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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Gram Chikitsalay Season 2 Review: शोर-शराबे के बीच भटखंडी लौटना सुकून देने वाला अनुभव, अमोल पाराशर और विनय पाठक ने फिर जीता दिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/gram-chikitsalay-season-2-review-returning-to-bhatkhandi-amidst-chaos-is-soothing-experience]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आजकल जब ओटीटी प्लेटफॉर्म्स मर्डर मिस्ट्री, गैंगस्टर्स की जंग और दुनिया खत्म होने जैसी डार्क व हिंसक कहानियों से भरे पड़े हैं, ऐसे में भटखंडी गाँव की सादगी भरी दुनिया में लौटना एक बेहद सुकून देने वाला अनुभव है। द वायरल फीवर (TVF) की बहुप्रतीक्षित वेब सीरीज़ 'ग्राम चिकित्सालय सीज़न 2' रिलीज हो चुकी है। यह शो किसी सनसनीखेज शॉक वैल्यू के पीछे भागने के बजाय रोज़मर्रा की आम ज़िंदगी में ही बेहतरीन ड्रामा और भावनाओं को ढूंढ निकालता है। यह सीज़न लोगों, उनकी जमीनी समस्याओं और उन छोटी-छोटी जीतों के बारे में है, जो असल जिंदगी में मायने रखती हैं।</div><div><b>&nbsp;</b></div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/censor-board-18-cuts-in-welcome-to-the-jungle-including-bikini-scenes-of-disha-jacqueline" target="_blank">Welcome To The Jungle को सेंसर बोर्ड से मिला झटका, दिशा और जैकलीन के बिकिनी सीन्स समेत 18 जगह चली कैंची</a></h3><div><b><br></b></div><div><b>क्या है सीज़न 2 की कहानी?</b></div><div>सीज़न 2 में हम डॉ. प्रभात सिन्हा (अमोल पाराशर) को भटखंडी गाँव की ज़िंदगी में पहले के मुकाबले बेहतर ढंग से ढलने की कोशिश करते हुए देखते हैं। अब वह इस जगह के लिए पूरी तरह अजनबी तो नहीं रहे, लेकिन गाँव वालों का अटूट भरोसा जीतना अभी भी उनके लिए एक लंबी और चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया है।</div><div><br></div><div>प्रभात की सबसे बड़ी चुनौती वही है जो हमेशा से रही है—गाँव के लोगों को यह समझाना कि अंधविश्वास, रूढ़िवादिता और स्थानीय नीम-हकीम (झोलाछाप डॉक्टर) के बजाय सही वैज्ञानिक इलाज चुनना क्यों बेहतर है। गौरतलब है कि वह स्थानीय नीम-हकीम गाँव वालों के बीच डॉ. प्रभात से कहीं ज़्यादा लोकप्रिय है।</div><div><br></div><div>नया सीज़न प्रभात की उन कोशिशों के इर्द-गिर्द घूमता है जिनसे वह प्राइमरी हेल्थ सेंटर (PHC) की सूरत बदलना चाहते हैं ताकि ग्रामीण उस पर सच में भरोसा कर सकें। लेकिन जैसा कि अक्सर होता है, राहें आसान नहीं हैं। दवाओं की भारी कमी, सरकारी अड़चनें, सिस्टम का भ्रष्टाचार और लोगों की गहरी जड़ें जमा चुकी पुरानी मान्यताएँ हर मोड़ पर उनके रास्ते में दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/filmreview/cocktail-2-movie-review-glitzy-but-the-screenplay-is-flawed-this-love-triangle-falls-flat" target="_blank">Cocktail 2 Movie Review: चकाचौंध से भरपूर, लेकिन पटकथा में झोल! फीका रह गया इस त्रिकोणीय प्रेम कहानी का स्वाद</a></h3><div><br></div><div><b>लेखन और निर्देशन: बनावटीपन से दूर, सच्चाई के करीब</b></div><div>इस सीरीज़ की सबसे बड़ी ताकत इसका लाजवाब लेखन और निर्देशन है। कहानी में स्वास्थ्य सेवा, रिश्वतखोरी और पुराने रीति-रिवाजों जैसे गंभीर मुद्दों को इतनी सहजता से पिरोया गया है कि ऐसा कभी नहीं लगता कि लेखक जबरन कोई सामाजिक संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं। सब कुछ किरदारों की परिस्थितियों से स्वाभाविक रूप से निकलकर आता है।</div><div><br></div><div><b>हमदर्दी भरा नज़रिया:</b></div><div>डायरेक्टर ललिताम आनंद ने ग्रामीण भारत को न तो कोई काल्पनिक फैंटेसी बनाया है और न ही कोई भयानक ट्रेजेडी। उन्होंने भटखंडी को एक असली जगह के रूप में पेश किया है। सीरीज़ का नजरिया हर किरदार के प्रति बेहद हमदर्दी भरा है। जो ग्रामीण इलाज कराने से कतराते हैं, उनका मज़ाक नहीं उड़ाया जाता और न ही भ्रष्ट सरकारी अधिकारियों को किसी कार्टून जैसे विलेन के रूप में दिखाया गया है। जब कोई किरदार गलत फैसला भी लेता है, तो कहानी उसके पीछे की सोच को समझने का पूरा समय लेती है।</div><div><br></div><div><b>कॉमेडी और कड़वी सच्चाई का मेल:</b> </div><div>यह शो आम पलों में भी कमाल का हास्य ढूंढ लेता है। सबसे मज़ेदार सीन तब देखने को मिलते हैं जब डॉ. प्रभात का शहरी और आदर्शवादी नज़रिया गाँव की ज़िंदगी की कठोर और व्यावहारिक सच्चाई से टकराता है।</div><div><br></div><div><b>एक्टिंग: कलाकारों ने फूंक दी किरदारों में जान</b></div><div>'ग्राम चिकित्सालय' की सबसे बड़ी खूबियों में से एक इसकी बेहतरीन स्टारकास्ट है:</div><div><br></div><div><b>अमोल पाराशर (डॉ. प्रभात सिन्हा): </b>अमोल ने एक बार फिर डॉ. प्रभात के किरदार में गजब का अपनापन और ईमानदारी दिखाई है। उन्होंने इस रोल को एक 'परफेक्ट हीरो' बनाने के बजाय एक ऐसे इंसान के रूप में पेश किया है जिसमें झुंझलाहट, खुद पर शक और कमज़ोरियाँ भी हैं। यही वजह है कि दर्शक खुद को उनसे जुड़ा हुआ पाते हैं।</div><div><br></div><div><b>विनय पाठक (डॉ. चेतक कुमार): </b>डॉ. चेतक कुमार के रोल में विनय पाठक ने हमेशा की तरह शानदार काम किया है। वह आकर्षक भी हैं, चिढ़ाने वाले भी, और अक्सर एक ही सीन में ये सारे रंग दिखा देते हैं। पाठक यह बखूबी पक्का करते हैं कि उनका किरदार कभी भी सिर्फ एक सपाट विलेन बनकर न रह जाए, जिससे उनके और प्रभात के बीच का टकराव बेहद दिलचस्प हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>आकांक्षा रंजन और अन्य कलाकार: </b>आकांक्षा रंजन को इस सीज़न में अपनी प्रतिभा दिखाने के ज़्यादा मौके मिले हैं और उन्होंने पराशर के साथ एक बहुत ही सहज केमिस्ट्री साझा की है। आनंदेश्वर द्विवेदी अपनी बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से एक बार फिर महफिल लूट ले जाते हैं, वहीं आकाश मखीजा ने 'गोविंद' के एंगल में बेहतरीन इमोशनल गहराई जोड़ी है।</div><div><br></div><div><b>तकनीकी पहलू: सादगी ही इसकी सुंदरता है</b></div><div>यह कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जो अपनी तकनीकी तामझाम से आपका ध्यान भटकाए, बल्कि इसकी सादगी ही इसकी यूएसपी (USP) है। सिनेमैटोग्राफ़ी गाँव को बिना वजह चमकाए या सुंदर दिखाए, उसे उसके वास्तविक और कच्चे रूप में पेश करती है। बैकग्राउंड म्यूज़िक भी काफी हल्का और शांत रखा गया है, जो दृश्यों पर हावी हुए बिना कहानी को आगे बढ़ाता है। गाँव की रोज़मर्रा की प्राकृतिक आवाज़ें माहौल को जीवंत बनाती हैं।</div><div><br></div><div><b>कुछ कमियां जो खटकती हैं</b></div><div>अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, सीज़न 2 में कुछ कमियां भी हैं जो इसे 'मास्टरपीस' बनने से रोकती हैं:</div><div><br></div><div><b>धीमी रफ़्तार (पेसिंग):</b> इस सीज़न की सबसे बड़ी समस्या इसकी रफ़्तार है। कुछ सब-प्लॉट्स को बेवजह लंबा खींचा गया है, जिससे कहानी कई जगह थमी हुई सी लगती है और दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है।</div><div><br></div><div><b>अनुमानित कहानी: </b>कई जगहों पर यह सीज़न उन्हीं घिसे-पिटे तरीकों और ग्रामीण पंचलाइनों पर निर्भर करता है जो हम पहले भी TVF के दूसरे शोज़ में देख चुके हैं। आदर्शवाद बनाम नौकरशाही की यह लड़ाई कुछ जगहों पर काफी प्रेडिक्टेबल (जिसका अंदाजा पहले से लगाया जा सके) हो जाती है।</div><div><br></div><div><b>कमजोर चरित्र विकास:</b> कुछ नए और दिलचस्प सहायक किरदारों को पेश तो किया गया, लेकिन उन्हें ठीक से विकसित नहीं किया गया, जिससे कुछ भावुक पल उतना गहरा असर नहीं छोड़ पाते जितनी उनसे उम्मीद थी।</div><div><b><br></b></div><div><b>निष्कर्ष: देखें या न देखें?</b></div><div>'ग्राम चिकित्सालय सीज़न 2' ने भले ही खुद को पूरी तरह से नया रूप न दिया हो, लेकिन इसकी ताकत इसकी ईमानदारी और सादगी में है। हर एपिसोड शायद उतना परफेक्ट न हो, लेकिन इसके किरदारों का असलीपन आपको स्क्रीन से बांधे रखता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">आज के इस दौर में जहाँ ओटीटी कंटेंट में दिखावे और सनसनी पर ज़्यादा ज़ोर दिया जाता है, वहाँ यह सीरीज़ छोटे, निजी और ज़मीन से जुड़े रहकर सफल होती है। यह भले ही TVF की सबसे बेहतरीन सीरीज़ न हो, लेकिन निस्संदेह यह उनकी सबसे ईमानदार और दिल छू लेने वाली कहानियों में से एक है। इसे अपने परिवार के साथ ज़रूर देखा जा सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>हमारी रेटिंग: 3.5/5 स्टार</b></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:16:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/gram-chikitsalay-season-2-review-returning-to-bhatkhandi-amidst-chaos-is-soothing-experience</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Cocktail 2 Movie Review: चकाचौंध से भरपूर, लेकिन पटकथा में झोल! फीका रह गया इस त्रिकोणीय प्रेम कहानी का स्वाद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/cocktail-2-movie-review-glitzy-but-the-screenplay-is-flawed-this-love-triangle-falls-flat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वर्ष 2012 में जब निर्देशक होमी अदजानिया ने सैफ अली खान, दीपिका पादुकोण और डायना पेंटी के साथ 'कॉकटेल' पेश की थी, तो वह आधुनिक सिनेमा के लिए एक ताज़ा ड्रिंक की तरह थी। भले ही त्रिकोणीय प्रेम कहानी (Love Triangle) बॉलीवुड के लिए घिसा-पिटा विषय था, लेकिन उस फिल्म में महानगरीय आधुनिकता, जज्बातों का बिखराव और सबसे बढ़कर 'वेरोनिका' के रूप में दीपिका का एक ऐसा यादगार किरदार था, जिसने कहानी में जान फूंक दी थी।</div><div><br></div><div>अब पूरे चौदह साल बाद, इसी फ्रेंचाइजी का अगला दौर यानी 'कॉकटेल 2' सिनेमाघरों में आ चुका है। इस बार स्क्रीन पर कृति सेनन, शाहिद कपूर और रश्मिका मंदाना की तिकड़ी है। तड़क-भड़क वाले इस नए ग्लास में परोसी गई यह कहानी क्या दर्शकों को थिएटर्स में बांधने में कामयाब होती है या यह सिर्फ एक बेस्वाद मिश्रण बनकर रह गई है? आइए विस्तार से विश्लेषण करते हैं।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'कॉकटेल 2' की कहानी?</b></div><div>फिल्म का ताना-बाना कुणाल (शाहिद कपूर) और दिया (रश्मिका मंदाना) के इर्द-गिर्द बुना गया है, जो पिछले 16 वर्षों से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में हैं। अपने इस लंबे रिश्ते के बीच वे इटली के सिसिली में छुट्टियां बिताने का फैसला करते हैं। यहाँ उनकी मुलाकात दिया की पुरानी सहेली एली (कृति सेनन) से होती है, जिससे वे पिछले एक दशक से नहीं मिले हैं।</div><div><br></div><div>कहानी में अजीब मोड़ तब आता है जब दिया को अचानक अपने इतने पुराने रिश्ते पर संदेह होने लगता है। वह अपने पार्टनर के प्रति असुरक्षा की भावना के कारण अपनी हॉट और आकर्षक सहेली एली को अपने ही बॉयफ्रेंड को रिझाने (Seduce) का एक अजीबोगरीब काम सौंप देती है।</div><div><br></div><div>ट्विस्ट: एली शुरुआत में दिया को समझाने का प्रयास करती है, लेकिन दिया के अड़ियल और अजीब बर्ताव के कारण कुणाल धीरे-धीरे उससे दूर और एली के करीब आने लगता है।</div><div><br></div><div>टकराव: जैसा कि दर्शकों को पहले से अंदाजा होता है, एली सचमुच कुणाल के प्यार में गिरफ्तार हो जाती है। इसके बाद सहेलियों का आपसी रिश्ता ताश के पत्तों की तरह बिखरने लगता है और कुणाल दोनों के बीच एक 'ट्रॉफी' की तरह बनकर रह जाता है। पूरी फिल्म "सिस्टर्स बिफोर मिस्टर्स" के सिद्धांत को तार-तार करती हुई आगे बढ़ती है।</div><div><br></div><div><b>कलाकारों का अभिनय और किरदार (Performances)</b></div><div>&nbsp;</div><div><b>कृति सेनन (एली)</b></div><div>पूरी फिल्म में कृति सेनन को बेहद ग्लैमरस और स्टाइलिश अंदाज में पेश किया गया है। उनके लुक्स, परिधान और हेयरस्टाइल पर स्टाइलिस्ट ने बहुत मेहनत की है, जो स्क्रीन पर साफ दिखती है। हालांकि, 'एली' का किरदार कृति के कंधों पर सबसे भारी होने के बावजूद पटकथा की कमजोरी के कारण गहरा प्रभाव छोड़ने में नाकाम रहता है। वे केवल एक 'गोल्डन गर्ल' के रूप में चमकती हुई दिखती हैं, जिसके पीछे की भावनाएं अधूरी लगती हैं।</div><div><br></div><div><b>शाहिद कपूर (कुणाल)</b></div><div>एक बेहतरीन अभिनेता होने के बावजूद शाहिद कपूर के पास इस फिल्म में करने के लिए बहुत सीमित गुंजाइश थी। उनका चरित्र दोनों अभिनेत्रियों के बीच केवल एक पुरस्कार की तरह इस्तेमाल हुआ है। फिल्म का नैरेटिव दर्शकों को उनके चरित्र की गहराई को समझने का अवसर ही नहीं देता। हालांकि, क्लाइमेक्स के अंतिम 15 मिनटों में शाहिद को अपनी अभिनय क्षमता दिखाने का थोड़ा मौका मिलता है, जहाँ वे प्रभावित करते हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>रश्मिका मंदाना (दिया)</b></div><div>रश्मिका मंदाना का इस फिल्म में पूरी तरह से दुरुपयोग हुआ है। उनका स्क्रीन प्रेजेंस, संवाद अदायगी और पहनावा काफी फीका नजर आता है। उनका किरदार एक ऐसी इनसिक्योर प्रेमिका का है जो अपने बॉयफ्रेंड पर भरोसा करने के बजाय अपनी सहेली की चालों में उलझ जाती है। चरित्र लेखन की इस कमजोरी के कारण दर्शक उनसे जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।</div><div><br></div><div><b>संगीत, निर्देशन और संवाद</b></div><div>इस फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष इसका संगीत (Soundtrack) है। फिल्म के गाने जैसे 'माशूका', 'वल्लाह' और 'तुझको' बेहतरीन बन पड़े हैं और बैकग्राउंड में दर्शकों को बांधकर रखते हैं।</div><div><br></div><div>राहत की बात: मेकर्स ने इस बार 'तुम ही हो बंधु 2.0' को एक लाउड रीमिक्स बनाने की गलती नहीं की। इस क्लासिक गाने को बिना किसी फालतू छेड़छाड़ के बहुत कम समय के लिए इस्तेमाल किया गया है, जो कानों को सुकून देता है।</div><div><br></div><div>निर्देशन की बात करें तो होमी अदजानिया का दृष्टिकोण हमेशा की तरह आधुनिक और पश्चिमी संभ्रांत वर्ग (First-world problems) को दिखाने वाला है। लेकिन इस बार किरदारों की बुनावट बेहद कच्ची रह गई है। संवादों को बेहद सरल और आज के दौर का रखने की कोशिश की गई है। उदाहरण के लिए यह संवाद ध्यान खींचता है: "प्यार फटी हुई टी-शर्ट की तरह होता है जिसमें हम आराम से सोते हैं।"</div><div>&nbsp;</div><div><b>कॉकटेल 2: क्या अच्छा है और क्या नहीं</b></div><div>'कॉकटेल 2' आपको कुछ समय के लिए यकीन दिलाएगी कि दुनिया बहुत खूबसूरत है और आपको बस अपने सेविंग्स अकाउंट से पैसे निकालने हैं, सपनों की छुट्टियों पर जाना है और वहाँ जो हुआ उसे भूल जाना है। लेकिन ज़्यादा आराम से न बैठें - यह फ़िल्म जल्द ही आपको असलियत में वापस ले आती है, वही असलियत जिससे हममें से ज़्यादातर लोग भागने की कोशिश कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>साथ ही, अगर आप कृति सेनन के फ़ैन हैं, तो आपको उन्हें स्क्रीन पर देखकर मज़ा आएगा - और शायद उनके स्टाइलिस्ट का काम देखकर और भी ज़्यादा मज़ा आएगा। कुछ पल ऐसे हैं जो सच में यादगार हैं, जैसे जब एली एक अजनबी को गले लगाती है और बदले में उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। यह एक ही समय में दिल को छू लेने वाला और थोड़ा फीका भी लगता है। क्यों? क्योंकि अगर यह वेरोनिका होती, तो हम समझ पाते कि वे भावनाएँ कहाँ से आ रही थीं। ग्लैमर और दिखावे के पीछे एक बुरी तरह टूटी हुई औरत थी, जो अपने माता-पिता के साथ रिश्ते की वजह से गहरे ज़ख्म लिए हुए थी। उसके पीछे एक कहानी थी।</div><div><br></div><div>लेकिन एली के मामले में, हम बस अंदाज़ा ही लगाते रह जाते हैं। वह क्यों रोई? उसके मन में क्या चल रहा है? फ़िल्म हमें यह बताने की कोशिश भी नहीं करती। यह फ़िल्म अपने मुख्य तीन किरदारों और उनकी बहुत ही असल, 'फ़र्स्ट-वर्ल्ड' समस्याओं पर इतनी ज़्यादा ध्यान देती है कि जिन लोगों के लिए हमें महसूस करना चाहिए, उन्हें ठीक से दिखा ही नहीं पाती।</div><div><br></div><div>स्क्रीनप्ले चाहता है कि सब कुछ बहुत अच्छा और शानदार दिखे, लेकिन किसी मोड़ पर यह सब बहुत ज़्यादा लगने लगता है। हर फ़्रेम में तेवर, दिल टूटने का दर्द, रोमांस, तड़प और जुनून भरा होता है, और ये सब एक साथ ध्यान खींचने की कोशिश करते हैं। और जैसा कि कहा जाता है, किसी भी चीज़ की अति अच्छी नहीं होती।</div><div><br></div><div><b>कॉकटेल 2: फ़ाइनल फ़ैसला</b></div><div>कुछ कॉकटेल समय के साथ बेहतर होती जाती हैं। कुछ का मज़ा बस एक बार ही लिया जा सकता है। 'कॉकटेल 2' पूरी कोशिश करती है कि अपनी पिछली फ़िल्म जैसा जादू फिर से पैदा करे, लेकिन डिज़ाइनर कपड़े, शानदार छुट्टियां, इमोशनल उतार-चढ़ाव और वही पुराने रिश्तों वाले ड्रामे के बीच, यह भूल जाती है कि असल फ़िल्म में क्या बात थी जिसने उसे इतना मज़ेदार बनाया था। यह देखने में महंगी और सुनने में बढ़िया लगती है और इसमें इतना ग्लैमर है कि आपका इंस्टाग्राम फ़ीड भर जाए, लेकिन जब इसका नशा उतरता है, तो आप सोचते रह जाते हैं कि आपने असल में क्या देखा।</div><div><br></div><div>यह एक ऐसी कॉकटेल है जो आसानी से गले से तो उतर जाती है, लेकिन इसका स्वाद ऐसा होता है जिसे आप जल्दी ही भूल जाते हैं। न तो यह पूरी तरह से बेकार है और न ही बहुत शानदार - बस एक ऐसी ड्रिंक जिसमें सजावट कम और थोड़ी और 'जान' (soul) होती, तो बेहतर होता।</div><div><b><br></b></div><div><b>'कॉकटेल 2' के लिए 5 में से 2.5 स्टार।</b></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 16:11:47 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Deewana Movie Review | जानी-पहचानी शुरुआत पर इंटरवल का वो चौंकाने वाला ट्विस्ट, जो फिल्म को बनाता है खास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/deewana-movie-review-familiar-beginning-followed-by-that-shocking-interval-twist]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'कल्कि' और 'शुभम' जैसी फिल्मों से दर्शकों और समीक्षकों के बीच अपनी खास पहचान बनाने वाले अभिनेता हर्षित रेड्डी ने एक बार फिर बड़े पर्दे पर वापसी की है। उनकी नई फिल्म 'दीवाना' (Deewana) आज, 20 जून 2026 को सिनेमाघरों में रिलीज़ हो गई है। श्रीकांत संगीशेट्टी द्वारा लिखित और निर्देशित यह फिल्म एक यूथफुल रोमांटिक एंटरटेनर है। प्रतिष्ठित डिस्ट्रीब्यूशन हाउस 'गीता आर्ट्स' द्वारा वितरित इस फिल्म को लेकर दर्शकों में इस कदर क्रेज था कि रिलीज़ से पहले ही इसके कई पेड प्रीमियर शो आयोजित किए गए थे। आइए जानते हैं कि एक प्यारी सी दिखने वाली यह यूथ लव स्टोरी बॉक्स ऑफिस और दर्शकों की उम्मीदों पर कितनी खरी उतरती है।</div><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>कहानी के केंद्र में है मुन्ना (हर्षित रेड्डी), जो एक आम बेफिक्र युवा है। वह अपनी जिम्मेदारियों से कोसों दूर अपने दोस्तों के साथ मौज-मस्ती में समय बिताना पसंद करता है। मुन्ना की इस आसान और सुस्त जिंदगी में तब एक बड़ा मोड़ आता है, जब उसकी मुलाकात अम्मू यानी अमूल्या (स्नेहा मणिमेघलाई) से होती है। अम्मू के आने से मुन्ना की जिंदगी में रोमांस, हंसी-मजाक के पल और कॉलेज के विरोधी ग्रुप के साथ छोटी-मोटी लड़ाइयों का सिलसिला शुरू हो जाता है। मुन्ना के माता-पिता शेखर (नरेश) और माँ (झांसी) भी कहानी में एंट्री लेते हैं, जो मुन्ना के रवैये और फैसलों पर अपने-अपने अनोखे अंदाज में प्रतिक्रिया देते हैं। शुरुआत में यह फिल्म एक आम कैंपस लव स्टोरी की तरह आगे बढ़ती है, लेकिन ठीक इंटरवल पर एक ऐसा अप्रत्याशित और ज़बरदस्त ट्विस्ट आता है, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की होती। यहाँ से फिल्म पूरी तरह बदल जाती है और गहरे जज्बातों व पारिवारिक भावनाओं की ओर मुड़ जाती है।</div><div><br></div><div><b>अभिनय और परफ़ॉर्मेंस: मुख्य जोड़ी ने जीता दिल</b></div><div><b>&nbsp;</b></div><div><b>हर्षित रेड्डी (मुन्ना):</b> हर्षित ने इस किरदार को बेहद आत्मविश्वास के साथ निभाया है। बेफिक्र और आलसी युवा से लेकर एक जिम्मेदार प्रेमी बनने तक का उनका बदलाव उनकी आंखों और बॉडी लैंग्वेज में साफ झलकता है। उन्होंने तेलंगाना स्लैंग (स्थानीय लहजे) को बहुत ही स्वाभाविक तरीके से पकड़ा है, जो युवाओं से सीधा कनेक्ट करता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>स्नेहा मणिमेघलाई (अम्मू):</b> स्नेहा ने इस फिल्म से एक ज़बरदस्त और ताज़गी भरा डेब्यू किया है। वह फनी और इमोशनल, दोनों ही दृश्यों में कमाल का संतुलन रखती हैं। प्री-क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स में उनका अभिनय देखने लायक है, जहाँ उन्होंने बिना किसी लाउड ड्रामे या नकली आँसुओं के उस पल को बेहद ईमानदार और गहरा बना दिया है।</div><div><br></div><div><b>सपोर्टिंग कास्ट</b>: पिता के रोल में अनुभवी अभिनेता नरेश का काम बेहद सधा हुआ है और वे बिना किसी शोर-शराबे के पारिवारिक दृश्यों को भारीपन देते हैं। माँ के रूप में झांसी ने अपनेपन और बेहतरीन कॉमिक व इमोशनल टाइमिंग से प्रभावित किया है। मुन्ना के दोस्त के रूप में विक्रांत ने फिल्म में गजब की एनर्जी भरी है। रोलर रघु और ज़बरदस्त वेणु का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, पर वे अपनी कॉमिक टाइमिंग से छाप छोड़ जाते हैं।</div><div><br></div><div><b>फिल्म के मजबूत पक्ष (Strengths)</b></div><div>'दीवाना' फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसका अप्रत्याशित और चौंकाने वाला इंटरवल ट्विस्ट है। जहां पहला हिस्सा एक बेहद साधारण कॉलेज लव स्टोरी की तरह आगे बढ़ता है, वहीं मध्यांतर पर आने वाला मोड़ पूरी कहानी का रुख बदलकर इसे बेहद गंभीर और इमोशनल ड्रामा में तब्दील कर देता है। फिल्म का दूसरा हाफ मजबूत पारिवारिक भावनाओं और Gen Z (आज के दौर के युवाओं) की जिम्मेदारियों को बखूबी दर्शाता है, जो दर्शकों को गहराई से भावुक करने में सफल रहता है। इसके अलावा, मुख्य जोड़ी के रूप में हर्षित रेड्डी और स्नेहा मणिमेघलाई की ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री कमाल की है। हर्षित ने बेफिक्र युवा से एक जिम्मेदार प्रेमी बनने के बदलाव को अपनी बॉडी लैंग्वेज से शानदार ढंग से दिखाया है, तो वहीं स्नेहा ने अपनी पहली ही फिल्म में बिना किसी लाउड ड्रामे या नकली आंसुओं के प्री-क्लाइमेक्स और क्लाइमेक्स के दृश्यों में बेहद परिपक्व और ईमानदार अभिनय किया है। तकनीकी मोर्चे पर, वामसी पचिपुुलुसु की खूबसूरत सिनेमैटोग्राफी और ईश्वर चंद का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म की भावनाओं को बहुत मजबूती देता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>फिल्म के कमजोर पक्ष (Weaknesses)</b></div><div>फिल्म के कमजोर पक्षों की बात करें, तो इसकी शुरुआत काफी धीमी और घिसी-पिटी लगती है। फिल्म का पहला हाफ बेहद साधारण है, जिसमें कॉलेज के पुराने ढर्रे के लड़ाई-झगड़े, दोस्तों के साथ आवारागर्दी और गलतफहमियां दिखाई गई हैं, जो कई जगह पुरानी फिल्मों की याद दिलाती हैं और नयापन महसूस नहीं होने देतीं। इसके अलावा, कुछ दृश्यों में स्क्रीनप्ले की रफ़्तार इतनी धीमी हो जाती है कि कहानी खिंची हुई लगने लगती है। ऋषिकेश पसपाल की एडिटिंग पहले हाफ में थोड़ी ढीली रही है; अगर मुन्ना और उसके दोस्तों के कुछ आम दृश्यों को छोटा (ट्रिम) कर दिया जाता, तो फिल्म की गति और बेहतर हो सकती थी। साथ ही, सहायक कलाकारों में जीवन कुमार का अभिनय कुछ खास दृश्यों में जरूरत से ज्यादा लाउड और तेज आवाज वाला लगता है, जो फिल्म के बाकी किरदारों के स्वाभाविक लहजे के साथ पूरी तरह मेल नहीं खाता।</div><div><br></div><div><b>सिनेमाई विश्लेषण (Direction &amp; Technical Analysis)</b></div><div>डायरेक्टर श्रीकांत संगीशेट्टी ने जानबूझकर फिल्म के पहले हाफ को हल्का-फुल्का और थोड़ा आम रखा है, ताकि दर्शक किरदारों की दुनिया से अच्छी तरह जुड़ सकें। लेकिन इंटरवल का टर्निंग पॉइंट कहानी को एक नया नज़रिया देता है और इमोशनल दूसरे हाफ की एक मजबूत नींव रखता है। डायरेक्टर ने 'Gen Z' (आज के युवा दर्शकों) की पसंद को ध्यान में रखते हुए कुछ बेहतरीन ट्विस्ट जोड़े हैं, जो लव स्टोरी की मूल आत्मा को खोने नहीं देते।</div><div><br></div><div>तकनीकी मोर्चे पर, वामसी पचिपुुलुसु की सिनेमैटोग्राफी शानदार है। वार्म टोन और साफ-सुथरे फ्रेम्स ने तेलंगाना के बैकड्रॉप को खूबसूरती से दिखाया है। संगीतकार ईश्वर चंद ने युवाओं को पसंद आने वाले गाने दिए हैं और उनका बैकग्राउंड स्कोर (BGM) विशेषकर दूसरे हाफ के इमोशनल दृश्यों को काफी मजबूती देता है। ऋषिकेश पसपाल की एडिटिंग ठीक है, हालांकि पहले हाफ के कुछ दृश्यों को ट्रिम किया जा सकता था।</div><div><br></div><div>'दीवाना' एक जानी-पहचानी प्रेम कहानी होने के बावजूद अपने साहसी ट्विस्ट, शानदार अभिनय और मजबूत पारिवारिक भावनाओं के संतुलन के कारण एक सफल और मुकम्मल फिल्म बनकर उभरती है। यह एक सकारात्मक, 'फील-गुड' सिनेमा है जो दर्शकों को एक उम्मीद भरे नोट पर छोड़कर जाता है।</div><div><br></div><div><b>रेटिंग: 3.5/5 स्टार्स (एक बार जरूर देखने लायक)</b></div><div><b>&nbsp;</b></div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span><b>&nbsp;</b></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:03:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/deewana-movie-review-familiar-beginning-followed-by-that-shocking-interval-twist</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Your Fault London Review | स्पैनिश हिट के ब्रिटिश रीमेक ने किया निराश, न जोश दिखा, न रोमांस का मज़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/your-fault-london-review-british-remake-of-spanish-hit-disappoints-lacking-both-energy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">अमेज़न प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video) की मशहूर स्पैनिश रोमांटिक फ्रैंचाइज़ी 'माई फॉल्ट' के ब्रिटिश रीमेक का अगला भाग 'योर फॉल्ट: लंदन' (Your Fault: London) रिलीज हो चुका है। स्पैनिश लेखिका मर्सिडीज़ रॉन के बेस्टसेलिंग रोमांस नॉवेल ट्रिलॉजी (Trilogy) पर आधारित यह कहानी सौतेले भाई-बहन नोआ और निक के बीच के 'फॉरबिडन लव' (प्रतिबंधित रोमांस) को दर्शाती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">स्पैनिश भाषा में तो इस फ्रैंचाइज़ी की फिल्मों ने जबरदस्त लोकप्रियता बटोरी थी, लेकिन इसका यह नया ब्रिटिश रीमेक दर्शकों और समीक्षकों को रिझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहा है। 17 जून 2026 से प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो रही इस फिल्म में न तो वह पुराना पैशन (जोश) नजर आता है और न ही कोई मनोरंजन।</span></div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bigg-boss-20-a-storm-is-brewing-with-the-old-vs-new-faces-theme" target="_blank">Bigg Boss 20 | 'पुराने बनाम नए चेहरे' की थीम के साथ मचेगा बवाल, Uorfi Javed से लेकर Faisal Shaikh तक ये सितारे आ सकते हैं नज़र</a></h3><div><br></div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी? (The Plot)</b></div><div>फिल्म की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है जहां पिछला भाग खत्म हुआ था। अब नोआ (आशा बैंक्स) और निक (मैथ्यू ब्रूम) पूरी तरह से एक-दूसरे के साथ रिलेशनशिप में आ चुके हैं।</div><div><br></div><div><b>रिश्ते का सस्पेंस:</b> निक इस रिश्ते को अपने माता-पिता से छिपाकर रखना चाहता है, जिनकी हाल ही में शादी हुई है। उसे डर है कि उसके दबंग अरबपति पिता (रे फियरन) को अगर इस सौतेले भाई-बहन के रोमांस का पता चला, तो अंजाम बुरा होगा।</div><div><br></div><div><b>दूरी और नए किरदार: </b>नोआ अनिच्छा से इस बात को मान लेती है और पढ़ाई के लिए ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी चली जाती है। वहां उसकी जिंदगी में माइकल (जोएल नैनकर्विस) नाम का एक समझदार छात्र आता है, जिसे नोआ "सिर्फ दोस्त" बताती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ, निक गैर-कानूनी ड्रैग-रेसिंग छोड़कर अपने पिता के बिजनेस में हाथ बंटा रहा है, जहां उसकी मुलाकात एक खूबसूरत टेक स्टार्ट-अप फाउंडर सोफिया (लुईसा बाइंडर) से होती है, जिसे वह "सिर्फ कलीग" कहता है। यहीं से रिश्ते में गलतफहमियां शुरू होती हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/batwara-1947-teaser-release-sunny-deol-preity-zinta-win-hearts-again-pain-of-partition-unfolds" target="_blank">Batwara 1947 Teaser Release | सनी देओल और प्रीति ज़िंटा की जोड़ी ने फिर जीता दिल, बिखरा विभाजन का दर्द</a></h3><div><br></div><div><b>समीक्षा: कहाँ चूक गई फिल्म? (Review &amp; Drawbacks)</b></div><div>इस जॉनर (Genre) की फिल्मों में दर्शक आमतौर पर दो चीजें देखने आते हैं— हाई-क्लास लग्जरी लाइफस्टाइल और स्क्रीन पर आग लगा देने वाली केमिस्ट्री (सेक्स और पैसा)। लेकिन 'योर फॉल्ट: लंदन' इन दोनों ही मोर्चों पर बेहद कमजोर साबित होती है।</div><div><br></div><div><b>बजट की कमी और कमजोर लाइफस्टाइल</b></div><div>फिल्म में किरदारों को बेहद रईस और अरबपति दिखाया गया है, लेकिन मेकर्स का बजट इतना कम लगता है कि वह अमीरी पर्दे पर दिखाई ही नहीं देती। उदाहरण के लिए, जब अरबपति का बेटा निक एक बहुत बड़ी बिजनेस डील पक्की करने के बाद अपने होटल के कमरे में पार्टी रखता है, तो वह कमरा किसी आलीशान फाइव-स्टार सुइट के बजाय एक सस्ते 'बेस्ट वेस्टर्न' बजट होटल जैसा नजर आता है।</div><div><br></div><div><b>ठंडी केमिस्ट्री और थकाऊ एक्टिंग</b></div><div>फिल्म के मुख्य कलाकारों (एक्टर्स) के चेहरे के हाव-भाव पूरी फिल्म में जमे हुए और हैरान-परेशान से लगते हैं। उन्हें देखकर ऐसा लगता है जैसे उन्हें एक्टिंग सेट पर नहीं, बल्कि किसी लग्जरी वेकेशन या हॉलिडे विज्ञापन की शूटिंग से उठाकर जबरदस्ती बैठा दिया गया हो।</div><div><br></div><div><b>कमजोर स्क्रीन प्रेजेंस:</b> निक और नोआ का जुनून ऐसा होना चाहिए था कि वे एक-दूसरे से दूर न रह पाएं, लेकिन फिल्म के लव मेकिंग और सेक्स सीन्स बेहद फीके और सॉफ्टकोर-लाइट (Softcore-light) हैं। इन्हें इस तरह कोरियोग्राफ किया गया है कि किरदारों के बीच का आकर्षण और तड़प दर्शकों तक पहुंच ही नहीं पाती।</div><div><br></div><div><b>निष्कर्ष (Verdict)</b></div><div>यदि आप मर्सिडीज़ रॉन की किताबों के बहुत बड़े फैन हैं, तो शायद आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप एक बेहतरीन, इंटेंस और मनोरंजक रोमांटिक-ड्रामा की उम्मीद कर रहे हैं, तो 'योर फॉल्ट: लंदन' आपको पूरी तरह निराश करेगी। इससे बेहतर होगा कि आप इसका ऑरिजनल स्पैनिश वर्जन ही देखें।</div><div><br></div><div><b>हमारा वर्डिक्ट: (1.5/5 स्टार)</b></div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 16:53:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/your-fault-london-review-british-remake-of-spanish-hit-disappoints-lacking-both-energy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Raakh Review | अली फज़ल की नई सीरीज ने ताजा की रंगा-बिल्ला केस की खौफनाक यादें, झकझोर देगी कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raakh-review-ali-fazal-new-series-revives-chilling-memories-of-the-ranga-billa-case]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ओटीटी प्लेटफॉर्म पर क्राइम थ्रिलर का जॉनर हमेशा से दर्शकों का पसंदीदा रहा है। लेकिन जब कोई सीरीज देश को हिलाकर रख देने वाले किसी सच्चे और खौफनाक क्राइम केस पर आधारित हो, तो उम्मीदें दोगुनी हो जाती हैं। डायरेक्टर प्रोसित रॉय की नई सीरीज 'राख' एक ऐसी ही कोशिश है। यह सीरीज साल 1978 के उस कुख्यात 'रंगा-बिल्ला अपहरण और हत्याकांड' से प्रेरित है, जिसने दशकों पहले पूरे भारत को झकझोर कर रख दिया था। इस मुश्किल और संवेदनशील विषय को बिना सनसनीखेज बनाए पर्दे पर उतारने में मेकर्स काफी हद तक कामयाब रहे हैं।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'राख' की कहानी?</b></div><div>सीरीज की कहानी एक आम दिन से शुरू होती है, जब दो मासूम बच्चे अपने घर से एक रेडियो स्टेशन के लिए निकलते हैं, लेकिन वहां कभी पहुंच नहीं पाते। बच्चों के गायब होने से परिवार में कोहराम मच जाता है और माता-पिता (सोनाली बेंद्रे और आमिर बशीर) मदद के लिए पुलिस का दरवाजा खटखटाते हैं।</div><div><br></div><div>इस पेचीदा मामले की जांच की जिम्मेदारी मिलती है सब-इंस्पेक्टर जयप्रकाश (अली फज़ल) को, जो अपने करियर का पहला बड़ा केस संभाल रहे हैं। काफी खोजबीन के बाद बच्चों के शव एक पहाड़ी इलाके में लावारिस हालत में मिलते हैं। इसके बाद शुरू होती है भारत के दो सबसे खूंखार अपराधियों— बाबू और रज्जो (जिन्हें दुनिया 'रंगा और बिल्ला' के नाम से जानती है) की धरपकड़ की रोंगटे खड़े कर देने वाली तफ्तीश।</div><div>&nbsp;</div><div><b>राख: डायलॉग्स</b></div><div>यह शो यादगार वन-लाइनर्स या लंबे भाषणों पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय, यह खामोशी, ठहराव और तनाव पर टिका है। सीरीज़ के माहौल की वजह से छोटी-सी आवाज़ भी बहुत तेज़ महसूस होती है। लेखक को पता है कि कब चुप रहना है, और यह बात शो के पक्ष में जाती है।</div><div><br></div><div><b>राख: परफॉर्मेंस</b></div><div>अली फ़ज़ल ने बहुत ही संयम के साथ शो को संभाला है। SI जयप्रकाश के तौर पर, वे एक युवा अफ़सर की बेचैनी को दिखाते हैं जो अपनी असुरक्षाओं से जूझते हुए एक भयानक केस को सुलझाने की कोशिश कर रहा है। उनकी परफॉर्मेंस कभी भी बढ़ा-चढ़ाकर नहीं लगती और यही इसे और भी असरदार बनाती है।</div><div><br></div><div>लेकिन 'राख' सिर्फ़ एक एक्टर की कहानी नहीं है। सोनाली बेंद्रे एक ऐसी माँ के रोल में दिल तोड़ने वाली लगती हैं जिनकी पूरी दुनिया रातों-रात बिखर जाती है। उनके हर सीन में दर्द झलकता है। आमिर बशीर एक पिता के तौर पर उन्हें बखूबी साथ देते हैं, जो मज़बूत बने रहने की कोशिश तो करते हैं लेकिन अंदर ही अंदर टूट रहे होते हैं।</div><div><br></div><div>राकेश बेदी का स्क्रीन टाइम कम है, लेकिन वे गहरी छाप छोड़ते हैं। अली फ़ज़ल के साथ उनका रिश्ता इस गंभीर कहानी में थोड़ी गर्माहट लाता है। दिब्येंदु भट्टाचार्य SP के रोल में भरोसेमंद हैं और अपने हर सीन में दमदार मौजूदगी दिखाते हैं। दविंदर गिल ने 'कोहरा 2' में बरुण सोबती की मदद करने वाले पुलिस अफ़सर का रोल किया था। इस बार वे अली फ़ज़ल की मदद कर रहे हैं। इस एक्टर के पास एक गंभीर थ्रिलर के माहौल को हल्का करने का शानदार अंदाज़ है। 'राख' में भी वे ऐसा करने में कामयाब रहे हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, सबसे बड़ा सरप्राइज़ आकाश मखीजा और रमनदीप यादव की ओर से मिलता है, जिन्होंने रंगा और बिल्ला का रोल किया है। उनकी परफॉर्मेंस बहुत परेशान करने वाली है। वे कभी भी सिर्फ़ दिखावे के लिए किरदार नहीं निभाते। इसके बजाय, वे बहुत आसानी से उन किरदारों की परेशान करने वाली सोच में ढल जाते हैं। अगर उनकी मौजूदगी आपको असहज करती है, तो एक्टर्स ने वही किया है जो वे करना चाहते थे।</div><div><br></div><div><b>राख: डायरेक्शन</b></div><div>कहानी को सनसनीखेज बनाने के लालच से बचने के लिए प्रोसित रॉय तारीफ़ के हकदार हैं। इसे ड्रामैटिक तमाशा बनाने के बजाय, वे तथ्यों और भावनाओं को खुद अपनी बात कहने देते हैं। कहानी का अंदाज़ ज़मीनी हकीकत से जुड़ा रहता है और इसी वजह से कई सीन और भी ज़्यादा परेशान करने वाले लगते हैं। क्राइम थ्रिलर में अक्सर असर पैदा करने के लिए सनसनी फैलाई जाती है। लेकिन 'राख' सही सुर पकड़ती है।</div><div><br></div><div><b>राख: क्या अच्छा है</b></div><div>इस सीरीज़ की सबसे मज़बूत बातों में से एक है सिर्फ़ इन्वेस्टिगेशन को ग्लोरिफ़ाई करने के बजाय क्रिमिनल्स को समझने में समय लगाना। ज़्यादातर क्राइम ड्रामा में मिस्ट्री सुलझाने वाले पुलिस अफ़सर को ही हीरो बनाया जाता है। यहाँ, कहानी यह भी दिखाती है कि क्राइम से पहले के दिनों में रंगा और बिल्ला क्या कर रहे थे, जिससे उनकी परेशान करने वाली सोच के बारे में पता चलता है। और अगर आप इसे रात में देखने का प्लान बना रहे हैं, तो यकीन मानिए, टीवी बंद होने के काफ़ी देर बाद तक भी आपको नींद नहीं आएगी।</div><div><br></div><div>'राख' की रफ़्तार भी तारीफ़ के काबिल है। यह न तो बहुत धीमी है और न ही बेवजह जल्दबाज़ी में आगे बढ़ती है। सीरीज़ एक ऐसा बैलेंस बनाती है जिससे पूरी कहानी में टेंशन बनी रहती है।</div><div><br></div><div><b>राख: क्या अच्छा नहीं है</b></div><div>जर्नलिस्ट वाला ट्रैक कभी-कभी मुख्य कहानी से अलग-थलग लगता है और इसे छोटा किया जा सकता था। कुछ पल ऐसे भी हैं जहाँ कुछ बातें अधूरी लगती हैं और कुछ सवाल बिना जवाब के रह जाते हैं। इन छोटी-मोटी कमियों से फ़िल्म का मज़ा खराब नहीं होता, लेकिन ये ध्यान ज़रूर खींचती हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>राख: फ़ाइनल फ़ैसला</b></div><div>'राख' एक ज़बरदस्त क्राइम थ्रिलर है जो फ़िल्म खत्म होने के बाद भी आपके ज़हन में बनी रहती है। यह एक मुश्किल विषय को ईमानदारी से दिखाती है और इसमें सभी कलाकारों ने दमदार एक्टिंग की है, खासकर अली फ़ज़ल और रंगा-बिल्ला का किरदार निभाने वाले एक्टर्स ने।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
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width:100%;" target="_blank"> <div style=" display: flex; flex-direction: row; align-items: center;"> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 40px; margin-right: 14px; width: 40px;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 100px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 60px;"></div></div></div><div style="padding: 19% 0;"></div> <div style="display:block; height:50px; margin:0 auto 12px; width:50px;"><svg width="50px" height="50px" viewBox="0 0 60 60" version="1.1" xmlns="https://www.w3.org/2000/svg" xmlns:xlink="https://www.w3.org/1999/xlink"><g stroke="none" stroke-width="1" fill="none" fill-rule="evenodd"><g transform="translate(-511.000000, -20.000000)" fill="#000000"><g><path d="M556.869,30.41 C554.814,30.41 553.148,32.076 553.148,34.131 C553.148,36.186 554.814,37.852 556.869,37.852 C558.924,37.852 560.59,36.186 560.59,34.131 C560.59,32.076 558.924,30.41 556.869,30.41 M541,60.657 C535.114,60.657 530.342,55.887 530.342,50 C530.342,44.114 535.114,39.342 541,39.342 C546.887,39.342 551.658,44.114 551.658,50 C551.658,55.887 546.887,60.657 541,60.657 M541,33.886 C532.1,33.886 524.886,41.1 524.886,50 C524.886,58.899 532.1,66.113 541,66.113 C549.9,66.113 557.115,58.899 557.115,50 C557.115,41.1 549.9,33.886 541,33.886 M565.378,62.101 C565.244,65.022 564.756,66.606 564.346,67.663 C563.803,69.06 563.154,70.057 562.106,71.106 C561.058,72.155 560.06,72.803 558.662,73.347 C557.607,73.757 556.021,74.244 553.102,74.378 C549.944,74.521 548.997,74.552 541,74.552 C533.003,74.552 532.056,74.521 528.898,74.378 C525.979,74.244 524.393,73.757 523.338,73.347 C521.94,72.803 520.942,72.155 519.894,71.106 C518.846,70.057 518.197,69.06 517.654,67.663 C517.244,66.606 516.755,65.022 516.623,62.101 C516.479,58.943 516.448,57.996 516.448,50 C516.448,42.003 516.479,41.056 516.623,37.899 C516.755,34.978 517.244,33.391 517.654,32.338 C518.197,30.938 518.846,29.942 519.894,28.894 C520.942,27.846 521.94,27.196 523.338,26.654 C524.393,26.244 525.979,25.756 528.898,25.623 C532.057,25.479 533.004,25.448 541,25.448 C548.997,25.448 549.943,25.479 553.102,25.623 C556.021,25.756 557.607,26.244 558.662,26.654 C560.06,27.196 561.058,27.846 562.106,28.894 C563.154,29.942 563.803,30.938 564.346,32.338 C564.756,33.391 565.244,34.978 565.378,37.899 C565.522,41.056 565.552,42.003 565.552,50 C565.552,57.996 565.522,58.943 565.378,62.101 M570.82,37.631 C570.674,34.438 570.167,32.258 569.425,30.349 C568.659,28.377 567.633,26.702 565.965,25.035 C564.297,23.368 562.623,22.342 560.652,21.575 C558.743,20.834 556.562,20.326 553.369,20.18 C550.169,20.033 549.148,20 541,20 C532.853,20 531.831,20.033 528.631,20.18 C525.438,20.326 523.257,20.834 521.349,21.575 C519.376,22.342 517.703,23.368 516.035,25.035 C514.368,26.702 513.342,28.377 512.574,30.349 C511.834,32.258 511.326,34.438 511.181,37.631 C511.035,40.831 511,41.851 511,50 C511,58.147 511.035,59.17 511.181,62.369 C511.326,65.562 511.834,67.743 512.574,69.651 C513.342,71.625 514.368,73.296 516.035,74.965 C517.703,76.634 519.376,77.658 521.349,78.425 C523.257,79.167 525.438,79.673 528.631,79.82 C531.831,79.965 532.853,80.001 541,80.001 C549.148,80.001 550.169,79.965 553.369,79.82 C556.562,79.673 558.743,79.167 560.652,78.425 C562.623,77.658 564.297,76.634 565.965,74.965 C567.633,73.296 568.659,71.625 569.425,69.651 C570.167,67.743 570.674,65.562 570.82,62.369 C570.966,59.17 571,58.147 571,50 C571,41.851 570.966,40.831 570.82,37.631"></path></g></g></g></svg></div><div style="padding-top: 8px;"> <div style=" color:#3897f0; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:550; line-height:18px;">View this post on Instagram</div></div><div style="padding: 12.5% 0;"></div> <div style="display: flex; flex-direction: row; margin-bottom: 14px; align-items: center;"><div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(0px) translateY(7px);"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; height: 12.5px; transform: rotate(-45deg) translateX(3px) translateY(1px); width: 12.5px; flex-grow: 0; margin-right: 14px; margin-left: 2px;"></div> <div style="background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; height: 12.5px; width: 12.5px; transform: translateX(9px) translateY(-18px);"></div></div><div style="margin-left: 8px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 50%; flex-grow: 0; height: 20px; width: 20px;"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 2px solid transparent; border-left: 6px solid #f4f4f4; border-bottom: 2px solid transparent; transform: translateX(16px) translateY(-4px) rotate(30deg)"></div></div><div style="margin-left: auto;"> <div style=" width: 0px; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-right: 8px solid transparent; transform: translateY(16px);"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; flex-grow: 0; height: 12px; width: 16px; transform: translateY(-4px);"></div> <div style=" width: 0; height: 0; border-top: 8px solid #F4F4F4; border-left: 8px solid transparent; transform: translateY(-4px) translateX(8px);"></div></div></div> <div style="display: flex; flex-direction: column; flex-grow: 1; justify-content: center; margin-bottom: 24px;"> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; margin-bottom: 6px; width: 224px;"></div> <div style=" background-color: #F4F4F4; border-radius: 4px; flex-grow: 0; height: 14px; width: 144px;"></div></div></a><p style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; line-height:17px; margin-bottom:0; margin-top:8px; overflow:hidden; padding:8px 0 7px; text-align:center; text-overflow:ellipsis; white-space:nowrap;"><a href="https://www.instagram.com/p/DY6ni0GOg-I/?utm_source=ig_embed&amp;utm_campaign=loading" style=" color:#c9c8cd; font-family:Arial,sans-serif; font-size:14px; font-style:normal; font-weight:normal; line-height:17px; text-decoration:none;" target="_blank">A post shared by prime video IN (@primevideoin)</a></p></div></blockquote>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:33:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raakh-review-ali-fazal-new-series-revives-chilling-memories-of-the-ranga-billa-case</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bharat Bhhagya Viddhaata Review | कामा हॉस्पिटल के 'गुमनाम नायकों' की रोमांचक दास्तान, कंगना रनौत की सधी हुई अदाकारी ने जीता दिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bharat-bhhagya-viddhaata-review-kangana-ranaut-powers-a-thrilling-real-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>Bharat Bhhagya Viddhaata Review | 26/11 के उस महाविनाश की कहानी को हम सबने कई बार देखा और सुना है। वो खौफनाक तस्वीरें, वो मूक कर देने वाले नाम और वो तीन दिन जब मुंबई पूरी तरह ठहर गई थी, हमारी यादों में आज भी जिंदा हैं। लेकिन डायरेक्टर मनोज तापड़िया की 'भारत भाग्य विधाता' तबाही के उस पुराने ढर्रे से हटकर एक बिल्कुल अलग और अनछुआ रास्ता चुनती है। साल 2008 के आतंकी हमले के दौरान मुंबई के 'कामा हॉस्पिटल' में घटी वास्तविक घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म हमें 'गीता माधव' (कंगना रनौत) नाम की एक नर्स के नजरिए से उस काली रात के बीच ले जाती है। हालांकि सिनेमाई लिबर्टी लेते हुए नाम बदले गए हैं और कुछ ड्रामैटिक लेयर्स जोड़ी गई हैं, लेकिन फिल्म का इरादा बिल्कुल साफ है— यह कहानी उन आस्तीन के सांपों (आतंकवादियों) की नहीं है, बल्कि यह कहानी उन जांबाज इंसानों की है जो चारों तरफ बरसती गोलियों के बीच भी खामोशी से अपना फर्ज निभाते रहे।"</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ott-release-date-announced-for-akshay-kumar-and-priyadarshan-bhooth-bangla" target="_blank">Bhooth Bangla OTT Release | 'भूत बंगला' का तहलका! अक्षय कुमार की हॉरर-कॉमेडी फिल्म की नेटफ्लिक्स रिलीज डेट आउट</a></h3><div>&nbsp;</div><div>बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनौत एक बार फिर एक बेहद संवेदनशील और दमदार विषय के साथ बड़े पर्दे पर लौटी हैं। सच्ची घटना पर आधारित फिल्म 'भारत भाग्य विधाता' सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। यह फिल्म आतंक के तांडव के बीच मानवता, हौसले और सर्वाइवल (Survival) की एक ऐसी अद्भुत कहानी है, जो दर्शकों को भावुक भी करती है और उनके रोंगटे भी खड़े कर देती है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bollywood-wrap-up--internet-outraged-over-the-teaser-of-alia-bhatt-alpha" target="_blank">Bollywood Wrap Up | आलिया भट्ट की 'Alpha' के टीजर पर भड़का इंटरनेट | सिनेमा गलियारों की सबसे बड़ी खबरें | Bollywood News Today In Hindi </a></h3><div>&nbsp;</div><div><b>क्विक फैक्ट्स (Quick Facts):</b></div><div>फिल्म: भारत भाग्य विधाता</div><div>डायरेक्टर/राइटर: मनोज तापड़िया</div><div>कास्ट: कंगना रनौत, गिरिजा ओक, स्मिता तांबे, प्रिया अरुण बेर्डे, रसिका अगाशे</div><div>रनटाइम: 2 घंटे 10 मिनट</div><div>रेटिंग: 3.5 / 5 स्टार (साढ़े तीन स्टार)</div><div>&nbsp;</div><div><b>क्या है फिल्म की कहानी?</b></div><div>यह थ्रिलर फिल्म भारत के इतिहास के सबसे काले अध्यायों में से एक, यानी 26/11 के मुंबई हमलों की पृष्ठभूमि पर बनी है। फिल्म की कहानी पूरा ध्यान शहर के आतंक पर केंद्रित करने के बजाय 'कामा हॉस्पिटल' के अंदर ले जाती है। यहाँ हथियारबंद आतंकवादियों द्वारा मचाई गई तबाही के बीच, निहत्थे हॉस्पिटल कर्मचारियों और नर्सों ने अपनी जान दांव पर लगाकर 400 से ज्यादा मरीजों और तीमारदारों को सुरक्षित रखा। यह फिल्म उन हेल्थकेयर प्रोफेशनल्स के बलिदान और अदम्य साहस को एक सच्ची श्रद्धांजलि है, जिनकी बहादुरी अक्सर इतिहास के पन्नों में कहीं खो गई थी।</div><div><br></div><div><b>फिल्म की खूबियां (What's Good)</b></div><div>अनोखा और अनसुना विषय: इस फिल्म की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसकी कहानी है। 26/11 पर कई फिल्में बनी हैं, लेकिन कामा अस्पताल के डॉक्टरों और नर्सों के निस्वार्थ भाव को इस तरह पर्दे पर पहली बार उतारा गया है।</div><div><br></div><div>इमोशनल कनेक्ट: निर्देशक मनोज तापड़िया ऐसे दृश्य रचने में सफल रहे हैं जो दर्शकों को उस खौफनाक रात के डर, अनिश्चितता और तनाव का सीधा अहसास कराते हैं। जीवन और मृत्यु के बीच फंसी नर्सों की इंसानियत दर्शकों के दिल को छू जाती है।</div><div><br></div><div>सटीक सिनेमैटोग्राफी और प्रोडक्शन: फिल्म का प्रोडक्शन डिजाइन अस्पताल के माहौल को पूरी तरह वास्तविक बनाता है। कैमरे का काम और बैकग्राउंड स्कोर बिना हावी हुए सस्पेंस और डर के माहौल को दोगुना कर देते हैं।</div><div><br></div><div><b>कहाँ रह गई कमी? (What's Bad)</b></div><div>धीमी रफ्तार: फिल्म के मध्य भाग (Second Quarter) में स्क्रीनप्ले अपनी गति बनाए रखने में थोड़ा संघर्ष करता दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>कमजोर चरित्र चित्रण: कुछ सहायक किरदारों (Supporting Characters) को थोड़ा और समय दिया जा सकता था, जिससे उनकी बैकस्टोरी और गहरी लगती। यदि फिल्म का दूसरा हिस्सा थोड़ा और कसा हुआ होता, तो इसका प्रभाव और भी गहरा होता।</div><div><br></div><div><b>कलाकारों का अभिनय (Performances)</b></div><div>फिल्म की पूरी स्टारकास्ट ने अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है:</div><div><br></div><div>कंगना रनौत (गीता के रोल में): कंगना ने इस गंभीर विषय को बेहद ईमानदारी और संयम के साथ निभाया है। उन्होंने एक साधारण महिला की कमजोरी और संकट के समय उसकी शांत मजबूती (Silent Strength) के बीच बेहतरीन संतुलन बनाया है। स्क्रीन पर उनका समर्पण फिल्म को मजबूती देता है।</div><div><br></div><div>गिरिजा ओक (शीतल के रोल में): गिरिजा ने अपने अभिनय में गजब का अपनापन और सच्चाई भरी है। उनका किरदार फिल्म का सबसे भरोसेमंद हिस्सा बनकर उभरता है।</div><div><br></div><div>स्मिता तांबे (तृप्ति के रोल में): स्मिता ने अपने कच्चे और असरदार अभिनय से गहरी छाप छोड़ी है। उन्होंने फ्रंटलाइन वर्कर्स के पक्के इरादे को बखूबी पर्दे पर जिया है।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट: आशा शेलार, प्रिया अरुण बेर्डे और रसिका अगाशे जैसे कलाकारों ने सामूहिक रूप से फिल्म के माहौल को विश्वसनीय और असल बनाने में अहम भूमिका निभाई है।</div><div><br></div><div><b>निष्कर्ष (Verdict)</b></div><div>'भारत भाग्य विधाता' महज एक फिल्म नहीं, बल्कि उन गुमनाम नायकों (Unsung Heroes) को दिया गया एक सम्मानजनक सलाम है, जिन्होंने खुद मौत के साये में रहकर सैकड़ों लोगों की जान बचाई। रफ्तार में मामूली कमियों के बावजूद, इसकी भावुक सच्चाई, देशभक्ति का जज्बा और उम्दा अभिनय इसे एक 'मस्ट वॉच' (Must Watch) फिल्म बनाते हैं। अगर आप असल जिंदगी से प्रेरित और दिल को छू लेने वाले सिनेमा के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपको बिल्कुल निराश नहीं करेगी।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 11:41:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bharat-bhhagya-viddhaata-review-kangana-ranaut-powers-a-thrilling-real-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Brown Series Review | धीमी रफ़्तार के बावजूद Karisma Kapoor ने डार्क थ्रिलर में किया करियर का सबसे बेहतरीन अभिनय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brown-series-review-karisma-kapoor-delivers-best-performance-of-career-in-this-dark-thriller]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सिनेमा और वेब सीरीज़ की दुनिया में कोलकाता को अक्सर पीली टैक्सियों, हावड़ा ब्रिज, भव्य विक्टोरिया मेमोरियल, दुर्गा पूजा के रंगों और मिट्टी के कुल्हड़ में चाय की चुस्कियों के साथ बेहद जीवंत दिखाया जाता है। लेकिन निर्देशक अभिनय देव की सात-एपिसोड की नई सस्पेंस वेब सीरीज़ 'ब्राउन' आपको एक ऐसे कोलकाता में ले जाती है जो बिल्कुल अलग, ठंडा, उदास, लगातार बारिश में भीगा हुआ और एक बेचैन कर देने वाली खामोशी में डूबा हुआ है। अभीक बरुआ के मशहूर उपन्यास 'सिटी ऑफ़ डेथ' पर आधारित यह सीरीज़ एक रोंगटे खड़े कर देने वाले मर्डर और किरदारों के गहरे मानसिक सदमे की एक सघन कहानी है। </div><div><b>&nbsp;</b></div><div><div><b>कहानी: हाई सोसाइटी मर्डर और एक टूटी हुई कॉप</b></div><div>कहानी की शुरुआत कोलकाता के एक बेहद रईस और रसूखदार बिजनेसमैन (अजिंक्य देव) की बेटी अहाना जायसवाल की बेरहमी से हुई हत्या से होती है। अहाना का बिना सिर वाला शव उसके आलीशान बंगले में मिलता है, जिससे शहर के रईसों और पुलिस महकमे में हड़कंप मच जाता है। मीडिया के भारी दबाव के बीच यह केस डीसीपी रीटा ब्राउन (करिश्मा कपूर) को सौंपा जाता है।</div><div><br></div><div>रीटा ब्राउन कभी विभाग की सबसे काबिल अफसर हुआ करती थीं, लेकिन अपने पति की मौत के सदमे और कई सालों के निलंबन (Suspension) के बाद अब वे शराब की भयंकर लत, डिप्रेशन और सिगरेट के धुएं में खुद को बर्बाद कर रही हैं। सिस्टम उन्हें यह केस मुख्य रूप से इसलिए सौंपता है ताकि वे इस उलझे हुए मामले में फेल हो जाएं और रसूखदारों के राज़ दफन रहें।</div><div><br></div><div>रीटा के साथ इस जांच में शामिल होते हैं इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा (सूर्या शर्मा), जो खुद अपनी पत्नी को खोने के गम और 'सर्वाइवर गिल्ट' से जूझ रहे हैं। जैसे ही ये दोनों टूटे हुए अफसर तफ्तीश शुरू करते हैं, ठीक उसी ढर्रे पर एक और मर्डर हो जाता है। जल्द ही उन्हें समझ आ जाता है कि उनका सामना किसी आम कातिल से नहीं, बल्कि एक साइको सीरियल किलर से है जो खुद को किसी दैवीय मिशन पर मानता है।</div></div><div>&nbsp;</div><div><b> परफॉर्मेंस</b></div><div>'ब्राउन' की सबसे बड़ी खूबी, और शायद एकमात्र लगातार प्रभावशाली पहलू, इसकी कास्ट है, खासकर करिश्मा कपूर। जिन दर्शकों को 'कुली नंबर 1' और 'राजा हिंदुस्तानी' जैसी फिल्मों में उनका ग्लैमरस अंदाज़ याद है, उन्हें यह बदलाव चौंकाने वाला लग सकता है। बिना किसी ग्लैमर के, दुख से थके हुए चेहरे के साथ, लगातार सिगरेट पीते हुए और शराब में अपना दर्द डुबोते हुए, करिश्मा ने शायद अपने करियर की सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस दी है। वह रीटा ब्राउन की कमियों और तीखेपन को बहुत ईमानदारी से अपनाती हैं। स्क्रीन पर एक स्टार को देखने के बजाय, दर्शक एक बुरी तरह से टूटी हुई महिला को देखते हैं जो जीने के लिए संघर्ष कर रही है। यह एक ऐसी परफॉर्मेंस है जो संयमित भी है और दिल को छू लेने वाली भी।</div><div><br></div><div>इंस्पेक्टर अर्जुन सिन्हा के तौर पर सूर्या शर्मा ने मज़बूत सपोर्ट दिया है। दुख, गुस्से और भावनात्मक उथल-पुथल को दिखाने का उनका अंदाज़ नपा-तुला और विश्वसनीय है। सोनी राज़दान रीटा की फिक्रमंद माँ के रोल में असरदार हैं, जबकि अजिंक्य देव एक प्रभावशाली बिज़नेसमैन के रोल में अधिकार और बारीकियां लेकर आते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे यादगार कैमियो अनुभवी एक्ट्रेस हेलेन का है, जिन्होंने रीटा की आंटी बर्था का रोल निभाया है। उनका परिचय बहुत ही अनोखा और अजीब है, क्योंकि वह अपने ही कटे हुए पैर के अंतिम संस्कार की तैयारी कर रही हैं, जिसे डायबिटीज़ की वजह से हुई दिक्कतों के कारण काटना पड़ा था। आर्यन भौमिक, जो अहाना के म्यूज़िशियन बॉयफ्रेंड बने हैं, सस्पेंस को बढ़ाने में असरदार भूमिका निभाते हैं, जबकि सपोर्टिंग कास्ट, जिसमें फोरेंसिक टीम भी शामिल है, कहानी में असलियत और स्थानीय रंग भरती है।</div><div><br></div><div><b>ब्राउन: डायरेक्शन और टेक्निकल पहलू</b></div><div>अभिनय देव एक ऐसी नियो-नॉयर थ्रिलर बनाने के लिए तारीफ़ के हकदार हैं जिसका विज़ुअल अंदाज़ एकदम डार्क और गंभीर है। अमोग देशपांडे की सिनेमैटोग्राफी निस्संदेह शो की सबसे मज़बूत खूबियों में से एक है। कोलकाता को ग्रे, काले और नीले रंगों के शेड्स में दिखाया गया है; बारिश से भीगी सड़कें, कम रोशनी वाले कमरे और सीलन भरी दीवारें एक दम घोंटू उदासी का माहौल बनाती हैं। बैकग्राउंड म्यूज़िक और खामोशी का इस्तेमाल पहले ही फ्रेम से बेचैनी का एहसास कराने में मदद करता है। फिर भी, सीरीज़ की रफ़्तार धीमी होने की वजह से इसका असर कम हो जाता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/why-did-8-ips-officers-suddenly-reach-the-pakistan-border-what-is-india-going-to-do" target="_blank">Pakistan Border पर अचानक क्यों पहुंचे 8 IPS अधिकारी, क्या करने वाला है भारत?</a></h3><div><br></div><div>इसके मेकर्स ने मिस्ट्री के बजाय किरदारों के भावनात्मक दुख और मानसिक संघर्ष पर ज़्यादा ध्यान दिया है। जब लगभग हर किरदार ट्रॉमा, डिप्रेशन या निजी नुकसान के बोझ तले दबा हो, तो दर्शकों के लिए उनमें से किसी एक के साथ भी गहरे भावनात्मक स्तर पर जुड़ना मुश्किल हो जाता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>ब्राउन: फ़ैसला</b></div><div>ऊपर से देखने पर 'ब्राउन' एक स्टाइलिश, शानदार माहौल वाली और उम्मीद जगाने वाली सीरीज़ लगती है, लेकिन इसके शानदार बाहरी रूप के नीचे एक काफ़ी आम और औसत कहानी छिपी है। अगर आप करिश्मा कपूर को ग्लैमर से दूर, एकदम अलग अवतार में और ज़बरदस्त एक्टिंग करते हुए देखना चाहते हैं, तो यह सीरीज़ ज़रूर देखनी चाहिए। कोलकाता का डार्क अंदाज़ और शानदार सिनेमैटोग्राफ़ी भी इसकी ख़ासियतें हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, जो दर्शक तेज़ रफ़्तार वाली मर्डर मिस्ट्री देखना चाहते हैं जिसमें अचानक आने वाले ट्विस्ट और ज़बरदस्त सस्पेंस हो, उन्हें 'ब्राउन' देखने में शायद थकान महसूस हो सकती है। बेहतरीन एक्टिंग और शानदार विज़ुअल स्टाइल के बावजूद, इसकी धीमी रफ़्तार और आसानी से अंदाज़ा लगाया जा सकने वाला अंत इसे अपनी पूरी क्षमता तक पहुँचने से रोकते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/promoters-have-great-confidence-in-zepto-ipo" target="_blank">Zepto IPO पर Promoters का बड़ा भरोसा, 11,000 करोड़ के इश्यू में नहीं बेचेंगे अपनी हिस्सेदारी</a></h3><div><br></div><div>कमियों के बावजूद, 'ब्राउन' को 5 में से 3 स्टार मिलने चाहिए।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 13:03:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/brown-series-review-karisma-kapoor-delivers-best-performance-of-career-in-this-dark-thriller</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bandar Movie Review: अनुराग कश्यप के उलझे हुए कानूनी ड्रामे में चमके बॉबी देओल, करियर की दी सबसे बेहतरीन परफॉर्मेंस]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bandar-movie-review-bobby-deol-shines-in-anurag-kashyap-convoluted-legal-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">सिनेमा की दुनिया में निर्देशक अनुराग कश्यप कभी भी आसान और सीधे रास्ते चुनने वाले फिल्ममेकर नहीं रहे हैं। उनकी फिल्में अक्सर दर्शकों को नैतिक रूप से एक ऐसे दोराहे पर लाकर खड़ा कर देती हैं, जहां सही और गलत के बीच का अंतर धुंधला हो जाता है। उनकी नई फिल्म 'बंदर' भी इसी कड़वी हकीकत और बेचैनी की परंपरा को आगे बढ़ाती है। सच्ची घटनाओं से प्रेरित यह फिल्म दिखाती है कि कैसे किसी व्यक्ति की हँसती-खेलती दुनिया महज एक आपराधिक आरोप के बाद ताश के पत्तों की तरह बिखर जाती है, और फिर शुरू होता है देश की सुस्त न्याय व्यवस्था का अंतहीन चक्रव्यूह। यह फिल्म किसी के दोषी या निर्दोष होने का फैसला सुनाने का ठेका नहीं लेती, बल्कि यह एक असंवेदनशील सिस्टम में फंसने के मानवीय और मानसिक परिणामों पर फोकस करती है। धीमी रफ्तार के बावजूद, बॉबी देओल की संजीदा एक्टिंग के दम पर यह फिल्म दर्शकों के दिलो-दिमाग पर गहरा भावनात्मक असर छोड़ती है।</span></div><div><br></div><div><b>कहानी: हेडलाइंस के फीके पड़ने के बाद का कड़वा सच</b></div><div>फिल्म की कहानी 'समीर मेहरा' (बॉबी देओल) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक नामचीन टीवी पर्सनैलिटी हैं। समीर का करियर पहले से ही थोड़ा डगमगा रहा होता है, लेकिन तभी उन पर अचानक 'रेप' (बलात्कार) का एक संगीन आरोप लगता है। इसके बाद शुरू होता है अंतहीन कानूनी कार्यवाहियों, मीडिया ट्रायल और सामाजिक बहिष्कार का एक ऐसा दर्दनाक सफर जो समीर को पूरी तरह तोड़कर रख देता है। रातों-रात, समीर एक ऐसे विलेन में तब्दील हो जाते हैं जिसके बारे में तथ्यों की जांच किए बिना ही समाज अपनी राय बना लेता है। अनुराग कश्यप ने इसे एक पारंपरिक और लाउड 'कोर्टरूम थ्रिलर' बनाने के बजाय इस बात पर फोकस किया है कि जब टीवी चैनलों की ब्रेकिंग न्यूज और हेडलाइंस फीकी पड़ जाती हैं, तब क्या होता है? जेल की कालकोठरी का मानसिक असर, बिखरते निजी रिश्ते और घुट-घुटकर दम तोड़ती उम्मीद ही इस कहानी की मुख्य आत्मा है। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें कोई साफ-सुथरा 'हीरो' या 'विलेन' नहीं है, बल्कि हर किरदार ग्रे-शेड्स (उलझा हुआ) लिए हुए है।</div><div><br></div><div><b>'बंदर': लेखन और निर्देशन</b></div><div>कश्यप ने इस कहानी को बहुत ही संयम के साथ पेश किया है। फिल्म का मैसेज समझाने के लिए कोई बड़े-बड़े भाषण नहीं हैं और बहुत कम ऐसे पल हैं जिन्हें सिर्फ़ गुस्सा दिलाने के लिए बनाया गया हो। डायरेक्टर ने फिल्म की स्थितियों को स्वाभाविक रूप से आगे बढ़ने दिया है। 'बंदर' के ज़रिए, अनुराग कश्यप अपने दर्शकों पर भरोसा करते हैं कि वे चीज़ों को खुद समझें, न कि हर सोच और भावना को उन्हें चम्मच से खिलाया जाए। इसलिए, स्क्रीनप्ले तब सबसे अच्छा लगता है जब यह घटनाओं के मानवीय असर को उजागर करता है। लेकिन 'बंदर' की सबसे अच्छी बात यह है कि इसके सबसे इमोशनल पल बहुत शांत होते हैं: जेल में बातचीत, अकेलेपन का एहसास, या बेबसी भरी नज़र। ये छोटे-छोटे पल अक्सर लंबे-चौड़े डायलॉग्स से कहीं ज़्यादा असरदार होते हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि, फिल्म की स्क्रिप्ट तब लड़खड़ाती है जब वह एक साथ कई आइडियाज़ को संभालने की कोशिश करती है - वही अनुराग कश्यप वाली समस्या जो उनकी ज़्यादातर फिल्मों में दिखती है। यह फिल्म एक साथ जेल ड्रामा, लीगल थ्रिलर, मीडिया कल्चर पर कमेंट्री और किरदारों की गहराई से पड़ताल करने वाली कहानी बनना चाहती है। भले ही ये सभी चीज़ें अलग-अलग दिलचस्प हों, लेकिन वे हमेशा उतनी आसानी से एक साथ नहीं जुड़ पातीं जितनी अच्छी तरह जुड़नी चाहिए थीं।</div><div><br></div><div>फिर भी, कश्यप को एक संवेदनशील विषय को समझदारी से संभालने के लिए क्रेडिट मिलना चाहिए। फिल्म मुश्किल सवाल पूछती है, बिना उन्हें आसान या सतही तर्कों में बदले।</div><div><br></div><div><b>बंदर: टेक्निकल पहलू</b></div><div>टेक्निकली, 'बंदर' अपने गंभीर माहौल के साथ अच्छी तरह मेल खाती है। अनुराग कश्यप की ज़्यादातर फिल्मों की तरह, इसमें भी सिनेमैटोग्राफी के ज़रिए असलियत दिखाने की कोशिश की गई है और दिखावे के लिए कोई जगह नहीं छोड़ी गई है, जिससे फिल्म ज़मीन से जुड़ी और अपनी सी लगती है। जेल के सीन असली लगते हैं, जो सीधे असर करते हैं और फिल्म को गहराई देते हैं।</div><div><br></div><div>प्रोडक्शन डिज़ाइन भी बहुत मदद करता है। लोकेशन नकली या बहुत ज़्यादा चमकीली नहीं हैं। जेल की कोठरियां हों, पूछताछ के कमरे हों या कोर्टरूम - सब कुछ इस्तेमाल किया हुआ सा लगता है और कहानी को सपोर्ट करता है।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड म्यूज़िक बहुत कम सुनाई देता है, लेकिन समझदारी से इस्तेमाल किया गया है और कहानी में रुकावट नहीं डालता। यह हमें यह बताने के बजाय कि क्या महसूस करना है, ज़्यादातर इमोशनल भार को एक्टर्स पर छोड़ देता है। एडिटिंग का काम भी ज़्यादातर अच्छा है, फिर भी फिल्म की लंबाई कभी-कभी कहानी की रफ़्तार धीमी कर देती है। थोड़ी और कट-छांट से उन हिस्सों में एनर्जी बनी रह सकती थी।</div><div><br></div><div><b>बंदर: कमियां</b></div><div>'बंदर' की अपनी खूबियां हैं, लेकिन यह परफेक्ट नहीं है। इसकी रफ़्तार एक बड़ी समस्या है। कानूनी कहानी और समीर का इमोशनल सफ़र धीरे-धीरे आगे बढ़ता है, लेकिन कभी-कभी यह खिंचा हुआ लगता है। शायद इसीलिए कई सीन दोहराव वाले लगते हैं, जिससे कहानी में ज़रूरी तेज़ी या गंभीरता की कमी महसूस होती है। इस वजह से, फिल्म का दूसरा हिस्सा बहुत ज़्यादा लंबा लगता है।</div><div><br></div><div>साथ ही, कुछ सपोर्टिंग किरदारों को ठीक से डेवलप नहीं किया गया है। वे बड़े रोल का संकेत तो देते हैं, लेकिन वैसा होता नहीं है। इससे फिल्म जिन इमोशन्स को जगाने की कोशिश करती है, उनके लिए आपको और बेहतर नतीजे की चाहत रह जाती है।</div><div><br></div><div>और सच कहें तो, फिल्म का एंडिंग लोगों की राय को बांट सकता है। बिना ज़्यादा कुछ बताए, यह कहा जा सकता है कि कहानी को आगे बढ़ाने में इतना समय लगाने के बाद, फ़िल्म का अंत काफ़ी जल्दी हो जाता है। फ़िल्म के आखिरी पल भावनात्मक रूप से असरदार हैं, लेकिन वे यह एहसास दिलाते हैं कि कहानी में अभी और भी कुछ बताया जा सकता था।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">इन कमियों की वजह से फ़िल्म बिगड़ती तो नहीं है, लेकिन ये इसे सच में बेहतरीन फ़िल्म बनने से रोक देती हैं।</span></div><div><br></div><div><b>एक्टिंग: बॉबी देओल का 'पुनर्जन्म' और सान्या की सादगी</b></div><div>अगर 'बंदर' को देखने की कोई एक सबसे बड़ी और अचूक वजह है, तो वह हैं बॉबी देओल। 'आश्रम' और 'एनिमल' के बाद बॉबी ने खुद को पूरी तरह री-इन्वेंट किया है, लेकिन इस फिल्म में उन्होंने जो लाचारी, भावुकता और मानसिक थकान दिखाई है, उसकी कल्पना किसी ने नहीं की होगी। उनका अभिनय चीखने-चिल्लाने के बजाय खामोशी और आंखों के हाव-भाव पर आधारित है। उन्होंने समीर के डर को इतनी शिद्दत से जिया है कि दर्शकों को उनसे हमदर्दी होने लगती है। यह बॉबी के करियर की सर्वश्रेष्ठ परफॉर्मेंस कही जा सकती है। इंद्रजीत सुकुमारन और जितेंद्र जोशी सहित बाकी सभी सहयोगी कलाकारों ने भी कहानी की वास्तविकता को बनाए रखने में शानदार योगदान दिया है।</div><div><br></div><div><b>फाइनल वर्डिक्ट (निष्कर्ष)</b></div><div>'बंदर' कोई 'पॉपकॉर्न एंटरटेनर' फिल्म नहीं है; इसे देखना कई जगह असहज करने वाला और आपके सब्र की परीक्षा लेने वाला अनुभव हो सकता है। लेकिन आज के सोशल मीडिया के दौर में, जहां बिना सच जाने लोग कुछ ही मिनटों में किसी को भी मुजरिम बना देते हैं, वहां यह फिल्म बेहद प्रासंगिक और समयोचित सवाल उठाती है। बॉबी देओल की लाजवाब एक्टिंग और कश्यप के कड़क निर्देशन के लिए इस गंभीर ड्रामे को एक बार जरूर देखा जाना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:49:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bandar-movie-review-bobby-deol-shines-in-anurag-kashyap-convoluted-legal-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Made in India A Titan Story Review | भरोसे और इनोवेशन की कहानी! 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' में चमके नसीरुद्दीन शाह और जिम सरभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/made-in-india-a-titan-story-review-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भारतीय कॉरपोरेट जगत के इतिहास में कुछ ब्रांड्स ऐसे हैं जो सिर्फ व्यवसाय नहीं, बल्कि देश की औद्योगिक और सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा बन जाते हैं। 'टाईटन' (Titan) एक ऐसा ही नाम है। ओटीटी प्लेटफॉर्म पर आई नई वेब सीरीज़ 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' (Made in India: A Titan Story) इसी ऐतिहासिक ब्रांड के उदय, संघर्ष और उसकी कामयाबी की अनकही दास्तान को परदे पर लेकर आई है। 6 एपिसोड की यह सीरीज़ एक ऐसे ब्रांड की कहानी है जो आज भारतीय मध्यम वर्ग के भरोसे और इनोवेशन का पर्याय बन चुका है। </span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">आइए जानते हैं कि नसीरुद्दीन शाह और जिम सरभ के अभिनय से सजी यह सीरीज़ दर्शकों पर कितना गहरा प्रभाव छोड़ पाती है। शुरू से ही, यह सीरीज़ ऐसा एहसास कराती है कि इसे बहुत सोच-समझकर और बारीकी से लिखा गया है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;"> इसकी कहानी की नींव बहुत मज़बूत है, जिसमें कई अलग-अलग पहलू शामिल हैं - सिर्फ़ बिज़नेस से जुड़े फ़ैसले ही नहीं, बल्कि आपसी रिश्ते, महत्वाकांक्षा और मुश्किलों का सामना करने का जज़्बा भी।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;"> हालाँकि, हर विचार या आइडिया परदे पर उतना असरदार नहीं लगता, जितना शायद कागज़ पर लगा होगा। शाह और सरभ जैसे दिग्गज कलाकारों के होने के बावजूद, कुछ पल ऐसे भी आते हैं जहाँ लगता है कि उन्हें और बेहतर ढंग से पेश किया जा सकता था। फिर भी, यह शो अपने सभी छह एपिसोड में लगातार दर्शकों को बांधे रखता है। यह आपको अपनी ओर खींचता रहता है - इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि आप यह जानने के लिए उत्सुक रहते हैं कि आगे क्या होने वाला है। इसकी कहानी कहने के अंदाज़ में एक तरह की ईमानदारी झलकती है, जो इसके पक्ष में काम करती है। इस ईमानदारी को और भी मज़बूती मिलती है शाह के शांत और नपे-तुले अंदाज़ से (JRD Tata के किरदार में), और सरभ के जोशीले और जुनूनी अंदाज़ से (Xerxes Desai के किरदार में)।</span></div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - कहानी का सारांश</b></div><div>इस सीरीज़ का मुख्य विषय Titan का सफ़र है - उसके शुरुआती दिनों से लेकर बाज़ार में एक बड़ा नाम बनने तक का सफ़र। नसीरुद्दीन शाह द्वारा निभाया गया किरदार JRD Tata, इस कहानी में एक स्थिर और मार्गदर्शक शक्ति के रूप में मौजूद रहते हैं; वहीं जिम सरभ द्वारा निभाया गया किरदार Xerxes Desai, एक ऐसे जोशीले और दूरदर्शी व्यक्ति के रूप में सामने आता है जो अक्सर ऐसे जोखिम भरे फ़ैसले लेता है, जो कंपनी को उसके भविष्य की ओर ले जाने में अहम भूमिका निभाते हैं।</div><div><br></div><div>सिर्फ़ उपलब्धियों की एक लंबी सूची गिनाने के बजाय, Made in India: A Titan Story उन लोगों पर रोशनी डालती है जिन्होंने इस ब्रांड को खड़ा करने में अपनी जान लगा दी। यह सीरीज़ सब कुछ दिखाती है: आपसी मतभेद, मन में उठने वाले सवाल, बड़ी-बड़ी असफलताएँ, छोटी-छोटी सफलताएँ और फिर मिलने वाली बड़ी जीत। इस कहानी का एक और अहम पहलू है JRD Tata और Xerxes Desai के बीच का गहरा रिश्ता।</div><div><br></div><div>इस शो की एक और भी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि यह उस दौर की 'आत्मा' को - उस समय के माहौल और मिज़ाज को - बहुत ही खूबसूरती से परदे पर उतारता है। उस ज़माने की सामाजिक और आर्थिक सच्चाइयों का इस कहानी में बहुत बड़ा योगदान है। आप यहाँ सिर्फ़ एक कंपनी को आगे बढ़ते हुए नहीं देख रहे हैं; आप उस माहौल को भी देख रहे हैं जिसमें वह ग्रोथ होनी थी। सबसे असरदार तरीकों में से एक है असल ज़िंदगी की फुटेज और पुरानी तस्वीरों का इस्तेमाल। ये चीज़ें कहानी को ज़्यादा असली बनाती हैं और कभी-कभी एक खास तरह का इमोशनल जुड़ाव भी पैदा करती हैं।</div><div><br></div><div>फिर भी, कहानी की रफ़्तार हमेशा एक जैसी नहीं रहती। कुछ हिस्से ऐसे हैं जहाँ सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं, जिससे कहानी धीमी पड़ जाती है। इससे शो पूरी तरह से खराब तो नहीं होता, लेकिन आपको यह महसूस ज़रूर होता है। इसके बावजूद, पूरी कहानी इतनी दिलचस्प बनी रहती है कि आप उसमें खोए रहते हैं।</div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - लेखन और निर्देशन</b></div><div>लेखन में साफ़ तौर पर मेहनत और रिसर्च दिखाई देती है। डायलॉग ज़्यादातर सधे हुए हैं, जो उस टोन के हिसाब से बिल्कुल सही बैठते हैं जो यह सीरीज़ अपनाना चाहती है। इसमें बेवजह का ड्रामा बहुत कम है, और इमोशनल पलों को काफ़ी संजीदगी से दिखाया गया है।</div><div><br></div><div>जहाँ यह थोड़ी कमज़ोर पड़ती है, वह है इसका एग्ज़ीक्यूशन। कुछ आइडिया जो सुनने में तो बहुत दमदार लगते हैं, वे स्क्रीन पर आते ही उतना असरदार नहीं रह जाते। कभी-कभी कहानी का बहाव थोड़ा टूटा-टूटा सा लगता है, जिसकी मुख्य वजह है बारीक जानकारियों और ड्रामा के बीच सही तालमेल बिठाने की कोशिश।</div><div><br></div><div>जहाँ तक निर्देशन की बात है, तो इसमें कई दिलचस्प बातें देखने को मिलती हैं। सबसे पहले, आपको कई बेहतरीन क्लोज़-अप शॉट्स देखने को मिलेंगे, खासकर उन सीन्स में जहाँ इमोशंस हावी होते हैं। दर्शकों के लिए किरदारों की बातें सुनने के बजाय उनके चेहरों के हाव-भाव पर ध्यान देना ज़्यादा दिलचस्प होता है।</div><div><br></div><div>समय के गुज़रने को जिस तरह से दिखाया गया है, उसके लिए भी मेकर्स की तारीफ़ होनी चाहिए। किरदारों की बढ़ती उम्र और अलग-अलग एपिसोड्स के माहौल में आने वाले बदलावों को आप साफ़ तौर पर महसूस कर पाते हैं, और यह सब काफ़ी असली लगता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>Made in India: A Titan Story - संगीत और तकनीकी पहलू</b></div><div>तकनीकी तौर पर, यह सीरीज़ काफ़ी मज़बूत है। पुरानी फुटेज और तस्वीरों का इस्तेमाल इसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक है। यह कहानी को ज़्यादा विश्वसनीय बनाता है, और उससे भी बढ़कर, यह शो में एक खास तरह की गर्माहट और पुरानी यादों का एहसास जगाता है।</div><div><br></div><div>पुराने मुंबई, तमिलनाडु और बैंगलोर को जिस तरह से दोबारा रचा गया है, वह भी तारीफ़ के काबिल है। इन जगहों को बनाने और दिखाने में बारीकियों पर साफ़ तौर पर ध्यान दिया गया है। ये जगहें किसी बनावटी सेट की तरह नहीं, बल्कि असल ज़िंदगी की तरह लगती हैं, और यही बात इसे खास बनाती है।</div><div><br></div><div>पुराने हिंदी और तमिल गानों का इस्तेमाल करना भी एक बेहतरीन आइडिया है। इन गानों को बस यूँ ही कहानी में नहीं डाल दिया गया है; बल्कि कहानी में इनका एक खास मकसद है। कभी-कभी ये गाने चुपके से किसी सीन को और भी ज़्यादा असरदार बना देते हैं, और बिना खुद पर ज़्यादा ध्यान खींचे, सीन में इमोशनल गहराई भर देते हैं। ये उस समय के दौर को और मज़बूत बनाने में भी मदद करते हैं, और जैसे-जैसे सीरीज़ आगे बढ़ती है, उसे थोड़ा पुराना और 'जीया हुआ' सा एहसास देते हैं।</div><div><br></div><div>बैकग्राउंड स्कोर ज़्यादातर बैकग्राउंड में ही रहता है, जो कि अच्छा काम करता है। यह कहानी को बिना खुद को अलग से दिखाने की कोशिश किए, सहारा देता है। हो सकता है कि शो खत्म होने के बाद आपको यह याद न रहे, लेकिन यह अपना काम बखूबी करता है।</div><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - एक्टिंग</b></div><div>Made in India: A Titan Story की सबसे मज़बूत चीज़ों में से एक है इसकी एक्टिंग। नसीरुद्दीन शाह ने JRD Tata के किरदार में एक शांत लेकिन दमदार असर डाला है। उनकी एक्टिंग में संयम है, लेकिन वह बहुत असरदार है। उन्होंने किसी भी चीज़ को बढ़ा-चढ़ाकर पेश नहीं किया है, और यह बात उनके किरदार के लिए एकदम सही बैठती है।</div><div><br></div><div>ज़र्क्सिस देसाई के किरदार में जिम सरभ भी उतने ही शानदार लगे हैं, हालांकि उनका अंदाज़ बिल्कुल अलग है। उनकी एक्टिंग में एक ऐसी तीव्रता है जो उन्हें सबसे अलग बनाती है। वह कहानी में जान डाल देते हैं, खासकर उन जगहों पर जहाँ जोश और पक्के इरादे की ज़रूरत होती है।</div><div><br></div><div>सहायक कलाकारों ने भी अपना किरदार बखूबी निभाया है। वैभव तत्ववादी, कावेरी सेठ और लक्षवीर सिंह सरन, और उनके साथ Titan के संस्थापक सदस्यों का किरदार निभाने वाले दूसरे कलाकारों ने कहानी में जान डाल दी है। वे टीम को बिल्कुल असली, लगभग एक परिवार जैसा दिखाते हैं, जो इस तरह के शो के लिए बहुत ज़रूरी है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/shilpa-shinde-confession-sexual-harassment-case-against-bhabiji-ghar-par-hain-producer-false" target="_blank">'भाबीजी घर पर हैं' फेम Shilpa Shinde का बड़ा कबूलनामा! बोलीं- 'प्रोड्यूसर पर किया सेक्सुअल हैरेसमेंट का केस झूठा था'</a></h3><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - कमज़ोर पहलू</b></div><div>अपनी तमाम खूबियों के बावजूद, यह सीरीज़ कुछ जगहों पर लड़खड़ाती है, खासकर आखिर में।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">पाँचवें और छठे एपिसोड कुछ ज़्यादा ही जल्दबाज़ी में निपटाए गए लगते हैं। यह वह जगह थी जहाँ शो को थोड़ा धीमा होना चाहिए था और कहानी के नतीजे को ठीक से उभरने देना चाहिए था, लेकिन इसके बजाय, यह बहुत तेज़ी से आगे बढ़ जाता है। कहानी को बनाने में इतना समय लगाने के बाद, उसका अंत थोड़ा अचानक सा लगता है।</span></div><div><br></div><div>एक दर्शक के तौर पर, आप जीत के उस पल को जी भर के महसूस करना चाहते हैं, उसे पूरी तरह से अपने अंदर उतारना चाहते हैं। यह सीरीज़ आपको ऐसा करने का पूरा मौका नहीं देती, और यहीं पर यह सबसे ज़्यादा निराश करती है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा भी कुछ छोटी-मोटी कमियाँ हैं। कुछ दृश्यों को छोटा किया जा सकता था, और कुछ जगहों पर—खासकर देसाई के फैसलों के मामले में—उनके पीछे की सोच के बारे में थोड़ी और जानकारी दी जाती तो बेहतर होता। कभी-कभी उनके फैसले सिर्फ़ जोखिम उठाने वाले लगते हैं, जिनके पीछे कोई ठोस वजह नहीं बताई गई होती।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/manoj-bajpayees-film-governor-reveals-no-one-knows-those-who-save-the-country-from-crisis" target="_blank">Manoj Bajpayee की Film 'Governor' खोलेगी राज, बोले- देश को संकट से उबारने वालों को कोई नहीं जानता</a></h3><div><br></div><div><b>Made in India: A Titan Story - फ़ैसला</b></div><div>Made in India: A Titan Story एक ज़रूरी कहानी को बताने की एक सच्ची कोशिश है, और ज़्यादातर मामलों में यह सफल भी रही है। हो सकता है कि यह हर पैमाने पर खरी न उतरे, लेकिन यह इतना तो ज़रूर करती है कि इसकी छाप आपके मन पर बनी रहे।</div><div><br></div><div>इसकी सबसे बड़ी खूबी इसका मकसद है। यह आपको याद दिलाती है कि भारतीय प्रतिभा और लगन क्या कुछ हासिल कर सकती है। यह उन इंजीनियरों, नेताओं और विचारकों पर रोशनी डालती है जिन्होंने अपने विचारों पर तब भी भरोसा बनाए रखा, जब दूसरे उन पर शक कर रहे थे। जिस तरह से यह दिखाता है कि टीमें कैसे एक साथ आती हैं, आइडिया को हकीकत में बदलती हैं, और लोगों को गलत साबित करती हैं, उसमें कुछ ऐसा है जो चुपचाप मन को सुकून देता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हाँ, इसकी गति थोड़ी और कसी हुई हो सकती थी, और इसके अंत को थोड़ा और समय मिलना चाहिए था। लेकिन इसमें कलाकारों का अभिनय, इसकी कहानी का मूल, और पूरी सीरीज़ की ईमानदारी इसे देखने लायक बनाती है।</span></div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, 'मेड इन इंडिया: ए टाइटन स्टोरी' को 5 में से 3 स्टार मिलते हैं।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 13:52:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/made-in-india-a-titan-story-review-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Obsession का जलवा! 7 करोड़ की हॉरर फ़िल्म ने बॉलीवुड की सबसे बड़ी समस्या उजागर कर दी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-power-of-obsession-a-7-crore-horror-film-exposes-bollywood-biggest-problem]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">ऐसे समय में जब दुनिया भर के स्टूडियो बड़े-बड़े विज़ुअल तमाशों, फ़्रैंचाइज़ी यूनिवर्स और भारी-भरकम बजट वाली ब्लॉकबस्टर फ़िल्मों पर अरबों रुपये का दांव लगा रहे हैं, हॉलीवुड की एक ताज़ा सफलता की कहानी ने सबको हैरान कर दिया है। यह कहानी किसी बड़े स्टूडियो या नामचीन डायरेक्टर की नहीं, बल्कि एक छोटी सी इंडी हॉरर फ़िल्म की है, जिसे 26 साल के एक YouTuber ने बनाया है – Obsession. इस नन्ही सी फ़िल्म ने न केवल बॉक्स ऑफ़िस पर तहलका मचाया है, बल्कि भारतीय सिनेमा (बॉलीवुड) के मौजूदा संकट और उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी को भी दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया है।</span></div><div><br></div><div><b>7 करोड़ की हॉरर फ़िल्म जिसने हॉलीवुड को चौंका दिया</b></div><div>करी बार्कर के निर्देशन में बनी और माइकल जॉनस्टन व इंडे नवरेट के शानदार अभिनय से सजी फ़िल्म Obsession का बजट कथित तौर पर सिर्फ़ $750,000 से $1 मिलियन (लगभग 6–8 करोड़ रुपये) था। रिलीज़ के महज़ दो हफ़्तों के अंदर इस फ़िल्म ने दुनिया भर में लगभग $80 मिलियन कमा लिए और अब यह $100 मिलियन (लगभग 830–850 करोड़ रुपये) के जादुई आंकड़े को छूने की तैयारी में है।</div><div><br></div><div>ROI (निवेश पर रिटर्न) का गणित: इसका सीधा मतलब यह है कि फ़िल्म ने अपनी प्रोडक्शन लागत का लगभग 80 से 100 गुना मुनाफ़ा कमाया है। आज के कॉर्पोरेट सिनेमाई कारोबार में इस तरह के रिटर्न (ROI) के बारे में शायद ही कभी सुना जाता है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि Obsession किसी स्थापित सिनेमाई यूनिवर्स, वीएफएक्स (VFX) के तमाशे, पुरानी यादों (Nostalgia) या किसी बड़े सुपरस्टार के चेहरे पर निर्भर नहीं थी। इसने दर्शकों को सिर्फ़ एक चीज़ बेची: एक दमदार आइडिया और खौफ का नया अनुभव। और यहीं से बॉलीवुड के लिए एक बड़ा सबक शुरू होता है।</div><div><br></div><div><b>"बड़ा करो या घर जाओ" — बॉलीवुड का बढ़ता संकट</b></div><div>आज का हिंदी सिनेमा पूरी तरह से "Go big or go home" (या तो बहुत बड़ा करो, या फिर मैदान छोड़ दो) की सोच पर चल रहा है। मध्यम बजट वाली फ़िल्में (Medium-budget films), जो कभी इस इंडस्ट्री की असली रीढ़ हुआ करती थीं, आज पूरी तरह गायब होने की कगार पर हैं। आज बॉलीवुड में फ़िल्में या तो सैकड़ों करोड़ की लागत से बड़े-बड़े सिनेमाई "इवेंट" के तौर पर बनाई जा रही हैं, या फिर उन्हें चुपचाप बिना किसी शोर-शराबे के स्ट्रीमिंग प्लेटफ़ॉर्म (OTT) पर डाल दिया जाता है।</div><div><br></div><div><b>गायब होता 'मिडिल' और पुरानी यादें</b></div><div>एक ज़माना था जब बॉलीवुड इसी मध्यम दायरे में Kahaani, Queen, Vicky Donor, Andhadhun, Tumbbad और मूल फ़िल्म Stree जैसी फ़िल्मों के दम पर खूब फलता-फूलता था। इन फ़िल्मों ने साबित किया था कि मज़बूत कॉन्सेप्ट और सीमित बजट के सहारे भी थिएटर में इतिहास रचा जा सकता है। लेकिन आज स्थिति बदल चुकी है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, Bhooth Bangla को ही लें, जिसका बजट कथित तौर पर 100 करोड़ रुपये से ज़्यादा था; या Mardaani को, जिसके बारे में कहा जाता है कि उस पर 80 से 100 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। हाल ही में आई Pati Patni Aur Woh Do, जिसका अनुमानित बजट 45–60 करोड़ रुपये था, बॉक्स ऑफ़िस पर अपनी लागत भी मुश्किल से निकाल पाई। चूँकि इनमें से कई फ़िल्में अपनी लागत भी नहीं निकाल पातीं, इसलिए उनके बढ़ते बजट के पीछे की वजह पर इंडस्ट्री के अंदर लगातार सवाल उठते रहते हैं। हॉलीवुड की बड़ी फ़िल्मों के साथ भी ऐसी ही तुलना की जा सकती है। क्योंकि जहाँ एक तरफ़ ग्लोबल ब्लॉकबस्टर फ़िल्में अभी भी ज़बरदस्त कमाई कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ़ उनके बजट इतने ज़्यादा बढ़ गए हैं कि उनकी मुनाफ़े की दरें (profit margins) तुलना में काफ़ी कम नज़र आती हैं।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, Michael को ही लें, जो इस साल हॉलीवुड की सबसे बड़ी फ़िल्मों में से एक है। इस फ़िल्म ने दुनिया भर में लगभग 788 मिलियन डॉलर (लगभग 6,550 करोड़ रुपये) कमाए हैं। लेकिन इसके कथित बजट (लगभग 155 मिलियन डॉलर या 1,290 करोड़ रुपये) के मुकाबले, फ़िल्म का रिटर्न इस समय इसके प्रोडक्शन खर्च का लगभग पाँच गुना है। इसी तरह, 'प्रोजेक्ट हेल मेरी', जिसे एक बड़े पैमाने के साइंस-फिक्शन तमाशे के तौर पर बनाया गया था, ने दुनिया भर में लगभग $675 मिलियन (मोटे तौर पर 5,600 करोड़ रुपये) कमाए हैं। लेकिन $200 मिलियन (लगभग 1,660 करोड़ रुपये) से ज़्यादा के अनुमानित बजट के साथ, इसका रिटर्न इसकी लागत का लगभग तीन गुना रहा।</div><div><br></div><div>यहीं पर 'ऑब्सेशन' एक बहुत ही ज़बरदस्त केस स्टडी बन जाती है</div><div>खबरों के मुताबिक, इस फ़िल्म की शूटिंग एक महीने से भी कम समय में पूरी हो गई थी। इसमें कोई बड़ा स्टार नहीं था। कोई फ़्रैंचाइज़ी का बोझ नहीं था। कोई "पैन-वर्ल्ड" पोज़िशनिंग नहीं थी। फिर भी, दर्शक बड़ी संख्या में इसे देखने आए, क्योंकि लोगों की ज़ुबानी तारीफ़ ही इसकी मार्केटिंग का इंजन बन गई थी। असल में, खबरों के मुताबिक, फ़िल्म ने अपने दूसरे वीकेंड में लगभग 39% की बढ़त हासिल की, जो आज के बॉक्स ऑफ़िस के माहौल में एक बहुत ही दुर्लभ बात है।</div><div><br></div><div><b>ब्लमहाउस मॉडल और कम जोखिम वाली कहानी कहने की ताकत</b></div><div>हॉलीवुड की हॉरर फ़िल्मों की दुनिया इस मॉडल को सालों से समझती आ रही है। ब्लमहाउस प्रोडक्शंस जैसे स्टूडियो ने अपना पूरा बिज़नेस प्लान ही सीमित बजट और बड़े आइडिया वाली कहानियों के इर्द-गिर्द बनाया है। 'पैरानॉर्मल एक्टिविटी' (2007), जो लगभग $15,000 (करीब 12 लाख रुपये) में बनी थी, उसने सालों में दुनिया भर में लगभग $194 मिलियन (1610 करोड़ रुपये) की कमाई की। जॉर्डन पील की 'गेट आउट' (2017) ने महज़ $4.5 मिलियन (लगभग 37 करोड़ रुपये) के बजट पर दुनिया भर में $255 मिलियन (करीब 2,120 करोड़ रुपये) से ज़्यादा कमाए। इसमें जोखिम और मुनाफ़े का अनुपात बुनियादी तौर पर ज़्यादा सुरक्षित होता है।</div><div><br></div><div><b>इसका फ़ॉर्मूला बेहद आसान है: कम जोखिम, ज़्यादा प्रयोग, ज़बरदस्त मुनाफ़ा</b></div><div>वहीं, बॉलीवुड का रवैया अब ऐसा होता जा रहा है, जैसे हर शुक्रवार रिलीज़ होने वाली फ़िल्म एक राष्ट्रीय तमाशा होनी चाहिए। इस बदलाव की एक वजह इंडस्ट्री की पूरे भारत और पूरी दुनिया में फैलने की बढ़ती महत्वाकांक्षाएँ भी हैं। एक्टर, स्टूडियो और फ़िल्ममेकर अब ऐसी फ़िल्में बना रहे हैं जो अलग-अलग भाषाओं और अंतरराष्ट्रीय बाज़ारों में ज़्यादा दर्शकों तक पहुँच सकें; रचनात्मक नज़रिए से यह भारतीय सिनेमा के लिए एक रोमांचक बदलाव है। लेकिन इन महत्वाकांक्षाओं की वजह से फ़िल्मों का बजट भी तेज़ी से बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>उदाहरण के लिए, 'टॉक्सिक' या 'रामायण' को ही ले लीजिए। ख़बरों के मुताबिक, यश की फ़िल्म और रणबीर कपूर-साई पल्लवी की फ़िल्म को इस पैमाने पर बनाया जा रहा है कि वे दुनिया भर के दर्शकों को पसंद आएँ; इनमें ज़बरदस्त एक्शन, अंतरराष्ट्रीय तकनीशियन और कई भाषाओं में रिलीज़ करने की योजना शामिल है। यह महत्वाकांक्षा यकीनन रोमांचक है। भारतीय सिनेमा का दुनिया भर में ज़्यादा दर्शकों तक पहुँचना एक सकारात्मक बात है।</div><div><br></div><div>चुनौती यह है कि जब फ़िल्मों को दुनिया भर के लिए "बड़े इवेंट" के तौर पर बनाया जाता है, तो उनका बजट तेज़ी से बढ़ने लगता है, और इसके साथ ही फ़िल्म की लागत वसूलने का भारी दबाव भी आ जाता है। और यह तरीका लंबे समय तक नहीं चल सकता।</div><div><br></div><div>क्योंकि कोई भी इंडस्ट्री सिर्फ़ "टेंटपोल" (बड़े बजट की मुख्य फ़िल्मों) के सहारे ज़िंदा नहीं रह सकती। टेंटपोल फ़िल्में सुर्खियाँ तो बटोरती हैं, लेकिन मध्यम बजट की फ़िल्में ही इंडस्ट्री के पूरे माहौल को बनाए रखती हैं। ये फ़िल्में नए लेखकों, युवा निर्देशकों, नए तरह की कहानियों और नए सितारों के लिए जगह बनाती हैं। साथ ही, ये दर्शकों को अलग-अलग तरह की फ़िल्में देखने का मौका देती हैं—एक ऐसी चीज़ जिसकी आज के हिंदी सिनेमा में लगातार कमी महसूस हो रही है।</div><div><br></div><div>मज़े की बात यह है कि बॉलीवुड की हाल की कुछ सफल कहानियों में से एक ऐसी ही शैली से आई है, जिसने ठीक इसी संतुलन को अपनाया है: हॉरर-कॉमेडी। मैडॉक फ़िल्म्स की बढ़ती हुई हॉरर फ़िल्मों की दुनिया इसलिए सफल नहीं हुई कि उसने सुपरहीरो फ़िल्मों की तरह बड़े पैमाने पर बनने की होड़ लगाई, बल्कि इसलिए सफल हुई क्योंकि उसने अपनी जड़ों से जुड़ी कहानियों और अपनी शैली की पहचान पर भरोसा किया। वह बीच की जगह ही शायद वह जगह है जहाँ बॉलीवुड का पुनरुद्धार फिर से हो सकता है।</div><div><br></div><div>क्योंकि अभी, हॉलीवुड की 7 करोड़ रुपये की एक हॉरर फ़िल्म एक ऐसी कड़वी सच्चाई सामने ला रही है: दर्शक आज भी स्टूडियो की सोच से कहीं ज़्यादा, फ़िल्म में कुछ नयापन, माहौल और कहानी कहने के तरीके को अहमियत देते हैं।</div><div><br></div><div>हर फ़िल्म पर 500 करोड़ रुपये खर्च करना ज़रूरी नहीं है। हर शुक्रवार को किसी 'सिनेमैटिक यूनिवर्स' की ज़रूरत नहीं होती। और हर फ़िल्मी अनुभव को जान-बूझकर एक 'पैन-इंडिया इवेंट' की तरह पेश करना भी ज़रूरी नहीं है।</div><div><br></div><div>कभी-कभी, बस एक ज़बरदस्त आइडिया ही काफ़ी होता है। और 2026 में, वह आइडिया एक YouTuber की बनाई छोटी सी हॉरर फ़िल्म से आया,&nbsp; करी बार्कर।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
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      <pubDate>Sat, 30 May 2026 13:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-power-of-obsession-a-7-crore-horror-film-exposes-bollywood-biggest-problem</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[The Great Grand Superhero Review | बचपन की मासूमियत और पुरानी यादें ताजा करती है जैकी श्रॉफ की यह प्यारी और मजेदार फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-great-grand-superhero-review-it-rekindles-innocence-of-childhood-brings-back-old-memories]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज सिनेमाघरों में रिलीज हुई मनीष सैनी के निर्देशन में बनी फिल्म 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो – एलियंस का आगमन' एक ऐसी दुनिया में ले जाती है, जिसे आज का बॉलीवुड लगभग भूल ही चुका है। हिंसा, डार्क यूनिवर्स और लाउड एक्शन फिल्मों के इस दौर में, यह फिल्म याद दिलाती है कि बच्चों के लिए भी उनके हिसाब से शुद्ध और मासूम मनोरंजन वाली फिल्में बननी चाहिए। एलियंस, सुपरहीरो और स्कूली बच्चों की कल्पना पर आधारित यह फिल्म थोड़ी अटपटी और बिखरी हुई जरूर है, लेकिन इसका दिल पूरी तरह से हिंदुस्तानी और पुराने जमाने जैसा प्यारा है।</div><div><br></div><h2>क्या है फिल्म की कहानी?</h2><div>फिल्म की कहानी 11 साल के एक लड़के, दीपू (मिहिर गोडबोले) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो एक नए शहर में रहने आता है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">अपने नए क्लासमेट्स को इंप्रेस करने की होड़ में दीपू एक मनगढ़ंत कहानी सुना देता है कि उसके दादा (जैकी श्रॉफ) असल में एक सीक्रेट सुपरहीरो हैं, जो एलियंस के हमले को रोकने की तैयारी कर रहे हैं।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">बचपन की एक आम शेखी के रूप में शुरू हुई यह बात तब रोमांचक मोड़ लेती है, जब चमकीली पोशाकों में दो दिलचस्प किरदार (सहरश शुक्ला और कुमार सौरभ) एंट्री मारते हैं और बच्चों की इस काल्पनिक कहानी को सच में बदल देते हैं। इसके बाद बच्चे पूरी तरह 'मिशन मोड' में आ जाते हैं।</span></div><div><br></div><h2>'दादा-सुपरहीरो' के रूप में छा गए जैकी श्रॉफ</h2><div>यह कोई मार्वल (Marvel) स्टाइल की वीएफएक्स-हैवी फिल्म नहीं है और न ही 'कृष' जैसी स्टाइलिश उड़ने वाली फिल्म है; बल्कि यह अपने देसी और कॉमिक-बुक वाले अंदाज में सबसे ज्यादा निखरती है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">&nbsp;फिल्म में जैकी श्रॉफ एक प्यारे और उम्रदराज दादा के रोल में हैं, जो एक तरफ तो दुनिया बचाने का दावा करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ जब एक मामूली छिपकली को देखकर बुरी तरह डर जाते हैं, तो उनका सारा 'सुपरहीरो' वाला रौब पल भर में हवा हो जाता है। जैकी ने इस किरदार को भारी-भरकम उपदेश देने वाले बुजुर्ग के बजाय बेहद जिंदादिल, रहस्यमयी और मजेदार बनाया है।</span></div><div><br></div><h2>स्टार परफॉर्मेंस और मुख्य आकर्षण</h2><div><b>सशक्त बाल कलाकार: </b>दीपू के लीड रोल में मिहिर गोडबोले ने गजब का आत्मविश्वास दिखाया है। वहीं उनके दोस्तों के रूप में शिवंश चोरगे और जिहान होदार की खेल के मैदान वाली स्वाभाविक केमिस्ट्री और मासूमियत दिल जीत लेती है।</div><div><br></div><div><b>शानदार सपोर्टिंग कास्ट: </b>प्रतीक स्मिता पाटिल ने एलियन के किरदार को सामान्य कैरिकेचर बनाने के बजाय उसमें रहस्य और आकर्षण का बेहतरीन तड़का लगाया है। भाग्यश्री पटवर्धन का कैमियो और 'भारत माता की जय' वाला दृश्य फिल्म के ड्रामे को और रोमांचक बनाता है। वहीं दुर्गेश कुमार का बेतुका किरदार भी फिल्म के माहौल में सहजता से फिट बैठता है।</div><div><br></div><div>साफ़-साफ़ कहें तो, यह कोई 'मार्वल' स्टाइल की शानदार फ़िल्म नहीं है जो दुनिया भर की बड़ी फ़िल्मों से मुक़ाबला करने की कोशिश कर रही हो, और न ही यह 'कृष' जैसी कोई फ़िल्म है जिसमें हीरो स्टाइलिश उड़ने वाली पोशाक पहनता हो। असल में, यह फ़िल्म तब सबसे अच्छी लगती है जब यह अपने देसी, थोड़े कच्चे-पक्के और कॉमिक-बुक वाले अंदाज़ को पूरी तरह से अपना लेती है। एलियंस काफ़ी नाटकीय हैं, हालात थोड़े अजीबोगरीब हैं और बच्चे हर समय 'मिशन मोड' में रहते हैं। कई लोगों को यह फ़िल्म थोड़ी मज़ाकिया या पैरोडी जैसी भी लग सकती है, लेकिन जिस ईमानदारी से इसकी कहानी कही गई है, उसकी वजह से 'द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो' दर्शकों के दिलों को छूने में कामयाब रहती है।</div><div><br></div><div>और फिर, फ़िल्म में जैकी श्रॉफ की एंट्री होती है। वह एक प्यारे और उम्रदराज़ दादा के किरदार में नज़र आते हैं, जो या तो दुनिया को बचा सकते हैं या फिर आपको उनके खोए हुए चश्मे को ढूंढने पर मजबूर कर सकते हैं। फ़िल्म के सबसे प्यारे और मज़ेदार पलों में से एक वह है, जब पोते का बताया हुआ यह 'निडर' दादा एक छिपकली को देखकर बुरी तरह डर जाता है, और इस तरह उसका 'सुपरहीरो' वाला रौब पल भर में ही हवा हो जाता है।</div><div><br></div><div>यह साफ़ ज़ाहिर है कि जैकी इस फ़िल्म को करते हुए काफ़ी मज़े कर रहे हैं, और इसी वजह से उन्हें देखना और भी ज़्यादा मनोरंजक हो जाता है। किसी फ़िल्म में हीरो को ज़िंदगी के सबक सिखाने वाले किसी दूसरे गंभीर बुज़ुर्ग का किरदार निभाने के बजाय, उन्हें एक 'दादा-सुपरहीरो' के रूप में देखना अपने आप में एक बेहद प्यारा अनुभव है। वह अपने अभिनय में गर्माहट, हास्य और थोड़ा सा रहस्य लेकर आते हैं, जिससे बच्चे - और सच कहूँ तो, दर्शक भी - यह मानने लगते हैं कि शायद यह आदमी सचमुच रात के खाने के बाद एलियंस से लड़ता है।</div><div><br></div><div>यह फिल्म बचपन की एक आम याद को भी चतुराई से छूती है: दादा-दादी द्वारा सुनाई गई हर मनगढ़ंत कहानी पर विश्वास करना। चाहे भूत हों, छिपे हुए खजाने हों, गुप्त शक्तियाँ हों या असंभव रोमांच, दादा-दादी हमेशा से ही कहानी सुनाने में माहिर रहे हैं। द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो इसी विचार के इर्द-गिर्द अपनी पूरी भावनात्मक बुनावट करता है, और यहीं से यह फिल्म सिर्फ एक मनोरंजक बच्चों की फिल्म से कहीं अधिक बन जाती है।</div><div><br></div><div>युवा कलाकारों की सराहना करनी चाहिए क्योंकि फिल्म की ऊर्जा काफी हद तक उनके द्वारा पूरी ईमानदारी से पागलपन को निभाने पर निर्भर करती है। मिहिर गोडबोले पूरी लगन और आत्मविश्वास के साथ फिल्म का नेतृत्व करते हैं, जबकि उनके दोस्तों के रूप में शिवंश चोरगे और जिहान होदार रोमांच वाले दृश्यों में एक अद्भुत मासूमियत और खेल के मैदान जैसी ऊर्जा भर देते हैं। उनकी केमिस्ट्री स्वाभाविक, जोशीली और बेहद बेपरवाह लगती है, खासकर उन पलों में जब उन्हें लगता है कि वे किसी भयानक एलियन हमले के बीच में हैं।</div><div><br></div><div>प्रतीक स्मिता पाटिल ने भी अराजकता के केंद्र में मौजूद एलियन किरदार के रूप में अपनी छाप छोड़ी है, और इसे एक सामान्य साइंस फिक्शन कैरिकेचर में बदलने के बजाय इसमें रहस्य और आकर्षण का संगम पैदा किया है। भाग्यश्री पटवर्धन की दमदार कैमियो और 'भारत माता की जय' का दृश्य अंतर-ग्रहीय ड्रामा को और भी रोमांचक बनाते हैं, जबकि दुर्गेश कुमार का बेतुका किरदार फिल्म के विलक्षण छोटे ब्रह्मांड में सहजता से समा जाता है।</div><div><br></div><div>फिल्म की एक और खासियत यह है कि यह शिक्षाप्रद, प्रेरणादायक या भावुक होने का प्रयास नहीं करती। यह बस बच्चों, कल्पना, दोस्ती और एक अनिच्छुक लेकिन साहसी दादाजी की एक मनोरंजक कहानी सुनाना चाहती है। और ऐसे उद्योग में जो आजकल हिंसा, अंधकारमय ब्रह्मांडों और अति-पुरुषवादी नायकों के प्रति आसक्त है, एलियंस, बचपन की उथल-पुथल और दादाजी की ऊर्जा से भरपूर यह फिल्म वाकई ताजगी का एहसास कराती है।</div><div><br></div><div>बेशक, फिल्म त्रुटिहीन नहीं है। दो घंटे से कम की अवधि के बावजूद, कुछ हिस्से खिंचे हुए से लगते हैं। भाव-भंगिमा में बदलाव भी कभी-कभी अनियमित हो जाते हैं, और सुगठित विज्ञान कथा की तलाश करने वाले वयस्क दर्शक शायद कभी-कभी अपने फोन में उलझकर बेचैन हो जाएं। साथ ही, परग्रही आक्रमण की ऊर्जा से पर्यावरण संरक्षण मिशन की ओर क्षणिक बदलाव भी कई लोगों को निराश कर सकता है।</div><div><br></div><div>हालांकि, द ग्रेट ग्रैंड सुपरहीरो की सबसे बड़ी खूबी है इसका अद्भुत अनुभव। यह समझता है कि बच्चों को हमेशा परफ़ेक्शन की ज़रूरत नहीं होती; कभी-कभी उन्हें बस एक ऐसी कहानी चाहिए होती है, जो उन्हें यह यकीन दिला सके कि उनके आस-पास भी कुछ जादुई चीज़ें हो सकती हैं। शायद उनके स्कूल में, शायद उनके मोहल्ले में, या शायद उनके अपने ही घर में। या शायद उनके दादाजी में। और इसी तरह सिनेमा जादू रचता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 15:36:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-great-grand-superhero-review-it-rekindles-innocence-of-childhood-brings-back-old-memories</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Aakhri Sawal Movie Review | संजय दत्त और नमाशी चक्रवर्ती के बीच इतिहास और RSS पर तथ्यों से भरी कड़क बहस]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aakhri-sawal-movie-review-history-and-the-rss-between-sanjay-dutt-and-namashi-chakraborty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग की नई फिल्म 'आखिरी सवाल' सिनेमाघरों में दस्तक दे चुकी है। यह फिल्म महज मनोरंजन नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास, राजनीति और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के इर्द-गिर्द बुनी गई एक वैचारिक और तथ्यों से भरी बहस (Debate Drama) है। फिल्म दिखावे की सोशल मीडिया वाली नकली दुनिया और देश की जमीनी हकीकत के बीच के अंतर को बेहद संजीदगी से उजागर करती है। हाल ही में 100 साल पूरे कर चुके संगठन RSS के उन पहलुओं और योगदानों को यह फिल्म सामने लाती है, जिनसे आम जनता अनजान है।</div><div><br></div><div><b>क्या है 'आखिरी सवाल' की कहानी?</b></div><div>फिल्म की कहानी घूमती है एक बेहद होनहार, बुद्धिमान लेकिन गुस्सैल युवक विक्की हेगड़े (नमाशी चक्रवर्ती) के इर्द-गिर्द। विक्की ने RSS पर एक थीसिस लिखी है, जिसे कॉलेज द्वारा खारिज कर दिया जाता है। इस बात से नाराज होकर विक्की अपने ही सम्मानित गुरु प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी (संजय दत्त) पर संस्थागत पक्षपात (Institutional Bias) का आरोप लगा देता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/actress-meenakshi-seshadri-returns-to-mumbai-seeks-impactful-roles" target="_blank">बॉलीवुड में फिर कदम रखेंगी 'दामिनी' फेम Meenakshi Seshadri, 62 की उम्र में फिल्मों और ओटीटी के लिए तलाश रहीं प्रभावशाली भूमिकाएं</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div>अकादमिक स्तर पर शुरू हुआ यह विवाद धीरे-धीरे एक बड़ा राष्ट्रीय मुद्दा बन जाता है और आखिरकार एक हाई-वोल्टेज लाइव टीवी डिबेट का रूप ले लेता है। इस बहस के जरिए डायरेक्टर अभिजीत मोहन वारंग और लेखक उत्कर्ष नैथानी ने देश के कई बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक मुद्दों को छुआ है, जिनमें शामिल हैं:</div><div><br></div><div>महात्मा गांधी की हत्या और उससे जुड़े तथ्य।</div><div>आपातकाल (Emergency) के काले दौर में RSS की भूमिका।</div><div>बाबरी मस्जिद विध्वंस का घटनाक्रम।</div><div>सुनामी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में संगठन का राहत कार्य।</div><div>केरल में एक संघ कार्यकर्ता की दुखद मौत का संवेदनशील मुद्दा।</div><div><br></div><div>फिल्म में प्रोफेसर नाडकर्णी के जरिए यह नैरेटिव सेट किया गया है कि संगठन का मूल उद्देश्य जाति, पंथ और वर्ग के भेदभाव को मिटाकर हिंदू समाज को एकजुट करना और नागरिकों में सांस्कृतिक गौरव जगाना है।</div><div><br></div><div><b>उत्कर्ष नैथानी के दमदार डायलॉग्स ने मारी बाजी</b></div><div>इस फिल्म की असली जान इसकी कसी हुई स्क्रिप्ट और कड़क डायलॉग्स हैं। लेखक उत्कर्ष नैथानी ने RSS के प्रति समाज में बनी धारणाओं और जमीनी सच्चाई दोनों पक्षों को बहुत ही तार्किक और विश्वसनीय तरीके से आमने-सामने रखा है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/mistreating-deepika-padukone-is-impossible-in-this-lifetime-imtiaz-ali-clarifies" target="_blank">'Deepika Padukone के साथ बुरा बर्ताव इस जन्म में मुमकिन नहीं', 'कॉकटेल' विवाद पर Imtiaz Ali ने दी सफाई</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div>यह फिल्म सिर्फ राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहती, बल्कि हिंदू धर्म और इस्लाम दोनों के ही धार्मिक और ऐतिहासिक तथ्यों की गहराई में उतरती है। संवादों के जरिए दर्शकों को कुछ ऐसी अनोखी जानकारियां मिलती हैं, जैसे:</div><div><br></div><div><b>नटराज की मूर्ति के नीचे दबी बच्चे जैसी आकृति (अपस्मार पुरुष) का आध्यात्मिक महत्व क्या है?</b></div><div><b><br></b></div><div><b>इस्लामी ग्रंथों और शरिया के अनुसार मस्जिद बनाने के लिए कौन सी अनिवार्य शर्तें तय की गई हैं?</b></div><div><br></div><div>तकनीक का मास्टरस्ट्रोक: अतीत को दिखाने के लिए AI का बेहतरीन इस्तेमाल</div><div>फिल्म की एक और सबसे बड़ी यूएसपी (USP) इसका तकनीकी पक्ष है। अतीत की ऐतिहासिक घटनाओं और संगठन की 100 साल की यात्रा को स्क्रीन पर जीवंत करने के लिए मेकर्स ने किसी पुराने धुंधले फुटेज का इस्तेमाल करने के बजाय AI-जनरेटेड विजुअल्स (AI-Generated Footage) का सहारा लिया है। तकनीक का यह इस्तेमाल इतना शानदार और सटीक है कि हर सीन की बारीकी और कारीगरी स्क्रीन पर साफ झलकती है, जो दर्शकों को सीधे उस दौर से जोड़ देती है।</div><div><br></div><div><b>अभिनय: छा गए संजू बाबा, नमाशी चक्रवर्ती ने किया हैरान</b></div><div>संजय दत्त: प्रोफेसर गोपाल नाडकर्णी के रूप में संजय दत्त ने अपने करियर का वन ऑफ द बेस्ट परफॉर्मेंस दिया है। शुद्ध हिंदी और कठिन संस्कृत श्लोकों के संवाद बोलते हुए संजू बाबा का ठहराव, गंभीरता और संयम देखने लायक है।</div><div><br></div><div>नमाशी चक्रवर्ती: एक बागी और वैचारिक रूप से मजबूत छात्र 'विक्की हेगड़े' के रोल में मिथुन चक्रवर्ती के बेटे नमाशी ने चौंकाया है। पूरी फिल्म में वे संजय दत्त जैसे दिग्गज के सामने पूरी शिद्दत और भरोसे के साथ टिके रहते हैं।</div><div><br></div><div>सपोर्टिंग कास्ट: अमित साध ने 'आदित्य राव' के एक छोटे से कैमियो रोल में हमेशा की तरह प्रभावित किया है। मृणाल कुलकर्णी ने प्रोफेसर की पत्नी के रूप में शानदार अभिनय किया है। हालांकि, समीरा रेड्डी (डॉ. पल्लवी) के चेहरे के बनावटी हाव-भाव निराश करते हैं। त्रिधा चौधरी और नीतू चंद्रा के पास फिल्म में करने के लिए कुछ खास नहीं था, वे सिर्फ सजावटी किरदारों में सिमट कर रह गईं।</div><div><br></div><div><b>निर्देशन और संगीत</b></div><div>117 मिनट की इस कसी हुई फिल्म को एडिट और डायरेक्ट करने का पूरा श्रेय अभिजीत मोहन वारंग को जाता है। उन्होंने फिल्म को कहीं भी बोझिल या उबाऊ नहीं होने दिया है, खासकर सेकंड हाफ और फिल्म का क्लाइमेक्स, जो पूरी तरह से अकाट्य तथ्यों (Facts) पर आधारित है, दर्शकों को बांधकर रखता है।</div><div><br></div><div>मोंटी शर्मा का बैकग्राउंड स्कोर दृश्यों के तनाव को बखूबी बढ़ाता है। फिल्म के अंत में बजने वाला इंदीवर का लिखा क्लासिक गाना 'है प्रीत जहाँ की रीत सदा' थिएटर से बाहर निकलते हुए दर्शकों के दिलों में देशभक्ति का एक अलग जज्बा छोड़ जाता है।</div><div><br></div><div>रेटिंग: 3.5/5 स्टार (तथ्यात्मक सिनेमा और कड़क राजनीतिक ड्रामा पसंद करने वालों के लिए एक मस्ट-वॉच फिल्म)।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 14:21:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/aakhri-sawal-movie-review-history-and-the-rss-between-sanjay-dutt-and-namashi-chakraborty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chand Mera Dil Movie Review: शानदार संगीत और उम्दा कोशिश के बावजूद कमजोर लेखन की भेंट चढ़ी अनन्या पांडे और लक्ष्य की फिल्म]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/chand-mera-dil-movie-review--ananya-panday-lakshya-film]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">कुछ फिल्में ऐसी होती हैं जो सिनेमाघर के अंधेरे से बाहर आने के बाद भी आपके दिलो-दिमाग में एक गहरी छाप छोड़ जाती हैं, जबकि कुछ फिल्में अपने पूरे रनटाइम के दौरान दर्शकों को हर एक मिनट घड़ी देखने पर मजबूर कर देती हैं। अनन्य पांडे और नवोदित अभिनेता लक्ष्य की नई फिल्म 'चाँद मेरा दिल' बदकिस्मती से दूसरी श्रेणी में खड़ी नजर आती है। यह फिल्म उन युवाओं की एक बेहद भावुक दास्तां बयां करने की कोशिश करती है जिन्हें परिस्थितियों के कारण वक्त से पहले परिपक्व होना पड़ा, लेकिन मेलोड्रामा और उलझी हुई राइटिंग के भंवर में फंसकर यह अपनी मूल राह से भटक जाती है।</span></div><div><br></div><div>देखा जाए तो फिल्म का उद्देश्य बॉलीवुड में रोमांस की किसी नई परिभाषा को गढ़ना नहीं था। एक सीधी-सादी, मर्मस्पर्शी कहानी भी दर्शकों को थियेटर तक खींच सकती है बशर्ते उसमें सच्चाई हो। लेकिन 'चाँद मेरा दिल' कभी अत्यधिक साधारण तो कभी बेवजह पेचीदा लगने लगती है। धर्मा प्रोडक्शंस के बैनर तले बनी इस फिल्म में कुछ प्यारे पल, बेहतरीन संगीत और कलाकारों की केमिस्ट्री की झलक जरूर मिलती है, परंतु फिल्म को एक सूत्र में पिरोकर रखने वाली 'आत्मा' नदारद है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/how-voice-of-radio-become-bollywood-superstar-know-journey" target="_blank">Sunil Dutt Death Anniversary: रेडियो की आवाज से कैसे बने Bollywood के Superstar, जानें सफर</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><h2>क्या है 'चाँद मेरा दिल' की कहानी?</h2><div>फिल्म की पटकथा चांदनी (अनन्या पांडे) और आरव (लक्ष्य) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो इंजीनियरिंग के छात्र हैं और कॉलेज के दिनों में एक-दूसरे के प्यार में गिरफ्तार हो जाते हैं। उनका यह प्रेम-प्रसंग बेहद तीव्र गति से आगे बढ़ता है और जल्द ही चांदनी गर्भवती (प्रेग्नेंट) हो जाती है। दोनों परिवारों के कड़े विरोध और सामाजिक बंधनों की परवाह न करते हुए वे इस बच्चे को दुनिया में लाने का साहसिक निर्णय लेते हैं। इसके बाद शुरू होता है आर्थिक तंगी, भावनात्मक अपरिपक्वता और समाज के तानों से जूझते हुए अपनी नई गृहस्थी बसाने का संघर्ष। इसी बीच दोनों के मध्य एक बड़ा विवाद होता है, जो उनकी संपूर्ण जीवन-यात्रा की दिशा बदल देता है।</div><div><br></div><div>कागज पर यह कहानी जितनी सुगठित और मर्मस्पर्शी लगती है, स्क्रीनप्ले में आते-आते इसके इमोशनल उतार-चढ़ाव उतने ही बेअसर साबित होते हैं। कई दृश्य स्वाभाविक न लगकर जबरन जोड़े हुए प्रतीत होते हैं।</div><div><br></div><h2>अभिनय: अनन्या की मेहनत और लक्ष्य की स्क्रीन प्रेजेंस</h2><div>अनन्या पांडे (चांदनी): अनन्या ने इस किरदार के लिए सचमुच काफी पसीना बहाया है। वे चांदनी की संवेदनशीलता और आंतरिक संघर्ष को पर्दे पर उतारने का पूरा प्रयास करती हैं। कई दृश्यों में उनकी यह कोशिश रंग लाती है और उनका अभिनय जीवंत लगता है, हालांकि कमजोर स्क्रिप्ट के कारण कुछ जगहों पर उनके हाव-भाव कृत्रिम लगने लगते हैं।</div><div><br></div><div>लक्ष्य (आरव): नवोदित अभिनेता लक्ष्य की स्क्रीन प्रेजेंस कमाल की है। उनकी बॉडी लैंग्वेज और संवाद अदायगी कई मौकों पर अभिनेता रणबीर कपूर की शुरुआती फिल्मों की याद दिलाती है। कुछ दृश्यों में अनन्या के साथ उनकी केमिस्ट्री में बेहतरीन चिंगारी दिखती है, लेकिन लेखन की शिथिलता के कारण उनका किरदार पूरी तरह निखर नहीं पाता।</div><div><br></div><div>फिल्म के कुछ हिस्सों में सह-कलाकारों का अभिनय इतना रिहर्सल किया हुआ और बनावटी लगता है कि दर्शक पल को महसूस करने के बजाय यह सोचने लगते हैं कि कलाकार कैमरे के पीछे से मिल रहे संकेतों का इंतजार कर रहे हैं।</div><div><br></div><h2>निर्देशन और संगीत: सचिन-जिगर का जादू बरकरार</h2><div>विवेक सोनी द्वारा निर्देशित यह फिल्म शुरू से ही अपने टोन (लहजे) को लेकर असमंजस में दिखती है। यह एक साथ यथार्थवादी और अत्यधिक नाटकीय होने की कोशिश करती है, जिसके कारण दोनों का संतुलन बिगड़ जाता है। महत्वपूर्ण भावनात्मक मोड़ों को बहुत जल्दबाजी में समेट दिया गया है, जबकि कुछ गैर-जरूरी दृश्य बहुत लंबे खींच दिए गए हैं।</div><h2><br>फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष:</h2><div>'चाँद मेरा दिल' का सबसे बड़ा और सकारात्मक पहलू इसका संगीत है। संगीतकार जोड़ी सचिन-जिगर ने एक ऐसा जबरदस्त साउंडट्रैक तैयार किया है जो फिल्म के ढीले दृश्यों में भी जान फूंक देता है। फिल्म का शीर्षक गीत (टाइटल ट्रैक) और कुछ कोमल धुनें किरदारों के संवादों से भी अधिक गहराई से भावनाओं को व्यक्त करने में सफल रही हैं।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: क्या अच्छा है</h2><div>कुछ पल ऐसे भी हैं जब फिल्म अपनी लय लगभग पा ही लेती है। एक शांत बातचीत। एक छोटी-सी बहस। मुख्य किरदारों के बीच एक संवेदनशील संवाद। ये हिस्से वास्तविक लगते हैं। अनन्या और लक्ष्य के बीच की केमिस्ट्री कुछ पलों के लिए ही सही, लेकिन असरदार लगती है—खासकर कॉलेज वाले हल्के-फुल्के दृश्यों में। जब पटकथा कमज़ोर पड़ती है, तब भी संगीत भावनात्मक माहौल को जीवंत बनाए रखने में मदद करता है।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: क्या अच्छा नहीं है</h2><div>कहानी खुद ही अपनी सबसे बड़ी बाधा बन जाती है। यह सरलता और ज़बरदस्ती की जटिलता के बीच लगातार झूलती रहती है, और कोई भी पक्ष पूरी तरह से सफल नहीं हो पाता। पटकथा में भावनात्मक निरंतरता की कमी है, और कई दृश्य अधूरे से लगते हैं। इसी वजह से कलाकारों के अभिनय पर भी बुरा असर पड़ता है। कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब संवाद अस्वाभाविक लगते हैं, और प्रतिक्रियाएँ देर से आती हैं—मानो कैमरे के पीछे से कोई उन्हें संकेत दे रहा हो।</div><div><br></div><div>फिल्म अपनी गति (pacing) को लेकर भी संघर्ष करती है। जिन जगहों पर इसे तेज़ी से आगे बढ़ना चाहिए, वहाँ यह धीमी पड़ जाती है; और जिन दृश्यों को वास्तव में समय की ज़रूरत होती है, उन्हें यह जल्दबाजी में निपटा देती है।</div><div><br></div><h2>चाँद मेरा दिल: अंतिम फैसला</h2><div>'चाँद मेरा दिल' में एक दिल को छू लेने वाले रोमांटिक ड्रामा के लिए ज़रूरी सभी तत्व मौजूद थे, लेकिन यह फिल्म उन तत्वों को एक साथ पिरोकर एक संपूर्ण कृति नहीं बन पाई। कलाकारों ने मेहनत की है, संगीत भी अच्छा है, और कुछ भावनात्मक पल भी हैं जो असरदार हैं। लेकिन कमज़ोर लेखन और असमान प्रस्तुति फिल्म को दर्शकों पर एक स्थायी छाप छोड़ने से रोक देते हैं। यह कोई बहुत बुरी फिल्म नहीं है; बस निराशाजनक रूप से औसत दर्जे की है। 'चाँद मेरा दिल' को 5 में से 2 स्टार।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 14:01:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/chand-mera-dil-movie-review--ananya-panday-lakshya-film</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[System Movie Review | सत्ता के खेल, रसूख और जज्बात की जंग में चमकीं ज्योतिका और सोनाक्षी सिन्हा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/system-movie-review-jyothika-sonakshi-sinha-shine-in-battle-power-games-influence-and-emotions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><div><span style="font-size: 1rem;">कोर्टरूम ड्रामा की दुनिया में जब भी कोई फिल्म आती है, तो अमूमन उम्मीद चीख-पुकार, नाटकीय बहस और आखिरी मिनट में मिलने वाले किसी चौंकाने वाले ट्विस्ट की होती है। लेकिन निर्देशक अश्विनी अय्यर तिवारी की नई फिल्म 'System' इन घिसे-पिटे रास्तों से अलग हटकर बड़े इरादों, दबे हुए जज्बातों और सिस्टम के अंदर सुलगती आग के साथ कदम रखती है। पहली नज़र में यह सत्ता के खेल और नैतिक दुविधाओं के इर्द-गिर्द बुना गया एक जाना-पहचाना लीगल ड्रामा लगता है, लेकिन जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है, यह कानूनी से ज्यादा इंसानी और निजी जंग में तब्दील हो जाती है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">ओटीटी प्लेटफॉर्म: प्राइम वीडियो (Prime Video)</span></div><div>निर्देशक: अश्विनी अय्यर तिवारी</div><div>मुख्य कलाकार: सोनाक्षी सिन्हा, ज्योतिका, आशुतोष गोवारिकर</div><div><span style="font-size: 1rem;">रेटिंग: 3.5/5</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><br></div><h2>क्या है 'System' की कहानी?</h2><div>फिल्म का ताना-बाना नेहा राजवंश (सोनाक्षी सिन्हा) के इर्द-गिर्द बुना गया है। नेहा एक बेहद महत्वाकांक्षी और आत्मविश्वास से भरी पब्लिक प्रॉसिक्यूटर (सरकारी वकील) है। वह अपने पिता (आशुतोष गोवारिकर) की प्रतिष्ठित लॉ फर्म में पार्टनर बनने की चाहत रखती है और खुद को साबित करने की जद्दोजहद में जुटी है। कहानी में मोड़ तब आता है, जब उसके पिता उसे एक ऐसा पेचीदा केस सौंप देते हैं, जो नेहा को नैतिकता के 'ग्रे शेड' (सही और गलत के धुंधले दायरे) में धकेल देता है।</div><div><br></div><div>इस अदालती और कानूनी भूलभुलैया से पार पाने के लिए नेहा हाथ मिलाती है सारिका रावत (ज्योतिका) से। सारिका एक बेहद तेज-तर्रार कोर्ट स्टेनोग्राफर है। वह इस पूरे 'सिस्टम' की रग-रग से वाकिफ है, लेकिन उसके शांत चेहरे के पीछे कुछ छिपे हुए निजी इरादे और पुराने राज भी हैं। इसके बाद शुरू होता है पेशेवर जिम्मेदारियों और निजी मकसदों के टकराव का एक दिलचस्प दौर।</div><div><br></div><h2>सधी हुई पटकथा और मारक संवाद</h2><div>'System' की सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह हर कुछ मिनट में कोर्टरूम के मेलोड्रामा की तरफ भागने के बजाय, अपने किरदारों की परतों को धीरे-धीरे खोलने का समझदारी भरा तरीका अपनाती है। फिल्म का दूसरा हाफ थोड़ा जाना-पहचाना लग सकता है, लेकिन इसका भावनात्मक वजन दर्शकों को बांधे रखता है।</div><div><br></div><div>फिल्म के संवाद इसकी रीढ़ की हड्डी हैं। डायलॉग्स बेहद तीखे और धारदार हैं, जिन्हें जबरदस्ती लाउड बनाने की कोशिश नहीं की गई है। फिल्म का एक संवाद पूरी कहानी का सार बयां कर देता है:</div><div><br></div><h2>"अमीरी के शोर में गरीब की आवाज़ खो जाती है"</h2><div>लेखन की परिपक्वता इस बात से भी झलकती है कि फिल्म में खामोशी का इस्तेमाल बेहतरीन तरीके से किया गया है। कई जगहों पर औपचारिक शब्दों के पीछे छिपे किरदारों के अनकहे जज्बात ज्यादा गहरा असर छोड़ जाते हैं।</div></div><div><br></div><div><b>सिस्टम: परफॉर्मेंस</b></div><div>ज्योतिका यकीनन इस फिल्म की जान हैं। सारिका रावत के रूप में उनका किरदार बेहद जीवंत और स्वाभाविक लगता है। वह ताकत, संवेदनशीलता और होशियारी को इतनी सहजता से एक साथ पेश करती हैं कि आप कभी पूरी तरह समझ नहीं पाते कि सारिका क्या सोच रही है; और यही बात देखने में बेहद दिलचस्प लगती है। पूरी फिल्म के दौरान, उनके शांत और संयमित चेहरे के पीछे एक गहरा दर्द छिपा रहता है। उनकी एक्टिंग में बनावटीपन बिल्कुल नहीं लगता। सब कुछ एकदम असली लगता है।</div><div><br></div><div>सोनाक्षी सिन्हा ने हाल के समय में अपनी सबसे सधी हुई परफॉर्मेंस दी है। नेहा राजवंश का किरदार आसानी से बहुत ज़्यादा रूखा या बहुत ज़्यादा ग्लैमरस हो सकता था, लेकिन सोनाक्षी ने अधिकार और भावनात्मक उथल-पुथल के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाए रखा है। वह अपने किरदार के अंदरूनी टकराव को बखूबी निभाती हैं, खासकर तब जब दबाव के चलते नेहा का आत्मविश्वास धीरे-धीरे डगमगाने लगता है।</div><div><br></div><div>आशुतोष गोवारिकर अपने किरदार में एक गंभीरता और गरिमा लाते हैं, बिना किसी सीन पर बेवजह हावी हुए। उनकी मौजूदगी कानूनी और भावनात्मक दांव-पेच को और भी ज़्यादा वज़नदार बना देती है। सहायक कलाकारों ने भी बेहतरीन काम किया है, भले ही कुछ किरदारों में और ज़्यादा गहराई की गुंजाइश थी।</div><div><br></div><div><b>सिस्टम: निर्देशन</b></div><div>अश्विनी अय्यर तिवारी ने फिल्म को अत्यधिक नाटकीयता के बजाय संवेदनशीलता के साथ संभाला है, और यही बात 'सिस्टम' को आम कोर्टरूम ड्रामा फिल्मों से अलग बनाती है। यह फिल्म तमाशों या भव्यता के बजाय किरदारों और इंसानी पहलुओं को दिखाने में ज़्यादा दिलचस्पी रखती है, और यही बात इसके पक्ष में काम करती है। भावनात्मक पलों को खुलकर उभरने का पूरा मौका दिया गया है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही, फिल्म की गति (पेस) कुछ जगहों पर थोड़ी और तेज़ या कसी हुई हो सकती थी। कुछ सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं, और कभी-कभी फिल्म उन भावनात्मक विचारों को दोहराती है जिन्हें दर्शक पहले ही समझ चुके होते हैं। फिर भी, अश्विनी केवल कहानी में आने वाले ट्विस्ट्स के भरोसे न रहकर, किरदारों के आपसी तालमेल और बातचीत के ज़रिए फिल्म में तनाव बनाए रखने में सफल रहती हैं—और यह बात तारीफ़ के काबिल है।</div><div><br></div><div>जिस तरह से वह इंसानी कमज़ोरियों और खामियों वाले किरदारों को पेश करती हैं, उसमें एक खास तरह की ईमानदारी झलकती है। यहाँ कोई भी किरदार पूरी तरह से हीरो जैसा नहीं लगता। और न ही कोई पूरी तरह से खलनायक या बुरा इंसान लगता है। किरदारों का यह 'ग्रे' (न अच्छा न बुरा) पहलू ही फिल्म को शुरू से आखिर तक दिलचस्प बनाए रखता है।</div><div><br></div><div><b>System: क्या अच्छा है</b></div><div>System की सबसे अच्छी बात यह है कि यह कितनी खामोशी से असरदार लगती है। फिल्म हर कुछ मिनट में चालाक या नाटकीय दिखने की बहुत ज़्यादा कोशिश नहीं करती, और यही संयम असल में इसकी ताकत बन जाता है। कई भावुक पल इसलिए असरदार लगते हैं क्योंकि कलाकार खामोशी को अपना काम करने देते हैं। ज्योतिका यहाँ सचमुच शानदार हैं। उनके हाव-भाव के पीछे लगभग हर समय उदासी, गुस्सा और हिसाब-किताब छिपा रहता है, लेकिन वह इसे कभी भी ज़रूरत से ज़्यादा नहीं दिखातीं। सोनाक्षी सिन्हा भी कुछ हिस्सों में अपने अभिनय से चौंकाती हैं; उनका अभिनय बहुत ज़्यादा तराशा हुआ न होकर, संयमित और विश्वसनीय लगता है। यहाँ तक कि कोर्टरूम के दृश्य भी ज़्यादातर ज़मीनी लगते हैं। भड़कीले नहीं। बस एक बहुत ही मानवीय तरीके से तनावपूर्ण।</div><div><b><br></b></div><div><b>System: क्या अच्छा नहीं है</b></div><div>इसके बावजूद, फिल्म कुछ जगहों पर थोड़ी ऊबड़-खाबड़ हो जाती है। बीच के हिस्सों में फिल्म की गति (pacing) काफ़ी धीमी हो जाती है, और कुछ दृश्य ज़रूरत से ज़्यादा लंबे खिंच जाते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि फिल्म उन भावुक बातों को दोहरा रही है जो पहले से ही साफ़ थीं। अगर एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई होती, तो फिल्म का कुल मिलाकर असर काफ़ी बेहतर होता।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/demand-for-fir-against-bengali-actors-parambrata-chatterjee-and-swastika-mukherjee" target="_blank">चुनाव बाद हुई हिंसा भड़काने का आरोप! बंगाली कलाकार Parambrata Chatterjee और Swastika Mukherjee के खिलाफ FIR की मांग</a></h3><div><br></div><div>कुछ ऐसे पल भी आते हैं जब System जानी-पहचानी कोर्टरूम ड्रामा वाली राह पर चलने लगती है। फिल्म के बीच में कुछ घटनाक्रमों का अंदाज़ा लगाना आसान हो जाता है, खासकर अगर आप इस जॉनर की बहुत सारी फिल्में देखते हैं। कुछ सहायक किरदारों को भी ठीक से गढ़ा नहीं गया है; ऐसा लगता है जैसे वे सिर्फ़ मुख्य कहानी को आगे बढ़ाने के लिए ही मौजूद हैं। और जहाँ एक तरफ फिल्म को अपने शांत और सूक्ष्म अंदाज़ से फ़ायदा होता है, वहीं कुछ पल ऐसे भी आते हैं जब आप चाहते हैं कि फिल्म थोड़ी और बेतरतीब और भावनात्मक रूप से ज़्यादा विस्फोटक होती।</div><div><br></div><div><b>System: अंतिम फ़ैसला</b></div><div>System कोई एकदम सही कोर्टरूम ड्रामा नहीं है, लेकिन यह भावनात्मक रूप से काफ़ी दिलचस्प है। यह इसलिए सफल होती है क्योंकि यह कानूनी दुनिया को एक भड़कीले युद्ध के मैदान की तरह दिखाने के बजाय, सिस्टम में फँसे लोगों पर ज़्यादा ध्यान केंद्रित करती है। दमदार अभिनय—खासकर ज्योतिका और सोनाक्षी का—और सोच-समझकर लिखी गई कहानी फिल्म को इसके जाने-पहचाने ढाँचे से ऊपर उठाने में मदद करते हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/demand-for-fir-against-bengali-actors-parambrata-chatterjee-and-swastika-mukherjee" target="_blank">चुनाव बाद हुई हिंसा भड़काने का आरोप! बंगाली कलाकार Parambrata Chatterjee और Swastika Mukherjee के खिलाफ FIR की मांग</a></h3><div><br></div><div>फिल्म की गति में कहीं-कहीं थोड़ी-बहुत दिक्कतें हैं, और कुछ हिस्से थोड़े-बहुत अनुमान लगाने लायक लगते हैं। लेकिन फिर भी, फिल्म कुछ ऐसे सवाल छोड़ जाती है जिन पर सोचना ज़रूरी है। सच के बारे में। सत्ता के बारे में। और इस बारे में कि जब सब कुछ लेन-देन का सौदा बन जाता है, तो असल में किसकी आवाज़ सुनी जाती है।</div><div><span style="font-size: 1rem;">और सच कहूँ तो, फिल्म जो एक शांत-सी बेचैनी आपके मन में छोड़ जाती है—वह फिल्म के फ़ैसले से भी ज़्यादा समय तक आपके साथ रहती है।</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 12:37:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/system-movie-review-jyothika-sonakshi-sinha-shine-in-battle-power-games-influence-and-emotions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kartavya Movie Review | सस्पेंस और सधे हुए अभिनय के बावजूद अपनी ही महत्वाकांक्षाओं के बोझ तले दबी सैफ अली खान की 'कर्तव्य']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/kartavya-movie-review-saif-ali-khan-kartavya-crushed-under-the-weight-of-ambitions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक जमाना था जब बॉलीवुड में कॉप ड्रामा (Police Movies) का मतलब होता था—हीरो की स्लो-मोशन एंट्री, कान फाड़ने वाले लाउड डायलॉग और बिना पसीना बहाए अकेले ही दस गुंडों को हवा में उड़ा देना। लेकिन निर्देशक पुलकित के निर्देशन में बनी सैफ अली खान की नई नेटफ्लिक्स (Netflix) फिल्म 'कर्तव्य' (Kartavya) इस घिसे-पिटे कमर्शियल फॉर्मूले को तोड़ने की कोशिश करती है। 'भक्षक' जैसी गंभीर फिल्म बना चुके पुलकित इस बार तड़क-भड़क के बजाय असलियत को चुनते हैं। वे पुलिस अफसर को 'लार्जर-दैन-लाइफ' सुपरहीरो के बजाय एक थके हुए और टूटते हुए आम इंसान के रूप में पेश करते हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">फिल्म की सोच नेक है और यह कर्तव्य, नैतिकता, भ्रष्टाचार और पारिवारिक दबाव जैसे कई संवेदनशील मुद्दों को एक साथ छूती है। लेकिन क्या यह फिल्म अपनी इस भारी-भरकम महत्वाकांक्षा के बोझ को संभाल पाई? आइए जानते हैं विस्तृत समीक्षा में।</span></div><div><br></div><h2>क्या है 'कर्तव्य' की कहानी?</h2><div>फिल्म की कहानी घूमती है एसएचओ (SHO) पवन मलिक (सैफ अली खान) के इर्द-गिर्द, जिसकी निजी और पेशेवर जिंदगी इस वक्त बेहद नाजुक दौर से गुजर रही है। थाने में उसके सामने एक हाई-प्रोफाइल पत्रकार की हत्या की जांच का जिम्मा है, जो धीरे-धीरे सिस्टम के अंदर छिपे कई सफेदपोश चेहरों और असहज कर देने वाले सच को उजागर करने लगती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ, पवन का घर भी किसी जंग के मैदान से कम नहीं है। रूढ़िवादी पिता के साथ उसके रिश्ते बेहद तनावपूर्ण हैं, और उसका बागी छोटा भाई इस आग में घी डालने का काम करता है। इस मानसिक उथल-पुथल के बीच पवन को एकमात्र राहत और कोमल सहारा अपनी पत्नी (रसिका दुग्गल) से मिलता है, जो उसकी खामोशी को भी बिना कहे पढ़ लेती है। जैसे-जैसे मर्डर मिस्ट्री की जांच आगे बढ़ती है, पवन का शक अपराधियों के साथ-साथ अपने ही महकमे के लोगों पर गहराने लगता है। कहानी में एक 'गॉडमैन' (धर्मगुरु) की भी एंट्री होती है, जहाँ आस्था और अंधविश्वास के बीच एक वैचारिक टकराव दिखाने की कोशिश की गई है।</div><div><br></div><h2>अभिनय: सैफ अली खान का शानदार और संयमित रूप</h2><div>सैफ अली खान निसंदेह इस पूरी फिल्म की सबसे मजबूत रीढ़ हैं। उन्होंने बिना किसी चीख-पुकार या आक्रामकता के, बेहद संयम के साथ पवन मलिक के किरदार को जिया है। पूरी फिल्म में उनकी आंखों में एक अजीब सी मानसिक थकान दिखाई देती है, जो उनके किरदार को बेहद विश्वसनीय बनाती है। उनका हरियाणवी लहजा कहीं-कहीं थोड़ा लाउड जरूर लगता है, लेकिन उनके जज्बात पूरी तरह सच्चे हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bollywood-wrap-up-the-truth-behind-salman-lonely-post" target="_blank">Bollywood Wrap-Up: सलमान के 'लोनली' पोस्ट का सच, इम्तियाज की फिल्म का धमाका और आलिया-शरवरी की लीक फोटो ने बढ़ाया इंटरनेट का पारा!</a></h3><div><br></div><div>रसिका दुग्गल का स्क्रीन टाइम भले ही कम हो, लेकिन वे जब भी पर्दे पर आती हैं, अपनी सहजता से फिल्म के भारी माहौल में एक गर्माहट और सुकून भर देती हैं। संजय मिश्रा हमेशा की तरह अपने बेहतरीन और मंझे हुए अंदाज में प्रभावित करते हैं। इनके अलावा युद्धवीर अहलावत, जाकिर हुसैन, मनीष चौधरी और दुर्गेश कुमार ने भी अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/punjabi-singer-inder-kaur-killed-for-refusing-marriage" target="_blank">शादी से इनकार करने पर पंजाबी सिंगर Inder Kaur की हत्या, नहर से मिला शव, Canada भागा आरोपी!</a></h3><div><br></div><div><b>कास्टिंग की सबसे कमजोर कड़ी</b></div><div><b>&nbsp;</b>'गॉडमैन' (बाबा) के मुख्य विलेन वाले किरदार में सौरभ द्विवेदी का चुनाव पूरी तरह गलत साबित होता है। जिस किरदार में एक खौफ और अप्रत्याशित खतरा झलकना चाहिए था, वहाँ उनका भावहीन चेहरा और बोरिंग संवाद अदायगी सब कुछ फीका कर देती है। चेहरे पर हमेशा रहने वाली मुस्कान के कारण वे विलेन के बजाय एक सामान्य व्यक्ति नजर आते हैं, जो दर्शकों को डराने में पूरी तरह नाकाम रहता है।</div><div><br></div><p><b>तकनीकी पक्ष</b></p><div>तकनीकी तौर पर फिल्म काफी सुसंगत है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना किसी भड़कीले तड़के के छोटे शहरों के पुलिस स्टेशनों, गलियों और घरों के माहौल की असलियत को बखूबी पकड़ती है। फिल्म का बैकग्राउंड म्यूजिक जज्बाती पलों में काफी असरदार है, हालांकि फिल्म के दूसरे हाफ की एडिटिंग थोड़ी और कसी जा सकती थी क्योंकि कुछ दृश्य जरूरत से ज्यादा लंबे खिंच गए हैं।</div><div><br></div><h2>कर्तव्य: तकनीकी पहलू</h2><div>फिल्म के तकनीकी पहलू की बात करें तो यह काफी सुसंगत और बेहतरीन लगती है। इसकी सिनेमैटोग्राफी बिना ज़्यादा भड़कीली हुए, ज़रूरी माहौल बनाए रखने में कामयाब रहती है; जिससे छोटे शहरों की सेटिंग, पुलिस स्टेशन, घर और फिल्म में दिखाए गए दूसरे स्थानों की असलियत को महसूस करना आसान हो जाता है।</div><div><br></div><div>जब फिल्म में गहरे जज़्बात शामिल होते हैं, तो बैकग्राउंड म्यूज़िक सुनने में खास तौर पर अच्छा लगता है। वहीं दूसरी ओर, एडिटिंग में सुधार की गुंजाइश है, क्योंकि फिल्म का दूसरा हिस्सा कहीं-कहीं बेवजह लंबा हो जाता है।</div><div><br></div><h2>कर्तव्य: फ़ैसला</h2><div>'कर्तव्य' उन फिल्मों में से एक है, जिसकी सोच तो नेक है, लेकिन वह अपने विचारों को पूरी तरह से परदे पर उतारने में थोड़ी कमज़ोर पड़ जाती है। यह फिल्म एक पुलिस अधिकारी होने की भावनात्मक कीमत को टटोलना चाहती है, और कई दृश्यों में वह ऐसा करने में सचमुच कामयाब भी होती है। यह फिल्म अपने मुख्य किरदार का महिमामंडन करने के बजाय, उसे एक आम इंसान के तौर पर पेश करती है, और यही इसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसके साथ ही, फिल्म को इस बात का भी नुकसान उठाना पड़ता है कि वह एक साथ बहुत सारे विषयों को समेटने की कोशिश करती है। </div><div>&nbsp;</div><div>भ्रष्टाचार, पारिवारिक ड्रामा, आध्यात्मिकता, जाँच-पड़ताल, विश्वासघात और भावनात्मक आघात—ये सभी विषय दर्शकों का ध्यान खींचने की होड़ में लगे रहते हैं, जिससे फिल्म की कई कहानियाँ अधूरी ही रह जाती हैं। कुल मिलाकर, 'कर्तव्य' एक यथार्थवादी, भावनात्मक और सच्ची फिल्म है, लेकिन साथ ही यह निराशाजनक रूप से अधूरी भी लगती है। इसलिए, हालाँकि 'कर्तव्य' में तारीफ़ करने लायक बहुत कुछ है, फिर भी यह 5 में से केवल 2.5 स्टार की ही हकदार है।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 20 May 2026 15:18:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/kartavya-movie-review-saif-ali-khan-kartavya-crushed-under-the-weight-of-ambitions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Inspector Avinash 2 Review | Randeep Hooda का 'स्वैग' और यूपी का क्राइम ड्रामा, इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2 में कितना है दम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/inspector-avinash-2-review-randeep-hooda-swag-and-up-crime-drama]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय ओटीटी (OTT) की दुनिया में उत्तर प्रदेश के अपराध और पुलिसिया कहानियों का एक अलग ही क्रेज है। 'मिर्जापुर' और 'पाताल लोक' जैसी सीरीज ने जो पैमाना सेट किया है, उसी कड़ी में अब रणदीप हुड्डा की सीरीज 'इंस्पेक्टर अविनाश' का दूसरा सीजन दस्तक दे चुका है। नीरज पाठक के निर्देशन में बनी यह सीरीज पहले सीजन की कहानी को और भी भव्य और हिंसक अंदाज में आगे बढ़ाती है।'इंस्पेक्टर अविनाश सीजन 2' की कहानी वहीं से शुरू होती है जहाँ पहला सीजन खत्म हुआ था। एसटीएफ (STF) ऑफिसर अविनाश मिश्रा (रणदीप हुड्डा) एक ऐसा किरदार है जिसके नाम सौ से ज्यादा एनकाउंटर दर्ज हैं। इस बार कहानी का दायरा केवल यूपी तक सीमित नहीं है, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाता है।</div><div><br></div><h2>इंस्पेक्टर अविनाश 2: कहानी</h2><div>सीज़न 2 ठीक वहीं से शुरू होता है जहाँ पहला सीज़न खत्म हुआ था, लेकिन इस बार इसका दायरा काफ़ी बड़ा है। कहानी सिर्फ़ उत्तर प्रदेश की सड़कों तक ही सीमित नहीं रहती, बल्कि नेपाल, मध्य प्रदेश, बिहार और ओडिशा तक फैल जाती है। कहानी STF अफ़सर अविनाश मिश्रा के इर्द-गिर्द घूमती है, जो न सिर्फ़ बाहर अपराधियों से लड़ रहे हैं, बल्कि सिस्टम के अंदर चल रही विभागीय राजनीति और सस्पेंशन के ख़तरे का भी सामना कर रहे हैं। इस बार, उनका सामना शेख़ (अमित सियाल) के हथियारों के कार्टेल और बेकाबू अपराधी देविकांत त्रिवेदी (अभिमन्यु सिंह) से होता है। हालाँकि, इस सीज़न की सबसे बड़ी ताक़त इसका निजी पहलू है। जब अविनाश के बेटे वरुण पर अपने एक क्लासमेट की हत्या का आरोप लगता है, तो कहानी एक एक्शन-बेस्ड पुलिस ड्रामा से बदलकर एक इमोशनल कहानी बन जाती है। यह ट्रैक दिखाता है कि कैसे एक पुलिसवाला, जो बाहर गोलियों के दम पर इंसाफ़ दिलाता है, अपने ही घर के अंदर पैदा हुए कानूनी और नैतिक उथल-पुथल में फँसकर बेबस हो जाता है। स्क्रीनप्ले इस निजी त्रासदी को राजनीतिक साज़िशों और गैंगवार के साथ जोड़ने की कोशिश करता है, जिससे दर्शक कहानी से जुड़े रहते हैं; हालाँकि कई छोटी-छोटी कहानियों (subplots) की वजह से कभी-कभी कहानी थोड़ी बोझिल भी लगने लगती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/orry-reignites-feud-with-sara-ali-khan-over-simmba" target="_blank">Orry ने Sara Ali Khan पर फिर बोला हमला, Simmba का जिक्र कर करियर पर कसा तंज</a></h3><div><br></div><h2>अभिनय: रणदीप हुड्डा का वन-मैन शो</h2><div>इस सीरीज की जान और शान रणदीप हुड्डा हैं। उन्होंने अविनाश मिश्रा के किरदार को महज एक 'फिल्मी हीरो' नहीं, बल्कि एक हाड़-मांस के इंसान के रूप में पेश किया है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>रणदीप हुड्डा: </b>उनके चेहरे का घमंड, परिवार के लिए चिंता और दमदार फिजीक सीरीज को जीवंत कर देती है। राइटिंग कमजोर होने के बावजूद हुड्डा अपने हाव-भाव से सीन को संभाल लेते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>अमित सियाल और अभिमन्यु सिंह: </b>अमित सियाल अपनी सधी हुई अदाकारी से एक निरंतर खतरा बनाए रखते हैं, वहीं अभिमन्यु सिंह का पागलपन दर्शकों को बेचैन करता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>उर्वशी रौतेला: </b>पूनम के किरदार में उर्वशी एक सरप्राइज पैकेज की तरह हैं। खासकर बेटे की गिरफ्तारी वाले दृश्यों में उनका अभिनय काफी सच्चा लगता है।</div><div><br></div><h2>निर्देशन और तकनीकी पक्ष</h2><div>नीरज पाठक का निर्देशन बारीकियों से ज्यादा माहौल (Atmosphere) बनाने पर केंद्रित है। यह सीरीज पुराने जमाने के 'मास एंटरटेनमेंट' की याद दिलाती है। चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफी इस शो का सबसे मजबूत तकनीकी हिस्सा है। 90 के दशक के उत्तर प्रदेश के धूल भरे और हिंसक मिजाज को उन्होंने बेहतरीन हवाई शॉट्स और चौड़े फ्रेम के साथ कैद किया है। एडिटिंग कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करती है, जबकि बैकग्राउंड स्कोर तनाव भरे पलों में जान फूंक देता है। एडिटिंग का काम अर्चित डी. रस्तोगी ने संभाला है। वह इस लंबी और उलझी हुई कहानी को कसा हुआ रखने की कोशिश करते हैं, हालाँकि स्क्रिप्ट की गति में उतार-चढ़ाव की वजह से कई जगहों पर दोहराव महसूस होता है। बैकग्राउंड स्कोर और साउंड डिज़ाइन भी तारीफ़ के काबिल हैं, जो तनाव भरे पलों में कहानी को और गहरा बनाते हैं। तकनीकी तौर पर यह शो काफ़ी समृद्ध है, लेकिन तकनीकी चमक हमेशा लेखन की कमियों को नहीं छिपा सकती।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/abhishek-bachchan-ferocious-look-leaked-from-the-sets-of-king" target="_blank">King के सेट से Abhishek Bachchan का खूंखार लुक लीक! हाथ में शॉटगन और ग्रे ओवरकोट में 'विलेन' बने </a></h3><div><br></div><h2>Inspector Avinash 2: यह सीरीज़ कहाँ कमज़ोर पड़ती है?</h2><div>Inspector Avinash Season 2 की सबसे बड़ी कमज़ोरी इसकी राइटिंग है। इसके डायलॉग्स अक्सर वैसे ही घिसे-पिटे लगते हैं, जो पिछले दो दशकों में नॉर्थ इंडियन क्राइम फ़िल्मों में बार-बार सुनने को मिले हैं। सिस्टम और वर्दी के बारे में कही गई बड़ी-बड़ी बातें सुनने में तो दमदार लग सकती हैं, लेकिन दर्शकों पर उनका कोई खास असर नहीं पड़ता। किरदारों की भीड़ भी एक और समस्या है। इतने सारे विलेन और सब-प्लॉट्स होने की वजह से, मुख्य कहानी कभी-कभी अपनी धार खो देती है।</div><div><br></div><div>कुछ एक्शन सीन, खासकर सचिन पहाड़ी वाला एनकाउंटर, ज़रूरत से ज़्यादा ड्रामैटिक और अफरा-तफरी भरे लगते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि यह शो असलियत के बजाय "स्वैग" को ज़्यादा अहमियत देता है। इसके अलावा, महिला किरदारों को भी बहुत सीमित तरीके से दिखाया गया है; वे या तो मुखबिर हैं या फिर पुरुषों के फ़ैसलों से प्रभावित होने वाली सिर्फ़ मोहरे। डबिंग और ऑडियो ट्रांज़िशन में भी कुछ कमियाँ साफ़ नज़र आती हैं, जिससे कुछ सीन का असर कम हो जाता है।</div><div><br></div><h2>Inspector Avinash 2: आख़िरी फ़ैसला</h2><div>कुल मिलाकर, Inspector Avinash Season 2 उन दर्शकों के लिए एक अच्छा ऑप्शन है, जिन्हें देसी-स्टाइल के पुलिस ड्रामा पसंद हैं। यह कोई ऐसी सीरीज़ नहीं है जो नैतिकता और कानून के बीच के दार्शनिक बहसों में बहुत गहराई तक जाती हो; बल्कि, यह एक ऐसी कहानी है जो अपनी तेज़ रफ़्तार और माहौल की वजह से आगे बढ़ती है। रणदीप हुड्डा की ज़बरदस्त परफ़ॉर्मेंस और चिरंतन दास की सिनेमैटोग्राफ़ी इस सफ़र को देखने लायक बनाती है। भले ही इसमें कुछ नयापन न हो और यह घिसी-पिटी चीज़ों पर ज़्यादा निर्भर हो, लेकिन यह अपने टारगेट ऑडियंस का मनोरंजन करना बखूबी जानती है। यह थोड़ी बिखरी हुई और कभी-कभी दोहराव वाली लग सकती है, लेकिन हुड्डा की शानदार परफ़ॉर्मेंस और इसकी क्राइम की दुनिया की पेचीदगियाँ इसे बोरिंग होने से बचा लेती हैं। अगर आपको नॉर्थ इंडिया की कच्ची और हिंसक कहानियाँ पसंद हैं, तो यह सीज़न आपको निराश नहीं करेगा।</div><div><br></div><div>रणदीप हुड्डा की Inspector Avinash Season 2 को 5 में से 3 स्टार।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 15 May 2026 14:07:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/inspector-avinash-2-review-randeep-hooda-swag-and-up-crime-drama</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sapne Vs Everyone Season 2 Review | दिल्ली की सत्ता और मुंबई के संघर्ष के बीच पिसते सपनों की कड़वी हकीकत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/sapne-vs-everyone-season-2-review-the-bitter-reality-of-dreams-crushed]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>TVF (The Viral Fever) हमेशा से मध्यम वर्ग की आकांक्षाओं और युवाओं के संघर्ष को पर्दे पर उतारने के लिए जाना जाता रहा है। 'Sapne Vs Everyone' का दूसरा सीज़न इसी विरासत को आगे बढ़ाता है, लेकिन इस बार कैनवास बड़ा है। यह सीरीज़ हमें दो अलग दुनियाओं—दिल्ली की आक्रामक राजनीति और मुंबई फिल्म इंडस्ट्री की अनिश्चितता—के बीच ले जाती है। अमरीश वर्मा द्वारा लिखित और निर्देशित यह सीज़न सिर्फ सपनों की बात नहीं करता, बल्कि उन सपनों को हासिल करने के लिए चुकाई जाने वाली भारी कीमत पर सवाल उठाता है।</div><div><b><br></b></div><div><b>ओटीटी प्लेटफॉर्म: YouTube (TVF)</b></div><div><b>निर्देशक और लेखक: अमरीश वर्मा</b></div><div><b>कलाकार: अमरीश वर्मा, परमवीर सिंह चीमा, अभिषेक चौहान, विजयांत कोहली</b></div><div><br></div><h2>कहानी: दो शहर, दो रास्ते</h2><div>सीज़न 2 की कहानी दो समानांतर रास्तों पर चलती है। एक तरफ जिमी मेहता (अमरीश वर्मा) है, जो दिल्ली/गुरुग्राम की रियल एस्टेट और राजनीति की दुनिया में अपना साम्राज्य खड़ा करना चाहता है। जिमी खुद को 'सेल्स गॉड' कहता है और उसका मानना है कि सफलता के लिए नैतिकता का बलिदान जायज है। उसका मुख्य टकराव अपने चाचा कुकरेजा (विजयांत कोहली) से है, जिनका राजनीतिक रसूख वह खत्म करना चाहता है। हालाँकि, टोनी (अभिषेक चौहान) की एंट्री जिमी के बुने हुए जाल को उलझा देती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/urvashi-rautela-at-cannes-2026-urvashi-rautela-dazzles-in-a-bold-sheer-silver-gown" target="_blank">Urvashi Rautela Cannes 2026 | उर्वशी रौतेला ने बोल्ड 'शीयर सिल्वर' गाउन में बिखेरा जलवा, पांचवीं बार किया भारत का प्रतिनिधित्व</a></h3><div><br></div><div>दूसरी तरफ जिमी का दोस्त प्रशांत (परमवीर सिंह चीमा) है, जो एक अभिनेता बनने का सपना लेकर मुंबई पहुँचता है। यहाँ कहानी का मिजाज बदल जाता है। प्रशांत का संघर्ष उन हजारों कलाकारों की कहानी है जो कास्टिंग एजेंट के चक्कर काटते हैं और एक मौके की तलाश में अपनी पहचान खोने से बचते हैं। जहाँ दिल्ली में जिमी 'शक्ति' (Power) के पीछे भाग रहा है, वहीं मुंबई में प्रशांत अपने 'मूल्यों' (Values) और ईमानदारी को बचाने की जद्दोजहद में है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: निर्देशन और लेखन</h2><div>अमरीश वर्मा इस सीज़न में एक ज़्यादा गहरा और परिपक्व नज़रिया लेकर आए हैं। वह दोनों शहरों के माहौल को बहुत ही खूबसूरती से पर्दे पर उतारने में कामयाब रहे हैं। दिल्ली के सीन में अधिकार और दबदबा दिखता है, जबकि मुंबई के सीन में हवा में घुला तनाव साफ़ महसूस होता है। अमरीश वर्मा अपनी कहानी कहने की कला से यह पक्का करते हैं कि कहानी असली लगे और उसका अंत हमेशा सफलता के साथ ही न हो।</div><div><br></div><div>यह शो किसी एक पक्ष का साथ लिए बिना, उम्मीदों और नैतिकता के बीच के संघर्ष को दिखाता है। फिर भी, इसकी स्क्रिप्ट और बेहतर हो सकती थी। बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने के लिए संघर्ष कर रहे कलाकारों के इर्द-गिर्द घूमने वाली कहानियाँ पहले भी कई बार दिखाई जा चुकी हैं, जिससे कहानी का आगे का हिस्सा पहले से ही पता चल जाता है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: एक्टिंग</h2><div>कलाकारों का अभिनय बहुत शानदार है। अमरीश वर्मा ने स्क्रिप्ट लिखने, निर्देशन करने और अभिनय करने—तीनों की ज़िम्मेदारी बखूबी निभाई है, और साथ ही जिमी मेहता के किरदार को भी गहराई दी है। उनके अभिनय में आत्मविश्वास, तीव्रता और हर चीज़ पर अपना नियंत्रण रखने की ज़बरदस्त चाह साफ़ झलकती है। हालाँकि उनके अभिनय में दूसरे कलाकारों की झलक भी दिखती है, फिर भी वे अपनी एक अलग ही छाप छोड़ते हैं। प्रशांत के किरदार में परमवीर सिंह चीमा ने बहुत ही संतुलित अभिनय किया है। उन्होंने एक संघर्षरत कलाकार की निराशा, उम्मीद और मन के द्वंद्व को बहुत ही स्वाभाविक ढंग से पेश किया है, जिससे दर्शक इस किरदार से खुद को आसानी से जोड़ पाते हैं।</div><div><br></div><div>सहायक कलाकारों में, अभिषेक चौहान ने टोनी के किरदार को बहुत ही बारीकी और असरदार ढंग से निभाकर उसे और भी ज़्यादा प्रभावशाली बना दिया है। प्रशांत के रूममेट—अश्विन और मनीष—का किरदार निभाने वाले अखिल कयामल और रजत दहिया ने भी अपने-अपने किरदारों के साथ पूरा न्याय किया है। मनीष का किरदार बहुत ही असली लगता है; वह एक हुनरमंद कलाकार तो है, लेकिन अपने हुनर ​​को लेकर उसका अपना ही नज़रिया उसकी राह में रुकावट बन जाता है। अंकल के किरदार में विजयंत कोहली ने बहुत ही सधा हुआ अभिनय किया है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: तकनीकी पहलू</h2><div>तकनीकी नज़रिए से देखें तो, यह सीरीज़ बहुत ही बढ़िया बनी है। इसकी सिनेमैटोग्राफी में रंगों और रोशनी का इस्तेमाल करके दोनों शहरों के बीच का अंतर साफ़ दिखाया गया है। दिल्ली का माहौल खुला और रोशन लगता है, जबकि मुंबई का माहौल कुछ तंग और घुटन भरा महसूस होता है। इसका बैकग्राउंड म्यूज़िक कहानी के मिज़ाज को और भी ज़्यादा उभारता है और उसमें तनाव पैदा करता है। इसकी एडिटिंग और भी ज़्यादा कसी हुई हो सकती थी, क्योंकि कुछ सीन थोड़े ज़्यादा लंबे लगते हैं, जिससे कहानी की रफ़्तार थोड़ी धीमी पड़ जाती है। इसके बावजूद, इसकी तकनीकी गुणवत्ता बहुत ही मज़बूत है।</div><div><br></div><h2>Sapne Vs Everyone S2: कमियाँ</h2><div>इसकी सबसे बड़ी कमी यह है कि इसका पूरा माहौल लगातार उदासी भरा रहता है। कभी-कभी तो इसे देखते रहना भी मुश्किल हो जाता है। इस शो में कोई भी हल्का-फुल्का या मज़ेदार पल नहीं है, जिससे यह और भी ज़्यादा असंतुलित सा लगता है। जिमी से जुड़े कुछ सीन थोड़े बढ़ा-चढ़ाकर दिखाए गए लगते हैं और वे असली दुनिया से कटे हुए लगते हैं। कहानी के अंत में कई ऐसे सवाल अधूरे रह जाते हैं जिनके जवाब नहीं मिलते; हो सकता है कि इन सवालों के जवाब अगले सीज़न में मिलें, लेकिन इसकी वजह से यह मौजूदा सीज़न अधूरा सा लगता है।</div><div><br></div><div>'Sapne Vs Everyone Season 2' एक ईमानदार कोशिश है जो हमें यह याद दिलाती है कि सपने देखना जितना खूबसूरत है, उन्हें हकीकत में बदलना उतना ही क्रूर। यदि आप गंभीर ड्रामा और हकीकत से जुड़ी कहानियों के शौकीन हैं, तो यह सीरीज़ आपके लिए है। हालाँकि, पिछले सीज़न जैसी ताजगी की उम्मीद करने वालों को यह थोड़ी भारी लग सकती है।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:53:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/sapne-vs-everyone-season-2-review-the-bitter-reality-of-dreams-crushed</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[This Weekend New OTT Releases | रणवीर सिंह की 'धुरंधर' से सैफ की 'कर्तव्य' तक, इस हफ्ते रिलीज हो रही हैं ये बड़ी फिल्में और सीरीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/dhurandhar-2-to-kartavya-these-big-films-and-series-are-releasing-this-week-on-ott]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><p data-path-to-node="1">जैसे-जैसे गर्मी का पारा चढ़ रहा है, लोगों का रुझान घर के अंदर रहकर मनोरंजन का आनंद लेने की ओर बढ़ गया है। ओटीटी प्रेमियों के लिए यह हफ्ता बेहद खास होने वाला है। नेटफ्लिक्स से लेकर जियो हॉटस्टार तक, एक्शन, क्राइम और इमोशन से भरपूर कई बड़ी फिल्में और वेब सीरीज दस्तक देने के लिए तैयार हैं।&nbsp;</p></div><div>Prime Video, Netflix, Jio Hotstar और Zee5 पर इस हफ़्ते रिलीज़ होने वाली फ़िल्मों और सीरीज़ की लिस्ट यहाँ देखें:</div><div><br></div><h2>Dhurandhar: The Revenge</h2><div>एक महीने से ज़्यादा समय तक सिनेमाघरों में धूम मचाने के बाद, ब्लॉकबस्टर फ़िल्म Dhurandhar: The Revenge आखिरकार OTT प्लेटफ़ॉर्म पर आने के लिए तैयार है। आदित्य धर द्वारा निर्देशित और रणवीर सिंह, सारा अर्जुन, संजय दत्त, अर्जुन रामपाल और आर. माधवन अभिनीत, यह फ़िल्म भारतीय बॉक्स ऑफ़िस पर सफलतापूर्वक 1000 करोड़ रुपये के क्लब में शामिल हो गई है। यह उपलब्धि हासिल करने वाली यह पहली बॉलीवुड फ़िल्म है। दर्शक इसे 15 मई से Jio Hotstar पर देख सकते हैं।</div><div><br></div><h2>Kartavya</h2><div>यह पुलकित द्वारा निर्देशित एक क्राइम ड्रामा फ़िल्म है। खास बात यह है कि इस फ़िल्म को शाहरुख खान की पत्नी, गौरी खान ने प्रोड्यूस किया है। Red Chillies Entertainment के बैनर तले बनी इस फ़िल्म में सैफ़ अली खान, रसिका दुगल, संजय मिश्रा और मनीष चौधरी जैसे कई बड़े कलाकार शामिल हैं। सैफ़ अली खान फ़िल्म में एक पुलिस अधिकारी की भूमिका में नज़र आएंगे। यह फ़िल्म 15 मई से Netflix पर स्ट्रीम होना शुरू हो जाएगी।</div><div><br></div><h2>Exam</h2><div>यह नेशनल अवॉर्ड विजेता ए. सरकुनम द्वारा लिखी और निर्देशित एक तमिल ड्रामा सीरीज़ है। यह शो एक प्रतियोगी परीक्षा के माहौल के भारी दबाव के बीच बुनी गई एक तनावपूर्ण और भावनात्मक यात्रा पर आधारित है। Exam सीरीज़ 15 मई से Prime Video पर उपलब्ध होगी।</div><div><br></div><h2>Inspector Avinash Season 2</h2><div>रणदीप हुड्डा, उर्वशी रौतेला, अमित सियाल, शालिन भनोट, राहुल मित्रा, ज़ाकिर हुसैन, आयशा एस. अयमान और ज़ोहेब फ़ारूक़ी जैसे कलाकारों से सजी Inspector Avinash का दूसरा सीज़न भी इस हफ़्ते OTT प्लेटफ़ॉर्म पर आने के लिए तैयार है। यह सीरीज़ अविनाश मिश्रा की कहानी बताती है, जो UP पुलिस के एक अधिकारी और STF के प्रमुख हैं, और जो गैंगस्टरों को निशाना बनाते हैं। यह सीरीज़ 15 मई से Jio Hotstar पर स्ट्रीम होना शुरू होगी।</div><div><br></div><h2>The Crash</h2><div>यह एक क्राइम-बेस्ड डॉक्यूमेंट्री है। The Crash 2022 की एक सच्ची घटना पर आधारित है, जिसमें ओहियो की 17 साल की किशोरी, मैकेंज़ी शिरिला ने जान-बूझकर अपनी कार को 100 मील प्रति घंटे की रफ़्तार से एक ईंटों वाली इमारत से टकरा दिया था। इस घटना के परिणामस्वरूप उसके बॉयफ्रेंड, डोमिनिक रूसो और उसके दोस्त, डेवियन फ़्लैनगन, दोनों की मौत हो गई थी। उसे 12 गंभीर अपराधों का दोषी ठहराया गया और आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई। The Crash 15 मई से Netflix पर स्ट्रीम करने के लिए उपलब्ध होगी।</div><div><br></div><h2>Marty, Life Is Short</h2><div>कॉमेडियन मार्टिन शॉर्ट पर केंद्रित यह आने वाली डॉक्यूमेंट्री, थिएटर और कॉमेडी की दुनिया में उनके शानदार और चर्चित करियर को दिखाती है। यह कॉमेडी में उनके 50 साल के सफ़र के उतार-चढ़ावों को बयां करती है और उनकी स्थायी विरासत को दिखाती है। इस फ़िल्म में उनके करियर के दुर्लभ फ़ुटेज के साथ-साथ उनके करीबी दोस्तों और सह-कलाकारों के खास इंटरव्यू भी शामिल हैं। दर्शक इस डॉक्यूमेंट्री को 12 मई से Netflix पर देख सकते हैं। गौरतलब है कि मार्टिन शॉर्ट एक कनाडाई कॉमेडियन, अभिनेता और लेखक हैं।</div><h2><br>Berlin and the Lady with an Ermine</h2><div>Berlin and the Lady with an Ermine, Money Heist का आठ-एपिसोड का एक स्पिन-ऑफ़ है। स्पेन के सेविले में सेट, यह बर्लिन (पेड्रो अलोंसो) और उसकी टीम की कहानी बताती है, जो एक मिशन को अंजाम देने के लिए वापस आते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood" target="_blank" style="background-color: rgb(255, 255, 255); font-size: 1rem;"><span style="font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif; background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial;">Entertainment News Hindi </span></a><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">Today
only at Prabhasakshi</span><span style="background-image: initial; background-position: initial; background-size: initial; background-repeat: initial; background-attachment: initial; background-origin: initial; background-clip: initial; font-size: 1rem; font-family: &quot;Segoe UI&quot;, sans-serif;">&nbsp;</span>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 11 May 2026 11:57:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/dhurandhar-2-to-kartavya-these-big-films-and-series-are-releasing-this-week-on-ott</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Daadi Ki Shaadi Movie Review: कपिल शर्मा और नीतू कपूर की अकेलेपन और बुढ़ापे की एक इमोशनल कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/daadi-ki-shaadi-movie-review-loneliness-and-old-age-starring-kapil-sharma-and-neetu-kapoor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब कोई फ़िल्म इंसानी रिश्तों की जटिलताओं को सादगी के साथ पर्दे पर उतारती है, तो वह सीधे दर्शकों के दिलों में जगह बना लेती है। आज सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई 'दादी की शादी' एक ऐसी ही संवेदनशील फ़िल्म है जो मनोरंजन के साथ-साथ समाज की रूढ़ियों पर भी प्रहार करती है। आज, 8 मई को सिनेमाघरों में रिलीज़ हुई यह फ़िल्म न सिर्फ़ मनोरंजन करती है, बल्कि हमारे समाज में बुज़ुर्गों के अकेलेपन और उनकी इच्छाओं के बारे में एक ज़रूरी बातचीत भी शुरू करती है। इस फ़िल्म की सबसे बड़ी खासियत कपूर परिवार की तीन पीढ़ियों का एक साथ आना और रिद्धिमा कपूर साहनी का बहुप्रतीक्षित डेब्यू है।</div><div><br></div><h2>कहानी: जब दादी ने किया दोबारा शादी का फैसला</h2><div>फ़िल्म की शुरुआत शिमला की खूबसूरत और शांत वादियों से होती है, जहाँ विमला आहूजा (नीतू कपूर) अपने आलीशान बंगले में अकेले वक्त गुज़ार रही हैं। कहानी में हलचल तब मचती है जब विमला सोशल मीडिया पर अपनी दूसरी शादी का ऐलान कर देती हैं। यह खबर उनके बेटों और बेटी सुनैना (रिद्धिमा कपूर साहनी) के लिए किसी बिजली गिरने से कम नहीं होती।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/aashka-goradia-and-brent-goble-welcome-a-baby-boy" target="_blank">Aashka Goradia-Brent Goble के घर गूंजी दूसरी बार किलकारी, बेटे के स्वागत पर दिव्यांका त्रिपाठी और मौनी रॉय ने लुटाया प्यार</a></h3><div><br></div><div>इधर विमला की पोती कनिका (सादिया ख़तीब) की सगाई दिल्ली के एक ठेठ पंजाबी परिवार के लाडले टोनी कालरा (कपिल शर्मा) से होने वाली है। जैसे ही विमला की शादी की बात सामने आती है, सगाई टूट जाती है और पूरा परिवार विमला को 'रोकने' के लिए शिमला धावा बोल देता है। यहीं एंट्री होती है रिटायर्ड कर्नल थीरन देवराजन (आर. सरथकुमार) की, जो विमला के जीवनसाथी बनने वाले हैं। इसके बाद शुरू होता है भावनाओं, कॉमेडी और ड्रामा का एक दिलचस्प सफर।</div><div><br></div><h2>दादी की शादी: निर्देशन और स्क्रीनप्ले</h2><div>आशीष आर. मोहन ने एक बहुत ही साहसी और संवेदनशील विषय चुना है। हमारे समाज में बुज़ुर्गों की दोबारा शादी को आज भी एक वर्जित विषय माना जाता है, लेकिन डायरेक्टर ने इसे बिना किसी उपदेश के, बहुत ही सहजता से पेश किया है। फ़िल्म का पहला हाफ़ बहुत ही जोशीला है। एक शोर-शराबे वाले पंजाबी परिवार और एक शांत व अनुशासित दक्षिण भारतीय व्यक्ति (कर्नल थीरन) के बीच का टकराव, पर्दे पर कॉमेडी और ड्रामा का एक बेहतरीन मेल तैयार करता है। हालाँकि, फ़िल्म की लंबाई (ढाई घंटे) थोड़ी ज़्यादा लगती है। इंटरवल के बाद, कहानी कुछ जगहों पर उन्हीं भावनाओं को दोहराती हुई लगती है, जिससे इसकी गति थोड़ी धीमी हो जाती है। फिर भी, डायरेक्टर की ईमानदारी तारीफ़ के काबिल है; उन्होंने भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं किया और कहानी को ज़मीन से जुड़ा रखा। फ़िल्म की लंबाई थोड़ी कम की जा सकती थी। दूसरे हाफ़ में फ़िल्म की गति धीमी हो जाती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/salman-abhishek-and-vidya-charged-no-fee-for-raja-shivaji-riteish-deshmukh" target="_blank">Raja Shivaji के लिए सलमान खान, अभिषेक और विद्या ने नहीं ली कोई फीस, Riteish Deshmukh ने खोला फिल्म की सफलता का राज</a></h3><div><br></div><div>'दादी की शादी' एक अहम सवाल छोड़ जाती है: क्या एक उम्र के बाद इंसान को किसी साथी की ज़रूरत नहीं रह जाती? यह फ़िल्म यह संदेश देती है कि बुज़ुर्गों को न सिर्फ़ अपने बच्चों और पोते-पोतियों की देखभाल की ज़रूरत होती है, बल्कि उन्हें मानसिक और भावनात्मक साथ की भी ज़रूरत होती है। फ़िल्म की लंबाई थोड़ी कम हो सकती थी। दूसरे हाफ़ में फ़िल्म की गति धीमी हो जाती है।</div><div><br></div><h2>'दादी की शादी': एक्टिंग</h2><div>नीतू कपूर इस फ़िल्म की जान हैं। उन्होंने विमला के किरदार को इतनी नज़ाकत और गहराई से निभाया है कि उनकी खामोशी में भी आप उनका अकेलापन महसूस कर सकते हैं। उनकी मुस्कान के पीछे छिपा दुख और अपनी शर्तों पर ज़िंदगी जीने का उनका जज़्बा फ़िल्म को एक भावनात्मक आधार देता है। कपिल शर्मा इस फ़िल्म में एक सुखद सरप्राइज़ बनकर उभरे हैं। उन्होंने अपनी जानी-पहचानी कॉमेडी वाली इमेज से हटकर एक बहुत ही संयमित और गंभीर परफ़ॉर्मेंस दी है। टोनी के किरदार में उन्होंने यह साबित कर दिया है कि वे न सिर्फ़ लोगों को हँसाने में माहिर हैं, बल्कि भावनात्मक दृश्यों में भी उनकी एक्टिंग ज़बरदस्त है। सादिया ख़तीब अपनी ताज़गी से फ़िल्म में जान डाल देती हैं, वहीं आर. सरथकुमार कर्नल के किरदार में एक अनोखा दबदबा और नज़ाकत दिखाते हैं।</div><div><br></div><div>रिद्धिमा कपूर साहनी ने अपने एक्टिंग डेब्यू में एक आत्मविश्वास से भरी भावना दिखाई है। उन्होंने एक ऐसी बेटी का किरदार निभाया है जो विदेश में रहती है और मुश्किल समय में अपने परिवार के साथ खड़ी रहती है। स्क्रीन पर उनकी मौजूदगी बहुत सहज लगती है, और वे कभी भी बेमेल नहीं लगतीं। वहीं, कपूर परिवार की सबसे छोटी सदस्य समारा साहनी ने अपनी छोटी सी भूमिका और 'Senti' गाने में अपनी परफ़ॉर्मेंस से सबका दिल जीत लिया। तीन पीढ़ियों (नीतू, रिद्धिमा और समारा) को एक ही फ़्रेम में एक साथ देखना एक ऐतिहासिक पल जैसा लगा। यह फ़िल्म उस ताक़त को दिखाती है जो कपूर परिवार की महिलाओं ने दशकों से सिनेमा को दी है।</div><div><br></div><h2>'दादी की शादी': तकनीकी पहलू</h2><div>फ़िल्म के डायलॉग बहुत ही यथार्थवादी हैं। ये किसी फ़िल्मी ड्रामा जैसे नहीं लगते, बल्कि ऐसे लगते हैं जैसे आपके घर में ही बातचीत हो रही हो। इसका ह्यूमर बहुत नैचुरल है और किरदारों की आपसी नोक-झोंक से पैदा होता है। म्यूज़िक के मामले में, गाने फ़िल्म के मूड को सपोर्ट करते हैं। 'Senti' एक मज़ेदार ट्रैक है, जबकि 'Suno Na Dil' दिल को सुकून देने वाला गाना है। बैकग्राउंड स्कोर फ़िल्म के इमोशनल टोन को बिना उस पर हावी हुए बनाए रखने में मदद करता है।</div><div><br></div><div>'Daadi Ki Shaadi' एक ऐसी फ़िल्म है जिसे आप अपने पूरे परिवार के साथ देख सकते हैं। यह आपको हँसाएगी, थोड़ा रुलाएगी, और आखिर में आपके चेहरे पर एक मुस्कान छोड़ जाएगी। अगर आप एक साफ़-सुथरी, अर्थपूर्ण और दिल को छू लेने वाली फ़ैमिली फ़िल्म की तलाश में हैं, तो यह एक बेहतरीन चॉइस है। कुल मिलाकर, 'Daadi Ki Shaadi' एक ताज़ी हवा के झोंके जैसी है, जो पुरानी रूढ़ियों को तोड़ती है।</div><div><br></div><div>3.5 रेटिंग के साथ, यह फ़िल्म अपनी सादगी और ईमानदारी के लिए ज़रूर देखी जानी चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div><div>स्टार रेटिंग: 3.5/5</div><div>डायरेक्टर: आशीष आर. मोहन</div><div>मुख्य कलाकार: नीतू कपूर, कपिल शर्मा, रिद्धिमा कपूर साहनी, आर. सरथकुमार, सादिया ख़तीब</div><div>रिलीज़ डेट: 8 मई, 2026</div></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 08 May 2026 16:12:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/daadi-ki-shaadi-movie-review-loneliness-and-old-age-starring-kapil-sharma-and-neetu-kapoor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ek Din Movie Review | जापान की हसीन वादियों में खोई कहानी, जुनैद खान और साई पल्लवी की केमिस्ट्री रही बेअसर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ek-din-movie-review-junaid-khan-and-sai-pallavi-chemistry-falls-flat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसी भी प्रेम कहानी की सफलता उसके किरदारों के बीच की 'स्पार्क' और केमिस्ट्री पर टिकी होती है। निर्देशक सुनील पांडे की फिल्म 'एक दिन' जापान की खूबसूरती और बर्फीले नज़ारों को कैमरे में कैद करने में तो सफल रही है, लेकिन जज़्बातों के मामले में यह फिल्म दर्शकों के दिल तक पहुँचने में नाकाम साबित होती है। जुनैद खान और साई पल्लवी जैसे कलाकारों के होने के बावजूद, फिल्म एक सुंदर लेकिन बेजान 'ट्रैवल ब्रोशर' बनकर रह जाती है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ameesha-patel-flight-stranded-amidst-missile-attacks-in-gulf-relief-in-mumbai-after-24-hours" target="_blank">मौत को छूकर भारत लौटीं 'सकीना'! खाड़ी में मिसाइल अटैक के बीच फँसा Ameesha Patel का विमान, 24 घंटे बाद मुंबई में ली राहत की सांस</a></h3><div><br></div><div><b>कहानी: याददाश्त की बीमारी और एकतरफा प्यार</b></div><div>फिल्म की कहानी दिनेश (जुनैद खान) के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो नोएडा की एक आईटी कंपनी में काम करने वाला एक अंतर्मुखी (Introvert) युवक है। वह अपनी सहकर्मी मीरा (साई पल्लवी) से खामोश मोहब्बत करता है। कहानी में मोड़ तब आता है जब ऑफिस ट्रिप के दौरान जापान में मीरा को TGA (Transient Global Amnesia) नामक बीमारी का पता चलता है।</div><div><br></div><div>इस स्थिति में मीरा की याददाश्त एक दिन के बाद मिट जाती है। दिनेश जापानी देवताओं से मन्नत मांगता है कि मीरा को उससे प्यार हो जाए—भले ही सिर्फ एक दिन के लिए। उसकी मुराद पूरी तो होती है, लेकिन एक दर्दनाक शर्त के साथ कि अगली सुबह मीरा को कुछ भी याद नहीं रहेगा।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/bandar-after-animal-another-sensation-from-bobby-deol" target="_blank">Bandar Movie | 'एनिमल' के बाद Bobby Deol का एक और धमाका, 90s के रॉकस्टार लुक में जीता फैंस का दिल</a></h3><div>&nbsp;</div><div><b>एक दिन: परफॉर्मेंस</b></div><div>परफॉर्मेंस के मामले में, साई पल्लवी अपने हिंदी डेब्यू में पूरी ईमानदारी लाती हैं। शांत पलों में उनकी मासूमियत और जज़्बाती गहराई फिल्म के सबसे मज़बूत पहलुओं में से एक बनकर उभरती है। वह मीरा के किरदार में जान डालने की पूरी कोशिश करती हैं, लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें एक आज़ाद महिला के बजाय एक बेबस किरदार के तौर पर ज़्यादा दिखाती है।</div><div><br></div><div>जुनेद खान अपनी पिछली परफॉर्मेंस के मुकाबले ज़्यादा संयमित नज़र आते हैं। दिनेश के तौर पर उनकी सादगी साफ़ झलकती है, लेकिन एक एक्टर के तौर पर, उनमें अभी भी वह स्क्रीन प्रेज़ेंस नहीं है जो दर्शकों को पूरी तरह से बांधे रख सके। संयम असरदार हो सकता है, लेकिन यहाँ यह फिल्म की रफ़्तार धीमी कर देता है। कुणाल कपूर एक छोटे लेकिन असरदार कैमियो में नज़र आते हैं, हालाँकि उनके पास करने के लिए ज़्यादा कुछ नहीं है।</div><div><br></div><div>फिल्म की सबसे बड़ी कमज़ोरी जुनेद और साई पल्लवी के बीच केमिस्ट्री की कमी है। किसी भी मोड़ पर दर्शकों को यह महसूस नहीं होता कि वे एक-दूसरे से प्यार करते हैं। उनका जुड़ाव इतना फीका लगता है कि कभी-कभी वे रोमांटिक पार्टनर के बजाय दूर के जान-पहचान वाले ज़्यादा लगते हैं। उस चिंगारी के बिना, दर्शकों के लिए कहानी से जुड़ना मुश्किल हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>एक दिन: डायरेक्शन और तकनीकी पहलू</b></div><div>सुनील पांडे का डायरेक्शन तकनीकी रूप से तो ठीक है, लेकिन जज़्बाती तौर पर कमज़ोर है। वह जापान की खूबसूरती को स्क्रीन पर दिखाने में कामयाब रहते हैं। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। होक्काइडो की बर्फ़ से ढकी सड़कें, सर्दियों की हल्की रोशनी और पोस्टकार्ड जैसे फ्रेम फिल्म को एक सिनेमाई अनुभव के बजाय एक ट्रैवल ब्रोशर जैसा ज़्यादा बनाते हैं।</div><div><br></div><div>संगीत की बात करें तो, अरिजीत सिंह का एक गाना है जो सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन फिल्म खत्म होते ही आसानी से भुला दिया जाता है। एडिटिंग भी खास असरदार नहीं है, और फिल्म की रफ़्तार कभी-कभी इतनी धीमी हो जाती है कि यह दर्शकों के सब्र का इम्तिहान लेती है। फिल्म की रिलीज़ का समय भी इसके खिलाफ जाता है; अप्रैल की गर्मी के बजाय यह सर्दियों या वैलेंटाइन डे के आस-पास रिलीज़ होती तो ज़्यादा सही रहता।</div><div><br></div><div><b>एक दिन: डायरेक्शन का नज़रिया</b></div><div>यह फिल्म थाई फिल्म 'वन डे' का ऑफिशियल रीमेक है, लेकिन यह कहानी को भारतीय sensibilities के हिसाब से पूरी तरह से ढाल नहीं पाती, जिससे यह ओरिजिनल न लगे। डायरेक्टर दिनेश को एक 'प्यारा nerd' बनाने की कोशिश करते हैं, लेकिन वह आखिर में अपनी ही दुनिया में खोया हुआ एक किरदार बनकर रह जाता है। फिल्म निस्वार्थ प्रेम का विचार पेश करने की कोशिश करती है, लेकिन उस संदेश को मज़बूती देने के लिए ज़रूरी गहराई इसमें नदारद है।</div><div><br></div><div><b>एक दिन: फैसला</b></div><div>'एक दिन' एक ऐसी फिल्म है जिसके इरादे तो अच्छे हैं, लेकिन नतीजे उम्मीद से कमज़ोर हैं। यह बॉलीवुड के पुराने 'साफ़-सुथरे रोमांस' वाले अंदाज़ को वापस लाने की कोशिश करती है, जो आज के ज़्यादा गंभीर कंटेंट के बीच ताज़गी भरा हो सकता था, लेकिन इसमें जान की कमी है। जापान के खूबसूरत नज़ारों, साई पल्लवी के आकर्षण और ज़बरदस्त सिनेमैटोग्राफ़ी के बावजूद, यह फ़िल्म अपनी धीमी रफ़्तार और मुख्य किरदारों के बीच केमिस्ट्री की कमी की वजह से कमज़ोर पड़ जाती है। यह एक ऐसी कहानी है जो बिना कोई गहरी छाप छोड़े आती है और चली जाती है—ठीक वैसे ही, जैसे फ़िल्म की हीरोइन, जो अगले ही दिन सब कुछ भूल जाती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 06 May 2026 15:06:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ek-din-movie-review-junaid-khan-and-sai-pallavi-chemistry-falls-flat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[The Devil Wears Prada 2 Movie Review: बदलते दौर में मिरांडा प्रीस्टली का नया और संवेदनशील अवतार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-movie-review-in-hindi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">लगभग दो दशकों के लंबे इंतज़ार के बाद, फैशन और कॉर्पोरेट जगत की सबसे चर्चित फिल्म का सीक्वल 'द डेविल वियर्स प्राडा 2' पर्दे पर लौट आया है। जहाँ पहली फिल्म ने फैशन की चकाचौंध के बीच सत्ता और महत्वाकांक्षा की कड़वी सच्चाई दिखाई थी, वहीं यह सीक्वल डिजिटल युग, AI (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) के खतरों और पुराने किरदारों के आत्म-मंथन की एक दिलचस्प दास्तां पेश करता है।</span></div><div><br></div><h2>कहानी: 'रनवे' की दुनिया में डिजिटल बदलाव</h2><div><div>कहानी एंडी सैक्स के इर्द-गिर्द घूमती है। कहीं और सालों तक एक शानदार करियर बनाने के बाद, वह एक बार फिर 'रनवे' मैगज़ीन की दुनिया में वापस खिंची चली आती है। यह उसकी अपनी मर्ज़ी से नहीं, बल्कि ज़रूरत के चलते होता है; इसी वजह से उसे एक ऐसे माहौल में काम पर लौटना पड़ता है, जहाँ उसके जाने के बाद से काफ़ी कुछ बदल चुका है। इस किरदार का यह नया रूप—जिसमें वह एक समझदार, लेकिन कुछ हद तक अनिश्चित महिला के तौर पर नज़र आती है—फ़िल्म को एक दिलचस्प मोड़ देता है। जो दुनिया कभी सिर्फ़ प्रिंट मीडिया तक सीमित थी, अब उसकी जगह डिजिटल मीडिया ले रहा है, और पुरानी-मानी-जानी मैगज़ीनें खुद को खतरे में महसूस कर रही हैं।</div><div><br></div><div>इसी माहौल में नज़र आती है मिरांडा प्रीस्टली, जो पहले के मुकाबले अब एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहाँ उसे समझ नहीं आ रहा कि क्या करे। अब वह पहले की तरह किसी चुटीले ताने या तीखी नज़र से इन खतरों को नज़रअंदाज़ नहीं कर सकती, बल्कि उसे इन वास्तविकताओं को स्वीकार करना ही होगा। उसे अपनी पहचान से समझौता किए बिना, इस नए माहौल में ढलने का कोई न कोई रास्ता ढूँढ़ना होगा—और फ़िल्म इसी पहलू को गहराई से टटोलने की कोशिश करती है। इस कहानी में एमिली के साथ का तनाव भी शामिल है, जो खुद भी कहानी के दौरान काफ़ी बदलती है। इसके बावजूद, कहानी पर कई छोटी-छोटी उप-कहानियों (subplots) का बोझ कुछ ज़्यादा ही लगता है; इनमें कॉर्पोरेट और निजी, दोनों तरह के मुद्दे शामिल हैं, जो उम्मीद के मुताबिक पूरी तरह से उभरकर सामने नहीं आ पाते। हालाँकि फ़िल्म का मूल विचार काफ़ी दिलचस्प है, लेकिन इसके प्रस्तुतीकरण (execution) में कुछ कमियाँ ज़रूर नज़र आती हैं।</div></div><div><br></div><h2>अभिनय: कलाकारों ने फूँकी जान</h2><div>फिल्म की सबसे बड़ी ताकत इसके पुराने कलाकारों की वापसी और उनका परिपक्व अभिनय है:</div><div><br></div><div>मेरिल स्ट्रीप: मिरांडा के रूप में उन्होंने एक ऐसी सूक्ष्म कमजोरी (vulnerability) दिखाई है, जो पहले कभी नहीं देखी गई। वह अब केवल एक 'बॉस' नहीं, बल्कि एक इंसान के रूप में उभरती हैं।</div><div><br></div><div>ऐनी हैथवे: एंडी के रूप में ऐनी ने परिपक्वता और पुरानी असुरक्षाओं के बीच एक बेहतरीन संतुलन बनाया है।</div><div><br></div><div>एमिली ब्लंट और स्टेनली टुची: एमिली के जानदार दृश्य और स्टेनली टुची की सहज मौजूदगी फिल्म को एक मजबूत आधार देती है।</div><div><br></div><h2>लेखन और निर्देशन: धारदार संवादों की कमी?</h2><div>निर्देशन के स्तर पर फिल्म पुरानी यादों (nostalgia) और भविष्य की चुनौतियों के बीच झूलती रहती है। फिल्म में वह 'ड्राई विट' (सूखा हास्य) तो है, लेकिन संवादों में पहली फिल्म जैसी तीखापन और धार की थोड़ी कमी खलती है। पटकथा पिछली बार के मुकाबले कुछ नरम है। हालाँकि, यह फिल्म फैशन की दुनिया की आलोचना करने के बजाय, अधिक सहानुभूतिपूर्ण और सोच-विचार वाला नजरिया अपनाती है।</div><div><br></div><h2>तकनीकी पक्ष और संगीत</h2><div>तकनीकी रूप से फिल्म ऊंचे मानकों पर खरी उतरती है:</div><div><br></div><div>सिनेमैटोग्राफी और कॉस्ट्यूम: फैशन की दुनिया का तनाव और चकाचौंध पर्दे पर बखूबी दिखता है, हालांकि यह पहली फिल्म जितना 'आइकॉनिक' नहीं बन पाया है।</div><div><br></div><div>साउंडट्रैक: फिल्म का संगीत इसे आधुनिक एहसास देता है। विशेष रूप से लेडी गागा की उपस्थिति और महिलाओं पर केंद्रित उनका गीत दर्शकों पर गहरा प्रभाव छोड़ता है।</div><div><br></div><div>एडिटिंग: फिल्म की गति पहले घंटे के बाद थोड़ी धीमी पड़ती है और कुछ सब-प्लॉट्स (उप-कहानियां) कहानी पर बोझ जैसी लगती हैं।</div><h2><br>निष्कर्ष: क्या यह देखने लायक है?</h2><div>'द डेविल वियर्स प्राडा 2' एक ऐसी फिल्म है जो पुरानी यादों का जश्न मनाती है और साथ ही आज के 'डिजिटल संकट' पर तीखा प्रहार करती है। यह पहली फिल्म की तरह शायद क्रांतिकारी न हो, लेकिन मेरिल स्ट्रीप और ऐनी हैथवे की जुगलबंदी के लिए इसे देखना एक सुखद अनुभव है।</div><div><br></div><div>रेटिंग: 3.5/5</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 04 May 2026 19:31:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-movie-review-in-hindi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Raja Shivaji Movie Review | 'राजा शिवाजी'- श्रद्धा और भव्यता का संगम, लेकिन सिनेमाई बारीकियों में कुछ कसर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raja-shivaji-movie-review-confluence-of-devotion-and-grandeur-yet-lacking-in-cinematic-nuances]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>छत्रपति शिवाजी महाराज भारतीय इतिहास के वह महानायक हैं, जिनका नाम सुनते ही हर भारतीय का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उनके जीवन पर आधारित किसी भी कलाकृति से दर्शकों का जुड़ाव केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह एक गहरी आस्था का विषय है। रितेश देशमुख ने अपने ड्रीम प्रोजेक्ट 'राजा शिवाजी' के जरिए इसी 'शिव-भाव' को पर्दे पर उतारने की कोशिश की है।</div><div><br></div><div><b>कहानी: स्वराज्य की नींव से अफजल खान के वध तक</b></div><div>फिल्म की शुरुआत 17वीं सदी के उस दौर से होती है जब महाराष्ट्र विदेशी आक्रमणकारियों के जुल्म से जूझ रहा था। फिल्म बहुत खूबसूरती से दिखाती है कि कैसे राजमाता जीजाबाई ने नन्हे शिवबा के मन में 'स्वराज्य' का बीज बोया। तोरणा, कोंढाणा और पुरंदर जैसे किलों की जीत के दृश्य दर्शकों में रोमांच भर देते हैं। फिल्म का मुख्य आकर्षण महाराज और अफजल खान (संजय दत्त) का वह ऐतिहासिक आमना-सामना है, जिसने इतिहास की धारा बदल दी थी। कहानी में एक अहम मोड़ तब आता है, जब आदिल शाह महाराज को गंभीरता से लेना शुरू करता है और उनके पिता, शाहजी राजे को बंदी बना लेता है। अफ़ज़ल खान का उदय और महाराज के साथ उसका ऐतिहासिक आमना-सामना ही इस फ़िल्म का मुख्य केंद्र है। यह सिर्फ़ युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि कूटनीति, बलिदान और 'स्वराज्य' के नाम से जाने जाने वाले अटूट संकल्प की भी कहानी है।</div><div><br></div><div><b>निर्देशन और अभिनय: जोश भरपूर, अनुभव में कमी</b></div><div>रितेश देशमुख ने इस फिल्म के साथ निर्देशन की कमान भी खुद संभाली है। उनका विजन भव्य है, लेकिन फिल्म कहीं-कहीं 'डेली सोप' जैसी मेलोड्रामैटिक लगने लगती है।</div><div><b>रितेश देशमुख:</b> उन्होंने महाराज के किरदार में अपनी पूरी आत्मा झोंक दी है। एक्शन और भावुक दृश्यों में वह प्रभावी हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>संजय दत्त: </b>अफजल खान के रूप में उनका खौफनाक अंदाज़ फिल्म के सबसे मजबूत पहलुओं में से एक है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>अभिषेक बच्चन और सलमान खान:</b> इन सितारों के कैमियो फिल्म की 'स्टार पावर' को बढ़ाते हैं, हालांकि अभिषेक के मराठी संवाद थोड़े असहज लगते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>विद्या बालन:</b> एक बेहतरीन अभिनेत्री होने के बावजूद उन्हें स्क्रीन पर बहुत कम समय मिला है।</div><div><br></div><div><b>राजा शिवाजी: क्या काम नहीं करता?</b></div><div>फिल्म की सबसे बड़ी कमी इसकी लंबाई और एडिटिंग है। तीन घंटे से ज़्यादा लंबी होने की वजह से, यह कई जगहों पर खिंची हुई सी लगती है। फिल्म की रफ़्तार ऊपर-नीचे होती रहती है, जिससे दर्शक कभी-कभी बेचैन हो सकते हैं। स्क्रीनप्ले में एकरूपता की कमी है, और सीन के बीच का बदलाव उतना सहज नहीं है जितना कि किसी विश्व-स्तरीय ऐतिहासिक ड्रामा में उम्मीद की जाती है। हालांकि एक्शन दृश्यों में तर्क खोजना व्यर्थ हो सकता है, फिर भी उन्हें एक सुसंगत संरचना की आवश्यकता होती है, जिसकी यहाँ कमी है। तकनीकी रूप से, फिल्म के कुछ हिस्से बहुत आधुनिक लगते हैं, जबकि अन्य पुराने ज़माने के प्रतीत होते हैं। यह असंतुलन इसके समग्र प्रभाव को थोड़ा कमज़ोर कर देता है।</div><div><br></div><div><b>राजा शिवाजी: तकनीकी पहलू</b></div><div>तकनीकी तौर पर, यह फ़िल्म मिली-जुली है। इसकी सिनेमैटोग्राफ़ी तारीफ़ के काबिल है, जिसमें महाराष्ट्र की सह्याद्री पर्वतमाला को बहुत खूबसूरती से दिखाया गया है, हालाँकि कुछ जगहों पर कलर ग्रेडिंग थोड़ी असमान लगती है। साउंड डिज़ाइन और बैकग्राउंड स्कोर औसत दर्जे के हैं और कई अहम पलों को उभारने में नाकाम रहते हैं। हालाँकि, अजय-अतुल का संगीत ही इस फ़िल्म की जान है। छत्रपति शिवाजी महाराज का एंथम और फ़िल्म के गाने रोंगटे खड़े कर देने वाले हैं, जो अक्सर साधारण से दृश्यों को भी असाधारण बना देते हैं। एक बार फिर, अजय-अतुल ने यह साबित कर दिया है कि महाराज की विरासत का जश्न मनाने वाला संगीत रचने के मामले में उनका कोई सानी नहीं है।</div><div><br></div><div><b>राजा शिवाजी: फ़ैसला</b></div><div>'राजा शिवाजी' एक ऐसी फ़िल्म है जिसे दिमाग से नहीं, बल्कि दिल से महसूस किया जाना चाहिए। इसमें कुछ कमियाँ भी हैं; कभी-कभी यह थोड़ी कच्ची और बेतरतीब लगती है, खासकर इसकी एडिटिंग। फिर भी, जब परदे पर भगवा झंडा लहराता है और महाराज के जयकारे गूँजते हैं, तो सारी शिकायतें अपने-आप दूर हो जाती हैं। फ़िल्म के आखिरी 20 मिनट का क्लाइमैक्स और महाराज का अदम्य साहस दर्शकों को अपनी सीटों से उठकर तालियाँ बजाने पर मजबूर कर देता है। रितेश देशमुख ने अपनी पूरी क्षमता से महाराज को एक भव्य श्रद्धांजलि देने की कोशिश की है, और पूरी उम्मीद है कि यह फ़िल्म बॉक्स ऑफ़िस पर भी सफल होगी। इस फ़िल्म को सिर्फ़ इसकी सिनेमाई बारीकियों के लिए नहीं, बल्कि हमारे इतिहास से जुड़े जिस गौरव और सम्मान का यह एहसास कराती है, उसके लिए देखा जाना चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/riteish-deshmukh-looks-like-the-very-incarnation-of-shivaji-rgv-praises-raja-shivaji" target="_blank">'शिवाजी के साक्षात अवतार दिख रहे हैं Riteish Deshmukh',  RGV ने की 'राजा शिवाजी' की तारीफ, बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने मचाया धमाल</a></h3><div><br></div><div>अगर आप छत्रपति शिवाजी महाराज के भक्त हैं, तो आप इस फ़िल्म से एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव महसूस करेंगे। इसकी सिनेमाई कमियों के बावजूद, सिर्फ़ 'शिवराय' का नाम ही इस फ़िल्म को देखने के लिए काफ़ी है। 'राजा शिवाजी' एक भव्य, लेकिन कुछ हद तक असमान फ़िल्म है, जिसे रितेश देशमुख के महाराज के प्रति प्रेम और श्रद्धा ने एक सूत्र में पिरोकर रखा है। इसे उस चरम 'शिवराय-भाव' को महसूस करने के लिए ज़रूर देखें, जो अंततः आपके मन में एक ज़बरदस्त उत्साह और जोश भर देता है।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/salman-khan-surprise-role-in-raja-shivaji-stuns-fans" target="_blank">Riteish Deshmukh की फिल्म में Salman Khan का दमदार Cameo, थिएटर में बजीं सीटियां</a></h3><div><br></div><div><b>'राजा शिवाजी' को 5 में से 3 स्टार</b></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 02 May 2026 15:51:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/raja-shivaji-movie-review-confluence-of-devotion-and-grandeur-yet-lacking-in-cinematic-nuances</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[The Devil Wears Prada 2 Critics Reviews | स्टाइलिश सीक्वल को दोहराए गए प्लॉट के लिए आलोचना का सामना करना पड़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-critics-reviews]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'The Devil Wears Prada' का लंबे समय से इंतज़ार किया जा रहा सीक्वल शुक्रवार, 1 मई, 2026 को सिनेमाघरों में दस्तक देने के लिए तैयार है। फिल्म के प्रीमियर से पहले ही क्रिटिक्स के रिव्यू आने शुरू हो गए हैं, जो ऐनी हैथवे, मेरिल स्ट्रीप और एमिली ब्लंट की वापसी को लेकर मिली-जुली राय दे रहे हैं।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">बुधवार तक, 'The Devil Wears Prada 2' को Rotten Tomatoes पर 74 प्रतिशत की सम्मानजनक रेटिंग मिली है। अधिकांश समीक्षकों का मानना है कि फिल्म 'नॉस्टेल्जिया' (पुरानी यादों) और 'स्टाइल' के मामले में तो खरी उतरती है, लेकिन कहानी के मामले में यह मूल फिल्म की ही छाया नजर आती है।</span></div><div><br></div><h2>क्रिटिक्स की राय: कपड़ों का जलवा या कहानी की कमी?</h2><div><b>डेविड रूनी (The Hollywood Reporter): </b>रूनी के अनुसार, यह फिल्म एक ऑफिस ड्रामा के बजाय 'हाई फैशन' का प्रदर्शन ज्यादा लगती है। उन्होंने मुख्य कलाकारों के बीच के तालमेल की सराहना की, लेकिन निष्कर्ष निकाला कि फिल्म "काम की जगह पर आधारित कॉमेडी कम, बल्कि कपड़ों का एक शोकेस ज्यादा है।" उन्होंने बॉक्स ऑफिस पर इसकी जबरदस्त सफलता की भविष्यवाणी भी की।</div><div><br></div><div><b>चैंटेल बोज़िकविक (9Honey): </b>बोज़िकविक ने फिल्म के प्लॉट पर कड़ा प्रहार करते हुए लिखा, "ऐसा लगता है कि इस फिल्म के प्लॉट को छिपाकर रखने की कोई खास वजह थी—क्योंकि इसका कोई ठोस प्लॉट है ही नहीं।"</div><div><br></div><div><b>डेविड फ़ियर (Rolling Stone): </b>फ़ियर ने इसे पत्रकारों के लिए एक स्टाइलिश "हॉरर फिल्म" बताया है। उनका मानना है कि ग्लैमर के पीछे यह कहानी बदलते मीडिया परिदृश्य और इस इंडस्ट्री की कड़वी सच्चाई (प्रतिभा और कड़ी मेहनत का पतन) को उजागर करती है।</div><div><br></div><h2>पुराने किरदारों की चमक और नए बदलाव</h2><div>ब्रायन ट्रुइट (USA Today) का तर्क है कि सीक्वल मूल फिल्म की संरचना पर बहुत ज्यादा निर्भर है। हालांकि, उन्हें एंडी और एमिली के बीच बदलते रिश्तों में एक नई ताकत दिखी। सहायक कलाकारों में उन्होंने जस्टिन थेरॉक्स के "अजीब से AI-प्रेमी टेक-ब्रो" वाले किरदार को सबसे अलग और मजेदार बताया।</div><div><br></div><div>पीटर ब्रैडशॉ (The Guardian) ने फिल्म को "उत्साह से भरा मनोरंजन" बताया। उन्होंने खास तौर पर एंडी के उस 'बुने हुए स्वेटर' (knitwear) के कैमियो का जिक्र किया, जिसका पहली फिल्म में मिरांडा ने मजाक उड़ाया था।</div><div><br></div><h2>मिरांडा प्रीस्टली का जादू बरकरार</h2><div>बेथ वेब (Empire) और जस्टिन चांग (The New Yorker) ने मेरिल स्ट्रीप के अभिनय की गहराई की तारीफ की है। चांग लिखते हैं कि फिल्म निराशा और उम्मीद के सही तालमेल के साथ पेश की गई है। वहीं, वेब ने स्टेनली टुची (Nigel) की वापसी को फिल्म के लिए एक भावनात्मक सहारा बताया, जो अपने पॉकेट-स्क्वायर और हमदर्दी के साथ दर्शकों का दिल जीत लेते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>बेथ वेब, Empire&nbsp; ने कहा&nbsp;</b><span style="font-size: 1rem;">"मिरांडा की सत्ता और उनका प्रभाव आज भी पूरी तरह से बरकरार है—भले ही इस बार उनके सामने कोई ऐसा प्रतिद्वंद्वी न हो, जिसके ऊपर वह अपनी पूरी ताकत आज़मा सकें।"&nbsp;</span></div><h2>कलाकार और निर्माण टीम</h2><div>फिल्म में मूल निर्देशक डेविड फ्रैंकल और लेखिका एलाइन ब्रोश मैकेना की जोड़ी एक बार फिर साथ आई है। पुराने सितारों के अलावा, इस बार दर्शकों को कुछ नए चेहरे भी देखने को मिलेंगे</div><div>केनेथ ब्रानघ</div><div>सिमोन एशले</div><div>जस्टिन थेरॉक्स</div><div>लूसी लियू</div><div><br></div><div>फैंस के लिए खुशी की बात यह है कि स्टेनली टुची के अलावा पहली फिल्म के ट्रेसी थॉम्स और टिबोर फेल्डमैन भी पर्दे पर नजर आएंगे।</div><div><br></div><div>निष्कर्ष: यदि आप शानदार कपड़े, मेरिल स्ट्रीप का दबदबा और नॉस्टेल्जिया के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपके लिए एक ट्रीट है। हालांकि, यदि आप एक पूरी तरह से नई कहानी की उम्मीद कर रहे हैं, तो दोहराया गया प्लॉट आपको थोड़ा निराश कर सकता है। "बस इतना ही!"</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Apr 2026 13:35:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-devil-wears-prada-2-critics-reviews</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Candy and the Pizza Girl Movie Review: स्टाइल तो है, पर कहानी के नाम पर सिर्फ उलझन और शोर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/candy-and-the-pizza-girl-movie-review-it-style-but-in-name-of-story-nothing-confusion-and-noise]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय सिनेमा में डार्क कॉमेडी और नियो-नोयर (Neo-noir) जैसे जॉनर के साथ प्रयोग करना हमेशा से एक दोधारी तलवार रहा है। अगर कहानी कसी हुई हो तो यह 'डेली बेली' जैसा कल्ट क्लासिक बन जाती है, और अगर संतुलन बिगड़े तो यह दर्शकों के लिए एक थका देने वाला अनुभव बन जाता है। अखिल कपूर के निर्देशन में बनी 'Candy and the Pizza Girl' बदकिस्मती से दूसरी श्रेणी में खड़ी नज़र आती है। </div><div>&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">फिल्म का अजीब सा टाइटल और जिस तरह से इसे दर्शकों के सामने पेश किया गया, उससे हमें इससे काफी उम्मीदें थीं। जिसे एक ज़बरदस्त सिनेमैटिक अनुभव के तौर पर प्रमोट किया गया था, वह देखते-देखते एक थकाने वाला अनुभव बन जाता है। Delhi Belly जैसी फिल्मों के उलट, जहाँ अफरा-तफरी को एक कसी हुई स्क्रीनप्ले का सहारा मिला था, यहाँ सिर्फ अफरा-तफरी ही रह जाती है।</span></div><div><br></div><div><div><b>कहानी और स्क्रीनप्ले: इत्तेफाकों का अंबार</b></div><div>फिल्म की कहानी मुंबई की एक ही रात की है, जहाँ कई किरदारों की ज़िंदगियाँ आपस में टकराती हैं। "पिज़्ज़ा गर्ल" का आगमन एक बड़े रहस्य के रूप में दिखाया गया है, लेकिन लेखक यहाँ दर्शकों को बांधने में नाकाम रहे हैं।</div><div><br></div><div>कमज़ोर राइटिंग: फिल्म में होने वाले ट्विस्ट और मोड़ लॉजिक के बजाय महज इत्तेफाकों पर टिके लगते हैं।</div><div><br></div><div>नॉन-लीनियर स्ट्रक्चर: फिल्म को अलग-अलग समय के हिसाब से दिखाने (Non-linear) की कोशिश की गई है, लेकिन यह फिल्म की कमियों को ढंकने का एक औज़ार मात्र बनकर रह गई है।</div><div><br></div><div>इमोशनल गहराई: फिल्म में किरदारों के बीच कोई गहरा जुड़ाव महसूस नहीं होता, जिससे दर्शक फिल्म से कट जाते हैं।</div></div><div><br></div><div>सबसे बड़ी दिक्कत इसकी राइटिंग में है। ज़्यादातर झगड़े और ट्विस्ट, believable कहानी कहने के बजाय महज़ इत्तेफाक पर आधारित लगते हैं। डार्क कॉमेडी तब सफल होती है जब उसकी बेतुकी बातें फिल्म की दुनिया के हिसाब से सही लगती हैं। लेकिन, इस मामले में, चीज़ें बहुत ही नाज़ुक ज़मीन पर टिकी हैं, और नॉन-लीनियर तरीके का इस्तेमाल सिर्फ कमियों को छिपाने की एक कोशिश लगती है। इसमें इमोशनल गहराई बहुत कम है, और जो डायलॉग दार्शनिक लगने की कोशिश करते हैं, वे अक्सर ज़बरदस्ती के और बोरिंग लगते हैं।</div><div><br></div><div><b>Candy and the Pizza Girl: डायरेक्शन और विज़न</b></div><div>डायरेक्टर अखिल कपूर फिल्म को एक इंटरनेशनल इंडी प्रोजेक्ट जैसा लुक देने के लिए काफी उत्सुक लगते हैं। वह शहरी ज़िंदगी के स्याह पहलू को दिखाने पर ज़ोर देते हैं, लेकिन स्टाइल और कंटेंट के बीच सही तालमेल बिठाने में नाकाम रहते हैं। डायरेक्शन कमज़ोर है, क्योंकि फिल्म खुद ही यह तय नहीं कर पाती कि वह एक थ्रिलर बनना चाहती है या कॉमेडी।</div><div><br></div><div>फिल्म की गति (pacing) से जुड़ी समस्या काफी गंभीर है। भले ही कहानी सिर्फ एक रात की हो, लेकिन फिल्म इतनी धीमी गति से आगे बढ़ती है कि दर्शकों की दिलचस्पी खत्म होने लगती है। नियॉन लाइट्स और तंग गलियाँ देखने में भले ही अच्छी लगें, लेकिन बिना किसी इमोशनल टेंशन या कहानी की मज़बूत पकड़ के, ये तकनीकी बारीकियां बेमानी लगती हैं। जिसे सररियलिज़्म (अवास्तविकता) के तौर पर पेश किया गया है, वह कलात्मक कम और अस्त-व्यस्त ज़्यादा लगता है।</div><div><br></div><div><b>Candy and the Pizza Girl: एक्टिंग</b></div><div>काबिल कलाकारों के बावजूद, किरदारों की कमज़ोर राइटिंग एक्टर्स के दायरे को सीमित कर देती है। निनाद कामत ने बॉबी के किरदार में एक ज़ोरदार परफॉर्मेंस दी है। उनके हाव-भाव और बोलने का अंदाज़ उस पागलपन को दिखाते हैं जिसे डायरेक्टर दिखाना चाहते थे। फिर भी, उनकी एक्टिंग इतनी ज़्यादा है कि किरदार कभी-कभी भरोसेमंद लगने के बजाय परेशान करने वाला लगने लगता है। शिवानी सिंह ने कैंडी का किरदार बहुत ही खूबसूरती से निभाया है, जिससे इस शोर-शराबे के बीच थोड़ी राहत मिलती है। दुख की बात है कि उनके किरदार में गहराई की कमी है।</div><div><br></div><div>प्रिया बनर्जी, जो पिज़्ज़ा गर्ल का किरदार निभाती हैं, एक पूरी तरह से विकसित इंसान के बजाय एक प्रतीक ज़्यादा लगती हैं। रहस्यमयी लगने के बजाय, उनकी एक्टिंग अक्सर अस्पष्ट लगती है। सहायक कलाकार दारा संधू और निमिष शितोले अपनी पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन कमज़ोर बनावट की वजह से किसी के लिए भी अपनी छाप छोड़ पाना मुश्किल हो जाता है।</div><div><br></div><div><b>कैंडी और पिज़्ज़ा गर्ल: तकनीकी पहलू</b></div><div>तकनीकी तौर पर, यह फ़िल्म औसत दर्जे की है। इसकी सिनेमैटोग्राफ़ी मुंबई की नाइटलाइफ़ को दिखाने की कोशिश करती है। नियॉन रंगों और डच एंगल्स का ज़्यादा इस्तेमाल करके एक 'ट्रिपी' माहौल बनाने की कोशिश की गई है। शुरुआत में यह ताज़ा लगता है, लेकिन पूरी फ़िल्म में बार-बार दोहराए जाने पर, यह एक लंबे म्यूज़िक वीडियो जैसा लगने लगता है।</div><div><br></div><div>इसका म्यूज़िक और साउंड डिज़ाइन फ़िल्म के पागलपन भरे माहौल को और उभारने की कोशिश करते हैं, लेकिन कभी-कभी बैकग्राउंड स्कोर डायलॉग पर भारी पड़ जाता है। एडिटिंग भी 'कैंडी और पिज़्ज़ा गर्ल' का एक और कमज़ोर पहलू है। कई सीन ज़रूरत से ज़्यादा लंबे हैं, जबकि अचानक होने वाले बदलाव कहानी के प्रवाह को तोड़ देते हैं। अगर एडिटिंग थोड़ी और कसी हुई होती, तो यह फ़िल्म देखने में कहीं ज़्यादा अच्छी लगती।</div><div><br></div><div>कैंडी और पिज़्ज़ा गर्ल: फ़ैसला</div><div>'कैंडी और पिज़्ज़ा गर्ल' एक ऐसी फ़िल्म है जो कई चीज़ें बनने की कोशिश करती है, लेकिन कोई भी चीज़ ठोस रूप से नहीं बन पाती। कुछ अलग करने की कोशिश के लिए इसे तारीफ़ मिलनी चाहिए, लेकिन इसे सफल बनाने के लिए ज़रूरी बारीकी और अनुशासन की इसमें कमी है। जो लोग 'ब्लैक ह्यूमर' पसंद करते हैं, उन्हें भी शायद यह फ़िल्म मज़ेदार न लगे।</div><div><br></div><div>अगर आपको सिनेमा में नए-नए प्रयोग पसंद हैं और आपमें काफ़ी सब्र है, तो आप इसे एक बार आज़माकर देख सकते हैं। लेकिन ज़्यादातर दर्शकों के लिए, यह फ़िल्म दिशाहीन और बहुत ज़्यादा उलझी हुई लग सकती है। 'कुछ हटके' होने के बजाय, यह अक्सर 'बेकाबू' लगती है।</div><div><br></div><div>इसलिए, 'कैंडी और पिज़्ज़ा गर्ल' 5 में से 2 स्टार की हक़दार है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Apr 2026 13:50:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/candy-and-the-pizza-girl-movie-review-it-style-but-in-name-of-story-nothing-confusion-and-noise</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Ginny Weds Sunny 2 Review: न जादू, न लॉजिक... यह तो ट्रेजेडी है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ginny-weds-sunny-2-review-neither-magic-nor-logic-it-a-tragedy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">कुछ फिल्में आप जिज्ञासा के साथ देखने जाते हैं, कुछ उत्साह के साथ, और फिर कुछ ऐसी दुर्लभ फिल्में होती हैं जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं: आखिर इसे बनाया ही क्यों गया? 'गिन्नी वेड्स सनी 2' (Ginny Weds Sunny 2) इसी श्रेणी में मजबूती से खड़ी नजर आती है। यह एक ऐसी फिल्म है जहां कहानी बिखरी हुई है, संगीत याद नहीं रहता, और परफॉरमेंस पर आपका ध्यान नहीं टिकता। फिल्म खत्म होने के बाद आपको महसूस होता है कि अपनी सुबह के ढाई घंटे इसके लिए कुर्बान करना बिल्कुल जरूरी नहीं था।</span></div><div><br></div><div><b>कहानी: शादी ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य?</b></div><div>फिल्म की शुरुआत ऋषिकेश के एक छोटे शहर के लड़के सनी से होती है, जो कुश्ती में डूबा हुआ है और नेशनल टीम में जगह बनाने का सपना देखता है। लेकिन दुर्भाग्य से, कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं कि उस पर 'परेशान करने वाले' (pervert) का लेबल लग जाता है। दो साल बाद, हम देखते हैं कि उसके जीवन का नया मिशन है—शादी करना। क्योंकि जाहिर है, हमारे सिनेमा में शादी से बड़ा दुखों का कोई इलाज नहीं है! दिक्कत यह है कि कोई उससे शादी नहीं करना चाहता, और उसकी यही हताशा फिल्म का रनिंग जोक बन जाती है।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ गिन्नी है—एक आधुनिक, शिक्षित लड़की जो अपनी शर्तों पर जीती है। उसकी मां इंग्लिश टीचर है, लेकिन फिर भी शादी को लेकर वही जल्दबाजी वहां भी है। 2026 में भी हमारी फिल्में शादी को जीवन के अंतिम लक्ष्य और 'वैलिडेशन' के रूप में पेश कर रही हैं। सवाल यह है कि क्यों?</div><div><br></div><div><b>लॉजिक को मिली छुट्टी</b></div><div>निर्देशक प्रशांत झा हमें अरेंज मैरिज के उस पक्ष में ले जाते हैं जहां परिवार रिश्ता पक्का करने के लिए झूठ बोलते हैं। आज के डिजिटल युग में, जहां आपकी पूरी जिंदगी ऑनलाइन है, ये झूठ और भी बेतुके लगते हैं। एक दिल्ली की पढ़ी-लिखी लड़की का 10वीं फेल लड़के से शादी के लिए मान जाना और एक पिछड़े समाज वाले छोटे शहर में बसने के लिए तैयार होना, गले से नीचे नहीं उतरता।</div><div><br></div><div><b>कुछ अच्छे विचार, लेकिन कमजोर पकड़</b></div><div>फिल्म में कुछ प्रासंगिक विचारों को छूने की कोशिश की गई है, जो इसकी एकमात्र खूबी कही जा सकती है:</div><div><br></div><div><b>फेमिनिज्म की झलक: </b>फिल्म महिलाओं की समानता की उम्मीदों को स्वीकार करती है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>कंडीशनिंग: </b>यह दिखाया गया है कि कैसे महिलाओं के साथ बातचीत की कमी पुरुषों के रिश्तों की समझ को प्रभावित करती है।</div><div><br></div><div><b>मेंटालिटी पर चोट: </b>"पति होने का ईगो" और महिलाओं को जज करने वाली पुरुषों की मानसिकता पर भी फिल्म कटाक्ष करती है।</div><div><br></div><div>लेकिन समस्या यह है कि फिल्म इन गंभीर मुद्दों को सिर्फ 'टिक' करती चलती है, गहराई में नहीं जाती।</div><div><br></div><div><b>परफॉरमेंस: कलाकारों की मेहनत पर पानी</b></div><div>अभिनय के मामले में अविनाश तिवारी शानदार हैं। उन्हें अपनी गंभीर भूमिकाओं से हटकर एक मृदुभाषी और प्यार में डूबे पति के रूप में देखना सुखद है। मेधा शंकर के पास अपने पल हैं, खासकर इमोशनल दृश्यों में, लेकिन 'बबली' रोल में वह थोड़ा ज्यादा कर जाती हैं। '12वीं फेल' के बाद उन्हें देखकर एहसास होता है कि एक अच्छा निर्देशक अभिनेता से क्या कुछ निकलवा सकता है। सुधीर पांडे और लिलेट दुबे जैसे दिग्गज कलाकारों के पास भी इस स्क्रिप्ट में करने को कुछ खास नहीं था।</div><div><br></div><div><b>फैसला: क्या देखें या नहीं?</b></div><div>'गिन्नी वेड्स सनी 2' बहुत कुछ कहना चाहती है, लेकिन उसे पता ही नहीं कि कहना कैसे है। यह बॉलीवुड के पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले पर चलती है: दो अजनबी मिलते हैं, शादी होती है और फिर उम्मीद की जाती है कि प्यार हो जाएगा। लेकिन दर्शक को यह कभी महसूस नहीं होता कि उन्हें प्यार हुआ कब और क्यों?</div><div><br></div><div><b>नतीजा: </b>यह फिल्म मजेदार होने की कोशिश करती है, लेकिन है नहीं। यह प्रासंगिक होने का नाटक करती है, लेकिन बहुत सुरक्षित खेलती है। अगर आप एक अच्छी प्रेम कहानी की तलाश में हैं, तो शायद यह फिल्म आपके लिए नहीं है।</div><div><br></div><div><b>रेटिंग: 2/5 स्टार</b></div><div>वन लाइनर: बिना किसी लॉजिक और मैजिक वाली यह शादी सिर्फ दर्शकों के लिए एक 'ट्रेजेडी' है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 15:52:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ginny-weds-sunny-2-review-neither-magic-nor-logic-it-a-tragedy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mr X Movie Review | 'मिशन इम्पॉसिबल' बनने की नाकाम कोशिश, आर्या और गौतम कार्तिक की स्पाई थ्रिलर में लॉजिक का 'विनाश']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/mr-x-movie-review-a-failed-attempt-to-become-mission-impossible]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">स्पाई थ्रिलर फिल्में इन दिनों भारतीय सिनेमा का पसंदीदा जॉनर बनी हुई हैं। जहाँ बॉलीवुड 'स्पाई यूनिवर्स' के जरिए बॉक्स ऑफिस पर राज कर रहा है, वहीं तमिल डायरेक्टर मनु आनंद अपनी फिल्म 'Mr X' के जरिए सीधे हॉलीवुड (जेम्स बॉन्ड और मिशन इम्पॉसिबल) को चुनौती देने की कोशिश करते हैं। लेकिन ऊँची उड़ान भरने की कोशिश में यह फिल्म ज़मीन पर औंधे मुंह गिरती नज़र आती है।</span></div><div><br></div><div><b>क्या है कहानी?</b></div><div>फिल्म की कहानी किसी टिपिकल इंटरनेशनल स्पाई ड्रामा जैसी ही है। गौतम (आर्या) एक रॉ (RAW) एजेंट है जो चेन्नई में एक अंडरकवर मिशन पर है। मामला तब गंभीर हो जाता है जब 'विलेन' राणा के हाथ एक न्यूक्लियर डिवाइस लग जाता है, जिससे वह G20 समिट के दौरान चेन्नई को उड़ाने की योजना बनाता है।</div><div><br></div><div>इस विनाश को रोकने की ज़िम्मेदारी रॉ चीफ इंदिरा वर्मा (मंजू वारियर) और अनुभवी एजेंट Mr X (सरथकुमार) के कंधों पर है। वहीं अमरण (गौतम कार्तिक) इस खेल का वह मास्टरमाइंड है जो अंदरूनी तौर पर राणा की मदद कर रहा है। 2 घंटे 33 मिनट की इस फिल्म में पाकिस्तान से लेकर रूस तक की यात्रा और कई ट्विस्ट एंड टर्न्स दिखाए गए हैं।</div><div><br></div><div><b>लॉजिक की 'लाइन' टूटी</b></div><div>फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी स्क्रिप्ट और लॉजिक है। निर्देशक चाहते हैं कि दर्शक अपना दिमाग घर छोड़कर आएं। फिल्म में इतने सारे सब-प्लॉट्स (पाकिस्तान से जंग, न्यूक्लियर कैप्सूल, अपनों का धोखा) हैं कि फिल्म खुद के बोझ तले दब जाती है। एक सीन में जब प्रधानमंत्री न्यूक्लियर हमले के खतरे के बारे में पूछते हैं, तो उन्हें डरावने आंकड़ों के बजाय सिर्फ एक शब्द में जवाब मिलता है— "विनाशकारी"। फिल्म का प्रभाव भी कुछ ऐसा ही है—बड़े सेटअप लेकिन कोई ठोस नतीजा नहीं।</div><div><br></div><div>Mr X बहुत तेज़ी से एक ट्विस्ट से दूसरे ट्विस्ट की ओर बढ़ती है। हालांकि, असली ट्विस्ट यह है कि आपको सीन आने से कई घंटे पहले ही पता चल जाता है कि कौन पाला बदल रहा है। चेन्नई में RAW एजेंट्स के उस ग्रुप को ही ले लीजिए, जिनके प्लान पर बार-बार हमला होता रहता है। आपको पता होता है कि टीम में से कोई जानकारी लीक कर रहा है। आपको बस मेकर्स के यह बताने का इंतज़ार करना होता है कि ऐसा क्यों हो रहा है — और जब वे बताते हैं, तो उनकी वजह में कोई दम नहीं लगता।</div><div><br></div><div>यही इस फिल्म की सबसे बड़ी दिक्कत है। एक ज़बरदस्त स्पाई थ्रिलर में ऐसे ट्विस्ट होने चाहिए जिन पर आप सच में यकीन कर सकें। मनु आनंद कागज़ पर तो ट्विस्ट सही लिख लेते हैं, लेकिन उनमें से कोई भी भरोसे लायक नहीं लगता। और जब वजह ही खोखली हो, तो ट्विस्ट का कोई मतलब नहीं रह जाता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/hollywood/citadel-season-2--official-trailer-prime-video" target="_blank">Citadel 2 का धमाकेदार ट्रेलर आउट! Priyanka Chopra और Richard Madden की वापसी, जानें कब और कहाँ होगी रिलीज़</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div>फिल्म का सबसे अहम पल तब आता है जब प्रधानमंत्री न्यूक्लियर हमले से होने वाले नुकसान के बारे में पूछते हैं। यह एक ऐसा सीन है जिसे बहुत ही डरावने और विस्तार से यह बताना चाहिए था कि इस हमले का कितना बड़ा खतरा है। इसके बजाय, इसका जवाब सिर्फ़ एक शब्द है: "विनाशकारी।" संक्षेप में कहें तो Mr X यही है — बड़े-बड़े सेटअप, लेकिन नतीजा कुछ नहीं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/anurag-basu-is-thrilled-by-ranbir-kapoor-look-in-ramayana-say-lot-of-courage" target="_blank">'रामायण' में Ranbir Kapoor का लुक देख गदगद हुए Anurag Basu, बोले- 'इस किरदार के लिए बहुत हिम्मत चाहिए'</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><div><b>प्रेडिक्टेबल ट्विस्ट्स</b></div><div>फिल्म में सस्पेंस बनाए रखने के लिए कई ट्विस्ट डाले गए हैं, लेकिन समस्या यह है कि दर्शक को ट्विस्ट आने से आधे घंटे पहले ही पता चल जाता है कि अगला गद्दार कौन होने वाला है। मेकर्स ने किरदारों के पाला बदलने की जो वजहें बताई हैं, वे बेहद खोखली और अविश्वसनीय लगती हैं।</div><div><b><br></b></div><div><b>एक्टिंग और तकनीकी पक्ष</b></div><div><b>आर्या: </b>पूरी फिल्म में एक ही तरह के हाव-भाव (Sullen expression) के साथ नज़र आते हैं। उनके किरदार में वह गहराई नहीं दिखी जो एक टॉप एजेंट में होनी चाहिए।</div><div>&nbsp;</div><div><b>गौतम कार्तिक: </b>उनके चेहरे पर एक कभी न खत्म होने वाली मुस्कान है, जो कई गंभीर दृश्यों में अजीब लगती है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>मंजू वारियर: </b>रॉ चीफ के तौर पर उन्होंने अपनी भूमिका के साथ न्याय किया है। वह पूरी कास्ट में सबसे दमदार नज़र आती हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><b>सिनेमैटोग्राफी: </b>अरुल विंसेंट का काम काबिले तारीफ है। रूस और भारत के नज़ारों को उन्होंने जिस तरह कैमरे में उतारा है, वह फिल्म को एक 'इंटरनेशनल लुक' देता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>म्यूजिक: </b>धिबू निनन थॉमस का बैकग्राउंड स्कोर तेज़ है, लेकिन कई बार ऐसा लगता है कि वह स्क्रिप्ट की कमियों को शोर से ढकने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><div>'Mr X' अपने सीक्वल के लिए भी दरवाज़े खोलती है, लेकिन सवाल यह है कि क्या दर्शक दोबारा इस 'मिसफायर' स्पाई थ्रिलर को देखना चाहेंगे? अगर आप केवल अच्छी लोकेशन और बंदूकों की लड़ाई देखना पसंद करते हैं, तो इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन यदि आप एक बुद्धिमान और सस्पेंस से भरी थ्रिलर की तलाश में हैं, तो 'Mr X' आपको निराश करेगी।</div><div>&nbsp;</div><div><span style="font-weight: bolder;">फिल्म: Mr X</span></div><div><span style="font-weight: bolder;">निर्देशक: मनु आनंद</span></div><div><span style="font-weight: bolder;">कलाकार: आर्या, गौतम कार्तिक, मंजू वारियर, सरथकुमार</span></div><div><span style="font-weight: bolder; font-size: 1rem;">रेटिंग: 2/5</span>&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 12:41:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/mr-x-movie-review-a-failed-attempt-to-become-mission-impossible</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[OTT Releases April 2026: इस सप्ताह रिलीज हो रही हैं ये दमदार फिल्में और सीरीज ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ott-releases-april-2026-these-power-packed-movies-and-series-are-releasing-this-week]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अप्रैल का यह सप्ताह ओटीटी प्रेमियों के लिए मनोरंजन की सौगात लेकर आया है। नेटफ्लिक्स से लेकर अमेज़न प्राइम और एप्पल टीवी तक, इस हफ्ते क्राइम थ्रिलर, एनिमेटेड एडवेंचर और हाई-वोल्टेज एक्शन का जबरदस्त तड़का लगने वाला है। अगर आप भी वीकेंड के लिए बिंज-वॉच की लिस्ट तैयार कर रहे हैं, तो इन रिलीज पर एक नज़र जरूर डालें:</div><div><br></div><div><b>क्रिमिनल रिकॉर्ड: सीजन 2 (Criminal Record: Season 2)</b></div><div>कहाँ देखें: एप्पल टीवी (Apple TV)</div><div>रिलीज डेट: 22 अप्रैल, 2026</div><div>पीटर कपल्डी और कुश जम्बो एक बार फिर डीसीआई डैनियल हेगार्टी और डीएस जून लेंकर के रूप में वापसी कर रहे हैं। लंदन की पृष्ठभूमि पर आधारित यह 8 एपिसोड का सीजन पहले से कहीं ज्यादा गहरा और तीव्र है। कहानी एक राजनीतिक रैली में हुई घातक चाकूबाजी की जांच के इर्द-गिर्द घूमती है, जो इन दोनों किरदारों को एक असहज गठबंधन बनाने पर मजबूर कर देती है।</div><div><br></div><div><b>स्ट्रेंजर थिंग्स: टेल्स फ्रॉम '85 (Stranger Things: Tales from '85)</b></div><div>कहाँ देखें: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>रिलीज डेट: 23 अप्रैल, 2026</div><div>दुनिया के सबसे लोकप्रिय शो 'स्ट्रेंजर थिंग्स' का अब एनिमेटेड अवतार आ गया है। 10 एपिसोड के इस सीजन में हॉकिन्स के बच्चों का वही ग्रुप 'अपसाइड डाउन' (Upside Down) की दुनिया से लड़ता हुआ नजर आएगा। इसमें बड़े खतरों के साथ-साथ उनके छोटे-छोटे रोमांचक कारनामों को भी दिखाया गया है।</div><div><br></div><div><b>एपेक्स (APEX)</b></div><div>कहाँ देखें: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>रिलीज डेट: 24 अप्रैल, 2026</div><div>चार्लीज़ थेरॉन और टैरॉन एगर्टन अभिनीत यह एक हाई-ऑक्टेन एक्शन थ्रिलर फिल्म है। कहानी एक ऐसी महिला की है जो अपने दुखों से निजात पाने के लिए जंगल में सुकून तलाशने जाती है, लेकिन वहाँ वह एक खूंखार सीरियल किलर के साथ 'चूहे-बिल्ली' के जानलेवा खेल में फंस जाती है।</div><div><br></div><div><b>मार्टी सुप्रीम (Marty Supreme)</b></div><div>कहाँ देखें: अमेज़न प्राइम वीडियो (Amazon Prime Video)</div><div>रिलीज डेट: 24 अप्रैल, 2026</div><div>हॉलीवुड स्टार टिमोथी चालमेट इस फिल्म में 'मार्टी मौसर' की भूमिका निभा रहे हैं। 1950 के दशक के न्यूयॉर्क की यह कहानी एक महत्वाकांक्षी जूते बेचने वाले सेल्समैन की है, जिसे वर्ल्ड चैंपियन टेबल टेनिस खिलाड़ी बनने का जुनून सवार हो जाता है। यह फिल्म रियल लाइफ लेजेंड मार्टी रीसमैन के जीवन और उनके संघर्षों से प्रेरित है।</div><div><br></div><div><b>इफ़ विशेस कुड किल (If Wishes Could Kill)</b></div><div>कहाँ देखें: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>रिलीज डेट: 24 अप्रैल, 2026</div><div>दक्षिण कोरियाई थ्रिलर के शौकीनों के लिए यह एक बेहतरीन सीरीज है। कहानी पांच हाई स्कूल के छात्रों के इर्द-गिर्द घूमती है, जिनकी जिंदगी एक ऐप के कारण बदल जाती है। यह ऐप उनकी इच्छाएं तो पूरी करता है, लेकिन साथ ही उनकी मौत का काउंटडाउन भी शुरू कर देता है। अब उन्हें अपनी जान बचाने के लिए इस अभिशाप को तोड़ना होगा।</div><div><br></div><div><b>सुपरनोवा स्ट्राइकर्स: जेनेसिस (Supernova Strikers: Genesis)</b></div><div>कहाँ देखें: नेटफ्लिक्स (Netflix)</div><div>रिलीज डेट: 26 अप्रैल, 2026</div><div>यह एक लाइव-स्ट्रीम इवेंट है, जिसमें मेक्सिको के एरिना में मशहूर इन्फ्लुएंसर्स, स्ट्रीमर्स और सेलिब्रिटीज के बीच बॉक्सिंग मुकाबले देखने को मिलेंगे। खेलों के साथ-साथ इसमें कारिन लियोन और ओजुना जैसे प्रसिद्ध कलाकारों के म्यूजिकल परफॉरमेंस भी शामिल होंगे।</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 16:49:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/ott-releases-april-2026-these-power-packed-movies-and-series-are-releasing-this-week</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Matka King Review: सत्ता, जोखिम और वफादारी की जंग में विजय वर्मा का 'राजसी' प्रदर्शन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/matka-king-review-vijay-varma-regal-performance-in-a-battle-of-power-risk-and-loyalty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>'मटका किंग' एक ज़बरदस्त पीरियड क्राइम ड्रामा है, जो 1960 के दशक के मुंबई की सट्टेबाजी की दुनिया को पर्दे पर जीवंत करता है। निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले ने लालच, ईमानदारी और पतन की इस कहानी को बहुत ही संजीदगी से बुना है। विजय वर्मा ने 'बृज भट्टी' के रूप में एक बार फिर अपने अभिनय का लोहा मनवाया है—एक साधारण मिल मैनेजर से जुए की दुनिया का बेताज बादशाह बनने का उनका सफर बेहद रोमांचक है। सई ताम्हणकर, कृतिका कामरा और गुलशन ग्रोवर जैसे कलाकारों ने भी दमदार प्रदर्शन किया है। हालांकि कहीं-कहीं तकनीकी और वीएफएक्स (VFX) की कमियां खटकती हैं, लेकिन अपने सस्पेंस और बेहतरीन किरदारों के दम पर यह सीरीज अंत तक दर्शकों को बांधे रखती है। यदि आप थ्रिलर और पुराने बॉम्बे की कहानियों के शौकीन हैं, तो यह सीरीज आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: कहानी</h2><div>विजय वर्मा ने बृज भट्टी का किरदार निभाया है, जो मुंबई की एक चाल में अपनी गर्भवती पत्नी बरखा (सई ताम्हणकर) और छोटे भाई लाछू (भूपेंद्र जादवत) के साथ रहने वाला एक कपास व्यापारी है। वह एक कपास मिल में मैनेजर के तौर पर काम करता है और अपने बॉस की मदद से ताश पर आधारित एक सट्टेबाजी का खेल (सट्टा) भी चलाता है, जिसमें लोग 0 से 9 तक के अंकों पर दांव लगाते हैं। जीतने वालों को न्यूयॉर्क कॉटन एक्सचेंज की दरों के आधार पर भुगतान किया जाता है। हालाँकि, उसका बॉस, लालजीभाई (गुलशन ग्रोवर), बेईमान है और सट्टा लगाने वालों के साथ ईमानदारी से खेलने के बजाय, अपना मुनाफ़ा बढ़ाने के लिए कभी-कभी जीतने वाले अंक को बदलकर नतीजों में हेरफेर करता है।</div><div><br></div><div>जल्द ही, बृज भट्टी के चरित्र के बारे में और भी बातें सामने आती हैं। हालात तब और बिगड़ जाते हैं जब उसके भाई की जुए की लत की वजह से वे एक फाइनेंसर के साथ मुसीबत में फँस जाते हैं। उसे बचाने के लिए, बृज दस दिनों के अंदर दोगुनी रकम चुकाने का वादा करता है। अपने बॉस से कोई मदद न मिलने पर—जो उलटा उसे ज़लील करता है—बृज वहाँ से अलग होकर अपना कुछ नया शुरू करने का फ़ैसला करता है। इसी तरह उसके 'मटका' खेल का अपना संस्करण शुरू होता है, जो एक ही सिद्धांत पर आधारित है: ईमानदारी। यह देखने के लिए कि कैसे एक साधारण कपास मिल मैनेजर उठकर सबसे ताक़तवर व्यापारियों में से एक बन जाता है, और कैसे सफलता धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी बदल देती है, आपको 'मटका किंग' देखनी होगी। </div><div>&nbsp;</div><h2>मटका किंग: लेखन और निर्देशन</h2><div>निर्देशक नागराज पोपटराव मंजुले ने अपने काम में बेहतरीन काम किया है। कुल मिलाकर, 'मटका किंग' सीरीज़ बहुत अच्छी तरह से बुनी हुई लगती है; ज़्यादातर एपिसोड तेज़ गति से आगे बढ़ते हैं, सिवाय कुछ पलों के जहाँ कहानी थोड़ी धीमी और सुस्त लगती है। एक्शन सीक्वेंस भी स्क्रीन पर बहुत असरदार लगते हैं। कुछ जगहों पर ऐसा लगा कि कुछ किरदारों के आर्क (कहानी के हिस्से) को पूरी तरह से नहीं दिखाया गया है, और उनकी कहानियों में गहराई की कमी थी। हालाँकि, यह तो समय ही बताएगा कि क्या ऐसा जान-बूझकर किया गया था।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: तकनीकी पहलू</h2><div>संगीतकारों ने भी बहुत अच्छा काम किया है; किशोर कुमार के गाने 'ज़िंदगी एक सफ़र' के इस्तेमाल के साथ-साथ, अजय जयंती द्वारा रचित टाइटल ट्रैक जैसे अन्य गानों को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे सीरीज़ की थीम के साथ पूरी तरह से मेल खाते हैं। साउंड डिपार्टमेंट ने भी शानदार काम किया है। एक्शन सीन असली और स्वाभाविक लगते हैं, नकली या ज़बरदस्ती के नहीं।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: क्या अच्छा है</h2><div>'मटका किंग' दिलचस्प है, इसमें बेहतरीन कलाकार हैं, और इसे एक ही बार में पूरा देखा जा सकता है। कॉस्ट्यूम बहुत अच्छे हैं, जो 1960 के दशक के बॉम्बे के माहौल को पूरी तरह से दिखाते हैं। निर्माताओं ने कहानी के अंत को शुरुआती सीन से जोड़ने की भी कोशिश की है, जिससे कहानी का एक पूरा चक्र (full-circle) बन जाता है। इससे दर्शक शुरू से ही उत्सुक बने रहते हैं और धीरे-धीरे उन्हें पता चलता है कि विजय वर्मा का किरदार उस स्थिति में कैसे पहुँचा।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: क्या अच्छा नहीं है</h2><div>कुछ ऐसे पल भी थे जहाँ मुझे लगा कि निर्माताओं को ग्रीन स्क्रीन पर शूट करने के बजाय असली कारों के शॉट्स का इस्तेमाल करना चाहिए था। कुछ दृश्यों में ऐसा लगा कि कार एक जगह स्थिर खड़ी है, जबकि बैकग्राउंड आगे बढ़ रहा है; यह बात साफ़ नज़र आती है और दर्शकों का ध्यान थोड़ा भटकाती है।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: अभिनय और प्रदर्शन</h2><div>विजय वर्मा ने इस पीरियड ड्रामा और जुए की कहानी में 'ब्रिज भट्टी' के अपने किरदार को बखूबी निभाया है। चाहे वह गंभीर और संजीदा पल हों, भावुक दृश्य हों, या नेतृत्व वाले सीक्वेंस हों, उन्होंने एक अभिनेता के तौर पर अपनी पूरी क्षमता दिखाई है और एक दमदार प्रदर्शन किया है।</div><div><br></div><div>उनके साथ-साथ, कृतिका कामरा ने 'गुलरुख दुबाश' के किरदार में अपने अभिनय से कहानी को और भी बेहतर बनाया है। साई ताम्हणकर, बरखा भट्टी के रूप में, एक सहयोगी पत्नी का किरदार बहुत अच्छे से निभाती हैं; वह अपने परिवार के लिए सब कुछ करती हैं, लेकिन साथ ही अपनी खुद की पहचान बनाने की भी इच्छा रखती हैं—जिसमें अपनी कॉलेज की डिग्री पूरी करना और अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाना शामिल है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, सिद्धार्थ जाधव, दगडू विचारे के रूप में, एक मराठी किरदार के लिए एकदम सही चुनाव हैं; वह पूरी लगन के साथ अपनी भूमिका निभाते हैं। भूपेंद्र जादवत, बृज भट्टी के छोटे भाई 'लाचू' के रूप में, एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं; वह अपने किरदार के अलग-अलग पहलुओं को दिखाते हैं, क्योंकि वह एक ही समय में चालाक और लालची दोनों हैं। और अंत में, गुलशन ग्रोवर, लालजी भाई के रूप में—जो एक कॉटन मिल चलाते हैं—एक नकारात्मक भूमिका निभाते हैं और वही करते हैं जिसमें वह सबसे माहिर हैं।</div><div><br></div><div>सहायक कलाकारों में, ईमानदार इंस्पेक्टर सब-इंस्पेक्टर एकनाथ तुम्बाडे ​​के रूप में भरत जाधव, खोजी पत्रकार टी.पी. डिसूजा के रूप में गिरीश कुलकर्णी, सुल्भा के रूप में जेमी लीवर, एक राजनेता के रूप में किशोर कदम, अभिनेता मकसूद के रूप में साइरस साहूकार, वसुधा के रूप में अर्पिता सेठी, मिल मज़दूर के रूप में संभाजी तांगाडे, फाइनेंसर जीनू मास्टर के रूप में इश्तियाक खान, अखबार के संपादक के रूप में संजीव जोतांगिया, और लालजी भाई की बेटी के रूप में सिमरन—ये सभी कहानी में जान डाल देते हैं।</div><div><br></div><h2>मटका किंग: अंतिम फैसला</h2><div>कुल मिलाकर, 'मटका किंग' देखने लायक एक अच्छी सीरीज़ है। इसमें रोमांच और सस्पेंस भरपूर है, और शो की स्क्रिप्ट इस तरह लिखी गई है कि हर बीतते एपिसोड के साथ, आप इसे एक ही बार में पूरा देखना चाहेंगे—इसका श्रेय इसके रोमांचक मोड़ (cliffhangers) को जाता है। विजय वर्मा ने 'ब्रिज भट्टी' का किरदार इतनी बखूबी निभाया है, मानो यह किरदार उन्हीं के लिए बना हो।</div><div><br></div><div>इस सीरीज़ में कृतिका कामरा, साई ताम्हणकर, सिद्धार्थ जाधव, भूपेंद्र जादावत और गुलशन ग्रोवर जैसे कई बेहतरीन कलाकार भी शामिल हैं, जो सभी मिलकर कहानी को और भी दमदार बनाते हैं। हालाँकि इसमें कुछ कमियाँ भी हैं—जैसे कि तकनीकी और गति (pacing) से जुड़ी दिक्कतें—लेकिन अगर आपको विजय वर्मा और रोमांचक शो पसंद हैं, तो आप निराश नहीं होंगे।</div><div><br></div><div>'मटका किंग' 5 में से 3.5 स्टार्स का हकदार है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 13:28:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/matka-king-review-vijay-varma-regal-performance-in-a-battle-of-power-risk-and-loyalty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhoot Bungla Review | अक्षय कुमार और प्रियदर्शन की पुरानी जोड़ी का जादू पड़ा फीका, न डर सताता है, न हंसी आती है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bhoot-bungla-review-the-magic-of-the-classic-akshay-kumar-priyadarshan-duo-has-faded]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भूत बंगला रिव्यू: नई हॉरर-कॉमेडी फ़िल्म 'भूत बंगला' के साथ अक्षय कुमार सिनेमा में वापसी कर रहे हैं। इस फ़िल्म का निर्देशन प्रियदर्शन ने किया है, जिन्होंने एक ऐसी फ़िल्म बनाई है जो दर्शकों के बीच पहले से ही चर्चा का विषय बन चुकी है। इस फ़िल्म में कई जाने-माने कलाकार एक साथ नज़र आ रहे हैं, जिनमें तब्बू, राजपाल यादव, परेश रावल, मिथिला पालकर, वामिका गब्बी और असरानी शामिल हैं। यह फ़िल्म अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के बीच लंबे समय से इंतज़ार किए जा रहे मिलन की निशानी है। जब भी भारतीय सिनेमा में प्रियदर्शन और अक्षय कुमार की जोड़ी का नाम आता है, तो 'हेरा फेरी' और 'भूल भुलैया' जैसी कालजयी फिल्मों की यादें ताज़ा हो जाती हैं। करीब 14 साल बाद जब यह जोड़ी 'भूत बंगला' के साथ पर्दे पर लौटी, तो उम्मीदें आसमान पर थीं। लेकिन अफ़सोस, यह 'बंगला' उम्मीदों की बुनियाद पर खड़ा नहीं उतर पाया। फिल्म डरावनी होने की कोशिश में शोर मचाती है और कॉमेडी के नाम पर पुराने घिसे-पिटे फॉर्मूले दोहराती है।</span></div><div><br></div><h2>कहानी: लोककथा और लॉजिक का संघर्ष</h2><div>फिल्म की शुरुआत मंगलपुर नामक एक काल्पनिक गांव की लोककथा से होती है, जहाँ एक राक्षस नई-नवेली दुल्हनों को अगवा कर लेता है। यह प्लॉट 1979 की क्लासिक फिल्म 'जानी दुश्मन' की याद दिलाता है। फिल्म में लॉजिक तब दम तोड़ देता है जब 49 साल के जिस्सू सेनगुप्ता को 58 साल के अक्षय कुमार के पिता के रूप में दिखाया जाता है। कहानी मंगलपुर से लंदन और फिर एक भुतहा महल के इर्द-गिर्द घूमती है, जहाँ मिथिला पालकर को विरासत में एक आलीशान लेकिन शापित बंगला मिलता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ek-din-trailer-out-junaid-khan-and-sai-pallavi-film-explores-love-and-the-pain-of-memory-loss" target="_blank">Ek Din Trailer Release | Junaid Khan और Sai Pallavi की फिल्म में प्यार और याददाश्त खोने का दर्द, रोंगटे खड़े कर देगा जापान का यह सफर</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><h2>अभिनय: सितारों की फौज, पर स्क्रिप्ट कमजोर</h2><div>अक्षय कुमार अपनी चिर-परिचित ऊर्जा के साथ नजर आते हैं। वे एक्शन और पंचलाइन्स में सहज हैं, लेकिन एक कमजोर और जरूरत से ज्यादा लंबी स्क्रिप्ट को अकेले कंधे पर ढोना उनके लिए भी मुश्किल साबित हुआ। परेश रावल, राजपाल यादव और असरानी जैसे दिग्गज कलाकार फिल्म में हैं, लेकिन उन्हें केवल 'फिजिकल कॉमेडी' (मार खाना या गिरना) तक सीमित कर दिया गया है, जो अब पुरानी और उबाऊ लगती है। तब्बू और वामिका गब्बी जैसी मंझी हुई अभिनेत्रियों को फिल्म में ठीक से इस्तेमाल नहीं किया गया। तब्बू का किरदार प्रभावहीन लगता है, वहीं वामिका का रहस्यमयी रोल अंत तक बेजान ही बना रहता है।</div><h2><br>तकनीकी पक्ष: हॉरर कम, शोर ज्यादा</h2><div>फिल्म का हॉरर तत्व पूरी तरह से 'जंप स्केयर्स' और लाउड बैकग्राउंड म्यूजिक पर निर्भर है। संगीत डराने के बजाय तनाव पैदा करता है, जो कई बार किसी पुराने टीवी सोप ओपेरा जैसा लगने लगता है।</div><div>&nbsp;</div><div><b>वधुसुर की कथा: </b>देव-असुर वंश और पौराणिक भविष्यवाणियों वाला हिस्सा दिलचस्प हो सकता था, लेकिन इसे दर्शकों को इतना 'समझाया' गया है कि रहस्य का रोमांच ही खत्म हो जाता है।</div><div><b>संगीत: </b>'राम जी आके भला करेंगे' को छोड़कर कोई भी गाना याद रखने लायक नहीं है। 'अमी जे तोमार' जैसे कल्ट पलों को फिर से रचने की कोशिश पूरी तरह नाकाम रही है।</div><div><br></div><h2>दूसरा हाफ: बिखराव और उपदेश</h2><div>फिल्म का दूसरा हिस्सा सबसे ज्यादा निराश करता है। कहानी फ्लैशबैक और लंबे स्पष्टीकरणों के बोझ तले दब जाती है। एक आधुनिक पृष्ठभूमि वाली महिला (मिथिला) का बिना किसी तर्क के पुरानी कुरीतियों को मान लेना खटकता है। साथ ही, फिल्म के बीच में 'पुत्र धर्म' जैसे उपदेश कहानी के प्रवाह को पूरी तरह तोड़ देते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ranbir-kapoor-shines-on-the-global-stage-included-in-times-100-most-influential-people" target="_blank">वैश्विक मंच पर Ranbir Kapoor का जलवा, TIME की 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में शामिल, आयुष्मान खुराना ने बताया 'सच्चा कहानीकार'</a></h3><div>&nbsp;</div><div><br></div><h2>निष्कर्ष: क्या आपको यह फिल्म देखनी चाहिए?</h2><div>'भूत बंगला' एक ऐसी सवारी है जो रोमांचक 'रोलरकोस्टर' होने का वादा करती है, लेकिन हकीकत में यह एक धीमी और चरमराती हुई 'भूतिया घर की सैर' बनकर रह जाती है। प्रियदर्शन की फिल्मों में जो सिचुएशनल कॉमेडी और टाइमिंग हुआ करती थी, उसकी यहाँ भारी कमी खलती है। यदि आप अक्षय कुमार और प्रियदर्शन के कट्टर प्रशंसक हैं, तो आप इसे एक बार देख सकते हैं। लेकिन अगर आप 'भूल भुलैया' जैसी बारीकी और हंसी की तलाश में हैं, तो यह 'बंगला' आपको निराश ही करेगा। काश, इस बंगले में 'भूत' कम और 'दिमाग' थोड़ा ज्यादा होता।</div><div><br></div><div><b>निर्देशक: प्रियदर्शन</b></div><div><b>लेखक: आकाश कौशिक, अभिलाष नायर, प्रियदर्शन</b></div><div><b>भूत बांग्ला कलाकार: अक्षय कुमार, परेश रावल, वामिका गब्बी, राजपाल यादव, मिथिला पालकर, असरानी जी, तब्बू</b></div><div><b>भूत बांग्ला फिल्म रेटिंग: 2/5</b></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 11:56:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/bhoot-bungla-review-the-magic-of-the-classic-akshay-kumar-priyadarshan-duo-has-faded</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Thrash Movie Rreview | हॉरर का नया चेहरा! Netflix की शार्क थ्रिलर 'Thrash' ने पेश किया साल 2026 का सबसे खौफनाक सीन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-new-face-of-horror-netfli-shark-thriller-thrash-unveils-the-most-terrifying-scene-of-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>&nbsp;नेटफ्लिक्स की नवीनतम 'क्रिएचर फीचर' फिल्म 'Thrash' दर्शकों को दक्षिण कैरोलिना के एक छोटे से शहर 'एनीविले' में ले जाती है, जो श्रेणी 5 (Category 5) के विनाशकारी तूफान और बाढ़ के पानी में तैरती खूंखार 'बुल शार्क' (Bull Sharks) के आतंक से जूझ रहा है। फिल्म का अंत केवल जीवित रहने की लड़ाई नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं और साहस की परीक्षा भी है।&nbsp;फिल्म के चरमोत्कर्ष (Climax) में कहानी दो मुख्य मोर्चों पर सिमट जाती है। एक तरफ लीसा (फीबी डायनेवर) और डकोटा (व्हिटनी पीक) हैं, और दूसरी तरफ वे तीन अनाथ भाई-बहन (रॉन, डी और विल) हैं जो अपने क्रूर पालक माता-पिता के साये से अभी-अभी आजाद हुए हैं, लेकिन मौत के साये में घिरे हैं।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/personality-rights-kartik-aaryan-granted-legal-shield-bombay-high-court-issues-strict-order" target="_blank">Personality Rights: ऐश्वर्या और करण जौहर के बाद अब Kartik Aaryan को मिला कानूनी कवच, बॉम्बे हाई कोर्ट ने दिया सख्त आदेश</a></h3><div>&nbsp;</div><div>अगर आप सोचते हैं कि स्टीवन स्पीलबर्ग की 'Jaws' ने शार्क फिल्मों की सीमाओं को खत्म कर दिया था, तो नेटफ्लिक्स की नई फिल्म 'Thrash' आपकी धारणा बदलने के लिए तैयार है। 2026 की इस सबसे महत्वाकांक्षी 'क्रिएचर फीचर' (Creature Feature) फिल्म ने एक ऐसा दृश्य पेश किया है, जिसकी चर्चा हॉरर सिनेमा के इतिहास में लंबे समय तक होगी।</div><div><br></div><h2>जब शहर बना 'शार्क' का शिकार: अनोखा प्लॉट</h2><div>'Thrash' पारंपरिक शार्क फिल्मों से अलग हटकर अपनी कहानी बुनती है। यहाँ विशालकाय समुद्र नहीं, बल्कि एक तटीय शहर है जो 'Category 5' के भीषण तूफान के कारण पानी में डूब चुका है। इस बाढ़ के गंदे पानी में कोई एक दानव शार्क नहीं, बल्कि कई छोटी और बेहद फुर्तीली 'Bull Sharks' सड़कों और घरों के अंदर शिकार की तलाश में घूम रही हैं।</div><div><br></div><h2>इतिहास का सबसे डरावना सीन: 'शार्क-प्रलय' के बीच जन्म</h2><div>फिल्म का सबसे चर्चित और रोंगटे खड़े कर देने वाला सीन अभिनेत्री फीबी डायनेवर (Phoebe Dynevor) पर फिल्माया गया है, जो 'लिसा' नाम की एक गर्भवती महिला का किरदार निभा रही हैं।</div><div><br></div><div><b>परिस्थिति: </b>लिसा एक घर की दूसरी मंजिल पर अकेली फंसी हुई है और प्रसव पीड़ा (Labor Pain) से गुजर रही है।</div><div><br></div><div><b>तनाव का चरम: </b>जैसे-जैसे कमरे में पानी भरता है, लिसा का बिस्तर तैरकर छत (Ceiling) से जा टकराता है। वह पूरी तरह से 'क्लॉस्ट्रोफोबिक' स्थिति में है।</div><div><br></div><div><b>अकल्पनीय साहस: </b>खून से लथपथ पानी के बीच लिसा अपने नवजात शिशु को जन्म देती है, जबकि उसके बिस्तर के चारों ओर खूंखार शार्क के पंख (Fins) चक्कर काट रहे होते हैं।</div><div><br></div><h2>'B-ग्रेड' हॉरर और क्रिएटिविटी का संगम</h2><div>फिल्म समीक्षकों का मानना है कि वैचारिक रूप से यह दृश्य हास्यास्पद लग सकता है, लेकिन इसका फिल्मांकन और तकनीक इसे 'क्लासिक' बनाती है।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">लिसा का अपनी गर्भनाल (Umbilical Cord) काटकर तुरंत एक शार्क पर हमला करना 'नॉर्ली सिनेमा' (Gnarly Cinema) का शिखर है। यह दृश्य मातृत्व की उस असाधारण शक्ति को दिखाता है, जो मौत के सामने भी हार नहीं मानती।</span></div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/ranbir-kapoor-shines-on-the-global-stage-included-in-times-100-most-influential-people" target="_blank">वैश्विक मंच पर Ranbir Kapoor का जलवा, TIME की 100 सबसे प्रभावशाली हस्तियों में शामिल, आयुष्मान खुराना ने बताया 'सच्चा कहानीकार'</a></h3><div><br></div><div><b>बेमेल संगीत का जादू:</b> प्रसव के दौरान लिसा की 'बर्थ प्लेलिस्ट' में वैनेसा कार्लटन का गाना "A Thousand Miles" बजना, चारों ओर मची तबाही के बीच एक अजीब और डरावना विरोधाभास पैदा करता है।</div><div><br></div><h2>फीबी डायनेवर का शानदार अभिनय</h2><div>'ब्रिजरटन' फेम फीबी डायनेवर ने लिसा के दर्द, बेबसी और फिर अपने बच्चे को बचाने के लिए जगे 'एड्रेनालाईन रश' को बखूबी जिया है। फिल्म का वह साइलेंट ओवरहेड शॉट, जिसमें लिसा लाल हो चुके पानी में अपने बच्चे के साथ तैर रही है और व्हिटनी पीक (Dakota) किनारे से हार्पून गन के साथ उसे कवर कर रही है, दर्शकों के मन में गहरी छाप छोड़ता है।</div><div>&nbsp;</div><h2>क्या कोई शार्क अब भी जीवित है?</h2><div>अंतिम शॉट में, जब नाव को रेस्क्यू किया जा रहा होता है, कैमरा धीरे से पानी के नीचे जाता है। वहाँ हम देखते हैं कि मलबे के बीच अभी भी कई शार्क तैर रही हैं, जो एक संकेत है कि प्रकृति का यह विनाशकारी रूप अभी खत्म नहीं हुआ है—यह भविष्य में सीक्वल की संभावना को भी खुला छोड़ देता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>क्यों देखें 'Thrash'?</h2><div>'Thrash' केवल एक शार्क फिल्म नहीं है, बल्कि यह इंसानी जिजीविषा और डर का एक अवास्तविक (Surreal) चित्रण है। यदि आप कुछ ऐसा देखना चाहते हैं जो आपने पहले कभी नहीं देखा, तो नेटफ्लिक्स की यह फिल्म आपकी लिस्ट में टॉप पर होनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 13:10:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/filmreview/the-new-face-of-horror-netfli-shark-thriller-thrash-unveils-the-most-terrifying-scene-of-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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