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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Papankusha Ekadashi Vrat पर भगवान विष्णु की पूजा से मिलता है 100 व्रत के समान पुण्य फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/papankusha-ekadashi-vrat-observed-with-ritual-lord-vishnu-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>एकादशी का व्रत जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित होता है। हर महीने कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत किया जाता है। आज यानी की 22 अक्टूबर को पापाकुंशा एकादशी का व्रत किया जा रहा है। धार्मिक मान्यता है कि इस एकादशी का व्रत करने और भगवान श्रीहरि की पूजा-अर्चना करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है और जीवन के कष्ट दूर होते हैं। तो आइए जानते हैं पापाकुंशा एकादशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>द्रिक पंचांग के मुताबिक 21 अक्टूबर की दोपहर 02:11 मिनट पर आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 22 अक्टूबर की दोपहर 02:47 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 22 अक्टूबर 2026 को पापाकुंशा एकादशी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और व्रत का संकल्प लें। इसके बाद लकड़ी की चौकी पर पीला कपड़ा बिछाकर उस पर भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर घी का दीपक जलाएं, तुलसी की टहनी और ताजे फूल श्रीहरि को अर्पित करें। फिर भगवान विष्णु को चंदन का तिलक करें, एकादशी व्रत कथा का पाठ करें और आरती करें। भगवान विष्णु को भोग लगाएं और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करें। वहीं इस दिन शालिग्राम की पूजा करना भी बेहद शुभ माना जाता है।</p><h2>मंत्र</h2><p>ऊं नमो नारायणाय</p><p>ऊं नम: भगवते वासुदेवाय</p><p>हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे<br>हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे</p><h2>धार्मिक महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यता है कि जो भी जातक पापाकुंशा एकादशी का व्रत करता है और विधि-विधान से भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करता है, उसको 100 व्रत के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है। वहीं इस व्रत के प्रभाव से व्यक्ति को एक हजार अश्वमेध यज्ञ और सभी तीर्थ स्थानों की यात्रा करने जितना पुण्य मिलता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 10:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/papankusha-ekadashi-vrat-observed-with-ritual-lord-vishnu-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Durga Visarjan 2026: विजयादशमी पर प्रतिमा विसर्जन के लिए मिलेगा 1 घंटा 59 मिनट का शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/durga-visarjan-muhurat-and-complete-puja-vidhi-on-vijayadashami]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि की समाप्ति के साथ विजयदशमी का पर्व मनाया जाता है। इस दिन मां दुर्गा की पूजा-अर्चना के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। दुर्गा विसर्जन के दौरान भक्त मां दुर्गा को भावपूर्ण विदाई देते हैं। फिर अगले साल मां दुर्गा से आने की प्रार्थना करते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस बार दुर्गा विसर्जन कब किया जाएगा, पूजा का मुहूर्त क्या है और विसर्जन की सही विधि क्या है।</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>द्रिक पंचांग के मुताबिक दुर्गा विसर्जन विजयादशमी के दिन किया जाता है। इस बार 20 अक्तूबर 2026 को विजयादशमी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाएगा। आज यानी की 20 अक्तूबर की दोपहर 12:20 मिनट से आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि शुरू होगी। वहीं 21 अक्तूबर की दोपहर 02:11 मिनट तक यह तिथि रहेगी। उदयातिथि के हिसाब से 20 अक्तूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जा रही है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-celebrations-begin-with-shastra-puja-and-evening-ravan-dahan" target="_blank" rel="noopener">Dussehra 2026: देशभर में आज मनेगा विजयादशमी पर्व, शाम को है रावण दहन का शुभ मुहूर्त</a></p><p>दुर्गा विसर्जन के दिन भक्त मां दुर्गा की पूजा-अर्चना करते हैं और परिवार की सुख-समृद्धि, शांति-खुशहाली और मंगल की कामना करते हैं। आज दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन का मुहूर्त 12:50 मिनट से लेकर 02:49 मिनट तक रहेगा। इस दौरान कुल अवधि 1 घंटा 59 मिनट तक रहेगा।</p><h2>पूजा विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान करें और साफ कपड़े पहनें। इसके बाद पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। फिर मां दुर्गा के सामने दीपक जलाकर पूजा शुरू करें। अब मां दुर्गा को फूल, अक्षत, चुनरी, सिंदूर और फल आदि अर्पित करें। आप मां दुर्गा को नारियल और अन्य पूजन सामग्री अर्पित करें। देवी दुर्गा को हलवा, खीर, पूड़ी आदि का भोग लगाएं। फिर मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और आरती करें। वहीं घर-परिवार के कल्याण और सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। साथ ही मां दुर्गा से अगले साल फिर से पधारने की प्रार्थना करें। वहीं पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें और फिर पूजा पूरी होने के बाद निर्धारित विसर्जन स्थल पर प्रतिमा का विसर्जन करें।</p><h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2><p>विसर्जन से पहले मां दुर्गा की पूजा-अर्चना और आरती करें।</p><p>विसर्जन के लिए स्थानीय प्रशासन की तरफ से निर्धारित स्थान का इस्तेमाल करना चाहिए।</p><p>देवी दुर्गा की प्रतिमा को तालाबों, नदियों या अन्य जलस्त्रोतों में विसर्जित न करें। जहां पर इसकी अनुमति नहीं है।</p><p>प्लास्टिक, प्लास्टर ऑफ पेरिस और हानिकारक रंगों से बनी सामग्री को जलस्त्रोतों में नहीं बहाना चाहिए।</p><p>प्लास्टिक, फूल, पत्ते और अन्य पूजन सामग्री को पानी में नहीं डालना चाहिए।</p><p>विसर्जन के दौरान भीड़ से बचना चाहिए।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Oct 2026 10:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/durga-visarjan-muhurat-and-complete-puja-vidhi-on-vijayadashami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dussehra 2026: देशभर में आज मनेगा विजयादशमी पर्व, शाम को है रावण दहन का शुभ मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-celebrations-begin-with-shastra-puja-and-evening-ravan-dahan]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 20 अक्तूबर 2026 को देशभर में दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है। हर साल यह पर्व आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन भगवान श्रीराम ने लंकापति रावण का वध कर देवी सीता को उनकी कैद से आजाद कराया था। दशहरा के दिन को विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम की पूजा, शस्त्र पूजन, दान-पुण्य और रावण दहन किया जाता है। तो आइए जानते हैं इस पर्व की तिथि, रावण दहन का मुहूर्त और धार्मिक महत्व के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि 20 अक्तूबर 2026 को दोपहर 12:51 मिनट पर शुरू होगी। वहीं इस तिथि की समाप्ति 21 अक्तूबर की दोपहर 02:11 मिनट पर होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 20 अक्तूबर 2026 को दशहरा का पर्व मनाया जा रहा है।</p><h2>शस्त्र पूजा का मुहूर्त</h2><p>विजयादशमी के मौके पर शस्त्र पूजन की परंपरा होती है। इस दिन शस्त्र की पूजा करके साहस, शक्ति और विजय की कामना की जाती है। माना जाता है कि विजयादशमी पर शस्त्र की पूजा करने से व्यक्ति की कभी पराजय नहीं होती है। आज शस्त्र पूजा के लिए विजय मुहूर्त दोपहर 01:59 मिनट से लेकर 02:45 मिनट तक है। वहीं अपराह्व पूजा मुहूर्त दोपहर 01:14 मिनट से लेकर शाम 03:30 मिनट तक है।</p><h2>रावण दहन का मुहूर्त</h2><p>दशहरे का पर्व बुराई पर अच्छाई का प्रतीक है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक रावण दहन के लिए प्रदोष काल का समय शुभ माना जाता है। इस दौरान सूर्यास्त के आसपास का समय भगवान की विजय का उत्सव मनाया जाता है और साथ ही रावण दहन किया जाता है। आज 20 अक्तूबर को प्रदोष काल का समय शाम 05:47 मिनट से लेकर रात 08:23 मिनट तक रहेगा। वहीं अबूझ मुहूर्त को रावण दहन के लिए श्रेष्ठ माना जाता है। वहीं रात 11:41 मिनट से लेकर रात 12:31 मिनट तक निशिता काल में भी पूजा की जाती है।</p><h2>अपराजिता देवी की पूजा</h2><p>दशहरे के मौके पर अपराजिता देवी की पूजा करना शुभ होता है। यह पूजा रावण दहन से पहले करनी चाहिए। धार्मिक मान्यता है कि देवी अपराजिता की पूजा होने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि आती है। देवी अपराजिता की पूजा करने से व्यक्ति का कार्य कोई असफल नहीं होता है। इसके लिए पूजा का स्थान साफ कर लें और एक चौकी पर साफ कपड़ा बिछाएं। फिर देवी अपराजिता देवी की प्रतिमा स्थापित करें। इसके बाद माता का जल और पंचामृत से अभिषेक करें और उनको अक्षत, फूल, वस्त्र, कुमकुम, फल, धूप और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।</p><p>इसके बाद देवी अपराजिता की चालीसा का पाठ करें। साथ ही 'ऊँ अपराजिताये नम:' मंत्र का जाप करें। देवी को सफेद या पीले रंग की मिठाई, फल या खीर का भोग अर्पित करें। पूजा के अंत में देवी अपराजिता की आरती करें। साथ ही पूजा में हुई भूल चूक के लिए क्षमायाचना करें।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Oct 2026 09:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-celebrations-begin-with-shastra-puja-and-evening-ravan-dahan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Dussehra 2026: अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-a-symbol-of-the-victory-of-good]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत में मनाए जाने वाले सभी त्योहारों में दशहरा का विशेष महत्व है। यह त्योहार बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इसे विजयादशमी भी कहा जाता है। इस दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके धर्म की स्थापना की थी। दशहरा न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। दशहरा शब्द हिंदी के दो शब्दों दस और हारा से मिलकर बना है। जहां दस गणित के अंक दस (10) और हारा शब्द पराजित का सूचक है। इसलिए यदि इन दो शब्दों को जोड़ दिया जाए तो दशहरा बनता है।&nbsp;</p><p><br>भारतीय संस्कृति वीरता की पूजक व शौर्य की उपासक है। व्यक्ति और समाज के रक्त में वीरता प्रकट हो इसलिए दशहरे का उत्सव रखा गया है। भारत कृषि प्रधान देश है। जब किसान अपने खेत में फसल उगाकर अनाज घर लाता है तो उसके उल्लास और उमंग का पारावार नहीं रहता। इस प्रसन्नता के लिये वह भगवान की कृपा को मानता है और उसे प्रकट करने के लिए उनका पूजन करता है। भारतवर्ष में यह पर्व विभिन्न प्रदेशों में विभिन्न प्रकार से मनाया जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-the-grand-festival-of-victory-power-and-the-establishment-of-dharma" target="_blank" rel="noopener">दुर्गा विसर्जन और दशहरा: विजय, शक्ति और धर्म की स्थापना का महापर्व</a></p><p>दशहरा भारत के सबसे महत्वपूर्ण त्योहारों में से एक है। इसी दिन भगवान राम ने बुराई के प्रतीक दस सिर वाले रावण का संहार किया था तो देवताओं को हराकर स्वर्ग पर अधिकार करने वाले महिषासुर का 10 दिन तक चले भयंकर युद्ध के बाद मां दुर्गा ने वध किया था। इसीलिये इसको विजयादशमी के नाम से जाना जाता है। अश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को इसका आयोजन होता है। इसे असत्य पर सत्य की विजय के रूप में मनाया जाता है। इसी दिन लोग नया कार्य प्रारम्भ करते हैं। इस दिन शस्त्र-पूजा की जाती है। इस दिन जगह-जगह मेले लगते हैं। रामलीला का समापन होता है। रावण का विशाल पुतला बनाकर उसे जलाया जाता है।</p><p>भारत एक विविधताओं से भरा देश है जहाँ अनेक धर्मों और संस्कृतियों के लोग साथ रहते हैं। यहां साल भर अनेक त्योंहार मनाए जाते हैं जो न केवल धार्मिक महत्व रखते हैं बल्कि सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समृद्धि का प्रतीक भी होते हैं। इन्हीं प्रमुख त्योहारों में से एक है दशहरा जिसे विजयादशमी के नाम से भी जाना जाता है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर जीत का प्रतीक है और इसका भारतीय संस्कृति में एक विशेष स्थान है। दशहरा का पर्व भगवान राम की रावण पर विजय के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसे विजयादशमी कहा जाता है जिसका अर्थ है विजय प्राप्त करने वाला दसवाँ दिन। रामायण के अनुसार भगवान राम ने रावण का वध कर अपनी पत्नी सीता को उसके बंदीगृह से मुक्त कराया था। यह पर्व यह संदेश देता है कि चाहे बुराई कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो अंत में जीत सत्य और धर्म की ही होती है। यह त्योहार लोगों को नैतिक मूल्यों, सत्य, और कर्तव्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।</p><p>बंगाल, ओडिशा और असम में यह पर्व दुर्गा पूजा के रूप में ही मनाया जाता है। यह बंगालियों, ओडिया, और आसमिया लोगों का सबसे महत्वपूर्ण त्योहार है। बंगाल में दशहरा पूरे पांच दिनों के लिए मनाया जाता है। ओडिशा और असम मे चार दिन तक त्योहार चलता है। यहां देवी दुर्गा को भव्य सुशोभित पंडालों में विराजमान करते हैं। देश के नामी कलाकारों को बुलवा कर दुर्गा की मूर्ति तैयार करवाई जाती हैं। यहां दशमी के दिन विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है और प्रसाद वितरण किया जाता है। पुरुष आपस में आलिंगन करते हैं जिसे कोलाकुली कहते हैं। स्त्रियां देवी के माथे पर सिंदूर चढ़ाती हैं व देवी को अश्रुपूरित विदाई देती हैं। इसके साथ ही वे आपस में भी सिंदूर लगाती हैं व सिंदूर से खेलती हैं। इस दिन यहां नीलकंठ पक्षी को देखना बहुत ही शुभ माना जाता है। अन्त में देवी प्रतिमाओं को विसर्जन के लिए ले जाया जाता है।<br><br>महाराष्ट्र में नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा को समर्पित रहते हैं जबकि दसवें दिन ज्ञान की देवी सरस्वती की वंदना की जाती है। इस दिन विद्यालय जाने वाले बच्चे अपनी पढ़ाई में आशीर्वाद पाने के लिए मां सरस्वती के तांत्रिक चिह्नों की पूजा करते हैं। किसी भी चीज को प्रारंभ करने के लिए खासकर विद्या आरंभ करने के लिए यह दिन काफी शुभ माना जाता है। महाराष्ट्र के लोग इस दिन विवाह, गृह-प्रवेश एवं नये घर खरीदने का शुभ मुहूर्त समझते हैं। महाराष्ट्र में इस अवसर पर सिलंगण के नाम से सामाजिक महोत्सव के रूप में भी इसको मनाया जाता है।&nbsp;</p><p><br>कर्नाटक में मैसूर का दशहरा भी पूरे भारत में प्रसिद्ध है। मैसूर में दशहरे के समय पूरे शहर की गलियों को रोशनी से सज्जित किया जाता है और हाथियों का शृंगार कर पूरे शहर में एक भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस समय प्रसिद्ध मैसूर महल को दीपमालिकाओं से दुल्हन की तरह सजाया जाता है। इसके साथ शहर में लोग टार्च लाइट के संग नृत्य और संगीत की शोभायात्रा का आनंद लेते हैं। पंजाब में दशहरा नवरात्रि के नौ दिन का उपवास रखकर मनाते हैं।</p><p>गुजरात में मिट्टी सुशोभित रंगीन घड़ा देवी का प्रतीक माना जाता है और इसको कुंवारी लड़कियां सिर पर रखकर एक लोकप्रिय नृत्य करती हैं जिसे गरबा कहा जाता है। गरबा नृत्य इस पर्व की शान है। पुरुष एवं स्त्रियां दो छोटे रंगीन डंडों को संगीत की लय पर आपस में बजाते हुए घूम घूम कर नृत्य करते हैं। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश एवं कर्नाटक में दशहरा नौ दिनों तक चलता है जिसमें तीन देवियां लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा की पूजा करते हैं। पहले तीन दिन धन और समृद्धि की देवी लक्ष्मी &nbsp;का पूजन होता है। अगले तीन दिन कला और विद्या की देवी सरस्वती की अर्चना की जाती है और अंतिम दिन देवी शक्ति की देवी दुर्गा की स्तुति की जाती है। पूजन स्थल को अच्छी तरह फूलों और दीपकों से सजाया जाता है। लोग एक दूसरे को मिठाइयां व कपड़े देते हैं।</p><p>कश्मीर के अल्पसंख्यक हिन्दू नवरात्रि के पर्व को श्रद्धा से मनाते हैं। परिवार के सारे वयस्क सदस्य नौ दिनों तक उपवास करते हैं। अत्यंत पुरानी परम्परा के अनुसार नौ दिनों तक लोग माता खीर भवानी के दर्शन करने के लिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि आश्विन शुक्ल दशमी को तारा उदय होने के समय विजय नामक मुहूर्त होता है। यह काल सर्वकार्य सिद्धिदायक होता है। इसलिए भी इसे विजयादशमी कहते हैं।</p><p>हिमाचल प्रदेश में कुल्लू का दशहरा बहुत प्रसिद्ध है। अन्य स्थानों की ही भांति यहां भी दस दिन अथवा एक सप्ताह पूर्व इस पर्व की तैयारी आरंभ हो जाती है। स्त्रियां और पुरुष सभी सुंदर वस्त्रों से सज्जित होकर ढोल, नगाड़े, बांसुरी आदि वाद्य यंत्रो को लेकर बाहर निकलते हैं। पहाड़ी लोग अपने ग्रामीण देवता का धूम धाम से जुलूस निकाल कर पूजन करते हैं। देवताओं की मूर्तियों को बहुत ही आकर्षक पालकी में सुंदर ढंग से सजाया जाता है। साथ ही वे अपने मुख्य देवता रघुनाथ जी की भी पूजा करते हैं। इस जुलूस में प्रशिक्षित नर्तक नटी नृत्य करते हैं। इस प्रकार जुलूस बनाकर नगर के मुख्य भागों से होते हुए नगर परिक्रमा करते हैं और कुल्लू नगर में देवता रघुनाथजी की वंदना से दशहरे के उत्सव का आरंभ करते हैं। दशमी के दिन इस उत्सव की शोभा निराली होती है।</p><p>बस्तर में दशहरे के मुख्य कारण को राम की रावण पर विजय ना मान कर लोग इसे मां दंतेश्वरी की आराधना को समर्पित एक पर्व मानते हैं। दंतेश्वरी माता बस्तर अंचल के निवासियों की आराध्य देवी हैंजो दुर्गा का ही रूप हैं। यहां यह पर्व पूरे 75 दिन चलता है। यहाँ दशहरा श्रावण मास की अमावस से आश्विन मास की शुक्ल त्रयोदशी तक चलता है। बस्तर में यह समारोह लगभग 15वीं शताब्दी से शुरु हुआ था। इसका समापन अश्विन शुक्ल त्रयोदशी को ओहाड़ी पर्व से होता है।</p><p>रमेश सर्राफ धमोरा<br>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार हैं।)</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 11:29:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-a-symbol-of-the-victory-of-good</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[दुर्गा विसर्जन और दशहरा: विजय, शक्ति और धर्म की स्थापना का महापर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-the-grand-festival-of-victory-power-and-the-establishment-of-dharma]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दुर्गा विसर्जन और विजयादशमी यानी दशहरा ऐसा महापर्व है, जो बुराई पर अच्छाई, अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर मर्यादा की विजय का संदेश देता है। शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की आराधना के बाद दसवें दिन विजयादशमी मनाई जाती है। इसी दिन अनेक स्थानों पर मां दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। दूसरी ओर भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण के वध की स्मृति में देश के अनेक हिस्सों में रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस प्रकार एक ही पर्व में शक्ति की आराधना और धर्म की विजय, दोनों भाव एक साथ दिखाई देते हैं।</p><h2>कब मनाया जाएगा दशहरा और दुर्गा विसर्जन?</h2><p>विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को मनाया जाएगा। दिल्ली के स्थानीय पंचांग के अनुसार दशमी तिथि 20 अक्टूबर को दोपहर 12.50 बजे शुरू होगी और 21 अक्टूबर को दोपहर 2.19 बजे समाप्त होगी। विजय मुहूर्त दिल्ली में लगभग दोपहर 1.59 बजे से 2.45 बजे तक बताया गया है। दुर्गा विसर्जन के लिए दिल्ली-एनसीआर के समीपवर्ती पंचांग गणना में 20 अक्टूबर को दोपहर 1.15 बजे से 3.31 बजे तक का समय दिया गया है। हालांकि पूजा और विसर्जन का मुहूर्त स्थान, स्थानीय सूर्योदय और पारिवारिक परंपरा के अनुसार कुछ अलग हो सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/vijayadashami-to-be-celebrated-on-20-october-with-evening-rituals" target="_blank" rel="noopener">Vijayadashami पर रावण दहन के लिए प्रदोष काल शुभ, 20 अक्तूबर को मनेगा पर्व</a></p><h2>दशहरा का धार्मिक महत्व</h2><p>इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया था। रावण विद्वान और शक्तिशाली होने के बावजूद अपने अहंकार, अधर्म और अन्याय के कारण विनाश को प्राप्त हुआ। इसलिए दशहरा यह संदेश देता है कि ज्ञान और शक्ति तभी सार्थक हैं, जब उनका उपयोग धर्म और मर्यादा के लिए किया जाए।</p><p>दूसरी मान्यता शक्ति परंपरा से जुड़ी है। देवी दुर्गा ने महिषासुर नामक असुर का वध कर देवताओं और संसार को उसके अत्याचार से मुक्ति दिलाई। इसीलिए विजयादशमी को असुरता पर देवी शक्ति की विजय का पर्व भी माना जाता है। यही कारण है कि भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में इस दिन की धार्मिक परंपराएं अलग दिखाई देती हैं, लेकिन मूल भावना धर्म की विजय और अधर्म का अंत ही है।</p><h2>दुर्गा विसर्जन का महत्व</h2><p>नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा के बाद दशमी के दिन प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन को केवल प्रतिमा को जल में प्रवाहित करने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखा जाता, बल्कि यह पूजा-अनुष्ठान की पूर्णता और मां को सम्मानपूर्वक विदा करने की धार्मिक परंपरा है। पूजा में जिस शक्ति का आवाहन किया गया था, विसर्जन के समय उसी शक्ति से पुनः अपने जीवन और घर-परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है। विसर्जन का आध्यात्मिक संदेश भी अत्यंत गहरा है। संदेश यह है कि आगमन और प्रस्थान, निर्माण और विलय तथा आरंभ और पूर्णता प्रकृति के शाश्वत नियम हैं। इसीलिए भक्त मां को विदा करते समय कहते हैं कि माता अगले वर्ष फिर आएं और अपने साथ सुख, शांति, समृद्धि और शक्ति लेकर आएं।</p><h2>दुर्गा विसर्जन की सामान्य पूजा विधि</h2><p>दुर्गा विसर्जन से पहले मां दुर्गा की पूजा श्रद्धा और विधि-विधान से की जाती है। सबसे पहले मां दुर्गा को स्नान, वस्त्र, पुष्प, अक्षत, रोली, सिंदूर, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित किया जाता है। फिर मां दुर्गा की आरती की जाती है और परिवार की सुख-शांति तथा कल्याण के लिए प्रार्थना की जाती है। जहां नवरात्रि की परंपरा में कन्या पूजन किया जाता है, वहां कन्याओं को भोजन कराया जाता है और उन्हें दक्षिणा तथा उपहार देकर आशीर्वाद लिया जाता है। नवरात्रि के प्रारंभ में स्थापित कलश तथा अन्य पूजन सामग्री का विधि के अनुसार समापन किया जाता है। कलश के जल को पवित्र स्थान या पौधे में अर्पित करने की परंपरा कई परिवारों में है। इसके बाद मां दुर्गा से निवेदन किया जाता है कि वे भक्तों की पूजा स्वीकार कर पुनः अपने दिव्य धाम को प्रस्थान करें और अपने आशीर्वाद से परिवार की रक्षा करें। तत्पश्चात प्रतिमा को श्रद्धापूर्वक विसर्जन स्थल तक ले जाया जाता है। वहां पूजा और प्रार्थना के बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। वर्तमान समय में पर्यावरण संरक्षण को ध्यान में रखते हुए स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थल और नियमों का पालन करना चाहिए। प्रतिमा और पूजन सामग्री के विसर्जन की व्यवस्था स्थानीय नियमों के अनुसार करना उचित है।</p><h2>दशहरा पूजन विधि</h2><p>विजयादशमी के दिन अनेक परिवारों में भगवान श्रीराम, मां दुर्गा, शस्त्र, वाहन, औजार तथा पुस्तकों आदि की पूजा की जाती है। कुछ परंपराओं में शमी पूजा, अपराजिता पूजा और सीमोल्लंघन भी किया जाता है। इन्हें सामान्यतः अपराह्न काल में करने की परंपरा बताई गई है।</p><p>पूजा के लिए स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को स्वच्छ करें। भगवान श्रीराम, मां दुर्गा अथवा अपने इष्टदेव की पूजा करें। पुष्प, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। शस्त्र, औजार या वाहन की पूजा करने की पारिवारिक परंपरा हो तो उसे भी विधिवत पूजें। शमी अथवा अपराजिता की पूजा करें। भगवान श्रीराम और मां दुर्गा का स्मरण करते हुए परिवार के सुख-समृद्धि की प्रार्थना करें। अंत में आरती करके प्रसाद वितरित करें। पूजा की स्थानीय परंपरा और कुलाचार को प्राथमिकता देना उचित है।</p><h2>दशहरा व्रत कथा</h2><p>विजयादशमी की कथा के दो प्रमुख धार्मिक प्रसंग हैं। श्रीराम और रावण का युद्ध तथा मां दुर्गा और महिषासुर का संग्राम।</p><h2>श्रीराम और रावण की कथा</h2><p>लंका का राजा रावण अत्यंत विद्वान और शक्तिशाली था, लेकिन उसके भीतर अहंकार और अधर्म बढ़ गया था। उसने माता सीता का हरण किया और भगवान श्रीराम को चुनौती दी। श्रीराम ने धर्म और न्याय की रक्षा के लिए रावण के विरुद्ध युद्ध किया। लंका में कई दिनों तक भयंकर युद्ध चला। अंततः विजयादशमी के दिन श्रीराम ने रावण का वध किया। इसी घटना की स्मृति में दशहरा मनाया जाता है और अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाता है। इस कथा का संदेश केवल रावण के वध तक सीमित नहीं है। यह मनुष्य को चेतावनी देती है कि अहंकार चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, वह अंततः विनाश का कारण बनता है।</p><h2>मां दुर्गा और महिषासुर की कथा</h2><p>पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और अत्यंत शक्तिशाली हो गया। शक्ति के मद में उसने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार आरंभ कर दिया। महिषासुर से युद्ध करने में देवताओं को कठिनाई हुई। तब देवताओं की शक्तियों के समन्वय से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से भयंकर युद्ध किया और अंततः उसका वध कर दिया। इसी विजय की स्मृति में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में पूजा जाता है और नवरात्रि के बाद विजयादशमी को शक्ति की विजय का पर्व माना जाता है। यह कथा बताती है कि जब अत्याचार अपनी सीमा पार करता है, तब धर्म और शक्ति का संगठित रूप अधर्म का अंत करता है।</p><h2>दशहरा हमें क्या संदेश देता है?</h2><p>दशहरा केवल पुतले जलाने या उत्सव मनाने का दिन नहीं है। यह अपने भीतर मौजूद उन प्रवृत्तियों को पहचानने का अवसर भी है, जो मनुष्य को धर्म और सत्य से दूर ले जाती हैं। रावण के दस सिर को परंपरागत रूप से अनेक नकारात्मक प्रवृत्तियों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसलिए दशहरे का वास्तविक संदेश यह है कि मनुष्य अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय प्राप्त करे। मां दुर्गा की आराधना हमें शक्ति देती है और श्रीराम की मर्यादा हमें उस शक्ति के उचित उपयोग का मार्ग दिखाती है।</p><p>इसीलिए विजयादशमी का सबसे बड़ा संदेश है कि शक्ति हो, लेकिन उसके साथ विवेक हो। सामर्थ्य हो, लेकिन उसके साथ मर्यादा हो। विजय मिले, लेकिन उसके साथ धर्म भी बना रहे।</p><p>- शुभा दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 11:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-the-grand-festival-of-victory-power-and-the-establishment-of-dharma</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri में Saraswati Visarjan आज, शुभ मुहूर्त में प्रतिमा विसर्जन से पूर्ण होगी पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/saraswati-visarjan-shubh-muhurat-begins-during-shravan-nakshatra]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में देवी सरस्वती को संगीत, कला, ज्ञान, बुद्धि और विद्या की देवी हैं। नवरात्रि के समय की जाने वाली चार दिवसीय सरस्वती पूजा के चौथे और आखिरी दिन सरस्वती विसर्जन का होता है। सरस्वती विसर्जन को सरस्वती उद्वासन के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन मां सरस्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है और उनका विसर्जन कर विदा ली जाती है। इस दौरान मां सरस्वती से विद्या, बुद्धि और ज्ञान प्रदान किए जाने का आशीर्वाद मांगना चाहिए। इस बार आज यानी की 19 अक्तूबर को सरस्वती विसर्जन किया जा रहा है।</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक सरस्वती विसर्जन 19 अक्तूबर 2026 को किया जा रहा है। इस दौरान 19 अक्टूबर को श्रवण नक्षत्र के दौरान लगभग दोपहर 3:38 बजे से रात 10:14 बजे तक विसर्जन का शुभ समय है। हालांकि पंचांग के हिसाब से मुहूर्त अलग-अलग हो सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-siddhidatri-puja-on-maha-navami-rituals-mantra-and-bhog-details" target="_blank" rel="noopener">Maha Navami पर मां सिद्धिदात्री को लगाएं सफेद तिल का भोग, मंत्र जाप के साथ करें हवन अनुष्ठान</a></p><h2>पूजन विधि</h2><p>विसर्जन से पहले देवी सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। फिर देवी को पुष्प अर्पित करें। अक्षत, चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। पुस्तकों, वाद्य यंत्रों और अध्ययन सामग्री की भी पूजा करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें। ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। आरती करें। इसके बाद श्रद्धा और स्थानीय परंपरा के अनुसार देवी की प्रतिमा का विसर्जन करें। पंचांग परंपरा में सरस्वती विसर्जन को सरस्वती उद्वासन भी कहा जाता है।</p><p>महत्व</p><p>शारदीय नवरात्रि में मां सरस्वती की पूजा का विशेष विधान माना जाता है। दक्षिण भारत और कुछ अन्य क्षेत्रों में इस दौरान मां सरस्वती आह्वान, सरस्वती पूजा और सरस्वती विसर्जन की परंपरा है। सरस्वती विसर्जन सिर्फ देवी सरस्वती की प्रतिमा को विदा करने की परंपरा नहीं बल्कि मां सरस्वती से ज्ञान, बुद्धि और रचनात्मकता प्राप्त करने का साधन भी है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 10:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/saraswati-visarjan-shubh-muhurat-begins-during-shravan-nakshatra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Maha Navami पर मां सिद्धिदात्री को लगाएं सफेद तिल का भोग, मंत्र जाप के साथ करें हवन अनुष्ठान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-siddhidatri-puja-on-maha-navami-rituals-mantra-and-bhog-details]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 19 अक्तूबर को शारदीय नवरात्रि के महाष्टमी और महानवमी से जुड़े अनुष्ठान किए जा रहे हैं। क्योंकि तिथियों के संयोग की वजह से अष्टमी औऱ नवमी तिथि एक ही दिन है। ऐसे में दोनों तिथियों की पूजा एक ही दिन की जा रही है। वहीं नवमी तिथि को मां दुर्गा के 9वें स्वरूप मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। इस दौरान हवन, कन्या पूजन और व्रत पारण भी किया जाता है।</p><h2>महानवमी तिथि</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 19 अक्तूबर को सुबह 10:51 मिनट से नवमी तिथि की शुरूआत हो रही है। वहीं इस तिथि की समाप्ति अगले दिन यानी की 20 अक्तूबर की दोपहर 12:50 मिनट पर होगी। उदयातिथि के स्पर्श के हिसाब से महानवमी भी 19 अक्तूबर को मनाई जा रही है।</p><h2>कन्या पूजन</h2><p>शारदीय नवरात्रि में अष्टमी औऱ नवमी दोनों तिथियों पर कन्या पूजन किया जाता है। ऐसे में आप भी अष्टमी और नवमी दोनों तिथि पर कन्या पूजन कर सकते हैं। 19 अक्तूबर को अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन के लिए पहला शुभ मुहूर्त सुबह 07:28 मिनट से लेकर सुबह 09:16 मिनट तक रहने वाला है। इसके बाद सुबह 11:43 &nbsp;मिनट से लेकर दोपहर 12:29 मिनट तक भी कन्या पूजन किया जा सकता है। क्योंकि इस दौरान अभिजीत मुहूर्त मान्य रहेगा।</p><h2>महानवमी पर सिद्धिदात्री की पूजा</h2><p>नवरात्रि के 9वें दिन मां दुर्गा के सिद्धदात्री स्वरूप की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां सिद्धिदात्री को विवेक, ज्ञान और सिद्धि देने वाली देवी माना जाता है। इस दिन भी हवन और कन्या पूजन का विधान होता है। इस दिन मां सिद्धिदात्री को फल, फूल, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करें। वहीं पूजा के दौरान 'ऊँ देवी सिद्धिदात्र्यै नम:' मंत्र का जाप करें। मां सिद्धिदात्री को सफेद तिल से बनी चीजों का भोग अर्पित करें और आरती करें। आप इस दिन हवन भी कर सकते हैं।</p><h2>हवन और व्रत पारण विधि</h2><p>नवरात्रि के अंतिम दिनों में हवन करके पूजा का समापन किया जाता है। नवरात्रि में कन्या पूजन और हवन आदि करने के बाद व्रत का पारण किया जाता है। हालांकि कुछ लोग नवमी को व्रत पारण करते हैं, तो वहीं कुछ लोग दशमी को व्रत खोलते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 09:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-siddhidatri-puja-on-maha-navami-rituals-mantra-and-bhog-details</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri की महाष्टमी पर Maa Mahagauri की पूजा और Kanya Pujan का विशेष विधान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-mahagauri-puja-and-kanya-pujan-vidhi-for-navratri-mahashtami]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदाय नवरात्रि में महाष्टमी का दिन बेहद खास माना जाता है। इस पावन मौके पर मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं इस दिन कन्या पूजन और व्रत की भी परंपरा है। हालांकि इस बार सप्तमी तिथि दो दिन रहने की वजह से अष्टमी और नवमी की तिथि को लेकर लोगों में मन में कंफ्यूजन है। तो आइए जानते हैं अष्टमी तिथि कब है, कन्या पूजन और व्रत की विधि के बारे में...</p><h2>अष्टमी तिथि 2026</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 18 अक्तूबर की सुबह 8:27 मिनट पर अष्टमी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की की 19 अक्तूबर की सुबह 10:51 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 19 अक्तूबर 2026 को दुर्गा अष्टमी मनाई जा रही है। इस दिन मां महागौरी की पूजा और कन्या पूजन किया जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-grand-festival-dedicated-to-the-worship-of-power-spiritual-attainment-and-knowledge" target="_blank" rel="noopener">दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन: शक्ति, सिद्धि और ज्ञान की आराधना का महापर्व</a></p><h2>मां महागौरी की पूजा</h2><p>मां महागौरी को पवित्रता, शांति और करुणा की देवी माना जाता है। ऐसे में इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर पूजा स्थल पर मां की प्रतिमा का तस्वीर को स्थापित करें। इसके बाद सफेद फूल, धूप, अक्षत, फल और दीप आदि अर्पित करें। पूजा के दौरान 'ऊँ देवी महागौर्ये नम:' मंत्र का जाप करें। दुर्गा चालीसा का पाठ करें और आरती कर पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>कन्या पूजन</h2><p>नवरात्रि में छोटी कन्याओं को मां दुर्गा का रूप मानकर उनकी पूजा की जाती है और भोजन कराया जाता है। ऐसे में कन्या पूजन के लिए कन्याओं को आदरपूर्वक घर बुलाएं और उनको साफ आसन पर बिठाएं। फिर कन्याओं के पैर धोकर उनका तिलक करें और उन्हें भोजन कराएं। कन्या पूजन के लिए परंपरागत रूप से पूड़ी, हलवा और काले चने प्रसाद के रूप में बनाए जाते हैं। कन्याओं को भोजन कराने के बाद दक्षिणा या गिफ्ट देकर उनका आशीर्वाद लें। वहीं कुछ लोग कन्याओं के साथ एक बालक को भैरव मानकर भोजन कराते हैं और दक्षिणा देते हैं।</p><h2>महत्व</h2><p>बता दें कि महाष्टमी को दु्र्गा अष्टमी भी कहा जाता है। यह दिन मां दुर्गा के आठवें स्वरूप मां महागौरी को समर्पित है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देवी की पूजा-आराधना और व्रत करने से जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली आती है। वहीं इस मौके पर कन्याओं को देवी मां का रूप मानकर उनका पूजन किया जाता है और भोजन कराने व उपहार देने की परंपरा है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 09:43:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-mahagauri-puja-and-kanya-pujan-vidhi-for-navratri-mahashtami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन: शक्ति, सिद्धि और ज्ञान की आराधना का महापर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-grand-festival-dedicated-to-the-worship-of-power-spiritual-attainment-and-knowledge]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि के अंतिम चरण में आने वाली दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन भारतीय सनातन परंपरा के अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व हैं। ये तीनों अवसर शक्ति, ज्ञान, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का संदेश देते हैं। वर्ष 2026 में दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का संयोग 19 अक्टूबर, सोमवार को पड़ रहा है। दिल्ली सहित उत्तर भारत के पंचांगों के अनुसार अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर की सुबह से शुरू होकर 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे समाप्त होगी, जिसके बाद नवमी तिथि आरंभ होगी। इस कारण 19 अक्टूबर को ही दुर्गा अष्टमी और महा नवमी दोनों के पर्व मनाए जाएंगे।</p><h2>2026 में कब हैं ये पर्व?</h2><p>दुर्गा अष्टमी / महाष्टमी 19 अक्टूबर 2026 सोमवार<br>महा नवमी &nbsp;19 अक्टूबर 2026 सोमवार<br>सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर 2026 सोमवार<br>विजयादशमी / दशहरा 20 अक्टूबर 2026 मंगलवार</p><p>पंचांग के अनुसार 2026 में अष्टमी और नवमी का तिथि-संयोग ऐसा है कि दोनों पर्व 19 अक्टूबर को पड़ रहे हैं। इसी दिन सरस्वती विसर्जन भी निर्धारित है।</p><h2>दुर्गा अष्टमी का धार्मिक महत्व</h2><p>दुर्गा अष्टमी को महाष्टमी या महादुर्गाष्टमी भी कहा जाता है। नवरात्रि के इस दिन देवी दुर्गा के महागौरी स्वरूप की पूजा की जाती है। यह दिन देवी की शक्ति और उनके दैवी स्वरूप की आराधना का विशेष अवसर माना जाता है। मान्यता है कि देवी ने दुष्ट शक्तियों का संहार कर संसार में धर्म और व्यवस्था की स्थापना की। इसलिए महाष्टमी का संदेश है कि जब अधर्म और अत्याचार बढ़ता है, तब दैवी शक्ति धर्म की रक्षा के लिए प्रकट होती है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/kanya-pujan-samagri-list-for-navratri-ashtami-and-navami-rituals" target="_blank" rel="noopener">Navratri Kanya Pujan Samagri: थाली, चुनरी से लेकर हलवा-चना भोग तक, कन्या पूजन में शामिल करें ये चीजें</a></p><p>कई परंपराओं में इसी दिन संधि पूजा का विशेष महत्व होता है। अष्टमी और नवमी के संधिकाल को अत्यंत पवित्र माना जाता है। 2026 में दिल्ली के पंचांग के अनुसार संधि पूजा का समय लगभग सुबह 10:27 से 11:15 बजे के बीच बताया गया है। स्थानीय पंचांग के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है।</p><h2>दुर्गा अष्टमी की पूजा विधि</h2><p>सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थल को स्वच्छ करें। इसके बाद देवी दुर्गा का ध्यान करें। दीपक और धूप प्रज्वलित करें। देवी को लाल या पीले वस्त्र, पुष्प और अक्षत अर्पित करें। रोली, सिंदूर, फल, मिष्ठान और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा देवी के मंत्रों का पाठ करें। देवी की आरती करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। कन्याओं को भोजन कराकर दक्षिणा एवं उपहार दें। महाष्टमी पर कन्या पूजन विशेष रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान देकर भोजन कराया जाता है।</p><h2>महा नवमी : साधना की पूर्णता का दिन</h2><p>नवरात्रि का नवम दिन महा नवमी कहलाता है। देवी दुर्गा के नौ स्वरूपों में इस दिन मां सिद्धिदात्री की पूजा की जाती है। वहीं दुर्गा पूजा की परंपरा में देवी को महिषासुरमर्दिनी के रूप में भी आराध्य माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इसी कालखंड में देवी ने महिषासुर का वध किया था। महा नवमी नवरात्रि की साधना के समापन की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इस दिन किया जाने वाला नवमी हवन विशेष महत्व रखता है। 2026 में नवमी तिथि 19 अक्टूबर को लगभग 10:51 बजे प्रारंभ होकर 20 अक्टूबर को लगभग 12:50 बजे तक रहेगी।</p><h2>महा नवमी की पूजा विधि</h2><p>महा नवमी पर प्रातः स्नान करके पूजा स्थान पर देवी की स्थापना के सामने दीप जलाएं। इसके बाद देवी सिद्धिदात्री का ध्यान करें। देवी को पुष्प, अक्षत, रोली, फल और नैवेद्य अर्पित करें। दुर्गा सप्तशती अथवा नवमी से संबंधित मंत्रों का पाठ करें। श्रद्धानुसार कन्या पूजन करें। नवमी हवन करें। हवन के बाद देवी की आरती करें। परिवार की सुख-शांति और समृद्धि के लिए प्रार्थना करें। नवमी हवन को नवरात्रि साधना का महत्वपूर्ण अंग माना जाता है और पारंपरिक रूप से नवमी पूजा के अंत में हवन किया जाता है।</p><h2>सरस्वती विसर्जन : ज्ञान की देवी को विदाई</h2><p>शारदीय नवरात्रि में कई परंपराओं में देवी सरस्वती की भी विशेष पूजा की जाती है। विशेष रूप से दक्षिण भारत और कुछ अन्य क्षेत्रों में नवरात्रि के दौरान सरस्वती आवाहन, पूजा और विसर्जन की परंपरा है। देवी सरस्वती को विद्या, बुद्धि, वाणी, संगीत और ज्ञान की देवी माना जाता है। इसलिए सरस्वती विसर्जन केवल प्रतिमा को विदा करने की परंपरा नहीं, बल्कि देवी से प्राप्त ज्ञान को जीवन में धारण करने का प्रतीकात्मक अवसर भी है।</p><p>2026 में सरस्वती विसर्जन 19 अक्टूबर, सोमवार को है। कुछ पंचांगों में श्रवण नक्षत्र के आधार पर विसर्जन का समय निर्धारित किया जाता है। उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश के सिरसी क्षेत्र के पंचांग में 19 अक्टूबर को श्रवण नक्षत्र के दौरान लगभग दोपहर 3:38 बजे से रात 10:14 बजे तक विसर्जन का समय दिया गया है। स्थानीय नगर के पंचांग के अनुसार मुहूर्त अलग हो सकता है।</p><h2>सरस्वती विसर्जन की पूजा विधि</h2><p>विसर्जन से पहले देवी सरस्वती की विधिवत पूजा की जाती है। फिर देवी को पुष्प अर्पित करें। अक्षत, चंदन और नैवेद्य चढ़ाएं। पुस्तकों, वाद्य यंत्रों और अध्ययन सामग्री की भी पूजा करें। सरस्वती मंत्र का जाप करें। ज्ञान और विवेक की प्राप्ति के लिए प्रार्थना करें। आरती करें। इसके बाद श्रद्धा और स्थानीय परंपरा के अनुसार देवी की प्रतिमा का विसर्जन करें। पंचांग परंपरा में सरस्वती विसर्जन को सरस्वती उद्वासन भी कहा जाता है।</p><h2>दुर्गा अष्टमी और महा नवमी की व्रत कथा</h2><p>दुर्गा अष्टमी और महा नवमी से जुड़ी सबसे प्रसिद्ध कथा महिषासुर वध की है। पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या करके ऐसा वर प्राप्त किया कि उसका वध किसी पुरुष के हाथों न हो सके। वरदान के प्रभाव से वह अत्यंत शक्तिशाली हो गया और उसने देवताओं तथा पृथ्वी पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। महिषासुर के अत्याचार से परेशान देवताओं ने अपनी-अपनी शक्तियों का तेज एकत्र किया। इसी दिव्य शक्ति से आदि शक्ति देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना के विरुद्ध युद्ध किया। यह युद्ध कई दिनों तक चला। अंततः देवी ने महिषासुर का वध किया और संसार को उसके आतंक से मुक्त कराया।</p><p>इसीलिए नवरात्रि को शक्ति की उपासना और महा नवमी को अधर्म पर धर्म की विजय के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। नवरात्रि की यह कथा विभिन्न पुराणों और देवी परंपराओं में अलग-अलग विवरणों के साथ मिलती है; इसलिए इसे धार्मिक मान्यता के रूप में समझना उचित है।</p><h2>कन्या पूजन का विशेष महत्व</h2><p>अष्टमी और नवमी पर कन्या पूजन की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। इसमें छोटी कन्याओं को देवी के स्वरूप के रूप में सम्मान दिया जाता है। कन्याओं के चरण धोकर उन्हें भोजन कराया जाता है और सामर्थ्य के अनुसार वस्त्र, फल, मिठाई या दक्षिणा दी जाती है। कई परिवारों में एक छोटे बालक को भैरव स्वरूप मानकर कन्याओं के साथ भोजन कराया जाता है। इस परंपरा का मूल संदेश यह है कि नारी शक्ति का सम्मान केवल पूजा के दिन नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक दिन होना चाहिए।</p><h2>2026 में एक विशेष संयोग</h2><p>वर्ष 2026 की शारदीय नवरात्रि में 19 अक्टूबर विशेष रूप से महत्वपूर्ण रहेगा, क्योंकि इसी दिन दुर्गा अष्टमी, महा नवमी और सरस्वती विसर्जन का उल्लेख विभिन्न पंचांगों में मिलता है। अगले दिन 20 अक्टूबर को विजयादशमी और दुर्गा विसर्जन होगा। इस प्रकार नवरात्रि के ये अंतिम दिन तीन महत्वपूर्ण भावनाओं को एक साथ सामने रखते हैं। अष्टमी— शक्ति की आराधना। नवमी— साधना और सिद्धि की पूर्णता। सरस्वती विसर्जन— ज्ञान और विवेक को जीवन में धारण करने का संकल्प।</p><p>- शुभा दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 18 Oct 2026 13:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/a-grand-festival-dedicated-to-the-worship-of-power-spiritual-attainment-and-knowledge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Surya Puja और स्नान दान से दूर होगा दोष, Tula Sankranti पर करें ये उपाय]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-dev-enters-libra-on-tula-sankranti-bringing-auspicious-punya-kaal]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 17 अक्तूबर 2026 को तुला संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है। आज ग्रहों के राजा सूर्य देव तुला राशि में प्रवेश करेंगे। इस दौरान 05 घंटे 43 मिनट का पुण्यकाल होगा। वहीं महापुण्यकाल 1 घंटा 54 मिनट है। संक्रांति के मौके पर स्नान-दान और सूर्य पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। इससे जातक के पापों का नाश होता है और कुंडली में सूर्य की स्थिति बेहतर होती है। तो आइए जानते हैं तुला संक्रांति की तिथि, पुण्यकाल का समय और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और पुण्यकाल</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 17 अक्टूबर शनिवार को शाम में 07:57 मिनट पर सूर्य का तुला राशि में प्रवेश होगा। उस दौरान तुला संक्रांति का क्षण होगा और इस बार तुला संक्रांति पर पुण्य काल दोपहर 12:06 मिनट से लेकर शाम 05:50 मिनट तक रहेगा।</p><h2>स्नान-दान विधि</h2><p>संक्रांति के दिन पवित्र नदियों में स्नान करने का विधान माना जाता है। इससे जातक के पाप मिटते हैं और पुण्य मिलता है। वहीं आप तुला संक्रांति के मौके पर पुण्यकाल में कभी भी पवित्र नदी में स्नान कर सकते हैं। लेकिन अगर नदी में स्नान करना संभव न हो, तो नहाने के पानी में गंगाजल मिलाकर स्नान करना चाहिए।</p><h2>क्या दान करें</h2><p>इस दिन स्नान आदि करने के बाद यथासंभव दान करना चाहिए। तुला संक्रांति के मौके पर अन्न, वस्त्र, बर्तन, फल, बिस्तर और कंबल आदि का दान किया जाता है। यह दिन सूर्य से जुड़ा होता है, इसलिए इस दिन सूर्य से जुड़ी वस्तुएं दान करना चाहिए।</p><p>तुला संक्रांति के मौके पर गेहूं, लाल या नारंगी कपड़े, केसर, तांबा या तांबे के बर्तन, घी, गुड़ और सोना आदि का दान किया जा सकता है। इससे लाभ मिलता है और कुंडली में सूर्य की स्थिति मजबूत होती है।</p><p>इन उपायों को करने से सूर्य का प्रभाव बढ़ता है और करियर में नए मौके मिलते हैं। साथ ही पिता के साथ संबंध मजबूत होता है और उनका सहयोग प्राप्त होता है।</p><h2>करें ये उपाय</h2><p>इस दिन सूर्य देव को अर्घ्य जरूर दें।<br>सूर्य मंत्रों का जाप करना चाहि।<br>आदित्य हृदय स्त्रोत का जाप करना चाहिए।<br>वहीं सूर्य चालीसा का पाठ करें।<br>इन उपायों को करने से सूर्य दोष दूर होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 10:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/surya-dev-enters-libra-on-tula-sankranti-bringing-auspicious-punya-kaal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Saraswati Vandana: शारदीय नवरात्र में Saraswati Puja आज, छात्र और कलाकार ऐसे करें मां शारदा की उपासना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/students-and-artists-worship-goddess-saraswati-on-shardiya-navratra]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देवी सरस्वती को विद्या, ज्ञान, कला और संगीत की देवी माना जाता है। देवी सरस्वती की आराधना का यह पर्व लेखकों, शिक्षकों, छात्रों और कला से जुड़े लोगों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देवी सरस्वती की पूजा-अर्चना करने से ज्ञान और विवेक की प्राप्ति होती है। इस बार आज यानी की 17 अक्तूबर 2026 को सरस्वती पूजा का पर्व मनाया जा रहा है। तो आइए जानते हैं सरस्वती पूजा की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक शारदीय नवरात्र के दौरान सरस्वती पूजा 17 अक्टूबर 2026 को मनाया जा रहा है। इस दिन पूजा का प्रमुख समय सुबह 06:22 मिनट से लेकर दोपहर 12:06 मिनट तक है। वहीं दोपहर में पूजा का मुहूर्त 03:54 मिनट से लेकर शाम 06:14 मिनट तक है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें और पूजा स्थल की सफाई करें। अब चौकी पर मां सरस्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। फिर देवी सरस्वती को अक्षत, फूल, चंदन और फल आदि अर्पित करें। पूजा के दौरान घी का दीपक जलाएं और मां सरस्वती की वंदना करें। वहीं छात्र अपनी किताबें, कॉपी और कलम आदि को पूजान स्थल पर रखकर देवी सरस्वती का आशीर्वाद लें। वहीं संगीत और कला से जुड़े लोग अपने वाद्य यंत्रों की पूजा-अर्चना कर सकते हैं। फिर मां सरस्वती को फल, मिठाई और खीर आदि का भोग लगाएं।</p><h2>धार्मिक महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक देवी सरस्वती को वाणी, विवेक और रचनात्मकता की देवी माना गया है। देवी सरस्वती की पूजा लेखकों, शिक्षकों, संगीतकारों, कलाकारों और छात्रों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि मां सरस्वती की आराधना से सीखने की क्षमता, एकाग्रता और बुद्धि के विकास का आशीर्वाद मिलता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 10:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/students-and-artists-worship-goddess-saraswati-on-shardiya-navratra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Saraswati Puja 2026: 17 अक्टूबर को है सरस्वती पूजा, किताबों से लेकर संगीत के सामान तक की होगी पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/saraswati-puja-2026-to-be-celebrated-on-17-october-in-sharad-navratri]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि के दौरान मां सरस्वती की पूजा का भी खास महत्व है। इस दौरान किताबें, पढ़ाई का सामान और संगीत से जुड़ी चीजें मां सरस्वती के सामने रखकर उनकी पूजा की जाती है। मान्यता है कि मां सरस्वती ज्ञान, पढ़ाई, बुद्धि, संगीत और कला की देवी हैं।</p><h2><strong>शारदीय नवरात्रि में सरस्वती पूजा कब है?</strong></h2><p>साल 2026 में शारदीय नवरात्रि के दौरान मुख्य सरस्वती पूजा 17 अक्टूबर, शनिवार को होगी। इससे एक दिन पहले 16 अक्टूबर को सरस्वती आवाहन किया जाएगा।</p><h2><strong>सरस्वती पूजा 2026 की पूरी तारीखें</strong></h2><p><strong>सरस्वती आवाहन: </strong>शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2026<br><strong>मुख्य सरस्वती पूजा: </strong>शनिवार, 17 अक्टूबर 2026<br><strong>सरस्वती बलिदान: </strong>रविवार, 18 अक्टूबर 2026<br><strong>सरस्वती विसर्जन/नवमी: </strong>सोमवार, 19 अक्टूबर 2026<br><strong>विद्यारंभम दिवस: </strong>बुधवार, 21 अक्टूबर 2026</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-saraswati-avahan-brings-wisdom-and-knowledge-for-students" target="_blank" rel="noopener">Saraswati Avahan पर मां सरस्वती की विशेष आराधना से दूर होगा अज्ञान, छात्र करें पूजन</a></h3><h2><strong>शारदीय नवरात्रि में सरस्वती पूजा क्यों की जाती है?</strong></h2><p>मां सरस्वती को ज्ञान, पढ़ाई, बुद्धि, संगीत और कला की देवी माना जाता है। इसलिए विद्यार्थी, कलाकार और संगीत सीखने वाले लोग उनका आशीर्वाद लेते हैं। इस पूजा का मकसद सिर्फ धार्मिक पूजा करना नहीं, बल्कि ज्ञान और सीखने को सम्मान देना भी है। यही वजह है कि पूजा के दौरान किताबों और पढ़ाई से जुड़ी चीजों को भी मां सरस्वती के सामने रखा जाता है।</p><p>कई जगहों पर संगीत से जुड़ी चीजें और काम में इस्तेमाल होने वाला सामान भी पूजा में रखा जाता है। इस तरह लोग अपने सीखने और हुनर से जुड़ी चीजों के प्रति सम्मान जताते हैं।</p><h2><strong>सरस्वती पूजा कैसे की जाती है?</strong></h2><p>सरस्वती पूजा की विधि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में थोड़ी अलग हो सकती है। सामान्य तौर पर पूजा इस तरह की जाती है, सबसे पहले पूजा की जगह को साफ किया जाता है। मां सरस्वती की तस्वीर या मूर्ति स्थापित की जाती है। किताबें, पढ़ाई का सामान और संगीत से जुड़ी चीजें उनके सामने रखी जाती हैं। फूल, धूप और दीपक जैसी पूजा सामग्री चढ़ाई जाती है। मां सरस्वती की प्रार्थना या मंत्र पढ़े जाते हैं। आखिर में आरती की जाती है। पूजा को बहुत भव्य तरीके से करना जरूरी नहीं है। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार इसे सरल तरीके से भी कर सकते हैं।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/durga-ashtami-and-maha-navami-fall-on-19-october-in-navratri-2026" target="_blank" rel="noopener">एक ही दिन में है Maha Ashtami और महानवमी , जानिए सही तिथि और कन्या पूजन का समय</a></h3><h2><strong>किताबों की पूजा क्यों होती है?</strong></h2><p>सरस्वती पूजा में किताबों को मां सरस्वती के सामने रखने की परंपरा सबसे खास मानी जाती है। किताबें ज्ञान हासिल करने का जरिया हैं, इसलिए इन्हें सम्मान दिया जाता है। इसी तरह संगीत सीखने वाले लोग अपने संगीत के सामान को पूजा में रखते हैं। कलाकार अपने काम से जुड़ी चीजों को भी मां सरस्वती के सामने रख सकते हैं। कह सकते हैं कि यह पूजा हमें याद दिलाती है कि सीखना और अपने हुनर को बेहतर बनाना भी सम्मान के योग्य है।</p><h2><strong>किसके लिए खास है सरस्वती पूजा?</strong></h2><p>सरस्वती पूजा खासतौर पर विद्यार्थियों, शिक्षकों, कलाकारों, संगीत सीखने वालों और किसी भी तरह का हुनर सीखने वाले लोगों के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। छात्र पढ़ाई और परीक्षा में सफलता के लिए मां सरस्वती का आशीर्वाद लेते हैं। वहीं कलाकार और संगीत सीखने वाले अपने हुनर को बेहतर बनाने की कामना करते हैं।</p><p>शारदीय नवरात्रि के दौरान होने वाली यह सरस्वती पूजा वसंत पंचमी की सरस्वती पूजा से अलग परंपरा है। दोनों में मां सरस्वती की पूजा की जाती है, लेकिन दोनों अलग समय और क्षेत्रीय परंपराओं से जुड़ी हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 15:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/saraswati-puja-2026-to-be-celebrated-on-17-october-in-sharad-navratri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Saraswati Avahan पर मां सरस्वती की विशेष आराधना से दूर होगा अज्ञान, छात्र करें पूजन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-saraswati-avahan-brings-wisdom-and-knowledge-for-students]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में मां सरस्वती को बुद्धि, ज्ञान, वाणी और कला की देवी मानी जाती है। हर साल छात्र, शिक्षक और कला-संगीत से जुड़े साधक मां सरस्वती की कृपा पाने के लिए पूजा-अर्चना करते हैं। हर साल आश्विन मास में शारदीय नवरात्रि के अंतिम दिनों में सरस्वती आह्वान का पर्व मनाया जाता है। इस बार 16 अक्तूबर 2026 को सरस्वती आह्वान पूजा मनाई जा रही है। तो आइए जानते हैं इस दिन की तिथि, मुहूर्त और पूजन विधि के बारे में...</p><h2>सरस्वती आह्वान</h2><p>बता दें कि शारदीय नवरात्रि के दौरान मां सरस्वती की पूजा में पहला दिन सरस्वती आह्वान और दूसरा दिन सरस्वती की पूजा का होता है। इस बार आज यानी की 16 अक्तूबर 2026 को मां सरस्वती का आह्वान होगा। आज 16 अक्तूबर को मूल नक्षत्र में मां सरस्वती का आह्वान दोपहर 03:33 मिनट से शाम को 05:50 मिनट तक होगा।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/upang-lalita-vrat-celebrated-on-fifth-day-of-navratri" target="_blank" rel="noopener">Sharadiya Navratri के 5वें दिन उपांग Lalita Vrat, जानिए देवी पूजा की विधि और मुहूर्त</a></p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 15 अक्तूबर की रात 01:13 मिनट पर आश्विन माह की पंचमी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 16 अक्तूबर की सुबह 03:25 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 16 अक्तूबर 2026 को सरस्वती आह्वान होगी।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर पूजा स्थल की सफाई कर मंदिर में मां सरस्वती की प्रतिमा को स्थापित करें। अब मां सरस्वती को अक्षत, पुष्प, फल और चंदन आदि अर्पित करें। फिर दीपक जलाकर मां सरस्वती की पूजा-अर्चना करें। स्टूडेंट्स अपनी किताबें, कॉपी और कलम आदि की पूजा करें। वहीं संगीत और कला से जुड़े लोग वाद्य यंत्रों को पूजा में शामिल करें। पूजा के बाद मिठाई, खीर या फल आदि का भोग लगाएं और आरती करें। वहीं पूजा के अंत में भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां सरस्वती को ज्ञान और विवेक की देवी माना जाता है। इस दिन भक्त जीवन में अज्ञानता को दूर करने और सही मार्ग पर चलने की प्रार्थना करते हैं। इस दौरान लेखन सामग्री, वाद्य यंत्रों, पुस्तकों और शिक्षा से जुड़ी चीजों की पूजा की जाती है और सम्मान व्यक्त किया जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 10:25:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-saraswati-avahan-brings-wisdom-and-knowledge-for-students</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sharadiya Navratri के 5वें दिन उपांग Lalita Vrat, जानिए देवी पूजा की विधि और मुहूर्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/upang-lalita-vrat-celebrated-on-fifth-day-of-navratri]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शारदीय नवरात्रि के 5वें दिन उपांग ललिता व्रत किया जाता है। इसको ललिता पंचमी भी कहा जाता है। इस बार आज यानी की 15 अक्तूबर 2026 को उपांग ललिता व्रत किया जा रहा है। इस दिन देवी ललिता की पूजा-अर्चना की जाती है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन देवी ललिता की पूजा करने से जीवन में सुख-सौभाग्य और समृद्धि का आगमन होता है। वहीं देवी ललिता को राजेश्वरी, त्रिपुरा सुंदरी और षोडशी के नाम से भी जाना जाता है। तो आइए जानते हैं उपांग ललिता व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक आश्विन माह की पंचमी तिथि की शुरूआत 15 अक्टूबर 2026 को सुबह 01:13 बजे से मिनट से हो रही है। वहीं अगले दिन यानी की 16 अक्तूबर 2026 की सुबह 03:25 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 15 अक्तूबर 2026 को उपांग ललिता व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ लाल या पीले कपड़े पहनें। फिर घर के मंदिर की साफ-सफाई करें और एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर देवी ललिता की प्रतिमा को स्थापित करें। अब शुद्ध दीपक जलाकर पूजा का संकल्प लें। फिर देवी ललिता को लाल पुष्प, कुमकुम, रोली, अक्षत, इत्र, गंध, ऋतुफल और सात्विक नैवेद्य आदि अर्पित करें। नवरात्रि के पांचवे दिन देवी स्कंदमाता के साथ देवी ललिता और भोलेनाथ की पूजा करें।</p><p>इस दिन ललिता सहस्त्रनाम या ललिता त्रिशती का पाठ करना चाहिए। वहीं आर्थिक संकट से मुक्ति पाने और समृद्धि की कामना के लिए मां ललिता के मूल मंत्र 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं सौ: ॐ ह्रीं श्रीं क ए ई ल ह्रीं ह स क ह ल ह्रीं सकल ह्रीं सौ: ऐं क्लीं ह्रीं श्रीं नमः' का जाप करना चाहिए। अंत में आरती करें और पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी ललिता शक्ति, सौंदर्य, समृद्धि और सौभाग्य की देवी हैं। पौराणिक कथा में उल्लेख मिलता है कि कामदेव के भस्म होने के बाद राख से भांडासुर नाम का एक असुर उत्पन्न हुआ। भांडासुर ने देवताओं पर अत्याचार करना शुरूकर दिया। उस असुर से मुक्ति दिलाने के लिए देवी ललिता का प्राकट्य हुआ और उन्होंने भांडासुर का वध किया। मान्यता है कि ललिता पंचमी का व्रत नवविवाहित महिलाओं और परिवार की सुख-शांति, समृद्धि, दीर्घायु और विद्या की कामना के लिए विशेष फलदायी होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 09:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/upang-lalita-vrat-celebrated-on-fifth-day-of-navratri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मां कूष्मांडा और कपर्दीश चतुर्थी व्रत से होगा कल्याण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-kushmanda-and-kapardish-chaturthi-fast-will-bring-welfare]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज गणेश चतुर्थी व्रत एवं नवरात्र का चौथा दिन है, परंपरा से लगभग हर पूजा में सबसे पहले गणेश जी का आवाहन किया जाता है, इसलिए आज की नवरात्रि पूजा गणेश जी से शुरू करके फिर मां कूष्मांडा की आराधना करना लाभदायी होता है तो आइए हम आपको कपर्दीश चतुर्थी व्रत एवं मां कूष्मांडा को प्रसन्न करने की विधि एवं महत्व के बारे में बताते हैं।</p><h2>जानें गणेश चतुर्थी और नवरात्रि के चौथे दिन का महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार बुधवार गणेश जी का दिन माना जाता है यह बुधवार उनकी चतुर्थी भी है। देवी की नौ रातों के बीच यह एक कोमल स्मरण है कि हर पूजा विघ्नहर्ता से ही आरंभ होती है। सुबह की शुरुआत गणपति से करें, फिर कूष्मांडा की आराधना करें। गणेश चतुर्थी और नवरात्र ऐसे ही प्रमुख पर्व हैं, जो भारतीय जनजीवन में विशेष स्थान रखते हैं। गणेश चतुर्थी भगवान गणेश की उपासना का पर्व है, जबकि नवरात्र मां दुर्गा की शक्ति, साधना और आराधना का महापर्व है। इन दोनों पर्वों का मूल संदेश विघ्नों पर विजय, धर्म की स्थापना, आत्मशुद्धि और सकारात्मक जीवन-दृष्टि का विकास है।</p><p>हर चांद्र मास में दो चतुर्थियां होती हैं: कृष्ण पक्ष में संकष्टी चतुर्थी और शुक्ल पक्ष में विनायक चतुर्थी। द्रिक पंचांग आश्विन की आज की शुक्ल चतुर्थी को कपर्दीश चतुर्थी नाम देता है। क्षेत्रीय पंचांगों में मासिक चतुर्थियों के कई नाम हैं; नाम चाहे जो हो, पूजा गणेश जी की ही होती है, दूर्वा घास, मोदक या कोई अन्य मिठाई और दीपक के साथ। इस साल 14 अक्टूबर को नवरात्र के चौथे दिन के संदर्भ में मां कुष्मांडा की उपासना और गणेश चतुर्थी पड़ रही है।</p><h2>मां कुष्मांडा की उपासना और गणेश पूजा का है खास महत्व</h2><p>पंडितों के अनुसार नवरात्र का चौथा दिन मां दुर्गा के चतुर्थ स्वरूप मां कुष्मांडा को समर्पित है। वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्र का चौथा दिन 14 अक्टूबर को है। इस दिन मां कुष्मांडा की पूजा की जाएगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां कुष्मांडा ने अपनी दिव्य मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना की थी। इसी कारण उन्हें सृष्टि की आदिशक्ति तथा ब्रह्मांड को ऊर्जा प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। उनके नाम में निहित आध्यात्मिक अर्थ सृजन, ऊर्जा और जीवन के विस्तार से जोड़ा जाता है। मां कुष्मांडा को सामान्यतः आठ भुजाओं वाली देवी के रूप में चित्रित किया जाता है। उनके हाथों में कमंडल, धनुष, बाण, कमल, अमृतकलश, चक्र और गदा जैसे आयुध एवं प्रतीक दर्शाए जाते हैं। उनका स्वरूप शक्ति, साहस, स्वास्थ्य, समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/navratri-is-a-celebration-of-women-empowerment" target="_blank" rel="noopener">Shardiya Navratri 2026: नारी सशक्तिकरण का पर्व है नवरात्रि</a></p><p>नवरात्र के चौथे दिन भक्तजन प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करते हैं। इसके बाद मां दुर्गा और मां कुष्मांडा की पूजा-अर्चना की जाती है। पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित किए जाते हैं। दुर्गा चालीसा, दुर्गा सप्तशती तथा देवी स्तुतियों का पाठ भी श्रद्धापूर्वक किया जाता है। पूजा की विधि परिवार और क्षेत्र की परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। इस दिन का आध्यात्मिक संदेश है कि मनुष्य को अपने भीतर की सकारात्मक ऊर्जा को पहचानना चाहिए। जैसे सृष्टि की कल्पना सृजन और ऊर्जा से जुड़ी है, वैसे ही मानव जीवन में विचार, संकल्प और कर्म नई संभावनाओं का निर्माण करते हैं। निराशा के स्थान पर आशा, भय के स्थान पर साहस और नकारात्मकता के स्थान पर सकारात्मक सोच अपनाना मां कुष्मांडा की आराधना से मिलने वाली प्रमुख प्रेरणाओं में शामिल है।</p><h2>गणेश चतुर्थी और नवरात्र के बीच है विशेष आध्यात्मिक संबंध</h2><p>गणेश चतुर्थी और नवरात्र की धार्मिक परंपराएं अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों में शक्ति, शुभता, विवेक और आत्मविकास की भावना समान रूप से दिखाई देती है। भगवान गणेश बुद्धि और विघ्नों को दूर करने के प्रतीक हैं, जबकि माँ दुर्गा शक्ति और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का प्रतिनिधित्व करती हैं। गणेश जी की उपासना हमें किसी भी कार्य को आरंभ करने से पहले विचार करने, योजना बनाने और विवेकपूर्ण निर्णय लेने की शिक्षा देती है। वहीं माँ दुर्गा की आराधना हमें कठिन परिस्थितियों में दृढ़ता, साहस और आत्मविश्वास बनाए रखने की प्रेरणा देती है। सफलता के लिए ज्ञान, शक्ति, अनुशासन और सही उद्देश्य का समन्वय आवश्यक है। जब व्यक्ति बुद्धि के साथ शक्ति और संकल्प के साथ सदाचार को अपनाता है, तब वह जीवन की चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर सकता है। यह संबंध भारतीय संस्कृति की उस व्यापक दृष्टि को भी स्पष्ट करता है, जिसमें आध्यात्मिक साधना का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत कल्याण नहीं, बल्कि परिवार, समाज और समस्त जीव-जगत के प्रति उत्तरदायित्व का विकास भी है।</p><h2>नवरात्र के चौथे दिन ऐसे करें पूजा, होगा लाभ</h2><p>पंडितों के अनुसार यह पूजा गणेश जी से आरंभ करें, उनकी प्रतिमा के सामने दीपक जलाएं, दूर्वा घास (हो सके तो 21 तिनके, नहीं तो कुछ ही), एक लाल फूल और मिठाई अर्पित करें। नीचे दिए गए गणेश मंत्र का 11 या 108 बार जाप करें। फिर नवरात्रि कलश की ओर मुड़ें: माँ कूष्मांडा को फूल अर्पित करें, उनका नाम मंत्र जपें और भोग में मालपुआ या कोई भी मिठाई चढ़ाएं। बोए गए अनाज (जवारे) को जल दें और आरती के साथ पूजा संपन्न करें। 14 अक्टूबर 2026 को पड़ने वाला शारदीय नवरात्र का चौथा दिन मां कुष्मांडा की आराधना के लिए विशेष महत्त्व रखता है। उनकी उपासना के माध्यम से सृजन, ऊर्जा और सकारात्मकता का संदेश ग्रहण किया जा सकता है।</p><p>इन पर्वों की वास्तविक का खास महत्व है यह पूजा तभी सार्थक है, जब हम पूजा-पाठ के साथ अपने आचरण में भी उनके मूल्यों को अपनाएं। दूसरों के प्रति करुणा, समाज के प्रति उत्तरदायित्व, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जीवन में सत्य एवं सदाचार का पालन ही हमारी धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाता है। यही गणेश चतुर्थी और माँ दुर्गा की आराधना का व्यापक संदेश है।</p><p>- प्रज्ञा पाण्डेय</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 11:25:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/maa-kushmanda-and-kapardish-chaturthi-fast-will-bring-welfare</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri 2026: नारी सशक्तिकरण का पर्व है नवरात्रि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/navratri-is-a-celebration-of-women-empowerment]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत त्योहारों का देश है जहां हर पर्व का अपना एक विशेष महत्व और पौराणिक कथा होती है। ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पर्व है नवरात्रि । यह पर्व मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना और शक्ति आराधना का प्रतीक है। नवरात्रि मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा और आराधना के लिए समर्पित है। जिन्हें शक्ति, साहस, और नारी सशक्तिकरण का प्रतीक माना जाता है। नवरात्रि का अर्थ है नौ रातें। इस दौरान भक्त देवी दुर्गा की विशेष पूजा करते हैं, उपवास रखते हैं, और भक्ति में लीन रहते हैं। इन नो दिनों का भारतीय धर्म एवं दर्शन में ऐतिहासिक महत्व है और इन्हीं दिनों में बहुत सी दिव्य घटनाओं के घटने की जानकारी हिन्दू पौराणिक ग्रन्थों में मिलती है। माता के इन नौ रूपों को नवदुर्गा के नाम से भी जाना जाता है जो इस प्रकार हैं -शैलपुत्री, ब्रह्माचारिणी, चन्द्रघन्टा, कूष्माण्डा, स्कन्द माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिध्दिदात्री। &nbsp;</p><p><br>नवरात्रि का त्योहार एक बार वसंत ऋतु के दौरान चैत्र नवरात्रि और शरद ऋतु के दौरान शरद नवरात्रि के रूप में मनाया जाता है। शरद नवरात्रि अश्विन के महीने के दौरान मनाई जाती है जो आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर में आती है। वहीं चैत्र नवरात्रि हिन्दू कैलेंडर के चैत्र महीने के दौरान मनाई जाती है। चैत्र नवरात्रि आमतौर पर मार्च या अप्रैल महीने में मनाई जाती है। नवरात्रि एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ होता है नौ रातें। इन नौ रातों और दस दिनों के दौरान शक्ति- देवी के नौ रूपों की पूजा की जाती है। दसवां दिन दशहरा के नाम से प्रसिद्ध है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/kanya-pujan-2026-dates-and-auspicious-timings-for-ashtami-and-navami" target="_blank" rel="noopener">Navratri 2026 Kanya Pujan: जानिए महा अष्टमी और नवमी पर कंजक खिलाने का शुभ मुहूर्त</a></p><p><br>नवरात्रि से हमें अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई के जीत की सीख मिलती हैं। यह हमें बताती है की इंसान अपने अंदर की मूलभूत अच्छाइयों से नकारात्मकता पर विजय प्राप्ती और स्वयं के अलौकिक स्वरूप से साक्षात्कार कैसे कर सकता है। भारतीय जन-जीवन में धर्म की महत्ता अपरम्पार है। यह भारत की गंगा-जमुना तहजीब का ही नतीजा है कि सब धर्मों को मानने वाले लोग अपने-अपने धर्म को मानते हुए इस देश में भाईचारे की भावना के साथ सदियों से एक साथ रहते चले आ रहे हैं। यही कारण है की पूरे विश्व में भारत की धर्म व संस्कृति सर्वोतम मानी गयी है। विभिन्न धर्मों के साथ जुड़े कई पर्व भी है जिसे भारत के कोने - कोने में श्रध्दा, भक्ति और धूमधाम से मनाया जाता है। उन्ही में से एक है नवरात्रि।</p><p>वसन्त की शुरुआत और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियां चन्द्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। यह पूजा वैदिक युग से पहले प्रागैतिहासिक काल से है। नवरात्रि के पहले तीन दिन देवी दुर्गा की पूजा करने के लिए समर्पित किए गए हैं। यह पूजा उनकी ऊर्जा और शक्ति की की जाती है। प्रत्येक दिन दुर्गा के एक अलग रूप को समर्पित है।</p><p>नवरात्रि वर्ष में चार बार आता है। चैत्र, आषाढ़, अश्विन, पौष प्रतिपदा से नवमी तक मनाया जाता है। नवरात्रि के नौ रातों में तीन देवियों महालक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा के नौ स्वरुपों की पूजा होती है जिन्हें नवदुर्गा कहते हैं। दुर्गा का मतलब जीवन के दुख को हटानेवाली होता है। नवरात्रि एक महत्वपूर्ण प्रमुख त्योहार है जिसे पूरे भारत में पूरे उत्साह के साथ मनाया जाता है। नवरात्रि का त्यौहार असत्य पर सत्य की जीत को दर्शाता है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार नवरात्रि साल में दो बार मनाया जाता है। हिंदी महीनो के मुताबिक पहला नवरात्रि चैत्र महीने में मनाया जाता है और दूसरी बार अश्विन महीने में मनाया जाता है। नवरात्रि नौ दिनों तक निरंतर चलता है जिसमे देवी माँ के अलग अलग स्वरूपों की लोग भक्ति और निष्ठा के साथ पूजा करते है। भारत में नवरात्रि अलग अलग राज्यों में विभिन्न तरीको और विधियों के संग मनाई जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इन्हीं नौ दिनों में मां दुर्गा धरती पर आती है। उनके आने की खुशी में इन दिनों को दुर्गा उत्सव के तौर पर देशभर में धूमधाम से मनाया जाता हैं।</p><p>नवरात्रि के पहले दिन बालिकाओं की पूजा की जाती है। दूसरे दिन युवती की पूजा की जाती है। तीसरे दिन जो महिला परिपक्वता के चरण में पहुंच गयी है, उसकि पूजा की जाती है। नवरात्रि के चैथे, पांचवें और छठे दिन लक्ष्मी- समृद्धि और शांति की देवी की पूजा करने के लिए समर्पित है। आठवे दिन पर एक यज्ञ किया जाता है। नौवा दिन नवरात्रि समारोह का अंतिम दिन है। यह महानवमी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन उन नौ जवान लड़कियों की पूजा होती है जो अभी तक यौवन की अवस्था तक नहीं पहुंची है। इन नौ लड़कियों को देवी दुर्गा के नौ रूपों का प्रतीक माना जाता है। लड़कियों का सम्मान तथा स्वागत करने के लिए उनके पैर धोए जाते हैं। पूजा के अंत में लड़कियों को उपहार के रूप में नए कपड़े, वस्तुयें, फल प्रदान किए जाते हैं।</p><p>शक्ति की उपासना का पर्व शारदीय नवरात्र प्रतिपदा से नवमी तक निश्चित नौ तिथि, नौ नक्षत्र, नौ शक्तियों की नवधा भक्ति के साथ सनातन काल से मनाया जा रहा है। आदिशक्ति के हर रूप की नवरात्र के नौ दिनों में क्रमशरू अलग-अलग पूजा की जाती है। मां दुर्गा की नौवीं शक्ति का नाम सिद्धिदात्री है। ये सभी प्रकार की सिद्धियां देने वाली हैं। इनका वाहन सिंह है और कमल पुष्प पर ही आसीन होती हैं। नवरात्रि के नौवें दिन इनकी उपासना की जाती है।</p><p>इस पर्व से जुड़ी एक कथा अनुसार देवी दुर्गा ने एक भैंस रूपी असुर अर्थात महिषासुर का वध किया था। पौराणिक कथाओं के अनुसार महिषासुर के एकाग्र ध्यान से बाध्य होकर देवताओं ने उसे अजय होने का वरदान दे दिया। उसको वरदान देने के बाद देवताओं को चिंता हुई कि वह अब अपनी शक्ति का गलत प्रयोग करेगा। महिषासुर ने अपने साम्राज्य का विस्तार स्वर्ग के द्वार तक कर दिया और उसके इस कृत्य को देख देवता विस्मय की स्थिति में आ गए। महिषासुर ने सूर्य, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, यम, वरुण और अन्य देवताओं के सभी अधिकार छीन लिए और स्वयं स्वर्गलोक का मालिक बन बैठा। देवताओं को महिषासुर के प्रकोप से पृथ्वी पर विचरण करना पड़ रहा था तब महिषासुर के इस दुस्साहस से क्रोधित होकर देवताओं ने देवी दुर्गा की रचना की।<br><br>ऐसा माना जाता है कि देवी दुर्गा के निर्माण में सारे देवताओं का एक समान बल लगाया गया था। महिषासुर का नाश करने के लिए सभी देवताओं ने अपने अपने अस्त्र देवी दुर्गा को दिए थे और कहा जाता है कि इन देवताओं के सम्मिलित प्रयास से देवी दुर्गा और बलवान हो गईं थी। इन नौ दिन देवी-महिषासुर संग्राम हुआ और अन्ततरू महिषासुर-वध कर महिषासुर मर्दिनी कहलायीं। नवदुर्गा और दस महाविद्याओं में काली ही प्रथम प्रमुख हैं। भगवान शिव की शक्तियों में उग्र और सौम्य, दो रूपों में अनेक रूप धारण करने वाली दशमहाविद्या अनंत सिद्धियां प्रदान करने में समर्थ हैं। दसवें स्थान पर कमला वैष्णवी शक्ति हैं, जो प्राकृतिक संपत्तियों की अधिष्ठात्री देवी लक्ष्मी हैं। देवता, मानव, दानव सभी इनकी कृपा के बिना पंगु हैं, इसलिए आगम-निगम दोनों में इनकी उपासना समान रूप से वर्णित है। सभी देवता, राक्षस, मनुष्य, गंधर्व इनकी कृपा-प्रसाद के लिए लालायित रहते हैं।</p><p>नवरात्रि के दौरान उपवास करने से शरीर से विषाक्त पदार्थ निकल जाते हैं, जिससे शरीर स्वस्थ और निरोगी रहता है। नवरात्रि के दौरान ध्यान, योग और भक्ति करने से मन को शांति मिलती है, जिससे तनाव और चिंता कम होती है। नवरात्रि व्रत का मूल उद्देश्य है इंद्रियों का संयम और आध्यात्मिक शक्ति का संचय। वस्तुत: नवरात्र अंत:शुद्धि का महापर्व है। आज वातावरण में चारों तरफ विचारों का प्रदूषण है। ऐसी स्थिति में नवरात्र का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।</p><p>- रमेश सर्राफ धमोरा<br>(लेखक राजस्थान सरकार से मान्यता प्राप्त स्वतंत्र पत्रकार है।)</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 17:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/navratri-is-a-celebration-of-women-empowerment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri 2026: घटस्थापना का शुभ Muhurat और मां Shailputri की पूजन विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-ghatasthapana-shubh-muhurat-and-puja-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 11 अक्तूबर 2026 को शारदीय नवरात्रि की शुरूआत हो रही है। आश्विन माह की शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शारदीय नवरात्रि की शुरूआत होती है। इस दौरान मां दुर्गा के 9 अलग-अलग स्वरूपों की विधिविधान से पूजा-अर्चना की जाती है। इस दौरान यानी घटस्थापना की जाती है। साथ ही अखंड ज्योति और दुर्गा सप्तशती का पाठ और कन्या पूजन जैसे अनुष्ठान होते हैं। वहीं नवरात्रि के पहले दिन शुभ मुहूर्त पर कलश स्थापना करना बेहद शुभ माना जाता है। तो आइए जानते हैं घटस्थापना का मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 10 अक्तूबर 2026 की रात 09:19 मिनट पर प्रतिपदा तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 11 अक्तूबर की रात 09:30 बजे इस तिथि की समाप्ति होगी। वहीं उदयातिथि के हिसाब से 11 अक्तूबर को कलश स्थापना की जाएगा। वहीं कलश स्थापना के साथ-साथ मां दुर्गा के पहले स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी।</p><h2>कलश स्थापना का मुहूर्त</h2><p>आज यानी की भक्तों को सुबह 06:19 मिनट से लेकर 10:12 बजे तक कलश स्थापना के लिए करीब 4 घंटे का मुहूर्त मिल रहा है। जोकि पूजा के लिए अति उत्तम है। वहीं इसके साथ ही सुबह 11:44 मिनट से लेकर दोपहर 12:31 मिनट तक अभिजीत मुहूर्त रहेगा। अगर आप सुबह के मुहूर्त में कलश स्थापना नहीं कर पाए, तो अभिजीत मुहूर्त में कलश स्थापित कर सकते हैं।</p><h2>हाथी पर होगा मां दुर्गा का आगमन</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक नवरात्रि के दिनों में मां दुर्गा का पृथ्वी लोक पर आगमन अलग-अलग वाहन पर होता है। इस बार रविवार को नवरात्रि की शुरूआत हो रही है, ऐसे में मां दुर्गा का आगमन हाथी पर हो रहा है। जिसको बेहद शुभ, उत्तम वर्षा-समृद्धि और लाभकारी माना जाता है।</p><h2>मां शैलपुत्री की पूजा</h2><p>नवरात्रि के पहले दिन मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। इस दिन मां शैलपुत्री की पूजा करने से जातक को धन-धान्य, सौभाग्य, ऐश्वर्य और आरोग्य की प्राप्ति होती है। वहीं मां शैलपुत्री की पूजा के दौरान 'ऊं ऐं ह्रीं क्लीं शैलपुत्र्यै नम:' मंत्र का जाप करना चाहिए। वहीं मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना करने से विवाह संबंधी बाधाएं दूर होती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 11 Oct 2026 07:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-ghatasthapana-shubh-muhurat-and-puja-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri 2026: शारदीय नवरात्रि प्रारम्भ और घटस्थापना: शक्ति आराधना का पावन पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/beginning-of-shardiya-navratri-and-ghatasthapana-holy-festival-of-shakti-worship]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि को शक्ति की उपासना का अत्यंत महत्वपूर्ण पर्व माना जाता है। आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होने वाले इन नौ दिनों में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है। नवरात्रि केवल उपवास और पूजा का पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मसंयम और अधर्म पर धर्म की विजय का प्रतीक भी है।</p><p>नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है। इसी के साथ नौ दिनों तक चलने वाली देवी आराधना का विधिवत शुभारंभ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार कलश में देवी शक्ति का आह्वान कर उसे पूजा स्थल पर स्थापित किया जाता है।</p><h2>2026 में कब शुरू होगी शारदीय नवरात्रि?</h2><p>वर्ष 2026 में शारदीय नवरात्रि का प्रारम्भ रविवार, 11 अक्टूबर को होगा। इस दिन आश्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा रहेगी और इसी दिन घटस्थापना तथा मां शैलपुत्री की पूजा की जाएगी। नवरात्रि का समापन 19 अक्टूबर को नवमी के साथ होगा और 20 अक्टूबर 2026 को विजयादशमी मनाई जाएगी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/mata-rani-will-come-riding-on-an-elephant-on-october-11" target="_blank" rel="noopener">11 अक्टूबर को हाथी पर सवार होकर आयेगी माता रानी, शारदीय नवरात्रि में ग्रह-नक्षत्रों का महासंयोग</a></p><h2>दिल्ली के लिए 2026 में घटस्थापना का प्रमुख मुहूर्त:?</h2><p>11 अक्टूबर, प्रातः 6 बजकर 19 मिनट से 10 बजकर 12 मिनट तक।<br>अभिजित मुहूर्त 11 बजकर 44 मिनट से दोपहर 12 बजकर 31 मिनट तक रहेगा।</p><p>मुहूर्त स्थान के अनुसार कुछ मिनट आगे-पीछे हो सकता है। उदाहरण के लिए वाराणसी में घटस्थापना का प्रातःकालीन मुहूर्त 5:54 से 9:48 तक बताया गया है। इसलिए अपने शहर के स्थानीय पंचांग के अनुसार समय देखना उचित है।</p><h2>घटस्थापना का क्या है महत्व?</h2><p>घटस्थापना को नवरात्रि की सबसे महत्वपूर्ण प्रारंभिक विधियों में माना जाता है। कलश को समृद्धि, पूर्णता, जीवन और देवी शक्ति का प्रतीक माना जाता है। कलश के ऊपर स्थापित नारियल और उसके चारों ओर रखी जाने वाली आम की पत्तियां तथा कलश के नीचे बोए जाने वाले जौ प्रकृति, उर्वरता और जीवन के विकास का प्रतीक माने जाते हैं।</p><p>धार्मिक परंपरा में कलश स्थापना के माध्यम से देवी शक्ति का आवाहन किया जाता है। इसके बाद नौ दिनों तक अखंड ज्योति, दुर्गा सप्तशती का पाठ, मंत्र जाप, आरती और देवी के विभिन्न स्वरूपों की पूजा की जाती है।</p><h2>घटस्थापना की पूजन विधि</h2><p>घटस्थापना के लिए सबसे पहले पूजा स्थल को अच्छी तरह साफ करके शुद्ध किया जाता है। इसके बाद निम्न प्रकार से पूजा की जा सकती है—</p><p>स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा का संकल्प लें।<br>पूजा स्थल पर स्वच्छ मिट्टी या चौकी तैयार करें।<br>उसमें जौ के बीज बोएं। नवरात्रि के दौरान उगने वाले इन जौ को धार्मिक रूप से शुभ माना जाता है।<br>तांबे, पीतल या मिट्टी के कलश में स्वच्छ जल भरें।<br>कलश में अक्षत, सुपारी, सिक्का और आवश्यकता अनुसार गंगाजल डालें।<br>कलश के मुख पर आम या अशोक के पत्ते लगाएं।<br>इसके ऊपर लाल वस्त्र में लिपटा हुआ नारियल रखें।<br>कलश को जौ बोई गई मिट्टी के ऊपर स्थापित करें।<br>मां दुर्गा का ध्यान करते हुए देवी का आवाहन करें।<br>रोली, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, फल और नैवेद्य अर्पित करें।<br>मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती अथवा देवी कवच का पाठ करें।<br>अंत में देवी की आरती करके प्रसाद वितरित करें।</p><h2>नवरात्रि के नौ दिनों में मां के नौ स्वरूप</h2><p>नवरात्रि के प्रत्येक दिन देवी के एक स्वरूप की पूजा की जाती है—</p><p>पहला दिन — मां शैलपुत्री<br>दूसरा दिन — मां ब्रह्मचारिणी<br>तीसरा दिन — मां चंद्रघंटा<br>चौथा दिन — मां कूष्मांडा<br>पांचवां दिन — मां स्कंदमाता<br>छठा दिन — मां कात्यायनी<br>सातवां दिन — मां कालरात्रि<br>आठवां दिन — मां महागौरी<br>नौवां दिन — मां सिद्धिदात्री</p><p>इस प्रकार नौ दिनों में देवी के नौ रूपों की आराधना की जाती है।</p><h2>शारदीय नवरात्रि की धार्मिक महत्ता</h2><p>शारदीय नवरात्रि का सबसे प्रमुख संदेश शक्ति और धर्म की विजय है। पौराणिक मान्यता के अनुसार महिषासुर नामक असुर ने देवताओं और पृथ्वी पर अत्याचार बढ़ा दिया था। तब देवताओं की शक्तियों से देवी दुर्गा का प्राकट्य हुआ। देवी ने महिषासुर से युद्ध किया और उसका वध किया।</p><p>इसी कारण मां दुर्गा को महिषासुरमर्दिनी भी कहा जाता है। यह कथा प्रतीकात्मक रूप से यह संदेश देती है कि जब अधर्म, अहंकार और अत्याचार बढ़ता है, तब शक्ति का प्राकट्य होकर उसका प्रतिकार होता है। नवरात्रि की साधना में बाहरी शक्ति के साथ-साथ मनुष्य की आंतरिक शक्ति, संयम और आत्मशुद्धि पर भी जोर दिया जाता है।</p><h2>नवरात्रि की व्रत कथा</h2><p>नवरात्रि से जुड़ी अनेक पौराणिक कथाएं अलग-अलग पुराणों और क्षेत्रीय परंपराओं में मिलती हैं। इनमें देवी और महिषासुर का युद्ध सबसे प्रसिद्ध कथाओं में से एक है। कहा जाता है कि महिषासुर ने कठोर तपस्या करके वरदान प्राप्त किया और उसके बाद अपनी शक्ति के अहंकार में देवताओं तथा मनुष्यों को परेशान करने लगा। देवताओं के लिए उसका सामना करना कठिन हो गया। तब ब्रह्मा, विष्णु, महेश सहित सभी देवताओं की शक्तियां एकत्र हुईं और उनसे एक दिव्य स्त्री शक्ति का प्राकट्य हुआ। देवताओं ने देवी को विभिन्न अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। देवी सिंह पर सवार होकर महिषासुर से युद्ध करने पहुंचीं। दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध कर दिया। इसी विजय को अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर शक्ति की विजय के रूप में देखा जाता है।</p><p>एक अन्य प्रसिद्ध परंपरा में भगवान श्रीराम द्वारा रावण से युद्ध से पहले देवी की आराधना का वर्णन मिलता है। इसी कारण शारदीय नवरात्रि को विजयादशमी से भी जोड़ा जाता है।</p><h2>व्रत में किन बातों का ध्यान रखें?</h2><p>नवरात्रि में श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य और परंपरा के अनुसार व्रत रखते हैं। कुछ लोग पूरे नौ दिन फलाहार करते हैं, जबकि कुछ लोग एक समय भोजन या सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत के दौरान सामान्यतः अनाज, मांसाहार, मदिरा और तामसिक भोजन से परहेज किया जाता है। फल, दूध, दही, साबूदाना, कुट्टू, सिंघाड़े का आटा, सेंधा नमक आदि का सेवन अनेक व्रत परंपराओं में किया जाता है।</p><h2>घटस्थापना से विजयादशमी तक</h2><p>घटस्थापना के साथ शुरू होने वाली नवरात्रि धीरे-धीरे अष्टमी और नवमी की विशेष पूजा तक पहुंचती है। कई घरों में अष्टमी या नवमी के दिन कन्या पूजन किया जाता है। नौ कन्याओं को देवी के नौ स्वरूपों का प्रतीक मानकर उनका पूजन और भोजन कराया जाता है।</p><p>इसके बाद दसवें दिन विजयादशमी आती है। इस प्रकार नवरात्रि का पूरा पर्व केवल देवी पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को अपने भीतर की नकारात्मक शक्तियों यानि अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह और अन्य विकारों पर विजय पाने का संदेश भी देता है।</p><p>- शुभा दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 18:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/beginning-of-shardiya-navratri-and-ghatasthapana-holy-festival-of-shakti-worship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[11 अक्टूबर को हाथी पर सवार होकर आयेगी माता रानी, शारदीय नवरात्रि में ग्रह-नक्षत्रों का महासंयोग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/mata-rani-will-come-riding-on-an-elephant-on-october-11]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>रविवार 11 अक्टूबर से देवी दुर्गा का नौ दिवसीय पर्व शारदीय नवरात्रि शुरू हो रहा है। रविवार को घट स्थापना होगा। ये पर्व 20 अक्टूबर तक चलेगा। इस साल देवी दुर्गा का वाहन हाथी है। शास्त्रों की मान्यता है कि नवरात्रि में जब देवी हाथी पर सवार होकर आती हैं, तब ज्यादा बारिश के योग बनते हैं। पाल बालाजी ज्योतिष संस्थान जयपुर-जोधपुर के निदेशक ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस वर्ष शारदीय नवरात्रि पूरे 9 दिनों का होगा। इस वर्ष शारदीय नवरात्रि का आरंभ रविवार 11 अक्टूबर 2026 से हो रहा है। शारदीय नवरात्रि के पहले दिन सूर्योदय के समय हस्त नक्षत्र और शुक्ल योग का प्रभाव रहेगा। इसके अलावा गुरु और चंद्रमा के केंद्र संबंध से बनने वाले गजकेसरी योग का भी दुर्लभ संयोग रहने वाला है। वहीं, शनि मीन राशि में विराजमान हैं और उनकी यह स्थिति भी ज्योतिषीय दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जा रही है। देवी भागवत पुराण में बताया गया है कि महालया के दिन जब पितृगण धरती से लौटते हैं तब मां दुर्गा अपने परिवार और गणों के साथ पृथ्वी पर आती हैं। जिस दिन नवरात्र का आरंभ होता है उस दिन के हिसाब से माता हर बार अलग-अलग वाहनों से आती हैं। माता का अलग-अलग वाहनों से आना भविष्य के लिए संकेत भी होता है जिससे पता चलता है कि आने वाला साल कैसा रहेगा। वैसे तो देवी दुर्गा का वाहन सिंह है, लेकिन नवरात्रि की शुरुआत में वार के अनुसार देवी का वाहन बदल जाता है। इस बार नवरात्रि रविवार से शुरू हो रही है, इस कारण देवी का वाहन हाथी रहेगा। देवी के इस वाहन का संदेश ये है कि आने वाले समय में देश को लाभ हो सकता है। लोगों को सुख-समृद्धि मिलेगी।</p><p>ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस बार शारदीय नवरात्रि में अमृत सिद्धि योग, सर्वार्थ सिद्धि योग और रवि योग बनेंगे। इन योगों में साधना-उपासना के साथ भूमि, भवन, वाहन और अन्य शुभ कार्य करना महत्वपूर्ण माना गया है। हिंदू धर्म में शारदीय नवरात्रि का विशेष महत्व है। मां दुर्गा की उपासना का पर्व साल में चार बार आता है। जिसमें दो गुप्त नवरात्रि और दो चैत्र व शारदीय नवरात्रि होती है। शारदीय नवरात्रि अश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होती है। नवरात्रि की शुरुआत रविवार 11 अक्टूबर 2026 से होगी। 20 अक्टूबर 2026 को नवरात्रि समाप्त होगी। वहीं 20 अक्टूबर विजयादशमी या दशहरा का पर्व मनाया जाएगा। वैदिक पंचांग के अनुसार आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का आरंभ 10 अक्तूबर को रात 9:19 मिनट से होगा। प्रतिपदा तिथि का समापन 11 अक्तूबर को रात 9:30 मिनट पर होगा। उदयातिथि के अनुसार शारदीय नवरात्रि का आरंभ 11 अक्तूबर 2026 से होगा।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/worship-of-shakti-importance-of-feelings-more-than-mantras" target="_blank" rel="noopener">शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व</a></p><h2>शारदीय नवरात्रि पर शुभ संयोग</h2><p>ज्योतिषाचार्य डॉ अनीष व्यास ने बताया कि इस बार शारदीय नवरात्रि की शुरुआत साधारण नहीं मानी जा रही है। पहले दिन 11 अक्टूबर को सूर्योदय के समय हस्त नक्षत्र और शुक्ल योग का संयोग रहेगा। इसके साथ ही गुरु और चंद्रमा के बीच केंद्र संबंध होने से गजकेसरी योग बनेगा।। ज्योतिष में इसे प्रभावशाली योग माना जाता है। वहीं शनि इस समय मीन राशि में विराजमान हैं, जिससे ग्रहों की स्थिति और भी खास हो जाती है।</p><h2>हाथी पर सवार होकर आएंगी मां दुर्गा</h2><p>कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि शारदीय नवरात्रि के पहले दिन के आधार पर मां दुर्गा की सवारी के बारे में पता चलता है। नवरात्रि में माता की सवारी का विशेष महत्व होता है। माता हाथी पर सवार होकर धरती पर आ रही हैं। हाथी पर माता का आगमन इस बात की ओर संकेत कर रहा है कि इस साल खूब अच्छी वर्षा होगी और खेती अच्छी होगी। देश में अन्न धन का भंडार बढ़ेगा।</p><h2>यह होगा असर</h2><p>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि धार्मिक मान्यता के अनुसार नवरात्रि में जब मां दुर्गा हाथी पर सवार होकर आती हैं तो ये बेहद शुभ माना जाता है। हाथी पर सवार होकर मां दुर्गा अपने साथ ढेर सारी खुशियां और सुख-समृद्धि लेकर आती हैं। मां का वाहन हाथी ज्ञान व समृद्धि का प्रतीक है। इससे देश में आर्थिक समृद्धि आयेगी। साथ ही ज्ञान की वृद्धि होगी। हाथी को शुभ का प्रतीक माना गया है। ऐसे में आने वाला यह साल बहुत ही शुभ कार्य होगा। लोगों के बिगड़े काम बनेंगे। माता रानी की पूजा अर्चना करने वाले भक्तों पर विशेष कृपा बरसेगी।</p><h2>कलश स्थापना शुभ मुहूर्त</h2><p>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि आश्विनशुक्ल प्रतिपदा 11 अक्टूबर (रविवार) को शारदीय नवरात्र का आरम्भ हो रहा है। देवीपुराण में द्विस्वभाव लग्न युक्त प्रातः काल में देवी का आह्वान एवं घटस्थापना पूजन कर विधान है। इस दिन चित्रा नक्षत्र रात्रि 10:32 तक एवं वैधृति योग रात्रि 09:05 तक है। प्रतिपदा के दिन चित्रा नक्षत्र व वैधति योग या दोनों में से कोई एक भी सम्पूर्ण दिन व्याप्त रहे तो अभिजीत मुहूर्त में घटस्थापना करनी चाहिए।</p><p>सम्पूर्णा प्रतिपदेव चित्रायुक्ता यदा भवेत्। वैभूत्या युक्ता स्यात्तदा मध्यदिने रखौ। अभिजित्नु मुहूर्त यत्तत्र स्थापनमिष्यते।। - निणर्यसिन्पु</p><p>चित्रा नक्षत्र व वैधृति योग को घटस्थापना में त्याज्य बताया गया है, किन्तु इन दोनों के दो चरणों को त्याग कर घटस्थापना की अनुमति प्रदान की जाती है।</p><p>तदुक्तं त कात्यायनेन प्रतिपाद्याश्विने मासि भयो वैधृति चित्रयोः। आद्यः पादौ पहि प्रारभेन्नवरात्रक्रमिति ।।</p><p>चित्रा नक्षत्र के दो चरण प्रातः 10:03 पर समाप्त होंगे एवं वैधृति के दो चरण प्रातः 09:33 पर समाप्त होंगे। अतः अति आवश्यकता में घटस्थापना हेतु लाभ अमृत का चौघड़िया प्रातः 10:04 से दोपहर 12:15 तक रहेगा, अभिजीत मुहूर्त प्रातः 11:49 से दोपह 12:37 तक रहेगा। द्विस्वभाव (धनु) लग्न प्रातः 11:32 से दोपहर 01:36 तक रहेगा।</p><h2>शारदीय नवरात्रि की तिथियां</h2><p>11 अक्तूबर 2026- पहला दिन - मां शैलपुत्री पूजा, घटस्थापना</p><p>12 अक्तूबर 2026 - दूसरा दिन - मां ब्रह्मचारिणी पूजा</p><p>13 अक्तूबर 2026 - तीसरा दिन - मां चंद्रघंटा पूजा</p><p>14 अक्तूबर 2026- चौथा दिन - मां कूष्मांडा पूजा</p><p>15 अक्तूबर 2026 - पांचवां दिन - मां स्कंदमाता पूजा</p><p>16 अक्तूबर 2026 - छठा दिन - मां कात्यायनी पूजा</p><p>17 अक्तूबर 2026- सातवां दिन - मां कालरात्रि पूजा</p><p>18 अक्तूबर 2026 - आठवां दिन - मां महागौरी की पूजा</p><p>19 अक्तूबर 2026 - नौवां दिन - मां सिद्धिदात्री की पूजा</p><p>20 अक्तूबर 2026- दुर्गा विसर्जन, विजयादशमी</p><h2>कलश स्थापना</h2><p>कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि नवरात्रि में कलश स्थापना का विशेष महत्व है। कलश स्थापना को घट स्थापना भी कहा जाता है। नवरात्रि की शुरुआत घट स्थापना के साथ ही होती है। घट स्थापना शक्ति की देवी का आह्वान है। मान्यता है कि गलत समय में घट स्थापना करने से देवी मां क्रोधित हो सकती हैं। रात के समय और अमावस्या के दिन घट स्थापित करने की मनाही है। घट स्थापना का सबसे शुभ समय प्रतिपदा का एक तिहाई भाग बीत जाने के बाद होता है। अगर किसी कारण वश आप उस समय कलश स्थापित न कर पाएं तो अभिजीत मुहूर्त में भी स्थापित कर सकते हैं। &nbsp;प्रत्येक दिन का आठवां मुहूर्त अभिजीत मुहूर्त कहलाता है। सामान्यत: यह 40 मिनट का होता है।</p><h2>कलश स्थापना की सामग्री</h2><p>भविष्यवक्ता डॉ अनीष व्यास ने बताया कि मां दुर्गा को लाल रंग खास पसंद है इसलिए लाल रंग का ही आसन खरीदें। इसके अलावा कलश स्थापना के लिए मिट्टी का पात्र, जौ, मिट्टी, जल से भरा हुआ कलश, मौली, इलायची, लौंग, कपूर, रोली, साबुत सुपारी, साबुत चावल, सिक्के, अशोक या आम के पांच पत्ते, नारियल, चुनरी, सिंदूर, फल-फूल, फूलों की माला और श्रृंगार पिटारी भी चाहिए।</p><h2>कैसे करें कलश स्थापना</h2><p>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक डॉ अनीष व्यास ने बताया कि नवरात्रि के पहले दिन यानी कि प्रतिपदा को सुबह स्नान कर लें। मंदिर की साफ-सफाई करने के बाद सबसे पहले गणेश जी का नाम लें और फिर मां दुर्गा के नाम से अखंड ज्योत जलाएं। कलश स्थापना के लिए मिट्टी के पात्र में मिट्टी डालकर उसमें जौ के बीज बोएं। अब एक तांबे के लोटे पर रोली से स्वास्तिक बनाएं। लोटे के ऊपरी हिस्से में मौली बांधें। अब इस लोटे में पानी भरकर उसमें कुछ बूंदें गंगाजल की मिलाएं। फिर उसमें सवा रुपया, दूब, सुपारी, इत्र और अक्षत डालें। इसके बाद कलश में अशोक या आम के पांच पत्ते लगाएं। अब एक नारियल को लाल कपड़े से लपेटकर उसे मौली से बांध दें। फिर नारियल को कलश के ऊपर रख दें। अब इस कलश को मिट्टी के उस पात्र के ठीक बीचों बीच रख दें जिसमें आपने जौ बोएं हैं। कलश स्थापना के साथ ही नवरात्रि के नौ व्रतों को रखने का संकल्प लिया जाता है। आप चाहें तो कलश स्थापना के साथ ही माता के नाम की अखंड ज्योति भी जला सकते हैं।</p><p>- डा. अनीष व्यास<br>भविष्यवक्ता और कुण्डली विश्ल़ेषक</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 18:27:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/mata-rani-will-come-riding-on-an-elephant-on-october-11</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Sarva Pitru Amavasya 2026: पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक है सर्वपितृ अमावस्या]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sarvapitri-amavasya-is-a-symbol-of-respect-for-ancestors]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज सर्वपितृ अमावस्या है, हिंदू धर्म में पितृ पक्ष को अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर माना गया है। इसे महालय अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या और सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है तो आइए हम आपको सर्वपितृ अमावस्या व्रत का महत्व एवं पूजा विधि के बारे में बताते हैं।</p><h2>जानें सर्वपितृ अमावस्या के बारे में</h2><p>पंडितों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या की विशेषता यह है कि इस दिन उन सभी पितरों का श्राद्ध और तर्पण किया जा सकता है, जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया। 10 अक्टूबर को पितृ पक्ष समाप्त होगा और 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि प्रारंभ होगी। इस प्रकार सर्वपितृ अमावस्या पितृ पक्ष और देवी पक्ष के बीच एक महत्वपूर्ण संक्रमण दिवस है। इसलिए पितृ पक्ष के सभी दिनों में इस अमावस्या को विशेष महत्व प्राप्त है। शनिवार को सर्वपितृ अमावस्या पड़ रही है। अमावस्या तिथि के साथ पितृ पक्ष भी खत्म हो जाते हैं। इस साल की सर्वपितृ अमावस्या आध्यात्मिक नजरिए से बेहद खास हैं, क्योंकि इस वर्ष यह शनिवार के दिन पड़ रही है। जिस वजह से इसे 'शनिश्चरी अमावस्या' के नाम से भी जाना जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/sarvapitri-amavasya-marks-end-of-pitru-paksha-with-shradh-rituals" target="_blank" rel="noopener">Sarvapitri Amavasya पर Shradh और Pind Daan से होगा Pitru Paksha का समापन</a></p><h2>जानें सर्वपितृ अमावस्या का शुभ मुहूर्त</h2><p>सर्वपितृ अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को मनाई जाएगी। यह पितृ पक्ष का अंतिम दिन है और इसे महालय अमावस्या, पितृ विसर्जनी अमावस्या तथा सर्वपितृ मोक्ष अमावस्या भी कहा जाता है।<br>- दिन: शनिवार, 10 अक्टूबर 2026&nbsp;<br>- तिथि: आश्विन कृष्ण अमावस्या&nbsp;<br>- अमावस्या तिथि प्रारंभ: 9 अक्टूबर रात लगभग 9:35 बजे&nbsp;<br>- अमावस्या तिथि समाप्त: 10 अक्टूबर रात लगभग 9:19 बजे&nbsp;<br>- पितृ पक्ष का समापन: 10 अक्टूबर&nbsp;<br>- शारदीय नवरात्रि का आरंभ: 11 अक्टूबर 2026</p><h2>सर्वपितृ अमावस्या का महत्व भी है विशेष</h2><p>शास्त्रों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या उन सभी पूर्वजों को श्रद्धांजलि देने का विशेष अवसर है जिनका श्राद्ध उनकी निश्चित तिथि पर नहीं हो पाया हो। जिन पितरों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करने की परंपरा है। हिन्दू मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण और तर्पण करने से परिवार अपने पितृ ऋण के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करता है। इस दिन किया गया श्राद्ध केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति स्मरण, सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक भी माना जाता है।</p><h2>सर्वपितृ अमावस्या के दिन ये करें, होंगे लाभान्वित</h2><p>पंडितों के अनुसार प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पितरों का स्मरण करके तर्पण करें। काले तिल, जल और कुश से तर्पण करने की परंपरा है। सामर्थ्य के अनुसार पिंडदान और श्राद्ध करें। ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराएं। अन्न, वस्त्र, तिल आदि का दान करें। गाय, कौए और कुत्ते को भोजन कराने की परंपरा भी है। पितरों की शांति के लिए प्रार्थना करें।</p><h2>इसलिए महत्वपूर्ण है सर्वपितृ अमावस्या</h2><p>भारतीय परंपरा में मनुष्य के जीवन को केवल वर्तमान तक सीमित नहीं माना गया है। परिवार, समाज और आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ पूर्वजों के योगदान को भी जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा माना गया है। इसी भावना से पितृ पक्ष में पूर्वजों का स्मरण किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष के दौरान पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध और दान करने से उन्हें शांति प्राप्त होती है और परिवार पर उनका आशीर्वाद बना रहता है। सर्वपितृ अमावस्या उन परिवारों के लिए विशेष अवसर है, जो किसी कारण से अपने पूर्वजों का श्राद्ध उनकी निर्धारित तिथि पर नहीं कर पाए। यह दिन हमें यह भी याद दिलाता है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी का अस्तित्व पिछली पीढ़ियों से जुड़ा हुआ है। इसलिए श्राद्ध केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भी है।</p><h2>इन पितरों के लिए किया जाता है सर्वपितृ अमावस्या श्राद्ध</h2><p>शास्त्रों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या पर परिवार के ऐसे सभी दिवंगत सदस्यों का श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है। इसके अलावा यदि पितृ पक्ष के दौरान किसी कारण से किसी पितर का श्राद्ध नहीं किया जा सका हो, तो इस दिन उनका श्राद्ध करने की परंपरा है। परिवार के दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों का स्मरण करके तर्पण और पिंडदान किया जाता है। कई परिवारों में इस दिन अपने वंश के सभी ज्ञात-अज्ञात पितरों को सामूहिक रूप से श्रद्धांजलि दी जाती है।</p><h2>ऐसे किया जाता है सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध</h2><p>पंडितों के अनुसार इस दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। इसके बाद पितरों का ध्यान करके तर्पण किया जाता है। तर्पण में सामान्यतः जल, काले तिल और कुश का प्रयोग किया जाता है। श्राद्ध की विधि परिवार की परंपरा और स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। जिन परिवारों में पिंडदान की परंपरा है, वे पितरों के निमित्त पिंडदान करते हैं। इसके बाद ब्राह्मण अथवा जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराने और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान करने की परंपरा है। कई स्थानों पर श्राद्ध के बाद गाय, कौए और कुत्ते को भोजन कराने की भी परंपरा है। इसके पीछे यह भावना है कि भोजन और सेवा के माध्यम से जीव-जगत के प्रति भी करुणा और सम्मान व्यक्त किया जाए।</p><h2>सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण और सेवा का है खास महत्व</h2><p>धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृ पक्ष में तर्पण को विशेष महत्व दिया जाता है। 'तर्पण' का अर्थ है श्रद्धा और समर्पण के साथ जल अर्पित करना। माना जाता है कि जल अर्पित करते समय पूर्वजों का स्मरण करने से उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है। तर्पण करते समय व्यक्ति अपने पूर्वजों को याद करता है और उनके प्रति सम्मान प्रकट करता है। धार्मिक मान्यताओं में इसे पितृ ऋण से जुड़ा महत्वपूर्ण कर्म माना गया है। सर्वपितृ अमावस्या पर दान करने की भी परंपरा है। व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार अन्न, वस्त्र, तिल, फल और अन्य आवश्यक वस्तुओं का दान कर सकता है। जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन कराना भी पुण्यकारी माना जाता है। आज के संदर्भ में इस परंपरा को समाज के कमजोर और जरूरतमंद वर्गों की सहायता से भी जोड़ा जा सकता है। किसी भूखे व्यक्ति को भोजन कराना, गरीब परिवार को राशन देना, बुजुर्गों की सहायता करना या किसी जरूरतमंद विद्यार्थी की पढ़ाई में सहयोग करना भी सेवा और मानवीय संवेदना का माध्यम बन सकता है।</p><h2>सर्वपितृ अमावस्या से जुड़ी पौराणिक मान्यता भी है रोचक</h2><p>शास्त्रों में पितृ पक्ष और श्राद्ध से जुड़ी अनेक कथाएं प्रचलित है। इनमें महाभारत के कर्ण की कथा विशेष रूप से प्रसिद्ध है। मान्यता के अनुसार जब कर्ण की मृत्यु के बाद उन्हें पितृलोक प्राप्त हुआ, तो वहां उन्हें भोजन के स्थान पर स्वर्ण और रत्न प्राप्त हुए। कर्ण ने इसका कारण पूछा तो उन्हें बताया गया कि उन्होंने जीवनभर स्वर्ण आदि का दान तो किया, लेकिन अपने पूर्वजों के लिए अन्न का दान और श्राद्ध नहीं किया। इसके बाद उन्हें पृथ्वी पर लौटकर अपने पितरों के लिए श्राद्ध और अन्नदान करने का अवसर मिला। इसी कथा को पितृ पक्ष की परंपरा से जोड़ा जाता है। कथा का मूल संदेश यह है कि केवल धन-संपत्ति का दान ही पर्याप्त नहीं, बल्कि पूर्वजों का स्मरण और अन्नदान भी महत्वपूर्ण है।</p><h2>सर्वपितृ अमावस्या के दिन ये करें और ये न करें</h2><p>पंडितों के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धा और संयम के साथ धार्मिक कार्य करने की परंपरा है। इस दिन पितरों का स्मरण, तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान, अन्नदान और जरूरतमंदों की सहायता करना शुभ माना जाता है। वहीं, अनावश्यक क्रोध, विवाद और दिखावे से बचने की सलाह दी जाती है। श्राद्ध कर्म को अपनी पारिवारिक परंपरा और सामर्थ्य के अनुसार करना चाहिए। धार्मिक कर्मकांड में सबसे महत्वपूर्ण भावना श्रद्धा है, न कि खर्च या प्रदर्शन।</p><h2>पितृ पक्ष के बाद शुरू होगा नवरात्रि पर्व</h2><p>सर्वपितृ अमावस्या के साथ पितृ पक्ष का समापन होगा। इसके अगले दिन से शारदीय नवरात्रि का आरंभ होगा। इस दृष्टि से भी सर्वपितृ अमावस्या भारतीय धार्मिक कैलेंडर में एक महत्वपूर्ण पड़ाव है एक ओर यह पूर्वजों के प्रति श्रद्धांजलि का अवसर है, वहीं इसके बाद शक्ति और देवी उपासना का पर्व शुरू होता है।</p><p>- प्रज्ञा पाण्डेय</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 12:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sarvapitri-amavasya-is-a-symbol-of-respect-for-ancestors</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sarvapitri Amavasya पर Shradh और Pind Daan से होगा Pitru Paksha का समापन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/sarvapitri-amavasya-marks-end-of-pitru-paksha-with-shradh-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 10 अक्तूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जा रही है। इस दिन से पितृ पक्ष का समापन होता है। सर्वपितृ अमावस्य़ा उन सभी पितरों के लिए विशेष माना जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि के बारे में जानकारी नहीं होती है। या फिर किसी कारण से उनकी तिथि पर श्राद्ध न हो पाया हो। सर्वपितृ अमावस्या के मौके पर तर्पण, श्राद्ध, पिंडदान के साथ-साथ पितरों के लिए दीपदान करना भी शुभ माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको सर्वपितृ अमावस्या की तिथि, मुहूर्त और विधि के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>सर्वपितृ अमावस्या तिथि की शुरुआत 09 अक्तूबर की रात 09:35 मिनट से हुई है। वहीं आज यानी की 10 अक्तूबर की रात 09:19 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 10 अक्तूबर 2026 को सर्वपितृ अमावस्या मनाई जा रही है।</p><h2>श्राद्ध विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद सूर्य देव को अर्घ्य दें और फिर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें। अब एक तांबे के लोटे में जौ, चावल, काले तिल, कुश और जल को रखें। फिर हाथ में कुशा लेकर जल में तिल मिलाएं और पितरों का ध्यान करते हुए तीन बार जल अर्पित करें। अब पके हुए चावल, काले तिल और घी मिलाकर एक पिंड बनाएं और फिर ब्राह्मणों को भोजन कराएं। इस दिन गाय, कुत्ते, देवता और चीटियों के लिए भोजन निकाला जाता है। वहीं श्राद्ध के दौरान हुई भूल-चूक के लिए पितरों से क्षमायाचना करें।</p><h2>दान विधि</h2><p>इस दिन दान करने का विशेष महत्व होता है। इस दिन श्राद्ध करने के बाद जरूरतमंद, गरीबों और मंदिर आदि में काले तिल, घी, अन्न और वस्त्र आदि का दान करना चाहिए। वहीं धार्मिक मान्यता है कि इन चीजों का दान करने से पितरों की कृपा और आशीर्वाद प्राप्त होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 10:21:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/sarvapitri-amavasya-marks-end-of-pitru-paksha-with-shradh-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-2026-complete-puja-samagri-list-and-ghatasthapana-vidhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में नवरात्रि पर्व का विशेष महत्व है। इस बार 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो रही है और इसका समापन 19 अक्टूबर 2026 को होगा। नौ दिनों तक मां दुर्गा के 9 स्वरुपों की पूजा विधिवत रुप से की जाएगी।</p><p>नवरात्रि के पहले दिन घटस्थापना के साथ पूजा की शुरुआत होती है। नवरात्र में भक्तजन अपने पूजा स्थल को सजाकर माता रानी की प्रतिमा स्थापित करते हैं और कलश पूजन किया जाता है।</p><p>ऐसे में कई घरों में परंपरा के अनुसार जौ बोए जाते हैं और पूरे नौ दिनों तक अखंड ज्योत भी प्रज्वलित की जाती है। आइए आपको बताते हैं नवरात्रि में मां दुर्गा की पूजा करने की तैयारी कैसे करें, जानें पूजन सामग्री, घटस्थापना और जौ बोने के लिए किन चीजों की आवश्यकता होती है।</p><p><strong>नवरात्रि पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट</strong></p><p>- मां दुर्गा की तस्वीर या प्रतिमा</p><p>- भगवान गणेश की प्रतिमा<br>-पूजा की चौकी और आसन<br>-चौकी पर बिछाने के लिए लाल कपड़ा<br>-कलावा या मौली<br>-फूल और फूलों की माला<br>-माता रानी के लिए लाल चुनरी<br>-श्रृंगार की सामग्री<br>-मौसमी फल और प्रसाद<br>-दुर्गा सप्तशती<br>-नारियल<br>-धूप और अगरबत्ती<br>-दीपक, रुई की बाती और घी<br>-आरती की थाली और घंटी<br>-पान के पत्ते और सुपारी<br>-कुमकुम और चंदन<br>-हल्दी और अक्षत<br>-जल रखने के लिए छोटा पात्र<br>-कपूर<br>-अष्टदल कमल<br>-हल्दी और कुमकुम से रंगे चावल<br>-घटस्थापना के लिए जरुरी सामग्री</p><p><strong>कलश स्थापना के लिए जरूरी सामग्री</strong></p><p>-मिट्टी या तांबे का कलश<br>-शुद्ध जल<br>एक सिक्का<br>-अक्षत यानी साबुत चावल<br>-नारियल<br>-आम के पत्ते<br>-दो साबुत सुपारी<br>-दो इलायची<br>-हल्दी की एक गांठ<br>-लाल कलावा या मौली<br>-दो साबुत लौंग<br>-नारियल पर बांधने के लिए छोटी लाल चुनरी<br>-नवरात्रि में जौ बोने के लिए सामग्री</p><p><strong>जौ बोने के लिए जरूरी वस्तुएं</strong></p><p>-मिट्टी का चौड़ा और बड़ा पात्र<br>-साफ मिट्टी<br>-जौ के दाने<br>-गेहूं के दाने, यदि परंपरा में शामिल हों<br>-पानी<br>-कलावा या मौली</p><p><strong>नवरात्रि में पूजा कैसे करें?</strong></p><p>- इस दिन सबसे पहले आप किसी मंदिर या किसी साफ स्थान पर पूजा की चौकी रखें। इस पर लाल कपड़ा बिछाएं और पूजा की सभी वस्तुओं को व्यवस्थित कर लें।</p><p>- अब चौकी पर अक्षत रखकर माता रानी की तस्वीर या प्रतिमा स्थापित करें। इसके साथ ही भगवान गणेश की प्रतिमा भी साथ ही स्थापित करें।</p><p>- इसके बाद कलश में शुद्ध जल भरें और परंपरा के अनुसार, इसमें सिक्का, अक्षत तथा अन्य निर्धारित सामग्री डाल दें। अब कलश के मुख पर आम के पत्ते लगाएं और ऊपर लाल चुनरी से सजा नारियल रखें। घटस्थापना के लिए अपने क्षेत्र की मान्य परंपरा और पंचांग में बताए गए नियमों का जरुर पालन करें।</p><p>- अगर आपके घर में जौ बोने की परंपरा है, तो मिट्टी के पात्र में साफी मिट्टी भरकर जौ के दाने डाल दें। अब इसमें थोड़ा पानी छिड़कें और पात्र को पूजा स्थल के पास ही रख दें।</p><p>- इसके बाद घी का दीपक जलाएं। अगर आप अखंड ज्योति जलाना चाहते हैं, तो उसे सुरक्षित स्थान पर रखें और पूरे समय अग्नि सुरक्षा का ध्यान रखें। अब आरती के लिए अलग से दीपक भी जलाएं।</p><p>- अब आप भगवान गणेश, मां दुर्गा, कलश और दीपक पर परंपरा के अनुसार हल्दी, कुमकुम और अक्षत अर्पित करें। जिसके बाद फूल, माला और माता रानी को चुनरी और श्रृंगार की सामग्री अर्पित है।</p><p>- इसके बाद मां दुर्गा को श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार फल, मिश्री, बताशे या अन्य सात्विक प्रसाद अर्पित कर सकते हैं।</p><p>- पूजा के समय मां दुर्गा के मंत्रों का जाप करें और दुर्गा सप्तशती का पाठ करें। आखिर में विधिवत रुप से माता रानी की आरती करें और परिवार की सुख-शांति के लिए प्रार्थना करें।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 17:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-2026-complete-puja-samagri-list-and-ghatasthapana-vidhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Shiva और मां पार्वती की कृपा के लिए Guru Pradosh Vrat पर करें विशेष मंत्र जाप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-shiva-worshipped-with-mantras-on-auspicious-guru-pradosh-vrat]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 08 अक्तूबर 2026 को गुरु प्रदोष व्रत किया जा रहा है। हिंदू पंचांग क मुताबिक हर साल आश्विन माह की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत किया जाता है। हिंदू धर्म मं इस व्रत का विशेष महत्व होता है। हर महीन में दो बार प्रदोष व्रत किया जाता है। जिसमें से एक कृष्ण और दूसरा शुक्ल पक्ष में त्रयोदशी तिथि को प्रदोष व्रत रखा जाता है। गुरुवार के दिन यह व्रत पड़ने की वजह से इसको गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है। इस दिन भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। तो आइए जानते हैं कि गुरु प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त, पूजा विधि और मंत्र आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 07 अक्तूबर 2026 की रात 11:16 मिनट पर आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 08 अक्तूबर की रात 10:15 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के मुताबिक 08 अक्तूबर 2026 को गुरु प्रदोष व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि करके साफ-सुथरे कपड़े पहनें और फिर भोलनाथ और मां पार्वती का ध्यान करते हुए व्रत और पूजा का संकल्प लें। फिर शाम को प्रदोष काल के समय शिवलिंग पर गंगाजल और शुद्ध जल से अभिषेक करें। शिवलिंग पर दूध, दही, शहद, घी से अभिषेक करें। फिर शिवलिंग पर धतूरा, बेलपत्र, फूल, अक्षत और चंदन आदि अर्पित करें। पूजा के दौरान लगातार 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप करें। फिर पूजा के अंत में प्रदोष व्रत कथा, शिव चालीसा और आरती करें। इसके बाद पूजा में हुई भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><h2>गुरु प्रदोष व्रत मंत्र</h2><h2>महामृत्युंजय मंत्र</h2><p>ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।<br>उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥</p><h2>शिव जी का मूल मंत्र</h2><p>ऊँ नम: शिवाय।।</p><h2>महादेव के प्रभावशाली मंत्र</h2><p>ओम साधो जातये नम:।। ओम वाम देवाय नम:।।<br>ओम अघोराय नम:।। ओम तत्पुरूषाय नम:।।<br>ओम ईशानाय नम:।। ॐ ह्रीं ह्रौं नमः शिवाय।।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 08 Oct 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-shiva-worshipped-with-mantras-on-auspicious-guru-pradosh-vrat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jitiya Vrat 2026 पर माताओं ने रखा Nirjala उपवास, शाम को Pradosh Kaal में ऐसे करें पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/jitiya-vrat-2026-begins-with-mothers-observing-nirjala-fast]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 03 अक्टूबर को जितिया यानी जीवित्पुत्रिका व्रत किया जा रहा है। जीवित्पुत्रिका व्रत संतान की लंबी उम्र, अच्छी सेहत और सुखी जीवन की कामना के साथ किया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस दिन माताएं निर्जला व्रत करती हैं और भगवान जीमूतवाहन की पूजा-अर्चना करती हैं। मुख्य रूप से यह व्रत बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और आसपास के राज्यों में बेहद श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया जाता है। तो आइए जानते हैं जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को जितिया व्रत किया जाता है। इस बार 03 अक्टूबर की सुबह 07:59 मिनट पर अष्टमी तिथि शुरू हुई है। वहीं अगले दिन यानी की 04 अक्टूबर की सुबह 05:51 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि और प्रदोष काल के हिसाब से 03 अक्टूबर 2026 को जितिया व्रत किया जा रहा है।</p><p>इससे पहले 02 अक्टूबर 2026 को नहाय-खाय की परंपरा पूरी की गई। आज यानी की 03 अक्टूबर को माताएं निर्जल व्रत करेंगी और भगवान जीमूतवाहन की पूजा करेंगी। फिर 04 अक्टूबर को व्रत का पारण किए जाएगा।</p><h2>पूजा का शुभ समय और विधि</h2><p>इस व्रत में मुख्य पूजा शाम के समय यानी प्रदोष काल में भगवान जीमूतवाहन की पूजा करने की परंपरा है। आज शाम करीब 06:05 मिनट से लेकर 08:29 मिनट तक पूजा का शुभ मुहूर्त है। इस दौरान महिलाएं घर के आंगन में छोटा सा पोखर बनाकर उसमें जीमूतवाहन की पूजा करती हैं। फिर जितिया व्रत कथा का पाठ किया जाता है और आरती की जाती है।</p><h2>भगवान जीमूतवाहन की पूजा</h2><p>जितिया व्रत में राजा जीमूतवाहन की कथा सुनने का विशेष महत्व होता है। धार्मिक कथा के मुताबिक नागवंश की रक्षा के लिए जीमूतवाहन ने अपने प्राणों का त्याग करने का संकल्प लिया था। उनकी करुणा और त्याग से जुड़ी इस कथा को जितिया व्रत की धार्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है। इस दौरान महिलाएं पूजा और कथा करती हैं और अपनी संतान की लंबी उम्र व सुखी जीवन की कामना करती हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 10:12:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/jitiya-vrat-2026-begins-with-mothers-observing-nirjala-fast</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Mahalakshmi Vrat का समापन आज, Kalash Visarjan Muhurat और पूजा की पूरी विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/kalash-visarjan-procedure-and-sacred-thread-rules-for-mahalakshmi-vrat]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 03 अक्टूबर को 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति हो रही है। इस व्रत की शुरूआत 19 सितंबर 2026 से हुई थी। यह मां लक्ष्मी की कृपा दिलाने वाला महालक्ष्मी व्रत बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक इस व्रत का उद्यापन करना जरूरी होता है। व्रत की समाप्ति के समय कलश विसर्जन का भी शास्त्रों में महत्व बताया गया है। तो आइए जानते हैं महालक्ष्मी व्रत का मुहूर्त और उद्यापन विधि के बारे में...</p><h2>कलश विसर्जन का मुहूर्त</h2><p>इस बार आज यानी की 03 अक्टूबर को महालक्ष्मी व्रत की समाप्ति हो रही है। इस दिन प्रातःकाल मुहूर्त सुबह 06:15 मिनट से लेकर 10:45 मिनट तक है। वहीं अभिजी मुहूर्त दोपहर 11:48 मिनट से लेकर 12:35 मिनट तक है।</p><h2>ऐसे करें महालक्ष्मी व्रत का उद्यापन</h2><p>इस दिन सबसे पहले जल्दी उठकर स्नान आदि करें और साफ कपड़े पहनें। फिर घर में मंदिर में ईशान कोण में लकड़ी की चौकी रखें और उस पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं। फिर मां महालक्ष्मी की तस्वीर या फिर गजलक्ष्मी स्वरूप की प्रतिमा को स्थापित करें।</p><p>चौकी पर चावल की ढेरी बनाएं और उस पर जल से भरा कलश स्थापित करें। फिर कलश पर आम के पत्ते और नारियल रखें। अब मां लक्ष्मी की विधिविधान से पूजा करें। वहीं अगर आपने पहले ही कलश स्थापनी की हुई है, तो फिर इस प्रक्रिया को न दोहराएं।</p><p>अब व्रत के पहले दिन बांधा गया 16 गांठों वाला पवित्र धागा मां महालक्ष्मी के सामने अर्पित करें औऱ उस पर रोली और अक्षत चढ़ाएं। फिर मां महालक्ष्मी को कमल का फूल, 16 श्रृंगार की सामग्री और लाल वस्त्र अर्पित करें। भोग में फल, खीर और पूड़ी चढ़ाएं।</p><p>महालक्ष्मी व्रत के उद्यापन के दिन हवन करने की परंपरा है। हवन के समय 'ऊँ महालक्ष्म्यै नम:' मंत्र का जाप करते हुए हवन में 108 आहुति दें। अंत में खीर और पूरियों की आहुति दें। फिर 16 घी के दीपक जलाएं और मां महालक्ष्मी और भगवान गणेश की आरती करें। साथ ही पूजा में होने वाली भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p><p>उद्यापन के दिन 16 कन्याओं या 16 सुहागिन महिलाओं को भोजन कराएं और सामर्थ्य के हिसाब से श्रृंगार सामग्री, वस्त्र, फल और दक्षिणा आदि देकर विदा करें।</p><h2>ऐसे करें कलश विसर्जन</h2><p>व्रत के आखिरी दिन मां महालक्ष्मी की विधिविधान से पूजा करें। फिर कलश पर हाथ रखकर भगवान वरुण देव और पूजा में आमंत्रित सभी देवी-देवताओं से सम्मानपूर्वक विदाई के लिए प्रार्थना करें।</p><p>अब कलश के जल को आम के पत्तों से पूरे घर में छिड़कें और बचे हुए जल को तुलसी के पौधे में डाल दें।</p><p>अब कलश पर रखा नारियल प्रसाद के रूप में परिवार के सदस्यों में बाटें और पूजन सामग्री का विसर्जन कर दें।</p><h2>16 गांठ वाला डोरा</h2><p>इस व्रत में 16 गांठ वाले डोरे का विशेष महत्व माना जाता है। पूजा पूरी होने के बाद इस डोरे को फेंकने की जगह पर तिजोरी या पूजा स्थान पर रखें।</p><p>अगर डोरा पुराना हो जाए या रखने योग्य नहीं है, तो इसको किसी पवित्र स्थान पर रखें या फिर बहते जल में प्रवाहित कर दें।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 09:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/kalash-visarjan-procedure-and-sacred-thread-rules-for-mahalakshmi-vrat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Vighnaraj Sankashti Chaturthi पर बना Angarki योग, गणेश पूजन का शुभ मुहूर्त और विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/vighnaraj-sankashti-chaturthi-date-shubh-muhurat-and-puja-vidhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी मनाई जा रही है। यह पर्व भगवान गणेश को समर्पित है। मंगलवार को यह पर्व पड़ने से इसको अंगारकी संकष्टी चतुर्थी भी कहा जाएगा। इस दिन भगवान गणेश की पूजा का विधान है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन जो भी जातक श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करता है, उसके जीवन में आने वाले सभी संकट और कष्ट दूर होते हैं और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व आदि के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 29 सितंबर की शाम 05:09 मिनट से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि की शुरूआत होगी। वहीं अगले दिन यानी की 30 सितंबर की दोपहर 02:55 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के हिसाब से 29 सितंबर 2026 को विघ्नराज संकष्टी चतुर्थी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें और फिर सूर्य देव को अर्घ्य दें। अब व्रत का संकल्प लें और फिर पूजा स्थल की साफ-सफाई करें। इसके बाद एक लकड़ी की चौकी पर पीला या लाल कपड़ा बिछाएं और उस पर गणपति की प्रतिमा को स्थापित करें। अब बप्पा को जल, दूर्वा, फूल, रोली, अक्षत और फल आदि अर्पित करें। इसके बाद मोदक और उनका प्रिय भोग चढ़ाएं। फिर गणेश मंत्र का जाप करें और गणेश चालीसा या गणेश स्त्रोत का पाठ करें। फिर शाम को विधिविधान से भगवान गणेश की पूजा करें। इसके बाद चंद्र दर्शन करें और चंद्र देव को अर्घ्य दें और फिर व्रत खोलें।</p><h2>महत्व</h2><p>भगवान गणेश को विघ्नहर्ता कहा जाता है। यही कारण है कि इस व्रत का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन बप्पा की पूजा-अर्चना करने से बाधाएं दूर होती हैं। संकष्टी चतुर्थी के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से संकटों से मुक्ति मिलती है और जीवन में सुख-समृ्द्धि और सौभाग्य का आगमन होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 29 Sep 2026 09:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/vighnaraj-sankashti-chaturthi-date-shubh-muhurat-and-puja-vidhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pitru Paksha 2026: पितरों के आशीर्वाद के लिए दक्षिण दिशा में करें श्राद्ध, कुशा और काले तिल का प्रयोग अनिवार्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/shradh-karma-rules-for-pitru-paksha-offerings-and-tarpan-timing]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 27 सितंबर 2026 से पितृपक्ष की शुरूआत हो रही है। इस दौरान पितरों को तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक पितृपक्ष के दौरान पूर्वज पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण ग्रहण कर उनपर कृपा बरसाते हैं। पितरों की आत्मशांति और उनका आशीर्वाद पाने के लिए विधिविधान से श्राद्ध कर्म किया जाता है। इस दौरान पूरे 15 दिनों तक कई नियमों का पालन भी किया जाता है। माना जाता है कि यह समय अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का होता है।</p><h2>पितृपक्ष 2026</h2><p>26 सितंबर - पूर्णिमा श्राद्ध</p><p>27 सितंबर - प्रतिपदा श्राद्ध</p><p>28 सितंबर - द्वितीया श्राद्ध</p><p>29 सितंबर - तृतीया श्राद्ध</p><p>30 सितंबर - चतुर्थी और पंचमी श्राद्ध</p><p>01 अक्तूबर - षष्ठी श्राद्ध</p><p>02 अक्तूबर - सप्तमी श्राद्ध</p><p>03 अक्तूबर - अष्टमी श्राद्ध</p><p>04 अक्तूबर - नवमी श्राद्ध</p><p>05 अक्तूबर - दशमी श्राद्ध</p><p>06 अक्तूबर - एकादशी श्राद्ध</p><p>07 अक्तूबर - द्वादशी श्राद्ध</p><p>08 अक्तूबर - त्रयोदशी श्राद्ध</p><p>09 अक्तूबर - चतुर्दशी श्राद्ध</p><p>10 अक्तूबर - सर्वपितृ श्राद्ध</p><h2>श्राद्ध करने का समय और जगह</h2><p>श्राद्ध या तर्पण हमेशा दोपहर के समय करना चाहिए। कभी भी सूर्यास्त के बाद यह कर्म नहीं करना चाहिए। पूजा के समय अपना मुंह हमेशा दक्षिण दिशा की ओर रखना चाहिए। इससे पितरों की दिशा माना जाता है। वहीं ध्यान रहे कि हमेशा श्रद्धा जमीन, किसी मंदिर या पवित्र नदी के किनारे ही करना चाहिए।</p><p>वहीं किसी दूसरे के घर पर श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। तर्पण के दौरान कुशा और काले तिल का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है।</p><h2>ब्राह्मण भोज और पंचबली का महत्व</h2><p>श्राद्ध वाले दिन कम से कम 3 ब्राह्मणों को घर पर बुलाकर पूरे सम्मान के साथ सात्विक भोजन कराना चाहिए। उनको दान-दक्षिणा देकर विदा करना चाहिए। क्योंकि बिना दान के श्राद्ध अधूरा माना जाता है। इसके साथ ही भोजन का एक हिस्सा गाय, देवताओं, कौवे, कुत्ते और चींटियों के लिए जरूर निकालें। इसको पंचबली कहा जाता है, जोकि पितरों तक खाना पहुंचाने का जरिया माना जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sun, 27 Sep 2026 08:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/shradh-karma-rules-for-pitru-paksha-offerings-and-tarpan-timing</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pitru Paksha में Purnima Shraddh पर तर्पण और Panchabali की पूरी विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/purnima-shraddh-rituals-and-significance-during-pitru-paksha]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में पितृपक्ष में पूर्वजों को याद किया जाता है और उनके प्रति श्रद्धा अर्पित की जाती है। इस दौरान लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान जैसे धार्मिक काम करते हैं। इस बार 26 सितंबर 2026, शनिवार को भाद्रपद पूर्णिमा का श्राद्ध किया जाएगा। वहीं इसके अगले दिन यानी की 27 सितंबर को आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि शुरू होगी। इस तिथि से मुख्य रूप से पितृपक्ष की शुरूआत मानी जाती है।</p><h2>पूर्णिमा श्राद्ध</h2><p>आज यानी की 26 सितंबर 2026 को पूर्णिमा श्राद्ध है, इस दिन उन पूर्वजों का याद किया जाता है और श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को होती है। अगर घर-परिवार में किसी व्यक्ति की मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी, तो पितृपक्ष में पूर्णिमा श्राद्ध की तिथि पर श्राद्ध किया जाता है। मुख्य पितृपक्ष से पहले आने वाली पूर्णिमा श्राद्ध को महत्वपूर्ण तिथि माना जाता है।</p><h2>पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध में फर्क</h2><p>पूर्णिमा श्राद्ध और प्रतिपदा श्राद्ध के बीच मुख्य अंतर तिथि का है। 26 सितंबर को पूर्णिमा श्राद्ध उन पूर्वजों का किया जाता है, जिनकी मृत्यु पूर्णिमा तिथि को हुई थी। वहीं 27 सितंबर को प्रतिपदा श्राद्ध में उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा तिथि को हुई थी।</p><h2>जानें पूर्णिमा श्राद्ध की विधि</h2><p>इस दिन सुबह उठकर स्नान करें और फिर साफ सफेद कपड़े पहनें। इसके बाद रौहिणी या कुतुप मुहूर्त में दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके बैठें। अब दाहिने हाथ की अनामिका उंगली में कुश की पवित्री पहनें। अब तांबे या कांसे के बर्तन में कच्चा दूध, शुद्ध जल, काले तिल, सफेद फूल और अक्षत मिलाएं। दोनों हाथों में कुश रखें और जल लेकर 'ॐ पितृभ्यः नमः' बोलते हुए अपने गोत्र का नाम लें। फिर अंगूठे के सहारे से जल को किसी बर्तन में गिराएं।</p><p>तर्पण के बाद प्याज-लहसुन के बिना बनाए गए खाने को छोटे-छोटे हिस्सों में कुत्ते, कौवे, गाय, चींटी और देवता के लिए अलग-अलग रखें। इसको पंचबलि भी कहा जाता है। वहीं संभव हो तो ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। वहीं मंदिर या जरूरतमंद को आटा, चावल, सब्जी और फल आदि का दान दें। वहीं श्राद्ध कर्म के अंत में अगस्त्य ऋषि सहित अपने पूर्वजों से प्रार्थना करें और भूलचूक के लिए क्षमायाचना करें।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 26 Sep 2026 10:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/purnima-shraddh-rituals-and-significance-during-pitru-paksha</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Anant Chaturdashi पर घर में Ganesh Visarjan करते समय अपनाएं यह सही विधि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-visarjan-rituals-and-shubh-muhurat-on-anant-chaturdashi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को 10 दिनों तक चलने वाले गणेश उत्सव का समापन हो रहा है। इस दिन गणपति विसर्जन किया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु और भदगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। इससे व्यक्ति के जीवन में सुख-समृद्धि और खुशहाली बनी रहती है। इस दिन देशभर में गणेश विसर्जन को लेकर विशेष तैयारी और रौनक देखने को मिलती है। ऐसे में अगर आप भी अनंत चतुर्दशी पर गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन करने के लिए जा रहे हैं। तो आइए जानते हैं इस दिन कि तिथि, मुहूर्त, महत्व और कुछ जरूरी नियमों के बारे में...</p><h2>विसर्जन विधि और पाथेय की परंपरा</h2><p>विसर्जन वाले दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर बप्पा की विधिविधान से पूजा करें और उनको फूल, माला, अक्षत, सिंदूर और मोदक अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाकर भगवान गणेश की आरती उतारें।</p><p>वहीं ध्यान रखें कि गणपति को विदा करने से पहले उनको एक पोटली बांधकर जरूर दें। इस पोटली को पाथेय कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि बप्पा को देवलोक लौटते समय रास्ते में भोजन के लिए यह पोटली दी जाती है। इसके लिए पीले या लाल कपड़े में थोड़ा सा दूर्वा, अक्षत, सिक्का, मोदक, सुपारी और फल बांधकर गणपति के साथ रखें।</p><h2>ऐसे करें विसर्जन</h2><p>अगर आप घर पर विसर्जन कर रहे हैं, तो साफ पात्र में जल भरें और इसमें थोड़ा सा गंगाजल मिलाएं। अब हाथ में पुष्प लेकर पवित्र नदियों का स्मरण करें और फूल को जल में अर्पित करें। फिर श्रद्धापूर्वक बप्पा की प्रतिमा को जल में विसर्जित करें। इस दौरान बप्पा के मंत्र का जाप करें और 'गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ' का उद्घोष करें। फिर प्रतिमा को पूरी तरह से जल में समर्पित करें। आप बाद में उस जल को दुर्वा या कोई पवित्र पौधे में डाला जा सकता है।</p><h2>महत्व</h2><p>भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से शुरू हुआ गणेश उत्सव का पर्व अनंत चतुर्दशी को समाप्त होता है। इस दिन भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना के अलावा गणपति विसर्जन किया जाता है। इस बात अनंत चतु्र्दशी के मौके पर कई शुभ और दुर्लभ योग बन रहे हैं, जिससे बप्पा की पूजा और विसर्जन से भक्तों को कई गुना शुभ फल प्राप्त होंगे।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 10:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/ganesh-visarjan-rituals-and-shubh-muhurat-on-anant-chaturdashi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Bhadrapada Anant Chaturdashi पर करें Lakshmi Narayan पूजन, इस विधि से मिलेगा व्रत का फल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-worship-on-anant-chaturdashi-with-fourteen-knot-thread]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज यानी की 25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी का पर्व मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान श्रीहरि विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा-अर्चना होती है और इसी के साथ 10 दिनों तक चलने वाले गणेश उत्सव पर गणेश जी की प्रतिमा का विसर्जन होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा-अर्चना करने और विशेष उपायों को करने से जीवन में सुख-समृद्धि आती है। इस दिन पूजा के दौरान अनंत सूत्र बांधने की भी परंपरा है। तो आइए जानते हैं अनंत चतुर्दशी की तिथि, मुहूर्त, पूजन विधि और महत्व के बारे में...</p><h2>तिथि और मुहूर्त</h2><p>वैदिक पंचांग के मुताबिक 24 सितंबर 2026 की रात 11:18 मिनट से भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि की शुरूआत हुई है। वहीं आज यानी की 25 सितंबर 2026 की रात 11:06 मिनट पर इस तिथि की समाप्ति होगी। ऐसे में उदयातिथि के आधार पर 25 सितंबर को अनंत चतुर्दशी का व्रत किया जा रहा है।</p><h2>पूजन विधि</h2><p>इस दिन सुबह जल्दी स्नान आदि करने के बाद साफ कपड़े पहनें। फिर सू्र्य देव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु का मन में स्मरण करते हुए व्रत का संकल्प लें। इसके बाद पूजा स्थल की सफाई करें और गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। फिर एक लकड़ी की चौकी पर लाल या पीला कपड़ा बिछाएं और कलश स्थापित करें। चौकी पर लक्ष्मी-नारायण की प्रतिमा को स्थापित करें। कलश पर अष्टदल और फूल आदि अर्पित करें और फिर विधि-विधान से भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की पूजा करें।</p><h2>14 गांठों वाला अनंत सूत्र</h2><p>अनंत चतुर्दशी की पूजा में अनंत सूत्र का खास महत्व माना जाता है। इसके लिए सूती, कुशा या रेशमी सूत्र लेकर इसमें हल्की और कुमकुम लगाएं, फिर इस सूत्र में 14 गांठें लगाएं। अब इस सूत्र को भगवान श्रीहरि को अर्पित करें। फिर धूप-दीप जलाएं और भगवान विष्णु को भोग लगाएं। इसके बाद अनंत चतुर्दशी व्रत कथा का पाठ करें। पूजा के दौरान 'अनंत संसार महासुमद्रे मग्रं समभ्युद्धर वासुदेव, अनंतरूपे विनियोजयस्व ह्रानंतसूत्राय नमो नमस्ते' मंत्र का जाप करें।</p><p>इसके बाद महिलाओं बाएं हाथ में और पुरुष दाहिने हाथ में अनंत सूत्र बांधें। पूजा आदि होने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराएं और यथासंभव दान दें। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन पूजा और व्रत करने से जीवन में सुख-शांति और समृद्धि का आगमन होता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 09:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/festivals/lord-vishnu-worship-on-anant-chaturdashi-with-fourteen-knot-thread</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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