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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Shravan Putrada Ekadashi: श्रावण पुत्रदा एकादशी पर Lord Vishnu की कृपा पाने का सुनहरा अवसर, जानें सही व्रत नियम और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/golden-opportunity-to-seek-lord-vishnu-blessings-on-shravan-putrada-ekadashi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को पुत्रदा एकादशी या पवित्रा एकादशी के नाम से जाना जाता है। हिंदू धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन व्रत करने और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करने से व्यक्ति को संतान सुख, परिवार की समृद्धि और संतान के उत्तम स्वास्थ्य की कामना पूरी होती है। इस बार आज यानी की 23 अगस्त 2026 को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं श्रावण पुत्रदा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 23 अगस्त की रात 02:00 बजे से श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। जोकि अगले दिन यानी की 24 अगस्त 2026 की सुबह 04:18 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 23 अगस्त को श्रावण पुत्रदा एकादशी का व्रत किया जा रहा है।&nbsp;</div><div>इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 07:32 मिनट से लेकर दोपहर 12:24 मिनट तक है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर व्रत का संकल्प करें और घर के पूजा स्थान की अच्छे से साफ-सफाई करें। फिर एक चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। अब श्रीविष्णु की प्रतिमा के सामने दीपक और धूप जलाएं। इसके बाद उनको फल-फूल, माला, रोली, कुमकुम और नैवेद्य आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु की पूजा में तुलसी दल जरूर शामिल करना चाहिए। इसके बाद पुत्रदा एकादशी व्रत का पाठ करें और भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करें। पूजा के अंत में भगवान श्रीहरि विष्णु की आरती करें और परिवार की सुख-समृद्धि व संतान के कल्याण के लिए प्रार्थना करें। अंत में पूजा में होने वाली भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>माना जाता है कि श्रावण पुत्रदा एकादशी को संतान सुख और परिवार की खुशहाली के लिए विशेष फलदायी होती है। वहीं इस एकादशी का व्रत करने से सुख-समृद्धि, संतान की उन्नति और अच्छे स्वास्थ्य की कामना भी पूरी होती है। एकादशी का व्रत करने और पूजा-अर्चना से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 23 Aug 2026 08:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/golden-opportunity-to-seek-lord-vishnu-blessings-on-shravan-putrada-ekadashi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Eid Milad-un-Nabi 2026: 25 या 26 अगस्त? जानें भारत में कब है Prophet Muhammad का जन्मदिन और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/eid-milad-un-nabi-2026-date-confusion-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस्लाम धर्म में ईद मिलाद-उन-नबी को पाक और अजतम (गौरवशाली) दिनों में शामिल किया गया है। खासतौर पर यह पाक मौका है, जब पैगंबर-ए-इस्लाम हजरत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की विलादत-ए-मुबारक यानी 'जन्म की बधाई' को मनाते हैं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">दुनियाभर के कई देशों में ईद मिलाद-उन-नबी, भारत में भी इसे अकीदत और एहतराम के साथ मनाया जाता है। भारत में भी इस दिन को मनाया जाता है। इसे नबी दिवस, मौलिद, मोहम्मद का जन्मदिन या पैगंबर मुहम्मद के जन्मदिन के रुप में जानते हैं। इस दिन सार्वजनिक अवकाश होता है। भारत में अधिकांश स्कूल और व्यवसाय इस दिन बंद होते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>भारत में कब ईद मिलाद-उन-नबी?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस्लाम धर्म में यह पवित्र त्योहार कब मनाया जाएगा, इसकी तारीख को लेकर काफी कन्यफूय्ज है। आइए आपको बताते हैं ईद मिलाद-उन-नबी का त्योहार 26 अगस्त 2026, बुधवार के दिन मनाया जाएगा।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">वैसे यह त्योहार इस्लामी तारीख चांद पर आधारित होती है, जिसके कारण अलग-अलग कैलेंडर और चांद देखने के तरीकों के कारण से ग्रेगोरियन तारीख में काफी अंतर देखने को मिलता है। वैसे कुछ इस्लामी कैलेंडरों में 12 रबी-उल-अव्वल 1448 हिजरी की तारीख 25 अगस्त है। वहीं, कुछ कैलेंडर और मुकामी रिवायतों में इसे 26 अगस्त को मनाया जाएगा।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>ईद मिलाद-उन-नबी के दिन लोग क्या करते हैं?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस दिन मुसलमान पैगंबर मुहम्मद के जन्म और उनकी शिक्षाओं को याद करते हैं, उन पर चर्चा करते हैं और जश्न मनाते हैं। कई सुन्नी मुसलमान इस अवसर को इस्लामी महीने रबी अल-अव्वल की 12 तारीख को मनाते हैं, बल्कि शिया समुदाय के लोग इसे रबी अल-अव्वल की 17 तारीख को मनाते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>इस दिन कई तरह की गतिविधियां की जाती हैं-</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- रात भर प्रार्थना सभाएं चलती हैं।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- बड़ी भीड़ वाली पदयात्राएं और जुलूस निकलते हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- इतना ही नहीं, घरों, मस्जिदों और अन्य इमारतों को उत्सव के बैनर और झंडे से सजाया जाता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- मस्जिदों से लेकर सामुदायिक भवनों में सामूहिक भोजन का आयोजन किया जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>&nbsp;- इसके अलावा, मुहम्मद के जीवन, कार्यों और उनकी शिक्षाओं के बारे में कहानियों और कविताओं के जरिए लोगों का मार्गदर्शन करते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 17:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/eid-milad-un-nabi-2026-date-confusion-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kalki Jayanti 2026: कलयुग के अंत और Sat-Yuga की स्थापना का प्रतीक, जानें शुभ Muhurat और पूजन विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/symbolizing-end-of-kali-yuga-and-establishment-of-sat-yuga-know-auspicious-muhurat]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल सावन माह की शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कल्कि जयंती मनाई जाती है। इस बार आज यानी की 18 अगस्त 2026 को कल्कि जयंती मनाई जा रही है। धार्मिक मान्यता है कि कलियुग के अंत में जब अधर्म अपने चरम पर होगा, तब धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु अपना 10वां और अंतिम कल्कि अवतार लेंगे। मान्यता है कि इसी पावन तिथि पर भगवान कल्कि का प्राकट्य होगा। तो आइए जानते हैं कल्कि जयंती की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 17 अगस्त की शाम 05:00 बजे से सावन माह के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं आज यानी की 18 अगस्त की शाम 05:50 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 18 अगस्त 2026 को कल्कि जयंती मनाई जाएगी। वहीं इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त दोपहर 04:31 बजे से शाम 05:50 बजे तक है।</div><div><br></div><h2>पौराणिक मान्यताएं</h2><div>पौराणिक ग्रंथों जैसे अग्निपुराण, श्रीमद्भागवत महापुराण, कल्कि पुराण, वायुपुराण के मुताबिक कलियुग के अंतिम चरण में 'शंभल' नामक जगह पर विष्णुयश नामक तपस्वी ब्राह्मण के घर भगवान कल्कि का अवतरण होगा। वह देवदत्त नामक श्वेत घोड़े पर सवार होकर आएंगे। भगवान कल्कि पापियों और अधर्मियों का संहार करेंगे और फिर से सतयुग की स्थापना करेंगे। सिर्फ हिंदू धर्मग्रंथों में ही नहीं बल्कि सिख और बौद्ध धर्म में भी भगवान कल्कि के अवतार का वर्णन मिलता है।</div><div>&nbsp;</div><h2>पूजन विधि</h2><div>कल्कि जयंती के दिन भगवान श्रीहरि के मंदिरों में विशेष अनुष्ठान होते हैं। वहीं भक्त इस दिन व्रत भी करते हैं। इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु का ध्यान करें और लकड़ी की चौकी पर लाल या पील कपड़ा बिछाएं। इस पर भगवान विष्णु या भगवान कल्कि के मूर्ति को स्थापित करें। इसके बाद भगवान विष्णु को चंदन, कुमकुम और हल्दी का तिलक करें।</div><div><br></div><div>फिर ताजे फूल अर्पित करें और धूप-दीप, नैवेद्य अर्पित करें और तुलसी दल नैवेद्य में जरूर रखें। पूजा के अंत में आरती करें। इस दिन विष्णु सहस्त्रनाम और या कल्किपुराण का पाठ करें। साथ ही विष्णु मंत्रों का जाप करें। पूजा खत्म करने के बाद क्षमायाचना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 10:08:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/symbolizing-end-of-kali-yuga-and-establishment-of-sat-yuga-know-auspicious-muhurat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nag Panchami Special: नागों की पूजा से मिलता है अभय वरदान, जानिए शुभ मुहूर्त और पूरी पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-of-the-nagas-grants-the-boon-of-fearlessness]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>श्रावण मास की पंचमी के दिन नागपंचमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग की पूजा कर उन्हें दूध पिलाया जाता है। दीवार पर नाग बनाकर भी पूजा की जाती है। हिंदू धर्म में नागों को देवताओं के तुल्य माना गया है। भगवान विष्णु शेष शैय्या पर विराजमान रहते हैं तो शिवजी के तो आभूषण ही नाग हैं। यही कारण है कि शिवजी के इस मास के द्वितीय पक्ष की पंचमी को सर्पों की विशेष रूप से पूजा की जाती है। इस दिन आज भी गांवों में घरों को गोबर में गेरू मिलाकर लीपा जाता था। नागपंचमी के दिन एक रस्सी में सात गांठें लगाकर और उस रस्सी को सांप मानकर लकड़ी के एक पट्टे पर रखा जाता है।</div><div><br></div><h2>नाग पंचमी पूजन विधि</h2><div><br></div><div>हल्दी−रोली, चावल और फूल आदि चढ़ाकर नाग देवता की पूजा करने के बाद कच्चा दूध, घी और चीनी मिलाकर इस रस्सी को सर्प देवता को अर्पित किया जाना चाहिए। इस दौरान पूजन के समय सर्प देवता की स्तुति इस श्लोक से करनी चाहिए− 'अनन्तम्, वासुकि, शेषम्, पद्मनाभम्, चकम्बलम् कर्कोतकम् तक्षकम्। पूजन के बाद नाग देवता की आरती जरूर उतारें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-get-relief-from-afflictions-on-nag-panchami-know-worship-rituals-for-nag-panchami" target="_blank">Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि</a></h3><h2>नाग पंचमी व्रत कथा</h2><div><br></div><div>एक साहूकार था। उसके सात लड़के और उनकी सात बहुएं थीं। छह बहुओं का तो मायका था, लेकिन सबसे छोटी बहू का मायका नहीं था। सावन मास लगते ही छह बहुएं तो अपने भाइयों के साथ मायके चली गईं, परंतु सातवीं के भाई नहीं था, तो कौन लेने आता? वो घर में उदास बैठी मन ही मन विचार करती थी कि मेरा मायका नहीं है। नागदेवता मुझे भी मायका देना।</div><div><br></div><div>इतना कहते ही नागदेवता ने दया की और ब्राह्मण का रूप धारण कर आए और सातवीं बहू को मायके के लिए लेकर चल दिए। थोड़ी दूर रास्ता तय करने पर उन्होंने अपना असली रूप धारण कर लिया, बहन मन में विचार करने लगी कि भाई मुझे लेकर कहां जाएगा। नागदेवता उसे नाग लोक में अपने घर ले आए और अपनी पत्नी से बोले कि यह मेरी बहन है, इसको अच्छी तरह से रखना, कोई दुख नहीं होने देना। एक दिन नागिन की जब प्रसूति हुई, तब वह दीया लेकर अपनी भाभी के बच्चों को देखने गई, लेकिन डर के कारण उसके हाथ से दीया गिर गया और नागिन के बच्चों की पूंछ जल गई। जिससे नागिन बहुत क्रोधित हुई और अपने पति से कहा कि आप अपनी बहिन को ससुराल भेज दो।</div><div><br></div><div>तब नाग देवता ने अपनी बहन को बहुत सारा धन देकर ससुराल भेज दिया। जब अगला सावन आया तो छोटी बहू दीवार पर नाग देवता बनाकर विधिवत पूजन कर मंगल कामना करने लगी। अपनी माता से पूंछ जलने का कारण जान नाग बालक जब छोटी बहू से बदला चुकाने आए, तो छोटी बहू को अपनी ही पूजा में मगन देखकर वे बहुत प्रसन्न हुए और उनका क्रोध समाप्त हो गया। नाग बालकों ने छोटी बहू के हाथ से प्रसाद रूप में दूध और चावल भी खाए। नागों ने उसे सर्पों से निर्भय होने का भी वरदान दिया तथा उपहार में बहुत सी मणियों की माला दी। और यह वरदान भी दिया कि श्रावण मास शुक्ल पक्ष की पंचमी को जो हमें भाई रूप में पूजेगा, उसकी हम सदा रक्षा करेंगे।</div><div><br></div><div>शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 14:16:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worship-of-the-nagas-grants-the-boon-of-fearlessness</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Singh Sankranti 2026: सूर्य का स्वराशि प्रवेश, महापुण्य काल में Surya Puja से चमकेगी किस्मत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-puja-performed-during-auspicious-period-marking-sun-entry-into-its-own-zodiac-sign]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में सूर्य को ग्रहों का राजा कहा गया है। वहीं सूर्य का राशि परिवर्तन भी विशेष महत्व रखता है। आज यानी की 17 अगस्त को सूर्य देव कर्क राशि से निकलकर सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। जब सूर्य देव किसी राशि में प्रवेश करते हैं, तो उसको राशि की संक्रांति कहा जाता है। इस दिन सूर्य देव की पूजा-आराधना और उनकी कृपा प्राप्त करने का विशेष मौका होता है। तो आइए जानते हैं आज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>आज 17 अगस्त की सुबह 08:03 मिनट पर कर्क राशि से निकलकर सूर्य देव सिंह राशि में प्रवेश करेंगे। सिंह संक्रांति का पुण्य काल मुहूर्त सुबह 05:51 मिनट से सुबह 08:04 मिनट तक रहेगा। वहीं इस दिन महापुण्य काल का समय 05:52 मिनट से लेकर सुबह 08:04 बजे तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>यह दिन सूर्य देव की विशेष कृपा प्राप्ति का होता है। इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर सूर्योदय के समय सूर्य देव को अर्घ्य करें। इस दिन स्नान-ध्यान करने, सूर्य देव को अर्घ्य देने और दान करने से शारीरिक कष्टों का नाश होता है। जल में रोली, कुमकुम और अक्षत मिलाकर सूर्य देव को अर्घ्य दें।</div><div><br></div><h2>मंत्र जाप</h2><div>'ॐ सूर्याय नमः'</div><div><br></div><div>'घृणि सूर्याय नमः'</div><div><br></div><div>इन मंत्रों के जाप के अलावा आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ करना चाहिए। ऐसा करने से सूर्य की स्थिति कुंडली में मजबूत होगी और सेहत लाभ, सम्मान और सुख-समृद्धि के रास्ते खुलते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 10:01:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-puja-performed-during-auspicious-period-marking-sun-entry-into-its-own-zodiac-sign</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Nag Panchami 2026: नाग पंचमी पर कैसे पाएं दोष से मुक्ति, जानें Nag Panchami 2026 की पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-get-relief-from-afflictions-on-nag-panchami-know-worship-rituals-for-nag-panchami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में नागपंचमी पर्व का विशेष महत्व होता है। श्रावण माह की शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को यह पर्व मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा-आराधना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन नागों की पूजा-अर्चना करने से सर्प भय, कालसर्प दोष और सर्पदंश जैसी बाधाओं से मुक्ति मिलती है। वहीं आज लोग नाग देवता को दूध अर्पित करते हैं और उनको स्नान कराकर पूजा आदि करते हैं। साथ ही नाग देवता से सुरक्षा और समृद्धि की कामना करते हैं। तो आइए जानते हैं नाग पंचमी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 16 अगस्त की शाम 04:51 मिनट से पंचमी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं 17 अगस्त ती शाम 05:00 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से आज यानी की 17 अगस्त को नागपंचमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का शुभ मुहूर्त 06:15 मिनट से लेकर 08:31 मिनट तक है।</div><div><br></div><h2>क्यों की जाती है नाग देवता की पूजा</h2><div>भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों से नागों का संबंध जुड़ा माना गया है। जहां भगवान शिव के गले में वासुकी नाग सुशोभित होते हैं। तो वहीं शेषनाग भगवान विष्णु की शैया हैं। श्रीकृष्ण के जन्म के बाद शेषनाग ने उनको और वासुदेव को यमुना पार कराने में मदद की थी। इसके अलावा समुद्र मंथन में भी वासुकी नाग की अहम भूमिका मानी जाती है। यह दिन नाग देवताओं के प्रति सम्मान प्रकट करने का पर्व है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद गाय के गोबर से नाग देवता का चित्र बनाएं और उनका आह्वान करें। अगर आपको व्रत करना हो, तो व्रत का संकल्प करें और फिर गुलाल, अबीर, मेहंदी, मेवा, फूल और दूध आदि अर्पित करें। इसके बाद मंत्रों का जाप करें और पूजा के बाद मनोकामना की पूर्ति के लिए प्रार्थना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 09:16:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/how-to-get-relief-from-afflictions-on-nag-panchami-know-worship-rituals-for-nag-panchami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hariyali Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए किया जाता है हरियाली तीज का पर्व, जानिए पूजन विधि और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-observed-for-enduring-marital-bliss-know-worship-rituals-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का पवित्र महीना चल रहा है। हर साल सावन महीने के शुक्ल पत्र की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। इस बार आज यानी की 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है। सुहागिन महिलाओं के लिए यह पर्व खास होता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा का विधान होता है। </div><div>&nbsp;</div><div>इस तिथि पर बारिश का मौसम रहता है और चारों ओर हरियाली रहती है। जिस कारण इसको हरियाली तीज का पर्व कहा जाता है। इस दिन व्रत और पूजन करने से वैवाहिक जीवन सुखमय होता है। तो आइए जानते हैं हरियाली तीज की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-the-festival-symbolizing-the-divine-union-of-shiva-and-parvati" target="_blank">Hariyali Teej 2026:  शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’</a></h3><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि की शुरूआत 14 अगस्त की शाम 06:47 मिनट पर हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति आज यानी 15 अगस्त की शाम 05:29 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 15 अगस्त 2026 को हरियाली तीज का पर्व मनाया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें। इसके बाद बालू से भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा बनाएं। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद मां पार्वती को सुहाग का सामान जैसे बिंदी, चूड़ियां, सिंदूर और कंघी आदि को थाली में सजाकर अर्पित करें। वहीं नैवेद्य में खीर, पूरी, हलुआ या मालपुए चढ़ाएं। इसके बाद हरियाली तीज की कथा सुनें। पूजा के अंत में आरती करें और सुखमय वैवाहिक जीवन की कामना करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>सावन के महीने में आने वाली हरियाली तीज के पर्व का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां पार्वती ने शिव को पति रूप में पाने के लिए वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उनको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। तब से हर साल सावन माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 09:50:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-observed-for-enduring-marital-bliss-know-worship-rituals-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hariyali Teej 2026:  शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक पर्व ‘हरियाली तीज’]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-the-festival-symbolizing-the-divine-union-of-shiva-and-parvati]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में ‘तीज’ पर्व का बहुत महत्व है, जो सालभर में तीन बार आता है। सबसे पहले आती है सावन के महीने में ‘हरियाली तीज’, उसके कुछ ही दिन बाद ‘कजरी तीज’ और फिर ‘हरतालिका तीज’। तीनों ही तीज भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित हैं और पूरे देश में बहुत धूमधाम से मनाई जाती हैं। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन शुक्ल तृतीया तिथि 14 अगस्त को शाम 6 बजकर 46 मिनट पर आरंभ होगी और 15 अगस्त को शाम 5 बजकर 28 मिनट पर समाप्त होगी। इसलिए उदया तिथि के अनुसार हरियाली तीज 15 अगस्त को मनाई जाएगी। हर साल श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला हिंदू महिलाओं का महत्वपूर्ण त्यौहार है ‘हरियाली तीज’, जिसका वर्णन सनातन शास्त्रों में भी मिलता है। यह शिव-पार्वती की पूजा के साथ महिलाओं के सजने-संवरने और खुशियां मनाने का पावन त्यौहार है। हिंदू धर्म में हरियाली तीज को महत्वपूर्ण व्रतों में से एक माना जाता है।</div><div><br></div><div>सनातन धर्म में हरियाली तीज का व्रत अपार भक्ति और उत्साह के साथ मनाया जाता है, जो भगवान शिव और देवी पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक है। मान्यता है कि तीज के दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करने से कई गुना अधिक फलों की प्राप्ति होती है। पौराणिक कथा के अनुसार इसी दिन माता पार्वती को 107 जन्मों तक तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, झारखंड इत्यादि कई राज्यों में सुहागिन हिंदू महिलाएं दिनभर निर्जला व्रत रखकर अपने पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना कर हरियाली तीज मनाती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-festival-for-women" target="_blank">Hariyali Teej 2026: महिलाओं का उत्सव है हरियाली तीज</a></h3><div>तीज पर्व उस दिन की याद में मनाया जाता है, जब भगवान शिव ने देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था, जिसके कारण पार्वती को ‘तीज माता’ के रूप में पूजा जाने लगा। धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती को समर्पित ‘हरियाली तीज’ व्रत करने से विवाहित महिलाओं का जीवन खुशियों से भर जाता है, उनके पति को लंबी आयु का आशीर्वाद प्राप्त होता है जबकि अविवाहित लड़कियों की शीघ्र शादी के योग बनते हैं। यही कारण है कि विवाहित महिलाओं के साथ अविवाहित लड़कियां भी यह व्रत करती हैं। इस दिन भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा-अर्चना करने का विधान है। विवाहित महिलाएं अपने पति की सलामती और लंबी उम्र की प्रार्थना करने के लिए यह व्रत रखती हैं।</div><div><br></div><div>श्रावण महीने में आने वाली इस ‘तीज’ को ‘हरियाली तीज’ इसीलिए कहा जाता है क्योंकि यह पर्व मानसून के ऐसे मौसम में मनाया जाता है, जब वातावरण सबसे हरा-भरा होता है। यह पर्व सावन के महीने में ऐसे समय मनाया जाता है, जब संपूर्ण धरा पर हरियाली की मनोहारी चादर बिछी रहती है। सावन की हरी-भरी ऋतु में आने के कारण ही यह पर्व ‘हरियाली तीज’ कहलाता है। हरियाली तीज के दिन वृक्ष, नदियों और जल के देवता वरुण देव की भी उपासना की जाती है। इसे ‘सिंधारा तीज’ भी कहा जाता है। ‘सिंधारा’ उपहार देने की ऐसी प्रथा है, जो नवविवाहितों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। हरियाली तीज को ‘सावन तीज’, ‘छोटी तीज’, ‘मधुश्रवा तीज’ इत्यादि नामों से भी जाना जाता है। पंजाब में इसे ‘तीयां’ और राजस्थान में ‘शिंगारा’ तीज के नाम से जाना जाता है। राजस्थान में माता पार्वती या तीज माता की शोभायात्राएं निकाली जाती हैं, वहीं हरियाणा में हरियाली तीज पर सरकारी अवकाश रहता है।</div><div><br></div><div>इस दिन श्रृंगार करने का काफी महत्व माना जाता है। दरअसल इस त्यौहार पर सुहागिन महिलाओं का अपने हाथों पर मेहंदी लगाना, हरे या लाल रंग के कपड़े पहनना, श्रृंगार करना और हरे रंग की चूड़ियां पहनना बहुत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन श्रृंगार करने से मां पार्वती प्रसन्न होती हैं और अपना आशीर्वाद प्रदान करती हैं, इसलिए माता पार्वती की कृपा पाने के लिए सुहागिन महिलाएं श्रृंगार करती हैं और अपने अखंड सौभाग्य की कामना करती हैं। सावन माह में हरे रंग का विशेष महत्व होता है क्योंकि यह रंग प्रकृति का रंग होता है। हरे रंग का गहरा संबंध वर्षा ऋतु और हरियाली से होता है, जो मन को भी शांति देता है। हिंदू धर्म में हरा रंग अखंड सौभाग्य का प्रतीक माना गया है। हरा रंग प्रकृति, वृद्धि और नवीनता का प्रतीक है, जो इन गुणों को विवाह में भी दर्शाता है। माना जाता है कि धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी भी हरे रंग को पसंद करती हैं। यही कारण है कि हरियाली तीज में इस रंग को पहनना शुभ माना गया है। इसीलिए हरियाली तीज के मौके पर सुहागिन महिलाएं हरी साड़ी, हरी कांच की चूड़ियां इत्यादि खासतौर से पहनती हैं।</div><div><br></div><div>हरियाली तीज में बरगद (वट) वृक्ष की परंपरा बहुत महत्वपूर्ण है, घरों में तथा वट वृक्ष की शाखाओं पर झूले डाले जाते हैं, जिन पर महिलाएं एकत्रित होकर दिनभर झूला झूलती हैं, नृत्य करती हैं और लोकगीत गाते हुए खुशियां मनाती हैं। हिंदू पौराणिक कथाओं में वट वृक्ष को बहुत पवित्र माना गया है, जो ज्ञान का प्रतीक है और हरियाली तीज पर इसकी पूजा करना शुभ माना जाता है। हरियाली तीज के दौरान महिलाएं कठोर निर्जला व्रत रखती हैं, जिसमें वे पूरे दिन भोजन और जल से परहेज करती हैं। शाम को चंद्रमा की पूजा के साथ व्रत का समापन किया जाता है। वृदांवन के कृष्ण मंदिरों में तीज का उत्सव बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है, जहां भगवान के लिए झूले बिछाए जाते हैं, जिसे ‘झूलन लीला’ कहा जाता है। खासकर विवाहित हिंदू महिलाओं के लिए तो देवी पार्वती और भगवान शिव के दिव्य मिलन को समर्पित यह त्यौहार करवा चौथ के समान महत्व रखता है।</div><div><br></div><div>विभिन्न धार्मिक कथाओं के अनुसार ‘हरियाली तीज’ व्रत की शुरुआत पर्वतराज हिमालय की पुत्री माता पार्वती ने की थी। माता पार्वती ने भगवान शिव को अपने पति के रूप में पाने के लिए काफी लंबे समय तक कठोर तपस्या की थी और यह व्रत किया था। इस व्रत के प्रभाव से ही भगवान शंकर उन्हें पति के रूप में प्राप्त हुए थे। हरियाली तीज मनाए जाने का वर्णन कई पौराणिक कथाओं में मिलता है। ऐसी ही एक पौराणिक कथा के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। भगवान शिव ने उनकी तपस्या और भक्ति से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसीलिए इस दिन को माता पार्वती और भगवान शिव के पुनर्मिलन के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि तभी से ही हरियाली तीज का त्यौहार मनाने की परंपरा चली आ रही है और कुंवारी कन्याएं भी हरियाली तीज के दिन मनचाहे वर की प्राप्ति और विवाह में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए यह व्रत रखती हैं।</div><div><br></div><div>- श्वेता गोयल</div><div>(लेखिका डेढ़ दशक से अधिक समय से शिक्षण क्षेत्र में सक्रिय शिक्षाविद हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 15:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-the-festival-symbolizing-the-divine-union-of-shiva-and-parvati</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Hariyali Teej 2026: महिलाओं का उत्सव है हरियाली तीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-festival-for-women]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तीज का उत्सव श्रावण मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है। यह महिलाओं का उत्सव है। सावन में जब सम्पूर्ण प्रकृति हरी ओढ़नी से आच्छादित होती है उस अवसर पर महिलाओं के मन मयूर नृत्य करने लगते हैं। वृक्ष की शाखाओं में झूले पड़ जाते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश में इसे कजली तीज के रूप में मनाते हैं। सुहागन स्त्रियों के लिए यह व्रत बहुत महत्व रखता है। आस्था, उमंग, सौंदर्य और प्रेम का यह उत्सव शिव-पार्वती के पुनर्मिलन के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। चारों ओर हरियाली होने के कारण इसे हरियाली तीज कहते हैं। इस अवसर पर महिलाएं झूला झूलती हैं, लोकगीत गाती हैं और आनन्द मनाती हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सौंदर्य, प्रेम के उत्सव और आस्था के इस व्रत का महिलाओं के लिए बड़ा महत्व है, विशेष रूप से नव विवाहिताओं के लिए। यह त्योहार मुख्य रूप से उत्तर भारत (राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर पदेश, बिहार और झारखंड) में धूमधाम से मनाया जाता है। परंपरा के अनुसार नवविवाहिताएं पहला व्रत मायके में रखती हैं और इसके लिए झूले सजाए जाते हैं, लोक गीत गाए जाते हैं। देश के कई हिस्सों में मेले लगते हैं और माता पार्वती की सवारी निकाली जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-unique-celebration-of-rich-traditions-and-the-sanctity-of-married-life" target="_blank">Hariyali Teej 2026: समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है हरियाली तीज</a></h3><div>वर्षा ऋतु में श्रावण के महीने में हमारे देश में चारों तरफ पानी बरसता रहता है। इस दौरान चारों तरफ हरियाली ही हरियाली नजर आती है। हरियाली के आगोश में प्रकृति इस तरह झूम उठती है मानो पृथ्वी अपनी हरी-भरी बाहें फैलाकर सबका अभिनंदन कर रही हो। श्रावण के महीने को हिंदू धर्मावलंबी भगवान शिव का महीना मान मानकर भगवान शिव की पूजा अर्चना करते हैं। कावड़िए देशभर में विभिन्न नदी, तालाबों से जल लाकर भगवान शिव का अभिषेक करते हैं। गणगौर के बाद त्योहारों का सिलसिला रुक जाता है वह एक बार फिर श्रावण मास की तीज से प्रारंभ हो जाता है। श्रावण का महीना महिलाओं के लिए विशेष उल्लास का महीना होता है। इस महीने में आने वाले अधिकांश लोक पर्व&nbsp; महिलाओं द्वारा ही मनाए जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>श्रावण मास का आगमन ही इस त्यौहार के आने की आहट सुनाने लगता है। समस्त सृष्टि सावन के अदभूत सौंदर्य में भिगी हुई सी नजर आती है। यह पर्व भारतीय जनमानस के अटूट विश्वास को और अधिक प्रगाढ़ता प्रदान करने का पर्व है। इस पर्व में हरियाली शब्द से ही साफ है कि इसका ताल्लुक पेड़-पौधों और पर्यावरण से है। यह त्योहार जीवन में जश्न का प्रतीक है और हरियाली तीज का पर्व प्रकृति का त्योहार हैं। इस मौके पर महिलाएं अच्छी फसल के लिए भी प्रार्थना करती हैं।</div><div><br></div><div>सावन के महीने में सिंजारा, तीज, नागपंचमी एवं सावन के सोमवार जैसे लोकपर्व उत्साह पूर्वक मनाए जाते हैं। श्रावण के महीने में मनायी जानेवाली हरियाली तीज आस्था, प्रेम, सौंदर्य व उमंग का त्यौहार है। तीज को मुख्यतः महिलाओं का त्यौहार माना जाता है। यह पर्व महिलाओं की सांस्कृतिक मान्यताओं का प्रतीक है। सावन माह में मनाया जाने वाला हरियाली पर्व दंपतियों के वैवाहिक जीवन में समृद्धि, खुशी और तरक्की का प्रतीक है। तीज का त्यौहार भारत के कोने-कोने में मनाया जाने वाला एक महत्वपूर्ण त्यौहार है। यह त्यौहार भारत के&nbsp; उत्तरी क्षेत्र में हर्षोउल्लास के साथ मनाया जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>श्रावण में में चारों ओर हरियाली की चादर सी बिखर जाती है। जिसे देख कर सबका मन झूम उठता है। सावन का महिना एक अलग ही मस्ती और उमंग लेकर आता है। श्रावण के सुहावने मौसम के मध्य में आता है तीज का त्यौहार। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को श्रावणी तीज कहते हैं। उत्तर भारत में यह हरियाली तीज के नाम से भी जानी जाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए इस व्रत का पालन किया था। परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनके तप से प्रसन्न होकर उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया था। माना जाता है कि श्रावण शुक्ल तृतीया के दिन माता पार्वती ने सौ वर्षों के तप उपरान्त भगवान शिव को पति रूप में पाया था। इसी मान्यता के अनुसार स्त्रियां माता पार्वती का पूजन करती हैं। हाथों में रची मेंहंदी की तरह ही प्रकृति पर भी हरियाली की चादर सी बिछ जाती है। इस नयनाभिराम सौंदर्य को देखकर मन में स्वतः ही मधुर झनकार सी बजने लगती है और हृदय पुलकित होकर नाच उठता है। इस समय वर्षा ऋतु की बौछारें प्रकृति को पूर्ण रूप से भिगो देती हैं। सावन की तीज में महिलाएं व्रत रखती हैं। इस व्रत को अविवाहित कन्याएं योग्य वर को पाने के लिए करती हैं तथा विवाहित महिलाएं अपने सुखी दांपत्य की चाहत के लिए करती हैं।</div><div><br></div><div>तीज पर मेहंदी लगाने, चूडियां पहनने, झूला झूलने तथा लोक गीतों को गाने का विशेष महत्व है। तीज के त्यौहार वाले दिन खुले स्थानों पर बड़े-बड़े वृक्षों की शाखाओं पर, घर की छत पर या बरामदे में झूले लगाए जाते हैं जिन पर स्त्रियां झूला झूलती हैं। हरियाली तीज के दिन अनेक स्थानों पर मेलों का भी आयोजन होता है।</div><div><br></div><div>राजस्थान में जिन कन्याओं की सगाई हो गई होती है। उन्हें अपने होने वाले सास&nbsp; ससुर से एक दिन पहले ही भेंट मिलती है। इस भेंट को स्थानीय भाषा में सिंझारा कहते हैं। सिंझारा में मेंहदी, लाख की चूडियां, लहरिया नामक विशेष वेश-भूषा, घेवर नामक मिठाई जैसी कई वस्तुएं होती हैं। पीहर पक्ष द्धारा अपनी विवाहित पुत्री को भी सिंजारा भेजा जाता है। जिसे पूजा के बाद सास को सुपुर्द कर दिया जाता है। राजस्थान में नवविवाहिता युवतियों को सावन में ससुराल से मायके बुलाने की भी परम्परा है।</div><div><br></div><div>तीज के अवसर पर नवयुवतियां हाथों में मेंहदी रचाते हुए गीत गाती हैं। समूचा वातावरण शृंगार से अभिभूत हो उठता है। इस त्योहार की सबसे बड़ी विशेषता है कि महिलाओं का हाथों पर विभिन्न प्रकार से बेलबूटे बनाकर मेंहदी रचाना। राजस्थान में हाथों व पांवों में भी विवाहिताएं मेंहदी रचाती हैं। जिसे मेंहदी मांडना कहते हैं। इस दिन राजस्थानी बालाएं दूर देश गए अपने पति के तीज पर आने की कामना करती हैं। जो कि उनके लोकगीतों में भी मुखरित होता है। राजस्थान के गांवों में पहले लड़किया गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलती थी। तीज के दिन से गुड्डे-गुड्डी का खेल खेलना बन्द कर देती थी। इसलिये गांव की लड़किया एक साथ एकत्रित होकर अपनी पुरानी गुड्डे-गुड्डी को गांव के पास के नदी,तालाब, जोहड़ में बहा देती थी। जिसे गुड्डी बहावना कहा जाता था।&nbsp;</div><div><br></div><div>अपने सुखी दांपत्य जीवन की कामना के लिये स्त्रियां यह व्रत किया करती हैं। इस दिन उपवास कर भगवान शंकर-पार्वती की बालू से मूर्ति बनाकर शोडशोपचार पूजन किया जाता है जो रात्रि भर चलता है। स्त्रियों द्धारा सुंदर वस्त्र धारण किये जाते है तथा घर को सजाया जाता है। इसके बाद मंगल गीतों से रात्रि जागरण किया जाता है। इस व्रत को करने वालि स्त्रियों को पार्वती के समान सुख प्राप्त होता है। तीज का आगमन वर्षा ऋतु के आगमन के साथ ही आरंभ हो जाता है। आसमान काले मेघों से आच्छादित हो जाता है और वर्षा की फोहार पड़ते ही हर वस्तु नवरूप को प्राप्त करती है। ऐसे में भारतीय लोक जीवन में हरियाली तीज या कजली तीज महोत्सव का बहुत गहरा प्रभाव देखा जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आज के दौर में ये सब बीती बाते बन कर रह गयी है। राजस्थान में मान्यता है कि गणगौर के साथ ही पर्व-त्यौंहार मनाना बन्द हो जाते हैं। वो तीज के दिन से पुनः मनाये जाने लगते हैं। तीज से शुरू होने के बाद त्योंहारों का सिलसिला गणगौर तक चलता है। इसीलिये राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है तीज त्योंहारा बावड़ी ले डूबी गणगौर।&nbsp;</div><div><br></div><div>- रमेश सर्राफ धमोरा&nbsp;</div><div>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 15:02:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-festival-for-women</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Hariyali Teej 2026: समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है हरियाली तीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-unique-celebration-of-rich-traditions-and-the-sanctity-of-married-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संस्कृति में प्रत्येक पर्व का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं पावन पर्वों में हरियाली तीज का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह पर्व श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। वर्षा ऋतु के आगमन से जब धरती हरियाली की चादर ओढ़ लेती है, तब प्रकृति का यह अनुपम सौंदर्य हरियाली तीज के उत्सव को और भी मनोहारी बना देता है। यह पर्व विशेष रूप से महिलाओं के लिए सौभाग्य, प्रेम, समृद्धि और आनंद का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><div>पौराणिक मान्यता के अनुसार माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। इसी दिव्य मिलन की स्मृति में हरियाली तीज का पर्व मनाया जाता है। विवाहित महिलाएँ अपने पति की दीर्घायु एवं सुख-समृद्धि की कामना करती हैं, जबकि अविवाहित कन्याएँ योग्य जीवनसाथी की प्राप्ति के लिए व्रत रखती हैं और माता पार्वती तथा भगवान शिव की पूजा करती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visiting-famous-shiva-temples-in-himachal-offers-immense-peace" target="_blank">Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide</a></h3><div>हरियाली तीज का उत्सव पूरे देश में उल्लास और उत्साह के साथ मनाया जाता है। महिलाएँ हरे रंग के वस्त्र धारण करती हैं, हाथों में मेहंदी रचाती हैं, चूड़ियाँ पहनती हैं और पारंपरिक आभूषणों से श्रृंगार करती हैं। बाग-बगीचों में झूले डाले जाते हैं, लोकगीत गाए जाते हैं और नृत्य के माध्यम से उत्सव की खुशी व्यक्त की जाती है। विशेष रूप से राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, हरियाणा और बिहार जैसे राज्यों में इस पर्व की भव्यता देखने योग्य होती है। अनेक स्थानों पर भगवान शिव और माता पार्वती की शोभायात्राएँ भी निकाली जाती हैं।</div><div><br></div><div>यह पर्व केवल धार्मिक आस्था का ही नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान और पर्यावरण संरक्षण का भी संदेश देता है। वर्षा ऋतु में चारों ओर फैली हरियाली हमें वृक्षों और वनस्पतियों के महत्व का स्मरण कराती है। हरियाली तीज हमें प्रकृति के साथ सामंजस्य स्थापित करने तथा पर्यावरण को सुरक्षित रखने की प्रेरणा देती है।</div><div><br></div><div>आज के आधुनिक जीवन में भी हरियाली तीज की प्रासंगिकता बनी हुई है। यह पर्व परिवार में प्रेम, विश्वास और सौहार्द को मजबूत करता है तथा हमारी सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने का अवसर प्रदान करता है। नई पीढ़ी को भी इस पर्व के सांस्कृतिक, सामाजिक और आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराना आवश्यक है। हरियाली तीज भारतीय संस्कृति की समृद्ध परंपराओं, प्रकृति-प्रेम और दांपत्य जीवन की पवित्रता का अनुपम उत्सव है। यह पर्व जीवन में उल्लास, प्रेम, आस्था और हरियाली का संदेश देता है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 16:49:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/hariyali-teej-is-a-unique-celebration-of-rich-traditions-and-the-sanctity-of-married-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hariyali Amavasya 2026: सावन की अमावस्या पर बन रहे विशेष संयोग, जानें Puja Vidhi और दान का महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/special-celestial-alignment-on-sawan-amavasya-know-puja-rituals-and-significance-of-charity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 12 अगस्त 2026 को हरियाली अमावस्या मनाई जा रही है। सावन शिवरात्रि के ठीक अगले दिन और हरियाली तीज से 3 दिन पहले यह अमावस्या आती है। सावन के महीने में पड़ने की वजह से इसको हरियाली अमावस्या कहा जाता है। हरियाली अमावस्या के दिन पूजा-पाठ, दान, पितरों का स्मरण करना बेहद फलदायी माना जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं हरियाली अमावस्या की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक श्रावण माह के कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि की शुरूआत 12 अगस्त की सुबह 01:53 मिनट पर हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति रात 11:07 मिनट पर होगी। ऐसे में हरियाली अमावस्या 12 अगस्त 2026 को मनाई जा रही है।</div><div><br></div><h2>स्नान-दान मुहूर्त</h2><div>सावन माह के दिन ब्रह्म मुहूर्त में स्नान-दान करना शुभ माना जाता है। 12 अगस्त को सुबह 04:23 मिनट से लेकर 05:06 मिनट तक ब्रह्म मुहूर्त रहेगा। वहीं पूजा के लिए अभिजित मुहूर्त दोपहर 11:59 मिनट से लेकर 12:52 मिनट तक रहेगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>हरियाली अमावस्या को पितरों के तर्पण के लिए सुबह जल्दी उठकर गंगाजल से स्नान आदि करें। इसके बाद अपने ईष्ट का ध्यान करें और भगवान शिव की पूजा-अर्चना करें। भगवान शिव को मदार और आक के फूल चढ़ाएं और पीपल के पेड़ की पूजा करें। इससे जीवन में सकारात्मक ऊर्जा आती है।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>हरियाली अमावस्या को चितलगी अमावस्या, गटारी अमावस्या और चुक्कला अमावस्या के नाम से भी जानते हैं। इस दिन भगवान शिव की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जो भी जातक इस दिन विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा करता है, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और कष्टों से मुक्ति मिलती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 09:37:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/special-celestial-alignment-on-sawan-amavasya-know-puja-rituals-and-significance-of-charity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan 2026: अमंगल हारी, करुणामयी शिवशक्ति का पावन पर्व है सावन शिवरात्रि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-shivratri-is-the-sacred-festival-of-shiva-and-shakti]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में सर्वाधिक महत्व जिस देव का है, वो देवाधिदेव भगवान शिव ही हैं, जो आज भी समूचे भारतवर्ष में उतने ही पूजनीय और वंदनीय हैं, जितने सदियों पहले। देशभर में भगवान शिव की पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है, इसीलिए ‘शिवरात्रि’ पर्व को भारत में राष्ट्रीय पर्व का दर्जा प्राप्त है। वैसे तो शिवरात्रि हर माह मनती है किन्तु इनमें से फाल्गुन महाशिवरात्रि और सावन शिवरात्रि की महत्ता सर्वाधिक है। सावन शिवरात्रि प्रायः माह की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिसे भगवान शिव के प्रति भारतीयों की आस्था की प्रतीक ‘कांवड़ यात्रा’ का समापन दिवस भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भारत में सावन शिवरात्रि का बहुत महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन की शिवरात्रि सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है और वर्ष यह तिथि 11 अगस्त को प्रातः 4 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर 12 अगस्त रात्रि 01 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, यह पर्व 11 अगस्त को ही मनाया जाएगा और इसी दिन शिवलिंग का जलाभिषेक होगा। सावन शिवरात्रि के पावन अवसर पर ही कांवड़ यात्रा का भी समापन होता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस साल सावन शिवरात्रि पर चतुर्ग्रही योग बन रहा है और इस दिन कर्क राशि में सूर्य, गुरु, बुध और चंद्रमा एक साथ बैठकर चतुर्ग्रही योग का निर्माण करने वाले हैं।</div><div><br></div><div>धार्मिक ग्रंथों में ‘शिव’ और ‘रात्रि’ के शाब्दिक अर्थ को परिभाषित करते हुए बताया गया है, जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करूणासागर भगवान शिव हैं। जो भगवान नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से ‘सगुण ईश्वर’ और ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं। ‘रात्रि’ शब्द ‘रा’ दानार्थक धातु से बना है अर्थात् जो सुखादि प्रदान करती है, वह ‘रात्रि’ है। रात्रि सदा आनन्ददायिनी होती है, अतः सबकी आश्रयदात्री होने के कारण उसकी स्तुति की गई है। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ है, वह रात्रि, जो आनंद देने वाली है, जिसका शिव नाम के साथ विशेष संबंध है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/the-supreme-mantra-of-life-is-hidden-within-every-offering-used-in-the-rudrabhishek" target="_blank">Sawan 2026: रुद्राभिषेक की हर सामग्री में छिपा है जीवन का महा मंत्र</a></h3><div>भगवान शिव को ‘कालों का काल’ और ‘देवों का देव’ अर्थात् ‘महादेव’ कहा गया है। देव-दानव, मानव-प्रेत, भगवान शिव इन सभी के आराध्य देव रहे हैं। ‘भोले बाबा’ के रूप में सर्वत्र पूजनीय भगवान शिव को समस्त देवों में अग्रणीय और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वह अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं तथा उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। भगवान शिव को भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता का प्रतीक माना गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में यही उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।</div><div><br></div><div>कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने भगवान शिव की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए उन्हें अपनी एक आंख समर्पित कर दी थी। इस बारे में कहा गया है कि भगवान विष्णु जब शिव को प्रसन्न करने के लिए 1008 कमल के फूलों से उनका अभिषेक कर रहे थे, तब आखिर में एक कमल कम रह गया। इस पर भगवान विष्णु ने तुरंत कटार से अपनी एक आंख निकाली और कम रहे कमल के स्थान पर शिव को अपनी आंख अर्पित कर दी। इससे शिव विष्णु पर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने भगवान विष्णु को अपना दिव्य मंत्र प्रदान कर दिया:-</div><div><br></div><div><b>ॐ त्रयम्बकं यजामहे</b></div><div><b>सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम।</b></div><div><b>उर्वारूकमिव बन्धनात।</b></div><div><b>मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।</b></div><div><br></div><div>भगवान शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है। इसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया। विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने गए। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाए।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 14:12:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-shivratri-is-the-sacred-festival-of-shiva-and-shakti</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan Shivratri 2026: सावन शिवरात्रि पर जानें जलाभिषेक का Muhurat और भद्रा काल का समय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/know-auspicious-time-for-jalabhishek-and-timing-of-bhadra-kaal-on-sawan-shivratri]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में सावन शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। इसलिए सावन माह में भगवान शिव की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व माना जाता है। इस दौरान भगवान शिव का पूजन, जप, जलाभिषेक और रुद्राभिषेक करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं और बाधाओं का नाश होता है। सावन महीने की शिवरात्रि का विशेष महत्व होता है। सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा और आराधना शुभ और फलदायी मानी जाती है। तो आइए जानते हैं सावन शिवरात्रि की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हर साल सावन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को सावन शिवरात्रि मनाई जाती है। पंचांग के मुताबिक इस साल चतुर्दशी तिथि की शुरूआत 11 अगस्त 2026 की सुबह 04:53 मिनट से हुई है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 12 अगस्त को देर रात 01:51 मिनट पर होगी। उदयातिथि के मुताबिक 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि मनाई जा रही है। शिवरात्रि पर रात्रि के चारों प्रहर में शिव और पार्वती की पूजा का विशेष महत्व होता है।</div><div><br></div><h2>भद्रा का साया</h2><div>इस बार सावन शिवरात्रि पर भद्राकाल का साया रहेगा। धार्मिक शास्त्रों में भद्राकाल को शुभ नहीं माना जाता है। आज सुबह से भद्रा लग जाएगी, जोकि दोपहर 03:22 मिनट तक रहेगी। लेकिन भगवान शिव की पूजा-अर्चना और जलाभिषेक में भद्रा दोष मान्य नहीं होगा। ऐसे में शिवभक्त बिना किसी डर के भद्राकाल में भगवान शिव की पूजा कर सकते हैं।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सूर्योदय से पहले उठें और स्नान आदि करके साफ कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और पास में स्थित शिवालय में जाकर भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा करें। शिवलिंग पर जल, गंगाजल, दही, दूध, घी, शहद और शक्कर से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग का दोबारा जल से अभिषेक करें। इसके बाद धतूरा, बेलपत्र, भांग, फूल और सफेद चंदन आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>अब भगवान शिव को फल और मिष्ठान आदि अर्पित कर नैवेद्य अर्पित करें। फिर 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र, महामृत्युंजय मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें। अंत में भगवान शिव की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 09:36:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/know-auspicious-time-for-jalabhishek-and-timing-of-bhadra-kaal-on-sawan-shivratri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Sawan Pradosh Vrat 2026: सोम प्रदोष व्रत पर शिवलिंग पूजा का महत्व, जानें Puja Timing और शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/significance-of-shivling-worship-som-pradosh-vrat-know-puja-timings-and-auspicious-moments]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा-आराधना का विशेष महत्व होता है। सावन माह में पड़ने वाले व्रत भी पुण्यदायी व्रतों में से एक माने जाते हैं। सावन में प्रदोष व्रत का विशेष महत्व होता है। वहीं प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ता है, इसको सोम प्रदोष व्रत भी कहा जाता है। प्रदोष में व्रत रखना और भगवान शिव की पूजा-आराधना करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत में प्रदोष काल में शिवलिंग का जलाभिषेक, रुद्राभिषेक, बेलपत्र और भांग-धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं। वहीं शिव मंत्रों के जाप से भगवान शिव और मां पार्वती की विशेष कृपा मिलती है। प्रदोष व्रत करने से वैवाहिक जीवन में सुख-शांति, संतान सुख और रोग आदि से छुटकारा मिलता है। इस बार 10 अगस्त को सोम प्रदोष व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सोम प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे मे...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरुआत 10 अगस्त को सुबह 8 बजे से होगी और इस तिथि का समापन 11 अगस्त को 4 बजकर 55 मिनट पर होगा। सावन सोम प्रदोष व्रत पर पूजा का शुभ मुहूर्त शाम 7 बजकर 05 मिनट से लेकर रात 09 बजकर 14 मिनट तक रहेगा। इस मुहूर्त में पूजा करना शुभ और फलदायी होता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प करें। फिर भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। इसके बाद 11 या 21 बेलपत्र, आक के फूल, धतूरा, फल, सुपारी, इलायची, लौंग, धूप, दीप, फूल, गंध, चावल और नैवेद्य अर्पित करें। पूजा के दौरान घी और शक्कर से बनी मिठाई का भोग लगाएं।</div><div><br></div><div>इसके बाद शिव मंत्रों का जाप करें और शिव चालीसा का पाठ करें। प्रदोष व्रत कथा पढ़े और पूजा के अंत में घी के दीपक से भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखते हुए मन में भगवान शिव का स्मरण करें और शाम को फिर से स्नान आदि करके प्रदोष काल में भगवान शिव की फिर से विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>प्रदोष व्रत पर भगवान शिव की पूजा-अर्चना का महत्व होता है। वहीं सावन में प्रदोष व्रत का महत्व बढ़ जाता है। भगवान शिव की पूजा के लिए सबसे अच्छा मुहूर्त प्रदोष काल होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रदोष का समय होता है, जब भगवान शिव कैलाश पर तांडव करते हैं और सभी देवी-देवता उनकी आराधना करते हैं। प्रदोष व्रत रखने और प्रदोष काल में पूजा करने, दीपदान करने, शिव चालीसा और रुद्राष्टक का पाठ करने से सभी तरह के पापों का अंत हो जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 09:39:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/significance-of-shivling-worship-som-pradosh-vrat-know-puja-timings-and-auspicious-moments</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kamika Ekadashi 2026: सावन में कामिका एकादशी व्रत का क्या है आध्यात्मिक महत्व? नोट करें Shubh Muhurat]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/what-spiritual-significance-of-kamika-ekadashi-fast-during-sawan-note-auspicious-timings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में कामिका एकादशी का विशेष महत्व होता है। हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को कामिका एकादशी कहा जाता है। सावन महीने में पड़ने वाली इस एकादशी तिथि का विशेष महत्व होता है। क्योंकि सावन का महीना भगवान शिव को अतिप्रिय होता है। वहीं एकादशी तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना के लिए सबसे अच्छा माना जाता है।</div><div><br></div><div>एकादशी का व्रत करने पर और भगवान विष्णु की पूजा करने से जातक के सभी तरह के पाप नष्ट हो जाते हैं और मृत्यु लोक के बाद व्यक्ति विष्णु लोक को प्राप्त होता है। कामिका एकादशी का व्रत करने से गंगा स्नान, काशी, गया, पुष्कर और कुरुक्षेत्र जैसे महान तीर्थों के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है। तो आइए जानते हैं कामिका एकादशी की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक सावन माह के कृष्ण पक्ष एकादशी तिथि की शुरूआत 08 अगस्त 2026 की दोपहर 01:59 मिनट पर शुरू होगी। वहीं अगले दिन यानी की 09 अगस्त की सुबह 11:04 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के मुताबिक कामिका एकादशी का व्रत 09 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। वहीं व्रत का पारण 10 अगस्त को सुबह 05:47 मिनट से लेकर 80:00 बजे तक होगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान विष्णु को पंचामृत, जल से स्नान कराने के बाद हल्दी और चंदन लगाएं। इसके बाद पीले फूल, तुलसी दल और भोग आदि अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान विष्णु से प्रार्थना करें। इसके बाद विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करें और एकादशी व्रत कथा सुनें। इसके बाद अगले दिन व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।</div><div>ॐ नारायणाय विद्महे वासुदेवाय धीमहि तन्नो विष्णुः प्रचोदयात।</div><div>ॐ श्रीं श्री लक्ष्मी-नारायणाभ्यां नमः।</div><div>ॐ विष्णवे नमः।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 09 Aug 2026 09:17:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/what-spiritual-significance-of-kamika-ekadashi-fast-during-sawan-note-auspicious-timings</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kamika Ekadashi 2026: विष्णु की पूजा और दान करने से मिलता है कभी न खत्म होने वाला पुण्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshipping-lord-vishnu-and-performing-acts-of-charity-yield-inexhaustible-merit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर वर्ष सावन माह के कृष्ण पक्ष की दशमी तिथि के अगले दिन कामिका एकादशी मनाई जाती है। यह पर्व भगवान विष्णु को समर्पित होता है। इस दिन भगवान विष्णु एवं धन की देवी मां लक्ष्मी की विशेष पूजा की जाती है।&nbsp; 9 अगस्त को सावन महीने की एकादशी का व्रत किया जाएगा। जिसका नाम कामिका एकादशी है। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 8 अगस्त 2026 को रात 3:29 मिनट से आरंभ होगी और 9 अगस्त 2026 को रात 12:34 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार कामिका एकादशी का व्रत&nbsp; 9 अगस्त 2026 को रखा जाएगा। कामिका एकादशी व्रत की कथा सुनना यज्ञ करने के समान है। इस व्रत के बारे में ब्रह्माजी ने देवर्षि नारद को बताया कि पाप से भयभीत मनुष्यों को कामिका एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए। एकादशी व्रत से बढ़कर पापों के नाशों का कोई उपाय नहीं है। स्वयं प्रभु ने कहा है कि कामिका व्रत से कोई भी जीव कुयोनि में जन्म नहीं लेता। जो इस एकादशी पर श्रद्धा-भक्ति से भगवान विष्णु को तुलसी पत्र अर्पण करते हैं, वे इस समस्त पापों से दूर रहते हैं। पुराणों में कहा गया है कि इस तिथि पर भगवान विष्णु की पूजा और व्रत करने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं। सावन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली इस एकादशी पर भगवान विष्णु को तुलसी पत्र चढ़ाने से जाने-अनजाने में हुए पाप खत्म हो जाते हैं। इस दिन तीर्थ स्नान और दान से कई गुना पुण्य फल मिलता है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि कामिका एकादशी पर शंख, चक्र, गदाधारी भगवान विष्णु का पूजन होता है। भीष्म पितामह ने नारदजी को इस एकादशी का महत्व बताया है। उन्होंने कहा कि जो मनुष्य इस एकादशी को धूप, दीप, नैवेद्य आदि से भगवान विष्णु की पूजा करते हैं, उन्हें गंगा स्नान के फल से भी उत्तम फल की प्राप्ति होती है। इस एकादशी की कथा सुनने से ही वाजपेय यज्ञ का फल मिल जाता है। भीष्म कहते हैं कि व्यतिपात योग में गंडकी नदी में और सूर्य-चन्द्र ग्रहण के दौरान स्नान करने से जितना पुण्य मिलता है। उतना ही महापुण्य सावन महीने में आने वाली कामिका एकादशी पर व्रत और भगवान विष्णु की पूजा करने से मिल जाता है। इस दिन तुलसी पत्र से भगवान विष्णु की पूजा करने का भी विधान बताया गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/learn-about-the-benefits-of-worshipping-a-shivling-made-from-a-specific-material" target="_blank">विभिन्न द्रव्यों से बनते हैं शिवलिंग, जानिये किस द्रव्य से बने शिवलिंग के पूजन से क्या लाभ होता है?</a></h3><h2>एकादशी तिथि&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, सावन माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि 8 अगस्त 2026 को रात 3:29 मिनट से आरंभ होगी और 9 अगस्त 2026 को रात 12:34 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार कामिका एकादशी का व्रत&nbsp; 9 अगस्त 2026 को रखा जाएगा।</div><div><br></div><h2>शुभ योग</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि पंचांग के अनुसार कामिका एकादशी के दिन सर्वार्थ सिद्धि योग भी बन रहा है। यह शुभ योग सुबह 6:03 मिनट से 6:22 मिनट तक रहेगा। धार्मिक मान्यता है कि इस योग में भगवान विष्णु की पूजा और दान-पुण्य करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>व्रत का संकल्प</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि स्कंद पुराण में बताया गया है कि सावन महीने के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी पर व्रत, पूजा और दान से जाने-अनजाने में हुए पाप खत्म हो जाते हैं। लेकिन, जानबूझकर दोबारा कोई पाप या अधर्म नहीं होगा, ऐसा संकल्प भगवान विष्णु के सामने लेने पर ही इसका फल मिलता है। ये व्रत साल की 24 एकादशियों में खास माना गया है।</div><div><br></div><h2>विष्णु पूजा&nbsp;</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि महाभारत और भविष्य पुराण में बताया गया है कि सावन महीने के दौरान भगवान विष्णु की पूजा करनी चाहिए। इनके अलावा विष्णुधर्मोत्तर पुराण में भी जिक्र है कि सावन महीने में भगवान विष्णु की पूजा और व्रत-उपवास से मिलने वाला पुण्य कभी खत्म नहीं होता है। पुराणों में कहा गया है कि सावन महीने के दौरान पंचामृत और शंख में दूध भरकर भगवान विष्णु का अभिषेक करने से जाने-अनजाने में हुए हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।</div><div><br></div><h2>निर्जल व्रत</h2><div>भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि सावन महीने में आने वाली एकादशियों को पर्व भी कहा जाता है। सावन मास में भगवान नारायण की पूजा करने वालों से देवता, गंधर्व और सूर्य आदि सब पूजित हो जाते हैं। एकादशी के दिन स्नानादि से पवित्र होने के बाद पूजा का संकल्प लेना चाहिए। इसके बाद भगवान विष्णु की मूर्ति की पूजा करना चाहिए। भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत और अन्य सामग्री चढ़ाकर आठों प्रहर निर्जल रहना चाहिए। यानी पूरे दिन बिना पानी पीए विष्णु जी के नाम का स्मरण करना चाहिए। एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन एवं दक्षिणा का भी बहुत महत्व है। इस प्रकार जो यह व्रत रखता है उसकी कामनाएं पूरी होती हैं।</div><div><br></div><h2>गौ दान का पुण्य</h2><div>भविष्यवक्ता डा. अनीष व्यास ने बताया कि पितामह ने बताया कि पूरे साल भगवान विष्णु की पूजा न कर सकें तो कामिका एकादशी का उपवास करना चाहिए। इससे बछड़े सहित गौदान करने जितना पुण्य मिल जाता है। सावन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी पर भगवान विष्णु की पूजा और उपवास करने से सभी देवता, नाग, किन्नर और पितरों की पूजा हो जाती है। जिससे हर तरह के रोग, शोक, दोष और पाप खत्म हो जाते हैं।</div><div><br></div><h2>मिलता है स्वर्ग</h2><div>कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि कामिका एकादशी के व्रत के बारे में खुद भगवान ने कहा है कि मनुष्यों को अध्यात्म विद्या से जो फायदा मिलता है उससे ज्यादा फल कामिका एकादशी का व्रत करने से मिल जाता है। इस दिन व्रत करने से मनुष्य को यमराज के दर्शन नहीं होते हैं। बल्कि स्वर्ग मिलता है। जिससे नरक के कष्ट नहीं भोगने पड़ते।</div><div><br></div><h2>दीपदान&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि भीष्म ने नारदजी को बताया कि कामिका एकादशी की रात में जागरण और दीप-दान करने से जो पुण्य मिलता है। उसको लिखने में चित्रगुप्त भी असमर्थ हैं। एकादशी भगवान विष्णु के सामने घी या तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए। जो ऐसे दीपक लगाता है उसे सूर्य लोक में भी हजारों दीपकों का प्रकाश मिलता है। ऐसे लोगों के पितरों को स्वर्ग में अमृत मिलता है।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 15:46:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshipping-lord-vishnu-and-performing-acts-of-charity-yield-inexhaustible-merit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Nag Panchami 2026: कब है नाग पंचमी? जानें तिथि, पूजा मुहूर्त, महत्व, कथा, मंत्र और पूजा विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/date-auspicious-time-for-worship-mantras-and-rituals-of-nag-panchami-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में नाग यानी सांप को भगवान शिव से जुड़ा और पूजनीय माना जाता है। हर साल सावन महीने में नाग पंचमी का त्योहार मनाया जाता है। इस दिन नाग देवता की पूजा करने और उन्हें दूध अर्पित करने की परंपरा है। माना जाता है कि नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से घर-परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है।</p><p>हिंदू पंचांग के अनुसार सावन महीने के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को नाग पंचमी मनाई जाती है। नाग पंचमी 2026 में 17 अगस्त, सोमवार को मनाई जाएगी। इस दिन भगवान शिव और नाग देवता की पूजा करने का विशेष महत्व माना जाता है।</p><p><strong>नाग पंचमी 2026 कब है?</strong><br>साल 2026 में नाग पंचमी का त्योहार 17 अगस्त, सोमवार को मनाया जाएगा। पंचमी तिथि की शुरुआत 16 अगस्त की शाम 4 बजकर 55 मिनट से होगी और इसका समापन 17 अगस्त की शाम 5 बजे होगा। नाग पंचमी के दिन सुबह स्नान करने के बाद नाग देवता और भगवान शिव की पूजा की जाती है। कई जगहों पर लोग मिट्टी से बने नाग की प्रतिमा या नाग के चित्र की भी पूजा करते हैं।</p><p><strong>नाग पंचमी 2026 पूजा का शुभ मुहूर्त</strong><br>नाग पंचमी पर पूजा के लिए सुबह का समय शुभ माना जाता है। साल 2026 में नाग पंचमी की पूजा का शुभ मुहूर्त सुबह 6 बजे से 8 बजकर 10 मिनट तक रहेगा। पूजा के लिए कुल समय 2 घंटे 10 मिनट का है।</p><p><strong>नाग पंचमी का महत्व क्या है?</strong><br>नाग पंचमी का हिंदू धर्म में विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग देवता की पूजा करने से परिवार की सुख-शांति बनी रहती है। भगवान शिव के गले में भी नाग विराजमान रहते हैं, इसलिए नाग पंचमी के दिन शिव पूजा को भी खास माना जाता है। गरुड़ पुराण में भी नाग पूजा का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार घर के मुख्य दरवाजे के दोनों ओर नाग के चित्र बनाकर उनकी पूजा करना शुभ माना जाता है। इसे नाग पूजा की एक पुरानी परंपरा माना जाता है।</p><p>नाग पंचमी के दिन कई महिलाएं व्रत रखती हैं और नाग देवता की पूजा करती हैं। इस दिन लड्डू और खीर जैसे पकवान बनाकर ब्राह्मणों को भोजन कराने की भी परंपरा बताई गई है। भगवान शिव के मंदिर में जाकर पूजा करना और नाग देवता को दूध अर्पित करना भी इस दिन की प्रमुख परंपराओं में शामिल है। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-shivratri-2026-date-know-muhurat-and-significance" target="_blank" rel="noopener">Sawan Shivratri 2026 Date and Time: जानिए कब है सावन की शिवरात्रि? जानें शिवलिंग पर जल चढ़ाने के नियम</a></p><p><strong>नाग पंचमी की पूजा कैसे की जाती है?</strong><br>नाग पंचमी के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद घर के पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करें। पूजा के लिए नाग देवता की मिट्टी, चांदी या पत्थर से बनी प्रतिमा रख सकते हैं। कुछ जगहों पर पांच नागों की प्रतिमा स्थापित करने की भी परंपरा है।</p><p>नाग देवता की प्रतिमा को साफ स्थान पर रखकर सबसे पहले भगवान गणेश और भगवान शिव का ध्यान करें। इसके बाद नाग देवता की पूजा करें। प्रतिमा पर जल, दूध, शहद और अन्य पूजा सामग्री अर्पित की जा सकती है। इसके बाद नाग पंचमी के मंत्र का जाप करें और भगवान से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।</p><p><strong>नाग पंचमी की पूजा विधि</strong><br>नाग पंचमी की पूजा के लिए सबसे पहले सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थान को साफ करें और वहां नाग देवता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद नाग देवता को जल, दूध और शहद अर्पित करें। पूजा में फूल, अक्षत, रोली और मिठाई भी चढ़ाई जा सकती है। भगवान शिव की पूजा करते समय शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाएं। पूजा के दौरान नाग देवता के मंत्र का जाप करें। अंत में नाग पंचमी की कथा सुनें या पढ़ें और आरती करें। पूजा पूरी होने के बाद परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।</p><p><strong>नाग पंचमी की कथा क्या है?</strong><br>नाग पंचमी की कथा महाभारत के राजा जनमेजय और सर्प यज्ञ से जुड़ी मानी जाती है। धार्मिक कथा के अनुसार राजा जनमेजय के पिता राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के काटने से हुई थी। अपने पिता की मृत्यु का बदला लेने के लिए जनमेजय ने सभी सांपों को खत्म करने के लिए एक बड़ा यज्ञ शुरू किया। यज्ञ में किए जा रहे मंत्रों के कारण कई सांप अग्नि कुंड में गिरने लगे। जब नागों पर संकट आया, तब देवी मनसा के पुत्र ऋषि आस्तिक ने राजा जनमेजय से यज्ञ रोकने का अनुरोध किया।</p><p>ऋषि आस्तिक की बात मानकर राजा जनमेजय ने यज्ञ रोक दिया और इस तरह कई नागों की जान बच गई। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह घटना सावन महीने की पंचमी तिथि को हुई थी। इसी वजह से इस दिन नाग पंचमी मनाने की परंपरा शुरू होने की कथा कही जाती है।</p><p><strong>नाग पंचमी 2026 का मंत्र</strong><br>नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करते समय इस मंत्र का जाप किया जाता है:<br>सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे ये केचित् पृथ्वीतले।<br>ये च हेलिमरीचिस्था येऽन्तरे दिवि संस्थिताः॥<br>ये नदीषु महानागा ये सरस्वतिगामिनः।<br>ये च वापीतडागेषु तेषु सर्वेषु वै नमः॥</p><p>मंत्र का जाप करते समय नाग देवता का ध्यान करें और परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करें।</p><p><strong>नाग पंचमी पर क्या चढ़ाया जाता है?</strong><br>नाग पंचमी के दिन नाग देवता की प्रतिमा या तस्वीर पर जल, दूध और शहद चढ़ाने की परंपरा है। इसके अलावा फूल, अक्षत, रोली और मिठाई भी अर्पित की जाती है। कई स्थानों पर लोग मिट्टी से नाग की प्रतिमा बनाकर उसकी पूजा करते हैं। पूजा के बाद नाग पंचमी की कथा सुनने और आरती करने की भी परंपरा है।</p><p><strong>नाग पंचमी पर भगवान शिव की पूजा का महत्व</strong><br>भगवान शिव के गले में नाग विराजमान रहते हैं। इसी वजह से नाग पंचमी के दिन भगवान शिव की पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है। भक्त इस दिन शिव मंदिर जाकर शिवलिंग पर जल और दूध चढ़ाते हैं और भगवान शिव से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।</p><p><strong>नाग पंचमी पर क्या नहीं करना चाहिए?</strong><br>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नाग पंचमी के दिन सांपों को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए। सांपों को पकड़कर या परेशान करके पूजा करने के बजाय नाग देवता की प्रतिमा या तस्वीर की पूजा करना बेहतर माना जाता है।</p><p>पूजा के दौरान साफ-सफाई का ध्यान रखें और श्रद्धा के साथ पूजा करें। जीवित सांपों को दूध पिलाने की कोशिश करने के बजाय मंदिर या घर में रखी नाग देवता की प्रतिमा पर दूध अर्पित करना सुरक्षित तरीका है। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-2026-correct-rituals-for-rudraksha-mala-chanting" target="_blank" rel="noopener">Sawan में Rudraksha Mala से जाप करते समय न करें ये बड़ी गलतियां, जानिए रुद्राक्ष माला के जप के नियम</a></p><p><strong>नाग पंचमी 2026 FAQs</strong><br><strong>नाग पंचमी 2026 में कब मनाई जाएगी?</strong><br>नाग पंचमी 2026 में 17 अगस्त, सोमवार को मनाई जाएगी।</p><p><strong>नाग पंचमी 2026 की पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है?</strong><br>नाग पंचमी 2026 में पूजा का शुभ समय सुबह 6 बजे से 8 बजकर 10 मिनट तक रहेगा।</p><p><strong>नाग पंचमी की पंचमी तिथि कब शुरू होगी?</strong><br>पंचमी तिथि 16 अगस्त 2026 को शाम 4 बजकर 55 मिनट से शुरू होगी।</p><p><strong>नाग पंचमी की पंचमी तिथि कब खत्म होगी?</strong><br>पंचमी तिथि 17 अगस्त 2026 को शाम 5 बजे समाप्त होगी।</p><p><strong>नाग पंचमी पर किसकी पूजा की जाती है?</strong><br>नाग पंचमी के दिन मुख्य रूप से नाग देवता की पूजा की जाती है। इसके साथ भगवान शिव की पूजा करना भी शुभ माना जाता है।</p><p><strong>नाग पंचमी पर क्या चढ़ाया जाता है?</strong><br>नाग पंचमी पर नाग देवता को जल, दूध और शहद अर्पित किया जाता है। इसके अलावा फूल, अक्षत, रोली और मिठाई भी चढ़ाई जाती है।</p><p><strong>नाग पंचमी की पूजा कैसे करें?</strong><br>सुबह स्नान करके साफ कपड़े पहनें और पूजा स्थान की सफाई करें। नाग देवता की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद जल, दूध, शहद, फूल और मिठाई अर्पित करें। मंत्र का जाप करें, नाग पंचमी की कथा पढ़ें और अंत में आरती करें।</p><p><strong>नाग पंचमी का क्या महत्व है?</strong><br>धार्मिक मान्यता के अनुसार नाग पंचमी के दिन नाग देवता की पूजा करने से परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। भगवान शिव से जुड़े होने के कारण इस दिन शिव पूजा का भी विशेष महत्व माना जाता है।</p><p><strong>नाग पंचमी की पूजा में कौन सा मंत्र पढ़ें?</strong><br>नाग पंचमी के दिन "सर्वे नागाः प्रीयन्तां मे..." मंत्र का जाप किया जाता है। श्रद्धालु इस मंत्र का जाप करते हुए नाग देवता से परिवार की सुख-शांति की प्रार्थना करते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 15:23:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/date-auspicious-time-for-worship-mantras-and-rituals-of-nag-panchami-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Gajanan Sankranti 2026: सावन की गजानन चतुर्थी आज, इन Mantras के जाप से चमक सकती है आपकी Fortune]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-gajanan-chaturthi-of-sawan-chanting-these-mantras-brighten-fortune]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में हर महीने कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाता है। यह व्रत भगवान गणेश को समर्पित होता है। वहीं सावन महीने में पड़ने वाली संकष्टी चतुर्थी को गजानन संकष्टी चतुर्थी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी व्यक्ति श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा करते हैं, उनके जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं। साथ ही सुख-समृद्धि आती है। इस बार आज यानी की 02 अगस्त को गजानन संक्रांति का व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और मंत्र आदि के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक 01 अगस्त की रात 11:07 मिनट से सावन कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 02 अगस्त की सुबह 11:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 02 अगस्त संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर भगवान गणेश का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। वहीं शाम को पूजा स्थान पर लकड़ी की चौकी लगाकर लाल कपड़ा बिछाएं। उस पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान गणेश को चंदन, रोली और फूल आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग लगाएं और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद संकष्टी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। वहीं चंद्रमा निकलने पर दूध, जल, फूल और अक्षत मिलाकर चंद्रदेव को अर्घ्य दें। इसके बाद प्रसाद ग्रहण करके व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>मंत्र</h2><div>वक्रतुंड महाकाय, सूर्यकोटि समप्रभ, निर्विघ्नम कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा।।</div><div><br></div><div>ॐ गण गणपतए नमः।।</div><div><br></div><div>गजाननं भूतगणादि सेवितं, कपित्थ जंबू फल चारु भक्षणम, उमा शतम् शोक विनाश कार्यक्रम, नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम।।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 02 Aug 2026 09:55:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/today-gajanan-chaturthi-of-sawan-chanting-these-mantras-brighten-fortune</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jaya Parvati Vrat 2026: जया पार्वती व्रत का समापन, जानिए Puja Vidhi और Udyapan का सही समय और नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/jaya-parvati-fast-concludes-know-correct-time-and-rules-for-puja-vidhi-and-udyapan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन माह की शुरूआत को चुकी है। वहीं आषाढ़ शुक्ल त्रयोदशी से जया-विजया पार्वती व्रत शुरू हुआ था। जोकि सावन कृष्ण तृतीया यानी की 5 दिनों तक रखा जाता है। जया पार्वती व्रत भगवान शिव और मां पार्वती को समर्पित है। यह व्रत महिलाएं अखंड सुहाग और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए रखती हैं और कुंवारी कन्याएं मनचाए वर की प्राप्ति के लिए रखती हैं। इस बार आज यानी की 01 अगस्त को जया पार्वती व्रत का समापन किया जाएगा।</div><div><br></div><h2>कैसे करें समापन</h2><div>जया पार्वती व्रत 5 दिनों तक चलने वाला विशेष व्रत है। इसको मुख्य रूप से सुहागिन महिलाएं और कुंवारी कन्याएं रखती हैं। वहीं व्रत के अंतिम दिन विधि-विधान से उद्यापन और समापन करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का पूजन करें। पूजा में भगवान शिव और मां पार्वती को अक्षत, फूल, फल, धूप-दीप और नैवेद्य आदि अर्पित करें। इसके बाद व्रत कथा का पाठ करें। क्योंकि माना जाता है कि बिना कथा सुने व्रत का पूजा पूरा फल मिलता है। मां पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित करें और इसमें चूड़ियां, बिंदी, चुनरी, सिंदूर, मेहंदी और श्रृंगार की अन्य वस्तुएं शामिल करें।</div><div><br></div><div>इसके बाद आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए मां पार्वती और भगवान शिव से क्षमायाचना करें। वहीं अपनी श्रद्धा अनुसार ब्राह्मण, जरूरतमंद या किसी सुहागिन को फल, वस्त्र, दक्षिणा या अन्न का दान करें। प्रसाद वितरित करें और सात्विक भोजन ग्रहण कर व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>धार्मिक मान्यता</h2><div>धार्मिक मान्यता है कि जो भी महिला विधिपूर्वक यह व्रत करके समापन करती हैं, उनका वैवाहिक जीवन खुशहाल रहता है और अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। वहीं अविवाहित कन्याओं को मनचाहे वर की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 01 Aug 2026 08:46:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/jaya-parvati-fast-concludes-know-correct-time-and-rules-for-puja-vidhi-and-udyapan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sawan 2026: व्रत शुरू करने से पहले जरूरी है संकल्प लेना, जानें इसका सही तरीका]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/correct-method-of-taking-sankalp-before-starting-the-sawan-2026-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सावन का पवित्र महीना शुरू हो चुका है। इस साल 30 जुलाई से 28 अगस्त तक भगवान शिव की पूजा का विशेष समय रहेगा। इस पूरे महीने में लाखों शिव भक्त कांवड़ यात्रा करते हैं, जबकि कई लोग हर सोमवार का व्रत रखते हैं। ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर आप सावन सोमवार का व्रत कर रहे हैं तो सिर्फ व्रत रखना ही काफी नहीं होता। व्रत शुरू करने से पहले संकल्प लेना भी बहुत जरूरी माना जाता है।</p><p><strong>व्रत की शुरुआत खाने से नहीं, संकल्प से होती है</strong><br>अक्सर लोग सोचते हैं कि व्रत की शुरुआत सुबह कुछ न खाने से हो जाती है। लेकिन धार्मिक मान्यता कहती है कि व्रत की असली शुरुआत आपके मन के संकल्प से होती है। जब आप भगवान शिव के सामने पूरे विश्वास और सच्चे मन से संकल्प लेते हैं, तभी व्रत का महत्व और बढ़ जाता है।</p><p><strong>संकल्प कब लेना चाहिए?</strong><br>सावन के पहले सोमवार की सुबह संकल्प लेना सबसे शुभ माना जाता है। अगर संभव हो तो ब्रह्म मुहूर्त में उठें। स्नान करें। हल्के या साफ रंग के कपड़े पहनें। भगवान शिव के सामने शांत होकर बैठें। कुछ देर मन को शांत करें और पूरे विश्वास के साथ "ॐ नमः शिवाय" मंत्र का जाप करें। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar" target="_blank" rel="noopener">Sawan 2026 Special: नागपंचमी और महाशिवरात्रि पर खुलने वाले ये Unique Temples, जानें इनकी पौराणिक परंपराएं</a></p><p><strong>संकल्प के लिए किन चीजों की जरूरत होगी?</strong><br>इस छोटी-सी पूजा के लिए आपको सिर्फ कुछ आसान चीजें चाहिए, जैसे 1 रुपये का सिक्का, थोड़े से कच्चे चावल, एक चम्मच जल, एक फूल (अगर हो तो) और शिवलिंग या भगवान शिव की तस्वीर। पूजा करते समय पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें और मन को पूरी तरह पूजा में लगाएं।</p><p><strong>संकल्प कैसे लें?</strong><br>भगवान शिव की तस्वीर या शिवलिंग के सामने बैठें। अपने दाहिने हाथ में जल, चावल और 1 रुपये का सिक्का रखें। इसके बाद यह संकल्प मंत्र बोलें,<br>देवदेव महादेव नीलकण्ठ नमोऽस्तु ते।<br>कर्तुमिच्छाम्यहं देव श्रावण सोमवार व्रतं तव।।<br>तव प्रभावाद्देवेश निर्विघ्नेन भवेदिति।<br>कामाधाः शत्रवो मां वै पीडां कुर्वन्तु नैव हि।।</p><p><strong>इस मंत्र का मतलब: </strong>हे देवों के देव महादेव, नीलकंठ, आपको मेरा प्रणाम। मैं पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ सावन सोमवार का व्रत रखना चाहता/चाहती हूं। कृपया मुझे आशीर्वाद दें ताकि मेरा यह व्रत बिना किसी परेशानी के पूरा हो सके। मेरे मन से क्रोध, लालच, गलत इच्छाएं और अशांत करने वाले विचार दूर करें। मुझे शांत, पवित्र और हमेशा अपनी भक्ति में बनाए रखें। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/sawan-2026-spiritual-rules-of-belpatra-plucking-explained" target="_blank" rel="noopener">Sawan 2026: सोमवार को Belpatra तोड़ने की मनाही क्यों? जानें Shivpuran के महत्वपूर्ण Rules और मान्यताओं का विश्लेषण</a></p><p><strong>संकल्प के बाद क्या करें?</strong><br>मंत्र बोलने के बाद भगवान शिव से अपने मन की इच्छा कहें। इसके बाद जल धीरे-धीरे शिवलिंग के चरणों में अर्पित करें। प्रेम और श्रद्धा से चावल चढ़ाएं। 1 रुपये का सिक्का अपने घर के मंदिर या पूजा स्थान पर रख दें। धार्मिक मान्यता है कि जब भक्त पूरे मन से भगवान शिव के सामने अपनी भावना व्यक्त करता है, तो उसकी भक्ति और भी मजबूत होती है।</p><p><strong>क्या सच में संकल्प लेना जरूरी है?</strong><br>ज्योतिष और धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संकल्प लेने से व्यक्ति का मन एक लक्ष्य पर टिकता है। इससे व्रत केवल एक परंपरा नहीं रहता, बल्कि श्रद्धा, अनुशासन और भगवान शिव के प्रति समर्पण का माध्यम बन जाता है। यही कारण है कि कई विद्वान सावन सोमवार का व्रत शुरू करने से पहले संकल्प लेने की सलाह देते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 18:59:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/correct-method-of-taking-sankalp-before-starting-the-sawan-2026-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kanwar Yatra 2026: 30 जुलाई से 'बम-बम भोले' की गूंज, जानें इस Holy Journey का धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/chanting-of-bam-bam-bhole-begins-on-july-30-and-religious-significance-of-holy-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का पवित्र महीना शुरू होते ही भगवान शिव के भक्तों की सबसे बड़ी और धार्मिक कांवड़ यात्रा शुरू हो जाती है। पूरे उत्तर भारत में केसरिया वस्त्र पहने लाखों की संख्या में श्रद्धालु गंगाजल भरने के लिए हरिद्वार, ऋषिकेश, गोमुख और अन्य पवित्र नदियों के तटों पर पहुंचने के लिए पैदल यात्रा करते हैं। इस दौरान भक्त अपने कंधों पर कांवड़ लेकर हर-हर महादेव के जयकारों के साथ सैकड़ों किमी की यात्रा करके स्थानीय शिव मंदिरों में पहुंचकर जलाभिषेक करते हैं। तो आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा कब से शुरू हो रही है और यह यात्रा कब समाप्त होगी।</div><div><br></div><h2>कांवड़ यात्रा 2026</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक सावन के महीने की शुरूआत के साथ ही कांवड़ यात्रा की शुरूआत हो जाती है। इस बार आज से यानी की 30 जुलाई 2026 से सावन माह की शुरूआत हुई है। वहीं 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि के दिन से कांवड़ यात्रा की समाप्ति होगी। इस बार कुल 13 दिनों तक कांवड़ यात्रा चलेगी।</div><div><br></div><h2>जलाभिषेक की डेट</h2><div>कांवड़ यात्रा का सबसे प्रमुख दिन सावन शिवरात्रि होती है। हरिद्वार, ऋषिकेश और अन्य धामों से जल लेकर आने वाले श्रद्धालु सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग का जलाभिषेक करते हैं। इस बार 11 अगस्त यानी की सावन शिवरात्रि पर जलाभिषेक के साथ कांवड़ यात्रा की समाप्ति होगी।</div><div><br></div><h2>क्यों निकलती है कांवड़ यात्रा</h2><div>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक समुद्र मंथन के दौरान जब विष निकला, तो भगवान शिव ने सृष्टि की रक्षा के लिए उस विष को अपने कंठ में धारण कर लिया था। विष के प्रभाव से महादेव का कंठ नीला पड़ गया और उनके शरीर का ताप अधिक बढ़ गया।</div><div><br></div><div>भगवान शिव के शरीर के ताप और जलन को शांत करने के लिए देवताओं और परम शिव भक्त रावण ने पवित्र गंगाजल से भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। तभी से सावन महीने में गंगाजल से शिवलिंग का जलाभिषेक करने और कांवड़ यात्रा निकालने की परंपरा चल रही है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 30 Jul 2026 09:12:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/chanting-of-bam-bam-bhole-begins-on-july-30-and-religious-significance-of-holy-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर्व है आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-is-a-spiritually-significant-festival]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज गुरु पूर्णिमा है, गुरु पूर्णिमा का हिन्दू धर्म में विशेष महत्व है। गुरु पूर्णिमा पर किए गए अनेक उपाय को करने से दरिद्रता दूरी होती है और घर में सुख-समृद्धि का वास होता है तो आइए हम आपको गुरु पूर्णिमा पर्व का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>जानें गुरु पूर्णिमा व्रत के बारे में&nbsp;</h2><div>हिंदू परंपरा में आषाढ़ माह की पूर्णिमा को आने वाली गुरु पूर्णिमा का विशेष धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व माना जाता है। यह दिन गुरु के प्रति आभार, सम्मान और समर्पण व्यक्त करने का अवसर होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार गुरु के मार्गदर्शन से ही जीवन में सही दिशा, ज्ञान और सफलता प्राप्त होती है। इसलिए इस दिन शिष्य अपने गुरु के चरणों में श्रद्धा अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि और उन्नति के द्वार खुलते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship" target="_blank">Ashadha Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर बना दुर्लभ योग, जानिए शुभ Muhurat और पूजा की विधि</a></h3><div>यह महापर्व उस गुरु को समर्पित होता है जो अपने शिष्य को अंधकार से निकालकर प्रकाश की ओर ले जाता है। गुरु पूर्णिमा का पर्व न सिर्फ धार्मिक बल्कि आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत ज्यादा मायने रखता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गुरू पूर्णिमा के पर्व पर यदि पूजा से जुड़े कुछेक उपायों को श्रद्धा और विश्वास के साथ किया जाए तो न सिर्फ सिद्ध संतों का आशीर्वाद बल्कि सुख-सौभाग्य की भी प्राप्ति भी होती है।</div><h2><br>व्यास पूर्णिमा के नाम से भी प्रसिद्ध है गुरु पूर्णिमा&nbsp;</h2><div>हिन्दू धर्म में गुरु पूर्णिमा महान ऋषि वेद व्यास जी के जन्मदिवस और उनके द्वारा चारों वेदों के संकलन के उपलक्ष्य में भी मनाया जाता है। उन्होंने महाभारत और पुराणों की रचना कर मानवता को ज्ञान का अनमोल खजाना दिया, इसीलिए उनके सम्मान में इसे ‘व्यास पूर्णिमा’ कहा जाता है। गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि इसी तिथि पर महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। वेदव्यास को हिंदू धर्मग्रंथों का संकलनकर्ता और महान गुरु माना जाता है। इस वर्ष गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। इस पावन अवसर पर लोग अपने गुरु को प्रसन्न करने के लिए उपहार भी अर्पित करते हैं। यह उपहार केवल वस्तु नहीं, बल्कि सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक होता है। यदि उपहार गुरु की पसंद या उनकी राशि के अनुसार दिया जाए, तो उसका महत्व और भी बढ़ जाता है। गुरु पूर्णिमा का महत्व सिर्फ़ एक धर्म तक ही सीमित नहीं है, बल्कि भारत के तीन प्रमुख धर्मों हिंदू धर्म, बौद्ध धर्म और जैन धर्म में भी इसका बहुत महत्व है। यह त्योहार हमारे गुरुओं या शिक्षकों की शिक्षाओं और उनके प्रयासों के सम्मान में मनाया जाता है। अगर हमारे मन में ज्ञान न भरा गया होता, तो हम सिर्फ़ मांस और हड्डियों का ढांचा ही होते।</div><div><br></div><div>गुरु पूर्णिमा का जश्न सिर्फ़ स्कूल-कॉलेज के शिक्षकों या साधुओं तक ही सीमित नहीं है। कोई भी व्यक्ति शिक्षक हो सकता है चाहे वह आपकी मां हों जिन्होंने आपको चलना सिखाया, या आपका दोस्त जिसने आपको कोई वाद्य यंत्र या खेल सिखाया। असल में, यही असली "टीचर्स डे" (शिक्षक दिवस) है। हालांकि गुरु पूर्णिमा का महत्व सभी धर्मों के लिए एक जैसा है, लेकिन इससे जुड़ी कहानियां अलग-अलग हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा पर पीपल के पेड़ के नीचे जलाएं दीया, होगा लाभ&nbsp;</h2><div>पंडितों के अनुसार सनातन परंपरा में तुलसी के पौधे का संबंध धन की देवी मां लक्ष्मी से माना गया है, वहीं पीपल के पेड़ में श्री हरि का वास माना गया है। ऐसे में साधक को गुरु पूर्णिमा वाले दिन पीपल के पेड़ में जल अर्पित करने के बाद शुद्ध देशी घी का दीया जलाना चाहिए। इस उपाय से साधक को श्री हरि संग माता लक्ष्मी का आशीर्वाद प्राप्त होता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा पर देवालय पर दीया जलाना होता है शुभ&nbsp;</h2><div>हिंदू मान्यताओं के अनुसार गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी के मंदिर में जाकर शुद्ध देशी घी का दीया जलाने से उनकी विशेष कृपा प्राप्त होती है। देवालयों में इस प्रकार दीए जलाने से जीवन के सभी दुख दूर और सुख-सौभाग्य की प्राप्ति होती है।</div><div>&nbsp;</div><h2>गुरु पूर्णिमा व्रत से जुड़ी पौराणिक कथा भी है रोचक</h2><div>शास्त्रों में वर्णित गुरु पूर्णिमा की पौराणिक कथा बहुत रोचक है। इस पौराणिक कथा के अनुसार, प्राचीन समय में एक बार भ्रमण के लिए महर्षि पराशर निकले थे। इस दौरान उनकी नजर एक महिला पर पड़ी, जिसका नाम सत्यवती था। वह एक मछुआरे की बेटी थी, वह अधिक खूबसूरत थी। उसके शरीर में से मछली की गंध आती रहती थी, क्योंकि उसका जन्म मछुआरे के घर हुआ था। इसलिए उन्हें मत्स्यगंधा भी कहा जाता था। ऋषि उसे देखकर व्याकुल हो गए, लेकिन पराशर ऋषि ने सत्यवती से संतान प्रदान करने की इच्छा जाहिर की। ऋषि की ये बात सुनकर सत्यवती ने अधिक आश्चर्यचकित होकर कहा कि मैं इस तरह से अनैतिक संबंध कैसे बना सकती हूं। इस तरह से संतान का जन्म लेना व्यर्थ है। ऐसे में ऋषि ने कहा कि जो संतान तुम्हारी कोख से जन्म लेगी। वह पूरे संसार के लिए महान काम करेगी। ऋषि की बात को सत्यवती ने मान लिया, लेकिन उसनें पहले ऋषि के सामने अपनी तीन शर्त रखी। पहली शर्त यह कि संभोग क्रीडा करते समय कोई न देखें। दूसरी शर्त में कहा कि होने वाला बच्चा महान ज्ञानी होने के साथ मेरी कौमार्यता को जीवन में कभी भंग न करे। वहीं, तीसरी शर्त थी कि शरीर से आने वाली गंध फूलों की खुशबू में बदल जाएं। इसके बाद सत्यवती की कोख से एक बेटे का जन्म हुआ, जिसका नाम द्वैपायन रखा था जो आगे चलकर वेदव्यास कहलाएं।धार्मिक मान्यता के अनुसार, महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ माह की पूर्णिमा को हुआ। उन्हें महाभारत, अठारह पुराणों, ब्रह्मसूत्र, मीमांसा जैसे अद्वितीय वैदिक साहित्य दर्शन के रचयिता माना जाता है।</div><div><br></div><h2>भगवान शिव ने सप्तऋषियों को चुना शिष्य&nbsp;</h2><div>पुराणों के अनुसार शिव ने सप्तर्षियों को तुरंत ज्ञान नहीं दिया था। उन्होंने उन ऋषियों की कई वर्षों की कठोर तपस्या, धैर्य और अटूट पात्रता को देखा। जब सप्तर्षि पूर्णतः ‘खाली’ और ग्रहणशील हो गए, तब पहली गुरु पूर्णिमा के दिन शिव ने उन्हें योग की सूक्ष्मताएं सिखाईं।</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा का आध्यात्मिक महत्व&nbsp;</h2><div>पडिंतों के अनुसार गुरु पूर्णिमा का अर्थ है गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। यह दिन शिष्य के लिए पुनर्जन्म के समान है। पूर्णिमा का चंद्रमा पूर्णता का प्रतीक है, और गुरु पूर्णिमा हमें याद दिलाती है कि गुरु के सान्निध्य में हमारा जीवन भी ज्ञान के प्रकाश से पूर्ण हो सकता है।</div><div><br></div><div>- प्रज्ञा पाण्डेय</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:28:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-is-a-spiritually-significant-festival</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ashadha Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा पर बना दुर्लभ योग, जानिए शुभ Muhurat और पूजा की विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 29 जुलाई को आषाढ़ पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है। इसको गुरु पूर्णिमा के नाम से भी जानते हैं। हिंदू धर्म में पूर्णिमा तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। इस तिथि पर स्नान-दान का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा पर व्रत और पूजा करने से भगवान श्रीहरि विष्णु, मां लक्ष्मी और चंद्रदेव का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन पूजा-अर्चना करने से जीवन में सुख-समृद्धि और शांति का वास होता है।</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक 28 जुलाई की सुबह 06:18 मिनट पर पूर्णिमा तिथि की शुरूआत हुई थी। वहीं आज यानी की 29 जुलाई की शाम 04:35 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। उदयातिथि के हिसाब से आषाढ़ पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जा रही है। इस दिन स्नान और दान-पुण्य करना शुभ माना जाता है।</div><div><br></div><h2>दुर्लभ योग</h2><div>बता दें कि आज आषाढ़ पूर्णिमा के दिन दो दुर्लभ योग बने हैं। आज प्रीति और आयुष्मान योग बना है। वैदिक ज्योतिष में इन दोनों योगों को बेहद शुभ और मंगलकारी माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस शुभ योग में पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठान करने से जातक को जीवन में सफलता और समृद्धि मिलती है।</div><div><br></div><h2>दान</h2><div>आषाढ़ पूर्णिमा को अन्न और गेहूं का दान करने से जीवन में धन-धान्य की कोई कमी नहीं होती है।</div><div><br></div><div>इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को कपड़ों का दान करने से जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।</div><div><br></div><div>आषाढ़ पूर्णिमा पर जल और घी का दान करने से जीवन में आरोग्यता की प्राप्ति होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:27:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/rare-yoga-formed-on-guru-purnima-know-auspicious-time-and-method-of-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: जानें आषाढ़ पूर्णिमा पर गुरु पूजा का महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-2026-know-the-significance-of-guru-puja-on-ashadha-purnima]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यह आषाढ़ के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा है जिसमें गुरु की पूजा का विधान है। पूरे भारत में यह पर्व बड़ी श्रद्धा व धूमधाम से मनाया जाता है। इस दिन हमें अपने गुरुजनों के चरणों में श्रद्धा अर्पित कर अपनी कृतज्ञता ज्ञापित करनी चाहिए। इस दिन प्रातः स्नान आदि से निवृत्त होकर ब्राह्मणों सहित 'गुरु परम्परा सिद्धयर्थं व्यासपूजा करिष्ये' संकल्प करके श्रीपर्गी वृक्ष की चौकी पर तत्सम धौतवस्त्र फैलाकर उस पर प्राग पर (पूर्व से पश्चिम) और उदग पर (उत्तर से दक्षिण) गन्धादि से बारह बारह रेखाएं बनाकर व्यास पीठ निश्चित करें तथा दसों दिशाओं में अक्षत छोड़कर दिग् बंधन करें। तत्पश्चात ब्रह्म, ब्रह्मा परावर शक्ति, व्यास, शुकदेव, गौडपाद, गोविन्द स्वामी और शंकराचार्य के नाम मंत्र से आह्वान आदि पूजन करके अपने दीक्षा गुरु (माता, पिता, पितामह, भ्राता आदि) की देवतुल्य पूजा करें।</div><div><br></div><div>प्राचीन काल में जब विद्यार्थी गुरु के आश्रम में निःशुल्क शिक्षा ग्रहण करता था तो इसी दिन श्रद्धाभाव से प्रेरित होकर अपने गुरु का पूजन करके उन्हें अपनी शक्ति और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा देकर कृतार्थ होता था। परिवार में अपने से जो भी बड़ा है, उसे गुरुतुल्य ही समझना चाहिए। जैसे माता, पिता, बड़ा भाई, बड़ी बहन आदि। इस दिन स्नान और पूजा आदि से निवृत्त होकर उत्तम वस्त्र धारण करके गुरु को वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। गुरु का आशीर्वाद ही प्राणीमात्र के लिए कल्याणकारी व मंगल करने वाला होता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29" target="_blank">Guru Purnima 2026: 29 जुलाई को मनाया जाएगा गुरु पूर्णिमा का पर्व</a></h3><div>कहा जाता है कि इस दिन से चार महीने तक साधु-संत एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। यह दिन महाभारत के रचयिता कृष्ण द्वैपायन व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और वेदों के सार ब्रह्मसूत्र की रचना भी वेद व्यास ने आज ही के दिन की थी। वेद व्यास ने ही वेद ऋचाओं का संकलन कर वेदों को चार भागों में बांटा था। उन्होंने ही महाभारत, 18 पुराणों व 18 उप पुराणों की रचना की थी जिनमें भागवत पुराण जैसा अतुलनीय ग्रंथ भी शामिल है। ऐसे जगत गुरु के जन्म दिवस पर गुरु पूर्णिमा मनाने की परंपरा है।</div><div><br></div><div>प्राचीन काल से चले आ रहे इस पर्व का महत्व आज भी कम नहीं हुआ है। पारंपरिक रूप से शिक्षा देने वाले विद्यालयों में यह दिन गुरु को सम्मानित करने का होता है। इस दिन मंदिरों में पूजा होती है, पवित्र नदियों में स्नान होते हैं, जगह जगह भंडारे होते हैं और मेले लगते हैं। इस दिन विद्यार्थियों को चाहिए कि अपने गुरु को वस्त्र, फल, फूल व माला अर्पण कर प्रसन्न कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करें। इस दिन केवल गुरु ही नहीं, अपितु माता-पिता, बड़े भाई-बहन आदि की भी पूजा का विधान है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:26:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/guru-purnima-2026-know-the-significance-of-guru-puja-on-ashadha-purnima</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: गुरु पूजन से दूर होगा अज्ञान का अंधेरा, जानें शुभ मुहूर्त और महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshiping-guru-dispel-darkness-of-ignorance-know-auspicious-time-and-its-importance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा हिंदू धर्म के एक बेहद महत्वपूर्ण पर्व है। इस बार आज यानी की 29 जुलाई 2026 को यह पर्व मनाया जा रहा है। गुरु पूर्णिमा के मौके पर गुरु का सम्मान, उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था। महर्षि वेदव्यास ने महाभारत की रचना, चारों वेदों का विभाजन और 18 पुराणों का संकलन कर मानव समाज को ज्ञान का अमूल्य भंडार दिया। इसलिए उनको आदिगुरु माना जाता है। तो आइए जानते हैं गुरु पूर्णिमा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 28 जुलाई की शाम 06:19 मिनट से हुई है। जोकि 29 जुलाई की शाम 08:06 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 जुलाई 2026 को गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है।।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर अपने गुरुजनों को प्रणाम कर उनका आशीर्वाद लें। अगर गुरु पास में नहीं हैं, तो उनके चित्र के जरिए उनको श्रद्धा अर्पित करें। फिर व्रत का संकल्प लें और दिनभर नियम और संयम के साथ इसका पालन करें। शाम को विधि-विधान से पूजा-अर्चना करें। वहीं पूजा के बाद चंद्रदेव को अर्घ्य देकर व्रत का पारण करें।</div><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>उपनिषदों और गुरु परंपरा में गुरु को त्रिदेवों यानी की ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूजनीय बताया गया है। क्यों बिना गुरु के मार्गदर्शन के आध्यात्मिक ज्ञान और मोक्ष प्राप्त करना कठिन है। गुरु पूर्णिमा आत्ममंथन, आत्मशुद्धि और ज्ञान प्राप्ति का पर्व है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 10:10:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/worshiping-guru-dispel-darkness-of-ignorance-know-auspicious-time-and-its-importance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Guru Purnima 2026: 29 जुलाई को मनाया जाएगा गुरु पूर्णिमा का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ मास की पूर्णिमा 29 जुलाई को है। इस तिथि पर गुरु पूजा का महापर्व गुरु पूर्णिमा मनाया जाता है। आम इंसान ही नहीं, भगवान ने भी गुरु से ज्ञान प्राप्त किया है। गुरु पूर्णिमा महर्षि वेदव्यास की जन्म तिथि है। वेदव्यास ने वेदों का संपादन किया। 18 मुख्य पुराणों के साथ ही महाभारत, श्रीमद् भागवत कथा जैसे ग्रंथों की रचना की थी। श्रीराम ने ऋषि वशिष्ठ और विश्वामित्र से ज्ञान प्राप्त किया, श्रीकृष्ण के गुरु सांदीपनि थे। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को शाम 6:18 मिनट से शुरू होकर 29 जुलाई को रात 8:05 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। हनुमान जी ने सूर्य देव को अपना गुरु बनाया था। भगवान दत्तात्रेय ने 24 गुरु बनाए थे। इसीलिए गुरु का स्थान सबसे ऊंचा माना गया है। गुरु पूर्णिमा पर अपने गुरु की पूजा करें, अपने सामर्थ्य के अनुसार कोई उपहार दें और उनकी शिक्षाओं पर चलने का संकल्प लें। तभी जीवन में सुख-शांति के साथ ही सफलता भी मिल सकती है।</div><div><br></div><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि भारत में इस दिन को बहुत श्रद्धा- भाव से मनाया जाता है। धार्मिक शास्त्रों में भी गुरु के महत्व को बताया गया है। गुरु को भगवान से भी श्रेष्ठ माना जाता है, क्योंकि गुरु ही भगवान तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं। हिंदू धर्म के सबसे महत्वपूर्ण पर्वों में से एक गुरु पूर्णिमा है। यह शुभ दिन गुरु की पूजा और उनका सम्मान करने के लिए समर्पित है, जो ज्ञान और आत्मज्ञान के मार्ग पर व्यक्तियों का मार्गदर्शन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan" target="_blank">Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत</a></h3><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि हिन्दू धर्म में गुरु का स्थान भगवान से भी ऊपर माना गया है। इनकी पूजा का दिन होता है गुरु पूर्णिमा, जो हर साल आषाढ़ मास के शुक्लपक्ष की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। हिंदू मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व महर्षि वेदव्यास की जयंती के रूप में मनाया जाता है। इसीलिए इसे व्यास पूर्णिमा के नाम से भी जाना जाता है। गुरु पूर्णिमा पर्व गुरुजनों को समर्पित है। शिष्य अपने गुरु देव का पूजन करेंगे। वहीं जिनके गुरु नहीं है वे अपना नया गुरु बनाएंगे। पुराणों में कहा गया है कि गुरु ब्रह्मा के समान है और मनुष्य योनि में किसी एक विशेष व्यक्ति को गुरु बनाना बेहद जरुरी है। क्योंकि गुरु अपने शिष्य का सृजन करते हुए उन्हें सही राह दिखाता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के दिन लोग अपने ब्रह्मलीन गुरु के चरण एवं चरण पादुका की पूजा अर्चना करते हैं। गुरु पूर्णिमा के दिन अनेक मठों एवं मंदिरों पर गुरुओं की पूजा-अर्चना की जाती है। मान्यता के अनुसार गुरु पूर्णिमा से ही वर्षा ऋतु का आरंभ होता है और आषाढ़ मास की समाप्ति होती है। इस दिन पवित्र नदी में स्नान और दान का भी विशेष पुण्य बताया गया है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूर्णिमा तिथि</h2><div>ज्योतिषाचार्य डा. अनीष व्यास ने बताया कि वैदिक पंचांग के अनुसार, गुरु पूर्णिमा 29 जुलाई को मनाई जाएगी। पूर्णिमा तिथि 28 जुलाई को शाम 6:18 मिनट से शुरू होकर 29 जुलाई को रात 8:05 मिनट तक रहेगी। उदया तिथि के आधार पर गुरु पूर्णिमा का पर्व 29 जुलाई को मनाया जाएगा। इस दिन गुरु पूर्णिमा का पर्व भी मनाया जाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2>गुरु पूर्णिमा</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि गुरु पूर्णिमा पर सुबह जल्दी उठें और सूर्य को जल चढ़ाने के बाद घर के मंदिर में पूजा करें। घर में पूजा करने के बाद अपने गुरु के घर जाएं। गुरु को ऊंचे आसन पर बैठाएं और हार-फूल, कुमकुम, चावल से पूजा करें। गुरु को मिठाई, फल और फूल चढ़ाएं। अपने सामर्थ्य के अनुसार उपहार और दक्षिणा दें। गुरु पूर्णिमा पर वेदव्यास की भी पूजा करें और उनके ग्रंथों के अध्यायों का पाठ करें। गुरु के सामने उनके उपदेशों को जीवन में उतारने का संकल्प लें।</div><div><br></div><h2>कर सकते हैं ये शुभ काम&nbsp;</h2><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डा. अनीष व्यास ने बताया कि आषाढ़ पूर्णिमा पर अनाज, धन, कपड़े, जूते-चप्पल, छाता, कंबल, चावल, खाना और ग्रंथों का दान कर सकते हैं। किसी गौशाला में गायों की देखभाल के लिए धन का दान करें। गायों को हरी घास खिलाएं। किसी मंदिर में पूजन सामग्री भेंट में दें। शिवलिंग पर जल, दूध चढ़ाएं। ऊँ नम: शिवाय मंत्र का जप करते हुए शिवलिंग पर चंदन का लेप करें। हनुमान जी के सामने दीपक जलाएं और सुंदरकांड या हनुमान चालीसा का पाठ करें। भगवान श्रीकृष्ण को माखन-मिश्री का भोग तुलसी के साथ लगाएं।</div><div><br></div><div>- डा. अनीष व्यास&nbsp;</div><div>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 17:58:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/the-festival-of-guru-purnima-will-be-celebrated-on-july-29</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kokila Vrat 2026: आज अखंड सौभाग्य के लिए कोकिला व्रत, जानें Muhurat, Puja Vidhi और धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/kokila-fast-for-unbroken-good-fortune-know-auspicious-time-and-puja-method]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह की पूर्णिमा का दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-उपासना के लिए बेहद शुभ माना जाता है। वहीं इस दिन महिलाएं कोकिला व्रत करती हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस व्रत को करने से वैवाहिक जीवन में प्रेम, सुख और सौभाग्य बना रहता है। वहीं कुंवारी लड़कियों योग्य जीवनसाथी की कामना के साथ कोकिला व्रत करती हैं। इस बार आज यानी की 28 जुलाई 2026 को कोकिला व्रत किया जा रहा है। तो आइए जानते हैं कोकिला व्रत कि तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और शुभ मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह की पूर्णिमा तिथि की शुरूआत 28 जुलाई की शाम 06:18 मिनट पर होगी। वहीं अगले दिन यानी की 29 जुलाई 2026 की रात 08:05 मिनच पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक यह व्रत 28 जुलाई 2026 को किया जा रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजा का समय</h2><div>कोकिला व्रत की पूजा शाम के समय प्रदोष काल में करना शुभ माना जाता है। आज प्रदोष काल का समय शाम 07:15 मिनट से लेकर रात 09:20 मिनट तक रहेगा। इस दौरान सुहागिन महिलाएं पूजा-अर्चना कर सकती हैं।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद भगवान शिव और मां पार्वती का ध्यान करें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और गंगाजल से मंदिर की सफाई करें। फिर मंदिर में भगवान शिव और मां पार्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। इसके बाद पवित्र मिट्टी से कोयल की छोटी प्रतिमा बनाएं। क्योंकि कोयल को मां पार्वती का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><div>इसके बाद इस कोयल की प्रतिमा को भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति के पास चौकी पर स्थापित करें। फिर फूल, धूप, चंदन, दीप, बेलपत्र, भांग, धतूरा, मौसमी फल और मिठाई आदि अर्पित कर भगवान शिव और मां पार्वती की विधि-विधान से पूजा करें।&nbsp;</div><div><br></div><div>बता दें कि प्रदोष काल में कोकिला व्रत की पूजा करना सबसे फलदायी माना जाता है। पूजा के दौरान कोकिला व्रत की कथा जरूर सुनना चाहिए। अंत में मां पार्वती की आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 08:15:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/kokila-fast-for-unbroken-good-fortune-know-auspicious-time-and-puja-method</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan 2026: इस बार 13 दिन की होगी Kanwar Yatra, जानें कब से होगी शुरू?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-2026-kanwar-yatra-will-last-for-13-days-find-out-when-it-begins]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देवों के देव महादेव का सबसे प्रिय महीना सावन 30 जुलाई से शुरू हो रहा है। सावन का महीना शुरू होते ही पवित्र कांवड़ यात्रा भी आरंभ हो जाएगी। इस बार सावन की शुरुआत 30 जुलाई, गुरुवार से हो रही है, इसलिए इसी दिन से यात्रा शुरू होगी। इस यात्रा का समापन सावन शिवरात्रि के दिन यानी 11 अगस्त, मंगलवार को होगा। मुख्य रूप से कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 11 अगस्त तक चलेगी, हालांकि कई जगह यह पूरे सावन चलती है।</p><p><strong>3 से 11 अगस्त का समय रहेगा बेहद खास</strong><br>3 अगस्त को सावन का पहला सोमवार है और 11 अगस्त को सावन शिवरात्रि है। इसलिए 3 से 11 अगस्त के बीच सड़कों और मंदिरों में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलेगी। इस दौरान शिव भक्त 'हर हर महादेव' और 'बम बम भोले' के जयकारे लगाते हुए अपने घरों और मंदिरों की ओर बढ़ते हैं। इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/shravan-2026-month-16-somvar-vrat-rules-and-mantra-analysis" target="_blank" rel="noopener">Shravan Month 2026 Rules: सावन व्रत में भगवान शिव के सामने जरूर बोलें ये एक मंत्र, पूरी होगी हर Wish</a></p><p><strong>सावन में कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व</strong><br>कांवड़ यात्रा को बहुत ही शुभ और पवित्र माना जाता है। मान्यता है कि इस महीने में भगवान शिव की पूजा करने से जितना पुण्य मिलता है, उससे कहीं ज्यादा पुण्य कांवड़ यात्रा से मिलता है। भक्त नंगे पांव पैदल चलकर या गाड़ियों से पवित्र नदियों का जल लाते हैं और शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। माना जाता है कि कांवड़ उठाने और जल चढ़ाने से भोलेनाथ प्रसन्न होते हैं, भक्तों पर अपनी कृपा बनाए रखते हैं और मोक्ष के द्वार खोलते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 17:45:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sawan-2026-kanwar-yatra-will-last-for-13-days-find-out-when-it-begins</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jaya Parvati Vrat 2026: 27 जुलाई से 31 जुलाई तक चलेगा आस्था का पर्व, जानें Shubh Muhurat और व्रत पारण की Date]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-faith-run-from-july-27-to-july-31-know-auspicious-time-and-date-of-breaking-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में जया पार्वती के व्रत का खास महत्व होता है। इसमें लगातार 5 दिनों तक व्रत किया जाता है। इस दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की जया के रूप में पूजा की जाती है। जया पार्वती व्रत अविवाहित कन्याएं और विवाहित महिलाएं दोनों रखती हैं। कुंवारी लड़कियां योग्य पति के लिए यह व्रत करती हैं। वहीं शादीशुदा महिला पति की लंबी उम्र और खुशहाल वैवाहिक जीवन के लिए यह व्रत करती हैं। इसके साथ ही संतान प्राप्ति के लिए भी जया पार्वती व्रत रखा जाता है। तो आइए जानते हैं जया पार्वती व्रत की तिथि, महूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल आषाढ़ माह की शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी से जया पार्वती व्रत की शुरूआत होती है। इस बार 26 जुलाई 2026 की दोपहर 01:57 मिनट से त्रयोदशी तिथि की शुरूआत हुई थी। इस तिथि की समाप्ति आज यानी 27 जुलाई की दोपहर 04:14 मिनट पर होगा। ऐसे में जया पार्वती व्रत 27 जुलाई को शुरू हो रहा है।</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद शुद्ध कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर में एक छोटे पात्र में पानी में ज्वार और गेहूं के दाने बोएं। अब पात्र के ऊपर 3 या 7 बार कलावा लपेटें। जिसको कुमकुम से रंग लें। लकड़ी की चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान शिव और मां पार्वती की मूर्ति को स्थापित करें। फिर हाथ में जल लेकर व्रत रखने का संकल्प लें।&nbsp; इसके बाद भगवान शिव और मां पार्वती को जल, चंदन, अक्षत, वस्त्र, श्रृंगार का सामान, फल, फूल और मिठाई आदि अर्पित करें।</div><div><br></div><div>घी का दीपक जलाकर 'ऊँ नम: शिवाय' और 'ऊँ पार्वतीपतये नम:' मंत्र का 11 या 21 बार जाप करें। इसके बाद जया पार्वती व्रत की कथा पढ़ें और आरती करें। वहीं पूजा के अंत में क्षमायाचना करके पूजा का समापन करें।</div><div><br></div><h2>व्रत के नियम</h2><div>व्रत के हर दिन गेहूं, ज्वार और शिव-पार्वती की पूजा-अर्चना करें।</div><div>5 दिन व्रत के दौरान आप सिर्फ दूध, फल, दही, फलों का जूस और दूध से बनी चीजों का सेवन करें।</div><div>इस व्रत में नमक वाला भोजन नहीं किया जाता है।</div><div>वहीं 5 दिनों तक अनाज नहीं खाना चाहिए।</div><div>व्रत में सभी तरह की सब्जियों का सेवन नहीं करना चाहिए।</div><div>दोपहर के समय सोना नहीं चाहिए।</div><div>बाल और नाखून नहीं काटने चाहिए।</div><div>5वें दिन रात में सोने के बजाय जागरण करना चाहिए।</div><div><br></div><h2>व्रत की समापन तिथि</h2><div>हर साल आषाढ़ माह की कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि पर जया पार्वती व्रत की समाप्ति होती है। इस बार 31 जुलाई 2026 को जया पार्वती व्रत का समापन होगा। लेकिन इन 5 दिनों के व्रत का पारण 01 अगस्त 2026 को किया जाएगा। जया पार्वती व्रत लगातार 5, 7, 9 या 11 वर्षों तक करना होगा है। वहीं अधिकतम 20 सालों तक करने का नियम है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 11:02:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/festival-of-faith-run-from-july-27-to-july-31-know-auspicious-time-and-date-of-breaking-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ravi Pradosh Vrat 2026: Ravi Pradosh Vrat पर दूर होंगी जीवन की सभी बाधाएं, शाम को इस Muhurat में करें Lord Shiva की आराधना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/obstacles-in-life-removed-on-ravi-pradosh-vrat-worship-lord-shiva-in-auspicious-evening]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी की 26 जुलाई 2026 को आषाढ़ मास का आखिरी प्रदोष व्रत रखा जा रहा है। इस दिन भगवान शिव की पूजा-उपासना करने का विधान है। वैदिक पंचांग के मुताबिक हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी पर यह व्रत किया जाता है। इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से जीवन में सुख-शांति आती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। आषाढ़ माह का यह प्रदोष व्रत रविवार को पड़ रहा है, इसलिए इसको रवि प्रदोष व्रत कहा जा रहा है। तो आइए जानते हैं रवि प्रदोष व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...&nbsp;</div><div><br></div><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><div>हिंदू पंचांग के मुताबिक आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत 26 जुलाई की दोपहर 01:58 मिनट पर होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति 27 जुलाई 2026 की शाम 04:15 मिनट पर होगी। ऐसे में प्रदोष काल का व्रत 26 जुलाई 2026 को किया जा रहा है।</div><div><br></div><div>बता दें कि प्रदोष व्रत की पूजा प्रदोष काल में करना बेहद शुभ माना जाता है। आज पूजा का शुभ मुहूर्त 26 जुलाई की शाम 07:16 मिनट से लेकर रात 09:21 मिनट तक है। इस अवधि में भगवान शिव की पूजा करना विशेष फलदायी माना जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>पूजन विधि</h2><div>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और फिर भगवान शिव का ध्यान करते हुए व्रत का संकल्प लें। भगवान शिव का दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल से अभिषेक करें। फिर 11 या 21 धतूरा, बेलपत्र, सुपारी, फल, आक के फूल, लौंग, फूल, इलायची, धूप, दीप, चावल और गंध आदि नौवेद्य आद अर्पित करें। इसके बाद शक्कर और घी से बनी मिठाई का भोग अर्पित करें। फिर शिव के मंत्र और शिव चालीसा का पाठ करें।</div><div><br></div><div>अब प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें और अंत में घी का दीपक जलाकर भगवान शिव की आरती करें। पूरा दिन व्रत रखें और भगवान शिव का मन में स्मरण करते रहें। शाम के समय फिर स्नान आदि करें। वहीं प्रदोष काल में भगवान शिव की पूरे विधि-विधान से पूजा और आरती करें।</div>]]></description>
      <pubDate>Sun, 26 Jul 2026 10:51:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/obstacles-in-life-removed-on-ravi-pradosh-vrat-worship-lord-shiva-in-auspicious-evening</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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