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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[55 किलो वजन घटाने वाले Ram Kapoor ने फिटनेस पर की खास बातचीत, Ozempic लेने वालों को दी खास सलाह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/ram-kapoor-who-lost-55-kg-offers-special-advice-to-those-taking-ozempic]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दिसंबर 2024 में राम कपूर ने अपने वजन घटाने के ट्रांसफॉर्मेशन से सोशल मीडिया यूजर्स को हैरान कर दिया था। उन्होंने बताया था कि उन्होंने 18 महीने में 55 किलो वजन कम किया। राम ने यह बदलाव हेल्दी डाइट और वर्कआउट की मदद से किया था। हालांकि, कई लोगों ने उनके वजन घटाने का क्रेडिट वजन कम करने वाली दवाओं को देना शुरू कर दिया। हाल ही में मिस्त्री स्टार ने मैशेबल इंडिया को इंटरव्यू दिया। इस दौरान उन्होंने वजन कम करने वाली दवाओं और वर्कआउट की जरूरत को लेकर खुलकर बात की।</p><h2><strong>55 किलो वजन घटाने के बाद राम कपूर ने दी सलाह</strong></h2><p>बातचीत के दौरान होस्ट ने गौतमी कपूर की फिटनेस और उनकी फिट बॉडी की तारीफ की। इस पर राम कपूर तुरंत बातचीत में शामिल हो गए और कहा कि गौतमी को यह फिटनेस विरासत में मिली है। गौतमी ने कहा, "गिफ्टेड क्या है? मैं वर्कआउट करती हूं। मेरे पति को देखो! मुझे उनके अच्छे लुक्स से मैच करना है।"</p><p>इसके बाद राम कपूर ने अपने वजन घटाने के सफर के बारे में बात करते हुए कहा, "मेरा वर्कआउट वाला है, इसका गॉड गिफ्ट है। जो भी ओजेम्पिक लेना चाहता है, बिंदास लो, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि तुम वर्कआउट नहीं कर सकते हो। ओजेम्पिक से सिर्फ पतले होते हो, मसल लॉस होता है, ओजेम्पिक बिना वर्कआउट के मतलब मरेगा तू।"</p><p>राम ने आगे कहा कि वजन कम करने वाली दवाएं लेने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए। लेकिन उनके मुताबिक, वर्कआउट की जगह कोई चीज नहीं ले सकती। उन्होंने कहा, "वर्कआउट का कोई शॉर्टकट नहीं है। ओजेम्पिक लें या माउंजारो, लेकिन वर्कआउट के बिना आप मर जाएंगे।"</p><p>राम कपूर ने उन लोगों पर भी निशाना साधा जो मानते हैं कि उन्होंने बिना वर्कआउट किए वजन कम किया और मसल्स बनाई हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे लोग बिना जानकारी के किसी भी तरह की बातें करते हैं, इसलिए उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लेना चाहिए।</p><p><iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/12t5Dk70EXY?si=Ee-K5vSv03JWY9dj" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe></p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/working-mothers-face-severe-anxiety-and-sleep-deprivation-after-maternity-leave" target="_blank" rel="noopener">Women Health: Maternity Leave के बाद Office लौटने वाली महिलाओं में बढ़ती है गंभीर Anxiety</a></h3><h2><strong>राम कपूर ने क्यों घटाया था वजन?</strong></h2><p>राम कपूर को बड़े अच्छे लगते हैं में उनके किरदार के लिए खास तौर पर जाना जाता है। उन्होंने बताया कि उस दौरान वह महीने में 27 दिन लगातार शूटिंग करते थे। नयनदीप रक्षित को दिए एक इंटरव्यू में राम ने बताया था कि उन्हें शुगर और ब्लड प्रेशर जैसी कई परेशानियां थीं।</p><p>डॉक्टर ने उन्हें चेतावनी दी थी कि अगर उन्होंने इसी तरह काम करना जारी रखा तो उनकी जान को खतरा हो सकता है और उन्हें स्ट्रोक भी आ सकता है। राम जानते थे कि उन्हें काम कम करना होगा, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सकते थे क्योंकि वह टीवी के सबसे बड़े शोज में से एक का हिस्सा थे। वह एकता कपूर और अपनी को-स्टार साक्षी तंवर को निराश नहीं करना चाहते थे।</p><p>इसके बाद उन्होंने वर्कआउट शुरू किया और 30 किलो वजन दो बार कम किया, लेकिन उनका तरीका लंबे समय तक चलने वाला नहीं था। उस समय उनका वजन 140 किलो था और वह 20 कदम तक चलने के बाद ही थक जाते थे।</p><p>राम ने बताया, "मैं उस समय स्कॉटलैंड में विद्या बालन के साथ नियत की शूटिंग कर रहा था। पहाड़ों में ठंड थी, लेकिन मैं 20 कदम भी नहीं चल पाता था और फिर मुझे बैठना पड़ता था। मेरी सांस फूल जाती थी। मैं इतना अस्वस्थ था। उस समय मेरा वजन 140 किलो था।"</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/managing-relationship-strain-and-mental-fatigue-after-ivf-failure-with-counseling" target="_blank" rel="noopener">IVF Cycle के मुश्किल दौर में Counselor की मदद से रिश्ते और मानसिक सेहत को ऐसे संभालें</a></h3><h2><strong>अब खुद को 25 साल के जैसा फिट मानते हैं राम</strong></h2><p>राम कपूर ने बताया कि वह दिन में तीन बार इंसुलिन लेते थे। लेकिन वजन कम करने के बाद अब उन्हें लगता है कि वह अपनी जिंदगी के सबसे फिट दौर में हैं। उन्होंने मजाकिया अंदाज में कहा, "मैं 25 साल के बंदर जैसा हूं। मैं हमेशा से बंदर था, लेकिन अब मैं जवान बंदर हूं।"</p><p><strong>डिस्क्लेमर: </strong>इस लेख में वजन घटाने की दवाओं, डाइट और एक्सरसाइज से जुड़ी जानकारी राम कपूर के इंटरव्यू में कही गई बातों पर आधारित है। वजन घटाने वाली दवाओं का इस्तेमाल या डाइट और एक्सरसाइज में बदलाव करने से पहले डॉक्टर या योग्य हेल्थ एक्सपर्ट की सलाह जरूर लें। हर व्यक्ति का शरीर और स्वास्थ्य अलग होता है, इसलिए किसी दूसरे व्यक्ति के अनुभव को अपनी स्थिति पर लागू न करें। यह लेख किसी भी तरह की मेडिकल सलाह का विकल्प नहीं है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 12:59:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Women Health: Maternity Leave के बाद Office लौटने वाली महिलाओं में बढ़ती है गंभीर Anxiety]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/working-mothers-face-severe-anxiety-and-sleep-deprivation-after-maternity-leave]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>महिलाओं के शरीर में प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद कई बदलाव होते हैं। जिस कारण महिलाओं के शरीर, मूड और पूरी सेहत पर इसका असर होता है। कई बार मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटना महिलाओं के लिए काफी चैलेंजिंग हो सकता है। मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटने के दौरान कई महिलाओं को एंग्जायटी, तनाव और गिल्ट महसूस होता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि आखिर मैटरनिटी लीव के बाद ऑफिस लौटने में महिलाओं का एंग्जायटी क्यों बढ़ सकता है।</p><h2>मैटरनिटी लीव के बाद ऑफिस जाने में क्यों महसूस होती है एंग्जायटी</h2><p>मैटरनिटी लीव के बाद कई महिलाओं को काम पर लौटने में खुशी नहीं बल्कि तनाव महसूस होता है। वह काम पर लौटने के दौरान घबराहट और बेचैनी फील करती हैं। इस दौरान महिलाओं को कई बातों का डर भी सताता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/managing-relationship-strain-and-mental-fatigue-after-ivf-failure-with-counseling" target="_blank" rel="noopener">IVF Cycle के मुश्किल दौर में Counselor की मदद से रिश्ते और मानसिक सेहत को ऐसे संभालें</a></p><p>कई महिलाओं को मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटने में घबराहट महसूस होती है। क्योंकि यह सिर्फ शेड्यूल में बदलाव नहीं बल्कि इसमें जिम्मेदारियों, पहचान और प्राथमिकताओं में होने वाले बदलाव भी शामिल हैं।</p><p>नई मां का शरीर और मन बच्चे के जन्म के बाद ठीक हो रहा होता है। इसके अलावा महिलाएं &nbsp;हार्मोनल बदलाव, बच्चे की देखभाल की मुश्किलों और नींद की कमी में तालमेल बिठाने की कोशिश करती हैं। इस दौरान काम पर अच्छा प्रदर्शन करने का दबाव, कभी-कभी काम की जगह पर सहयोग न मिलने वाली नीतियों और बच्चे की चिंता की वजह से उनको लगातार एंग्जायटी और गिल्ट महसूस होता है।</p><p>जब महिलाओं को ऑफिस और घर में सही तरह से सपोर्ट नहीं मिलता है, तो उनको ऐसा फील होता है कि वह अपनी पहचान को खो रही हैं। ऐसे में एंग्जायटी होना आम है।</p><p>बच्चे के जागने की वजह से कई बार महिलाओं की नींद भी नहीं पूरी हो जाती है। जिस कारण थकान और नींद की वजह से भी उनको एंग्जायटी महसूस होने लगती हैं।</p><p>कई नई मां काम पर जाने के दौरान चिड़चिड़ापन भी महसूस करती हैं। असल में ऐसा महिलाओं के साथ ओवरबर्डन की वजह से होता है।</p><h2>जानें क्यों डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी</h2><p>दरअसल, जब भी कोई महिला मैटरनिटी लीव के बाद अपने काम पर वापस लौटती है, तो उसको परिवार और ऑफिस दोनों की ओर से सहयोग मिलना चाहिए। काम में फ्लेक्सिबिलिटी, ब्रेस्टफीडिंग में मदद और अपनी बात को खुलकर कह पाने वाला माहौल मिलने पर महिलाओं की दिक्कतें कम हो सकती हैं।</p><p>इस दौरान किसी भी महिला के लिए उनके पार्टनर का सपोर्ट बेहद जरूरी होता है।</p><p>अगर आपको एंग्जायटी ज्यादा महसूस हो रही है, तो आप डॉक्टर की सलाह पर थेरेपी भी ले सकती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 12:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/working-mothers-face-severe-anxiety-and-sleep-deprivation-after-maternity-leave</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[IVF Cycle के मुश्किल दौर में Counselor की मदद से रिश्ते और मानसिक सेहत को ऐसे संभालें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/managing-relationship-strain-and-mental-fatigue-after-ivf-failure-with-counseling]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>IVF यानी इन विट्रो फर्टिलाइजेशन लाखों कपल के लिए माता-पिता बनने की उम्मीद बन चुका है। हालांकि आईवीएफ के इंजेक्शन या दवाएं ज्यादा मुश्किल नहीं होती है। बल्कि महिलाएं एक सप्ताह के अंदर इस ट्रीटमेंट की आदत डाल लेती हैं। लेकिन इस प्रोसेस में असली थकान मानसिक रूप से होती है। जो ट्रीटमेंट के दौरान महिलाओं के आसपास रहता है। इस दौरान लंबा इंतजार, बात को छिपाने की मजबूरी और फैमिली के सवालों से महिलाएं अक्सर मानसिक रूप से परेशान हो जाती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस मुश्किल समय में कपल्स खुद को कैसे संभाल सकते हैं।</p><h2>एम्ब्रियो ट्रांसफर के बाद का इंतजार</h2><p>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक आईवीएफ में एम्ब्रियो ट्रांसफर के बाद महिलाओं के लिए 14 दिन घबराहट और उम्मीद वाले होते हैं। कई बार 2 हफ्ते का समय कई सालों जितना लंबा लगता है। कई पेशेंट्स बार-बार कैलेंडर देखती हैं। महिलाएं इस दौरान अक्सर पेट पर हाथ रखकर अपने आने वाले बच्चे से बातें करती थीं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/sore-throat-and-cold-prevention-habits-during-changing-weather" target="_blank" rel="noopener">गले की खराश और जुकाम से बचाव के लिए Health Experts ने बताए जरूरी नियम</a></p><p>लेकिन जब कोई आईवीएफ फेल होता है, तो यह सिर्फ मेडिकल फेलियर नहीं बल्कि महिला के लिए बहुत मुश्किल समय होता है। लोगों को उम्मीद होती है कि आप नॉर्मल होकर अगले दिन अपने काम पर लौट जाएं, जबकि यह दर्द वास्तन में रियल होता है। इसलिए एक्सपर्ट की सलाह है कि न तो खुद को कमजोर समझें और न ही ओवररिएक्ट करें।</p><h2>महिलाएं खुद को करती हैं ब्लेम</h2><p>अक्सर महिलाएं ट्रीटमेंट के दौरान खुद को ब्लेम करने लगती हैं। उनके मन में सवाल आने लगते हैं कि क्या शादी के बाद उन्होंने ज्यादा वेट कर लिया, लेट लाइट काम करने की वजह से ऐसा हुआ या एक ट्रिप की वजह से ऐसा हुआ। जबकि इन सभी सवालों का जवाब नहीं है। &nbsp;इनफर्टिलिटी थायराइड या शुगर जैसी ही एक नॉर्मल मेडिकल कंडीशन होती है। यह किसी की गलती के कारण नहीं है। इस ट्रीटमेंट के फेल होने पर स्मार्ट और समझदार महिलाएं भी अपना कॉन्फिडेंस खो देती हैं।</p><h2>रिश्ते पर पड़ता है असर</h2><p>इस ट्रीटमेंट के स्ट्रेस का असर कई बार पति-पत्नी के रिश्ते पर भी देखने को मिलता है। अक्सर पति की चुप्पी को पत्नी उसका अनकेयरिंग एटीट्यूड समझ लेती है। जब देर रात पत्नी इस पर बात करना चाहती हैं, लेकिन पति सोकर सब भूलना चाहता है। इस मौके पर गलत दोनों में से कोई नहीं है। बस दोनों के दुख जताने का तरीका अलग है।</p><h2>खुद को कैसे संभाले</h2><p>अगर आप भी इस मुश्किल दौर से बाहर निकलना चाहती हैं, तो कुछ बातों का ध्यान रखना चाहिए।</p><h2>कम लोगों से शेयर करें अपनी बात</h2><p>पति-पत्नी मिलकर यह तय कर लें कि इस ट्रीटमेंट के बारे में किसे बताना है और किसको नहीं बताना है। क्योंकि आपका सर्कल जितना छोटा होगा, आपको भी उतने ही कम सवालों का सामना करना पड़ेगा।</p><h2>2 हफ्ते के इंतजार को पहले से करें प्लान</h2><p>एम्ब्रियो ट्रांसफर के बाद के 2 सप्ताह में कपल को खुद को छोटे-मोटे कामों में व्यस्त रखना चाहिए। शाम को बैठकर मूवी देख सकते हैं, साथ में वॉक कर सकते हैं या स्ट्रीट फूड का लुत्फ उठा सकते हैं।</p><h2>काउंसलर की मदद</h2><p>किसी भी काउंसलर से बात करने ज्यादा महंगा नहीं बल्कि यह ट्रीटमेंट का एक जरूरी हिस्सा होता है।</p><h2>ब्रेक है जरूरी</h2><p>अगर आपको एक साइकिल के बाद दूसरे साइकिल के बीच में 1 से 2 महीने का ब्रेक चाहिए, जो वह ब्रेक जरूर लें। क्योंकि इस दौरान खुद को रिलैक्स करना बेहद जरूरी है।</p><h2>पतियों के लिए खास टिप्स</h2><p>एक्सपर्ट के मुताबिक अगर आपकी पत्नी उदास है, तो उनकी उदासी को फौरन फिक्स करने की कोशिश नहीं करना चाहिए। बस उनके पास बैठें, उनके साथ रहें। आपका यह छोटा सा सपोर्ट भी उनके लिए काफी मायने रखता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 12:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/managing-relationship-strain-and-mental-fatigue-after-ivf-failure-with-counseling</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[गले की खराश और जुकाम से बचाव के लिए Health Experts ने बताए जरूरी नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/sore-throat-and-cold-prevention-habits-during-changing-weather]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बदलते मौसम में अक्सर सर्दी-जुकाम और खांसी के लक्षण जरुर देखने को मिलते हैं। कई बार गले की खराश से हम सभी परेशान हो जाते हैं। गले का दर्द भी समस्या बन जाता है। ऐसे मौसम में खुद का ध्यान रखना भी बेहद &nbsp;जरुरी है। कमजोर इम्यूनिटी के कारण भी गले में खराश, सर्दी-जुकाम और स्वास्थ्य संबंधित अन्य समस्याओं होती है, इससे बचने के लिए लाइफस्टाइल में कुछ अच्छी आदतों को जरुर अपनायें।</p><p><strong>बदलते मौसम में गले की खराश और सर्दी-जुकाम से बचने के लिए क्या करें?</strong></p><p>हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, प्रतिदिन अपने रुटीन में हेल्दी आदतें अपनाने से इंफेक्शन का खतरा कम हो जाता है और गले की जलन जैसी समस्याओं से राहत प्रदान होती है।</p><p><strong>हाथों की साफ-सफाई का ध्यान रखें</strong></p><p>सबसे जरुरी है कि अपने हाथों को नियमति रूप से साबुन और पानी से धोएं, जैसे कि-</p><p>- सार्वजानिक जगहों (पब्लिक प्लेस) से लौटने के बाद</p><p>- पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करने के बाज</p><p>- खांसने और छींकने के बाद</p><p>ध्यान रखें कि बिना धुले हाथों से अपनी आंखों, नाक और मुंह को छूने से बचें, क्योंकि वायरस इन्हीं रास्तों से शरीर में घुस जाते हैं।</p><p><strong>शरीर में पानी की कमी न होने दें</strong></p><p>पूरे दिन पर्याप्त मात्रा में &nbsp;पानी जरुर पिएं। गुनगुना पानी, सूप और अन्य लिक्विड गले में नमी बनाए रखने और जलन कम करने में मदद कर सकती हैं। गर्म ड्रिंक्स आराम तो देते हैं, लेकिन ये वायरल इंफेक्शन को रोक नहीं सकते हैं। अब ज्यादा गर्म ड्रिंक से बचें, क्योंकि इनसे गले को नुकसान पहुंच सकता है।</p><p><strong>घर के अंदर हवा का वेंटिलेशन बनाए रखें</strong></p><p>जितना हो सके घर, ऑफिस और क्लासरुम जैसी जगहों पर हवा की वेंटिलेशन को अच्छे से प्रबंधन करने का प्रयास करे, खासकर वहां जहा कई लोग इकट्ठा होते हैं। जिन लोगों को सांस से संबंधित लक्षण वाले लोगों से थोड़ा दूर रहे। भीड़-भाड़ वाली बंद जगहों पर या जहां इंफेक्शन का खतरा ज्यादा हो, वहां अच्छी तरह फिट होने वाला मास्क जरुर पहनें।</p><p><strong>बैलेंस डाइट लें</strong></p><p>अपने रोज के खाने में फल, सब्जियां, साबुत अनाज, दालें, ड्राई फ्रूट्स और पर्याप्त प्रोटीन शामिल करें। इनसे ऐसे पोषक तत्व मिलते हैं, जो शरीर के इम्यून सिस्टम को बेहतर बनाए रखने के सहायक है।</p><p><strong>पर्याप्त नींद लें और एक्सरसाइज करें</strong></p><p>रोजाना रात को 7 से 9 घंटे की नींद जरुर लें। अगर आप नियमित रुप से फिजिकल एक्टिविटी और सोने का एक फिक्स टाइम आपकी ओवऑल हेल्थ और इम्यूनिटी को बेहतर बनाता है।</p><p><strong>गले में जलन पैदा करने वाली चीजों से बचें</strong></p><p>इस दौरान सिगरेट का धुआं, वेपिंग, एरोसोल, धूल और वायु प्रदूषण गले और सांस नली में जलन पैदा करते हैं, जिससे लक्षण और भी बिगड़ सकते हैं। इसलिए गुनगुने नमक के पानी से गरारे करने से गले की खराश में आराम मिलेगा। लेकिन सर्दी-जुकाम को रोका नहीं जाता सकता है।</p><p><strong>वैक्सीनेशन को लेकर सदैव अपडेट रहें</strong></p><p>इन्फ्लूएंजा और COVID-19 के वैक्सीनेशन इन खास इंफेक्शनों से बचाव में मदद करते हैं, लेकिन ये नॉर्मल सर्दी-जुकाम को पूरी तरह से नहीं रोक सकते हैं।</p><p>अगर आपको गले में खरास के साथ सांस लेने या कुछ निगलने में परेशानी हो रही है, तो तुरंत डॉक्टर को दिखाएं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 11:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/sore-throat-and-cold-prevention-habits-during-changing-weather</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Fiber और Protein के मामले में Quinoa vs Brown Rice क्या बेहतर, कैसे करें डाइट में शामिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/quinoa-provides-more-fiber-and-complete-protein-than-brown-rice]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आजकल हर कोई सेहत को लेकर काफी जागरुक है और अपनी डाइट में चावल के ऑप्शन को तलाश रहे हैं। वेट लॉस और बेहतर पाचन के लिए अक्सर ब्राउन राइस और क्विनोआ का नाम सबसे ऊपर आता है। लेकिन जब बात फाइबर की आए, तो मन में सवाल यह आता है कि इन दोनों में से कौन सा अनाज ज्यादा फायदेमंद है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि आपकी सेहत के लिए क्या बेहतर है।</p><h2>जानिए किसमें कितना होता है फाइबर</h2><p>अगर 100 ग्राम पके हुए अनाज के आधार पर तुलना की जाए, तो दोनों के पोषक तत्वों में काफी फर्क देखने को मिलता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/women-experiencing-menopause-need-emotional-support-from-family" target="_blank" rel="noopener">Health Tips: महिलाओं में Menopause के लक्षण दिखने पर इमोशनल सपोर्ट की अनदेखी बढ़ाती है तनाव</a></p><p>100 ग्राम पके हुए क्विनोआ में करीब 2.8 ग्राम फाइबर प्रदान करता है।</p><p>वही 100 ग्राम पके हुए ब्राउन राइस में करीब 1.6 से 1.8 ग्राम फाइबर देता है।</p><p>इसका मतलब है कि ब्राउन राइस की तुलना में क्विनोआ में करीब 50 से 75% तक ज्यादा फाइबर होता है। वहीं दोनों ही अनाज शरीर की दैनिक फाइबर जरूरतों को पूरा करने में सहायता करता है। लेकिन उतनी बराबर मात्रा में खाने पर क्विनोआ से आपका अधिक फाइबर मिलेगा।</p><h2>शरीर के लिए फाइबर क्यों जरूरी</h2><p>फाइबर युक्त भोजन न सिर्फ पेट को साफ करने बल्कि पाचन दुरुस्त करने तक सीमित नहीं बल्कि इसके अन्य कई बड़े फायदे हैं।</p><p>एक शोध के मुताबिक फाइबर से भरपूर भोजन को पचने में थोड़ा अधिक समय लगता है। इससे आपका पेट लंबे समय तक भरा हुआ महसूस होता है और आप भी बार-बार अनहेल्दी खाने से बचते हैं।</p><p>एक रिपोर्ट के अनुसार, अधिक फाइबर के सेवन से दिल की बीमारियों और कोलन के कैंसर का खतरा और टाइप-2 डायबिटीज का जोखिम काफी हद तक कम हो जाता है।</p><h2>फाइबर के अलावा प्रोटीन में भी आगे क्विनोआ</h2><p>ब्राउन राइस और क्विनोआ के बीच का लेवल सिर्फ फाइबर तक सीमित नहीं है। प्रोटीन और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों के मामले में भी क्विनोआ काफी आगे है।</p><p>100 ग्राम पके क्विनोआ में प्रोटीन की मात्रा करीब 4.4 ग्राम होती है। वहीं 100 ग्राम ब्राउन राइस में सिर्फ 2.3 से 2.7 ग्राम प्रोटीन मिलता है।</p><p>इसके साथ ही क्विनोआ को 'कम्प्लीट प्रोटीन' माना जाता है। क्योंकि इसमें शरीर के लिए जरूरी सभी 9 एसेंशियल एमीनो एसिड मौजूद होते हैं। पारंपरिक अनाज होने की वजह से ब्राउन राइस में कुछ एमीनो एसिड की कमी होती है।</p><p>वहीं क्विनोआ में आयरन, मैग्नीशियम और फोलेट जैसे पोषक तत्व ज्यादा मात्रा में पाए जाते हैं।</p><h2>किसे खाने से लंबे समय तक भूख नहीं लगेगी</h2><p>अगर आप ऐसा खाना चाहते हैं, जिससे आपका पेट लंबे समय तक भरा रहे, तो क्विनोआ एक बेहतरीन ऑप्शन है। इसमें प्रोटीन और फाइबर दोनों की अधिक मात्रा होती है, जिससे आपका पेट लंबे समय तक भरा महसूस होता है। हालांकि पेट भरा रहना सिर्फ अनाज पर निर्भर नहीं करता है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि आप इसको किस तरह से और किन दालों, सब्जियों या हेल्दी फैट्स के साथ पकाकर खाते हैं।</p><h2>डाइट में किसे करें शामिल</h2><p>अगर आप क्विनोआ को अपनी डाइट में शामिल करना चाहते हैं, तो भोजन में प्रोटीन की अधिक मात्रा, सभी जरूरी एमीनो एसिड्स से भरपूर प्लांट प्रोटीन, पोषक तत्वों से भरपूर नया ऑप्शन और प्रति सर्विंग ज्यादा फाइबर होता है।</p><p>अगर आपके लिए ब्राउन राइस सही है और आप इसको डाइट में शामिल करना चाहते हैं। तो बता दें कि इसका रोजमर्रा के खाने में आसानी से घुल-मिल जाने वाला स्वाद है। भारतीय दाल और करी के साथ खाया जाने वाला एक जाना-पहचाना ऑप्शन, होल-ग्रेन कार्बोहाइड्रेट का अच्छा स्रोत होने से अलावा बजट के अनुकूल और किफायती अनाज होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Oct 2026 12:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/quinoa-provides-more-fiber-and-complete-protein-than-brown-rice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Kidney Disease से बढ़ता है Heart Failure का जोखिम, दोनों अंगों का कामकाज है आपस में जुड़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/kidney-disease-increases-risk-of-heart-attack-and-high-blood-pressure]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>असल में किडनी और हार्ट शरीर के दो ऐसे महत्वपूर्ण अंग है, जिसका कार्य अलग-अलग है फिर भी एक-दूसरे से गहराई से जुड़ा है। किडनी खून से अपशिष्ट पदार्थ (टॉक्सिन्स) और अतिरिक्त पानी के बाहर निकालने में मदद करती है, बल्कि हार्ट पूरे शरीर में खून पंप करता है।</p><p>जब किडनी ठीक से काम नहीं करती है, तो शरीर में पानी और नमक जम जाता है, ऐसे में ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है और दिल पर अतिरिक्त दबाव भी पड़ सकता है। दूसरी तरफ, हार्ट की पंपिंग कमजोर होने पर किडनी तक पर्याप्त खून नहीं पहुंचता, जिससे उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है। यही वह कनेक्शन है जो किडनी के मरीजों के लिए परेशानी का कारण बनता है।</p><p><strong>किडनी और हार्ट के बीच क्या कनेक्शन होता है?</strong></p><p>किडनी और हार्ट एक-दूसरे के कामकाज पर निर्भर हैं। हार्ट खून को पंप करता है, जबकि किडनी खून को साफ कर अतिरिक्त पानी बाहर निकालती है। इनमें से किसी एक की कार्यक्षमता प्रभावित होने पर ब्लड प्रेशर बढ़ने और दूसरे अंग पर दबाव पड़ने का खतरा बढ़ सकता है।</p><p><strong>किडनी डिजीज में हाई ब्लड प्रेशर होने का जोखिम</strong></p><p>अमेरिकन किडनी फंड के अनुसार, किडनी की बीमारी और हाई ब्लड प्रेशर यानी हाइपरटेंशनस के बीच दोतरफा संबंध होता है। लंबे समय तक हाई ब्लड प्रेशर रहने से किडनी की छोटी रक्त वाहिकाएं और खून से फिल्टर करने वाली संरचनाएं क्षतिग्रस्त हो सकती हैं। जिससे किडनी को खून को फिल्टर करने की क्षमता कम होने लगती है। दूसरी ओर, जब किडनी खराब होती है, तो वह शरीर से अतिरिक्त सोडियम और पानी को पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकाल पाती है।</p><p>फिर शरीर में तरल पदार्थ बढ़ता है और ब्लड प्रेशर ऊपर जा सकता है। हमारे शरीर में किडनी ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करने वाले हार्मोनल सिस्टम को भी प्रभावित करती है।</p><p>कुछ परिस्थितियों में यह सिस्टम एक्टिव होने से रक्त वाहिकाएं संकरी हो सकती हैं और ब्लड प्रेशर बढ़ सकता है। वैसे यह ऐसा चक्र बन सकता है जिसमें हाई ब्लड प्रेशर किडनी को और नुकसान पहुंचाता है, जबकि खराब किडनी ब्लड प्रेशर को नियंत्रित करना ठीक बना देती है।</p><p><strong>किडनी डिजीज और हार्ट फेलियर के बीच क्या संबंध है?</strong></p><p>अमरेकिन हार्ट एसोसिशन के अनुसार, हार्ट फेलियर एक ऐसी स्थिति है, जिसमें हार्ट शरीर की जरुरत के अनुसार ही खून पंप नहीं कर पाता या उसे ऐसा करने के लिए अधिक दबाव के साथ काम करना पड़ेगा। इसका यह अर्थ नहीं है कि हार्ट ने काम करना पूरी तरह बंद कर दिया है।</p><p>किडनी की बीमारी और हार्ट फेलियर एक-दूसरे को प्रभावित कर सकते हैं। वहीं सीकेडी में हाई ब्लड प्रेशर, शरीर में अतिरिक्त तरल पदार्थ, रक्त वाहिकाओं &nbsp;की क्षति और अन्य मेटाबॉलिक बदलाव हार्ट पर दबाव बढ़ा सकते हैं।</p><p>जब हार्ट फेलियर में किडनी तक पहुंचने वाले खून का प्रवाह कम हो सकता है। शरीर में रक्त का दबाव और तरल पदार्थों का वितरण भी बदल सकता है, जिससे किडनी की कार्यक्षमता बिगड़ जाती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Oct 2026 12:12:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/kidney-disease-increases-risk-of-heart-attack-and-high-blood-pressure</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: महिलाओं में Menopause के लक्षण दिखने पर इमोशनल सपोर्ट की अनदेखी बढ़ाती है तनाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/women-experiencing-menopause-need-emotional-support-from-family]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मेनोपॉज महिलाओं की जिंदगी का एक सामान्य पड़वा होता है। इस दौरान शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव कई बार व्यवहार और मूड को प्रभावित करता है। कुछ महिलाओं को इस दौरान बिना किसी कारण बेचैनी, उदासी, चिड़चिड़ापन या बार-बार परेशान महसूस होने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। वहीं कई बार महिलाओं को खुद नहीं समझ आता है कि आखिर वह छोटी-छोटी बातों में इतना क्यों परेशान हो रही हैं। तो वहीं कई महिलाएं खुद से ही परेशान महसूस करने लगती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि किस तरह से हार्मोन्स महिलाओं के मूड को प्रभावित करते हैं और इस दौरान महिलाएं अपना कैसे ध्यान रखें।</p><h2>हार्मोन्स में बदलाव से क्यों प्रभावित होता है मूड</h2><p>मेनोपॉज के आसपास शरीर में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन जैसे हार्मोन्स के लेवल में उतार-चढ़ाव होने लगता है। एस्ट्रोजन का संबंध सिर्फ फर्टिलिटी से नहीं बल्कि दिमाग में मूड को कंट्रोल करने वाले कई केमिकल्स और प्रोसेस को प्रभावित करता है। एस्ट्रोजन के लेवल में होने वाले इस बदलाव की वजह से कुछ महिलाओं को चिड़चिड़ापन, मूड स्विंग्स, बेचैनी या भावनात्मक उतार-चढ़ाव ज्यादा महसूस हो सकते हैं। लेकिन इसका असर हर महिला में एक जैसा नहीं होता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/fennel-seeds-health-benefits-and-simple-ways-to-include-them-in-diet" target="_blank" rel="noopener">किचन का Superfood है सौंफ, पेट की सूजन और एसिडिटी खत्म करने में है मददगार</a></p><h2>छोटी-छोटी बातों पर क्यों आता है गुस्सा</h2><p>मेनोपॉज के दौरान हॉट फ्लैशेज, नींद में परेशानी, रात में पसीना आना और थकान जैसी समस्याएं होना आम बात है। इस दौरान कई महिलाओं को छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आने लगता है और कई बार वह बिना बड़ी वजह के रोने लगती हैं। हर बार समस्या सिर्फ हार्मोन्स की नहीं होती है, बल्कि खराब नींद, हार्मोनल बदलाव, रोजमर्रा का तनाव और थकान आदि मिलकर मूड को प्रभावित कर सकती हैं।</p><h2>मेनोपॉज में क्यों परेशान रहने लगती हैं महिलाएं</h2><p>इसको समझना बेहद जरूरी है। जिसको अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है या फिर महिलाएं इसके बारे में किसी से बात नहीं कर पाती हैं। लेकिन मेनोपॉज के दौरान कई महिलाएं खुद से परेशान रहती लगती हैं।</p><p>इसके पीछे सिर्फ हार्मोनल इंबैलेंस नहीं होता है। इस समय पर कई बार महिलाओं को सही इमोशनल सपोर्ट नहीं मिल पाता है।</p><p>महिलाओं के चिड़चिड़ेपन, मूड स्विंग्स या परेशानी को समझने की जगह उनके बच्चे, पार्टनर या फैमिली के अन्य लोग ऐसा महसूस कराने लगते हैं कि वह अपनी जिम्मेदारियों को ठीक तरीके से निभा नहीं पा रही हैं या वह हर बार पर ओवररिएक्ट करने लगी हैं।</p><p>मेनोपॉज के दौरान कुछ महिलाएं शरीर में होने वाले बदलावों को लेकर भी असहज महसूस कर सकती हैं। स्किन, वेट और बालों में बदलाव, पीरियड्स का अनियमित होना या इंटिमेट लाइफ से जुड़े कुछ बदलाव भी महिलाओं को परेशान करते हैं।</p><p>ऐसे में महिलाओं को लग सकता है कि अब वह पहले जैसी नहीं रही हैं। वहीं महिलाओं को यह भावना कई बार बेचैनी या मूड खराब करने का कारण कर सकती हैं।</p><h2>क्या सिर्फ मोनोपॉज है इसकी वजह</h2><p>दरअसल, चिड़चिड़ापन, हर तरह की उदासी या फिर चिंता को मेनोपॉज से जोड़ना सही नहीं है। अगर आपका लगातार मूड खराब रहता है, अधिक चिंता रहती है, किसी काम में मन नहीं लगता, नींद और रोजमर्रा की जिंदगी भी प्रभावित हो रही है। तो आपको डॉक्टर या फिर मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना चाहिए।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 13:34:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/women-experiencing-menopause-need-emotional-support-from-family</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[किचन का Superfood है सौंफ, पेट की सूजन और एसिडिटी खत्म करने में है मददगार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/fennel-seeds-health-benefits-and-simple-ways-to-include-them-in-diet]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर भारतीय रसोई में सौंफ जरुर पाई जाती है। यह किसी सुपरफूड से कम नहीं है। यह स्वाद के साथ ही सेहत का भी खास ख्याल रखता है। इसमें पाए जाने वाले फाइबर, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीबैक्टीरियल गुण पाचन तंत्र को मजबूत बनाते हैं, गैस -अपच से राहत दिलाने और सांसों को भी फ्रेश बनाता है।</p><p>आइए जानते हैं सौंफ के कुछ आसन और असरदार इस्तेमाल के तरीके-</p><p><strong>खाने के बाद सौंफ का चबाना</strong></p><p>अगर आप खाना खाने के बाद सौंफ चबाते हैं, तो यह एक पारंपरिक और कारगर तरीका है। इससे लार के स्राव को बढ़ाता है, जिससे भोजन जल्दी पच जाता है और मुंह की बदबू भी दूर होती है।</p><p><strong>सौंफ का डिटॉक्स पानी</strong></p><p>इसके लिए रात में एक चम्मच सौंफ पानी में भिगोकर रख दें और सुबह खाली पेट इसका सेवन जरुर करें। यह शरीर को डिटॉक्स करता है, पाचन को तेज करता है और पेट की सूजन को भी कम करता है।</p><p><strong>सौंफ की हर्बल चाय</strong></p><p>अगर आपको अपना दिन बेहतरीन रखना है, तो एक कप पानी में सौंफ उबालकर चाय बनाएं। इसमें थोड़ा अदरक या शहद मिलाएं। फिर गैस, एसिडिटी और पेट दर्द में राहत देने के साथ ही शरीर को रिलैक्स भी करती है।</p><p><strong>सौंफ का पाउडर</strong></p><p>सबसे पहले सौंफ को हल्का भून लें फिर इसे पीस लें। इसको रोजाना गुनगुने पानी के साथ के जरुर लें। यह मेटाबॉलिज्म को बेहतर बनाता है और पेट को हल्का रखता है, जिससे भारीपन महसूस नहीं होता है।</p><p><strong>सलाद और डिशेज में इस्तेमाल</strong></p><p>इतना ही नहीं, आप रायता या सब्जियों में भी थोड़ी सौंफ मिला सकते हैं, इससे स्वाद को बढ़ेगा और पाचन भी बेहतरीन होगा। यह एक हेल्दी फ्लेवर एन्हांसर की तरह काम करता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 11:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/fennel-seeds-health-benefits-and-simple-ways-to-include-them-in-diet</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Fatty Liver के लक्षण घटाने और Bloating दूर करने में असरदार है सुबह Jeera Water पीना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/cumin-water-on-empty-stomach-helps-reduce-fatty-liver-symptoms]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>घर की रसोई में ऐसे कई मसाले मौजूद है, जो औषधीय गुणों से भरपूर होते हैं और जिनका इस्तेमाल सिर्फ रंगत व स्वाद के लिए नहीं बल्कि सेहत से संबंधित परेशानियों को दूर करने में भी किया जाता है। जीरा इन्हीं में से एक है। वैसे तो दाल और सब्जी में जीरे लड़का जरुर लगाया जाता है, हालांकि कई लोगों को जानकारी नहीं होती है कि यह छोटा-सा बीज कैसे डाइजेशन को दुरुस्त करके गैस और ब्लोटिंग को दूर करता है। कहा जाता है कि खाली पेट जीरा का पानी पीने से फैटी लिवर के लक्षण रिवर्स हो जाते हैं।</p><p><strong>क्या जीरे के पानी से रिवर्स हो सकते हैं फैटी लिवर के लक्षण?</strong></p><p>जीरे का पानी सेहत के लिए काफी फायदेमंद माना जाता है। इसे खाली पेट सेवन करने से गैस, एसिडिटी, ब्लोटिंग और कब्ज की समस्या दूर होती है। इससे फैटी लिवर के लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है, क्योंकि खाली पेट एक गिलास जीरा पानी पीने से शरीर को कुछ जरुरत मिनरल्स मिलते हैं और यह पचान तंत्र की सफाई करने में मदद करता है। लेकिन फैटी लिवर को कम करने के लिए इस पर निर्भर रहना ही सही नहीं होगा।</p><p><strong>फैटी लिवर क्यों होता है?</strong></p><p>फैटी लिवर होने के मुख्य कारण मेटाबॉलिज्म में होने वाले बदलाव। अगर आप सुस्त जीवनशैली, मोटापा, डिस्लिपिडेमिया (खून में फैट का असंतुलन), खराब खान-पान और नींद के गलत पैटर्न के कारण होते हैं। वहीं, लाइफस्टाइल संबंधित कुछ आदतें जैसे कि नियमित व्यायाम न करना, नाइट शिफ्ट में काम करना, खाने का कोई निश्चित समय न होना, डाइट में बहुत अधिक रिफाइंड कार्बोहाइड्रेट, चीनी वाली चीजें, तला-भुना खाना, प्रोसेस्ड फूड और पैकेट बंद खाने का ज्यादा सेवन करना और तेल का अधिक इस्तेमाल, लिवर में कैलोरी और फैट जमा होने का कारण बनती हैं।</p><p><strong>ज्यादा मात्रा में न पिएं जीरा का पानी</strong></p><p>- अगर आप जीरे का पानी से एसिडिटी और सीने में जलन होती है, तो आप इसे दिन में 1 ही बार पिएं।</p><p>- 1 टीस्पून जीरे का 1 गिलास पानी में भिगोएं।</p><p>- सुबह इसे उबाल लें और छानकर पिएं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 18 Oct 2026 17:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/cumin-water-on-empty-stomach-helps-reduce-fatty-liver-symptoms</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: पीरियड्स के दर्द से राहत दिलाने में मदद कर सकते हैं ये फूड्स]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/foods-that-can-reduce-period-cramps-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पीरियड्स के दौरान पेट में ऐंठन, कमर दर्द और थकान से परेशान रहती हैं? ऐसे में हर बार दवाइयों का सहारा लेना जरूरी नहीं है। अगर आप चाहें तो इन दिनों अपनी डाइट में कुछ पौष्टिक चीजें शामिल करके इस पीरियड्स क्रैम्प को कम कर सकती हैं। तो चलिए जानते हैं इनके बारे में-</p><h2>अदरक</h2><p>कुछ शोधों में यह बात सामने आई है कि अदरक से पीरियड्स के दर्द में संभावित राहत मिल सकती है। आप सुबह या शाम अदरक की चाय ले सकती हैं। इसके अलावा, अदरक का इस्तेमाल दाल, सब्जी या सूप में भी थोड़ी मात्रा में किया जा सकता है। याद रखें कि इसे बहुत ज्यादा मात्रा में लेने या सप्लीमेंट के रूप में इस्तेमाल करने से पहले सावधानी बरतें।</p><h2>दही</h2><p>अक्सर महिलाएं पीरियड्स में दही लेना बिल्कुल बंद कर देती हैं। लेकिन दही कैल्शियम देता है, जो मांसपेशियों और हड्डियों के सामान्य कामकाज के लिए जरूरी है। कैल्शियम से भरपूर आहार पीरियड्स से जुड़े कुछ लक्षणों को संभालने में मदद कर सकता है। हालांकि केवल दही खाने से ऐंठन खत्म हो जाएगी, ऐसा कहना सही नहीं होगा। आप अपने लंच में खाने के साथ एक कटोरी सादा दही ले सकती हैं। अगर आप दही नहीं लेना चाहती हैं तो तो दूध या कैल्शियम से भरपूर अन्य खाद्य पदार्थ भी विकल्प हो सकते हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/importance-of-rest-day-in-workout-routine-in-hindi" target="_blank" rel="noopener">फिट रहने के लिए सिर्फ वर्कआउट नहीं, आराम भी जरूरी! जानें रेस्ट डे के फायदे</a></p><h2>हरी पत्तेदार सब्जियां</h2><p>पालक, मेथी और सरसों जैसी हरी पत्तेदार सब्जियां आयरन, फोलेट और दूसरे पोषक तत्वों का अच्छा सोर्स है। जिन महिलाओं को पीरियड्स में ज्यादा रक्तस्राव होता है, उनके लिए पर्याप्त आयरन लेना महत्वपूर्ण है। आप पीरियड्स में पालक की सब्जी, मेथी के पराठे या दाल में हरी सब्जियां शामिल करें। पौधों से मिलने वाले आयरन के अवशोषण को बेहतर बनाने के लिए खाने के साथ नींबू, आंवला या अमरूद जैसे विटामिन-सी वाले खाद्य पदार्थ साथ में अवश्य लें।</p><h2>अलसी और अखरोट</h2><p>अलसी और अखरोट में ओमेगा-3 फैटी एसिड पाए जाते हैं। ओमेगा-3 और पीरियड्स के दर्द के बीच संभावित संबंध पर शोध हुआ है, लेकिन इन्हें दर्द का पक्का इलाज नहीं माना जा सकता। लेकिन इसे लेने से आपको यकीनन बेहतर महसूस होगा। आप रोजाना थोड़ी पिसी हुई अलसी दलिया या दही में मिला सकती हैं। अखरोट को नाश्ते में खाएं। मात्रा अपनी जरूरत और कुल खानपान के हिसाब से रखें।</p><p>- मिताली जैन</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 18 Oct 2026 12:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/foods-that-can-reduce-period-cramps-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[फिट रहने के लिए सिर्फ वर्कआउट नहीं, आराम भी जरूरी! जानें रेस्ट डे के फायदे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/importance-of-rest-day-in-workout-routine-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज के समय में अधिकतर लोग अपनी फिटनेस को लेकर सजग हो गए हैं और इसलिए वे वर्कआउट को अपने रूटीन में जरूर शामिल करते हैं। कोई जिम में वजन उठाता है तो कोई घर पर ही योग और एक्सरसाइज करता है। अमूमन लोगों को लगता है कि जितने ज्यादा दिन वर्कआउट करेंगे, उतनी जल्दी वजन कम होगा और शरीर फिट बनेगा। इसी सोच में वे थकान होने पर भी एक्सरसाइज करना नहीं छोड़ते।</p><p>लेकिन क्या आपको पता है कि फिटनेस के लिए वर्कआउट के साथ-साथ आराम के लिए भी समय निकालना जरूरी है? लगातार एक्सरसाइज करने से मांसपेशियों को थकान हो सकती है और शरीर को खुद को संभालने के लिए समय चाहिए। ऐसे में रेस्ट डे बहुत अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है तो चलिए जानते हैं इसके फायदे-</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/mulethi-health-benefits-for-acidity-skin-hair-and-weight-loss" target="_blank" rel="noopener">Health Tips: मुलेठी से Acidity और Weight Loss में राहत, जानिए आयुर्वेद में इसके फायदे</a></p><h2>मांसपेशियां होती हैं रिकवर</h2><p>जब आप वजन उठाते हैं या कोई कठिन एक्सरसाइज करते हैं, तो इससे मांसपेशियों पर दबाव पड़ता है। इसके बाद शरीर को उनकी मरम्मत और रिकवरी के लिए समय चाहिए। आराम, सही खानपान और पर्याप्त नींद इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभाते हैं। अगर आप हर दिन बहुत कठिन वर्कआउट करती हैं और शरीर को पर्याप्त आराम नहीं देतीं, तो मांसपेशियों में दर्द और थकान लंबे समय तक बनी रह सकती है। &nbsp;</p><h2>वर्कआउट की परफॉर्मेंस होती है बेहतर</h2><p>रेस्ट ना लेने से बॉडी सही तरह से रिकवर नहीं हो पाती और इसलिए वर्कआउट की परफॉर्मेंस भी धीरे-धीरे खराब होने लगती है। लेकिन आराम के बाद शरीर अधिक तैयार महसूस कर सकता है। इससे आप अगले वर्कआउट में बेहतर तकनीक के साथ एक्सरसाइज कर सकते हैं और अपनी क्षमता के अनुसार अभ्यास कर सकती हैं।</p><h2>चोट लगने का जोखिम कम करने में मदद</h2><p>सुनने में शायद अजीब लगे लेकिन रेस्ट डे से चोट लगने का जोखिम भी काफी कम हो जाता है। थके हुए शरीर के साथ एक्सरसाइज करने पर सही तकनीक बनाए रखना मुश्किल हो सकता है। उदाहरण के लिए, वजन उठाते समय शरीर का संतुलन बिगड़ना या दौड़ते समय कदमों पर ठीक से नियंत्रण न रहना चोट का कारण बन सकता है। रेस्ट डे थकान कम करने और शरीर को संभलने का समय देने में मदद कर सकते हैं। &nbsp;</p><h2>फिटनेस के लक्ष्य तक पहुंचना होता है आसान</h2><p>वजन कम करना हो, मांसपेशियां मजबूत बनानी हों या स्टैमिना बढ़ाना हो, इन सभी लक्ष्यों के लिए नियमित अभ्यास के साथ-साथ रिकवरी भी उतनी ही जरूरी है। हर दिन बहुत ज्यादा एक्सरसाइज करने का मतलब यह नहीं कि नतीजे भी उतनी ही तेजी से मिलेंगे। लेकिन जब आप वर्कआउट के साथ पर्याप्त आराम करते हैं, संतुलित भोजन और अच्छी नींद का ध्यान रखते हैं, तो लंबे समय तक अपनी दिनचर्या बनाए रखना आसान हो सकता है। जिससे आपके गोल्स भी आसानी से पूरे होते हैं।</p><p>- मिताली जैन</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 18:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/importance-of-rest-day-in-workout-routine-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Kareena Kapoor रात में पैरों पर लगाती हैं Desi Ghee, अच्छी नींद और सेहत को मिलते हैं कई फायदे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/saif-ali-khan-reveals-kareena-kapoor-applies-ghee-on-feet-before-sleeping]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हाल ही में बॉलीवुड एक्ट्रेस करीना कपूर अपने पति एक्टर सैफ अली खान के साथ कपिल शर्मा के शो में पहुंची। इस दौरान सैफ अली खान ने बताया कि करीना सोने से पहले पैरों में घी लगाती है। गौरतलब है कि बेबो अपनी फिटनेस के लिए खास ध्यान रखती हैं। बतौर एक्टिंग में कमाल है करीना कपूर खान, इसके साथ ही उनकी फिटेनस एकदम बेमिसाल है। करीना ने कपिल के शो में यह भी कहा है कि इससे नींद अच्छी आती है। सोने से पहले पैरों के तलवों में घी लगाने से क्या होता है, आइए आपतो बताते हैं।</p><p><strong>सोने से पहले पैरों पर घी लगाने के फायदे</strong></p><p><strong>पैर बनते हैं सॉफ्ट</strong></p><p>अगर आप सोने से पहले पैरों में थोड़ा-सा घी लगाना एक पारंपरिक तरीका है, जो कि रुखे, खुरदरे तलवों और फटी एडियो को नमी देने में मदद करती हैं। घी में ऐसे फैट होते हैं जो त्वचा पर एक सुरक्षात्मक परत बनाता है, जिससे नमी कम नहीं होती है और पैर मुलायम हो जाते हैं।</p><p><strong>नींद बढ़िया आती है</strong></p><p>पैरों सोने से पहले हल्का घी लगाकर मालिश करने पर काफी आराम मिलता है। इससे नींद भी काफी बढ़िया आती है। अगर आपको नींद आने में मुश्किल होती है, तो रोजाना सोने से पहले कुछ देर तलवों पर घी जरुर लगाएं।</p><p><strong>ब्लड सर्कुलेशन में सुधार</strong></p><p>सोने से पहले तलवों पर हल्की मसाज जरुर करें। ऐसा करने से मांसपेशियों को दर्द, खिंचाव और थकान दूर होती है। जिन लोगों के पैरों में दर्द रहता है, वो लोग इस उपाय को रोज करें।</p><p><strong>डाइजेशन में सुधार</strong></p><p>आयुर्वेद के अनुसार, पैरों के तलवों पर घी लगाने से वात दोष कम होता है, डाइजेशन बेहतर होता है और पेट से संबंधित समस्याओं से आराम मिलता है।</p><p><strong>क्या सभी को सोने से पहले लगाना चाहिए पैरों के तलवों पर घी?</strong></p><p>बता दें कि, जिन स्वस्थ वयस्कों की त्वचा पर कोई घाव नहीं है, उनके लिए सीमित मात्रा में घी का इस्तेमाल करना ही ठीक है। लेकिन खुले घावों, फंगल इन्फेक्शन या जलन वाली त्वचा पर इसका इस्तेमाल न करें। यदि इसे लगाने से खुजली, लालिमा या रैशेज हों, तो इसका इस्तेमाल तुरंत बंद कर दें। वहीं, डायबिटीज वाले लोगों को अपने पैरों की देखभाल में अतिरिक्त सावधानी बरतें। यदि पैरों में लगातार ड्राईनेस या दरारे बनीं रहती है, तो डॉक्टर की सलाह जरुर लें।&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 16:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/saif-ali-khan-reveals-kareena-kapoor-applies-ghee-on-feet-before-sleeping</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: मुलेठी से Acidity और Weight Loss में राहत, जानिए आयुर्वेद में इसके फायदे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/mulethi-health-benefits-for-acidity-skin-hair-and-weight-loss]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आयुर्वेद में मुलेठी एक औषधि है, जो शरीर की कई समस्याओं का रामबाण इलाज साबित हो सकती है। स्किन के दाग-धब्बों को मिटाने से लेकर पेट की जलन और सिर से लेकर पांव तक मुलेठी फायदों से भरपूर है। हालांकि सभी समस्याओं से निजात पाने के लिए मुलेठी के सेवन का तरीका एक जैसा नहीं है। अगर गले में खराश की समस्या है तो मुलेठी का टुकड़ा चूसने से खांसी में राहत मिलती है। वहीं अगर पेट में अपच या गैस की समस्या है, तो मुलेठी पाउडर का गुनगुने पानी से सेवन करना चाहिए। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको मुलेठी के फायदे और इसके सेवन के तरीके के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>जानें फायदे और खाने का तरीका</h2><p>मुलेठी न सिर्फ शरीर की अंदरूनी समस्याओं से राहत देती है, बल्कि इसके लेप से शरीर की बाहरी समस्याएं भी कम होती हैं। पेट, गला, बाल और स्किन आदि के लिए यह फायदेमंद होता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/october-weather-changes-can-cause-five-common-health-issues-in-children" target="_blank" rel="noopener">तापमान में उतार-चढ़ाव से बच्चों में बढ़ता है Infection, सर्दी-जुकाम और फ्लू से ऐसे करें बचाव</a></p><h2>जलन और अपच में राहत</h2><p>जिनको अक्सर एसिडिटी रहती है या फिर खाना ठीक से पचता नहीं है, तो इन लोगों को खाने के बाद मुलेठी पाउडर का सेवन करना चाहिए। मुलेठी एसिड को कम करता है। इससे पेट और आंतों की सूजन भी कम होती है।</p><h2>सर्दी-जुकाम में है फायदेमंद</h2><p>सर्दी-जुकाम और गले की खराश में मुलेठी फायदेमंद होता है। यह ऑटोइम्यून बीमारियों को रोकने के साथ-साथ इम्यूनिटी मजबूत करने में मदद करती है।</p><h2>वेट कम करने में सहायक</h2><p>मुलेठी मेटाबॉलिज्म तेज करने के साथ शरीर में फैट को जमा होने से रोकती है। जिससे वेट कंट्रोल में रहता है। यह फैट लिपिड मेटाबॉलिज्म को बेहतर करने के साथ शरीर से टॉक्सिन्स को बाहर निकालने में सहायक होता है। वहीं यह भूख को कंट्रोल करने में भी मदद करती है और मुलेठी के एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण मोटापे से जुड़ी सूजन भी कम होती है।</p><h2>एक्ने की समस्या होगी कम</h2><p>अगर फेस पर मुंहासे या पिंपल है, तो मुलेठी का फेस पैक काम आ सकता है। एक चम्मच मुलेठी पाउडर में एक से दो चम्मच शहद और गुलाब जल मिलाकर फेस पर लगाएं। इससे धीरे-धीरे एक्ने की समस्या कम होने लगती है।</p><h2>हेयर फॉल होगा कम</h2><p>बालों की समस्या के लिए मुलेठी का पैक रामबाण है। बालों का झड़ने से रोकने के लिए आप मुलेठी का सेवन कर सकते हैं या फिर इसको बालों पर लगा सकते हैं। मुलेठी का सेवन चूर्ण या चाय के रूप में किया जा सकता है। लेकिन बालों में इसको लगाने के लिए अलग विधि अपनानी होगी।</p><p>इसको बालों में लगाने के लिए एक चम्मच मुलेठी पाउडर लें और इसमें दो चम्मच आंवला और हिना पाउडर और एक चम्मच सरसों का तेल मिलाकर पेस्ट बना लें। फिर लोहे की कड़ाही में इस पेस्ट को रातभर के लिए छोड़ दें। फिर अगली सुबह इस पेस्ट को बालों पर लगाएं और शैंपू कर लें। सप्ताह में एक से दो बार यह विधि अपनानी चाहिए। इससे हेयर फॉल की समस्या कम होती है।</p><h2>क्या कहते हैं एक्सपर्ट</h2><p>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक मुलेठी की प्रकृति शीतल, शांत और मधुर है। इसलिए इसके सेवन से वात और पित्त दोष भी कम होता है। मुलेठी के सेवन से बैठी हुई गले की आवाज और गले में दर्द की समस्या ठीक हो जाती है। यह उल्टी को रोकने में भी कारगर है। लेकिन मुलेठी पाउडर का सेवन ज्यादा किया जाए, तो उल्टी ज्यादा होने लगती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 12:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/mulethi-health-benefits-for-acidity-skin-hair-and-weight-loss</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तापमान में उतार-चढ़ाव से बच्चों में बढ़ता है Infection, सर्दी-जुकाम और फ्लू से ऐसे करें बचाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/october-weather-changes-can-cause-five-common-health-issues-in-children]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बदलते मौसम में तापमान में काफी उतार-चढ़ाव देखने को मिलते हैं। मौसम में नमी के कारण बच्चे अक्सर बीमार पड़ जाते हैं। बदलते मौसम में वायरस, एलर्जी और पर्यावरण से संबंधित जुड़ी अशुद्धियों के संपर्क में आ जाते हैं। बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता इस मौसम में थोड़ी कमजोर होती है, इसलिए उन्हें इन बदलावों में ढलने में काफी समय लगता है।</p><p><strong>बदलते मौसम में बच्चों में होने वाली आम बीमारियां</strong></p><p>मौसम के बदलने से बच्चों को मुख्य रुप से 5 तरह की स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है।</p><p><strong>सर्दी-जुकाम</strong></p><p>बच्चों में सबसे ज्यादा सर्दी-जुकाम देखनो के मिलता है। इसके लक्षणों के बहती नाक, छींक आना, हल्की खांसी, गले में खराश शामिल होना। बदलते मौसम में तापमान में उतार-चढ़ाव की वजह से श्वसन नली प्रभावित होती है, जिससे सर्दी के वायरस तेजी से फैलने लगता है।</p><p><strong>मौसमी फ्लू</strong></p><p>वैसे यह सामान्य सर्दी-जुकाम की तुलना में थोड़ा ज्यादा होता है और किसी भी उम्र के बच्चों को प्रभावित कर सकता है। इस दौरान तेज बुखार, बदन दर्द, थकान, ठंड लगना, सूखी खांसी और सिरदर्द के मुख्य लक्षण देखने को मिलते हैं।</p><p><strong>मौसमी एलर्जी</strong></p><p>बदलते मौसम के दौरान बच्चों को हवा में धूल की वजह से एलर्जी हो जाती है, जिससे सांस लेने में दिक्कत होती है और बच्चा दिन भर परेशान रहता है।</p><p><strong>गले में संक्रमण</strong></p><p>बदलते मौसम से बच्चों में ठंडे-गरम की दिक्कतें देखनो को मिलती है। जिस कारण से गले में खराश, दर्द और सूजन जैसी समस्याओं से गुजरना पड़ता है।</p><p><strong>पाचन संबंधी समस्याएं</strong></p><p>कई बार गलत खान-पान के कारण से पेट में संक्रमण हो जाता है। इसकी वजह से पेट में दर्द, दस्त और उल्टी की शिकायत हो सकती है।</p><p><strong>इस तरह से रखें बच्चों का ख्याल</strong></p><p>- मौसम में बदलाव होने के कारण फुल स्लीव्स के कपड़े पहनाएं। शाम के समय मौसम ठंडा हो, तो डबल लेयर पहना दें।</p><p>- अगर आप संक्रमण को रोकना चाहते हैं, तो हाथ जरुर धोएं, बच्चों को सिखाएं कि वे खाने से पहले, शौचालय जाने के बाद और खांसने या छींकने के बाद साबुन से हाथ जरुर धोएं।</p><p>- इस मौसम में बच्चों की नींद पूरी होना बेहद जरुरी है। प्री-स्कूल के बच्चों को रोजाना 10-13 घंटे, स्कूली बच्चों को 9-12 घंटे और किशोंरों को 8-10 घंटे की नींद लेना काफी जरुरी है।</p><p>- बच्चों की इम्यूनिटी मजबूत बने रहने के लिए ताजे फल, सब्जियां, साबुत अनाज, लीन प्रोटीन और हेल्दी फैट्स दें। ऐसा करने से इम्युनिटी बूस्ट होती है।</p><p>- समय पर टीके लगवाने से बच्चों को गंभीर संक्रमणों और मौसमी फ्लू से सुरक्षा मिलेगी।</p><p>- इसके अलावा, आउटडोर खेल, साइकिल चलाना और सैर जैसी गतिविधियां काफी जरुरी है। इससे शरीर एक्टिव रहता है और सामान्य कार्यप्रणाली के लिए बच्चों को पर्याप्त पानी पिलाते रहे हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 16:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/october-weather-changes-can-cause-five-common-health-issues-in-children</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: ज्यादा गर्म Tea या Coffee पीने से Esophageal Cancer का खतरा तीन गुना बढ़ सकता है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/drinking-very-hot-tea-or-coffee-can-increase-esophageal-cancer-risk]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कई लोग बहुत ज्यादा गर्म चाय या कॉफी पीना पसंद करते हैं। कप में चाय या कॉफी डालते ही वह इसको पीने लगते हैं। अगर आपकी भी ऐसी ही कुछ आदत है, तो आपको सावधान होने की जरूरत है। क्योंकि हाल ही में हुई एक रिचर्स में एक चौंकाने वाली बात सामने आई है। दरअसल, रिसर्च में सामने आया है कि ज्यादा गर्म पेय पदार्थ पीने से एसोफेगल कैंसर का जोखिम बढ़ सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।</p><h2>ज्यादा गर्म पेय पदार्थ बढ़ा सकते हैं कैंसर का जोखिम</h2><p>हाल ही में हुई एक रिसर्च में सामने आया है कि जो लोग ज्यादा गर्म चाय या कॉफी का सेवन करते हैं, उनमें एसोफेगल कैंसर का जोखिम बढ़ जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/night-shift-work-linked-to-higher-risk-of-breast-cancer-in-women" target="_blank" rel="noopener">Night Shift करने वाली महिलाओं में Breast Cancer का खतरा, रिसर्च में सामने आया कनेक्शन</a></p><p>रिसर्च में बताया गया है कि गुनगुनी चाय या कॉफी पीने वालों की तुलना में ज्यादा गर्म चाय या कॉफी पीने वालों में कैंसर का खतरा लगभग तीन गुना ज्यादा होता है।</p><p>जब इतना गर्म पेय पदार्थ हमारे फूड पाइप से गर्म पेट तक जाता है, तो रास्ते में मौजूद सेल्स को नुकसान हो सकता है। हालांकि इस तरह के कैंसर के होने के चांसेज अमूमन कम ही होते हैं।</p><h2>क्या कहते हैं एक्सपर्ट</h2><p>एक्सपर्ट की मानें, तो इस रिसर्च के मुताबिक ज्यादा गर्म चाय या कॉफी को बार-बार पीने से एसोफेजियल स्क्वैमस सेल कार्सिनोमा का जोखिम बढ़ सकता है।</p><p>UK में करीब 10 लाख वयस्कों पर की गई 14 साल की स्टडी के हिसाब से जो लोग ज्यादा गर्म ड्रिंक पीना पसंद करते हैं, उनमें यह जोखिम ज्यादा होता है।</p><p>बहुत ज्यादा गर्म तरल पदार्थ पीने से एसोफेगस की परत को बार-बार थर्मल नुकसान पहुंचा सकते हैं। जिस कारण समय के साथ कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां हो सकती हैं।</p><p>असल में खतरा ड्रिंक से नहीं बल्कि इसके तापमान से होती है।</p><p>जरूरी बात यह है कि अधिकतर लोगों में इस कैंसर के होने का जोखिम अभी भी कम है। स्टडी में एसोफेजियल एडेनोकार्सिनोमा के साथ ऐसा संबंध नहीं पाया गया।</p><p>हालांकि जो लोग नियमित रूप से ज्यादा गर्म ड्रिंक का सेवन करते हैं, या जो दिन में 6 या इससे ज्यादा कप गर्म ड्रिंक पीते हैं, उनमें यह बढ़ा हुआ खतरा मायने रखता है।</p><h2>हमेशा गुनगुना पिएं चाय-कॉफी</h2><p>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक चाय या कॉफी पीने से पहले इसको कुछ मिनट के लिए ठंडा होने दें।</p><p>अगर चाय या कॉफी जीभ या होंठ पर ज्यादा गर्म लगती है, तो शायद इसका तापमान सेफ सीमा से अधिक है।</p><p>चाय-कॉफी या किसी भी गरम पेय पदार्थ को हमेशा गुनगुना ही पीना चाहिए।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 12:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/drinking-very-hot-tea-or-coffee-can-increase-esophageal-cancer-risk</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Night Shift करने वाली महिलाओं में Breast Cancer का खतरा, रिसर्च में सामने आया कनेक्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/night-shift-work-linked-to-higher-risk-of-breast-cancer-in-women]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>प्रत्येक वर्ष अक्तूबर का महीना ब्रेस्ट कैंसर अवेयरनेस मंथ के रुप में जाना जाता है। इस बार इसकी थीम है 'Every Story is Unique, Every Journey Matters'। आजकल सबसे ज्यादा महिलाएं ब्रेस्ट कैंसर का शिकार हो रही हैं। ऐसे में कई महिलाएं आईटी कंपनियों, बीपीओ, अस्पतालों और दूसरी जगहों पर नाइट शिफ्ट में काम करती हैं। नाइट शिफ्ट में रात भर जागना होता है। इसलिए उनका रूटीन रातभर जागना और दिन में सोना बन ही जाता है।</p><p>क्या आपने कभी सोचा है कि रात में लगातार काम करने का असर आपकी सेहत को खराब कर सकता है। एक रिसर्च के अनुसार, लंबे समय तक नाइट शिफ्ट करने और ब्रेस्ट कैंसर के बीच संबंध बताया है। ऐसे में रात में काम करने वाली महिलाओं को ब्रेस्ट कैंसर का खतरा है, आइए आपको बताते हैं क्या कहती है रिसर्च?</p><p><strong>रात में काम करने से ब्रेस्ट कैंसर का क्या है कनेक्शन?</strong></p><p>वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गेनाइजेशन (WHO) की एजेंसी इंटरनेशनल एजेंसी फॉर रिसर्च ऑन कैंसर (IARC) ने साल 2019 में रात की शिफ्ट में काम करने वाली महिलाओं को कैंसर का खतरा बढ़ाने वाला माना था, जिनको ग्रुप 2A में रखा गया था। असल में इस क्लासिफिकेशन में उन महिलीओं को रखा गया था, जिसमें ब्रेस्ट कैंसर से संबंधित कुछ सबूत मिले थे। इसका मतलब यह नहीं है कि नाइट शिफ्ट करने वाली हर महिला को कैंसर होगा।</p><p><strong>डॉक्टर ने नाइट शिफ्ट करने वाली महिलाओं को क्या सलाह दी?</strong></p><p>हेल्थ एक्सपर्ट के अनुसार, भारत में बहुत-सी महिलाए नाइट शिफ्ट में काम करती है। लंबे समय तक नींद और जागने के बदलते रुटीन को जरुर गंभीरता से लेना चाहिए। रिसर्च में नाइट शिफ्ट और ब्रेस्ट कैंसर के बीच संबंध देखने को मिला है, हालांकि दोनों के बीच संबंध मिलने का मतलब यह नहीं है कि नाइट शिफ्ट करने के कारण कैंसर हो सकता है।</p><p><strong>क्या कहती है ब्रेस्ट कैंसर पर हुई रिसर्च?</strong></p><p>बात करें साल 2022 में प्रकाशित एक रिसर्च की, तो 33 स्टडी सामने आई थीं, जिसमें करीब 43 लाख लोगों को शामिल किया गया था। इस स्टडी में पता चला था कि रात की शिफ्ट में कार्य करने से 20 परसेंट महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर का खतरा देखने को मिला था। लेकिन हर रिसर्च में &nbsp;एक जैसे नतीजे देखने को मिले नहीं है। कुछ बड़ी स्टड़ी में नाइट शिफ्ट और ब्रेस्ट कैंसर के बीच संबंध न होने की बात कही गई है।</p><p>इतना ही नहीं, साल 2024 में प्रकाशित एक रिव्यू में भी इस टॉपिक पर हुई नए रिसर्च को स्टडी किया गया था। इसमें लंबे समय तक लगातार या बार-बार नाइट शिफ्ट करने और ब्रेस्ट कैंसर के संबंध होने के कुछ संकेत देखने को मिले थे।</p><p>लेकिन, इसको लेकर पुख्ता नतीजे तक पहुंचने के लिए अभी और रिसर्च की जरुरत है। सबसे जरुरी बात यह है कि रिसर्च में सामने आया 20% ही खतरा है। इसका अर्थ यह नहीं है कि नाइट शिफ्ट करने वाली हर पांच में से एक महिला को ब्रेस्ट कैंसर होगा।</p><p><strong>नाइट शिफ्ट करने वाली महिलाएं अपनी सेहत का ख्याल कैसे रखें?</strong></p><p>- रोजाना जब भी आप सोएं तो एक समय पर ही नींद लें और ज्यादा से ज्यादा सोने की जरुरत है।</p><p>- दिन में सोते समय कमरे में पर्दे लगाएं, जिससे बाहर की रोशनी कमरे में न आएं।</p><p>- जब आप सोएं तो शोर कम करें, ताकि आपकी नींद बार-बार न टूटे।</p><p>- यदि आपको लंबे समय से नींद नहीं आ रही है, तो डॉक्टर से सलाह जरुर लें।</p><p>- ध्यान रखें कि, जब भी आपको ब्रेस्ट में गांठ, स्किन में चेंज या निप्पल से डिस्चार्ज जैसी परेशानी दिखे, तो डॉक्टर से जांच करवाएं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 12:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/night-shift-work-linked-to-higher-risk-of-breast-cancer-in-women</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कोहरा समझकर न करें नजरअंदाज! ऐसे पता करें हवा में प्रदूषण है या नहीं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/difference-between-winter-fog-haze-and-toxic-smog-explained]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सर्दियों में सुबह के समय धुंध और कोहरा इतना ज्यादा होता है कि कई बार समझ ही नहीं आता कि सामने की हवा में आखिर है क्या। लेकिन हर धुंध को कोहरा समझना सही नहीं है। कई बार इसके पीछे हवा में मौजूद प्रदूषण भी हो सकता है। कोहरा, धुंध और स्मॉग देखने में भले ही एक जैसे लगें, लेकिन इनके बीच बड़ा फर्क है। आइए आसान भाषा में समझते हैं कि ये तीनों कैसे बनते हैं और इनमें से कौन आपकी सेहत के लिए ज्यादा चिंता की बात है।</p><h2><strong>पहले समझिए, कोहरा क्या होता है?</strong></h2><p>कोहरा तब बनता है, जब हवा में मौजूद नमी ठंडी होकर पानी की बहुत छोटी-छोटी बूंदों में बदल जाती है। ये बूंदें जमीन के आसपास हवा में तैरती रहती हैं। आसान भाषा में कहें तो कोहरा जमीन के पास बना एक बादल ही होता है। ब्रिटेन के मौसम विभाग के मुताबिक, जब किसी जगह 1,000 मीटर से आगे देखना मुश्किल हो जाए, तो उसे कोहरा कहा जाता है।</p><p>कोहरा खासतौर पर तब ज्यादा बनता है, जब रात में हवा शांत हो और उसमें नमी ज्यादा हो। ठंड बढ़ने पर हवा की नमी पानी की छोटी बूंदों में बदल जाती है और सुबह हमें घना कोहरा दिखाई देता है। घना कोहरा सड़क पर गाड़ी चलाने और हवाई यात्रा में परेशानी पैदा कर सकता है। लेकिन जरूरी नहीं कि कोहरा होने का मतलब उस समय प्रदूषण भी बहुत ज्यादा हो।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/doctor-explains-causes-of-knee-and-joint-pain-in-changing-weather" target="_blank" rel="noopener">Joint Pain Causes: मौसम बदलते ही घुटने-कंधे में होने लगता है दर्द? डॉक्टर ने बताया कारण</a></h3><h2><strong>धुंध क्या होती है?</strong></h2><p>अब बात करते हैं धुंध की। धुंध तब दिखाई देती है, जब हवा में मौजूद बहुत छोटे-छोटे कण सूरज की रोशनी को चारों तरफ फैला देते हैं। इससे दूर की चीजें साफ नजर नहीं आतीं और आसमान भी फीका-फीका दिखाई देता है। इन कणों में धूल, धुआं और प्रदूषण शामिल हो सकते हैं। हवा में मौजूद छोटे कण जितने ज्यादा होंगे, उतनी ही ज्यादा धुंध दिखाई दे सकती है। धुंध सिर्फ एक छोटे इलाके तक सीमित नहीं रहती। हवा में मौजूद ये छोटे कण काफी दूर तक जा सकते हैं, इसलिए बड़े इलाके में भी धुंध दिखाई दे सकती है।</p><h2><strong>और स्मॉग क्या होता है?</strong></h2><p>स्मॉग को आसान भाषा में प्रदूषण वाली धुंध कह सकते हैं। यह प्रदूषित हवा से जुड़ा होता है। स्मॉग शब्द धुएं और कोहरे से मिलकर बना है, लेकिन आज के समय में स्मॉग होने के लिए कोहरा होना जरूरी नहीं है। हवा में मौजूद बहुत छोटे प्रदूषण वाले कण और जमीन के पास मौजूद ओजोन जैसी प्रदूषित गैसें भी इसमें शामिल हो सकती हैं।</p><p>कुछ तरह का स्मॉग तब बनता है, जब हवा में मौजूद प्रदूषक सूरज की रोशनी के संपर्क में आकर आपस में प्रतिक्रिया करते हैं। वहीं, कुछ मामलों में गाड़ियों और दूसरी जगहों से निकलने वाला प्रदूषण जमीन के पास ही जमा होता रहता है।</p><h2><strong>सर्दियों में कोहरा और स्मॉग साथ क्यों दिखते हैं?</strong></h2><p>अब सवाल आता है कि अगर कोहरा और स्मॉग अलग-अलग हैं, तो सर्दियों में दोनों एक साथ क्यों नजर आते हैं? उत्तर भारत में सर्दियों के दौरान तापमान कम हो जाता है और कई बार हवा भी बहुत धीमी चलती है। ठंड और हवा में ज्यादा नमी से कोहरा बनने में मदद मिलती है। वहीं, धीमी हवा के कारण प्रदूषण आसानी से फैल नहीं पाता और जमीन के आसपास ही जमा रहने लगता है।</p><p>जब हवा में नमी और प्रदूषण दोनों एक साथ होते हैं, तो हमें आसमान पर एक मोटी धूसर परत दिखाई दे सकती है। ऐसे में सिर्फ देखकर यह पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि सामने कोहरा है, धुंध है या प्रदूषण। लेकिन एक बात याद रखें कोहरा और स्मॉग एक ही चीज नहीं हैं। कोहरा मौसम से जुड़ा है, जबकि स्मॉग प्रदूषण से जुड़ा है। इसलिए अगर सुबह बहुत ज्यादा कोहरा है, तो इसका यह मतलब नहीं है कि हवा में प्रदूषण भी बहुत ज्यादा है। इसी तरह आसमान साफ दिखने का मतलब यह भी नहीं है कि हवा पूरी तरह साफ है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-causes-symptoms-and-severe-effects-on-body" target="_blank" rel="noopener">Health Tips: रोजाना कम सोने से बढ़ता है Sleep Debt और कमजोर होता है Immune System</a></h3><h2><strong>क्या स्मॉग, कोहरे और धुंध से ज्यादा खतरनाक है?</strong></h2><p>यह इस बात पर निर्भर करता है कि हवा में क्या मौजूद है और उसकी मात्रा कितनी है। कोहरे से सबसे बड़ी परेशानी आमतौर पर कम दिखाई देना है। हालांकि, कोहरे की पानी की बूंदें हवा में मौजूद प्रदूषण के संपर्क में आ सकती हैं।</p><p>वहीं, प्रदूषण की वजह से बनी धुंध इस बात का संकेत हो सकती है कि हवा में ऐसे छोटे कण मौजूद हैं, जो सेहत के लिए नुकसानदायक हो सकते हैं। इनमें पीएम 2.5 खास चिंता की बात है। ये बेहद छोटे कण होते हैं, जो सांस के साथ फेफड़ों के अंदर तक पहुंच सकते हैं। अमेरिकी पर्यावरण संरक्षण एजेंसी के मुताबिक, इनके संपर्क में आने से सांस और दिल से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं। जिन लोगों को पहले से अस्थमा या दिल और फेफड़ों से जुड़ी बीमारी है, उन्हें ऐसे प्रदूषण से ज्यादा परेशानी हो सकती है।</p><h2><strong>सिर्फ आसमान देखकर हवा को साफ न मानें</strong></h2><p>एक बात हमेशा याद रखें सिर्फ आसमान का रंग देखकर यह पता नहीं लगाया जा सकता कि हवा सांस लेने के लिए सुरक्षित है या नहीं। अगर आप जानना चाहते हैं कि आपके इलाके की हवा कितनी साफ या प्रदूषित है, तो भारत के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के वायु गुणवत्ता सूचकांक यानी एक्यूआई को चेक करें। प्रदूषण ज्यादा होने पर स्थानीय प्रशासन की ओर से जारी सलाह का भी ध्यान रखें। तो आसान भाषा में याद रखिए कोहरा पानी की छोटी बूंदों से बनता है, धुंध हवा में मौजूद छोटे कणों की वजह से दिखाई देती है और स्मॉग प्रदूषण वाली हवा से जुड़ा होता है। कई बार ये तीनों एक साथ भी नजर आ सकते हैं। इसलिए सिर्फ खिड़की से बाहर देखकर हवा की स्थिति का अंदाजा लगाने के बजाय मौसम की जानकारी के साथ एक्यूआई भी देखना ज्यादा बेहतर है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 17:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/difference-between-winter-fog-haze-and-toxic-smog-explained</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Joint Pain Causes: मौसम बदलते ही घुटने-कंधे में होने लगता है दर्द? डॉक्टर ने बताया कारण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/doctor-explains-causes-of-knee-and-joint-pain-in-changing-weather]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मौसम बदलने पर घुटनों, कंधों या कमर में दर्द और अकड़न बढ़ना आम बात है। कई लोगों को ठंड बढ़ने या हवा में नमी ज्यादा होने पर जोड़ों का दर्द पहले से ज्यादा महसूस होता है। हालांकि, ठंड या नमी से गठिया नहीं होता, लेकिन मौसम में बदलाव से पहले से मौजूद हड्डियों और जोड़ों की समस्या का दर्द और अकड़न बढ़ सकती है।</p><p>ग्रेटर नोएडा वेस्ट के सर्वोदय अस्पताल के हड्डी रोग एवं रोबोटिक जॉइंट रिप्लेसमेंट के एसोसिएट डायरेक्टर और हेड डॉ. अंकुर सिंह ने एनडीटीवी के साथकस &nbsp;इस मुद्दे पर अपनी राय साझा की। उन्होंने बताया कि मौसम बदलने पर जोड़ों में दर्द और अकड़न क्यों बढ़ती है और किन बातों का ध्यान रखना चाहिए।</p><h2><strong>मौसम बदलने पर जोड़ों में अकड़न क्यों बढ़ती है?</strong></h2><p>तापमान में बदलाव, कम शारीरिक गतिविधि, रोजमर्रा की दिनचर्या में बदलाव और मांसपेशियों में होने वाले बदलाव जोड़ों की परेशानी बढ़ा सकते हैं। मौसम बदलने का सबसे साफ असर जोड़ों में अकड़न के रूप में दिख सकता है।</p><p>ठंड में लंबे समय तक बैठे या बिना ज्यादा हिले-डुले रहने पर मांसपेशियां और शरीर के आसपास के नरम हिस्से ज्यादा खिंचे हुए महसूस हो सकते हैं। जिन लोगों को पहले से घुटनों में घिसाव या जोड़ों से जुड़ी दूसरी परेशानी है, उनमें यह समस्या ज्यादा महसूस हो सकती है। ऐसे में कुर्सी से उठना, सीढ़ियां चढ़ना या लंबे समय तक चलना भी मुश्किल लग सकता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/common-mistakes-that-can-harm-gut-health-and-digestion" target="_blank" rel="noopener">Gut Health सुधारने के चक्कर में ज्यादा Fiber और Probiotics लेना बिगाड़ सकता है पाचन</a></h3><h2><strong>हवा के दबाव से भी बढ़ सकता है जोड़ों का दर्द?</strong></h2><p>हवा के दबाव में बदलाव को भी कई बार जोड़ों के बढ़ते दर्द से जोड़ा जाता है। गठिया से परेशान कुछ लोगों का कहना है कि मौसम बदलने से पहले उन्हें जोड़ों में दर्द या अकड़न महसूस होने लगती है। हालांकि, मौसम के दबाव में बदलाव और जोड़ों के दर्द के बीच ऐसा संबंध क्यों है, इसका सही कारण अभी पूरी तरह साफ नहीं है। इस पर अभी भी शोध किया जा रहा है। लेकिन एक बात साफ है कि मौसम बदलने से दर्द या अकड़न बढ़ सकती है। इसका मतलब यह नहीं है कि मौसम की वजह से गठिया होता है या बीमारी बढ़ती है।</p><h2><strong>मौसम खराब होने पर कम चलना-फिरना भी बढ़ा सकता है दर्द</strong></h2><p>मौसम का असर सिर्फ ठंड या हवा के दबाव तक सीमित नहीं है। बहुत ठंड, ज्यादा गर्मी या बारिश के दौरान लोग घर के अंदर ज्यादा समय बिताते हैं और पहले के मुकाबले कम चलते-फिरते हैं। लंबे समय तक कम चलने-फिरने से मांसपेशियां कमजोर हो सकती हैं, शरीर का लचीलापन कम हो सकता है और जोड़ों में अकड़न बढ़ सकती है। इसका असर खासतौर पर घुटनों, कूल्हों और रीढ़ जैसे हिस्सों पर पड़ सकता है, जिन पर हमारे शरीर का वजन रहता है। इन हिस्सों को मजबूत रखने के लिए आसपास की मांसपेशियों का मजबूत होना जरूरी है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-causes-symptoms-and-severe-effects-on-body" target="_blank" rel="noopener">Health Tips: रोजाना कम सोने से बढ़ता है Sleep Debt और कमजोर होता है Immune System</a></h3><h2><strong>मौसम बदलने पर भी चलते-फिरते रहें</strong></h2><p>मौसम बदलने पर जोड़ों में दर्द होने पर पूरी तरह से चलना-फिरना बंद कर देना सही तरीका नहीं है। इसके बजाय मौसम और अपनी परेशानी के हिसाब से एक्सरसाइज करनी चाहिए। एक्सरसाइज शुरू करने से पहले हल्का वार्म-अप करने से मांसपेशियों और जोड़ों को तैयार करने में मदद मिल सकती है। पैदल चलना, एक ही जगह रखी जाने वाली साइकिल चलाना, हल्की स्ट्रेचिंग और दूसरे हल्के व्यायाम शरीर को सक्रिय रखने में मदद कर सकते हैं। अगर पहले से जोड़ों की समस्या है, तो लंबे समय तक आराम करने के बाद अचानक बहुत ज्यादा या मुश्किल एक्सरसाइज नहीं करनी चाहिए। एक्सरसाइज का टाइम धीरे-धीरे बढ़ाना चाहिए।</p><h2><strong>हड्डियों और मांसपेशियों के लिए सही खान-पान भी जरूरी</strong></h2><p>हड्डियों और मांसपेशियों को स्वस्थ रखने में खान-पान की भी अहम भूमिका है। शरीर को पर्याप्त प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन डी और दूसरे जरूरी पोषक तत्व मिलने चाहिए। कुछ मौसमों में धूप कम मिलने के कारण कुछ लोगों में विटामिन डी की कमी हो सकती है। हालांकि, बिना अपनी जरूरत और पोषण की स्थिति जाने खुद से विटामिन डी की गोलियां या सप्लीमेंट लेना सही नहीं है।</p><h2><strong>इन लक्षणों को सिर्फ मौसम का असर न समझें</strong></h2><p>सबसे जरूरी बात यह है कि लंबे समय से बने हुए दर्द को सिर्फ मौसम की वजह न मानें। अगर जोड़ों में ज्यादा सूजन है, सुबह उठने के बाद लंबे समय तक अकड़न रहती है, चलने-फिरने में परेशानी होती है, जोड़ कमजोर या अस्थिर महसूस होता है या दर्द की वजह से रोजमर्रा के काम प्रभावित हो रहे हैं, तो डॉक्टर से जांच करानी चाहिए। इन लक्षणों के पीछे कोई दूसरी बीमारी या जोड़ों से जुड़ी समस्या हो सकती है, जिसके लिए सही इलाज की जरूरत पड़ सकती है।</p><h2><strong>मौसम से ज्यादा जरूरी हैं ये आदतें</strong></h2><p>मौसम हमारे जोड़ों में होने वाले दर्द को प्रभावित कर सकता है, लेकिन हड्डियों और जोड़ों की सेहत तय करने वाली सबसे बड़ी वजह मौसम नहीं है। नियमित रूप से शारीरिक गतिविधि करना, मांसपेशियों को मजबूत रखना, संतुलित खान-पान लेना और लंबे समय से बनी परेशानी को समय पर डॉक्टर को दिखाना ज्यादा जरूरी है। मौसम और जोड़ों के दर्द से जुड़े इस भ्रम को समझने से लोग उन आदतों पर ध्यान दे सकते हैं, जो लंबे समय तक हड्डियों और जोड़ों को स्वस्थ रखने में मदद करती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 16:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/doctor-explains-causes-of-knee-and-joint-pain-in-changing-weather</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gut Health सुधारने के चक्कर में ज्यादा Fiber और Probiotics लेना बिगाड़ सकता है पाचन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/common-mistakes-that-can-harm-gut-health-and-digestion]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज के समय में लोग अपनी गट हेल्थ यानी की पेट और पाचन की सेहत को लेकर काफी ज्यादा जागरुक हो गए हैं। कब्ज, गैस, एसिडिटी या पेट फूलने जैसी समस्याएं होते ही कई लोग प्रोबायोटिक्स, डिटॉक्स ड्रिंक, फाइबर सप्लीमेंट या घरेलू नुस्खे अपनाते हैं। लेकिन क्या आप जानती हैं कि कई बार पेट की सेहत को सुधारने की कोशिश में की गई कुछ गलतियां इस समस्या को ज्यादा बढ़ा सकता है।</p><h2>जानें Gut Health बिगाड़ने वाली आदतें</h2><p>अगर आप भी अपनी गट हेल्थ को बेहतर बनाने के लिए कुछ खास आदतें अपना रही हैं। तो आपको सही खानपान की आदत समझना जरूरी है और साथ ही यह भी समझना जरूरी है कि आपको किन आदतों से बचना चाहिए और किन चीजों को अपने रूटीन में शामिल करना चाहिए। पेट की सेहत को खराब करने वाली ऐसी आम गलतियों के बारे में हम आपको बताने जा रहे हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-causes-symptoms-and-severe-effects-on-body" target="_blank" rel="noopener">Health Tips: रोजाना कम सोने से बढ़ता है Sleep Debt और कमजोर होता है Immune System</a></p><h2>फाइबर</h2><p>पेट को स्वस्थ रखने और कब्ज से बचाने में फाइबर मदद करता है। लेकिन अचानक ज्यादा मात्रा में फाइबर खाने से नुकसान हो सकता है। एकदम से ज्यादा कच्ची सब्जियां, चोकर, बीज या फाइबर सप्लीमेंट लेने से पेट में सूजन, गैस और दर्द की समस्या हो सकती है। इसलिए धीरे-धीरे फाइबर की मात्रा बढ़ानी चाहिए और साथ ही में पर्याप्त मात्रा में पानी पीना चाहिए।</p><h2>प्रोबायोटिक्स</h2><p>कई लोगों का मानना होता है प्रोबायोटिक्स लेने से हर तरह की पेट की समस्या सही हो जाएगी। जबकि ऐसा जरूरी नहीं होता है। कब्ज, गैस या एसिडिटी की वजह हर व्यक्ति में अलग-अलग हो सकती है। इसलिए बिना डॉक्टर के परामर्श के प्रोबायोटिक्स लेना सही नहीं होता है।</p><h2>कब्‍ज पर न दें ध्‍यान</h2><p>कब्ज की समस्या होने पर बार-बार लोग दवा या घरेलू उपायों का सहारा लेते हैं। लेकिन कब्ज की समस्या होने के पीछे फिजिकल एक्टिविटी की कमी, कम पानी पीना या गलत खानपान जैसी वजहें हो सकती हैं। वहीं अगर लंबे समय तक यह समस्या बनी रहती है, तो डॉक्टर से सलाह लेना चाहिए।</p><h2>डिटॉक्‍स ड्रिंक</h2><p>आज के समय में डिटॉक्स ड्रिंक का चलन भी बढ़ गया है। लेकिन बार-बार शरीर को डिटॉक्स करने की जरूरत नहीं होती है। पेट को हेल्दी रखने के लिए सब्जियां, फल, पर्याप्त पानी, साबुत अनाज और रेगुलर एक्सरसाइज व अच्छी नींद ज्यादा जरूरी होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 11:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/common-mistakes-that-can-harm-gut-health-and-digestion</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: रोजाना कम सोने से बढ़ता है Sleep Debt और कमजोर होता है Immune System]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-causes-symptoms-and-severe-effects-on-body]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अक्सर हम सभी भागदौड़ भरी जिंदगी के बीच में खुद का ध्यान रखना भूल जाते हैं। अक्सर हम यही सोचते हैं कि छुट्टी वाले दिन या वीकेंड पर नींद पूरी पूरी होने पर थकान दूर हो जाएगी। लेकिन असल में ऐसा होता नहीं है। जब लंबे समय तक आपके शरीर को रोजाना उतनी नींद नहीं मिल पाती है, जितना कि शरीर को जरूरत होती है। तो इसका असर साफ तौर पर हमारे शरीर और मन पर नजर आने लगता है। नींद की कमी के पीछे कई वजह हो सकती हैं।&nbsp;</p><p>वहीं कई बार तनाव की वजह से तो कई बार बिजी शेड्यूल की वजह से नींद पूरी नहीं हो पाती है। ऐसे में Sleep Debt बढ़ता जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि Sleep Debt क्या होता है और नींद पूरी न होने के क्या लक्षण हैं और कैसे आपका मन और शरीर इससे प्रभावित होता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/excessive-licorice-consumption-for-sore-throat-triggers-5-health-risks" target="_blank" rel="noopener">ज्यादा मुलेठी खाने से बढ़ सकता है High BP, सेहत पर होते हैं 5 गंभीर नुकसान</a></p><h2>क्या है Sleep Debt</h2><p>Sleep Debt तब होता है, जब आपकी नींद की जरूरत और असल में मिलने वाली नींद की मात्रा में अंतर होता है। ऐसा तब होता है, जब आपकी नींद पूरी नहीं होती है और आप देर तक काम किया करते हैं, तनाव के कारण सो नहीं पाते हैं या फिर आपके सोने का समय तय नहीं होता है। रोजाना एक या दो घंटे कम सोने से भी Sleep Debt हो सकता है और इसका आपकी हेल्थ पर बुरा असर हो सकता है।</p><h2>नींद की कमी पर लक्षण</h2><p>दिन में बहुत ज्यादा नींद आना<br>ध्यान और फोकस में कमी<br>सुबह उठने में मुश्किल<br>भूलने की आदत<br>चिड़चिड़ापन<br>सिरदर्द<br>थकान</p><h2>शरीर पर पड़ता है बुरा असर</h2><p>नींद की कमी होने पर फिजिकल और मेंटल हेल्थ खराब होने लगती है। नींद न आने के कारण इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, वेट पर असर प़ड़ता है, मेटाबॉलिज्म बूस्ट होता है और बार-बार बीमार होने जैसी दिक्कतें हो सकती हैं। वहीं पर्याप्त नींद न लेने से सीखने की क्षमता, याददाश्त और ध्यान लगाने की शक्ति पर असर पड़ता है। इसके साथ ही व्यक्ति तनाव और बेचैनी महसूस करने लगता है। नींद की भारी कमी के कारण व्यक्ति को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।</p><h2>रोजाना कितनी नींद लेना है जरूरी</h2><p>हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो रोजाना कम से कम 8 से 9 घंटे की नींद लेना चाहिए। वहीं आपका स्लीप साइकिल भी तय होना चाहिए। अगर किसी कारण से आप पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं, तो इस पर ध्यान देना चाहिए। वहीं अगर नींद आने में मुश्किल होती है या लाख कोशिश के बाद भी नींद नहीं आती है, तो आपको डॉक्टर से जरूर मिलना चाहिए।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 11:15:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-causes-symptoms-and-severe-effects-on-body</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[ज्यादा मुलेठी खाने से बढ़ सकता है High BP, सेहत पर होते हैं 5 गंभीर नुकसान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/excessive-licorice-consumption-for-sore-throat-triggers-5-health-risks]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बदलते मौसम में सर्दी-खांसी और गले की खराश जरुर परेशान करती है। ऐसे में मुलेठी चबाना बेहद फायदेमंद हो सकती हैं। इसका सेवन करने से गले को आराम मिलता है, लेकिन इसे बार-बार या ज्यादा मात्रा में खाने से सेहत को नुकसान पहुंच सकता है।</p><p>वहीं, ज्यादा मुलेठी खाने से शरीर में ग्लाइसीराइजिन पॉइजनिंग हो जाती है, जो शरीर में नमक, पानी और हार्मोन का पूरा बैलेंस बिगाड़ देती है। इतना ही नहीं, आपको हेल्थ से संबंधित कई दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, जैसे-हाई-बीपी, पोटेशियम कम होना और दिल की धड़कन का बिगड़ना।</p><p><strong>ज्यादा मुलेठी खाने के 5 बड़े नुकसान</strong></p><p>अगर आप गले की खराश दूर करने के लिए ज्यादा मुलेठी का सेवन करते है, तो नेशनल सेंटर फॉर कॉम्प्लमेंट्री एंड इंटीग्रेटिव हेल्थ के अनुसार, नुकसानदायक हो सकती है।</p><p><strong>हाई ब्लड प्रेशर बढ़ता है</strong></p><p>असल में मुलेठी में ग्लाइसीराइजिन होता है। जिससे शरीर में सोडियम और पानी रुक जाता है और ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है।</p><p><strong>पोटेशियम कम हो जाता है</strong></p><p>अगर आप ज्यादा मुलेठी का सेवन करेंगे, तो शरीर से पोटेशियम बाहर निकल जाता है। इस कारण से आपको थकान, मसल्स में ऐंठन और कमजोरी महसूस होती है।</p><p><strong>&nbsp;प्रेग्नेंसी में न खाएं मुलेठी</strong></p><p>दरअसल, प्रेग्नेंसी को दौरान मुलेठी नहीं खाना चाहिए, क्योंकि यह सेफ नहीं है। इससे समय से पहले डिलीवरी का जोखिम बढ़ जाता है। इसलिए गर्भावस्था के समय के इसका सेवन न करें।</p><p><strong>दिल की धड़कन बिगड़ सकती है</strong></p><p>पोटेशियम की कमी और हाई बीपी की वजह से दिल की धड़कन बिगड़ सकती हैं। कार्डियक अरेस्ट का खतरा बढ़ जाता है।</p><p><strong>हार्मोन पर प्रभाव पड़ता है</strong></p><p>अगर आप अधिक मुलेठी का सेवन करते हैं, तो अभी छोड़ दें। मुलेठी के सेवन कोर्टिसोल हार्मोन को ठीक से टूटने नहीं देता, जिससे सिरदर्द, चक्कर आना और महिलाओं में पीरियड्स गड़बड़ होने की समस्या देखने को मिलती हैं।</p><p><strong>गले की खराश में मुलेठी क्यों फायदेमंद हैं?</strong></p><p>अपोलो की रिपोर्ट के अनुसार, मुलेठी एक प्राकृतिक एक्सपेक्टोरेंट है, यानी यह कफ को कम करने और खांसी से राहत दिलाने में मदद करती है। जो कि यह सूजन-रोधी गुण भी होते हैं, जो कि गले की जलन को शांत करती है।</p><p><strong>गले की खराश से कैसे बचें?</strong></p><p>- फ्लू के टीके समय पर जरुर लगवाएं।</p><p>- साबुन-पानी या सैनिटाइजर से बार-बार हाथ धोएं।</p><p>- खाना, पीने की चीजें या बर्तन शेयर न करें।</p><p>- सर्दी-जुकाम वाले लोगों से दूरी बनाएं।</p><p>- खुद बीमार होने के बाद दूसरों के संपर्क में आने से बचें, जिससे संक्रमण न फैले।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 15:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/excessive-licorice-consumption-for-sore-throat-triggers-5-health-risks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dopamine और Serotonin जैसे Hormones तय करते हैं इंसान का मूड और व्यवहार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/how-hormones-and-neurotransmitters-influence-human-behaviour-and-mood]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हमारे आसपास जितने भी लोग होते हैं, उनमें अपने व्यक्तित्व की कोई न कोई खासियत मौजूद होती है, जो उनको दूसरों से अलग बनाती है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे क्या वजह हो सकती है। दरअसल, न्यूरोट्रांसमीटर्स और हार्मोन्स व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित करते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि न्यूरोट्रांसमीटर्स और हार्मोन्स व्यक्ति के व्यवहार को किस तरह से प्रभावित करते हैं।</p><h2>जानिए कैसे काम करता है ब्रेन</h2><p>इंसानी दिमाग किसी कंप्यूटर की तरह काम करता है। इसमें कुछ स्पेशल मैसेंजर्स होते हैं, जो किसी वायरिंग की तरह हमारे पूरे शरीर में मौजूद होते हैं, जिनको न्यूरोट्रांसमीटर्स कहा जाता है। इसकी मदद से हमारा दिमाग शरीर के सभी हिस्सों तक संदेश पहुंचाता है। आमतौर पर देखा जाता है कि अगर किसी गंभीर बीमारी, बढ़ती उम्र या फिर दवाओं के साइड इफेक्ट के कारण धीरे-धीरे दिमाग के न्यूरोट्रांसमीटर्स खत्म होने लगते हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/home-remedies-to-relieve-muscle-pain-naturally-with-hot-compress-and-milk" target="_blank" rel="noopener">Muscle Pain Relief: मांसपेशियों के Muscle Pain से राहत पाने के लिए अपनाएं सिकाई और हल्दी दूध के नुस्खे</a></p><h2>डोपामिन हार्मोन</h2><p>डोपामिन हार्मोन एक ऐसा न्यूरोट्रांसमीटर है, जो व्यक्ति के फोकस, मेमोरी, सीखने और प्रॉब्लम सॉल्विंग कैपेसिटी को बढ़ाता है। इसकी एक्टिविटी के कारण व्यक्ति नए काम को करने के लिए मोटिवेट होता है। जब व्यक्ति किसी गोल की ओर बढ़ रहा होता है, तो यह हार्मोन तेजी से काम करता है। यह अच्छी नींद के लिए भी सहायक होता है। वहीं इस हार्मोन की कमी होने पर व्यक्ति डिप्रेशन में जा सकता है। अल्कोहल या ड्रग्स के एडिक्शन के शिकार लोगों में इस हार्मोन की कमी पाई जाती है। व्यक्ति के अच्छे व्यवहार के लिए डोपामिन की क्वांटिटी बैलेंस्ड होनी चाहिए।</p><h2>सेरोटोनिन हार्मोन</h2><p>सेरोटोनिन पॉजिटिव हार्मोन है, जो व्यक्ति में भूख, नींद और सेक्स की इच्छा को तय करता है और उसको पॉजिटिव बनाता है। सेरोटोनिन का लेवल अगर अच्छा है, तो यह व्यक्ति को खुश और एक्टिव बनाने में मदद करता है। लेकिन इस हार्मोन की कमी से व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार हो सकता है। वहीं ज्यादा लेवल होने पर व्यक्ति ओवर एक्साइटेड हो जाता है और गुस्सा भी अधिक आता है। इस हार्मोन से पैदा होने वाले मूड को हाइपो-मेनिया कहा जाता है।</p><h2>नॉरएड्रिनालिन हार्मोन</h2><p>नॉरएड्रिनालिन हार्मोन की वजह से व्यक्ति जोश में भर जाता है। खेल और युद्ध के मैदान में खिलाड़ियों और सैनिकों के दिमाग में इसका सीक्रेशन बढ़ जाता है। यह बीपी और हार्टबीट को कंट्रोल करता है और इसका बैलेंस्ड लेवल इंसान को फिट और खुश बनाए रखने में मदद करता है। इसकी कमी से थकावट फील होती है और इसकी अधिक मात्रा के कारण व्यक्ति को हाई बीपी की समस्या हो सकती है।</p><h2>ऑक्सिटोसिन हार्मोन</h2><p>ऑक्सिटोसिन हार्मोन उम्मीद, प्यार, देखभाल और विश्वास करने की भावना से जुड़ा होता है। ऑक्सिटोसिन हार्मोन इंसान के अलावा दूध पिलाने वाले सभी जीवों में भी पाया जाता है। महिलाओं में डिलीवरी के दौरान ब्रेन से इसी हार्मोन का रिसाव होता है। यह महिलाओं की डिलीवरी को आसान बनाने में सहायता करता है, वहीं मां के शरीर में दूध बनाने के प्रोसेस में भी इस हार्मोन की बड़ी भूमिका रहती है। बच्चे के जन्म के बाद मां का उसके साथ जो गहरा भावनात्मक जुड़ाव और प्यार महसूस होता है। वह इसी हार्मोन के कारण होता है। शरीर में इसकी कमी होने पर महिलाओं में निराशा और उदासी जैसे लक्षण दिख सकते हैं। लेकिन पॉजिटिव सोच रखने और खुध रहने से इस हार्मोन का लेवल अपने आप बढ़ जाता है।</p><h2>एंडोर्फिंस हार्मोन</h2><p>ब्रेन की पिट्यूटरी ग्लैंड से 20 प्रकार के एंडोर्फिंस हार्मोन का सीक्रेसन होता है। जोकि शरीर के लिए कई तरह से काम करते हैं। हर व्यक्ति के शरीर में यह हार्मोन प्राकृतिक रूप से अलग-अलग लेवल पर होता है। हमारे शरीर के लिए यह हार्मोन पेन किलर के रूप में काम करता है। जब भी शरीर के किसी हिस्से में दर्द का एहसास होता है, तो हमारा ब्रेन ज्यादा क्वांटिटी में एंडोर्फिन रिलीज करने लगता है। जिससे व्यक्ति को दर्द सहने की ताकत मिलती है। वहीं इमरजेंसी सिचुएशन में प्राकृतिक रूप से इसका सीक्रेशन बढ़ जाता है। वहीं जब महिलाओं में लेबर पेन होता है, तो इसका लेवल बढ़ जाता है, इसी कारण से वह मुश्किल दर्द बर्दाश्त कर पाती हैं।</p><h2>कॉर्टिसोल हार्मोन</h2><p>कई बार ऐसा होता है कि जब व्यक्ति के शरीर में आराम और खुशी का एहसास कराने वाले डोपामिन, सेरोटोनिन और नॉरएड्रिनालिन जैसे हैप्पी हार्मोन्स का लेवल काफी कम हो जाता है। ऐसी कंडीशन में कॉर्टिसोल हार्मोन अपना काम शुरूकर देता है। जिसकी एक्टिविटी के कारण व्यक्ति थोड़ी देर में टेंशन में आ जाता है, लेकिन इस समस्या का समाधान ढूंढने में उसकी मदद करता है।</p><h2>ये हैं फर्टिलिटी से जुड़े हार्मोन्स</h2><p>टीनेज में लड़कियों के शरीर में फीमेल फर्टिलिटी हार्मोन एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन का सीक्रेशन शुरू हो जाता है। जो लड़कियों की फिजिकल डेवलपमेंट में मददगार होता है। जिस कारण से उनमें आर्टिस्टिक नेचर, केयर और पेशेंस जैसे फीमेल ट्रेड्स पाए जाते हैं। वहीं लड़कों में &nbsp;मेल हार्मोन टेस्टोस्टेरोन पाया जाता है, जिस कारण उनमें लीडरशिप, निडरता और जोश जैसे मेल ट्रेड्स का डेवलपमेंट होता है। पुरुष और महिला दोनों के शरीर में अपोजिट जेंडर के लिए हार्मोन्स लिमिटेड क्वांटिटी में एक्टिव होते हैं। यह महिला और पुरुषों की पर्सनालिटी को बैलेंस करने का काम करता है। इस कारण महिलाओं में केयरिंग नेचर और पुरुषों में हिम्मत आदि की क्वालिटी नजर आती है।</p><h2>थायरॉयड और मूड</h2><p>गले में मौजूद थायरॉयड ग्लैंड से T3 और T4 हार्मोन का सीक्रेशन भी होता है। पुरुषों के शरीर में भी यह हार्मोन मौजूद होता है। जिस कारण उनको डिप्रेशन, वेट लॉस, सुस्ती और कब्ज जैसी समस्या हो सकती है। इसका लेवल ज्यादा होने से उनमें गुस्सा, घबराहट, वेट गेन, अनिद्रा और लूज मोशन जैसी समस्या हो सकती है। हालांकि अधिकतर महिलाओं में हाइपोथायरॉइडिज्म यानी इस हार्मोन की कमी से जुड़ी समस्या देखने को मिलती है।</p><h2>यह न भूलें</h2><p>रोजाना एक्सरसाइज और मॉर्निंग वॉक करना चाहिए। इससे शरीर में एंडोर्फिंस हार्मोन लेवल बढ़ता है और व्यक्ति स्ट्रेस फ्री फील करता है।</p><p>वहीं अच्छी मेमोरी के लिए रोजाना 7 से 8 घंटे की नींद लेना जरूरी है।</p><p>पहेलियां, सुडोकू और चेस जैसे गेम्स खेलने से दिमाग की अच्छी एक्सरसाइज होती है।</p><p>मेंटल स्ट्रेस की कंडीशन में अगर चटपटी और चॉकलेट जैसी चीजें खाई जाती हैं, तो दिमाग में एंडोर्फिन हार्मोन तेजी से रिलीज होता है, जोकि स्ट्रेस लेवल को कम करने में मदद करता है।</p><p>स्मोकिंग की आदत और पॉल्यूशन से बचने की कोशिश करनी चाहिए। क्योंकि धुंए में मौजूद जहरीले एलिमेंट्स से दिमाग की काम करने की क्षमता प्रभावित होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 13:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/how-hormones-and-neurotransmitters-influence-human-behaviour-and-mood</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[High Uric Acid के लक्षण और बचाव: जोड़ों में सूजन और Gout का खतरा ऐसे घटाएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/high-uric-acid-level-causes-joint-pain-and-ways-to-control-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अगर अचानक से आपको तेज दर्द, सूजन और खासकर पैर के अंगूठे में असहनीय तकलीफ होती है, तो यह संकेत यूरिक एसिड बढ़ने के हो सकते हैं, जो कि गाउट की समस्या बढ़ा देता है। यूरिक एसिड शरीर में प्यूरीन नाम के पदार्थों के ब्रेकडाउन से बनता है।</p><p>किडनी इसे फिल्टर करके पेशाब के जरिए बाहर निकालती रहती है, लेकिन जब शरीर इसे पर्याप्त मात्रा में बाहर नहीं निकाल पाता या इसकी मात्रा बढ़ जाती है, तो इससे जोड़ों में समस्याएं भी बढ़ने लगती है।</p><p>हेल्थ एक्सपर्ट के अनिसार, यूरिक एसिड बढ़ने का मतलब ये जरुरी नहीं कि हर व्यक्ति को गठिया हो। खानपान, वजन और समय पर सही इलाज से भी इसको मैनेज किया जाता है।</p><p><strong>यूरिक एसिड बढ़ने की वजह क्या है?</strong></p><p>दरअसल, यूरिक एसिड बढ़ने के पीछे खानपान में गड़बड़ी को जिम्मेदार माना जाता है। कुछ लोगों को अनुवंशिक कारण, किडनी की कार्यक्षमता में कमी, कुछ दवाओं और दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भी यूरिक एसिड बढ़ने की दिक्कत हो सकती है।</p><p>- जैसे कि रेड मीट और कुछ खास तरह के सीफूड में प्यूरीन अधिक मात्रा में पाया जाता है।</p><p>- शराब और बीयर के सेवन करने से गाउट के जोखिमों को बढ़ा सकते हैं।</p><p>- मीठे पेय और फ्रक्टोज की अधिकता भी जोखिमों का कारण बन सकती है।</p><p>- मोटापा और किडनी से जुड़ी समस्याओं के शिकार लोगों में भी खतरा अधिक देखने को मिलता है।</p><p><strong>खानपान में क्या बदलाव करें?</strong></p><p>- रेड मीट और हाई प्यूरीन वाले सीफूड्स का सेवन न करें।</p><p>- शराब और चीनी वाले सॉफ्ट ड्रिंक के सेवन से बचें।</p><p>- सब्जियां, साबुत अनाज, लो फैट वाले दूध और दही को डाइट में शामिल करें।</p><p>- जूस और मीठे पेय की जगह साबुत फलों का सेवन करें।</p><p><strong>यूरिक एसिड कंट्रोल करने के लिए और किन बातों का ध्यान रखें?</strong></p><p>- रोजाना नियमित अंतराल में पानी पिएं।</p><p>- वजन अधिक है, तो धीरे-धीरे वजन को कम करें।</p><p>- नियमित हल्की या मध्यम शारीरिक गतिविधि करें।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 16:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/high-uric-acid-level-causes-joint-pain-and-ways-to-control-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बदलते मौसम में सर्दी-खांसी और गले की खराश से राहत दिलाएंगे ये आसान घरेलू उपाय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/simple-home-remedies-to-treat-cold-cough-and-sore-throat]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बदलते मौसम में कई सारी बीमारियों का जन्म देता है। इस दौरान सर्दी-खांसी और जुकाम होना आम बात है। इस समय में मौसम में काफी बदलाव हुआ है, जिस कारण से एलर्जी और संक्रमण भी काफी फैल रहा है। वर्तमान में सर्दी-खांसी के साथ ही गले में खराश की समस्या हो सकती है।</p><p>इसके साथ ही गले में दर्द, कुछ खाने-पीने में परेशानी और यहां तक कि बोलने में भी तकलीफ होने लगती है। असल में गले में खराश हमेशा बैक्टीरियल संक्रमण के कारण ही नहीं होती, कई मामलों में इसके पीछे वायरल संक्रमण भी हो सकता है। ऐसे में हर बार एंटीबायोटिक्स लेने की जरुरत नहीं होती है। वैसे आपको इन दवाओं का सेवन डॉक्टर की सलाह पर करना चाहिए।</p><p>आइए आपको इस लेख में बताते हैं कि सर्दी-खांसी और गले की खराश होने पर इनसे कैसे आराम पाएं?</p><p><strong>तुलसी और काली मिर्च का काढ़ा</strong></p><p>अगर आप काफी समय से सर्दी-खांसी से परेशान है, तो आप तुलसी और काली मिर्च से बना गर्म पेय पी सकते हैं। यह आपको काफी आराम देगा।</p><p>- इसे बनाने के लिए आपको चाहिए एक कप पानी में 5-6 तुलसी के पत्ते और 4-5 काली मिर्च डालकर उबालें।</p><p>- अब पानी को छानकर गुनगुना होने पर पिएं।</p><p>- गले की समस्याओं से राहत देने में फायदेमंद तरीका माना जाता है।</p><p><strong>नमक वाले पानी से करें गरारे</strong></p><p>अगर आपके गले में खराश और दर्द हो रहा है, तो आप गुनगुने नमक वाले पानी से गरारे कर सकते हैं। यह एक आसान घरेलू उपाय है, जो गले की असहजता को कम करने में मदद कर सकता है। इसके लिए एक गिलास गुनगुने पानी में करीब आधा चम्मच नमक मिलाएं। नमक के पूरी तरह घुल जाने के बाद इससे गरारे कर सकते हैं। जरुरत के मुताबिक दिन में दो-तीन बार ऐसा कर सकते हैं।</p><p><strong>शहद से मिल सकती है गले की खराश में राहत</strong></p><p>गले में खराश और खांसी से राहत पाने के लिए आप शहद का सेवन कर सकते हैं। शहद गले को आराम पहुंचाने और खांसी की परेशानी कम करने में मदद करता है।</p><p>- यदि आपके गले में खराश है, तो आप थोड़ी मात्रा में शहद का सेवन कर सकते हैं। कुछ लोग इसमें थोड़ी काली मिर्च मिलाकर भी खाते हैं।</p><p>- यदि आपकी समस्या बढ़ती ही जा रही है और सामान्य उपायों से आराम नहीं मिल रहा है, तो आप एक बार डॉक्टर को जरुर दिखाएं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 12:25:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/simple-home-remedies-to-treat-cold-cough-and-sore-throat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Muscle Pain Relief: मांसपेशियों के Muscle Pain से राहत पाने के लिए अपनाएं सिकाई और हल्दी दूध के नुस्खे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/home-remedies-to-relieve-muscle-pain-naturally-with-hot-compress-and-milk]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आजकल मसल पेन यानी की मांसपेशियों में दर्द की समस्या आम हो गई है। गलत पॉश्चर, ऑफिस में घंटों बैठकर काम करना, ज्यादा एक्सरसाइज या नींद की कमी होना। ये सभी मसल पेन की बड़ी वजह बनती हैं। कई बार ठंड लगने या फिर शरीर में पानी की कमी होने से भी मांसपेशियों में दर्द और जकड़न महसूस होने लगता है। तो कई बार यह दर्द इतना तेज होता है कि रोजमर्रा के काम करना भी मुश्किल हो जाता है। ऐसे में लोग पेनकिलर का सहारा लेते हैं, लेकिन हर बार दवा लेना सही नहीं होता है। इसलिए आप कुछ आसान और घरेलू नुस्खों की मदद से इस दर्द से राहत पा सकते हैं।</p><h2>मसल पेन से ऐसे पाएं राहत</h2><h2>सिकाई करें</h2><p>अगर आपका दर्द पुराना है, अकड़न या जकड़न है, तो गर्म पानी की थैली या तौलिए को गर्म पानी में निचोड़कर 15-20 मिनट सिकाई करें। इससे आपकी मसल्स रिलैक्स होती हैं और साथ ही खून का दौरा बढ़ता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/gen-z-struggles-with-anxiety-relying-secretly-on-ai-chatbots-for-help" target="_blank" rel="noopener">Gen Z युवा तनाव छिपाने के लिए ले रहे AI Chatbots का सहारा, Health Experts ने दी चेतावनी</a></p><p>अगर चोट लगने, ज्यादा वर्कआउट करने या गिरने के फौरन बाद दर्द और सूजन होती है, तो बर्फ को कपड़े में लपेटकर 10 मिनट तक लगाएं। इससे जलन और सूजन फौरन कम होगी।</p><h2>हल्दी वाला दूध</h2><p>हल्दी को नेचुरल पेनकिलर कहा जाता है। इसमें करक्यूमिन नामक तत्व होता है, जोकि सूजन को अंदर से खत्म करता है। रात में सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध में आधा चम्मच हल्दी और एक चुटकी काली मिर्च को मिलाकर पिएं। काली मिर्च हल्दी के असर को 10 गुना तक बढ़ा देती है और अगर आप लगातार 4-5 दिन पीने से दर्द में काफी आराम मिलता है।</p><h2>मालिश</h2><p>मालिश करने से भी मसल पेन से राहत मिल सकती है। इसके लिए सरसों के तेल में 2-3 टिकिया कपूर की डालकर पका लें। फिर इसको हल्का गुनगुना होने पर दर्द वाली जगह पर 5 से 7 मिनट तक नीचे से ऊपर की ओर मालिश करें।</p><p>अगर आपको जलन वाला दर्द है, तो नारियल तेल बेहतर है। रात में नारियल तेल और लौंग से मालिश करके सुबह तक छोड़ दें। ध्यान रहे कि ज्यादा तेज हाथों से न रगड़ें।</p><h2>खुद को रखें हाइड्रेटेड</h2><p>शरीर में पानी की कमी होने पर मसल्स में लैक्टिक एसिड जमा हो जाता है, जिस कारण दर्द और क्रैंप होता है। इसलिए दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी जरूर पिएं। साथ ही नारियल पानी, नींबू पानी, ORS या केले खाएं। केले में पोटैशियम पाया जाता है, तो मसल्स क्रैंप को रोकता। वहीं चाय-कॉफी और कोल्ड ड्रिंक कम पीना चाहिए।</p><h2>स्ट्रेचिंग और योग</h2><p>दर्द में पूरा आराम करना भी गलत है, क्योंकि दर्द हल्की स्ट्रेचिंग से मसल्स पेन जल्दी ठीक हो जाता है।</p><p>रोजाना सुबह उठते ही कंधे, गर्दन और कमर की 10 मिनट स्ट्रेचिंग करनी चाहिए।</p><p>तड़ासन, भुजंगासन और शवासन आदि करने से भी मसल पेन के लिए सबसे अच्छे माने जाते हैं।</p><p>लंबे समय तक एक ही पॉश्चर में बैठे रहने से भी यह समस्या हो सकती है, इसलिए हर 45 मिनट में 2 मिनट जरूर टहलना चाहिए।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 11:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/home-remedies-to-relieve-muscle-pain-naturally-with-hot-compress-and-milk</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Navratri व्रत में मिलावटी Kuttu Atta से बचें, वरना बिगड़ जाएगी तबयित! चिकनाई और महक से तुरंत पहचानें असली आटा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/buckwheat-flour-purity-can-be-checked-at-home-with-simple-tests]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>नवरात्रि के मौके पर हर कोई देवी दुर्गा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए व्रत रखते हैं। ऐसे में कई लोग 9 दिनों तक व्रत रखते हैं। व्रत रखने वाले ज्यादातर लोग फलाहर के रुप में कुट्टू के आटे से बनीं हुई पूड़ी, पकौड़ी या चीला खाना पसंद करते हैं।</p><p>हालांकि, आप जानते हैं कि बाजार में मिलने वाला कुट्टू का आटा आपकी सेहत के लिए खतरनाक भी हो सकता है। फेस्टिल सीजन के समय मुनाफे की लालच में इसमें काफी मिलावट की जाती है। आइए आपको बताते हैं कुट्टू आटे की शुद्धता को कैसे पहचानें।</p><p><strong>नकली कुट्टू का आटा कैसे पहचानें?</strong></p><p><strong>पानी का टेस्ट</strong></p><p>इसके लिए आप एक पारदर्शी गिलास में पानी लें और उसमें चम्मच कुट्टू का आटा को मिला लें। असल में यह आटा धीरे-धीरे नीचे बैठ जाए और पानी का रंग सामान्य रहे, तो यह शुद्ध है। लेकिन पानी का रंग बहुत ज्यादा बदल जाए या ऊपर कुछ तैरता नजर आए, तो इसमें मिलावट हो सकती है।</p><p><strong>नींबू का रस</strong></p><p>एक कटोरी में थोड़ा-सा कुट्टू का आटा लें और उस पर नींबू का रस की कुछ बूंदें डालें। यदि आटे में से बुलबुले उठने लगे, तो समझ जाए कि इसमें चॉक पाउडर या बेकिंग सोडा मिलाया गया है। इस तरह का आटे का सेवन काफी हानिकारक है।</p><p><strong>छूकर और सूंघकर देखें</strong></p><p>अगर आप असली कुट्टू का आटा छूते हैं, तो आपको हल्का-सा दरदरा महसूस होगा। यह टेलकम पाउडर की तरह बहुत ही चिकना लगे , तो यह मिलावटी कुट्टू का आटा है। वहीं, आप आटे को सूंघकर देखें। इसमें से सीलन, जाले या कड़वी महक आ रही है, तो यह पुराना है और खराब हो चुका है।</p><p><strong>आटा गूंथते समय ध्यान दे</strong></p><p>इस बात का ध्यान रखें कि कुट्टू के आटे में ग्लूटेन नहीं होता है। इसलिए यह आसानी से गुंधता या बंधता नहीं है। यदि आपको आटा गूंथते समय गेहूं के आटे की तरह ज्यादा खिच रहा है या आसानी से लोई बन रही है, तो इसका मतलब है कि इसमें मिलावट की गई है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 11 Oct 2026 17:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/buckwheat-flour-purity-can-be-checked-at-home-with-simple-tests</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gen Z युवा तनाव छिपाने के लिए ले रहे AI Chatbots का सहारा, Health Experts ने दी चेतावनी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/gen-z-struggles-with-anxiety-relying-secretly-on-ai-chatbots-for-help]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>वैश्विक स्तर मेंटल हेल्थ की समस्याएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के हिसाब से दुनियाभर में करीब हर 7 में से 1 व्यक्ति किसी न किसी मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या से परेशान हैं। जिनमें डिप्रेशन और एंग्जायटी के मामले सबसे आम हैं। यह आंकड़े बताते हैं कि यह समस्याएं सिर्फ वयस्कों और कामकाजी वर्ग के लोगों तक सीमित नहीं है, लेकिन यहां कम उम्र वाले छात्रों में भी यह समस्या बढ़ती जा रही है।</p><p>वहीं भारतीय लोगों के लिए भी मानसिक विकार चिंता का कारण बने हैं। डब्ल्यूएचओ और राष्ट्रीय सर्वे के आंकड़ों के मुताबिक भारत में करीब 15 करोड़ लोगों को एंग्जायटी और डिप्रेशन जैसी समस्या से निदान की जरूरत है। करीब 10.6% वयस्क किसी न किसी ऐसी मेंटल हेल्थ की समस्याओं से जूझ रहे हैं। वहीं ग्रामीण इलाकों की तुलना में शहरी इलाकों में मेंटल हेल्थ संबंधी समस्याओं में इलाफा अधिक है। हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो मेंटल हेल्थ की बढ़ती समस्या चिंता का विषय है, लेकिन ज्यादा चिंता की बात यह है कि लोगों को समय पर इसके बारे में पता न चल पाना या फिर इलाज न मिल पाना।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/buckwheat-flour-daily-consumption-during-navratri-fasting-can-harm-health" target="_blank" rel="noopener">Navratri Diet में रोज न खाएं तला हुआ कुट्टू का आटा, बिगड़ सकती है Gut Health</a></p><h2>युवा पीढ़ी में मेंटल हेल्थ का खतरा</h2><p>हाल ही में एक सर्वे में बड़ा खुलासा हुआ है कि मेंटल हेल्थ के प्रति बढ़ती जागरुकता के बाद बड़ी संख्या में देश के जेन-जी अब भी भावनात्मक चुनौतियों से परेशान हैं।</p><p>सर्वे के मुताबिक 13 से 29 साल की उम्र वाले देश के करीब 50% युवा अपनी मुश्किल भावनाओं को खुद संभालने का प्रयास करते हैं। सिर्फ 9-10% युवा ही मदद के लिए जाते हैं।</p><p>वहीं करीब 40.9% युवाओं ने इस बात को माना कि अंदर से परेशान होने की बजाय वह ऐसा दिखाने पर मजबूर हैं कि सब ठीक है। भावनाओं पर बात करने की जगह युवा खुद को बिजी रखते हैं। जिससे कि परेशान करने वाले ख्यालों के बारे में सोचने का समय न मिले।</p><p>सिर्फ 13.6% युवाओं ने बताया कि किसी ने बिना जज किए उनकी बातों को सुना और उनका साथ दिया।</p><h2>सर्वे में क्या निकला</h2><p>मेंटल हेल्थ को सिर्फ डिप्रेशन या एंग्जायटी जैसी बीमारियों तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि व्यक्ति अपने रिश्तों, विचारों और मुश्किल भावनाओं को कैसे संभालता है।</p><p>जब युवाओं को बार-बार काम पर ध्यान दो, मजबूत बनो जैसी बातें सुनने को मिलती हैं। तो उनके भावनात्मक दर्द और वास्तविक परेशानी को समझने की जगह पर उसको दबा दिया जाता है।</p><h2>क्या कहते हैं एक्सपर्ट</h2><p>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक बाहर से सब ठीक दिखने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि वह व्यक्ति अंदर से भी ठीक हो। मेंटल हेल्थ जैसी समस्याओं के निदान के दौरान कई बार देखने को मिलता है कि मरीज काम कर रहा है, पढ़ाई कर रहा, दोस्तों से बात हो रही लेकिन इसके बाद भी उनके दिल और दिमाग में किसी चीज की उथल-पुथल चल रही है, जो किसी से कहने का मन नहीं करता है।</p><p>युवाओं में मानसिक परेशानी और भावनात्मक तनाव को लेकर चुप्पी गंभीर चिंता का विषय है। आमतौर पर इसके लिए सामाजिक कलंक के भाव को सबसे बड़ी वजह के तौर पर देखा जाता है। मरीजों को डर रहता है कि अगर वह मदद लेने के लिए डॉक्टर के पास गए, तो लोग क्या सोचेंगे कि क्या ये पागल हो गया है।</p><p>जबकि असलियत यह है कि बीमारी को छिपाना समस्या को हर दिन के साथ ज्यादा बढ़ाता जाता है। जिसको स्ट्रेस-एंग्जायटी को समय रहते ध्यान देकर सही किया जा सकता है। लेकिन इसको लंबे समय तक छिपाए रखना, कई बार डिप्रेशन जैसी गंभीर समस्या के रूप में सामने आता है।</p><h2>युवा AI से लेते हैं मदद</h2><p>एक रिपोर्ट के मुताबिक मेंटल हेल्थ की समस्या होने पर युवा चोरी-छिपे एआई का सहारा लेते हैं। एआई चैटबॉट मानसिक तनाव, भावनात्मक परेशानियों और अकेलेपन में लोगों को फौरन बातचीत का ऑप्शन दे रहे हैं। क्योंकि एआई परेशान लोगों की बात सुनता है, जवाब देता है तो युवा थोड़ा अच्छा महसूस करते हैं।</p><p>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक किसी भी सेहत संबंधी समस्या के निदान के लिए मरीज ही लाइफस्टाइल, हिस्ट्री और खानपान की आदत जैसी चीजों को समझना जरूरी है। जोकि एआई चैटबॉट नहीं करते हैं। वहीं एआई की सहायता लेना डिप्रेशन जैसे गंभीर मामलों में आत्महत्या के विचारों को बढ़ाने वाला हो सकता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 15:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/gen-z-struggles-with-anxiety-relying-secretly-on-ai-chatbots-for-help</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Navratri Diet में रोज न खाएं तला हुआ कुट्टू का आटा, बिगड़ सकती है Gut Health]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/buckwheat-flour-daily-consumption-during-navratri-fasting-can-harm-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि की शुरुआत 11 अक्टूबर 2026, रविवार से हो रही है। नवरात्रि में नौ दिनों तक व्रत रखा जाता है। इस दौरान व्रती कुट्ट के आटे की पकौड़ी का सेवन सबसे ज्यादा करता है। उपवास के समय अपनी हेल्थ और डाइट का भी खासा ध्यान रखना है। इस दौरान ज्यादा तला-भुना या मीठी चीजें खाने से सेहत बिगड़ सकती हैं। नवरात्रि में कुट्टू के आटे की पूरी और पकौड़ी घरों में खूब खाई जाती है। ऐसे में रोजाना कुट्टू का आटे का सेवन सेहत बिगड़ सकता है। आइए आपको बताते हैं रोजाना कितनी मात्रा और किस तरह से डाइट में शामिल किया जा सकता है।</p><p><strong>कुट्टू के आटे के फायदे</strong></p><p>- कुट्टू का आटा प्रोटीन और फाइबर से भरपूर होती है, जो कि लंबे समय तक पेट को भरा रखती है।</p><p>- इसमें ग्लाइसेमिक इंडेक्स (GI) बेहद कम होता है। इसलिए यह ब्लड शुगर लेवल को कंट्रोल करने में मदद करती है।</p><p>- इतना ही नहीं, इसमें मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और आयरन जैसे मिनरल्स भी पाए जाते हैं। जो कि बोन हेल्थ के लिए फायदेमंद है।</p><p>- यह कब्ज की समस्या को दूर करता है और गट हेल्थ को बेहतर बनाता है।</p><p>- इसमें पाए जाने वाला एंटीऑक्सीडेंट्स और फाइबर कोलेस्ट्रॉल को कम करते हैं और हार्ट हेल्थ के लिए फायदेमंद होती है।</p><p><strong>क्या नवरात्रि में रोजाना कुट्टू की पूरी और पकौड़ी खाना सही है?</strong></p><p>वैसे तो कुट्टू के आटे में फाइबर और मिनरल्स से पाए जाते हैं और यह ग्लूटेन-फ्री होता है। हालांकि नवरात्रि में सबसे ज्यादा कुट्टू की पूरी और पकौड़े खाने से सेहत पर काफी बुरा असर देखने को मिलता है। पूरी और पकौड़ी को डीप-फ्राई किया जाता है। जिससे तेल सबसे ज्यादा अब्जॉर्ब होता है। जिसके सेवन से एसिजिटी, पेट फूलना, अपच और सुस्ती हो सकती है। इसके अधिक सेवन से पेट में समस्या हो सकती है, जिन लोगों को इरिटेबल बाउल सिंड्रोम या किडनी से संबंधित दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।</p><p><strong>नवरात्रि के व्रत में कुट्टू के आटे की कितनी मात्रा सही?</strong></p><p>नवरात्रि के व्रत में हेल्दी रहने के लिए, नौ दिनों के दौरान कुट्टू से बनी तली हुई चीजें दो-तीन बार ही खाएं। कुट्टू की रोटी, भाप में पकी या उबली हुई व्रत वाली सब्जियां, फल, नट्स और छाछ जैसे हेल्दी ऑप्शन चूज करें। इसलिए आप नारियल पानी, नींबू पानी या हर्बल चाय पीकर शरीर को हाइड्रेट रखें।</p><p>सही मात्रा- एक बार में एक- दो छोटी पूरी या चार-पांच पकौड़े खाएं, रोज नहीं। पाचन में मदद के लिए फाइबर से भरपूर सलाद या दही के साथ खाएं। यदि आपको डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर या पाचन संबंधित जुड़ी समस्या हो सकती है, तो व्रत रखने से पहले एक बार डॉक्टर की सलाह जरुर लें।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 18:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/buckwheat-flour-daily-consumption-during-navratri-fasting-can-harm-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[World Mental Health Day पर Screen Time घटाएं, दिमाग को स्वस्थ रखने के लिए अपनाएं ये आदतें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/world-mental-health-day-tips-to-protect-brain-health-in-digital-age]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल 10 अक्टूबर को वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे मनाया जाता है। गौरतलब है कि आज के डिजिटल दौर में मोबाइल और लैपटॉप हमारी जिंदगी का जरुरी हिस्सा बन चुका है। जब हम सभी सुबह उठते हैं, तो सबसे पहले फोन चेक करना, दिनभर स्क्रीन पर काम करना और रात को सोने से पहले सोशल मीडिया चलाना हमारी आदत बन गई है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि फोन को घंटों तक इस्तेमाल करना, नींद न पूरी होना और हर समय ऑनलाइन रहने का प्रभाव हमारे दिमाग पर असर जरुर डालता है।</p><p>हम आपको वर्ल्ड मेंटल हेल्थ डे 2026 के मौके पर डिजिटल दुनिया का इस्तेमाल करते हुए अपने दिमाग की सेहत को कैसे बचाएं और कौन-सी आदतें आपकी मदद कर सकते हैं, जानें।</p><p><strong>डिजिटल दौर में दिमाग को हेल्‍दी कैसे रखें?</strong></p><p>अगर आप डिजिटल दुनिया से पूरी तरह से दूर रहना चाहते हैं, तो लेकिन फोन और लैपटॉप का इस्तेमाल किस तरह करते हैं, इस पर ध्यान देना जरुरी है। लगातार नोटिफिकेशन चेक करना, देर रात तक रील्स देखने और काम के बीच आराम न करना हमारी नींद और ध्यान लगाने की क्षमता पर बुरा असर डाल सकता है।</p><p>असल में मेंटल हेल्थ का संबंध केवल दिमाग से नहीं बल्कि दिल, खून की नसों, नींद और हमारी रोजाना की आदतों से भी है। इसलिए दिमाग को हेल्दी रखने के लिए स्क्रीन टाइम के साथ-साथ अपनी पूरी दिन की रुटीन पर भी ध्यान देना चाहिए।</p><p><strong>ऑनलाइन रहने का दबाव दिमाग को कैसे प्रभावित करता है?</strong></p><p>खासकर ऑफिस के मैसेज, सोशल मीडिया की लगातार अपडेट और घर की जिम्मेदारियों के बीच कई लोग तनाव से घिर जाते हैं। ऐसे में तनाव लंबे समय तक बना रहता है। काम के बीच आराम करना, अच्छी नींद लेना और तनाव को कम करना भी काफी जरुरी है।</p><p><strong>मेंटल हेल्‍थ के लिए इन लक्षणों को न करें नजरअंदाज</strong></p><p>अगर आप डिजिटल स्क्रीन पर लंबे समय तक काम करते हैं, तो आपके आंखों में थकान, गर्दन में दर्द और सिरदर्द हो सकता है, लेकिन हर परेशानी की वजह स्क्रीन ही हो, यह जरुरी नहीं है।</p><p>लगातार बढ़ता सिरदर्द<br>अचानक चक्‍कर आना,<br>धुंधला द‍िखाई देना<br>याददाश्त से जुड़ी परेशानी होना<br>हाथ-पैर में कमजोरी होना<br>बोलने में द‍िक्कत महसूस होना<br>अचानक चेहरे का एक हिस्सा लटकना</p><p>यदि आपको ये सभी लक्षण नजर आएं, तो डॉक्टर को जरुर दिखाएं। ये स्ट्रोक के लक्षण हो सकते हैं।</p><p><strong>डिजिटल युग में दिमाग को हेल्‍दी रखने के तरीके</strong></p><p>- रात में मोबाइल चलाने का समय कम करें और सोने-जागने का समय फिक्स कर लें।</p><p>- हर घंटे कुछ देर के लिए स्क्रीन से नजर हटाएं और थोड़ा दूर चलें।</p><p>- रोजना पैदल चलें, अपने क्षमता के अनुसार करीब 30 मिनट टहलने की कोशिश करें।</p><p>- वर्क और आराम के बीच बैलेंस बनाए रखें। जरुरत पड़ने पर किसी भी एक्सपर्ट से बात जरुर करें।</p><p>- इनका बढ़ा हुआ लेवल दिमाग की नसों को नुकसान पहुंचा सकता है।</p><p>- हर समय ऑनलाइन रहने से बचना जरुरी है। अपने फोन के नोटिफिकेशन की सीमित करें और दिन में कुछ समय बिना स्क्रीन के बिताएं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 15:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/world-mental-health-day-tips-to-protect-brain-health-in-digital-age</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sunset Awe Effect: Sunset Awe बढ़ाता है एकाग्रता और Memory, अनिद्रा की समस्या से मिलेगी राहत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/better-sleep-and-reduced-depression-through-regular-sunset-awe-therapy]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शाम को ढलते सूरज को देखना सिर्फ प्रकृति का एक सुंदर दृश्य नहीं बल्कि यह हमारी फिजिकल और मेंटल हेल्थ के लिए एक कुदरती थेरेपी है। विज्ञान की भाषा में इसको 'सनसेट ऑ' प्रभाव कहा जाता है। कई अध्ययनों से यह पता चलता है कि सूर्यास्त के दौरान मन में कई हैरान कर देने वाली सुंदर भावनाएं चिंता, डिप्रेशन और तनाव को दूर करने में बेहतर असर दिखाती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि सनसेट ऑ क्या है और साथ ही यह भी जानेंगे कि इसका हमारी फिजिकल और मेंटल हेल्थ पर क्या असर होता है।</p><h2>'सनसेट ऑ' का प्रभाव</h2><p>जब भी हम प्रकृति को देखते हैं, तो हमारे मन में एक विशेष तरह का विस्मय पैदा होता है। हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक जब इंसान आसमान में ढलते सूरज के रंगों को देखता है, तो व्यक्ति को यह एहसास होता है कि इस अनंत ब्रह्मांड के सामने उनकी चिंताएं और परेशानियां बहुत छोटी हैं। इस नजरिए के साथ व्यक्ति निगेटिव सोच से बाहर निकलता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/arthritis-prevention-tips-include-physical-activity-and-weight-loss" target="_blank" rel="noopener">Arthritis Symptoms: जोड़ों की पुरानी चोट से बढ़ सकता है Osteoarthritis का रिस्क, सही समय पर लें डॉक्टरी सलाह</a></p><h2>मानसिक और शारीरिक सेहत पर पॉजिटव प्रभाव</h2><p>सूर्यास्त का नजारा इतना गहरा होता है कि यह इंसान को पूरी तरह से वर्तमान के समय में ले आता है और इसके अन्य वैज्ञानिक फायदे भी हैं।</p><h2>तनाव और डिप्रेशन से मिल सकती है मुक्ति</h2><p>अगर आप नियमित रूप से सूर्यास्त देखते हैं, तो इससे दिमाग में सकारात्मक तरंगे पैदा होती हैं। जो लोग कुदरत के इस रूप को निहारते हैं, वह मानसिक तनाव और अवसाद से आसानी से उबर जाते हैं।</p><h2>नींद होगी बेहतर</h2><p>सनसेट के समय प्राकृतिक रोशनी कम होती है, जोकि हमारी बायोलॉजिकल क्लॉक को संकेत देता है कि दिन अब खत्म हो रहा है। इससे शरीर में नींद लाने वाले हार्मोन रिलीज होते हैं, जिससे अनिद्रा की समस्या भी दूर होती है।</p><h2>याददाश्त और एकाग्रता में होगी वृद्धि</h2><p>बता दें कि कुदरत के ऐसे दृश्य देखने से एकाग्रता में वृद्धि होती है, साथ ही इससे ध्यान लगाने की क्षमता और याददाश्त में भी सुधार होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 11:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/better-sleep-and-reduced-depression-through-regular-sunset-awe-therapy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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