दी थी। उन्होंने एक्स पर लिखा जनरल ज़िया ने 1980 के दशक में छात्र संघों पर प्रतिबंध लगा दिया था और ज़्यादातर मामलों में उन्हें फिर से बहाल नहीं किया गया है। पाकिस्तान में युवाओं की बड़ी आबादी और एक्टिविज़्म में छात्रों/युवाओं की अहम भूमिका को देखते हुए, उस प्रतिबंध के असर को नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान देने वाली बात है कि इस प्रतिबंध से पहले पाकिस्तान में छात्र राजनीति खूब फल-फूल रही थी। 1968-69 के बड़े जन-आंदोलन में छात्र समूह सबसे आगे थे; इस आंदोलन के कारण राष्ट्रपति अयूब खान को महीनों तक चले देशव्यापी विरोध-प्रदर्शनों के बाद इस्तीफ़ा देना पड़ा था। हालाँकि, ज़िया के शासनकाल में छात्र यूनियनों को दबाने की कार्रवाई एक अहम मोड़ साबित हुई, जिससे राजनीतिक लामबंदी के केंद्र के तौर पर कैंपस की भूमिका कमज़ोर पड़ गई। तब से, पाकिस्तान में युवाओं के नेतृत्व वाले बहुत कम देशव्यापी आंदोलन हुए हैं। एक उल्लेखनीय अपवाद 'स्टूडेंट्स सॉलिडैरिटी मार्च' था, जो 2018 से 2022 के बीच हर साल आयोजित किया गया। इसमें छात्र यूनियनों को बहाल करने और छात्रों को ज़्यादा अधिकार देने की मांग की गई थी। कार्यकर्ताओं की बार-बार की मांगों के बावजूद, छात्र यूनियनों पर प्रतिबंध ज़्यादातर बना हुआ है। नतीजतन, पाकिस्तान में उस तरह के संगठित कैंपस नेटवर्क का अभाव है, जिन्होंने दक्षिण एशिया के अन्य हिस्सों में युवा आंदोलनों को मज़बूती दी है।&nbsp;</div><h2>पाकिस्तान में बिखरे हुए विरोध आंदोलन</h2><div>पाकिस्तान की सत्ता को चुनौती देने वाले विरोध आंदोलनों की कोई कमी नहीं है। बलूचिस्तान में, कार्यकर्ताओं ने ज़्यादा प्रांतीय स्वायत्तता, ज़बरदस्ती लोगों को गायब करने की प्रथा को खत्म करने और प्रांत की विशाल खनिज संपदा में उचित हिस्सेदारी की मांग को लेकर लगातार प्रदर्शन किए हैं, हालांकि उनके अभियान अक्सर लंबे समय से चल रहे हिंसक बलूच विद्रोह की वजह से दब जाते हैं। इसी तरह, पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में 'जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' के नेतृत्व में अशांति की लहर देखी गई है। इस कमेटी ने बिजली की बढ़ती कीमतों से लेकर शरणार्थियों के लिए विधानसभा में 12 सीटें आरक्षित करने जैसे मुद्दों पर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए हैं। हालांकि, अहम फ़र्क यह है कि ये आंदोलन ज़्यादातर अपने-अपने इलाकों और मुद्दों तक ही सीमित रहे हैं। पड़ोसी दक्षिण एशियाई देशों में युवाओं के नेतृत्व में हुए आंदोलनों के उलट, ये आंदोलन एक ऐसे देशव्यापी आंदोलन में नहीं बदल पाए हैं जो इस्लामाबाद को चुनौती दे सके। पाकिस्तान के कई युवा भी इसी बात से सहमत हैं। बीबीसी उर्दू से बात करते हुए, एक युवा ने कहा कि भारत में CJP के नेतृत्व में हुए विरोध प्रदर्शनों से सबसे बड़ी सीख यह मिली कि प्रदर्शनकारी एक साझा मकसद के लिए एकजुट हो सकते हैं। पाकिस्तान में छात्रों, कंटेंट क्रिएटर्स और यहां तक ​​कि अखबारों के संपादकीय लेखों ने भी CJP के नेतृत्व वाले Gen Z आंदोलन की तारीफ़ की है, जिसके कारण शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफ़ा देना पड़ा। फिर भी, युवाओं को एकजुट करने में सक्षम मज़बूत संगठनों की कमी और पाकिस्तान के मौजूदा विरोध आंदोलनों के एक संयुक्त मोर्चे के रूप में एकजुट होने में असमर्थ या अनिच्छुक होने के कारण, ऐसा नहीं लगता कि देश की Gen Z उस तरह के युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों को दोहरा पाएगी जिन्होंने बाकी दक्षिण एशिया को हिलाकर रख दिया है।</div><h2>साउथ एशिया में हुए सभी आंदोलन की जो वजह अलग-अलग</h2><div>हाल ही में साउथ एशिया में हुए सभी प्रदर्शन नेपाल में बांग्लादेश में, श्रीलंका में इन सब का जो संदर्भ था वो अलग-अलग था। जैसे नेपाल में करप्शन का मुद्दा सबसे बड़ा था। जब सोशल मीडिया में मंत्रियों के बच्चों की आलीशान जिंदगी दिखने लगी तो सरकार ने सोशल मीडिया ही बैन कर दिया। फिर आंदोलन भड़का और हिंसा के बाद वहां सरकार गिरी नेपाल में। बांग्लादेश में सरकारी नौकरी में शेख हसीना ने सेना से जुड़े हुए सेना के जो बच्चे थे उनको रिजर्वेशन दे रही थी। इसलिए आम छात्रों ने इसका विरोध किया और जब प्रदर्शनकारियों पर क्रैक डाउन हुआ तो हिंसा भड़क गई और फिर शेख हसीना की भी वहां से सरकार चली गई। उसी तरह इंडोनेशिया में सरकार के मंत्रियों के वीआईपी प्रोटोकॉल पर उनके वीआईपी कल्चर पर पाबंदी लगाने के लिए छात्रों ने प्रदर्शन किए। प्रदर्शन के बाद सरकार ने कई बदलाव किए और वहां पे उनकी मांगे मानी गई और भारत का उदाहरण तो आप जानते ही हैं कि नीट पेपर लीक में सरकार की जवाबदेही मांगी गई और शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा गया। यानी इन सभी देशों में आप देखिए कि आंदोलन की जो वजह है वो आपको अलग-अलग मिलेंगी। जबकि जो आंदोलन अतीत में हुए और एक दूसरे को इंस्पायर किया।</div><h2>सेना का डर</h2><div>ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान में प्रदर्शन होने की कोई वजह ही नहीं है। वहां की अर्थव्यवस्था कई बरस से वेंटिलेटर में है। आईएमएफ के इंजेक्शन से वो सर्वाइव कर रही है। शिक्षा व्यवस्था का भी यही हाल है। चुनाव फेयर नहीं है। सेना के इशारे पर सब कुछ चल रहा है। यहां तक कि न्यायपालिका पर भी वहां सवालों के घेरे में उसे लिया जा रहा है। यानी मुद्दे पर्याप्त हैं प्रदर्शन करने के लिए। लेकिन सेना वहां के लोगों को आंदोलन खड़े करने का मौका ही नहीं देती है। आपने इमरान खान, गजा, ईरान या किसी पश्चिमी देश में हुई किसी घटना के खिलाफ पाकिस्तान में प्रदर्शनों के बारे में तो सुना होगा। लेकिन शिक्षा व्यवस्था या रोजगार पर प्रदर्शन के बारे में अक्सर वहां से कोई ऐसी घटना या ऐसी कोई खबर सुनाई नहीं देती है क्योंकि वहां के आम लोग इस तरह के मुद्दों में पड़ना ही नहीं चाहते हैं। वो सीधी वजह है क्योंकि वहां की सेना क्रैक डाउन कर देती है। आखिरी बार अक्टूबर 2025 में कराची में बढ़ती महंगाई और कम वेतन की वजह से कई संगठन इकट्ठे हुए थे। इनमें सिंध एंप्लाइज एयंस एसईए सबसे आगे था। लेकिन क्या हुआ? वहां भी आंदोलन को दबा दिया गया। ईरान, गजा या पश्चिमी देश में हुई घटना पर भी जब आंदोलन होते हैं तो उन्हें भी सरकार कुचल देती है। जब पाकिस्तान ट्रंप के गजा पीस प्लान में शामिल हुआ था तब तहरीकलबैक पाकिस्तान ने एक हाईवे ही बंद कर दिया था। अंत में क्या हुआ? हिंसा हुई। इसी तरह ईरान के मुद्दे पर प्रदर्शन जब बहुत बढ़ने लगे तो आसिम मुनीर ने ये कह दिया कि जिन्हें ईरान से ज्यादा प्यार है वो ईरान ही चले जाएं।&nbsp; इस आंदोलन को भी कुचल दिया गया।&nbsp;</div><h2>प्रदर्शन कभी आंदोलन में नहीं बदल पाए</h2><div>जो प्रदर्शन आंदोलन में बदल भी पाए हैं उन्हें मेन स्ट्रीम पॉलिटिक्स और मेन स्ट्रीम मीडिया से ही साइडलाइन कर दिया गया। बलूचिस्तान और पाकिस्तान ऑक्युपाइड कश्मीर यानी पीओके का उदाहरण ही&nbsp; देख लीजिए। बलूचिस्तान में कई बरसों से प्रदर्शन चल रहे हैं। वहां लोगों की मांग यह है कि उन्हें भी पाकिस्तान के दूसरे शहरियों की तरह यानी पंजाबियों की तरह सिंधियों की तरह अधिकार मिले। जो गैस बलोचिस्तान से निकाली जाती है वो पहले कराची तक पहुंच जाती है। लेकिन बलोच लोगों को लकड़ी जलाकर चूल्हे में खाना बनाना क्यों पड़ता है? उसी तरह पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर पीओके में प्रदर्शन जो है वो महंगाई को लेकर बहुत लंबे वक्त से चल रहे हैं। और अब इलेक्शन में रिफॉर्म की मांग भी वहां की जा रही है।</div><h2>आखिर पाकिस्तान पीओके में क्या करने वाला है?</h2><div>पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में जबरदस्त बवाल चल रहा है। खबरें हैं कि पाकिस्तानी सेना की गोलियों में 14 आम लोग मारे गए हैं। लगभग पूरे पीओके में घेराबंदी है। कम्युनिकेशन ब्लैकआउट है। इंटरनेट नदारद है। चौक चौराहों पर सिर्फ सुरक्षा बलों की बंदूके दिखाई दे रही हैं। पैरामिलिट्री फोर्स बुलाई गई है। दूसरे सूबों से पुलिस के दस्ते मंगाए जा रहे हैं। पाकिस्तान के 14,000 रेंजर्स सड़कों पर कश्त कर रहे हैं। लेकिन यह सब किसी दंगे या हंगामे की वजह से नहीं हो रहा। यह सब वहां के चुनाव की तैयारियों का हिस्सा है। पीओके में चुनाव शुरू हो चुके हैं। पहले चरण के नतीजे भी आ गए हैं और चुनाव का विरोध करने वालों पर पाकिस्तान की पुलिस फायरिंग कर रही है। 28 जुलाई को पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू कश्मीर में पहले फेस के चुनाव के नतीजे घोषित हुए। 27 जुलाई को मीरपुर डिवीजन की 13 सीटों पर हुए चुनाव में नौ पर नवाज शरीफ की पीएमएलएन पार्टी ने जीत दर्ज की। जबकि चार सीटों पर भुट्टो परिवार की पाकिस्तान पीपल्स पार्टी पीपीपी ने जीत दर्ज की। पाकिस्तान की सत्ता में इस वक्त इन दोनों पार्टियों ने मिलकर गठबंधन की सरकार बना रखी है। नवाज शरीफ के छोटे भाई शहबाज शरीफ पाकिस्तान के प्रधानमंत्री हैं। लेकिन पीओके में यह दोनों पार्टियां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। वोटिंग के दौरान हिंसा की खबरें भी सामने आई।&nbsp;&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:48:17 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[PM Modi Video Block Controversy: टेक्निकल ग्लिच या एल्गोरिदम की आड़ में Meta कर रहा मनमानी? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/pm-modi-video-block-meta-acting-arbitrarily-under-guise-of-technical-glitches-algorithms]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पीएम मोदी का जेन-जी वाला वीडियो फेसबुक से गायब हो गया था। कुछ घंटों तक यूजर्स को सिर्फ ये मैसेज दिख रहा था कि लीगल रिक्वेस्ट के कारण ये वीडियो अब आपके एरिया में उपलब्ध नहीं है। इसके बाद सोशल मीडिया पर सवाल उठने लगे कि क्या भारत में ही प्रधानमंत्री का वीडियो ब्लॉक कर दिया गया है? मामला बढ़ने के बाद मेटा की ओर से सफाई आई और उसके बाद वीडियो भी वापस आया और कहा गया कि टेक्निकल ग्लिच था और मेटा की तरफ से माफी भी मांगी गई। हुआ ये था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में अपना सेल्फी जेन-जी वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था। इस वीडियो में उन्होंने युवाओं से संवाद किया और नीट समेत जो बाकी कंपटेटिव एग्जाम और पेपर लीक की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि सरकार इसके खिलाफ सख्त कदम उठाने जा रही है। उन्होंने ये भी कहा कि अगले कैबिनेट में इस विषय पर महत्वपूर्ण फैसले भी हमारी कैबिनेट लेगी। लेकिन मंगलवार तड़के 1:25 मिनट के करीब कई यूजर्स जब ये वीडियो देख रहे थे तो स्क्रीन पर नजर आ रहा था कि लीगल रिक्वेस्ट के कारण ये वीडियो अब उपलब्ध नहीं है। वीडियो के साथ एक ऑप्शन See Why का आता है यानी क्यों ये वीडियो उपलब्ध नहीं है? उस पर क्लिक करने पर यही जानकारी दिखाई दे रही थी। हालांकि नोटिस में ये नहीं बताया गया था कि किस कानून या किस सरकारी एजेंसी के रिक्वेस्ट पर वीडियो को ब्लॉक किया गया था। कुछ ही घंटों में फेसबुक पर वीडियो दोबारा से लौट आया। मेटा की ओर से साफ किया गया कि ये किसी सरकारी आदेश या कानूनी कार्रवाई का मामला नहीं था बल्कि टेक्निकल ग्लिच की वजह से ऐसा हुआ था। कंपनी ने इस गलती के लिए सरकार से माफी भी मांगी। मामला सामने आने के बाद भाजपा ने मेटा पर निशाना साधा।&nbsp;केंद्र सरकार ने इस घटना को बहुत गंभीरता से लिया है और इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मेटा और इंस्टाग्राम के ग्लोबल प्रमुखों को समन जारी किया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-busy-with-instagram-reels-gaurav-gogoi-says-government-is-not-serious-about-nta" target="_blank">PM Modi इंस्टाग्राम Reels पर व्यस्त? गौरव Gogoi बोले- NTA पर सरकार गंभीर नहीं</a></h3><h2>बच्चों के यौन शोषण से जुड़े विज्ञापनों के मामले में मेटा को किया गया था तलब</h2><p>जुलाई की शुरुआत में मेटा सरकार की नज़र में आ गया। BBC की एक जांच में पता चला कि Instagram यूज़र्स को ऐसे विज्ञापन और कंटेंट दिखा रहा था जो बच्चों के यौन शोषण और दुर्व्यवहार से जुड़ी सामग्री को बढ़ावा देते थे। बीबीसी-आई की एक पड़ताल में पाया गया है कि इंस्टाग्राम भारत में पैसे लेकर ऐसे विज्ञापन चला रहा है, जिनके ज़रिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी सामग्री का प्रसार हो रहा है। इस रिपोर्ट के प्रकाशित होने के बाद इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने अधिकारियों को मेटा से स्पष्टीकरण मांगने और उसे तलब करने का निर्देश दिया।</p><h2>WhatsApp के Username फीचर पर रोक</h2><p>जुलाई में भारत ने WhatsApp के उस नए फ़ीचर को रोल आउट करने पर रोक लगाने का आदेश दिया था, जिससे यूज़र्स यूनीक यूज़रनेम का इस्तेमाल करके चैट कर सकते थे। इसकी वजह यह थी कि इससे ऑनलाइन धोखाधड़ी और फ़िशिंग स्कैम बढ़ सकते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि WhatsApp का यूज़रनेम फ़ीचर लोगों को अपना फ़ोन नंबर बताए बिना चैट करने की सुविधा देता। भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने एक नोटिस में WhatsApp से पूछा है कि साइबर अपराध बढ़ाने वाले फ़ीचर को लॉन्च करने के लिए भारतीय क़ानून के तहत उसके ख़िलाफ़ कार्रवाई क्यों न की जाए। मंत्रालय ने यह भी कहा कि उसे लगता है कि यह फ़ीचर "ऑनलाइन धोखाधड़ी, फ़िशिंग, डिजिटल अरेस्ट स्कैम और किसी और का रूप धरकर किए जाने वाले हमलों" की घटनाओं को काफ़ी बढ़ा सकता है, क्योंकि इससे अपराधी अपना फ़ोन नंबर बताए बिना संभावित पीड़ितों से संपर्क कर सकते हैं। इसके जवाब में WhatsApp ने एक बयान में कहा कि यह फ़ीचर अभी लाइव नहीं हुआ है और इसमें सुरक्षा के उपाय किए गए हैं, जैसे कि हाई-प्रोफ़ाइल यूज़रनेम को सुरक्षित रखना और किसी और का रूप धरने या धोखाधड़ी का पता लगाने के तरीक़े शामिल करना।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/government-summons-meta-official-after-pm-modi-facebook-post-removed" target="_blank">प्रधानमंत्री की पोस्ट हटाने के बाद सरकार ने मेटा के वैश्विक लोक नीति प्रमुख को किया तलब</a></h3><h2>जुकरबर्ग ने 2024 के चुनाव में किया बीजेपी की हार का दावा! मेटा ने मांगी माफी</h2><p>पिछले साल जनवरी में मेटा ने भारत से भी माफ़ी मांगी थी। यह माफ़ी तब मांगी गई जब CEO मार्क ज़करबर्ग ने जो रोगन के पॉडकास्ट पर 2024 के भारतीय चुनावों के नतीजों को लेकर टिप्पणी की, जिससे विवाद खड़ा हो गया था। ज़करबर्ग ने दावा किया था कि भारत समेत कई देशों में कोविड के बाद हुए चुनावों में मौजूदा सरकारों को सत्ता गंवानी पड़ी। भारतीय सरकारी अधिकारियों ने तुरंत इस दावे का खंडन किया। ज़करबर्ग की टिप्पणियों पर ध्यान देते हुए, IT मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि भारत के 2024 के चुनाव मौजूदा सरकार के लिए बहुत बड़ी कामयाबी रहे, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले नेशनल डेमोक्रेटिक अलायंस (NDA) ने निर्णायक रूप से तीसरा कार्यकाल हासिल किया। वैष्णव ने 64 करोड़ से ज़्यादा लोगों के भारी मतदान का ज़िक्र किया और ज़करबर्ग की बातों को तथ्यात्मक रूप से गलत बताया। इस टिप्पणी के बाद, मेटा इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट शिवनाथ ठुकराल ने एक्स पर लिखा कि मार्क की यह बात कि 2024 के चुनावों में कई मौजूदा सरकारें दोबारा नहीं चुनी गईं, कई देशों के लिए तो सही है, लेकिन भारत के लिए नहीं। ठुकराल ने इस टिप्पणी को अनजाने में हुई गलती बताते हुए खेद जताया और दोहराया कि भारत मेटा के लिए एक अहम बाज़ार बना हुआ है। उन्होंने आगे कहा कि हम इस अनजाने में हुई गलती के लिए माफ़ी मांगना चाहते हैं। भारत मेटा के लिए बेहद महत्वपूर्ण देश है और हम इसके इनोवेटिव भविष्य का अहम हिस्सा बनने के लिए उत्सुक हैं। मेटा के लिए, भारत सरकार और न्यायपालिका के साथ ये टकराव अच्छे संकेत नहीं हैं। स्टेटिस्टा के डेटा के अनुसार, 2025 तक भारत में इंस्टाग्राम के सबसे ज़्यादा यूज़र्स (480 मिलियन से ज़्यादा) हैं, जो अमेरिका के मुक़ाबले दोगुने से भी ज़्यादा हैं। यहाँ फ़ेसबुक के भी 400 मिलियन से ज़्यादा यूज़र्स हैं, जो दुनिया में सबसे ज़्यादा हैं। देश में WhatsApp की भी मज़बूत मौजूदगी है, जिसके लगभग 853 मिलियन यूज़र्स हैं।</p><h2>WhatsApp को भारत छोड़ने की 'सुप्रीम' चेतावनी</h2><p>सुप्रीम कोर्ट ने WhatsApp और उसकी पेरेंट कंपनी Meta को साफ चेतावनी दी। अदालत ने कहा कि नागरिकों की प्राइवेसी के अधिकार के साथ कोई कंपनी खेल नहीं सकती। यहां तक कहा गया कि अगर नियम नहीं मान सकते, तो भारत छोड़ने का विकल्प भी खुला है। इस विवाद की जड़ WhatsApp की प्राइवेसी पॉलिसी थी। WhatsApp सालों से यह कहता आ रहा है कि उसके मैसेज End-To-End Encrypted (E2EE) हैं और कोई तीसरा शख्स उन्हें नहीं पढ़ सकता। लेकिन समस्या मैसेज के कंटेंट की नहीं, बल्कि यूज़र डेटा की है। इसी साल फरवरी के महीने में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान जजों ने WhatsApp के रवैये पर सीधी आपत्ति जताई। अदालत ने कहा कि WhatsApp यूज़र्स को यह नहीं कह सकता कि पॉलिसी मानो या ऐप छोड़ दो। इस मामले की सुनवाई के दौरान, भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि WhatsApp की मोनोपॉली (एकाधिकार) के कारण यूज़र्स के पास कोई वास्तविक विकल्प नहीं बचता है और उन्होंने इसके डेटा से जुड़े तौर-तरीकों की तुलना "निजी जानकारी की चोरी" से की। सीजेआई ने आगे कहा था कि आप इस देश के संवैधानिक मूल्यों का मज़ाक उड़ा रहे हैं। हम इसे तुरंत खारिज कर देंगे। आप लोगों के निजता के अधिकार के साथ इस तरह कैसे खिलवाड़ कर सकते हैं? कंज्यूमर के पास कोई विकल्प नहीं है। आपने एकाधिकार बना लिया।&nbsp;</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 15:35:24 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Cockroaches का बाप! अब आरक्षण और E-20, एक दिन में 2 मिलियन फॉलोअर्स, ये 2 अकाउंट उड़ाएंगे सरकार की नींद?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/2-million-followers-in-a-single-day-will-these-two-accounts-give-the-government-sleepless-nights]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या देश में नया आंदोलन शुरू होने जा रहा है? क्या सड़कों से उठकर इंटरनेट के सर्वर को हिला देने वाला एक नया युवा विद्रोह भारत की सबसे पुरानी और संवेदनशील व्यवस्था को चुनौती दे रहा है?&nbsp;सोशल मीडिया का 'रील' वाला ज़माना अब सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहा, यह देश का नया डिजिटल आंदोलन केंद्र बन चुका है। जिस तरह 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने इंस्टाग्राम के ज़रिए ज़मीनी आक्रोश खड़ा किया और केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को कुर्सी छोड़ने पर मजबूर कर दिया, उसने विरोध के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। आज अलग-अलग मांगों के साथ इंस्टाग्राम पर कई नए मोर्चे खुल रहे हैं। ज़ाहिर है, इस डिजिटल दौर में अगर इंस्टाग्राम को जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी का नया 'जंतर-मंतर' कहा जाए, तो यह रत्ती भर भी गलत नहीं होगा।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">एक डिजीटल विस्फोट ने पिछले 24 से 48 घंटों में पूर देश के सियासी और सामाजिक हल्कों में तहलका मचा दिया है। कॉकरोच जनता पार्टी ने जिस तरीके से शिक्षा व्यवस्था को लेकर आंदोलन किया उसके ठीक बाद अब सोशल मीडिया के दीवारों पर एक ही नारा गूंज रहा है- आरक्षण हटाओ आंदोलन! समानता के अधिकार, योग्यता और न्याय इन तीन शब्दों के ईर्द-गिर्द बुने गए नए अभियान जिसे रिजर्वेशन हटाओ आंदोलन यानी आरएचए का नाम दिया गया है। इस आंदोलन का मुख्य मकसद भारत की मौजूदा जाति आधारित आरक्षण व्यवस्था का विरोध करना और कॉलेज एडमिशन से लेकर सरकारी नौकरियों में मेरिट यानी योग्यता को एकमात्र आधार बनाने की मांग करना है। जो लोग आंदोलन कर रहे हैं, उनका नारा है कि सारी जातियां एक समान, मेरा बस ये देश महान। इनका तर्क है कि 21वीं सदी के भारत में हर नागरिक को बिना किसी कोटे या जितगत भेदभाव के एक समान अवसर यानी फुल ऑपरच्युनिटी मिलनी चाहिए। हालांकि इनका ये भी कहना है कि वो किसी समुदाय के खिलाफ नहीं हैं बल्कि उनका प्रस्ताव ये है कि सरकार को रोजमर्रा के सार्वजनिक जिंदगी में जाति की पहचान को ही पहचानना बंद कर देना चाहिए ताकी जातिवाद जड़ से खत्म हो सके।&nbsp;</span></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uddhav-bold-ram-mandir-donation-embezzlement-case-ram-raksha-andolan-against-bjp-district-level" target="_blank">राम मंदिर दान गबन मामले पर Uddhav Thackeray का बड़ा दांव! BJP के खिलाफ अब जिला स्तर पर 'राम रक्षा आंदोलन'</a></h3><h2>24 घंटे में 10 लाख से अधिक फॉलोअर्स&nbsp;</h2><p><span style="font-size: 1rem;">इस आंदोलन के सोशल मीडिया हैंडल का नाम रिजर्वेशन हटाओ मूवमेंट है। ये अकाउंट हाल फिलहाल एक्टिव हुआ। लेकिन रफ्तार का आलम ये है कि 24 से 48&nbsp; घंटे के अंदर-अंदर 10 लाख से अधिक फॉलोअर्स बन चुके थे। यानी की एक मिलियन फॉलोअर्स हो चुके थे। लेकिन देखते ही देखते एमआरआई लिखे जाने तक 4.3 मिलियन तक चला गया। इस पेज पर अब तक कई सारे पोस्ट किए जा चुके हैं जो ये बताने के लिए काफी है कि कैसे इस मुद्दे को उठाया जा रहा है। इनमें पोल, रील और छात्र-छात्राओं के इंटरव्यूज शामिल हैं। किसी भी सोशल मीडिया मूवमेंट के इतिहास में सबसे तेजी से बढ़ने वाले हैंडल्स में से एक बन चुका है। देश की जनता और सोशल मीडिया यूजर्स के मन में सबसे बड़ा सवाल अब ये है कि आखिर इस डिजिटल क्रांति को जन्म देने वाला लड़का कौन है?</span></p><h2>डिजिटल क्रांति को जन्म किसने दिया</h2><p>बहुत ज्यादा तथ्यों की पड़ताल करेंगे तो आपको बहुत सारे चेहरे नजर आएंगे जो इसके सपोर्ट में यानी कि रिजर्वेशन हटना चाहिए। इसके सपोर्ट में वीडियो बना रहे हैं। लेकिन कोई इसका सिंगल फाउंडर सामने नहीं आया है। हां, एक लड़का जरूर बहुत आगे आकर वीडियो बना रहा है। लग रहा है कि यह सारा आंकड़ा उसी का हो सकता है। फिलहाल पेज के बायो में लिखा है बैक बाय सिटीजंस हु बिलीव रिफॉर्म डिर्व्स अ बॉयज। यानी यह उन आम नागरिकों और छात्रों द्वारा संचालित है जो व्यवस्था में सुधार चाहते हैं। इस पेज पर कई युवा रिजर्वेशन हटाओ का नारा देते हुए सरकार और आरएसएस से भी सवाल पूछते दिख रही हैं।&nbsp; मेरा फर्ज है सवाल पूछना। क्यों भारतीय जनता पार्टी चुप है? क्यों कांग्रेस चुप है? क्यों आम आदमी पार्टी चुप है? यही एकमात्र ऐसा मुद्दा था जिस पे सारी पार्टियां चुप हैं। कोई इस पे नहीं बोलता। सब लोग एक ही थाली में खाना खाते हैं ये लोग। सबका पता होता है कि कौन सा पार्लियामेंट में कानून पास होने वाला है, कौन सा नहीं होने वाला और सिर्फ एक्टिंग करते हैं। जनता को बरगलाने का काम करते हैं। भारतीय जनता पार्टी से बस एक खुशी की चीज यह है कि वो देशद्रोही नहीं है। राजनीतिक पार्टी जरूर है। देशद्रोही नहीं है कम से कम।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uproar-over-ram-mandir-funds-uddhav-thackeray-targets-bjp-ram-raksha-andolan-to-begin-on-july-5" target="_blank">Ram Mandir फंड पर घमासान: Uddhav Thackeray का BJP पर वार, 5 जुलाई से राम रक्षा आंदोलन</a></h3><h2>क्या देश में कोई नया बड़ा ऑन ग्राउंड प्रोटेस्ट होने जा रहा है?&nbsp;</h2><p>इसका जवाब है बिल्कुल नहीं फिलहाल नहीं। इस आंदोलन के एडमिन और रणनीतिकारों ने बहुत ही सोची समझी रणनीति अपनाई है। उन्होंने इसे फर्स्ट पीसफुल ऑनलाइन प्रोटेस्ट बताया है। पेज के जरिए युवाओं से अपील की गई है कि वह सड़कों पर ना उतरे। मतलब कि सड़कों पर उतर कर लाठियां खाने के बजाय या कानून व्यवस्था बिगाड़ने के बजाय डिजिटल ताकत का इस्तेमाल करें। समर्थकों को निर्देश दिया गया है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और सीजेपी के सोशल मीडिया कमेंट सेक्शन में जाकर पूरी तरीके से शांतिपूर्ण तरीके से रिजर्वेशन हटाओ लिखकर अपनी मांग को दर्ज कराएं। हालांकि इस ऑनलाइन अभियान की संवेदनशीलता को देखते हुए देश के कुछ हिस्सों खासकर देश की राजधानी दिल्ली में प्रशासन पूरी तरीके से अलर्ट है। छात्र संगठनों की हर हलचल पर नजर रखी जा रही है और एतिहातन सुरक्षा व्यवस्था के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं ताकि इंटरनेट का यह उबाल सड़कों पर किसी बड़ी अव्यवस्था का रूप ना ले सके। इस पूरे आंदोलन का एक और पहलू भी है जिसे भी आपके लिए समझना जरूरी है। जहां एक तरफ देश का जेंजी युवा मेरिट और आर्थिक आधार पर अवसरों की मांग कर रहा है तो वहीं दूसरी तरफ सामाजिक न्याय के समर्थकों का दृढ़ तर्क यह है कि भारत में भैया सदियों से सामाजिक असमानता चली आ रही है। जातिगत भेदभाव और प्रतिनिधित्व की कमी है और उसे दूर करने के लिए आरक्षण आज भी बेहद जरूरी संवैधानिक हथियार है। हालांकि सवाल इस बात पर भी उठता है कि 700 साल पहले अगर किसी के ऊपर अत्याचार हुआ तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि आने वाले 7000 साल तक उसके ऊपर अत्याचार ही होगा। लोग आगे बढ़ रहे हैं। यह जो रिजर्वेशन अब तक मिला है इसका फायदा हुआ है। लोग स्टेबल हुए हैं और आज भी अगर कोई एससी एसटी है और किसी अच्छी पोजीशन पर है तो उसके बच्चे को भी वही सारी चीजें फेस करनी होंगी जो उसके पूर्वजों ने किया होगा। जाहिर सी बात है यह बिल्कुल कुतर्क लगता है। शायद इसीलिए खुलकर इस पर बहस हो रही है और यह जो प्रोटेस्ट कर रही हैं इनका भी कहना है कि तार्किक बहस होनी चाहिए।&nbsp;</p><h2>आरक्षण पर बहस</h2><p>जेई परीक्षा में 2023 में जो एससी एसटी हैं उनका कट ऑफ 37 था और जनरल का 90 के करीब था। मतलब कि 90 से भी ज्यादा प्रतिशत तो जनरल कास्ट के लड़के हैं वो 90 नंबर लाकर भी सिलेक्ट नहीं हुए और जो दूसरे लड़के वो 38 नंबर लाकर सिलेक्ट हो गए। इसी तरह 2025 के नीट का एग्जाम का रिजल्ट तो आपको याद ही होगा जिसपर खूब बवाल मचा था। हुआ यह था कि -40 लाने वाले का सिलेक्शन हो गया था। -40 मतलब कोरा कागज भी अगर चुपचाप आप दे देते हैं फिर भी जीरो आते हैं। माइनस लाने के लिए आपको एक्स्ट्रा टैलेंट की जरूरत पड़ती है। जो कि नीट 2025 में हुआ था। रोहिणी कमीशन की रिपोर्ट कहती है कि 37% वैसी जातियां जो ओबीसी में डाल दी गई हैं उन्हें कभी ओबीसी का लाभ मिला ही नहीं। मतलब यह कि 2600 से ज्यादा जातियों को ओबीसी में डाला गया है। यानी किसी को कुछ नहीं मिल रहा तो ओबीसी में डाल दो। ओबीसी में इतने सारे लोगों को भर दिया गया है कि उनमें से आधे से ज्यादा लोगों ने कभी ओबीसी का लाभ ही नहीं उठाया। इसलिए जब कोई नेता बोले कि ओबीसी रिजर्वेशन बढ़ा देंगे तो क्योंकि ऑलरेडी 2600 जातियां है। 80 साल के आसपास होने जा रहे हैं इस रिजर्वेशन पॉलिसी के। 78 साल हो गए हैं। इस रिजर्वेशन पॉलिसी से देश के 20% दलित और 12% आदिवासियों में से कितने प्रतिशत को लाभ मिला है? भारत की कुल जनसंख्या का मात्र 3% टोटल सरकारी नौकरी है।&nbsp;</p><h2>E20 जनता पार्टी क्या है?</h2><p>E20 जनता पार्टी कोई आधिकारिक राजनीतिक दल या संस्था नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर छिड़ा एक डिजिटल अभियान है। इस मुहिम की शुरुआत उन वाहन चालकों और नागरिकों ने की है, जो E20 पेट्रोल (20% एथेनॉल ब्लेंडेड) के साथ-साथ 100% शुद्ध पेट्रोल की उपलब्धता की मांग कर रहे हैं। इस अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि सरकार E20 पेट्रोल की आपूर्ति भले जारी रखे, लेकिन पेट्रोल पंपों पर बिना एथेनॉल वाला सामान्य पेट्रोल भी मिलना चाहिए ताकि विकल्प चुनना ग्राहकों के हाथ में हो। सोशल मीडिया पर यह कैंपेन तेजी से ट्रेंड कर रहा है और लोग इससे जुड़ते जा रहे हैं। इनका तर्क सीधा है—E20 पेट्रोल उपलब्ध कराया जाए, लेकिन शुद्ध पेट्रोल का विकल्प बंद न हो, ताकि उपभोक्ता खुद तय कर सके कि उसकी गाड़ी के लिए क्या सही है। इस ऑनलाइन मुहिम को लोगों का लगातार समर्थन मिल रहा है।&nbsp;</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 14:22:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सोनम बेवफा निकले? बेपटरी हो रहा आंदोलन या कुछ और है वजह, वांगचुक के अनशन तोड़ने की इनसाइड स्टोरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/is-sonam-wangchuk-betray-what-really-happened-behind-the-scenes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज बात उस सवाल की, जिसने देश के लाखों छात्रों और युवाओं के दिल में एक कसक छोड़ दी है। लद्दाख के पर्यावरणविद सोनम वांगचुक जिन्होंने नीट (NEET) के छात्रों की आवाज़ बनकर 26 दिनों तक अन्न का एक दाना नहीं उठाया, जब उन्होंने मंत्रियों से मुलाकात के बाद अपना अनशन तोड़ा... तो जश्न की जगह सन्नाटा और सवालों का बवंडर खड़ा हो गया! अजीबोगरीब मोड़ देखिए जो लोग 26 दिन से सोनम वांगचुक को कोस रहे थे, आज वही उन्हें ‘महान’ और ‘समझदार’ बता रहे हैं।&nbsp; जो छात्र, जो समर्थक कल तक उनके नाम का नारा लगा रहे थे, आज वही दबी ज़ुबान में पूछ रहे हैं- सोनम सर, ये क्या कर दिया? क्या यह बेवफ़ाई है? तो आज सबसे बड़ा और कड़वा सवाल यही है-क्या सोनम वांगचुक ने छात्रों का भरोसा तोड़ा या फिर उन्होंने दूरदर्शिता और समझदारी दिखाई? क्या सोनम सच में बेवफ़ा हैं... या फिर आंदोलन की बाज़ी पलटने वाले सबसे समझदार खिलाड़ी? आइए, आज के एमआरआई में इसी गुत्थी की इनसाइड स्टोरी से पर्दा उठाते हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/government-should-speak-directly-to-us-cjp-leader-sourav-das-ready-for-meeting-jantar-mantar" target="_blank">Paper Leak Case: सरकार सीधे हमसे बात करे, Jantar Mantar पर मीटिंग के लिए तैयार CJP नेता Sourav Das</a></h3><h2>सीजेआई के व्यंग्य से उपजी पार्टी और उसका धरणा</h2><div>लोकतंत्र में प्रतिरोध का मतलब है अपने हक की लड़ाई के लिए आवाज उठाना। गलत के खिलाफ बोलना और देश चलाने का जिम्मा लेने वालों से जवाबदेही तलब करना। भारत का इतिहास ऐसे ही सफल जन आंदोलनों से लिखा गया है। आजादी की लड़ाई से लेकर 70 के दशक के जेपी मूवमेंट और फिर निर्भया आंदोलन तक हर बड़े बदलाव की नींव सड़क पर ही रखी गई है। जब देश का नौजवान सड़क पर उतरता है तो उसके सीने में सिस्टम के खिलाफ एक जायज आग होती है। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया कॉकरोच शब्द देते हैं। एक आदमी कॉकरोच के नाम से मीम पेज बनाता है। फॉर्म भरवाता है। इंडिया आता है। 4 500 700 लोग नजर आते हैं। आठ दिन बाद सोनम वांगचुक जैसा चेहरा आता है। एक मीम पेज Instagram पेज सडनली एक बड़ा आंदोलन बन जाता है। देश दुनिया में सबकी निगाहें जाती हैं। भीड़ बढ़ने जा लगती है। हालत यह होती है कि जनता सड़क से संसद जाने को तैयार हो जाती है। नीट परीक्षा में धांधली और पेपर लीक के सताए लाखों स्टूडेंट्स ने जब दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाला तो भारत के मुख्य न्यायाधीश के व्यंग से उपजी कॉकरोच जनता पार्टी यानी सीजेपी ने इस आंदोलन का नेतृत्व संभालने का जिम्मा लिया था। लोग समर्थन भी कर रहे थे और 20 जुलाई को जब चलो संसद का नारा सीजेपी लीडरशिप ने दिया तो देश भर से छात्र दिल्ली पहुंचे। तब तक भी आंदोलन में एक गजब की मासूमियत थी। बच्चे फूल बांट रहे थे।&nbsp;</div><h2>नीट पेपर लीक से सताए छात्रों को मिला आंदोलन का चेहरा</h2><div>अपनी मांगों को लेकर साफ शब्दों में गुजारिश कर रहे थे। यह सोचकर कि सरकार उनकी सुनेगी। लेकिन जुलाई के आखिरी हफ्ते तक आते-आते इस शांतिपूर्ण प्रतिरोध की तस्वीर अचानक बदल गई। पुलिस और छात्रों के बीच खूनी झड़पें हुई। मीडिया के कैमरे तोड़े गए और पुलिस की गाड़ियों पर तलवारें लहराई गई। सीजेपी का आंदोलन 6 जून को शुरू हुआ था। 28 जून को सोनम वांगचुक के अनशन पर बैठने के साथ ही इसे एक मजबूत नैतिक केंद्र मिल गया। लेकिन सरकार ने हफ्तों तक इन छात्रों की कोई सुध नहीं ली। कोई बातचीत का दरवाजा नहीं खोला गया। इसके उलट 18 जुलाई को पुलिस ने वाकचुक को जबरदस्ती उठाकर अस्पताल पहुंचा दिया। जब आप एक शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक मांग को पुलिस के बूटों तले कुचलने की कोशिश करते हैं तो सड़क पर गुस्सा फटना तय हो जाता है। 20 जुलाई को चलो संसद मार्च के दिन हालात बेकाबू हो गए। 1400 पुलिसकर्मियों की घेराबंदी, बैरिकेड्स और आंसू गैस के गोलों ने दिल्ली को छावनी में तब्दील कर दिया। दर्जनों छात्रों के सर फूटे। जब सत्ता संवाद के बजाय डंडे की भाषा बोलती है तो भीड़ का सब्र भी जवाब दे देता है।&nbsp;</div><h2>जब वांगचुक ने अपना अनशन तोड़ा</h2><div>23 जुलाई की आधी रात के कुछ देर बाद, वांगचुक ने 26 दिनों से चल रहा अपना अनशन खत्म किया। राजधानी के मेदांता अस्पताल का एक वीडियो दिखाता है कि यह सब कैसे हुआ। केंद्रीय मंत्री नड्डा और सिंह का हाथ थामे हुए वांगचुक ने कहा कि अपना अनशन खत्म करके मैं आभारी और खुश हूँ। धन्यवाद। फिर अपनी पत्नी की ओर मुड़कर उन्होंने कहा गीतांजलि हमेशा मेरे साथ रही हैं। मैं आपको धन्यवाद नहीं देना चाहता, बल्कि अपनी भावनाएं ज़ाहिर करना चाहता हूँ। बाद में जेपी नड्डा वांगचुक को सरकार के आश्वासन पढ़कर सुनाते हुए दिखे। मंत्री ने कहा कि सरकार दिल्ली के जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण विरोध करने वालों और 20 जुलाई, 2026 को संसद तक मार्च में शामिल होने वालों के खिलाफ़ केस दर्ज न करने को लेकर सकारात्मक है। सरकार पहले ही बातचीत के ज़रिए पेपर लीक और परीक्षाओं से जुड़े शिक्षा सुधारों का समाधान निकालने का भरोसा दे चुकी है। इसके अलावा, सरकार हाल ही में हुए NEET पेपर लीक के कारण आत्महत्या करने वालों के परिवारों को उचित मुआवज़ा देने पर भी सकारात्मक रूप से विचार कर रही है। खास बात यह है कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े का कोई ज़िक्र नहीं किया गया, जो 28 जून को भूख हड़ताल शुरू करते समय वांगचुक की शुरुआती मांग थी।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/passports-of-rioters-to-be-revoked-delhi-police-takes-a-tough-stance-amidst-cjp-protests" target="_blank">दंगा करने वालों का पासपोर्ट होगा रद्द! CJP प्रोटेस्ट के बीच दिल्ली पुलिस सख्त</a></h3><h2>आधी रात सरकार से क्या हुई बात</h2><div>इस प्रोटेस्ट को और ज्यादा मजबूती तब मिली जब सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट में शामिल हुए और उन्होंने भूख हड़ताल शुरू कर दी। एक तरह से कहें तो उस दिन के बाद सोनम वांगचुक इस प्रोटेस्ट की रीड बन गए थे। क्योंकि सोनम वांगचुक के जुड़ने के बाद वो लोग भी इस प्रोटेस्ट में आए जो दरअसल पर्यावरण को बचाने की देख रखते हैं। एक गंभीरता उन्होंने गंभीरता उन्होंने दे दी इस प्रोटेस्ट को। मगर लंबे वक्त के बाद अब लगभग 26 दिन के अनशन के बाद भूख हड़ताल के बाद। अब उन्होंने मतलब जूस पिया वो भी जेपी नड्डा के हाथ से।&nbsp; जेपी नड्डा के हाथ से इस इस वजह से जरूरी हो जाता है क्योंकि उसी सरकार के खिलाफ यह लोग लगातार आवाजें उठा रहे थे। इस मुलाकात का एक वीडियो जारी होता है। जिसमें स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा सोनम वांगचुक को जूस पिला रहे हैं। सिर्फ जेपी नड्डा ही वहां पर नहीं होते बल्कि सरकार की तरफ से प्रधानमंत्री कार्यालय में जो राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह की भी मौजूदगी होती है। सरकार ने बताने की कोशिश की कि पीएमओ से भी एक मिनिस्टर को भेजा गया है।&nbsp; जेपी नड्डा भी अंग्रेजी में अपनी बात रख रहे हैं और सोनम मानचुक भी अपनी बात को अंग्रेजी में ही रखा है। तो कुछ दो ढाई मिनट का वीडियो है। दोनों साइड्स का जहां वो सेटिस्फेक्शन खोजना चाहती थी वो आपको सुनने को मिल जाएगा। जेपी नड्डा भरोसा दिलाते हैं कि सरकार पॉजिटिव है। मतलब सरकार की नियत है कि जो जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट जो पीसफुल कर रहे थे उनके खिलाफ हम मुकदमा नहीं लिखने जा रहे हैं। उन्होंने कहा उन्होंने कहा कि हम पॉजिटिव हैं। मतलब हम यह करेंगे। उसके बाद उन्होंने कहा कि जिन्होंने 20 तारीख को मार्च किया उन पर भी मुकदमे या कोई पनिटिव एक्शन ना हो उसे लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। जेपी नड्डा ये भी कहते हैं कि जो विक्टिम ऑफ पेपर लीक जिन बच्चों ने अपना जीवन समाप्त किया नीट पेपर लीक होने के बाद में रीट से पहले 20 बच्चे हैं। उनके लिए सूटेबल कंपनसेशन को लेकर भी सरकार पॉजिटिव है। गौरतलब है कि सोनम वागंचुक ने पिछला खत लिखा था उसमें उन्होंने यही कहा था कि लगातार सत्ता के और विपक्ष के सांसद मुझसे संपर्क कर रहे हैं। आग्रह कर रहे हैं कि मैं अपना अनशन समाप्त कर दूं और मैं इस बारे में गंभीरता से सोचूंगा। मैं कर दूंगा यह। यदि सरकार पहले उन्होंने कहा पहले इस्तीफे की मांग की। फिर उसके बाद उन्होंने यह कहा कि यदि सदन में चर्चा हो जाए और मुझसे आकर के कोई अस्पताल में मिल ले। अब जो आखिरी हालिया खत था उसमें उन्होंने लिखा था कि यदि सरकार यह वादा कर दे कि जिन बच्चों ने आंदोलन किया है उन पर कोई मुकदमा नहीं किया जाएगा। उनको उस चीज के लिए सजा नहीं दिया जाएगा तो फिर मैं अनशन छोडूंगा। तो वो बातें&nbsp; होती दिख रही हैं।&nbsp;</div><h2>दोनों पक्षों ने एक दूसरे के पसंद की बात कर दी</h2><div>सोनम अंग्रेजी में वो भी कहते हैं कि मुझसे मुझे जानकर खुशी है कि सरकार और विपक्ष की ओर से यह आश्वासन मुझे दिया गया है कि जो नीट है और जो दूसरी मतलब शिक्षा से जुड़ी जो बाकी यंत्रणाएं हैं उनमें रिफॉर्म को लेकर और अकाउंटेबिलिटी एनश्योर करने के लिए या जो लैप्सेस हुए हैं उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए पार्लियामेंट के फ्लोर पर डिस्कशन होगा। फिर उसके बाद की तरफ से कहा ही जा रहा था। उसके बाद और बड़ी रोचक भाषा में उन्होंने कहा कि एट अ सूटेबल टाइम एक मुफीद वक्त पर जो आगे वो कहते हैं, आई एम नो वन टू डिक्टेट। मैं नहीं तय करूंगा वो। उसमें यह जो नीट वाला मामला हुआ है। उसमें शिक्षा मंत्रालय कंसर्न मिनिस्ट्री वो कह रहे हैं अकाउंटेबिलिटी इन द मिनिस्ट्री एंड द मिनिस्टर यानी कि मंत्री और मंत्रालय में जो लोग हैं उनकी जो जवाबदेही होगी उसको लेकर के कदम उठाए जाएंगे जो कि सरकार कंसीडर ही कर रही होगी। यानी जो सरकार की पहले ही मंशा है लेकिन सूटेबल टाइम और आई एम नो वन टू डिक्टेट। ये दो बातें कि सरकार को कोई ये डिक्टेट नहीं करेगा कि कब लेकिन उन्होंने कहा कि मुझे भरोसा दिलाया गया। फिर&nbsp; आगे वो कहते हैं फिर वो जो छात्रों से अपनी अपील करते हैं कि आप अभी संयम बना के रखें। हिंसा ना करें। उन्होंने कहा कि मैं हिंसा का समर्थन नहीं करता हूं। फिर उसके बाद उन्होंने ये भी कहा कि जो एंटी सोशल एलिमेंट्स हैं उनकी जो करतूतें हैं उनका समर्थन नहीं करता हूं।&nbsp; उन्होंने कहा कि जो मांग है उस पर जरूर ध्यान दिया जाए।&nbsp;</div><h2>एक्शन मोड में आए पीएम मोदी</h2><div>गुरुवार रात 11:52 बजे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सेल्फी वीडियो संदेश पोस्ट करके सीधा छात्रों से संपर्क साधा और NEET पेपर लीक विवाद के बीच उन्हें आश्वासन दिया कि सरकार उनके साथ खड़ी है। यह स्वीकार करते हुए कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है, उन्होंने कड़ी कार्रवाई का वादा किया। इसमें शुक्रवार को कैबिनेट द्वारा एक प्रस्तावित कानून पर निर्णय लेना भी शामिल है, जिसमें परीक्षा में धांधली करने वालों के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों और कड़े दंड का प्रावधान है। प्रधानमंत्री का यह प्रयास उनके संचार के पारंपरिक तरीके से काफी अलग था। किसी आधिकारिक स्थान से टीवी पर दिए जाने वाले संबोधन के बजाय, मोदी ने तीन मिनट से भी छोटा सेल्फी वीडियो चुना—जो विशेष रूप से युवाओं और डिजिटल-फ़र्स्ट दर्शकों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया प्रतीत होता है। छात्रों को दोस्तों कहकर संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मैं जानता हूं कि पेपर लीक कोई मामूली मुद्दा नहीं है। इससे लाखों छात्रों और उनके माता-पिता को भारी कष्ट हुआ है। इसीलिए, पेपर लीक की घटना के बाद से पिछले ढाई महीनों में कई कदम उठाए गए हैं। दोषियों को गिरफ्तार कर लिया गया है और वे अब जेल में हैं। पीएम मोदी ने कहा कि सरकार केवल इतनी कार्रवाई से संतुष्ट होने वाली नहीं है। उन्होंने बताया कि आज उन्होंने संबंधित विभागों को पेपर लीक मामलों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाने के निर्देश दिए थे। विभागों ने लगातार मेहनत करके देर रात इसका मसौदा तैयार कर उन्हें सौंप दिया है।</div><h2>क्या सच में बेपटरी हो रहा आंदोलन</h2><div>जब आंदोलन सड़क पर पुलिस से भिड़ने लगता है, वही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी भी बन जाता है। महात्मा गांधी ने चौराचोरी की हिंसक घटना के बाद अपना पूरा असहयोग आंदोलन ही वापस ले लिया था। क्योंकि वह जानते थे कि हिंसा से हासिल की गई जीत कभी स्थाई नहीं होती। यहां हमें यह भी समझना होगा कि महात्मा गांधी ने जब साल 1917 में चंपारण सत्याग्रह किया या फिर साल 1920 में असहयोग आंदोलन तो इन बड़े आंदोलनों से लगभग एक दशक पहले उन्होंने अपने समर्थकों को अहिंसक आंदोलन के लिए तैयार करना शुरू कर दिया था। साल 1909 में उनकी किताब हिंस स्वराज छपी थी। जिसमें उन्होंने अहिंसक आंदोलन की वकालत की थी और जब वह आंदोलन करने उतरे तो उनके समर्थकों के लिए अहिंसा का विचार कोई नया नहीं था। लेकिन सीजेपी के मामले में कहानी थोड़ी अलग है क्योंकि उनके आंदोलन में अहिंसा की ऐसी कोई वैचारिक पृष्ठभूमि मौजूद नहीं है और यह बात सिर्फ आंदोलन करने वाले युवाओं पर ही नहीं इस आंदोलन के अगवा माने जाने वाले लड़कों पर भी लागू होती है। महात्मा गांधी सत्य पर भी उतना ही जोर देते थे और सीजेपी के प्रोटेस्ट में भी यह फर्क तब दिखता है जब इनके लीडर्स एक तरफ कहते हैं कि वह इस मंच को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनने देंगे। लेकिन बाद में तमाम विपक्षी नेता उनके ही मंच से अपना स्कोर सेटल करते नजर आते हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 14:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/is-sonam-wangchuk-betray-what-really-happened-behind-the-scenes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या प्रदर्शन में अपनी पहचान छिपा सिविल ड्रेस में तैनात हो सकते हैं पुलिसकर्मी,  SC के फैसले और कानून में 'Police Identity' पर क्या है नियम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/can-police-personnel-be-deployed-in-plainclothes-concealing-their-identity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली का जंतर-मंतर, गूंजते नारे और शिक्षा मंत्री के इस्तीफे पर अड़ा विपक्ष... लेकिन इस विरोध प्रदर्शन के बीच अब खाकी खुद कटघरे में खड़ी हो गई है। NEET पेपर लीक मामले में CJP के उग्र प्रदर्शन के दौरान 'सादे कपड़ों' और 'बिना नाम की पट्टियों' वाले पुलिसकर्मियों पर प्रदर्शनकारियों को बर्बरता से निशाना बनाने के गंभीर आरोप लगे हैं। सोशल मीडिया पर घिरने के बाद दिल्ली पुलिस मुख्यालय को बैकफुट पर आना पड़ा और 22 जुलाई को एक बड़ा फरमान जारी करना पड़ा कि प्रोटेस्ट साइट पर तैनात सभी जवान अनिवार्य रूप से अपनी पूरी वर्दी में रहेंगे। सवाल यह है कि क्या यह फैसला खाकी पर उठे सवालों को दबा पाएगा?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/turmoil-in-stock-market-and-rising-crude-oil-prices-rupee-slides-to-a-low-of-9659-against-dollar" target="_blank">Share Market में कोहराम और Crude Oil के बढ़ते दाम, Dollar के मुकाबले 96.59 के रिकॉर्ड स्तर पर लुढ़का रुपया</a></h3><h2>CJP के विरोध प्रदर्शन के दौरान क्या हुआ?</h2><div>NEET पेपर लीक और शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) की ओर से आयोजित विरोध प्रदर्शन सोमवार को उम्मीद से कहीं ज़्यादा बड़ा हो गया। जब भीड़ संसद की ओर बढ़ी, तो पुलिस ने लाठीचार्ज किया, जिससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। पुलिस और भीड़ में शामिल लोगों, दोनों को चोटें आईं। एक प्रदर्शनकारी अभी भी ICU में है। शाम तक सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो में सादे कपड़ों में कुछ अनजान लोग पुलिस वाली लाठियां लिए प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखे। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सोशल मीडिया पर दिल्ली पुलिस से सवाल किया, सादे कपड़ों में लाठी लिए ये गुंडे कौन हैं? हमें पीटने के लिए आपने किसे काम पर रखा है? कुछ और वीडियो में वर्दी पहने दिल्ली पुलिस और RAF के जवान बिना नेमप्लेट के दिखाई दिए। इन क्लिप्स में प्रदर्शनकारी अधिकारियों की वीडियो बनाते हुए उनसे पूछ रहे हैं, आपकी नेमप्लेट कहाँ है? प्लीज़ हमें जवाब दें, जबकि जवान कोई जवाब नहीं दे रहे हैं। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों या वीडियो पर सार्वजनिक रूप से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है। लेकिन 'द इंडियन एक्सप्रेस' को पता चला है कि फ़ोर्स ने निर्देश जारी किए हैं कि जंतर-मंतर पर तैनात सभी जवान वर्दी में ही रिपोर्ट करें, न कि आम कपड़ों में।&nbsp;</div><h2>दिल्ली पुलिस ने क्या आदेश जारी किया है?</h2><div>बुधवार शाम को, दिल्ली पुलिस ने विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात सभी कर्मचारियों को यूनिफॉर्म में ड्यूटी पर आने का निर्देश दिया।</div><div>अधिकारियों के मुताबिक, यह निर्देश सभी संबंधित यूनिट्स को दिया गया था, जिसमें अधिकारियों और कर्मचारियों से कहा गया कि वे विरोध प्रदर्शन वाली जगह पर कानून-व्यवस्था से जुड़ी ड्यूटी के दौरान यूनिफॉर्म पहनें। ये निर्देश तब आए जब सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हुए, जिनमें सादे कपड़ों में कुछ लोग सोमवार (20 जुलाई) को संसद तक मार्च के दौरान पुलिस की लाठियां लिए हुए प्रदर्शनकारियों पर हमला करते दिखे। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए दिल्ली पुलिस से सवाल किया सादे कपड़ों में लाठियां लिए ये गुंडे कौन हैं? हमें पीटने के लिए आपने किसे काम पर रखा है?एक और घटना में, कैमरे पर एक पत्रकार के साथ सादे कपड़ों में एक व्यक्ति मारपीट करता हुआ दिखाई दिया, जबकि दिल्ली पुलिस का एक हवलदार भी वहां मौजूद था। वह व्यक्ति सादे कपड़ों में था और उसने अपनी पहचान बताने या यह बताने से इनकार कर दिया कि वह किस अधिकार के तहत ऐसा कर रहा था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/jordan-shoots-down-iranian-missiles-in-aqaba-heightened-tension-in-region-following-us-strikes" target="_blank">West Asia Crisis: Jordan ने Aqaba में मार गिराईं Iranian Missiles, US Strikes के बाद क्षेत्र में भारी तनाव</a></h3><h2>क्या अपनी पहचान छिपाना कानूनी है?</h2><div>हालांकि कुछ खास ऑपरेशन, जैसे कि खुफिया जानकारी जुटाने के काम में, पहचान छिपाने या किसी और का रूप धरने की असल में ज़रूरत होती है, लेकिन आम पुलिसिंग कानूनी प्रक्रियाओं और अदालती दिशानिर्देशों के आधार पर की जाती है। सार्वजनिक व्यवस्था और शांति बनाए रखने के नियम BNSS के चैप्टर XI (धारा 148 से 160, जो पहले CrPC का चैप्टर X था) में दिए गए हैं। हालांकि, इसमें साफ़ तौर पर यह नहीं बताया गया है कि कानून-व्यवस्था की स्थिति के दौरान पुलिसकर्मियों या सशस्त्र बलों के जवानों को अपनी पहचान बतानी ज़रूरी है या नहीं, लेकिन सूत्रों का कहना है कि कानून के तहत सिर्फ़ मजिस्ट्रेट या "पुलिस अधिकारी" ही भीड़ को तितर-बितर कर सकते हैं, जिससे उनकी पहचान ज़ाहिर होती है। तर्क यह है कि हथियारों से लैस अज्ञात लोगों की भीड़ कानूनी तौर पर किसी सार्वजनिक सभा को तितर-बितर होने के लिए नहीं कह सकती। दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाले एक क्रिमिनल लॉयर ने कहा कि अगर किसी पुलिस अधिकारी की पहचान नहीं हो पा रही है, तो भीड़ को तितर-बितर करने का उसका आदेश कानूनी रूप से मान्य नहीं होगा। डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ्तारी और हिरासत के लिए विस्तृत सुरक्षा उपाय तय किए थे। इनमें यह शर्त भी शामिल थी कि गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी की पहचान साफ ​​और आसानी से दिखने वाली होनी चाहिए। हालांकि यह फैसला गिरफ्तारी से जुड़ा था, न कि भीड़ को काबू करने से, लेकिन वकीलों का कहना है कि यह ज़बरदस्ती वाली शक्तियों का इस्तेमाल करते समय पुलिस अधिकारियों की पहचान ज़ाहिर होने पर न्यायपालिका के व्यापक ज़ोर को दिखाता है। अगस्त 2025 में आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने YSRCP विधायक नल्लापारेड्डी प्रसन्ना कुमार रेड्डी की याचिका पर सुनवाई करते हुए सवाल उठाया कि नागरिकों से यह कैसे उम्मीद की जा सकती है कि वे सादे कपड़ों में मौजूद कर्मियों को पुलिस अधिकारी के तौर पर पहचानें, जबकि वे अपनी सरकारी ड्यूटी कर रहे हों। रेड्डी, जिन पर पुलिस अधिकारी को ड्यूटी करने से रोकने का आरोप था, ने तर्क दिया था कि पुलिस अधिकारी वर्दी में नहीं थे।&nbsp;</div><h2>तो फिर पुलिस अपनी पहचान उजागर करने से क्यों बचती है?</h2><div>पुलिस अधिकारियों का तर्क है कि सार्वजनिक रूप से पहचान उजागर करने से कर्मियों को लंबे समय तक कानूनी कार्यवाही, ऑनलाइन उत्पीड़न और यहां तक ​​कि उनके परिवार को भी धमकियों का सामना करना पड़ सकता है। दिल्ली पुलिस के एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि यह चलन जम्मू-कश्मीर, पंजाब और छत्तीसगढ़ जैसे संघर्ष वाले इलाकों से शुरू हुआ, जहाँ सुरक्षाकर्मी अक्सर नेमप्लेट या रैंक का निशान लगाने से बचते थे क्योंकि इससे उग्रवादियों के लिए उन्हें निशाना बनाना आसान हो सकता था। समय के साथ, ऐसा लगता है कि यह आम पुलिसिंग में भी शामिल हो गया है। उन्होंने आगे कहा कि हालाँकि सुरक्षा से जुड़ी असाधारण स्थितियों में यह चलन समझ में आता है, लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की सामान्य ड्यूटी में इसे लागू करना विवाद का विषय बना हुआ है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Jul 2026 13:59:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/can-police-personnel-be-deployed-in-plainclothes-concealing-their-identity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Iran के सपोर्ट में उतरे ऐसे खतरनाक लड़ाके, Bab-Al-Mandeb बंद,  MBS को अमेरिका बचा पाएगा? ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/formidable-fighters-rally-in-support-of-iran-bab-el-mandeb-shut-dow]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>13 जुलाई 2026 को एक हवाई जहाज तेहरान से उड़ान भरकर यमन की तरफ बढ़ रहा था। उस हवाई जहाज में इंसार अल्लाह यानी हूती विद्रोहियों के अधिकारी सवार थे। ये अधिकारी ईरान में अयातुल्लाह अली खामनेई के जनाजे से लौट रहे थे। 13 जुलाई की शाम को जब प्लेन सना इंटरनेशनल एयरपोर्ट पर उतरने ही वाला था कि तभी रनवे पर धड़ाधड़ कई मिसाइलें दागी गई। पूरा रनवे तबाह हो गया। ऐसे रनवे पर प्लेन का लैंड होना मुमकिन नहीं था। इसलिए आनन-फानन में प्लेन की डायरेक्शन मोड़ी गई और उसे सना की बजाए यमन के एक अन्य हवाई अड्डे हुदैदा में उतारा गया। हूती अधिकारी सुरक्षित अपने देश पहुंच चुके थे। लेकिन इस घटना ने ये सवाल खड़ा कर दिया था कि आखिर प्लेन की लैंडिंग के कुछ देर पहले किसने रनवे में हमला करवाया होगा। इसके पीछे क्या वजह रही होगी। हूतियों ने इसकी जांच की तो पता चला की इसके पीछे सऊदी अरब का हाथ है। ये पता चलने के फौरन बाद हूतियों ने सऊदी अरब पर हमला बोल दिया। सऊदी अरब के अभा एयरपोर्ट को निशाना बनाया गया। सऊदी अरब ने इस हमले की निंदा करते हुए बदला लेने की बात कही। लेकिन फिर कोई हमला सऊदी की तरफ से नहीं किया गया। हूती विद्रोहियों की तरफ से कहा गया कि अगर सऊदी ने कोई हमला किया तो उसके तेल भंडार और बंदरगाहों को तबाह कर दिया जाएगा। कई दिनों तक सऊदी और हूती एक दूसरे को धमका रहे थे। लेकिन 20 जुलाई को हूतियों ने ऐसा ऐलान कर दिया है, जिसने मोहम्मद बिन सलमान की नींद जरूर उड़ा दी होगी।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/major-meeting-between-s-jaishankar-and-marco-rubio-in-manila" target="_blank">Manila में S Jaishankar और Marco Rubio की बड़ी बैठक: Trade, Tariffs और AI पर बनी नई रणनीति</a></h3><h2>&nbsp;बाब अल-मंदेब बंद!</h2><p>हूती सेना के प्रवक्ता या सारी ने 20 जुलाई को ऐलान किया कि वह सऊदी अरब के खिलाफ मेरिटाइम एंबागो लगाने जा रहे हैं। यानी उनके समुद्री व्यापार पर पूरी तरह से रोक लगा देंगे। इसके तहत हूती लाल सागर और अदन की खाड़ी को जोड़ने वाले बाब अल-मंदेब बंद करने की कोशिश करेंगे। हूतियों का कहना है कि वो सऊदी की तरफ से यमन पर लगाए गए ब्लॉकेड के जवाब में यह ब्लॉकेड लगा रहे हैं। यह भी स्ट्रीट ऑफ हॉर्मोस की तरह ही एक अहम ग्लोबल शिपिंग पॉइंट है। दुनिया का लगभग 15% समुद्री व्यापार इसी रास्ते से होकर गुजरता है। हुतियों ने अभी केवल सऊदी के जहाजों पर रोक लगाने का ऐलान किया है। बाकी किसी जहाज पर कोई भी पाबंदी नहीं है। पर इसका असर पूरी दुनिया पर पड़ना तय है। स्टेट ऑफ फार्मर्स बंद होने के बाद सऊदी अरब के तेल एक्सपोर्ट के लिए बाब अल-मंदेब अहम रास्ता बन गया था। ऐसे में अगर सऊदी का व्यापार वहां से रुकता है तो तेल की सप्लाई में और भी ज्यादा कमी आ जाएगी। न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक बाबल मंदीप स्टेट को पूरी तरह बंद करने से ग्लोबल तेल सप्लाई 7% तक कम हो जाएगी। इस बीच अमेरिका ने पहली बार ईरान के साथ दोबारा शुरू हुई झड़प में घायल हुए सैनिकों की जानकारी दी है। अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने बताया कि 7 जुलाई से अब तक लगभग 100 सैनिक घायल हुए हैं। पेंटागन ने अमेरिकी मीडिया की ओर से घायल सैनिकों की जानकारी छिपाए जाने के आरोप के बाद यह जवाब दिया है। मीडिया में कहा जा रहा था कि सरकार ना तो अपने बुलेटिन में घायल सैनिकों की जानकारी दे रही है और ना ही यह बता रही है कि कितने हथियार खर्च किए हुए हैं। पेंटागन ने इन आरोपों से इंकार किया है। कहा है कि हाल में घायल सैनिकों में से अधिकतर को मामूली चोटें आई थी। 96% से ज्यादा सैनिक सर्विस पर वापस लौट भी आए हैं।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/high-level-meeting-amidst-iran-tensions-doval-holds-secret-meeting-with-saudi-arabia" target="_blank">Iran से बवाल के बीच बड़ी बैठक, सऊदी के साथ डोभाल ने की सीक्रेट मीटिंग</a></h3><h2>सऊदी के लिए लाल सागर इतना महत्वपूर्ण कैसे हो गया?</h2><p>ईरान युद्ध के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य में रुकावटों के बाद, सऊदी अरब ने अपने कच्चे तेल के निर्यात का ज़्यादातर हिस्सा फारस की खाड़ी से हटाकर लाल सागर की ओर मोड़ दिया। अब सऊदी अरामको के कच्चे तेल के निर्यात का 70 प्रतिशत से अधिक हिस्सा देश के भीतर 746 मील लंबी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के ज़रिए पहुँचाया जाता है। यह पाइपलाइन तेल उत्पादन वाले अबकैक और घावर जैसे पूर्वी क्षेत्रों को यानबू में स्थित लाल सागर के निर्यात टर्मिनल से जोड़ती है। इस बदलाव ने यानबू को सऊदी अरब का मुख्य एक्सपोर्ट हब बना दिया है। हाल के शिपिंग डेटा से पता चलता है कि यानबू से एक्सपोर्ट हाल के हफ़्तों में औसतन लगभग 4 मिलियन बैरल प्रति दिन रहा है, जबकि एक साल पहले यह लगभग 973,000 बैरल प्रति दिन था। जून तक, कुछ अनुमानों के अनुसार यानबू से कच्चे तेल का एक्सपोर्ट रिकॉर्ड 4.77 मिलियन बैरल प्रति दिन तक पहुँच गया। यूरोप जाने वाले सऊदी टैंकर स्वेज नहर से होते हुए उत्तर की ओर जाते हैं, जबकि एशियाई बाज़ारों के लिए जाने वाले कार्गो बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होते हुए दक्षिण की ओर जाते हैं। होर्मुज़ जलडमरूमध्य में पहले से ही रुकावटें होने के कारण, रेड सी दुनिया भर में तेल की सप्लाई बनाए रखने के लिए सऊदी अरब का मुख्य वैकल्पिक रास्ता बन गया है। खबर है कि सऊदी अरब इस वैकल्पिक एक्सपोर्ट कॉरिडोर को मज़बूत करने के लिए रेड सी तट तक अपने पाइपलाइन नेटवर्क का विस्तार करने पर भी विचार कर रहा है।</p><h2>क्यों है बाब अल मंदेब का अहम</h2><p>इस रास्ते का महत्व आज का नहीं है। करीब 3000 साल पहले भी मिस्र, अरब, भारत और पूर्वी अफ्रीका के बीच जो मसालों, सोना, लोबान और रेशम का जो व्यापार था इसी समंदर के रास्ते से होता था। बाद में रोमन साम्राज्य, अरब व्यापारियों, उस्मानी साम्राज्य और फिर यूरोपीय औपनिवेशिक शक्तियों ने भी इसी रास्ते का इस्तेमाल किया था। लेकिन जब 1869 में स्वेज नहर खुली तब बाबल मंदब की जो भूमिका थी वो और बढ़ गई। इसकी अहमियत और बढ़ गई और फिर इसे समुद्री बहुत इंपॉर्टेंट महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में दुनिया के गिना जाने लगा। इसकी ये वजह थी क्योंकि अब जहाजों को अफ्रीका का चक्कर लगा के नहीं जाना पड़ता था और एशिया से यूरोप की जो दूरी थी वो हजारों किलोमीटर कम हो गई थी। आज इसी रास्ते से दुनिया का लगभग 10 से 12% समुद्री व्यापार गुजरता है। ओआरएफ की रिपोर्ट में जिक्र मिलता है कि हर साल यहां से एक ट्रिलियन डॉलर का सामान गुजरता है। भारतीय रुपयों में यह रकम करीब ₹87 लाख करोड़ की होती है। अगर तेल और गैस को भी इसमें जोड़ दिया जाए तो यह रकम और ज्यादा हो जाएगी। सामान्य परिस्थितियों में जैसे 2023 में हम देखते हैं गजा वॉर के पहले यहां से लगभग 93 लाख बैरल प्रतिदिन कच्चा तेल और पेट्रोलियम के जो प्रोडक्ट्स थे वो इसी रास्ते से गुजरते थे। लेकिन हूती विद्रोहियों ने गजा में इसराइली हमलों के विरोध में यहां से गुजरने वाले जहाजों पर हमला शुरू कर दिया।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/several-of-trump-drones-and-fighter-jets-destroyed-india-takes-major-action-in-iran" target="_blank">ट्रंप के कई ड्रोन, लड़ाकू विमान तबाह, ईरान में भारत का बड़ा एक्शन</a></h3><h2>कौन-कौन से देश अपना सामान भेजते हैं?&nbsp;</h2><p>चीन इस रास्ते का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करता है। चीन से यूरोप जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, कंप्यूटर, सोलर पैनल, मशीनें, खिलौने सब यहीं से जाते हैं। यूरोप भी एशियाई देशों को यहीं से सामान बेचता है। महंगी महंगी यूरोपियन कंपनी की जो कारें हैं, विमान के पुरजे हैं, मशीनें हैं, लग्जरी सामान हैं वो सब यहीं से होकर गुजरता है। सोचिए इतना जरूरी रास्ता है यह। और इसी रास्ते पर अब सऊदी अरब के जहाजों को उड़ाने की धमकी मिल रही है। अगर एक भी सऊदी अरब के जहाज को होती सक्सेसफुली टारगेट कर लेते हैं तो दूसरे जहाज भी यहां से गुजरने से डरेंगे और करोड़ों डॉलर का व्यापार ठप्प पड़ सकता है। इस इस वजह से सऊदी अरब औरतियों के बीच पिछले 4 साल से एक सीज फायर चल रहा था।&nbsp;</p><h2>हूती गुट की नाकेबंदी से तेल की सप्लाई में कैसे रुकावट आ सकती है?</h2><p>हालांकि हूथियों ने यह साफ़ नहीं किया है कि वे अपनी समुद्री नाकेबंदी को असल में कैसे लागू करेंगे, लेकिन इस घोषणा से यह डर बढ़ गया है कि लाल सागर से गुज़रने वाले कमर्शियल जहाज़ एक बार फिर हमले का निशाना बन सकते हैं। बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य लाल सागर का दक्षिणी प्रवेश द्वार है और यह दुनिया के सबसे अहम समुद्री 'चोकपॉइंट' (संकरे और रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते) में से एक है। अगर इसे बंद किया जाता है या इसमें लंबे समय तक रुकावट आती है, तो एक अभूतपूर्व स्थिति पैदा हो जाएगी जिसमें होर्मुज जलडमरूमध्य और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य, दोनों पर एक साथ पाबंदियां लग जाएंगी। यानबू से एशिया तक कच्चा तेल ले जाने वाले टैंकरों के लिए बाब अल-मंदेब से गुज़रना ज़रूरी है। इस रास्ते पर होदेइदाह और अदन की खाड़ी के पास काम कर रही हूथी एंटी-शिप मिसाइलों, बैलिस्टिक मिसाइलों, ड्रोन और बिना चालक वाले समुद्री जहाजों से खतरा हो सकता है। यहाँ तक कि स्वेज नहर के ज़रिए यानबू से उत्तर की ओर यूरोप जाने वाले जहाजों को भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता, क्योंकि लाल सागर के अंदर शिपिंग लेन या तेल से जुड़े बुनियादी ढांचे पर संभावित हमलों की चिंता बनी हुई है। एक और चिंता यानबू शहर के सुरक्षित न होने की है। यह बंदरगाह हूथी-कब्जे वाले उत्तरी यमन से लगभग 800 मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है और 2022 के समझौते से पहले हूथी हमलों का शिकार हो चुका है। जानकारों का कहना है कि अगर स्टोरेज टैंक, लोडिंग टर्मिनल या पंपिंग स्टेशन पर लंबी दूरी के ड्रोन या मिसाइल से सफल हमले होते हैं, तो सऊदी के एक्सपोर्ट के काम पर सीधा असर पड़ सकता है। अगर इंश्योरेंस प्रीमियम बढ़ते रहे या इंश्योरेंस कंपनियां युद्ध के जोखिम का कवरेज पूरी तरह से बंद कर दें, तो शिपिंग कंपनियां ज़्यादा जोखिम वाले इलाकों में अपने जहाज़ भेजने से हिचकिचा सकती हैं। ऐसी स्थिति में कई जहाज़ों को रेड सी के बजाय केप ऑफ़ गुड होप होते हुए अफ्रीका का चक्कर लगाकर जाना पड़ सकता है।</p><h2>क्या अमेरिका देगा साथ</h2><p>हूतियों से अकेले उलझना सऊदी अरब के लिए इस बार मुश्किल होगा। ऊपर से इस बात में भी संशय बना हुआ है कि क्या मुसीबत की घड़ी में अमेरिका उसे बचाने आएगा? सऊदी अरब को बचाने आएगा? क्योंकि हॉर्मूस खोलने की मुहिम में तो सऊदी अरब ने अमेरिका को ऐन वक्त में धोखा दे दिया था। उसे अपने एयरबेस का इस्तेमाल नहीं करने दिया था। जिसकी वजह से अमेरिका का पूरा का पूरा ऑपरेशन ही फेल हो गया था। ऐसे में देखना होगा कि सऊदी अरब इस समस्या को कैसे सुलझाता है।&nbsp;&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 14:03:49 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[देश के 22 करोड़ मुसलमान अब करेंगे चुनाव का बहिष्कार? ओवैसी-खुर्शीद-मदनी समेत मुस्लिम नेताओं  के 24 जुलाई को दिल्ली वाली बैठक का एजेंडा क्या है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-country-220-million-muslims-now-boycott-the-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली की सियासत में इन दिनों दो अलग-अलग मोर्चों पर बड़ी हलचल देखने को मिल रही है। एक तरफ जहां 'कॉकरोच जनता पार्टी' (सीजेपी) के बैनर तले युवाओं और छात्रों का प्रदर्शन सड़क पर उग्र रूप ले रहा है और सरकार के खिलाफ तीखी नारेबाजी हो रही है, वहीं दूसरी तरफ अंदरखाने एक अलग ही राजनीतिक रणनीति तैयार की जा रही है। प्रमुख मुस्लिम नेताओं और धर्मगुरुओं की अगुवाई में एक ऐसा एजेंडा आकार ले रहा है, जिसकी गूंज आने वाले दिनों में देश की सियासत को गरमा सकती है।&nbsp; सवाल यह उठ रहा है कि क्या एक तरफ छात्रों के आंदोलन और दूसरी तरफ इस नई गोलबंदी के बीच लोकतंत्र की आड़ में सरकार पर दबाव बनाने या कोई नया मोर्चा खोलने की तैयारी है? क्या यह सब महज संयोग है या लोकतांत्रिक व्यवस्था के तहत सरकार पर चौतरफा दबाव बनाने की कोई बड़ी पटकथा? आइए समझते हैं राजधानी दिल्ली में बन रहे इस नए सियासी समीकरण का पूरा गणित। दरअसल इंडियन मुस्लिम फॉर सिविल राइट्स यानी आईएमसीआर नामक संगठन ने आगामी 24 जुलाई को दिल्ली में एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बैठक का ऐलान कर दिया है। इस बैठक में मुस्लिम समुदाय की कई बड़ी और जानीमानी हस्तियों के छूटने की खबर है। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस मंच पर कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद और एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी समेत कई राजनीतिक दलों के मुस्लिम सांसद एक साथ नजर आएंगे। यानी मंच बड़े लेवल पर सजाया जाएगा। इतना ही नहीं जमात इस्लामी, जमात अहले हदीस और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल अवार्ड जैसे प्रभावशाली संगठनों के नुमाइंदे भी इस चर्चा का हिस्सा बनने जा रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk" target="_blank">पिता का अनशन तुड़वाने दिल्ली से खुद इंदिरा चलकर आईं, क्या है सोनम वांगचुक का असली सच?</a></h3><h2>क्यों हुलाया गया सम्मेलन</h2><div>यह कोई आम सम्मेलन नहीं है बल्कि यह सम्मेलन इसलिए बुलाया गया है ताकि देश के मुसलमानों को लोकतंत्र के खिलाफ खड़ा किया जा सके। करोड़ों मुसलमानों को चुनाव के बहिष्कार के लिए उकसाया जा सके। आप सोच रहे होंगे कि आखिर मुसलमानों के बड़े ठेकेदार रहनुमा इकट्ठा होकर क्या करने वाले हैं? क्या भारत के खिलाफ मोदी सरकार के खिलाफ कोई बड़ी साजिश रचने की प्लानिंग हो रही है? दरअसल बैठक के आधिकारिक एजेंडे में मदरसे पर होने वाली प्रशासनिक कारवाई, समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी और मुस्लिम समुदाय से जुड़े अन्य मुद्दे बुलडोजर एक्शन को शामिल किया गया है। लेकिन इस पूरे सम्मेलन में जो बात सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है और जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाली है वो है चुनाव का बहिष्कार।&nbsp; चुनाव का बहिष्कार। अब सवाल यह है कि कौन करने वाला है चुनाव का बहिष्कार? क्या मुस्लिम अब वोट नहीं डालेंगे? संगठन की ओर से यह संकेत दे दिए गए हैं कि इस बैठक में महात्मा गांधी के ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन की तर्ज पर मुस्लिम समुदाय के जरिए चुनावी प्रक्रिया का पूरी तरह से बहिष्कार करने की रणनीति पर चर्चा की जाएगी। कभी सोचा है कि जब से मोदी सरकार सत्ता में आई है तब से सबसे ज्यादा तकलीफ किसे हो रही है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro" target="_blank">120 इस्तीफे...एक्शन में आई सरकार, ISRO में भगदड़ क्यों मची है? भारत की 'स्पेस मिस्ट्री' का MRI स्कैन</a></h3><h2>मसलमान करेंगे चुनाव का बहिष्कार?</h2><div>विपक्षी दलों को और उनसे भी ज्यादा मुसलमानों को, मौलानाओं को जिनकी दुकान पर हथौड़ा चल रहा है। वही बार-बार चिल्लाते हैं, बैठक बुलाते हैं, माहौल गरमाते हैं। किसी ना किसी बहन मुसलमानों को इकट्ठा कर सरकार के खिलाफ भड़काने की कोशिश में लग जाते हैं। अब देखिए ना यह जो बैठक बुलाई जा रही है, इसमें क्या मुद्दे उठाए जा रहे हैं। गौर से सुनिए। मदरसों पर चल रहे बुलडोजर एक्शन। बुलडोजर एक्शन मजहब देखकर नहीं बल्कि अवैध चीजें देखकर किया जा रहा है। फिर चाहे उसकी जद में मस्जिद आए या फिर मंदिर आए। दस्तावेज है तो बच जाएंगे। नहीं है अवैध है तो जाहिर सी बात है बुलडोजर की जद में जाएंगे। लेकिन इस चीज से ना तो हिंदुओं को दिक्कत है। इस चीज से ना तो अवैध कारनामे जो कर रहे हैं उन्हें दिक्कत हो रही है। लेकिन दिक्कत किसे हो रही है?&nbsp; देश भर में यूसीसी कानून का भी मुसलमान ही विरोध कर रहे हैं। जब एक देश है तो सभी धर्मों के लिए एक कानून क्यों नहीं हो सकता? जबकि इस कानून से बेटियों को उनका हक मिल रहा है। तलाक शादी के नियम बन रहे हैं। कुप्रथाएं बंद हो रही हैं। लेकिन फिर भी चंद मुसलमानों को दिक्कत है। सिर्फ इतना ही नहीं। अब उत्तराखंड में मदरसा बोर्ड के खत्म करने पर ही आ जाते हैं। क्या कोई बच्चा धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ बाकी शिक्षा ग्रहण करेगा? डॉक्टर इंजीनियर बनेगा तो किसी को तकलीफ होगी? नहीं। जाहिर सी बात है नहीं होगी। फिर इस चीज से चंद मुसलमानों को तकलीफ क्यों हो रही है?&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines" target="_blank">रूस-भारत की परमाणु साझेदारी में सेंध? क्यों कुडनकुलम फिर से सुर्खियों में है</a></h3><h2>क्या हो सकता है इसका असर</h2><div>अगर सरकार निशाना बनाती या फिर अनदेखी करती हर चीज की सुविधा ना मिलती। बोलने की आजादी ना मिलती। हर चीज का तो हक मिल रहा है। अब देखिए ना इसी तकलीफ को लेकर मुसलमानों के ठेकेदार मंच सजा रहे हैं और मुसलमानों को ही भड़काने के लिए साजिश रचते नजर आ रहे हैं। जब कहीं मुसलमानों को भड़काकर देश के लोकतंत्र के खिलाफ किया गया कोई विरोध प्रदर्शन खड़ा किया जाता है तो उसका कितना नेगेटिव असर हुआ है चलिए इस पर भी आ जाते हैं। आयोजकों का सीधा-सीधा तर्क है। राजनीतिक दलों के जरिए मुसलमानों की लगातार की जा रही अनदेखी के विरोध में यह कदम उठाया जा सकता है। लेकिन यहां एक बड़ा और बुनियादी सवाल खड़ा होता है कि क्या इस तरह की अपीलों से देश का ही नुकसान नहीं होगा? जिस लोकतंत्र ने स्वतंत्र भारत को एक सूत्र में पिरोकर रखा क्या उसके बहिष्कार से किसी मुस्लिम समुदाय का भला हो सकता है? इतिहास गवाह है कि जब भी मजहब या पंथ के आधार पर लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से दूरी बनाने का प्रयास किया गया है। उसके परिणाम हमेशा नकारात्मक यानी नेगेटिव ही रहे हैं। तो ऐसे में अगर हम अतीत के पन्नों को पलटे तो ऐसी रूढ़िवादी और अलगाववादी सोच के परिणाम साफ दिखाई देते हैं। पड़ोसी देश पाकिस्तान की शह पर कश्मीर में हुरियत जैसे अलगाववादी गुटों ने कई बार चुनावों के बहिष्कार का नारा दिया था।&nbsp;</div><h2>2005 में इराक के सुन्नी मुसलमानों ने किया था चुनाव का बहिष्कार</h2><div>कश्मीर के आम नागरिक लंबे समय तक एक स्वस्थ और पारदर्शी लोकतांत्रिक प्रक्रिया से मरहूम रहे और वहां तो विकास की रफ्तार भी थमी रही। आपने देखा होगा वैश्विक स्तर पर देखें तो साल 2005 में इराक के सुन्नी मुसलमानों ने अमेरिकी प्रभाव का आरोप लगाते हुए चुनाव का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया था। इस बहिष्कार का परिणाम क्या हुआ सबने देखा। संसद में सुन्नी समुदाय का प्रतिनिधित्व किसी गिनती में नहीं रहा। जिससे देश में शिया सुन्नी टकराव की एक नई और हिंसक लहर शुरू हो गई। और इसी तरह साल 2014 में बहरीन के शिया मुसलमानों ने भी वही रास्ता चुना जिसके कारण वहां सुन्नी मुस्लिम दलों ने एक तरफ़ा जीत हासिल की और वहां का विपक्ष आज तक राजनीतिक रूप से खुद को स्थापित करने के लिए संघर्ष कर रहा है। इन तमाम वैश्विक और घरेलू उदाहरणों से यह साफ है कि लोकतंत्र से दूरी बनाना कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता।&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 13:41:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/will-the-country-220-million-muslims-now-boycott-the-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पिता का अनशन तुड़वाने दिल्ली से खुद इंदिरा चलकर आईं, क्या है सोनम वांगचुक का असली सच?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह कहानी उस अपराजेय डोगरा सेनापति की है, जिसने उत्तर के दुर्जय शिखरों और बर्फीली वादियों को चीरकर भारत की सीमाओं का ऐसा विस्तार किया जिसकी मिसाल इतिहास में विरली ही मिलती है। कहलूर रियासत के एक साधारण से गाँव में जन्मे और ज़मीन के पारिवारिक विवाद के कारण अपना घर छोड़ने वाले जोरावर सिंह कहलुरिया ने हरिद्वार के मैदानों से लेकर जम्मू के दुर्गम क्षेत्रों तक न सिर्फ युद्ध की कलाएँ सीखीं, बल्कि महाराजा रणजीत सिंह, राजा संसार चंद और डोगरा राजा गुलाब सिंह जैसे महान शासकों के भरोसे को जीतकर अपने पराक्रम का लोहा मनवाया। भीमगढ़ किले की कमान से लेकर किश्तवाड़ की गवर्नरशिप तक का सफर तय करने वाले इस वीर की तलवार ने साल 1834 में जब लद्दाख के बर्फीले रास्तों का रुख किया, तो उसने तिब्बत से अफगानिस्तान तक फैले व्यापारिक मार्गों की तकदीर और डोगरा साम्राज्य की सीमाओं का इतिहास हमेशा-हमेशा के लिए बदलकर रख दिया। लद्दाख आधिकारिक तौर पर हमेशा के लिए जम्मू की डोगरा रियासत का हिस्सा बन गया और फिर जम्मू कश्मीर के साथ ही सन 47 में लद्दाख भारत का हिस्सा बना। कट टू आजादी के 72 साल बाद तारीख 5 अगस्त 2019 जगह देश की संसद जहां देश भर से चुनकर आए जनता के प्रतिनिधि बैठे हैं लेकिन एक सांसद महोदय खड़े हैं। देश के गृह मंत्री अमित शाह सफेद कुर्ता और गाढ़े भूरे रंग की सदरी। हाथ में कागजों का पुलिंदा है। जिनमें अलग-अलग पन्नों पर स्टिकी नोट्स चसपा थे। इन कागजों को हाथ में लिए अमित शाह जम्मू कश्मीर से जुड़े दो बिल और दो प्रस्ताव पेश करते हैं। यह बिल और प्रस्ताव पास होते ही जम्मू कश्मीर से अनुच्छेद 370 हमेशा के लिए खत्म हो जाता है। साथ ही जम्मू कश्मीर को दो भागों में बांट दिया जाता है। दोनों को ही केंद्र शासित प्रदेश बना दिया जाता है। पहला जम्मू कश्मीर विधानसभा के साथ, और दूसरा लद्दाख बगैर विधानसभा के।&nbsp; जो लद्दाख सेनाओं की लड़ाई के बाद जम्मू कश्मीर का हिस्सा बनाया गया था, उसे एक बार फिर कश्मीर से अलग कर दिया गया। इस फैसले को लद्दाख में खुशखबरी की तरह सेलिब्रेट किया गया। सेलिब्रेशन का पहला बयान आया लद्दाख के एक इंजीनियर, साइंटिस्ट, शिक्षाविद और सोशल एक्टिविस्ट की तरफ से जिन्हें हिंदुस्तान ने उनके असली नाम से कम और आमिर खान की फिल्म से मिले नाम से ज्यादा जाना। थ्री इडियट्स वाले फुनसुक बांगरु। असली नाम सोनम वांगचुक। वांगचुक ने 5 अगस्त 2019 की रात सोशल मीडिया पर लिखा, प्रधानमंत्री जी आपका धन्यवाद। लद्दाख नरेंद्र मोदी और पीएमओ का धन्यवाद करता है और उन्होंने लद्दाख के लंबे समय से चले आ रहे सपने को पूरा किया। ठीक 30 साल पहले अगस्त 1989 में लद्दाख के नेताओं ने केंद्र शासित प्रदेश यानी यूटी का दर्जा पाने के लिए आंदोलन शुरू किया था। उन सभी का धन्यवाद जिन्होंने इस लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण में मदद की। लेकिन बहुत जल्द सोनम वांगचुक का शुक्राना अंदाज बदल जाता है और वह कहने लगते हैं कि इससे तो बेहतर था कि हम जम्मू कश्मीर का ही हिस्सा रहते। अब सोनम वांगचुक एक बार फिर से चर्चा में हैं। दिल्ली के जंतर-मंतर पर अनशन पर बैठे सोशल एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक अब अस्पताल में भर्ती हैं। पुलिस दिल्ली हाई कोर्ट का निर्देश का हवाला देते हुए 18 जुलाई को उन्हें जबरन सफ़दरजंग अस्पताल ले गई थी। अस्पताल में उन्होंने ड्रिप या मुंह से कोई भी तरल पदार्थ लेने से इनकार कर दिया है और कहा है कि उनका अनशन जारी रहेगा। लेकिन उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म एक्स पर पोस्ट कर अपना अनशन ख़त्म करने के लिए तीन शर्तें रखीं। सोनम वांगचुक ने जो शर्तें रखी हैं उनमें कहा गया है कि सरकार प्रश्नपत्र लीक होने जैसी घटनाओं समेत शिक्षा व्यवस्था की 'हाल की नाकामियों' का जिम्मा लेती है या फिर राजनीतिक दल संसद में इस मुद्दे को उठाने का भरोसा देते हैं या फिर अलग-अलग दलों के सांसद और नेता अस्पताल आकर उनसे मिलकर आश्वासन देते हैं तो वो अपना अनशन ख़त्म कर देंगे। ऐसे में आइए जानते हैं कि सोनम वांगचुक आखिर है कौन? टाइम मैगजीन ने सोनम वांगचुक को लेकर क्या कहा था? वांगचुक को किस काम के लिए रमन मैक्से अवार्ड मिला था? सोनम वांगचुक को एनएसए के तहत क्यों गिरफ्तार किया गया था?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cjp-protest-cockroach-janata-party-members-march-to-lay-siege-to-parliament-clash-with-police" target="_blank">CJP Protest: संसद घेरने चले कॉकरोच जनता पार्टी के लोग, Police से हुई तीखी झड़प</a></h3><h2>रेंचो का किरदार, जंतर-मंतर का अनशन और शुरुआती सफर</h2><div>साल 2009 में एक फिल्म आई थी। फिल्म का नाम था थ्री इडियट्स। मशहूर डायरेक्टर राजकुमार हिरानी ने इस फिल्म को डायरेक्ट किया था। फिल्म में आमिर खान, आर माधवन, शर्मन जोशी और करीना कपूर सहित कई काबिल एक्टर्स थे। 3 इडियट्स फिल्म में एक डायलॉग है। बेटा काबिल बनो काबिल। कामयाबी तो झक मार के पीछे आएगी। फिल्म का यह मशहूर डायलॉग रेंचो नाम का किरदार बोलता है। इस किरदार को आमिर खान ने बेहतरीन तरीके से पर्दे पर निभाया। कहा जाता है कि आमिर खान का यह किरदार लद्दाख के शिक्षाविद सोनम वांगचुक से प्रेरित है। हालांकि आमिर खान सोनम वांगचुक दोनों ने इस बात को खारिज किया है कि फिल्म का किरदार रॉनचो वांगचुक से प्रेरित है। लेकिन स्पष्टीकरण फिल्म आने के बहुत दिन बाद आया था। संयोग देखिए कि यही सोनम वांगचुक दिल्ली के जंतरमंतर पर 20 दिनों से आमरण अनशन पर बैठे थे। उनका कहना है कि बच्चे तभी काबिल बन पाएंगे जब देश की शिक्षा व्यवस्था में से बेईमानी खत्म होगी और पेपर लीक जैसी समस्या का समाधान होगा। सोनम वांगचुक के जीवन की कहानी भी बेहद दिलचस्प है। अमेरिका की मशहूर पत्रिका टाइम मैगजीन ने द 100 मोस्ट इन्फ्लुएंशियल क्लाइमेट लीडर्स ऑफ 2025 नाम से एक लिस्ट जारी की। इस लिस्ट में सोनम वांगचुक का भी नाम शामिल था। मैगजीन ने नाम के साथ सोनम वांगचुक का परिचय देते हुए जो कहा वह पढ़ने लायक है। वांगचुक एक इंजीनियर, शिक्षाविद और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। पिछले महीने उन्हें लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने के प्रदर्शन के चलते गिरफ्तार किया गया था। वांगचुक पिछले एक दशक से प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा कृत्रिम ग्लेशियर बनाने में नई वैज्ञानिक तकनीकों को शामिल करने का काम कर रहे हैं। सोनम वांगचुक किसी भी परिचय के मोहताज नहीं है। पिछले कुछ सालों में वह लगातार चर्चा में बने हुए हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/police-lathi-charge-cjp-protesters-demonstrators-begin-behaving-bizarrely" target="_blank">CJP प्रोटेस्ट पर पुलिस लाठीचार्ज, अजीब-अजीब हरकतें करने लगे प्रदर्शनकारी</a></h3><h2>42 साल पहले इंदिरा गांधी ने खुद तुड़वाया था अनशन!</h2><div>सोनम वांगचुक आज देश भर में चर्चा का नाम है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस परिवार से सोनम वांगचुक आते हैं उस परिवार का आंदोलन और लद्दाख की राजनीति से रिश्ता आज का नहीं बल्कि 40 साल से भी ज्यादा पुराना है। आज जिस तरह सोनम वांगचुक भूख हड़ताल पर बैठे हैं, ठीक उसी तरह 42 साल पहले उनके पिता भी अनशन पर बैठे थे। फर्क सिर्फ इतना था कि उस वक्त देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद दिल्ली से लेह पहुंच गई थी और अपने हाथों से उनका अनशन तुड़वाया था। सोनम वांगचुक के पिता का नाम था सोनम वांग्याल। सोनम वांग्याल सिर्फ एक राजनेता नहीं थे बल्कि लद्दाख की पहचान और अधिकारों के लिए लड़ने वाले प्रमुख नेताओं में गिने जाते थे। 1975 में वे जम्मू कश्मीर विधानसभा के सदस्य बने और बाद में राज्य सरकार में मंत्री भी रहे। यही वह दौर था जब लद्दाख के लोगों को लगता था कि उनकी आवाज श्रीनगर की राजनीति में दब जाती है। लद्दाख के लोगों की सबसे बड़ी मांग थी कि उन्हें अनुसूचित जाति यानी कि शेड्यूल ट्राइब का दर्जा मिले ताकि शिक्षा, नौकरी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व में उन्हें संवैधानिक सुरक्षा मिल सके। यही मांग आगे चलकर एक बड़े जन आंदोलन में बदल गई। साल था 1984। सोनम वांग्याल ने लद्दाख के लोगों के अधिकारों की मांग को लेकर भूख हड़ताल शुरू कर दी। उनकी मांग साफ थी कि लद्दाख को अनुसूचित जनजाति यानी एसटी का दर्जा दिया जाए। अनशन लंबा खिसने लगा। जैसे-जैसे उनकी तबीयत बिगड़ती गई, मामला दिल्ली तक पहुंच गया। उस समय देश की प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी। रिपोर्टों के मुताबिक मामला इतना गंभीर हो गया कि इंदिरा गांधी खुद लेह पहुंची। सोनम बांगियाल से मुलाकात की और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनकी मांग पर गंभीरता से विचार किया जाएगा। इसके बाद उन्होंने अपने हाथों से जूस पिलाकर उनका अनशन तुड़वाया।&nbsp;&nbsp;</div><h2 style="font-family: &quot;Source Sans Pro&quot;, -apple-system, BlinkMacSystemFont, &quot;Segoe UI&quot;, Roboto, &quot;Helvetica Neue&quot;, Arial, sans-serif, &quot;Apple Color Emoji&quot;, &quot;Segoe UI Emoji&quot;, &quot;Segoe UI Symbol&quot;; color: rgb(0, 0, 0);">सिसमोल की स्थापना, 'ऑपरेशन न्यू होप' और सामाजिक पहल</h2><div>भारत के उत्तरी कोने पर बसा लद्दाख अब एक केंद्र शासित प्रदेश यानी यूनियन टेरिटरी है। लेकिन साल 2019 से पहले तक वह जम्मू कश्मीर राज्य का हिस्सा हुआ करता था। इसी लद्दाख के लेह जिले के अलची के पास साल 1966 में सोनम वांगचुक का जन्म हुआ। वांगचुक एक इंटरव्यू में बताते हुए कहते हैं कि उनका गांव बहुत छोटा था। केवल पांच ही घर थे गांव में। वहां कोई भी स्कूल नहीं था। 9 साल तक वह किसी भी स्कूल में नहीं गए। 9 साल की उम्र में वांगचुक का दाखिला श्रीनगर के एक स्कूल में करवाया गया। इसके बाद उन्होंने दिल्ली के एक केंद्रीय विद्यालय से पढ़ाई की।&nbsp;</div><div>12वीं करने के बाद वांगचुक दोबारा से श्रीनगर लौटे। यहां उन्होंने नेशनल इंस्टट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी यानी एनआईटी श्रीनगर से मैकेनिकल इंजीनियरिंग में बीटेक किया। जब वांगचुक बीटेक कर रहे थे तो साल 1987 का था। इसी दौरान उनकी दिलचस्पी मशीनों में बढ़ी और वांगचुक ने किताबों की थ्योरी रटने के बजाय स्किल सीखने और सिखाने पर जोर दिया। वांगचुक की इंजीनियरिंग की पढ़ाई जब खत्म हुई तो उन्होंने कहीं नौकरी करने के बजाय साल 1988 में अपने भाई और पांच अन्य दोस्तों के साथ मिलकर सिसमोल यानी स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख नाम का एक स्कूल खोला। उनके इस स्कूल में बेहद प्रैक्टिकल तरीके से एजुकेशन दी जाती थी। बाद के दिनों में वांगचुक ने अपने स्कूल में ऑपरेशन न्यू होप नाम से एक प्रोग्राम शुरू किया। इस प्रोग्राम के तहत लद्दाख के सरकारी स्कूलों में एजुकेशन रिफॉर्म शुरू हुआ। इस रिफॉर्म में लोकलाइज्ड टेक्स्ट बुक्स और टीचर्स की ट्रेनिंग दी जाने लगी। यह सोनम वांगचुक का एजुकेशन को लेकर बेहद सुंदर विज़न था। अब साल आता है 1993 का। जून का महीना था। सोनम वांगचुक ने लद्दाख में एक मैगज़ीन का प्रकाशन शुरू किया। इस मैगज़ीन का नाम था लद्दाख स्मेलोंग। यह बात बड़ी हैरतनुमा लगती है कि अगस्त 2005 तक यह मैगज़ीन लद्दाख की एकमात्र प्रिंट मैगज़ीन थी और इसके संपादक थे सोनम वांगचुक। ऐसा कोई भी साल नहीं है जब वांगचुक ने लद्दाख और उससे जुड़े मुद्दों के लिए कोई सकारात्मक काम नहीं किया हो। साल 2002 में उन्होंने लद्दाख वंटरी नेटवर्क एलवीएन की स्थापना की। दरअसल यह संगठन लद्दाख में काम कर रहे एनजीओ को एक मंच पर लाने के लिए बनाया गया था। खुद वांगचुक साल 2005 तक इस संगठन की एग्जीक्यूटिव कमेटी के सेक्रेटरी रहे। 2004 की बात है। केंद्र में नई यूपीए सरकार आ चुकी थी। मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे। उसी साल लद्दाख हिल काउंसिल सरकार का विज़न डॉक्यूमेंट लद्दाख 2025 नाम से तैयार किए जाने के लिए एक कमेटी बनाई गई। इसी कमेटी में वांगचुक को शिक्षा और पर्यटन पर नीति को तैयार करने की जिम्मेदारी सौंपी गई। साल 2005 में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस रिपोर्ट को लॉन्च किया। वांगचुक ने नई तकनीकी और नए मेथड से काम करना कभी बंद नहीं किया।</div><h2>आइस स्तूप' का आविष्कार, हायल यूनिवर्सिटी और मैगसेसे पुरस्कार</h2><div>&nbsp;साल 2013 में उन्होंने आइस स्तूप नाम से एक अद्भुत प्रोजेक्ट शुरू किया। दरअसल जब गर्मी का मौसम आता है तो लद्दाख के किसानों को खेती के लिए पानी की कमी का सामना करना पड़ता है। अमूमन पानी की कमी अप्रैल और मई के महीने में ही होती है और उसी समय बुवाई का समय होता है यानी खेती का पीक टाइम। वांगचुक ने इसका तोड़ आइस स्तूप प्रोजेक्ट से निकाला। लद्दाख में ठंड के मौसम में भारी बर्फबारी होती है। वांगचुक ने बर्फबारी के समय ही उस बर्फ को इकट्ठा करके स्तूप बना दिया। यह एक आर्टिफिशियल ग्लेशियर जैसा था और जैसे-जैसे गर्मी का मौसम आता इस स्तूप की बर्फ पिघलकर पानी में तब्दील होती। साल 2014 के आखिर तक वांगचुक ने दो मंजिला कई आई स्तूप का स्ट्रक्चर बनाया जिसमें करीब 1.5 लाख लीटर पानी स्टोर किया जा सकता था। यह इस प्रोजेक्ट की सफलता को दिखाता था। बाद में यह तकनीक बहुत मशहूर हुई और इसे विदेशों में भी पहचान मिली। इसे लद्दाख के अलावा हिमालय और आल्प्स के क्षेत्रों में भी अपनाया गया। साल 2016 में वांगशुक ने हिमालयन इंस्टट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख यानी हायल की स्थापना की। यह एक अलग तरह की यूनिवर्सिटी है जिसमें पहाड़ी इलाकों के युवाओं को नए ढंग से पर्यावरण और सांस्कृतिक सहित तमाम एजुकेशन दी जाती है। इस यूनिवर्सिटी की स्थापना के 2 साल बाद साल 2018 में एजुकेशन रिफॉर्म और कम्युनिटी बिल्डिंग के लिए वांगचुक को रमन मैक्ससे अवार्ड से सम्मानित किया गया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/no-investigation-report-received-trust-waning-sonam-wangchuk-wife-writes-letter" target="_blank">जांच रिपोर्ट नहीं मिली, भरोसा कम...सोनम वांगचुक की पत्नी ने चिट्ठी लिख दूसरे अस्पताल में शिफ्ट करने की मांग की</a></h3><h2>लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे</h2><div>उनके पिता वांगियाल कांग्रेस के नेता रहे हैं। उनके पिता सोनम वांग्याल साल 1975 में जम्मू कश्मीर सरकार में मंत्री थे। वांगचुक भी लद्दाख के पर्यावरण को लेकर समय-समय पर आंदोलन करते रहे। 26 जनवरी 2023 को उन्होंने लद्दाख के जलवायु परिवर्तन से बिगड़ते हालात पर खारदंगला पास के पास जाकर अनशन शुरू किया। हालांकि प्रशासन ने उन्हें पहले ही हाउस अरेस्ट कर लिया था। प्रशासन का दावा था कि दर्रे का तापमान शून्य से -40° तक होता है। इसलिए वहां अनशन करने से वांगचुक की जान को खतरा था। 30 सितंबर 2024 को अपनी मांगों के समर्थन में लद्दाख से दिल्ली तक पैदल मार्च के दौरान सोनम वांगचुक और उनके समर्थकों को दिल्ली पुलिस ने सिंधु बॉर्डर पर हिरासत में ले लिया। बाद में उन्हें 2 अक्टूबर 2024 को रिहा कर दिया गया।</div><h2>सोनम वांगचुक के अनशन ख़त्म करने की शर्तों को लेकर क्यों उठ रहे हैं सवाल?</h2><div>सोनम वांगचुक नीट परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के लिए धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग को लेकर ही अनशन पर बैठे थे। वांगचुक की शर्तों में धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की शर्त का न होना लोगों को चौंका रहा है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 20 Jul 2026 14:32:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/scientist-or-activist-the-real-story-of-sonam-wangchuk</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[120 इस्तीफे...एक्शन में आई सरकार, ISRO में भगदड़ क्यों मची है? भारत की 'स्पेस मिस्ट्री' का MRI स्कैन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या भारत के स्पेस ड्रीम्स को अपनों की ही नज़र लग गई है? क्या अंतरिक्ष में तिरंगा लहराने वाला हमारा इसरो, अंदरूनी 'रॉकेट लीक' से जूझ रहा है? जी हां, आंकड़ा बहुत बड़ा है और चिंता उससे भी गहरी! सोचिए, जिस संगठन में 14 हजार लोग काम करते हों, वहां से 100 लोगों का जाना शायद समंदर से एक लोटा पानी निकालने जैसा लगे। लेकिन ठहरिए, गणित इतना सीधा नहीं है। असली झटका तो तब लगता है जब इसरो के सबसे वीआईपी सैटेलाइट सेंटर के 1339 कर्मचारियों में से 80 टॉप के वैज्ञानिक अचानक बाय-बाय कह देते हैं! हद तो तब हो जाती है जब बाहुबली रॉकेट GSLV Mk-III के डायरेक्टर विक्रम जोसेफ और चंद्रयान-3 की कामयाबी के पीछे खड़े प्रोजेक्ट मैनेजर आदित्य रल्लापल्ली जैसे दिग्गज भी अपना केबिन खाली कर देते हैं। आखिर ऐसा क्या हुआ कि देश का सबसे बड़ा स्पेस स्टेशन, वैज्ञानिकों के लिए एक स्टॉप-ओवर बनकर रह गया है? क्यों आज देश के सबसे बड़े दिमाग यानी आईआईटी (IIT) के टॉपर्स इसरो की दहलीज पर कदम रखने से भी कतरा रहे हैं? देरी, खिंचती डेडलाइन्स और सेंट्रलाइज्ड फैसले... क्या इसरो के अंदर कोई अंदरूनी मंदी चल रही है? आज इसी 'स्पेस मिस्ट्री'का एमआरआई स्कैन करेंगे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/government-halts-mass-resignations-of-isro-scientists" target="_blank">ISRO Scientists के सामूहिक इस्तीफों पर सरकार की रोक, Gaganyaan Project के लिए लागू हुए New Rules</a></h3><h2>स्पेस सेक्टर में 5 साल के भीतर 400 प्राइवेट स्टार्टअप</h2><div>भारत से पहले ही बहुत से वैज्ञानिक समय-समय पर नासा जाते रहे हैं। आज नासा के अंदर जो प्रमुख वैज्ञानिक हैं उनमें बड़ी संख्या भारतीयों की है। लेकिन आज भारत के अंदर ही वैज्ञानिक नहीं रुक रहे हैं। इसके पीछे के मेजर रीजन क्या हैं? 2014 में एक भी शायद प्राइवेट सेक्टर कंपनी हमारे स्पेस में नहीं थी। आज 500 से ज्यादा कंपनियां स्पेस के अंदर प्राइवेट सेक्टर के अंदर एंट्री कर चुकी हैं। 2020 में जैसे ही प्राइवेट सेक्टर ओपन किया तमाम प्रकार की कंपनीज़ इस सेक्टर में लाइन लगाकर आ गई। आज भारत की टॉप कंपनीज के अगर नाम लें जो बीते 5 साल के अंदर तेजी से बढ़कर आई हैं। उनमें स्काई रूट एयररोस्पेस का नाम है। ऐसे ही अग्निकुल कॉस्मोस का नाम है। पिक्सल का नाम है। गैलेक्स का नाम है। दिगंतारा, बेलटेक्का नाम है। दो नाम&nbsp; स्काई रूट और अग्निकुल है ये तो बहुत ही तेजी से आगे चल रहे हैं। बिलियन डॉलर कंपनी बन चुकी हैं। ये इन्होंने इतना तेजी से फंडिंग उठाई है। टॉप फाइव में देखा जाए तो स्काई रूट और अग्निकुल का नाम है। स्काई रूट तो अपना भी विक्रम करके वन टू थ्री नाम से रॉकेट भी बना चुका है। सफल परीक्षण कर चुका है। सेटेलाइट और रॉकेट बनाने में अब ये तेजी से लोग आगे निकलते हुए आ रहे हैं।&nbsp; 400 प्राइवेट स्टार्टअप इंडिया के अंदर बीते 5 साल के अंदर केवल स्पेस सेक्टर में आ गए हैं। 500 मिलियन से ऊपर की फंडिंग प्राप्त कर चुके हैं। इतना पैसा इनके अंदर निवेश हो चुका है। इतना तेजी से मतलब 2014 में एक कंपनी तो 2026 में 400 नई कंपनियां स्टार्टअप के अंदर आ गई और निवेश 600 मिलियन का तो खुद हमारे विज्ञान मंत्री ने बोला कि इतना तो इन्वेस्टमेंट लेकर आ गए। तेजी से प्राइवेट सेक्टर इन हुआ।&nbsp;</div><h2>देरी, बढ़ती समय-सीमा और कम जवाबदेही</h2><div>इसरो से यह इस्तीफ़े ऐसे समय में भी हो रहे हैं जब संगठन मिशनों को पूरा करने में एक असामान्य मंदी से जूझ रहा है। गगनयान G1 टेस्ट फ्लाइट, SSLV-L1, GSLV-F17 और निजी क्षेत्र (इंडस्ट्री) द्वारा निर्मित PSLV-N1 जैसे कई बड़े और महत्वपूर्ण मिशन अपनी घोषित समय-सीमा से आगे बढ़ चुके हैं। इस साल की शुरुआत में PSLV को लगे दो झटकों ने लॉन्च गतिविधियों में और अधिक देरी कर दी है, और अंतरिक्ष एजेंसी ने अभी तक विफलता की कोई विस्तृत रिपोर्ट (असेसमेंट) सार्वजनिक नहीं की है। संगठन के कुछ हिस्सों में इस बात पर भी चर्चा बढ़ रही है कि निर्णय लेने की प्रक्रिया लगातार केंद्रित (सेंट्रलाइज्ड) होती जा रही है। कई मौजूदा और पूर्व अधिकारियों ने निजी बातचीत में कहा है कि तकनीकी और प्रशासनिक स्तर के बड़े फ़ैसले अब चेयरमैन के ऑफ़िस तक ही सीमित हो गए हैं, जिससे मंज़ूरी मिलने में देरी हो रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/man-who-issued-bomb-threat-to-isro-arrested-from-ghaziabad" target="_blank">ISRO को Bomb Threat देने वाला Ghaziabad से गिरफ्तार, पुलिस जांच में हुआ बड़ा खुलासा</a></h3><h2>अचानक ब्रेन ड्रेन होना शुरू हुआ</h2><div>प्राइवेट सेक्टर से फंडिंग आ गई। प्राइवेट सेक्टर की कंपनियां आ गई। इनको काम करने वाले वैज्ञानिक कहां से लाओगे? काम करने वाले वैज्ञानिकों के लिए आवश्यकता अचानक आ पड़ी। 5 साल में वैज्ञानिक तैयार नहीं होता। वैज्ञानिक सालों की मेहनत से निकलता है। काफ़ी सारी रिसर्च करता है। बहुत सा समय खपाता है। तब जाकर वैज्ञानिक बनता है। ऐसे में अचानक वैज्ञानिकों के लिए ऑप्शंस ओपन हो गए। 400 कंपनियां सामने। अब तक जॉब देने के लिए इसरो खड़ा था। अब 400 कंपनियां एक साथ सामने आई। क्या ऑप्शंस हुए? इन्होंने कहा छोड़ो इसरो इन्हें ज्वाइन करते हैं। अचानक ब्रेन ड्रेन होना शुरू हुआ। 100 से अधिक वैज्ञानिक अचानक छोड़ निकल गए इन दिनों इनमें से अधिकांश ने जाकर इन प्राइवेट कंपनीज को ज्वाइन कर लिया।&nbsp; इतना तेजी से निकले कि इन वैज्ञानिकों ने कईयों ने तो कई अहम प्रोजेक्ट छोड़ दिए। यानी कि चंद्रयान 3 तक का जो लीडरशिप था वो तक छोड़ दिया।&nbsp;</div><h2>रोज़गार मॉडल में बदलाव की ज़रूरत</h2><div>नाम न बताने की शर्त पर वरिष्ठ अधिकारियों ने यह भी कहा कि स्पेस एजेंसी को नासा (NASA) और यूरोपियन स्पेस एजेंसी जैसी पश्चिमी स्पेस एजेंसियों के रोज़गार मॉडल पर गौर करना चाहिए, जो ज़्यादातर प्रोजेक्ट-आधारित होते हैं। नासा के वर्कफ़ोर्स स्ट्रक्चर में स्थायी सरकारी कर्मचारी, कॉन्ट्रैक्टर और खास प्रोजेक्ट के लिए रखे गए लोग शामिल होते हैं। इससे एजेंसी को ज़रूरी संस्थागत विशेषज्ञता बनाए रखते हुए लचीलापन मिलता है। कई स्पेस पॉलिसी एक्सपर्ट्स का मानना ​​है कि इसरो (ISRO) को इस हाइब्रिड मॉडल को अपनाकर फ़ायदा हो सकता है।</div><h2>ISRO इन चीज़ों पर फोकस कर सकता है</h2><div>मिशन डिज़ाइन और सिस्टम इंजीनियरिंग।</div><div>इंसानों को अंतरिक्ष में भेजना और डीप-स्पेस एक्सप्लोरेशन।</div><div>एडवांस्ड R&amp;D, जैसे कि दोबारा इस्तेमाल होने वाले रॉकेट और न्यूक्लियर प्रोपल्शन।</div><h2>इसरो इस समस्या को सुलझाने के लिए तेजी से कदम उठा रहा है</h2><div>अंतरिक्ष विभाग के 14 जुलाई के ज्ञापन में इस बात पर चिंता व्यक्त की गई है कि इन इस्तीफों से राष्ट्रीय महत्व के कार्यक्रमों पर असर पड़ रहा है। गगनयान और अन्य प्रमुख मिशनों से जुड़े वैज्ञानिकों को अब सामान्य मंजूरी के जरिए इस्तीफा देने की अनुमति नहीं होगी; इसके बजाय, प्रत्येक इस्तीफे को अब अंतरिक्ष विभाग से मंजूरी लेनी होगी। हालांकि इस्तीफों की संख्या इसरो के 14,600 से अधिक कर्मचारियों में से एक छोटा सा हिस्सा है, लेकिन इसका प्रभाव कहीं अधिक है क्योंकि जाने वाले कई लोगों के पास चंद्रयान-3, स्पैडेक्स और गगनयान जैसे मिशनों के माध्यम से अर्जित वर्षों का विशेष अनुभव है। इस तरह के ज्ञान की भरपाई केवल नए स्नातकों की भर्ती से नहीं की जा सकती। टैलेंट का यह बदलाव भारत के स्पेस सेक्टर में हो रहे बड़े बदलाव को भी दिखाता है। दशकों तक, महत्वाकांक्षी एयरोस्पेस इंजीनियरों के लिए ISRO ही लगभग एकमात्र ठिकाना था। आज, यह एक बहुत बड़े इकोसिस्टम का मुख्य केंद्र बन गया है, जहाँ प्राइवेट कंपनियाँ अच्छे वेतन, तेज़ी से तरक्की और स्पेस टेक्नोलॉजी की अगली पीढ़ी को आकार देने के मौके के साथ करियर के दूसरे विकल्प भी देती हैं। इसरो के लिए चुनौती अब सिर्फ़ देश के सबसे होनहार लोगों को आकर्षित करना ही नहीं, बल्कि उन्हें अपने साथ बनाए रखना भी है।</div><h2>क्यों हो सकती है चिंता की बात</h2><div>फर्ज कीजिए कि अगर दुश्मन देश किसी भारत की प्राइवेट कंपनी में फंडिंग करवा दे और उनसे कहे कि सारे के सारे वैज्ञानिकों को तोड़ के इधर ले आओ। मुंह मांगा पैसा दे दो। आपका तो पूरा अंतरिक्ष प्रोग्राम रखा रह जाएगा। आज 400 कंपनी हैं और उनको फंडिंग के दम पर सारा काम हो रहा है। फंडिंग के नाम पर वो तमाम प्रकार के लोगों को तोड़ रही हैं।आज इसरो में एक आम वैज्ञानिक की तनख्वाह ₹5 लाख एक बार बड़ी चर्चा बनी थी। देश के जो मतलब इसरो के चीफ साइंटिस्ट हैं उनकी तनख्खा ढाई लाख थी और हमारे देश के अंदर हम जैसी जो छोटी कंपनियां काम कर रही हैं उनके पास ही लाख लाख रुपए के कई कर्मचारी होते हैं।&nbsp;</div><h2>अर्ली रिटारमेंट के खिलाफ सरकार का ऑर्डर</h2><div>14 जुलाई को निकाले गए ऑर्डर में कहा गया कि गगनयान जैसे मिशन पर काम कर रहे ग्रुप ए के साइंटिस्ट&nbsp; के इस्तीफे अब आसानी से मंजूर नहीं होंगे ऐसे मामलों में अब फैसला डिपार्टमेंट ऑफ स्पेस ही करेगा।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Jul 2026 14:23:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/120-resignations-government-swings-into-immediate-action-why-is-there-an-exodus-at-isro</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[रूस-भारत की परमाणु साझेदारी में सेंध? क्यों कुडनकुलम फिर से सुर्खियों में है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सबसे बड़े न्यूक्लियर पावर प्लांट कुडनकुलम का नाम एक बार फिर चर्चा में है और इस बार वजह कोई तकनीकी खराबी नहीं बल्कि एक कथित डाटा ब्रिज जिसने देश के एक बड़े इंफ्रा की साइबर सुरक्षा को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल दावा है कि डाक पेप पर करीब 858,000 फाइलें अपलोड की गई हैं। जिसमें से लगभग 19,000 फाइलें कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट से जुड़ी बताई जा रही हैं। ऐसे में लोगों के मन में कई तरह के सवाल आ रहे हैं कि क्या भारत का न्यूक्लियर पावर प्लांट हैक हो गया है या फिर रिएक्टर का डाटा लीक हुआ है या मामला कुछ और है। यह मामला सीधे एनपीसीआईएल यानी न्यूक्लियर पावर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के सर्वर से डाटा चोरी का नहीं है। दरअसल कुडनकुलम न्यूक्लियर पावर प्लांट के यूनिट थ्री और यूनिट 4 के कुछ इंफ्रा का ईपीसी कॉन्ट्रैक्ट साल 2018 में Reliance infra को दिया गया था। इसी कंपनी के डाटा में सेंध लगने का दावा सामने आया है। खुद Reliance ने स्वीकार किया कि उसके डाटा में आंशिक यानी कि पार्शियल ब्रीच हुआ है और इसकी जानकारी सरकार को दे दी गई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक Reliance का डाटा भारतीय डाटा सेंटर कंपनी यो के सर्वर पर होस्ट था। योटा का कहना है कि 29 मई को उसे सर्वर पर संदिग्ध गतिविधियां दिखी थी और संभावित रैंसमवेयर को उसी समय रोक दिया गया था। लेकिन जून के आखिर में Reliance ने उसे बताया कि बाहरी हमलावर डाटा चोरी का दावा कर रहे हैं। इसके बाद पूरे मामले की जांच शुरू हुई। इस पूरे मामले के पीछे जिस समूह का नाम सामने आया है, उसका नाम वर्ल्ड लीग्स है। यह एक कुख्यात रसमवेयर गिरोह है। इसका तरीका आमतौर पर यह होता है कि पहले किसी कंपनी का डाटा चुराया जाता है। फिरौती मांगी जाती है और अगर पैसे नहीं मिलते तो चोरी किया गया डाटा डाक पर सार्वजनिक कर दिया जाता है। इससे पहले यह गिरोह Tata समूह समेत कई बड़ी कंपनियों को निशाना बना चुका है। अब सवाल कि आखिरकार लीक क्या हुआ है? रर्स की रिपोर्ट के मुताबिक डाक वेब पर मौजूद दस्तावेजों में कथित तौर पर यूनिट थ्री और यूनिट फोर से जुड़े वेंटिलेशन और कूलिंग सिस्टम के ब्लूप्रिंट सप्लाई की सूची, मीटिंग रिकॉर्ड, जॉइंट इंस्पेक्शन रिपोर्ट, उपकरणों की समीक्षा और बीमा से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं। हालांकि रॉयर्स ने साफ कहा कि वह इन दस्तावेजों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं करता।&nbsp;</div><h2>19,000 फाइलें और 14.3 GB डेटा ऑनलाइन लीक</h2><div>एक रैनसमवेयर और जबरन वसूली (extortion) करने वाले समूह 'वर्ल्ड लीक्स' (World Leaks) द्वारा कथित तौर पर इस डेटा लीक को अंजाम दिया गया है, जिसने अपने डार्क वेब प्लेटफॉर्म पर चोरी की गई फाइलों का एक बड़ा जखीरा प्रकाशित किया है। साइबर सुरक्षा शोधकर्ताओं (researchers) ने कहा कि इस समूह ने लगभग 19,000 फाइलों का एक संग्रह जारी किया है, जिसका कुल आकार (डेटा) करीब 14.3 GB है। इन फाइलों में केकेएनपीपी (KKNPP - कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र) से जुड़े संदर्भ मिले हैं।</div><div>रिपोर्ट के मुताबिक, लीक हुए दस्तावेज 2016 से लेकर 2025 के मध्य तक की अवधि के हैं और ये इस परियोजना के निर्माण (construction) और संचालन (operations) के विभिन्न पहलुओं के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान करते हैं।</div><div><b>कथित तौर पर इन फाइलों में निम्नलिखित जानकारियां शामिल हैं:</b></div><div>कूलिंग (शीतलन) और वेंटिलेशन (हवादार) प्रणालियों से जुड़े इंजीनियरिंग चित्र (Drawings)</div><div>एक कॉमन कंट्रोल रूम (सामान्य नियंत्रण कक्ष) के लेआउट प्लान</div><div>भारतीय और रूसी इंजीनियरों के बीच बैठकों के मिनट्स (विवरण) और संयुक्त निरीक्षण रिपोर्ट</div><div>वेंडर (विक्रेता) के विवरण, उपकरण प्रस्ताव और आपूर्तिकर्ताओं (suppliers) की जानकारी</div><div>आंतरिक बीमा दस्तावेज, जिसमें निर्माणाधीन इकाइयों के लिए कथित तौर पर $112 मिलियन (11.2 करोड़ डॉलर) की संयुक्त आतंकवाद क्षतिपूर्ति नीति (joint terror indemnity policy) भी शामिल है।</div><h2>न्यूक्लियर सेफ्टी सिस्टम पर कोई असर नहीं पड़ा</h2><div>भारत के न्यूक्लियर इंफ्रास्ट्रक्चर पर संभावित खतरे की चिंताओं के बीच, एनपीसीआईएल ने एक बयान जारी कर स्पष्ट किया कि लीक हुए दस्तावेज़ रिएक्टर सेफ्टी सिस्टम से जुड़े नहीं थे। कंपनी ने कहा कि यह जानकारी केवल कुडनकुलम यूनिट 3 और 4 के लिए 'बैलेंस ऑफ़ प्लांट' (BoP) कॉमन सर्विस सुविधाओं से संबंधित थी, जिनका निर्माण अभी चल रहा है। एनपीसीआईएल ने कहा ये सुविधाएं पारंपरिक किस्म की हैं और आमतौर पर थर्मल पावर प्लांट के साथ-साथ अन्य प्रोसेस इंडस्ट्रीज़ में भी पाई जाती हैं। इनका न्यूक्लियर सेफ्टी या न्यूक्लियर सिक्योरिटी सिस्टम से कोई संबंध नहीं है। अधिकारियों ने बताया कि इस तरह के इंफ्रास्ट्रक्चर में बाहरी वेंटिलेशन सिस्टम, पानी की आपूर्ति नेटवर्क और अन्य सहायक सेवाएं जैसी सुविधाएं शामिल होती हैं, जिनके डिज़ाइन अक्सर बड़े निर्माण प्रोजेक्ट्स के दौरान सिविलियन कॉन्ट्रैक्टर्स के साथ साझा किए जाते हैं। अधिकारियों ने बताया कि रूसी डिज़ाइन वाले VVER-1000 प्रेशराइज़्ड वॉटर रिएक्टर समेत मुख्य रिएक्टर सिस्टम कॉन्ट्रैक्टर नेटवर्क से अलग रखे गए हैं।</div><h2>कुडनकुलम को पहले भी साइबर खतरों का सामना करना पड़ा है?</h2><div>ताज़ा घटना कुडनकुलम प्लांट के सामने आई पहली साइबर सुरक्षा चुनौती नहीं है। 2019 में प्लांट में Dtrack मैलवेयर के ज़रिए साइबर घुसपैठ की बात सामने आई थी। साइबर सुरक्षा कंपनियों ने इसे उत्तर कोरिया के सरकारी समर्थन वाले 'लाज़रस ग्रुप' से जोड़ा था। यह मैलवेयर प्लांट के लोकल नेटवर्क से जुड़े एक एडमिनिस्ट्रेटिव कंप्यूटर पर पाया गया था। जांचकर्ताओं के अनुसार, यह सिस्टम की जानकारी, की-स्ट्रोक और नेटवर्क की डिटेल्स इकट्ठा करने में सक्षम था। उस समय, NPCIL ने शुरुआत में घुसपैठ की खबरों से इनकार किया था, लेकिन बाद में पुष्टि की कि एक एडमिनिस्ट्रेटिव सिस्टम प्रभावित हुआ था। कंपनी का कहना था कि रिएक्टर कंट्रोल सिस्टम अलग-अलग, आइसोलेटेड नेटवर्क से सुरक्षित थे जो इंटरनेट से जुड़े नहीं थे।&nbsp;</div><div>साइबर सुरक्षा के लिए थर्ड-पार्टी कॉन्ट्रैक्टर बने बड़ी चुनौती&nbsp;</div><div>हाल ही में हुई सुरक्षा चूक ने रिएक्टर कंट्रोल रूम के बाहर साइबर सुरक्षा जोखिमों को लेकर फिर से सवाल खड़े कर दिए हैं। हालांकि भारत का परमाणु ऊर्जा विभाग परमाणु गतिविधियों के लिए कड़े सुरक्षा उपाय करता है, लेकिन बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स में अक्सर कई प्राइवेट कंपनियां, कॉन्ट्रैक्टर और क्लाउड सर्विस प्रोवाइडर शामिल होते हैं। साइबर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर पूरी सप्लाई चेन में सिक्योरिटी स्टैंडर्ड्स एक जैसे मज़बूत नहीं हैं, तो ये बाहरी लिंक कमज़ोर कड़ी बन सकते हैं।</div><div>इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पॉन्स टीम (CERT-In) और न्यूक्लियर सिक्योरिटी एक्सपर्ट्स अब इस बात की जांच कर रहे हैं कि हमलावरों ने कॉन्ट्रैक्टर के सिस्टम तक कैसे पहुँच बनाई और डेटा कैसे निकाला। इस जांच का मकसद सिक्योरिटी में कमियों का पता लगाना और भारत के स्ट्रैटेजिक इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़े थर्ड-पार्टी नेटवर्क की सुरक्षा को मज़बूत करना होगा।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 13:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/a-dent-in-the-russia-india-nuclear-partnership-why-kudankulam-is-back-in-the-headlines</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Iran के राष्ट्रपति को ही जासूस बना लिया? मोसाद का अब तक का सबसे बड़ा गेम, IRGC के उड़े होश, फिर क्या हुआ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/iranian-president-into-a-spy-mossad-biggest-operation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कोई खुफिया एजेंसी कितनी दुस्साहसी हो सकती है? दुश्मन देश में जासूस भेज देगी। ऑपरेशन कर देगी, राज चुरा लेगी। इससे ज्यादा कुछ आपके दिमाग में आ रहा है क्या? लेकिन दुनिया में एक एजेंसी है जो हर बार ऐसा कुछ करती है कि गेम एक नए लेवल पर चला जाता है। हम मोसाद की बात कर रहे हैं। वही मोसाद जो पेजर में बम छुपा देती है और महीनों बाद उसे डेटोनेट करती है। अगले ही दिन वायरलेस सेट में धमाका करती है, उसका भी किसी को अंदेशा नहीं होता। लेकिन क्या आप ये कल्पना कर सकते हैं कि किसी देश का पूर्व राष्ट्रपति अपने ही दुश्मन देश का एजेंट बन जाए। ये कहानी ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की है। अमेरिका के एक बहुत बड़े अखबरा द न्यूयॉर्क टाइम्स ने ये दावा किया है कि अहमदीनेजाद को इजरायल ने अपने जासूस की तरह इस्तेमाल किया। महमूद अहमदीनेजाद 2005 से 2013 तक ईरान के राष्ट्रपति थे। उस दौरान वो ईरान के सबसे कट्टर नेताओं में गिने जाते थे। जब वो राष्ट्रपति थे तो अक्सर इजरायल के खिलाफ बड़े बड़े बयान दिया करते थे। इजरायल को अपना सबसे बड़ा दुश्मन बताते थे। उन्हीं के शासनकाल में ईरान ने अपना यूरेनियम प्रोग्राम शुरू किया था। जिसके बाद दुनिया के कई देशों को शक हुआ कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की कोशिश कर रहा है। उस समय ऐसा लगता था कि उन्हें इजरायल से सबसे ज्यादा नफरत है। लेकिन ईरान के पूर्व राष्ट्रपति अहमदीनेजाद को लेकर अब सबसे बड़ा ट्विस्ट आया है कि वही राष्ट्रपति पद से हटने के बाद से इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद के लिए काम कर रहे थे। यानी वो मोसाद के एजेंट बन गए थे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days" target="_blank">विदेश से लौटते ही मोदी का एक्शन! 2 दिन बाद बीजेपी में क्या होने वाला है?</a></h3><h2>कैसे शुरू हुई पूरी कहानी</h2><div>26 सितंबर 2016 ईरान के सुप्रीम लीडर आया अली खामनेई को तेहरान की एक इस्लामिक सेमिनरी से आमंत्रण आया। उस कार्यक्रम में उन्हें सेमिनरी के छात्रों को संबोधित करना था। कार्यक्रम में खामनेई जाते हैं। धर्म की बात करते हैं। साथ में उस समय ईरान की राजनीति के सबसे विवादित शख्स पर भी टिप्पणी करते हैं। कहते हैं कि अहमदीनेजाद मुझसे मिलने आए थे। मैंने उनसे अगला राष्ट्रपति चुनाव न लड़ने की सलाह उनको दी है। अपील की है। अगर वह चुनाव लड़ते हैं तो यह देश को दो हिस्सों में बांट सकता है। जिससे अंत में देश का ही नुकसान होगा। ठीक 7 महीने बाद 20 अप्रैल 2017 को ईरान के फॉर्मर प्रेसिडेंट महमूद अहमदीनेजाद&nbsp; राष्ट्रपति चुनाव का पर्चा भर देते हैं। बड़ी खबर यहां यह नहीं थी कि अहमदीनेजाद ने फिर से चुनाव लड़ने का फैसला किया। बल्कि बड़ी खबर यह थी कि उन्होंने रहबर मुहज्जम इंकलाब इस्लामी यानी ईरान की इस्लामिक क्रांति के सुप्रीम लीडर की अवहेलना की। सार्वजनिक रूप से खामनेई के मना करने के बाद भी अहमदीनेजाद ने पर्चा भरा। लेकिन गार्डियन काउंसिल ने उनकी उम्मीदवारी को खारिज कर दिया। ईरान में राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने के लिए गार्डियन काउंसिल का अप्रूवल मिलना जरूरी होता है। इसके लिए 12 मेंबर्स की सहमति आपको चाहिए होती है जो गार्डियन काउंसिल में बैठते हैं। छह सिविल लॉयर्स होते हैं जिनको पार्लियामेंट चुनती है वहां की और छह इस्लामिक धर्म गुरु होते हैं जिन्हें सीधे सुप्रीम लीडर चुनते हैं।&nbsp;</div><h2>खामनेई से नाराजगी</h2><div>अहमदीनेजाद 2005 से 2013 यानी दो टर्म्स के लिए ईरान के राष्ट्रपति रह चुके हैं। चार-चार साल का वहां कार्यकाल होता है। ईरानी सिस्टम में एक शख्स दो टर्म्स तक राष्ट्रपति रह सकता है। इसके बाद उसे न्यूनतम एक साल का गैप देना होता है। लगातार तीन नहीं लड़ सकते। 2017 में जब अहमदीनेजाद पर्चा भरते हैं तो कानूनी रूप से सही थे। अगर उनकी उम्मीदवारी को मंजूरी मिलती तो उनका सामना सर्विंग प्रेसिडेंट हसन रूहानी से होता। अब रूहानी जो थे अलोकप्रिय नहीं थे। रिजीम की ही पसंद के थे। लेकिन रूहानी और अहमदन एजाद के बीच अगर पॉपुलैरिटी कॉन्टेस्ट होता तो कौन जीतता ईरान में हर कोई जानता था। इसके बाद अहमदीनेजाद 2021 में चुनाव लड़ने की कोशिश करते हैं। जब रईसी जीतते थे। खामनेई की अनुमति उन्हें नहीं मिली। रईसी की असल में मृत्यु हो जाती है तो 2025 में फिर चुनाव होते हैं। तो एक बार फिर अहमदीनेजाद&nbsp; पर्चा भरना चाहते हैं। लेकिन रहबर साथ नहीं देते। यहां तक आते-आते अहमदन इजाज समझ जाते हैं कि खामनेई अपने जीते जी उन्हें प्रेसिडेंट बनने नहीं देंगे और अब अगर उन्हें सत्ता हासिल करनी है तो कोई दूसरा तरीका अपनाना होगा।&nbsp;</div><h2>मोसाद का अब तक का सबसे बड़ा ऑपरेशन</h2><div>मोसाद के इस ऑपरेशन की शुरुआत साल 2022 के आसपास हुई। मोसाद को लग रहा था कि अहमदीनेजाद ईरानी सत्ता से नाराज है और दोबारा देश की कमान संभालना चाहते हैं। फर्स्ट पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक इजराइली अधिकारियों का मानना था कि अहमदीनेजाद की ईरान के कामकाजी और कम कमाई वाले लोगों के बीच अब भी पकड़ है। ऊपर से वह ईरान के पुराने पॉलिटिकल स्ट्रक्चर का जाना माना चेहरा भी थे। ऐसे में अगर ईरान की मौजूदा सत्ता गिरती तो उन्हें नए नेता के तौर पर सामने लाया जा सकता था। यह अपने आप में एक बहुत हैरान करने वाली एक योजना थी। जिस नेता ने खुद के राष्ट्रपति रहते हुए इजराइल को कभी मुंह नहीं लगाया, उसी नेता को इजराइल अपना एजेंट बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन मोसाद का मकसद सिर्फ खुफिया जानकारी हासिल करना नहीं था। क्योंकि खुफिया जानकारी के लिए मोसाद इतना बड़ा रिस्क नहीं लेता। उसका असली मकसद ईरान की गद्दी पर अहमदीनेजाद को बैठाना था। अब मोसाद के सामने सबसे बड़ी चुनौती थी कि अहमदीनेजाद से बात कैसे हो और उसके लिए मुनासिब जगह क्या होगी? इसके लिए हंगरी की राजधानी बुडापेस्ट को चुना गया। न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक साल 2024 की शुरुआत में हंगरी सरकार के एक आला अधिकारी ने लुडोविका यूनिवर्सिटी ऑफ पब्लिक सर्विस के रेक्टर गिरगली डेली से संपर्क किया। उनसे क्लाइमेट चेंज पर एक कॉन्फ्रेंस करने और उसमें अहमदीनेजाद को बुलाने के लिए कहा गया। लेकिन यह कॉन्फ्रेंस केवल एक दिखावा था। असली मकसद था अहमदीनेजाद और इजराइली खुफिया अधिकारियों के बीच सीक्रेट मीटिंग करवाना। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक मोसाद के तत्कालीन चीफ डेविड बर्निया खुद अहमदीनेजाद से मिलने बुडापेस्ट पहुंचे। दावा है कि अहमदीनेजाद&nbsp; के स्पोक्सपर्सन और करीबी इलाय अली अकबर जवनफेकर को इजराइल की ओर से कई अंडर दी टेबल पेमेंट्स भी किए गए। इजराइली अफसरों ने अहमदीनेजाद की ट्रिप्स और स्टे का खर्च तक उठाया। इसके बाद उनके खेमे और मोसाद के अफसरों के बीच और भी कई मुलाकातें हुई।&nbsp;</div><h2>पुरानी कट्टर छवि बदलने की कोशिश</h2><div>कुछ मीडिया रिपोर्ट में ये भी दावा किया गया है कि अहमदीनेजाद ने पिछले कुछ सालों में अपनी पुरानी कट्टर छवि को बदलने की भी कोशिश की। उन्होंने अंग्रेजी सीखी, अपने पहनावे और पब्लिक इमेज में बदलाव किया। यहां तक कि ईरानी सत्ता की पॉलिसीज को क्रिटिसाइज करना भी शुरू किया। इजराइली खुफिया अधिकारियों को कथित तौर पर यह लग रहा था कि इस इमेज के साथ अहमदीनेजाद को आगे चलकर ईरान के एक नए लीडर के तौर पर पेश किया जा सकता है। लेकिन इस कहानी में सबसे ड्रामेटिक फेस फरवरी 2026 में आया। यरूशलम पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के घर के प्रेमाइसेस पर इजराइली हवाई हमला हुआ। इसमें उनके सुरक्षाकर्मियों और बख्तरबंद गाड़ी को निशाना बनाया गया। इसके बाद मोसाद के एजेंट कथित तौर पर अहमदीनेजाद को वहां से निकालकर तेहरान के एक सीक्रेट लोकेशन पर ले गए। लेकिन इसके बाद सब कुछ उतना स्मूथ नहीं रहा जैसा पहले था। दावा है कि अहमदीनेजाद इस पूरी कार्यवाही और युद्ध से नाराज हो गए थे। वे कुछ समय बाद उस सीक्रेट लोकेशन से बाहर निकल गए। न्यूयॉर्क टाइम्स ने चार सीनियर ईरानी अफसरों के हवाले से दावा किया गया कि इसके बाद ईरानी आलाकमान को अहमदीनेजाद के इजराइल से नजदीकियों की भनक लग गई थी। जिसके बाद आईआरजीसी की इंटेलिजेंस ब्रांच ने उन्हें हिरासत में लेकर नजरबंद कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor" target="_blank">ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?</a></h3><h2>आईआरजीसी ने फिर क्या किया?</h2><div>13 जुलाई को अमेरिकी अखबार न्यूयॉर्क टाइम्स की एक इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्ट में दावा किया गया है कि खामनेई के साथ विवाद के बाद अहमदीनेजाद अपने विश्वास पात्रों और सलाहकारों से विदेशी मदद के जरिए सत्ता हासिल करने पर बात करते थे। यह बात अखबार को अहमदीनेजाद के ही एक करीबी सहयोगी ने बताई है। अखबार ने एक डिटेल रिपोर्ट छापी जिसका टाइटल है इनसाइड इजराइल सीक्रेट ऑपरेशन टू कल्टीवेट अहमदीनेजाद। इसे मार्क मज़िटी, जुलनी बांस, फरनास फसीही और रन बर्गमन ने मिलकर लिखा है। इसमें दावा किया गया है कि 28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला किया तो उनका लक्ष्य केवल इस्लामिक रिजीम को खत्म करना नहीं था। एक ऐसे व्यक्ति को सत्ता भी सौंपना चाहते थे जो ईरान को अंदर से अच्छी तरह जानता हो। यह व्यक्ति ईरान के पूर्व राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद थे। वही अहमदीनेजाद जिन्हें सबसे कट्टर राष्ट्रपतियों में से एक माना जाता है ईरान के जितने हुए इस्लामिक क्रांति के बाद मोसाद ने बाकायदा इसके लिए प्लान बनाया था। कई ऑपरेशंस तैयार हुए थे। हमले के पहले मोसाद के मुखिया और दूसरे अधिकारी अहमदीनेजाद से विदेश में कई बार मिले भी और इस प्लान की पूरी जानकारी सीआईए को भी दी जा रही पर अंततः प्लान फेल हो गया। अखबार का दावा है कि अब इस प्लान के बारे में आईआरजीसी को पता चल चुका है। अखबार की रिपोर्ट से नहीं उससे काफी पहले। इसलिए अहमदीनेजाद ईरान में किसी जगह नजरबंद रखे गए हैं। हालांकि अहमदीनेजाद की तरफ से इस दावे को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया है। गाजा मीडिया पैलेस्टाइन क्रॉनिकल की रिपोर्ट के मुताबिक अहमदीनेजाद के दफ्तर ने मोसाद से संपर्क उन्हें भर्ती करने की कोशिश और उनकी नजरबंदी से जुड़े दावों को पूरी तरह मनगढ़ंत बताया है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 13:46:44 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/iranian-president-into-a-spy-mossad-biggest-operation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ब्राजील-अमेरिका-थाइलैंड ने जिस Ethanol से किया कमाल, भारत में उस पर क्यों मचा बवाल? जटिल सवालों का सरल जवाब 10 लाइन में समझें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/ethanol-worked-wonders-in-brazil-us-thailand-sparked-controversy-in-india-all-answers-in-10-lines]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>90 के दशक का दौर, पैदाइश बिहार की, जहां नए-नए जुगाड़ और देसी तिकड़म से हर नामुमकिन काम को मुमकिन बना दिया जाता था। यह वह दौर था जब अभाव ही आविष्कार की असली जननी हुआ करती थी। उस ज़माने में जब पेट्रोल के दाम बढ़ने लगते या उसकी किल्लत होती, तो लोग गैरेज में अपनी पुरानी याज़्दी, राजदूत या बुलेट खड़ी नहीं करते थे, बल्कि उसमें किरोसीन (मिट्टी का तेल) डालकर सड़कों पर धुआं उड़ाते निकल पड़ते थे। हालांकि इंजन खटखटाने लगता था और गाड़ी से सफेद धुएं का गुबार निकलता था, लेकिन गाड़ी चल पड़ती थी। इसी तिकड़मी माहौल में अक्सर यह कौतूहल और चर्चा भी गर्म रहती थी कि अगर महुआ की दारू से इंसान झूम सकता है, तो भला उससे मोटरसाइकिल कैसे चल सकती है? लोग हंसी-मजाक या गंभीर चौपालों में यह कयास लगाते थे कि जिस तरह स्पिरिट या किरोसीन से गाड़ियां रेंग सकती हैं, क्या पता आने वाले वक्त में यह महुआ की शराब भी गाड़ियों का ईंधन बन जाए! अपने देश में 2026 में कुछ वैसा ही हो रहा है। एक तरफ सोशल मीडिया पर वीडियो की बाढ़ है और हर कोई एक बोतल लिए हुए है और कह रहा है कि यह देखिए यह ऊपर रहा पेट्रोल और यह नीचे रहा इथेनॉल। नितिन गडकरी ने तो इथेनॉल इस्तेमाल करके सारी गाड़ियों का बांटाधार कर दिया। बहुत सारे यूजर्स नितिन गडकरी को भला-बुरा कह रहे हैं और कह रहे हैं कि एथनॉल डालकहमारी 12 लाख, 13 लाख, 14 लाख की गाड़ी को बर्बाद कर दिया। लोग वीडियो बना रहे हैं। कुछ लोग सवाल कर रहे हैं कि क्या एथनॉल मिश्रित पेट्रोल से गाड़ियां खराब हो रही हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों के इंजन फेल हो रहे हैं। क्या एथनॉल से गाड़ियों में जंग लग रही है। पार्ट-पुर्जे बेकार हो रहे हैं। क्या एथनॉल की वजह से गाड़ियों का माइलेज कम हो रहा है। आज तमाम सवालों का एमआरआई स्कैन करेंगे।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/small-weapon-has-ended-the-dragon-game-in-the-south-china-sea" target="_blank">एक छोटे से अस्त्र से South China Sea में ड्रैगन का गेम हुआ ओवर, भारत का नेकलेन ऑफ डॉयमंड उड़ाएगा होश!</a></h3><h2>1. सोशल मीडिया पर ई-20 पेट्रोल को लेकर क्या दावे किए जा रहे हैं?</h2><p>कुछ लोगों ने तो यहां तक दावा किया कि पेट्रोल में चींटी लग रही है। उन लोगों ने सोचा होगा कि गन्ने से इथेनॉल बनता है तो चींटी यहां भी लग सकती है। इन्हें कौन समझाए कि एथनॉल को पहले डिस्टलरी प्लांट में लिया जाता है। वहां फर्मेंट होता है, मिक्स होता है। उसमें चींटी नहीं लग सकती। ठीक उसी तरह जैसे दारू भले ही अंगूर के रस से बनती हो या जौ से बनती हो पर दारू में कभी चींटी लगते सुना है? तो जिस तरह दारू में चींटी नहीं लगती उसी तरह पेट्रोल में मिलाए गए एथनॉल में भी चींटी नहीं लगती। यह भ्रामक है। इसके अलावा बहुत सारे लोग वो पानी वाला बोतल ले घूम रहे हैं। ये कह रहे हैं कि ऊपर पेट्रोल है नीचे इथेनॉल है। तो जो बेसिक भी साइंस का स्टूडेंट है वो जानता है कि एथनॉल घुलनशील है। वो अलग-अलग नहीं हो सकता। जैसे दूध में हम कितना भी पानी मिला दें तो पानी अलग और दूध अलग बोतल में आप नहीं दिखा सकते उसी तरह इथेनॉल अलग और पेट्रोल अलग नहीं दिखा सकते तो यह खबर भी भ्रामक है।&nbsp;</p><h2>2. ब्राजील ने 50 साल पहले क्यों और कैसे बदला पूरा फ्यूल सिस्टम</h2><p>&nbsp;आज से करीब 50 साल पहले तक ब्राजील भी बाकी देशों की तरह ही पेट्रोल पर ही चलता था। लेकिन उसके पास अपनी जरूरत के हिसाब से पर्याप्त तेल मौजूद नहीं था। यही वजह थी कि वह भी अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से ही आयात करता था। लेकिन फिर आया साल 1973 जब दुनिया में तेल की किल्लत शुरू हुई। मिडिल ईस्ट में युद्ध छिड़ गया और ऑयल एक्सपोर्ट करने वाले देशों ने सप्लाई घटा दी और देखते ही देखते क्रूड ऑयल की कीमतों में कई गुना तक बढ़ोतरी हो गई। इसका सीधा असर ब्राजील की अर्थव्यवस्था पर पड़ने लगा। सरकार का इंपोर्ट बिल तेजी से बढ़ने लगा। इसी बीच ब्राजील को समझ आ गया कि अगर वह विदेशों के तेल पर ही निर्भर रहेगा तो भविष्य का हर संकट उसकी अर्थव्यवस्था को हिला सकता है। वहीं से ब्राजील की सबसे बड़ी एनर्जी रिवॉल्यूशन की शुरुआत हुई। साल 1975 में ब्राजील सरकार ने एक पूरा प्रोग्राम ल्च किया जिसका मकसद था पेट्रोल का विकल्प तैयार करना और इसके लिए सरकार ने इथेनॉल को चुना। दरअसल साल 1975 में भी इथेनॉल कोई नया फ्यूल नहीं था। इसका इस्तेमाल पहली बार 19वीं सदी में किया गया था। जब इंटरनल कंबस्शन इंजंस पर इसका प्रयोग किया गया। तब इथेनॉल को पहली बार फ्यूल के तौर पर देखा गया और तब से ही इसकी गाड़ियों का इस्तेमाल करने का भी प्रयास शुरू हो गया था। यहां तक कि हेनरी फोर्ड की पहली मॉडल टी कार भी पेट्रोल के साथ-साथ इथेनॉल पर भी चल सकती थी। लेकिन उस समय दुनिया में सस्ता क्रूड ऑयल आसानी से मिल जाता था। जिसकी वजह से ज्यादातर देशों ने पेट्रोल को अपना मुख्य फ्यूल बना लिया। लेकिन 1973 के दौरान जब ऑयल क्राइसिस के बाद ब्राजील ने इस पुराने विकल्प को एक बार फिर दोबारा से देखा क्योंकि इथेनॉल शुगरकेन यानी कि गन्ने से बनता है और तब ब्राजील के पास भरपूर मात्रा में गन्ना भी मौजूद था। सरकार ने सोचा तो फिर विदेशों से ऑयल मंगवाने की बजाय क्यों ना अपने ही खेतों से फ्यूल तैयार किया जाए और यहीं से पूरी कहानी बदल गई। सरकार ने किसानों को गन्ने उगाने के लिए सब्सिडी देना भी शुरू कर दिया। नई ईथेनॉल फैक्ट्रीज भी लगाई गई और कार कंपनियों को ऐसे इंजन बनाने के लिए खासकर की बढ़ावा दिया गया जो इथेनॉल पर चल सके। इतना ही नहीं सरकार ने इथेनॉल को देश भर में पहुंचाने के लिए स्टोरेज और सप्लाई नेटवर्क पर भी काफी काम किया और फ्यूल स्टेशन पर भी इसकी उपलब्धता बढ़ाने की तैयारी शुरू कर दी गई। यानी कि ब्राजील सिर्फ नया फ्यूल बनाने पर ही नहीं जुटा था बल्कि उसे तैयार करने, देश भर में पहुंचाने और गाड़ियों तक उपलब्ध कराने का भी पूरा इकोसिस्टम वह खड़ा कर रहा था।&nbsp; साल 2003 और यहीं से ब्राजील के इथनॉल प्रोग्राम को उसकी सबसे बड़ी ताकत मिल गई। क्योंकि इसी साल ब्राजील में पहली बार फ्लेक्स फ्यूल कार लॉन्च हुई। दरअसल इससे पहले लोग ऐसी गाड़ियां खरीद रहे थे जो सिर्फ इथेनॉल पर ही चलती थी। ऐसे में जब इथेनॉल की कमी हुई तो उनके पास कोई दूसरा विकल्प बचा ही नहीं और उनकी गाड़ी खड़ी हो गई।&nbsp;</p><h2>3. सरकार का क्या कहना है</h2><p>10 जुलाई को नरेंद्र मोदी सरकार ने एफएक्यू में यही दलीलें दी है। साफ कहा ई20 पेट्रोल ही अब स्टैंडर्ड है क्योंकि यह ज्यादा साफ है। कम प्रदूषण फैलाता है। इसकी ऑक्टेन रेटिंग ज्यादा है। एंटीनॉक प्रॉपर्टी बेहतर है। बेहतर पिकअप और एक्सीलरेशन देता है। इंजन बढ़िया तरीके से चलता है।&nbsp;</p><h2>4.&nbsp; अमेरिका में ई15</h2><p>अमेरिका में सबसे आम ईंधन E10 है। इसी के साथ कई राज्यों में इसके अनुकूल गाड़ियों के लिए E15 भी मौजूद है। फ्लेक्स फ्यूल गाड़ियां E85 का भी इस्तेमाल कर सकती हैं। जर्मनी, फ्रांस और फिनलैंड जैसे कई यूरोपीय देश बड़े पैमाने पर E10 पेट्रोल का इस्तेमाल करते हैं। इसी के साथ पुरानी गाड़ियों के लिए E5 भी उपलब्ध है। चीन ने वायु प्रदूषण से निपटने, ईंधन सुरक्षा को बेहतर करने और साफ-सुथरे ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा देने के लिए कई प्रांतों और बड़े शहरों में E10 पेट्रोल को शुरू किया है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/how-did-america-gain-independence-250-years-ago" target="_blank">250 साल पहले कैसे आजाद हुआ अमेरिका,  बिखरी हुई कंगाल कॉलोनी के दुनिया की सबसे बड़ी ताकत को हराने की कहानी</a></h3><h2>5. दुनिया के इन देशों में भी बिकता है एथेनॉल वाला पेट्रोल</h2><table class="table table-bordered"><tbody><tr><td>&nbsp;<b>देश</b></td><td><b>&nbsp;ब्लीडिंग %</b></td><td><b>कब से शुरुआत हुई&nbsp;</b></td><td><b>&nbsp;मुख्य स्रोत</b></td></tr><tr><td>ब्राजील</td><td>&nbsp;E27.5 से E30&nbsp;</td><td>&nbsp;1931 में 5% अनिवार्य किया। आधुनिक अभियान 1975 (Pro-Álcool कार्यक्रम) से शुरू हुआ।</td><td>&nbsp;गन्ना</td></tr><tr><td>अमेरिका</td><td>&nbsp;E10 (मानक) और E15</td><td>&nbsp;1970 के दशक के अंत से (गैसोहोल के रूप में) और 2005 के ऊर्जा नीति अधिनियम के बाद अनिवार्य हुआ।</td><td>&nbsp;मक्का</td></tr><tr><td>भारत</td><td>E20</td><td>&nbsp;2001-2003 में पायलट प्रोजेक्ट। 2014 में 1.5% था, जो अप्रैल 2025 तक पूरी तरह 20% तक पहुँच गया।</td><td>&nbsp;गन्ना, मक्का और अनाज</td></tr><tr><td>पराग्वे</td><td>E30</td><td>&nbsp;2000 के दशक के मध्य से धीरे-धीरे प्रतिशत बढ़ाते हुए अब 30% पर है।</td><td>&nbsp;गन्ना और अनाज</td></tr><tr><td>कनाडा</td><td>&nbsp;E10</td><td>&nbsp;2010 से संघीय स्तर पर 5% अनिवार्य था, जो अब स्वच्छ ईंधन नियमों के तहत बढ़ रहा है।</td><td>&nbsp;मक्का, गेंहू</td></tr><tr><td>यूरोपीय संघ</td><td>&nbsp;E5 से E10 (फ्रांस, जर्मनी में अधिक)</td><td>&nbsp;2009 के 'रिन्यूएबल एनर्जी डायरेक्टिव' के बाद से यूरोपीय देशों में तेजी आई।</td><td>&nbsp;चुकंदर, अनाज</td></tr><tr><td>&nbsp;चीन</td><td>&nbsp;E10</td><td>&nbsp;2002 में पायलट प्रोजेक्ट शुरू हुआ, 2017 से राष्ट्रव्यापी विस्तार की नीति बनी।</td><td>&nbsp;मक्का और पुराना अनाज</td></tr><tr><td>&nbsp;थाइलैंड</td><td>&nbsp;E20 मुख्य ईंधन</td><td>&nbsp;2005-2008 के दौरान व्यावसायिक रूप से बड़े पैमाने पर रोलआउट किया गया।</td><td>गन्ना और कसावा</td></tr></tbody></table><h2>6. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान भी एथनॉल वाला पेट्रोल</h2><p>देश में E5 2003 से पहली बार लागू की गई। E5 मतलब होता है कि पेट्रोल में 5% एथनॉल मिलाना। तो 2005 से पेट्रोल में एथनॉल मिलाया जा रहा है। 2004 में आई मनमोहन सिंह की सरकार ने भी इसे जारी रखा और E10 कर दिया। फिर अब गडकरी&nbsp; आए तो E20 कर दिया नहीं।</p><h2>7. एथनॉल ब्लेंडिंग की इतनी जल्दी क्यों है?</h2><p>सरकार इसके लिए इतनी जल्दी में इसलिए है क्योंकि भारत इस समय एक ट्रांजिशन फेज से गुजर रहा है। भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक तनाव (जैसे हाल के वर्षों में मध्य पूर्व के संकट) भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर भारी दबाव डालते हैं। एथनॉल तुरंत राहत देने वाला एकमात्र विकल्प है। इसके लिए देश को 10-15 साल इंतजार नहीं करना है। मौजूदा गाड़ियों में ही 20% तक एथनॉल बिना किसी बड़े इंजन बदलाव के इस्तेमाल किया जा सकता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor" target="_blank">ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?</a></h3><h2>8. ईवी (EV) बनाम भारत का कोल-बेस्ड पावर ग्रिड</h2><p>इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी को पूरी तरह क्लीन कहना अभी भारत के संदर्भ में एक भ्रम है, जैसा कि आपने बिल्कुल सही पकड़ा। भारत में आज भी लगभग 60-65% बिजली का उत्पादन कोयले को जलाकर होता है। अगर कोई व्यक्ति ईवी चला रहा है, तो उसकी गाड़ी की टेलपाइप से धुआं नहीं निकल रहा, लेकिन उस गाड़ी को चार्ज करने के लिए जो बिजली आ रही है, वह थर्मल पावर प्लांट में कोयला जलाकर ही बन रही है। यानी प्रदूषण सिर्फ शहर से हटकर पावर प्लांट वाले इलाके में शिफ्ट हो रहा है। इसलिए जब तक हमारा पावर ग्रिड पूरी तरह सोलर या विंड एनर्जी पर शिफ्ट नहीं होता, तब तक ईवी पूरी तरह ग्रीन नहीं है।</p><h2>9. EV का कुल कार्बन फुटप्रिंट</h2><p>इलेक्ट्रिक वाहन (EV) का कुल कार्बन फुटप्रिंट समझने के लिए सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि गाड़ी चलाते समय धुआं निकलता है या नहीं, बल्कि उसके पूरे जीवन चक्र को देखना होता है। ईवी का सबसे बड़ा शुरुआती कार्बन उत्सर्जन उसकी बैटरी बनाने की प्रक्रिया से आता है, क्योंकि लिथियम, निकेल, कोबाल्ट जैसी धातुओं के खनन, प्रोसेसिंग और बैटरी निर्माण में काफी ऊर्जा खर्च होती है। इसके अलावा वाहन निर्माण और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों के उत्पादन से भी उत्सर्जन जुड़ा होता है। हालांकि, पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में EV को चलाने के दौरान टेलपाइप से कोई CO₂ या जहरीली गैस नहीं निकलती, जिससे लंबे समय में इसका कुल उत्सर्जन कम हो सकता है। भारत जैसे देश में ईवी का कार्बन फुटप्रिंट काफी हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि उसे चार्ज करने वाली बिजली किस स्रोत से आ रही है। क्योंकि भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी काफी हद तक कोयले पर आधारित है, इसलिए ईवी पूरी तरह शून्य-उत्सर्जन वाहन नहीं कहा जा सकता। यहां प्रदूषण सड़क से हटकर बिजली उत्पादन केंद्रों तक पहुंच जाता है। लेकिन जैसे-जैसे भारत सोलर, विंड और अन्य नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों की हिस्सेदारी बढ़ाएगा, ईवी का कार्बन फुटप्रिंट भी लगातार कम होता जाएगा। साथ ही बैटरी रीसाइक्लिंग और स्वच्छ बैटरी निर्माण तकनीक विकसित होने से ईवी भविष्य में और ज्यादा पर्यावरण-अनुकूल बन सकते हैं। इसलिए ईवी को पूरी तरह ग्रीन नहीं बल्कि पेट्रोल-डीजल वाहनों की तुलना में कम उत्सर्जन वाला विकल्प कहना ज्यादा सही होगा।</p><h2>10. पूरी तरह एथनॉल पर शिफ्ट क्यों नहीं हो सकते?</h2><p>एथनॉल एक सप्लीमेंट है, रिप्लेसमेंट नहीं। हम 100% एथनॉल पर इसलिए शिफ्ट नहीं हो सकते क्योंकि अगर देश की सारी गाड़ियों को 100% एथनॉल से चलाना हो, तो हमें इतनी खेती करनी पड़ेगी कि खाने की फसलों (गेहूं, धान) के लिए जमीन ही नहीं बचेगी। यह 'फूड बनाम फ्यूल'का एक खतरनाक संकट खड़ा कर देगा। सामान्य पेट्रोल इंजन 100% एथनॉल नहीं झेल सकते। उसके लिए फ्लेक्स-फ्यूल इंजन की जरूरत होगी, जिसमें समय लगेगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 15:43:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/ethanol-worked-wonders-in-brazil-us-thailand-sparked-controversy-in-india-all-answers-in-10-lines</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ख़ामेनेई को जिस शहर में दफनाया गया, उसका 'कोहिनूर' से है क्या कनेक्शन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-connection-between-the-city-where-khamenei-was-buried-and-koh-i-noor]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>28 फरवरी के बाद से राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप कभी शांति दूत बन जाते हैं। कभी दुनिया के सबसे बड़े सेनापति, लेकिन ईरान के मामले में चिट भी मेरी और पट भी मेरी का इरादा रखने वाले ट्रंप की एक न चली। अमेरिका ने ईरान के साथ युद्ध विराम खत्म करके दोबारा हमले की शुरुआत ऐसे समय में की, जब ईरान अयातुल्लाह अली खामनेई को सुपर्द-ए-खाक करने के लिए एक विश्वस्तर का बड़ा आयोजन शुरू कर चुका था। अमेरिकी अखबरा गार्डियन की खबर के अनुसार 6 दिनों के आयोजन में अली खामनेई के तकरीबन 3 करोड़ समर्थकों के शामिल होने की बात सामने आई है। अली खामनेई का पार्थिव शरीर इराक के नजफ हवाई अड्डे से मशहद तक लाया गया।&nbsp;ईरान के दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई को उत्तर-पूर्वी शहर मशहद में सुपुर्द-ए-खाक (दफ़न) किया गया। यह दफ़न एक हफ़्ते से चल रही उस ऐतिहासिक और लंबी शवयात्रा का अंतिम पड़ाव थी, जो ईरान और इराक के सबसे मुकद्दस (पवित्र) धार्मिक केंद्रों तेहरान, कोम, नजफ और कर्बला की गलियों से गुज़रती हुई... आज अपने आखिरी ठिकाने मशहद पहुंची है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/amid-the-iran-conflict-president-trump-made-a-post-that-sparked-a-stir" target="_blank">ईरान युद्ध के बीच राष्ट्रपति ट्रंप ने किया ऐसा पोस्ट, मची खलबली!</a></h3><h2>क्या है मशहद का इतिहास</h2><p>ईरान का सबसे पवित्र और दूसरा सबसे बड़ा शहर खामनेई का जन्म भी इसी शहर में हुआ था। मशहद देश के उत्तरपूर्वी कोने में&nbsp; पड़ता है। यह तेहरान से करीब 900 किमी दूर है और खुरासान रजवी प्रांत की राजधानी है। यह अफगानिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की सीमाओं के काफी करीब है। इसी वजह से सदियों से यह मध्य एशिया और ईरान के बीच सांस्कृतिक यात्रा और संस्कृति का एक बड़ा केंद्र रहा है। मशहद की आबादी करीब 30 लाख है। लेकिन यहां भीड़ काफी ज्यादा रहती है क्योंकि पर्यटक और तीर्थ यात्री बड़ी संख्या में आते हैं। हर साल दुनिया भर से इतने पर्यटक और तीर्थ यात्री मशहद आते हैं कि कई मौकों पर बाहर से आने वालों की संख्या यहां की मूल आबादी से भी ज्यादा हो जाती है। मशहद का मतलब होता है शहादत की जगह यानी जहां कोई शहीद हुआ हो। शियाओं के आठवें इमाम इमाम रजा यहीं शहीद हुए थे। मशहद पहले सनाबाद नाम की एक बस्ती के रूप में जाना जाता था। इमाम रजा के दफन होने के बाद इसका नाम पड़ा मशद रज़वी जो आगे चलकर सिर्फ मशहद रह गया। इमाम रजा का पूरा नाम अली इब्न मूसा अल रजा था। उनका जन्म 765 ईवी में मदीना में हुआ था। नवीं सदी की शुरुआत में अब्बासी खलीफा अल मामून ने उन्हें उत्तराधिकारी घोषित किया और मदीना से खुरासान बुलाया। लेकिन कुछ समय बाद 818 ईसवी में तूस के पास उनकी मृत्यु हो गई। शिया परंपरा का मानना है कि उन्हें जहर देकर शहीद किया गया था। जबकि कुछ ऐतिहासिक स्रोत इसे स्वाभाविक मृत्यु भी बताते हैं। इसी कारण इस स्थान को मशहद यानी शहादत की जगह कहा जाने लगा। बाद में यहीं उनकी मजार बनी और उसके चारों ओर धीरे-धीरे आज का मशहद शहर विकसित हुआ।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/mojtaba-15000-missiles-deployed-who-is-the-next-target" target="_blank">मोजतबा की 15 हजार मिसाइलें तैनात! अगला टारगेट कौन?</a></h3><h2>ईरान का सबसे मुकद्दस मुकाम</h2><p>मशहद... जो ईरान में शिया मुसलमानों के सबसे पवित्र धार्मिक स्थल, 'इमाम रज़ा दरगाह' का घर है। यह वही पावन दरगाह है जहाँ शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रज़ा का मक़बरा है जो ईरान की सरज़मीं पर दफ़न होने वाले इकलौते शिया इमाम हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">ऐसे में इसी पाक दरगाह के साए में अयातुल्ला खामेनेई को सुपुर्द-ए-खाक किया जाना... न सिर्फ बेहद गहरा धार्मिक महत्व रखता है, बल्कि उनके पूरे जीवन और उनकी विरासत को हमेशा-हमेशा के लिए शिया इस्लाम के इस सबसे पवित्र मुकाम से जोड़ देता है।</span></p><h2>ईरान के बड़े नेताओं के लिए दफ़नाने की जगह</h2><p>इमाम रज़ा श्राइन ईरान की कई जानी-मानी हस्तियों के लिए भी अंतिम विश्राम स्थल बन गया है। 2024 में हेलीकॉप्टर दुर्घटना में मौत के बाद पूर्व राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी को वहीं दफ़नाया गया था। इस श्राइन में खामेनेई को दफ़नाए जाने से इस्लामिक रिपब्लिक के नेताओं के लिए एक प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण विश्राम स्थल के तौर पर इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।</p><h2>दफ़नाने में चार महीने से ज़्यादा की देरी क्यों हुई?</h2><p>इस्लाम में आम तौर पर शव को जल्द से जल्द, अक्सर 24 घंटे के भीतर दफ़ना दिया जाता है। इसलिए खामेनेई के अंतिम संस्कार में हुई देरी बहुत असामान्य थी। ईरानी अधिकारियों का कहना है कि उनकी हत्या के बाद देश की सुरक्षा स्थिति को देखते हुए अंतिम संस्कार को टाल दिया गया था। खामेनेई की मौत का कारण बने हमले उस समय हुए जब ईरान, अमेरिका और इज़राइल के बीच ज़बरदस्त सैन्य टकराव चल रहा था। अधिकारियों का तर्क था कि हमले के तुरंत बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक अंतिम संस्कार करने से सुरक्षा का गंभीर ख़तरा पैदा हो सकता था, क्योंकि लाखों शोक मनाने वाले लोग और हमलों की चपेट में आ सकते थे। साथ ही, अधिकारियों को देश के भीतर अशांति का भी सामना करना पड़ रहा था; जहाँ एक तरफ़ उनके समर्थक शोक मना रहे थे, वहीं सरकार-विरोधी समूह उनकी मौत का जश्न मना रहे थे, जिससे सुरक्षा से जुड़ी और चुनौतियाँ पैदा हो गई थीं। जून में एक नाज़ुक युद्धविराम समझौता होने के बाद ही ईरानी अधिकारियों ने देश भर में अंतिम संस्कार के कार्यक्रम आयोजित किए।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bahrain-kuwait-and-jordan-the-middle-east-goes-up-in-smoke" target="_blank">भाड़ में गया सीजफायर, धुआं-धुआं हुआ मिडिल ईस्ट, ईरान ने पैट्रियट सिस्टम और ड्रोन बेड़े को उड़ाया</a></h3><h2>खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था?</h2><p>इतनी लंबी देरी की वजह से यह अटकलें भी लगने लगीं कि खामेनेई का शव कहाँ रखा गया था। ईरान के सरकारी मीडिया के अनुसार, चार महीने की इस पूरी अवधि के दौरान उनके शव को सुरक्षित और तापमान-नियंत्रित मेडिकल रेफ्रिजरेशन सुविधा में रखा गया था। केमिकल एम्बामिंग (रसायनों से शव को सुरक्षित रखने की प्रक्रिया) के विपरीत, जिसे आमतौर पर इस्लामी परंपराओं में सही नहीं माना जाता, रेफ्रिजरेशन से शव में कोई बदलाव किए बिना उसे सुरक्षित रखा जा सकता है। जानकारों का कहना है कि शिया इस्लामी कानून युद्ध या राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरे जैसी असाधारण स्थितियों में शव को दफनाने में देरी करने और उसे कोल्ड स्टोरेज में रखने की इजाज़त देता है। इससे ईरानी अधिकारियों को धार्मिक नियमों का पालन करते हुए खामेनेई के शव को सुरक्षित रखने में मदद मिली।&nbsp;</p><h2>ईरान और इराक में अंतिम संस्कार का जुलूस</h2><p>खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में सात दिनों तक चलीं और आज मशहद में दफ़नाए जाने से पहले कई शहरों से गुज़रीं।</p><h2>इस रास्ते में ये जगहें शामिल थीं:</h2><p>तेहरान, जहाँ मुख्य राजकीय अंतिम संस्कार शुरू हुआ</p><p>कोम, जो शिया धार्मिक शिक्षा का ईरान का प्रमुख केंद्र है</p><p>इराक में नजफ़ और कर्बला, जो शिया इस्लाम के दो सबसे पवित्र शहर हैं</p><p>मशहद, जहाँ इमाम रज़ा दरगाह में खामेनेई को दफ़नाया गया।</p><p>मशहद में दफ़नाए जाने के साथ ही, खामेनेई के हफ़्ते भर चलने वाले अंतिम संस्कार की रस्में पूरी हो गई।</p><h2>कोहिनूर को लूटने वाले ने मशहद को बनाई अपनी राजधानी</h2><p>18वीं सदी में ईरान के बादशाह नादिर शाह जिसे ईरान का नेपोलियन भी कहा जाता था। उसने मशहद को अपनी राजधानी बनाया। नादिर शाह वही बादशाह है जिसने 1739 में दिल्ली पर हमला किया था और कोहिनूर हीरा लूट कर अपने साथ ले गया था। 1747 में नादिर शाह की हत्या के बाद यह हीरा अफगान सेनापति अहमद शाह दुरानी को मिल गया। इसके बाद यह शाह शुजा दुरानी के पास पहुंचा। जिन्होंने सैन्य सहायता और राजनीतिक शरण के बदले कोहिनूर महाराजा रणजीत सिंह को दे दिया था। उनकी मौत के बाद लाहौर की संधि के तहत नाबालिग महाराजा दिलीप सिंह से कोहिनूर ईस्ट इंडिया कंपनी को सौंप दिया गया। जहां से यह क्वीन विक्टोरिया के पास पहुंचा और तब से अब तक यह ब्रिटिश शाही खजाने का हिस्सा है।</p><p>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 14:18:32 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विदेश से लौटते ही मोदी का एक्शन! 2 दिन बाद बीजेपी में क्या होने वाला है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>इस वक्त सबसे ज्यादा चर्चा अगर किसी चीज की हो रही है तो वो है केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के दफ्तर में हुए बड़े प्रशासनिक बदलाव की। पहले निजी सचिव अमर सिंह को हटाया गया। फिर आयुष शरण और शैलेश कुमार सिंह को भी उनके पदों से मुक्त कर दिया गया। ऐसे में सवाल यही है कि ऐसा क्या हुआ कि इतने बड़े स्तर पर एक साथ कार्रवाई करनी पड़ी। सरकार की तरफ से अभी तक इन अधिकारियों को हटाने की कोई आधिकारिक वजह नहीं बताई गई है। आदेश जारी हुए,&nbsp; अधिकारी हटाए गए लेकिन कारण सार्वजनिक नहीं किया गया। यही बात इस पूरे घटनाक्रम को सामान्य ट्रांसफर से अलग बनाती है। राजनीतिक गलियारों में कई तरह की चर्चाएं चल रही हैं। कहा जा रहा है कि मोदी सरकार अपने तीसरे कार्यकाल में मंत्रालयों और मंत्रियों के दफ्तर की कार्यप्रणाली की गहन समीक्षा कर रही है। जिन अधिकारियों के कामकाज को लेकर सवाल है, या जिनकी कार्यशैली सरकार की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर रही है उन पर एक्शन हो सकता है। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि तो नहीं है। लेकिन लगातार हो रहे बदलावों ने इन अटकलों को जरूर हवा दे दिया है। चर्चा ये भी है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विदेश दौरे से लौटने के बाद सरकार कुछ और बड़े प्रशासनिक और राजनीतिक फैसले ले सकती है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jairam-ramesh-jibe-environment-ministry-has-become-a-ministry-of-sermons-governance-has-failed" target="_blank">Jairam Ramesh का तंज: पर्यावरण मंत्रालय बना प्रवचन मंत्रालय, governance फेल</a></h3><h2>भूपेंद्र यादव के स्टॉफ को क्यों हटाया गया?</h2><p>विस्पर्स इन द कॉरिडोर वेबसाइट की रिपोर्ट के अनुसार&nbsp; भूपेंद्र यादव को पता ही नहीं था कि उनके स्टॉफ को हटाया जा रहा है। उन्हें तब पता चला जब सचिवालय में चिट्ठी टाइप होने चली गई। अगर विस्पर्स इन द कॉरिडोर की खबर सच है तो ये अपने आप में एक ऐतिहासिक मामला है कि मंत्री ऑफिस में भी नहीं बताया गया। शैलेंद्र यादव को लेकर इंडियन एक्सप्रेस ने दावा किया है कि वो बहुत पुराने वक्त से भूपेंद्र यादव के साथ थे। आरएसएस के जमाने से वो जुड़े थे। एक महीना राजनीति में बहुत लंबा वक्त होता है। भूपेंद्र यादव लुटियंस दिल्ली के जिस बंगले में रहते हैं वो बंगला नंबर 9 है। इस बंगले में आज से करीब एक महीने पहले की बात है तृणमूल कांग्रेस के सारे बागी सांसद इसी बंगले में बैठे थे। उस वक्त ये चर्चा चल रही थी कि 20 की संख्या कैसे पूरी होगी। लेकिन उस बंगले से आई तस्वीर में कहीं भी भूपेंद्र यादव नजर नहीं आ रहे थे। कहा ये भी गया कि भूपेंद्र यादव लाइमलाइट में नहीं आना चाहते थे और इसलिए उन्होंने सांसदों की तस्वीरें खिंचवाई और बीजेपी का आंकड़ा 300 के पार कर दिया। एक व्यक्ति जो बीजेपी को बंगाल जिताकर आया हो। जो टीएमसी को तोड़ रहा हो। उसके सारे के सारे स्टॉफ को पीएमओ के आदेश पर हटा दिया गया। दावे के अनुसार भूपेंद्र यादव को बाद में दी जा रही है।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/three-officials-including-bhupender-yadav-ps-removed-is-this-a-sign-of-a-cabinet-reshuffle" target="_blank">Bhupender Yadav के PS समेत 3 अधिकारी हटाए गए, क्या Cabinet Reshuffle की आहट है?</a></h3><h2>क्या भूपेंद्र यादव का हो सकता है इस्तीफा?</h2><p>भूपेंद्र यादव एक पॉवरफुल मंत्री हैं और बीजेपी के नंबर 2 के नेता के बहुत करीबी माने जाते हैं। संगठन के अंदर बहुत अच्छी पकड़ है। राजनीतिक हलकों में दबी जुबान से ये भी कहा जा रहा है कि भूपेंद्र यादव का इस्तीफा भी हो सकता है। पीएम मोदी 12 जुलाई को अपने विदेश दौरे से लौट रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में पीएम मोदी ने साफ कहा कि हम एक गोल रखते हैं और उसके पूरा होते ही दूसरा बड़ा गोल रखते हैं। पीएम मोदी एक टारगेट ओरिएंटेंड लीडर हैं। वो टारगेट सेट करते हैं और उस टारगेट पर फिट नहीं बैठने पर 'पूरे घर को बदल डालो' वाली नीति अपनाते हैं। 12 जुलाई को एक बैठक होने वाली है। उसके बाद बड़े बड़े फैसले हो सकते हैं।&nbsp;</p><h2>राजनाथ सिंह और गडकरी को नई जिम्मेदारी?</h2><p>सूत्रों के हवाले से तो ये भी दावा किया जा रहा है कि राजनाथ सिंह को आगामी राष्ट्रपति के कार्यकाल समाप्त होने के बाद ये जिम्मेदारी दी जा सकती हैं। वहीं नितिन गडकरी के गवर्नर बनाए जाने की भी चर्चा है। इसके अलावा भी कैबिनेट में बड़े बदलाव हो सकते हैं। कैबिनेट में बदलाव तो एक हफ्ते पहले ही हो जाना था। लेकिन एनडीए की सहयोगी दलों को भी मंत्रिमंडल में जगह दिया जाना है और उसके लिए नेगोसिएशन का दौर चल रहा था। कौन सा विभाग किसके पास जाए इसको लेकर ये उस वक्त छोड़ा लंबा खिंच गया।&nbsp;</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bhupender-yadav-four-key-aides-removed-environment-ministry-political-row" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव के 4 करीबी सहयोगियों को अचानक पद से हटाया गया, विपक्ष ने पूछा- क्या गड़बड़ी हुई थी?</a></h3><h2>पीएम का राजस्थान दौरा और...&nbsp;</h2><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने&nbsp; बीते सप्ताह पचपदरा में देश की सबसे आधुनिक और पहली ग्रीन फील्ड रिफाइनरी का उद्घाटन किया। इस प्लांट का उद्घाटन पहले ही करना था। लेकिन जब प्रधानमंत्री का कार्यक्रम बना तो वहां मालूम चला कि आग लग गई। सूत्रों के हवाले से बताया जाता है कि उस वक्त दो प्रशासनिक अधिकारयों के हटाए जाने को कहा गया था। लेकिन उस वक्त भी राजनस्थान की राजनीति को दिल्ली से चलाने वाले एक बड़े नेता ने मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है। लेकिन इसके बाद पेड़ लगाने का कार्यक्रम रखा गया। सूत्रों के अनुसार पीएमओ की तरफ से कहा गया था कि वहां पर दो पेड़ की बातचीत चल रही थी और उस पेड़ में पीपल नहीं लगना था तो जो पेड़ लगाना था वो खेजड़ी का लगाना था। लेकिन हुआ इसका उल्टा।</p><h2>राजस्थान का वृक्षारोपण विवाद</h2><p>पौधारोपण के बाद प्रधानमंत्री के आधिकारिक एक्स हैंडल से तस्वीरें साझा करते हुए लिखा गया कि पर्यावरण संरक्षण हम सभी की जिम्मेदारी है और उन्हें पचपदरा में 'खेजड़ी' का पौधा लगाने का सौभाग्य मिला है। इस पोस्ट के सामने आते ही आरएलपी सांसद हनुमान बेनीवाल ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा को टैग करते हुए एक्स पर एक पोस्ट लिखी। बेनीवाल ने तंज कसते हुए सवाल किया मैं प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी से पूछना चाहता हूं कि आज आप राजस्थान के पचपदरा आए, वृक्षारोपण भी किया, क्या आपकी सरकार ने खेजड़ी की नई किस्म का आविष्कार किया है या फिर राजस्थान के मुख्यमंत्री श्री भजनलाल जी ने पीपल को खेजड़ी बताकर आपसे पौधारोपण करवा दिया ? हनुमान बेनीवाल की ओर से सोशल मीडिया पर यह दावा किए जाने के बाद कि लगाया गया पौधा खेजड़ी नहीं बल्कि पीपल का है, इंटरनेट पर यह मुद्दा तेजी से वायरल हो गया। इसके कुछ समय बाद ही प्रधानमंत्री के सोशल मीडिया हैंडल से उस संबंधित पोस्ट और तस्वीरों को हटा दिया गया।&nbsp;</p><h2>क्या राजस्थान में भी होगा कोई बड़ा बदलाव?&nbsp;</h2><p>फिर यह पूछा गया कि जब खेजरी तय हुआ तो किसने बदला? कहा जाता है न कि जब वक्त उल्टा चलता है तो यही हो जाता है कि फिर एक के बाद एक गलतियां जो है वो सामने आने लगती है। प्लांट के अंदर पिछली बार भी बवाल मचा था। आग लगने की वजह से तो यही पूछा गया कि भाई फिर अब यह किसकी जिम्मेदारी है? फिर पेड़ वाला विवाद तो राजस्थान में भी कुछ बदलाव अगर देखने को मिल जाएं तो आश्चर्य नहीं होगा।&nbsp;</p><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Jul 2026 14:34:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/modi-swings-into-action-immediately-upon-returning-from-abroad-what-is-set-to-happen-in-bjp-2-days</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Trump के टॉरगेट पर लॉरेंस बिश्ननोई! क्या है अमेरिका का Operation Hardball]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/mri/lawrence-bishnoi-in-trump-crosshairs-what-is-america-operation-hardball]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>जस्टिन ट्रूडो एक दिन अपनी संसद में खड़े होकर क्रेडिबल एलिगेशन समझा रहे थे। कनाडा में एक आतंकी की हत्या के पीछे भारत का हाथ बता रहे थे।&nbsp;लेकिन 7 जुलाई को कनाडा के सीबीसी पर एक पत्रकार ने पुलिस की डेपुटी कमिश्नर लीसा मोलैंड से एक सवाल पूछा कि पूर्व प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने तो यह आरोप लगाया था कि हरदीप सिंह निजर की हत्या में भारत सरकार शामिल थी उसके एजेंट क्या आपकी इस जांच में इस आरोप को लेकर कोई सबूत मिला है? इस सवाल पर डिप्टी कमिश्नर पहले कुछ सेकंड्स के लिए चुप रहे। लेकिन बाद में उन्होंने साफ कहा कि जांच ऑर्गेनाइज्ड क्राइम पर फोकस्ड है और अब तक जांच में ऐसा कुछ भी सामने नहीं आया जो भारत सरकार या भारतीय अधिकारियों को इस हत्या से जोड़ता हो। जिसके बाद साफ है कि ट्रूडो का क्रेडिबल एलिगेशन औंधे मुंह गिरा।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">कनाडा पुलिस ने यह खुलासा तब किया है जब कुछ ही घंटों पहले कनाडा के साथ-साथ यूएस में भी लॉरेंस बिश्नोई से जुड़े 50 ठिकानों पर रेड पड़ी। दो दर्जन लोगों को गिरफ्तार किया गया। इसके बाद जस्टिस डिपार्टमेंट ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में निज्जर हत्या से जुड़े खुलासे हुए। जिसमें आरोपी के तौर पर गैंगस्टर लॉरेंस बिश्नोई और गोल्डी बराड का नाम आया। हालांकि अमेरिका ने भी निज्जर हत्याकांड में भारत सरकार की किसी भूमिका का आरोप नहीं लगाया है। कैलिफोर्निया से लेकर कनाडा तक बिश्नोई गैंग पर पड़ी रेड में क्या-क्या सामने आया? लॉरेंस गोल्डी बराड का गैंग कैसे ऑपरेट करता है। कैसे भय को हथियार बनाया जाता है। ऐसे आरोप भी हैं जो भ्रष्ट अफसरों के कान खड़े कर सकते हैं।&nbsp; जांच में पंजाब के एक एसएओ का नाम क्यों आ रहा है? और क्या जिस लॉरेंस को भारत में एक ही जेल से दूसरी जेल ले जाना संभव नहीं है, एक कानून के तहत वो प्रोविजन किया गया है। उस लॉरेंस बिश्नोई को भारत अमेरिका के हवाले करेगा? तमाम मुद्दों का एमआरआई स्कैन करेंगे।</span></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/major-crackdown-on-indian-gangsters-in-the-us-canada-and-europe" target="_blank">अमेरिका-कनाडा और यूरोप में भारतीय गैंगस्टर्स पर बड़ा एक्शन, हत्या, जबरन वसूली और ड्रग्स से जुड़े आरोपों में चार्जशीट दाखिल</a></h3><p><div>ईरान के साथ युद्ध विराम तोड़कर अमेरिका ने दुनिया में आर्थिक अस्थिरता की वापसी करा दी है। दूसरी तरफ अमेरिका की जांच एजेंसी ने अपनी कार्रवाई का रुख उस गैंग की तरफ कर दिया है जिसकी दहशत भारत, अमेरिका और कनाडा समेत दुनिया के कई देशों में है। अमेरिका ने संगठित अपराध के खिलाफ एक अभियान शुरू किया है। इस अभियान को ऑपरेशन हार्ड वॉल नाम दिया गया है। अभियान के तहत गैंगस्टर लॉरेंस बिश्ननोई के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया है। लॉरेस के साथ ही एक और गैंगस्टर गोल्डी बरार के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज हुआ है। एफबीआई ने लॉरेंस और गोल्डी को खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का दोषी माना है।&nbsp;</div><h2>कैसे शुरू हुआ पूरा मामला</h2><div>हरदीप सिंह निजर कनाडा के ब्रिटिश कोलंबिया में सरे शहर में रहता था। साल 1997 में पंजाब से कनाडा चला गया। शुरुआत में वहां प्लमर के तौर पर काम करता था। बाद में उसने कनाडा में शादी भी की। साल 2020 से वह सरे में एक गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का अध्यक्ष था। इसी साल हिंदुस्तान ने उसे आतंकवादी घोषित किया। निजर को खालिस्तान टाइगर फोर्स का हेड बताया जाता था। साल 2023 में कनाडा के हिसरे में गुरुद्वारे की पार्किंग में दो नकाबपोश हमलावरों ने उसे गोली मारकर उसकी हत्या कर दी। इसके बाद जब कनाडा की सरकार ने इस हत्या की जांच करनी शुरू की। ट्रूडो ने इल्जाम लगाया कि इस हत्या के पीछे हिंदुस्तान है। इसके बाद यह भी सामने आया कि कनाडा अमेरिका के साथ मिलकर इस मामले की जांच कर रहा है क्योंकि फाइव आईएस का अलायंस है। दोनों के बीच में इंटेलिजेंस शेयरिंग होती है। इसी वजह से दोनों देशों ने मिलकर खुफिया जानकारी पर काम के एक दूसरे को शेयर किया।&nbsp; 7 8 जुलाई जिसकी हम बात कर रहे हैं। आज का जो क्रैकडाउन यूएस में हुआ है। इसी मामले से जुड़ा हुआ था। अमेरिकी एजेंसियों ने इसे ऑपरेशन हार्ड बॉल कहा। 50 से ज्यादा जगहों पर छापेमारी हुई। यूएस, कनाडा और यूरोप के पुलिस ने मिलकर 24 लोगों को अरेस्ट किया। इनमें से 11 कैलिफोर्निया में पकड़े गए। इसलिए कैलिफोर्निया का नाम भी आ रहा है। ये सारे लोग हिंदुस्तान से जुड़े तीन बड़े इंटरनेशनल क्राइम सिंडिकेट से जुड़े बताए जा रहे हैं। गिरफ्तारी 24 की हुई है। लेकिन कुल आरोपी 37 हैं। अमेरिका के जस्टिस डिपार्टमेंट ने जो इंडकमेंट यानी आरोप पत्र जारी किया है उसके मुताबिक इनमें से दो आरोपी हिंदुस्तान की जेलों में रहते हुए अपना इंटरनेशनल क्राइम नेटवर्क चला रहे हैं।&nbsp;</div></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/canada-admits-there-is-no-link-between-the-indian-government-and-nijjar-killing" target="_blank">ट्रूडो के जाते ही बदले ओटावा के सुर, कनाडा ने माना- निज्जर की हत्या में भारत सरकार का कोई लिंक नहीं</a></h3><p><h2>दस्तावेज़ों में अंडरवर्ल्ड नेटवर्क का पूरा ब्लूप्रिंट</h2><div>अमेरिकी जांच एजेंसियों के मुताबिक लॉरेंस बिश्नोई-गोल्डी बराड़ नेटवर्क का ब्लूप्रिंट तैयार है। दावा है कि कभी छात्र राजनीति से पहचान बनाने वाला लॉरेंस बिश्नोई जेल में रहते हुए भी तस्करी से पहुंचाए गए मोबाइल फोन और इंटरनेट के जरिए अपने अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क को संचालित करता रहा। अमेरिका, कनाडा और यूरोप तक फैले इस नेटवर्क को संभालने के लिए अलग-अलग क्षेत्रों में भरोसेमंद सहयोगी तैनात किए गए थे। FBI के मुताबिक लॉस एंजेलिस एरिया में लाखों डॉलर की रंगदारी मांगी गई। एक मामले में 50 लाख डॉलर तक की मांग का आरोप है। जांच में जग्गू भगवानपुरिया नेटवर्क का भी उल्लेख है, जिसके कथित तौर पर दुनिया भर में 1,000 से अधिक सदस्य और सहयोगी हैं।</div><h2>FBI ने गोल्डी बराड़ की सूचना पर रखा 50,000 डॉलर</h2><div>का इनामः FBI ने गोल्डी बराड़ की सूचना देने वाले को 50,000 डॉलर का इनाम देने का ऐलान किया है। FBI ने अपील की है कि अगर किसी के पास गोल्डी बराड़ के बारे में जानकारी हो तो वे FBI की हेल्पलाइन 1-SOO-CALL-FBI पर संपर्क करें या FBI की वेबसाइट के माध्यम से सूचना साझा करें। एफबी आई के मुताबिक गोल्डी बराड़ कथित तौर पर लॉरेंस बिश्नोई के क्राइम सिंडिकेट ग्रुप का उत्तर अमेरिका में प्रमुख ऑपरेटर है। FBI के मुताबिक, गोल्डी बराड़ कैलिफोर्निया समेत अमेरिका और कनाडा में कई गंभीर आपराधिक गतिविधियों में शामिल रहा है। उसके खिलाफ गिरफ्तारी वॉरंट जारी है।</div><h2>बंदूक से ज्यादा डर को ब्रांड बनाया</h2><div>कनाडा, अमेरिका और यूरोप में भारतीय मूल के कारोबारियों व प्रवासियों से रंगदारी वसूली-हिंसा बढ़ने पर अमेरिकी एजेंसियों ने जांच शुरू की। 'ऑपरेशन हार्डबॉल' में सैकड़ों अधिकारी जांच में जुटे। भारत से जुड़े 3 संगठित अपराध नेटवर्क लॉरेंस बिश्नोई, जग्गू भगवानपुरिया और रविंदर सिंह ढांडा के गिरोहों का इसमें जिक्र है। 37 लोग आरोपी हैं। 24 आरोपी गिरफ्तार हुए। 11 कैलिफोर्निया में, एक इंडियाना, एक जॉर्जिया, 3 कनाडा और एक स्पेन में पकड़े गए। 7 पहले से हिरासत में थे। चार्जशीट के अनुसार, भारतीय जेलों से संचालित गिरोह विदेशों में मौजूद नेटवर्क के जरिए ड्रग्स तस्करी, रंगदारी, हथियार सप्लाई और टारगेटेड किलिंग करते हैं। हर वारदात के बाद सोशल मीडिया पर जिम्मेदारी लेकर लोगों में डर पैदा किया जाता, ताकि अगला शिकार बिना विरोध रंगदारी दे दे। दस्तावेज के अनुसार इसी डर के सहारे ये भारत से लेकर अमेरिका और कनाडा तक नेटवर्क फैलाते गए। गरीब व नाबालिग युवा भर्ती किए जाते हैं।</div><h2>पंजाब के एसएचओ ने मांगी 4 लाख डॉलर की रंगदारी</h2><div>अटॉनों कार्यालय के शीर्ष अभियोजक बिल एस्सायली ने कहा कि पंजाब का एक एसएचओ अमेरिका में बसे परिवार से 4 लाख डॉलर रंगदारी मांगने में शामिल था। भारत में रह रहे रिश्तेदारों पर हत्या के झूठे केस की धमकी दी गई थी।' इसके बाद होशियारपुर के एसएसपी ने टांडा थाने के एसएचओ गुरिंदरजीत सिंह नागरा को लाइन हाजिर कर आरोपों की जांच के आदेश दिए।</div><h2>क्या अमेरिका मांगेगा लॉरेंस का प्रत्यर्पण?</h2><div>ऑपरेशन हार्ड बॉल के बाद सबसे बड़ा सवाल अब लॉरेंस बिश्नोई को लेकर खड़ा हो गया है। क्या उसका प्रत्यर्पण होगा। कनाडा के एक सीनियर पुलिस अधिकारी ने बयान दिया है कि अमेरिका, निज्जर हत्याकांड और अन्य मामलों में मुकदमे के लिए भारत से लॉरेंस बिश्नोई के प्रत्यर्पण की मांग कर सकता है। फिलहाल लॉरेंस बिश्नोई भारत की जेल में बंद है।</div><div>&nbsp;</div></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Jul 2026 14:38:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/mri/lawrence-bishnoi-in-trump-crosshairs-what-is-america-operation-hardball</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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