<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[Expensive Hair Treatment की जगह अपनाएं ये Hair Care डाइट, बायोटिन और आयरन से बढ़ेगी चमक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/7-superfoods-for-stronger-hair-and-scalp-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बालों की केयर के लिए हम सभी कई महंगे शैंपू, सीरम और हेयर स्पा&nbsp; पर पैसे खर्च करते हैं। लेकिन फिर भी खासा परिणाम नहीं मिलता है। असल में बालों में असली बदलाव तब आता है जब उन्हें अंदर से सही पोषण मिले।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">गौरतलब है कि बाहरी देखभाल से बालों का डेंसिटी नहीं बढ़ता। यदि आपकी डेली डाइट संतुलित रहती है, तो आपके लिए हेयर फॉलिकल्स मजबूत बने रहते हैं और बाल अपने आप घने और शानदार दिखाई देते हैं। आइए आपको बताते हैं कुछ खास नेचुरल डेली सप्लीमेंट्स के बारे में, जो आपके बालों की मोटाई और मजबूती बढ़ाने में एक्सपर्ट है।</span></div><div><br></div><div><b>शकरकंद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">शकरकंद में बीटा-कैरोटीन का खजाना है। यह शरीर में जाकर विटामिन ए में बदल जाता है, जो स्कैल्प में नेचुरल ऑयल बनाने में मदद करता है। इसके नियमित सेवन से आपके बाल सूखे और बेजान नहीं होगी।&nbsp; वहीं, बालों की जड़ें मजबूत होती हैं और उनका घनत्व काफी बेहतर हो जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>चिया सीड्स&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">ओमेगा-3 फैटी एसिड, प्रोटीन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते है। इतना ही नहीं, चिया सीड्स स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन को सुधारने में मदद करता है। वैसे यह बालों की ग्रोथ का बढ़ाता है। रोजाना एक चम्मच भिगोए हुए चीया सीडस् को पानी या अपनी पसंदीदा स्मूदी में मिला सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>अंडे</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">बालों के लिए सबसे जरुरी प्रोटीन है और अंडे हाई क्वालिटी वाले प्रोटीन के साथ-साथ बायोटिन से भरपूर है। बायोटिन बालों में केराटिन के उत्पादन को तेज करता है। यदि आप नियमित रूप से अंडे खाते हैं, तो बाल घने, मजबूत होंगे और उनका टूटना भी काफी कम हो जाएगा।</span></div><div><br></div><div><b>कद्दू के बीज</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मैग्नीशियम, आयरन और जिंक से भरे कद्दू के बीज स्कैल्प को हेल्दी रखता है। इनमें मौजूद जिंक आपके हेयर ग्रोथ साइकिल को संतुलित करता है। इसके लिए आप एक छोटी मुट्ठी कद्दू के बीज खाएं, यह जड़ों को भरपूर पोषण देता है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>दही</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">शायद ही आप जानते होंगे कि एक हेल्दी पाचन तंत्र पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से सोखता है, जिसका असर आपके बालों की मजबूती में देखने को मिलता है। खासकर दही में प्रोटीन और प्रोबायोटिक्स का बेस्ट सोर्स है। रोज एक कटोरी ताजा दही खाने से बालों की ग्रोथ और डेंसिटी में गजब का सुधार आता है।</span></div><div><br></div><div><b>बादाम</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सेहत के मामले में बादाम हेल्दी होता है। इसमें हेल्दी फैट्स, बायोटिन और विटामिन ई का बेहतरीन कॉम्बिनेशन हैं। विटामिन ई स्कैल्प में ब्लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे आपके हेयर फॉलिकल्स को अच्छे पोषण प्राप्त होता है। मजबूत और चमकदार बाल पाने के लिए रोज 4-5 भिगोए हुए बादाम जरुर खाएं।</span></div><div><br></div><div><b>पालक</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आपके लगातार बाल झड़ रहे हैं, तो आयरन की कमी है। विटामिन-सी, फोलेट और आयरन से भरपूर पालक इस कमी को दूर करता है। पालक का नियमित सेवन करने से स्कैल्प तक ऑक्सीजन सही तरीके से पहुंचती है, जिससे बालों की जड़े न सिर्फ मजबूत होती है, बल्कि बाल घने बनते हैं।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 11:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/7-superfoods-for-stronger-hair-and-scalp-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/23/7-superfoods_large_1148_157.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: क्या बाईं करवट सोना वाकई पाचन के लिए बेस्ट है? Heartburn रोकने के लिए अपनाएं ये Health Tips]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/is-sleeping-on-left-side-really-best-for-digestion-follow-these-health-tips-to-prevent-heartburn]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिनभर की थकान के बाद हर किसी के लिए सुकूनभरी और अच्छी नींद बेहद जरूरी होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सिर्फ कितने घंटे सोते हैं। यही नहीं आप किस पोजीशन में सोते हैं, इसका भी आपकी सेहत पर बड़ा असर हो सकता है। खासतौर हार्टबर्न और डाइजेशन जैसी समस्याओं में सोने की पोजीशन बेहद अहम भूमिका निभाती है। कई लोग रात में खाना खाने के बाद खट्टी डकार, सीने में जलन, एसिडिटी या पेट में भारीपन की शिकायत करते हैं।</div><div><br></div><div>अक्सर इसकी वजह अनियमित खानपान या मसालेदार खाने के माना जाता है। लेकिन कई बार गलत तरीके से सोना भी इन परेशानियों को बढ़ा सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि क्या सोने की पोजीशन से भी पाचन और सीने में जलन की समस्या हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/benefits-of-2-minute-micro-breaks-for-office-workers" target="_blank">Work Culture में तेजी से वायरल हो रहा Micro Break ट्रेंड, Desk Job वालों के लिए वरदान है यह 2-Minute ट्रिक</a></h3><div><br></div><h2>सोने की पोजीशन से भी पाचन और सीने में जलन की समस्या</h2><div>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक भोजन के फौरन बाद ही पीठ के बल सीधे लेट जाना या फिर पूरी तरह से सपाट सोने से पेट का एसिड भोजन नली की तरफ वापस आने लगता है। जिस कारण खट्टी डकार, सीने में जलन और गले में जलन जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। खासकर उन लोगों को जिनको पहले से गैस्ट्रोएसोफेगल रिफ्लक्स डिजीज है। उनमें यह समस्याएं ज्यादा देखने को मिलती है।</div><div><br></div><div>कई बार पेट के बल सोने से भी पेट पर ज्यादा दबाव पड़ता है, जिस कारण पाचन संबंधी असुविधा बढ़ सकती है। इस कारण देर रात भारी खाना खाने के फौरन बाद लेटना सही आदत नहीं मानी जाती है।</div><div><br></div><h2>पाचन के लिए सोने की सबसे अच्छी पोजीशन</h2><div>पाचन और हार्टबर्न दोनों के लिए बाईं करवट लेकर सोना फायदेमंद माना जाता है। बाएं ओर करवट लेकर सोने से गुरुत्वाकर्षण की वजह से पेट का एसिड भोजन नली में वापस जाने की संभावना कम होती है। इससे एसिड रिफ्लक्स और सीने की जलन की समस्या नहीं होती है। वहीं कुछ लोगों के लिए सिर और कंधों को थोड़ा ऊंचा रखकर सोना भी फायदेमंद होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा करने से पेट का एसिड ऊपर की ओर नहीं आता है और फिर रात में हार्टबर्न की शिकायत भी कम हो सकती है। लेकिन हर व्यक्ति की शारीरिक स्थिति अलग होती है। इसलिए यदि किसी को लगातार समस्या बनी रहती है, तो उसको फौरन डॉक्टर की सलाह जरूर लेना चाहिए।</div><div><br></div><div>वहीं बाएं ओर करवट लेकर रात में सोने से एसिड रिफ्लक्स के लक्षणों को कम करने में मदद कर सकता है। इससे हार्टबर्न और खट्टी डकार जैसी समस्याएं कम हो सकती हैं। इससे नींद और क्वालिटी बेहतर होती है। लेकिन अगर बार-बार एसिड रिफ्लक्स की समस्या होती है, तो सिर्फ सोने की पोजीशन को चेंज करने पर ही निर्भर नहीं रहना चाहिएष बल्कि डॉक्टर की सलाह और इलाज भी जरूरी है।</div><div><br></div><h2>हार्टबर्न से कैसे करें बचाव</h2><div>रात को सोने से कम से कम 2-3 घंटे पहले भोजन कर लेना चाहिए। जिससे कि भोजन को पचने का समय मिल सके। राज में ज्यादा मसालेदार, तला-भुना और ज्यादा तेल वाले खाने से परहेज करना चाहिए। वहीं शराब, कैफीन और धूम्रपान जैसी आदतों की वजह से भी एसिड रिफ्लैक्स को बढ़ा सकती है। अगर वेट ज्यादा है, तो उसको भी कंट्रोल करें। क्योंकि मोटापा पेट पर दबाव बढ़ाकर हार्टबर्न की समस्या को बढ़ा सकता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 12:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/is-sleeping-on-left-side-really-best-for-digestion-follow-these-health-tips-to-prevent-heartburn</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/22/health-tips_large_1222_148.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Work Culture में तेजी से वायरल हो रहा Micro Break ट्रेंड, Desk Job वालों के लिए वरदान है यह 2-Minute ट्रिक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/benefits-of-2-minute-micro-breaks-for-office-workers]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल कॉर्पोरट लाइफस्टाइल और डेस्क जॉब में घंटों तक लैपटॉप के सामने बैठे रहना सामान्य नहीं होता है। करीब 7 और 8 घंटे एक ही जगह बैठकर काम करना लोग अपनी आदत बना रहे हैं। आप भी ऑफिस में लगातार 8 घंटे तक लैपटॉप पर वर्क करते होंगे।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर होता है कि लगातार ऐसे बैठे रहने से न सिर्फ पीठ दर्द और गर्जन में खिंचाव आता है, बल्कि दिमाग भी थक जाता है और कई शारीरिक समस्याएं होने लगती हैं। सुबह के दौरान माइड फ्रेश रहता है, जिससे वर्क भी अच्छे से होता है, लेकिन दोपहर के समय ध्यान भटकने लगता है और आपको थकान महसूस जरुर होती होगी। इन सभी दिक्कतों से बचने के लिए आप 2 मिनट वाला माइक्रो ब्रेक ट्रेंड आजमा सकती हैं। वैसे आजकल वर्किंग लोगों के बीच यह काफी लोकप्रिय है।</span></div><div><br></div><div><b>2 मिनट वाला 'माइक्रो ब्रेक' ट्रेंड</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अब आप भी सोचे रहे होंगे कि क्या है, यह ट्रेंड। दो मिनट की हल्की बॉक या बॉडी स्ट्रैचिंग की यह आसान ट्रिक आपके दिमाग को तुरंत रीफ्रेश कर सकती है। आइए आपको इस ट्रेंड के बारे में जानकारी देते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>क्या है माइक्रो ब्रेक ट्रेंड?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, माइक्रो ब्रेक का मतलब है काम के बीच में लिया जाने वाला एक छोटा सा ब्रेक। अगर कोई व्यक्ति ऑफिस में लगतार 30 से 45 मिनट या 1 घंटे तक कार्य करता है, तो इस ट्रेंड के तहत वह बीच-बीच में उठकर 2 मिनट के लिए टहलने लगता है या हल्की मूवमेंट करता है। इसलिए इस एक्टिविटी को माइक्रो ब्रेक कहा जाता है। इसमें आपको घंटों का लंबा ब्रेक लेने की जरुरत नहीं है, आप बस 2 मिनट में ही थोड़ा बहुत घूमकर वापस आकर अपनी सीट पर वर्क कर सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>सिटिंग जॉब में कैसे मदद करता है यह ट्रेंड?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">बता दें कि, यूके की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा और नेशनल लाइब्रेरी ऑफ मेडिसिन के आधिकारिक पोर्टल के अनुसार जब आप हर आधे या एक घंटे में 2 मिनट वाला यह ट्रेंड करते हैं, तो इससे काम का तनाव कम हो जाता है। इस तरह की आदत आपकी आंखों को भी डिजिटल स्क्रीन से कुछ समय के लिए आराम दे सकती है। वहीं, इन छोटे ब्रेक की मदद से आंखों में जलन और सिरदर्द की शिकायत भी कम हो जाती है। असल में यह ट्रेंड उन लोगों के लिए बेहद खास है, जिनको वर्कलोड की वजह से सिर में दर्द&nbsp; बना रहता है।</span></div><div><br></div><div><b>वर्कप्लेस पर 2 मिनट का माइक्रो ब्रेक कैसे लें?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- जब आप ऑफिस में काम करें, तो हर समय एक घंटे के लिए अलार्म या रिमाइंडर सेट करें।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- फोन पर अलार्म बजते ही अपनी डेस्क से उठें और 2 मिनट के लिए हाथों और कंधों की हल्की स्ट्रैचिंग करें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इसके अलावा, आप ऑफिस में थोड़ा बहुत चल-फिर चल सकते हैं, जैसे सीट से उठकर पानी पीने या कैंटीन तक जा सकते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 11:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/benefits-of-2-minute-micro-breaks-for-office-workers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/22/2-minute-micro-breaks_large_1150_157.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या आप भी हैं Sleep Debt के शिकार? जानिए सेहत पर इसके गंभीर Mental Health और शारीरिक प्रभाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-impact-why-weekend-rest-fails-your-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्सर हम सभी नींद को लेकर काफी परेशान रहते हैं। हर बार यही सोचते हैं कि 'इस वीकेंड हफ्ते भर की नींद पूरी करेंगे....' लेकिन ऐसा हो नहीं पता है। जब हमारा पूरा हफ्ता भागदौड़ में बीतता है और आखिर में हम यही सोच लेते हैं कि छुट्टी वाले दिन या वीकेंड पर नींद पूरी करके हम अपनी थकान दूर करेंगे, हालांकि ऐसा हो नहीं पाता है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में आपके शरीर को जो रोजाना नींद चाहिए, वो उतनी मिल नहीं रही है जो कि हमारे शरीर के लिए काफी जरुरी होती है। जब आपकी नींद पूरी न हो, तो इसका असर आपके तन और मन पर साफ दिखाई देता है। नींद की कमी के पीछे कई कारण हो सकते हैं। अक्सर देखा जाता है कि बिजी शेड्यूल के चक्कर में नींद पूरी नहीं होती है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">ऐसे में 'स्लीप डेट' (Sleep Debt) या स्लीप डेफिसिट बढ़ जाता है। आखिर यह क्या है, इसके क्या लक्षण है और कैसे यह आपके पूरे शरीर और मन प्रभावित करता है, आइए आपको बताते हैं।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>Sleep Debt क्या होता है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, 'स्लीप डेट' तब होता है जब आपको नींद की जरुरत है और असल में आपको मिलने वाली नींद की मात्रा में अंतर होना। यह सब तब होता है जब आपकी नींद पूरी न हो, आप देर तक काम करते हैं, तनाव की वजह से सो नहीं पा रहे हैं या आपके सोने का कोई तय समय नहीं होता है। रोजाना एक या दो घंटे कम सोने से भी 'स्लीप डेट' हो सकता है और इसका आपकी सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>नींद की कमी के लक्षण</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- थकान होना</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- सुबह उठने में मुश्किल अधिक होना</div><div><br></div><div>&nbsp;- दिन में बहुत ज्यादा नींद आना</div><div><br></div><div>&nbsp;- ध्यान और फोकस की कमी</div><div><br></div><div>&nbsp;- भूलने की आदत</div><div><br></div><div>&nbsp;- सिरदर्द</div><div><br></div><div>&nbsp;- चिड़चिड़ापन</div><div><br></div><div><b>शरीर पर बुरा असर डालती है नींद की कमी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर नींद की कमी से लोगों की शारीरिक और मानसिक सेहत खराब हो जाती है। नींद न आने (इंसोम्रिया) के चलते इम्यून सिस्टम का कमजोर होना, मेटाबॉलिज्म पर असर दिखना, वजन पर असर होना और बार-बार बीमार बनें रहने की समस्या देखी जाती हैं। वहीं, पर्याप्त नींद न लेने से आपकी याददाश्त, सीखने की क्षमता और ध्यान लगाने की शक्ति पर काफी असर देखने को मिलता है।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इतना ही नहीं,&nbsp; तनाव और बेचैनी महसूस होती है। नींद की भारी कमी होने पर आपको मेंटल हेल्थ जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं।</span></div><div><br></div><div><b>रोजाना कितनी नींद है जरूरी?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">डॉक्टर मानते हैं कि कम से कम रोजाना 8-9 घंटे की नींद लेना बहुत जरुरी है। वहीं आपकी स्लीप साइकिल तय होनी चाहिए। किसी भी तरह से पूरी नींद नहीं ले पा रहे हैं, तो आप इस बात का ध्यान दें। यदि आपको नींद आने में काफी दिक्कत होती है तो लाखों कोशिशों के बाद भी नींद नहीं आती है, तो डॉक्टर को जरुर दिखाएं।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 12:25:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/sleep-debt-impact-why-weekend-rest-fails-your-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/sleep-debt_large_1225_157.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: Diabetes Control के लिए रामबाण है Slow Walk, खाने के बाद टहलने से होगा लाभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/slow-walk-surefire-remedy-for-diabetes-control-walking-after-meals-beneficial]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज के समय में देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा डायबिटीज जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्या से परेशान है। जोकि मुख्य रूप से आधुनिक लाइफस्टाइल और गलत खानपान की आदतों से जुड़ी है। फिजिकल एक्‍टिविटी की कमी, सोने-जागने का अनिश्चित समय, खानपान की गलत आदतें, स्मोकिंग की लत और अल्कोहल आदि इसकी मुख्य वजहें हैं। वैसे तो डायबिटीज से बचाव के कई तरीके बताए जाते हैं, जैसे चीनी, आलू, चावल, तेल-घी और मैदे आदि से परहेज करना आदि। लेकिन क्या आप जानती हैं कि डायबिटीज को कम करने में स्लो वॉक भी मदद कर सकती है।</div><div><br></div><h2>जानें क्‍या कहती है रिसर्च</h2><div>एक रिपोर्ट के मुताबिक रोजाना लंच या डिनर के करीब 30 मिनट बाद 10-15 मिनट की हल्की वॉक के बाद भी लोगों में ब्लड शुगर लेवल में कमी पाई गई। अगर खाना खाने के करीब 30 मिनट के बाद 10 मिनट के लिए थोड़ा टहल लिया जाए। तो यह क्रिया सेहत के लिए काफी फायदेमंद साबित हो सकती है। ऐसे में अगर आप भी इस समस्या से बचना चाहती हैं, तो लंच और डिनर के बाद टहलने की आदत को रूटीन में शामिल करें। इससे न सिर्फ शुगर लेवल कंट्रोल होगा बल्कि फिटनेस के लिए भी यह आदत अच्छी साबित होगी।</div><div><br></div><h2>क्या कहते हैं एक्सपर्ट</h2><div>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक यह रिचर्स बिल्कुल सही है। खाने के बाद शरीर में ब्लड सर्कुलेशन सही तरीके से होता है। इससे मसल्स खून में मौजूद ग्लूकोज का सही तरीके से यूज कर लेते हैं। रोजाना वॉक करने से तनाव दूर होता है, नींद अच्छी आती है और शुगर लेवल भी कंट्रोल होता है।</div><div><br></div><h2>स्‍लो वॉक के क्या हैं फायदे</h2><div>वॉक करना सबसे आसान एक्टिविटी में से एक है। डायबिटीज से परेशान लोग इसको कर सकते हैं। स्लो वॉक में चोट का खतरा कम होता है। वहीं वॉक शुरू करने के लिए किसी स्पेशल इक्विपमेंट की जरूरत नहीं होती है। लेकिन आरामदायक जूते और कपड़े पहनने से आपको मोटिवेट रहने में मदद मिल सकती है। वहीं जब आप रोजाना वॉक करते हैं, तो आपको सेहत से जुड़े कई फायदे मिलते हैं।</div><div><br></div><div>मेटाबॉलिज्‍म बढ़ता है।</div><div>मूड बेहतर होता है।</div><div>ब्‍लड प्रेशर कम होता है।</div><div>बैलेंस में सुधार होता है।</div><div>इंसुलिन सेंसिटिविटी बढ़ती है।</div><div>दिल की सेहत में सुधार होता है।</div><div>ब्लड शुगर का लेवल कम होता है।</div><div>वेट कंट्रोल में रहता है।</div><div>वॉक करने से ज्यादा अलर्ट और फोकस्ड फील होता है।</div><div>सोचने-समझने और याददाश्त की क्षमता में सुधार होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 11:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/slow-walk-surefire-remedy-for-diabetes-control-walking-after-meals-beneficial</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/slow-walking-benefits_large_1155_148.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Fatty Liver रिवर्स करने के लिए अपनाएं ये 4 Home Remedies, नानी मां के नुस्खों से Liver Health होगी बेहतर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/4-best-home-remedies-to-reverse-fatty-liver-naturally]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे शरीर में मौजूद हर एक अंग बिना रुके और बिना थके लगातार काम करते रहते हैं। इन्हीं में से एक लिवर है, जो कि शरीर के मुख्य अंगों में से एक है। लिवर का कार्य खाना पचाने में मदद करना, टॉक्सिन्स को शरीर से बाहर निकालना, खाने को एनर्जी में बदलना और इम्यून सिस्टम को मजबूत करना सहित कई काम लिवर करता है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">इसलिए हेल्दी रहने के लिए इसका सही तरह से काम करना काफी जरुरी है। आजकल डाइट, फिजिकल एक्टिविटी की कमी और स्ट्रेस सहित कई कारणों के चलते फैटी लिवर की दिक्कत काफी देखने को मिलती है। ऐसे में नानी मां की रसोई में उपलब्ध खाने-पीने की कुछ चीजें लिवर को हेल्दी रखने और फैटी लिवर के लक्षणों को रिवर्स करने में मदद करता है। आइए आपको बताते हैं फैटी लिवर के लिए 4 देसी उपाय, जिनका इस्तेमाल करना बेहद ही फायदेमंद है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>नींबू पानी का सेवन करें</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गौरतलब है कि नींबू फैटी लिवर में काफी फायदेमंद माना जाता है। इसके अलावा, संतरें, मौसंबी और अन्य सिट्रस फ्रूट्स को भी लिवर के लिए हेल्दी माना जाता है। इसलिए खाली पेट गुनगुने पानी में नींबू का रस डालकर जरुर पिएं। वहीं आप सलाद और सब्जियों में भी नींबू का इस्तेमाल कर सकते हैं। यह शरीर को डिटॉक्स करता है और फैट तेजी से बर्न करता है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>&nbsp;जीरा, धनिया, सौंफ और अदरक की चाय पिएं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इसके अलावा, आप जीरा, धनिया, सौंफ और अदरक की चाय भी लिवर हेल्थ को सुधार सकती है। इन सभी चीजों को पानी में डलकर उबाल लें और फिर इसे छान लें। इसे खाने के करीब एक घंटे बाद पीना फायदेमंद माना जाता है। यह ब्लोटिंग को दूर करने में मदद करता है। साथ ही पाचन को दुरुस्त करता है और शरीर को डिटॉक्स करती है। इससे शरीर में जमा चर्बी भी कम हो जाती है और फैटी लिवर के लक्षण रिवर्स हो जाते हैं।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>आंवले को डाइट का हिस्सा बनाएं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">लिवर के लिए आंवला किसी वरदान से कम नहीं है। यह पित्त को बैलेंस करता है और लिवर को सही तरह से फंक्शन करने में मदद करता है। इससे पाचन भी दुरुस्त होता है। खाली पेट आंवला का जूस पीना काफी फायदेमंद होता है। आप कच्चे आंवले के टुकड़ों को भी खा सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>&nbsp;कच्ची हल्दी है फायदेमंद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;फैटी लिवर के लक्षणों को कम करने में मददगार है हल्दी। इसमें कर्क्युमिन होता है। साथ ही एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुणों से भरपूर होती है। यह लिवर सेल्स हेल्दी रखता है। आप कच्ची हल्दी और चुटकी भर काली मिर्च को पानी में उबालकर पिएं। इसका सेवन सीमित मात्रा में ही करना श्रेष्ठ है। वरना यह लिवर को नुकसान भी पहुंचा सकता है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 11:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/4-best-home-remedies-to-reverse-fatty-liver-naturally</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/fatty-liver_large_1114_157.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Alert: खाना खाने के तुरंत बाद बिस्तर पर लेटना खतरनाक, Metabolism सुधारने के लिए 10 Minute Walk जरूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/benefits-of-10-minute-post-meal-walk-for-blood-sugar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्सर खाना खाने के बाद लोग बिस्तर पर पड़े रहते है या फिर लगातार बैठे रहते हैं। जो कि हेल्थ को लेकर एकदम ठीक नहीं है। अगर आप भोजन करने के बाद केवल 10 मिनट तक हल्की वॉक कर लेते हैं, तो भी आपके हेल्थ के लिए सोने पर सुहागा है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">रिसर्च से पता चला है कि भोजन के बाद थोड़ी देर चलने से खाने के बाद बढ़ने वाला ग्लूकोज यानी के पोस्टप्रांडियल ब्लड शुगर को नियंत्रित करने में मदद करता है। आपको बताते चलें कि, 2025 के रैंडमाइज्ड ट्रायल में भोजन के तुरंत बाद 10 मिनट की वॉक से बिना वॉक करने की तुलना में ग्लूकोज का स्तर और उसका पीक कम पाया गया है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">लेकिन, यह वजन घटाने में कारगर साबित नहीं होगा। वजन कम करने के लिए कैलोरी संतुलन, पौष्टिक खानपान, पर्याप्त नींद और नियमित शारीरिक गतिविधि भी काफी जरुरी है। गौरतलब है कि भोजन के बाद 10 मिनट चलना काफी जरुरी है। यह कम मेहनत में हेल्दी वाली आदत है। आइए आपको इसके फायदे बताते हैं।</span></div><div><br></div><h3>खाने के बाद 10 मिनट चलने के फायदे</h3><div><b style="font-size: 1rem;">ब्लड शुगर मैनेजमेंट में मदद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप भोजन के बाद लाइट वॉक करते हैं, तो मांसपेशियों को ग्लूकोज प्राप्त होता है। एक रिसर्च में पता चला है कि पोस्ट-मील एक्सरसाइज का ब्लड ग्लूकोज पर पॉजिटिव असर पड़ता है।</span></div><div><br></div><div><b style="font-size: 1rem;">10 मिनट हैं फायदेमंद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एक अध्ययन के मुताबिक, भोजन करने के बाद 10 मिनट चलने से 2 घंटे के ग्लूकोज रिस्पॉस और ग्लूकोज पीक में कमी देखी गई है।</span></div><div><br></div><div><b>लंबे समय से बैठे रहने से बचाव</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप भोजन के बाद लंबे समय तक बैठे रहते हैं, तो छोटी-छोटी एक्टिविटी ब्रेक लेना जरुरी है। वैसे यह मेटाबॉलिक हेल्थ के लिए उपयोगी हो सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>वजन घटाने में कैसे मदद मिल सकती है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वॉकिंग से शारीरिक गतिविधि और ऊर्जा खर्च बढ़ता है, इसलिए यह वजन प्रबंधन की ओवरऑल स्ट्रेटजी का हिस्सा हो सकता है। हालांकि, आप सोचों कि 10 मिनट चलने से वजन कम हो जाएगा, तो यह गलत है। इसलिए नियमित एक्टिविटी और संतुलित डाइट लेना काफी जरुरी है।</span></div><div><br></div><div><b>वॉक कैसी होनी चाहिए?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">खाना खाने के बाद चाहे दोपहर हो या फिर रात को हल्की मध्यम गति से आरामदायक वॉक कर सकते हैं। शुरुआत में 10 मिनट पर्याप्त हो सकते हैं। शरीर की क्षमता के मुताबिक धीरे-धीरे अवधि बढ़ा सकते हैं।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 18:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/benefits-of-10-minute-post-meal-walk-for-blood-sugar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/20/post-meal-walk_large_1806_157.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: Left Arm Pain के पीछे छिपे हैं ये 5 बड़े कारण, जानें कब है Heart Disease और कब मामूली मोच]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/here-major-reasons-behind-left-arm-pain-know-when-it-indicates-heart-disease]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बाएं हाथ में दर्द होना एक ऐसा लक्षण है, जिसको कई लोग गलत तरीके से सोने, थकान या ज्यादा काम करने का परिणाम मानकर नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन हर बार इसको नजरअंदाज करना सही नहीं है। कई मामलों में यह दर्द हड्डियों, मांसपेशियों या नसों की समस्या से जुड़ा होता है। वहीं कुछ स्थितियों में यह दिल की बीमारी या हार्ट अटैक का शुरूआती संकेत हो सकता है।</div><div><br></div><div>खासकर अगर दर्द अचानक शुरू हो, सांस लेने में तकलीफ, ठंडा पसीना, सीने में दबाव, मतली या जबड़े तक फैलने वाले दर्द के साथ हो, तो इसको हार्ट अटैक का संकेत मानकर फौरन हॉस्पिटल जाना चाहिए। वहीं अगर दर्द गर्दन से शुरू होकर हाथ की उंगलियों तक फैल जाता है। अगर सुन्नपन या झनझनाहट के साथ है, तो इसकी वजह नस दबना या सर्वाइकल रेडिकुलोपैथी हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/mouthwash-side-effects-7-essential-oral-health-facts" target="_blank">Mouthwash Side Effects: क्या आप भी रोजाना करते हैं Mouthwash का इस्तेमाल? ये 7 Facts बदल देंगे आपकी Dental Health की आदतें</a></h3><div><br></div><h2>जानें क्या हैं सामान्य कारण</h2><div>बाएं हाथ में दर्द के पीछे कई कारण हो सकते हैं। इनमें नसों की समस्या, चोट, हड्डी की चोट, रीढ़ की बीमारी और मांसपेशियों का खिंचाव आदि शामिल है।</div><div><br></div><h2>हड्डी टूटना</h2><div>अगर सड़क दुर्घटना, गिरने या खेल के दौरान हाथ में चोट लगी हो और इसके बाद सूजन, तेज दर्द, हाथ हिलाने में परेशानी या हाथ का आकार बदलता दिखे, तो हड्डी टूटने की संभावना हो सकती है। फ्रैक्चर में लगातार दर्द बना रहता है और बिना इलाज के हड्डी सही तरीके से नहीं जुड़ती है।</div><div><br></div><h2>स्लिप डिस्क की समस्या</h2><div>गर्दन की रीढ़ में मौजूद डिस्क बाहर आकर नस पर दबाव डाल सकती है। ऐसी स्थिति में दर्द सिर्फ तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि बाजू, कंधे और उंगलियों तक फैल सकता है। कुछ मरीजों के हाथ में झुनझुनी या फिर कमजोरी महसूस हो सकती है।</div><div><br></div><h2>नस का दबना</h2><div>जब गर्दन से निकलने वाली नस दब जाती है, तो दर्द गर्दन से होते हुए पूरे हाथ तक जा सकता है। इसको सर्वाइकल रेडिक्युलोपैथी कहा जाता है।</div><div><br></div><h2>मोच और मांसपेशियों में खिंचाव होना</h2><div>जिम में भारी वजन उठाने, बार-बार एक ही तरह का काम करने या अचानक झटका लगने से मांसपेशियों और लिंगामेंट में खिंचाव आ सकता है। आमतौर पर ऐसी स्थिति में एक्टिविटी करने में दर्द बढ़ता है। वहीं आराम करने से धीरे-धीरे कम होने लगता है।</div><div><br></div><h2>बाएं हाथ का दर्द बन सकता है दिल की बीमारी</h2><div>हार्ट अटैक के दौरान हृदय की मांसपेशियों तक पर्याप्त ब्लड नहीं पहुंच पाता है। इसका दर्द सिर्फ सीने तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि नसों के साझा मार्ग के कारण बाएं कंधे, बाजू, जबड़े, गर्दन और पीठ तक फील हो सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि हर हार्ट अटैक में बाएं हाथ का दर्द नहीं होता है। बल्कि अगर यह सीने में दबाव या जकड़न के साथ हो, तो इसको भूलकर भी नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>इन लक्षणों में लें इमरजेंसी सहायता</h2><div>सांस लेने में समस्या</div><div>सीने में दबाव या तेज दर्द</div><div>ठंडा पसीना आता</div><div>मतली या उल्टी</div><div>चक्कर आना</div><div>पीठ, गर्दन या जबड़े तक दर्द फैलना</div><div>बेहोशी महसूस होना</div><div>अचानक कमजोरी</div><div><br></div><div>यह हार्ट अटैक या अन्य गंभीर हृदय संबंधी समस्या के संकेत भी हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि हमेशा बाएं हाथ में दर्द हार्ट अटैक का संकेत नहीं होता है, बल्कि कई बार यह जानलेवा स्थिति की चेतावनी भी हो सकती है। अगर दर्द मोच, नस दबने, चोट या स्लिप डिक्स की वजह से है, तो समय पर इलाज से राहत मिल सकती है। अगर दर्द सांस फूलने, ठंडा पसीना, सीने में जकड़न या मतली जैसे लक्षणों के साथ होता है, तो फौरन आपको इमरजेंसी में मेडिकल सहायता लेना जरूरी है। वहीं दर्द की वजह की सही पहचान सही इलाज और गंभीर जटिलताओं से बचाव की कुंजी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 14:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/here-major-reasons-behind-left-arm-pain-know-when-it-indicates-heart-disease</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/20/health-tips_large_1444_148.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mouthwash Side Effects: क्या आप भी रोजाना करते हैं Mouthwash का इस्तेमाल? ये 7 Facts बदल देंगे आपकी Dental Health की आदतें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/mouthwash-side-effects-7-essential-oral-health-facts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्सर डेंटिस्ट ब्रशिंग और फ्लॉसिंग के साथ माउथवॉश को नियमित तौर पर रोजाना रुटीन में शामिल करने की सलाह जरुर देते हैं। हालांकि, इसके ज्यादा या फिर केमिकल से भरपूर माउथवॉश के इस्तेमाल से ड्राई माउथ वॉश या फिर टिशूज के सेंसिटिव हो जाने की समस्या हो सकती हैं। आइए आपको बताते हैं माउथवॉश से संबंधित ऐसे 7 फैक्ट्स जिनके बारे में आपको पता नहीं होना चाहिए। यह आपको बेहतर रिजल्ट पाने में मदद करता है।</div><div><br></div><div><b>डेंटिस्ट भी नहीं हैं एकमत</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">डेंटिस्ट हमेशा ब्रशिंग और फ्लॉसिंग के साथ ही डेली माउथवॉश करने को कहते हैं। हालांकि एक्सपर्ट का मानना है कि ब्रश और फ्लॉस मुंह के हर कोने में नहीं पहुंच सकते हैं। बल्कि माउथवॉश आपकी इस मुश्किल को मिनटों में दूर कर देगा। लेकिन कुछ डेंटिस्ट इसके इस्तेमाल को लेकर ज्यादा अहमियत नहीं देते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>ब्रशिंग को रिप्लेस नहीं करता</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वैसे यह आपके मुंह के हाइजीन को मेंटेन रखता है, लेकिन यह ब्रशिंग का ऑप्शन नहीं है। माउथवॉश से कुल्ला भर कर लेना कीटाणुओं और प्लाक को हटाने के लिए काफी नहीं। इसी बात को लेकर लोग कंफ्यूज रहते हैं और माउथवॉश को ही कम्प्लीट केयर मान लेते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>सेंसेशन का मतलब असरदार होना नहीं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यदि आप माउथवॉश इस्तेमाल करते हैं, तो मुंह के अंदर जलन जरुरी होती है, इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपना काम बेहतर कर रहा है। माउथवॉश से होने वाली जलन अल्कोहल या उसमें एड किए गए फ्लेवर की वजह हो सकती है।</span></div><div><br></div><div><b>गुड बैक्टीरिया भी मर जाते हैं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">कई माउथवॉश में एंटीमाइक्रोबायल एजेंट होते हैं, जो बैक्टीरिया को मारते हैं, लेकिन यह गुड या बैड बैक्टीरिया के बीच अंतर नहीं कर पाता है। वहीं गुड बैक्टीरिया आपके मुंह की सेहत के लिए जरुरी माने जाते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>खरीदने से पहले लेवल पढ़े</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब आप माउथवॉश खरीदें तो एक बार लेवल जरुर चेक करें कि उसमें अल्कोहल और सोडियम लॉरेल सल्फेट या एसएलसी तो नहीं है। अधिकतर माउथ वॉश केयर प्रोडक्ट्स में ये दो तत्व जरुर शामिल होते हैं। वहीं, ऐसा माउथवाश&nbsp; देखें , जिसका अल्कलाइन पीएच हो और यह जितना ज्यादा होगा, मुंह की सेहत के लिए उतना ही बेहतर है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>ब्लडप्रेशर पर असर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में मुंह के कुछ ऐसे बैक्टीरिया होते हैं, जो भोजन से मिलने वाले नाइट्रेट्स को नाइट्रिक ऑक्साइड में बदल देते हैं। यह ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है। वहीं, लगातार ब्रॉड स्पेक्ट्रम वाले एंटीमाइक्रोबायल माउथवॉश इस्तेमाल करने से यह संतुलन बिगड़ सकता है। लेकिन, इस असंतुलन को सीधे माउथवॉश के इस्तेमाल से जोड़कर नहीं देखा जा सकता है, अभी इस दिशा में रिसर्च चल रही है।</span></div><div><br></div><div><b>समस्याएं सिर्फ छुपती हैं हटती नहीं</b></div><div><b>&nbsp;</b><span style="font-size: 1rem;">अगर सांसों से बदबू आ रही है, तो मसूड़ों से जुड़ी बीमारी होने का संकेत हो सकता है और माउथवॉश करने से पहले कुछ समय के लिए यह समस्या छिप जाएगी लेकिन जड़ से खत्म नहीं होती है। ऐसा होने पर माउथवॉश इस्तेमाल करने के बजाय सबसे पहले डेंटिस्ट को जरुर दिखाएं।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 10:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/mouthwash-side-effects-7-essential-oral-health-facts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/20/mouthwash-side-effects_large_1041_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Maternity Leave के बाद ऑफिस लौटना क्यों बन जाता है मानसिक चुनौती? एक्सपर्ट्स ने बताए Anxiety और Stress के बड़े कारण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/stress-factors-for-moms-returning-to-workplace]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह एकदम सच है कि प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद महिलाओं के शरीर में कई बदलाव देखने को मिलते है। इस दौरान उनका मूड, शरीर और पूरा स्वास्थ्य पर असर देखने को मिलता है। मैटरनिटी लीव के बाद फिर से काम पर लौटना कई महिलाओं के लिए काफी मुश्किल होता है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर महिलाओं को इस सिचुएशन में एंग्जायटी, तनाव और गिल्ट फील होता है। आइए आपको बताते हैं आखिर क्यों Maternity Leave के बाद ऑफिस में दोबारा से लौटने से तनाव कैसे बढ़ जाता है।</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">&nbsp;</b></div><div><b style="font-size: 1rem;">मैटरनिटी लीव के बाद ऑफिस लौटने में महिलाओं को एंग्जायटी क्यों महसूस होती है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर पाया गया है कि महिलाएं मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटने में खुश नहीं होती है, बल्कि तनाव महसूस करती हैं। कई बार वो बेचैनी और घबराहट फील होती है और डर भी सताने लगता है।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- मैटरनिटी लीव के बाद काम पर लौटने पर अक्सर महिलाओं में एंग्जायटी (बेचैनी या घबराहट) देखी गई है, क्योंकि यह एक शेड्यूल बदलाव नहीं है, यह पहचान, जिम्मेदारियां और प्राथमिकताओं में एक साथ होने वाला बदलाव है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- गौरतलब है कि नई मां का शरीर और मन अभी बच्चे के जन्म के बाद ठीक हो रहा होता है, इसके साथ ही नींद की कमी, हार्मोनल बदलाव और बच्चे की देखभाल की मुश्किलों से तालमेल बिठाने की कोशिश करती हैं। इस दौरान बेहतर प्रदर्शन करने का दबाव भी बना रहता है, बच्चे की भलाई की चिंता और कभी-कभार वर्क प्लेस पर सहयोग न मिलने पर लगातार एंग्जायटी बढ़ जाती है। कई महिलाएं गिल्ट में चली जाती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- असल में जब महिलाओं को घर और ऑफिस में सही सपोर्ट नहीं मिल पाता है और फिर उनको लगता है उनकी पहचान खो रही है। जिससे एंग्जायटी और बढ़ जाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- बच्चे की जागने के कारण कई बार नींद पूरी नहीं हो पाती है और फिर नींद और थकान के कारण तनाव हद से ज्यादा बढ़ जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- ऐसे में कई नई मांएं है जो काम पर जाते समय काफी चिड़चिड़ापन महसूस करती हैं। यह सब ओवरबर्डन के कारण भी हो सकता है।</div><div><br></div><div><b>डॉक्टर की सलाह लेना है जरूरी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- ऐसे में महिलाएं मैटरनिटी लीव के बाद काम पर जाएं, तो उसे ऑफिस और परिवार दोनों की तरफ से सहयोग मिलना जरुरी है। काम के समय में लचीलापन (फ्लेक्सिबिलिटी), ब्रेस्टफीडिंग में मदद और अपनी बात खुलकर जरुर रखें।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- इस समय हर किसी महिला के लिए पार्टनर का सपोर्ट होना काफी जरुरी है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- यदि आपको ज्यादा एंग्जायटी महसूस हो रही है, डॉक्टर को जरुर दिखाएं। इसके अलावा, आप थेरेपी का सहारा ले सकती हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 15:33:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/stress-factors-for-moms-returning-to-workplace</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/19/stress-factors-for-moms_large_1533_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ayurveda For Monsoon: शरीर में कफ और वात संतुलित करता है सोंठ का पानी, ऐसे बढ़ाएं अपनी Immunity! जानें किन लोगों के लिए नुकासनदायक हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/monsoon-health-analytical-view-on-dry-ginger-water]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बरसात का मौसम हर किसी को काफी पंसद होता है, क्योंकि चारों तरफ हरियाली और सुकून वाला मौसम होता है। हालांकि, इस दौरान सेहत का खासा ध्यान रखना ज्यादा जरुरी होता है। इस मौसम में सर्दी-खांसी, जुकाम और पाचन संबंधित समस्याएं ज्यादा परेशान करती हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;">इनसे बचने के लिए आपको अपनी डाइट में काफी बदलाव करने की जरुरत है। वहीं, आपको ठंडी तासीर वाली चीजों से दूर रहना जरुरी है। कुछ खास हर्ब्स और देसी नुस्खों की मदद से इम्यूनिटी को मजबूत कर सकते हैं। ऐसे में आप सूखी अदरक यानी सोंठ का पानी पी सकते हैं। यह सेहत के लिए काफी फायदेममंद है। यह आपके पाचन में भी काफी सुधार लेकर आता है। जब आपकी इम्यूनिटी बूस्ट हो जाती है, तो सर्दी-खांसी छूमंतर हो जाती है। आइए आपको इसके फायदे और डाइट में कैसे शामिल करें बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>मानसून में पानी में मिलाकर पिएं सूखी अदरक</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक सूखी अदरक का इंफ्यूज्ड पानी जरुर पिएं।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- सूखी अदरक को आधा टीस्पून पाउडर या 1-2 टुकड़े सूखी अदरक को 1 लीटर में पानी में डाल दें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- अब इसे करीब 10 मिनट तक उबालें और फिर अच्छे से छान लें।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इसको आप दिन पर पीती रहें। इसको खाने के साथ भी ले सकती हैं।</div><div><br></div><div><b>मानसून में सूखी अदरक का पानी पीने के फायदे</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जिन लोगों को इम्यूनिटी कमजोर होती है, उन्हें इसका सेवन जरुर करना चाहिए-</span></div><div><br></div><div><b>पाचन में सुधार होता</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सोंठ का पानी पीने से पाचन दुरुस्त रहता है, डाइजेस्टिव फायर (पाचन अग्नि) तीव्र होती है और भूख खुलकर लगती है। मानसून के समय पाचन अग्नि धीमी हो जाती है और ऐसे में डाइजेशन से संबंधित परेशनियां होती है। इसलिए इस पानी को पीना काफी फायदेमंद रहने वाला है।</span></div><div><br></div><div><b>गैस और ब्लोटिंग दूर होती है</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप इस पानी को नियमित रुप से पीते हैं, तो गैस और ब्लोटिंग की समस्या दूर हो जाएगी। मानसून के समय आपको काफी आराम मिलेगा। खाने के बाद पेट में भारीपन महसूस नहीं होगा। इससे गट हेल्थ और मेटाबॉलिज्म में सुधार करता है और शरीर में जमा टॉक्सिन्स को बाहर निकालता है।</span></div><div><br></div><div><b>&nbsp;सर्दी-खांसी दूर होती है</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस पानी के सेवन से सर्दी-खांसी से बचाव होता है और आपके जुकाम या खांसी है, तो उससे भी राहत मिलती है। यह पानी मौसमी इंफेक्शन से बचाता है। यह शरीर में कफ और वात बैलेंस करता है।</span></div><div><br></div><div><b>इम्यूनिटी मजबूत होती है</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सूखी अदरक पानी पीने से इम्यूनिटी मजबूत होती है। यदि आप इसका सेवन लगातार करती हैं, तो इम्यूनिटी बेहतर होगी और बीमारियों से बचाव होगा।</span></div><div><br></div><div><b>किन लोगों को सूखी अदरक पानी नहीं पीना चाहिए?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- यदि आपको एसिडिटी या मुंह में अल्सर है, तो इसे नहीं पीना चाहिए।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- मसालेदार खाने के बाद भी इसका सेवन नहीं करना चाहिए।</div><div><br></div><div>&nbsp;- जिन लोगों के शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है यानी बॉडी हीट अधिक है और बर्निंग सेंसेशन अधिक महसूस होती है, उन्हें इसका सेवन भूलकर भी नहीं करना चाहिए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 11:10:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/monsoon-health-analytical-view-on-dry-ginger-water</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/19/ayurveda-for-monsoon_large_1112_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Low Sperm Count की समस्या में IVF या IUI? जानें बेहतर Success Rate के लिए कौन सा Treatment है किफायती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/ivf-or-iui-for-low-sperm-count-find-out-which-treatment-offers-better-success-rate]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आईवीएफ और आईयूआई दोनों ही फर्टिलिटी ट्रीटमेंट हैं। लेकिन अक्सर लोग दोनों को एक जैसा प्रोसेस समझ बैठते हैं। वहीं महिलाएं खुद भी दोनों प्रोसेस में से किसी एक को नहीं चुनती हैं। बल्कि डॉक्टर महिला की मेडिकल कंडीशन और उम्र को ध्यान में रखकर IVF और IUI में से किसी एक का चुनाव करते हैं। इन दोनों तरीकों, सफलता के चांसेज, खर्च और इस्तेमाल की स्थिति अलग-अलग होती है।</div><div><br></div><div>इसलिए इलाज शुरू करने से पहले यह समझना जरूरी होता है कि दोनों में क्या फर्क है और किस स्थिति में कौन सा ऑप्शन बेहतर माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस बारे में बताने जा रहे हैं कि कपल्स के लिए कौन सा इलाज बेहतर है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/blue-space-therapy-benefits-for-mental-health" target="_blank">डिप्रेशन और तनाव का इलाज अब दवाओं में नहीं, Blue Space Therapy के जरिए पानी में मिल रहा है गहरा सुकून</a></h3><div><br></div><h2>जानें IVF और IUI में अंतर</h2><div>IUI नेचुरल रूप से शरीर के अंदर फर्टिलाइजेशन होता है। जबकि IVF में लैब में शरीर के बाहर फर्टिलाइजेशन होता है।</div><div><br></div><div>IUI प्रोसेस में पुरुष के स्पर्म को पतली नली से सीधा महिला के यूट्रेस में डाला जाता है। वहीं IVF में महिला के एग्स को निकाला जाता है और फिर लैब में स्पर्म के साथ मिलाकर भ्रूण बनाया जाता है, इसके बाद में यूट्रेस में ट्रांसफर किया जाता है।</div><div><br></div><div>IUI बहुत सरल, कम इनवेसिव, बिना एनेस्थीसिया के 5-10 मिनट के अंदर पूरा होने वाला प्रोसेस है। जबकि IVF में एग्स को निकालने की छोटी सर्जरी, इंजेक्शन और एंब्रियो ट्रांसफर आदि किया जाता है।</div><div><br></div><div>IUI प्रोसेस में महिला की कम से कम एक फैलोपियन ट्यूब का खुला होना जरूरी है। जबकि IVF बंद फैलोपियन ट्यूब वाले केस में भी पूरी तरह से कारगर होता है।</div><div><br></div><div>IUI प्रोसेस तब होता है जब पुरुष में स्पर्म की हल्की कमी होती है या फिर महिला में बांझपन की समस्या होती है। वहीं गंभीर स्पर्म समस्या, एडवांस एंडोमेट्रियोसिस, PCOS या बार-बार IUI फेल होने पर IVF प्रोसेस कराने की सलाह दी जाती है।</div><div><br></div><div>ओव्यूलेशन के समय IUI प्रोसेस सिर्फ 1 दिन में पूरा होता है। जबकि IVF साइकिल में करीब 2 से 5 सप्ताह का समय लगता है।</div><div><br></div><div>IUI प्रोसेस क्लिनिकल प्रेग्नेंसी दर 33 फीसदी तक सफल हो सकता है। वहीं IVF क्लिनिकल प्रेग्नेंसी दर 46 फीसदी तक हो सकता है।</div><div><br></div><div>IUI प्रोसेस किफायती और कम खर्चीला इलाज होता है। जबकि IVF थोड़ा अधिक खर्चीला हो सकता है।</div><div><br></div><h2>IUI क्या है और कैसे होता है</h2><div>नेचुरल प्रेग्नेंसी में स्पर्म वजाइना से होते हुए गर्भाशय में जाता है और फिर फैलोपियन ट्यूब तक जाता है। ओवरी से एग निकलने के बाद फैलोपियन ट्यूब में जाकर स्पर्म में मिलता है और फिर फर्टिलाइज होता है। लेकिन IUI प्रोसेस में पतली नली की सहायता से स्पर्म को सीधे यूट्रेस में पहुंचाया जाता है। इससे स्पर्म फैलोपियन ट्यूब के बेहद करीब पहुंच जाता है।</div><div><br></div><div>IUI के जरिए स्पर्म को एग के पास तक पहुंचा दिया जाता है। जिस कारण प्रेग्नेंसी की संभावना बढ़ जाती है। इस प्रोसेस को कुछ मिनटों में ही पूरा किया जाता है। इसमें महिला को एनेस्थीसिया भी नहीं दिया जाता है। जब कपल में बिना किसी वजह इंफर्टिलिटी होती है, स्पर्म काउंट हल्का या स्पर्म की गतिशीलता कम होती है। तो IUI की सलाह दी जाती है। लेकिन सबसे जरूरी यह है कि जब महिला की फैलोपियन ट्यूब खुली होती है और ओवरी सामान्य रूप से काम कर रही हो, तभी यह प्रोसेस सफल होता है।</div><div><br></div><h2>जानें क्या है IVF प्रोसेस</h2><div>IVF एक एडवांस्ड टेक्निक है। जिसमें आमतौर पर महिला को कुछ दिन हार्मोन के इंजेक्शन दिए जाते हैं और ओवरी में ज्यादा अंडे बनाए जाते हैं। इस प्रोसेस के बाद एग्स को बाहर निकाला जाता है। लैब में पार्टनर के स्पर्म के साथ फर्टिलाइज किया जाता है। एंब्रियो बनने के बाद इसको वापस महिला के यूट्रेस में ट्रांसफर कर दिया जाता है।</div><div><br></div><div>IVF की सलाह कब मिलती है</div><div>IVF की सलाह तब ही दी जाती है, जब IUI की संभावना काफी कम होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 10:05:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/ivf-or-iui-for-low-sperm-count-find-out-which-treatment-offers-better-success-rate</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/19/ivf-or-iui_large_1007_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[डिप्रेशन और तनाव का इलाज अब दवाओं में नहीं, Blue Space Therapy के जरिए पानी में मिल रहा है गहरा सुकून]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/blue-space-therapy-benefits-for-mental-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल युवाओ से लेकर बड़ों में भी मानसिक तनाव देखने को मिल रहा है। दिनभर में फोन में बिजी रहना और खराब लाइफस्टाइल के कारण हर कोई कहीं न कहीं मेंटल हेल्थ से परेशान है।&nbsp; विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, क मेंटल हेल्थ समझें तो एक मानसिक रुप से सेहतमंद इंसान अपनी क्षमता को जनता है, प्रतिदिन के तनाव को झेल सकता है और प्रोडक्टिविटी के साथ काम भी कर सकता है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">हालांकि, आजकल लोगों की मानसिक स्थिति दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है, इन दिनों ट्ब्लू स्पेस जैसी थेरेपी भी दवा का कार्य कर रही है। आइए आपको विस्तार से बताते हैं ब्लू स्पेस थेरेपी के बारे में और यह क्या है?</span></div><div><br></div><div><b>क्या है ब्लू स्पेस थेरेपी?&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मेंटल हेल्थ से संबंधित मामले में डिजिटल दौर में काफी तेजी देखी जा रही है। जबकि इंटरनेट के दौर से पहले न तो किसी ने डिप्रेशन, अकेलेपन और एंग्जाएटी जैसी बीमारियों के नाम सुने भी नहीं थे। अब हर कोई इन नामों को जानने के साथ-साथ इनके बुरे अनुभव से भी परेशान है।&nbsp; इसलिए आजकल ब्लू स्पेस थेरेपी ट्रेंड में है। इसके नाम से आपको पता चल रहा होगा कि यह ब्लू स्पेस अर्थ पानी से जुड़ी चीजों से हैं, जैसे कि झील, नदी और समंदर।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">कुछ रिपोर्ट्स में यह पता चला है कि ब्लू स्पेस के ज्यादा संपर्क में रहने से मेंटल हेल्थ अच्छी रहती है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि तटीय इलाकों में रहने वाले और वहां जाने वाले लोगों में साइकोलॉजिकल डिस्ट्रेस यानी मेंटल हेल्थ से संबंधित परेशानियों कम करती है।</span></div><div><br></div><div><b>किताब ने भी किया साबित&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, साल 2014 में मरीन बायोलॉजिस्ट वालेस जें. निकोलस की किताब ब्लू माइंड थी, इस किताब में यह साबित कर दिया था कि पानी के आसपास रहने से स्ट्रेस हॉर्मोन कोर्टिसोल कम हो जाता है और व्यक्ति खुद को लेकर पॉजिटिव महसूस करता है।</span></div><div><br></div><div><b>पानी के अंदर थेरेपी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">खासकर ब्लू स्पेस थेरेपी पानी के आसपास रहने से दिखने वाले सकारात्मक बदलावों की बात करती है, लेकिन इसके फायदों को देखते हुए पानी के अंदर भी इस थेरेपी को दिया जाने लगा है। वहीं, विदेशों में डिप्रेशन, ट्रॉमा और नशे की लत जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए स्कूबा और फ्री-डाइविंग, वेटलेसनेस के अनुभव, ब्रीदवर्क के साथ मेडिटेशन जैसी थेरेपी लोगों को दी जाती हैं। वहीं, सबसे खास एहसास वेटलेसनेस का है, जो कि नर्वस और ब्रेन सिस्टम को दोबारा से रेगुलेट करने में काफी सहायक साबित होता है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 17:46:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/blue-space-therapy-benefits-for-mental-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/18/blue-space-therapy_large_1748_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Best Breakfast for Iron Deficiency: आयरन की कमी है तो नाश्ते में खाएं ये चीजें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/best-breakfast-for-iron-deficiency-to-support-better-iron-absorption-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सुबह का नाश्ता यकीनन काफी मायने रखता है। अधिकतर लोग सुबह उठकर चाय-बिस्कुट, ब्रेड या नमकीन खाना पसंद करते हैं। लेकिन शरीर में आयरन की कमी है, तो नाश्ते का चुनाव सिर्फ पेट भरने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। आप आयरन रिच फूड्स को अपने नाश्ते का हिस्सा बनाएं।</div><div><br></div><div>साथ ही, यह भी ध्यान रखें कि सिर्फ आयरन से भरपूर खाना खाना ही पर्याप्त नहीं होता। शरीर उस आयरन को कितना अवशोषित कर पाता है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है।&nbsp; यही वजह है कि आयरन की कमी में “क्या खाएं” के साथ-साथ “किसके साथ खाएं और कब खाएं” जानना ज्यादा काम का है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/no-need-to-go-to-gym-boost-brain-efficiency-and-focus-with-simple-tennis-ball" target="_blank">Health Tips: जिम जाने की जरूरत नहीं, Simple Tennis Ball से बढ़ाएं Brain Efficiency और Focus</a></h3><h2>बेसन चीला और नींबू का कॉम्बिनेशन&nbsp;&nbsp;</h2><div>आयरन की कमी वाले लोगों के लिए बेसन से बना चीला एक बेहतरीन नाश्ता हो सकता है। चना और दूसरी दालें प्लांट बेस्ड सोर्स में शामिल हैं। लेकिन यहां एक छोटी-सी गलती पूरी प्लेट को कम इफेक्टिव बना सकती है। आप चीले के साथ सिर्फ दही और चाय लेने के बजाय इसे टमाटर, शिमला मिर्च, हरी धनिया और नींबू के साथ खाएं। विटामिन सी प्लांट बेस्ड आयरन के अब्जॉर्बशन में मदद करता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>इस तरह खाएं पोहा&nbsp;</h2><div>नाश्ते में पोहा खाना एक अच्छा आइडिया हो सकता है। लेकिन इसे सही इंग्रीडिएंट्स के साथ बनाया जाए तो यह ज्यादा बैलेंस्ड ब्रेकफास्ट बन सकता है। पोहा बनाते समय इसमें मूंगफली, मटर, थोड़ी मात्रा में चना और हरी सब्जियां जोड़ी जा सकती हैं। इसके साथ नींबू और ताजा टमाटर डालना भी एक अच्छा तरीका है। याद रखें कि नींबू सिर्फ स्वाद के लिए नहीं है। विटामिन सी प्लांट बेस्ड आयरन को अब्जॉर्ब करने में मदद करता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>खाएं स्प्राउट्स चाट&nbsp;</h2><div>अगर आप सुबह कुछ हल्का और जल्दी तैयार होने वाला नाश्ता चाहिए, तो मूंग या चने की स्प्राउट्स चाट अच्छा विकल्प हो सकती है। इसे सिर्फ अंकुरित दानों और नमक तक सीमित रखने के बजाय इसमें टमाटर, शिमला मिर्च, धनिया, नींबू, थोड़े भुने चने या मूंगफली डालें। अगर स्प्राउट्स या दालें आपके लिए पचने में भारी लगती हैं, तो मात्रा कम रखें। आयरन बढ़ाने के चक्कर में ऐसा ब्रेकफास्ट चुनने की जरूरत नहीं है जिससे पेट ही परेशान हो जाए।</div><div><br></div><div>- मिताली जैन</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 17:45:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/best-breakfast-for-iron-deficiency-to-support-better-iron-absorption-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/18/iron-rich-breakfast_large_1747_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: जिम जाने की जरूरत नहीं, Simple Tennis Ball से बढ़ाएं Brain Efficiency और Focus]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/no-need-to-go-to-gym-boost-brain-efficiency-and-focus-with-simple-tennis-ball]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल का व्यस्त लाइफस्टाइल में जिम के समय निकालना बेहद मुश्किल हो जाता है। लेकिन दिमाग की कार्यक्षमता को बढ़ाने के लिए घंटों जिम में पसीना बहाने की जरूरत नहीं है। बल्कि आप एक सिंपल टेनिस बॉस से घर पर कुछ मिनटों का वर्कआउट करके न्यूरॉन्स को फिर से एक्टिव कर सकते हैं। यह छोटी सी बॉल आपके स्ट्रेस को कम करने और ब्रेन की स्पीड को बढ़ाने में काफी सहायक साबित होती है।</div><div><br></div><div>ऐसे में इसके बारे में जानकारी होना तो बनता है। आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि यह बॉल एक्सरसाइज क्या है और यह कैसे फायदा पहुंचाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/risks-of-high-hemoglobin-and-heart-attack-explained" target="_blank">High Hemoglobin भी है जानलेवा, Heart Attack और Stroke का बढ़ सकता है गंभीर खतरा</a></h3><div><br></div><h2>बॉल एक्सरसाइज</h2><div>यह एक आसान और असरदार ट्रेनिंग तकनीक है। जिसमें छोटी टेनिस बॉल का यूज किया जाता है। यह मुख्य रूप से आपके आंखों और हाथों के तालमेल को सुधारने पर काम करती है।</div><div><br></div><div>जब आपकी आंखें बॉल की स्पीड को ट्रैक करती हैं और हाथ उस बॉल को पकड़ते हैं, तो दिमाग के ग्रे सेल्स तेजी से काम करते हैं। इसके अलावा यह न्यूरोप्लास्टिसिटी को भी बढ़ावा देता है। जिससे फोकस और फैसले लेने की स्पीड बेहतर होती है।</div><div><br></div><h2>सिंगल हैंड ड्रॉप-कैच</h2><div>सिंगल हैंड ड्रॉप-कैच के लिए बॉल को सीखे खड़े होकर अपने कंधे की ऊंचाई पर रखें और फिर बिना उछाल दिए इसको छोड़ दें। बॉल के जमीन पर टप्पा खाने से ठीक पहले उसको उसी हाथ से तेजी से पकड़ने की कोशिश करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>फायदे</h2><div>यह वर्कआउट आपकी आंखों के रिफ्लेक्सिस और ब्रेन रिस्पॉन्स टाइम को तेज बनाता है।</div><div><br></div><div>जब दिमाग और हाथ का तालमेल पलक झपकते बनता है, तो इससे एकाग्रता क्षमता में अच्छा खासा सुधार देखने को मिलता है।</div><div><br></div><h2>अल्टरनेट हैंड टॉस</h2><div>इस एक्सरसाइज में बॉल को हवा में थोड़ा ऊपर की ओर उछालें। फिर बारी-बारी से दाएं और बाएं हाथ से कैच करना चाहिए। इसमें एक हाथ से फेंककर दूसरे हाथ से संतुलित करके पकड़ना होता है।</div><div><br></div><h2>फायदे</h2><div>यह एक्टिविटी दिमाग के दोनों हिस्सों, लेफ्ट और राइट हेमीस्फीयर को एक साथ एक्टिव करता है।</div><div><br></div><div>इससे आंखों और हाथों का तालमेल मजबूत होता है। इससे मानसिक थकान दूर होती है। ब्रेन हमेशा यंग और एक्टिव बना रहता है।</div><div><br></div><h2>कुछ अहम बातें</h2><div>घर के किसी ऐसे कमरे या बालकनी को चुनें। जहां आसपास कोई शीशे या टूटने वाली चीज न हो।</div><div><br></div><div>बॉल को उछालने या फेंकने के समय स्पीड अधिक तेज न रखें। जिससे रिफ्लेक्सिस आपको धीरे-धीरे समझ आए।</div><div><br></div><div>रोजाना सिर्फ 5 से 10 मिनट का समय निकालें। इसको आप काम के बीच में ब्रेक लेते समय भी कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>एक्सरसाइज करते समय अपना पूरा ध्यान बॉल की दिशा और हाथों के मूवमेंट पर रखना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 13:29:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/no-need-to-go-to-gym-boost-brain-efficiency-and-focus-with-simple-tennis-ball</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/18/health-tips_large_1332_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[High Hemoglobin भी है जानलेवा, Heart Attack और Stroke का बढ़ सकता है गंभीर खतरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/risks-of-high-hemoglobin-and-heart-attack-explained]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे आजकल लोगों में कई बार हीमोग्लबिन की कमी देखी जाती है। जिसके बाद लोग अपनी डाइट पर ध्यान देते हैं। ब्लड का लेवर नेचुरल रुप से बढ़ाते हैं। गौरतलब है कि शरीर में मौजूद हर एक टिश्यू तक ऑक्सीजन पहुंचाने के लिए हीमोग्लोबिन बेहद जरुरी है, लेकिन ब्लड का स्तर ज्यादा होने से बड़ा जोखिम देखने को मिलता है। कई बार हीमोग्लबिन अधिक होने से ब्लड क्लॉट, स्ट्रोक और हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">जब हीमोग्लोबिन का हाई होने सेल्स में ज्यादा रेड ब्लड सेल्स बनने या फिर प्लाज्मा के कम होने का इशारा करता है। वैसे ब्लड अधिक होने से कोई बीमारी नहीं बल्कि, यह किसी न किसी बड़ी समस्या का संकेत भी हो सकता है। आइए आपको बताते हैं हाई होने के कारण और खतरे।</span></div><div><br></div><div><b>क्या होता है हीमोग्लोबिन और यह क्या करता है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हीमोग्लोबिन आयरन से भरपूर प्रोटीन है जो शरीर के हर सेल्स में मौजूद रखता है। इसका कार्य है कि फेफड़ों से ताजा ऑक्सीजन लेकर शरीर के हर टिश्यू, मसल और ऑर्गन तक पहुंचाना।</span></div><div><br></div><div><b>जानें हीमोग्लोबिन का नॉर्मल रेंज&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>पुरुष:</b> 13.8-17.2 g/dl</span></div><div><b>महिला: </b>12.1-15.1 g/dl</div><div><b>बच्चे: </b>11-16 g/dl</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>कब यह खतरनाक माना जाता है?</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">पुरुषों में 17.2g/dl से ज्यादा, महिलाओं और बच्चों में 16 g/dl या इससे अधिक हीमोग्लोबिन का स्तर खतरनाक माना जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>क्या कारण हो सकते हैं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हीमोग्लोबिन हाई होने का प्राइमरी कारण है कि रेयर किस्म का ब्लड कैंसर पॉलिसेथेमिया वेरा। इसके सेकंडरी कारणों में शामिल हैं-</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- फेफड़े की क्रॉनिक बीमारी- गंभीर अस्थमा, स्लीप एप्निया</div><div><br></div><div>&nbsp;- धूम्रपान</div><div><br></div><div>&nbsp;- पहाड़ी इलाकों में रहने की वजह से ऑक्सीजन कम हो जाता है, जो कि ज्यादा हीमोग्लोबिन बनाने के लिए ट्रिगर करता है</div><div><br></div><div>&nbsp;- गंभीर रुप से डिहाइड्रेशन की समस्या होने पर</div><div><br></div><div>&nbsp;- किंडनी की बीमारी और ट्यूमर</div><div><br></div><div>&nbsp;- जन्म से दिल की बीमारी हो या क्रॉनिक सायनॉटिक हार्ट डिजीज हो</div><div><br></div><div><b>किन कारण से हीमोग्लोबिन का स्तर अधिक हो सकता है</b></div><div><br></div><div>&nbsp;- कार्यस्थल पर कार्बन मोनोऑक्साइड के संपर्क में आना।</div><div><br></div><div>&nbsp;- लंबे समय से प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हों।</div><div><br></div><div><b>&nbsp;ये होते हाई हीमोग्लोबिन के लक्षण</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">-सिरदर्द</span></div><div>-चक्कर या सिर में हल्कापन</div><div>-आंखों से धुंधला दिखना</div><div>- थकान और कमजोरी</div><div>- सांस लेने में परेशानी</div><div>- हाथ और पैरों की त्वचा लाल रहना</div><div>- महिलाओं में पीरियड्स में ज्यादा ब्लीडिंग होना</div><div><br></div><div><b>जानें खतरे</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- ब्लड क्लॉट या डीप वेन थ्रोम्बोसिस की समस्या</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- स्ट्रोक&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- हार्ट अटैक&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- हाइपरटेंशन</div><div><br></div><div>&nbsp;- मुख्य अंगों तक खून का बहाव कम हो जाना</div><div><br></div><div>&nbsp;- स्प्लीन का फैल जाना</div><div><br></div><div><b>इनसे मिलेगी मदद</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- धूम्रपान ना करें</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- अपने हाइड्रेशन का ध्यान रखें</div><div><br></div><div>&nbsp;- लगातार बैठे रहने से बचें</div><div><br></div><div>&nbsp;- ऑक्सीजन का लेवल चेक करते रहे और क्रॉनिक बीमारियों का इलाज कराएं</div><div><br></div><div>&nbsp;- डॉक्टर की सलाह लिए बिना आयरन सप्लीमेंट ना लें</div><div><br></div><div>&nbsp;- मोटापा, डायबिटीज और ब्ल़ड प्रेशर नियंत्रित रखें</div><div><br></div><div>&nbsp;- सांस से संबंधित समस्या होने पर ऊंची जगह पर जाने से पहले एक्सपर्ट की राय जरुर लें</div><div><br></div><div><b>कब डॉक्टर को दिखाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- बार-बार चक्कर आना और सिरदर्द हो</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- बिना काम किए भी थकान रहती हो</div><div><br></div><div>&nbsp;- सांस लेने में दिक्कत हो रही हो</div><div><br></div><div>&nbsp;- लगातार ब्लड क्लॉट की समस्या हो रही हो</div><div><br></div><div>&nbsp;- टेस्ट रिपोर्ट में हीमोग्लोबिन का लेवल लगातार अधिक आ रहा हो।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 11:09:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/risks-of-high-hemoglobin-and-heart-attack-explained</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/18/high-hemoglobin_large_1112_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नकली पनीर से बढ़ सकता है Heart Disease का खतरा, Analog Paneer के 5 बड़े नुकसान!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/risks-of-analog-paneer-fssai-warning]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पनीर से बनी हुई हर एक डिश हम सबको काफी पसंद होती है, लेकिन बाजार में मिलने वाली पनीर मेंकाफी मिलावट देखने को मिलती है। त्योहारों के समय पनीर में सबसे ज्यादा मिलावट की जाती है। वैसे पनीर प्रोटीन और कैल्शियम का अच्छा स्रोत माना जाता है, लेकिन मार्केट में मिलने वाला पनीर असली दूध से बना हुआ हो, यह जरुरी नहीं है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">आजकल एनालॉग पनीर को लेकर कई राज्यो में सख्ती देखने को मिल रही है। एनलॉग पनीर पारंपरिक दूध से बने पनीर के बजाय दूसरे गैर-डेयरी फैट, स्टार्च और अन्य सामग्री से तैयार किया जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>क्या कहा FSSAI ने?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">FSSAI ने यह साफ स्पष्ट किया है कि एनलॉग को पनीर के नाम से बेचना नियमों का उल्लंघन है। इस समय उत्तर प्रदेश से लेकर महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में एनालॉग पनीर के खिलाफ कार्रवाई और प्रतिबंध की खबरें सामने आई है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>इस लेख में हम आपको बताएंगे कि एनालॉग पनीर क्या है, असली पनीर से यह कैसे अलग है और इसे खाने को लेकर चिंता क्यों जताई जा रही है। आइए जानते हैं एनालॉग पनीर से जुड़े 5 बड़े नुकसान और इससे बचने के तरीके।</div><div><br></div><div><b>क्या है एनालॉग पनीर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एनालॉग पनीर एक ऐसी चीज है जो एकदम पनीर की तरह दिखती है और इस्तेमाल भी होता है, लेकिन इसमें दूध के जगह पर वनस्पति फैट, स्टार्च या दूसरे गैर-डेयरी तत्वों का इस्तेमाल किया जा सकता है। जब लोगों को इस एनलॉग पनीर को असली पनीर बताकर बेचा जाता है। वहीं, FSSAI ने इस तरह की गलत लेबलिंग करने पर सख्ती दिखाई है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>एनालॉग पनीर खाने के नुकसान</b></div><div><br></div><div><b>पाचन संबंधी परेशानी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में एनालॉग पनीर में दूध की जगह अलग तरह का वसा, स्टार्च और दूसरी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इस तरह के उत्पाद हर व्यक्ति के लिए आसानी से पचने वाले नहीं है, यह जरुरी नहीं है। अगर आप इसको अधिक मात्रा में सेवन करते हैं, तो कुछ लोगों को पेट में भारीपन, गैस, पेट फूलना, अपच या एसिडिटी जैसी परेशनियों से जूझना पड़ सकता है। यदि आप इसे तले-भुने या मसालेदार खाने के साख खाएंगे, तो पाचन समस्या बढ़ जाएगी।</span></div><div><br></div><div><b>ज्यादा वसा और कैलोरी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गौरतलब है कि एनलॉग पनीर को बनाने में वनस्पति वसा का इस्तेमाल किया जाता है। प्रोडक्ट में इस्तेमाल होने वाली सामग्री और उसकी मात्रा के आधार पर इसमें वसा और कैलोरी की मात्रा अलग-अलग हो सकती है। यदि कोई व्यक्ति इसे नियमित रुप से अधिक मात्रा में सेवन करता है, तो इसकी कुल कैलोरी और वसा की खपत बढ़ सकती है। खरीदते समय पैकेट पर पोषण संबंधी जानकारी और सामग्री जरुर चेक करें।</span></div><div><br></div><div><b>&nbsp;पोषण की कमी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">पनीर दूध से बनाया जाए, तो इसमें प्रोटीन, कैल्शियम और अन्य पोषक तत्व पाए जाते हैं। लेकिन एनालॉग पनीर का पोषण प्रोफाइल इसमें इस्तेमाल की गई सामग्री पर निर्भर करता है। इसलिए एनलॉग पनीर को हमेशा असली दूध से बने पनीर के बराबर पोषण वाला प्रोडक्ट नहीं माना जाता है। इसलिए भूलकर भी एनलॉग पनीर को अपनी डाइट में शामिल न करें।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>दिल की सेहत को लेकर चिंता</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गौरतलब है कि एनालॉग पनीर में सबसे अधिक वसा की मात्रा पाई जाती है। यदि किसी व्यक्ति के भोजन में पहले से ही संतृप्त वसा की मात्रा ज्यादा है और वह लंबे समय तक ऐसे खाद्य पदार्थों का अधिक सेवन न करे, जिससे हृदय-स्वस्थ पर असर देखने को मिलेगा। इसलिए एनालॉग पनीर को नियमित रुप से सेवन न करे, उसमें पाए जाने वाले वसा का मात्रा और खाने की मात्रा पर ध्यान जरुर दें।</span></div><div><br></div><div><b>खाद्य सुरक्षा का जोखिम</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, एनालॉग पनीर को लेकर ग्राहकों को इतनी जानकारी नहीं होती है। वहीं, सही जानकारी ग्राहक को दी नहीं जाती है या उत्पाद खाद्य सुरक्षा मानको के मुताबिक तैयार और सुरक्षित तरीके से संग्रहित नहीं किए जाते हैं। गलत तरीके से रखे गए खाद्य पदार्थ में दूषित होने का खतरा अधिक देखने को मिलता है। इसलिए बिन लेवल, संदिग्ध गुणवत्ता या अनजान स्रोत से मिलने वाले पनीर खरीदने से बचें। जब आप पैकेट वाला पनीर लें, तो एक बार सामग्री, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि और एफएसएसएआई से संबंधित जानकारी जरुर जान लें।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 15:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/risks-of-analog-paneer-fssai-warning</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/17/analog-paneer_large_1600_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: रोजाना मिर्च खाने वालों में 14% कम होता है Death Risk, जानें Chili Consumption के फायदे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/daily-chili-consumption-reduces-risk-of-death-by-14-know-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अधिकतर भारतीयों को तीखा खाना ज्यादा पसंद है। जब भी हम कुछ बनाते हैं, तो उसमें कई तरह के मसालों का इस्तेमाल किया जाता है। जो खाने के स्वाद को बढ़ाने के साथ तीखापन भी लाता है। लेकिन हर किसी को तीखा खाना पसंद नहीं होता है। लेकिन क्या आपने कभी सुना है कि तीखा खाना खाने से आपकी उम्र बढ़ सकती है।</div><div><br></div><div>दरअसल, पिछले कुछ सालों में इस पर रिसर्च की गई है। जिसमें मसालेदार खाना खाने और लंबी उम्र के बीच एक कनेक्शन देखने को मिला है। हालांकि वैज्ञानिकों की मानें, तो अभी इस पर रिसर्च की और जरूरत है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि क्या सच में तीखा खाने वाले लोगों की जिंदगी लंबी हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/why-cholesterol-spikes-after-40-an-analytical-review" target="_blank">संभल जाएं! 40 के बाद शरीर में होने वाले ये Natural Changes बढ़ाते हैं Bad Cholesterol और हार्ट स्ट्रोक का खतरा</a></h3><div><br></div><h2>जानें रिसर्च में क्या आया सामने</h2><div>एक रिसर्च के मुताबिक करीब 5 लाख से अधिक लोगों की सेहत पर नजर रखी गई थी। उन पर स्टडी की गई, जिसमें पाया गया कि जो लोग सप्ताह में 6 से 7 दिन मसालेदार खाना खाते थे। उनमें मौत का खतरा अन्य लोगों की तुलना में कम था। जो लोग सप्ताह में एक बार या इससे भी कम तीखा खाना खाते थे।</div><div><br></div><div>यह अंतर करीब 14% तक देखा गया। वहीं यह भी पाया गया कि मसालेदार खाना खाने वालों में कुछ तरह के कैंसर, हार्ट डिजीज और लंग्स से जुड़ी समस्याओं की वजह मौत का खतरा कम देखा गया।</div><div><br></div><h2>अन्य रिसर्च ने भी दिए ऐसे ही संकेत</h2><div>अन्य रिसर्च में भी यह पाया गया कि जो लोग नियमित रूप से अपनी डाइट में लाल मिर्च शामिल करते हैं। उनमें मौत का जोखिम अन्य लोगों की तुलना में कम होता है। यह अंतर करीब 13% तक था। लेकिन यह सिर्फ एक ही कनेक्शन दिखाता है। जिसका मतलब यह नहीं है कि लंबी उम्र की वजह सिर्फ तीखा मिर्च खाना हो।</div><div><br></div><h2>मिर्च में क्या होता है</h2><div>मिर्च में कैप्साइसिन नामक एक्टिव एलिमेंट पाया जाता है। जिस कारण यह तीखा होता है। यह तत्व हमारी बॉडी में कुछ खास रिसेप्टर्स पर असर करता है, जो तीखेपन और गर्मी को महसूस करते हैं। इस एलिमेंट से सेहत पर सकारात्मक असर होता है।</div><div><br></div><h2>दिल की सेहत को फायदा</h2><div>रिसर्च में पाया गया है कि कैप्साइसिन बॉडी में अच्छे कोलेस्ट्ऱॉल यानी की HDL के लेवल को बढ़ा सकता है। वहीं कुछ लोग तीखा खाने पर नमक का कम इस्तेमाल करते हैं। जिससे बीपी को कंट्रोल करने में मदद मिलती है। लेकिन यह फायदा आपकी लाइफस्टाइल और खानपान की आदतों पर निर्भर करती है।</div><div><br></div><h2>हमेशा पेट के लिए नुकसानदायक नहीं</h2><div>आमतौर पर लोगों को लगता है कि तीखा खाना पेट को नुकसान पहुंचाता है। लेकिन रिसर्च के मुताबिक कैप्साइसिन पेट को नुकसान नहीं पहुंचाता है। लेकिन जिन लोगों को गैस, एसिडिटी या कुछ डाइजेशन संबंधी समस्याएं हैं, उनको तीखा खाने पर कुछ समस्याएं हो सकती हैं।</div><div><br></div><h2>जानिए क्‍या कहते हैं एक्‍सपर्ट</h2><div>रिसर्च में बताया गया है कि स्‍पाइसी फूड और लंबी उम्र के बीच संबंध लेकर कुछ पॉजिटिव संकेत जरूर मिले हैं। लेकिन यह कहना पूरी तरीके से सही नहीं होगा कि सिर्फ तीखा खाने से उम्र बढ़ती है। मिर्च में मौजूद कैप्साइसिन में एंटी-इंफ्लेमेटरी और मेटाबॉलिज्म से जुड़े कुछ फायदे देखने को मिले हैं। लेकिन किसी की व्यक्ति की लंबी उम्र कई चीजों पर निर्भर करती है। जैसे नियमित एक्सरसाइज करना, हेल्दी डाइट, तनाव कम लेना, जेनेटिक रीजन और अच्छी नींद आदि। वहीं कुछ लोगों में तीखा खाने से सेहत को फायदा हो सकता है।</div><div><br></div><div>वहीं जिन लोगों को गैस्ट्रो-इसोफेजियल रिफ्लक्स, एसिडिटी, इरिटेबल बाउल सिंड्रोम, गैस्ट्राइटिस या दूसरी डाइजेशन से जुड़ी समस्याएं हैं, तो तीखा खाना इन लोगों की परेशानी को और बढ़ा सकता है। इसलिए सिर्फ लंबी उम्र की उम्मीद करके ज्यादा मिर्च-मसाला खाना सही नहीं है।</div><div><br></div><h2>ज्यादा तीखा खाना शुरू करना</h2><div>हालांकि अगर आपको तीखा खाना ज्यादा पसंद है, तो आप सीमित मात्रा में इसको खा सकती हैं। लेकिन सिर्फ लंबी उम्र पाने के लिए तीखा खाना शुरू करना सही नहीं होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 11:15:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/daily-chili-consumption-reduces-risk-of-death-by-14-know-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/17/health-tips_large_1118_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संभल जाएं! 40 के बाद शरीर में होने वाले ये Natural Changes बढ़ाते हैं Bad Cholesterol और हार्ट स्ट्रोक का खतरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/why-cholesterol-spikes-after-40-an-analytical-review]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्सर लोग यही सोचते है कि कोलेस्ट्रॉल सिर्फ गलत खानपान के कारण ही बढ़ता है, हालांकि सच्चाई कुछ और है। दरअसल, 40 वर्ष की उम्र के बाद शरीर में ऐसे प्राकृतिक बदलाव देखने को मिलते हैं, जो कि कोलेस्ट्रोल के स्तर को प्रभावित करते हैं। उम्र बढ़ने के साथ कोशिकाओं की कार्यक्षमता कम होने लगती है। इस दौरान मेटाबॉलिज्म भी धीमा पड़ने लगता है और हार्मोनल परिवर्तन लिपिड प्रोफाइल पर असर दिखाता है। इसी कारण से 40 पार करने के बाद से हार्ट अटैक और स्ट्रोक का खतरा अधिक बढ़ने लगता है।</div><div><br></div><div><b>40 के बाद कोलेस्ट्रॉल क्यों बढ़ता है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मैयोक्लीनिक के मुताबिक, उम्र बढ़ने के साथ शरीर की कैलोरी खर्च करने की क्षमता धीरे-धीरे कम हो सकती है। ऐसे में पहले के मुकाबले कम कैलोरी बर्न होती है और अतिरिक्त कैलोरी शरीर में फैट के रूप में जमा होने लगती है। इसका असर वजन बढ़ने के साथ-साथ एलडीएल (LDL) और ट्राइग्लिसराइड्स जैसे ब्लड फैट के स्तर पर भी पड़ सकता है। इसके अतिरिक्त, उम्र बढ़ने के साथ ही लिवर की वह क्षमता भी कम हो जाती है, जिससे वह रक्त से अतिरिक्त LDL को रिमूव करता है। जिसका परिणाम रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल का स्तर बढ़ सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>कोलेस्ट्रॉल को बढ़ाने में हार्मोन और मेटाबॉलिज्म की क्या भूमिका होती है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एनसीबीआई के मुताबिक, 40 वर्ष के बाद हार्मोनल बदलाव के कारण कोलेस्ट्रोल बढ़ने लगता है। महिलाओं में मेनोपॉज के समय एस्ट्रोजन का स्तर तेजी से कम होने लगता है। एस्ट्रोजन सामान्य परिस्थितियों में HDL (अच्छा कोलेस्ट्रॉल) को बनाए रखने और LDL को नियंत्रित करने में मदद करता है। इसकी कमी के बाद LDL और ट्राइग्लिसराइड्स बढ़ सकते हैं।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">वहीं, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन धीरे-धीरे कम होने लगता है। जिसके साथ शरीर में फैट प्रतिशत बढ़ सकता है और इंसुलिन रेजिस्टेंस विकसित होने लगता है, जिससे लिपिड प्रोफाइल प्रभावित होती है।</span></div><div><br></div><div><b>लिवर की कार्यक्षमता में बदलाव</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एनसीबीआई के अनुसार, लिवर रक्त से अतिरिक्त एलडीएल यानी खराब कोलेस्ट्रॉल को हटाने का कार्य करता है। उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह प्रक्रिया कुछ लोगों में कम प्रभावी हो सकती है, जैसे कि रक्त में खराब कोलेस्ट्रॉल जमा होना।</span></div><div><br></div><div><b>शारीरिक गतिविधि में कमी</b></div><div>&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">40 वर्ष के बाद लोग पहले की तुलना में कम एक्टिव नजर आते हैं। अक्सर नियमित रुप से एचडीएल यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल को कम करने और खराब कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल को बढ़ा सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>वजन और पेट की चर्बी बढ़ना</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">उम्र बढ़ने के साथ खासकर पेट के आसपास की चर्बी, जिसे विसरल फैट कहा जाता है, बढ़ने का खतरा रहता है। यह शरीर में इंसुलिन रेजिस्टेंस और खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ने की समस्या पैदा कर सकती है। इसके कारण आगे चलकर कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा भी बढ़ सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>किन लोगों में कोलेस्ट्रॉल के कारण हार्ट डिजीज का खतरा ज्यादा होता है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">- 40 वर्ष से अधिक उम्र के लोग</span></div><div><br></div><div>- परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास</div><div><br></div><div>- डायबिटीज के मरीज</div><div><br></div><div>- हाई ब्लड प्रेशर वाले लोग</div><div><br></div><div>- मोटापा या बढ़ा हुआ कमर का घेरा</div><div><br></div><div>- जो लोग घू्म्रपान करते हैं</div><div><br></div><div><b>40 के बाद कौन-कौन से टेस्ट नियमित कराने चाहिए?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, 40 वर्ष के बाद सिर्फ कोलेस्ट्रॉल ही नहीं बल्कि संपूर्ण हार्ट हेल्थ की जांच जरुर करानी चाहिए।</span></div><div><br></div><div>- लिपिड प्रोफाइल (टोटल कोलेस्ट्रॉल टेस्ट - LDL और HDL, Triglycerides)</div><div><br></div><div>-ब्लड प्रेशर</div><div><br></div><div>-फास्टिंग ब्लड शुगर एवं HbA1c</div><div><br></div><div>-BMI और कमर की माप</div><div><br></div><div>-हाई सेंसिटिव CRP (जरूरत पड़ने पर)</div><div><br></div><div>-ApoB या Lipoprotein(a) (यदि पारिवारिक जोखिम हो)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 16:07:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/why-cholesterol-spikes-after-40-an-analytical-review</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/15/cholesterol_large_1609_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bone Health: Menopause के बाद महिलाओं में बढ़ जाता है Osteoporosis का खतरा, ये उपाय बचाएंगे आपकी Bone Health]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/risk-of-osteoporosis-increases-in-women-after-menopause-measures-protect-bone-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महिलाओं के जीवन में मेनोपॉज एक नेचुरल प्रोसेस है। आमतौर 45 से 55 वर्ष की उम्र के बीच से मेनोपॉज शुरू होता है। इस दौरान महिलाओं के शरीर में एस्ट्रोजन हार्मोन का लेवल तेजी से कम होने लगता है। एस्ट्रोजन सिर्फ फर्टिलिटी के लिए जरूरी नहीं है। बल्कि यह हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। जब इसका लेवल घटता है, तो बोन डेंसिटी भी कम होने लगती है और हड्डियों में खोखले होने का जोखिम बढ़ जाता है।</div><div><br></div><div>मेनोपॉज के शुरू होने के बाद 5 से 10 सालों में महिलाओं की बोन मिनरल डेंसिटी तेजी से कम हो सकती है। जिससे फ्रैक्चर का खतरा बढ़ जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि महिलाओं को इस दौरान क्या लक्षण महसूस हो सकते हैं। साथ ही इससे कैसे बचाव कर सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/how-to-curb-frequent-hunger-and-weight-gain-learn-mindful-eating-tips" target="_blank">Women Health: बार-बार लगने वाली भूख और Weight Gain पर कैसे लगाएं लगाम? जानें Mindful Eating टिप्स</a></h3><div><br></div><h2>जानिए मेनोपॉज और हड्डियों का संबंध</h2><div>हमारे शरीर की हड्डियां के टूटने या फ्रैक्चर होने पर वह दोबारा बन सकती हैं। युवावस्था में नई हड्डियां बनने का प्रोसेस ज्यादा एक्टिव होता है। लेकिन उम्र बढ़ने के साथ और मेनोपॉज के बाद यह प्रोसेस बिगड़ने लगता है। एस्ट्रोजन हड्डियों को टूटने से बचाता है। इसकी कमी होने पर हड्डियों का डैमेज तेजी से होने लगता है। यही वजह है कि मेनोपॉज के बाद महिलाओं को हड्डियों के खोखले और कमजोर होने की समस्या का सामना करना पड़ता है।</div><div><br></div><h2>जानें कमजोर हड्डियों के शुरुआती संकेत</h2><div><br></div><h2>लगातार कमर दर्द होना</h2><div>रीढ़ की हड्डियों में कमजोरी आने पर कमर और पीठ में लगातार दर्द हो सकता है। बता दें कि यह हड्डी से जुड़े रोग जैसे ऑस्टियोपोरोसिस का भी संकेत हो सकता है।</div><div><br></div><h2>कम लंबाई होना</h2><div>अगर बढ़ती उम्र के साथ ऊंचाई कम होती जा रही है। तो यह रीढ़ की हड्डियों के कमजोर होने या सिकुड़ने का भी संकेत हो सकता है। जब बोन डेंसिटी कम होती है, इसका प्रभाव रीढ़ पर देखने को मिलता है। इस कारण व्यक्ति झुककर चलने लगता है। ऐसे में हाइट कम लगने लगता है।</div><div><br></div><h2>मामूली चोट में फ्रैक्चर होना</h2><div>ज्यादा उम्र में मेनोपॉज के बाद हड्डियों के प्रभावित होने से कहीं पर साधारण चोट या हल्का गिरने पर भी कूल्हे, कलाई या रीढ़ की हड्डी टूटने का खतरा होता है।</div><div><br></div><h2>मेनोपॉज के बाद क्यों कमजोर होती हैं हड्डियां</h2><div>बढ़ती उम्र के साथ हड्डियों के दोबारा बनने का प्रोसेस स्लो हो जाता है।</div><div><br></div><div>विटामिन डी और कैल्शियम की कमी होने पर बोन डेंसिटी कम होने लगती है।</div><div><br></div><div>उम्र की वजह से महिलाएं ज्यादा काम नहीं करती हैं, जिस कारण बोन हेल्थ प्रभावित होती है।</div><div><br></div><div>शराब और धूम्रपान का सेवन भी महिलाओं में बोन लॉस को तेज कर सकता है।</div><div><br></div><div>अगर महिला की फैमिली में किसी को पहले से ऑस्टियोपोरोसिस रोग रहा है, तो खतरा बढ़ सकता है।</div><div><br></div><h2>मेनोपॉज के बाद कैसे मजबूत करें हड्डियां</h2><div><br></div><h2>कैल्शियम है जरूरी</h2><div>महिलाओं को अपनी डाइट में दूध, पनीर, रागी, दही, तिल और हरी पत्तेदार सब्जियों को शामिल करना चाहिए। यह सभी चीजें कैल्शियम का अच्छा सोर्स मानी जाती हैं।</div><div><br></div><h2>विटामिन डी है जरूरी</h2><div>सुबह की धूप और विटामिन डी युक्त खाद्य पदार्थ कैल्शियम के अवशोषण में सहायता करते हैं। इससे हड्डियों के डैमेज होने का खतरा कम होता है।</div><div><br></div><h2>एक्सरसाइज</h2><div>तेज चलना, योग, स्ट्रेंथ ट्रेनिंग और सीढ़ियां चढ़ना आदि हड्डियों को मजबूत बनाता है। वहीं ऐसा करने से मोटापा भी कंट्रोल होता है।</div><div><br></div><h2>पर्याप्त प्रोटीन लेना जरूरी</h2><div>प्रोटीन मांसपेशियों और हड्डियों दोनों के लिए जरूरी है। बढ़ती उम्र में मेनोपॉज के बाद हड्डियों को कमजोर होने से बचाने के लिए विटामिन डी, कैल्शियम के साथ प्रोटीन लेना जरूरी होता है।</div><div><br></div><h2>नियमित हेल्थ चेकअप</h2><div>समय-समय पर बोन मिनरल डेंसिटी टेस्ट और डॉक्टर की सलाह से हड्डियों की स्थिति का पता किया जा सकता है। एक्सपर्ट के मुताबिक 65 साल से ज्यादा उम्र की महिलाओं और जोखिम वाले मामलों में BMD टेस्ट कराना फायदेमंद हो सकता है। इस जांच से हड्डियों के कमजोर, हेल्दी और ऑस्टियोपोरोसिस की स्थिति का पता चलता है।</div><div><br></div><div>मेनोपॉज के बाद महिलाओं की हड्डियों के कमजोर होने का जोखिम अधिक बढ़ जाता है। लेकिन सही समय पर पहचान होने और सही लाइफस्टाइल अपनाकर इस खतरे को कम किया जा सकता है। झुकी हुई पीठ, कमर दर्द या बार-बार फ्रैक्चर जैसे संकेतों को इग्नोर नहीं करना चाहिए। विटामिन डी और कैल्शियम से भरपूर डाइट, एक्सरसाइज और बोन मिनरल डेंसिटी की जांच हेल्थ और मजबूत हड्डियों के लिए बेहद जरूरी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 14:06:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/risk-of-osteoporosis-increases-in-women-after-menopause-measures-protect-bone-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/15/bone-health_large_1408_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Women Health: बार-बार लगने वाली भूख और Weight Gain पर कैसे लगाएं लगाम? जानें Mindful Eating टिप्स]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/how-to-curb-frequent-hunger-and-weight-gain-learn-mindful-eating-tips]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रेग्नेंसी के समय एक हेल्दी बच्चे के लिए जरूरी होता है कि महिलाएं अपनी डाइट में जरूरी पोषण को शामिल करें। प्रेग्नेंट महिलाओं को अक्सर यह कहा जाता है कि उनको दो लोगों का खाना खाना चाहिए। वहीं इमोशनल, हार्मोनल बदलाव और शारीरिक बदलावों की वजह से प्रेग्नेंट महिलाएं ज्यादा खाने भी लगती हैं। जिस कारण इस दौरान उनका वेट बढ़ जाता है। प्रेग्नेंसी में बढ़ता वेट न सिर्फ महिला की सेहत बल्कि बच्चे की सेहत और डिलीवरी के लिए भी सही नहीं माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि प्रेग्नेंसी में ओवरईटिंग से बचने के लिए क्या करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>प्रेग्नेंसी में ओवरईटिंग से बचने के टिप्स</h2><div>एक स्टडी के मुताबिक प्रेग्नेंसी में खाने पर कंट्रोल न करना एंग्जायटी और तनाव को बढ़ाता है। वहीं यह वेट बढ़ने का भी कारण बन सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/best-diet-tips-during-periods-if-you-are-in-fat-loss-journey-in-hindi" target="_blank">Health Tips: पीरियड्स में भी नहीं रुकेगा फैट लॉस, बस डाइट में करें ये छोटे बदलाव</a></h3><div><br></div><div>प्रेग्नेंसी में क्रेविंग्स, परिवार का प्रेशर या हार्मोनल बदलाव की वजह से महिलाएं ज्यादा खा लेती हैं। ऐसे में प्रेग्नेंसी में ओवरईटिंग से वेट बढ़ जाता है। इससे हाई बीपी, जस्टेशनल डायबिटीज, एसिडिटी और डिलीवरी के समय जोखिम बढ़ जाता है। इन जोखिमों को कम करने के लिए और ओवरईटिंग से बचने के लिए आप इन टिप्स को फॉलो कर सकती हैं।</div><div><br></div><h2>इस मिथक से बचें</h2><div>प्रेग्नेंसी की शुरूआत में गर्भ में पलने वाले बच्चे का आकार एक छोटे बीज या फल के समान होता है। इसलिए उसको अपने लिए भोजन की जरूरत नहीं होती है। आप जो खाती हैं, उससे बच्चे को पोषण मिलता है। प्रेग्नेंसी की पहली तिमाही तक आप नॉर्मल कैलोरी ले सकती हैं। दूसरी और तीसरी तिमाही में ज्यादा कैलोरी इनटेक लेना चाहिए। हालांकि इसके लिए बहुत खाने की जरूरत नहीं है। भोजन में सिर्फ 300 से 450 ज्यादा कैलोरी सही है।</div><div><br></div><h2>दिन में 5-6 छोटे मील लेने चाहिए</h2><div>अगर दिन में एक बार ही पेट भर के खाना खाएंगी, तो गर्भाशय का पेट पर दबाव पड़ेगा। जिस कारण आपको एसिडिटी, ब्लोटिंग और भारीपन महसूस हो सकता है। इसलिए इसकी जगह दिनभर के भोजन को 5-6 छोटे-छोटे मील में बांट लें। हर 2 से 3 घंटे में कुछ हल्का और पौष्टिक खाएं। इससे ब्लड शुगर लेवल स्थिर रहेगा और अचानक तेज भूख का एहसास भी नहीं होगा।</div><div><br></div><h2>डाइट में प्रोटीन और फाइबर की बढ़ाएं</h2><div>फाइबर और प्रोटीन पचने में थोड़ा समय लेते हैं, इससे आपका पेट लंबे समय तक भरा रहता है। प्रोटीन के लिए थाली में दही, उबला अंडा, पनीर, अंकुरित अनाज, दालें और टोंड मिल्क डाइट में शामिल करें। वहीं फाइबर के लिए हरी पत्तेदार सब्जियां, ओट्स और मौसमी फल खाएं।</div><div><br></div><h2>असली भूख और क्रेविंग में फर्क</h2><div>प्रेग्नेंसी के दौरान हार्मोनल बदलावों की वजह से तीखा, मीठा या जंक फूड खाने की क्रेविंग बढ़ जाती है। इस दौरान जब भी कुछ खाने का मन करे, तो 1 गिलास पानी या नारियल पानी पीकर 10 मिनट रुकें। कई बार शरीर डिहाइड्रेशन को भूख समझ लेता है। इसके बाद भी अगर खाने की इच्छा हो, तो भुना चना या मुट्ठी भर ड्राई फ्रूट्स खाएं।</div><div><br></div><h2>प्रोसेस-फूड और सिर्फ कैलोरी से बचना चाहिए</h2><div>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक कोल्ड ड्रिंक्स, समोसे, मिठाइयां, पिज्जा, बिस्कुट और पैकेटबंद जूस पोषण नहीं होता है। लेकिन इनमें कैलोरी बहुत होती है। इन चीजों के सेवन से ब्लड शुगर तेजी से बढ़ता है और फिर अचानक लो होता है। इस वजह से आपको थोड़ी देर बाद फिर से भूख लगने लगती है। इसलिए आप प्रोसेस फूड्स या खाली कैलोरी की बजाय घर का हेल्दी और ताजा खाना खाएं।</div><div><br></div><h2>माइंडफुल ईटिंग</h2><div>खाना खाते समय माइंडफुल ईटिंग अपनाना चाहिए। खाना खाते समय मोबाइल चलाना, टीवी देखना या किसी एंग्जायटी में रहना ओवरईटिंग की सबसे बड़ी वजह हो सकती है। जब आप बिना ध्यान दिए खाते हैं, तो दिमाग को पेट भरने का सिग्नल देर से मिलता है। इसलिए आराम से बैठकर चबा-चबाकर खाना खाएं। वहीं खाना खत्म करने में कम से कम 15 से 20 मिनट का समय लें।</div><div><br></div><h2>पर्याप्त नींद है जरूरी</h2><div>नींद की कमी और तनाव शरीर में कोर्टिसोल और घ्रेलिन जैसे हार्मोन्स को बढ़ा देता है। जोकि भूख को ज्यादा बढ़ाते हैं। इसलिए रोजाना 7 से 8 घंटे की अच्छी और गहरी नींद लेना जरूरी है। सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल न करें। इसकी जगह पर मेडिटेशन, हल्का संगीत या डॉक्टर की सलाह पर वॉक करें।</div><div><br></div><div>एक रिसर्च स्टडी के मुताबिक नींद की समस्याओं और बिंज ईटिंग के बीच कनेक्शन है। नींद की कमी होने और ज्यादा खाने की आदत मिलकर एक हानिकारक हार्मोनल और मेटाबॉलिक चक्र पैदा कर सकता है। जिसका हेल्थ पर बुरा प्रभाव पड़ता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 14:04:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/how-to-curb-frequent-hunger-and-weight-gain-learn-mindful-eating-tips</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/pregnancy-diet-myth_large_1406_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Festival Diet Plan: रक्षाबंधन से पहले 2 किलो वजन घटाने का Formula, डिनर में अपनाएं ये Healthy Habits]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/raksha-bandhan-weight-loss-expert-dinner-strategies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का महीना व्रत-त्योहारों से भरा हुआ है। हरियाली तीज से लेकर रक्षाबंधन पर्व बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। राखी का त्योहार भाई-बहन के प्रेम का प्रतीक है। इस खास पर्व के लिए लोग पहले से ही तैयारी करते हैं। इस दिन हर कोई अपनी फेवरेट ड्रेस पहनने के लिए फिट और कॉन्फिडेंट दिखना चाहता हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;">ऐसे में आप भी वजन कम करने का प्लान जरुर बना रहे होंगे। हालांकि, अभी इतनी देर नहीं हुई है। वजन को कंट्रोल करने के लिए आपको जल्दबाजी में क्रैश डाइटिंग करने की जरुरत नहीं है। अब आप आज से ही डिनर में कुछ खास बदलाव करके अपना वजन 2 किलो तक कम कर सकते हैं। जानें कैसे? आइए आपको बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>डिनर में सूप और सलाद लें&nbsp;</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वजन को कम करने के लिए आपको हैवी डिनर नहीं लेना। इसकी जगह पर आप सूप और सलाद ले सकते हैं। यह शरीर के जरुरी न्यूट्रिएंट्स देता है और वजन भी आसानी से कम हो जाता है। आप मूंग दाल, टमाटर या सब्जियों और रागी के आटे से बनने वाले सूप को आप डिनर का हिस्सा बना सकते हैं। चाहें तो आप सब्जियों को सॉथे कर लें। इस बात का ध्यान रखें कि वेट लॉस के लिए डिनर में कार्ब्स को कम से कम लेना चाहिए। इसके अलावा, ओट्स, दलिया या खिचड़ी खा सकती हैं।</span></div><div><br></div><div><b>डिनर जल्दी करें</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर वेट लॉस जर्नी के दौरान कहा जाता है डिनर जल्दी करना काफी जरुरी है। यदि व्यक्ति मोटापे से परेशान हैं या वजन कम करने की सोच रहा है, तो उसे डिनर शाम को 7 बजे तक कर लेना चाहिए और इसके बाद अगली सुबह नाश्ते तक कुछ भी नहीं खाना चाहिए। आप डिनर के लिए एक निश्चित समय तक कर सकते हैं और रोजाना उसी समय पर डिनर करें। इसलिए रात के समय खाने और अगली सुबह के नाश्ते के बीच 12 घंटे का गेप जरुर रखें।</span></div><div><br></div><div><b>मीठे को अवॉइड करें</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वेट लॉस जर्नी के लिए आप डिनर में या फिर डिनर के बाद भूलकर भी मीठा नहीं खाना चाहिए। कुछ लोगों की आदत होती है डिनर के बाद मीठा जरुर खाते हैं। इसलिए कुछ मीठा न खाएं, क्योंकि यह आपके मोटापे के लिए जिम्मेदार हो सकता है। डिनर से मीठे को पूरी तरह हटा दें। यदि आप 2 हफ्तों के लिए मीठा पूरी तरह छोड़ दे, तो ज्यादा बेहतर रहेगा।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>डिनर के बाद दालचीनी और सौंफ का पानी पिएं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">रक्षाबंधन से पहले वजन कम करने की कोशिश करना चाहती है, तो डिनर के बाद पानी में सौंफ, अदरक और दालचीनी उबालकर पिएं। यह आपका फैट तेजी से बर्न होता है। खासकर बेली फैट कम करने में यह ड्रिंक बेहद कमाल की है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 12:31:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/raksha-bandhan-weight-loss-expert-dinner-strategies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/raksha-bandhan-weight-loss_large_1233_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: पीरियड्स में भी नहीं रुकेगा फैट लॉस, बस डाइट में करें ये छोटे बदलाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/best-diet-tips-during-periods-if-you-are-in-fat-loss-journey-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>फैट लॉस के दौरान पीरियड्स के दिन आते ही अक्सर महिलाओं की पूरी जर्नी गड़बड़ा जाती है। यह वह वक्त होता है, जब क्रेविंग्स को रोक पाना काफी मुश्किल होता है। कभी मीठा खाने का मन करता है, तो कभी बहुत ज्यादा भूख लगती है और कभी पेट इतना फूला हुआ महसूस होता है कि लगता है जैसे पिछले कई दिनों की मेहनत बेकार हो गई। इतना ही नहीं, इन दिनों स्केल पर वजन भी काफी बढ़ा हुआ नजर आता है। ऐसे में पूरा मूड ही खराब हो जाता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>अमूमन इस दौरान अक्सर महिलाएं अपनी पूरी डाइट से फोकस हटा देती हैं और बाद में गिल्ट की वजह से दोबारा अपनी जर्नी शुरू ही नहीं करतीं। हो सकता है कि आपके साथ भी ऐसा हुआ हो। तो चलिए जानते हैं कि वेट लॉस जर्नी में पीरियड्स के दौरान अपनी डाइट में किस तरह के बदलाव करें, जिससे क्रेविंग्स और वजन दोनों को मैनेज किया जा सके-&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/comments-about-periods-undermine-confidence-and-profound-impact-on-women-mental-health" target="_blank">Health Tips: 'Self-Confidence' पर चोट करते हैं पीरियड्स कमेंट्स, महिलाओं की 'Mental Health' पर पड़ता है गहरा असर</a></h3><h2>समझदारी से खाएं मीठा</h2><div>पीरियड्स के दौरान अक्सर मीठा खाने की बहुत अधिक क्रेविंग्स हो सकती है। ऐसे में खुद को बहुत ज्यादा रोकने की कोशिश ना करें। दरअसल, ऐसे में आप अचानक बहुत ज्यादा खा सकती हैं। कोशिश करें कि आप मीठा स्मार्टली खाएं। मसलन, पहले प्रोटीन व फाइबर वाला भोजन लें और फिर छोटी मात्रा में अपनी पसंद की चीज खाएं। मीठे की इच्छा पर दही के साथ फल और थोड़ी मात्रा में डार्क चॉकलेट लिया जा सकता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>इन दिनों सिर्फ सलाद खाकर काम न चलाएं</h2><div>अगर आप फैट लॉस पर हैं तो पीरियड्स में वजन बढ़ने के डर से खाना कम करने की कोशिश ना करें। इस दौरान शरीर पहले ही से थका हुआ महसूस कर रहा होता है और ऐसे में सिर्फ सलाद या सूप पर टिके रहना अच्छा विचार नहीं है। बेहतर होगा कि आप अपनी थाली में दाल, चना, राजमा, लोबिया, पनीर या दही जैसे प्रोटीन स्रोत के साथ रोटी, चावल या कोई दूसरा संतुलित कार्बाेहाइड्रेट और सब्जियां रखें। पेट भी ज्यादा देर तक भरा रहेगा और बार-बार कुछ खाने का मन भी कम होगा।</div><div><br></div><h2>हर भोजन में प्रोटीन</h2><div>यह एक आसान रूल है, जो पीरियड्स के दौरान आपकी भूख व क्रेविंग्स को मैनेज करने में मददगार साबित हो सकता है। कोशिश करें कि आप अपने भोजन को सिर्फ कम कैलोरी वाला बनाने के बजाय भरपेट और संतोषजनक बनाएं। इसके लिए हर मील में प्रोटीन को जरूर शामिल करें। नाश्ते में दही या दूध, दोपहर के खाने में दाल या पनीर और शाम को भुना चना जैसे विकल्प शामिल किए जा सकते हैं। इससे आपको हर थोड़ी देर में कुछ खाने की जरूरत कम महसूस होगी।</div><div><br></div><h2>नमकीन चीजों पर रखें नजर</h2><div>पीरियड्स के दिनों में अक्सर हम बहुत ज्यादा नमकीन चिप्स, पैकेट वाले नाश्ते, अचार और दूसरी अधिक नमक वाली चीजों का सेवन अनजाने में कर लेते हैं। जिससे ब्लोटिंग और भी ज्यादा बढ़ सकती है। कोशिश करें कि आप इनकी जगह घर का बना नाश्ता, फल, दही, भुना चना या मखाना जैसे विकल्प रखें। इससे आपकी खाने की इच्छा भी पूरी होगी और बेवजह ज्यादा नमक लेने से बचेंगी।</div><div><br></div><div>याद रखें कि पीरियड्स के आसपास आपका वजन अचानक 500 ग्राम या 1 किलो ऊपर चला गया, तो आपको घबराने की जरूरत नहीं है। कुछ दिनों का वजन पानी, ब्लोटिंग और पाचन में बदलाव से प्रभावित हो सकता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>- मिताली जैन</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 16:33:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/best-diet-tips-during-periods-if-you-are-in-fat-loss-journey-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/13/diet-tips_large_1635_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dengue Platelets Danger: डेंगू में कब गिरती है प्लेटलेट्स? जानिए ये Critical Signs और डॉक्टर की सलाह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/dengue-platelet-drop-critical-signs-and-risks]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बरसात के समय डेंगू का जोखिम अधिक बढ़ जाता है। डेंगू का नाम सुनते ही अच्छे-अच्छे परेशान हो जाते हैं। इसको लेकर प्लेटलेट्स कम होने की चिंता सताने लगती है। इस बीमारी में प्लेटलेट्स का घटना आम बात है, लेकिन हर मरीज में इसकी स्थिति एक जैसी नहीं होती है। अक्सर प्लेटलेट्स कम होने के बाद मरीज की हालत सामान्य रहती है, बल्कि कुछ मामलों में दूसरे लक्षण ज्यादा गंभीर करते हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;">इस मौसम में शरीर में होने वाले बदलावों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। खासकर बुखार के दिनों में मरीज की स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। प्लेटलेट्स के लेकर अक्सर लोगों के मन में कई सवाल आते हैं, जैसे कि डेंगू में प्लेटलेट्स कब गिरती है, कितनी प्लेटलेट्स खतरनाक मानी जाती हैं और प्लेटलेट्स कम होने पर क्या करें? आइए आपको बताते हैं किन लक्षणों को देखकर तुरंत सावधान रहने की जरुरत है।</span></div><div><br></div><div><b>डेंगू में प्लेटलेट्स कब गिरती है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में डेंगू की शुरुआत में तेज बुखार 2 से 7 दिनों तक रहता है। बीमारी के तीसरे से सातवें दिन के आसपास, खासकर जब बुखार कम होने लगता है, क्रिटिकल फेज शुरु हो सकता है। इसी दौरान प्लेटलेट काउंट तेजी से गिर जाती है। WHO के मुताबिक, वाइट रक्त कोशिकाओं में कभी के बाद प्लेटलेट्स में तेजी से गिरावट देखी जाती है।</span></div><div><br></div><div>अगर आप डेंगू को सिर्फ एक प्लेटलेट रिपोर्ट देखकर खतरे का अनुमान लगाना सही नहीं है। डॉक्टर प्लेटलेट्स के साथ हीमेटोक्रिट (HCT), ब्लड प्रेशर, नाड़ी, पेशाब की मात्रा, शरीर में पानी की स्थिति और मरीज के लक्षणों को भी देखते हैं। प्लेटलेट्स तेजी से गिरने के साथ ही हीमेटोक्रिट बढ़ना प्लाज्मा लीकेज की ओर इशारा करता है।</div><div><br></div><div><b>कितनी प्लेटलेट्स कम होना चिंता की बात</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यदि प्लेटलेट्स लगातार तेजी से गिर रही हैं या साथ में ब्लीडिंग , लो ब्लड प्रेशर, सांस लेने में परेशानी या अधिक कमजोरी जैसे लक्षण देखने को मिलते हैं, ऐसे में तुरंत डॉक्टर को दिखाना जरुरी है।</span></div><div><br></div><div><b>इन लक्षणों के बाद तुरंत डॉक्टर को दिखाएं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">- तेज या काफी से लगातार पेट दर्द होना</span></div><div><br></div><div>- बार-बार या लगातार उल्टी होना</div><div><br></div><div>- मसूड़ों या नाक से खून आना</div><div><br></div><div>- उल्टी या मल में खून&nbsp;</div><div><br></div><div>- अक्सर सांस तेजी से चलना या सांस लेने में परेशानी</div><div><br></div><div>- बहुत ज्यादा कमजोरी, सुस्ती या बैचेनी</div><div><br></div><div>- अत्यधिक प्यास लगना</div><div><br></div><div>- त्वचा का पीला, ठंडा या चिपचिपा पड़ना</div><div><br></div><div>- शरीर में पानी जमा होने के संकेत</div><div><br></div><div><b>&nbsp;प्लेटलेट्स बढ़ाने के लिए क्या करें?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अगर डेंगू में प्लेटलेट्स अधिक बढ़ गई हैं, तो मरीज को डॉक्टर की सलाह के अनुसार पर्याप्त तरल पदार्थ और आराम देना महत्वपूर्ण है। डिहाड्रेशन से बचने के लिए पानी, ORS और डॉक्टर द्वारा सुझाए गए तरल पदार्थ का सेवन करना उचित माना जाता है।</span></div><div><br></div><div>वहीं, पपीते के पत्ते या दूसरे घरेलू नुस्खों को प्लेटलेट्स बढ़ाने का प्रमाणित इलाज मानकर डॉक्टर की निगरानी को नजरअंदाज नहीं करें। प्लेटलेट ट्रांसफ्यूजन भी हर ऐसे मरीज को सिर्फ कम प्लेटलेट काउंट के आधार पर नहीं दिया जाता है, इसका निर्णय डॉक्टर मरीज की पूरी स्थिति और ब्लीडिंग के जोखिम को देखकर किया जाता है।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 12:54:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/dengue-platelet-drop-critical-signs-and-risks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/13/dengue-platelets-danger_large_1256_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: 'Self-Confidence' पर चोट करते हैं पीरियड्स कमेंट्स, महिलाओं की 'Mental Health' पर पड़ता है गहरा असर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/comments-about-periods-undermine-confidence-and-profound-impact-on-women-mental-health]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्सर महिलाएं तब गुस्सा होती हैं, या चिढ़ती हैं या इमोशनल होती हैं, तो उनके पार्टनर या आसपास के लोग सवाल करते हैं कि पीरियड्स की वजह से चिढ़ रही हो। या तुमको पीरियड्स आए हैं क्या। हालांकि पीरियड्स के दौरान महिलाओं को मूड स्विंग्स होते हैं। कई बार उनका छोटी-छोटी बातों पर रोना आता है या तेज गुस्सा आता है। लेकिन महिलाओं के इमोशंस को पीरियड्स से जोड़ देना सही नहीं है।</div><div><br></div><div>इसका महिलाओं की मेंटल हेल्थ पर भी असर होता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा हैं कि इस तरह के कमेंट्स किस तरह से महिलाओं की मेंटल हेल्थ को प्रभावित करते हैं।</div><div><br></div><h2>महिलाएं व्यक्त नहीं कर पातीं अपनी फीलिंग्स</h2><div>पीरियड्स होने से पहले भावनात्मक बदलावों को यह कहकर टाल देना कि 'तुमको तो पीरियड हो रहा है' या फिर उनके इमोशनल होने को पीरियड से जोड़ देना गलत होता है। भले ही पीरियडस में होने वाले हार्मोनल बदलाव का असर मूड पर पड़ता है। लेकिन सभी भावनात्मक प्रतिक्रियाएं बायोलॉजिकल नहीं होती हैं। वहीं सभी महिलाओं में एक तरह के लक्षण भी नहीं दिखते हैं।</div><div><br></div><div>जब महिलाओं द्वारा अपनी फीलिंग्स शेयर करने पर उसको पीरियड्स से जोड़ दिया जाए, तो कई बार महिलाएं मदद लेने से हिचकिचा जाती हैं। इस तरह से वह अपने इमोशंस को अपने मन में रखती हैं। जिसका उनकी मेंटल हेल्थ पर भी असर होता है।</div><div><br></div><h2>हर बात को हार्मोन से जोड़ना</h2><div>महिलाओं की हर बात, नाराजगी या गुस्से को सिर्फ हार्मोन्स से जोड़ देना बात की गंभीरता को खत्म करता है। इससे वह खुद में बुरा महसूस करने लगती हैं।</div><div><br></div><h2>कम होने लगता है आत्मविश्वास</h2><div>जब कई बार आप महिलाओं की असल परेशानी को इस तरह से नकार देते हैं, तो महिलाओं का सेल्फ कॉन्फिडेंस भी कम होने लगता है। उनको ऐसा महसूस होता है कि शायद उनका गुस्सा या इमोशंस सही नहीं है। जिस कारण वह खुद को कम आंकने लगती हैं।</div><div><br></div><h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2><div>साथ ही एक बात का और भी ध्यान रखना चाहिए कि पीरियड्स के दिनों में ज्यादा मूड स्विंग्स होना सही नहीं है। भले ही पीएमएस नॉर्मल है। लेकिन प्रीमेंस्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर या मूड डिसऑर्डर जैसी स्थितियां नॉर्मल नहीं हैं अगर इमोशंस पर काबू करना मुश्किल हो जाता है और रोजाना के कामों में भी मुश्किल होने लगे, तो इस चीज को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और डॉक्टर की सलाह लेना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 11:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/comments-about-periods-undermine-confidence-and-profound-impact-on-women-mental-health</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/13/health-tips_large_1157_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[World Organ Donation Day 2026: अंगदान के Medical Rules और प्रक्रिया क्या हैं? जानें कौन से Organs कर सकते हैं डोनेट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/world-organ-donation-on-13-august-guide-list-of-organs-and-tissues-to-donate]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रत्येक वर्ष 13 अगस्त को विश्व अंगदान दिवस मनाया जाता है। खासतौर पर इस दिन दुनियाभर में लोगों को अंगदान के प्रति जागरुक किया जाता है। ऑर्गन दान करना किसी जरुरतमंद मरीज को नया जीवन देने का खास जारिया है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, भारत में हजारों मरीज गंभीर अंग विफलता के चलते प्रत्यारोपण का इंतजार करते हैं। गौरतलब है कि एक व्यक्ति के मृत्यु के बाद दान किए गए अंग कई लोगों की जिंदगी बचाने में मदद करता है। ऐसे में आपके मन में भी सवाल आते होंगे कि आखिर इंसान अपने शरीर के कौन-कौन से अंग दान कर सकता है? आइए आपको इस लेख में पूरी जानकारी बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>शरीर के कौन-कौन से अंग दान किए जा सकते हैं?</b></div><div><b style="font-size: 1rem;">किडनी:</b><span style="font-size: 1rem;"> मृतक दाता अपनी दोनों किडनी को दान कर सकता है। जीवित व्यक्ति भी चिकित्सकीय और कानूनी नियमों के जरिए एक किडनी दान कर सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>लिवर: </b>मृत व्यक्ति लिवर का दान कर सकता है। जीवित व्यक्ति भी लिवर का एक हिस्सा दान कर सकते हैं, क्योंकि लिवर के हिस्से समय के साथ पुन:विकसित हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>हृदय: </b>मृतक हृदय का प्रत्यारोपण गंभीर हार्ट रोग से जूझ रहे मरीजों के लिए किया जा सकता है। इसके लिए डोनेट करने वाले व्यक्ति की मेडिकल स्थिति और अंग की उपयुक्तता बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है।</div><div><br></div><div><b>फेफड़े:</b> असल में मृतक दाता दोनों फेफड़ों का दान कर सकता है। वहीं, जीवित दाता सिर्फ एक फेफड़े का दान कर सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>अग्नयाशय:&nbsp;</b><span style="font-size: 1rem;">अग्नयाशय एक मुख्य अंगों में से एक है, जिसे दान किया जाता है। जीवित दाता से इसके एक हिस्से का दान भी कुछ स्थितियों में संभव माना जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>आंत:</b> आपको बता दें कि, छोटी आंत/आंत भी प्रत्यारोपण के लिए दान किए जाने वाले अंगों में शामिल है।</div><div><br></div><div><b>अंगों के अलावा इन ऊतकों का भी हो सकता है दान</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इसके अलावा, इन चीजों का दान भी किया जा सकता है। जैसे कि कॉर्निया, त्वचा, हड्डियां, हार्ट वाल्व, रक्त वाहिकाएं, नसें और टेंडन जैसे ऊतकों का भी दान किया जा सकता है। आपको बता दें कि, कॉर्निया का ट्रांसप्लांट दृष्टि बहाल करने में मदद कर सकता है, जबकि त्वचा का इस्तेमाल गंभीर जलने और घावों के उपचार में किया जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>&nbsp;जीवित रहते कौन से अंग दान किए जा सकते हैं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वैसे जीवित व्यक्ति सभी ऑर्गन डोनेट नहीं कर सकता है। राष्ट्रीय अंग और ऊतक प्रत्यारोपण संगठन के अनुसार, मेडिकल परिस्थितियों में जीवत दाता एक किडनी, लिवर का एक हिस्सा और अग्न्याशय का हिस्सा दान कर सकता है। वहीं, कुछ खास परिस्थिति में फेफड़े के एक हिस्से या छोटी आंत के हिस्से का दान भी संभव हो सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>हर व्यक्ति अंग दान के लिए योग्य है</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हालांकि, यह जरुरी नहीं है कि हर व्यक्ति अंग दान कर सकता है। असल में अंगदान के लिए उम्र से ज्यादा महत्वपूर्ण दाता की मेडिकल स्थिति और आंगों की उपयुक्तता होती है। डॉक्टर मृत्यु के समय जांच करके तय करते हैं कि कौन-सा अंग या ऊतक प्रत्यारोपण के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 18:00:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/world-organ-donation-on-13-august-guide-list-of-organs-and-tissues-to-donate</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/12/world-organ-donation_large_1802_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: Digital Age में ब्रेन स्ट्रोक का नया लक्षण 'Dystextia', मोबाइल पर गलत मैसेज भेजना हो सकता है Stroke का संकेत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/dystextia-symptom-of-brain-stroke-sending-incorrect-text-on-mobile-phone-sign-of-stroke]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया भर में मृत्यु और विकलांगता के प्रमुख कारणों में स्ट्रोक वजह है। हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो स्ट्रोक के इलाज में हर एक मिनट कीमती होता है। जितना जल्दी मरीज को हॉस्पिटल ले जाया जाए, उतना ज्यादा रिकवरी की संभावना होता है। डॉक्टरों ने आज स्मार्टफोन के दौर में एक नया शुरुआती संकेत पहचाना है, जिसको डिस्टेक्स्टिया कहा जाता है। इसमें व्यक्ति फोन पर सही शब्द नहीं टाइप कर पाता, उसके वाक्य अर्थहीन हो जाते हैं या फिर लिखने में काफी गलतियां होने लगती हैं। कई मामलों में यह स्ट्रोक का पहला दिखने वाला संकेत मिला है।</div><div><br></div><h2>जानें क्या है डिस्टेक्स्टिया</h2><div>यह कोई बीमारी नहीं बल्कि डिजिटल माध्यम पर लिखने की क्षमता में अचानक से आने वाले बदलाव या गड़बड़ी को दिखाता है। यह Dysgraphia और Aphasia जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षणों का आधुनिक रूप है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/unknowingly-consuming-too-much-protein-harmful-to-body-check-these-signs-to-avoid-side-effects" target="_blank">Health Tips: अनजाने में ज्यादा प्रोटीन लेना शरीर के लिए नुकसानदेह, Side Effects से बचने के लिए चेक करें ये 5 संकेत</a></h3><div><br></div><div>हेल्थ एक्सपर्ट के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति सामान्य रूप से टाइप करता है, लेकिन अचानक से उसके मैसेज में गड़बड़ी दिखने लगे, शब्दों का क्रम बिगड़ जाए, सामान्य शब्द भी न याद आएं, अर्थहीन वाक्य बनने लगे और सही शब्द न टाइप कर पाएं। तो यह दिमाग में भाषा कंट्रोल करने वाले हिस्से के प्रभावित होने का संकेत हो सकता है।</div><div><br></div><h2>डिस्टेक्स्टिया और स्ट्रोक का संबंध</h2><div>स्ट्रोक तब होता है, जब दिमाग के किसी हिस्से में ब्लड सर्कुलेशन रुक जाता है। या फिर रक्त वाहिका फट जाती है। अगर यह हिस्सा भाषा या फिर लिखने की क्षमता को कंट्रोल करने वाले क्षेत्र को प्रभावित करता है, तो व्यक्ति को पढ़ने, बोलने या लिखने में परेशानी महसूस होती है।</div><div><br></div><div>आज के समय में लोग मोबाइल पर टाइप करके बातचीत करते हैं। इसलिए कई बार सबसे पहला बदलाव फोन पर भेजे गए मैसेज पर दिखता है। कुछ केस में मरीज हॉस्पिटल पहुंचने से पहले फैमिली में किसी को ऐसे मैसेज भेजे, जिसमें व्याकरण और अर्थ दोनों ही पूरी तरह से असामान्य हो, तो जांच में उनको स्ट्रोक की पुष्टि हो सकती है।</div><div><br></div><h2>फोन पर टाइप करते समय कौन-से संकेत न करें नजरअंदाज</h2><div>व्यक्ति जानने वाले शब्दों को भी बार-बार गलत लिखता हो।</div><div>मैसेज पढ़ने पर शब्द होते हैं, लेकिन इस मैसेज का कोई सही अर्थ न निकले।</div><div>अगर बिना किसी तकनीकी वजह के टाइपिंग में परेशानी होने लगे।</div><div><br></div><h2>क्यों मानते हैं डिस्टेक्स्टिया को स्ट्रोक का शुरुआती चेतावनी संकेत</h2><div>डिस्टेक्स्टिया इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि आज भी ज्यादातर लोग फोन पर लगातार मैसेज करते हैं। ऐसे में लिखने की क्षमता में अचानक बदलाव सबसे पहले डिजिटल बातचीत में नजर आ सकता है।</div><div><br></div><div>सिर्फ टाइपिंग में गलती होना ही स्ट्रोक का प्रमाण नहीं है। जल्दबाजी, ध्यान भटकना, या ऑटो करेक्ट से भी गलतियां हो सकती हैं। लेकिन अगर व्यक्ति पहले सामान्य रूप से टाइप करता था, लेकिन अगर अचानक से असामान्य मैसेज आने लगे, तो इसको गंभीरता से लेना चाहिए।</div><div><br></div><h2>स्ट्रोक के शुरुआती संकेत</h2><div>एक हाथ या एक पैर में कमजोरी</div><div>चेहरा के एक तरफ का हिस्सा लटक जाना</div><div>बोलने में परेशानी होना</div><div>अचानक से धुंधला दिखना</div><div>तेज सिरदर्द</div><div>संतुलन बिगड़ना</div><div>भ्रम या समझने में परेशानी</div><div><br></div><div>आधुनिक डिजिटल युग में स्ट्रोक एक शुरूआती संकेत माना जाता है। हालांकि यह कोई अलग बीमारी नहीं बल्कि दिमाग के भाषा और लेखन से जुड़े हिस्सों में आई समस्या का संकेत हो सकता है। हालांकि सिर्फ टाइपिंग में हुई एक-दो गलतियों से घबराने की जरूरत नहीं है। लेकिन अगर आपको लगातार बोलने में परेशानी, लगातार असामान्य मैसेज, चेहरे का टेढ़ा दिखना, हाथ-पैरों में कमजोरी जैसे लक्षण दिखते हैं, तो इसको मेडिकल इमरजेंसी मानना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 16:43:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/dystextia-symptom-of-brain-stroke-sending-incorrect-text-on-mobile-phone-sign-of-stroke</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/12/health-tips_large_1644_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Weight Loss Diet Plan: खराब Lifestyle से बढ़ा वजन? फॉलो करें यह 7 दिन का Healthy Dinner रूटीन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/7-day-weight-loss-dinner-plan-an-analytical-guide]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भागदौड़ भारी जिंदगी में किसी के पास भी फिटनेस के लिए समय नहीं है। खराब जीवनशैली और अनहेल्दी फूड्स आदतों के कारण वजन बढ़ने की समस्या शुरु हो जाती है। कई बार वजन बढ़ने से बीमारियों की समस्या भी बढ़ जाती है, जैसे- टाइप 2 डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटैक और स्ट्रोक, फैटी लिवर।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">आजकल कई लोग वजन कम करने के लिए जिम जरुर जाते हैं और स्ट्रिक्ट डाइट फॉलो करते हैं। आपको बताते चलें कि वेट लॉस के लिए एक्सरसाइज के साथ-साथ बड़ा रोल खाने की चीजों का भी है। आइए आपको बताते हैं एक्सरसाइज के साथ-साथ वेट लॉस के लिए हेल्दी डिनर प्लान।</span></div><div><br></div><div><b>वेट लाॅस के ल‍िए पूरे हफ्ते का ड‍िनर प्‍लान</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यदि आप रात के समय तला-भुना खाएंगी, तो वजन कम करना मुश्किल है। गौरतलब है कि आप भी डाइटिंग के नाम पर सादा खाना खाकर बोर हो गई होंगी। इस आर्टिकल में हम आपको पूरे 7 दिन का सिंपल, टेस्टी और प्रोटीन भरपूर डिनर का प्लान बताएंगे। इसको फॉलो करके ही आप चर्बी कम हो जाएगी।</span></div><div><br></div><div><b>सोमवार को रात में क्‍या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">हफ्ते की शुरुआत आप बैलेंस मील से करें। रात के खाने में दाल-चावल, पनीर स्टफ्ड बेसन चीला या फिर मिक्स वेज दालिया और सौते पनीर अपनी थाली में एड कर सकते हैं। यह डाइट आपकी प्रोटीन से भरपूर है। इससे आपका पेट भी हल्का रहने वाला है और खाना आसानी से डाइजेस्ट रह सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>मंगलवार को रात में क्या सेवन करें?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मंगलवार को आप अपनी डाइट में टेस्टी और हेल्दी चीजें शामिल कर सकते हैं। रात के खाने में एक या दो ओट्स की रोटी, हरी-भरी पालक पनीर और एक कटोरी सलाद लें। अपनी सलाद में खीरा, टमाटर और प्याज ले सकती हैं। ओट्स और पालक का कॉम्बिनेशन डाइजेशन को सही रखा जा सकता है और फैट बर्न करने में भी सहायक है।</span></div><div><br></div><div><b>बुधवार की रात को क्या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस दिन आप कुछ हल्का और झटपट बनाने के लिए आप मिक्स वेजिटेबल राइस बना सकते हैं। इसमें आप गाजर, ब्रोकली, बीन्स या जो भी आपकी मनपसंद हरी सब्जी है, उसे ही मिलाकर मिक्स वेज राइस तैयार कर सकते हैं। वैसे यह डाइजेस्ट करने के लिए काफी आसान है और रात में पेट में हल्का ही महसूस होगा।</span></div><div><br></div><div><b>गुरुवार को रात को क्या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">गुरुवार रात को आप स्टीम्ड मूंग और हेल्दी सूप को अपनी डाइट का हिस्सा बना सकती हैं। इसके साथ ही ओट्स की रोटी, ताजा सलाद और ड्रमस्टिक (सहजन) का सूप जरुर पिएं। क्योंकि इस सूप में प्रोटीन और कोलेजन दोनों भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। जो कि वजन कम करने और स्किन के लिए फायदेमंद हो सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>शुक्रवार को रात में क्या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">अक्सर वीकेंड के दौरान लोग बाहर का खाना को पसंद करते हैं। ऐसा करने से आपका वजन कम होने के बजाय बढ़ सकता है। इसलिए बाहर के खान को छोड़कर आप घर पर ही उबला हुआ मिलेट्स, कॉर्न पालक की सब्जी, उबला हुआ चुकंदर और एक कटोरी फ्रेश दही जरुर खाएं। दही खाने से एनर्जी मिलेगी और आपका फैट बर्न होगा।</span></div><div><br></div><div><b>शनिवार को रात में क्या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">वीकेंड पर कुछ चटपटा खाने का मन करें, तो आप एक स्वादिष्ट और हेल्दी रैप ट्राई कर सकते हैं। इसके लिए आप सोयाबीन की कीमे से भरा सोया रैप और साथ में तीखी हरी चटनी खाएं। वैसे सोयाबीन प्रोटीन का बढ़िया सोर्स है, जो मसल्स को मजबूत बनाता है और फैट कम करने में भी मदद करता है।</span></div><div><br></div><div><b>रविवार को रात में क्या खाएं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस दिन आप अपने डिनर को थोड़ा फैंसी और सुपर हेल्दी बनाए। आप एक थाली में सब्जियों, भुने हुए पनीर और क्विनोआ की फिलिंग के साथ बना क्विनोआ पनीर रैप जरुर खाएं। आपको बता दें कि, यह लो-कौलोरी और हाई-प्रोटीन डाइट है, जो हफ्ते के आखिरी दिन आपके लिए वजन घटाने के गोल को पूरा करेगा।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 14:56:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/7-day-weight-loss-dinner-plan-an-analytical-guide</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/11/weight-loss-diet-plan_large_1458_157.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: अनजाने में ज्यादा प्रोटीन लेना शरीर के लिए नुकसानदेह, Side Effects से बचने के लिए चेक करें ये 5 संकेत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/unknowingly-consuming-too-much-protein-harmful-to-body-check-these-signs-to-avoid-side-effects]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले कुछ सालों में हाई-प्रोटीन डाइट का ट्रेंड काफी तेजी से बढ़ा है। वेट कम करे, फिट रहने और मसल्स गेन करने के लिए लोग अपनी डाइट में प्रोटीन की मात्रा को बढ़ा रहे हैं। दालें, अंडे, प्रोटीन शेक, चिकन और सप्लीमेंट का ज्यादा मात्रा में सेवन करने कुछ लोगों के लिए आम हो गया है। हालांकि हमारे शरीर के लिए प्रोटीन एक जरूरी पोषक तत्व है। </div><div>&nbsp;</div><div>लेकिन जरूरत से ज्यादा प्रोटीन का सेवन शरीर में कई समस्याओं को बढ़ा सकता है। जिस कारण कब्ज, थकान और सुस्ती आदि परेशानियां शामिल हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि ज्यादा प्रोटीन लेने से शरीर क्या संकेत दे सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/experience-tingling-sensation-radiating-from-lower-back-to-legs-know-symptoms-and-treatment" target="_blank">Health Tips: क्या आपकी कमर से पैरों तक होती है झनझनाहट? जानें Nerve Compression के लक्षण और इलाज</a></h3><div><br></div><h2>जानिए ज्यादा प्रोटीन लेने के संकेत</h2><div>हेल्थ एक्सपर्ट की मानें, तो ज्यादा मात्रा में प्रोटीन लेने पर सेहत संबंधी कई समस्याएं हो सकती हैं। क्योंकि किसी भी चीज को बहुत ज्यादा या कम मात्रा में लेना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है।</div><div><br></div><h2>बार-बार पेशाब जाना</h2><div>अगर आपको नॉर्मल से ज्यादा पेशाब जाना पड़ता है। तो यह भी ज्यादा प्रोटीन लेने का संकेत हो सकता है। जब शरीर प्रोटीन को पचाता है, तो नाइट्रोजन वाले टॉक्सिक पदार्थ बनते हैं। जिनमें किडनी पेशाब के जरिए बाहर निकलती है। अधिक मात्रा में प्रोटीन लेने से किडनी को ज्यादा काम करना पड़ सकता है। जिससे पेशाब की मात्रा बढ़ सकती है।</div><div><br></div><div>वहीं अगर ज्यादा प्यास लगने की समस्या होती है, तो यह शरीर में पानी की कमी का संकेत हो सकता है। इसलिए हाई प्रोटीन डाइट लेने वालों के लिए पर्याप्त मात्रा में पानी पीना जरूरी है। हाई प्रोटीन डाइट से पेशाब में यूरिया की सांद्रता बढ़ जाती है। जोकि मूत्राशय की परत पर दबाव डालती है। इससे बॉडी में CRP जैसे मार्कर बढ़ते हैं। वहीं इससे मूत्राशय में सूजन की समस्या हो सकती है।</div><div><br></div><h2>हर समय सुस्ती लगना</h2><div>हमारे शरीर के लिए प्रोटीन एक जरूरी पोषक तत्व है। लेकिन जरूरत से ज्यादा प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट बहुत कम लेते हैं। तो शरीर में एनर्जी की कमी हो सकती है। कार्बोहाइड्रेट फूड्स आपके शरीर को एनर्जी देता है। ऐसे में ज्यादा प्रोटीन ज्यादा लेने से शरीर में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा कम हो जाती है। जिससे लोगों में सुस्ती, थकान और काम में मन न लगने जैसी समस्या महसूस हो सकती है। अगर आप हाई प्रोटीन डाइट शुरू करने के बाद भी लगातार सुस्ती महसूस करते हैं, तो आपको अपनी डाइट का संतुलन चेक करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>कब्ज की समस्या</h2><div>हाई-प्रोटीन डाइट में फाइबर की मात्रा कम हो जाती है। खासकर जब लोग साबुत अनाज, दालों, फल और सब्जियों की जगह सिर्फ एनिमल बेस्ड प्रोटीन पर अधिक निर्भर होते हैं। तो फाइबर की कमी से पाचन तंत्र प्रभावित हो सकता है। जिस कारण ब्लोटिंग, कब्ज और मल त्याग करने में मुश्किलें जैसी समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में अगर आपकी डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ गई है, तो इसके साथ पर्याप्त मात्रा में फाइबर का सेवन और पर्याप्त पानी पीना जरूरी है।</div><div><br></div><h2>वेट बढ़ना</h2><div>अक्सर लोगों को लगता है कि अधिक मात्रा में प्रोटीन खाने से सिर्फ वेट कम होगा, ऐसा नहीं होता है। अगर आप शरीर की जरूरत के हिसाब से ज्यादा कैलोरी ले रहे हैं। फिर चाहे वह प्रोटीन से ही क्यों न आए, तो अधिक एनर्जी शरीर में फैट के रूप में जमा हो सकता है। इसके अलावा प्रोटीन बार, सप्लीमेंट्स और शेक में अधिक चीनी और कैलोरी भी होती है। जोकि वेट गेन की वजह बन सकती है। इसलिए सिर्फ हाई-प्रोटीन के लेबल वाले प्रोडक्ट्स को अपनी डाइट में शामिल करने से बचना चाहिए। बल्कि इन प्रोडक्ट में कैलोरी भी चेक करें। मध्यम उम्र और बुजुर्गों के लंबे समय तक ज्यादा प्रोटीन खाने से वेट गेन का जोखिम बढ़ जाता है।</div><div><br></div><h2>हर समय थकान लगना</h2><div>अगर पर्याप्त नींद लेने के बाद भी आपको लगातार थकान की समस्या हो सकती है। इसका कारण असंतुलित डाइट हो सकती है। अधिक प्रोटीन और कम कार्बोहाइड्रेटेड वाली डाइट लेने से शरीर की एनर्जी पर असर पड़ता है। वहीं लंबे समय तक डिहाइड्रेशन की वजह से भी थकान लग सकती है। लेकिन लगातार थकान के पीछे एनीमिया, थायराइड की समस्या, विटामिन की कमी या अन्य सेहत संबंधी कारण हो सकते हैं। इसलिए यह लक्षण लंबे समय तक बना रहता है, तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।</div><div><br></div><h2>कितनी प्रोटीन की जरूरत</h2><div>हेल्थ एक्सपर्ट ने बताया कि प्रोटीन की जरूरत हर व्यक्ति के शरीर के अलग-अलग होती है। यह उम्र, वजन, फिजिकल एक्टिविटी और सेहत पर निर्भर करती है। इसलिए जो लोग नियमित रूप से एक्सरसाइज करते हैं या फिर एथलीट हैं। उनको नॉर्मल लोगों की तुलना में अधिक प्रोटीन की जरूरत हो सकती है। वहीं किडनी से जुड़ी कुछ बीमारियों परेशान लोगों को डॉक्टर की सलाह के मुताबिक प्रोटीन की मात्रा का ध्यान रखना चाहिए। वहीं संतुलित मात्रा में प्रोटीन लेना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 12:45:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/unknowingly-consuming-too-much-protein-harmful-to-body-check-these-signs-to-avoid-side-effects</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/11/health-tips_large_1246_148.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Health Tips: क्या आपकी कमर से पैरों तक होती है झनझनाहट? जानें Nerve Compression के लक्षण और इलाज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/health/experience-tingling-sensation-radiating-from-lower-back-to-legs-know-symptoms-and-treatment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कई बार लोगों को चलने-फिरने या फिर बैठने के दौरान तेज दर्द महसूस होता है। यह दर्द पीठ से होता हुआ पैरों तक जाता है। इसमें व्यक्ति को तेज झनझनाहट महसूस हो सकती है। लेकिन इससे रोजमर्रा के काम भी प्रभावित हो सकते हैं। अधिकतर मामलों में इसको मांसपेशियों में होने वाला खिंचाव मानकर नजरअंदाज कर दिया जाता है। वहीं एक्सपर्ट की मानें, तो यह दर्द किसी नस के दबने का संकेत हो सकता है।</div><div><br></div><div>अगर व्यक्ति समय रहते इसका इलाज शुरूकर दे, तो होने वाले दर्द से काफी हद तक राहत पाया जा सकता है। अधिकतर मामलों में यह स्थिति तब बनती है, जब रीढ़ की हड्डी के आसपास मौजूद हड्डी, डिस्क या अन्य टिशू किसी नस पर दबाव डालते हैं। जिस कारण यह दर्द होता है और व्यक्ति की परेशानी ज्यादा बढ़ जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/health/understanding-masked-hypertension-the-silent-office-killer" target="_blank">क्या आपको भी ऑफिस पहुंचते ही गुस्सा आने लगता है? सावधान! Masked Hypertension और Mental Stress बिगाड़ सकता है आपकी सेहत</a></h3><div><br></div><h2>पीठ से पैरों तक होने वाला तेज दर्द नस दबने का संकेत</h2><div>कमर दर्द आज के समय में सबसे आम स्वास्थ्य समस्याओं में से एक है। हालांकि हर कमर दर्द गंभीर नहीं होता। क्लीवलैंड क्लीनिक के अनुसार यदि दर्द कमर से शुरू होकर कूल्हे, जांघ, पिंडली और पैर तक फैलने लगे, साथ में झनझनाहट, सुन्नपन या कमजोरी महसूस हो तो यह नस दबने (Nerve Compression) या साइटिका का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसी स्थिति में जल्द जांच कराना जरूरी है, क्योंकि लंबे समय तक नस पर दबाव बने रहने से उसकी कार्यक्षमता प्रभावित हो सकती है।</div><div><br></div><h2>जानें क्या होता है नस दबना</h2><div>नस दबना एक ऐसी स्थिति है, जिसमें शरीर की किसी नस पर आसपास की डिस्क, हड्डी, लिगामेंट या मांसपेशियों में एक्स्ट्रा दबाव डालने लगती है। रीढ़ की हड्डी में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है। जब नस पर दबाव बढ़ता है, तो यह सामान्य तरीके से दिमाग और शरीर के बीच तक संदेश नहीं पहुंचा पाती है। जिसका परिणाम झनझनाहट, दर्द, सुन्नपन, कमजोरी और कई बार चलने में परेशानी होती है। अगर लंबे समय तक दबाव बना रहता है, तो नस को स्थायी नुकसान पहुंच सकता है।</div><div><br></div><h2>नस के और मांसपेशियों के दर्द में अंतर</h2><div>नस का दर्द कमर से लेकर पैर तक फैलता है, तो वहीं मांसपेशियों का दर्द सिर्फ एक हिस्से तक सीमित रहता है।</div><div><br></div><div>नस का दर्द होने पर बिजली सी झनझनाहट होती है। वहीं मांसपेशियों का दर्द दबाने पर बढ़ता है।</div><div><br></div><div>नस का दर्द होने पर सुन्नपन हो सकता है। लेकिन मांसपेशियों के दर्द में सुन्नपन या झनझनाहट नहीं होती है।</div><div><br></div><div>नस के दर्द में जलन महसूस हो सकती है। मांसपेशियों के दर्द जलन महसूस नहीं होती है।</div><div><br></div><div>नस के दर्द में पैरों में कमजोरी होती है। मांसपेशियों के दर्द में कमजोरी कम होती है।</div><div><br></div><div>नस का दर्द होता है, तो आराम करने के बाद भी यह दर्द कम नहीं होता है। लेकिन मांसपेशियों का दर्द आराम के बाद ठीक होने लगता है।</div><div><br></div><h2>नस दबने की सामान्य वजह</h2><div><br></div><h2>स्लिप डिस्क</h2><div>रीढ़ की डिस्क बाहर निकलकर नस पर दबाव डाल सकती है। इसको नस दबने की सबसे सामान्य वजह माना जाता है।</div><div><br></div><h2>साइटिका</h2><div>साइटिका नर्व हमारे शरीर की सबसे लंबी नस होती है। इसके दबने पर दर्द कमर से लेकर पैर तक फैलता है। सामान्य रूप से यह दर्द कमर से पैरों तक जाता है।</div><div><br></div><h2>स्पाइनल स्टेनोसिस</h2><div>बता दें कि उम्र बढ़ने के साथ ही रीढ़ की नलिका संकरी होने लगती है। इससे नसों पर दबाव बढ़ सकता है, जिसकी वजह से पैरों में भारीपन, कमजोरी और दर्द महसूस हो सकती है।</div><div><br></div><h2>बोन स्पर</h2><div>हड्डी का उभार भी सीधे तौर पर तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचा सकता है। वहीं रीढ़ की हड्डी या फिर जोड़ों के पास एक्स्ट्रा हड्डी बढ़ती है, तो यह आसपास की तंत्रिकाओं और रीढ़ की हड्डी को दबा सकती है। यह उन पर दबाव डाल सकती है या फिर उनको रगड़ सकती है।</div><div><br></div><h2>चोट या दुर्घटना</h2><div>गिरने या शारीरिक चोट लगने से नसों पर दबाव आसानी से दबाव पड़ सकता है। किसी भी तरह की दुर्घटना नसों को खींच सकती है, कुचल सकती हैं या दबा सकती है, सूजे हुए टिशू और आसपास की हड्डियों को उन पर दबाव डालने की वजह बन सकती है।</div><div><br></div><h2>डॉक्टर कैसे करते हैं नस दबने की पहचान</h2><div>सबसे पहले डॉक्टर मरीजों के लक्षण और मेडिकल हिस्ट्री के बारे में जानकारी लेते हैं। फिर शारीरिक और न्यूरोजलॉजिकल जांच की जाती है। वहीं जरूरत होने पर रीढ़ की डिस्क की MRI, सीटी स्कैन, इलैक्ट्रोमायोग्रॉफी और एक्स-रे किया जाता है।</div><div><br></div><div>कमर से पैरों तक फैलने वाला तेज, बिजली जैसा या चुभने वाला दर्द सामान्य कमर दर्द नहीं हो सकता है। अगर इसके साथ सुन्नपन, झनझनाहट, कमजोरी या चलने में परेशानी हो रही है, तो यह भी नस दबने का संकेत हो सकता है। अगर समय रहते सही जांच और इलाज कराने से ज्यादातर मरीज बिना किसी स्थायी नुकसान के स्वस्थ हो सकते हैं। इसलिए ऐसे लक्षणों को नजरअंदाज करने के जगह जल्द से जल्द न्यूरोलॉजिस्ट, ऑर्थोपेडिक विशेषज्ञ या स्पाइन एक्सपर्ट से सलाह लेना बेहतर होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 09:54:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/health/experience-tingling-sensation-radiating-from-lower-back-to-legs-know-symptoms-and-treatment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/10/health-tips_large_0955_148.webp" />
    </item>
  </channel>
</rss>