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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Nayyi Navelli Movie Review: फैमिली ड्रामा में तो है दम, लेकिन अलौकिक उलझनों ने बिगाड़ा खेल, अनुराग ठाकुर ने चुराई महफिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/nayyi-navelli-movie-review-horror-comedy-falls-flat-despite-strong-family-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>झगड़ों से भरा एक परिवार, एक नई दुल्हन और एक देवर जिसे शक है कि कुछ तो गड़बड़ है। 'नयी नवेली' में एक मजेदार हॉरर-कॉमेडी बनने के सारे गुण हैं। बालाजी मोहन के निर्देशन में बनी यह फिल्म एक मनोरंजक मोड़ से शुरू होती है, जिसमें भरपूर फैमिली ड्रामा और अजीबोगरीब स्थितियां हैं जो कहानी को आगे बढ़ाती हैं। सवाल यह है कि क्या यह फिल्म अपना यह आकर्षण बनाए रख पाती है?<br><br><strong>स्टार रेटिंग: 2 / 5 स्टार (2/5 Stars)</strong><br><strong>निर्देशक: बालाजी मोहन</strong><br><strong>मुख्य कलाकार: यामी गौतम धर, अनुराग ठाकुर, आदिनाथ एम. कोठारे, सुनीता राजवार, मीता वशिष्ठ</strong><br><strong>हाइलाइट: अनुराग ठाकुर की शानदार कॉमिक टाइमिंग और शुरुआती फैमिली ड्रामा फिल्म की मुख्य ताकत है।</strong><br><strong>कमजोरी: कमजोर पटकथा, अतार्किक पौराणिक पहलू और AI से बने औसत दर्जे के विजुअल इफेक्ट्स।</strong></p><p><strong>नयी नवेली: कहानी और लेखन</strong><br>यामी गौतम धर ने मोहिनी का किरदार निभाया है, जो नई-नई शादी के बाद मेरठ में अपने नए घर में आती है। उसके देवर, बंटू (अनुराग ठाकुर) को पक्का यकीन है कि मोहिनी वैसी नहीं है जैसी वह दिखती है। फिल्म की शुरुआत में ज्यादातर कॉमेडी इसी शक और इस अजीब स्थिति पर परिवार की प्रतिक्रियाओं से आती है। फिल्म के इन्हीं हिस्सों में सबसे ज्यादा सहजता महसूस होती है। घर-परिवार की नोक-झोंक और गलतफहमियां जानी-पहचानी लगती हैं, और कॉमेडी तब सबसे अच्छी लगती है जब किरदार आपस में उलझते हैं।</p><p>इन दृश्यों में अनुराग ठाकुर का काम वाकई शानदार है। उन्होंने बंटू के किरदार में एक स्वाभाविक कॉमिक टाइमिंग दिखाई है, जिससे साधारण बातचीत भी मजेदार बन जाती है। असल में, जब जोक्स उतने असरदार नहीं होते, तब भी अनुराग ठाकुर ही पूरी कहानी को संभाल लेते हैं। फिल्म उनके किरदार के साथ और भी बहुत कुछ कर सकती थी, लेकिन जितना भी उन्हें मिला, उसमें उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है।</p><p>कहानी तब थोड़ी फीकी पड़ने लगती है जब इसमें 'काल शील' नाम के एक पत्थर का जिक्र आता है, जो रामायण और रावण की पौराणिक कथाओं से जुड़ा है। फिल्म धीरे-धीरे अपना ध्यान अलौकिक (supernatural) संघर्ष की ओर ले जाती है, और वह फैमिली ड्रामा, जिसने शुरुआत में फिल्म को मनोरंजक बनाया था, पीछे छूट जाता है। दुर्भाग्य से, कहानी का यह नया मोड़ उतना दिलचस्प नहीं है।</p><p><strong>नयी नवेली: लेखन और निर्देशन</strong><br>पौराणिक कथाओं को कॉमेडी के साथ मिलाना कोई बुरा विचार नहीं है, लेकिन यहां ये दोनों चीजें कभी ठीक से जुड़ नहीं पातीं। जैसे ही पारिवारिक दृश्यों में एक लय (rhythm) बनने लगती है, फिल्म किसी और दिशा में मुड़ जाती है। नतीजा यह होता है कि कहानी में कुछ अच्छे पल तो आते हैं, लेकिन वे अपना पूरा असर छोड़ने में नाकाम रहते हैं। पारिवारिक दृश्यों में एक जानी-पहचानी लय है, जबकि पौराणिक हिस्से ऐसे लगते हैं मानो वे किसी दूसरी फिल्म का हिस्सा हों। कहानी में गहराई जोड़ने के बजाय, ये उसके प्रवाह में रुकावट डालते हैं। नतीजा यह होता है कि फिल्म एक असंतुलित मनोरंजन बनकर रह जाती है, जो बार-बार अपने सबसे मजबूत पहलुओं से दूर होती जाती है।</p><p>इसके अलावा, कहानी के कई ऐसे हिस्से हैं जिन्हें मेकर्स आपस में जोड़ने की कोशिश तो करते हैं, लेकिन वे कभी ठीक से जुड़ नहीं पाते। 'राजा' सड़क के दूसरी तरफ क्यों है, किरदारों की उम्र क्या है, दशहरा से पहले दिवाली कैसे आ गई, और हनुमान वाला हिस्सा—ये सब मिलकर कहानी को कई जगहों पर अतार्किक (illogical) बना देते हैं।</p><p>साथ ही, पौराणिक फिल्मों के साथ एक आम समस्या देखने को मिल रही है। चाहे काजोल की 'माँ' वाला किरदार हो या यामी गौतम की 'नई नवेली', पुरानी कथाओं को दिखाने के लिए AI से बने दृश्यों का इस्तेमाल काफी आलस भरा और बिना किसी रचनात्मकता के लगता है। यह असल फिल्ममेकिंग के बजाय, बस AI को 'प्रॉम्प्ट' (निर्देश) देने जैसा काम लगता है। बालाजी मोहन इन दृश्यों पर बहुत ज्यादा निर्भर रहकर निराश करते हैं, और साथ ही वे पौराणिक तत्वों को अपनी कहानी से जोड़ने में भी नाकाम रहते हैं।</p><p><strong>'नई नवेली': अभिनय</strong><br>गौतम धर के पास काम करने के लिए बहुत कम गुंजाइश थी। कहानी के केंद्र में 'मोहिनी' है, लेकिन इस किरदार को ठीक से समझ पाना मुश्किल है। कई जगहों पर अभिनय एक जैसा ही लगता है; अलग-अलग स्थितियों में भी उनके हाव-भाव एक जैसे ही दिखते हैं। यह पूरी तरह से कलाकार की कमी नहीं है; पटकथा (writing) में ही उन्हें किरदार को विकसित करने का बहुत कम मौका दिया गया है। फिर भी, फिल्म को एक ज्यादा दमदार मुख्य किरदार की जरूरत थी, खासकर तब जब कहानी का बड़ा हिस्सा उसी पर टिका हो।</p><p>'राजा' का किरदार निभाने वाले आदिनाथ एम. कोठारे को भी पटकथा ने निराश किया है। वे भावुक दृश्यों में अपनी काबिलियत साबित करते हैं, लेकिन फिल्म उन्हें पूरी तरह निखरने का मौका नहीं देती। सुनीता राजवार और मीता वशिष्ठ पारिवारिक माहौल में जान डालती हैं, लेकिन बाकी कलाकारों को ऐसा कुछ खास करने को नहीं मिलता जिससे वे कोई गहरी छाप छोड़ सकें। घर में कई किरदार हैं, लेकिन फिल्म उनके आपसी रिश्तों का इस्तेमाल सिर्फ अगली गलतफहमी पैदा करने के लिए करती है, और उससे आगे कुछ खास नहीं दिखाती।</p><p><strong>'नई नवेली': तकनीकी पक्ष</strong><br>तकनीकी पक्ष से भी फिल्म को कोई खास मदद नहीं मिलती। कुछ विज़ुअल इफ़ेक्ट्स बनावटी लगते हैं, और यह तब और भी ज़्यादा खटकता है जब फ़िल्म दर्शकों से एक अलौकिक दुनिया को स्वीकार करने की उम्मीद करती है। कहानी में पूरी तरह से डूबने के बजाय, ये दृश्य आपको बार-बार याद दिलाते हैं कि आप बस एक तैयार किया गया तमाशा देख रहे हैं। गाने भी कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ पाते। न तो वे फ़िल्म के माहौल में कुछ जोड़ते हैं और न ही कोई ऐसा यादगार संगीतमय पल देते हैं जिसे याद रखा जा सके।</p><p>लगभग 2 घंटे 18 मिनट की इस फ़िल्म को थोड़ा और छोटा किया जा सकता था। समस्या सिर्फ़ इसकी लंबाई की नहीं है, बल्कि उन हिस्सों पर बहुत ज़्यादा समय बर्बाद किया गया है, जिनसे कहानी को आगे बढ़ाने में कोई मदद नहीं मिलती। इस फ़ैमिली कॉमेडी में एक कसी हुई फ़िल्म बनने की पूरी क्षमता थी, लेकिन इसकी पटकथा (स्क्रीनप्ले) ही बार-बार इसमें रुकावट बन जाती है।</p><p><br><strong>अंतिम फैसला (Verdict)</strong><br>'नयी नवेली' में एक बेहतरीन हॉरर-कॉमेडी बनने की पूरी क्षमता थी, अगर यह बहुत सारी चीज़ें एक साथ आजमाने के बजाय अपनी मूल कहानी और फैमिली ड्रामा पर टिकी रहती। पहले हाफ में मिलने वाली हंसी और अनुराग ठाकुर के शानदार प्रदर्शन के लिए इस फिल्म को दिए जाते हैं 5 में से 2 स्टार। देखें या न देखें? अगर आप अनुराग ठाकुर की कॉमिक टाइमिंग और हल्के-फुल्के फैमिली ड्रामा के शौकीन हैं तो इसे एक बार देख सकते हैं, लेकिन भारी-भरकम लॉजिक या बेहतरीन हॉरर की उम्मीद न रखें।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 13:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/nayyi-navelli-movie-review-horror-comedy-falls-flat-despite-strong-family-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Prahaar The Untold Story of Ujjwal Nikam Movie Review | प्रोपेगैंडा के दौर में एक ईमानदार और संतुलित सिनेमाई प्रयास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prahaar-the-untold-story-of-ujjwal-nikam-review-an-honest-film-on-kasab-trial]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज के दौर में, जहाँ ऐतिहासिक तथ्यों और वास्तविक घटनाओं का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक नैरेटिव या प्रोपेगैंडा फिल्मों के निर्माण के लिए किया जाने लगा है, ऐसे माहौल में एक निष्पक्ष और ईमानदार फिल्म की पहचान करना ज्यादा मुश्किल नहीं होता। हालांकि, ऐसे दौर में ऐसी फिल्म बनाना निर्देशक के लिए किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। यहीं पर निर्देशक अविनाश अरुण अपनी अलग पहचान बनाते हैं। जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' का ट्रेलर जारी किया था, तब कई लोगों को यह आशंका थी कि यह फिल्म भी हालिया दौर की कुछ खास राजनीतिक फिल्मों के ढर्रे पर चलेगी। लेकिन फिल्म देखकर यह धारणा पूरी तरह गलत साबित होती है।</p><p><strong>प्रोपेगैंडा के जाल से बचाव और संवेदनशील निर्देशन</strong><br>यह फिल्म भारत के सबसे चर्चित और मशहूर विशेष सरकारी वकील उज्ज्वल निकम के जीवन और 26/11 मुंबई आतंकी हमले के दोषी पाकिस्तानी आतंकवादी मोहम्मद अजमल आमिर कसाब के ऐतिहासिक मुकदमे पर आधारित है।</p><p><strong>संतुलित दृष्टिकोण:</strong> 26/11 का हमला एक दर्दनाक राष्ट्रीय त्रासदी था। फिल्म में कसाब और उसके सहयोगियों द्वारा 189 बेगुनाह लोगों की हत्या के खौफनाक मंजर को दिखाया गया है। लेकिन निर्देशक अविनाश अरुण और निर्माता दिनेश विजान की सबसे बड़ी उपलब्धि यह है कि उन्होंने इस कहानी को धार्मिक या राजनीतिक नफरत का जरिया नहीं बनने दिया।</p><p><strong>अदालती बहस की बारीकियां:</strong> फिल्म में निकम द्वारा कसाब के वकील अब्बास काज़मी (सिकंदर खेर द्वारा निभाया गया किरदार) के साथ तीखी बहस के दौरान 'आतंकवादी वकील' कहने जैसे वास्तविक प्रसंगों को ईमानदारी से जगह दी गई है, जो कोर्टरूम के तनाव और रणनीति को दर्शाते हैं।</p><p><strong>कहानी और कसाब का मुकदमा</strong><br>फिल्म की शुरुआत एक अदालती दृश्य से होती है जहाँ उज्ज्वल निकम (राजकुमार राव) 1993 के मुंबई बम धमाकों के असली मास्टरमाइंड्स-दाऊद इब्राहिम, टाइगर मेमन और पाकिस्तान की ISI- के अब तक कानून की गिरफ्त से बाहर होने पर गुस्सा जताते हैं। इसके तुरंत बाद कहानी 26 नवंबर 2008 के मुंबई हमलों और कसाब के ट्रायल पर केंद्रित हो जाती है।</p><p>फिल्म में निकम की रणनीतियों, पाकिस्तान के आतंकी नेटवर्क के पर्दाफाश, लश्कर-ए-तैयबा की भूमिका और निकम के निजी पारिवारिक जीवन के त्याग को बखूबी पिरोया गया है। पारिवारिक उप-कथानक में निकम और उनके बेटे के बीच के संबंधों की उलझन को दर्शाया गया है। हालांकि, कुछ मौकों पर तत्कालीन केंद्रीय और राज्य मंत्रियों तथा पाकिस्तानी राजनयिकों को निकम द्वारा दी जाने वाली सलाह के दृश्य उनके किरदार को वास्तविक जीवन से थोड़ा ज्यादा बड़ा (larger-than-life) दिखाते हैं।</p><p><strong>दमदार अभिनय: राजकुमार राव, जयदीप अहलावत और ललित प्रभाकर</strong><br>फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसकी स्टारकास्ट का शानदार अभिनय है:</p><p><strong>राजकुमार राव (उज्ज्वल निकम):</strong> 'शाहिद' फिल्म में मानवाधिकार वकील की भूमिका निभा चुके राजकुमार राव ने इस बार एक सख्त, उसूलों के पक्के और तेजतर्रार सरकारी वकील के रूप में बेहद सहज और प्रभावित करने वाला काम किया है।</p><p><strong>जयदीप अहलावत (चौधरी जुल्फिकार): </strong>पाकिस्तान की फेडरल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (FIA) के पब्लिक प्रॉसिक्यूटर के रूप में जयदीप अहलावत और राजकुमार राव के बीच के दृश्य फिल्म के सबसे बेहतरीन पलों में से एक हैं।</p><p><strong>ललित प्रभाकर (अजमल कसाब): </strong>कसाब के जटिल और खूंखार किरदार में ललित प्रभाकर ने जान फूंक दी है। CST पर अंधाधुंध गोलीबारी के क्रूर दृश्यों से लेकर जेल की 'अंडा सेल' में पछतावे के पलों तक, वे पर्दे पर दर्शकों के मन में गुस्सा और नफरत दोनों पैदा करने में सफल रहते हैं।</p><p><strong>ऋत्विक सहोरे (निकम के बेटे): </strong>एक असहज और संघर्षरत बेटे के रूप में ऋत्विक सहोरे ने भी अपनी बेहतरीन अभिनय क्षमता का परिचय दिया है।</p><p><strong>फिल्म में कहाँ रह गई कमी?</strong><br>जहाँ फिल्म छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CST) में हुए नरसंहार की विभीषिका को पूरी क्रूरता के साथ दिखाती है, वहीं एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू छूटता नजर आता है। सहायक उप-निरीक्षक (ASI) तुकाराम ओम्बले के उस अभूतपूर्व और निस्वार्थ बलिदान को फिल्म में पर्याप्त जगह नहीं मिली, जिनकी बदौलत कसाब को जिंदा पकड़ा जा सका था। यदि इस क्षण को 2 मिनट का दृश्य दिया जाता, तो फिल्म और अधिक मुकम्मल होती।</p><p><strong>निष्कर्ष</strong><br>तमाम चुनौतियों के बावजूद, अविनाश अरुण एक बेहद संवेदनशील और राष्ट्रीय स्मृति में दर्ज दुखद घटना पर एक ईमानदार, निष्पक्ष और परिपक्व फिल्म बनाने में सफल रहे हैं। 'प्रहार' न तो बेवजह सनसनी फैलाती है और न ही सांप्रदायिक सौहार्द को नुकसान पहुंचाती है—यह एक कानूनी लड़ाई की सच्ची और कड़वी दास्तान बयां करती है।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 14:04:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prahaar-the-untold-story-of-ujjwal-nikam-review-an-honest-film-on-kasab-trial</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Prahaar Movie Review: 26/11 के बाद की सबसे बड़ी कानूनी जंग, जहाँ बंदूकों से नहीं दलीलों से जीती गई जंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prahaar-movie-review-rajkummar-rao-shines-in-gripping-26-11-courtroom-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कुछ फिल्में अपने जॉनर की सीमाओं को पार कर जाती हैं और दर्शकों को ऐसा अनुभव देती हैं, जो लंबे समय तक याद रहता है। कोर्टरूम ड्रामा भी ऐसा ही जॉनर है, जहां रोमांच सिर्फ अदालत में होने वाली बहसों से नहीं, बल्कि इंसाफ की लड़ाई लड़ने वाले इंसान के संघर्ष से पैदा होता है। ‘प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम’ इसी पहलू को सामने लाती है। यह फिल्म 26/11 के बाद उज्ज्वल निकम के सामने आई कानूनी चुनौतियों के साथ उनकी निजी जिंदगी में मची उथल-पुथल को भी दिखाती है। यही वजह है कि फिल्म का फोकस सिर्फ केस और उसके फैसले पर नहीं, बल्कि उस इंसान पर भी रहता है जिसकी जिंदगी इस लड़ाई के बीच लगातार बदल रही है।</p><p>26/11 के खौफनाक हमले के बाद जब पूरा देश सदमे में था, तब असली लड़ाई अदालत के दरवाजों के पीछे शुरू हुई। यह कहानी है उस ऐतिहासिक कानूनी जंग की, जहाँ एक तरफ खूंखार आतंकी कसाब का केस था, तो दूसरी तरफ पूरे देश को इंसाफ दिलाने की जिम्मेदारी। सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने किस तरह कड़े सबूतों और मजबूत दलीलों के दम पर इस नामुमकिन सी दिखने वाली लड़ाई को लड़ा और आतंक के सबसे बड़े गुनहगार को उसके अंजाम तक पहुँचाया, 'प्रहार' इसी सच्चाई और न्याय के संघर्ष को बेहद आसान और सीधे शब्दों में बयां करती है।</p><p>यह कोर्ट में तब शुरू हुआ एक ऐसा अदालती महा-संग्राम, जिसने पूरे देश की सांसें थाम दीं। 'प्रहार: द अनटोल्ड स्टोरी ऑफ उज्ज्वल निकम' कोई साधारण कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा माइंड-गेम है जहाँ हर एक शब्द मौत और जिंदगी का फैसला तय करता है।</p><p>​इस हाई-वोल्टेज खेल के केंद्र में खड़े हैं राजकुमार राव, जिनकी ठंडी और सधी हुई निगाहें ही कोर्टरूम में ऐसा खौफनाक सन्नाटा पैदा कर देती हैं, जो किसी भी बड़े हंगामे से ज्यादा भारी पड़ता है। उनके सामने जब कठघरे में खड़े चेहरे (ललित प्रभाकर) की बेचैनी और वकील के रूप में सिकंदर व जयदीप अहलावत के पैंतरे आमने-सामने आते हैं, तो स्क्रीन पर तनाव अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाता है।</p><p>​अविनाश अरुण का निर्देशन और दिनेश विजन (मैडॉक फिल्म्स) का विज़न आपको कहानी के इस चक्रव्यूह में ऐसे उलझाता है कि आप हर अगले पल यह अंदाज़ा लगाने को मजबूर हो जाते हैं कि अगली चाल किसकी होगी। कैमरे की खामोशी, दिल की धड़कनें बढ़ा देने वाला बैकग्राउंड स्कोर और रिश्तों के बीच सुलगती अनकही आग के साथ यह फिल्म आपको अंत तक अपनी सीट से हिलने नहीं देगी।</p><p>यह फिल्म सिर्फ इसलिए नहीं देखी जानी चाहिए कि यह 26/11 के हमले के बाद की ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई को दिखाती है, बल्कि इसलिए भी कि यह एक सच्चे नायक के त्याग और संघर्ष को बेहद खूबसूरती से सामने लाती है। राजकुमार राव का बिना किसी एकस्ट्रा ड्रामे का, सहज और रोंगटे खड़े कर देने वाला अभिनय इस कहानी की असली जान है। कोर्टरूम के सस्पेंस के साथ-साथ यह फिल्म एक इंसान की निजी ज़िंदगी और पारिवारिक रिश्तों के उस अनकहे दर्द को भी छूती है, जिसे अक्सर देश सेवा के पीछे अनदेखा कर दिया जाता है। अगर आप बेहतरीन अभिनय, मजबूत कंटेंट और देश को हिला देने वाली असली कहानी पर बनी फिल्में पसंद करते हैं, तो 'प्रहार' एक ऐसा सिनेमाई अनुभव है जिसे आपको बिल्कुल मिस नहीं करना चाहिए।</p><p><strong>डायरेक्टर: </strong>अविनाश अरुण<br><strong>कास्ट: </strong>राजकुमार राव, वामिका गब्बी, ललित प्रभाकर, जयदीप अहलावत, सिकंदर खेर, आशीष विद्यार्थी<br><strong>ड्यूरेशन: </strong>140 मिनट<br><strong>रेटिंग:</strong> 4</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 19:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prahaar-movie-review-rajkummar-rao-shines-in-gripping-26-11-courtroom-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Jailer 2 Review | रजनीकांत का सदाबहार स्वैग और नेल्सन का तीखा ह्यूमर, जानें कैसी है थलाइवर की यह नई फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/jailer-2-movie-review-rajinikanth-returns-as-tiger-in-nelson-dilipkumar-sequel]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>"अलापारा केलापारोम... थलाइवर निरंधारम!" - 'जेलर' के इस सुपरहिट ट्रैक 'हुकुम' की ये पंक्तियां सुपरस्टार रजनीकांत के उस सदाबहार आकर्षण को बयां करती हैं, जो आज भी भारतीय सिनेमा के बड़े पर्दे पर एकछत्र राज कर रहा है। 600 करोड़ रुपये कमाने वाली ब्लॉकबस्टर फिल्म का सीक्वल बनाना निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार के लिए एक बड़ी चुनौती थी। लेकिन क्या 'जेलर 2' पहली फिल्म के जादू, स्वैग और Mass Appeal को दोहरा पाई है? आइए जानते हैं इस विस्तृत समीक्षा में।</p><p><strong>कहानी: वहीं से शुरुआत जहां छूटा था सिरा</strong><br>'जेलर 2' की कहानी ठीक वहीं से आगे बढ़ती है जहां पहली फिल्म खत्म हुई थी। टाइगर मुथुवेल पांडियन (रजनीकांत) और उनका परिवार अपने बेटे अर्जुन की मौत के गम से पूरी तरह उबरा भी नहीं है कि मूर्तियों की तस्करी करने वाला गिरोह उनके जीवन में फिर जहर घोल देता है।</p><p>वर्मन (विनायकान) की मौत का बदला लेने के लिए उसका साथी दिलीप (सूरज वेंजारामूडु) उस शख्स की तलाश में निकलता है जिसने यह हत्या की। यह तलाश उसे पूर्व जेलर 'टाइगर' तक ले आती है। अपने परिवार को बचाने के लिए टाइगर को इस बार एक बेहद खूंखार और बड़े सिंडिकेट का सामना करना पड़ता है, जिसे बोधि कल्पक (एसजे सूर्या), कांता कल्पक (विद्या बालन) और उनके पिता कल्पक (मिथुन चक्रवर्ती) चला रहे हैं।</p><p><strong>निर्देशन और लेखन: 'एब्सर्ड कॉमेडी' और 'मास मोमेंट्स' का संतुलन</strong><br>निर्देशक नेल्सन दिलीपकुमार की सबसे बड़ी ताकत उनकी 'एब्सर्ड कॉमेडी' (अजीबोगरीब हास्य) है, जो इस फिल्म में भी भरपूर है।</p><p>पहला हाफ (First Half): फिल्म की शुरुआत बेहद शांत और संयमित अंदाज में होती है, जहां 'टाइगर' टकराव से बचता है। लेकिन यह धीमापन बाद में आने वाले 'मास मोमेंट्स' (जैसे चाय की दुकान पर गोलीबारी और पुल का सीक्वेंस) के रोमांच को दोगुना कर देता है।</p><p>अनोखे किरदार: क्रूर लेकिन नासमझ गैंगस्टर मूर्ति (नमो नारायणन) और मलयाली तस्कर दिलीप (सूरज वेंजारामूडु) के किरदार कहानी में जबरदस्त कॉमेडी तड़का लगाते हैं।</p><p>दूसरा हाफ और कैमियो (Second Half): इंटरवल का ट्विस्ट शानदार है। हालांकि, दूसरे भाग में कहानी थोड़ी भटकती है और पहली फिल्म की याद दिलाती है। नेल्सन ने पुराने और नए कैमियो को बहुत ही समझदारी से शामिल किया है, हालांकि ऋतिक रोशन की एंट्री का प्रभाव थोड़ा फीका महसूस होता है।</p><p><strong>अभिनय: रजनीकांत की स्क्रीन प्रेजेंस ही फिल्म की जान</strong><br>रजनीकांत: थलाइवर एक बार फिर साबित करते हैं कि उनके जैसा स्वैग किसी के पास नहीं है। एक शांत पारिवारिक इंसान से खतरनाक 'टाइगर' बनने का उनका परिवर्तन बेहद सहज और दमदार है।</p><p>सह-कलाकार: एसजे सूर्या ने विलेन के रूप में बेहतरीन टक्कर दी है। सूरज वेंजारामूडु और नमो नारायणन की जुगलबंदी फिल्म के सबसे मजेदार हिस्सों में से एक है। विद्या बालन छोटे से रोल में भी अपनी छाप छोड़ती हैं, जबकि राम्या कृष्णन और योगी बाबू को सीमित स्पेस मिला है।</p><p><strong>तकनीकी पक्ष और संगीत</strong><br>संगीत: अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) हर सीन में जोश भर देता है। हालांकि, दो गाने रफ्तार वाली इस फिल्म में 'स्पीड ब्रेकर' का काम करते हैं, जिन्हें एडिट किया जा सकता था।</p><p>सिनेमैटोग्राफी व एडिटिंग: विजय कार्तिक कन्नन ने कोयंबटूर और गोवा के दृश्यों को भव्य रूप दिया है। फिल्म का रनटाइम 2 घंटे 45 मिनट है; यदि क्लाइमैक्स और आखिरी 20 मिनट की ट्रिमिंग (Editing) थोड़ी और कसी होती, तो फिल्म और असरदार बनती।</p><p><strong>अंतिम फैसला (Verdict)</strong><br>कमजोर क्लाइमैक्स और कुछ तार्किक कमियों के बावजूद, 'जेलर 2' मुख्य रूप से नेल्सन के अनोखे राइटिंग स्टाइल, वन-लाइनर्स और रजनीकांत के अजेय आकर्षण की वजह से एक पैसा वसूल कमर्शियल एंटरटेनर बनती है। भले ही यह पहली फिल्म जितनी बिल्कुल 'ताज़ा' न लगे, लेकिन थिएटर्स में सीटी बजाने के लिए इसमें भरपूर मसाला है। और हाँ, फिल्म का अंत 'जेलर 3' के लिए दरवाजे खुले छोड़ जाता है!</p><p><strong>फिल्म: जेलर 2 (Jailer 2)</strong></p><p><strong>मुख्य कलाकार: रजनीकांत, एसजे सूर्या, सूरज वेंजारामूडु, विद्या बालन, मिथुन चक्रवर्ती, नमो नारायणन, योगी बाबू, राम्या कृष्णन और ऋतिक रोशन (कैमियो)</strong></p><p><strong>निर्देशक: नेल्सन दिलीपकुमार</strong></p><p><strong>संगीत: अनिरुद्ध रविचंदर</strong></p><p><strong>रेटिंग: 3.5/5 स्टार</strong></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 14:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/jailer-2-movie-review-rajinikanth-returns-as-tiger-in-nelson-dilipkumar-sequel</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Love Series Review | डेटिंग ऐप्स और आधुनिक रिश्तों पर आधारित नई तमिल सीरीज़ 'लव' में क्या है खास और कहां रह गई कमी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/love-tamil-web-series-review-modern-dating-drama-lacks-emotional-depth]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज के डिजिटल युग में जहां डेटिंग ऐप्स ने लोगों के मिलने-जुलने और रिश्ते जोड़ने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है, वहीं रिश्तों की उलझनों को पर्दे पर उतारने के लिए कई वेब सीरीज और फिल्में आ रही हैं। इसी कड़ी में नई तमिल रोमांटिक ड्रामा सीरीज़ 'लव' (Love) रिलीज हुई है, जिसमें साउथ सिनेमा के जाने-माने कलाकार ऐश्वर्या लक्ष्मी (Aishwarya Lekshmi) और अर्जुन दास (Arjun Das) मुख्य भूमिकाओं में नजर आ रहे हैं। यह सीरीज़ 'केमिस्ट्री' (Chemistry) बनाम 'कंपैटिबिलिटी' (Compatibility - आपसी तालमेल) की उस जानी-पहचानी बहस पर आधारित है, जो आज की डेटिंग कल्चर का एक अहम हिस्सा बन चुकी है। हालांकि, मजबूत कलाकारों और बेहतरीन कॉन्सैप्ट के बावजूद यह सीरीज दर्शकों के दिलों पर गहरी छाप छोड़ने में थोड़ी असफल नजर आती है। आइए जानते हैं इस सीरीज़ की खूबियों और कमियों के बारे में:-</p><p><strong>क्या है सीरीज़ की कहानी?</strong><br>सीरीज़ की मुख्य किरदार तारा कृष्णन (ऐश्वर्या लक्ष्मी) एक डेटिंग प्लेटफॉर्म चलाती हैं। उनका पक्का विश्वास है कि लोगों के बीच 'कंपैटिबिलिटी' (विचारों और आदतों का मेल) के जरिए लंबे समय तक टिकने वाले और मजबूत रिश्ते बनाए जा सकते हैं।</p><p>इसके विपरीत, मैथ्यू जेबराज (अर्जुन दास) डेटिंग को लेकर अपनी सहज समझ (Instinct) और भावनाओं पर भरोसा करते हैं। उनका मानना है कि दो लोगों के बीच की 'केमिस्ट्री' को किसी एल्गोरिदम या डेटा में नहीं बांधा जा सकता।</p><p>जब ये दोनों अलग-अलग सोच वाले लोग एक-समान चुनौती के लिए आमने-सामने आते हैं, तो यह प्यार और आधुनिक रिश्तों के बारे में उनकी मान्यताओं की कड़ी परीक्षा लेता है।</p><p><strong>'लव' सीरीज़ की राइटिंग: डेटिंग ऐप्स और आधुनिक रिश्ते</strong><br>डेटिंग-ऐप का माहौल 'लव' को एक आधुनिक बैकड्रॉप देता है, लेकिन सीरीज़ इसका पूरा फ़ायदा नहीं उठाती। डेटिंग के दो अलग-अलग नज़रिए - एक कंपैटिबिलिटी पर आधारित और दूसरा केमिस्ट्री पर - कहानी का मुख्य हिस्सा हैं। फिर भी, सीरीज़ यह नहीं दिखाती कि एल्गोरिदम, ऑनलाइन प्रोफ़ाइल और ऐप-आधारित डेटिंग ने लोगों के करीबी रिश्ते बनाने के तरीके को कैसे बदल दिया है।</p><p>इसके बजाय, टेक्नोलॉजी ज़्यादातर कहानी को आगे बढ़ाने का एक आसान ज़रिया बनकर रह जाती है। यह सीरीज़ के सबसे बड़े छूटे हुए मौकों में से एक है। इस शो को डेटिंग ऐप्स पर लेक्चर जैसा बनाए बिना, मॉडर्न रिश्तों को और गहराई से दिखाने की गुंजाइश थी।</p><p><strong>लव: कास्ट और परफॉर्मेंस</strong><br>ऐश्वर्या लक्ष्मी और अर्जुन दास इस सीरीज़ के सबसे मज़बूत हिस्से हैं। लक्ष्मी ने तारा के किरदार को बहुत सधे हुए और शांत अंदाज़ में निभाया है। उनका किरदार थोड़ा संभलकर चलने वाला है और वह अपने अतीत का भावनात्मक बोझ लिए हुए है; शांत पलों में एक्ट्रेस ने बहुत अच्छा काम किया है। तारा के मन में एक अंदरूनी द्वंद्व है, जिसे अगर राइटिंग में और गहराई से दिखाया जाता, तो यह किरदार और भी दिलचस्प हो सकता था।</p><p>अर्जुन दास ने मैथ्यू के किरदार में अपनी जानी-पहचानी स्क्रीन प्रेज़ेंस दिखाई है। उनकी आवाज़ और सहज अभिनय किरदार को एक खास आकर्षण देते हैं, और लक्ष्मी के साथ उनके सीन में इतनी केमिस्ट्री है कि मुख्य जोड़ी का रिश्ता विश्वसनीय लगता है।</p><p>समस्या यह है कि एक्टर्स को अक्सर ऐसे स्क्रीनप्ले की कमियों को पूरा करना पड़ता है जो उनके रिश्ते को पर्याप्त गहराई नहीं देता। सपोर्टिंग कास्ट के भी कुछ अच्छे पल हैं, खासकर परिवार और दोस्ती से जुड़े सब-प्लॉट्स में। इनमें से कुछ रिश्ते मुख्य रोमांस की तुलना में ज़्यादा स्वाभाविक लगते हैं।</p><p><strong>लव: तकनीकी पहलू</strong><br>विज़ुअली, 'लव' बहुत शानदार है। प्रोडक्शन डिज़ाइन और लोकेशन सीरीज़ को एक समकालीन शहरी रोमांस वाली चमकदार लुक देते हैं। लेकिन कभी-कभी यह शानदार प्रस्तुति ही इसके खिलाफ काम करती है। किरदार एक आकर्षक दुनिया में रहते हैं, फिर भी उनकी भावनात्मक ज़िंदगी हमेशा उतनी ही वास्तविक नहीं लगती।</p><p>निर्देशन भी सुरक्षित रास्ता अपनाता है। जिन दृश्यों में भावनात्मक तनाव होना चाहिए, उनके बाद अक्सर स्पष्टीकरण दिए जाते हैं, जिससे ड्रामा स्वाभाविक लगने के बजाय सोच-समझकर बनाया हुआ लगता है।</p><p>रफ़्तार (पेसिंग) भी एक समस्या है। छह एपिसोड वाली यह सीरीज़ बहुत लंबी नहीं है, लेकिन मुख्य संघर्ष खिंचा हुआ लगने लगता है क्योंकि राइटिंग बार-बार उन्हीं विचारों पर घूमती रहती है।</p><p><strong>'लव' में क्या कमी है</strong><br>सबसे बड़ी कमज़ोरी भावनात्मक जुड़ाव की कमी है। अगर किरदार इतने दिलचस्प हों कि दर्शक उनकी यात्रा में दिलचस्पी लें, तो एक अनुमानित रोमांटिक कहानी में कुछ भी गलत नहीं है। 'लव' ऐसा करने में पूरी तरह सफल नहीं हो पाती।</p><p>तारा और मैथ्यू के बीच साफ़ केमिस्ट्री दिखती है, लेकिन दो कलाकारों के बीच की केमिस्ट्री ज़रूरी नहीं कि दो किरदारों के बीच की केमिस्ट्री जैसी ही हो। शो हमें बताता है कि ये दोनों लोग एक-दूसरे में दिलचस्पी क्यों लेंगे, लेकिन यह हमेशा हमें उस जुड़ाव को महसूस नहीं करा पाता।</p><p>संवाद भी कभी-कभी बहुत ज़्यादा स्पष्टीकरण देने वाले हो जाते हैं। खामोशी, कामों और छोटी-मोटी बातचीत से किरदारों को दिखाने के बजाय, पटकथा में अक्सर यह साफ़-साफ़ बता दिया जाता है कि वे क्या सोच रहे हैं। इससे कुछ भावनात्मक मोड़ अधूरे या ठीक से विकसित न हुए से लगते हैं।</p><p><strong>'लव': फ़ैसला</strong><br>'लव' का कॉन्सेप्ट अच्छा है और इसके लीड एक्टर्स भी काबिल हैं, लेकिन यह इन चीज़ों को मिलाकर एक संतोषजनक रोमांटिक ड्रामा नहीं बना पाती। ऐश्वर्या लक्ष्मी और अर्जुन दास की केमिस्ट्री और उनकी मौजूदगी सीरीज़ को देखने लायक बनाती है, और सपोर्टिंग कास्ट भी कुछ दिलचस्प पल देती है।</p><p>असली समस्या इसकी राइटिंग में है। सीरीज़ यह पता लगाना चाहती है कि क्या प्यार कम्पैटिबिलिटी (आपसी तालमेल) से मिल सकता है या केमिस्ट्री ऐसी चीज़ है जिसे प्लान नहीं किया जा सकता। लेकिन इसका रोमांस इतना बनावटी लगता है कि यह सवाल उतना असरदार नहीं बन पाता।</p><p>इसमें ऐसे आइडियाज़ हैं जो डिजिटल ज़माने में डेटिंग पर एक बेहतर और लोगों से जुड़ने वाली सीरीज़ बना सकते थे। इसके बजाय, 'लव' एक चमकदार लेकिन कमज़ोर रोमांस बनकर रह जाती है जो शायद ही कभी अपने किरदारों की असल भावनाओं तक पहुँच पाती है।</p><p>'लव' को 2/5 रेटिंग</p><p><a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood"><span style="background-color:white;color:#007BFF;">Entertainment News Hindi&nbsp;</span></a><span style="background-color:white;color:black;">Today only at Prabhasakshi</span><span style="background-color:white;">&nbsp;</span></p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 13:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/love-tamil-web-series-review-modern-dating-drama-lacks-emotional-depth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Drishyam 3 Movie Review | 'दृश्यम 3' में विजय सलगांवकर का आखिरी दांव, पर नए पुलिस अफसर ने बिगाड़ा मजा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/drishyam-3-movie-review-ajay-devgn-shines-in-tense-franchise-finale]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>"अब ये खेल दिमाग का नहीं, नसीब का बन चुका है..." -जब अजय देवगन का किरदार विजय सलगांवकर पुलिस के साथ एक और तनावपूर्ण आमना-सामना होने के बाद अपने सहमे हुए परिवार से यह संवाद कहता है, तो सिनेमाघर में बैठे दर्शक अपनी सांसें थाम लेते हैं। 2 अक्टूबर, सत्संग और पाव-भाजी की पुरानी यादों के साथ 'दृश्यम 3' इस आइकॉनिक फ्रेंचाइजी का अंतिम और बहुप्रतीक्षित चैप्टर लेकर पर्दे पर आ चुकी है। अभिषेक पाठक के निर्देशन में बनी यह फिल्म विजय सलगांवकर और उनके परिवार की रक्षा की आखिरी लड़ाई को तो मजबूती से दिखाती है, लेकिन एक जगह आकर चूक जाती है।</p><p><strong>क्या है 'दृश्यम 3' की कहानी?</strong><br>कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ विजय सलगांवकर और उनका परिवार गोवा में अपनी जिंदगी में आगे बढ़ने की कोशिश कर रहा है। लेकिन, यह शांति ज्यादा दिन कायम नहीं रहती। दफनाया जा चुका पुराना केस एक बार फिर खोदकर निकाल लिया जाता है।</p><p>इस बार तब्बू (मीरा देशमुख) एक सख्त पुलिस अफसर के बजाय एक टूटी हुई, दुखी मां के रूप में दिखाई देती हैं, जिसने अपना इकलौता बेटा खो दिया है। केस की कमान अब क्राइम ब्रांच के नए हेड राजीव सिंह तोमर (जयदीप अहलावत) के हाथों में है। तोमर खुद को विजय की जिंदगी का नया 'शनि' बताता है। वह कब्रें खोदता है, डीएनए (DNA) सबूत ढूंढता है और भ्रष्ट इंस्पेक्टर गायतोंडे (कमलेश सावंत) के साथ मिलकर सलगांवकर परिवार पर शिकंजा कसने की कसम खाता है।</p><p><strong>दृश्यम 3: कहानी और कड़ियाँ</strong><br>फिल्म की एक खूबी यह है कि इसे पता है कि दर्शक क्या सोच रहे हैं। दृश्यम 2 की तरह ही, यह फिल्म भी शुरुआत में दर्शकों को अब तक हुई सभी घटनाओं की याद दिलाती है। फिल्म बनाने वालों को उस सवाल का भी अंदाज़ा है जो तीसरी फिल्म की घोषणा के साथ ही उठा था। अब और क्या हो सकता है?</p><p>फिल्म की कहानी किरदारों के ज़रिए ही इस उत्सुकता को शांत करती है। एक जगह, गायतोंडे मज़ाकिया अंदाज़ में कहते हैं, "इस केस की वजह से मेरी नौकरी जाती है और आती है।" यह बात असरदार लगती है क्योंकि दर्शक भी ठीक यही सोच रहे होते हैं।</p><p>कई ऐसे पल आते हैं जब किरदार सवाल उठाते हैं कि यह केस आखिर कब तक चलेगा। केस बंद होता है और फिर शुरू हो जाता है। विजय बार-बार पुलिस को चकमा देता है। यह लगभग एक मज़ाक जैसा बन जाता है। और यहीं पर दृश्यम 3 पिछली फिल्मों की भावना से जुड़ी रहती है। इसे पता है कि दर्शक विजय को यह खेल आखिरी बार खेलते हुए देखने आए हैं।</p><p><strong>दृश्यम 3: अभिनय</strong><br>अजय देवगन ने फिल्म में ज़बरदस्त काम किया है। विजय सलगांवकर के किरदार में उन्हें लंबे डायलॉग या नाटकीय अंदाज़ की ज़रूरत नहीं पड़ती। उनकी आँखें और खामोशी ही बहुत कुछ कह जाती हैं। विजय भले ही ज़्यादा पढ़े-लिखे न हों, लेकिन वे बेहद समझदार हैं। वे मुसीबत आने से पहले ही उसे भांप लेते हैं, और यही समझ हमेशा से उनकी सबसे बड़ी ताकत रही है। हर बार जब विजय पुलिस से एक कदम आगे रहते हैं, तो दर्शक प्रतिक्रिया देते हैं। हंसी, तनाव और राहत का एहसास होता है। फिल्म का पूरा दारोमदार उन्हीं के कंधों पर है, और देवगन ने इसे बखूबी निभाया है।</p><p>जयदीप अहलावत की कास्टिंग ने काफी उत्साह पैदा किया था। अहलावत और देवगन जैसे दो दमदार कलाकारों को आमने-सामने लाने से यादगार टकराव की उम्मीद थी। दुर्भाग्य से, यहीं पर फिल्म अपनी राह भटक जाती है। फिल्म का पहला हिस्सा राजीव सिंह तोमर को एक ऐसे नए अधिकारी के तौर पर पेश करने में काफी समय लगाता है जो आखिरकार सच का पता लगा सकता है। सच का पता लगाने के लिए वह सैम की आत्मा को बुलाएगा - यही उसका गुस्सा है। उसे लेकर लोगों में सचमुच उत्सुकता है। लेकिन कहानी की लिखावट उस उम्मीद पर खरी नहीं उतरती। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, उसका किरदार बेजान लगने लगता है। यहाँ बहुत गुंजाइश थी। इसके बजाय, बीच में ही किरदार का आकर्षण खत्म होता दिखता है। जिस तरह से उसे पेश किया गया और जिस तरह से उसकी कहानी खत्म होती है, वह भी लिखावट और एडिटिंग पर सवाल खड़े करता है। जयदीप ने जो कुछ भी उन्हें दिया गया, उसमें अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया; दुख की बात है कि लेखक इसमें चूक गए।</p><p>तब्बू का मीरा देशमुख वाला किरदार अब बदल चुका है। उसने अपना इकलौता बेटा खो दिया है और उसके साथ ही, खुद का एक हिस्सा भी। इस बार उसका किरदार जांच-पड़ताल से ज़्यादा दुख पर केंद्रित है। भले ही उनका रोल छोटा है, लेकिन जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं, तो सबका ध्यान खींच लेती हैं। रजत कपूर को मीरा के पति महेश देशमुख के तौर पर ज़्यादा काम करने को मिलता है। उनके किरदार में ज़्यादा संवाद और पहल है, और वह सिर्फ़ एक सहयोगी भूमिका जैसा नहीं लगता।</p><p>श्रिया सरन नंदिनी सालगांवकर के किरदार में असरदार हैं। वह अदालतों, पुलिस स्टेशनों और सामान्य जीवन जीने के दबाव का सामना करते हुए भी अपने परिवार को एकजुट रखने की कोशिश कर रही हैं। वह इस किरदार में सही मात्रा में भावुकता और कमज़ोरी (vulnerability) लाती हैं।</p><p><br>इशिता दत्ता ने भी अंजू के रोल में अच्छा काम किया है। उनका किरदार पिछली घटनाओं के असर से जूझ रहा है और दत्ता ने अपनी एक्टिंग में उस इमोशनल गहराई को बखूबी दिखाया है। मृणाल जाधव का रोल अनु के तौर पर छोटा है, लेकिन कहानी के लिए अहम है।</p><p>और फिर आते हैं इंस्पेक्टर लक्ष्मीकांत गायतोंडे, जिनका रोल कमलेश सावंत ने निभाया है। वह अब भी ऐसे किरदार हैं जिनसे नफ़रत करना भी अच्छा लगता है। विजय के साथ उनकी नोक-झोंक में काफ़ी मज़ा है, और सावंत यह पक्का करते हैं कि हर बार जब वह स्क्रीन पर आएं, तो छाप छोड़ें। विजय के साथ उनकी केमिस्ट्री उन चीज़ों में से एक होगी जिन्हें फ़ैंस मिस करेंगे, क्योंकि अब यह फ़्रैंचाइज़ी अपने आखिरी चैप्टर पर पहुँच गई है।</p><p>प्रकाश राज ने तब्बू के बेटे की मौत के मामले में वकील का छोटा लेकिन असरदार रोल निभाया है और एक बार फिर साबित किया है कि वह कितने बेहतरीन एक्टर हैं। एक्टर में सबसे गंभीर किरदारों में भी एक खास मज़ा या जोश लाने की अनोखी काबिलियत है। और यही खूबी वह इंद्रजीत शेट्टी के किरदार में भी लाते हैं।</p><p><strong>दृश्यम 3: डायरेक्शन</strong><br>अभिषेक पाठक, जिन्होंने ज़िंदगी भर मुख्य रूप से प्रोड्यूसर के तौर पर काम किया है, उन्होंने दृश्यम 2 और 3 को को-राइट और डायरेक्ट किया है। वह दृश्यम की दुनिया को समझते हैं और कैमरा वर्क और फ़िल्म की रफ़्तार को काफ़ी हद तक कंट्रोल में रखते हैं। फ़िल्म को देखकर ऐसा लगता है कि इसे सिर्फ़ एक और सीक्वल बनाने के लिए नहीं, बल्कि फ़्रैंचाइज़ी को एक सही अंजाम देने के मकसद से बनाया गया है।</p><p>हालांकि, एडिटिंग और राइटिंग की वजह से फ़िल्म थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह बात ख़ासकर जयदीप अहलावत के किरदार में साफ़ दिखती है। कहानी जिस तरह से आगे बढ़ती है, उससे लगता है कि कुछ बहुत बड़ा होने वाला है, लेकिन आखिर में जो दिखाया जाता है, वह उम्मीद के मुताबिक नहीं लगता।</p><p><strong>दृश्यम 3 की खूबियां क्या हैं?</strong><br>इसकी सबसे बड़ी ताकत अब भी विजय सलगांवकर ही हैं। अजय देवगन की सधी हुई एक्टिंग कहानी को दिलचस्प बनाए रखती है, खासकर तब जब विजय एक बार फिर पुलिस से आगे निकल जाते हैं। फ़िल्म अपने दर्शकों को भी अच्छी तरह समझती है। पुरानी फ़िल्मों की यादें ताज़ा करना, गायतोंडे के मज़ेदार पल और पिछली फ़िल्मों का ज़िक्र कहानी के अनुभव को और बेहतर बनाते हैं, बिना किसी चीज़ के बेमेल लगे। तब्बू, श्रिया सरन और इशिता दत्ता ने भी अपने-अपने किरदारों में इमोशनल गहराई लाई है। फिल्म का वह सीन जिसमें दर्शकों को 'दृश्यम' की अहम चीज़ों जैसे '2 अक्टूबर', 'सत्संग', 'पाव भाजी' की याद दिलाई जाती है, वह पुरानी यादें ताज़ा करने वाला है। और यह काफी हद तक असरदार भी है।</p><p>सबसे ज़रूरी बात यह है कि फिल्म विजय और उसके परिवार के एक साथ रहने की लड़ाई पर फोकस बनाए रखती है, जो 'दृश्यम' फ्रेंचाइजी की जान है।</p><p><strong>'दृश्यम 3' में क्या कमी रह गई?</strong><br>सबसे बड़ी समस्या जयदीप अहलावत का किरदार है। उनके आने से काफी उत्साह बनता है, खासकर इसलिए क्योंकि उन्हें विजय के एक मज़बूत नए दुश्मन के तौर पर पेश किया जाता है। लेकिन कहानी में उनके किरदार को उतनी गहराई नहीं दी गई है। किरदार की शुरुआत तो अच्छी होती है, लेकिन कहानी आगे बढ़ने के साथ उसमें दम नहीं रहता। आखिर में उनका किरदार उम्मीद के मुताबिक असरदार नहीं लगता, खासकर तब जब उसमें काफी गुंजाइश थी।</p><p>हम खास तौर पर उस सीन का ज़िक्र करना चाहेंगे जिसमें विजय की सुनवाई वाले दिन जयदीप को एक इमरजेंसी प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए बुलाया जाता है। यह कमज़ोर लेखन जैसा लगा क्योंकि मेकर्स कोर्ट में तोमर की मौजूदगी को सही ढंग से नहीं दिखा पाए, और फिर भी वह हार जाते हैं, खासकर तब जब उन्होंने शुरू में दावा किया था कि इस बार उनकी जांच सबूतों पर आधारित है।</p><p>कुछ हिस्से खिंचे हुए भी लगते हैं, खासकर तब जब फिल्म आखिरी टकराव की ओर बढ़ रही होती है। सस्पेंस तो दिलचस्प बना रहता है, लेकिन आखिर में मिलने वाला नतीजा हमेशा पहले हाफ में बनी उम्मीदों के बराबर नहीं होता।</p><p><strong>क्या 'दृश्यम 3' का अंत मज़बूत है?</strong><br>'दृश्यम 3' तब सबसे अच्छी लगती है जब यह विजय सलगांवकर पर फोकस करती है। अजय देवगन इस फ्रेंचाइजी का सबसे मज़बूत हिस्सा बने हुए हैं, और उनकी एक्टिंग फिल्म में इतना तनाव और इमोशन लाती है कि दर्शक जुड़े रहते हैं। अगर आप इसे सिर्फ विजय के सफर के तौर पर देखें तो फिल्म को 3 रेटिंग मिलनी चाहिए।</p><p>हालांकि, आखिरी चैप्टर होने के नाते, इसमें और भी बहुत कुछ हो सकता था। जयदीप के किरदार में आखिरी लड़ाई को और भी रोमांचक बनाने की क्षमता थी, लेकिन लेखन ने उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया। फिर भी, विजय के सफर को काफी सही विदाई मिलती है, भले ही फिल्म अपनी पिछली फिल्मों के स्तर तक पूरी तरह न पहुँच पाए।</p><p><a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood"><span style="background-color:white;color:#007BFF;">Entertainment News Hindi&nbsp;</span></a><span style="background-color:white;color:black;">Today only at Prabhasakshi</span><span style="background-color:white;">&nbsp;</span><br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 16:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/drishyam-3-movie-review-ajay-devgn-shines-in-tense-franchise-finale</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Prem Keetanu Movie Review: वीर पहाड़िया-आफिया सैयद की रोमांटिक केमिस्ट्री ने जीता दिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prem-keetanu-movie-review-veer-pahariya-and-aafia-sayed-deliver-fresh-romance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पहला प्यार जिंदगी में कब दाखिल हो जाए, इसका कोई टाइमटेबल नहीं होता। कभी दोस्तों के साथ मस्ती करते-करते किसी एक शख्स पर नजर टिक जाती है और फिर वही इंसान दिनभर की बातचीत का सबसे बड़ा मुद्दा बन जाता है। 'प्रेम कीटाणु' इसी एहसास को पकड़ने की कोशिश करती है, लेकिन फिल्म की खूबी यह है कि यह सिर्फ दो लोगों के रोमांस तक सीमित नहीं रहती। निर्देशक अपूर्व सिंह कार्की ने प्यार के साथ दोस्ती, परिवार, करियर और उस उम्र की बेचैनी को भी कहानी में जगह दी है, जब इंसान को खुद नहीं पता होता कि वह जिंदगी से आखिर चाहता क्या है। फिल्म हल्के-फुल्के अंदाज में आगे बढ़ती है, लेकिन इसके किरदारों के बीच चल रही इमोशनल उथल-पुथल इसे सिर्फ एक और रोमांटिक कॉमेडी बनने से बचाती है।</p><p>वीर पहाड़िया फिल्म में विशाल का किरदार निभाते हैं। विशाल उन लड़कों में से है जिन्हें लगता है कि जिंदगी को ज्यादा गंभीरता से लेने की कोई जरूरत नहीं है। पढ़ाई उसकी प्राथमिकता नहीं और दोस्तों के साथ वक्त बिताना, मस्ती करना और अपनी ही दुनिया में रहना उसे पसंद है। उसकी यह आराम से चल रही जिंदगी तब बदलती है, जब उसकी मुलाकात सुहानी से होती है। आफिया सैयद ने सुहानी के किरदार से अभिनय की शुरुआत की है। उनका किरदार विशाल से बिल्कुल अलग है—सुहानी समझदार है, अपने भविष्य को लेकर स्पष्ट है और अपनी जिंदगी को लेकर उसके पास एक दिशा है। विशाल का उसकी तरफ आकर्षित होना स्वाभाविक लगता है, लेकिन परेशानी तब शुरू होती है जब उसे एहसास होता है कि प्यार सिर्फ पसंद कर लेने का नाम नहीं है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-vvaan-movie-review-sidharth-malhotra-and-tamannaah-bhatia-film-the-vvaan-overwhelmed-by-ideas" target="_blank" rel="noopener">The Vvaan Movie Review | सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फैंटेसी थ्रिलर बहुत सारे आइडियाज़ के बोझ तले दबी</a></h3><p>कहानी में रंजीत की एंट्री इसी मोड़ पर होती है। अपारशक्ति खुराना ने इस किरदार को अपने चिर-परिचित हल्के और मजेदार अंदाज में निभाया है। रंजीत को महज एक ऐसा विलेन नहीं बनाया गया जो हीरो की प्रेम कहानी बिगाड़ने के लिए मौजूद हो। उसके अपने इरादे हैं और सुहानी को पसंद करने की अपनी वजहें हैं। यही वजह है कि लव ट्राएंगल फिल्म में कुछ दिलचस्प सवाल भी खड़े करता है। विशाल को यह समझना पड़ता है कि उसकी भावनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन सुहानी की पसंद भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। फिल्म इसी कन्फ्यूजन से कई मजेदार पल निकालती है—वह कन्फ्यूजन जिसे शायद हर उस इंसान ने महसूस किया होगा, जिसने कभी किसी को पसंद किया हो और सामने वाले की हर छोटी बात में कोई संकेत ढूंढा हो।</p><p>वीर पहाड़िया की परफॉर्मेंस फिल्म की बड़ी खूबियों में शामिल है। वह विशाल को जरूरत से ज्यादा नाटकीय बनाने की कोशिश नहीं करते। उनका अभिनय सहज है और किरदार की बेफिक्री स्क्रीन पर साफ दिखाई देती है। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, हमें विशाल में जिम्मेदारी और जीवन के प्रति सीरियसनेस को लेकर बदलवा नजर लगते है, ग्रोइंग-अप आसान नहीं है, और विशाल के किरदार में हमें यह साफ़ दिखाई देता है. शुरुआत में उसका ध्यान सिर्फ सुहानी पर है, लेकिन बाद में उसे अपने करियर और भविष्य के बारे में भी सोचना पड़ता है। आफिया सैयद फिल्म में फ्रेशनेस लेकर आती हैं। सुहानी के किरदार में उनका आत्मविश्वास और सादगी अच्छी लगती है।</p><p>वीर और आफिया की केमिस्ट्री भी बनावटी नहीं लगती। दोनों के बीच की झिझक, आकर्षण और छोटी-छोटी नोकझोंक फिल्म के रोमांटिक हिस्सों को खूबसूरत बनाती है। अपारशक्ति इन दोनों के बीच चल रही कहानी में अपनी कॉमिक एनर्जी जोड़ते हैं और कई दृश्यों को हल्का बनाए रखते हैं। फिल्म की दोस्ती वाली कहानी भी खास ध्यान खींचती है। विशाल और उसके रूममेट के बीच की बातचीत में वह सहज मस्ती है, जो पुराने दोस्तों के रिश्ते में अक्सर देखने को मिलती है। विशाल जब भी अपनी प्रेम कहानी को लेकर परेशान होता है, वह अपने दोस्त के पास पहुंच जाता है और वहां से उसे सलाह के साथ कुछ ऐसी बातें भी सुनने को मिलती हैं, जो उसकी परेशानी और बढ़ा देती हैं। इन दृश्यों में फिल्म की कॉमेडी सबसे नैचुरल लगती है। मजेदार बात यह है कि दोस्त का नजरिया भले ही अजीब हो, लेकिन रिश्तों को लेकर उसकी कई बातें सुनकर हंसी के साथ यह भी लगता है कि उनमें थोड़ी सच्चाई छिपी है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-paradise-movie-review-nani-film-disappoints-due-to-brutal-violence-and-flawed-script" target="_blank" rel="noopener">The Paradise Movie Review | क्रूर हिंसा और उलझी कहानी का शिकार हुई नानी की सबसे बड़ी फिल्म</a></h3><p>फिल्म का पारिवारिक पक्ष कहानी को एक अलग भाव देता है। राकेश बेदी सुहानी के पिता के किरदार में सहज और प्यारे लगते हैं। वहीं, विशाल का अपने माता-पिता के साथ रिश्ता कहानी को इमोशनल गहराई देता है। यहां फिल्म किसी बड़े पारिवारिक ड्रामे का सहारा नहीं लेती। छोटे संवादों और सामान्य परिस्थितियों के जरिए दिखाया जाता है कि माता-पिता और बच्चों के बीच प्यार होने के बावजूद कई बार बातचीत आसान नहीं होती। विशाल को अपने माता-पिता और खुद के व्यवहार को नए नजरिए से देखने का मौका मिलता है। यही हिस्सा फिल्म को थोड़ा ज्यादा रिलेटेबल बनाता है, क्योंकि भारतीय परिवारों में प्यार अक्सर बड़े-बड़े शब्दों में नहीं, बल्कि चिंता, सलाह, डांट और रोजमर्रा की छोटी बातों में दिखाई देता है।</p><p>कहानी में एक मोमेंट ऐसा भी होता हैं जब विशाल को अमेरिकी वीजा मिल जाता है, और उसे इंडिया छोड़ कर अमेरिका जाना एक बड़ा फैसला लेना हैं, उसके पास बाहर जाकर अपना भविष्य बनाने का मौका है, लेकिन उसके सामने रिश्ते और भावनाएं भी हैं। अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सुहानी उसके साथ रहेगी या नहीं, बल्कि यह है कि विशाल खुद किस तरह की जिंदगी चाहता है। फिल्म इसी जगह पर अपने सबसे दिलचस्प सवाल उठाती है—क्या प्यार के लिए अपने सपनों को छोड़ देना सही है, या दोनों के बीच कोई रास्ता निकाला जा सकता है? अपूर्व सिंह कार्की इन सवालों को बहुत भारी नहीं होने देते। रोमांस, दोस्ती और कॉमेडी कहानी को लगातार हल्का बनाए रखते हैं।</p><p>फिल्म का संगीत भी इसके युवा माहौल को मजबूत करता है और रोमांटिक पलों में जरूरी रंग भरता है। कुल मिलाकर, 'प्रेम कीटाणु' पहली मोहब्बत की कहानी से शुरू होकर धीरे-धीरे खुद को समझने की कहानी बन जाती है। वीर पहाड़िया ने विशाल को सहजता से निभाया है, जबकि आफिया सैयद का डेब्यू ताजगी लेकर आता है। अपारशक्ति खुराना कहानी में हंसी और ऊर्जा बनाए रखते हैं और राकेश बेदी फिल्म के पारिवारिक हिस्से को अपनापन देते हैं। फिल्म में कुछ ऐसे पल जरूर हैं जहां कहानी थोड़ी और कसावट मांगती है, लेकिन इसकी गर्मजोशी, हास्य और युवा ऊर्जा उसे संभाल लेते हैं। यह उन फिल्मों में से है जो आपको याद दिलाती हैं कि पहला प्यार सिर्फ किसी को पाने की कहानी नहीं होता—कई बार वह खुद को समझने की शुरुआत भी बन जाता है।</p><p>डायरेक्टर: अपूर्व सिंह कार्की</p><p>कास्ट: वीर पहाड़िया, आफिया सैयद, अपारशक्ति खुराना, राकेश बेदी, निखिल विजय</p><p>ड्यूरेशन: 2 घंटे 18 मिनट</p><p>रेटिंग: 4</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 11:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/prem-keetanu-movie-review-veer-pahariya-and-aafia-sayed-deliver-fresh-romance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[The Vvaan Movie Review | सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया की फैंटेसी थ्रिलर बहुत सारे आइडियाज़ के बोझ तले दबी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-vvaan-movie-review-sidharth-malhotra-and-tamannaah-bhatia-film-the-vvaan-overwhelmed-by-ideas]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>लोककथाओं, देवी-देवताओं और रहस्यमयी जंगलों पर आधारित कहानियों ने हमेशा भारतीय दर्शकों को आकर्षित किया है। फिल्म 'द व्वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' (The Vvan: Force of the Forest) इन्हीं कुछ तत्वों को बड़े पर्दे पर लाती है। कहानी एक पवित्र जंगल, उससे जुड़ी एक स्थानीय मान्यता और एक ऐसे व्यक्ति के इर्द-गिर्द घूमती है जो इन सब बातों को अंधविश्वास मानता है। इसमें छठ पूजा, गाँव की संस्कृति, ज़मीन का विवाद और अलौकिक शक्तियों का कॉम्बिनेशन है। कागज़ पर यह विचार काफी दिलचस्प लगता है, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, यह साफ हो जाता है कि एक साथ इतने सारे आइडियाज़ को संभालने की कोशिश कहानी पर भारी पड़ जाती है।</p><p><strong>'द व्वन': क्या है फिल्म की कहानी?</strong><br>फिल्म की कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक इंजीनियर है और अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ मुंबई में रहता है। यह जोड़ा एक निजी समस्या से जूझ रहा है और माता-पिता बनने की उम्मीद कर रहा है। इसी बीच, ऋषि को अपने पुश्तैनी गाँव 'देवांचल' लौटना पड़ता है, जहाँ वह ज़मीन से जुड़ा एक मामला सुलझाना चाहता है।</p><p>गाँव पहुँचने पर उसका सामना जंगल से जुड़ी एक पुरानी मान्यता से होता है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह जंगल 'वन देवी' का घर है और सूर्यास्त के बाद इसमें प्रवेश करना मना है। ऋषि इन बातों को महज़ अंधविश्वास मानता है, लेकिन जंगल में घटने वाली कुछ घटनाएँ उसके नज़रिए को चुनौती देने लगती हैं। इसी बीच जंगल से होकर सड़क बनाने की योजना सामने आती है, जिससे विकास और आस्था के बीच टकराव पैदा होता है।</p><p><strong>द व्वन: दूसरा भाग पूरी तरह भटक जाता है</strong><br>फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसका दूसरा भाग है। यहाँ कहानी एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश करती है। लोककथाएँ, पौराणिक कथाएँ, पर्यावरण से जुड़ी चिंताएँ, ज़मीन का विवाद, विकास परियोजना, अलौकिक शक्तियाँ और कॉमेडी - सब कुछ एक साथ लाया जाता है, और इस प्रक्रिया में मुख्य कहानी अपनी मज़बूती खो देती है।</p><p>ज़मीन और सड़क का मुद्दा शुरू में महत्वपूर्ण लगता है, लेकिन आखिरकार अलौकिक घटनाओं के सामने गौण हो जाता है। इसी तरह, छठ पूजा और कहानी के बीच का संबंध उतना मज़बूत नहीं बन पाता जितना फिल्म बनाना चाहती है।</p><p>स्क्रीनप्ले नए-नए मोड़ लाता रहता है, लेकिन उनमें से कई कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसे उलझा देते हैं। कई दृश्यों में ऐसा लगता है कि फिल्म दर्शकों को कहानी समझाने के बजाय अगली घटना की ओर तेज़ी से बढ़ने में ज़्यादा दिलचस्पी ले रही है।</p><p>जब तक फिल्म अपने क्लाइमेक्स तक पहुँचती है, उसका अंदाज़ भी काफी बदल चुका होता है। जो कहानी लोककथा और रहस्य के रूप में शुरू हुई थी, वह आखिरकार बड़े पैमाने पर अलौकिक एक्शन में बदल जाती है। असरदार लगने के बजाय, यह बदलाव थोड़ा अजीब लगता है।</p><p><strong>द व्वन: दीपक कुमार मिश्रा का निर्देशन</strong><br>दीपक कुमार मिश्रा इस फिल्म के ज़रिए एक अलग तरह की भारतीय फैंटेसी बनाने की कोशिश करते हैं। भारतीय लोककथाओं और ग्रामीण परिवेश से जोड़कर कहानी को एक अलग पहचान देने का उनका इरादा साफ़ दिखता है।</p><p>हालाँकि, निर्देशन के साथ सबसे बड़ी समस्या फिल्म का अंदाज़ है। यह फ़िल्म कभी तय ही नहीं कर पाती कि वह एक गंभीर लोक-कथा, हॉरर फ़िल्म, फ़ैंटेसी एडवेंचर या कॉमेडी एंटरटेनर बनना चाहती है। एक सीन में रहस्य बनाने की कोशिश की जाती है, तो अगला सीन अचानक कॉमेडी में बदल जाता है। इससे बार-बार फ़िल्म का माहौल बिगड़ता है।</p><p>मिश्रा 'पंचायत' जैसी कहानी में स्वाभाविकता और स्थानीय रंग लाने के लिए जाने जाते हैं, लेकिन यहाँ वैसी पकड़ नहीं दिखती। बिहार की पृष्ठभूमि पर आधारित होने के बावजूद, यह फ़िल्म वहाँ की संस्कृति को उतनी गहराई से नहीं दिखा पाती।</p><p><br><strong>द वैन: परफॉर्मेंस</strong><br>सिद्धार्थ मल्होत्रा ​​ऋषि के रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन उनकी परफॉर्मेंस फिल्म की कमज़ोर स्क्रिप्ट से ऊपर नहीं उठ पाती। उनके किरदार को एक समझदार, शहर में रहने वाले आदमी से ऐसे व्यक्ति में बदलना था जिसे अलौकिक घटनाओं का सामना करना पड़ता है। हालांकि, स्क्रीनप्ले इस बदलाव को काफ़ी इमोशनल गहराई नहीं देता।</p><p>मल्होत्रा ​​एक्शन और फिजिकल सीन में सहज लगते हैं, लेकिन इमोशनल सीन में वैसा असर नहीं दिखता। कुल मिलाकर, उनकी परफॉर्मेंस औसत रहती है।</p><p>तमन्ना भाटिया को ममता के तौर पर एक इमोशनल गहराई वाले किरदार को निभाने का मौका मिला। उनके किरदार को कहानी के पर्सनल और आध्यात्मिक, दोनों पहलुओं से जोड़ा जा सकता था। तमन्ना अपने रोल को ईमानदारी से निभाती हैं, लेकिन रोल को विकसित होने के लिए काफ़ी गुंजाइश नहीं दी गई है। कई जगहों पर, वह मुख्य कहानी के साथ चलने वाले एक सपोर्टिंग किरदार से ज़्यादा कुछ नहीं लगतीं। उनके किरदार की क्षमता का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता था।</p><p>सुनील ग्रोवर को एक गंभीर रोल में देखना दिलचस्प है। वह किरदार में गंभीरता लाने की कोशिश करते हैं, लेकिन उनकी बनी-बनाई कॉमिक इमेज कई जगहों पर रुकावट बनती है।</p><p>मनीष पॉल को मुख्य रूप से कॉमेडी के लिए लाया गया है। उनकी टाइमिंग कुछ सीन में काम करती है, लेकिन उनका ट्रैक अक्सर कहानी में ज़बरदस्ती जोड़ा हुआ लगता है। एक जैसे जोक्स का बार-बार इस्तेमाल भी उनके असर को कम कर देता है।</p><p>अनूप सोनी और श्वेता तिवारी अपने-अपने रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें काम करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं देता।</p><p><br><strong>द व्वन: तकनीकी पहलू</strong><br>तकनीकी तौर पर, सिनेमैटोग्राफी फिल्म के मजबूत पहलुओं में से एक है। घने पेड़ों, परछाइयों और धुंध के साथ जंगल को शूट किया गया है, जिससे कई आकर्षक दृश्य (फ्रेम) बने हैं। जंगल में एक रहस्यमयी माहौल बनाने की कोशिश की गई है, लेकिन सिर्फ सिनेमैटोग्राफी से वह डर पैदा नहीं हो पाता जिसकी कहानी को ज़रूरत है।</p><p>माहौल को और असरदार बनाने के लिए बैकग्राउंड स्कोर और लोक धुनों का इस्तेमाल किया गया है। छठ से जुड़े हिस्से भी फिल्म में क्षेत्रीय रंग लाने की कोशिश करते हैं।</p><p>जहाँ तक VFX की बात है, फिल्म बड़े पैमाने पर एक अलौकिक दुनिया बनाने की कोशिश करती है, लेकिन नतीजे एक जैसे नहीं हैं। कुछ सीन ठीक-ठाक काम करते हैं, जबकि कुछ में विजुअल इफेक्ट्स बनावटी लगते हैं।</p><p>एडिटिंग एक और कमजोर कड़ी है। कहानी को और कसा हुआ होना चाहिए था। कुछ कॉमेडी सीन और गाने मुख्य कहानी की रफ्तार को धीमा कर देते हैं।</p><p><strong>द व्वन: क्या कमी रह गई?</strong><br>'द व्वन' के साथ सबसे बड़ी समस्या विचारों की कमी नहीं, बल्कि विचारों की अधिकता है। फिल्म एक ही समय में बहुत सारी बातें कहना चाहती है, बिना किसी एक विचार को पर्याप्त गहराई दिए।</p><p>जंगल से जुड़ा रहस्य अपना असर खो देता है क्योंकि फिल्म उसे विकसित होने के लिए पर्याप्त समय नहीं देती। छठ और लोककथाएँ कहानी का हिस्सा हैं, लेकिन उनका इस्तेमाल अक्सर सतही लगता है।</p><p>विकास और प्रकृति के बीच का टकराव एक मजबूत सामाजिक पहलू दे सकता था, लेकिन अलौकिक कहानी के कारण यह दब जाता है। कॉमेडी भी हमेशा असरदार नहीं होती। गंभीर घटनाओं के बीच अचानक आने वाले जोक्स फिल्म के मूड को खराब कर देते हैं।</p><p>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि क्लाइमेक्स उस रहस्य का संतोषजनक समाधान नहीं देता जिसे फिल्म ने शुरुआत में खड़ा किया था।</p><p><strong>द व्वन: अंतिम फैसला</strong><br>'द व्वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' के पीछे का विचार निश्चित रूप से दिलचस्प है। भारतीय लोककथाएँ, वन देवी, छठ पूजा और एक रहस्यमयी जंगल एक अनोखी फैंटेसी फिल्म का आधार बन सकते थे।</p><p>फिल्म में कुछ अच्छे दृश्य और कलाकारों की मेहनत भी दिखती है। लेकिन एक अच्छे विचार और एक अच्छी फिल्म के बीच, सबसे महत्वपूर्ण तत्व एक मजबूत कहानी है। यहीं पर 'द व्वन' सबसे ज्यादा चूक जाती है। बिखरी हुई पटकथा, उतार-चढ़ाव वाला टोन, किरदारों का अधूरा विकास, कमज़ोर कॉमेडी और ऐसा क्लाइमेक्स जो उम्मीद के मुताबिक असर नहीं छोड़ पाता-ये सब मिलकर फ़िल्म की अच्छी बातों पर हावी हो जाते हैं।</p><p>5 में से 2 स्टार, क्योंकि फ़िल्म में निश्चित रूप से क्षमता और कुछ अच्छे विचार हैं, लेकिन उनका सही इस्तेमाल नहीं हो पाया। 'द व्वन: फ़ोर्स ऑफ़ द फ़ॉरेस्ट' आख़िरकार एक ऐसी फ़िल्म बनकर रह जाती है जो शुरुआत में तो उम्मीद जगाती है, लेकिन अंत तक उस उम्मीद पर खरी नहीं उतर पाती।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 12:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-vvaan-movie-review-sidharth-malhotra-and-tamannaah-bhatia-film-the-vvaan-overwhelmed-by-ideas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[The Paradise Movie Review | क्रूर हिंसा और उलझी कहानी का शिकार हुई नानी की सबसे बड़ी फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-paradise-movie-review-nani-film-disappoints-due-to-brutal-violence-and-flawed-script]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>तेलुगु सिनेमा के 'नैचुरल स्टार' नानी पिछले कुछ समय से अपनी पारंपरिक फैमिली-मैन छवि को छोड़कर एक्शन-प्रधान और प्रयोगधर्मी सिनेमा की ओर रुख कर रहे हैं। निर्देशक श्रीकांत ओडेला के साथ 'दसारा' जैसी सफल फिल्म देने के बाद, दोनों की जोड़ी अपनी नई पैन-इंडिया एक्शन-ड्रामा फिल्म 'द पैराडाइज़' (The Paradise) लेकर आई है। स्केल, बजट और एक्शन के मामले में यह नानी के करियर की अब तक की सबसे बड़ी फिल्म मानी जा रही है। लेकिन क्या यह विशालकाय प्रोजेक्ट उम्मीदों पर खरा उतर पाता है? आइए जानते हैं इस विस्तृत समीक्षा में।</p><p><strong>क्या है फिल्म की कहानी?</strong><br>फिल्म की कहानी आजादी के बाद के सिकंदराबाद की पृष्ठभूमि पर आधारित है। जादल (नानी) और उसकी मां शमक्का (सोनाली कुलकर्णी) एक बेहद शोषित और हाशिए पर धकेले गए कबीले से ताल्लुक रखते हैं। इस कबीले पर स्थानीय सामंत मलिक (मोहन बाबू) का क्रूर और अमानवीय शासन है। कबीले के लोगों से उनकी मूलभूत पहचान, सम्मान और आजादी छीन ली गई है। कहानी में मुख्य मोड़ तब आता है जब किशोरावस्था में जादल की मां को सरेआम अपमानित किया जाता है। इस घटना से उपजा गुस्सा जादल के जीवन का मुख्य उद्देश्य बन जाता है। जैसे-जैसे जादल बड़ा होता है, उसकी निजी बदले की लड़ाई पूरे कबीले को सामंती दमन से आजाद कराने के 'मसीहा' वाले मिशन में बदल जाती है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/what-was-türkiye-erdogan-saying-about-kashmir-at-the-un-when-india-friend-israel-suddenly-stood" target="_blank" rel="noopener">UN में कश्मीर पर ऐसा क्या बोल रहे थे तुर्किए वाले एर्दोगान, तभी अचानक खड़ा हो गया भारत का दोस्त इजरायल, फिर...</a></h3><p><strong>निर्देशन और स्क्रीनप्ले: बिखराव और लॉजिक की कमी</strong><br>फिल्म 'द पैराडाइज़' में सबसे बड़ी कमी इसका निर्देशन और स्क्रीनप्ले का बिखराव है, जिसके कारण कहानी दर्शकों को अपने साथ जोड़ने में पूरी तरह विफल रहती है। निर्देशक श्रीकांत ओडेला ने फिल्म को 'वॉम्ब ऑफ स्कार्स' और 'वॉम्ब ऑफ वॉर' जैसे भारी-भरकम और आकर्षक अध्यायों (Chapters) में विभाजित तो किया है, लेकिन यह प्रयोग फिल्म को एक सुसंगत ढांचा देने के बजाय उसे और अधिक दिशाहीन तथा बिखरा हुआ बना देता है।</p><p>स्क्रीनप्ले में गहराई और भावनात्मक प्रवाह की जगह अत्यधिक और अनावश्यक हिंसा को दे दी गई है। शोषित कबीले की पीड़ा और सामाजिक असमानता जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय, कहानी बार-बार अमानवीय और क्रूर दृश्यों में उलझकर रह जाती है। गर्भवती महिलाओं और नवजात शिशुओं पर होने वाले अत्याचारों को जिस तरह बार-बार स्क्रीन पर दिखाया गया है, वह कहानी को कोई सिनेमाई मजबूती प्रदान नहीं करता, बल्कि धीरे-धीरे एक 'टॉर्चर पोर्न' जैसा रूप ले लेता है जो दर्शकों को सिर्फ असहज करता है।</p><p>इसके अलावा, फिल्म में तार्किकता और लॉजिक की भारी कमी साफ झलकती है। एक तरफ जहां निर्देशक एक बहुत ही कठोर, वास्तविक और क्रूर दुनिया रचने का दावा करते हैं, वहीं दूसरी तरफ एक्शन दृश्यों में भौतिकी और गुरुत्वाकर्षण के नियमों की धज्जियां उड़ाई गई हैं। कहानी में कई तरह के परस्पर विरोधी विषयों—जैसे सामंतवाद, व्यक्तिगत बदला, पूरे कबीले के लिए 'मसीहा' बनना और कानूनी व्यवस्था से लड़ाई—को एक साथ ठूंसने की कोशिश की गई है। इस अति-उत्साह के चक्कर में किसी भी एक विषय या भावना को उभरने का पर्याप्त समय नहीं मिलता।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/samastipur-police-arrest-four-men-for-molesting-minor-girl-on-roadside" target="_blank" rel="noopener">बिहार में जमुई जैसी एक और शर्मनाक वारदात! समस्तीपुर में सड़क किनारे नाबालिग लड़की से बदसलूकी, वीडियो वायरल होने के बाद 4 गिरफ्तार</a></h3><p>तकनीकी स्तर पर भी पटकथा में भारी ढिलाई दिखती है; उदाहरण के लिए, मुख्य किरदार के कुत्ते वाले सीन्स में घटिया AI तकनीक का इस्तेमाल और गंभीर भावनात्मक दृश्यों में बैकग्राउंड की लापरवाही यह साबित करती है कि ओडेला के पास एक बड़ा विजन तो था, लेकिन वे उसे एक लॉजिकल, कड़ाकेदार और प्रभावकारी स्क्रीनप्ले में बदलने में बुरी तरह चूक गए।</p><p><strong>अभिनय और संगीत: नानी और अनिरुद्ध का प्रयास</strong><br>फिल्म 'द पैराडाइज़' में यदि कोई पहलू इसे पूरी तरह बिखरने से बचाता है और दर्शकों को बांधे रखने का काम करता है, तो वह नानी का सधा हुआ अभिनय और अनिरुद्ध रविचंदर का धमाकेदार बैकग्राउंड म्यूजिक है। 'नैचुरल स्टार' नानी ने 'जादल' के अपने इस सबसे आक्रामक और जटिल किरदार में खुद को पूरी तरह झोंक दिया है। वे परदे पर जब भी आते हैं, अपनी जबरदस्त स्क्रीन प्रेजेंस, संवाद अदायगी और आंगिक अभिनय से दृश्य में जान फूंक देते हैं। एक शोषित पुत्र से लेकर पूरे कबीले का 'मसीहा' बनने तक के भावनात्मक और शारीरिक परिवर्तन को उन्होंने बहुत ही ईमानदारी से जिया है। लेकिन त्रासदी यह है कि एक अभिनेता के तौर पर उनका यह शानदार प्रयास एक बेहद कमजोर, दिशाहीन और ढीली पटकथा की बलि चढ़ जाता है; एक बिखरी हुई कहानी को सिर्फ अपने दम पर खींच पाना नानी जैसे मंझे हुए कलाकार के लिए भी मुमकिन नहीं हो पाया।</p><p>संगीत पक्ष की बात करें तो अनिरुद्ध रविचंदर का बैकग्राउंड स्कोर (BGM) कई दृश्यों में कमाल का रोमांच पैदा करता है और सिनेमाघरों में एक अलग ही ऊर्जा भर देता है। खासकर एक्शन और हीरो-इंट्रोडक्शन सीन्स में उनका संगीत फिल्म के गिरते स्तर को उठाने की पूरी कोशिश करता है। हालांकि, समस्या यह आती है कि जब स्क्रीनप्ले में ही भावनाएं और लॉजिक गायब हों, तो सिर्फ तेज और प्रभावशाली संगीत भी लंबे समय तक दर्शकों को जोड़कर नहीं रख पाता।</p><p>वहीं दूसरी ओर, नानी को छोड़कर बाकी के कलाकारों को पटकथा में इतना कम स्पेस दिया गया है कि वे फिल्म में कोई खास वजन नहीं जोड़ पाते। मुख्य खलनायक 'मलिक' के रूप में दिग्गज अभिनेता मोहन बाबू के पास करने के लिए लगभग कुछ नहीं था; नानी के साथ उनका कोई ऐसा बड़ा या रोंगटे खड़े कर देने वाला आमना-सामना नहीं हो पाता जो किसी बड़े कमर्शियल ड्रामा की जान होता है। सोनाली कुलकर्णी ने मां 'शमक्का' के भावुक रोल में अपनी तरफ से बेहतरीन काम किया है और नानी के साथ उनका रिश्ता फिल्म की थोड़ी-बहुत इमोशनल रीढ़ बनता है। हालांकि, राघव जुयाल और कायडू लोहार जैसे किरदार सिर्फ नाममात्र के लिए शामिल लगते हैं और उनका प्रदर्शन एक विशालकाय कहानी में पूरी तरह बेअसर साबित होता है।</p><p><br><strong>अंतिम फैसला</strong><br>'द पैराडाइज़' में कुछ रचनात्मक विचार जरूर देखने को मिलते हैं, जैसे शोषित कबीले की सामाजिक स्थिति को दर्शाने वाले शुरुआती सीन। हालांकि, लगभग तीन घंटे की यह फिल्म अत्यधिक खून-खराबे, कमजोर विलेन और बिखरी हुई पटकथा के कारण एक निराशाजनक अनुभव बनकर रह जाती है। नानी के प्रशंसकों के लिए उनका अभिनय देखने लायक है, लेकिन कुल मिलाकर यह फिल्म निर्देशक श्रीकांत ओडेला के लिए एक गंवाया हुआ मौका नजर आती है।</p><p>रेटिंग: 2.5/5 स्टार</p><p><a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood"><span style="background-color:white;color:#007BFF;">Entertainment News Hindi&nbsp;</span></a><span style="background-color:white;color:black;">Today only at Prabhasakshi</span><span style="background-color:white;">&nbsp;</span></p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 24 Sep 2026 13:29:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Heart of the Beast Movie Review | अलास्का के खूंखार जंगल में ब्रैड पिट और उनके वफादार कुत्ते का साहसिक थ्रिलर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brad-pitt-battles-alaskan-wilderness-with-loyal-combat-dog-in-heart-of-the-beast]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>एक ऐसी फिल्म के बारे में क्या कहा जाए जिसमें स्क्रीन पर आते ही सारा ध्यान एक बेजुबान कुत्ता अपनी ओर खींच ले? और जब उस कुत्ते के साथ हॉलीवुड के दिग्गज अभिनेता ब्रैड पिट मौजूद हों, तो पर्दे से अपनी नज़रें हटाना- या इमोशनली प्रभावित न होना- दर्शकों के लिए लगभग नामुमकिन हो जाता है।</p><p>डेविड आयर के निर्देशन में बनी फिल्म 'हार्ट ऑफ़ द बीस्ट' असल में स्पेशल फ़ोर्स के पूर्व सैनिक जेम्स "जिम" बेलमोंट (ब्रैड पिट) की एक रोंगटे खड़े कर देने वाली सर्वाइवल थ्रिलर कहानी है। जिम अलास्का के बेहद खतरनाक और बर्फीले जंगली इलाके में अपने रिटायर्ड कॉम्बैट डॉग 'ओडिन' के साथ फंस जाते हैं। लेकिन बर्फ, खून, जंगली शिकारियों और जिंदगी-मौत की जद्दोजहद के बीच यह फिल्म चुपचाप दो ऐसे जीवों की बेहद खूबसूरत कहानी बन जाती है, जो किसी भी कीमत पर एक-दूसरे का साथ छोड़ने को तैयार नहीं हैं।</p><p><strong>इंसान और बेजुबान के बीच इमोशनल जुड़ाव</strong><br>फिल्म की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह एक इंसान और उसके वफादार साथी को एक साथ जानलेवा खतरे में डालने के इमोशनल प्रभाव को बखूबी समझती है। ओडिन अपने काम में बेहद माहिर है और उसे महज़ एक फिल्मी प्रॉप की तरह इस्तेमाल नहीं किया गया है। वह दोनों के सर्वाइवल में एक्टिव भूमिका निभाता है। फिल्म ओडिन को इतनी बेहतरीन पर्सनैलिटी देती है कि उनके बीच का रिश्ता पूरी तरह असली महसूस होता है, बिना उसे किसी कार्टून जैसे हाव-भाव वाले साइडकिक में बदले।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/upasana-konidela-gets-special-lord-ram-idol-made-for-her-grandfather" target="_blank" rel="noopener">Upasana Konidela ने अयोध्या के 'राम लल्ला' के मूर्तिकार अरुण योगीराज से बनवाई भगवान राम की मूर्ति, दादाजी को समर्पित किया विशेष प्रोजेक्ट</a></h3><p>ब्रैड पिट पूरे सीन में थके हुए, चोटिल और जिंदगी से जंग लड़ते दिखते हैं, लेकिन जैसे ही ओडिन उन्हें देखता है, माहौल अचानक से बेहद पर्सनल और संवेदनशील हो जाता है। दोनों के बीच की एक-दूसरे पर निर्भरता यह साबित करती है कि भले ही बेलमोंट इंसान होने के नाते इंचार्ज दिखते हों, लेकिन प्रकृति का खतरनाक माहौल जल्द ही उस ऊँच-नीच के अंतर को खत्म कर देता है।</p><p><strong>ब्रैड पिट का संयमित अभिनय और डेविड आयर का कड़ा निर्देशन</strong><br>ब्रैड पिट ने बेलमोंट का किरदार बहुत ही संयम और संजीदगी के साथ निभाया है, जो अलास्का के कठोर माहौल के हिसाब से बिल्कुल सटीक बैठता है। उनके किरदार पर मिलिट्री लाइफ के कड़वे अनुभवों और अपनों को खोने का दर्द साफ झलकता है। फिल्म समझदारी दिखाते हुए हर खामोशी को भारी-भरकम साइकोलॉजिकल मोनोलॉग में नहीं बदलती, बल्कि ओडिन के साथ उनके मूक रिश्ते को वह सब बयां करने देती है जो बेलमोंट खुद कभी नहीं कह पाते।</p><p>डायरेक्टर डेविड आयर का काम यहाँ सबसे असरदार नजर आता है। अलास्का का नजारा सिर्फ किसी खूबसूरत पोस्टकार्ड जैसा नहीं लगता, बल्कि वहां की हाड़ कंपा देने वाली ठंड का एहसास दर्शकों को भी होता है। फिल्म के विजुअल स्टाइल में एक आकर्षक खुरदरापन है, खासकर तब जब कुदरत सिर्फ बैकग्राउंड न रहकर एक खतरनाक दुश्मन की तरह सामने आती है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/upasana-konidela-gets-special-lord-ram-idol-made-for-her-grandfather" target="_blank" rel="noopener">Upasana Konidela ने अयोध्या के 'राम लल्ला' के मूर्तिकार अरुण योगीराज से बनवाई भगवान राम की मूर्ति, दादाजी को समर्पित किया विशेष प्रोजेक्ट</a></h3><p><strong>सर्वाइवल सीन्स में रीयलिज्म और कुछ कमियां</strong><br>सर्वाइवल के सीन्स को बहुत ही बारीकी से दिखाया गया है। एक्शन सीन्स में असली संघर्ष दिखाई देता है—जंगल में थकान, भूख, चोट और मौसम की मार हर पल मायने रखती है। आयर अपने हीरो को सुपरमैन की तरह अजेय दिखाने के बजाय सर्वाइवल को एक कठिन और मेहनत भरे कृत्य की तरह पेश करते हैं।</p><p>हालांकि, जब फिल्म अपने मुख्य रिश्ते से भटकती है, तो यह थोड़ी कमजोर महसूस होती है। कभी-कभी फिल्म मिलिट्री भाईचारे और पुरुषों के शांत-गंभीर स्वभाव जैसे घिसे-पिटे विचारों पर जरूरत से ज्यादा जोर देती दिखाई देती है। जंगली जानवरों के साथ हुए कुछ सीन्स में डिजिटल काम (VFX) हमेशा उतना बेहतरीन नहीं रह पाता कि फिल्म द्वारा बनाए गए असलियत के एहसास को बरकरार रख सके।</p><p><strong>वफादारी और जिंदादिली की पुरानी दास्तान</strong><br>तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद 'हार्ट ऑफ़ द बीस्ट' में एक क्लासिक, पुराने जमाने का अहसास है। यह फिल्म मानती है कि वफादारी आज भी मायने रखती है और किसी का साथ होना भी जिंदा रहने की सबसे बड़ी ताकत बन सकता है। कभी-कभी प्यार का सबसे सच्चा इज़हार सिर्फ साथ बने रहना होता है। ब्रैड पिट की खास स्क्रीन अपील इस फिल्म की सबसे बड़ी रीढ़ है। उन्होंने अपने दशकों लंबे स्टारडम को यहाँ बहुत ही सहजता से इस्तेमाल किया है। उनका अभिनय दिखावटी न होकर किरदार की शारीरिक बनावट और ओडिन के साथ अपने इमोशनल रिश्ते पर टिका हुआ है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/why-nani-the-paradise-has-been-deemed-dangerous-for-pregnant-women" target="_blank" rel="noopener">इतना खून-खराबा कि हिल जाएगा दिमाग! नानी की The Paradise को प्रेग्नेंट महिलाओं के लिए क्यों बताया खतरनाक?</a></h3><p><br>'हार्ट ऑफ़ द बीस्ट' भले ही कोई बहुत अनोखी सर्वाइवल फिल्म न हो, लेकिन इसे बेहद खूबसूरती से शूट किया गया है। इसकी एक्टिंग मजबूत है और यह एक ऐसे भावनात्मक रिश्ते पर टिकी है जिसे नजरअंदाज करना नामुमकिन है। जब ब्रैड पिट अलास्का के माइनस तापमान में एक वफादार कुत्ते के साथ जिंदगी की जंग लड़ रहे हों, तो कोई भी दर्शक इमोशनली अलग नहीं रह सकता। यह ग्रिपिंग थ्रिलर फिल्म भारत भर के सिनेमाघरों में 25 सितंबर 2026 को दस्तक देने के लिए पूरी तरह तैयार है।</p><p><strong>फिल्म रिव्यू: 'हार्ट ऑफ़ द बीस्ट' (Heart of the Beast)</strong><br><strong>डायरेक्टर: डेविड आयर</strong><br><strong>मुख्य कलाकार: ब्रैड पिट</strong><br><strong>रिलीज़ डेट: 25 सितंबर 2026 (भारत में)</strong></p><p><a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood"><span style="background-color:white;color:#007BFF;">Entertainment News Hindi&nbsp;</span></a><span style="background-color:white;color:black;">Today only at Prabhasakshi</span><span style="background-color:white;">&nbsp;</span>&nbsp;</p><p><iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/JFQcDFhNh4o?si=gd-Sd-p04XqoSmCr" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe></p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 13:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brad-pitt-battles-alaskan-wilderness-with-loyal-combat-dog-in-heart-of-the-beast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[The Scandal K-Drama Review | सोन ये-जिन और जी चांग-वूक का जादू, धीमी रफ्तार के बावजूद बांधे रखती है नेटफ्लिक्स सीरीज़]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-scandal-k-drama-review-son-ye-jin-and-ji-chang-wook-impress-in-netflix]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हाल ही में ओटीटी प्लेटफॉर्म नेटफ्लिक्स पर रिलीज़ हुई साउथ कोरियन सीरीज़ 'द स्कैंडल' (The Scandal) दर्शकों के बीच खासी चर्चा बटोर रही है। पियरे चोडरलोस डी लैक्लोस के मशहूर 18वीं सदी के फ्रांसीसी उपन्यास 'डेंजरस लियाज़न्स' (Dangerous Liaisons) और 2003 की ब्लॉकबस्टर कोरियन फिल्म 'अनटोल्ड स्कैंडल' से प्रेरित यह आठ एपिसोड की सीरीज़ प्यार, धोखे और सामाजिक पाबंदियों का एक ऐसा जटिल ताना-बाना बुनती है, जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखता है। सोन ये-जिन, जी चांग-वूक और नाना की मुख्य भूमिकाओं वाली यह सीरीज़ जोसियन काल के कड़े नियमों और मर्यादाओं के बीच पनपती अनैतिक चाहतों और इमोशनल मैनिपुलेशन (भावनाओं के खेल) को बखूबी उजागर करती है।</p><p><strong>कहानी का ताना-बाना: एक मासूम दांव और गहरी साज़िश</strong><br>सीरीज़ की कहानी के केंद्र में लेडी चो (सोन ये-जिन) हैं, जो एक प्रभावशाली कुलीन महिला हैं। अपने जीवन और सामाजिक पाबंदियों से घुटन महसूस कर रहीं लेडी चो अपने चचेरे भाई और मशहूर प्लेबॉय चो वॉन (जी चांग-वूक) के सामने एक शर्त रखती हैं। चुनौती बेहद सीधी लेकिन खतरनाक है—चो वॉन को हुई-योन (नाना) नाम की एक बेहद ही सीधी और मर्यादा पसंद युवा विधवा को अपने प्यार के जाल में फंसाकर रिझाना है।</p><p>जो खेल शुरुआत में महज़ एक मनोरंजन और टाइमपास जैसा लगता है, वह धीरे-धीरे तब एक खौफनाक मोड़ ले लेता है जब आकर्षण की जगह सच्ची भावनाएं और असली प्यार मूल योजना में दखल देने लगता है। जोसियन काल का परिवेश इस खेल को और ज्यादा गंभीर बनाता है, क्योंकि उस दौर में इज़्ज़त, शादी और सामाजिक रुतबा दांव पर लगे होते थे।</p><p><strong>दमदार अभिनय: किरदारों की परतों में छिपी गहराई</strong><br>सोन ये-जिन (लेडी चो): सोन ये-जिन ने अपने किरदार को महज़ एक 'विलेन' या चालाक महिला के रूप में पेश नहीं किया है। उन्होंने लेडी चो की निराशा, कंट्रोल खोने का डर और अंदरूनी कमज़ोरी को अपनी नपी-तुली एक्टिंग से बेहद प्रभावशाली बनाया है।</p><p>जी चांग-वूक (चो वॉन): शुरू में एक बेफिक्र और फ्लर्ट करने वाले आशिक के रूप में दिखने वाले जी चांग-वूक का रूपांतरण देखने लायक है। जब उनका आत्मविश्वास डगमगाता है और वे सच्चे प्यार और पुरानी वफादारी के बीच उलझते हैं, तो उनकी खामोशी भी स्क्रीन पर बहुत कुछ कह जाती है।</p><p>नाना (हुई-योन): नाना का किरदार महज़ एक 'शिकार' तक सीमित नहीं रहता। एक संयमित विधवा से लेकर अपने हक और सच्चाई के प्रति जागरूक होने वाली महिला के रूप में उनका अभिनय बेहद शानदार और संतुलित है।</p><p><strong>निर्देशन और विज़ुअल ग्रैंड्योर</strong><br>निर्देशक जुंग जी-वू ने जोसियन दौर के माहौल, भव्य कॉस्ट्यूम्स और सिनेमैटोग्राफी का शानदार इस्तेमाल किया है। सीरीज़ की सबसे बड़ी खासियत इसका विज़ुअल प्रेजेंटेशन है। संवादों से ज़्यादा किरदारों की नज़रों का ठहराव, दो लोगों के बीच की शारीरिक दूरी और हाव-भाव कहानी के तनाव को कई गुना बढ़ा देते हैं।</p><p><br><strong>सोन ये-जिन ने लेडी चो के किरदार को कई पहलू दिए हैं</strong><br>सोन ये-जिन इस सीरीज़ से जुड़े रहने की सबसे बड़ी वजहों में से एक हैं। लेडी चो आसानी से एक आम 'मैनिपुलेटर' (दूसरों को अपने हिसाब से चलाने वाली) बन सकती थीं, जो लोगों को बोर्ड पर रखे मोहरों की तरह इस्तेमाल करती हैं। इसके बजाय, सोन ने उन्हें कंट्रोल, निराशा और कमज़ोरी का मिला-जुला रूप दिया है। वह जिस दुनिया में रहती हैं, उसके नियमों को समझती हैं और अच्छी तरह जानती हैं कि उन्हें कितना मोड़ा जा सकता है।</p><p>साथ ही, ऐसा लगता है कि लेडी चो के खेल कुछ हद तक इस बात का नतीजा हैं कि अपनी ज़िंदगी पर उनका कितना कम कंट्रोल है। यही विरोधाभास उनके किरदार को और दिलचस्प बनाता है। उन्हें न तो सिर्फ़ एक पीड़ित के तौर पर दिखाया गया है और न ही उन्हें विलेन बना दिया गया है।</p><p><strong>जी चांग-वूक ने चो वॉन के किरदार को जटिल बनाया है</strong><br>जी चांग-वूक को चो वॉन के तौर पर एक अलग चुनौती मिलती है। शुरू में, वह कॉन्फिडेंट और फ़्लर्ट करने वाले हैं, और रोमांस को मनोरंजन की तरह लेने में सहज हैं। लेडी चो के साथ उनका दांव एक और खेल जैसा लगता है, जिसे वह आसानी से जीत सकते हैं। जब उनका यह कॉन्फिडेंस डगमगाने लगता है, तो उनका किरदार और दिलचस्प हो जाता है। जी चांग-वूक ने चो वॉन के बदलाव को बहुत अच्छे से दिखाया है, जिससे यह अचानक नहीं लगता। उनकी एक्टिंग शांत दृश्यों में खास तौर पर असरदार है, जहाँ उनके किरदार की उलझन, उनकी फ़्लर्ट वाली बातचीत की तुलना में ज़्यादा साफ़ दिखती है।</p><p>सोन ये-जिन के साथ उनकी केमिस्ट्री भी सीरीज़ में काफ़ी तनाव पैदा करती है। उनके किरदारों का एक पुराना इतिहास और एक उलझा हुआ इमोशनल कनेक्शन है, इसलिए शर्त के बारे में उनकी बातचीत में भी एक अलग ही गहराई होती है।</p><p><br><strong>नाना सिर्फ़ बीच में फंसी हुई महिला नहीं हैं</strong><br>नाना के किरदार 'हुई-योन' को बस चो वॉन और लेडी चो के खेल की मासूम शिकार के तौर पर भी दिखाया जा सकता था। लेकिन सीरीज़ में उन्हें और भी बहुत कुछ करने को मिलता है। हुई-योन की कहानी एक युवा विधवा के तौर पर शुरू होती है, जिससे अच्छे चरित्र वाली छवि बनाए रखने की उम्मीद की जाती है। नाना ने इस किरदार को बहुत संयम के साथ निभाया है, जिससे किरदार की भावनाएं और शंकाएं धीरे-धीरे सामने आती हैं। जैसे-जैसे हुई-योन को अपने आस-पास हो रही घटनाओं का पता चलता है, हालात बदलते जाते हैं। अब वह सिर्फ़ ऐसी महिला नहीं रह जातीं जिन्हें उनसे ज़्यादा ताकत और आज़ादी वाले दो लोग अपनी मर्ज़ी से चला रहे हों।</p><p>यहीं पर 'द स्कैंडल' सिर्फ़ एक पुराने ज़माने की रोमांटिक कहानी से कहीं ज़्यादा बन जाती है। सीरीज़ बार-बार यह सवाल उठाती है कि तब क्या होता है जब अपनी ज़िंदगी पर बहुत कम कंट्रोल रखने वाले लोग दूसरों की भावनाओं के ज़रिए उस कंट्रोल को वापस पाने की कोशिश करते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/varun-dhawan-to-make-iifa-hosting-debut-alongside-karan-johar-at-iifa-2027-in-abu-dhabi" target="_blank" rel="noopener">IIFA 2027: अबू धाबी में करण जौहर संग होस्टिंग डेब्यू करेंगे वरुण धवन, सलमान खान और करीना कपूर जमाएंगे रंग</a></h3><p><strong>द स्कैंडल: विज़ुअल्स कहानी के मूड को समझते हैं</strong><br>'द स्कैंडल' उन ड्रामा सीरीज़ में से एक है जिसमें विज़ुअल प्रेजेंटेशन अनुभव का एक अहम हिस्सा है। प्रोडक्शन डिज़ाइन, कॉस्ट्यूम और सिनेमैटोग्राफ़ी जोसियन काल को इतिहास के किसी सबक की तरह दिखाने के बजाय, उसे एक भव्य और आकर्षक रूप में पेश करते हैं।</p><p>जुंग जी-वू तनाव पैदा करने के लिए शारीरिक हाव-भाव का भी इस्तेमाल करते हैं। एक नज़र, एक ठहराव या दो किरदारों के बीच की दूरी कभी-कभी लंबी बातचीत से ज़्यादा कुछ कह जाती है। इसलिए, इसमें कामुकता को सिर्फ़ असर डालने के लिए नहीं, बल्कि कहानी से जोड़कर दिखाया गया है। इच्छाएं इसलिए जटिल हैं क्योंकि उनसे जुड़े कई नियम-कायदे हैं।</p><p><strong>जहाँ 'द स्कैंडल' की रफ़्तार धीमी पड़ जाती है</strong><br>सबसे बड़ी समस्या यह है कि आठ एपिसोड का फ़ॉर्मेट कभी-कभी ज़रूरत से ज़्यादा लंबा लगता है। कहानी की मुख्य शर्त या दांव तो शुरू में ही तय हो जाता है, लेकिन ड्रामा कभी-कभी कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय अपने किरदारों और उनके आपसी टकरावों के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। कुछ एपिसोड में उन घटनाओं तक पहुँचने में काफ़ी समय लग जाता है जो पहले ही हो सकती थीं।</p><p>यह एक ऐसी जगह है जहाँ सीरीज़ दर्शकों के सब्र की परीक्षा ले सकती है। इसकी मूल कहानी धोखे और उसके नतीजों पर आधारित है, इसलिए तनाव इस बात पर निर्भर करता है कि किरदारों की योजनाएँ कितनी तेज़ी से खुलती हैं। कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब किरदारों के फ़ैसले कहानी के हिसाब से पूरी तरह सही लगने के बजाय, सिर्फ़ कहानी को आगे बढ़ाने के लिए सुविधाजनक लगते हैं।</p><p>इसके बावजूद, धीमी रफ़्तार वाले हिस्से उन चीज़ों को कमज़ोर नहीं करते जो इसमें अच्छी हैं। जब रिश्ते इमोशनली उलझ जाते हैं, तो उस ड्रामा में दिलचस्पी बनाए रखना आसान हो जाता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/marathi-film-gondhal-selected-as-india-official-entry-for-oscars-2027" target="_blank" rel="noopener">Marathi Film Selected For Oscars 2027 | ऑस्कर के लिए मराठी फिल्म 'गोंधल' चुनी गई भारत की आधिकारिक एंट्री, FFI ने की घोषणा</a></h3><p><strong>'द स्कैंडल': फ़ैसला</strong><br>'द स्कैंडल' तब सबसे अच्छी लगती है जब यह सिर्फ़ बहकाने-फुसलाने की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि ऐसे लोगों की कहानी बन जाती है जो एक ऐसे समाज में कंट्रोल पाने की कोशिश कर रहे हैं जहाँ उन्हें बहुत कम कंट्रोल मिलता है। सोन ये-जिन, जी चांग-वूक और नाना की तिकड़ी मज़बूत है, और हर कोई इस खतरनाक खेल में अलग-अलग तरह के इमोशन लाता है। जोसोन का बैकग्राउंड कहानी में असली दांव-पेच जोड़ता है, जबकि जंग जी-वू का डायरेक्शन सीरीज़ को एक शानदार और कामुक विज़ुअल पहचान देता है।</p><p>यह उतनी लगातार दिलचस्प नहीं है जितनी इसकी कहानी से उम्मीद थी, और इसकी रफ़्तार थोड़ी और बेहतर हो सकती थी। लेकिन लेडी चो, चो वॉन और हुई-योन के रिश्तों में इतनी उलझनें और गहराई है कि आठ एपिसोड देखना सार्थक लगता है।</p><p><a target="_blank" rel="noopener noreferrer" href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood"><span style="background-color:white;color:#007BFF;">Entertainment News Hindi&nbsp;</span></a><span style="background-color:white;color:black;">Today only at Prabhasakshi</span><span style="background-color:white;">&nbsp;</span><br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 09:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-scandal-k-drama-review-son-ye-jin-and-ji-chang-wook-impress-in-netflix</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vibe Movie Review | कॉमेडी और जासूसी के चक्कर में उलझी कुणाल खेमू की फिल्म, दूसरे हाफ में धीमी पड़ी रफ्तार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/vibe-movie-review-kunal-kemmu-comedy-spy-thriller-lacks-second-half-momentum]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कुणाल खेमू जब भी कॉमेडी की दुनिया में कदम रखते हैं, तो दर्शकों की उम्मीदें खुद-ब-खुद बढ़ जाती हैं। बतौर अभिनेता अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग साबित कर चुके खेमू अपनी नई फिल्म 'Vibe' के जरिए कॉमेडी और स्पाई-थ्रिलर (Spy-Thriller) का अनूठा तड़का लेकर आए हैं। फिल्म अपने शुरुआती पलों में एक बेफिक्र, अनोखी और हल्की-फुल्की दुनिया रचने में कामयाब होती है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी स्पाई मिशन और अंतरराष्ट्रीय साजिशों की ओर बढ़ती है, इसकी पकड़ ढीली होने लगती है।</p><p><strong>क्या है 'Vibe' की कहानी?</strong><br>फिल्म का ताना-बाना हार्दिक (कुणाल खेमू) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो बेहद लापरवाह जिंदगी जीता है और किसी भी गंभीर परिस्थिति को मजाकिया बना सकता है। उसके साथ है उसका दोस्त भागीरथ उर्फ बग्स (स्पर्श श्रीवास्तव), जो स्वभाव में उससे बिल्कुल अलग लेकिन हर कदम पर उसका साथ देने वाला साथी है।</p><p>रोमांटिक एंगल: हार्दिक की जिंदगी में करीना (वंशिका धीर) के आने से कहानी एक हल्की-फुल्की रॉम-कॉम (Rom-Com) का रूप लेती है।</p><p>ट्विस्ट व स्पाई मिशन: एक अप्रत्याशित घटना के बाद हार्दिक और बग्स मैडम एच (प्रीति जिंटा) की गुप्त इंटेलिजेंस एजेंसी के संपर्क में आते हैं। इसके बाद दोनों एक ऐसे राष्ट्रीय सुरक्षा मिशन में फंस जाते हैं जिसकी उन्होंने कभी कल्पना भी नहीं की थी।</p><p><strong>Vibe: पहले हाफ में कॉमेडी बढ़िया है</strong><br>'Vibe' का पहला हाफ फ़िल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा है। फिल्म का अंदाज़ हल्का-फुल्का है और दर्शक आसानी से किरदारों से जुड़ जाते हैं। हार्दिक की हरकतें, बग्स के रिएक्शन और दोनों के बीच की केमिस्ट्री फिल्म को कई बार मज़ेदार बनाती है। फिल्म की कॉमेडी हमेशा दमदार नहीं होती, लेकिन कोशिश साफ दिखती है। छोटे-छोटे रेफरेंस, पुरानी मशहूर फिल्मों और सितारों के नामों का इस्तेमाल और कुछ वन-लाइनर्स माहौल को हल्का बनाए रखते हैं। कभी-कभी फिल्म अपनी कहानी के अजीबपन को मानती हुई लगती है, और यही इसकी खासियत बन जाती है। हार्दिक का किरदार भी शुरुआत में दिलचस्प लगता है। वह कोई पारंपरिक हीरो नहीं है, बल्कि ऐसा व्यक्ति है जो हालात से लड़ने के बजाय उनसे भागने की कोशिश करता है। इसलिए, जब वह जासूसी की दुनिया में कदम रखता है, तो उसके रिएक्शन कॉमेडी पैदा करते हैं।</p><p><strong>जब फिल्म का मज़ा कम हो जाता है</strong><br>फिल्म की असली दिक्कतें इंटरवल के बाद शुरू होती हैं। जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, इसमें नए ट्विस्ट, ज़्यादा खतरा और ज़्यादा एक्शन आता है। यह सब कुछ देर तक तो दिलचस्प लगता है, लेकिन जल्द ही फिल्म में बहुत ज़्यादा चीज़ें भरने की वजह से दिक्कतें आने लगती हैं। यह स्पाई मिशन के साथ आतंकवाद, टेक्नोलॉजी, AI और अंतरराष्ट्रीय साज़िशों को जोड़ने की कोशिश करती है। सोच के हिसाब से, यह एक कॉमेडी स्पाई थ्रिलर को बेहतर बनाने का तरीका हो सकता था, लेकिन यहाँ कई चीज़ें सतही लगती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि फिल्म यह तय नहीं कर पाती कि वह अपनी कॉमेडी पर भरोसा करे या पूरी तरह से एक्शन फिल्म बन जाए।</p><p>दूसरे हाफ में कहानी ज़्यादा गंभीर और बड़े पैमाने की हो जाती है, जबकि दर्शक पहले ही इसके मज़ेदार और अजीब अंदाज़ के आदी हो चुके होते हैं। थाईलैंड वाला हिस्सा भी फिल्म की रफ़्तार पर असर डालता है। हालाँकि कहानी अंतरराष्ट्रीय लोकेशन और एक बड़े मिशन के स्तर पर पहुँच जाती है, लेकिन मनोरंजन का स्तर वैसा नहीं रहता। कई सीन बहुत लंबे लगते हैं।</p><p><strong>निर्देशन और लेखन: कुणाल खेमू का फिल्म में अपना विज़न</strong><br>एक निर्देशक के तौर पर, कुणाल खेमू के पास आइडिया की कोई कमी नहीं है। फिल्म के शुरुआती हिस्से में उनका विज़न साफ ​​दिखता है। वह ऐसे किरदारों और स्थितियों से कॉमेडी निकालने की कोशिश करते हैं जिनमें कुछ अजीबपन हो। शुरुआत से लेकर किरदारों के परिचय तक, फिल्म का तरीका दिखाता है कि खेमू कोई पारंपरिक कॉमेडी बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हैं। उनकी कहानी पॉप कल्चर रेफरेंस, व्यंग्य और जानबूझकर लाए गए अजीबपन से भरी है।</p><p><br>हालांकि, उनके निर्देशन की सबसे बड़ी कमी फिल्म पर कंट्रोल न रख पाना है। कहानी में कई तरह के आइडिया एक साथ दिखाए गए हैं और फिल्म का मूड बार-बार बदलता रहता है। एक तरफ तो यह हल्की-फुल्की कॉमेडी लगती है, तो दूसरी तरफ यह ज़बरदस्त एक्शन और स्पाई ड्रामा का रूप लेने लगती है। क्लाइमेक्स के पास आते-आते यह बदलाव और भी साफ़ दिखने लगता है। एक्शन को बड़ा और हीरो को ज़्यादा प्रभावशाली दिखाने की कोशिश में फिल्म अपना शुरुआती सहजपन खो देती है। कुछ सीन बहुत ज़्यादा भव्य और लंबे लगते हैं। अगर डायरेक्टर कहानी के ह्यूमर पर ज़्यादा ध्यान देते और दूसरे हाफ को छोटा रखते, तो फिल्म का असर बेहतर हो सकता था।</p><p><strong>वाइब: एक्टर के तौर पर कुणाल खेमू की छाप</strong><br>एक एक्टर के तौर पर कुणाल खेमू फिल्म का सबसे दमदार हिस्सा हैं। वे हार्दिक के किरदार में वही कॉमिक टाइमिंग लाते हैं जो दर्शकों ने उनके पिछले कामों में देखी है। उनके चेहरे के हाव-भाव, डायलॉग बोलने का अंदाज़ और हालात पर उनके रिएक्शन अक्सर फिल्म को बचा ले जाते हैं। हालांकि, दिक्कत यह है कि उनके कुछ एक्शन और कॉमिक अंदाज़ नए नहीं लगते। दर्शकों को लगातार उनके पिछले किरदारों की झलक मिलती रहती है। फिर भी, फिल्म को उसके अंजाम तक पहुँचाने में खेमू अहम भूमिका निभाते हैं।</p><p><strong>वाइब: स्पर्श श्रीवास्तव ने अपनी मौजूदगी का एहसास कराया</strong><br>बग्स का किरदार निभाने वाले स्पर्श श्रीवास्तव फिल्म का सरप्राइज़ हैं। हालांकि उनका किरदार शुरू में साधारण लगता है, लेकिन वे अपनी बॉडी लैंग्वेज और हल्के-फुल्के रिएक्शन से उसे मज़ेदार बना देते हैं। कभी-कभी किसी सीन में असली कॉमेडी नहीं होती, लेकिन सिर्फ़ स्पर्श के रिएक्शन ही चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। उनकी परफॉर्मेंस कुणाल की तुलना में कम बनावटी लगती है, और दोनों मिलकर फिल्म को ज़रूरी कॉमिक बैलेंस देते हैं।</p><p><strong>वाइब: प्रीति ज़िंटा और सपोर्टिंग कास्ट</strong><br>मैडम एच के तौर पर प्रीति ज़िंटा का किरदार अनोखा है। वे एक सख्त और प्रभावशाली स्पाई बॉस का रोल निभाती हैं और कुछ पलों में फिल्म में जान डाल देती हैं। उनके एक्शन सीन फिल्म के बेहतर हिस्सों में से हैं, लेकिन कभी-कभी वे इसे ज़रूरत से ज़्यादा करती हुई लगती हैं। हालांकि, उनके किरदार में लिखे गए कुछ ह्यूमर और महिला सशक्तिकरण के संकेत गहराई से असर नहीं छोड़ पाते।</p><p>थाईलैंड वाला हिस्सा भी कोई खास असर नहीं छोड़ता। वंशिका धीर फिल्म के ग्लैमर और रोमांटिक पहलुओं को संभालती हैं। उनकी स्क्रीन प्रेज़ेंस अच्छी है, लेकिन उनके किरदार का दायरा सीमित है। कभी-कभी उनका लहज़ा भी नैचुरल नहीं लगता। यशपाल सिंह और दिनेश लाल यादव (जिन्हें निरहुआ के नाम से भी जाना जाता है) अपने-अपने किरदारों में ठीक-ठाक हैं। शर्मिला टैगोर की छोटी सी मौजूदगी एक सुखद सरप्राइज़ देती है, लेकिन उनका रोल बहुत छोटा है।</p><p><strong>Vibe: फिल्म की कमियां क्या हैं?</strong><br>Vibe की सबसे बड़ी कमियां इसकी लंबाई और खिंचा हुआ दूसरा हाफ है। फिल्म तब सबसे अच्छी लगती है जब यह कॉमेडी मोड में रहती है। जैसे ही यह एक बड़े स्पाई-एक्शन ड्रामा में बदलने लगती है, कहानी की रफ़्तार और ह्यूमर दोनों कमज़ोर पड़ जाते हैं।</p><p>रोमांटिक ट्रैक कुछ जगहों पर कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय बोझिल लगता है। गाने फिल्म की रफ़्तार को खास बढ़ाते नहीं हैं। कुछ म्यूज़िकल नंबर कहानी में योगदान देने के बजाय सिर्फ़ माहौल बनाने के लिए जोड़े गए लगते हैं। एक्शन सीन प्रभावशाली हैं, लेकिन वे हमेशा कहानी के हिसाब से सही नहीं लगते। फिल्म का बहुत ज़्यादा मसाला, खासकर आखिरी हिस्से में, इसकी शुरुआती कॉमेडी पर हावी हो जाता है।</p><p>फिल्म का प्रोडक्शन डिज़ाइन और लोकेशन अच्छे हैं, और सिनेमैटोग्राफी भी बढ़िया है। हालांकि, शानदार लोकेशन और बड़े पैमाने पर बनी होने के बावजूद, ये कहानी की कमियों को पूरी तरह छिपा नहीं पाते। दूसरे हाफ की एडिटिंग में भी कसावट की कमी है।</p><p><br>Vibe में निश्चित रूप से एक अच्छी कॉमेडी स्पाई फिल्म बनने के गुण हैं। कुणाल खेमू का कॉमिक अंदाज़, स्पर्श श्रीवास्तव की सहज एक्टिंग और प्रीति ज़िंटा के कुछ मज़ेदार पल इसे पूरी तरह निराश करने वाली फिल्म बनने से बचाते हैं। शुरुआत में, फिल्म अपने हल्के-फुल्के मज़ाक से दर्शकों को बांधे रखती है, लेकिन दूसरा हाफ इसकी सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।</p><p>कहानी बहुत कुछ करने की कोशिश करती है और इस चक्कर में वह चीज़ खो देती है जो इसे खास बना सकती थी: इसका अजीब और बेफिक्र ह्यूमर। अगर आप कुणाल खेमू की कॉमेडी और हल्की-फुल्की टाइम-पास फिल्मों के फैन हैं, तो Vibe आपको कुछ अच्छे पल दे सकती है। हालांकि, अगर आप लगातार मज़बूत कॉमेडी और एक कसी हुई स्पाई थ्रिलर की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म बहुत ज़्यादा असर नहीं छोड़ती। कुल मिलाकर, 'वाइब' हंसाने की पूरी कोशिश करती है और कुछ पलों में कामयाब भी होती है, लेकिन मज़ेदार माहौल लंबे समय तक बना नहीं रह पाता। अच्छे आइडिया और कास्ट के बावजूद, बिखरी हुई कहानी और बहुत लंबा खिंचा हुआ दूसरा हाफ इसे औसत से बेहतर बनने से रोकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 17:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/vibe-movie-review-kunal-kemmu-comedy-spy-thriller-lacks-second-half-momentum</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA['दायरा' मूवी रिव्यू: करीना और पृथ्वीराज की इंसाफ़ की तीखी लड़ाई, पर व्यवस्था के सवालों के बीच रह गया असर अधूरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/daayra-movie-review-kareena-kapoor-and-prithviraj-sukumaran-battle-for-justice]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मेघना गुलज़ार की फिल्में हमेशा से समाज के उन छुपे हुए और असहज करने वाले पहुलुओं को सामने लाती रही हैं, जिन पर अक्सर बात करने से बचा जाता है। 'राज़ी', 'तलवार' और 'छपाक' जैसी गंभीर कहानियों के बाद मेघना इस बार 'दायरा' लेकर आई हैं। करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन के मुख्य अभिनय से सजी यह फिल्म भारतीय न्याय प्रणाली, पुलिसिया रवैये, त्वरित इंसाफ़ (Instant Justice) की जन-चाहत और महिला सुरक्षा के बीच घूमते कड़वे सच को उजागर करती है।</p><p>फिल्म में बहुत से ऐसे सवाल हैं जो सीधे दर्शक के ज़हन में उतरते हैं, लेकिन सिनेमाई बुनावट और टकराव के स्तर पर यह फिल्म अपनी बात को उस आक्रामकता से नहीं कह पाती, जिसकी इससे अपेक्षा थी।</p><p><strong>क्या है 'दायरा' की मुख्य कहानी?</strong></p><p>फिल्म की शुरुआत एक बहुत ही हाई-प्रोफाइल और नाटकीय मोड़ से होती है। DCP रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) और उनकी एनकाउंटर टीम को जनता पलकों पर बिठा रही है। उनकी टीम ने 24 वर्षीय रागिनी पुजारी के साथ हुई अमानवीय बर्बरता, सामूहिक दुष्कर्म और हत्या के चार मुख्य आरोपियों को एक कथित पुलिस मुठभेड़ में ढेर कर दिया है। आम जनता और मीडिया में जश्न का माहौल है, लेकिन कानून के गलियारों में सन्नाटा है। सवाल उठ खड़ा होता है—क्या यह एनकाउंटर वाकई में आत्मरक्षा में हुआ था या फिर यह भीड़ को शांत करने के लिए किया गया एक सु नियोजित फर्जी एनकाउंटर (Fake Encounter) था?</p><p>इसी बीच कहानी में एंट्री होती है इंटरनल विजिलेंस की सख्त और उसूलों की पक्की अफसर DCP अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) की। अजूनी को इस पूरे एनकाउंटर की निष्पक्ष जांच का जिम्मा सौंपा जाता है। जब अजूनी अपनी टीम के साथ मामले की गहराई में उतरती हैं, तो एनकाउंटर से ठीक पहले की वे खौफनाक और शर्मनाक परतें खुलती हैं जो हमारी पूरी व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती हैं।</p><p>यह फिल्म एनकाउंटर से ज्यादा उस लापरवाही पर प्रहार करती है जो अपराध के घटित होने के दौरान पुलिस स्टेशनों में हुई। गुमशुदगी की शिकायत दर्ज कराने पहुंचे पीड़िता के परिवार को एक थाने से दूसरे थाने टहलाना, पुलिस अधिकारियों का संवेदनहीन रवैया, कागजी औपचारिकताओं में बीतते अनमोल घंटे और सीसीटीवी फुटेज का 'सुविधाजनक' रूप से गायब हो जाना—यह सब दिखाता है कि रागिनी की हत्या से पहले ही हमारा सिस्टम उसे कई बार मार चुका था। यह पूरी पटकथा वर्ष 2019 के बहुचर्चित हैदराबाद एनकाउंटर केस की याद दिलाती है।</p><p><strong>अभिनय और किरदार: सधा हुआ प्रदर्शन, पर अधूरे भावनात्मक ट्रैक</strong><br>अजूनी के रोल में करीना कपूर ज़बरदस्त हैं – शांत, सधी हुई और ऐसी महिला जो न तो समय बर्बाद करती है और न ही फालतू बातें। वह सीन जिसमें वह रागिनी के परिवार से मिलती है और उन गायब घंटों के बारे में सुनती है, फ़िल्म के सबसे शांत और बेहतरीन पलों में से एक है। वह कोई हीरो का रोल नहीं कर रही हैं। वह एक ऐसी महिला का रोल कर रही हैं जो उस सिस्टम में अपना काम कर रही है जिस पर उन्हें भरोसा है, जबकि उनके आस-पास ऐसे सबूत हैं जो बताते हैं कि सिस्टम हमेशा उस भरोसे के लायक नहीं होता।</p><p>अजूनी के किरदार में एक दिलचस्प पहलू है जिसे फ़िल्म दिखाती तो है, लेकिन कभी पूरी तरह से एक्सप्लोर नहीं करती। उनके पिता, जिनका रोल कंवलजीत ने निभाया है और जो एक रिटायर्ड जज थे, उन्हें कोर्ट परिसर में गोली मारी गई थी। इसलिए न्यायपालिका में उनका भरोसा सिर्फ़ किताबी नहीं है, बल्कि निजी और उलझा हुआ है। क्या उनके पिता के साथ हुई घटना ने कानूनी प्रक्रिया के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को और मज़बूत किया, या फिर जिस सिस्टम का वह बचाव करती हैं, उसी से वह अंदर ही अंदर नाराज़ हैं? क्या उन्हें कभी रमन जैसा बनने का डर लगता है? फ़िल्म इन सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं देती और तेज़ी से आगे बढ़ जाती है, और यही इसकी सबसे बड़ी चूक है। पिता-बेटी के रिश्ते को अगर पाँच मिनट और दिए जाते, तो अजूनी सिर्फ़ उसूलों वाली महिला के बजाय सचमुच एक जटिल किरदार बन सकती थीं।</p><p>रमन कुमार के रोल में पृथ्वीराज सुकुमारन का काम असरदार है; वह ऐसे व्यक्ति हैं जिनका स्टैंड शुरू से ही साफ़ है और जो कुछ और होने का दिखावा नहीं करते। उनका मानना ​​है कि सिस्टम रागिनी के मामले में नाकाम रहा। उन्हें यकीन है कि यह अगली लड़की के मामले में भी नाकाम रहेगा। फ़िल्म आपसे उनकी बात से सहमत होने के लिए नहीं कहती। वह बस आपसे उन्हें समझने के लिए कहती है, और पृथ्वीराज ऐसा मुमकिन कर दिखाते हैं – बिना रमन को ऐसा हमदर्द किरदार बनाए जिससे उसकी गलतियों को नज़रअंदाज़ किया जा सके।</p><p><strong>कैसी है फिल्म?</strong></p><p>'दायरा' रागिनी के साथ जो हुआ, उसे लेकर आपको जितना ज़्यादा गुस्सा दिलाती है, उतना ही आसान हो जाता है यह समझना कि रमन जैसे आदमी ने वैसा क्यों किया। यही वह विरोधाभास है जिसका फ़िल्म को फ़ायदा उठाना चाहिए था। 'दायरा' को पता है कि यह बात वहाँ मौजूद है। बस, वह इसका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। 'दायरा' खुद को थ्रिलर के बजाय एक कमेंट्री के तौर पर पेश करती है, और यह फिल्ममेकर की अपनी पसंद है। फिल्म यह बताने में दिलचस्पी नहीं रखती कि कौन सही है। यह दोनों पक्षों को सामने रखती है और फिर पीछे हट जाती है। फिल्म के आखिर में दिखाए गए आंकड़े — हर 20 मिनट में रेप की रिपोर्ट, हर दिन एनकाउंटर की खबर, और रेप के आरोपियों में से सिर्फ़ 23 प्रतिशत को सज़ा मिलना — पूरी बात साफ कर देते हैं।</p><p>लेकिन दिक्कत यहाँ है। फिल्म शुरू से ही अजूनी और रमन को अलग-अलग विचारधाराओं वाले लोगों के तौर पर दिखाती है। एयरपोर्ट पर उनका आमना-सामना — जब वह उसके लौटने पर अचानक उससे मिलती है — वह पल होना चाहिए था जिसके लिए फिल्म तैयारी कर रही थी। उनकी सोच टकराती है। उनकी निजी ज़िंदगी की कहानियाँ मायने रखती हैं। दर्शकों को दोनों पक्षों पर गंभीरता से सोचने के लिए मजबूर होना पड़ता है। इसके बजाय, उनका आमना-सामना बहुत धीमा और लगभग शालीन होता है — और इसमें वह असर नहीं दिखता जिसकी ज़रूरत थी।</p><p>जिस फिल्म ने इस टकराव को तैयार करने में दो घंटे लगाए हों, उसमें असर वाला पल मुश्किल से ही महसूस होता है। जाँच से जिस चूहे-बिल्ली वाले तनाव की उम्मीद थी, वह कभी पूरी तरह नहीं बन पाता, और जब तक आखिरी टकराव का पल आता है, फिल्म पहले ही बता चुकी होती है कि कौन किस पक्ष में है। कोई हैरानी नहीं होती, न ही दोनों किरदारों के यकीन की कोई असली परीक्षा होती है, और न ही कोई ऐसा पल आता है जब हालात पूरी तरह बदल जाएँ।</p><p>हमेशा भरोसेमंद रहने वाले जितेंद्र जोशी ने सपोर्टिंग रोल में अच्छा काम किया है। रमन के सीनियर के तौर पर बिस्वपति सरकार का इस्तेमाल कम लेकिन असरदार तरीके से किया गया है। अजूनी के पिता के रोल में कंवलजीत सिंह कुछ ही सीन में दिखते हैं, लेकिन किरदार की तरह ही, उन्हें भी काम करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं मिलता। रागिनी की माँ के रोल में क्षिती जोग शानदार हैं। आप उनका दर्द महसूस कर सकते हैं।</p><p>'दायरा' सही सोच और सच्चे यकीन के साथ बनाई गई फिल्म है। मेघना गुलज़ार न्याय, न्यायपालिका और उन महिलाओं के बारे में अहम सवाल उठा रही हैं जो उस सिस्टम की खामियों का शिकार हो जाती हैं, जिसे उनकी सुरक्षा करनी चाहिए थी। कानूनी प्रक्रिया वाले हिस्से अच्छे हैं। करीना और पृथ्वीराज दोनों अच्छे हैं। सिस्टम की नाकामी पर फिल्म का गुस्सा असली है।</p><p>लेकिन जहाँ फिल्म को आगे बढ़कर बात कहनी चाहिए थी, वहाँ यह पीछे हट जाती है। मुख्य किरदार से जुड़ी निजी बातें ठीक से नहीं दिखाई गई हैं। आखिरी टकराव वैसा असर नहीं छोड़ता जैसा उसे छोड़ना चाहिए था। और अगर आप चाहते हैं कि दर्शक किसी मुश्किल नैतिक सवाल पर सोच-विचार करें, तो आपको पहले उन्हें सचमुच असहज महसूस कराना होगा। लेकिन, 'दायरा' उस मुकाम तक पूरी तरह नहीं पहुँच पाती।</p><p>यह फ़िल्म देखने लायक तो है, लेकिन हो सकता है कि यह आपको उतना न दे पाए, जितनी आपकी इससे उम्मीदें हों।<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 15:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/daayra-movie-review-kareena-kapoor-and-prithviraj-sukumaran-battle-for-justice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[The Paper Season 2 Review: JioHotstar पर न्यूज़रूम कॉमेडी और तीखे व्यंग्य का डबल डोज़]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-paper-season-2-review-highlights-sharp-modern-journalism-satire]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पत्रकारिता और न्यूज़रूम के माहौल पर आधारित कॉमेडी या व्यंग्य बनाना हमेशा से एक बेहद जोखिम भरा काम माना जाता है। किसी पत्रकार या मीडिया जगत के करीब रहे व्यक्ति की नज़र सबसे पहले उन छोटी-मोटी बारीकियों पर जाती है जो अक्सर स्क्रीन पर गलत दिखाई जाती हैं—जैसे पत्रकारों की आपसी बातचीत, किसी खबर का डेवलपमेंट, एडिटर का रवैया, डेडलाइन का दबाव और यहाँ तक कि बैकएंड पर काम करने वाला CMS (कंटेंट मैनेजमेंट सिस्टम)। ऐसे में किसी भी शो के लिए ज़रा सी चूक पर असफल होने की काफी गुंजाइश रहती है। लेकिन 'द ऑफिस' (The Office) का लोकप्रिय मॉक्यूमेंट्री स्पिन-ऑफ 'द पेपर' (The Paper) अपने दूसरे सीज़न में न केवल इन सभी कसौटियों पर पूरी तरह खरा उतरता है, बल्कि न्यूज़रूम की कड़वी सच्चाई और अफरा-तफरी को इतने शानदार ढंग से पेश करता है कि आप हँसते-हँसते लोटपोट हो जाते हैं।</p><p><strong>'टोलेडो ट्रुथ टेलर' का संघर्ष और शो का नया आत्मविश्वास</strong></p><p>'द पेपर' सीज़न 2 एक बार फिर दर्शकों को संघर्षरत स्थानीय अख़बार 'टोलेडो ट्रुथ टेलर' (TTT) की अतरंगी दुनिया में ले जाता है। यहाँ एक स्थानीय अख़बार को डिजिटल दौर में ज़िंदा रखना उतना ही मुश्किल काम है जितना कि न्यूज़रूम में बैठे पत्रकारों को इस बात पर सहमत करना कि अगली 'लीड स्टोरी' क्या होनी चाहिए।</p><p>जहाँ इसका पहला सीज़न खुद को साबित करने की कोशिश कर रहे एक स्पिन-ऑफ जैसा लगता था, वहीं दूसरा सीज़न पूरी तरह आत्मविश्वास से लबरेज़ है। शो अब 'द ऑफिस' की तुलनात्मक छाया से बाहर निकलकर अपनी एक अलग पहचान बना चुका है।</p><p><strong>आधुनिक पत्रकारिता का सटीक और तीखा व्यंग्य</strong></p><p>शो का यह नया आत्मविश्वास इसके लेखन और परिस्थितियों में साफ झलकता है। 'द पेपर' तब सबसे ज़्यादा मज़ेदार और असरदार बन जाता है जब यह आधुनिक मीडिया की उन छोटी-मोटी शर्मिंदगी वाली स्थितियों पर प्रहार करता है जिन्हें हम रोज़ देखते हैं:</p><p>विज्ञापनों की विडंबना: अख़बार की सफलता और निष्पक्षता का जश्न मनाने के लिए लगाया गया एक बड़ा बिलबोर्ड लोगों को उल्टे यह याद दिला देता है कि उन्हें अपना सब्सक्रिप्शन क्यों रद्द कर देना चाहिए।</p><p>शोक-संदेश (Obituary) का ड्रामा: एक साधारण सा शोक-संदेश अचानक एक अप्रत्याशित और विवादित मोड़ ले लेता है।</p><p>पुश नोटिफिकेशन का सिरदर्द: मोबाइल ऐप पर जाने वाला एक मामूली सा 'पुश नोटिफिकेशन' पूरे न्यूज़रूम के लिए एक बड़ा बखेड़ा खड़ा कर देता है।</p><p>यह शो पत्रकारों को कोई महान देशभक्त या लोकतंत्र को बचाने वाले 'सुपरहीरो' के रूप में नहीं दिखाता। इसके बजाय, ये वे आम लोग हैं जो हर दिन क्लिक्स, सब्सक्रिप्शन, गिरते सर्कुलेशन, डेडलाइन के तनाव और कॉर्पोरेट फैसलों के बीच झूलते हुए भी कुछ ऐसा लिखने की कोशिश कर रहे हैं जो पढ़ने लायक हो।</p><p><strong>दमदार अभिनय: डॉमनाल ग्लीसन और स्टार कास्ट का जादू</strong></p><p>अभिनेता डॉमनाल ग्लीसन TTT के एडिटर नेड सैम्पसन के रूप में इस पूरी अफरा-तफरी के केंद्र बने हुए हैं। नेड के किरदार में एक ऐसा अटूट आशावाद है जो आमतौर पर चिड़चिड़ापन पैदा कर सकता है, लेकिन ग्लीसन के अभिनय की सादगी इसे बेहद आकर्षक और प्यारा बना देती है। उन्हें दिल से विश्वास है कि डूबते अख़बार को बचाया जा सकता है।</p><p><strong>वहीं, कलाकारों की सपोर्टिंग टीम इस सीज़न की सबसे बड़ी ताकत साबित होती है:</strong></p><p>सबरीना इम्पैचियाटोर (एस्मेराल्डा ग्रैंड): सबरीना का अभिनय इस सीज़न की सबसे बड़ी उपलब्धि है। उनकी लाउड, लाउड-एंड-क्लियर और फिजिकल कॉमेडी शो को एक अलग ही ऊँचाई पर ले जाती है। क्रेट और अजीब भेष वाले उनके सीन्स बेतुके होने के बावजूद ज़बरदस्त ठहाके लगाने पर मजबूर करते हैं।</p><p>लिसा गिलरॉय: एक अजीब सी असहज ऊर्जा वाली HR ऑफिसर के रूप में लिसा गिलरॉय की एंट्री ताज़गी लाती है, जो निजी जानकारियाँ शेयर करने में कोई सीमा नहीं मानतीं।</p><p>चेल्सी फ्रे (मेयर): नेड और मेयर के बीच की केमिस्ट्री और पिछले सीज़न के चुंबन (Kiss) के बाद का ड्रामा सीज़न में रोमांटिक तड़का लगाता है। एक 'टोरनेडो' (बवंडर) वाले सीन में फिजिकल कॉमेडी को रोमांटिक पल में बदलते देखना काफ़ी असरदार है।इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/mookuthi-amman-2-teaser-released-starring-nayanthara-as-mahashakthi" target="_blank" rel="noopener">Mookuthi Amman 2 का धमाकेदार टीज़र रिलीज़: Nayanthara ने फिर धारण किया 'महाशक्ति' का अवतार, दिवाली पर होगी रिलीज़</a></p><p><strong>हास्य के पीछे छिपा एक दर्दनाक सच</strong></p><p>तमाम मज़ाकों, बेतुकी हरकतों और कॉर्पोरेट राजनीति के बीच यह शो अपने भावनात्मक पहलू को कभी नहीं खोता। सभी चुटकुलों के पीछे एक दर्दनाक और प्रासंगिक सवाल छिपा है: उन पत्रकारों और कर्मचारियों का क्या होता है जो अपने काम की ईमानदारी से परवाह करते हैं, जबकि पूरी दुनिया और उनके कॉर्पोरेट मालिक उस संस्थान की परवाह करना छोड़ चुके हैं?</p><p>शो किसी भी स्तर पर भावुक या उपदेशात्मक नहीं बनता। यह संघर्षरत अख़बार की बेइज्जती और लाचारी में भी हास्य ढूँढ लेता है। यही वजह है कि इसके भावनात्मक पल बहुत स्वाभाविक और सीधे दिल को छूने वाले लगते हैं।</p><p><strong>निष्कर्ष: क्या आपको यह देखना चाहिए?</strong></p><p>'द पेपर' सीज़न 2 साबित करता है कि बेहतरीन 'वर्कप्लेस कॉमेडी' असल में दफ्तर की दीवारों के बारे में नहीं, बल्कि वहाँ काम करने वाले हाड़-मांस के इंसानों के बारे में होती है। यद्यपि इसमें एक साथ कई ट्रैक (रोमांस, न्यूज़रूम की राजनीति, व्यक्तिगत राज़) चलाने के चक्कर में कभी-कभी बिखराव महसूस होता है, फिर भी यह शो अपनी ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और शानदार राइटिंग के दम पर दर्शकों को बाँधे रखता है।इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ramayana-film-song-jai-jai-ram-launched-with-lyrics-by-kumar-vishwas" target="_blank" rel="noopener">'यह श्री राम का वर्णन नहीं, भक्त का भाव है', Dr. Kumar Vishwas ने बताया कैसे लिखे Ramayana के 'जय जय राम' गीत के बोल</a></p><p>यदि आप 'द ऑफिस' शैली की मॉक्यूमेंट्री कॉमेडी, तीखे व्यंग्य और बेहतरीन अभिनय के शौकीन हैं, तो 'द पेपर' सीज़न 2 आपके लिए एक परफेक्ट बिंज-वॉच है। इसके सभी 10 एपिसोड अब JioHotstar पर देखने के लिए उपलब्ध हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 16:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-paper-season-2-review-highlights-sharp-modern-journalism-satire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Haiwaan Movie Review: फिल्म में है फ्रेश कहानी, डार्क किरदार और अक्षय कुमार-सैफ अली खान का अब तक का सबसे अलग अंदाज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/haiwaan-movie-review-akshay-kumar-and-saif-ali-khan-most-unique-avatar-to-date]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">‘हैवान’ अक्षय कुमार और सैफ अली खान दोनों के करियर के लिए गेम चेंजर साबित हो सकती है, क्योंकि यह सिर्फ दो बड़े सितारों की साथ में वापसी वाली फिल्म नहीं, बल्कि अपनी तरह की एक अलग और फ्रेश कहानी लेकर आती है। फिल्म का कॉन्सेप्ट दिलचस्प होने के साथ-साथ ऐसा है, जिसे हिंदी सिनेमा में बार-बार एक्सप्लोर नहीं किया गया है। एक तरफ है नेत्रहीन श्याम, जिसकी दुनिया आंखों के बजाय आवाज, एहसास और इंस्टिंक्ट से चलती है, तो दूसरी तरफ है परशुराम, जिसका रहस्य और खौफ हर पल कहानी को एक नई दिशा देता है। दोनों के बीच होने वाला मुकाबला सिर्फ हीरो और विलेन की भिड़ंत नहीं, बल्कि दिमाग, हिम्मत और सर्वाइवल का ऐसा खेल है, जहां एक छोटी सी चूक भी भारी पड़ सकती है। प्रियदर्शन ने इसी यूनिक आइडिया को अक्षय कुमार और सैफ अली खान के बिल्कुल नए अवतार के साथ पर्दे पर उतारा है और यही वजह है कि ‘हैवान’ दोनों एक्टर्स के लिए एक ऐसी फिल्म बनकर सामने आती है, जो उनकी अब तक की इमेज को बदलने की ताकत रखती है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div>‘हैवान’ की कहानी की सबसे दिलचस्प बात इसका बेसिक कॉन्सेप्ट है। यहां एक ऐसा शख्स है जो देख नहीं सकता, लेकिन उसके सामने खड़ा इंसान उसके लिए किसी भी वक्त सबसे बड़ा खतरा बन सकता है। श्याम की दुनिया आवाजों, एहसास और अंदाजे से चलती है, जबकि परशुराम अपने इरादों को पढ़ने का कोई मौका नहीं देता। दोनों के बीच शुरू होने वाला संघर्ष धीरे-धीरे एक ऐसे चेज़ में बदल जाता है, जहां हर छोटी आहट मायने रखती है और किसी भी पल कहानी का रुख बदल सकता है। फिल्म आपको लगातार इस सवाल के साथ आगे ले जाती है कि आखिर इस खेल में बढ़त किसके पास है।</div><div><br></div><div>अक्षय कुमार ने परशुराम को जिस तरह निभाया है, वह उनके करियर के आम विलेन किरदारों से काफी अलग नजर आता है। यहां वह जरूरत से ज्यादा गुस्सा या शोर नहीं करते। उनकी आंखों की नजर, चेहरे की ठंडक और बेहद नपी-तुली बॉडी लैंग्वेज ही किरदार का डर पैदा करती है। वह जब स्क्रीन पर मौजूद होते हैं, तो बिना कुछ किए भी सीन में बेचैनी महसूस होने लगती है। अक्षय ने परशुराम को ऐसा किरदार बनाया है जिसे आप जितना समझने की कोशिश करते हैं, उतना ही वह रहस्यमयी होता जाता है।</div><div><br></div><div>श्याम के रूप में सैफ अली खान का काम काफी कंट्रोल्ड है। वह नेत्रहीन किरदार को सिर्फ उसकी शारीरिक कमजोरी तक सीमित नहीं रखते, बल्कि उसकी मानसिक मजबूती को सामने लाते हैं। आवाज पहचानना, आसपास की हलचल को समझना और खतरे को महसूस करना उनके किरदार के अहम हथियार बनते हैं। सैफ का परफॉर्मेंस किसी बड़े ड्रामे पर निर्भर नहीं है, बल्कि छोटे-छोटे रिएक्शन और शांत रवैये से श्याम की स्थिति को असरदार बनाता है। यही संयम अक्षय के परशुराम के सामने उनकी मौजूदगी को और मजबूत करता है।</div><div><br></div><div>पहल चौधरी का किरदार फिल्म की कहानी में ऐसा एंगल लेकर आता है, जिसे पहले से जानना उसके इम्पैक्ट को कम कर सकता है। इसलिए उनके हिस्से को बिना किसी स्पॉइलर के देखना ही बेहतर है। उन्होंने अपने किरदार की मासूमियत और इमोशनल पहलू को अच्छी तरह पकड़ा है। सैयामी खेर, श्रिया पिलगांवकर और बोमन ईरानी भी कहानी के अलग-अलग हिस्सों को मजबूती देते हैं। शारिब हाशमी पुलिस ऑफिसर की भूमिका में अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। वहीं असरानी की स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म को एक अलग भावनात्मक रंग देती है।</div><div><br></div><div>प्रियदर्शन को लंबे समय से कॉमेडी और फैमिली एंटरटेनमेंट के लिए जाना जाता है, लेकिन ‘हैवान’ में उनका फोकस पूरी तरह अलग दिखाई देता है। निर्देशक ने कहानी को सिर्फ एक्शन सीक्वेंस के सहारे आगे नहीं बढ़ाया, बल्कि सिचुएशन और माहौल को कहानी का अहम हिस्सा बनाया है। कई सीन्स में कम संवाद और ज्यादा सन्नाटा काम करता है। यही तरीका फिल्म की टेंशन को बनाए रखता है।</div><div><br></div><div>फिल्म के साउंड डिजाइन और बैकग्राउंड म्यूजिक का इस्तेमाल इसके मूड को बनाने में अहम भूमिका निभाता है। प्रीतम का BGM खासकर उन पलों में असर डालता है, जहां स्क्रीन पर ज्यादा कुछ होता हुआ नजर नहीं आता, लेकिन अंदर ही अंदर खतरा बढ़ रहा होता है। ‘मेरे हीरो हैं’ फिल्म के इमोशनल हिस्से को सपोर्ट करता है, जबकि ‘रंगियारा’ कहानी के कुछ हल्के और ट्रैवल मोमेंट्स में अलग फील देता है। म्यूजिक को कहानी पर हावी करने के बजाय उसके मूड के हिसाब से रखा गया है।</div><div><br></div><div>मलयालम फिल्म ‘ओप्पम’ से प्रेरित होने के बावजूद ‘हैवान’ को सिर्फ सीन-दर-सीन रीमेक के तौर पर देखना सही नहीं होगा। प्रियदर्शन ने मूल कहानी के सस्पेंस को बरकरार रखते हुए इसे हिंदी दर्शकों और स्टार कास्ट की स्क्रीन इमेज के हिसाब से ढाला है। इमोशन, एक्शन और कमर्शियल एंटरटेनमेंट को इसमें अपनी जगह दी गई है। मोहनलाल की स्पेशल अपीयरेंस भी ओरिजिनल फिल्म से जुड़े दर्शकों के लिए एक खास सरप्राइज बनती है।</div><div><br></div><div>‘हैवान’ उन फिल्मों में से है जो अपनी कहानी के साथ दर्शक को लगातार जोड़े रखने की कोशिश करती है। अक्षय का डार्क अवतार, सैफ का इंटेंस परफॉर्मेंस और एक ऐसे कॉन्फ्लिक्ट का सेटअप, जहां देखने वाला भी किरदारों के साथ खतरे को महसूस करता है, फिल्म को अलग पहचान देता है। अगर आपको साइकोलॉजिकल थ्रिलर, कैट-एंड-माउस गेम और ऐसी कहानियां पसंद हैं जिनमें पूरी तस्वीर धीरे-धीरे सामने आती है, तो इस तरह से ‘हैवान’ आपके लिए सही पसंद है।</div><div>&nbsp;</div><div>डायरेक्टर – प्रियदर्शन</div><div>कास्ट – सैफ अली खान, अक्षय कुमार, बोमन ईरानी, ​​श्रिया पिलगांवकर, सैयामी खेर, मोहनलाल, असरानी, ​​शारिब हाशमी</div><div>ड्यूरेशन – 2h44m</div><div>रेटिंग – 3.5</div><div><br></div><div>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 09:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/haiwaan-movie-review-akshay-kumar-and-saif-ali-khan-most-unique-avatar-to-date</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jeevan Ya Bheema Con Movie Review | अरशद वारसी की दमदार कॉमेडी के बावजूद स्क्रिप्ट और दोहराव ने बिगाड़ा खेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/jeevan-ya-bheema-movie-review-despite-arshad-warsi-strong-comic-performance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>निर्देशक अभिषेक डोगरा के मार्गदर्शन में बनी 'जीवन या बीमा कॉन?' एक ऐसी क्राइम-कॉमेडी के रूप में सामने आती है, जो अपने अनोखे प्लॉट और मंझे हुए कलाकारों की मौजूदगी से शुरुआत में दर्शकों के भीतर खासी उत्सुकता जगाती है। नकली मौत, हमशक्ल का चक्कर, और करोड़ों के इंश्योरेंस स्कैम जैसे बेहद मजेदार और पेचीदा सेटअप पर आधारित यह कहानी पूरी तरह से एक ही घर के भीतर सिमटी हुई है। एक सीमित जगह में शानदार सिचुएशनल ह्यूमर और थ्रिल पैदा करने की असीम संभावनाएं थीं, और फिल्म का पहला हाफ लगातार होती गलतफहमियों और नए किरदारों के आने से दर्शकों को बांधे रखने में काफी हद तक सफल भी रहता</div><div><br></div><div><b>'जीवन या भीमा कॉन' किस बारे में है?</b></div><div>फिल्म एक शादीशुदा जोड़े, जीवन (अरशद वारसी) और योजना (संजीदा शेख) के इर्द-गिर्द घूमती है। दोनों आर्थिक तंगी और कर्ज़ के बोझ से जूझ रहे हैं, और इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए वे एक ऐसा प्लान बनाते हैं जो शुरू में एक चतुर समाधान लगता है। जीवन अपनी मौत का नाटक करने का फैसला करता है, और उसकी जगह एक ऐसे आदमी की लाश का इस्तेमाल किया जाता है जो बिल्कुल उसके जैसा दिखता है। उनका मकसद जीवन के इंश्योरेंस का पैसा हासिल करना है, लेकिन जैसा कि धोखे वाले किसी भी प्लान में अक्सर होता है, चीजें उम्मीद के मुताबिक नहीं होतीं। जिस आदमी को मृत घोषित किया गया है, वह असल में भीमा है, और उसका अतीत उस जोड़े की कल्पना से कहीं ज़्यादा उलझा हुआ है। भीमा हीरे की तस्करी में शामिल है, और कुछ लोग उसके पीछे पड़े हैं जो अपने हीरे वापस चाहते हैं। यहीं से जीवन और योजना के घर में मुसीबतों का सिलसिला शुरू होता है।</div><div><br></div><div>विनायक और मनु नाम के दो आदमी घर आते हैं। उन्हें लगता है कि भीमा उनके हीरे लेकर भाग गया है। अब, उनके सामने खड़ा आदमी असल में कौन है, यही कहानी में मज़ाक और उलझन का मुख्य कारण बनता है। क्या वह जीवन है या भीमा? क्या जीवन और योजना अपने इंश्योरेंस का पैसा हासिल कर पाएँगे? और गायब हुए हीरों का क्या हुआ? फिल्म इन्हीं सवालों के इर्द-गिर्द आगे बढ़ती है। कहानी में इंश्योरेंस कंपनी की जांच का पहलू भी जुड़ता है। भारी-भरकम इंश्योरेंस क्लेम पाने के लिए योजना को जांच के दौरान पकड़े जाने से बचना है, जबकि घर की मालकिन यशिका के अपने हित हैं। कहानी में पुलिस और अपराधी भी शामिल हो जाते हैं, जिससे दांव और ऊंचे हो जाते हैं। यानी फिल्म में घटनाओं की कोई कमी नहीं है। समस्या यह है कि इन अलग-अलग तत्वों को एक मजबूत कॉमिक कहानी में ठीक से नहीं पिरोया गया है।</div><div><br></div><div><b>जीवन या भीमा कॉन?: एक्टिंग</b></div><div>एक्टिंग के मामले में अरशद वारसी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। डबल रोल में, वह जीवन और भीमा के बीच साफ फर्क दिखाने की कोशिश करते हैं और दोनों किरदारों को अलग-अलग ऊर्जा देते हैं। खुद की पैदा की हुई मुश्किलों में फंसने पर जीवन की घबराहट, बेबसी और बेचैनी अरशद की परफॉर्मेंस में साफ दिखती है। वहीं, भीमा का अंदाज थोड़ा अलग है। फिल्म के कमजोर हिस्सों में भी अरशद अपनी ऊर्जा बनाए रखते हैं, और कई बार ऐसा लगता है कि जब कहानी का लेखन पर्याप्त सहारा नहीं देता, तो वह अपनी परफॉर्मेंस से सीन को बचाने की कोशिश कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>संजीदा शेख ने योजना का किरदार निभाया है और वह अरशद का अच्छा साथ देती हैं। पति-पत्नी के तौर पर दोनों की केमिस्ट्री स्वाभाविक लगती है, और कई सीन में उनका तालमेल फिल्म को बांधे रखने में मदद करता है। हालांकि, योजना के किरदार को जिस तरह से लिखा गया है, उसमें उसकी बुद्धिमानी और प्लानिंग के बजाय, उसके कुछ फैसले कहानी को आगे बढ़ाने के आसान तरीके लगते हैं। नतीजतन, किरदार में वह दम नहीं है जिसकी ऐसी कहानी को जरूरत होती है।</div><div><br></div><div>विजय राज ने विनायक के किरदार में अपने अनुभव का बखूबी इस्तेमाल किया है। उनके किरदार को डर और हास्य के बीच संतुलन बनाने के लिए डिजाइन किया गया है, और विजय राज दोनों को संभालने में सक्षम हैं। बृजेंद्र काला के साथ उनकी जोड़ी कई जगहों पर मजेदार लगती है। उनकी ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री अच्छी है, लेकिन एक जैसे कॉमिक अंदाज के बार-बार इस्तेमाल के कारण उनका ट्रैक धीरे-धीरे दोहराव वाला लगने लगता है। पूजा चोपड़ा यशिका के रोल में ठीक-ठाक हैं, लेकिन कहानी में उनके किरदार का कोई खास योगदान नहीं है। उनके कुछ ट्रैक ऐसे लगते हैं जिन्हें छोटा किया जा सकता था या बेहतर ढंग से संभाला जा सकता था।</div><div><br></div><div><b>जीवन या भीमा कॉन?: डायरेक्शन</b></div><div>अभिषेक डोगरा ने कहानी को एक सीमित जगह पर सेट किया है। फिल्म का ज़्यादातर हिस्सा एक ही घर के अंदर होता है। ऐसा सेटअप अपने आप में कोई समस्या नहीं है। अगर स्क्रिप्ट मज़बूत हो, तो एक कमरे या घर का इस्तेमाल करके भी बेहतरीन कॉमेडी और रोमांच पैदा किया जा सकता है। हालाँकि, यहाँ डायरेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती सीमित सेटिंग के बावजूद दर्शकों की दिलचस्पी बनाए रखना था।</div><div><br></div><div>फिल्म शुरू में ऐसा करने में कामयाब रहती है। नकली मौत, हमशक्ल और इंश्योरेंस स्कैम वाला सेटअप उत्सुकता पैदा करता है। जैसे-जैसे नए किरदार घर में आते हैं, स्थिति और उलझती जाती है। लेकिन एक पॉइंट के बाद, कहानी एक ही तरह के कन्फ्यूजन और गलतफहमियों को दोहराने लगती है। डायरेक्टर के पास कई मौके थे, खासकर जीवन और भीमा की पहचान को लेकर शक को और मज़ेदार और तनावपूर्ण बनाने के। स्क्रीनप्ले भी कई जगहों पर अपने ही सेटअप का पूरा फायदा उठाने में नाकाम रहता है। लगातार नए ट्विस्ट लाने की कोशिश की गई है, लेकिन हर ट्विस्ट वैसा असर नहीं डाल पाता। नतीजतन, फिल्म दूसरे हाफ में धीमी लगने लगती है।</div><div><br></div><div><b>जीवन या भीमा कॉन?: टेक्निकल पहलू</b></div><div>टेक्निकली, फिल्म के कोई बहुत बड़े प्लान नहीं हैं। चूँकि कहानी का ज़्यादातर हिस्सा घर के अंदर होता है, इसलिए सिनेमैटोग्राफी को मुख्य रूप से अलग-अलग एंगल और फ्रेमिंग के ज़रिए सीमित जगह को जीवंत बनाए रखना होता है। कैमरा वर्क ठीक-ठाक है और फिल्म के कॉमिक मूड को सपोर्ट करता है। प्रोडक्शन डिज़ाइन कहानी की घरेलू सेटिंग को तो दिखाता है, लेकिन विज़ुअली ऐसा कुछ खास नहीं है जो फिल्म को अलग पहचान दे।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड स्कोर कुछ सीन में कॉमिक टाइमिंग को बेहतर बनाने में मदद करता है। एडिटिंग में सुधार की सबसे ज़्यादा ज़रूरत महसूस होती है, क्योंकि कुछ सीन बहुत ज़्यादा लंबे खींचे गए हैं। कॉमेडी में टाइमिंग बहुत ज़रूरी होती है, और जब कोई गैग ज़रूरत से ज़्यादा देर तक चलता है, तो उसका असर तुरंत कम हो जाता है। कई जगहों पर कॉमेडी पैदा करने के लिए साउंड डिज़ाइन का भी इस्तेमाल किया गया है, लेकिन कुछ साउंड-बेस्ड जोक्स ज़रूरत से ज़्यादा दोहराए गए हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/cm-devendra-fadnavis-honours-rani-mukerji-with-raj-kapoor-special-award" target="_blank">Rani Mukerji को मिला Raj Kapoor Special Contribution Award, बोलीं- अपने लोगों से सम्मान मिलना खास</a></h3><div><br></div><div><b>जीवन या भीमा कॉन?: क्या काम नहीं करता?</b></div><div>फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी कॉमेडी है। कॉमेडी के लिए बेसिक सेटअप मौजूद है और एक्टर्स भी काबिल हैं, लेकिन हर जोक उतना असरदार नहीं होता। शुरुआत में कुछ वन-लाइनर्स और सिचुएशनल ह्यूमर काम करते हैं, लेकिन जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वही गलतफहमियां और रिएक्शन बार-बार देखने को मिलते हैं।</div><div><br></div><div>फिल्म को हल्का-फुल्का बनाए रखने के लिए टॉयलेट ह्यूमर और पादने वाले जोक्स का इस्तेमाल भी हमेशा काम नहीं करता। कहानी का स्वाभाविक हिस्सा लगने के बजाय, ये जोक्स अक्सर जबरदस्ती जोड़े गए लगते हैं। यह बात इसलिए भी खटकती है क्योंकि फिल्म का मुख्य कॉन्सेप्ट ही इतना दिलचस्प है कि इसमें और भी बेहतर कॉमेडी हो सकती थी, जिससे ऐसे आसान ह्यूमर पर इसकी ज़्यादा निर्भरता और भी साफ़ नज़र आती है।</div><div><br></div><div>एक और समस्या यह है कि फिल्म में कई सब-प्लॉट हैं, लेकिन उन सभी पर बराबर ध्यान नहीं दिया गया है। इंश्योरेंस की जांच, हीरों की तलाश, और पुलिस व अपराधियों की मौजूदगी कहानी का दायरा तो बढ़ाती है, लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे फिल्म एक साथ बहुत कुछ करने की कोशिश कर रही है। क्लाइमैक्स भी वैसा असर नहीं छोड़ पाता जिसकी उम्मीद सेटअप के बाद की जाती है। कुछ घटनाक्रम पहले ही समझ आ जाते हैं, और आखिर में होने वाले खुलासे वह सरप्राइज़ नहीं दे पाते जिसकी ऐसी मिस्ट्री-कॉमेडी को ज़रूरत होती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/grand-seven-film-series-based-on-shrimad-bhagavatam-is-in-works-vishnurata-set-release-in-2027" target="_blank">Shrimad Bhagavatam Movie Series | भारतीय सिनेमा में महाकाव्य का आगाज़! श्रीमद्भागवतम पर बनेगी 7 फिल्मों की भव्य सीरीज़, 2027 में रिलीज़ होगी 'विष्णुरत'</a></h3><div><br></div><div><b>आखिरी फैसला (Verdict)</b></div><div>'जीवन या बीमा कॉन?' अरशद वारसी की शानदार कॉमिक एनर्जी, विजय राज और बृजेंद्र काला जैसे मंझे हुए कलाकारों की अदाकारी के दम पर कुछ हल्के-फुल्के मनोरंजक पल जरूर देती है। लेकिन अगर आप एक कसी हुई, लगातार हंसाने वाली और चतुर क्राइम-कॉमेडी की उम्मीद कर रहे हैं, तो यह फिल्म आपको निराश कर सकती है।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 10 Sep 2026 12:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/jeevan-ya-bheema-movie-review-despite-arshad-warsi-strong-comic-performance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mirzapur The Movie Review | Ravi Kishan का स्वैग कालीन भैया के दबदबे पर भारी, लेकिन कमज़ोर क्लाइमैक्स ने फीका किया मज़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/mirzapur-the-movie-review-ravi-kishan-swag-overshadows-kaleen-bhaiya-dominance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'मिर्ज़ापुर' का नाम सुनते ही सबसे पहले बंदूकें, गालियां, खून-खराबा, बदला, सत्ता और भौकाल जैसी चीज़ें दिमाग में आती हैं। तीन सीज़न तक OTT पर तहलका मचाने के बाद, यह मशहूर दुनिया अब बड़े पर्दे पर सिनेमाई अंदाज़ में लौट आई है। 'मिर्ज़ापुर द मूवी' वेब सीरीज़ का महज़ अगला हिस्सा नहीं है, बल्कि यह एक अलग टाइमलाइन और नए नज़रिए के साथ बड़े पर्दे के लिए तैयार की गई एक मसाला एंटरटेनर है।</div><div><br></div><div><b>कहानी और प्लॉट</b></div><div>फ़िल्म की कहानी मिर्ज़ापुर की गद्दी पर कब्ज़े की पुरानी लड़ाई को एक नए मोड़ के साथ आगे बढ़ाती है। केंद्र में एक बार फिर कालीन भैया (पंकज त्रिपाठी) हैं, जिनकी सत्ता की भूख इस दुनिया को चलाती है। मुन्ना भैया (दिव्येंदु) अपने पिता की मंज़ूरी पाने की ज़द्दोजहद में हैं, वहीं गुड्डू पंडित (अली फ़ज़ल) और बबलू पंडित (जितेंद्र कुमार) सत्ता और दुश्मनी के बीच फंसे हैं। इस बार सबसे बड़ा ट्विस्ट लेकर आते हैं बब्बन बाबूआ (रवि किशन), जो सत्ता पर कब्ज़ा ज़माने के लिए नए खिलाड़ी के रूप में एंट्री लेते हैं। बीना भाभी (रसिका दुगल) भी अपनी चालों से समीकरण बदलती नज़र आती हैं।</div><div><br></div><div>'मिर्ज़ापुर: द मूवी' की कहानी मिर्ज़ापुर की गद्दी और उस पर कब्ज़े की पुरानी लड़ाई को नए तरीके से आगे बढ़ाती है। कहानी के केंद्र में एक बार फिर पंकज त्रिपाठी यानी कालीन भैया हैं, जिनका दबदबा और सत्ता की भूख इस दुनिया को चलाती रहती है। मुन्ना भैया (दिव्येंदु) अभी भी अपने पिता की मंज़ूरी पाने और गद्दी हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि भाई गुड्डू पंडित (अली फ़ज़ल) और बबलू पंडित (जितेंद्र कुमार) की ज़िंदगी सत्ता, परिवार और पुरानी दुश्मनी के बीच फंसी हुई है। इस बार, रवि किशन का किरदार बब्बन बाबूआ कहानी में एक नए खिलाड़ी के तौर पर आता है, जिसकी नज़र मिर्ज़ापुर की सत्ता और कंट्रोल पर है। उसके आने से पहले से ही उलझे हुए समीकरण और भी मुश्किल हो जाते हैं। पुराने रिश्ते, वफ़ादारी, धोखा, बदला और सत्ता की महत्वाकांक्षा - ये सब कहानी में साथ-साथ चलते हैं। बीना भाभी (रसिका दुगल) भी इस सत्ता के संघर्ष में अपनी चालें चलती हैं और कहानी में एक नया मोड़ लाती हैं।</div><div><br></div><div>गुड्डू और मुन्ना की मौजूदगी पुराने ज़ख्मों को फिर से ताज़ा कर देती है। दूसरी ओर, बबलू की वापसी इस बार एक अलग एक्टर के साथ होती है, जिससे दर्शकों के मन में तुलना होना स्वाभाविक है। सत्ता के संघर्ष के साथ-साथ, कहानी में रिश्तों, वफ़ादारी, प्यार और धोखे के लिए भी जगह है। फ़िल्म कोई बहुत ज़्यादा उलझी हुई या गहरी राजनीतिक कहानी बताने की कोशिश नहीं कर रही है। यह असल में एक मसाला एंटरटेनर है जो मिर्ज़ापुर की स्थापित दुनिया के ज़रिए दर्शकों को थिएटर जैसा अनुभव देना चाहती है। जब ये चीज़ें साफ़ तौर पर सामने आती हैं, तो फ़िल्म मज़ेदार लगती है। समस्या तब शुरू होती है जब यह एक ही समय में बहुत सारे किरदारों और ट्रैक को जगह देने लगती है। कई हिस्से ऐसे हैं जो अलग-अलग तो अच्छे लगते हैं, लेकिन जब सब कुछ एक साथ आता है, तो फ़िल्म थोड़ी बिखरी-बिखरी सी लगने लगती है। OTT कहानी को कई एपिसोड में फैलाने की आज़ादी देता है, लेकिन फ़िल्म में हर सीन का कहानी की रफ़्तार में योगदान होना ज़रूरी है। यहाँ ऐसा हमेशा नहीं होता।</div><div><br></div><div><b>मिर्ज़ापुर द मूवी: एक्टिंग</b></div><div>पंकज त्रिपाठी, कालीन भैया के तौर पर हमेशा की तरह दमदार हैं, लेकिन उनका स्क्रीन टाइम कम है। उनके और रवि किशन के बीच सीधी टक्कर और भी मज़ेदार होती। रवि किशन, बब्बन बाबूआ के तौर पर छा जाते हैं। जब भी वह स्क्रीन पर आते हैं, आपकी नज़रें उन पर ही टिकी रहती हैं। आप एक पल के लिए भी नज़रें नहीं हटा पाएंगे। वही असली पूर्वांचली अंदाज़ लेकर आते हैं। उनके चलने-फिरने का तरीका और बॉडी लैंग्वेज उन्हें पंकज त्रिपाठी, अली फ़ज़ल और दिव्येंदु शर्मा—तीनों से कहीं ज़्यादा दमदार बनाती है। अली फ़ज़ल (गुड्डू पंडित) और दिव्येंदु शर्मा (मुन्ना भैया) स्क्रीन पर पुरानी यादें ताज़ा करने में कामयाब रहे हैं। दोनों का अंदाज़ वही पुराना वाला है। उनका जुनून भरा अंदाज़ आज भी वैसा ही है, जैसा पहले था।</div><div><br></div><div>बिरजू लोहार के रोल में मोहित मलिक कहानी में एक नया मोड़ लाते हैं। क्लाइमेक्स तक पहुँचने से पहले ऐसा लगता है कि कहानी उन्हीं के इर्द-गिर्द घूम रही है। उनकी एक्टिंग ज़बरदस्त है। उनकी वफ़ादारी, प्यार और खतरनाक स्वभाव उनकी परफॉर्मेंस में साफ़ झलकते हैं। [स्पॉइलर अलर्ट]: लेकिन अगर यह किरदार बच जाता, तो चौथे सीज़न में उनसे बहुत उम्मीदें होतीं। यह मोहित मलिक की दूसरी फ़िल्म है। इससे पहले वह टीवी के बड़े स्टार थे। सालों बाद उनके टैलेंट को पहचाना गया और उन्हें जो मौका मिला, उसका उन्होंने पूरा और सही इस्तेमाल किया। रसिका दुगल एक बार फिर कमाल करती हैं। क्लाइमेक्स में कहानी को वही मोड़ती हैं। बीना भाभी के रोल में रसिका ने वही पुराना असर छोड़ा है।</div><div><br></div><div>सोनाली चौहान ने मुमताज़ बीबी का रोल किया है। उनका रोल छोटा है, लेकिन वह इस किरदार में एकदम सही हैं। रवि किशन के साथ उनकी जोड़ी बहुत अच्छी लगती है। उनकी सहज सुंदरता से नज़रें हटाना आसान नहीं है। जितेंद्र कुमार ने बबलू पंडित का रोल किया है। विक्रांत मैसी ने मिर्ज़ापुर सीरीज़ में यह किरदार इतनी शानदार ढंग से निभाया था कि इस रोल से उनकी छाप मिटाना नामुमकिन है। इसीलिए, जितेंद्र चाहे कितनी भी कोशिश कर लें, वह वैसा असर नहीं छोड़ पाते जैसा विक्रांत ने छोड़ा था। वह अच्छे एक्टर हैं, लेकिन यह किरदार उनके लिए नहीं बना था। इस पर पहले से ही विक्रांत मैसी का नाम लिखा हुआ है।</div><div><br></div><div>गुड्डू और बबलू की माँ वसुधा के रोल में शीबा चड्ढा बेहतरीन हैं। गुड्डू के पिता के रोल में राजेश तैलंग भी प्रभावशाली हैं। वह जानते हैं कि कम स्क्रीन टाइम में भी अपनी दमदार परफॉर्मेंस से कैसे असर छोड़ा जाए। कहानी ने भैरव सिंह करनावत के रोल में सुशांत सिंह के साथ नाइंसाफ़ी की है। इतने टैलेंटेड एक्टर कहानी में और भी मज़बूत जगह के हक़दार थे। आपको बार-बार लगेगा कि उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया, जबकि उन्हें फ़िल्म जगत के शुरुआती गैंगस्टर्स में से एक माना जाता है। राम गोपाल वर्मा की लगभग हर फ़िल्म में उनका हुनर ​​साफ़ दिखता था। बाबू जी के रोल में कुलभूषण खरबंदा एकदम सही हैं। कंपाउंडर के रोल में अभिषेक बनर्जी भी ठीक-ठाक हैं, लेकिन अगर वह कहानी में न होते तो भी कोई खास फ़र्क नहीं पड़ता। उनका रोल और भी छोटा हो सकता था और उससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। 'लापता लेडीज़' के एक्टर सतेंद्र सोनी भी अपने छोटे से रोल में अच्छे लगे हैं। शाजी चौधरी एक बार फिर मकबूल के रोल में अच्छे हैं। प्रमोद पाठक ने जेपी यादव के रोल के साथ न्याय किया है। श्रिया पिलगांवकर, हर्षिता गौर और श्वेता त्रिपाठी के होने या न होने से कोई खास फर्क नहीं पड़ता।</div><div><br></div><div><b>एक्शन, डायरेक्शन और विज़ुअल ट्रीटमेंट</b></div><div>निर्देशक गुरमीत सिंह ने मिर्ज़ापुर के ओरिजिनल फ्लेवर को बनाए रखने की पूरी कोशिश की है। बड़े पर्दे के हिसाब से गैंग वॉर, कार चेज़ और आमने-सामने की भिड़ंत को काफी भव्य पैमाने पर शूट किया गया है। राजस्थान की लोकेशंस और बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म को एक सिनेमाई स्केल देते हैं। हालांकि, हर एक्शन सीन उतना असरदार नहीं है, खासकर वह जिसमें रवि किशन और अली फज़ल हैं। कुछ जगहों पर ऐसा लगता है कि एक्शन को कहानी से स्वाभाविक रूप से निकलने के बजाय सिर्फ़ दर्शकों में उत्साह पैदा करने के लिए जोड़ा गया है। बड़े सेटअप के बावजूद, हर सीन में उतना इमोशनल वजन नहीं है।</div><div><br></div><div><b>मिर्ज़ापुर द मूवी: डायरेक्शन</b></div><div>गुरमीत सिंह जानते हैं कि मिर्ज़ापुर के दर्शक क्या चाहते हैं। उन्होंने फिल्म के ट्रीटमेंट में पुराने मिर्ज़ापुर वाले फ्लेवर को बनाए रखने की कोशिश की है। डायलॉग, किरदारों का व्यवहार, हिंसा और रिश्तों में कड़वाहट - ये सभी ओरिजिनल सीरीज़ की पहचान को बनाए रखते हैं। डायरेक्शन तब सबसे मज़बूत होता है जब यह किरदारों को आमने-सामने लाता है। पुराने चेहरों को एक साथ देखने का उत्साह और उनके बीच की केमिस्ट्री कई सीन में अतिरिक्त ऊर्जा भर देती है। लेकिन डायरेक्शन के साथ सबसे बड़ी समस्या फिल्म की लंबाई और रफ़्तार है। कई जगहों पर आपको लगता है कि एडिटिंग टेबल पर फिल्म को थोड़ा छोटा और कसा हुआ करने की ज़रूरत थी। कुछ सीन कहानी को आगे बढ़ाए बिना ही दुनिया का विस्तार करते हैं। इस वजह से, दूसरे हाफ में कई बार रफ़्तार धीमी हो जाती है।</div><div><br></div><div><b>फ़िल्म की मुख्य कमियां</b></div><div><b>धीमी रफ़्तार और लंबाई: </b>फ़िल्म की लंबाई बहुत ज़्यादा है। अनावश्यक गानों और मुन्ना भैया की बेइज्जती वाले सीन काटकर इसे छोटा किया जा सकता था।</div><div>&nbsp;</div><div><b>कमज़ोर क्लाइमैक्स:</b> पूरी फ़िल्म में बब्बन बाबूआ (रवि किशन) को बेहद ताकतवर दिखाया गया, लेकिन क्लाइमैक्स में उनका अंत बहुत आसानी से और निराशाजनक तरीके से कर दिया गया।</div><div>&nbsp;</div><div><b>लॉजिक की कमी: </b>एक सीन में गंभीर रूप से घायल गुड्डू पंडित को 'ऊंट वाले इंजेक्शन' से अचानक हल्क जैसी ताकत मिलते हुए दिखाया गया है, जो थोड़ा अजीब लगता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>सेंसर बोर्ड का असर: </b>अगर आप सीरीज़ जैसे अत्यधिक बोल्ड सीन, गालियां और खून-खराबे की उम्मीद कर रहे हैं, तो थिएटर में यह सब काफी सीमित मात्रा में देखने को मिलेगा।</div><div><br></div><div><b>मिर्ज़ापुर द मूवी: क्या चीज़ें अच्छी हैं?</b></div><div>कहानी की सबसे बड़ी ताकत मिर्ज़ापुर की दुनिया और उसके किरदारों का असर है। यह फ़िल्म उन रिश्तों और पावर गेम्स को बड़े पर्दे पर लाती है जिन्होंने इस फ़्रैंचाइज़ी को पहचान दिलाई थी। कालीन भैया की वापसी कहानी को सबसे ज़्यादा मज़बूती देती है। उनका शांत लेकिन खतरनाक अंदाज़ आज भी दर्शकों पर असर डालता है, भले ही उनका रोल छोटा हो।</div><div><br></div><div>गुड्डू, मुन्ना और बबलू के बीच पुरानी केमिस्ट्री और तनाव भी कहानी को दिलचस्प बनाए रखते हैं। साथ ही, बब्बन यादव के तौर पर रवि किशन की एंट्री कहानी में नया रंग भरती है। उनका किरदार पुराने खिलाड़ियों के लिए एक नई चुनौती पेश करता है। सत्ता, परिवार, वफ़ादारी और धोखे के बीच बदलते समीकरण दिलचस्प हैं। सबसे अच्छी बात यह है कि फ़िल्म सिर्फ़ एक्शन पर निर्भर नहीं है। यह अपने किरदारों के रिश्तों और महत्वाकांक्षाओं को भी जगह देती है। पुराने और नए का यह तालमेल इसे मनोरंजक बनाता है।</div><div><br></div><div><b>क्या मिर्ज़ापुर: द मूवी देखने लायक है?</b></div><div>हाँ, लेकिन आपको अपनी उम्मीदों को थोड़ा संतुलित रखना होगा। अगर आप मिर्ज़ापुर के फ़ैन हैं और अपने पसंदीदा किरदारों को बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो फ़िल्म आपको कई ऐसे पल देती है जो थिएटर जाने को सार्थक बनाते हैं। डायलॉग्स पर रिएक्शन मिलेंगे, एक्शन पर सीटियाँ बजेंगी और पुराने किरदारों की वापसी पुरानी यादें ताज़ा कर देगी।</div><div><br></div><div>लेकिन अगर आप ऐसी फ़िल्म की उम्मीद कर रहे हैं जो मिर्ज़ापुर की दुनिया को बिल्कुल नए स्तर पर ले जाए, तो आप निराश हो सकते हैं। फ़िल्म में आइडिया या किरदारों की कमी नहीं है। समस्या तो इसके ठीक उलट है। इतनी सारी चीज़ें हो रही हैं कि कहानी को खुलकर आगे बढ़ने के लिए बहुत कम जगह मिलती है।</div><div><br></div><div>मिर्ज़ापुर: द मूवी में वह 'भौकाल' है, पुराने किरदारों का आकर्षण है, दमदार परफ़ॉर्मेंस है और कई ऐसे पल हैं जो थिएटर में आपका मनोरंजन कर सकते हैं। रवि किशन फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक बनकर उभरते हैं, जबकि पंकज त्रिपाठी, अली फ़ज़ल, दिव्येंदु शर्मा और रसिका दुग्गल अपने-अपने किरदारों की पहचान बनाए रखते हैं। समस्या यह है कि फ़िल्म की लंबाई, बहुत सारी स्टोरीलाइन और कुछ कमज़ोर क्रिएटिव फ़ैसले इसे एक यादगार सिनेमाई अनुभव बनने से रोकते हैं, जो यह बन सकती थी। अगर फ़िल्म छोटी होती, कुछ फ़ालतू हिस्से हटा दिए जाते और क्लाइमैक्स को और असरदार बनाया जाता, तो इसका असर कहीं ज़्यादा ज़बरदस्त हो सकता था। फिर भी, बड़े पर्दे पर मिर्ज़ापुर की दुनिया को देखने का मज़ा ही कुछ और है। यह फ़िल्म एकदम बेहतरीन तो नहीं है, लेकिन पूरी तरह से निराश भी नहीं करती।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 05 Sep 2026 14:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/mirzapur-the-movie-review-ravi-kishan-swag-overshadows-kaleen-bhaiya-dominance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gandhari Movie Review | थ्रिलर देने की जल्दबाज़ी में भटकी तापसी पन्नू और ईश्वाक सिंह की थ्रिलर फ़िल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/gandhari-movie-review-taapsee-and-ishwak-singh-thriller-loses-way-in-rush-to-deliver-thrills]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बेहतरीन सस्पेंस-थ्रिलर फ़िल्म में क्या होना चाहिए? एक मजबूत मुख्य किरदार, मां-बेटी के रिश्ते की गहराई या फिर एक हंसते-खेलते परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़? नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ हुई निर्देशक देवाशीष मखीजा की नई फ़िल्म 'गांधारी' (Gandhari) इन्हीं सब पहलुओं को समेटने का प्रयास करती है। तापसी पन्नू स्टारर यह एक्शन-थ्रिलर शुरुआत तो दमदार करती है, लेकिन जल्द ही थ्रिल पैदा करने की हड़बड़ी में अपनी राह से भटक जाती है।</div><div><br></div><div><b>क्या है फ़िल्म की कहानी?</b></div><div>फ़िल्म की कहानी बानी (तापसी पन्नू) की है, जिसकी मासूम बेटी मिष्टी ट्रेन यात्रा के दौरान मानव तस्करी (Human Trafficking) करने वाले खूंखार गिरोह का शिकार हो जाती है। जब बानी और उसके पति गोकुल (ईश्वाक सिंह) को एहसास होता है कि जॉयपुरा की स्थानीय पुलिस उनकी कोई मदद नहीं कर रही, तो बानी खुद अपनी बेटी को खोजने निकल पड़ती है।</div><div><br></div><div>कहानी में बड़ा मोड़ तब आता है जब एक हादसे में बानी की आंखों की रोशनी धीरे-धीरे जाने लगती है। दृष्टिबाधित होने के बावजूद वह हार नहीं मानती और अपनी बेटी को बचाते हुए शहर में फैले एक बहुत बड़े ह्यूमन ट्रैफिकिंग रैकेट की पोल खोलती है।</div><div><br></div><div><b>गांधारी: कहानी में कमी</b></div><div>'गांधारी' की शुरुआत अच्छी होती है। साथ ही, आप स्टार कास्ट और कहानी से प्रभावित भी होते हैं। लेकिन पहले 20 मिनट के बाद फ़िल्म अचानक कमज़ोर पड़ने लगती है। हमें नहीं पता कि यह कहानी की समस्या है या नहीं, लेकिन यह ज़रूर पता है कि कहानी के हिस्सों को ठीक से न जोड़ पाना एक बड़ी कमी थी।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, जब तापसी स्थानीय पुलिस पर भरोसा न करके खुद अपनी बेटी को खोजने का फ़ैसला करती है, तो उसे पता चलता है कि उसके पास अपनी बेटी को खोजने के लिए डेढ़ महीने का समय है। फिर सीन एक महीने बाद की घटना पर चला जाता है। तब तक, तापसी, जिसे ठीक से दिखाई भी नहीं देता, शहर के ज़्यादातर लोगों से दोस्ती कर लेती है। वह एक NGO में पढ़ाती भी है।</div><div><br></div><div>हालाँकि ऐसा होना पूरी तरह नामुमकिन नहीं है, लेकिन तापसी जिस तरह से इस स्थिति तक पहुँचती है, वह बहुत जल्दबाज़ी में किया गया लगता है। दर्शकों को दुखी माँ के लिए महसूस करने का ज़्यादा समय ही नहीं मिलता। और यह सिर्फ़ एक उदाहरण है। फिल्म में रहस्य का माहौल बनाने के लिए 'बहुरूपियों' का इस्तेमाल एक अहम चीज़ के तौर पर किया गया है। हालांकि, कहानी में कुछ खास जोड़ने के बजाय, वे बस कुछ पल के लिए डराने-धमकाने का काम करते हैं।</div><div><br></div><div>आमतौर पर माना जाता है कि थ्रिलर फिल्में तेज़ रफ़्तार वाली होनी चाहिए। लेकिन 'गांधारी' की रफ़्तार कुछ ज़्यादा ही तेज़ है। आप साफ़ तौर पर देख सकते हैं कि फिल्म को जल्दबाज़ी में बनाया गया है। फिल्म बनाने वाले और एडिटर का पूरा ध्यान सिर्फ़ एक्शन पर है। वे दर्शकों को कहानी को 'महसूस' करने का काफ़ी समय नहीं देते, खासकर ऐसी कहानी में जिसमें इतने इमोशनल पहलू हों।</div><div><br></div><div>मिसाल के तौर पर, मीता वशिष्ठ के किरदार को ही ले लीजिए। वह आती हैं और बानी अचानक उन पर भरोसा करने लगती है। फिर वह उनसे लड़ाई-झगड़े और खुद का बचाव करने के तरीके सीखने लगती है। आपको लगता है कि कहीं पलक झपकते ही आपने कुछ ज़रूरी पल तो नहीं छोड़ दिए। लेकिन जल्द ही आपको समझ आ जाता है कि असल में दिक्कत कहाँ है।</div><div><br></div><div><b>गांधारी: एक्टिंग</b></div><div>'गांधारी' में बेहतरीन कलाकार हैं। हालांकि, लगभग हर किरदार का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं किया गया है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">तापसी पन्नू ने बानी का किरदार निभाया है। अपनी फिल्मों की वजह से वह एक वर्सेटाइल कलाकार के तौर पर जानी जाती हैं। 'गांधारी' में तापसी ने किरदार को अपने अंदाज़ में ढालने की कोशिश की है। हालांकि, कमज़ोर स्क्रिप्ट कहानी को कमज़ोर कर देती है। कुछ हिस्से समझ नहीं आते, तो कुछ हद से ज़्यादा लगते हैं।</span></div><div><br></div><div>इसमें 'अंधाधुन' जैसा एक पल भी है, जिसे हम यहाँ नहीं बताएंगे। लेकिन हमने तापसी को इससे बेहतर काम करते देखा है। फिर भी, इमोशनल पलों के लिए उनकी तारीफ़ करनी होगी। जब वह रोती हैं और अपने पति से खोए हुए बच्चे को वापस लाने की गुहार लगाती हैं, तो वह आपको अपना दर्द महसूस कराने में कामयाब रहती हैं।</div><div><br></div><div>एक्शन सीन भी अच्छे से किए गए हैं। तापसी उन वजहों में से एक हैं जिनकी वजह से आप 'गांधारी' को एक मौका दे सकते हैं।</div><div><br></div><div>गोकुल के किरदार में इश्वक सिंह - जो तापसी के पति और खोए हुए बच्चे के पिता हैं - काफ़ी असरदार लगे हैं। वह फिल्म की कुछ अच्छी चीज़ों में से एक हैं। लेकिन कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब उनके किरदार को निखरने का पूरा मौका नहीं मिलता। फिर भी, इश्वक ने जो कुछ भी उन्हें मिला है, उसका पूरा फ़ायदा उठाने की पूरी कोशिश की है।</div><div><br></div><div>मीता वशिष्ठ, स्वस्तिका मुखर्जी, जतिन सरना, प्रशांत नारायणन और चंदन रॉय बहुत मशहूर नाम हैं। असल में, शानदार स्टार कास्ट उन वजहों में से एक है जिनकी वजह से आप में से कई लोग 'गांधारी' देखने के बारे में सोचेंगे।</div><div><br></div><div>हालांकि, लगभग हर किरदार की कहानी में कमियां हैं और उनका पूरा इस्तेमाल नहीं किया गया है। जब छाया कदम का किरदार स्क्रीन पर आता है, तो आपको थोड़ी उम्मीद होती है कि शायद यह कुछ राहत देगा। लेकिन यह यकीन करना मुश्किल है कि यह वही एक्ट्रेस हैं जिन्होंने 'ऑल वी इमेजिन एज़ लाइट' और 'लापता लेडीज़' जैसी फिल्मों से देश का नाम रोशन किया था।</div><div><br></div><div>और खासकर प्रशांत नारायणन। 'मर्डर 2' में धीरज पांडे के रोल में इस एक्टर ने हमें डरा दिया था। 'गांधारी' में वे मुख्य विलेन हैं, लेकिन आपको शायद ही ऐसा महसूस हो। वे बहुत कम समय के लिए स्क्रीन पर आते हैं। उनके किरदार का जो अंजाम होता है, या जिस तरह से होता है, वह भी दुखद है। एक एक्टर के तौर पर प्रशांत में बहुत काबिलियत है। हालांकि, 'गांधारी' उनके साथ उतना न्याय नहीं करती जितना किया जाना चाहिए था।</div><div><br></div><div><b>गांधारी: निर्देशन और लेखन</b></div><div>कनिका ढिल्लों इस फ़िल्म की लेखिका और प्रोड्यूसर हैं। देवाशीष मखीजा इसके निर्देशक हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">और यहीं पर 'गांधारी' सबसे ज़्यादा कमज़ोर पड़ जाती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">यहाँ एक बहुत ही दिलचस्प कहानी हो सकती थी। ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग (मानव तस्करी)। गायब लड़कियाँ। एक माँ जो बेताबी से अपने बच्चे को ढूँढ रही है। एक महिला जो अपनी शारीरिक सीमाओं से जूझते हुए एक बड़े क्रिमिनल नेटवर्क का सामना कर रही है। कागज़ पर देखें तो, एक ज़बरदस्त थ्रिलर के लिए इसमें काफ़ी मसाला है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">लेकिन लेखन इन चीज़ों को ठीक से उभरने का मौका ही नहीं देता।</span></div><div><br></div><div>स्क्रीनप्ले बिना सही संदर्भ (context) बनाए एक घटना से दूसरी घटना पर तेज़ी से आगे बढ़ता है। किरदार आते हैं, गायब हो जाते हैं और बिना किसी ठोस वजह के वापस आ जाते हैं। इमोशनल पल तो आते हैं, लेकिन उन्हें असर छोड़ने का समय शायद ही कभी मिलता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/controversy-erupts-over-kichcha-sudeepa-bearded-look-as-sri-krishnadevaraya-in-devaraaya" target="_blank"> Devaraaya में श्री कृष्णदेवराय बने Kichcha Sudeepa के दाढ़ी वाले लुक पर छिड़ा विवाद, ऐतिहासिक सटीकता पर उठे सवाल</a></h3><div><br></div><div>देवाशीष मखीजा एक डार्क और गंभीर माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। उनकी मंशा साफ़ दिखती है। एक्शन सीन भी तेज़ी और हड़बड़ी के साथ दिखाए गए हैं। लेकिन निर्देशन स्क्रीनप्ले की सबसे बड़ी समस्या को दूर नहीं कर पाता - फ़िल्म को हमेशा अगले प्लॉट पॉइंट पर पहुँचने की जल्दी रहती है।</div><div><br></div><div>नतीजा यह होता है कि यह एक ऐसी थ्रिलर बन जाती है जो आपको बताती तो है कि क्या हो रहा है, लेकिन हमेशा उसे महसूस नहीं करा पाती।</div><div><br></div><div><b>गांधारी: क्या अच्छा है</b></div><div>'गांधारी' की सबसे बड़ी खूबी इसका आधार (premise) है। अपनी अगवा बेटी को ढूँढती माँ की कहानी अपने आप में ही इमोशनल होती है। इसमें ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग का रैकेट और मुख्य किरदार की आँखों की रोशनी का धीरे-धीरे जाना जोड़ दें, तो एक ज़बरदस्त थ्रिलर बनने की पूरी गुंजाइश बन जाती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/hollywood/ott-september-3-releases-the-gentlemen-season-2-chad-powers-and-dulquer-salmaan-i-am-game" target="_blank">3 सितंबर को OTT और सिनेमाघरों में धमाकेदार एंटरटेनमेंट! The Gentlemen Season 2, Chad Powers और दुलकर सलमान की 'आई एम गेम' रिलीज़</a></h3><div><br></div><div>कास्ट भी एक बड़ी खूबी है। तापसी पन्नू और इश्वक सिंह ने बेहतरीन काम किया है। सपोर्टिंग कास्ट में भी कई टैलेंटेड कलाकार हैं।</div><div><br></div><div>एक्शन सीन कहीं-कहीं अच्छे लगते हैं। फ़िल्म एक डार्क और डरावना माहौल बनाने में भी कामयाब रहती है, खासकर शुरुआत में।</div><div><br></div><div>और कमियों के बावजूद, तापसी के इमोशनल सीन असरदार हैं। एक माँ के तौर पर उनकी बेताबी शायद फ़िल्म का सबसे दमदार हिस्सा है।</div><div><br></div><div><b>गांधारी: क्या अच्छा नहीं है</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सबसे बड़ी समस्या लेखन है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">फ़िल्म बहुत तेज़ी से आगे बढ़ती है। इतनी तेज़ी से कि कहानी में अहम मोड़ बिना किसी ठोस आधार के लगते हैं। किरदारों को ठीक से विकसित होने का समय नहीं मिलता। इमोशनल पल असर छोड़ने से पहले ही खत्म हो जाते हैं।</span></div><div><br></div><div>ह्यूमन ट्रैफ़िकिंग का एंगल एक ज़बरदस्त सोशल थ्रिलर बना सकता था। इसके बजाय, यह अक्सर कहानी को आगे बढ़ाने के लिए इस्तेमाल किया गया एक ज़रिया (plot device) लगता है।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग किरदारों का भी सही इस्तेमाल नहीं हुआ है। इतनी मज़बूत कास्ट के साथ, आप यादगार किरदारों की उम्मीद करते हैं। इसके बजाय, आपको ऐसे कई कलाकार मिलते हैं जिन्हें लगता है कि उन्हें अधूरे लिखे हुए रोल दिए गए हैं।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ी निराशा यह है कि 'गांधारी' में एक अच्छी थ्रिलर वाली सभी खूबियां हैं। इसमें अच्छे कलाकार हैं। कहानी का आधार भी अच्छा है। इसमें डार्क माहौल है। यहाँ तक कि इसमें कुछ वाकई इमोशनल पल भी हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">लेकिन ये सभी चीज़ें कभी ठीक से जुड़ नहीं पातीं।</span></div><div><br></div><div><b>गांधारी: आखिरी फैसला</b></div><div>'गांधारी' की शुरुआत एक अच्छे आइडिया के साथ होती है, लेकिन जल्द ही यह अपनी पकड़ खो देती है। फिल्म एक ही समय में माँ-बेटी की इमोशनल कहानी और एक ज़बरदस्त थ्रिलर बनना चाहती है। अफ़सोस की बात है कि यह दोनों में से कुछ भी ठीक से नहीं कर पाती।</div><div><br></div><div>तापसी पन्नू ने अपना सब कुछ झोंक दिया है। इश्वक सिंह ने ईमानदारी से काम किया है। सपोर्टिंग कास्ट भी टैलेंटेड है। लेकिन इनमें से कोई भी उस स्क्रीनप्ले को पूरी तरह नहीं बचा पाता जो जल्दबाजी में लिखा हुआ और अधूरा लगता है।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ी विडंबना यह है कि 'गांधारी' एक ऐसी थ्रिलर है जो अपनी ही कहानी को थ्रिल पैदा करने के लिए काफ़ी समय नहीं देती।</div><div><br></div><div>कुछ पल ऐसे आते हैं जब आप 'बानी' का साथ देना चाहते हैं। कुछ पल ऐसे भी होते हैं जब फिल्म लगभग उस मुकाम तक पहुँच जाती है। लेकिन ठीक जब आप कहानी में रमने लगते हैं, तो यह फिर से तेज़ी से आगे बढ़ जाती है - बिना आपको साथ लिए।</div><div><br></div><div>'गांधारी' के लिए 2/5 स्टार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 03 Sep 2026 15:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/gandhari-movie-review-taapsee-and-ishwak-singh-thriller-loses-way-in-rush-to-deliver-thrills</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Once More Movie Review | अर्जुन दास और अदिति शंकर की केमिस्ट्री एक उतार-चढ़ाव वाली रोमांटिक कहानी में जान डालती है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/once-more-movie-review-arjun-das-and-aditi-shankar-chemistry-breathes-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">अगर आप किस्मत में यकीन रखते हैं, तो ज़िंदगी का सीधा सा मतलब है—'दूसरा मौका'। इसी सोच और उम्मीद पर टिकी है निर्देशक विग्नेश श्रीकांत की रोमांटिक ड्रामा फिल्म 'वन्स मोर' (Once More)। यह कहानी एक ऐसे इंसान के इर्द-गिर्द घूमती है जो डिप्रेशन के अंधियारे में खुशियों का मतलब भूल चुका है। रघुवरन की बेरंग जिंदगी में जब खुशियों से लबरेज अंजलि की एंट्री होती है, तो कहानी एक नया मोड़ लेती है।</span></div><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>फिल्म का मुख्य किरदार रघुवरन (अर्जुन दास) पिछले आठ सालों से एक दुखद अतीत के साए में जी रहा है। एक पुरानी त्रासदी ने प्यार और जीवन के प्रति उसके नजरिए को पूरी तरह बदल दिया है। वह खुद में सिमटा रहता है, तभी उसकी कॉलेज जूनियर अंजलि (अदिति शंकर) अचानक उसकी दुनिया में वापस आती है।</div><div><br></div><div>अंजलि का उत्साही और चुलबुला स्वभाव रघुवरन के शांत और अकेले रहने की आदत के बिल्कुल उलट है। रघुवरन उसे खुद से दूर करने की हरसंभव कोशिश करता है, लेकिन अंजलि का निश्छल प्यार धीरे-धीरे उसकी खामोशी की दीवार को तोड़ने लगता है। क्या रघुवरन अपने अतीत को भुलाकर अंजलि के साथ जिंदगी को 'एक और मौका' दे पाएगा? फिल्म इन्हीं संवेदनशील सवालों के जवाब तलाशती है।</div><div><br></div><div><b>संवेदनशील मुद्दों पर परिपक्व दृष्टिकोण</b></div><div>'वन्स मोर' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह डिप्रेशन, आत्महत्या, सेम-सेक्स रिलेशनशिप (समलैंगिक संबंध) और इंटिमेसी जैसे संवेदनशील विषयों को बहुत ही सहजता और परिपक्वता से पर्दे पर उतारती है।</div><div><br></div><div>बिना किसी जजमेंट के चित्रण: फिल्म इन गंभीर विषयों को सिर्फ ड्रामे या सनसनी के लिए इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि ये किरदारों की जिंदगी का एक स्वाभाविक हिस्सा लगते हैं।</div><div><br></div><div>नैतिक सीख से दूरी: कहानी किरदारों को अपनी भावनाएं व्यक्त करने, गलतियां करने और मदद मांगने की पूरी आजादी देती है, बिना उन पर कोई मोरल पुलिसिंग थोपे।</div><div><br></div><div><b>अभिनय और किरदारों की केमिस्ट्री</b></div><div><b>अर्जुन दास और अदिति शंकर: </b>अपनी गंभीर छवि के लिए जाने जाने वाले अर्जुन दास ने एक टूटे हुए इंसान से लेकर फिर से मुस्कुराना सीखने वाले प्रेमी के किरदार को बेहद शिद्दत से निभाया है। वहीं, अदिति शंकर अपनी ऊर्जावान और स्क्रीन प्रेजेंस से अंजलि के किरदार को जीवंत बना देती हैं। शुरुआत में उनका तरीका भले ही थोड़ा जोर-जबरदस्ती वाला लगे, लेकिन धीरे-धीरे दर्शक उनकी मासूमियत से जुड़ जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>इंद्रा और सहायक कलाकार: </b>सोना ओलिकल (इंद्रा के रूप में) रोमांटिक और ड्रामेटिक दोनों दृश्यों में अपना प्रभाव छोड़ती हैं। हालांकि, रघुवरन और इंद्रा के रिश्ते के अचानक खत्म होने की वजह बहुत ठोस नहीं लगती, जो फिल्म को थोड़ा कमजोर बनाती है। देवदर्शिनी, द्रविड़ सेल्वम और अनुषा प्रभु जैसे सहायक कलाकारों ने कहानी को जरूरी हास्य और अपनापन दिया है।</div><div><br></div><div><b>तकनीकी पक्ष: संगीत और सिनेमैटोग्राफी</b></div><div>फिल्म को संभालने में इसके तकनीकी पहलुओं का बड़ा योगदान रहा है:</div><div><br></div><div><b>हेशम अब्दुल वहाब का संगीत: </b>फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर और ट्रैक—खासकर 'वा कन्नाम्मा' और 'इधयम' बेहद कर्णप्रिय हैं, जो थिएटर से बाहर निकलने के बाद भी आपके दिल में बसे रहते हैं।</div><div><br></div><div><b>अरविंद विश्वनाथन की सिनेमैटोग्राफी:</b> कैमरे का काम कहानी के मूड और इमोशंस को बहुत खूबसूरती से फ्रेम करता है।</div><div><br></div><div><b>अंतिम फैसला</b></div><div>'वन्स मोर' निर्देशक विग्नेश श्रीकांत की एक अच्छी शुरुआत है। फिल्म में संवेदनशीलता, अपनापन और बेहतरीन परफॉर्मेंस का सुंदर मेल है। हालांकि, कहीं-कहीं फिल्म जानी-पहचानी और घिसी-पिटी रोमांटिक-ड्रामा की लीक पर चलने लगती है, जिससे यह पूरी तरह से अपनी क्षमता को नहीं छू पाती। इसके बावजूद, अर्जुन दास और अदिति शंकर की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री के लिए इसे एक बार जरूर देखा जा सकता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 02 Sep 2026 15:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/once-more-movie-review-arjun-das-and-aditi-shankar-chemistry-breathes-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Babita Singh Reporting Review | निमिषा सजयन का दमदार अभिनय, क्राइम-ड्रामा में वरुण सोबती ने जोड़ी कहानी की गहराई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/babita-singh-reporting-review-nimisha-sajayan-delivers-a-powerful-performance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' एक ऐसी क्राइम-ड्रामा फिल्म है जो वर्दीधारी महिलाओं के पेशेवर कर्तव्यों, घरेलू जिम्मेदारियों और अपनी बेगुनाही व क्षमता साबित करने के लगातार संघर्ष को पर्दे पर उतारती है। अंबिका पंडित के निर्देशन में बनी इस फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी निमिषा सजयन हैं, जिन्होंने असिस्टेंट सब-इंस्पेक्टर (ASI) बबीता सिंह के मुख्य किरदार में अपनी गहरी छाप छोड़ी है। एक पारिवारिक त्रासदी और अपने करीबी दोस्त की संदिग्ध मौत के बाद न्याय की जंग लड़ती एक महिला पुलिस अफसर की यह कहानी जितनी पेशेवर है, उतनी ही भावनात्मक भी है। बबीता का किरदार पेशेवर चुनौतियों और निजी उलझनों का मेल है, जो इस प्रोजेक्ट को खास तौर पर दिलचस्प बनाता है। फिल्म में एक दिलचस्प क्राइम ड्रामा के सभी तत्व मौजूद हैं, खासकर इसकी मुख्य भूमिका में एक मज़बूत महिला है। निमिषा सजयन की शानदार परफॉर्मेंस फिल्म को और भी दिलचस्प बनाती है। बबीता कहानी की जान है और एक ऐसा किरदार है जिसे नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है।</div><div><br></div><div><b>'बबीता सिंह रिपोर्टिंग': कहानी</b></div><div>यह पूरी कहानी एक महिला पुलिस अधिकारी के कर्तव्य, पारिवारिक जिम्मेदारियों और न्याय की लड़ाई के बीच के गहरे भावनात्मक संघर्ष को दर्शाती है। असिस्टेंट सब-इंस्थापक बबीता सिंह ('बेबी') अपने भ्रष्ट और स्वार्थी सीनियर अधिकारी के कहने पर एक झूठा केस अपने सिर लेकर दो हफ्ते का सस्पेंशन स्वीकार करती है ताकि उसे छुट्टी मिल सके और वह अपने ससुराल जा सके। इस दौरान उसकी मुलाकात अपने बचपन के करीबी दोस्त बंसी से होती है, लेकिन यह खुशी उस समय त्रासदी में बदल जाती है जब बंसी की संदिग्ध परिस्थितियों में हत्या हो जाती है। परिवार, पति और ससुराल वालों के भारी विरोध और बहुत कम सरकारी समर्थन के बावजूद, बबीता अपनी खाकी का फर्ज निभाने और दोस्त को न्याय दिलाने के लिए अकेली ही जांच में कूद पड़ती है। जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ती है, वह पाती है कि इस जघन्य अपराध के तार उसके अपने ही किसी करीबी से जुड़े हुए हैं। आखिरकार, अपनी निजी जिंदगी और पेशेवर ईमानदारी के बीच संतुलन बनाते हुए, बबीता तमाम सामाजिक व पारिवारिक बाधाओं को तोड़कर सच को सामने लाती है, जो यह साबित करता है कि हर विपरीत परिस्थिति के बावजूद उसका फर्ज और पक्का इरादा ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।</div><div><br></div><div>कहानी को और भी दिलचस्प बनाने वाली बात है बबीता का सच का पता लगाने का पक्का इरादा, जबकि उसे बहुत कम समर्थन मिलता है। उसके पति और परिवार उसे रोकने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह जाँच छोड़ने से इनकार कर देती है। जल्द ही यह केस बबीता के लिए बहुत निजी हो जाता है। न्याय के लिए उसकी लड़ाई एक भावनात्मक सफ़र में बदल जाती है। आखिर में पता चलता है कि कातिल उसका कोई करीबी ही है। फिर कहानी दिखाती है कि सच सामने आने पर क्या होता है। यह फिल्म के मुख्य विचार को दर्शाता है, जहाँ बबीता की पेशेवर समझ का टकराव एक ऐसे केस से होता है जो उसके दिल के बहुत करीब है।</div><div><br></div><div><b>&nbsp;'बबीता सिंह रिपोर्टिंग': कास्ट और परफॉर्मेंस</b></div><div>'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' में ASI बबीता सिंह के रोल में निमिषा सजायन सबसे मज़बूत कड़ी हैं। वह एक पक्के इरादे वाली पुलिस ऑफिसर के रोल में एकदम फिट बैठती हैं और एक पत्नी, दोस्त और पुलिस ऑफिसर के तौर पर बबीता की ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाती हैं। उनकी परफॉर्मेंस किरदार में गहराई लाती है, खासकर इमोशनल और इन्वेस्टिगेशन वाले पलों में। निमिषा एक जानी-मानी भारतीय एक्ट्रेस हैं जो मलयालम सिनेमा में अपनी दमदार परफॉर्मेंस के लिए पहचानी जाती हैं। इस रोल के साथ, वह एक बार फिर अपनी एक्टिंग की काबिलियत साबित करती हैं।</div><div><br></div><div>बबीता सिंह के पति, शरद वशिष्ठ के रोल में अंशुमान पुष्कर ने एक सपोर्टिव पति के तौर पर अच्छी परफॉर्मेंस दी है। वह किरदार में अच्छी तरह ढल जाते हैं, हालांकि कुछ सीन में निमिषा सजायन की दमदार स्क्रीन प्रेज़ेंस के आगे उनकी परफॉर्मेंस थोड़ी फीकी पड़ जाती है। राजेश कुमार ने SI सेठी का रोल निभाया है, जो एक मतलबी और मौके का फायदा उठाने वाला पुलिस ऑफिसर है और जिसे अपने करियर की तरक्की की ज़्यादा चिंता रहती है। एक भ्रष्ट पुलिस वाले के तौर पर उनका रोल विश्वसनीय लगता है और किरदार पर जंचता है।</div><div><br></div><div>नवल शुक्ला ने एक ज़िम्मेदार और ईमानदार स्टेशन हाउस ऑफिसर (SHO) के तौर पर बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। उनकी सधी हुई एक्टिंग किरदार के लिए सही है और दर्शकों को एक पुलिस ऑफिसर के तौर पर उन पर भरोसा दिलाती है।</div><div>बंसी सैनी के रोल में बरुन सोबती को स्क्रीन पर कम समय मिला है, लेकिन वह गहरी छाप छोड़ते हैं। कुछ ही सीन में दिखने के बावजूद, उनका किरदार इन्वेस्टिगेशन को आगे बढ़ाने और कहानी में नया मोड़ लाने में अहम भूमिका निभाता है। बबीता सिंह की सास के रोल में सुनीता राजवार ने एक ऐसा किरदार निभाया है जो भारतीय घरों में अक्सर दिखने वाली पारंपरिक सास की छवि को दिखाता है। वह इस रोल में अपनी जानी-पहचानी सहजता और नैचुरल एक्टिंग लाती हैं और किरदार को विश्वसनीय बनाती हैं।</div><div><br></div><div><b>बबीता सिंह रिपोर्टिंग: निर्देशन</b></div><div>अंबिका पंडित के निर्देशन में बनी 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' हर किरदार की भावनाओं को समझने की कोशिश करती है। निमिषा सजयन, बरुन सोबती, अंशुमान पुष्कर और बाकी कलाकारों को ऐसे रोल दिए गए हैं जो कहानी में स्वाभाविक रूप से फिट बैठते हैं। अंबिका पंडित के निर्देशन की एक खूबी हर किरदार पर ध्यान देना है। कहानी को सिर्फ़ जांच तक सीमित रखने के बजाय, वह एक महिला पुलिस अफ़सर की निजी और पेशेवर ज़िंदगी को भी दिखाती हैं। इससे बबीता सिंह के किरदार को और गहराई मिलती है।</div><div><br></div><div>हालांकि, इसमें कुछ कमियां भी हैं। कुछ सीन बेवजह लंबे लगते हैं, और जांच में कुछ खास नयापन नहीं है। उदाहरण के लिए, बबीता अपने कलाकार दोस्त बंसी की हत्या से जुड़े सुराग खोजने के लिए बार-बार घने जंगल में जाती है, लेकिन उसे वहां कुछ नहीं मिलता। ये सीन दोहराव वाले लगते हैं और कहानी को उबाऊ बना देते हैं।</div><div><br></div><div>कभी-कभी, बेवजह का ड्रामा मुख्य कहानी के असर को कम कर देता है। अंबिका पंडित का निर्देशन तब सबसे अच्छा लगता है जब वह बबीता के एक महिला के तौर पर अपनी निजी ज़िम्मेदारियों और एक पुलिस अफ़सर के तौर पर अपने कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाने की कोशिश पर ध्यान देती हैं। सहायक किरदारों को अहमियत देने की कोशिश भी तारीफ़ के काबिल है। हालांकि, बेहतर एडिटिंग और पेसिंग से फ़िल्म और भी दिलचस्प हो सकती थी।</div><div><br></div><div><b>बबीता सिंह रिपोर्टिंग: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' की सबसे बड़ी खूबी महिला सशक्तिकरण पर इसका फ़ोकस है, जो बबीता सिंह के किरदार में मज़बूती से उभरकर आता है। फ़िल्म उसे एक ऐसी महिला के तौर पर दिखाती है जो आत्मविश्वास के साथ दो मुश्किल भूमिकाएं निभाती है - एक गृहिणी और एक ASI अफ़सर की। उसका किरदार मज़बूत, दृढ़ और साहसी दिखाया गया है, जिससे उसका सफ़र जुड़ाव महसूस कराने वाला और प्रेरणादायक बन जाता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, फ़िल्म की एडिटिंग और रफ़्तार थोड़ी कमज़ोर लगती है। कुछ बातचीत में वही बातें और भावनाएं दोहराई जाती हैं, जिससे कुछ हिस्से लंबे लगते हैं। मौजूदा सब-प्लॉट को बढ़ाने के बजाय, कहानी को कुछ सहायक किरदारों को और गहराई देकर बेहतर बनाया जा सकता था।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड स्कोर नाटकीय पलों के दौरान अच्छा काम करता है और कुछ सीन में तीव्रता लाता है। हालांकि, कभी-कभी ऐसा लगता है कि स्कोर भावनाओं को स्वाभाविक रूप से अभिनय और कहानी कहने के ज़रिए विकसित होने देने के बजाय उन पर ज़ोर डाल रहा है। कहानी को निश्चित रूप से बेहतर बनाया जा सकता था, लेकिन बबीता का किरदार फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है। 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग: द फ़ाइनल वर्डिक्ट' सिर्फ़ एक मर्डर मिस्ट्री नहीं है। यह एक ऐसी बहादुर महिला की कहानी है जो कई ज़िम्मेदारियाँ निभाते हुए अपनी पर्सनल और प्रोफ़ेशनल ज़िंदगी में तालमेल बिठाने की कोशिश करती है। फ़िल्म उसके साहस, संघर्षों और अपनी ड्यूटी निभाते समय आने वाली चुनौतियों को दिखाती है। इसकी सबसे अच्छी बातों में से एक है इसकी सीधी-सादी कहानी कहने का तरीका। यह बिना फालतू की जानकारी दिए सीधे मुख्य बात पर आती है, जिससे कहानी को समझना आसान हो जाता है।</div><div><br></div><div>इसमें कुछ कमियाँ भी हैं। कुछ हिस्से धीमे लगते हैं और फ़िल्म की रफ़्तार पर असर डालते हैं। फिर भी, दमदार एक्टिंग और बेहतरीन डायरेक्शन फ़िल्म को आखिर तक दिलचस्प बनाए रखते हैं।</div><div><br></div><div><b>'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' के लिए 2.5/5 स्टार।</b></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 29 Aug 2026 13:32:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/babita-singh-reporting-review-nimisha-sajayan-delivers-a-powerful-performance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Toxic Movie Review | यश स्टारर ‘टॉक्सिक’ सिर्फ एक्शन ड्रामा नहीं, रिश्तों और जज्बातों की भी है दास्तान!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/toxic-movie-review-yash-starrer-toxic-is-not-just-an-action-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">यश ने अपने करियर में कई ऐसे किरदार निभाए हैं, जिन्होंने उन्हें मास हीरो से लेकर एक पैन-इंडिया स्टार तक की पहचान दिलाई है, लेकिन ‘टॉक्सिक’ में उनका अंदाज पहले के किरदारों से काफी अलग नजर आता है। जहां ‘केजीएफ’ के रॉकी भाई में गुस्सा, बदला और दबदबा हावी था, वहीं यहां यश एक ही फिल्म में राया और टिकट जैसे दो बिल्कुल अलग किरदारों के जरिए अपनी रेंज दिखाते हैं। एक तरफ राया की दुनिया में खौफ और ताकत है, तो दूसरी तरफ टिकट में भावनाओं और रिश्तों का पहलू है। यही फर्क ‘टॉक्सिक’ को यश की पिछली फिल्मों से अलग करता है और उनके स्टारडम के साथ उनकी परफॉर्मेंस का एक नया रंग सामने लाता है।</span></div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/dewas-school-van-flooded-underpass-driver-arrested" target="_blank">Dewas में School Van पानी भरे अंडरपास में फंसाने वाला चालक गिरफ्तार, सात बच्चे बचाए गए</a></h3><div>&nbsp;</div><div><div>डायरेक्टर: गीतू मोहनदास</div><div>कास्ट : यश, कियारा आडवाणी, नयनतारा, हुमा कुरेशी, तारा सुतारिया, रुक्मिणी वसंत</div><div>ड्यूरेशन: 3 घंटे 14 मिनट</div><div>रेटिंग - 3.5</div><div>&nbsp;</div></div><div><b>अपराध की दुनिया से रिश्तों की कहानी तक</b></div><div>‘टॉक्सिक’ की कहानी राया की दुनिया से शुरू होती है, जहां ताकत, अपराध और वफादारी के अपने नियम हैं। उसका बेटा टिकट जब इस दुनिया का हिस्सा बनता है, तो कहानी सिर्फ गैंगस्टर और एक्शन तक सीमित नहीं रहती। पिता-पुत्र के रिश्ते के साथ परिवार, प्यार, बदला और अपने लोगों के लिए खड़े होने की भावनाएं भी कहानी में जुड़ती जाती हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/uttarakhand-issues-helpline-numbers-for-citizens-stranded-in-nepal-flood" target="_blank">Nepal Flood में फंसे लोगों के लिए जारी हुए Helpline Number, Uttarakhand ने शुरू की मदद</a></h3><div><br></div><div>गंगा और नादिया जैसे किरदार इस कहानी को एक इमोशनल एंगल देते हैं। फिल्म की शुरुआत में घटनाएं एक एक्शन ड्रामा की तरह आगे बढ़ती हैं, लेकिन धीरे-धीरे इसके किरदारों और उनके रिश्तों की कई परतें खुलने लगती हैं। जैसे-जैसे राया और टिकट की दुनिया के राज सामने आते हैं, कहानी का माहौल और ज्यादा खतरनाक होता जाता है। वहीं क्लाइमैक्स में आने वाला ट्विस्ट कहानी को एक नई दिशा देता है और फिल्म खत्म होने के बाद भी कई सवाल दर्शकों के मन में छोड़ जाती है।</div><div><br></div><div><b>यश के डबल रोल में दिखा अलग-अलग रंग</b></div><div>यश ‘टॉक्सिक’ में राया और उसके बेटे टिकट, दोनों किरदारों में नजर आते हैं। दोनों एक ही परिवार से जुड़े हैं, लेकिन उनके व्यक्तित्व और अंदाज में जमीन-आसमान का फर्क है। राया के किरदार में गैंगस्टर की दुनिया का दबदबा, आक्रामकता और आत्मविश्वास दिखाई देता है, जबकि टिकट ज्यादा शांत और भावनाओं से जुड़ा हुआ नजर आता है।</div><div><br></div><div>यश ने दोनों किरदारों के बीच इस फर्क को अपनी बॉडी लैंग्वेज, हाव-भाव और स्क्रीन प्रेजेंस के जरिए अच्छी तरह दिखाया है। कहानी जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, दोनों के व्यक्तित्व और रिश्ते की नई परतें सामने आती हैं। यही बदलाव यश के डबल रोल को फिल्म के दिलचस्प हिस्सों में शामिल करता है।</div><div><br></div><div><b>सपोर्टिंग कास्ट ने भी छोड़ी अपनी छाप</b></div><div>यश के साथ फिल्म की बाकी कास्ट भी कहानी को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती है। नयनतारा गंगा के किरदार में फिल्म के इमोशनल हिस्से को मजबूती देती हैं, जबकि कियारा आडवाणी नादिया के रूप में अपने किरदार में संवेदनशीलता और गर्मजोशी लेकर आती हैं। हुमा कुरैशी की एलिजाबेथ भी अपने अंदाज और मजबूत स्क्रीन प्रेजेंस से ध्यान खींचती हैं।</div><div><br></div><div>रुक्मिणी वसंत मेलिसा के किरदार में खास तौर पर प्रभावित करती हैं। उनका अभिनय ज्यादा दिखावटी नहीं है, लेकिन उनकी खामोशी और सहज अंदाज किरदार को असरदार बनाता है। वहीं तारा सुतारिया की रेबेका, अक्षय ओबेरॉय के टोनी, डैरेल डी'सिल्वा के साल्वाडोर और सुदेव नायर के करमाडी भी कहानी में अपनी अलग मौजूदगी दर्ज कराते हैं। इन सभी किरदारों की वजह से फिल्म की दुनिया ज्यादा बड़ी और दिलचस्प लगती है।</div><div><br></div><div><b>इंटरवल के बाद बदल जाता है ‘टॉक्सिक’ का अंदाज</b></div><div>फिल्म का पहला हिस्सा दर्शकों को राया की दुनिया और उसके आसपास के रिश्तों से रूबरू कराता है। यहां मास एंटरटेनमेंट के साथ कहानी और किरदारों पर भी ध्यान दिया गया है। गीतू मोहनदास ड्रामा और गैंगस्टर वर्ल्ड को धीरे-धीरे आगे बढ़ाते हैं, जिससे फिल्म की नींव मजबूत होती है। फिर इंटरवल में एक बड़ा सीक्वेंस आता है, जो कहानी को नई दिशा देने के साथ कई सवाल भी छोड़ जाता है।</div><div><br></div><div>इंटरवल के बाद फिल्म की रफ्तार और टोन दोनों बदल जाते हैं। सेकंड हाफ में एक्शन पहले से कहीं ज्यादा बड़ा, तेज और इंटेंस हो जाता है। कहानी भी ज्यादा खतरनाक और असल नजर आने लगती है। बड़े सेट और शानदार स्केल के बीच एक्शन सीन्स की रॉ एनर्जी सबसे ज्यादा ध्यान खींचती है और यही हिस्सा फिल्म को बड़े पर्दे का दमदार अनुभव बनाता है।</div><div><br></div><div><b>गीतू मोहनदास की कहानी कहने की शैली</b></div><div>गीतू मोहनदास ने ‘टॉक्सिक’ को सिर्फ एक बड़े एक्शन ड्रामा के तौर पर पेश नहीं किया है, बल्कि इसकी दुनिया को काफी विस्तार दिया है। फिल्म में कई किरदार हैं और लगभग हर किरदार की अपनी कहानी, सोच और मकसद है। इन सभी को एक साथ सामने रखने के बजाय निर्देशक ने उन्हें धीरे-धीरे कहानी का हिस्सा बनाया है।</div><div><br></div><div>फिल्म हर बात का जवाब तुरंत देने की कोशिश नहीं करती। कई घटनाएं और किरदारों से जुड़े राज समय के साथ सामने आते हैं, जिससे दर्शक खुद कहानी की कड़ियों को जोड़ते रहते हैं। यही तरीका फिल्म को दिलचस्प बनाए रखता है और इसकी कई परतों को हर सीन के साथ समझने का मौका देता है।</div><div><br></div><div><b>क्यों है मस्ट वॉच</b></div><div>अगर आपको बड़े पर्दे पर दमदार एक्शन के साथ ऐसी कहानी देखना पसंद है, जिसमें रिश्ते, प्यार, परिवार और इमोशन भी बराबर मौजूद हों, तो ‘टॉक्सिक’ आपके लिए सही फिल्म हो सकती है। यश का डबल रोल, कहानी में लगातार खुलती परतें, सेकंड हाफ का जबरदस्त एक्शन और क्लाइमैक्स का ट्विस्ट फिल्म को खास बनाते हैं। इसका बड़ा स्केल और शानदार विजुअल्स थिएटर में इसके अनुभव को और बेहतर करते हैं। खासकर यश के फैंस के लिए यह फिल्म मस्ट वॉच कही जा सकती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 27 Aug 2026 08:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/toxic-movie-review-yash-starrer-toxic-is-not-just-an-action-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Toxic Movie Review | KGF स्टार यश की बड़ी महत्वाकांक्षी वापसी, पर स्टाइल के आगे कमज़ोर पड़ी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/toxic-movie-review-kgf-star-yash-ambitious-comeback-but-story-falls-short-against-the-style]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'KGF' चैप्टर 2 के बाद ब्लॉकबस्टर सफलता का स्वाद चख चुके साउथ सुपरस्टार यश की बहुप्रतीक्षित फिल्म 'Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups' आखिरकार बड़े पर्दे पर आ चुकी है। निर्देशक गीतू मोहनदास के निर्देशन में बनी और महिलाओं के नजरिए से पेश की जाने वाली एक अनोखी गैंगस्टर ड्रामा के रूप में प्रचारित इस फिल्म से दर्शकों और सिनेमा जगत को भारी उम्मीदें थीं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हालांकि, भव्यता, जबरदस्त एक्शन और स्वैग से लैस होने के बावजूद, 'Toxic' अपनी उलझी हुई पटकथा और निर्देशन की ढिलाई के कारण एक शानदार अनुभव बनने से चूक जाती है।</span></div><div><br></div><div><b>'Toxic' की विस्तृत कहानी</b></div><div>'Toxic: A Fairy Tale for Grown-ups' की पूरी कहानी अपराध, प्रतिशोध, रिश्तों के ताने-बाने और इंसान के भीतर छिपे उसके अपने ही काले साये की एक उलझी हुई दास्तान है। कहानी का केंद्र बिंदु राया (यश) है, जो एक खूंखार लेकिन बेहद स्टाइलिश गैंगस्टर है। राया अंडरवर्ल्ड की उस दुनिया का बेताज बादशाह बनने की चाह रखता है जहाँ नियम केवल ताकतवर तय करते हैं।</div><div><br></div><div>कहानी की शुरुआत राया के वर्चस्व और उसकी क्राइम सिंडिकेट पर पकड़ के साथ होती है। राया की इस काली दुनिया में उसकी सबसे बड़ी ताकत और ढाल उसकी बड़ी बहन गंगा (नयनतारा) है। गंगा ना केवल उसके जुर्म के साम्राज्य में बराबर की भागीदार है, बल्कि हर कदम पर राया के लिए एक सुरक्षा कवच और रणनीतिकार के रूप में काम करती है।</div><div><br></div><div>राया की जिंदगी में दूसरा पहलू तब आता है जब वह अपनी सामान्य और शांत जिंदगी की ख्वाहिश में रेबेका (तारा सुतारिया) से सगाई करता है। रेबेका उस अंधेरी दुनिया का हिस्सा नहीं है, और राया उसे पाने के लिए अपनी हिंसात्मक प्रवृत्ति से दूर जाने का झूठा सपना देखता है। हालांकि, राया का अतीत और उसकी जुर्म की जड़ें उसे कभी आजाद नहीं होने देतीं।</div><div><br></div><div>कहानी में मोड़ तब आता है जब नादिया (कियारा आडवाणी) और एलिज़ाबेथ (हुमा कुरैशी) का प्रवेश होता है। एलिज़ाबेथ एक बेहद चतुर और प्रतिशोध से भरी महिला है, जो राया के साम्राज्य को ध्वस्त करने के लिए अंडरवर्ल्ड के दुश्मनों के साथ मिलकर उसके खिलाफ साजिशें रचती है। वहीं नादिया, जो एक सर्कस से जुड़ी उथल-पुथल भरी जिंदगी जीती है, राया के साथ एक ऐसे रिश्ते में बंध जाती है जहाँ प्यार और हिंसा के बीच का अंतर खत्म हो जाता है।</div><div><br></div><div>फिल्म का मुख्य ट्विस्ट तब आता है जब राया को सिर्फ बाहरी दुश्मनों से ही नहीं, बल्कि अपने ही दिमाग के एक बेकाबू और सनकी रूप 'टिकट' (यश का दूसरा किरदार) से जूझना पड़ता है। 'टिकट' कोई और नहीं, बल्कि राया का अपना ही आक्रामक और विनाशकारी रूप है, जो उस पर हावी होने की कोशिश करता है।</div><div><br></div><div>कहानी के मध्य में, एलिज़ाबेथ और विरोधी गैंग्स नादिया के सर्कस में राया पर एक जानलेवा और बड़ा हमला (सर्कस अटैक) करवाते हैं। इस भीषण हमले में राया अपनी पूरी ट्रेनिंग और हथियारों का इस्तेमाल करके दुश्मनों का सफाया करता है, लेकिन इस खून-खराबे में उसकी अपनी निजी जिंदगी बिखरने लगती है।</div><div><br></div><div>अंतिम चरण में, गंगा की कोशिशों और दुश्मनों के बढ़ते घेरे के बीच, राया का सामना अपने ही भीतर छिपे 'टिकट' से होता है। यह एक दिमागी और भावनात्मक टकराव में बदल जाता है, जहाँ राया को यह तय करना होता है कि वह अपने जुर्म के इस दलदल में खुद को बचा पाता है या अपने ही बनाए इस 'टॉक्सिक' साम्राज्य की आग में भस्म हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>कहानी और किरदार: 'राया' के इर्द-गिर्द घूमती दुनिया</b></div><div>फिल्म पूरी तरह से 'राया' (यश) के इर्द-गिर्द बुनी गई है—वही कहानी का हीरो है, वही विलेन और वही इसका केंद्र बिंदु। बाकी सभी मुख्य किरदार राया के इर्द-गिर्द ही अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं:</div><div><br></div><div>गंगा (नयनतारा): राया की बड़ी बहन और जुर्म की दुनिया में उसकी रक्षा कवच।</div><div><br></div><div>रेबेका (तारा सुतारिया): राया की मंगेतर और उसकी सामान्य जिंदगी की चाह।</div><div><br></div><div>नादिया (कियारा आडवाणी): प्यार और मानसिक उथल-पुथल से भरा एक जटिल किरदार।</div><div><br></div><div>एलिज़ाबेथ (हुमा कुरैशी): बदला लेने की फिराक में रहने वाली एक चतुर और चालाक महिला।</div><div><br></div><div>रुक्मिणी वसंत: राया की 'परमानेंट' साथी के तौर पर पेश की गई भूमिका।</div><div><br></div><div>'टिकट' (यश का दूसरा किरदार): राया के दिमाग पर हावी होने वाला एक बेकाबू और सनकी इंसान।</div><div><br></div><div><b>अभिनय और एक्शन: जहाँ चमके यश</b></div><div>यश का बहुआयामी प्रदर्शन: एक अभिनेता के तौर पर यश फिल्म को पूरी ताकत से संभालते हैं। ना केवल उनका स्टाइल और स्वैग दमदार है, बल्कि दूसरे हाफ में राया और 'टिकट' के बीच का इमोशनल व दिमागी टकराव फिल्म का सबसे बेहतरीन हिस्सा है।</div><div><br></div><div>सर्कस अटैक एक्शन सीक्वेंस: अंतरराष्ट्रीय कोरियोग्राफर जेजे पेरी द्वारा निर्देशित नादिया के सर्कस में राया पर हमले वाला 10 मिनट का एक्शन सीक्वेंस नएपन और रोमांच से भरा है। यश की हथियारों की स्पेशल ट्रेनिंग यहाँ पूरी तरह रंग लाती है।</div><div><br></div><div>सह-कलाकारों का काम: नयनतारा अपने पोकर-फेस और गंभीर अभिनय से प्रभावित करती हैं, हालांकि उनके रोल का सही इस्तेमाल नहीं हुआ। कियारा आडवाणी अपने किरदार के शेड्स को बखूबी ढालती हैं, जबकि तारा सुतारिया और हुमा कुरैशी को कमजोर राइटिंग के चलते सीमित दायरा मिला।</div><div><br></div><div><b>फिल्म के मजबूत और कमजोर पहलू</b></div><div>'Toxic' का सबसे मजबूत पहलू इसका भव्य विजुअल ट्रीटमेंट और सुपरस्टार यश का बेजोड़ प्रदर्शन है। राजीव रवि की सिनेमैटोग्राफी और टीपी आबिद का आर्ट डायरेक्शन हर फ्रेम को वर्ल्ड-क्लास और देखने योग्य बनाता है। एक अभिनेता के रूप में यश ना केवल अपने चिर-परिचित स्टाइल और स्वैग से दर्शकों को बांधते हैं, बल्कि फिल्म के दूसरे हाफ में 'राया' और 'टिकट' के रूप में उनका दोहरा, भावनात्मक और दिमागी टकराव उनकी अभिनय क्षमता को साबित करता है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय कोरियोग्राफर जेजे पेरी द्वारा डिजाइन किया गया 10 मिनट का सर्कस अटैक सीक्वेंस और नयनतारा व कियारा आडवाणी का गंभीर अभिनय फिल्म में जान फूंकने का काम करता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी ढीली पटकथा और दिशाहीन निर्देशन है। निर्देशक गीतू मोहनदास कमर्शियल मास सिनेमा और एक्सपेरिमेंटल 'फाइट क्लब' स्टाइल के बीच संतुलन बनाने में नाकाम रही हैं, जिससे फिल्म किसी एक जॉनर पर टिक नहीं पाती। जिस 'फीमेल गेज' और मजबूत महिला किरदारों का वादा किया गया था, वह भी अधूरा रह जाता है क्योंकि नयनतारा, तारा सुतारिया और हुमा कुरैशी जैसी बेहतरीन अभिनेत्रियों को कमजोर राइटिंग के कारण सीमित दायरा ही मिल पाता है। साथ ही, उज्ज्वल कुलकर्णी की एडिटिंग में अचानक लगने वाले कट्स, अजीब ट्रांज़िशन और शुरुआती 15 मिनट की अव्यवस्थित गति दर्शकों को कहानी से जोड़े रखने में बाधा उत्पन्न करती है।</div><div><b><br></b></div><div><b>क्या 'Toxic' देखने लायक है?</b></div><div>'Toxic' में महत्वाकांक्षा, विजुअल ब्यूटी और यश का शानदार अभिनय हर फ्रेम में दिखता है। लेकिन केवल स्टाइल और खूबसूरत फ्रेम किसी फिल्म को अमर नहीं बनाते। यदि पटकथा थोड़ी कसी हुई होती और संपादन अधिक सुचारू होता, तो यह भारतीय सिनेमा का एक ऐतिहासिक प्रयोग बन सकती थी। फिलहाल, यह एक ऐसी फिल्म के रूप में सामने आती है जो बहुत कुछ बनने के बेहद करीब पहुंचकर भी निराश करती है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 26 Aug 2026 15:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/toxic-movie-review-kgf-star-yash-ambitious-comeback-but-story-falls-short-against-the-style</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Bethlehem Kudumba Unit Movie Review | निविन पॉली और ममिता बैजू की सहज केमिस्ट्री से सजी एक प्यारी, भावुक और हल्की-फुल्की रोमांटिक स्टोरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bethlehem-kudumba-unit-movie-review-effortless-chemistry-between-nivin-pauly-and-mamita-baiju]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मलयालम सिनेमा के दीवानों और दुनिया भर के सिनेप्रेमियों के दिलों में निविन पॉली का नाम आते ही सबसे पहले 2015 की कालजयी ब्लॉकबस्टर रोमांटिक फिल्म 'प्रेमम' की यादें और उसके खुशनुमा लम्हे ताजा हो जाते हैं। हालांकि, अपनी चिरपरिचित शैली से थोड़ा इतर जाकर, डायरेक्टर गिरीश AD की नई रिलीज 'बेथलहम कुडुम्बा यूनिट' में यह मलयालम सुपरस्टार एक बेहद परिपक्व, शांत और नए अंदाज वाले रोमांस के साथ पर्दे पर वापस लौटा है। यह फिल्म सिनेमाई चकाचौंध या भारी-भरकम मेलोड्रामा के बजाय हमारे रोजमर्रा के उलझे हुए रिश्तों, पड़ोस के माहौल, पारिवारिक खुशियों और उन अनकहे, बेहद नाजुक पलों पर आधारित है जो प्यार को बहुत सच्चा, सहज और दिल के करीब बनाते हैं।</div><div><br></div><div><b>फिल्म का नाम: बेथलहम कुडुम्बा यूनिट (Bethlehem Kudumba Unit)</b></div><div><b>डायरेक्टर: गिरीश AD</b></div><div><b>मुख्य कलाकार: निविन पॉली, ममिता बैजू, संगीत प्रताप, तब्बू (सपोर्टिंग रोल्स में कई अन्य)</b></div><div><br></div><div><b>कहानी&nbsp;</b></div><div>कहानी की शुरुआत केरल के खूबसूरत शहर मुंडाकायम से होती है। यहाँ एशली (ममिता बैजू) अपने परिवार के साथ हँसती-खेलती ज़िंदगी बिता रही है। उसकी ज़िंदगी में मोड़ तब आता है जब उसके माता-पिता अचानक एर्नाकुलम शिफ्ट होने का फैसला करते हैं। इसका मतलब था कि एशली को अपने कॉलेज के दोस्तों, म्यूज़िक बैंड, अपनी पुरानी किताबों और बचपन की यादों को पीछे छोड़ना पड़ता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/mahakali-shukracharya-war-cry-akshaye-khanna-menacing-avatar-takes-center-stage" target="_blank">MAHAKALI: Shukracharya War Cry Teaser | अक्षय खन्ना का खूंखार अवतार छाया, 8 जनवरी 2027 को सिनेमाघरों में दस्तक देगी फिल्म</a></h3><div><br></div><div>अपनी प्यारी यादों को साथ लेकर, वह भारी मन से एर्नाकुलम जाती है और चाहे कुछ भी हो, उसे किसी चीज़ में असली खुशी नहीं मिलती। लेकिन उसे जल्द ही पता चलता है कि उसके पड़ोसी बहुत दिलचस्प लोग हैं। जहाँ सामने वाले घर में तीन मोरेली बहनें माहौल को ज़िंदादिल बनाए रखती हैं, वहीं बगल के घर में भाई जस्टिन (निविन पॉली) और जोएल (संगीत प्रताप) इलाके को रौनकदार बनाते हैं।</div><div><br></div><div>जब उसका लैपटॉप खराब हो जाता है, तब उसकी मुलाकात जस्टिन से होती है, जो 30 के दशक के बीच में है और अभी भी सिंगल है। कॉलेज जाने वाली एशली, अकेले रहने वाले जस्टिन में दिलचस्पी लेने लगती है और अजीब बातचीत के ज़रिए दो ऐसे लोगों के बीच एक अनोखा रोमांस शुरू होता है जिनकी उम्र में काफी अंतर है। लेकिन क्या सामाजिक नियमों और दबावों के बावजूद जस्टिन और एशली को अपनी खुशी भरी ज़िंदगी मिल पाती है? फिल्म इस सवाल को बिना उनके रोमांस को आम लव स्टोरी में बदले या उनकी उम्र के अंतर का मज़ाक उड़ाए, दिखाती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ajay-devgn-announces-drishyam-3-drishyam-the-conclusion-to-release-on-this-date" target="_blank">'मेरा सच, मेरा सही सिर्फ़ मेरा परिवार है', Ajay Devgn ने किया 'दृश्यम 3' का ऐलान, इस दिन रिलीज़ होगी Drishyam: The Conclusion</a></h3><div><br></div><div><b>डायरेक्शन: गिरीश AD का सिग्नेचर स्टाइल</b></div><div>डायरेक्टर गिरीश AD की सबसे बड़ी खासियत यह है कि वे बेहद आम और जाने-पहचाने विषयों को उठाकर उनमें यथार्थवादी और पहचाने जा सकने वाले किरदार पिरोते हैं।</div><div><br></div><div><b>सुलझा हुआ नजरिया:</b> भारतीय सिनेमा में 'उम्र के अंतर वाले रोमांस' (Age Gap Romance) को अक्सर बहुत ज्यादा नाटकीय या अजीब तरीके से पेश किया जाता है। लेकिन गिरीश AD ने इसे बिना किसी उतावलेपन के, बहुत ही सहज और गरिमापूर्ण तरीके से पर्दे पर उतारा है।</div><div><br></div><div><b>मजेदार सामाजिक दायरा:</b> डायरेक्टर ने छोटी-छोटी बारीकियों को दिखाने में कमाल किया है। पड़ोसियों की छोटी-मोटी आदतें और उनकी उलझनें फिल्म में ज़बरदस्त कॉमिक टाइमिंग और अपनापन जोड़ती हैं।</div><div><br></div><div><b>एक्टिंग: निविन पॉली का कमबैक और ममिता बैजू का जादू</b></div><div><b>&nbsp;</b></div><div><b>निविन पॉली (जस्टिन के रूप में):</b> निविन ने जस्टिन के किरदार के अकेलेपन, उसके बेफिक्र मिजाज और उसकी कमियों को बहुत ही सहजता से निभाया है। जस्टिन कोई मिस्टर परफेक्ट नहीं है—उसे दोस्तों के साथ बार में पीना पसंद है और वह अपनी कमियों को अपनी खुशमिजाजी के पीछे छिपाता है। निविन की नेचुरल कॉमिक टाइमिंग फिल्म को एक अलग ऊंचाई पर ले जाती है।</div><div><br></div><div><b>ममिता बैजू (एशली के रूप में): </b>ममिता बैजू एक बार फिर साबित करती हैं कि वे मौजूदा दौर की सबसे प्रतिभाशाली युवा अभिनेत्रियों में से एक हैं। इससे पहले फिल्म 'विश्वनाथ एंड सन्स' में भी वे एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति के साथ स्क्रीन शेयर करती दिखी थीं। इस फिल्म में भी उन्होंने अपने किरदार में जो ताजगी और स्वाभाविकता लाई है, वह काबिले तारीफ है।</div><div><br></div><div><b>ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री: </b>निविन और ममिता के बीच की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री इतनी स्वाभाविक है कि दर्शकों को उनका रिश्ता बिल्कुल असली और सच्चा लगता है। सपोर्टिंग कास्ट ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।</div><div><br></div><div>पूरे रिश्ते को जो चीज़ कामयाब बनाती है, वह है उनके और ममिता बैजू के बीच शानदार ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री - और यह फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। दिलचस्प बात यह है कि हाल के हफ़्तों में ममिता बैजू की यह दूसरी फ़िल्म है जिसमें वह किसी अधेड़ उम्र के आदमी के साथ रोमांस करती दिख रही हैं (दूसरी फ़िल्म 'विश्वनाथ एंड सन्स' है)। यह युवा एक्ट्रेस एक बार फिर साबित करती है कि क्यों वह दर्शकों के दिलों में जगह बना पाई है। वह एक नैचुरल परफॉर्मर है, जो अपने रोल में सहजता और स्वाभाविकता लाती है, और इसी वजह से उनका रिश्ता असली लगता है। इस फ़िल्म के सपोर्टिंग कास्ट को भी क्रेडिट मिलना चाहिए क्योंकि उन सभी ने अपनी मौजूदगी से फ़िल्म को और बेहतर बनाया है।</div><div><br></div><div>'बेथलहम कुडुम्बा यूनिट' में एक अपनापन है जो आपको पूरी तरह से अपना बना लेता है। डायरेक्टर गिरीश AD ने एक बार फिर दिखाया है कि आम लोग कितने दिलचस्प हो सकते हैं और प्यार, दोस्ती, कमियों और छोटी-छोटी खुशियों से भरी कितनी शानदार ज़िंदगी जी सकते हैं। और निविन पॉली और ममिता बैजू हमें यकीन दिलाते हैं कि रोमांस का हमेशा पारंपरिक तरीकों के हिसाब से होना ज़रूरी नहीं है - यह बस दो लोगों के बारे में है जो एक-दूसरे से प्यार करते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 24 Aug 2026 13:54:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bethlehem-kudumba-unit-movie-review-effortless-chemistry-between-nivin-pauly-and-mamita-baiju</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[7 Dogs Movie Review | धमाकेदार एक्शन, इंटरनेशनल लोकेशन्स और सलमान-संजय का स्वैग, जानिए कैसी है यह मेगा-थ्रिलर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/7-dogs-movie-review-%7C-explosive-action-international-locations-and-swag-of-salman-and-sanjay]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यदि आप सिनेमाघरों में ऐसी फ़िल्में देखना पसंद करते हैं जो बिना समय गंवाए सीधे आपको रोंगटे खड़े कर देने वाले एड्रेनालाईन-पंपिंग (Adrenaline-Pumping) एक्शन में झोंक देती हैं, तो '7 Dogs' आपके लिए ही बनी है। 'बैड बॉयज़ फॉर लाइफ' और 'बैड बॉयज़: राइड ऑर डाई' जैसी सुपरहिट फ़िल्में देने वाले मशहूर डायरेक्टर द्वय आदिल अल अरबी और बिलाल फल्लाह ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि एक्शन को स्क्रीन पर एंटरटेनमेंट की तरह कैसे पेश किया जाता है। यह फ़िल्म शुरुआत से अंत तक एक ही नियम पर चलती है: 'बस आगे बढ़ते रहो!'</div><div><br></div><div><b>हवाई जहाज़ के खौफनाक मंजर से शुरुआत</b></div><div>फ़िल्म का ओपनिंग सीन ही इसकी आगे की रफ़्तार तय कर देता है। एक मिडल-एयर क्रैश होते हवाई जहाज़ के भीतर जबरदस्त गनफ़ाइट और स्टंट्स होते हैं, जिसे किसी तरह दो लोग बचाते हैं। पहला है खालिद अल-अज़ाज़ी (अहमद एज़), जो एक बेहद काबिल इंटरपोल अफ़सर है। दूसरा है घाली अबू दाऊद (करीम अब्देल अज़ीज़), जो एक खूंखार क्रिमिनल है और 'सेवन डॉग्स' नाम के खतरनाक इंटरनेशनल सिंडिकेट का मुख्य सदस्य है।</div><div><br></div><div>खालिद अब फील्ड वर्क छोड़कर अपनी मंगेतर के साथ एक शांत शादीशुदा जिंदगी बिताना चाहता है। लेकिन उसकी यह योजना तब ध्वस्त हो जाती है जब 'पिंक लेडी' नाम का एक नया, घातक ड्रग पूरी दुनिया के क्राइम नेटवर्क में तहलका मचा देता है। सिंडिकेट को खत्म करने के लिए खालिद को एक आखिरी मिशन पर लौटना पड़ता है। सबसे बड़ा ट्विस्ट यह है कि उसे अपने पुराने दुश्मन और अपराधी घाली के साथ ही हाथ मिलाना पड़ता है।</div><div><br></div><div><b>ग्लोबल स्टेज पर मौत का पीछा और चाइनीज़ टच</b></div><div>फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबी इसका दायरा (Scale) है। सिंडिकेट के सात प्रमुख सदस्य दुनिया के अलग-अलग देशों में छिपे हैं, जिससे यह पूरा मिशन एक 'ग्लोबल कैट-एंड-माउस चेस' बन जाता है। हर नई लोकेशन के साथ एक्शन का स्टाइल भी बदलता है।</div><div><br></div><div>चाइनीज़ सीक्वेंस: चीन वाला हिस्सा, जिसमें ली चांग (मैक्स हुआंग) का किरदार है, फ़िल्म को एक नए मुकाम पर ले जाता है। इस बैकग्राउंड में प्रिसिला चैन का मशहूर कैंटोनीज़ गाना 'अ थाउज़ेंड क्यू सॉन्ग्स' बजता है। कोरियोग्राफी इतनी शानदार और ऊर्जावान है कि यह भयंकर खून-खराबे के बीच भी एक गजब का मजेदार टच देती है।</div><div><br></div><div><b>भारतीय दर्शकों के लिए धमाका: सलमान खान और संजय दत्त</b></div><div>भारतीय फैंस के लिए फ़िल्म का सबसे बड़ा आकर्षण सलमान खान और संजय दत्त का कैमियो है। भले ही उनका स्क्रीन टाइम अपेक्षा से कम है, लेकिन वे जब भी स्क्रीन पर आते हैं, पूरी लाइमलाइट चुरा लेते हैं।</div><div><br></div><div>सलमान खान (जौहर): खालिद के बेहद करीबी और वफादार सहयोगी 'जौहर' के रोल में सलमान अपने खास अंदाज़ और स्वैग में नजर आते हैं। उन्हें न सिर्फ भारी-भरकम गन-फाइट का मौका मिला है, बल्कि ऑटो-रिक्शा के साथ एक बेहद मजेदार एक्शन-राइड भी दी गई है जो भारतीय फैंस को सीट से बांधे रखती है।</div><div><br></div><div>संजय दत्त (रंजीत): भारत वाले सीन में संजय दत्त एक खूंखार अपराधी 'रंजीत' के अवतार में दिखते हैं। मेकर्स ने उन्हें पारंपरिक विलेन की जगह एक अनूठा अंदाज़ दिया है—वह भीषण लड़ाई के दौरान भी एक हाथ में 'सेल्फी स्टिक' पर कैमरा पकड़े ब्लॉगर की तरह लड़ते दिखते हैं। यह सीन अजीब, नया और बेहद मनोरंजक है।</div><div><br></div><div><b>महिला किरदारों का एक्शन अवतार और मोनिका बेलुची की शालीनता</b></div><div>लास वेगास और रेगिस्तानी लोकेशन्स के दौरान एंट्री होती है जूलिया यानी मोनिका बेलुची की। मोनिका इस तेज़-तर्रार फिल्म में अपनी मौजूदगी से एक डार्क, शालीन और खतरनाक वाइब जोड़ती हैं।</div><div><br></div><div>इस फिल्म की एक और तारीफ करनी होगी कि यह महिला किरदारों को केवल 'ग्लैमर' या 'भावनात्मक सपोर्ट' तक सीमित नहीं रखती। खालिद की महिला सहकर्मियों को भी पुरुषों के कंधे से कंधा मिलाकर घातक एक्शन सीन्स और गन-फाइट में हिस्सा लेते दिखाया गया है।</div><div><br></div><div><b>कॉमेडी, परिवार और रफ़्तार का समझौता</b></div><div>फ़िल्म केवल गोलियों की गूंज तक सीमित रहने की कोशिश नहीं करती। इसमें खालिद का अपनी मंगेतर के साथ रिश्ता, उसके पिता की मौत का अतीत और घाली के परिवार का भावनात्मक पक्ष भी जोड़ा गया है। एक बेहद उथल-पुथल भरे एक्शन सीन के बीच खालिद को उसकी मंगेतर का कॉल आना—जो इस बात से बेखबर है कि वह अपनी जान बचा रहा है और उससे शादी की लोकेशन तय करने को कह रही है—फ़िल्म में कॉमेडी का एक बहुत प्यारा एंगल लाता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, भावनात्मक पहलू फ़िल्म का सबसे कमजोर हिस्सा है। कहानी इतनी तेजी से आगे बढ़ती है कि दर्शकों को किसी भी रिश्ते की गहराई को महसूस करने का मौका ही नहीं मिलता।</div><div><br></div><div><b>अंतिम फैसला (Verdict)</b></div><div>रेगिस्तान के बीच धूल भरी आंधियों, आग के गोलों और धमाकों से भरा इसका क्लाइमैक्स (Climax) बड़े पर्दे पर देखने लायक है। '7 Dogs' कोई ऐसी फिल्म नहीं है जिसके बारे में आप हफ्तों तक सोचते रहें, लेकिन सिनेमाघर के अंदर बिताए गए दो घंटे में यह आपको एक पल के लिए भी बोर नहीं होने देती। सलमान और संजय का ज्यादा स्क्रीन टाइम न होना थोड़ा खटक सकता है, लेकिन अगर आप एक शुद्ध, बिना रुके चलने वाले और हाई-ऑक्टेन 'मास एक्शन एंटरटेनर' की तलाश में हैं, तो यह फ़िल्म आपको निराश नहीं करेगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 13:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/7-dogs-movie-review-%7C-explosive-action-international-locations-and-swag-of-salman-and-sanjay</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Batwara 1947 Review | Sunny Deol का दमदार अवतार और Shabana Azmi की भावुक एक्टिंग, इंसानियत और दर्द की अटूट दास्तान!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/batwara-1947-review-sunny-deol-powerful-avatar-and-shabana-azmi-emotional-performance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div>असगर वजाहत के बहुचर्चित और पुरस्कार विजेता नाटक "जिस लाहौर नई वेख्या, ओ जम्या ही नई" पर आधारित फिल्म 'बंटवारा 1947' सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है। 'घायल', 'दामिनी' और 'घातक' जैसी ऑल-टाइम ब्लॉकबस्टर फिल्में देने वाले निर्देशक राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी ने एक बार फिर बड़े पर्दे पर वापसी की है। यह फिल्म 1947 के विभाजन के उस खौफनाक दौर को दर्शाती है जहाँ नफ़रत के बीच इंसानियत की जीत होती है।</div><div>&nbsp;</div><div><div><b>रेटिंग: 3.5/5 स्टार</b></div><div><b>डायरेक्टर: राजकुमार संतोषी</b></div><div><b>मुख्य कलाकार: सनी देओल, शबाना आज़मी, प्रीति ज़िंटा, अली फ़ज़ल, करण देओल, अभिमन्यु सिंह</b></div><div>&nbsp;</div></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>फिल्म की कहानी विभाजन के तुरंत बाद के लाहौर की पृष्ठभूमि पर सेट है। शरणार्थी कैंपों की बदहाली के बीच लखनऊ से लाहौर पहुंचा सिकंदर मिर्ज़ा (सनी देओल) का परिवार—जिसमें उसकी पत्नी हमीदा (प्रीति ज़िंटा), बेटा जावेद (करण देओल) और बेटी तनवीर शामिल हैं—एक बड़ी हवेली में अपना नया आशियाना तलाशता है।</div><div><br></div><div>यह हवेली एक हिंदू परिवार छोड़ कर गया था, लेकिन कहानी में असली मोड़ तब आता है जब उन्हें पता चलता है कि हवेली में एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला 'माई दुर्गावती' (शबाना आज़मी) अभी भी रह रही हैं। माई अपना घर छोड़ने से साफ़ इंकार कर देती हैं। एक तरफ सिकंदर पर अपने परिवार की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी है, तो दूसरी तरफ नफ़रत फैलाने वाले याकूब पहलवान (अभिमन्यु सिंह) जैसे दुश्मनों का खतरा। यहाँ से शुरू होती है दो परिवारों के बीच टकराव, अपनापन और इंसानियत की एक बेहद भावुक दास्तान।</div></div><div>&nbsp;</div><div><b>बंटवारा 1947: एक्टिंग</b></div><div>सनी देओल ने सिकंदर मिर्ज़ा के रोल में ज़बरदस्त छाप छोड़ी है। उन्होंने इस किरदार में अपनी जानी-पहचानी तेज़ी और दमदार मौजूदगी दिखाई है, खासकर इमोशनल और एक्शन से भरपूर हिस्सों में। सिकंदर अपने परिवार की रक्षा के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है, और देओल ने उन पलों को बखूबी निभाया है। उनके कुछ एक्शन सीन दर्शकों को 'गदर' की याद दिला सकते हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, शबाना आज़मी इस फ़िल्म की इमोशनल जान हैं। 'माई' के तौर पर उनका रोल दिल को छू लेने वाला है, और कई सीन ऐसे हैं जो सीधे असर करते हैं। उनके कुछ पल सचमुच दिल तोड़ने वाले हैं और लंबे समय तक याद रहते हैं।</div><div><br></div><div>प्रीति ज़िंटा लगभग आठ साल के लंबे ब्रेक के बाद 'बंटवारा 1947' से बड़े पर्दे पर लौटी हैं। हमीदा मिर्ज़ा के रोल में उन्होंने अच्छा असर छोड़ा है, हालांकि उनके किरदार को और भी बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता था।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/sunita-ahuja-has-withdrawn-the-divorce-petition-against-govinda-manager-confirms" target="_blank">तलाक की खबरों पर लगा पूर्णविराम! सुनीता आहूजा ने गोविंदा के खिलाफ वापस ली डिवोर्स पेटीशन, मैनेजर ने की पुष्टि</a></h3><div><br></div><div>करण देओल का 'जावेद' वाला किरदार दिलचस्प है और उसमें काफी गुंजाइश है, लेकिन उनकी एक्टिंग और बेहतर हो सकती थी। कहानी में इस रोल के लिए और भी बहुत कुछ था, जिसे एक्टिंग के ज़रिए पूरी तरह से नहीं दिखाया जा सका।</div><div><br></div><div>अली फ़ज़ल ने हबीब काज़मी के रोल में फ़िल्म में एक नया आयाम जोड़ा है। उन्होंने इस किरदार को बहुत ही शांत, समझदार और लगभग शायराना अंदाज़ में निभाकर कहानी में एक अलग ही ऊर्जा भरी है। सिकंदर के साथ उनके सीन में एक तरह का ठहराव है, जो उनके आस-पास फैली हिंसा के बिल्कुल उलट है।</div><div><br></div><div>अभिमन्यु सिंह ने याकूब पहलवान का रोल निभाया है और विलेन के तौर पर ज़बरदस्त छाप छोड़ी है। वे सचमुच खतरनाक लगते हैं और उस नफ़रत का चेहरा बन जाते हैं जिसे फ़िल्म आखिर में खत्म करने की कोशिश करती है।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट भी 'बंटवारा 1947' को सिर्फ़ स्टार-ओरिएंटेड कहानी से कहीं ज़्यादा बड़ा बनाती है। यह असल में एक बेहतरीन कलाकारों वाली फ़िल्म है। खुशी हज़ारे ने तनवीर मिर्ज़ा के रोल में अच्छा काम किया है, जबकि कनिका कपूर, ईशा संधीर, खालिद सिद्दीकी, रुखसार रहमान, परमिंदर सिंह कंठ, शिविका ऋषि, अंबिका नागवानी, पंकज रैना, राजन मोदी और चंदन दिलावर जैसे सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी कहानी में अहम योगदान दिया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/awarapan-2-makes-history-crosses-100-crore-in-5-days-emraan-hashmi-first-solo-100-crore-film" target="_blank">Awarapan 2 ने रचा इतिहास! 5 दिनों में ₹100 करोड़ पार, Emraan Hashmi की पहली सोलो 100 करोड़ी फिल्म, 'कबीर सिंह' और 'सूर्यवंशी' की बराबरी की</a></h3><div><br></div><div><b>बंटवारा 1947: डायरेक्शन</b></div><div>राजकुमार संतोषी का डायरेक्शन भारत-पाकिस्तान बंटवारे के दोनों तरफ़ रहने वाले लोगों के साझा दर्द को बखूबी दिखाता है। फ़िल्म इस बात पर ज़ोर देती है कि बंटवारे ने सिर्फ़ एक देश को ही नहीं बांटा था। इसने परिवारों को अलग कर दिया और अनगिनत लोगों को अपनी ज़िंदगी नए सिरे से शुरू करने पर मजबूर कर दिया।</div><div><br></div><div>कहानी का मुख्य हिस्सा मज़बूत है और विषय में स्वाभाविक रूप से काफ़ी भावनात्मक गहराई है। फ़िल्म का पहला भाग बहुत अच्छा है और दर्शकों को बांधे रखता है। हालाँकि, दूसरा भाग थोड़ा खिंचा हुआ लगता है।</div><div><br></div><div>निर्देशन और एडिटिंग कुछ जगहों पर और बेहतर हो सकती थी, ख़ासकर तब जब फ़िल्म दोहराव वाली लगने लगती है। फ़िल्म के भावनात्मक माहौल की ज़रूरत से ज़्यादा सनी देओल के एक्शन और हीरो वाले सीन भी शायद इसमें हैं। कुछ दृश्य बहुत ज़्यादा नाटकीय और बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए हैं, जो फ़िल्म के ज़्यादा निजी और भावनात्मक अंदाज़ के साथ हमेशा सही नहीं बैठते। संवादों में भावनात्मक पल हैं, लेकिन कुछ संवाद और भी असरदार और दृश्यों के लिए ज़्यादा उपयुक्त हो सकते थे।</div><div><br></div><div><b>बंटवारा 1947: संगीत</b></div><div>फिल्म के इमोशनल माहौल को मज़बूत बनाने में बैकग्राउंड स्कोर अच्छा काम करता है। अच्छी बात यह है कि कहानी फालतू गानों के बोझ तले नहीं दबती।</div><div><br></div><div>शबाना आज़मी पर फिल्माया गया एक गाना अपनी इमोशनल क्वालिटी के लिए खास तौर पर अलग दिखता है। इसमें भगवान राम और रानी कौशल्या का ज़िक्र है, जो फिल्म के इमोशनल पहलू में एक और परत जोड़ता है।</div><div><br></div><div><b>बंटवारा 1947: टेक्निकल एनालिसिस</b></div><div>संतोषी और देओल ने पहले भी एक्शन-प्रधान फिल्मों में साथ काम किया है, और 'बंटवारा 1947' एक बार फिर एक्टर को काफी फिजिकल काम करने का मौका देती है। टेक्निकली, फिल्म उथल-पुथल भरे दौर के माहौल को फिर से बनाने में अच्छा काम करती है।</div><div><br></div><div>प्रोडक्शन डिज़ाइन और कॉस्ट्यूम उस दौर के माहौल को बनाने में मदद करते हैं, जबकि सिनेमैटोग्राफी किरदारों के आस-पास के दुख और अनिश्चितता को दिखाती है।</div><div><br></div><div>हालांकि, फिल्म की रफ़्तार कभी-कभी धीमी हो जाती है, खासकर जब यह अपने मुख्य इमोशनल टकराव से हटती है। बैकग्राउंड स्कोर ड्रामैटिक हिस्सों को सपोर्ट करता है, लेकिन कभी-कभी यह इमोशन को स्वाभाविक रूप से विकसित होने देने के बजाय उसे ज़बरदस्ती उभारता है।</div><div><br></div><div>एक बड़ी टेक्निकल कमी इतने इमोशनल और गहरे विषय को पेश करने के तरीके में है। बंटवारे की कहानी में गहराई और दिलचस्पी बनी रहनी चाहिए, लेकिन बार-बार ऑडियो का कटना-जुड़ना देखने के अनुभव को खराब कर सकता है और कहानी के असर को कम कर सकता है।</div><div><br></div><div><b>'बंटवारा 1947' में सबसे अच्छी बात क्या है?</b></div><div>'बंटवारा 1947' की सबसे बड़ी ताकत निस्संदेह इसका विषय है। बंटवारे को सिर्फ एक पॉलिटिकल घटना के तौर पर दिखाने के बजाय, फिल्म इसे आम लोगों की ज़िंदगी के नज़रिए से देखने की कोशिश करती है, जिन्हें अपने घर, यादें और पहचान पीछे छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था।</div><div><br></div><div>शबाना आज़मी का किरदार 'माई' उस व्यक्ति के दर्द को दिखाता है जिसने लगभग सब कुछ खो दिया है। साथ ही, फिल्म माई और सिकंदर के बीच एक दिल को छू लेने वाला रिश्ता बनाती है। एक मुस्लिम आदमी और एक बुज़ुर्ग हिंदू महिला, जो एक ऐसे बंटवारे के विपरीत पक्षों में फँसे हैं जो उन्हें अलग करने वाला था, धीरे-धीरे एक-दूसरे का सहारा बन जाते हैं और परिवार जैसा महसूस करने लगते हैं।</div><div><br></div><div>इसी रिश्ते में फिल्म का मुख्य विचार सबसे साफ़ तौर पर सामने आता है। कहानी आखिरकार बंटवारे से पैदा हुई दूरियों के बजाय उस इंसानियत में ज़्यादा दिलचस्पी रखती है जो उन दूरियों के बावजूद बची रहती है।</div><div><br></div><div><b>बंटवारा 1947: क्या इसे देखना चाहिए?</b></div><div>देशों का बंटवारा हो सकता है। घरों का बंटवारा हो सकता है। ज़मीन का बंटवारा हो सकता है। लेकिन इंसानियत को बांटा नहीं जा सकता। यही सोच 'बंटवारा 1947' का मुख्य आधार है, जिसमें बंटवारे पर बनी फिल्मों वाले सभी जाने-पहचाने तत्व मौजूद हैं: एक्शन, परिवार, देशभक्ति, भावनाएं और कहानी का एक मजबूत मुख्य टकराव।</div><div><br></div><div>फिल्म का दूसरा हिस्सा और कसा हुआ हो सकता था, और संवाद भी और धारदार हो सकते थे। कुछ जगहों पर वीरता और एक्शन को थोड़ा कम नाटकीय रखा जा सकता था, खासकर उन दृश्यों में जहां बहुत ज़्यादा बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए एक्शन से फिल्म के भावनात्मक माहौल पर असर पड़ता है।</div><div><br></div><div>फिर भी, कहानी ही इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है। इसमें इतना भावनात्मक असर और कहानी का इतना मजबूत मुख्य टकराव है कि 'बंटवारा 1947' को कम से कम एक बार तो जरूर देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>'बंटवारा 1947' के लिए 5 में से 3.5 स्टार।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 16:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/batwara-1947-review-sunny-deol-powerful-avatar-and-shabana-azmi-emotional-performance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Awarapan 2 Movie Review | 19 साल बाद भी कायम है 'शिवम पंडित' का स्वैग, इमरान हाशमी की धमाकेदार वापसी!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/awarapan-2-movie-review-emraan-hashmi-shivam-pandit-swag-remains-intact-even-after-19-years]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div>2007 में आई फिल्म 'आवारापन' भले ही उस समय बॉक्स ऑफिस पर बड़ी हिट न रही हो, लेकिन समय के साथ 'शिवम पंडित' का किरदार और फिल्म का म्यूजिक दर्शकों के दिलों में आइकॉनिक बन गया। पूरे 19 साल बाद मेकर्स 'आवारापन 2' के साथ वापस लौटे हैं। पहले दिन, पहले शो में ही थिएटरों का हाउसफुल होना यह साबित करता है कि दर्शक इमरान हाशमी के इस अवतार को कितना पसंद करते हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div></div><div>स्टार रेटिंग: 3.5/5</div><div>मुख्य कलाकार: इमरान हाशमी, दिशा पाटनी, पूरन गब्बी, शबाना आज़मी, सुविंदर विक्की</div><div>निर्देशक: नितिन कक्कड़</div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: कहानी और प्लॉट</b></div><div>'आवारापन 2' की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ 2007 की फिल्म खत्म हुई थी। श्रिया सरन का किरदार 'आलिया हामिद' अब नहीं रहा, और शिवम पंडित (इमरान हाशमी) फिर से उसी हालत में है - अकेला। वह अब लड़ाई-झगड़े और अपराध की दुनिया से दूर रहता है। उसका ज़्यादातर समय अपने सच्चे प्यार की कब्र के पास बैठकर गुज़रता है। एक दिन, वहाँ बैठे-बैठे वह अपनी ज़िंदगी के मकसद के बारे में सोचने लगता है। तभी उसे एक लावारिस बच्ची के रोने की आवाज़ सुनाई देती है।</div><div><br></div><div>वह उसे उठाता है और अनाथालय ले जाता है। लेकिन वह दूर से ही उसकी देखभाल करता रहता है। वह उसका नाम अपनी पुरानी प्रेमिका के नाम पर 'आलिया' रखता है। हालात तब बदलते हैं जब उस छोटी बच्ची को एक ऐसा परिवार मिल जाता है जो उसे गोद लेने को तैयार होता है। वह जाने से हिचकिचाती है, लेकिन शिवम उसे भेज देता है। उसका मानना ​​है कि वह बेहतर ज़िंदगी की हकदार है। जल्द ही उसे पता चलता है कि वह परिवार नकली था। आलिया इंसानों की तस्करी करने वाले एक गिरोह (रैकेट) का शिकार बन गई है। तभी शिवम को एहसास होता है कि वह अपनी आलिया को दूसरी बार नहीं खो सकता।</div><div><br></div><div>वह हत्यारे (assassin) के तौर पर अपनी पुरानी ज़िंदगी में लौट आता है और उस रैकेट के मास्टरमाइंड को खोजने निकल पड़ता है। उसकी खोज उसे बैंकॉक ले जाती है, जहाँ उसे पता चलता है कि समस्या उसकी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ी है। अब उसके सामने दो काम हैं: रैकेट के पीछे के लोगों को ढूंढना और बच्ची की रक्षा करना।</div><div>&nbsp;</div><div><b> आवारापन 2: परफॉर्मेंस</b></div><div>जब राघव जुयाल ने 'द बार्ड्स ऑफ़ बॉलीवुड' में कहा था कि "अक्खा बॉलीवुड एक तरफ, इमरान हाशमी एक तरफ", तो वे गलत नहीं थे।</div><div><br></div><div>शिवम पंडित के रोल में इमरान हाशमी फिल्म की जान हैं। उनकी गंभीर पर्सनैलिटी, लंबे बाल, दाढ़ी और आंखों का खालीपन ही बहुत कुछ कह जाता है। वे एक ठुकराए हुए प्रेमी का दर्द बहुत आसानी से दिखाते हैं। उनका चलना, उनकी खामोशी और लोगों को देखने का अंदाज़ भी शिवम की पर्सनैलिटी का हिस्सा बन जाता है। आप उनका दर्द महसूस करते हैं। और कहीं न कहीं, आप 2000 के दशक के बीच के समय में वापस चले जाते हैं, जब इमरान की 'खोए हुए प्रेमी' वाली इमेज ने पूरी पीढ़ी को अपना दीवाना बना लिया था।</div><div><br></div><div>ज़ारा के रोल में दिशा पाटनी का किरदार काफी दमदार है, और उन्होंने इसे बखूबी निभाया है। कुछ जगहों पर उनके डायलॉग बोलने का तरीका और बेहतर हो सकता था, लेकिन ट्रेलर में जो दिखाया गया था, उससे कहीं ज़्यादा काम उन्होंने फिल्म में किया है। वे फिल्म के मज़बूत स्तंभों में से एक बन जाती हैं।</div><div><br></div><div>पूरन गब्बी मुख्य विलेन ज़ोरावर का रोल निभाते हैं। वह सनकी, अजीब और साइकोटिक है। उनकी मौजूदगी फिल्म में एक डरावना माहौल बनाती है। उनके अजीब डांस मूव्स और भड़कीली पर्सनैलिटी आपको असहज करती है, और यह काफी हद तक असरदार भी है। इमरान हाशमी के सामने विलेन का रोल निभाना आसान नहीं है, खासकर तब जब उनके साथ यह आपका पहला अहम रोल हो। पूरन ने इसे बखूबी निभाया है।</div><div><br></div><div>शबाना आज़मी ने एक गैंगस्टर गैंग की लीडर नफीसा का रोल निभाया है। वह डरावनी हैं और फिल्म में उनका रोल कम है। लेकिन जब भी वह स्क्रीन पर आती हैं, तो छा जाती हैं। काश उनके किरदार का और इस्तेमाल किया जाता, क्योंकि उन्हें और भी खतरनाक दिखाने की गुंजाइश थी।</div><div><br></div><div>सुविंदर विक्की आजकल हर जगह नज़र आ रहे हैं। और आप जानते हैं कि जब वे किसी फिल्म में होते हैं, तो उसके पीछे एक अच्छी स्क्रिप्ट ज़रूर होती है। उनका किरदार कई परतों वाला है, और उनका रोल कहानी में एक दिलचस्प पहलू जोड़ता है।</div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: बेहतरीन पल</b></div><div>फिल्म शुरू से ही आपको अपनी दुनिया में ले जाती है। मेकर्स ने नॉस्टेल्जिया का बहुत अच्छे से इस्तेमाल किया है। जब बैकग्राउंड में 'तो फिर आओ' गाने का नया वर्शन बजता है और इमरान का चेहरा सामने आता है, तो आप बस आह भरते रह जाते हैं। आप तुरंत 'आवारापन' की दुनिया में वापस पहुँच जाते हैं।</div><div><br></div><div>इसमें अकेलापन है। इसमें प्यार है। इसमें बदला है, एक्शन है। भला क्या पसंद नहीं आएगा? लेकिन सबसे अच्छी बात है शिवम पंडित।</div><div><br></div><div>उनके चेहरे और सिर पर लगने वाली हर चोट अपनी सी लगती है। उनके चलने का अंदाज़, उनका दुख और अकेलेपन को संभालने का तरीका आपके ज़हन में बस जाता है। कुछ सीन में जाने-पहचाने चेहरों की अचानक एंट्री भी बहुत बढ़िया लगती है। ज़्यादातर हिस्सों में स्क्रिप्ट कसी हुई है। स्क्रीनप्ले कहानी को आगे बढ़ाता है और एक्टिंग फ़िल्म को इमोशनल गहराई देती है।</div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: म्यूज़िक और डायलॉग</b></div><div>क्या आप जानते हैं कि 2007 में रिलीज़ होने पर 'आवारापन' बॉक्स ऑफ़िस पर फ़्लॉप रही थी? आज यह इमरान हाशमी की एक आइकॉनिक फ़िल्म बन गई है, और इसमें इसके म्यूज़िक का बहुत बड़ा हाथ है। 'आवारापन 2' के म्यूज़िक कंपोज़र्स ने अपना काम बखूबी किया है। उन्होंने उन चीज़ों को बदलने की कोशिश नहीं की जो पहले से ही हिट थीं, बल्कि उन्हें और बेहतर बनाया। कहानी की ज़रूरत के हिसाब से बीच-बीच में बांसुरी की धुनें और 'तो फिर आओ' और 'तेरा मेरा रिश्ता पुराना' जैसे गानों के नए वर्ज़न सुनने को मिलते हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">और यह असरदार भी लगता है।</span></div><div><br></div><div>सुबोध शर्मा और साज़ भट्ट ने इन क्लासिक गानों को जिस तरह से गाया है, वह ओरिजिनल गानों की गहराई के लगभग बराबर है। गानों के बोल भी बहुत समझदारी से लिखे गए हैं। नए गाने - जैसे अरिजीत सिंह का गाया 'ये आवारापन', मिथुन का कंपोज़ किया 'वे जुनून' और अखिल सचदेवा का 'पिया घर आया' - फ़िल्म की दुनिया में एकदम सही बैठते हैं। आइकॉनिक चीज़ों की जगह कोई नहीं ले सकता, लेकिन यह एक ईमानदार कोशिश थी।</div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: डायरेक्शन</b></div><div>नितिन कक्कड़ ने मोहित सूरी से बागडोर संभाली है और उन्हें अच्छी तरह पता है कि दर्शक क्या देखने आए हैं। वह जानते हैं कि 'आवारापन 2' सिर्फ़ एक और सीक्वल नहीं है। यह उस पीढ़ी के लिए पुरानी यादों को ताज़ा करने जैसा है जो शायद पहली फ़िल्म के रिलीज़ होने के समय स्कूल या कॉलेज में थी।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">और वह इसी नॉस्टैल्जिया का इस्तेमाल करते हैं। कभी-कभी तो जोखिम भरे तरीके से भी।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">लेकिन वह पूरी तरह से इसी पर निर्भर नहीं रहते। फ़िल्म की अपनी कहानी और अपना इमोशनल पहलू है। इससे यह फ़िल्म पुराने फ़ैन्स से तो जुड़ती ही है, साथ ही नई पीढ़ी (Gen Z) के दर्शकों को भी पसंद आती है। सबसे अच्छी बात यह है कि फ़िल्म को इस बात में कोई झिझक नहीं है कि किस चीज़ ने 'आवारापन' को खास बनाया था।</span></div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: क्या अच्छा है</b></div><div>इमरान हाशमी फ़िल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। शिवम पंडित का किरदार ऐसा लगता है जैसे उनके लिए ही बना हो। दर्द, खामोशी और गहराई - सब कुछ इसमें है। नॉस्टैल्जिया काम करता है। म्यूज़िक, पुराने सीन की याद दिलाने वाले विज़ुअल और जाने-पहचाने इमोशनल पल तुरंत याद दिलाते हैं कि पहली फ़िल्म समय के साथ क्यों खास बन गई थी।</div><div><br></div><div>म्यूज़िक भी ज़बरदस्त है। मेकर्स जानते हैं कि पुराने गाने कब वापस लाने हैं और कब कुछ नया पेश करना है। एक्शन में दम है। ऐसा नहीं लगता कि एक्शन सिर्फ़ एक्शन के लिए किया गया है। शिवम की हिंसा उसके किरदार और उसके इमोशनल सफ़र से जुड़ी है।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट ने भी फ़िल्म को बेहतर बनाया है। दिशा पाटनी को एक अहम रोल मिला है, पूरन गब्बी ने छाप छोड़ी है, और सुविंदर विक्की ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वे सबसे भरोसेमंद एक्टर्स में से एक क्यों बन रहे हैं।</div><div><br></div><div>सबसे ज़रूरी बात, फ़िल्म अपने दर्शकों को समझती है। यह अच्छी तरह जानती है कि 'आवारापन' के साथ बड़े हुए मिलेनियल्स क्या देखना चाहते हैं।</div><div><br></div><div><b>आवारापन 2: फ़िल्म की कमियां</b></div><div>'आवारापन 2' के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि यह कभी-कभी पहली फ़िल्म के इमोशनल पहलू पर बहुत ज़्यादा निर्भर करती है। अगर आपने 'आवारापन' नहीं देखी है, तो कुछ इमोशनल पल शायद उतने असरदार न लगें। फ़िल्म उम्मीद करती है कि आप शिवम के दर्द और आलिया के साथ उसके जुड़ाव को समझें।</div><div><br></div><div>कुछ पल ऐसे भी हैं जब कहानी का अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है। एक बार जब शिवम ट्रैफ़िकिंग रैकेट में शामिल हो जाता है, तो आप मोटे तौर पर समझ जाते हैं कि कहानी किस तरफ़ जा रही है। एक पॉइंट के बाद कहानी की रफ़्तार भी धीमी हो जाती है, और आपको लगता है कि सीन में तेज़ी की ज़रूरत है। जब तक कहानी फिर से रफ़्तार पकड़ती है, तब तक धीमी रफ़्तार का असर आपके दिमाग पर रह जाता है।</div><div><br></div><div>दिशा के किरदार में भी थोड़ी और गहराई हो सकती थी। उनके पास करने के लिए काफ़ी कुछ है, लेकिन कुछ पल ऐसे भी हैं जब आपको लगता है कि फ़िल्म उनके किरदार को और बेहतर तरीके से दिखा सकती थी। और जबकि पूरन गब्बी ने अच्छा काम किया है, विलेन कभी-कभी सच में डरावने लगने के बजाय अजीब ज़्यादा लगता है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">हालांकि, ये छोटी-मोटी कमियां हैं। ये फ़िल्म को पूरी तरह से खराब नहीं करतीं।</span></div><div><b><br></b></div><div><b>आवारापन 2: फ़ाइनल वर्डिक्ट</b></div><div>'आवारापन 2' को पता है कि वह क्या है। यह उन लोगों के लिए बनाया गया सीक्वल है जिन्होंने ओरिजिनल फ़िल्म को कभी भुलाया नहीं। फ़िल्म उस अकेलेपन, म्यूज़िक और ज़ख्मी प्रेमी को वापस लाती है जिसने शिवम पंडित को इतना यादगार किरदार बनाया था। लेकिन यह उसे एक नया मकसद भी देती है।</div><div><br></div><div>इमरान हाशमी ने फ़िल्म में ज़बरदस्त काम किया है। उनकी परफ़ॉर्मेंस में एक जाना-पहचानापन है, लेकिन यह ज़रूरी नहीं कि बुरी बात हो। असल में, फ़ैन्स इसी जाने-पहचाने अंदाज़ के लिए तो आए हैं।</div><div><br></div><div>फ़िल्म परफेक्ट नहीं है। इसमें कुछ हिस्से ऐसे हैं जिनका अंदाज़ा आसानी से लगाया जा सकता है और कुछ सपोर्टिंग किरदारों के साथ और बेहतर काम किया जा सकता था। लेकिन जब 'तो फिर आओ' गाना बजता है और शिवम पंडित स्क्रीन पर आते हैं, तो आपको एहसास होता है कि यह किरदार आज भी क्यों असरदार है। जिन फ़ैन्स ने 19 साल तक इंतज़ार किया, उनके लिए 'आवारापन 2' उस दुनिया में एक शानदार वापसी है जिसे उन्होंने कभी असल में छोड़ा ही नहीं था।</div><div><br></div><div>'आवारापन 2' के लिए 3.5/5।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 14:54:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/awarapan-2-movie-review-emraan-hashmi-shivam-pandit-swag-remains-intact-even-after-19-years</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Operation Safed Sagar Review | IAF की जांबाजी और बलिदान की दमदार कहानी, जिमी शेरगिल और सिद्धार्थ का बेहतरीन अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/operation-safed-sagar-review-a-powerful-story-of-the-iaf-valor-and-sacrifice]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1999 के कारगिल युद्ध की गाथा को भारतीय सिनेमा ने कई बार भुनाया है, लेकिन नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'ऑपरेशन सफेद सागर' इस ऐतिहासिक लड़ाई के उस पहलू को सामने लाती है, जिसकी चर्चा अक्सर कम होती है—इंडियन एयर फोर्स (IAF) का ऐतिहासिक हाई-एल्टीट्यूड कॉम्बैट मिशन। 'असुर' फेम डायरेक्टर ओनी सेन के निर्देशन में बनी यह सीरीज 'गोल्डन एरो स्क्वाड्रन' के पराक्रम और वॉर ज़ोन के पीछे की मानवीय संवेदनाओं को बेहद ईमानदारी से पर्दे पर उतारती है।</div><div><span style="font-size: 1rem;"><br></span></div><div><b>कहानी और प्लॉट: 18,000 फीट की ऊंचाई पर IAF का शौर्य</b></div><div>यह सीरीज 1999 में कारगिल की बर्फ़ीली और दुर्गम पहाड़ियों में 16,000 से 18,000 फीट की ऊंचाई पर चलाए गए ग्राउंड अटैक ऑपरेशन्स पर केंद्रित है। इसमें दिखाया गया है कि कैसे MiG-21, MiG-23 और MiG-27 जैसे फाइटर जेट्स के जरिए भारतीय वायुसेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों के ठिकानों को तबाह किया था। कहानी सिर्फ हवाई हमलों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह वर्दी के पीछे छिपे इंसानों के बीच की दोस्ती, उन पर टिके जिम्मेदारी के भारी बोझ और घर पर उनका इंतजार कर रहे परिवारों के त्याग को भी गहराई से छूती है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>ऑपरेशन सफेद सागर: परफॉर्मेंस</b></div><div>जिमी शेरगिल इस सीरीज़ की जान हैं। वे विंग कमांडर बी.एस. धनोआ 'टोनी' के किरदार में बिना ज़्यादा कोशिश किए ही अधिकार और शांति का भाव लाते हैं। सिद्धार्थ ने स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा के तौर पर हाल के समय की अपनी सबसे सधी हुई परफॉर्मेंस दी है। वे इस रोल में गरिमा, साहस और भावनात्मक गहराई लाते हैं।</div><div><br></div><div>अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना और अर्णव भसीन युवा फाइटर पायलट के तौर पर असरदार लगे हैं। उनकी केमिस्ट्री सहज लगती है और आप उनके लिए महसूस करते हैं। कम स्क्रीन टाइम के बावजूद दीया मिर्ज़ा और आदिल हुसैन अपनी गहरी छाप छोड़ते हैं। प्राजक्ता कोली ने ईमानदारी से काम किया है, हालांकि उनके किरदार के लिए और बेहतर लेखन की ज़रूरत थी और कभी-कभी वे कहानी के बहाव में ठीक से फिट नहीं बैठती थीं।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: सबसे बेहतरीन पल</b></div><div>हवाई लड़ाई के सीन 'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' की सबसे बड़ी खासियत हैं। ये सीन रोमांचक और असरदार हैं, और बिना किसी दिखावे के भी देखने में शानदार लगते हैं। VFX पर बहुत मेहनत की गई है, और यह साफ़ दिखता है।</div><div><br></div><div>'ऑपरेशन सफ़ेद सागर' की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी कास्टिंग है। हर एक्टर अपने रोल के लिए एकदम सही लगता है, जिससे किरदार तुरंत असली लगने लगते हैं। अक्सर कहा जाता है कि अच्छी कास्टिंग बेहतरीन स्क्रिप्ट को और भी बेहतर बना सकती है, और यह बात यहाँ भी सच साबित होती है। चाहे मुख्य कलाकार हों या सहायक कलाकार, हर किरदार का अपना मकसद है और वे कहानी में आसानी से घुल-मिल जाते हैं। वे सब मिलकर कहानी में वज़न, सच्चाई और इमोशनल गहराई लाते हैं।</div><div><br></div><div>स्क्वाड्रन के लोगों के बीच का आपसी तालमेल भी खास है। पायलटों के बीच तनावपूर्ण और हल्के-फुल्के पलों की वजह से इमोशनल सीन और भी ज़्यादा असरदार लगते हैं। परिवार वाले सीन, जब छोटे रखे जाते हैं, तो कहानी में अपनापन लाते हैं और दर्शकों को याद दिलाते हैं कि युद्ध के मैदान से दूर भी कितनी कुर्बानियाँ दी जाती हैं। वे आपको रुककर सोचने पर मजबूर करते हैं कि सेना के परिवारों में कितनी बहादुरी होती है।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: डायरेक्शन</b></div><div>सुपरहिट 'असुर' सीरीज़ के डायरेक्टर ओनी सेन ने इस गंभीर विषय को बहुत समझदारी से संभाला है। वे देशभक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाते और न ही असर पैदा करने के लिए ज़ोरदार डायलॉग का सहारा लेते हैं। इसके बजाय, वे कहानी और किरदारों को ही मुख्य फोकस में रखते हैं। और यह सच्चाई पूरी फ़िल्म में दिखती है। ऑपरेशन के माहौल से लेकर मिलिट्री की बारीकियों तक, इतिहास के इस हिस्से को फिर से दिखाने में की गई मेहनत साफ़ नज़र आती है।</div><div><br></div><div>बड़े कैनवस पर होने के बावजूद, उन्होंने भावनाओं को ज़मीन से जुड़ा रखा है। उनकी सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि वे दर्शकों को मिशन से पहले उसमें शामिल लोगों की परवाह करने के लिए प्रेरित करते हैं।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>यह सीरीज़ अपनी असलियत की वजह से खास बन जाती है। इसमें की गई गहरी रिसर्च, एयर फ़ोर्स की असली लोकेशन और दमदार एक्टिंग इसे भरोसेमंद बनाती है। एक्शन सीन बहुत अच्छे से फ़िल्माए गए हैं और कहीं भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं दिखाए गए। इमोशनल पल, खासकर स्क्वाड्रन के सदस्यों के बीच, दिल को छू लेते हैं। इसमें पॉलिटिक्स भी है। हालांकि, आपको एक पल के लिए भी ऐसा नहीं लगेगा कि यह कहानी या सीरीज़ के असल मकसद पर हावी हो रही है। ऑपरेशन सफ़ेद सागर का असली हीरो एयर मिशन है। और आखिरी यानी छठे एपिसोड के अंत तक यही इसका मुख्य हिस्सा बना रहता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, कुछ जगहों पर इसकी रफ़्तार धीमी पड़ जाती है। कुछ इमोशनल सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं। प्राजक्ता कोली के किरदार 'माधवी' वाले कुछ सीन कहानी से भटकाव जैसे लगते हैं। हालांकि इनका मकसद अफ़सरों के मानवीय पहलू को दिखाना और उनके परिवारों के संघर्ष को उजागर करना था, लेकिन ये हमेशा कहानी को आगे नहीं बढ़ाते।</div><div><br></div><div>सीरीज़ की एडिटिंग और बेहतर हो सकती थी। कुछ बातचीत में उन्हीं भावनाओं को दोहराया गया है जो पहले ही दिखाई जा चुकी हैं। मौजूदा सब-प्लॉट को खींचने के बजाय कुछ सपोर्टिंग किरदारों को बेहतर ढंग से दिखाया जा सकता था।</div><div><br></div><div><b>ऑपरेशन सफ़ेद सागर: आखिरी राय</b></div><div>ऑपरेशन सफ़ेद सागर सिर्फ़ एक और वॉर ड्रामा नहीं है। यह इंडियन एयर फ़ोर्स और उन जांबाज़ों को एक सच्ची श्रद्धांजलि है जिन्होंने भारतीय सैन्य इतिहास के सबसे मुश्किल कॉम्बैट मिशन में हिस्सा लिया था। यह उनकी बहादुरी का सम्मान करती है और साथ ही ड्यूटी के दौरान जुड़ी भावनाओं को भी नज़रअंदाज़ नहीं करती। और सबसे अच्छी बात? यह बिना किसी फालतू बात के सीधे मुद्दे पर बात करती है।</div><div><br></div><div>इसके बावजूद, सीरीज़ में कुछ कमियां भी हैं। कुछ धीमी गति वाले हिस्से इसकी रफ़्तार पर असर डालते हैं। लेकिन दमदार एक्टिंग, बेहतरीन डायरेक्शन और रोमांचक एरियल सीक्वेंस इसे शुरू से आखिर तक दिलचस्प बनाए रखते हैं।</div><div><br></div><div><br></div><div>ओटीटी प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>निर्देशक: ओनी सेन</div><div>मुख्य कलाकार: जिमी शेरगिल, सिद्धार्थ, अभय वर्मा, मिहिर आहूजा, तारुक रैना, दीया मिर्जा, आदिल हुसैन और प्राजक्ता कोली</div><div>रेटिंग: 3.5/5 स्टार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 16:57:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/operation-safed-sagar-review-a-powerful-story-of-the-iaf-valor-and-sacrifice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Aryabhatt Ka Zero Movie Review | उम्मीद, संघर्ष और आत्मसम्मान की इमोशनल कहानी, हिमांश कोहली और नीरज सूद का दमदार अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aryabhatt-ka-zero-movie-review-an-emotional-story-of-hope-struggle-and-self-respect]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा में असफलता के बाद फिर से उठ खड़े होने और अपनी पहचान तलाशने की कहानियों की हमेशा से एक खास जगह रही है। कमल चंद्रा के निर्देशन में बनी फिल्म 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक ऐसे ही मध्यमवर्गीय युवा के बिखरने और खुद को फिर से संवारने की कहानी है। हिमांश कोहली और सोनाली सहगल स्टारर यह फिल्म केवल UPSC की तैयारी या दिल टूटने का ड्रामा नहीं है, बल्कि यह एक बेटे की अपने पिता का सम्मान पाने और समाज द्वारा थपेड़े गए 'ज़ीरो' के टैग को मिटाने की इमोशनल जद्दोजहद है।</div><div><br></div><div><b>कहानी और प्लॉट</b></div><div>फिल्म की कहानी उत्तराखंड के एक साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाले ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव यानी 'बग्गू' (हिमांश कोहली) के इर्द-गिर्द घूमती है। बग्गू के पिता आर्यभट्ट श्रीवास्तव (नीरज सूद) एक सरकारी दफ्तर में ग्रुप-D कर्मचारी हैं, जिनकी अपने बेटे से बहुत बड़ी उम्मीदें हैं।</div><div><br></div><div>बग्गू की जिंदगी में असली भूचाल तब आता है जब उसकी गर्लफ्रेंड रिंकू (सोनाली सहगल) उसकी नाकामी से तंग आकर एक SDM से शादी कर लेती है। दिल टूटने के बाद बग्गू दिल्ली के मुखर्जी नगर पहुँचता है और उस SDM से भी बड़ा अफसर बनने का संकल्प लेकर UPSC की तैयारी में जुट जाता है। हालांकि, बार-बार की नाकामी और रिश्तेदार-समाज का 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' कहकर तंज कसना बग्गू का आत्मविश्वास तोड़ देता है। फिल्म इसी यात्रा को दर्शाती है कि क्या बग्गू समाज के तय मानकों से परे जाकर अपनी असली अहमियत को पहचान पाता है या नहीं।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: निर्देशन और तारिक़ मोहम्मद की लेखन शैली</b></div><div>निर्देशक कमल चंद्र ने फ़िल्म को ज़्यादा ड्रामेबाज़ी और बनावटी दिखावे से दूर रखा है और असलियत के करीब रहने की कोशिश की है। उन्होंने एक छोटे शहर के नौजवान की सोच और मध्यम-वर्गीय परिवार के संघर्षों को सादगी और ईमानदारी से दिखाया है। हालाँकि लेखक तारिक़ मोहम्मद की कहानी शायद बहुत नई न लगे, लेकिन उनके संवाद और हालात स्वाभाविक और विश्वसनीय लगते हैं। पिता और बेटे के बीच की बातचीत खास तौर पर दिल को छू लेने वाली है, जो कई आम भारतीय परिवारों की सच्चाई को दर्शाती है। निर्देशक ने कॉमेडी और ड्रामा के बीच संतुलन बनाए रखने की भी कोशिश की है, जिससे कहानी दिलचस्प बनी रहती है। हालाँकि, कुछ हिस्सों में उनकी पकड़ कमज़ोर पड़ जाती है, खासकर तब जब फ़िल्म अपने मुख्य विषय से भटककर गैर-ज़रूरी उप-कहानियों में उलझ जाती है।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: तकनीकी पहलू और प्रोडक्शन वैल्यू</b></div><div>तकनीकी नज़रिए से फ़िल्म का काम संतोषजनक है। सिनेमैटोग्राफ़ी ने उत्तराखंड के शांत नज़ारों और दिल्ली के मुखर्जी नगर की भीड़-भाड़ वाली गलियों के बीच के अंतर को खूबसूरती से दिखाया है। कैमरा वर्क सादगी भरा है और कहानी के मिज़ाज के अनुकूल है। बैकग्राउंड स्कोर भावनात्मक पलों को असरदार बनाता है और दर्शकों को किरदारों के संघर्ष से जुड़ने में मदद करता है। हालाँकि, एडिटिंग फ़िल्म के कमज़ोर पहलुओं में से एक है। अगर दूसरे हाफ़ में कुछ गैर-ज़रूरी दृश्यों को काट दिया जाता, तो फ़िल्म की गति और बेहतर होती। संगीत ठीक-ठाक है, कुछ गाने कहानी में स्वाभाविक रूप से घुल-मिल जाते हैं, लेकिन फ़िल्म खत्म होने के बाद कोई भी गाना लंबे समय तक याद नहीं रहता।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/shreya-kalra-winner-of-lock-upp-2-she-won-the-trophy-along-with-prize-money-of-1-crore" target="_blank">Lock Upp 2 की विजेता बनीं Shreya Kalra! ट्रॉफी के साथ जीती 1 करोड़ रुपये की इनामी राशि, Netflix पर व्यूअरशिप ने तोड़े रिकॉर्ड्स</a></h3><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: परफॉर्मेंस</b></div><div>परफॉर्मेंस की बात करें तो हिमांश कोहली ने ज़बरदस्त छाप छोड़ी है। 'बग्गू' के रोल में, उन्होंने एक परेशान, टूटे हुए लेकिन दिल से मासूम नौजवान के जज़्बातों को बहुत अच्छे से दिखाया है। हल्के-फुल्के पलों में उनकी कॉमिक टाइमिंग कमाल की है, जबकि उनकी आँखों में दिखने वाली बेबसी इमोशनल सीन को और भी असरदार बनाती है। नीरज सूद, बग्गू के पिता के रोल में फिल्म की इमोशनल जान हैं। उन्होंने एक मिडिल-क्लास पिता की बेबसी, गुस्से और बिना कहे प्यार को अपनी दिल को छू लेने वाली एक्टिंग से जीवंत कर दिया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/jiya-shankar-gets-engaged-to-us-based-businessman-karan-dhanak-flaunts-her-diamond-ring" target="_blank">Bigg Boss OTT 2 फेम Jiya Shankar ने की सगाई, US के बिजनेसमैन कारन धनक को बनाया हमसफर, फ्लॉन्ट की डायमंड रिंग</a></h3><div><br></div><div>रवि किशन जब भी स्क्रीन पर आते हैं, अपने खास देसी अंदाज़ से दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। उनका किरदार कहानी में हल्का-फुल्का मनोरंजन जोड़ता है। सोनाली सहगल ने प्रैक्टिकल और समझदार गर्लफ्रेंड 'रिंकू' के रोल के साथ पूरा न्याय किया है। हालाँकि दर्शना बनिक का रोल छोटा है, फिर भी वह अपनी एक्टिंग से छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं। इसके अलावा, अलका अमीन, राजेश शर्मा और शिल्पा शिंदे जैसे अनुभवी सपोर्टिंग एक्टर्स ने भी फिल्म को और मज़बूत बनाया है।</div><div><br></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: फिल्म कहाँ कमज़ोर पड़ जाती है</b></div><div>कई अच्छी बातों के बावजूद, 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' में कुछ कमियाँ हैं जो इसे एक बेहतरीन फिल्म बनने से रोकती हैं। पहली बात, कहानी में नयापन नहीं है। '12th फेल' और 'शादी में ज़रूर आना' जैसी फिल्मों के बाद, दिल टूटे प्रेमी का UPSC परीक्षा पास करने की कोशिश वाला प्लॉट अब थोड़ा जाना-पहचाना और पहले से अंदाज़ा लगाने लायक लगता है। दर्शक पहले ही अंदाज़ा लगा सकते हैं कि आगे क्या होने वाला है, जिससे सरप्राइज़ का एलिमेंट कम हो जाता है।</div><div><br></div><div>फिल्म का दूसरा हाफ भी काफी धीमा हो जाता है। बग्गू के संघर्ष को दिखाने की कोशिश में, कई सीन दोहराव वाले लगने लगते हैं, जिससे फिल्म दर्शकों को थोड़ी उबाऊ लग सकती है। कुछ किरदारों का विकास और अचानक आए प्लॉट ट्विस्ट भी थोड़े बनावटी लगते हैं और उन्हें और बेहतर तरीके से लिखा जा सकता था। इसके अलावा, फिल्म का अंत वैसा असर नहीं छोड़ता जैसा होना चाहिए था और थोड़ा जल्दबाजी में किया हुआ लगता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>आर्यभट्ट का ज़ीरो: आखिरी फैसला</b></div><div>'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक साफ-सुथरी और सरल फिल्म है जो एक पॉज़िटिव मैसेज देती है और दर्शकों को याद दिलाती है कि किसी व्यक्ति की असफलता उसकी पहचान तय नहीं करती। हिमांश कोहली और नीरज सूद की शानदार एक्टिंग, पिता-बेटे का इमोशनल रिश्ता और हल्का-फुल्का ह्यूमर इस फिल्म को देखने लायक बनाते हैं। हालांकि, इसकी जानी-पहचानी कहानी और कमज़ोर दूसरा हाफ इसे उस मुकाम तक पहुँचने से रोकते हैं, जिसकी यह उम्मीद करती है। अगर आप बिना बहुत ज़्यादा उम्मीदें रखे परिवार के साथ देखने के लिए कोई हल्की-फुल्की, इमोशनल और प्रेरणादायक फ़िल्म ढूंढ रहे हैं, तो यह एक ऐसी फ़िल्म है जिसे आप कम से कम एक बार ज़रूर देख सकते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 14:30:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aryabhatt-ka-zero-movie-review-an-emotional-story-of-hope-struggle-and-self-respect</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Musafir Cafe Review | भागदौड़ भरी जिंदगी में ठहराव और सुकून का अहसास देती है विक्रांत मैसी की यह नई सीरीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/musafir-cafe-review-a-sense-of-pause-and-tranquility-amidst-a-hectic-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज की तेज़-तर्रार दुनिया में, जहाँ ज़िंदगी महज 'स्क्रॉलिंग' और 'ट्रोलिंग' के बीच सिमट कर रह गई है, ऐसे में नेटफ्लिक्स की नई वेब सीरीज 'मुसाफिर कैफ़े' एक ताज़ा हवा के झोंके की तरह आती है। रुचिर अरुण द्वारा निर्देशित और 8 एपिसोड्स में बंटी यह श्रृंखला दिव्या प्रकाश दुबे के मशहूर हिंदी उपन्यास पर आधारित है। यह कहानी हमें याद दिलाती है कि जिंदगी में कभी-कभी रुकना, ठहराव लेना और पलों को जीना कितना ज़रूरी है।</div><div><br></div><div><b>कहानी: प्यार, सपने और अधूरे अहसास</b></div><div>कहानी की शुरुआत भोपाल में अरेंज्ड मैरिज के लिए मिले चंदर (विक्रांत मैसी) और सुधा (वेदिका पिंटो) से होती है। पहली मुलाकात में एक-दूसरे को रिजेक्ट करने के बाद भी किस्मत उन्हें बार-बार आमने-सामने लाती है। दोनों में गहरा और सच्चा प्यार हो जाता है, लेकिन सुधा अपने लॉ फर्म के सपनों को पूरा करने के लिए शादी से इनकार कर देती है।</div><div><br></div><div>सालों बाद, चंदर अपनी नौकरी छोड़कर पहाड़ों में एक कैफ़े खोलने का सपना पूरा करता है और उसकी ज़िंदगी में प्रीति (महिमा मकवाना) की एंट्री होती है। प्रीति एक आत्मनिर्भर, प्रैक्टिकल और समझदार महिला है जो चंदर के साथ एक खूबसूरत रिश्ता बनाती है। हालांकि, चंदर के दिल के किसी कोने में सुधा की यादें अब भी बाकी हैं। यह कहानी किसी एक को सही या गलत ठहराने के बजाय प्यार, महत्वाकांक्षा और गलत समय के ताने-बाने को बहुत ही खूबसूरती से पेश करती है।</div><div><br></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: परफॉर्मेंस</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' की आत्मा क्या है, यह किसी एक चीज़ के बारे में कहना मुश्किल है। चाहे परफॉर्मेंस हो, कहानी हो या सेटिंग, सब कुछ मिलकर एक ऐसा फ़्लेवर बनाते हैं जो बिल्कुल अनोखा है। चंदर के रोल में विक्रांत मैसी ने ऐसे आदमी का किरदार निभाया है जैसा हर औरत चाहती है। वे मिलनसार, सब्र रखने वाले और इमोशनली साथ देने वाले इंसान हैं; वे एक 'सेफ़ स्पेस' (सुरक्षित जगह) की मिसाल हैं। कई बार विक्रांत और चंदर के बीच फ़र्क करना मुश्किल हो जाता है क्योंकि यह किरदार उन पर बहुत स्वाभाविक लगता है। वे अपनी एक्टिंग को बहुत आसान और सहज बना देते हैं। आप यह सोचना छोड़ देते हैं कि वे एक्टिंग कर रहे हैं या नहीं, क्योंकि वे पूरी तरह से उस किरदार में ढल जाते हैं।</div><div><br></div><div>सुधा के रोल में वेदिका पिंटो भी उतनी ही प्रभावशाली हैं। वे एक जोश से भरी युवा महिला के रोल में आसानी से ढल जाती हैं, जो प्यार और अपने सपनों के करियर के बीच फंसी हुई है। उनकी परफॉर्मेंस स्वाभाविक लगती है और विक्रांत के साथ उनकी केमिस्ट्री फ़िल्म की सबसे बड़ी खूबियों में से एक है। दोनों के बीच का हर पल सच्चा और असल लगता है।</div><div><br></div><div>महिमा मकवाना का 'प्रीति' वाला किरदार शायद फ़िल्म का एक सुखद सरप्राइज़ है। वह कॉन्फिडेंट है, इमोशनली मज़बूत है और उसे पता है कि उसे ज़िंदगी से क्या चाहिए। वह सफलतापूर्वक एक बिज़नेस चलाती है, राइटर बनने का सपना भी पूरा करती है और रिश्ते (या अपने बिज़नेस) में खुद को खोए बिना प्यार के लिए भी जगह बनाती है।</div><div><br></div><div>खासकर एक सीन बहुत यादगार है, जिसमें वह मानती है कि चंदर और सुधा का रिश्ता बहुत गहरा था और वह उसकी ज़िंदगी के उस हिस्से में दखल न देने का फैसला करती है। अतीत से मुकाबला करने के बजाय, वह अपनी बनाई ज़िंदगी और रिश्ते में सुकून पाती है। ठीक उसी पल प्रीति आपका दिल जीत लेती है।</div><div><br></div><div>कास्ट के अलावा, कैफ़े और पहाड़ भी बराबर क्रेडिट के हकदार हैं। वे लगभग खामोश किरदारों की तरह हैं, जो बिना कुछ कहे माहौल बनाते हैं। चाहे भोपाल की जानी-पहचानी गलियां हों या पहाड़ों के बीच बसा आरामदायक कैफ़े, हर लोकेशन कहानी में गर्माहट और एक अलग पहचान जोड़ती है। एक्टिंग, सेटिंग और राइटिंग मिलकर कुछ सुकून देने वाला अनुभव बनाते हैं, जैसे एक बेहतरीन कप कॉफ़ी।</div><div><br></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: म्यूज़िक और डायलॉग्स</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' डायलॉग्स के बजाय राइटिंग और स्क्रीनप्ले पर ज़्यादा निर्भर करती है। यह बातचीत का एक सिलसिला है - ऐसी बातचीत जो लंबे समय तक याद रहती है और आपको सोचने पर मजबूर करती है।</div><div><br></div><div>हालांकि, 'मुसाफिर कैफ़े' में म्यूज़िक अहम भूमिका निभाता है। यह बहुत ही सुकून देने वाला है और सही पलों पर इस्तेमाल किया गया है। 'तेरा हुआ साहिबा', 'काफ़ी है ना', 'दरमियां', 'रोज़ाना', 'टूटा रहूंगा' और 'रोज़ाना रिप्राइज़' जैसे गाने कहानी को आगे बढ़ाने और खास पलों को और बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b> मुसाफिर कैफे: निर्देशन</b></div><div>रुचिर अरुण द्वारा निर्देशित, 8 एपिसोड की यह श्रृंखला लगभग पूरी तरह से तैयार केक की तरह लगती है। सरल कहानी को अनावश्यक रूप से जटिल नहीं बनाया गया है, और यही बात फिल्म की सफलता का कारण है। वे नाटकीय मोड़ों पर निर्भर रहने के बजाय संवादों और मौन को भावनाओं को व्यक्त करने का अवसर देते हैं।</div><div><br></div><div>कभी-कभी गति धीमी लग सकती है, लेकिन यह जीवन के एक पहलू को दर्शाती है और ध्यान भटकाने के बजाय उसे और निखारती है। तीनों मुख्य पात्रों के प्रति सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार के लिए अरुण प्रशंसा के पात्र हैं। किसी को भी नायक या खलनायक के रूप में चित्रित नहीं किया गया है। यह श्रृंखला इस बारे में नहीं है कि किसे सबसे अधिक स्क्रीन टाइम मिलता है। इसके बजाय, वे उन्हें त्रुटिपूर्ण लेकिन फिर भी प्रासंगिक लोगों के रूप में प्रस्तुत करते हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>अगर ज़िंदगी आपसे थोड़ा रुककर ऐसा शो देखने के लिए कह रही है जो आपकी आत्मा को सुकून दे, तो 'मुसाफिर कैफ़े' बिल्कुल वैसा ही शो है। इसमें कोई सस्पेंस या अगले एपिसोड में किसी धमाकेदार कहानी का वादा नहीं है। फिर भी, आप तीनों मुख्य किरदारों की कहानी में दिलचस्पी लेंगे क्योंकि आप उन तीनों में कहीं न कहीं खुद की झलक पाएंगे। इसमें पहाड़ हैं; बढ़िया कॉफ़ी और अच्छी चाय का ज़िक्र है, किताबें हैं और प्यार भी है - तो भला क्या पसंद नहीं आएगा!</div><div><br></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' की कुछ कमियों में से एक यह हो सकती है कि यह कहानी बहुत ज़्यादा सुरक्षित रास्ते पर चलती है। जब कहानी में इमोशनल उलझनें आती भी हैं, तो वे शायद ही कभी ऐसे पलों में बदलती हैं जो शो खत्म होने के बाद भी आपके ज़हन में बने रहें। उलझनों को उसी नरमी से सुलझाया जाता है जो इस फ़िल्म की पहचान है; यह इसके मूड के हिसाब से तो ठीक है, लेकिन इससे उनका असर भी कम हो जाता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>मुसाफिर कैफ़े: आखिरी राय</b></div><div>'मुसाफिर कैफ़े' देखना शनिवार की धीमी दोपहर या रविवार की शांत सुबह जैसा लगता है - ऐसा सुकून भरा पल जिसकी चाहत हमें भागदौड़ भरे हफ़्ते के बाद होती है। अगर आप कोई सुकून देने वाली, दिल को छू लेने वाली कहानी देखना चाहते हैं, तो इसे अपनी वॉचलिस्ट में ज़रूर शामिल करें। वैसे भी, 'मुसाफिर कैफ़े' आपका समय देने लायक है। सिर्फ़ इसलिए नहीं कि इसमें बेहतरीन कलाकार और दिल को छू लेने वाली कहानी है, बल्कि इसलिए भी क्योंकि यह आपको धीरे चलने, सोच-समझकर ब्रेक लेने और ज़िंदगी में कुछ छूट जाने की चिंता न करने की याद दिलाता है।</div><div>&nbsp;</div><div>रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 03 Aug 2026 12:58:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/musafir-cafe-review-a-sense-of-pause-and-tranquility-amidst-a-hectic-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[OTT Release This Week | The Devil Wears Prada 2 से लेकर Musafir Cafe तक, इस हफ़्ते ओटीटी पर लगेगा मनोरंजन का तड़का]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-to-musafir-cafe-get-ready-for-dose-of-entertainment-on-ott-this-week]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिनेमाघरों में जहाँ इन दिनों 'जना नायकन' और 'द ओडिसी' जैसी विभिन्न शैलियों की फ़िल्में दर्शकों का मनोरंजन कर रही हैं, वहीं ओटीटी (OTT) प्लेटफ़ॉर्म्स भी इस हफ़्ते नए और रोमांचक कंटेंट के साथ तैयार हैं। बड़े पर्दे के अलावा डिजिटल स्पेस में इस हफ़्ते हॉलीवुड के बहुप्रतीक्षित सीक्वल से लेकर ऐतिहासिक डॉक्युड्रामा और दिलचस्प भारतीय शो रिलीज़ हो रहे हैं। यदि आप भी इस वीकेंड घर बैठे बिंज-वॉच (Bingo Watch) का प्लान बना रहे हैं, तो आइए जानते हैं इस हफ़्ते ओटीटी पर आने वाली बड़ी रिलीज़ और हाल ही में स्ट्रीम हुए शो के बारे में।</div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/christopher-nolan-latest-blockbuster-the-odyssey-crosses-the-100-crore-mark-in-india" target="_blank">Christopher Nolan का नया धमाका! The Odyssey ने भारत में पार किया ₹100 करोड़ का आंकड़ा, तोड़े कई बड़े रिकॉर्ड्स</a></h3><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">आने वाले हफ़्ते में अलग-अलग तरह की कई रोमांचक फ़िल्में और शो रिलीज़ होने वाले हैं, जिनमें हॉलीवुड की बहुप्रतीक्षित सीक्वल 'द डेविल वेयर्स प्राडा 2' और डॉक्युड्रामा 'द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103' शामिल हैं। आइए जानते हैं उन शो के बारे में जिन्हें आप इस हफ़्ते ऑनलाइन देख सकते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>1. द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103</b></div><div>डॉक्युड्रामा सीरीज़ 'द बॉम्बिंग ऑफ़ पैन एम 103' 1988 में हुए लॉकरबी बम धमाके की घटनाओं पर आधारित है। इसे जोनाथन ली और एडम मोने-ग्रिफ़िथ्स ने बनाया है। यह ऐतिहासिक एक्शन ड्रामा सीरीज़ 30 जुलाई, 2026 को नेटफ़्लिक्स पर रिलीज़ होगी। शो की मुख्य कास्ट में कॉनर स्विंडेल्स, पैट्रिक जे एडम्स और लॉरेन लाइल शामिल हैं।</div><div><br></div><div>रिलीज़ की तारीख - 30 जुलाई</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/kaun-banega-crorepati-18-returns-with-amitabh-bachchan" target="_blank">Kaun Banega Crorepati 18: अमिताभ बच्चन के साथ लौटेगा ज्ञान का महामंच, 1 अगस्त से शुरू होगी शूटिंग</a></h3><div><br></div><div><b>2. द डेविल वेयर्स प्राडा 2</b></div><div>मेरिल स्ट्रीप, ऐनी हैथवे और एमिली ब्लंट की फ़िल्म 'द डेविल वेयर्स प्राडा 2' 29 जुलाई, 2026 को भारत में JioHotstar पर OTT पर रिलीज़ होने जा रही है। यह फ़िल्म अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों भाषाओं में स्ट्रीमिंग के लिए उपलब्ध होगी।</div><div>रिलीज़ की तारीख - 29 जुलाई</div><div>&nbsp;</div><div>फ़िल्म की OTT रिलीज़ की तारीख और ट्रेलर शेयर करते हुए JioHotstar ने लिखा, "तैयार हो जाइए, क्योंकि 'द रनवे' घर आ रही है #TheDevilWearsPrada2 29 जुलाई को JioHotstar पर स्ट्रीम होगी।"</div><div><br></div><div><b>OTT पर हाल ही में रिलीज़ हुई सीरीज़</b></div><div>नई रिलीज़ के अलावा, विक्रांत मैसी और वेदिका पिंटो की 'मुसाफ़िर कैफ़े' और के के मेनन की 'आदर्श बाल विद्यालय' जैसी सीरीज़ भी OTT प्लेटफ़ॉर्म पर आई हैं और दर्शकों का ध्यान खींच रही हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b> 1. मुसाफिर कैफे</b></div><div>विक्रांत मैसी, वेदिका पिंटो और महिमा मकवाना की 'मुसाफिर कैफे' भी नेटफ्लिक्स पर आ गई है, जो इस हफ़्ते की OTT लाइनअप में शामिल हो गई है। यह दिव्या प्रकाश दुबे के इसी नाम के नॉवेल पर आधारित है; यह रोमांटिक ड्रामा चंदर (विक्रांत मैसी), सुधा (वेदिका पिंटो) और प्रीति (महिमा मकवाना) की ज़िंदगी के इर्द-गिर्द घूमता है, जब एक इमोशनल सफ़र में उनके रास्ते आपस में मिलते हैं।</div><div>OTT प्लेटफ़ॉर्म - नेटफ्लिक्स</div><div><br></div><div><b>2. आदर्श बाल विद्यालय</b></div><div>हिमांक गौर की डायरेक्ट की हुई कॉमेडी-ड्रामा सीरीज़ 'आदर्श बाल विद्यालय' अब OTT प्लेटफ़ॉर्म प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही है। सात एपिसोड वाली इस सीरीज़ में कई कलाकार हैं, जिनमें के के मेनन, अर्चना पूरन सिंह, नवीन कस्तूरिया, प्रसन्ना बिष्ट, देवेन भोजानी, अजितेश गुप्ता, अन्नपूर्णा सोनी, प्राची शाह और अभिमन्यु सिंह शामिल हैं।</div><div><br></div><div>OTT प्लेटफ़ॉर्म - प्राइम वीडियो</div><div>&nbsp;</div><div>'आदर्श बाल विद्यालय' को दर्शकों और क्रिटिक्स से मिले-जुले रिव्यू मिले हैं; कुछ लोगों ने कलाकारों की एक्टिंग की तारीफ़ की है, जबकि कुछ दर्शकों को यह सीरीज़ धीमी, उपदेश देने वाली और पहले से अंदाज़ा लगाई जा सकने वाली (predictable) लगी।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 09:20:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-to-musafir-cafe-get-ready-for-dose-of-entertainment-on-ott-this-week</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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