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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Russia-Ukraine War में पलट गया खेल, Putin के गढ़ में घुसकर हमले कर रहा Ukraine, दुनिया हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/russia-oil-refinery-crisis-ukraine-attacks]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध ने अब ऐसा मोड़ ले लिया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। यूक्रेन ने न केवल रूस के सीमावर्ती इलाकों बल्कि राजधानी मॉस्को के भीतर तक अपनी पहुंच साबित कर दी है। जिस क्रेमलिन से राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन पूरे रूस का शासन चलाते हैं, उसके आसपास तक ड्रोन हमलों की गूंज सुनाई देने लगी है। साथ ही मॉस्को पर हुए बड़े ड्रोन हमले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि युद्ध अब केवल मोर्चों पर नहीं बल्कि रूस के दिल तक पहुंच चुका है।</div><div><br></div><h2>राजधानी बचाने उतरा रूस</h2><div><br></div><div>रूसी अधिकारियों के अनुसार यूक्रेन की ओर से भेजे गए उनसठ ड्रोन राजधानी की तरफ बढ़ रहे थे जिन्हें रूसी वायु रक्षा प्रणाली ने मार गिराया। हालात इतने गंभीर हो गए कि मॉस्को के चारों प्रमुख हवाई अड्डों को अस्थायी रूप से बंद करना पड़ा। विमानन विभाग ने कहा कि यात्रियों और उड़ानों की सुरक्षा के लिए यह कदम जरूरी था। राजधानी के लोगों ने रातभर धमाकों की आवाजें सुनीं और कई इलाकों में भय का माहौल बन गया। रूस के लिए यह केवल सुरक्षा चुनौती नहीं बल्कि प्रतिष्ठा का भी बड़ा झटका माना जा रहा है, क्योंकि यूक्रेन अब सीधे उस सत्ता केंद्र तक खतरा पैदा कर रहा है जहां से पुतिन युद्ध संचालन कर रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/modi-putin-brahmos-hypersonic-missile-india-russia-defence-news" target="_blank">Vishwakhabram: BrahMos का नया अवतार मचाएगा पूरी दुनिया में धमाल, भारत ने बूस्टर के बाद स्वदेशी वॉरहेड भी बना लिया</a></h3><h2>हमले बढ़ा रहा यूक्रेन</h2><div><br></div><div>यूक्रेन ने हाल के महीनों में रूस की ऊर्जा व्यवस्था को भी निशाना बनाया है। मॉस्को और अन्य शहरों की तेल रिफाइनरियों पर लगातार हमले किए गए हैं। यूक्रेनी ड्रोन हमलों के कारण कई तेल संयंत्रों का कामकाज प्रभावित हुआ और कुछ स्थानों पर ईंधन आपूर्ति बाधित हो गई। अमेरिकी ऊर्जा अनुसंधान संस्थाओं के अनुसार रूस की लगभग एक तिहाई तेल शोधन क्षमता पर असर पड़ा है। रूस जैसे बड़े ऊर्जा उत्पादक देश में पेट्रोल की कमी दिखाई देना अपने आप में असाधारण स्थिति मानी जा रही है। कुछ इलाकों में पेट्रोल की बिक्री सीमित करनी पड़ी जबकि ईंधन निर्यात पहले ही रोका जा चुका है।</div><div><br></div><div>सबसे गंभीर स्थिति रूस के कब्जे वाले क्रीमिया क्षेत्र में दिखाई दे रही है। यूक्रेनी ड्रोन हमलों में कर्च शहर के तेल भंडार और क्रास्नोदार क्षेत्र के ईंधन परिवहन केंद्रों को निशाना बनाया गया। इन हमलों में कई लोगों की मौत और दर्जनों के घायल होने की खबर है। क्रीमिया प्रशासन ने आम नागरिकों को पेट्रोल बिक्री रोक दी है और केवल सरकारी सेवाओं को ही ईंधन उपलब्ध कराया जा रहा है। सोशल मीडिया पर लोग पेट्रोल के लिए परेशान नजर आ रहे हैं जबकि कुछ लोग बाजार कीमत से दोगुने दाम पर ईंधन बेचते दिखे।</div><div><br></div><div>उधर, यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की ने इन कार्रवाइयों को रूस की ऊर्जा व्यवस्था के खिलाफ लंबी दूरी की रणनीतिक कार्रवाई बताया। उनका कहना है कि रूस केवल ताकत की भाषा समझता है और यूक्रेन अब वही भाषा इस्तेमाल कर रहा है। यूक्रेन का दावा है कि इन हमलों का उद्देश्य रूस की युद्ध क्षमता को कमजोर करना है, क्योंकि तेल और ईंधन से होने वाली कमाई का इस्तेमाल रूस युद्ध संचालन में कर रहा है।</div><div><br></div><h2>पूर्वी यूक्रेन में रूस की बढ़त</h2><div><br></div><div>इसके अलावा, जहां एक ओर यूक्रेन रूस के भीतर गहरे हमले कर रहा है, वहीं दूसरी ओर पूर्वी यूक्रेन में रूस की सेना लगातार आगे बढ़ रही है। डोनबास क्षेत्र का महत्वपूर्ण शहर कोस्त्यांतिनिवका इस समय युद्ध का सबसे बड़ा केंद्र बना हुआ है। यूक्रेनी सैनिकों के अनुसार रूसी सैनिक शहर के भीतर तक घुस चुके हैं और अब उसे चारों तरफ से घेरने की कोशिश कर रहे हैं। यह शहर रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके बाद रूस के लिए क्रामातोर्स्क और स्लोवियांस्क जैसे प्रमुख शहरों तक पहुंच आसान हो जाएगी।</div><div><br></div><div>यूक्रेनी ड्रोन संचालकों का कहना है कि शहर अब लगभग धुंधले नियंत्रण क्षेत्र में बदल गया है जहां किसी एक पक्ष का पूरी तरह नियंत्रण नहीं है। रूसी सैनिक इमारतों और पेड़ों का सहारा लेकर धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे हैं। यूक्रेनी सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौती संसाधनों और सैनिकों की कमी है। कई सैनिकों ने स्वीकार किया कि उन्हें पर्याप्त सहायता नहीं मिल रही और रूसी सेना लगातार दबाव बना रही है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो रूस की रणनीति अब केवल सीधे हमले तक सीमित नहीं है। रूसी ड्रोन इकाइयां यूक्रेनी ड्रोन प्रक्षेपण स्थलों को नष्ट करने पर विशेष ध्यान दे रही हैं ताकि यूक्रेन की निगरानी और जवाबी कार्रवाई कमजोर हो सके। यूक्रेनी सैनिकों का कहना है कि यदि उन्होंने अपनी रणनीति नहीं बदली तो रूस धीरे-धीरे और इलाकों पर कब्जा करता जाएगा।</div><div><br></div><h2>यूक्रेन-पोलैंड के बीच विवाद बढ़ा</h2><div><br></div><div>उधर, युद्ध का असर केवल सैन्य मोर्चों तक सीमित नहीं है बल्कि राजनीतिक संबंधों पर भी दिखाई दे रहा है। पोलैंड और यूक्रेन के बीच दूसरे विश्व युद्ध से जुड़े ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। पोलैंड के राष्ट्रपति कारोळ नावरोत्स्की ने राष्ट्रपति जेलेंस्की से देश का सर्वोच्च सम्मान वापस ले लिया है। इसके विरोध में यूक्रेन के कई पूर्व राष्ट्रपतियों और वरिष्ठ नेताओं ने अपने पोलिश सम्मान लौटा दिए। दरअसल, विवाद उस यूक्रेनी सैन्य इकाई के नाम को लेकर है जिसे ऐसे राष्ट्रवादी संगठन के नाम पर रखा गया जिस पर दूसरे विश्व युद्ध के दौरान पोलिश नागरिकों के नरसंहार का आरोप है।</div><div><br></div><div>पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने इस टकराव को दोनों देशों के लिए खतरनाक बताया है। उनका कहना है कि ऐसे विवाद व्यापार, भू राजनीति और दोनों देशों की अंतरराष्ट्रीय छवि को नुकसान पहुंचाएंगे। वहीं जेलेंस्की ने कहा कि यूक्रेन और पोलैंड मित्र बने रहेंगे और दोनों देशों के बीच टकराव केवल रूस को फायदा पहुंचाएगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इन घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि रूस और यूक्रेन का युद्ध अब केवल सीमावर्ती संघर्ष नहीं रह गया है। यूक्रेन ने मॉस्को तक पहुंच कर रूस को चौंका दिया है, जबकि रूस पूर्वी यूक्रेन में अपने सैन्य अभियान को और तेज कर रहा है। ऊर्जा संकट, ड्रोन युद्ध, राजनीतिक तनाव और नागरिकों की बढ़ती परेशानियां इस संघर्ष को और अधिक जटिल बना रही हैं इसलिए अब केवल रूस और यूक्रेन ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया इस युद्ध के अंत का इंतजार कर रही है। हालांकि मौजूदा हालात देखकर ऐसा लगता है कि पुतिन और जेलेंस्की, दोनों ही पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। साथ ही दुनिया के कई देशों की युद्ध आधारित अर्थव्यवस्था और हथियार उद्योग भी इस संघर्ष को जल्दी खत्म होने देने के पक्ष में दिखाई नहीं देते। ऐसे में शांति की उम्मीद फिलहाल दूर ही नजर आ रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 13:22:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/russia-oil-refinery-crisis-ukraine-attacks</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आधुनिक संकटों का प्राचीन समाधान है योग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/yoga-is-the-ancient-solution-to-modern-crises]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया भर के 170 से भी ज्यादा देश प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं और योग को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाने का संकल्प लेते हैं। संयुक्त राष्ट्र ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के 69वें सत्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा रखे गए प्रस्ताव के जवाब में 11 दिसंबर 2014 को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस की स्थापना की थी और वैश्विक स्तर पर पहला अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया था। इस वर्ष पूरी दुनिया ‘स्वस्थ वृद्धावस्था के लिए योग’ थीम के साथ 12वां अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस मना रही है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का यह विषय जीवन के सभी चरणों में शारीरिक शक्ति, मानसिक अनुकूलता और समग्र कल्याण को बढ़ावा देने में योग की भूमिका का उल्लेख करता है। योग व्यक्तियों को स्वस्थ और अधिक संतुलित जीवन जीने के लिए प्रेरित करता रहता है, साथ ही आंतरिक शक्ति और जागरूकता को भी बढ़ावा देता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में भारतीय वायुसेना देशभर में योगाभ्यास का आयोजन करेगी, जिसमें उत्तर में लेह के ऊंचे पहाड़ों से लेकर दक्षिण में कार निकोबार के समुद्र तटों तक और पूर्वी सीमांत तवांग से लेकर पश्चिम में पवित्र शहर द्वारका तक के विविध भूभाग शामिल होंगे।</div><div><br></div><div>प्रतिवर्ष यह दिवस मनाने का उद्देश्य योग को एक ऐसे आंदोलन के रूप में बढ़ावा देना है, जो व्यक्ति की तन्यकता को उन्नत करता है और समाज के प्रत्येक व्यक्ति के लिए कल्याण को बढ़ावा देता है। वैसे तो योग को विश्व स्तर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सतत प्रयासों के चलते वर्ष 2015 में अपनाया गया था किंतु भारत में योग का इतिहास सदियों पुराना है। माना जाता रहा है कि पृथ्वी पर सभ्यता की शुरुआत से ही योग किया जा रहा है लेकिन साक्ष्यों की बात करें तो योग करीब पांच हजार वर्ष पुरानी भारतीय परंपरा है। करीब 2700 ईसा पूर्व वैदिक काल में और उसके बाद पतंजलि काल तक योग की मौजूदगी के ऐतिहासिक प्रमाण मिलते हैं। महर्षि पतंजलि ने अभ्यास तथा वैराग्य द्वारा मन की वृत्तियों पर नियंत्रण करने को ही योग बताया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/yoga-is-india-eternal-contribution-to-the-world" target="_blank">योग है दुनिया के लिए भारत का शाश्वत अवदान</a></h3><div>हिंदू धर्म शास्त्रों में भी योग का व्यापक उल्लेख मिलता है। विष्णु पुराण में कहा गया है कि जीवात्मा तथा परमात्मा का पूर्णतया मिलन ही अद्वेतानुभूति योग कहलाता है। इसी प्रकार भगवद्गीता बोध में वर्णित है कि दुःख-सुख, पाप-पुण्य, शत्रु-मित्र, शीत-उष्ण आदि द्वंदों से अतीतय मुक्त होकर सर्वत्र समभाव से व्यवहार करना ही योग है। भारत में योग को निरोगी रहने की करीब पांच हजार वर्ष पुरानी मानसिक, शारीरिक और आध्यात्मिक पद्धति के रूप में मान्यता प्राप्त है, जो भारतीयों की जीवनचर्या का अहम हिस्सा है। सही मायनों में योग भारत के पास प्रकृति प्रदत्त ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसका भारत सदियों से शारीरिक और मानसिक लाभ उठाता रहा है, लेकिन कालांतर में इस दुर्लभ धरोहर की अनदेखी का ही नतीजा है कि लोग तरह-तरह की बीमारियों के मकड़जाल में जकड़ते गए। वैसे तो स्वामी विवेकानंद ने भी अपने शिकागो सम्मेलन के भाषण में सम्पूर्ण विश्व को योग का संदेश दिया था लेकिन कुछ वर्षों पूर्व योग गुरु स्वामी रामदेव द्वारा योग विद्या को घर-घर तक पहुंचाने के बाद ही इसका व्यापक प्रचार-प्रसार संभव हो सका और आमजन योग की ओर आकर्षित होते गए। देखते ही देखते कई देशों में लोगों ने इसे अपनाना शुरू किया। साल 2023 में ही लगभग 190 देशों में योग दिवस के तहत 25 करोड़ से अधिक लोगों ने भाग लिया था।</div><div><br></div><div>आज की भागदौड़ भरी जीवनशैली में योग का महत्व कई गुना बढ़ गया है। योग न केवल कई गंभीर बीमारियों से छुटकारा दिलाने में मददगार साबित होता है बल्कि मानसिक तनाव को खत्म कर आत्मिक शांति भी प्रदान करता है। दरअसल यह एक ऐसी साधना, ऐसी दवा है, जो बिना किसी लागत के शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों का इलाज करने में सक्षम है। यह मस्तिष्क की सक्रियता बढ़ाकर दिनभर शरीर को ऊर्जावान बनाए रखता है। यही कारण है कि अब युवा एरोबिक्स व जिम छोड़कर योग अपनाने लगे हैं। माना गया है कि योग तथा प्राणायाम से जीवनभर दवाओं से भी ठीक न होने मधुमेह रोग का भी इलाज संभव है। यह वजन घटाने में भी सहायक माना गया है। योग की इन्हीं महत्ताओं को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा से आह्वान किया था कि दुनियाभर में प्रतिवर्ष योग दिवस मनाया जाए ताकि प्रकृति प्रदत्त भारत की इस अमूल्य पद्धति का लाभ पूरी दुनिया उठा सके। यह भारत के बेहद गर्व भरी उपलब्धि रही कि संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रधानमंत्री के इस प्रस्ताव के महज तीन माह के भीतर 177 देशों ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाए जाने के प्रस्ताव पर स्वीकृति की मोहर लगा दी, जिसके उपरांत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 11 दिसम्बर 2014 को घोषणा कर दी गई कि प्रतिवर्ष 21 जून का दिन दुनियाभर में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाया जाएगा।</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए 21 जून का ही दिन निर्धारित किए जाने की भी खास वजह रही। दरअसल यह दिन उत्तरी गोलार्ध का पूरे कैलेंडर वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है। इस दिन की तिथि को ग्रीष्म संक्रांति के साथ मेल खाने के लिए बनाया गया था, जो उत्तरी गोलार्ध में वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और प्रकाश और स्वास्थ्य का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति के नजरिये से देखें तो ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन हो जाता है तथा यह समय आध्यात्मिक सिद्धियां प्राप्त करने में लाभकारी माना गया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान भी योग के महत्व को स्वीकारने लगा है। इसलिए स्वस्थ जीवन जीने के लिए जरूरी है कि योग को अपनी दिनचर्या का अटूट हिस्सा बनाया जाए। योग केवल एक व्यायाम नहीं है बल्कि यह शरीर और मन के साथ-साथ स्वयं को सशक्त बनाने का एक बेहतरीन तरीका है। यह भारत की उस धरोहर का पुनर्जागरण है, जिसे आज पूरा विश्व अपनाकर अपने तन, मन और आत्मा को संतुलन में ला रहा है।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरन्तर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार तथा ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 14:01:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/yoga-is-the-ancient-solution-to-modern-crises</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिरी आदमी की सांसों में बसा कर्मयोद्धा नेता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-leader-and-karma-yoddha-who-lived-in-the-very-breath-of-the-last-person-in-line]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में कुछ व्यक्तित्व केवल राजनीतिक नेतृत्व तक सीमित नहीं रहते, वे एक युग का निर्माण करते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का नेतृत्व ऐसा ही एक युगबोध बनकर उभरा है। जून 2026 में उन्होंने स्वतंत्र भारत के इतिहास में लगातार सबसे लंबे समय तक निर्वाचित प्रधानमंत्री रहने का नया कीर्तिमान स्थापित किया। यह उपलब्धि केवल दिनों की संख्या का रिकॉर्ड नहीं है, बल्कि उस विश्वास, जनसमर्थन और विकास-यात्रा का प्रतीक है, जिसने भारत की राजनीति, अर्थव्यवस्था, शासन-प्रणाली और वैश्विक छवि को नई दिशा दी है। लोकतंत्र में किसी नेता की वास्तविक सफलता उसके पद की अवधि से नहीं, बल्कि उसके कार्यों के प्रभाव से मापी जाती है। यदि शासन की कसौटी अंतिम व्यक्ति तक विकास का लाभ पहुंचाना है, तो मोदी युग का सबसे बड़ा योगदान यही है कि उसने विकास को सरकारी फाइलों और घोषणाओं से निकालकर सामान्य नागरिक के जीवन तक पहुंचाया है। यह वही अवधारणा है जिसे पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने ‘अंत्योदय’ कहा था-समाज के अंतिम व्यक्ति का उदय।</div><div><br></div><div>स्वतंत्रता के बाद भारत ने लंबी विकास यात्रा तय की है। जवाहरलाल नेहरू ने नवस्वतंत्र भारत की संस्थागत नींव रखी। लोकतंत्र, वैज्ञानिक चिंतन, सार्वजनिक संस्थानों, शिक्षा, अनुसंधान तथा औद्योगिक विकास की आधारशिला उन्हीं के समय में रखी गई। किंतु समय के साथ यह भी स्पष्ट हुआ कि योजनाएं बनाना और उनका लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं। दशकों तक सरकारी योजनाओं और लाभार्थियों के बीच बिचौलियों की एक लंबी श्रृंखला खड़ी रही, जिसके कारण विकास का बड़ा हिस्सा रास्ते में ही समाप्त हो जाता था। वर्ष 2014 में जब नरेंद्र मोदी ने देश की बागडोर संभाली, तब भारत अनेक चुनौतियों से जूझ रहा था। आर्थिक सुस्ती, भ्रष्टाचार के आरोप, अधूरी परियोजनाएं, प्रशासनिक जड़ता और जनता में घटता विश्वास प्रमुख चिंताएं थीं। ऐसे समय में उन्होंने शासन की परंपरागत शैली को बदलते हुए तकनीक, पारदर्शिता और जवाबदेही को केंद्र में रखा। यह परिवर्तन केवल नीतियों का नहीं, बल्कि शासन के दर्शन का परिवर्तन था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/iran-us-war-gold-prices-india-wedding-season-jewellery-market-analysis" target="_blank">Wedding Season शुरू हो गया, Iran-US War खत्म हो गयी, क्या अब Gold Jewellery को खरीदना सही रहेगा?</a></h3><div>मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (डीबीटी) प्रणाली का विस्तार है। जनधन खाते, आधार और मोबाइल तकनीक को जोड़कर एक ऐसी व्यवस्था विकसित की गई, जिसने सरकारी सहायता को सीधे लाभार्थियों तक पहुंचाना संभव बनाया। इससे न केवल भ्रष्टाचार और रिसाव में कमी आई, बल्कि करोड़ों लोगों को पहली बार यह अनुभव हुआ कि सरकार वास्तव में उनके द्वार तक पहुंच सकती है। गरीब, किसान, महिला, छात्र, वृद्ध और श्रमिक-सभी वर्गों को इसका लाभ मिला। वित्तीय समावेशन की दिशा में जनधन योजना ने ऐतिहासिक भूमिका निभाई। जिन परिवारों के पास कभी बैंक खाता नहीं था, वे औपचारिक बैंकिंग प्रणाली का हिस्सा बने। यह केवल बैंक खाते खोलने की योजना नहीं थी, बल्कि आर्थिक सशक्तीकरण का एक नया अध्याय था। इसी प्रकार उज्ज्वला योजना ने करोड़ों महिलाओं को धुएं से भरे रसोईघरों से मुक्ति दिलाई। स्वच्छ ईंधन ने उनके स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की गुणवत्ता में सकारात्मक परिवर्तन किया।</div><div><br></div><div>मोदी युग की एक बड़ी पहचान आधारभूत संरचना का अभूतपूर्व विस्तार भी है। सड़कों, एक्सप्रेस-वे, रेलवे, मेट्रो, हवाई अड्डों, बंदरगाहों और डिजिटल नेटवर्क के क्षेत्र में जिस गति से कार्य हुआ, उसने विकास को नए पंख दिए। आज छोटे शहर भी हवाई संपर्क से जुड़ रहे हैं। गांवों तक सड़कें पहुंच रही हैं। रेलवे का तीव्र आधुनिकीकरण हो रहा है। वंदे भारत जैसी आधुनिक ट्रेनें भारत की तकनीकी क्षमता और आत्मविश्वास का प्रतीक बन गई हैं। आवास योजना के माध्यम से करोड़ों गरीब परिवारों को पक्के घर उपलब्ध कराए गए। जिन लोगों ने वर्षों तक कच्ची झोपड़ियों में जीवन बिताया, उनके लिए अपना घर केवल एक भवन नहीं, बल्कि सम्मान और सुरक्षा का प्रतीक है। इसी प्रकार जल जीवन मिशन ने करोड़ों घरों तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाने का कार्य किया। शौचालय निर्माण अभियान ने स्वच्छता को जनांदोलन का रूप दिया। ये परिवर्तन केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जीवन स्तर में दिखाई देते हैं।</div><div><br></div><div>कृषि क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिले हैं। इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम ने किसानों के लिए आय के नए अवसर खोले हैं। किसान केवल अन्नदाता ही नहीं, बल्कि ऊर्जादाता के रूप में भी उभर रहे हैं। जैव ईंधन, प्राकृतिक खेती, कृषि अवसंरचना और तकनीकी नवाचारों के माध्यम से कृषि को अधिक लाभकारी बनाने के प्रयास किए गए हैं। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा मिली है। डिजिटल इंडिया अभियान ने भारत को वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिलाई है। आज भारत का डिजिटल भुगतान मॉडल दुनिया के लिए अध्ययन का विषय बन गया है। यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने आर्थिक लेन-देन को सरल, तेज और पारदर्शी बनाया है। डिजिटल तकनीक का उपयोग केवल सुविधा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह सुशासन का महत्वपूर्ण माध्यम बन गया है। शिक्षा, स्वास्थ्य, बैंकिंग, व्यापार और प्रशासन-हर क्षेत्र में डिजिटल क्रांति का प्रभाव दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी भारत की प्रतिष्ठा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आज भारत केवल एक विकासशील राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक नेतृत्व की क्षमता वाले देश के रूप में देखा जा रहा है। जी-20 की सफल अध्यक्षता, अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रभावशाली उपस्थिति, वैश्विक संकटों में संतुलित भूमिका और विकासशील देशों की आवाज बनने का प्रयास भारत की बढ़ती शक्ति को दर्शाता है। इनदिनों के जी-7 शिखर सम्मेलन में सदस्य न होने पर भी मोदी का दबदबा होना- विदेश नीति में आत्मविश्वास और संतुलन के नये स्वर दृशाता है। मोदी युग की एक विशेषता यह भी है कि उसने राष्ट्रवाद को विकास से जोड़ा है। आत्मनिर्भर भारत का संकल्प केवल आर्थिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मविश्वास का अभियान है। रक्षा उत्पादन, अंतरिक्ष अनुसंधान, स्टार्टअप संस्कृति, नवाचार और विनिर्माण क्षेत्र में बढ़ती गतिविधियां इसी सोच का परिणाम हैं। भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता और नवप्रवर्तक बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास-ये केवल राजनीतिक नारे नहीं, बल्कि शासन के मार्गदर्शक सूत्र के रूप में स्थापित हुए हैं। इनका उद्देश्य विकास को समावेशी बनाना है, ताकि समाज का कोई वर्ग पीछे न रह जाए। यही कारण है कि विकास योजनाओं का केंद्र अब वही व्यक्ति है, जो कभी व्यवस्था के हाशिए पर खड़ा था। निस्संदेह, किसी भी लंबे शासनकाल की तरह मोदी सरकार की नीतियों और निर्णयों पर बहस और आलोचना भी होती रही है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक और आवश्यक है। किंतु यह भी सत्य है कि पिछले बारह वर्षों में शासन की कार्यशैली, विकास की गति और नागरिकों की अपेक्षाओं में एक व्यापक परिवर्तन दिखाई देता है। आज नागरिक केवल वादे नहीं सुनना चाहता, बल्कि परिणाम देखना चाहता है। यही लोकतांत्रिक परिपक्वता की पहचान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही है कि उन्होंने शासन को एक जनांदोलन का स्वरूप देने का प्रयास किया है। वे स्वयं को शासक नहीं, बल्कि ‘प्रधान सेवक’ के रूप में प्रस्तुत करते हैं। उनकी कार्यशैली में निरंतरता, परिश्रम, लक्ष्य के प्रति समर्पण और राष्ट्र को सर्वोपरि रखने का भाव दिखाई देता है। यही कारण है कि वे देश के सबसे लोकप्रिय नेताओं में गिने जाते हैं और विश्व मंच पर भी एक प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में स्थापित हुए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण का संकल्प केवल आर्थिक समृद्धि का लक्ष्य नहीं है। यह एक ऐसे भारत की परिकल्पना है जो आत्मनिर्भर, समावेशी, तकनीकी रूप से उन्नत, सांस्कृतिक रूप से आत्मविश्वासी और सामाजिक रूप से संवेदनशील हो। इस दिशा में मोदी युग ने अनेक आधारभूत परिवर्तन किए हैं, जिनका प्रभाव आने वाले दशकों में और अधिक स्पष्ट होगा। आज जब भारत अमृतकाल की यात्रा पर अग्रसर है, तब यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र मोदी का योगदान केवल योजनाओं और परियोजनाओं तक सीमित नहीं है। उन्होंने करोड़ों भारतीयों में यह विश्वास जगाया है कि परिवर्तन संभव है, विकास सबका अधिकार है और राष्ट्र की प्रगति में प्रत्येक नागरिक की भागीदारी आवश्यक है। अंत्योदय से विकसित भारत तक की यह यात्रा उसी विश्वास, संकल्प और कर्मयोग की कहानी है, जिसने आधुनिक भारत के निर्माण को नई गति और नई दिशा प्रदान की है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 18:37:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-leader-and-karma-yoddha-who-lived-in-the-very-breath-of-the-last-person-in-line</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[फ्रांस में हुई ट्रंप-मोदी की बहुप्रतीक्षित मुलाकात के वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/global-diplomatic-implications-of-the-highly-anticipated-meeting-between-trump-and-modi-in-france]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जब दुनिया के दो बड़े लोकतांत्रिक देशों के मशहूर राष्ट्राध्यक्ष मिलते हैं तो दुनियावी जनकल्याण की बातें अवश्य छिड़ती हैं। हाल ही में जब फ्रांस में भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi और अमेरिका के राष्ट्रपति Donald Trump की मुलाकात हुई तो इसे केवल द्विपक्षीय शिष्टाचार भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके व्यापक राजनीतिक, सामरिक और कूटनीतिक संकेत मिले हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, Narendra Modi और Donald Trump के बीच हालिया मुलाकात को कई विश्लेषक केवल औपचारिक कूटनीतिक संवाद नहीं, बल्कि व्यक्तिगत समीकरणों को पुनर्जीवित करने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि यह कहना जल्दबाजी होगी कि दोनों के रिश्तों पर जमी पूरी "बर्फ" पिघल गई है, लेकिन यह स्पष्ट है कि दोनों नेताओं ने सार्वजनिक रूप से सकारात्मक संकेत देने का प्रयास किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/voices-of-protest-emerge-ahead-of-us-iran-deal" target="_blank">अमेरिका-ईरान समझौते से पहले उभरते विरोध के स्वर</a></h3><div>इस मुलाकात में सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि अमेरिका ने भारत को आश्वस्त किया है कि मोदी काल में यदि भारत के ऊपर कोई हमला होता है तो यूएस यानी अमेरिका भारत के साथ रहेगा। हालांकि उनकी इस आश्वस्ति भाव के कूटनीतिक मायने भी बड़े दिलचस्प होंगे, जिसकी चर्चा मैं आगे करूँगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2># यक्ष प्रश्न: क्या व्यक्तिगत रिश्ते सामान्य हो रहे हैं?</h2><div><br></div><div>सवाल है कि क्या व्यक्तिगत रिश्ते सामान्य हो रहे हैं? तो जवाब होगा कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में "Howdy Modi" और "Namaste Trump" जैसे आयोजनों ने दोनों नेताओं की व्यक्तिगत निकटता की छवि बनाई थी। बाद के वर्षों में कुछ मुद्दों—व्यापार, वीजा, रूस से भारत के संबंध और अमेरिकी घरेलू राजनीति—के कारण रिश्तों में उतनी गर्मजोशी सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दी। जबकि हालिया मुलाकात से संकेत मिलता है कि दोनों नेता व्यक्तिगत संवाद की लाइन खुली रखना चाहते हैं। क्योंकि रणनीतिक हित व्यक्तिगत मतभेदों से अधिक महत्वपूर्ण हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>भारत और अमेरिका दोनों बदलते वैश्विक समीकरणों में एक-दूसरे की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>सबसे पहले मोदी-ट्रंप मुलाकात के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ की चर्चा कर लेते हैं, जो इस प्रकार है-</div><div><br></div><p><b>पहला, भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी की पुनर्पुष्टि:</b>&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">वैश्विक स्तर पर चीन के बढ़ते प्रभाव, हिंद-प्रशांत क्षेत्र की प्रतिस्पर्धा और नई भू-राजनीतिक चुनौतियों के बीच यह मुलाकात दोनों देशों की रणनीतिक साझेदारी को मजबूत करने का संदेश देती है। साथ ही, रक्षा सहयोग और तकनीकी साझेदारी पर जोर डालती है, क्योंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बनाए रखने की साझा चिंता दोनों देशों को है। इसलिए समुद्री सुरक्षा और आपूर्ति शृंखला (Supply Chain) सहयोग को बढ़ावा देने के लिए दोनों देश आगे आ चुके हैं।</span></p><div><br></div><div><b>दूसरा, भारत के प्रतिद्वंद्वी चीन के लिए महत्वपूर्ण संकेत:</b> यह मुलाकात अप्रत्यक्ष रूप से China को संदेश देती है कि भारत और अमेरिका क्षेत्रीय तथा वैश्विक मुद्दों पर संवाद बनाए हुए हैं। दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की गतिविधियों पर नजर दोनों देशों की नजर है। लिहाजा क्वाड (Quad) जैसी व्यवस्थाओं को मजबूती मिलने की संभावना है। इससे एशिया में शक्ति संतुलन की राजनीति को बल मिलेगा। हालांकि, भारत को अमेरिकी चालों के परिप्रेक्ष्य में सावधानी भी बरतनी होगी, उसके मतलबी इतिहास के दृष्टिगत।</div><div><br></div><div><b>तीसरा, रूस-यूक्रेन और वैश्विक संघर्षों पर संवाद: </b>चूंकि भारत रूस और पश्चिमी देशों के बीच संतुलित कूटनीति अपनाता रहा है। इसलिए भारत की "रणनीतिक स्वायत्तता" की नीति पर चर्चा भी संभव हुआ है। वहीं Russo-Ukrainian War और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी विचार-विमर्श हुआ होगा। क्योंकि इन मामलों में अमेरिका, भारत को संभावित मध्यस्थ या संवाद-सहयोगी के रूप में देखने का आदी बन चुका है और इसमें अमेरिकी रुचि भी अस्वाभाविक नहीं है।</div><div><br></div><div><b>चौथा, व्यापार और निवेश के मायने:</b> दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है। उच्च तकनीक, सेमीकंडक्टर, एआई और रक्षा उत्पादन में सहयोग बढ़ा है। अमेरिकी निवेश आकर्षित करने की भारतीय कोशिशों को बल मिला है। साथ ही आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीन पर निर्भरता से हटाने की रणनीति में भारत की भूमिका बढ़ी है।</div><div><br></div><div><b>पांचवां, भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा में वृद्धि: </b>यह मुलाकात दर्शाती है कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एक महत्वपूर्ण वैश्विक खिलाड़ी के रूप में देखा जा रहा है। जी-7 और अन्य बहुपक्षीय मंचों पर भारत की बढ़ती स्वीकार्यता भी इस बात को जाहिर करती है। वहीं वैश्विक दक्षिण (Global South) की आवाज के रूप में भारत की भूमिका मजबूत हुई है। खासकर ऊर्जा, जलवायु और विकास संबंधी मुद्दों पर भारत की अहमियत बढ़ना इसी बात का द्योतक है।</div><div><br></div><div><b>छठा, घरेलू राजनीतिक मायने:</b> भारत में सरकार इसे भारत की बढ़ती अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के प्रमाण के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। विदेश नीति की उपलब्धियों को राजनीतिक विमर्श में प्रमुखता मिल सकती है। जबकि अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के लिए भारत के साथ निकट संबंध एशिया नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। भारतीय-अमेरिकी समुदाय के संदर्भ में भी यह राजनीतिक रूप से उपयोगी संदेश माना जा सकता है।</div><div><br></div><div><b>सातवां, फ्रांस की भूमिका भी महत्वपूर्ण: </b>चूंकि यह मुलाकात भारत के मित्र फ्रांस की उपस्थिति में हुई, इसलिए इसका एक त्रिपक्षीय आयाम भी है। दरअसल France, भारत और अमेरिका के बीच रक्षा एवं प्रौद्योगिकी सहयोग के नए अवसर पैदा हुए हैं। साथ ही इंडो-पैसिफिक में फ्रांस की सक्रिय भूमिका को समर्थन मिला है। इससे यूरोप-भारत-अमेरिका सहयोग के नए समीकरण बने हैं, जो भारत के दूरगामी हित में हैं।</div><div><br></div><h2># दुनिया के अन्य देशों पर मोदी-ट्रंफ मुलाकात के संभावित प्रभाव</h2><div><br></div><div>जहां तक दुनिया के अन्य देशों पर मोदी-ट्रंप मुलाकात के संभावित प्रभाव की बात है तो&nbsp;</div><div><br></div><div><b>पहला, चीन पर प्रभाव:</b> China इस मुलाकात को ध्यान से देखेगा, क्योंकि भारत-अमेरिका सहयोग मजबूत होने पर चीन को एशिया में अधिक संतुलित प्रतिरोध का सामना करना पड़ सकता है। चूंकि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की भूमिका और महत्वपूर्ण हो सकती है। इसलिए चीन भारत के साथ संबंधों को स्थिर रखने की कोशिश भी बढ़ा सकता है ताकि वह दो मोर्चों पर दबाव न झेले।</div><div><br></div><div><b>दूसरा, रूस पर प्रभाव:</b> Russia के लिए यह मिश्रित संकेत है, क्योंकि रूस समझता है कि भारत अमेरिका के साथ भी मजबूत संबंध रखेगा। इससे भारत की "बहुध्रुवीय कूटनीति" (multi-alignment) और मजबूत होगी। मॉस्को भारत को अपने प्रभाव क्षेत्र में बनाए रखने के लिए रक्षा और ऊर्जा सहयोग बढ़ा सकता है।</div><div><br></div><div><b>तीसरा, यूरोप पर प्रभाव:</b> France, Germany और अन्य यूरोपीय देश इसे सकारात्मक रूप से देख सकते हैं। भारत पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के बीच पुल की भूमिका निभा सकता है।यूरोपीय देशों के लिए भारत और भी आकर्षक रणनीतिक साझेदार बन सकता है। रक्षा और हरित प्रौद्योगिकी सहयोग में नए अवसर खुल सकते हैं।</div><div><br></div><div><b>चौथा, पाकिस्तान पर प्रभाव:</b> Pakistan इस घटनाक्रम को सावधानी से देखेगा। भारत-अमेरिका निकटता पाकिस्तान की रणनीतिक चिंताओं को बढ़ा सकती है। हालांकि अमेरिका पाकिस्तान के साथ भी संबंध बनाए रखेगा, लेकिन दक्षिण एशिया में भारत का महत्व अपेक्षाकृत अधिक बना रहेगा।</div><div><br></div><div><b>पांचवां, खाड़ी और अरब देशों पर प्रभाव: </b>Saudi Arabia, United Arab Emirates और अन्य खाड़ी देश भारत-अमेरिका समन्वय को अवसर के रूप में देख सकते हैं। ऊर्जा, निवेश और लॉजिस्टिक्स कॉरिडोर परियोजनाओं को गति मिल सकती है। भारत की मध्य-पूर्व में कूटनीतिक भूमिका मजबूत हो सकती है।</div><div><br></div><div><b>छठा, वैश्विक दक्षिण (Global South) पर प्रभाव:</b> Brazil, South Africa और अन्य विकासशील देश यह देखेंगे कि भारत पश्चिमी शक्तियों से निकटता रखते हुए भी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रख सकता है। भारत की "संतुलनकारी शक्ति" (balancing power) की छवि मजबूत होगी।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">विकासशील देशों के हितों को उठाने में भारत की आवाज और प्रभावशाली हो सकती है।</span></div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि मोदी-ट्रंप मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका लगातार बढ़ रही है। लिहाजा यह मुलाकात केवल भारत-अमेरिका संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि चीन, रूस, यूरोप, हिंद-प्रशांत क्षेत्र और वैश्विक दक्षिण की राजनीति पर भी प्रभाव डालने वाली घटना के रूप में देखी जा सकती है। इसके दीर्घकालिक परिणाम रक्षा, व्यापार, तकनीक और वैश्विक शक्ति-संतुलन के क्षेत्रों में दिखाई दे सकते हैं।</div><div><br></div><div>वहीं, इस&nbsp; बहुप्रतीक्षित मुलाकात का सबसे बड़ा कूटनीतिक संदेश यह है कि यदि मोदी और ट्रंप के व्यक्तिगत संबंध वास्तव में फिर से सहज होते हैं, तो इसका सबसे बड़ा प्रभाव यह होगा कि भारत-अमेरिका संबंध किसी एक मुद्दे या प्रशासन तक सीमित न रहकर दीर्घकालिक रणनीतिक साझेदारी के रूप में और मजबूत दिखेंगे। इससे दुनिया को यह संकेत जाएगा कि 21वीं सदी की शक्ति-राजनीति में भारत अब केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि अमेरिका, यूरोप, रूस और वैश्विक दक्षिण—सभी के साथ समानांतर संबंध रखने वाली एक प्रमुख धुरी बन चुका है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:05:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/global-diplomatic-implications-of-the-highly-anticipated-meeting-between-trump-and-modi-in-france</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[PM Modi की UAE, UK, Canada, Japan, Egypt, Korea, Italy, Germany के नेताओं के साथ बैठक से भारत को क्या फायदा हुआ?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-g7-summit-france-bilateral-meetings]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>फ्रांस के एवियन में आयोजित जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जहां अपने धारदार और दूरदर्शी भाषण से दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचा, वहीं कई महत्वपूर्ण द्विपक्षीय मुलाकातों के जरिए भारत की रणनीतिक ताकत और वैश्विक स्वीकार्यता को भी नई ऊंचाई दी। वैश्विक संकट, पश्चिम एशिया का तनाव, खाद्य और ऊर्जा सुरक्षा, आपूर्ति शृंखलाओं का संकट तथा अंतरराष्ट्रीय सहयोग जैसे मुद्दों पर प्रधानमंत्री मोदी की स्पष्ट और संतुलित सोच ने विश्व नेताओं को प्रभावित किया। उन्होंने साफ कहा कि दुनिया अब दानदाता और प्राप्तकर्ता की मानसिकता से आगे बढ़कर समान भागीदारी और विश्वास पर आधारित सहयोग की दिशा में आगे बढ़े। यही कारण रहा कि जी-7 सम्मेलन में भारत केवल सहभागी देश नहीं, बल्कि समाधान प्रस्तुत करने वाली शक्ति के रूप में उभरा।</div><div><br></div><h2>यूएई के साथ द्विपक्षीय वार्ता</h2><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का जिक्र करें तो आपको बता दें कि उनकी संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद अल नाह्यान के साथ हुई मुलाकात ने भारत और पश्चिम एशिया के बीच बढ़ती रणनीतिक निकटता को और मजबूत किया। वर्ष 2026 में दोनों नेताओं की यह तीसरी मुलाकात थी, जो दोनों देशों के बीच गहरे विश्वास और तेजी से मजबूत हो रहे संबंधों का प्रमाण है। बैठक में प्रौद्योगिकी, व्यापार, निवेश, ऊर्जा और रक्षा सहयोग पर गंभीर चर्चा हुई। दोनों नेताओं ने इस बात पर जोर दिया कि पश्चिम एशिया में स्थायी शांति और स्थिरता के लिए संवाद, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान बेहद आवश्यक है। प्रधानमंत्री मोदी ने होर्मुज जलडमरूमध्य में सुरक्षित और निर्बाध व्यापारिक आवाजाही की आवश्यकता को रेखांकित किया, क्योंकि यह मार्ग वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की धुरी माना जाता है। इस मुलाकात का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति मोहम्मद बिन जायद को भारत में होने वाले ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होने का निमंत्रण दिया। यह कदम भारत की उस व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है, जिसके जरिए वह पश्चिम एशिया और ग्लोबल साउथ के देशों के साथ बहुआयामी गठजोड़ को मजबूत कर रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-g7-what-is-its-global-significance" target="_blank">जी-7 क्या है? इसके वैश्विक मायने क्या हैं? दुनिया के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?</a></h3><h2>ब्रिटेन के साथ द्विपक्षीय वार्ता</h2><div><br></div><div>ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही। दोनों नेताओं ने भारत-ब्रिटेन संबंधों को वर्ष 2035 की साझा दृष्टि के अनुरूप और गति देने पर सहमति जताई। व्यापार, हरित ऊर्जा, रक्षा, तकनीक, शिक्षा और नवाचार जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते सहयोग की समीक्षा की गई। व्यापक आर्थिक और व्यापार समझौते को शीघ्र लागू करने पर विशेष जोर दिया गया। शिक्षा क्षेत्र में भी भारत को बड़ी उपलब्धि मिली, क्योंकि लिवरपूल विश्वविद्यालय द्वारा बेंगलुरु में परिसर स्थापित करने और यॉर्क तथा ब्रिस्टल विश्वविद्यालयों द्वारा मुंबई में अपने परिसरों को स्थापित करने की दिशा में हुई प्रगति का स्वागत किया गया। प्रधानमंत्री मोदी ने दिल्ली में आयोजित एआई समिट में ब्रिटेन की सक्रिय भागीदारी की सराहना की। दोनों देशों ने महत्वपूर्ण खनिज आपूर्ति शृंखला वेधशाला की शुरुआत को भविष्य की आर्थिक और सामरिक साझेदारी का महत्वपूर्ण आधार बताया। यूक्रेन और पश्चिम एशिया की स्थिति पर भी दोनों नेताओं के बीच गहन चर्चा हुई। यह बैठक साफ संकेत देती है कि भारत और ब्रिटेन अब पारंपरिक संबंधों से आगे बढ़कर तकनीकी और सामरिक सहयोग के नए युग में प्रवेश कर चुके हैं।</div><div><br></div><h2>कनाडा के साथ द्विपक्षीय वार्ता</h2><div><br></div><div>कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के साथ प्रधानमंत्री मोदी की मुलाकात ने दोनों देशों के संबंधों में नई गर्माहट पैदा की। पिछले कुछ वर्षों में उतार-चढ़ाव देखने वाले भारत-कनाडा संबंध अब स्थिरता और सहयोग की नई दिशा में आगे बढ़ते दिखाई दिए। दोनों नेताओं ने ऊर्जा, खाद्य सुरक्षा और आपूर्ति शृंखलाओं को मजबूत बनाने के लिए साझा सहयोग बढ़ाने पर बल दिया। तरलीकृत प्राकृतिक गैस, रसोई गैस और कोयले से जुड़े व्यापारिक समझौतों में हुई प्रगति पर संतोष जताया गया। व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते को इसी वर्ष अंतिम रूप देने का साझा लक्ष्य भी तय किया गया। रक्षा और सुरक्षा सहयोग को नई मजबूती देने के लिए सामान्य सुरक्षा सूचना समझौते पर वार्ता शुरू करने का निर्णय महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी, शिक्षा, कौशल विकास और प्रतिभा आदान-प्रदान को लेकर भी दोनों देशों ने नए अवसर तलाशने पर सहमति जताई। भारत द्वारा हिंद महासागर क्षेत्रीय संगठन में कनाडा को संवाद सहयोगी बनाने का समर्थन देना भी भारत की व्यापक समुद्री रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।</div><div><br></div><h2>कई अन्य द्विपक्षीय वार्ताएं</h2><div><br></div><div>इसके अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जापान, जर्मनी, मिस्र, केन्या और दक्षिण कोरिया के नेताओं के साथ भी महत्वपूर्ण मुलाकातें कर भारत की वैश्विक कूटनीति को नई मजबूती दी। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के साथ बातचीत में व्यापार, निवेश और भविष्य की आर्थिक साझेदारी को और गहरा करने पर जोर दिया गया। मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल-सिसी से मुलाकात में दोनों देशों की ऐतिहासिक मित्रता और रणनीतिक सहयोग को नई गति देने पर चर्चा हुई। वहीं केन्या के राष्ट्रपति विलियम समोई रुटो के साथ प्रधानमंत्री मोदी ने ग्लोबल साउथ की साझा आकांक्षाओं और विकासशील देशों की आवाज को मजबूत करने की प्रतिबद्धता दोहराई। दक्षिण कोरिया के राष्ट्रपति ली जे-म्यांग के साथ हुई वार्ता में व्यापार, प्रौद्योगिकी और भविष्य की उभरती तकनीकों में सहयोग बढ़ाने पर सहमति बनी। इन मुलाकातों ने साफ कर दिया कि भारत अब केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि एशिया, अफ्रीका और ग्लोबल साउथ को जोड़ने वाला निर्णायक नेतृत्व बन चुका है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि जी-7 सम्मेलन के दौरान प्रधानमंत्री मोदी का भाषण सबसे अधिक चर्चा में रहा। उन्होंने साफ कहा कि आज ऊर्जा, स्वास्थ्य, खाद्य और आर्थिक सुरक्षा एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारी अब विकल्प नहीं बल्कि अनिवार्यता बन चुकी है। प्रधानमंत्री ने चेतावनी दी कि व्यापार और तकनीक का संकीर्ण हितों के लिए दुरुपयोग वैश्विक विश्वास को कमजोर कर रहा है। उन्होंने कोरोना महामारी का उदाहरण देते हुए पारदर्शिता और भरोसे पर आधारित वैश्विक व्यवस्था की आवश्यकता बताई। प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की विकास यात्रा को “सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय” के मंत्र से जोड़ते हुए वित्तीय समावेशन, डिजिटल पहचान, स्वास्थ्य सुरक्षा और महिला सशक्तिकरण की उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखा। उन्होंने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानून की अनदेखी वैश्विक एकजुटता की सबसे बड़ी बाधा है। पश्चिम एशिया संकट के कारण ईंधन, उर्वरक और खाद्य आपूर्ति शृंखलाओं पर पड़े असर का जिक्र करते हुए उन्होंने ग्लोबल साउथ के गरीब और कमजोर देशों की चिंता उठाई। प्रधानमंत्री ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि संकट का बोझ केवल कमजोर देशों पर नहीं छोड़ा जा सकता और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं को विकासशील देशों की सहायता के लिए मजबूत तंत्र विकसित करना होगा।</div><div><br></div><div>इस सम्मेलन में चीन के बढ़ते निर्यात और वैश्विक बाजारों पर उसके प्रभाव को लेकर भी गंभीर चर्चा हुई। सस्ते उत्पादों के जरिए दुनिया के बाजारों में बढ़ती चीनी पैठ को लेकर पश्चिमी देशों में चिंता दिखाई दी। इस पूरे विमर्श के बीच भारत एक संतुलित और भरोसेमंद आर्थिक शक्ति के रूप में उभरा। प्रधानमंत्री मोदी ने जिस आत्मविश्वास और स्पष्टता के साथ भारत की बात रखी, उसने यह संदेश दिया कि आने वाले समय में वैश्विक आर्थिक और सामरिक संतुलन में भारत की भूमिका और अधिक निर्णायक होने वाली है। प्रधानमंत्री की इन द्विपक्षीय मुलाकातों से भारत को ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार विस्तार, तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी और वैश्विक मंचों पर राजनीतिक समर्थन जैसे कई सामरिक लाभ मिले हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि प्रधानमंत्री मोदी ने भारत को केवल एक उभरती अर्थव्यवस्था नहीं, बल्कि विश्व व्यवस्था को दिशा देने वाली जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित किया। उनकी सक्रिय और दूरदर्शी कूटनीति ने एक बार फिर साबित कर दिया कि बदलती वैश्विक राजनीति में भारत अब निर्णायक भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह तैयार है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 17:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-g7-summit-france-bilateral-meetings</link>
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      <title><![CDATA[अमेरिका-ईरान समझौते से पहले उभरते विरोध के स्वर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/voices-of-protest-emerge-ahead-of-us-iran-deal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हांलाकि अमेरिका-ईरान के बीच सीजफायर समझौते पर राजी होने के समाचार से दुनिया के देशों ने राहत की सांस ली है पर समझौता कितने दिन चलेगा और इसके साइड इफेक्ट क्या होंगे, इसे लेकर अभी से कयास लगने आरंभ हो गए हैं। इजरायल ने जहां सीज फायर समझौते से अभी तक तो अपने को अलग कर लिया हैं वहीं मिडिल ईस्ट फोरम ने समझौते की शर्तों को लेकर जो प्रतिक्रिया दी है उसे भविष्य के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता। एक बात यह भी साफ हो जानी चाहिए कि जो मैसेज दुनिया के देशों के सामने गया है वह साफ है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध से गले तक भर आये हैं और अब सवाल इज्जत बचाने का रह गया है। अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी जल्दी ही होने हैं। इसके अलावा दुनिया के अन्य देशों की तो छोड़ो अमेरिकियों का ही ट्रंप पर भरोसा नहीं रहा है। अमेरिका में ट्रंप की रेंकिंग लगातार नीचे जा रही है। ट्रंप भले ही अपने 80 वें जन्मदिन पर युद्ध विराम की बात कर रहे हो पर यदि निष्पक्ष विष्लेषण किया जाए तो इस युद्ध में अमेरिका ने खोया ही खोया है। ट्रंप ने अपनी क्रेडिट रेंकिंग खोई है तो निर्णय लेने से पहले उसके परिणामों को लेकर गंभीर नहीं होना देखा गया है। हांलाकि समूची दुनिया विष्व शांति चाहती है और सभी चाहते हैं कि युद्ध विराम जल्दी से जल्दी हो। पर एक बात और साफ हो जानी चाहिए कि ईरान के तेवर अभी तक तीखे है और वह कुछ खोना नहीं चाहता।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमेरिका-इजरायल द्वारा जब 28 फरवरी को ईरान पर आक्रमण किया गया था तब उन्होंने सोचा नहीं था कि यह युद्ध इतना लंबा चलेगा और इनके हाथ से निकल जाएगा। अमेरिका-ईरान युद्ध से समूचा विश्व प्रभावित हुआ है। ईंधन की आपूर्ति बाधित होने से सबसे अधिक संकट के हालात बने। वैसे भी अमेरिका को ईरान पर आक्रमण करने से पहले रुस-यूक्रेन युद्ध से सबक लेना चाहिए था। लाख प्रयासों के बावजूद रुस यूक्रेन युद्ध अभी तक विराम की स्थिति में नहीं आ पाया है। देखा जाए तो आज छोटा से छोटा देश भी युद्ध को लंबा खींचने की स्थिति में है। एक दो दिन में युद्ध समाप्ति की सोचना भी बेमानी होगा। अब अमेरिका-ईरान युद्ध की ही बात की जाए तो 7200 से अधिक जान लेने और हजारों की संख्या में घायलों के बाद समझौते की बात की जा रही है। ईरान तो युद्ध के नुकसान की भरपाई के लिए साफ साफ कह रहा है तो परमाणु को लेकर भी कोई ठोस नतीजा नहीं देखा जा रहा है। अमेरिकियों को लगने लगा है कि 2015 के बराक ओबामा के समय परमाणु समझौते जैसे ही हालात लग रहे हैं। दूसरी और तथाकथित मध्यस्थ की भूमिका निभा रहे पाकिस्तान और कतर भरोसे वाले देश नहीं हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि यह वहीं पाकिस्तान है जिसने तालीबान के मामलें में दुनिया को धोखा दिया वहीं ओसामा बिन लादेन को शरण दी। वैसे भी पाकिस्तान को आंतक को पनाह देने वाला देश माना जाता है। अब अमेरिका और अरब देश ईरान के पुननिर्माण के लिए करीब 300 अरब डॉलर देंगे। ईंधन की आपूर्ति बाधित होने से 146 देशों को ईंधन के दाम बढ़ाने पड़े और इसका सीधा सीधा असर इन देशों के नागरिकों पर पड़ा। देखा जाए तो 108 दिन बर्बादी के बाद कहीं जाकर अमेरिका-ईरान समझौते की लिए राजी हुए हैं पर अमेरिका का एक साथी और युद्ध में संलग्न इजरायल ने इस समझौते को सीरे से खारिज कर दिया है। बल्कि समझौता प्रयासों के दौरान ही लेबनान पर हमले तेज ही किये हैं। इजरायल किसी भी हालत में ईरान को परमाणु संपन्न देश नहीं चाहता। अब अमेरिका इजरायल के बीच संबंधों में बिगाड़ के आसार भी साफ दिखने लगे हैं। यह भी कयास लगाये जाने लगे हैं कि खाड़ी के देश अमेरिका से संबंधों पर नए सिरे से विचार करें। अभी तो समझौते पर हस्ताक्षर भी जेनेवा में 19 जून को होना है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/g7-summit-2026-major-outcomes-analysis" target="_blank">जी-7 शिखर सम्मेलन में अमेरिका दिखा अलग थलग, दुनिया जता रही मोदी पर भरोसा</a></h3><div>मिडिल इस्ट फोरम के पॉलिसी एनालिसिस निदेशक माइकल रुबिन की तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है और उनका मानना है कि इससे मध्य पूर्व में नए संघर्ष के हालात बनेंगे। पश्चिमी एशिया में संघर्ष की राह प्रशस्त होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि युद्ध विराम समझौते से ईरान लाभ में रहने वाला है। उसे पुननिर्माण के लिए अच्छी खासी सहायता राशि मिलेगी। दूसरी यह भी एक प्रतिक्रिया आई है कि जिस तरह से द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति रुजवेल्ट ने&nbsp; जर्मनी से निपटने के लिए फासीवादी इटली पर भरोसा कर समझौता किया था।&nbsp;</div><div>खैर इतना तो तय है कि दुनिया के देश युद्ध से तंग आ गए हैं। तत्काल युद्ध बंद होना चाहिए यह सभी चाहते हैं। दुनिया के किसी भी कोने में युद्ध के हालात नहीं बनने चाहिए। अमेरिका-ईरान युद्ध ने समूची दुनिया को प्रभावित किया है। ईंधन की आपूर्ति बाधित होने से हालात खराब हुए हैं और आने वाले समय में दुनिया के देशों को होर्मुज का वैकल्पिक रास्ता भी खोजना ही पड़ेगा क्योंकि ईंधन यानी के तेल और एलपीजी की निर्भरता अधिकांश देशों की है और रास्ता रोकना या फिर टोल लगाना किसी दादागिरी से कम नहीं हैं। ऐसे में अमेरिका ईरान युद्ध से दुनिया के देशों को सबक लेना होगा। समझौते में स्थायित्व होना और इजरायल को भी समझौते की टेबल पर लाने के प्रयास किये जाते हैं तो परिणाम सकारात्मक प्राप्त हो सकते हैं नहीं तो इजरायल और लेबनान व अन्य देशों के बीच तनाव व संघर्ष के हालात बने ही रहेंगे और उसके परिणाम अच्छे नहीं हो सकतें। अब लोगों की निगाह 19 जून पर जेनेवा में समझौते पर हस्ताक्षर होने और समझौते की सभी पक्षों द्वारा ईमानदारी से पालना करने पर टिकी हुई हैं। इजरायल को भी समझौते की टेबल पर लाना होगा नहीं तो पश्चिम एशिया में शांति के हालात बनना मुश्किल ही रहेंगे। भले ही मजबूरी या अपनी साख बचाये रखने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने शांति की पहल की है इसे सफल होना ही होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 12:14:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/voices-of-protest-emerge-ahead-of-us-iran-deal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चिन्ताजनक है महंगी होती दवाइयां, महंगा होता इलाज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/rising-costs-of-medicines-and-medical-treatment-are-a-cause-for-concern]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत आज विकसित राष्ट्र बनने के स्वप्न के साथ आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2047 तक विकसित भारत के निर्माण की परिकल्पना बार-बार दोहराई जा रही है। बड़े-बड़े बुनियादी ढांचे, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष उपलब्धियां और आर्थिक विकास के दावों के बीच एक प्रश्न बार-बार सामने खड़ा हो जाता है-क्या ऐसा भारत वास्तव में विकसित कहलाएगा, जहां एक सामान्य नागरिक बीमारी के कारण कर्ज में डूबने को विवश हो जाए? जहां इलाज और दवाइयों की बढ़ती कीमतें जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी तय करने लगें? जहां स्वास्थ्य सेवा अधिकार नहीं, बल्कि आर्थिक सामर्थ्य का विषय बन जाए? ऐसे समय में जब महंगाई पहले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है, नेशनल फार्मास्यूटिकल प्राइसिंग अथॉरिटी (एन.पी.पी.ए.) द्वारा कुछ जीवनरक्षक दवाओं और टीकों की कीमतों में भारी वृद्धि की अनुमति देना गंभीर चिंता का विषय है। कैंसर की कुछ दवाओं, एंटी-टेटनस सीरम और बच्चों के आवश्यक टीकों की कीमतों में लगभग पचास प्रतिशत तक वृद्धि की स्वीकृति ने लाखों परिवारों के सामने नया संकट खड़ा कर दिया है। यह निर्णय केवल आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि सामाजिक न्याय, मानवीय संवेदना और जनकल्याणकारी शासन की अवधारणा से भी जुड़ा हुआ प्रश्न है।</div><div><br></div><div>भारत में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति किसी से छिपी नहीं है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि देश में बड़ी संख्या में लोग आज भी अपने इलाज का खर्च अपनी जेब से वहन करते हैं। बीमारी केवल स्वास्थ्य संकट नहीं रह जाती, वह आर्थिक संकट में भी बदल जाती है। एक समय था जब कहा जाता था कि व्यक्ति अपनी बेटी की शादी के कारण कर्ज में डूबता है, लेकिन आज की स्थिति यह है कि किसी गंभीर बीमारी का इलाज पूरा परिवार आर्थिक रूप से बर्बाद कर सकता है। कैंसर, हृदय रोग, किडनी रोग या अन्य जटिल बीमारियों का उपचार लाखों रुपये की मांग करता है। ऐसे में यदि जीवनरक्षक दवाइयों की कीमतें भी लगातार बढ़ती रहें तो गरीब और निम्न मध्यम वर्ग के लिए स्वास्थ्य सेवा लगभग असंभव हो जाएगी। एन.पी.पी.ए. ने दवाओं की कीमत बढ़ाने के पीछे उत्पादन लागत में वृद्धि और बाजार में संभावित कमी का तर्क दिया है। उनका कहना है कि यदि दवा कंपनियां लागत भी नहीं निकाल पाएंगी तो वे उत्पादन बंद कर सकती हैं, जिससे मरीजों को आवश्यक दवाएं उपलब्ध नहीं होंगी। यह तर्क अपनी जगह सही हो सकता है। किसी भी उद्योग को जीवित रहने के लिए उचित लाभ आवश्यक है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या जीवनरक्षक दवाओं को सामान्य उपभोक्ता वस्तुओं की तरह देखा जा सकता है? क्या स्वास्थ्य क्षेत्र में लाभ कमाने की सीमा और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया जाना चाहिए?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-g7-what-is-its-global-significance" target="_blank">जी-7 क्या है? इसके वैश्विक मायने क्या हैं? दुनिया के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?</a></h3><div>स्वास्थ्य और शिक्षा किसी भी सभ्य समाज की दो मूलभूत आवश्यकताएं हैं। दुर्भाग्य से भारत में इन दोनों क्षेत्रों में व्यवसायीकरण का प्रभाव लगातार बढ़ता गया है। निजी अस्पतालों की बढ़ती फीस, महंगे परीक्षण, अनावश्यक जांचें, चिकित्सा उपकरणों का भारी खर्च और अब दवाइयों की बढ़ती कीमतें मिलकर आम नागरिक को असहाय बना रही हैं। चिकित्सा सेवा धीरे-धीरे सेवा के बजाय उद्योग में परिवर्तित होती दिखाई दे रही है। अस्पताल स्वास्थ्य केंद्र कम और कॉरपोरेट प्रतिष्ठान अधिक प्रतीत होने लगे हैं। रोगी अब मरीज नहीं, बल्कि ग्राहक की तरह देखा जाने लगा है। यह स्थिति केवल आर्थिक असमानता को ही नहीं बढ़ाती, बल्कि सामाजिक विभाजन को भी गहरा करती है। आज भी देश में गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मुख्यतः उन्हीं लोगों को उपलब्ध हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत है। गरीब व्यक्ति सरकारी अस्पतालों की लंबी कतारों, सीमित संसाधनों और अपर्याप्त सुविधाओं के भरोसे है। अमीर व्यक्ति अत्याधुनिक अस्पतालों और महंगे उपचारों का लाभ उठा सकता है। क्या यही सामाजिक न्याय है? क्या यही वह भारत है जिसकी कल्पना स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी?</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अनेक जनहितकारी योजनाएं लागू हुई हैं। आयुष्मान भारत जैसी योजना ने लाखों लोगों को राहत भी प्रदान की है। जन औषधि केंद्रों की स्थापना ने सस्ती दवाइयों की उपलब्धता बढ़ाने का प्रयास किया है। लेकिन इसके बावजूद स्वास्थ्य क्षेत्र में व्याप्त व्यापक विसंगतियां अभी भी बनी हुई हैं। यदि दवाओं की कीमतें लगातार बढ़ती रहें और निजी स्वास्थ्य सेवाएं अनियंत्रित होती जाएं, तो इन योजनाओं का प्रभाव सीमित हो जाएगा। वास्तविक चुनौती यह है कि स्वास्थ्य को बाजार की शक्तियों के हवाले छोड़ने के बजाय उसे जनकल्याण के केंद्र में रखा जाए। सरकार का दायित्व केवल योजनाओं की घोषणा करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि प्रत्येक नागरिक को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हों। जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों पर विशेष नियंत्रण होना चाहिए। सरकारी अस्पतालों में दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जानी चाहिए। दवा खरीद प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी और जवाबदेह बनाया जाना चाहिए। आवश्यक दवाओं के उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार विशेष सहायता और सब्सिडी भी दे सकती है, ताकि लागत बढ़ने का पूरा बोझ मरीजों पर न पड़े।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही स्वास्थ्य बीमा योजनाओं का दायरा और व्यापक होना चाहिए। अनेक गरीब और निम्न मध्यमवर्गीय परिवार ऐसे हैं जो किसी भी बीमा सुरक्षा से वंचित हैं। गंभीर बीमारी की स्थिति में वे अपनी जीवनभर की जमा पूंजी गंवा देते हैं। स्वास्थ्य बीमा केवल अस्पताल में भर्ती होने तक सीमित न रहे, बल्कि आवश्यक दवाओं और दीर्घकालिक उपचार को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए। यह भी आवश्यक है कि सरकार समय-समय पर दवा कंपनियों की लागत संरचना और मूल्य निर्धारण की स्वतंत्र समीक्षा कराए। यदि वास्तव में लागत बढ़ी है तो उसका प्रमाण सार्वजनिक होना चाहिए। पारदर्शिता से जनता का विश्वास भी बढ़ेगा और अनावश्यक मूल्यवृद्धि पर भी रोक लगेगी। स्वास्थ्य नीति का मूल उद्देश्य कंपनियों के लाभ और नागरिकों के अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करना होना चाहिए।</div><div><br></div><div>वर्ष 2047 का विकसित भारत केवल ऊंची इमारतों, तेज रफ्तार सड़कों और बढ़ती जीडीपी से नहीं बनेगा। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होगा कि वहां का सबसे गरीब नागरिक कितना सुरक्षित, शिक्षित और स्वस्थ है। यदि एक किसान, मजदूर, कर्मचारी या निम्न आय वर्ग का व्यक्ति बीमारी के समय सम्मानपूर्वक इलाज प्राप्त नहीं कर सकता, तो विकास के दावे अधूरे रह जाएंगे। आज आवश्यकता केवल दवाइयों की कीमतों पर बहस करने की नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था की समग्र समीक्षा करने की है। यह स्वीकार करना होगा कि स्वास्थ्य कोई विलासिता नहीं, बल्कि मौलिक मानवीय अधिकार है। जिस राष्ट्र में नागरिकों को स्वस्थ जीवन का अवसर नहीं मिलता, वहां विकास की चमक भी फीकी पड़ जाती है। समय आ गया है कि सरकार, नीति-निर्माता, चिकित्सा जगत और समाज मिलकर यह सुनिश्चित करें कि स्वास्थ्य सेवा लाभ कमाने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा का सशक्त उपकरण बने। अन्यथा विकसित भारत का सपना केवल आंकड़ों में चमकेगा, जबकि आम आदमी बीमारी, कर्ज और असहायता के अंधकार में संघर्ष करता रहेगा। स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर बढ़ते भारत के सामने यही सबसे बड़ी नैतिक और मानवीय चुनौती है, जिसका समाधान आज ही तलाशना होगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 12:10:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/rising-costs-of-medicines-and-medical-treatment-are-a-cause-for-concern</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ethanol Fuel आपकी गाड़ी की उम्र घटाएगा या पैसा बचाएगा? E-100 पर आखिर इतना बड़ा दाँव क्यों लगा रही है मोदी सरकार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-e100-ethanol-fuel-policy-explained]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत अब पेट्रोल और डीजल पर निर्भर अर्थव्यवस्था से निकलकर वैकल्पिक ईंधन की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ा रहा है। केंद्रीय सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने E-100 ईंधन के मानकों को मंजूरी देकर देश की ऊर्जा नीति में एक नई बहस और नई उम्मीद दोनों को जन्म दिया है। इस फैसले के बाद इथेनॉल आधारित परिवहन व्यवस्था को लेकर सरकार, वाहन कंपनियों और ऊर्जा क्षेत्र में तेजी से हलचल बढ़ गई है। माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में यही ईंधन भारत को कच्चे तेल के वैश्विक झटकों से बचाने का मजबूत आधार बन सकता है।</div><div><br></div><h2>पेट्रोल का खेल खत्म? सरकार लाई E-100 ईंधन का मास्टर प्लान</h2><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि E-100 ऐसा ईंधन है जिसमें लगभग सौ प्रतिशत इथेनॉल होता है और पारंपरिक पेट्रोल की मिलावट नहीं के बराबर रहती है। इथेनॉल गन्ना, मक्का, खराब अनाज और कृषि अपशिष्ट जैसे स्रोतों से तैयार किया जाता है। अभी देश में E-20 मिश्रण वाला पेट्रोल इस्तेमाल हो रहा है जिसमें बीस प्रतिशत इथेनॉल और अस्सी प्रतिशत पेट्रोल होता है। लेकिन E-100 पूरी तरह इथेनॉल आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ने का संकेत है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-indus-water-strategy-pakistan-crisis" target="_blank">सही कहा था Modi ने... एक एक बूंद पानी के लिए तरस रहा Pakistan, नहरें सूखीं, खेत बंजर हो रहे, शहरों में भी जल संकट</a></h3><h2>तेल संकट से बचने का भारत का नया हथियार!</h2><div><br></div><div>मोदी सरकार की नजर सिर्फ पर्यावरण पर नहीं बल्कि अर्थव्यवस्था और रणनीतिक सुरक्षा पर भी है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा विदेशों से कच्चे तेल के रूप में खरीदता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ते ही देश का आयात बिल और महंगाई दोनों बढ़ जाती हैं। ऐसे में सरकार इथेनॉल आधारित ईंधन को ऊर्जा आत्मनिर्भरता का रास्ता मान रही है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार इथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम के कारण अब तक एक लाख करोड़ रुपये से अधिक के कच्चे तेल आयात की बचत हुई है, जबकि किसानों को लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय मिली है।</div><div><br></div><div>ऊर्जा विशेषज्ञ भी इसे भारत की दीर्घकालिक रणनीति का अहम हिस्सा मान रहे हैं। केपीएमजी की हालिया रिपोर्ट में कहा गया है कि इथेनॉल आधारित बदलाव भारत के परिवहन ऊर्जा ढांचे को मजबूत बना सकता है और वैश्विक तेल संकटों से देश को बचाने में मददगार साबित हो सकता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो E-100 ईंधन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि इससे किसानों की भूमिका सीधे ऊर्जा अर्थव्यवस्था से जुड़ जाएगी। गन्ना और मक्का जैसी फसलों की मांग बढ़ेगी तो ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नया सहारा मिलेगा। लंबे समय से खेती में लागत और लाभ के संकट से जूझ रहे किसानों के लिए यह अतिरिक्त आय का नया रास्ता बन सकता है। सरकार इसी वजह से इसे कृषि और ऊर्जा दोनों क्षेत्रों के लिए दोहरा लाभ मान रही है।</div><div><br></div><div>हालांकि सवाल यह भी है कि क्या E-100 पेट्रोल की पूरी तरह जगह ले सकता है। जवाब है, हां लेकिन तुरंत नहीं। देश की करोड़ों गाड़ियां अभी पारंपरिक पेट्रोल या E-20 ईंधन के हिसाब से बनी हैं। उन्हें सीधे E-100 पर चलाना संभव नहीं है। इथेनॉल का व्यवहार पेट्रोल से अलग होता है। इससे इंजन की संरचना, फ्यूल पंप, इंजेक्टर और पाइप लाइन तक में बदलाव करना पड़ता है। यही वजह है कि अब वाहन कंपनियां विशेष फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाले वाहन विकसित कर रही हैं।</div><div><br></div><div>मारुति सुजूकी ने वैगन आर का फ्लेक्स फ्यूल मॉडल पेश कर संकेत दे दिया है कि कम कीमत वाली जनसाधारण की गाड़ियां भी इथेनॉल आधारित तकनीक पर लाई जा सकती हैं। इसके अलावा टोयोटा, एमजी, हुंडई और सुजुकी भी ऐसे उत्पादों पर काम कर रही हैं। दोपहिया क्षेत्र में हीरो मोटोकॉर्प ने स्प्लेंडर और एच एफ डीलक्स के फ्लेक्स फ्यूल संस्करण सामने रखे हैं। इससे साफ है कि उद्योग जगत अब इस बदलाव को गंभीरता से लेने लगा है।</div><div><br></div><h2>गन्ने से बनेगा गाड़ी का ईंधन!</h2><div><br></div><div>देखा जाये तो E-100 के कई फायदे हैं। सबसे पहला लाभ विदेशी तेल पर निर्भरता कम होना है। इससे देश की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी। दूसरा बड़ा लाभ पर्यावरण को होगा क्योंकि इथेनॉल पारंपरिक जीवाश्म ईंधन की तुलना में अपेक्षाकृत स्वच्छ माना जाता है और इससे कार्बन उत्सर्जन कम हो सकता है। तीसरा लाभ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगा जहां इथेनॉल उत्पादन से कृषि आधारित उद्योगों को नई गति मिल सकती है।</div><div><br></div><h2>क्यों डर रहे हैं लोग इथेनॉल वाले पेट्रोल से?</h2><div><br></div><div>वैसे इथेनॉल को लेकर आम उपभोक्ताओं के मन में अभी भी कई तरह की आशंकाएं हैं। सबसे बड़ी चिंता गाड़ी के इंजन और उसकी उम्र को लेकर है। बहुत से वाहन मालिक मानते हैं कि अधिक इथेनॉल मिश्रण से इंजन पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है, माइलेज घट सकता है और लंबे समय में फ्यूल पाइप, रबर पार्ट्स तथा इंजेक्टर जैसे हिस्सों को नुकसान हो सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि पुराने पेट्रोल वाहन पूरी तरह इथेनॉल आधारित ईंधन के लिए तैयार नहीं हैं, इसलिए उनमें दिक्कतें आ सकती हैं। यही वजह है कि लोग अपने मौजूदा वाहन में अधिक इथेनॉल वाला ईंधन डलवाने से हिचक रहे हैं। हालांकि नई फ्लेक्स फ्यूल तकनीक वाली गाड़ियां विशेष रूप से इथेनाल के हिसाब से तैयार की जा रही हैं, इसलिए उनमें ऐसी आशंकाएं कम होंगी। सरकार और कंपनियां यह दावा कर रही हैं कि सही तकनीक वाले इंजनों में इथेनॉल से गाड़ी की आयु पर कोई गंभीर असर नहीं पड़ेगा, लेकिन उपभोक्ताओं का भरोसा जीतना अभी बाकी है।</div><div><br></div><div>कीमत को लेकर भी बहस तेज है। माना जा रहा है कि देश में बड़े पैमाने पर उत्पादन होने पर इथेनॉल आधारित ईंधन पेट्रोल की तुलना में सस्ता पड़ सकता है, क्योंकि इसका स्रोत घरेलू कृषि क्षेत्र है और इसमें आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता कम रहती है। फिर भी आम लोगों के बीच यह सवाल लगातार उठ रहा है कि जब मौजूदा E-20 ईंधन में बीस प्रतिशत इथेनॉल मिला हुआ है, तब उपभोक्ताओं से पूरी तरह पेट्रोल जैसी कीमत क्यों वसूली जा रही है। आलोचकों का तर्क है कि यदि पेट्रोल की मात्रा कम है तो कीमत में भी उसका असर दिखना चाहिए। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि ईंधन मूल्य निर्धारण केवल कच्चे तेल की मात्रा से तय नहीं होता, बल्कि उत्पादन, प्रसंस्करण, परिवहन और कर व्यवस्था जैसे कई पहलू उसमें शामिल रहते हैं। साथ ही डीजल में इथेनॉल मिलाने को लेकर अभी व्यापक स्तर पर कोई स्पष्ट योजना सामने नहीं आई है, क्योंकि डीजल इंजन की तकनीक पेट्रोल इंजनों से अलग होती है और उसमें इथेनॉल मिश्रण को लेकर ज्यादा तकनीकी चुनौतियां हैं। फिलहाल सरकार का मुख्य जोर पेट्रोल आधारित वाहनों और फ्लेक्स फ्यूल तकनीक को आगे बढ़ाने पर है।</div><div><br></div><div>लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी कम चुनौतीपूर्ण नहीं है। इथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। यानी समान दूरी तय करने के लिए वाहन को ज्यादा ईंधन की जरूरत पड़ सकती है। इसके अलावा मौजूदा वाहनों को सीधे E-100 पर चलाना संभव नहीं है। उपभोक्ताओं को नए फ्लेक्स फ्यूल वाहन खरीदने होंगे, जो शुरुआती दौर में महंगे भी हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचे की है। देशभर के पेट्रोल पंपों को E-100 के भंडारण और वितरण के लिए नई व्यवस्था विकसित करनी होगी। जब तक व्यापक स्तर पर ईंधन स्टेशन तैयार नहीं होंगे, तब तक उपभोक्ताओं का भरोसा भी नहीं बन पाएगा। दूसरी चुनौती इथेनॉल उत्पादन की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करना है। यदि ईंधन उत्पादन के लिए अत्यधिक कृषि संसाधन लगाए गए तो खाद्य सुरक्षा और जल संकट जैसे सवाल भी उठ सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इसके बावजूद सरकार और उद्योग दोनों मानते हैं कि भारत अब ऊर्जा परिवर्तन के ऐसे मोड़ पर पहुंच चुका है जहां वैकल्पिक ईंधन को टाला नहीं जा सकता। E-100 कोई रातोंरात होने वाली क्रांति नहीं है, बल्कि यह लंबी यात्रा की शुरुआत है। आने वाले वर्षों में पेट्रोल और इथेनॉल दोनों साथ-साथ चलेंगे, लेकिन दिशा साफ दिखाई दे रही है। भारत अब तेल आयात पर टिके भविष्य से हटकर खेतों से निकलने वाली ऊर्जा की ओर बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 13:28:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-e100-ethanol-fuel-policy-explained</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[गुमनाम पार्टी में क्यों शामिल हुए TMC के नामी सांसद? दलबदल विरोधी नारे वाला दल क्यों बना तृणमूल के बागियों का नया ठिकाना?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/tmc-rebel-mps-merge-with-ncpi-political-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तृणमूल कांग्रेस में उठी बगावत ने राष्ट्रीय राजनीति को ऐसा मोड़ दे दिया है जिसकी गूंज आने वाले महीनों तक सुनाई दे सकती है। हम आपको बता दें कि लोकसभा में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों ने अचानक एक लगभग गुमनाम दल नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी एनसीपीआई में विलय का ऐलान कर दिया और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से अलग समूह के तौर पर मान्यता तथा सदन में अलग बैठने की मांग कर डाली। इस घटनाक्रम ने केवल बंगाल की राजनीति को नहीं हिलाया, बल्कि दलबदल कानून, विपक्ष की एकजुटता और संसद की शक्ति संतुलन की बहस को भी फिर से केंद्र में ला खड़ा किया है।</div><div><br></div><div>सबसे दिलचस्प बात यह है कि जिस एनसीपीआई में यह विलय हुआ है, उसका अब तक का राजनीतिक अस्तित्व लगभग नगण्य रहा है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस दल ने चार उम्मीदवार उतारने की घोषणा की थी, लेकिन आखिरकार तीन सीटों पर ही चुनाव लड़ पाया। पार्टी के उम्मीदवारों का प्रदर्शन इतना कमजोर रहा कि वे कई जगह नोटा से थोड़ा ही आगे निकल सके। त्रिपुरा की चावमानु सीट पर पार्टी उम्मीदवार बरजेदा त्रिपुरा को केवल 536 वोट मिले, जबकि नोटा को 500 वोट प्राप्त हुए। कैलाशहर सीट पर पार्टी को मात्र 286 वोट मिले। कुल मिलाकर दो सीटों पर एनसीपीआई को सिर्फ 822 वोट हासिल हुए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/the-meaning-of-mamata-tears-who-showed-her-eyes-to-congress" target="_blank">कांग्रेस को आंखे दिखाने वाली ममता के आंसूओं का मर्म</a></h3><div>खास बात यह भी है कि इस पार्टी का चुनाव चिह्न ‘पेन की निब’ है और इसने नारा दिया था, “अपने अधिकारों की रक्षा के लिए दलबदलुओं को नकारें।” लेकिन राजनीति की विडंबना देखिए कि अब वही दल देश के सबसे चर्चित दलबदल का मंच बन गया है। वैसे इस पूरे घटनाक्रम के पीछे केवल नाराजगी नहीं, बल्कि गहरी राजनीतिक रणनीति दिखाई दे रही है। बागी सांसदों का मकसद सीधे भाजपा में जाना नहीं, बल्कि पहले एक अलग राजनीतिक पहचान बनाकर दलबदल कानून से बचना माना जा रहा है। हम आपको बता दें कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत यदि किसी दल के दो तिहाई विधायक या सांसद किसी दूसरे दल में विलय करते हैं, तो उन्हें अयोग्यता से राहत मिल सकती है। इसी कानूनी रास्ते का इस्तेमाल करते हुए बागी गुट खुद को “असली तृणमूल” साबित करने की जमीन तैयार कर रहा है।</div><div><br></div><div>तृणमूल के वरिष्ठ सांसद सुदीप बंद्योपाध्याय ने साफ कहा है कि अभी उन्होंने एनसीपीआई में विलय किया है, लेकिन संसद का अगला सत्र शुरू होने पर वह तृणमूल नाम और पहचान पर दावा करेंगे। उनका कहना है कि दो तिहाई सांसद उनके साथ हैं, इसलिए वास्तविक राजनीतिक अधिकार भी उसी गुट के पास होना चाहिए। दूसरी ओर, टीएमसी के महासचिव अभिषेक बनर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखकर इस दावे को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के महाराष्ट्र राजनीतिक संकट वाले फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल विधायी दल का टूटना पर्याप्त नहीं होता, मूल राजनीतिक दल का विलय भी जरूरी है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यही वह बिंदु है जहां यह लड़ाई केवल संख्या की नहीं, बल्कि कानूनी और संवैधानिक व्याख्या की बन जाती है। तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि पार्टी सर्वोपरि है, सांसद नहीं। जबकि बागी गुट संख्या बल के आधार पर वैधता चाहता है। इस टकराव का अंतिम फैसला अब अदालत और लोकसभा अध्यक्ष की व्याख्या पर निर्भर करेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि इस घटनाक्रम की तुलना 2016 के अरुणाचल प्रदेश संकट से भी की जा रही है। तब कांग्रेस के अधिकांश विधायक पहले पीपुल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल में गए और बाद में भाजपा में शामिल हो गए थे। उसी रास्ते ने भाजपा को पूर्वोत्तर में पहली पूर्ण सरकार दी थी। अब तृणमूल के भीतर भी वैसी ही पटकथा दिखाई दे रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार दांव बंगाल की सबसे बड़ी विपक्षी शक्ति पर लगा है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दृष्टि से देखें तो यह ममता बनर्जी के नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा झटका माना जाएगा। बंगाल में भाजपा लगातार तृणमूल कांग्रेस को घेरने की कोशिश कर रही है और अब यदि लोकसभा में पार्टी का बड़ा हिस्सा अलग खड़ा हो जाता है, तो विपक्षी राजनीति में ममता की राष्ट्रीय भूमिका कमजोर पड़ सकती है। खासकर ऐसे समय में जब विपक्षी एकता की राजनीति पहले ही बिखराव का शिकार है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, भाजपा के लिए यह घटनाक्रम अप्रत्यक्ष राजनीतिक लाभ लेकर आ सकता है। बागी सांसदों ने पहले ही राजग को समर्थन देने के संकेत दिए हैं। यदि यह समीकरण आगे बढ़ता है, तो संसद में सत्ता पक्ष की स्थिति और मजबूत हो सकती है।</div><div><br></div><div>सबसे तीखी चोट हालांकि राजनीति की नैतिकता पर पड़ती दिखाई देती है। जिस दल ने दलबदलुओं को नकारने का नारा दिया था, वही अब दलबदल की सबसे बड़ी प्रयोगशाला बन गया है। यह भारतीय राजनीति का वह चेहरा है, जहां विचारधारा से ज्यादा महत्व संख्या, सत्ता और कानूनी चालों का रह गया है। छोटे दल अब केवल चुनाव लड़ने के मंच नहीं, बल्कि राजनीतिक पुनर्जन्म के औजार बनते जा रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की यह टूटन आने वाले दिनों में केवल बंगाल की राजनीति नहीं बदलेगी, बल्कि यह तय करेगी कि देश में दलबदल कानून की असली ताकत कितनी बची है। संसद, अदालत और चुनाव आयोग, तीनों की अग्निपरीक्षा अब शुरू हो चुकी है। उधर, एनसीपीआई पार्टी के कार्यालय के बाहर इन दिनों कौतूहल के साथ लोग इकट्ठा हो रहे हैं। आसपास के लोगों का तो यहां तक कहना है कि हमें तो पता ही नहीं था कि यहां से कोई पार्टी चल रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 15:45:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/tmc-rebel-mps-merge-with-ncpi-political-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सही कहा था Modi ने... एक एक बूंद पानी के लिए तरस रहा Pakistan, नहरें सूखीं, खेत बंजर हो रहे, शहरों में भी जल संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-indus-water-strategy-pakistan-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने जो रणनीतिक कदम उठाया था उसका असर अब पाकिस्तान के खेतों और उसकी अर्थव्यवस्था पर साफ दिखाई देने लगा है। भले पाकिस्तान पानी की कमी से त्राहि त्राहि कर रहा हो लेकिन भारत के केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने साफ कह दिया है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली से एक बूंद पानी भी नहीं मिलेगा, जबकि रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह पहले ही चेतावनी दे चुके हैं कि आतंकवाद को संरक्षण देने वालों तक भारत सिंधु का पानी नहीं पहुंचने देगा। हम आपको बता दें कि सिंधु जल समझौते को स्थगित करने के फैसले ने पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी पर चोट कर दी है। सिंध और बलूचिस्तान में नहरें सूख रही हैं, खेत बंजर होने लगे हैं और किसानों में भारी बेचैनी फैल गई है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान में हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि वहां के राजनीतिक नेता, किसान संगठन और जल विशेषज्ञ खुलकर चेतावनी दे रहे हैं कि यह केवल जल संकट नहीं, बल्कि “आर्थिक कत्लेआम” की शुरुआत है। सिंध, जहां कराची जैसा आर्थिक केंद्र मौजूद है, वहां पानी की कमी ने पूरे तंत्र को हिला दिया है। बलूचिस्तान के कई इलाके भी अब इसी तबाही की चपेट में हैं। यह संकट पाकिस्तान की लगभग एक तिहाई आबादी को प्रभावित कर रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/60-trucks-bound-for-pakistan-set-ablaze-what-was-found-inside-caused-a-stir" target="_blank">पाकिस्तान जा रहे 60 ट्रकों को लगा दी आग, अंदर जो निकला, मचा हड़कंप!</a></h3><div>देखा जाये तो भारत ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद केवल सैन्य जवाब नहीं दिया, बल्कि कूटनीतिक मोर्चे पर भी ऐसी चोट की जिसने इस्लामाबाद की नींद उड़ा दी। ऑपरेशन सिंदूर के बाद नई दिल्ली ने सिंधु जल समझौते को स्थगित करके दुनिया को संदेश दिया कि आतंक फैलाने वालों को अब हर मोर्चे पर कीमत चुकानी होगी। हम आपको बता दें कि मोदी सरकार अब अपने इरादे को केवल राजनीतिक बयान तक सीमित नहीं रख रही, बल्कि उसे जमीन पर उतारने की तैयारी भी तेज कर चुकी है। केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सीआर पाटिल ने साफ शब्दों में कहा है कि आने वाले वर्षों में पाकिस्तान को सिंधु नदी प्रणाली से एक बूंद पानी भी नहीं मिलेगा। उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर सरकार सीमा पार पानी के प्रवाह को रोकने के लिए हर संभव कदम उठा रही है। पाटिल ने यह भी कहा कि गृह मंत्री अमित शाह खुद इस पूरी प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने दो टूक कहा कि भारत अब आतंकवाद को संरक्षण देने वालों तक सिंधु का पानी नहीं पहुंचने देगा। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर और सिंधु जल संधि को रोकने का फैसला दुनिया को यह बताने के लिए काफी है कि भारत अब शांति की भाषा न समझने वालों को उसी की भाषा में जवाब देना जानता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, जल की कमी का असर पाकिस्तान के सबसे महत्वपूर्ण सिंचाई ढांचे सुक्कुर बैराज पर साफ दिखाई दे रहा है। सिंधु नदी पर बना यह विशाल ढांचा लाखों एकड़ खेती को जीवन देता है। लेकिन अब यहां से निकलने वाली नहरों में पानी तेजी से घट रहा है। उत्तर पश्चिम नहर में 64 प्रतिशत से अधिक कमी दर्ज की गई है। राइस नहर लगभग 38 प्रतिशत घाटे में चल रही है, जबकि दादू नहर की हालत सबसे भयावह है, जहां 82 प्रतिशत तक पानी कम हो चुका है।</div><div><br></div><div>स्थिति इतनी गंभीर हो चुकी है कि कई नहरों में तय हिस्से का केवल एक चौथाई पानी पहुंच रहा है। दादू नहर को जहां लगभग पांच हजार क्यूसेक पानी मिलना चाहिए था, वहां केवल आठ सौ साठ क्यूसेक पानी पहुंच रहा है। उत्तर पश्चिम नहर को छह हजार से अधिक क्यूसेक के बदले केवल 2100 क्यूसेक पानी मिल रहा है। किसान धान की नर्सरी तक तैयार नहीं कर पा रहे हैं। खेत सूख रहे हैं और गांवों में बेचैनी फैल रही है।</div><div><br></div><div>यहां एक और बात यह भी है कि पाकिस्तान के भीतर ही पानी की लूट और असमान वितरण ने भी आग में घी डाल दिया है। सिंध सिंचाई विभाग के आंकड़े बताते हैं कि पंजाब अपने तय हिस्से से 21 प्रतिशत अधिक पानी खींच रहा है। तौंसा बैराज भी तय सीमा से ज्यादा पानी ले रहा है। दूसरी तरफ निचले इलाकों में नहरें सूख रही हैं। इसका मतलब साफ है कि पाकिस्तान का आंतरिक ढांचा भी अब टूटने लगा है।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि वहां राजनीतिक युद्ध छिड़ चुका है। जमात-ए-इस्लामी ने पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की सिंध सरकार को पानी संकट के लिए जिम्मेदार ठहराया है। वहीं पीपुल्स पार्टी संघीय तंत्र और जल प्रबंधन एजेंसियों पर हमला बोल रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता निसार अहमद खुह्रो ने खुलकर कहा है कि सिंध देश की 67 प्रतिशत कृषि उपज पैदा करता है, फिर भी उसे उसके हिस्से का पानी नहीं दिया जा रहा। उन्होंने खरीफ मौसम में पानी कटौती को सिंध का “आर्थिक कत्लेआम” बताया।</div><div><br></div><div>दरअसल पाकिस्तान की सबसे बड़ी कमजोरी अब उजागर हो रही है। उसकी पूरी कृषि व्यवस्था सिंधु नदी प्रणाली पर टिकी हुई है। वहां की अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण रोजगार का विशाल हिस्सा इसी पानी पर निर्भर है। भारत ने पहली बार इस कमजोरी को रणनीतिक हथियार में बदल दिया है। यह केवल पानी रोकने का मामला नहीं, बल्कि पाकिस्तान को यह समझाने की कोशिश है कि आतंकवाद की कीमत केवल सीमा पर नहीं, बल्कि देश की आंतरिक स्थिरता पर भी चुकानी पड़ेगी।</div><div><br></div><div>रणनीतिक दृष्टि से देखें तो भारत का यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है। दशकों तक पाकिस्तान आतंक को राज्य नीति की तरह इस्तेमाल करता रहा, जबकि भारत केवल सैन्य जवाब तक सीमित था। लेकिन अब तस्वीर बदल चुकी है। नई दिल्ली ने जल, कूटनीति और आर्थिक दबाव को एक साथ जोड़कर बहुस्तरीय रणनीति तैयार की है। इसका असर केवल आज के संकट तक सीमित नहीं रहेगा। आने वाले महीनों में यदि पाकिस्तान के भीतर पानी को लेकर प्रांतीय संघर्ष और बढ़ते हैं, तो वहां राजनीतिक अस्थिरता, कृषि संकट और आर्थिक दबाव और गहरा सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सबसे बड़ा संदेश यही है कि भारत अब केवल जवाब देने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वह दुश्मन की सबसे कमजोर नस पहचानकर वहां चोट करने की नीति पर चल रहा है। पाकिस्तान ने वर्षों तक आतंक को हथियार बनाकर भारत को लहूलुहान करने की कोशिश की, लेकिन अब वही नीति उसकी अपनी धरती को सुखाने लगी है। सिंध और बलूचिस्तान के सूखे खेत बता रहे हैं कि भारत ने इस बार ऐसा प्रहार किया है जिसकी गूंज बहुत दूर तक जाएगी। वैसे भी नरेंद्र मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी खासियत भी यही मानी जाती है कि शुरुआत में अक्सर लगता है जैसे उनके फैसले का कोई बड़ा असर नहीं पड़ा, लेकिन समय बीतते ही पता चलता है कि चोट बेहद गहरी थी। आज पाकिस्तान के खेत, उसकी नहरें और उसकी बिखरती अर्थव्यवस्था उसी गहरी मार की कहानी कह रहे हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 17:57:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-indus-water-strategy-pakistan-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[भारत में तो कई बार देखी होगी, अब अमेरिकी सांसदों की भिड़ंत देखिये, Ilhan Omar को Nancy Mace का करारा जवाब छा गया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nancy-mace-vs-ilhan-omar-us-congress-controversy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में आपने कई बार नेताओं और नेत्रियों के बीच तीखी बहस, जुबानी जंग और राजनीतिक कटाक्ष देखे होंगे, लेकिन इस बार अमेरिका से जो मामला सामने आया है उसने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। अमेरिकी राजनीति में दो महिला सांसदों के बीच छिड़ी इस भीषण टकराहट ने वहां के लोकतंत्र, प्रवासी राजनीति और राष्ट्रवाद की बहस को नए सिरे से हवा दे दी है। खास बात यह रही कि इस पूरे विवाद में सोमालिया में जन्मीं सांसद इल्हान उमर को करारा जवाब मिला और मामला केवल व्यक्तिगत कटाक्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अमेरिकी संसद में विदेशी मूल के नेताओं की भूमिका तक पहुंच गया।</div><div><br></div><div>दरअसल अमेरिका की रिपब्लिकन सांसद नैन्सी मेस ने एक ऐसा संवैधानिक संशोधन प्रस्तावित कर दिया है जिसने वहां की राजनीति में भूचाल ला दिया है। नैन्सी मेस का कहना है कि जिस तरह अमेरिका का राष्ट्रपति केवल जन्म से अमेरिकी नागरिक ही बन सकता है, उसी तरह संसद के सदस्य, संघीय न्यायपालिका और सीनेट से मंजूर होने वाले महत्वपूर्ण पदों पर भी केवल जन्मजात अमेरिकी नागरिकों को ही बैठने का अधिकार होना चाहिए। उन्होंने साफ कहा कि विदेशी मूल के लोग अमेरिकी राजनीति में रहकर दूसरे देशों के प्रति निष्ठा रखते हैं और इससे अमेरिका के हित प्रभावित होते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/how-uae-qatar-and-pakistan-persuaded-trump-to-halt-attacks-on-iran" target="_blank">Iran पर Attack से Trump को किसने रोका? UAE, कतर और Pakistan की एक फोन कॉल ने बदला खेल</a></h3><div>नैन्सी मेस ने सीधे तौर पर इल्हान उमर, श्री थानेदार और प्रमिला जयपाल जैसे नेताओं का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि इन नेताओं की वफादारी अमेरिका से ज्यादा दूसरे देशों के प्रति दिखाई देती है। उन्होंने कहा कि बहुत लंबे समय से अमेरिका ने विदेशी मूल के लोगों को सत्ता के महत्वपूर्ण पदों तक पहुंचने दिया और अब इसे खत्म करने का समय आ गया है। नैन्सी मेस ने यहां तक कह दिया कि अगर यह संवैधानिक संशोधन लागू होता है तो वह इसे पुराने मामलों पर भी लागू करने के पक्ष में हैं, यानी पहले से संसद में मौजूद विदेशी मूल के नेताओं की सदस्यता भी खतरे में पड़ सकती है।</div><div><br></div><div>इस बयान के बाद अमेरिकी राजनीति में जबरदस्त हंगामा मच गया। इल्हान उमर ने शुरुआत में इस प्रस्ताव को हल्के अंदाज में लेते हुए केवल इतना कहा, “उन्हें शुभकामनाएं।” लेकिन मामला यहीं नहीं रुका। प्रमिला जयपाल ने नैन्सी मेस के प्रस्ताव को नस्लवादी, संकीर्ण सोच वाला और प्रवासियों का अपमान करने वाला कदम बताया। जयपाल ने कहा कि जब अमेरिकी जनता महंगाई, किराया और रोजमर्रा की परेशानियों से जूझ रही है तब नैन्सी मेस जैसे नेता असली मुद्दों से ध्यान भटकाकर विभाजनकारी राजनीति कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन विवाद ने और विस्फोटक रूप तब लिया जब दक्षिण कैरोलाइना के गवर्नर पद के रिपब्लिकन प्राथमिक चुनाव में नैन्सी मेस को करारी हार का सामना करना पड़ा। चुनाव में वह पांचवें स्थान पर रहीं। इसके बाद इल्हान उमर ने उन पर तीखा तंज कसते हुए कहा, “तुम जहां से आई हो वहां का एक तरफा टिकट तुम्हारे नाम पर तैयार है।” यह टिप्पणी सीधे तौर पर उसी पुराने बयान की याद दिलाने वाली थी जब नैन्सी मेस ने इल्हान उमर से कहा था कि उनके नाम का एक तरफा टिकट सोमालिया के लिए तैयार है।</div><div><br></div><div>इल्हान उमर की इस टिप्पणी पर नैन्सी मेस ने बेहद आक्रामक अंदाज में पलटवार किया। उन्होंने कहा, “तुम मेरे बारे में कुछ भी कह लो, लेकिन मैं कभी अपने भाई से शादी नहीं करूंगी।” यह बयान इल्हान उमर को लेकर लंबे समय से चल रहे उन विवादों की ओर इशारा माना गया जिनमें उन पर अपने भाई से विवाह करने के आरोप लगाए जाते रहे हैं। हालांकि उमर इन आरोपों को पहले भी नकार चुकी हैं, लेकिन अमेरिकी राजनीति में यह मुद्दा बार-बार उछलता रहा है। एक अमेरिकी सांसद ने टीवी चैनल से बातचीत करते हुए आरोप लगाया है कि इल्हान उमर ने अपने भाई अहमद नूर सईद एल्मी से शादी की थी ताकि उन्हें अमेरिका में रहने और पढ़ाई करने के लिए कानूनी दस्तावेज मिल सकें। उन्होंने कहा कि बाद में जब यह मामला सार्वजनिक हुआ, तो 2017 में दोनों का तलाक हो गया और इसके बाद इल्हान उमर ने अहमद अब्दिसलान हिरसी से विवाह किया। उन्होंने यह भी कहा कि 2019 में इल्हान उमर के निजी जीवन को लेकर फिर विवाद खड़ा हुआ, जब उनके राजनीतिक सलाहकार टिम माइनट के साथ अनैतिक संबंधों की खबरें सामने आईं। साथ ही यह भी आरोप लगाए गए कि 2018 से 2020 के बीच उनकी चुनावी कैंपेन से माइनट की कंपनी को बड़ी रकम का भुगतान किया गया। इन घटनाओं के चलते इल्हान उमर लगातार राजनीतिक और व्यक्तिगत विवादों के केंद्र में बनी रहीं।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, कई राजनीतिक विश्लेषकों और सामाजिक संगठनों ने माना है कि इल्हान उमर पर किया गया कटाक्ष केवल व्यक्तिगत हमला नहीं था, बल्कि यह उनके धार्मिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि की ओर भी इशारा करता दिखाई दिया। इल्हान उमर मुस्लिम समुदाय से आती हैं जहां रिश्तों की परवाह किये बिना शादी करने की खबरें आम रहती हैं। आलोचकों का कहना है कि नैन्सी मेस का बयान राजनीतिक जवाब से आगे बढ़कर पहचान और धर्म आधारित हमले जैसा नजर आया, जिसने अमेरिका में पहले से चल रही धार्मिक और सामाजिक ध्रुवीकरण की बहस को और तेज कर दिया।</div><div><br></div><div>उधर, इस विवाद में एक और सांसद सारा मैकब्राइड भी कूद पड़ीं। उन्होंने नैन्सी मेस की चुनावी हार पर तंज कसते हुए व्यंग्यात्मक टिप्पणी की। इसके जवाब में नैन्सी मेस ने एक और तीखा बयान जारी करते हुए कहा कि कम से कम उन्हें अपने लिंग को लेकर कभी भ्रम नहीं रहा और न ही वह अपने भाई से शादी करेंगी। इस बयान ने विवाद को और ज्यादा भड़का दिया। यही नहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने तो और भी ज्यादा आगे बढ़ते हुए कह दिया कि वो सोमालिया से यहां आई, अपने भाई से शादी की और अब हमें संविधान का लेक्चर सुना रही है।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह पूरा मामला केवल व्यक्तिगत हमलों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे अमेरिका में तेजी से उभर रही राष्ट्रवादी राजनीति, प्रवासियों की भूमिका और पहचान की राजनीति का बड़ा संघर्ष छिपा हुआ है। नैन्सी मेस का प्रस्ताव अगर आगे बढ़ता है तो यह अमेरिकी संविधान में बेहद बड़ा बदलाव साबित हो सकता है। हालांकि इस संशोधन को लागू करना आसान नहीं होगा, क्योंकि इसके लिए संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत और फिर अमेरिका के तीन चौथाई राज्यों की मंजूरी जरूरी होगी।</div><div><br></div><div>फिलहाल अमेरिका में यह मुद्दा जबरदस्त राजनीतिक ध्रुवीकरण पैदा कर चुका है। एक पक्ष इसे राष्ट्रहित और देशभक्ति का सवाल बता रहा है तो दूसरा पक्ष इसे खुला नस्लवाद और प्रवासी विरोधी राजनीति करार दे रहा है। लेकिन इतना तय है कि इल्हान उमर और नैन्सी मेस के बीच छिड़ी यह जंग अब केवल दो नेताओं की बहस नहीं रह गई है, बल्कि यह अमेरिका की बदलती राजनीति का सबसे विस्फोटक चेहरा बन चुकी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nancy-mace-vs-ilhan-omar-us-congress-controversy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[भारत के माथे पर कलंक है 'बालश्रम' की समस्या]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-problem-of-child-labour-is-a-stain-on-india-forehead]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>‘बालश्रम’ समस्या दशकों से न सिर्फ भारत में, बल्कि समूचे संसार में प्रचलित रही है। वैसे, बालश्रम अपने आप में किसी कलंक से कम नहीं? भारत की बात करें, तो लाखों की संख्या में नौनिहाल विभिन्न राज्यों में&nbsp; किसी न किसी मजबूरी के चलते अपने जीवन को श्रम की भट्टियों में झुका हुआ है। हालांकि, सरकारी और सामाजिक स्तर पर रोकने की कोशिशों में कोई कोर-कसर नहीं? पर, समस्या घटने के जगह बढ़ ही रही है दिनोंदिन। आज ‘विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’ है जो सालाना 12 जून को मनाया जाता है। इसकी शुरूआत वर्ष-2002 में ‘अंनराष्टृीय श्रम संगठन’ की अगुआई में बड़े वैचारिक स्तर पर मुकर्रर की गई थी। दिवस का आज 24वीं संस्करण पूरे विश्व में मनाया जा रहा है। मकसद, चाइल्ड लेबर के विरूद्व वैश्विक मंचों पर ईमानदारी से जागरूकता फैलाना और बच्चों के अधिकारों की रक्षा करने को लेकर जनमानस को आहवान करना।&nbsp;</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>कानून और संविधान में प्रत्येक बच्चे को शिक्षा, स्वास्थ्य और सम्मान सहित गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार सुनिश्चित है। बावजूद इसके गरीब, अक्षम और असहाय बच्चों के साथ असमानता और भेदभाव किया जाता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद-24 के मुताबिक किसी भी कर-कारखानों में 14 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के रोजगार पर पूर्ण प्रतिबंध होने के बाद भी चोरी-छिपे बच्चों से काम करवाया जाता है। ये बात शासन से लेकर स्थानीय प्रशासन के लोग भी भली भांति जानते हंै। लेकिन कार्रवाई के जगह अपनी आंख मूंदे रहते हंै। जबकि, ऐसा नहीं किया जाना चाहिए। केंद्र सरकार ने साल-1986 में बाल श्रम के विरूद्व रोकथाम के लिए कठोर अधिनियम बनाया था जिसके तहत बच्चों को खतरनाक जगहों जैसे खादानों, मशीनरी कारखानों में जबरन काम करवाने वालों पर दंडनीय अपराध का प्रावधान तय किया था। लेकिन इस कठोर कानून की भी खुलआम धज्जियां उड़ाई जाती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/childhood-should-have-the-right-to-education-protection-and-respect-not-labor" target="_blank">World Day Against Child Labour 2026: बचपन को श्रम नहीं, शिक्षा, सुरक्षा और सम्मान का अधिकार मिलें</a></h3><div>दरअसल, बाल श्रम ऐसा अभिशाप है जो किसी भी विकसित मुल्क की प्रगति में घोर बाधक रूपी असर छोड़ता है। बीते वर्ष ‘विश्व बाल श्रम निषेध दिवस’-2025 की थीम थी ‘प्रगति स्पष्ट है, लेकिन अभी और काम करना बाकी है’। वहीं, इस वर्ष यानी 2026 की थीम है ‘बाल श्रम को लाल कार्ड-बच्चों के लिए उचित खेल, वयस्कों के लिए सम्मानजनक काम’ रखी गई है। गंभीरता से अगर विमर्श करें, तो ये दिवस तभी सफलता अर्जित कर पाएगा। जब सभी एकजुट होकर इस बुराई से लड़ेंगे। संकल्प लें कि बाल श्रम के खिलाफ समाज में जागरूकता फैलाएंगे और मासूमों के बचपन के साथ खिलवाड़ नहीं होने देंगे। बच्चे देश का भविष्य हैं। हम सबका दायित्व है कि इन्हें बेहतर ‘आज’ दें ताकि सुनहरे ‘कल’ का निर्माण कर सकें।&nbsp; ं</div><div><br></div><div>बालश्रम के विश्वस्तरीय आंकड़े रोंगटे खड़े करते हैं। बाल अधिकार रक्षक संस्थाओं और उनके विशेषज्ञों के अनुसार करीब 1 करोड़ 1 लाख बच्चे पूरे भारत में बाल श्रम में शामिल हैं जिनमें 56 लाख लड़के और 45 लाख लड़किया, जिनकी उम्र 5 से 14 के बीच है। ये बच्चे बीड़ी बनाना, सूत काटना, होटल-ढाबो में चाकरी करना, कृषि कार्यों, कालीन बुनाई व घरेलू कार्यों में ज्यादा लगे हैं। उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, महाराष्टृ और मध्यप्रदेश में बाल श्रमिकों की सर्वाधिक संख्या को सरकार की अधिकृत बाल समितियों द्वारा बताई है। वहीं, पूरे विश्व में बाल श्रमिकों की बात करें, तो ‘अंतर्राष्टृीय श्रम संगठन’ और ‘यूनिसेफ’ की रिपोर्टस् के मुताबिक दुनिया के 198 देशों में इस समय 13 करोड़ 80 लाख से अधिक बच्चे इस वक्त चाइल्ड लेबर में संलिप्त हैं। यानी प्रत्येक 10वें बच्चे पर एक बच्चा बाल मजदूरी कर रहा है। इस कंलक को जड़ से खत्म करने के लिए एक और वैश्विक मंच सजाने की जरूरत है जहां इस मसले पर विमर्श करके पूर्व समाधान का कोई मुकम्मल रास्ता निकाला जा सके।</div><div><br></div><div>जनगणना 2011 के अनुसार भारत में 5-11 वर्ष आयु वर्ग की कुल बाल जनसंख्या 259.6 मिलियन थी जिसमें 10 मिलियन से अधिक यानी 4 फीसदी आबादी बाल श्रमिकों की पाई गई थी। आज 2026 में 146 करोड़ आबादी में इन आंकड़ों पर गौरफरमाते हैं तो ये आंकड़े काफी बढ़े दिखाई देते हैं। बाल अपराध, बाल श्रमिकों की संख्या में इजाफा बीते कुछ दशकों में तेजी से बढ़ा है। भारत में सालाना करीब 2.3 से 2.5 करोड़ बच्चे पैदा होते हैं। हर दिन औसतन 63 हजार से 73 हजार बच्चे जन्म लेते हैं जिसमें गरीब और अल्पसंख्यकों की संख्या सर्वाधिक है। हालांकि, ‘हम दो, हमारे दो’ के स्लोगन के बाद शिक्षित वर्ग में जनसंख्या नियंत्रण भाग पनपा है। बाल श्रम कलंक को मिटाने के लिए सबसे पहले प्राथमिक शिक्षा पर ज्यादा जोर देना होगा। शिक्षा के अधिकार की अलख शहरों के मुकाबले कस्बों-गांवों में ज्यादा फैलाने की दरकार है। केंद्र व राज्यों सरकारों को नई नीति बनानी होगी जिसमें शुरुआती शिक्षा से कोई बच्चा वंचित न रह सके। ऐसा करने के बाद ही बाल श्रम जैसे अभिशाप से मुक्ति पाने की कल्पना की जा सकेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 13:19:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-problem-of-child-labour-is-a-stain-on-india-forehead</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आखिर भारत की बढ़ती परमाणु ताकत से चौकन्ना क्यों होने लगा अंतरराष्ट्रीय जगत?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-has-the-international-community-started-to-become-wary-of-india-growing-nuclear-might]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की बढ़ती परमाणु शक्ति से दुनिया में व्यापक भय कम और रणनीतिक सतर्कता अधिक है, क्योंकि भारत की सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक ताकत जितनी बढ़ेगी, उसकी परमाणु क्षमताओं पर वैश्विक चर्चा और निगरानी भी उतनी ही बढ़ेगी। भारत आज उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनकी सामरिक शक्ति वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल, SIPRI 2026 रिपोर्ट का संदेश यह है कि भारत की परमाणु शक्ति में वृद्धि संख्या के स्तर पर सीमित है, लेकिन उसकी गुणवत्ता, तैनाती और परिचालन क्षमता में हो रहे बदलाव कहीं अधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। ताज़ा Stockholm International Peace Research Institute (SIPRI) रिपोर्ट के अनुसार भारत की परमाणु क्षमता में क्रमिक लेकिन महत्वपूर्ण वृद्धि हुई है। SIPRI Yearbook 2026 के अनुसार भारत की परमाणु क्षमता में लगातार वृद्धि और आधुनिकीकरण जारी है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># रिपोर्ट के कुछ प्रमुख निष्कर्ष इस प्रकार हैं:-</h2><div><br></div><div>पहला, भारत के परमाणु वारहेड (nuclear warheads) का अनुमानित भंडार जनवरी 2026 तक बढ़कर 190 हो गया है, जो पिछले वर्ष लगभग 180 था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-nuclear-warheads-deployed-china-pakistan-warning" target="_blank">Shaurya Path: India ने पहली बार तैनात किये 12 Nuclear Warheads, China और Pakistan की किसी भी दुस्साहसी हरकत का तुरंत मिलेगा जवाब</a></h3><div>दूसरा, SIPRI ने पहली बार आकलन किया है कि भारत के लगभग 12 परमाणु वारहेड "तैनात" (deployed) अवस्था में हैं। पहले भारत आमतौर पर वारहेड और डिलीवरी सिस्टम (मिसाइल/विमान) को अलग-अलग रखता था।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, भारत का परमाणु आधुनिकीकरण अब अधिकाधिक China तक पहुंच रखने वाली लंबी दूरी की मिसाइलों, समुद्री प्रतिरोधक क्षमता (sea-based deterrence) और नई डिलीवरी प्रणालियों पर केंद्रित है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, भारत का परमाणु आधुनिकीकरण अब अधिकाधिक लंबी दूरी की उन प्रणालियों पर केंद्रित है जो पूरे China तक पहुंचने में सक्षम हों। भारत की रणनीतिक योजना में Pakistan के साथ पारंपरिक प्रतिद्वंद्विता अभी भी महत्वपूर्ण है, लेकिन चीन को ध्यान में रखकर भी क्षमताओं का विस्तार किया जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत की परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता (भूमि, वायु और समुद्र आधारित प्रतिरोधक शक्ति) परिपक्व हो रही है और समुद्र-आधारित प्रतिरोधक क्षमता को विशेष महत्व दिया जा रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div># SIPRI की रिपोर्ट में भारत-पाकिस्तान-चीन तुलना इस प्रकार है-&nbsp; देश/अनुमानित परमाणु वारहेड (जनवरी 2026)- China- लगभग 620, India- लगभग 190 और Pakistan- लगभग 170।</div><div><br></div><h2># समझिए, आखिर दुनिया क्यों ध्यान दे रही है?</h2><div><br></div><div>SIPRI का कहना है कि भारत उन देशों में शामिल है जो अपने परमाणु शस्त्रागार का आधुनिकीकरण कर रहे हैं। विशेष चिंता इस बात को लेकर है कि वैश्विक स्तर पर परमाणु हथियारों की भूमिका फिर बढ़ रही है और कई देश अधिक परिचालन-तत्पर (operationally ready) परमाणु बल विकसित कर रहे हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि भारत केवल वारहेड की संख्या नहीं बढ़ा रहा, बल्कि नई मिसाइल प्रणालियां, लंबी दूरी की क्षमताएं, MIRV तकनीक तथा समुद्री परमाणु प्रतिरोधक क्षमता विकसित कर रहा है। इससे भारत की "द्वितीय प्रहार क्षमता" (Second Strike Capability) और अधिक मजबूत होती है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># सवाल: क्या यह चिंता भारत-विरोधी है?</h2><div><br></div><div>आवश्यक नहीं, क्योंकि भारत को अक्सर एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में देखा जाता है, जिसने अपेक्षाकृत संयमित परमाणु नीति अपनाई है। फिर भी, क्योंकि परमाणु हथियारों का प्रभाव वैश्विक होता है, इसलिए भारत की बढ़ती क्षमता को लेकर दुनिया में स्वाभाविक रूप से रणनीतिक विश्लेषण, निगरानी और सतर्कता बनी रहती है।</div><div><br></div><h2># यक्ष प्रश्न: क्या दुनिया वास्तव में भारत से डरती है?</h2><div><br></div><div>अधिकांश पश्चिमी देशों और रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का परमाणु कार्यक्रम मुख्यतः "विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध" (Credible Minimum Deterrence) और "पहले उपयोग नहीं" (No First Use) जैसे सिद्धांतों पर आधारित रहा है। इसलिए भारत को आमतौर पर एक जिम्मेदार परमाणु शक्ति के रूप में देखा जाता है। हालांकि उसके पड़ोसी देशों और कुछ रणनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के लिए उसकी बढ़ती क्षमता चिंता का विषय हो सकती है।</div><div><br></div><h2># जानिए इसके राजनीतिक और सामरिक मायने</h2><div><br></div><div>पहला, भारत अब केवल दक्षिण एशिया की नहीं, बल्कि व्यापक एशियाई शक्ति-संतुलन की गणना में शामिल हो चुका है। China और Pakistan दोनों को ध्यान में रखकर भारत अपनी प्रतिरोधक क्षमता को उन्नत कर रहा है। एशिया में चीन, भारत और पाकिस्तान के बीच सामरिक संतुलन आने वाले वर्षों में वैश्विक सुरक्षा विमर्श का प्रमुख विषय बना रह सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, भारत की "विश्वसनीय न्यूनतम प्रतिरोध" (Credible Minimum Deterrence) नीति बरकरार है, लेकिन परिचालन तत्परता (operational readiness) बढ़ने के संकेतों ने वैश्विक रणनीतिक समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। इस प्रकार से भारत अब केवल न्यूनतम प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने तक सीमित नहीं दिख रहा, बल्कि उसकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक विश्वसनीय और त्वरित प्रतिक्रिया योग्य बन रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, समुद्र-आधारित परमाणु क्षमता और लंबी दूरी की मिसाइलों के कारण भारत की "दूसरे प्रहार" (second-strike) की क्षमता मजबूत हो रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चौथा, ताज़ा SIPRI रिपोर्ट भारत को एक ऐसी परमाणु शक्ति के रूप में देखती है जो संख्या की दृष्टि से धीरे-धीरे बढ़ रही है, लेकिन उससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि उसकी परमाणु क्षमता पहले की तुलना में अधिक आधुनिक, तैनात और परिचालन रूप से सक्षम होती जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># आखिर क्यों भारत की परमाणविक क्षमता को लेकर दुनिया में सतर्कता और रणनीतिक चिंता दिखाई देती है?&nbsp;</h2><div><br></div><div>भारत की परमाणविक क्षमता को लेकर दुनिया में जो सतर्कता और रणनीतिक चिंता दिखाई देती है, उसके पीछे कई भू-राजनीतिक और सामरिक कारण हैं। यह चिंता केवल भारत तक सीमित नहीं है; किसी भी परमाणु शक्ति के बारे में वैश्विक समुदाय इसी प्रकार सतर्क रहता है।</div><div><br></div><div>एक, एशिया में बदलता शक्ति-संतुलन: भारत आज एशिया की प्रमुख शक्तियों में से एक है। उसकी बढ़ती सैन्य और आर्थिक क्षमता का प्रभाव सीधे China, Pakistan और व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र पर पड़ता है। इसलिए भारत की परमाणु शक्ति में हर वृद्धि क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दो, एशिया के दो परमाणु पड़ोसियों के साथ जटिल संबंध: भारत की सीमाएं दो परमाणु-संपन्न देशों—China और Pakistan—से जुड़ी हैं। सीमा विवाद, आतंकवाद और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के कारण किसी भी संकट की स्थिति में परमाणु आयाम जुड़ जाने की आशंका रणनीतिक विशेषज्ञों को चिंतित रखती है।</div><div><br></div><div>तीन, लंबी दूरी की मिसाइलों का विकास: भारत की उन्नत मिसाइल प्रणालियां उसकी प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाती हैं। लेकिन जब कोई देश दूरस्थ लक्ष्यों तक मार करने वाली क्षमता विकसित करता है, तो अन्य देश उसके दीर्घकालिक सामरिक उद्देश्यों और शक्ति-प्रक्षेपण क्षमता का अध्ययन करने लगते हैं। भारत की Agni-V और उससे आगे विकसित हो रही मिसाइल प्रणालियां एशिया के बड़े हिस्से तक पहुंचने में सक्षम हैं। इससे भारत की प्रतिरोधक (deterrence) क्षमता बढ़ी है, जो वैश्विक रणनीतिक समीकरणों को प्रभावित करती है।</div><div><br></div><div>चार, हिंद महासागर का बढ़ता महत्व: भारत की समुद्री परमाणु क्षमता, विशेषकर परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती, हिंद महासागर क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करती है। यह क्षेत्र वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, इसलिए यहां शक्ति-संतुलन में बदलाव दुनिया का ध्यान आकर्षित करता है। इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन बना है। भारत की बढ़ती सामरिक ताकत का सीधा प्रभाव एशिया के शक्ति-संतुलन पर पड़ता है। विशेषकर China और Pakistan भारत की सैन्य क्षमताओं पर बारीकी से नजर रखते हैं। इससे क्षेत्रीय हथियार प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका बनी रहती है।</div><div><br></div><div>पांच, वैश्विक शक्ति के रूप में भारत का उदय: भारत केवल सैन्य शक्ति नहीं, बल्कि एक बड़ी अर्थव्यवस्था, तकनीकी केंद्र और उभरती वैश्विक कूटनीतिक शक्ति भी है। जब किसी देश का वैश्विक प्रभाव बढ़ता है, तो उसकी परमाणु क्षमता का महत्व भी बढ़ जाता है। इसलिए प्रमुख शक्तियां भारत की रक्षा और परमाणु नीतियों पर विशेष नजर रखती हैं। अब भारत केवल परमाणु शक्ति ही नहीं, बल्कि तेजी से उभरती आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति भी है। इसलिए विश्व की बड़ी शक्तियां भारत की सैन्य क्षमताओं को उसके बढ़ते अंतरराष्ट्रीय प्रभाव के संदर्भ में देखती हैं।</div><div><br></div><div>छह, संकट प्रबंधन की चुनौती: दुनिया की चिंता का एक कारण यह भी है कि परमाणु हथियारों से लैस देशों के बीच किसी भी सैन्य टकराव का प्रभाव सीमाओं से बहुत आगे तक जा सकता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय चाहता है कि सभी परमाणु शक्तियां संयम, संवाद और विश्वसनीय कमान-नियंत्रण व्यवस्था बनाए रखें।</div><div><br></div><div>सात, परमाणु हथियारों के प्रसार को लेकर चिंता: दुनिया के अधिकांश देश चाहते हैं कि परमाणु हथियारों की संख्या और भूमिका सीमित रहे। किसी भी देश की बढ़ती परमाणु क्षमता को इसलिए भी सावधानी से देखा जाता है ताकि वैश्विक हथियार नियंत्रण व्यवस्था पर उसका प्रभाव समझा जा सके।</div><div><br></div><div>आठ, भारत की बढ़ती सैन्य-तकनीकी क्षमता: भारत ने पिछले दो दशकों में अपनी परमाणु त्रिस्तरीय क्षमता (Nuclear Triad) को मजबूत किया है। यानी भारत अब भूमि, वायु और समुद्र—तीनों माध्यमों से परमाणु हथियार दागने की क्षमता रखता है। इसमें INS Arihant जैसी परमाणु पनडुब्बियों की भूमिका महत्वपूर्ण है।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि भारत की परमाणु शक्ति को लेकर दुनियावी सतर्कता का सबसे बड़ा कारण भय नहीं, बल्कि यह तथ्य है कि भारत अब वैश्विक शक्ति-संतुलन को प्रभावित करने वाली प्रमुख शक्तियों में शामिल हो चुका है। जितना बड़ा देश का सामरिक प्रभाव होगा, उतनी ही अधिक उसकी क्षमताओं, नीतियों और निर्णयों पर अंतरराष्ट्रीय नजर रहेगी। अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार भी बताते हैं कि भारत की बढ़ती परमाणु क्षमताओं को लेकर दुनिया का दृष्टिकोण पूरी तरह "घबराहट" का नहीं, बल्कि "सतर्कता और रणनीतिक चिंता" का है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 17:53:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-has-the-international-community-started-to-become-wary-of-india-growing-nuclear-might</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर में बर्बर सैन्य-पुलिस हिंसा के अंतरराष्ट्रीय निहितार्थ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-implications-of-barbaric-military-police-violence-in-pojk]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पीओजेके में समय-समय पर सामने आने वाली हिंसा, दमन, विरोध-प्रदर्शन और मानवाधिकार संबंधी आरोप केवल स्थानीय घटनाएं नहीं हैं, बल्कि इनके कई अंतरराष्ट्रीय आयाम भी हैं। चूंकि पाकिस्तान अधिकृत जम्मू-कश्मीर (PoJK) में हाल के दिनों में प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों के बीच हुई हिंसक झड़पों ने भारत सहित अंतरराष्ट्रीय समुदाय का ध्यान आकर्षित किया है। इसलिए सबने कड़ी प्रतिक्रिया दी है, क्योंकि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कई लोगों की मौत हुई, तथा बड़ी संख्या में लोग घायल हुए तथा गिरफ्तारियां और इंटरनेट प्रतिबंध जैसी कार्रवाइयाँ भी की गईं। लिहाजा यह स्थिति अंतरराष्ट्रीय चिंता का भी सबब बन चुकी है।</div><div><br></div><div>जहां तक भारत की सधी हुई कड़ी प्रतिक्रिया की बात है तो भारत सरकार ने इस घटना पर सधी हुई कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। भारतीय विदेश मंत्रालय ने कथित पुलिस बर्बरता और प्रदर्शनकारियों की मौतों पर चिंता जताते हुए कहा कि पाकिस्तान पीओके में अपने प्रशासनिक और राजनीतिक विफलताओं को छिपाने के लिए दमन का रास्ता अपना रहा है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से भी इस स्थिति पर ध्यान देने और मानवाधिकार उल्लंघनों के लिए पाकिस्तान को जवाबदेह ठहराने की मांग की है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pakistan-armys-bloody-game-in-pojk-taslima-akhtar-appeals-to-the-world-for-justice" target="_blank">POJK में Pakistan Army का खूनी खेल! तस्लीमा अख्तर ने दुनिया से लगाई न्याय की गुहार</a></h3><div>जहां तक अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया की बात है तो एमनेस्टी इंटरनेशनल (Amnesty International) ने प्रदर्शनकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई, गिरफ्तारियों और इंटरनेट बंदी पर चिंता व्यक्त की तथा शांतिपूर्ण संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और कुछ कश्मीरी अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी पीओके में मानवाधिकारों की स्थिति पर सवाल उठाए हैं और निष्पक्ष जांच की मांग की है। जबकि प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने घटनाओं को राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक असंतोष और नागरिक अधिकारों से जुड़े व्यापक संकट के रूप में प्रस्तुत किया है। लिहाजा, पीओजेके में होने वाली बर्बर हिंसा के मायने केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसके प्रभाव मानवाधिकार, भारत-पाकिस्तान संबंध, चीन की रणनीतिक परियोजनाओं, क्षेत्रीय सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति तक फैलते हैं। इसलिए ऐसी घटनाओं को केवल स्थानीय नहीं, बल्कि व्यापक भू-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में भी देखा जाता है। आइए इसे विस्तार से इसके अंतरराष्ट्रीय मायने समझते हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, मानवाधिकारों का गम्भीर वैश्विक मुद्दा: यदि किसी क्षेत्र में नागरिकों पर अत्यधिक बल प्रयोग, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध या राजनीतिक दमन के आरोप लगते हैं, तो यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और वैश्विक मंचों का विषय बन जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ तथा एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे अंतरराष्ट्रीय संस्थान ऐसे मामलों पर नजर रखते हैं।</div><div><br></div><div>दूसरा, पाकिस्तान की बर्बर अंतरराष्ट्रीय छवि पर प्रभाव: पीओजेके में अस्थिरता या हिंसा की खबरें अमेरिकी-चीनी पिल्ले पाकिस्तान के उस दावे को चुनौती दे सकती हैं कि वहां के लोग संतुष्ट और लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंतर्गत रह रहे हैं। इससे उसकी कूटनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।</div><div><br></div><div>तीसरा, भारत-पाकिस्तान के द्विपक्षीय संबंधों पर असर: इंडिया और पाकिस्तान के बीच कश्मीर पहले से ही एक संवेदनशील मुद्दा है। पीओजेके में हिंसा की घटनाएं दोनों देशों के राजनीतिक विमर्श और कूटनीतिक आरोप-प्रत्यारोप को और तेज कर सकती हैं।</div><div><br></div><div>चौथा, चीन की रणनीतिक चिंताएं: पीओजेके से होकर&nbsp; सीपीईसी (China-Pakistan Economic Corridor) का महत्वपूर्ण हिस्सा गुजरता है। लिहाजा क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ने पर चीन की आर्थिक और सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बढ़ सकती हैं।</div><div><br></div><div>पांचवां, दक्षिण एशिया की क्षेत्रीय सुरक्षा: किसी भी संवेदनशील सीमा क्षेत्र में लंबे समय तक अस्थिरता बनी रहने से क्षेत्रीय सुरक्षा, आतंकवाद-निरोधक प्रयासों और सीमापार तनावों पर प्रभाव पड़ सकता है। इस कारण प्रमुख शक्तियां स्थिति पर नजर बनाए रखती हैं।</div><div><br></div><div>छठा, कश्मीर विमर्श का नया आयाम: पीओजेके में विरोध-प्रदर्शन या हिंसा की घटनाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह बहस भी जन्म देती हैं कि कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में लोगों की वास्तविक सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक आकांक्षाएं क्या हैं। इससे कश्मीर संबंधी वैश्विक विमर्श अधिक जटिल हो जाता है।</div><div><br></div><div># इसके राजनीतिक और कूटनीतिक मायने निम्नलिखित हैं:&nbsp;</div><div>1. पाकिस्तान की आंतरिक चुनौतियाँ उजागर हुई हैं — स्थानीय जनता के बीच शासन, आर्थिक स्थिति और राजनीतिक अधिकारों को लेकर असंतोष सामने आया है।&nbsp;</div><div>2. भारत को कूटनीतिक अवसर मिला है — नई दिल्ली पीओके में मानवाधिकार और लोकतांत्रिक अधिकारों के प्रश्न को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अधिक मजबूती से उठा सकती है।</div><div>3. कश्मीर विमर्श में नया आयाम — लंबे समय से भारत जिस मुद्दे को उठाता रहा है कि पीओके के लोगों को पर्याप्त राजनीतिक अधिकार नहीं मिले हैं, उसे इस घटनाक्रम से नया बल मिला है।&nbsp;</div><div>4. अंतरराष्ट्रीय दबाव की संभावना — यदि हिंसा और दमन के आरोप बढ़ते हैं तो पाकिस्तान पर मानवाधिकारों के पालन को लेकर बाहरी दबाव बढ़ सकता है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर, पीओके की यह हिंसा केवल कानून-व्यवस्था का मामला नहीं रह गई है, बल्कि मानवाधिकार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भारत-पाकिस्तान संबंधों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनती जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अंततोगत्वा यह कहा जा सकता है कि इसके व्यापक राजनीतिक मायने ये हैं कि यदि पीओके में नागरिक असंतोष और दमन के आरोप बढ़ते हैं, तो Pakistan की लोकतांत्रिक छवि, मानवाधिकार रिकॉर्ड और कश्मीर पर उसकी अंतरराष्ट्रीय दलीलों को चुनौती मिल सकती है। इसी कारण मुनीर की भूमिका पर बहस केवल सुरक्षा नीति तक सीमित नहीं है, बल्कि मानवाधिकार और राजनीतिक वैधता के प्रश्नों से भी जुड़ गई है।&nbsp;</div><div><br></div><div># आखिर मुनीर की तुलना डायर से क्यों की जा रही है?</div><div><br></div><div>जनरल (अब फील्ड मार्शल) Asim Munir को "जनरल डायर" कहे जाने का संदर्भ हाल में पीओके में हुए प्रदर्शनों पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई से जुड़ा है। यह तुलना कोई आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय निष्कर्ष नहीं है, बल्कि कुछ भारतीय राजनीतिक और सुरक्षा विश्लेषकों द्वारा की गई आलोचनात्मक टिप्पणी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>जनरल डायर कौन थे?: Reginald Dyer ब्रिटिश भारतीय सेना के अधिकारी थे, जिन्होंने 1919 के Jallianwala Bagh Massacre में निहत्थी भीड़ पर गोली चलाने का आदेश दिया था। यह घटना औपनिवेशिक दमन का प्रतीक मानी जाती है।</div><div><br></div><div>मुनीर की तुलना डायर से क्यों की जा रही है?: आलोचकों का आरोप है कि पीओके में आर्थिक और नागरिक अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध अत्यधिक बल प्रयोग किया गया, जिसमें कई लोगों की मौत और बड़ी संख्या में घायल होने की खबरें आईं। इसी आधार पर पूर्व जम्मू-कश्मीर डीजीपी एस.पी. वैद ने कहा कि "पीओके आज जलियांवाला बाग जैसा दिख रहा है और आसिम मुनीर जनरल डायर की तरह व्यवहार कर रहे हैं।"&nbsp;</div><div>उनके तर्क मुख्यतः तीन बिंदुओं पर आधारित हैं: निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग के आरोप। विरोधी संगठनों पर प्रतिबंध और गिरफ्तारियां। असंतोष को राजनीतिक संवाद के बजाय सुरक्षा समस्या के रूप में देखना।&nbsp;</div><div><br></div><div>सवाल है कि क्या यह सर्वमान्य दृष्टिकोण है?: नहीं। यह एक राजनीतिक और नैतिक तुलना है, कोई न्यायिक या आधिकारिक निष्कर्ष नहीं। पाकिस्तान सरकार और सेना आमतौर पर ऐसे अभियानों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने और हिंसा रोकने की कार्रवाई बताती हैं, जबकि आलोचक इन्हें दमनकारी कदम मानते हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 18:09:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-implications-of-barbaric-military-police-violence-in-pojk</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बेगुनाह जिंदगियों से खेलता भ्रष्ट तंत्र और दिल्ली के अंतहीन अग्निकांड]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-corrupt-system-playing-with-innocent-lives-and-delhi-unending-fire-tragedies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले दिनों दिल्ली के मालवीय नगर स्थित हौजरानी क्षेत्र में हुए भीषण अग्निकांड ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि हमारे यहां हादसे अचानक नहीं होते बल्कि उन्हें पैदा किया जाता है। 21 लोगों की दर्दनाक मौत, दर्जनों घायल, धुएं में घुटती सांसें, तीसरी मंजिल से जान बचाने के लिए छलांग लगाते लोग और बेसमेंट के बाहर बंद पड़ा निकास द्वार, यह केवल एक दुर्घटना नहीं बल्कि प्रशासनिक विफलता, भ्रष्ट व्यवस्था और नियमों की खुलेआम हत्या का भयावह परिणाम था। दुखद यह है कि यह कोई नई कहानी नहीं है। दिल्ली बार-बार अग्निकांडों में जलती है, लोग बार-बार मरते हैं, जांच समितियां बनती हैं, मुआवजे घोषित होते हैं और फिर सब कुछ पहले जैसा हो जाता है। मालवीय नगर के हादसे में जो शुरुआती तथ्य सामने आए, वे किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को झकझोर देने वाले थे। जिस भवन में ‘लेमन ग्रीन रेस्टोरेंट’ और ‘मिकासा होम्स’ संचालित हो रहे थे, वहां कथित रूप से छह कमरों की अनुमति के बावजूद 25 से अधिक कमरे बनाए गए थे। भवन से निकलने का केवल एक रास्ता था। बेसमेंट में लोगों की मौजूदगी के बावजूद बाहरी गेट पर ताला लगा था। आग लगने के बाद धुआं इतनी तेजी से फैला कि लोग बाहर निकल ही नहीं सके। कुछ लोगों ने तीसरी मंजिल से कूदकर जान बचाने की कोशिश की। यह दृश्य 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड की भयावह यादों को फिर से ताजा कर गया, जहां बाहर निकलने के रास्ते बंद होने के कारण 59 लोगों की मौत हो गई थी।</div><div>&nbsp;</div><div>दिल्ली में अग्निकांडों का इतिहास बताता है कि हर बड़ी त्रासदी के पीछे कहानी लगभग एक जैसी है, अवैध निर्माण, सुरक्षा मानकों की अनदेखी, भ्रष्टाचार, फर्जी प्रमाणपत्र, बंद निकास द्वार और प्रशासनिक लापरवाही। 13 जून 1997 को हुए उपहार सिनेमा अग्निकांड में 59 लोगों की मौत हुई थी, जो दिल्ली का अब तक का सबसे भयावह अग्निकांड माना जाता है। आग लगने के बाद सिनेमा हॉल में धुआं भर गया और निकास मार्ग अवरुद्ध होने के कारण लोग बाहर नहीं निकल सके। पूरे देश को झकझोर देने वाले इस हादसे के बाद सुरक्षा नियमों को सख्त बनाने की बातें तो बहुत हुई लेकिन वास्तविकता यही है कि उनसे कोई स्थायी सबक नहीं लिया गया। 31 मई 1999 को लाल कुआं स्थित केमिकल गोदाम में लगी आग में 57 लोगों की मौत हो गई। उसके बाद भी अवैध गोदामों और रासायनिक इकाइयों पर प्रभावी नियंत्रण नहीं लगाया गया। 8 दिसंबर 2019 को अनाज मंडी की अवैध फैक्टरी में लगी आग में 43 लोगों की मौत हुई। उस समय भी खुलासा हुआ था कि इमारत में निकास के पर्याप्त रास्ते नहीं थे, सीढ़ियां सामान से भरी थी और खिड़कियों पर लोहे की ग्रिलें लगी थी। जहरीले धुएं ने मजदूरों को सोते हुए ही मौत की नींद सुला दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies" target="_blank">दिल्ली अग्निकाडों के हादसों की राजधानी बनी</a></h3><div>12 फरवरी 2019 को करोल बाग के अर्पित पैलेस होटल में लगी आग में 17 लोगों की जान गई। जांच में सामने आया कि होटल में अवैध निर्माण हुआ था और सुरक्षा उपकरण पर्याप्त नहीं थे। 2022 में मुंडका की व्यावसायिक इमारत में लगी आग में 27 लोगों की मौत हुई। वहां भी केवल एक निकास मार्ग था और सुरक्षा मानकों की घोर अनदेखी की गई थी। उसी वर्ष गोकुलपुरी की झुग्गी बस्ती में आग से 7 लोगों की जान चली गई। 2024 में अलीपुर की अवैध पेंट फैक्टरी में लगी आग में 11 लोगों की मौत हुई। 2026 में पालम और विवेक विहार में हुए अग्निकांडों में नौ-नौ लोगों की जान गई। अब मालवीय नगर की त्रासदी ने मृतकों की सूची में 21 और नाम जोड़ दिए हैं। दिल्ली फायर सर्विस के आंकड़े बताते हैं कि जनवरी 2026 से 27 मई 2026 तक आग की घटनाओं में 45 लोगों की मौत हो चुकी थी। इसके बाद विवेक विहार और मालवीय नगर की घटनाओं को जोड़ दें तो यह संख्या 67 से अधिक हो चुकी है। यह आंकड़ा केवल संख्या नहीं बल्कि उन परिवारों की बर्बादी का दस्तावेज है, जिन्होंने अपने प्रियजनों को खो दिया।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी इमारतें बन कैसे जाती हैं? कैसे आवासीय भवनों में व्यावसायिक गतिविधियां चलने लगती हैं? कैसे छह कमरों की अनुमति वाले भवन में 25 कमरे बन जाते हैं? कैसे फायर एनओसी के बिना होटल, रेस्टोरेंट और फैक्ट्रियां वर्षों तक संचालित होती रहती हैं? कैसे चार मंजिल की अनुमति वाले क्षेत्र में छह-सात मंजिलें खड़ी हो जाती हैं? इन सवालों का जवाब किसी जांच आयोग की मोटी रिपोर्ट में नहीं बल्कि भ्रष्टाचार की उस जड़ में छिपा है, जिसने पूरे सिस्टम को खोखला कर दिया है। यदि कोई अवैध इमारत बनती है तो वह एक दिन में नहीं बनती। उसकी नींव पड़ती है, दीवारें उठती हैं, मंजिलें तैयार होती हैं, बिजली के कनेक्शन लगते हैं, पानी के कनेक्शन मिलते हैं और फिर व्यापार शुरू होता है। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक सरकारी विभागों की आंखों के सामने सब कुछ होता है। इसलिए यह कहना कि प्रशासन को जानकारी नहीं थी, वास्तविकता से आंखें मूंदना होगा। सच यह है कि ऐसी अधिकांश इमारतें प्रशासन और कारोबारियों की मिलीभगत का परिणाम होती हैं।</div><div><br></div><div>हर हादसे के बाद राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं। मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और विधायक घटनास्थल पर पहुंचते हैं। जांच के आदेश दिए जाते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं और कुछ अधिकारियों को निलंबित कर दिया जाता है। लेकिन क्या कभी किसी बड़े अधिकारी को कठोर दंड मिला? क्या कभी किसी विभागीय प्रमुख को जवाबदेह ठहराया गया? क्या कभी ऐसी कार्रवाई हुई कि भविष्य में कोई अधिकारी नियमों की अनदेखी करने का साहस न कर सके? दुर्भाग्य से जवाब है ‘नहीं’। मालवीय नगर का हादसा भी केवल एक होटल या रेस्टोरेंट की कहानी नहीं है। यह उस पूरे शहरी विकास मॉडल पर प्रश्नचिह्न है, जहां मुनाफा मानव जीवन से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दिल्ली में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जहां फायर सेफ्टी के उपकरण या तो हैं ही नहीं या केवल दिखावे के लिए लगाए गए हैं। अनेक भवनों में इमरजेंसी एग्जिट कागजों में मौजूद हैं लेकिन वास्तविकता में बंद पड़े हैं। कई जगहों पर बेसमेंट का उपयोग पार्किंग की बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है। संकरी गलियों में बहुमंजिला भवन खड़े हैं, जहां दमकल की गाड़ियां तक नहीं पहुंच सकती।</div><div><br></div><div>अब समय आ गया है कि केवल जांच और मुआवजे की राजनीति से आगे बढ़ा जाए। दिल्ली में सभी होटलों, गेस्ट हाउसों, रेस्टोरेंटों, अस्पतालों, फैक्ट्रियों और बहुमंजिला इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट कराया जाए। फायर एनओसी की व्यवस्था डिजिटल और पारदर्शी बने। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना नहीं बल्कि तत्काल ध्वस्तीकरण हो। सुरक्षा मानकों की अनदेखी करने वाले भवन मालिकों और जिम्मेदार अधिकारियों पर गैर-इरादतन हत्या नहीं बल्कि कठोर आपराधिक मुकदमे दर्ज हों। जब तक जवाबदेही की तलवार ऊपर तक नहीं पहुंचेगी, तब तक नीचे कोई नहीं सुधरेगा। मालवीय नगर की आग में मारे गए लोग किसी राजनीतिक बहस का हिस्सा नहीं थे, वे आम नागरिक थे, जिनमें महिलाएं थी, विदेशी नागरिक थे, मरीजों के परिजन थे और बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर वहां ठहरे हुए लोग थे। आज जरूरत शोक व्यक्त करने से ज्यादा आत्ममंथन की है। उपहार कांड से लेकर मालवीय नगर तक लगभग तीन दशक बीत चुके हैं लेकिन व्यवस्था की मानसिकता नहीं बदली। यदि इस बार भी कुछ दिनों के शोर-शराबे के बाद सब कुछ सामान्य हो गया तो यकीन मानिए, अगला अग्निकांड केवल समय का प्रश्न होगा। तब फिर वही सवाल गूंजेगा कि आखिर बेगुनाह लोगों की जान से खेलते इस सिस्टम का जिम्मेदार कौन है?</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 18:31:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-corrupt-system-playing-with-innocent-lives-and-delhi-unending-fire-tragedies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA['कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते महत्वपूर्ण सवाल!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/important-questions-arising-from-the-cockroach-janata-party-protest-at-jantar-mantar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश की राजधानी नई दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर कथित "कॉकरोच जनता पार्टी" (CJP) द्वारा आयोजित जन-प्रदर्शन केवल एक विरोध-प्रदर्शन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति में उभर रही डिजिटल-युवा राजनीति की अग्नि-परीक्षा भी माना जा सकता है। देखा गया कि “अनिबन्धित कॉकरोच जनता पार्टी” एक व्यंग्यात्मक, प्रतीकात्मक या सीमांत राजनीतिक संगठन के रूप में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन कर रही है, जो व्यवस्था-विरोधी संदेश है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे प्रदर्शन का वास्तविक राजनीतिक महत्व इस बात पर निर्भर करेगा कि संगठन के मुद्दे क्या हैं, उसके पीछे कितना जनसमर्थन है, और क्या वह प्रतीकात्मक विरोध से आगे बढ़कर कोई ठोस राजनीतिक प्रभाव पैदा कर पाता है। वहीं, इससे जुड़े नेताओं का भावी राजनीतिक मकसद भी केंद्र में सत्तारूढ़ नरेंद्र मोदी सरकार व विभिन्न भाजपा राज्य सरकारों को अपदस्थ करना है। ऐसे में आंदोलनकारियों का लक्ष्य बड़ा है और उनके संसाधन कमतर। ऐसा उनके द्वारा उठाए हुए मुद्दों से प्रतीत होता है। इसलिए कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन कतिपय महत्वपूर्ण सवाल उपजते हैं, जो निम्नलिखित हैं:-</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/reviews-on-tea/mamata-banerjee-is-reaping-what-she-sowed-the-rebellion-by-mps" target="_blank">Chai Par Sameeksha: ममता बनर्जी ने जो बोया वो काटा, MLAs के बाद MPs का विद्रोह TMC को खत्म कर देगा!</a></h3><div>पहला, जंतु-विज्ञान में कॉकरोच को अक्सर ऐसी प्रजाति माना जाता है जो कठिन परिस्थितियों में भी जीवित रहती है। ऐसे में यदि कोई संगठन स्वयं को इस प्रतीक से जोड़ता है, तो वह यह संदेश दे सकता है कि आम जनता तमाम आर्थिक, सामाजिक और प्रशासनिक दबावों के बावजूद संघर्षरत है। वाकई इस आंदोलन की मुख्य मांग, छात्रों से जुड़ी शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा सम्बन्धी अनियमितताओं और युवाओं के लिए अधिकाधिक अवसर जुटाने आदि से जुड़ी हुई हैं। लिहाजा जेन-जी का झुकाव जगजाहिर है।</div><div><br></div><div>दूसरा, मुख्यधारा की राजनीति पर यह आंदोलन भी एक व्यंग्य मानिंद है, क्योंकि ऐसा नाम पारंपरिक दलों और राजनीतिक संस्कृति पर कटाक्ष का माध्यम बन चुका है। इससे यह संदेश दिया जा रहा है कि स्थापित दल जनता की समस्याओं से दूर हो चुके हैं। वहीं, मीडिया का ध्यान आकर्षित करने की रणनीति के तहत असामान्य नाम और प्रदर्शन शैली का चयन किया गया है, जो अक्सर मीडिया कवरेज पाने का आसान तरीका बनती है। छोटे या गैर-पंजीकृत संगठन इसी माध्यम से अपनी बात राष्ट्रीय विमर्श में लाने का प्रयास करते हैं।</div><div><br></div><div>तीसरा, यह युवा आंदोलन, जन-असंतोष की अभिव्यक्ति है, जो प्रदर्शन के माध्यम से महंगाई, बेरोजगारी, भ्रष्टाचार या प्रशासनिक विफलताओं जैसे मुद्दों पर मुखर है। यह व्यापक जन-असंतोष का प्रतीकात्मक रूप माना जा रहा है। इसलिए लोकतांत्रिक स्पेस का उपयोग रणनीति के तौर पर किया जा रहा है, क्योंकि जंतर-मंतर लंबे समय से विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक समूहों के विरोध-प्रदर्शनों का केंद्र रहा है। वहां प्रदर्शन करना इस बात का संकेत है कि संगठन लोकतांत्रिक तरीकों से अपनी बात रखना चाहता है।</div><div><br></div><div>चौथा, इसी आंदोलन के बहाने अब युवा भी चुनावी राजनीति में प्रवेश की तैयारी कर रहे हों, ताकि सिस्टम के भीतर प्रवेश करके उसे बदला जाए। लिहाजा कई छोटे संगठन पहले आंदोलन और प्रदर्शन के माध्यम से पहचान बनाते हैं, फिर राजनीतिक विस्तार या चुनावी भागीदारी की ओर बढ़ते हैं। तभी तो वहां मौजूद टीन एजर्स बताते हैं कि कॉकरोच जनता पार्टी अभी एक उभरता हुआ, मुख्यतः युवा-आधारित आंदोलन है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, इस युवा आंदोलन अभी तक औपचारिक रूप से किसी बड़े विपक्षी राष्ट्रीय राजनीतिक दल का समर्थन नहीं मिला है, लेकिन कुछ सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्र समूहों और जन-आंदोलन से जुड़े व्यक्तियों का समर्थन जरूर मिला है। इससे आंदोलन कारियों को बल मिला है। सवाल है कि अब तक सीजेपी को किस-किस का समर्थन मिला? तो जवाब होगा कि हाल ही जेल से छूटे लद्दाख के सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक जंतर-मंतर प्रदर्शन में पहुंचे और शिक्षा व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन के साथ खड़े दिखाई दिए। वहीं, विभिन्न छात्र समूहों, NEET, UPSC तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के अभ्यर्थियों ने इसमें भागीदारी की। जबकिं कुछ सामाजिक और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने भी सहानुभूति व्यक्त की।&nbsp;</div><div><br></div><div>छठा, जिस तरह से राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव द्वारा आंदोलन के प्रति सकारात्मक रुख प्रदर्शित किया गया है और विपक्षी दलों को युवाओं की चिंताओं पर ध्यान देने की अपील की खबरें विभिन्न मीडिया चर्चाओं में सामने आई हैं, इससे इस आंदोलन को ऊर्जा मिली है। हालांकि वे CJP के औपचारिक नेता या सदस्य नहीं हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां, जहां तक आंदोलन की वर्तमान दिशा का सवाल है तो अभी तक CJP की मुख्य मांगें हैं: परीक्षा-पत्र लीक और भर्ती अनियमितताओं पर जवाबदेही। केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग। युवाओं में बेरोजगारी और अवसरों की कमी के मुद्दे उठाना, और शिक्षा व्यवस्था में सुधार।&nbsp;</div><div><br></div><div>आठवां, जहां तक आंदोलन की संभावित दशा की बात है तो आगे इसकी दिशा तीन तरह से विकसित हो सकती है: एक, यदि यह केवल सोशल मीडिया की नाराजगी तक सीमित रहा, तो इसकी ऊर्जा कुछ समय बाद कम हो सकती है। दो, यदि छात्र संगठनों, अभिभावक समूहों और रोजगार से जुड़े आंदोलनों का व्यापक समर्थन मिला, तो यह राष्ट्रीय युवा आंदोलन का रूप ले सकता है। तीन, यदि आंदोलन स्पष्ट संगठन, नेतृत्व और दीर्घकालिक एजेंडा विकसित कर लेता है, तो यह भविष्य में एक राजनीतिक दबाव समूह या नए राजनीतिक मंच में बदल सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>नौवां, फिलहाल CJP को सीधे-सीधे दूसरी "संपूर्ण क्रांति" या "अन्ना आंदोलन" कहना जल्दबाज़ी होगी। लेकिन यह स्पष्ट है कि इसने युवाओं की परीक्षा, रोजगार और जवाबदेही संबंधी चिंताओं को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। इसकी सबसे बड़ी ताकत सोशल मीडिया पर युवा समर्थन है, जबकि सबसे बड़ी चुनौती संगठनात्मक ढांचा, नेतृत्व की स्थिरता और दीर्घकालिक रणनीति होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>बहरहाल, इस प्रदर्शन का सबसे बड़ा सियासी संदेश यह है कि शिक्षा, रोजगार और युवाओं की आकांक्षाएं फिर से राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में आने लगी हैं। यदि यह असंतोष व्यापक सामाजिक समर्थन प्राप्त करता है, तो इसका प्रभाव केवल शिक्षा नीति तक सीमित नहीं रहेगा; बल्कि यह भविष्य की चुनावी राजनीति और राजनीतिक नेतृत्व की प्राथमिकताओं को भी प्रभावित कर सकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 18:11:02 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/important-questions-arising-from-the-cockroach-janata-party-protest-at-jantar-mantar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विदेश मंत्री रूबियों देश के नेताओं को दिखा गए आईना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/foreign-minister-rubio-held-up-a-mirror-to-the-country-leaders]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत दौर पर आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग होते हैं। हम इन्हें गंभीरता से लेंगे। उन्होंने कहा कि अमेरिका में भी बेवकूफ लोग मौजूद हैं। 'क्वाड्रीलेटरल सिक्योरिटी डायलॉग' (क्वाड) की बैठक में शिरकत करने राजधानी दिल्ली में आए अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने अमरीका में भारतीयों पर नस्लीय हमलों को लेकर यह जवाब दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>रुबियो ने कहा कि मैं नस्लभेदी कमेंट्स को बहुत गंभीरता से लूंगा। मुझे यकीन है कि ऐसे लोग हैं जिन्होंने ऑनलाइन और दूसरी जगहों पर कमेंट्स किए हैं, क्योंकि दुनिया के हर देश में बेवकूफ लोग मौजूद होते हैं। मुझे यकीन है कि यहां भी बेवकूफ लोग हैं, यूनाइटेड स्टेट्स में भी बेवकूफ लोग हैं जो हर समय बेवकूफी भरे कमेंट्स करते हैं। यूनाइटेड स्टेट्स एक बहुत ही वेलकमिंग देश है। दुनिया भर से हमारे देश में आने वाले लोगों से फायदा हुआ है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/trump-invitation-to-pm-modi-to-visit-washington-is-proof-of-growing-ties-between-two-countries" target="_blank">US-India Relations | भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी मजबूत! राष्ट्रपति ट्रंप का पीएम मोदी को वाशिंगटन आने का निमंत्रण दोनों देशों के बढ़ते रिश्तों का 'प्रमाण'</a></h3><div>अमरीकी विदेश मंत्री को शायद अंदाजा होगा कि नस्लवाद, जातिवाद, सांप्रदायिकता और क्षेत्रवाद भारत के अभिन्न अंग हैं। इन मुद्दों पर राजनीतिक करके देश को कमजोर और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनाम करने में भारत के राजनीतिक दल ही सबसे आगे हैं। इसमें चाहे विपक्ष हो या सत्ता पक्ष, कोई भी अपने राजनीतिक स्वार्थों को भुनाने में पीछे नहीं रहता। सत्ता में जो भी राजनीतिक दल होता है, वह यंत्रणा और क्रूरता को कानूनी आड़ में जायज ठहराने का प्रयास करता है। इसका देश में सबसे बड़ा उदाहरण है पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें।&nbsp;</div><div><br></div><div>अमरीका में एक अश्वेत युवक की पुलिसकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इससे पूरे अमरीका में बवाल मच गया था। 25 मई 2020 को मिनियापोलिस शहर में 'डेरेक शॉविन' नामक एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज फ्लॉयड नाम के निहत्थे अश्वेत व्यक्ति की गर्दन पर लगभग 9 मिनट तक अपना घुटना दबाए रखा था, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई थी। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद "ब्लैक लाइव्स मैटर" आंदोलन के तहत अमेरिका के सभी 50 राज्यों में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए। आरोपी पुलिस अधिकारी को हत्या का दोषी ठहराया गया और 2021 में उसे 22.5 साल की जेल की सजा सुनाई गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसके विपरीत भारत में पुलिस हिरासत में मौतें साधारण घटनाओं में शुमार है। सरकारी तंत्र को ऐसी मौतों से खास फर्क नहीं पड़ता। सरकार ऐसी मौतों को कभी गंभीरता से नहीं लेती। कारण साफ है ऐसी मौतों में कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्तातंत्र जिम्मेदार होता है। यही वजह है कि हिरासत में मौतों जैसे बेहद अमानवीय और संवदेनशील मुद्दे पर भी सरकारें खामोश रहती हैं। विपक्ष जरूर कुछ शोर मचाता है, किन्तु विपक्ष जब सत्ता में रहा होता है, तब भी ऐसी मौतें होती रही हैं, इसलिए सत्ता पक्ष द्वारा गढ़े मुर्दे उखाड़े जाने के भय विपक्ष प्राय: चुप्पी ही साधे रहता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अदालतों ने भारत में पुलिस हिरासत में मौतें रोकने के प्रयास किए हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में होने वाली हिंसा को व्यवस्था पर धब्बा बताया था। ऐसी मौतों के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट का सख़्त सवाल पूछा था कि क्या केंद्र सरकार हमें हल्के में ले रही है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, "अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। "शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई करने के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ यह सख्त टिप्पणी की थी।</div><div><br></div><div>हिरासत में मौतों पर अपवादस्वरूप ही दोषी पुलिसकर्मियों को अदालतों से सजा मिल पाती है। अप्रैल 2026 में, एक ऐतिहासिक और दुर्लभतम फैसले में मदुरै की एक अदालत ने वर्ष 2020 में पुलिस हिरासत में एक पिता (पी. जयराज) और पुत्र (जे. बेनिक्स) की बेरहमी से हत्या करने के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई। जबकि अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव या गवाहों के मुकरने के कारण पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराना मुश्किल होता है, जिसके चलते कई मामलों में पुलिसकर्मियों को केवल विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ता है या वे बरी हो जाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार वर्ष 2024 में 2,739 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। हिरासत में यातना सत्ता तंत्र की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों का घोर दुरुपयोग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिरासत में रखे गए लोग कमजोर और&nbsp;</div><div>असुरक्षित स्थिति में होते हैं और वहाँ शक्ति का संतुलन भी उनके खिलाफ होता है। जवाबदेही तय करने की स्वतंत्र जांच नहीं हो पाती है, क्योंकि हिरासत में हुई मौतों की जांच अक्सर उसी पुलिस विभाग द्वारा की जाती है, जिनके संरक्षण में ऐसी घटना घटित होती है। यातना के उपयोग को पुलिस बल के भीतर हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देने से जोड़ा गया है।</div><div><br></div><div>भारत में यातना (टॉर्चर) को रोकने या उससे निपटने के लिए अब तक कोई विशेष, स्वतंत्र कानून नहीं बन पाया है। यद्यपि भारत ने 1997 में 'संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी सम्मेलन' पर हस्ताक्षर किए थे，लेकिन वर्तमान में यातना से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता और भारतीय संविधान के प्रावधानों का ही उपयोग किया जाता है। यातना निवारण विधेयक 2010 में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन की पुष्टि करना और यातना को स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध बनाना था। हालाँकि, प्रवर समिति को भेजे जाने और संशोधनों की सिफारिशों के बाद, यह विधेयक लैप्स हो गया और कानून का रूप नहीं ले सका।</div><div><br></div><div>मानवाधिकार समूहों का कहना है कि भारत में हर साल सैकड़ों लोग हिरासत में मारे जाते हैं। उनका कहना है कि संदिग्धों से जबरन कबूलनामा निकलवाने के लिए यातना और दुर्व्यवहार करना पुलिसिंग का हिस्सा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों ने भारत से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप पुलिस व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए बड़े सुधार करने का आह्वान किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब हिरासत में मौतों को लेकर देश की सरकारों को खास फर्क नहीं पड़ता, तब अमरीकी विदेश मंत्री को अमरीका में मौजूद मामूली से नस्लवाद को लेकर शर्मिंदा होना देश के नेताओं को आईना दिखाने जैसा है।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 16:38:07 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/foreign-minister-rubio-held-up-a-mirror-to-the-country-leaders</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विकास की अंधी दौड़ में दम तोड़ता पर्यावरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/environment-gasping-for-breath-in-the-blind-race-for-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पर्यावरण प्रदूषण वर्तमान समय में सबसे बड़ी वैश्विक समस्या है। पिछले तीन दशकों से महसूस किया जा रहा है कि वैश्विक स्तर पर सबसे बड़ी समस्या पर्यावरण से ही जुड़ी है। मानवीय क्रियाकलापों के कारण प्रकृति में लगातार बढ़ते दखल के कारण पृथ्वी पर बहुत से प्राकृतिक संसाधनों का विनाश हुआ है। आधुनिक जीवनशैली, पृथ्वी पर पेड़-पौधों की कमी, पर्यावरण प्रदूषण का विकराल रूप, मानव द्वारा प्रकृति का बेदर्दी से दोहन इत्यादि कारणों से मानव और प्रकृति के बीच असंतुलन की भयावह खाई उत्पन्न हो रही है। जलवायु परिवर्तन और प्रदूषित वातावरण के बढ़ते खतरे हम अब लगातार अनुभव कर रहे हैं। इसीलिए पर्यावरण की सुरक्षा तथा संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष 5 जून को पूरी दुनिया में ‘विश्व पर्यावरण दिवस’ मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा तथा संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (यूएनईपी) द्वारा 16 जून 1972 को स्टॉकहोम में पर्यावरण के प्रति वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक जागृति लाने के लिए यह दिवस मनाने की घोषणा की गई थी और पहला विश्व पर्यावरण दिवस 5 जून 1974 को मनाया गया था। विश्व पर्यावरण दिवस का वर्ष 2026 का विषय ‘प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए।’</div><div><br></div><div>पर्यावरण की रक्षा और प्रकृति के उचित दोहन को लेकर हालांकि यूरोप, अमेरिका तथा अफ्रीकी देशों में 1910 के दशक से ही समझौतों की शुरूआत हो गई थी किन्तु बीते कुछ दशकों में दुनिया के कई देशों ने इसे लेकर क्योटो प्रोटोकाल, मांट्रियल प्रोटोकाल, रियो सम्मलेन जैसे कई बहुराष्ट्रीय समझौते किए हैं। अधिकांश देशों की सरकारें पर्यावरण को लेकर चिंतित तो दिखती हैं लेकिन पर्यावरण की चिंता के बीच कुछ देश अपने हितों को देखते हुए पर्यावरण संरक्षण की नीतियों में बदलाव करते रहे हैं। प्रदूषित वातावरण का खामियाजा केवल मनुष्यों को ही नहीं बल्कि धरती पर विद्यमान प्रत्येक प्राणी को भुगतना पड़ता है। बड़े पैमाने पर प्रकृति से खिलवाड़ के ही कारण दुनिया के विशालकाय जंगल हर साल सुलगने लगे हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को खरबों रुपये का नुकसान होने के अलावा दुर्लभ जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियां भी भीषण आग में जलकर राख हो जाती हैं। कोरोना काल में लॉकडाउन के दौरान दुनियाभर में पर्यावरण की स्थिति में सुधार देखा गया था, जिसने बता दिया था कि अगर हम चाहें तो पर्यावरण की स्थिति में काफी हद तक सुधार किया जा सकता है लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति के अभाव में पर्यावरण संरक्षण को लेकर अपेक्षित कदम नहीं उठाए जाते। न केवल भारत में बल्कि वैश्विक स्तर पर तापमान में निरन्तर हो रही बढ़ोतरी और मौसम का लगातार बिगड़ता मिजाज गहन चिंता का विषय बना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/the-environment-is-the-foundation-of-life" target="_blank">World Environment Day 2026: जीवन का आधार है पर्यावरण</a></h3><div>जलवायु परिवर्तन से निपटने को लेकर चर्चाएं और चिंताएं तो बहुत होती हैं, तरह-तरह के संकल्प भी दोहराये जाते हैं किन्तु सुख-संसाधनों की अंधी चाहत, सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि, अनियंत्रित औद्योगिक विकास और रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करने के दबाव के चलते इस तरह की चर्चाएं और चिंताएं अर्थहीन होकर रह जाती हैं। अपनी पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ में मैंने विस्तार से यह स्पष्ट किया है कि धरती में रह-रहकर जो उथल-पुथल की प्राकृतिक घटनाएं घट रही हैं, उनके पीछे छिपे संकेतों और प्रकृति की मूक भाषा को समझना कितना जरूरी है। आधुनिकरण और औद्योगिकीकरण की दौड़ में हमने हर पल प्रकृति की नैतिक सीमाओं का उल्लंघन किया है और ये सब प्रकृति के साथ इंसान की ज्यादतियों का ही नतीजा हैं, जिसके भयावह परिणाम हमारे सामने हैं।</div><div><br></div><div>मानवीय क्रियाकलापों के कारण ही वायुमंडल में कार्बन मोनोक्साइड, नाइट्रोजन, ओजोन और पार्टिक्यूलेट मैटर के प्रदूषण का मिश्रण इतने खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है कि हमें सांस के जरिये असाध्य बीमारियों की सौगात मिल रही है। सीवरेज की गंदगी स्वच्छ जल स्रोतों में छोड़ने की बात हो या औद्योगिक इकाईयों का अम्लीय कचरा नदियों में बहाने की अथवा सड़कों पर रेंगती वाहनों की लंबी-लंबी कतारों से वायुमंडल में घुलते जहर की या फिर सख्त अदालती निर्देशों के बावजूद खेतों में जलती पराली से हवा में घुलते हजारों-लाखों टन धुएं की, हमारी आंखें तब तक नहीं खुलती, जब तक प्रकृति का बड़ा कहर हम पर नहीं टूट पड़ता। पैट्रोल, डीजल से उत्पन्न होने वाले धुएं ने वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड तथा ग्रीन हाउस गैसों की मात्रा को खतरनाक स्तर तक पहुंचा दिया है। पेड़-पौधे कार्बन डाईऑक्साइड को अवशोषित कर पर्यावरण संतुलन बनाने में अहम भूमिका निभाते रहे हैं लेकिन पिछले कुछ दशकों में वन-क्षेत्रों को बड़े पैमाने पर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील कर दिया गया है। धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिसके दुष्परिणाम स्वरूप ध्रुवीय क्षेत्रों में बर्फ पिघल रही है, जिससे समुद्रों का जलस्तर बढ़ने के कारण दुनिया के कई शहरों के जलमग्न होने की आशंका जताई जाने लगी है।</div><div><br></div><div>प्रकृति कभी समुद्री तूफान तो कभी भूकम्प, कभी सूखा तो कभी अकाल के रूप में अपना विकराल रूप दिखाकर हमें निरन्तर चेतावनियां देती रही है कि यदि हम इसी प्रकार प्रकृति के संसाधनों का दोहन करते रहे तो हमारे भविष्य की तस्वीर कैसी होने वाली है लेकिन हम हर बार प्रकृति का प्रचण्ड रूप देखने के बावजूद प्रकृति की इन चेतावनियों को नजरअंदाज कर खुद अपने विनाश को आमंत्रित कर रहे हैं। यदि दुनियाभर में पर्यावरण प्रदूषण की विकराल होती वैश्विक समस्या को देखें तो स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के नाम पर वैश्विक चिंता व्यक्त करने से आगे शायद हम कुछ करना ही नहीं चाहते। ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक’ में बताया गया है कि पर्यावरण का संतुलन डगमगाने के कारण दुनियाभर में लोग तरह-तरह की भयानक बीमारियों के जाल में फंस रहे हैं, उनकी प्रजनन क्षमता पर इसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है, उनकी कार्यक्षमता भी इससे प्रभावित हो रही है। लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा बीमारियों के इलाज पर ही खर्च हो जाता है। प्रकृति हमारी मां के समान है, जो हमें अपने प्राकृतिक खजाने से ढ़ेरों बहुमूल्य चीजें प्रदान करती है लेकिन अपने स्वार्थों के चलते हम अगर खुद को ही प्रकृति का स्वामी समझने की भूल करने लगे हैं तो फिर भला प्राकृतिक तबाही के लिए प्रकृति को कैसे दोषी ठहरा सकते हैं?</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और पर्यावरण मामलों के जानकार हैं तथा पर्यावरण पर चर्चित पुस्तक ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ लिख चुके हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 10:46:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/environment-gasping-for-breath-in-the-blind-race-for-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[आखिर कैसे रूकेंगे मालवीय नगर होटल अग्निकांड जैसे हादसे, जिम्मेदार कौन?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-can-tragedies-like-the-malviya-nagar-hotel-fire-be-prevented-and-who-is-responsible]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल-अग्निकांड में 21 लोगों की मृत्यु और दर्जनों के घायल होने की घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि सुरक्षा नियमों की संभावित विफलता और प्रशासनिक लापरवाही पर गंभीर प्रश्नचिह्न है। दुर्भाग्य की बात है कि दिल्ली या अन्य महानगरों में हुई ऐसी ही घटनाओं से सिविल/पुलिस प्रशासन ने कोई सीख नहीं ली, जिससे यह हादसा भी नियति का खेल बनकर रह गया। प्रशासन को इसे गम्भीरता से लेना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि भविष्य में ऐसी घटनाओं पर लगाम लगे, जिससे इतनी भारी क्षति नहीं हो पाए।</div><div><br></div><div>प्रारंभिक रिपोर्टों के अनुसार, भवन में केवल एक प्रवेश-निकास मार्ग था, बेसमेंट और ऊपरी मंजिलों में क्षमता से अधिक कमरे संचालित किए जा रहे थे, तथा अग्नि सुरक्षा मानकों के पालन पर भी सवाल उठ रहे हैं। लिहाजा यह प्रश्न मौजूं है कि आखिर इस लोमहर्षक और दर्दनाक घटना का जिम्मेदार कौन? यह ठीक है कि जांच पूरी होने से पहले अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन सामान्यतः ऐसी घटनाओं में जिम्मेदारी कई स्तरों पर तय होती है जो इस प्रकार से समझी जा सकती है:-</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/malviya-nagar-fire-cm-rekha-gupta-calls-for-report-promises-strict-action-visits-max-hospital" target="_blank">Malviya Nagar Fire: CM Rekha Gupta ने रिपोर्ट तलब की, कड़ी कार्रवाई का वादा, मैक्स अस्पताल का किया दौरा</a></h3><div>पहला, होटल मालिक और अदूरदर्शी प्रबंधन: यदि बिना वैध अग्नि सुरक्षा अनुमति (Fire NOC) के संचालन हुआ। यदि निर्धारित क्षमता से अधिक कमरे या अवैध निर्माण किए गए।&nbsp; यदि आपातकालीन निकास, अलार्म और अग्निशमन उपकरण पर्याप्त नहीं थे। तो इसका सीधा तातपर्य है कि होटल मालिक के अदूरदर्शी प्रबंधन ने लोगों को अप्रत्याशित मुसीबत की आग में झुलसने को मजबूर कर दिया और समय पर समुचित मदद उनतक नहीं पहुंच पाई। यह जांच का विषय है और शायद इसी वजह से होटल मालिक को दिल्ली पुलिस ने हिरासत में भी लिया है।</div><div><br></div><div>दूसरा, लाइसेंस और निरीक्षण देने वाली एजेंसियां: यदि नियमों के उल्लंघन के बावजूद संचालन जारी रहा। यदि नियमित निरीक्षण केवल कागजों तक सीमित रहे, तो&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">लाइसेंस जारी करने और निरीक्षण देने वाली एजेंसियों पर उँगली उठनी स्वाभाविक बात है, क्योंकि इनकी लापरवाही या मिलीभगत से न केवल जान-माल की भारी क्षति हुई, बल्कि केंद्र व राज्य सरकार के गुणवत्ता हीन विकास और कथित सुशासन के दावों की भी हवा निकल गई। चूंकि इस अग्निकांड के विदेशी नागरिक भी शिकार बताए जाते हैं, इसलिए विदेशों में भारत की बदनामी स्वाभाविक है और इससे दिल्ली समेत देश का पर्यटन कारोबार भी प्रभावित हो सकता है।</span></div><div><br></div><div>तीसरा, स्थानीय प्रशासन और नगर निकाय: अवैध निर्माण, क्षमता से अधिक उपयोग और सुरक्षा उल्लंघनों की समय रहते पहचान न कर पाना भी जांच का विषय है। चूंकि स्थानीय प्रशासन और नगर निकाय से जुड़े जिम्मेदार लोग भी यदि समय रहते ही खामियां पकड़ लिए होते और स्पष्ट कार्रवाई किये होते तो राष्ट्रीय राजधानी नई दिल्ली की इतनी बदनामी नहीं होती।</div><div><br></div><div>इसलिए यक्ष प्रश्न समुपस्थित है कि आखिर कबतक ऐसे दर्दनाक हादसे रुकेंगे और कैसे रुकेंगे? इसका जवाब निम्नतम हो सकता है:-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, शून्य-सहनशीलता नीति: बिना Fire NOC वाले होटल, गेस्ट हाउस और रेस्तरां तत्काल बंद किए जाएं। दूसरा, डिजिटल और सार्वजनिक निरीक्षण: सभी होटलों की अग्नि सुरक्षा स्थिति ऑनलाइन सार्वजनिक हो ताकि ग्राहक भी देख सकें कि होटल सुरक्षित है या नहीं। तीसरा, बहु-निकास अनिवार्य: एक ही प्रवेश-निकास वाले भवनों को होटल या व्यावसायिक उपयोग की अनुमति न दी जाए। चौथा, आपातकालीन अभ्यास: होटल कर्मचारियों और अतिथियों के लिए नियमित फायर ड्रिल अनिवार्य हो। पांचवां, व्यक्तिगत जवाबदेही: केवल जुर्माना नहीं, बल्कि गंभीर लापरवाही साबित होने पर होटल मालिकों और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई हो।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">छठा, नागरिक जागरूकता: होटल में ठहरते समय लोगों को भी आपातकालीन निकास, अग्निशमन यंत्र और सुरक्षा संकेतों पर ध्यान देना चाहिए।</span></div><div><br></div><div>इस घटना से हमें व्यापक सबक मिलती है, क्योंकि यह घटना हमें यह याद दिलाती है कि भारत में कई बार हादसों के बाद जांच और मुआवजे की घोषणा तो होती है, लेकिन सुरक्षा संस्कृति में अपेक्षित बदलाव नहीं आता। 2019 के दिल्ली होटल अग्निकांड सहित कई बड़ी आग की घटनाओं के बाद भी वही समस्याएं—एकमात्र निकास, अवैध निर्माण, और सुरक्षा मानकों की अनदेखी—दोहराई जाती रही हैं। ऐसे में फिर यदि जांच में सुरक्षा नियमों की अनदेखी सिद्ध होती है, तो जिम्मेदारी केवल होटल मालिक तक सीमित नहीं रहनी चाहिए; उन सभी संस्थाओं और अधिकारियों की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए जिनकी निगरानी में यह व्यवस्था चल रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 14:50:25 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-can-tragedies-like-the-malviya-nagar-hotel-fire-be-prevented-and-who-is-responsible</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Shaurya Path: आकाश पर राज करेगी Indian Air Force, South Asia में ताकत के सारे समीकरण बदलकर रख देंगे 114 Rafale Jets]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-air-force-will-rule-the-skies-114-rafale-jets-will-change-the-equations-of-south-asia]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत ने एक बार फिर चीन और पाकिस्तान को साफ चेतावनी दे दी है कि अब नया भारत सिर्फ जवाब नहीं देता, बल्कि दुश्मन की रणनीति को जड़ से तोड़ने की ताकत रखता है। हम आपको बता दें कि भारतीय वायुसेना के लिए 114 राफेल युद्धक विमानों की खरीद का फैसला दक्षिण एशिया में ताकत का पूरा समीकरण बदलने वाली चाल है। करीब तीन लाख पच्चीस हजार करोड़ रुपये के इस महा समझौते ने बीजिंग और इस्लामाबाद दोनों की नींद उड़ा दी है। खास बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस यात्रा से ठीक पहले उठाया गया यह कदम दुनिया को साफ संदेश देता है कि भारत अपनी सैन्य ताकत को किसी भी कीमत पर कमजोर नहीं पड़ने देगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारतीय वायुसेना इस समय अपने इतिहास के सबसे कठिन दौर में खड़ी है। स्वीकृत 42.5 पांच स्क्वॉड्रन के मुकाबले उसके पास केवल 29 स्क्वॉड्रन बचे हैं। दूसरी ओर चीन तेजी से अपने पांचवीं और छठी पीढ़ी के युद्धक विमानों का जाल खड़ा कर रहा है। चीन के पास पहले से जे-20 और जे-35 जैसे स्टेल्थ विमान सक्रिय हैं, जबकि वह जे-36 और जे-50 जैसे अगली पीढ़ी के विमानों का परीक्षण भी कर रहा है। पाकिस्तान भी चीन के सहयोग से जे-35 ए जैसे स्टेल्थ विमान हासिल करने की तैयारी में है। ऐसे माहौल में भारत का राफेल पर दांव केवल जरूरत नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का निर्णायक प्रश्न बन चुका है।</div><div><br></div><div>भारतीय वायुसेना ने पिछले वर्षों में जिस अदम्य साहस और पराक्रम का प्रदर्शन किया है, उसने दुनिया को भारत की नई सैन्य सोच का परिचय दिया है। बालाकोट से लेकर वास्तविक नियंत्रण रेखा तक भारतीय वायुसेना ने यह साबित किया कि वह दुश्मन के घर में घुसकर जवाब देने की क्षमता रखती है। अब वही वायुसेना राफेल जैसे घातक और आधुनिक युद्धक विमानों से और अधिक प्रचंड होने जा रही है। देखा जाये तो राफेल केवल विमान नहीं, बल्कि हवा में भारत की दहाड़ है। इसकी मारक क्षमता, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, लंबी दूरी तक सटीक हमला करने की ताकत और दुश्मन की वायु रक्षा को ध्वस्त करने की क्षमता इसे बेहद घातक बनाती है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस समझौते के तहत अठारह विमान सीधे फ्रांस से आएंगे, जबकि 96 विमानों का निर्माण भारत में होगा। यह पहली बार होगा जब राफेल का निर्माण फ्रांस के बाहर किया जाएगा। लगभग पचास प्रतिशत स्वदेशीकरण के साथ यह कार्यक्रम भारत को केवल खरीदार नहीं, बल्कि रक्षा निर्माण शक्ति बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम है। इससे भारत की रक्षा औद्योगिक क्षमता बढ़ेगी, हजारों रोजगार पैदा होंगे और भविष्य में स्वदेशी युद्धक विमान कार्यक्रमों को भी नई गति मिलेगी।</div><div><br></div><div>हालांकि यह भी सच है कि केवल राफेल से पूरी समस्या का समाधान नहीं होगा। मिग-29, मिराज-2000 और जगुआर जैसे पुराने विमान अगले दशक में सेवा से बाहर होने लगेंगे। दूसरी ओर तेजस मार्क-1 ए और तेजस मार्क-2 जैसी स्वदेशी परियोजनाएं देरी से जूझ रही हैं। ऐसे में भारतीय वायुसेना को संख्या और तकनीक दोनों स्तरों पर दबाव का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन इस संकट के बीच भी भारत ने बहुस्तरीय रणनीति अपनाई है। एक ओर राफेल, दूसरी ओर उन्नत मध्यम युद्धक विमान कार्यक्रम और साथ ही मानव रहित युद्धक प्रणालियों पर निवेश, यह दिखाता है कि नई दिल्ली आने वाले बीस वर्षों की हवाई शक्ति संरचना तैयार कर रही है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि दुनिया की दो बड़ी छठी पीढ़ी की परियोजनाएं भी इस समय संकट में हैं। ब्रिटेन, इटली और जापान का वैश्विक युद्धक विमान कार्यक्रम वित्तीय संकट और देरी का शिकार है, जबकि फ्रांस, जर्मनी और स्पेन की भविष्य वायु युद्ध प्रणाली आंतरिक टकराव में फंसी हुई है। भारत ने इन दोनों परियोजनाओं में रुचि दिखाई थी, लेकिन अब वहां अनिश्चितता बढ़ गई है। यही कारण है कि भारत ने तत्काल सामरिक मजबूती के लिए राफेल पर भरोसा बढ़ाया है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, रूस का सुखोई-57 भी चर्चा में है। रूस भारत को तकनीक हस्तांतरण, स्रोत कोड और भारत में निर्माण जैसे आकर्षक प्रस्ताव दे रहा है। कई पूर्व वायुसेना अधिकारियों का मानना है कि सीमित संख्या में सुखोई-57 विमानों की खरीद भारत के लिए अंतरिम समाधान हो सकती है। लेकिन भारत फिलहाल किसी एक देश पर पूरी तरह निर्भर होने की बजाय बहुध्रुवीय रक्षा रणनीति अपना रहा है। यही भारत की सबसे बड़ी ताकत है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी की आगामी फ्रांस यात्रा इस पूरे घटनाक्रम को और अधिक महत्वपूर्ण बना देती है। यह यात्रा भारत और फ्रांस के बीच उभरती सामरिक साझेदारी का निर्णायक चरण साबित हो सकती है। अमेरिका के साथ हाल के तनाव और पश्चिमी देशों की अनिश्चित नीतियों के बीच फ्रांस ऐसा साझेदार बनकर उभरा है जो भारत को तकनीक, उत्पादन और रणनीतिक सहयोग तीनों देने को तैयार दिख रहा है। चीन को घेरने की वैश्विक रणनीति में भारत और फ्रांस का यह गठजोड़ हिंद महासागर से लेकर प्रशांत क्षेत्र तक नई शक्ति संतुलन रचना कर सकता है।</div><div><br></div><div>दक्षिण एशिया में इसका सबसे गहरा असर पाकिस्तान पर पड़ेगा। पाकिस्तान पहले ही आर्थिक संकट और सैन्य निर्भरता से जूझ रहा है। ऐसे समय में भारत का 200 से अधिक राफेल विमानों की दिशा में बढ़ना पाकिस्तान की वायु शक्ति को पूरी तरह असंतुलित कर देगा। चीन भले ही पाकिस्तान को आधुनिक हथियार दे, लेकिन भारतीय वायुसेना का युद्ध अनुभव, प्रशिक्षण स्तर और तकनीकी समन्वय पाकिस्तान के लिए भय का कारण बना रहेगा। राफेल की मौजूदगी से भारत को दो मोर्चों पर युद्ध की स्थिति में भी निर्णायक बढ़त मिलने की संभावना मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि यह समझौता भारत की नई सैन्य सोच का उद्घोष है। संदेश बिल्कुल साफ है कि भारत अब इंतजार नहीं करेगा, भारत अब जवाब देगा। भारतीय वायुसेना की गर्जना आने वाले वर्षों में और प्रचंड होने वाली है। राफेल के पंखों पर सवार होकर भारत केवल अपनी सीमाएं सुरक्षित नहीं करेगा, बल्कि पूरे एशिया में शक्ति संतुलन की नई कहानी लिखेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 14:39:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/indian-air-force-will-rule-the-skies-114-rafale-jets-will-change-the-equations-of-south-asia</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Myanmar President Min Aung Hlaing India Visit Analysis: PM Modi की बड़ी रणनीतिक जीत! China को मिला करारा जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-diplomacy-is-a-miracle-myanmar-warns-opponents-of-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और म्यांमार के बीच संबंधों को नई रणनीतिक धार देने वाली उच्चस्तरीय वार्ता ने दक्षिण पूर्व एशिया की बदलती भू राजनीतिक तस्वीर में बड़ा संदेश दिया है। म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने राष्ट्रपति बनने के बाद अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए भारत को चुनकर साफ संकेत दिया कि वह चीन की बढ़ती पकड़ से संतुलन बनाने के लिए नई दिल्ली के साथ संबंधों को प्राथमिकता देना चाहते हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि ह्लाइंग ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को स्पष्ट आश्वासन दिया कि म्यांमार की धरती का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह संदेश केवल चीन के लिए ही नहीं बल्कि म्यांमार में सक्रिय उन सशस्त्र गुटों के लिए भी था जो लंबे समय से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में अशांति फैलाने की कोशिश करते रहे हैं। इस वार्ता के जरिए भारत ने म्यांमार में चीन के बढ़ते प्रभाव को चुनौती देते हुए यह दिखा दिया कि क्षेत्रीय सुरक्षा, सीमा प्रबंधन और सामरिक साझेदारी के मामले में नई दिल्ली अब अधिक आक्रामक और निर्णायक भूमिका निभा रही है।</div><div><br></div><div>विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने वार्ता के बाद बताया कि दोनों देशों के बीच महत्वपूर्ण खनिजों और दुर्लभ मृदा तत्वों को लेकर सहयोग पर गंभीर चर्चा हुई। यह क्षेत्र आज वैश्विक राजनीति और आर्थिक प्रतिस्पर्धा का अहम हिस्सा बन चुका है क्योंकि आधुनिक प्रौद्योगिकी, रक्षा उपकरण, ऊर्जा परिवर्तन और अर्धचालक उद्योग में इन खनिजों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। भारत लंबे समय से इन संसाधनों के लिए चीन पर निर्भरता कम करने की दिशा में प्रयासरत है। ऐसे में म्यांमार के साथ सहयोग भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। म्यांमार दुर्लभ मृदा संसाधनों से समृद्ध देश है और भारत इस क्षेत्र में साझेदारी के माध्यम से अपनी आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुरक्षित और विविध बनाना चाहता है।</div><div><br></div><div>दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, संपर्क, सुरक्षा, क्षमता निर्माण और सीमा प्रबंधन जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति व्यक्त की। विदेश मंत्रालय ने बताया कि प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत म्यांमार का विश्वसनीय पड़ोसी, भरोसेमंद सहयोगी और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाला देश बना रहेगा। यह दृष्टिकोण भारत की ‘पड़ोसी प्रथम’, ‘एक्ट ईस्ट’ और ‘महासागर’ नीति के अनुरूप है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-backs-myanmar-sovereignty-vows-mutual-security" target="_blank">India-Myanmar Talks: साइबर घोटालों पर PM Modi का सख्त रुख, फंसे भारतीयों की वापसी पर बनी सहमति</a></h3><div>वार्ता में सुरक्षा सहयोग सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रहा। म्यांमार के राष्ट्रपति ने भारत को आश्वासन दिया कि उनकी भूमि का उपयोग भारत विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होने दिया जाएगा। यह आश्वासन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत और म्यांमार के बीच लगभग सोलह सौ चालीस किलोमीटर लंबी सीमा है, जो अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मणिपुर और मिजोरम जैसे संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों से जुड़ी हुई है। हम आपको बता दें कि हाल के वर्षों में म्यांमार के भीतर अस्थिरता, सशस्त्र समूहों की गतिविधियां, अवैध तस्करी और सीमा पार घुसपैठ भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाती रही हैं। विशेष रूप से मणिपुर में जातीय तनाव और हिंसा के बाद सीमा प्रबंधन का महत्व और बढ़ गया है।</div><div><br></div><div>भारत और म्यांमार के बीच रक्षा सहयोग का केंद्र प्रशिक्षण, क्षमता निर्माण और संस्थागत विकास रहा है। विदेश सचिव ने कहा कि म्यांमार के सैनिकों को संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों से जुड़े प्रशिक्षण भी दिए जाते हैं। साथ ही दोनों देशों ने संपर्क परियोजनाओं को तेजी से पूरा करने की आवश्यकता पर भी जोर दिया। विशेष रूप से कलादान बहु माध्यम पारगमन परिवहन परियोजना को रणनीतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस परियोजना के माध्यम से भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को म्यांमार के रास्ते दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ा जाएगा। इससे न केवल व्यापार और आर्थिक गतिविधियों को गति मिलेगी, बल्कि पूर्वोत्तर भारत का रणनीतिक महत्व भी बढ़ेगा। यह परियोजना भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति का प्रमुख आधार मानी जाती है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस पूरी वार्ता का एक महत्वपूर्ण पहलू चीन के बढ़ते प्रभाव की पृष्ठभूमि भी है। दक्षिण पूर्व एशिया में चीन लगातार आर्थिक और सामरिक विस्तार कर रहा है। म्यांमार में भी चीन की बड़ी निवेश परियोजनाएं और बंदरगाह विकास योजनाएं चल रही हैं। ऐसे में भारत म्यांमार के साथ संबंधों को मजबूत कर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है। भारत के लिए म्यांमार केवल पड़ोसी देश नहीं बल्कि पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाला सामरिक द्वार है। इसलिए नई दिल्ली इस संबंध को आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा तीनों स्तरों पर मजबूत करने की कोशिश कर रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने म्यांमार में शांति, स्थिरता और समावेशी संवाद के समर्थन की भी बात कही। भारत ने संघीय शासन व्यवस्था और आर्थिक विकास के अपने अनुभव साझा करने की पेशकश की। यह संकेत देता है कि भारत म्यांमार में स्थिर राजनीतिक व्यवस्था और दीर्घकालिक शांति को क्षेत्रीय स्थिरता के लिए आवश्यक मानता है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि म्यांमार के राष्ट्रपति यू मिन आंग ह्लाइंग ने अपनी भारत यात्रा के दौरान विदेश मंत्री एस जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल से भी महत्वपूर्ण मुलाकात की। इन बैठकों में सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर क्षेत्र में सक्रिय उग्रवादी गुटों की गतिविधियां, अवैध हथियार और नशीले पदार्थों की तस्करी, समुद्री सुरक्षा तथा क्षेत्रीय स्थिरता जैसे मुद्दों पर विस्तार से चर्चा हुई। भारत ने साफ किया कि म्यांमार की स्थिरता और वहां शांति बहाली भारत की सुरक्षा से सीधे जुड़ी हुई है। अजित डोभाल के साथ हुई बातचीत में सामरिक सहयोग, खुफिया समन्वय और सीमा पार आतंकी नेटवर्क पर निगरानी मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया। विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ बैठक में व्यापार, संपर्क परियोजनाओं, ऊर्जा सहयोग और पूर्वोत्तर भारत को दक्षिण पूर्व एशिया से जोड़ने वाली योजनाओं को तेजी से आगे बढ़ाने पर सहमति बनी।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो म्यांमार के राष्ट्रपति की यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब पूरा क्षेत्र भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा, आपूर्ति श्रृंखला संकट और सुरक्षा चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। इस यात्रा ने स्पष्ट किया है कि भारत और म्यांमार अपने संबंधों को केवल पारंपरिक पड़ोसी संबंधों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उन्हें व्यापक रणनीतिक साझेदारी में बदलना चाहते हैं। दुर्लभ खनिजों से लेकर सीमा सुरक्षा और संपर्क परियोजनाओं तक, दोनों देशों की बढ़ती निकटता आने वाले समय में दक्षिण एशिया और दक्षिण पूर्व एशिया की राजनीति पर महत्वपूर्ण प्रभाव डाल सकती है।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर म्यांमार के साथ यह पूरी कूटनीतिक पहल मोदी सरकार की सक्रिय और दूरदर्शी विदेश नीति का मजबूत उदाहरण बनकर सामने आई है। ऐसे समय में जब चीन दक्षिण पूर्व एशिया में अपना प्रभाव तेजी से बढ़ा रहा है, भारत ने म्यांमार के साथ सामरिक, आर्थिक और सुरक्षा संबंधों को नई मजबूती देकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखने में माहिर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में भारत ने एक ओर जहां अपने पूर्वोत्तर की सुरक्षा चिंताओं को मजबूती से उठाया, वहीं दूसरी ओर संपर्क परियोजनाओं, व्यापार और रणनीतिक साझेदारी के जरिए म्यांमार को भरोसेमंद सहयोग का संदेश भी दिया। यह कूटनीतिक सफलता केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है, बल्कि इससे भारत की ‘एक्ट ईस्ट’ नीति, क्षेत्रीय सुरक्षा रणनीति और एशिया में बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच उसकी मजबूत होती भूमिका भी साफ दिखाई देती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 01 Jun 2026 19:30:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-diplomacy-is-a-miracle-myanmar-warns-opponents-of-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hindi Journalism Day: हिन्दी पत्रकारिता की दशा और दिशा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-state-and-direction-of-hindi-journalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में प्रेस ने लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण अवसर पर अपनी महत्ता सिद्ध की है, फिर चाहे भारत-पाक युद्ध हो या भारत-चीन लड़ाई अथवा अन्य कोई चुनौतीपूर्ण अवसर। यह कहना भी असंगत नहीं होगा कि हिन्दी पत्रकारिता का स्थान इसमें सर्वोपरि रहा है। हिन्दी भाषी समाचारपत्र हों अथवा पत्रिकाएं, उनका देश की बहुसंख्यक आबादी के साथ सदैव विशेष जुड़ाव रहा है और इस दृष्टि से राष्ट्र की एकता, अखण्डता एवं विकास की दिशा में हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका को कदापि नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। हालांकि हिन्दी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास में समय के साथ पत्रकारिता के मायने और उद्देश्य बदलते रहे हैं किन्तु उसके बावजूद सुखद स्थिति यह है कि हिन्दी पत्रकारिता के पाठकों या दर्शकों की रूचि में कोई कमी नहीं आई। यह अलग बात है कि अंग्रेजी मीडिया और उससे जुड़े कुछ पत्रकारों ने भले ही हिन्दी पत्रकारिता की उपेक्षा करते हुए सदैव उसकी प्रामाणिकता एवं विश्वसनीयता पर सवाल उठाने की कोशिशें की हैं किन्तु वास्तविकता यही है कि पिछले कुछ दशकों में हिन्दी पत्रकारिता ने अपनी ताकत का बखूबी अहसास कराया है और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उसकी विश्वसनीयता बढ़ी है। यह हिन्दी पत्रकारिता की बढ़ती ताकत का ही नतीजा है कि कुछ हिन्दी अखबारों ने अनेक संस्करणों के साथ प्रसार संख्या के मामले में कुछ अंग्रेजी अखबारों को भी पीछे छोड़ दिया है।</div><div><br></div><div>हिन्दी पत्रकारिता की शुरूआत 30 मई 1826 को कानपुर निवासी पं. युगुल किशोर शुक्ल द्वारा प्रथम हिन्दी समाचार पत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ के प्रकाशन के साथ हुई थी, जिसका अर्थ था ‘समाचार सूर्य’। उस समय अंग्रेजी, फारसी और बांग्ला में कई समाचारपत्र निकल रहे थे किन्तु हिन्दी का पहला समाचारपत्र ‘उदन्त मार्तण्ड’ 30 मई 1826 को कलकत्ता से पहली बार प्रकाशित हुआ था, जो साप्ताहिक के रूप में आरंभ किया गया था। पहली बार उसकी केवल 500 प्रतियां ही छापी गई थी लेकिन चूंकि कलकत्ता में हिन्दी भाषियों की संख्या काफी कम थी और इसके पाठक कलकत्ता से बहुत दूर के भी होते थे, इसीलिए संसाधनों की कमी के कारण यह लंबे समय तक प्रकाशित नहीं हो पाया। 4 दिसम्बर 1826 से ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन बंद कर दिया गया लेकिन इस समाचारपत्र के प्रकाशन के साथ ही हिन्दी पत्रकारिता की ऐसी नींव रखी जा चुकी थी कि उसके बाद से हिन्दी पत्रकारिता ने अनेक आयाम स्थापित किए हैं। ‘उदन्त मार्तण्ड’ के बाद अंग्रेजी शासनकाल में अनेक हिन्दी समाचारपत्र व पत्रिकाएं एक मिशन के रूप में निकलते गए किन्तु ब्रिटिश शासनकाल की ज्यादतियों के चलते उन्हें लंबे समय तक चलाते रहना बड़ा मुश्किल था, फिर भी कुछ पत्र-पत्रिकाओं ने सराहनीय सफर तय किया। अब परिस्थितियां बिल्कुल बदल चुकी हैं और हिन्दी पत्रकारिता भी मिशन न रहकर एक बड़ा व्यवसाय बन गई है किन्तु अच्छी बात यह है कि आज भी हिन्दी पाठक व दर्शक अपनी-अपनी पसंद के अखबारों व चैनलों के साथ पूरी शिद्दत से जुड़े हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/biodiversity-conservation-is-essential-for-the-ecosystem" target="_blank">International Day for Biological Diversity: इको सिस्टम के लिए जरूरी है जैव विविधता संरक्षण</a></h3><div>बहरहाल, घर बैठे-बैठे दुनिया की सैर कराने की बात हो या देश-विदेश की हर छोटी-बड़ी हलचल से लेकर तमाम ज्वलंत मुद्दों और हर प्रकार की नवीनतम जानकारियों को जुटाकर अपने पाठकों या दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने की, व्यवसायीकरण के आरोपों या तमाम विरोधाभासों के बावजूद हिन्दी पत्रकारिता भी यह काम बखूबी कर रही है और आमजन के भरोसे पर खरा उतरते हुए हिन्दी पत्रकारिता आज आम जनजीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है। अधिकांश हिन्दी समाचारपत्रों के अब ऑनलाइन संस्करण उपलब्ध हैं। विगत कुछ वर्षों में देश में बड़े-बड़े घोटालों का पर्दाफाश करके अनेक सफेदपोशों के चेहरों पर पड़े नकाब उतार फैंकने का श्रेय भी पत्रकारिता जगत को ही जाता है, जिसमें हिन्दी पत्रकारिता की भूमिका को भी किसी भी लिहाज से कमतर नहीं आंका जा सकता।</div><div><br></div><div>जहां तक राष्ट्रीय अखंडता में प्रेस की भूमिका और इसके दायित्वों का प्रश्न है तो प्रेस के कई प्रमुख दायित्व माने गए हैं, जिनमें कानून व्यवस्था की खामियों को प्रकाशित-प्रसारित करना, अपने प्रयासों से शासन को सुव्यवस्थित करना व लोक हितकारी बनाना, पथभ्रष्टों को सन्मार्ग पर लाना, भ्रष्ट तंत्र को चौकन्ना बनाना, असामाजिक तत्वों पर कड़ी नजर रखना, समाज के विभिन्न क्षेत्रों में पर्दे की ओट में होने वाले दुष्कृत्यों, अत्याचारों व अन्याय का जनहित में पर्दाफाश करना, समाज व मानवता के गुनाहगार चेहरों पर पड़े नकाब नोचकर जनता के सामने लाना, निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए धार्मिकता एवं राजनीति की आड़ लेने वालों के राज पर्दाफाश करना, समाज में स्वस्थ मानक स्थापित करना, लोक चेतना जागृत करना इत्यादि शामिल हैं। प्रेस की भूमिका पर टिप्पणी करते हुए महात्मा गांधी ने कहा था, ‘‘प्रेस का प्रथम उद्देश्य जनता की इच्छाओं व विचारों को समझना और उन्हें सही ढ़ंग से व्यक्त करना है जबकि दूसरा उद्देश्य जनता में वांछनीय भावनाओं को जागृत करना और तीसरा उद्देश्य सार्वजनिक दोषों को निर्भयतापूर्वक प्रकट करना है।’’</div><div><br></div><div>लोकतंत्र में प्रेस की भूमिका के बारे में पूर्व राष्ट्रपति डा. शंकर दयाल शर्मा ने कहा था कि प्रेस पर लोकतांत्रिक परम्पराओं की रक्षा करने और शांति व भाईचारा बढ़ाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। राष्ट्रीय अखण्डता के संदर्भ में पत्रकारिता की भूमिका की बात करें तो लोकतंत्र के अन्य स्तंभों के मुकाबले प्रेस की भूमिका कितनी महत्वपूर्ण है, इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि विश्वभर में भारत की प्रतिष्ठा के जो तीन प्रमुख कारण माने गए हैं, वे हैं जागरूक मतदाता, स्वतंत्र न्यायपालिका व स्वतंत्र प्रेस। भारत में प्रेस को जनता की एक ऐसी ‘संसद’ की उपाधि दी गई है, जिसका कभी सत्रावसान नहीं होता और जो सदैव जनता के लिए ही कार्य करती है। इसे समाज में परिवर्तन लाने का अथवा उसे जागृत करने के लिए जन संचार का सशक्त माध्यम माना गया है। प्रेस को समाज की चिंतन प्रक्रिया का एक ऐसा अनिवार्य तत्व माना गया है, जो उसे दिशा व गति देने में सक्षम हो। इसे जनता की ऐसी आंख माना गया है, जो सभी पर अपनी पैनी और निष्पक्ष दृष्टि रखे। प्रेस को जनता की उंगली माना गया है, जो गलत कार्यों के विरोध में स्वतः ही उठ जाती है। प्रेस को समाज के प्रति पूर्ण समर्पण के रूप में देखा जाता है। इसे केवल एक पेशा न मानकर जनसेवा का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है।</div><div><br></div><div>वर्तमान में जहां देशभर में नैतिक मूल्यों में बड़ी गिरावट आई है और राजनीतिज्ञों, विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायिक व्यवस्था पर से लोगों का विश्वास कम हो रहा है, वहीं हिन्दी पत्रकारिता भी इस नैतिक पतन का शिकार होने से नहीं बची है। फिर भी इतना संतोष तो किया ही जा सकता है कि इसने इसके बावजूद अधिकांश अवसरों पर सराहनीय भूमिका निभाई है। हालांकि आज के पूर्ण व्यावसायिकता के दौर में पत्रकारिता को अव्यावसायिक बनाए रखने की बात करना बेमानी होगा क्योंकि इस पेशे से जुड़े लोगों को भी अपने परिवार के पालन-पोषण के लिए इसे एक व्यवसाय के रूप में अपनाना अनिवार्य होता गया है लेकिन व्यावसायिकता के इस दौर में भी इसे एक उद्योग-धंधे के रूप में स्थापित करने के प्रयासों के चलते पत्रकारिता के मानदंडों को ताक पर रखने की प्रवृति से तो हर हाल में बचना ही चाहिए।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से हिन्दी पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’, ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ सहित कई चर्चित पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 12:21:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-state-and-direction-of-hindi-journalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[हीट वेव की गिरफ्त में भारत: तपती धरती, तड़पता जीवन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-in-the-grip-of-a-heatwave-scorching-earth-suffering-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बदलती जलवायु के कारण भारत सहित दुनिया के अनेक हिस्से भीषण हीट वेव की चपेट में है। अब यह संकट पारंपरिक क्षेत्रों से निकलकर तटीय इलाकों तक फैल चुका है। अंधाधुंध शहरीकरण, घटती हरियाली और कंक्रीट के बढ़ते निर्माण से ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव बढ़ रहा है, जिससे दिन और रातें अत्यधिक गर्म हो रही हैं। राजस्थान के बाड़मेर से लेकर दिल्ली की गलियों और विदर्भ के मैदानों तक पारा 45 डिग्री सेल्सियस के स्तर को पार कर चुका है। यह केवल बढ़ते तापमान का आंकड़ा नहीं है बल्कि यह एक गहराता सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट और आर्थिक चेतावनी है। हीट वेव अब केवल मौसमी असुविधा नहीं बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और मानव अस्तित्व के लिए गंभीर संकट बन चुकी है। बढ़ते तापमान, घटती हरियाली और कंक्रीट के फैलते जंगलों ने जीवन को लू की लपटों में समेट दिया है।</div><div><br></div><div>मौसम विभाग और पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के ताजा आंकड़ों ने एक डरावनी तस्वीर पेश की है। पिछले चार दशकों में हीट वेव (लू) से होने वाली मौतों में 62 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। गौर करने वाली बात यह है कि हीट वेव अब केवल अपने पारंपरिक गढ़ (उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत) तक सीमित नहीं रही बल्कि इसने दक्षिण भारत के उन तटीय इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जो ऐतिहासिक रूप से कम ताप प्रभावित रहते थे। अध्ययन बताते हैं कि 1981 से 2000 के बीच लू की औसत अवधि जहां 2.5 से 5.5 दिन थी, वहीं 2001 से 2020 के बीच यह बढ़कर 8.5 दिन तक पहुंच गई। लू का भौगोलिक दायरा भी 11.9 लाख वर्ग किलोमीटर से फैलकर 18.1 लाख वर्ग किलोमीटर हो चुका है। यह विस्तार बताता है कि जलवायु परिवर्तन अब भविष्य की आशंका नहीं, वर्तमान की कड़वी हकीकत है। हमारे शहर कंक्रीट के जंगलों में तब्दील हो चुके हैं, जो दिनभर गर्मी सोखते हैं और रात में उसे मुक्त करते हैं, जिससे ‘अर्बन हीट आइलैंड’ का प्रभाव पैदा होता है। इस तपती आग में सबसे अधिक जोखिम उन लोगों (रेहड़ी-पटरी वाले, निर्माण श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर) का है, जो खुले आसमान के नीचे अपना वजूद तलाशते हैं। इनके पास न तो कूलिंग सेंटर की सुविधा है और न ही काम के घंटों में लचीलापन। इसके साथ ही बच्चे और बुजुर्ग इस बढ़ते ‘डिस्कंफर्ट इंडेक्स’ के सबसे आसान शिकार बन रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/scorching-earth-scorched-lives-the-challenge-of-heatwaves-facing-the-public" target="_blank">तपती धरती, झुलसता जीवन: जनता के समक्ष हीटवेव की चुनौती</a></h3><div>वैज्ञानिकों के मुताबिक तापमान में वृद्धि से आगामी वर्षों में हीट वेव, गर्मी का मौसम ज्यादा समय तक रहने और सर्दी के मौसम का समय घटने जैसी स्थितियां पैदा होंगी। इस बारे में वैज्ञानिकों का स्पष्ट कहना है कि जिस जलवायु परिवर्तन के बारे में अब तक हम केवल पढ़ते-सुनते रहे थे, वह अब हमारे सामने आकर खड़ा हो गया है। भारत में मई का महीना गर्म हवाओं (लू) का चरम समय होता है और लू की घटनाओं को भी मौसम में दिन-प्रतिदिन बदलाव का स्वाभाविक हिस्सा माना जाता है लेकिन चिंता की बात यही है कि लू की तीव्रता लगातार वर्ष दर वर्ष बढ़ रही है। पिछले करीब डेढ़ दशकों में 2009, 2010, 2016, 2017 और 2022 भारत में रिकॉर्ड किए गए पांच सबसे गर्म वर्ष रहे। आईएमडी के मुताबिक 15 सबसे गर्म वर्षों में से 11 वर्ष 2008 से 2022 के बीच ही दर्ज किए गए।</div><div><br></div><div>यह जानना भी जरूरी कि हीट वेव आखिर है क्या? जैसा कि नाम से ही जाहिर है, हीट वेव अत्यधिक गर्म मौसम की अवधि है, जो प्रायः दो या ज्यादा दिनों तक रहती है। जब तापमान किसी क्षेत्र के सामान्य औसत तापमान से अधिक हो जाता है तो उसे ‘हीट वेव’ कहा जाता हं। आईएमडी के अनुसार मैदानी इलाकों का अधिकतम तापमान जब 40 डिग्री सेल्सियस तक और पहाड़ी क्षेत्रों का तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो लू चलने लगती है और यदि तापमान 47 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है तो यह खतरनाक लू की श्रेणी में कही जाती है। इसी प्रकार तटीय क्षेत्रों में जब तापमान 37 डिग्री सेल्सियस हो जाता है तो लू चलने लगती है। हीट वेव के कारण लोगों के बीमार होने और हीट स्ट्रोक का खतरा बहुत बढ़ जाता है तथा सैंकड़ों लोगों की मौत हो जाती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 1998 से 2017 के बीच हीट वेव के कारण 1.66 लाख से ज्यादा लोगों की मौत हुई थी और यह आंकड़ा अब वर्ष दर वर्ष तेजी से बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन से यह स्पष्ट हो चुका है कि तापमान में वृद्धि तथा लू का मानव शरीर पर व्यापक असर पड़ रहा है। गर्म हवाओं से ब्रेन स्ट्रोक, हृदयाघात, नसों में खून के थक्के जमने की आशंका, स्थायी विकलांगता का खतरा बढ़ जाता है और इससे मृत्यु दर में भी वृद्धि हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार, हीट वेव बाढ़ के बाद दूसरी सबसे घातक आपदा है, जो मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौतियां पेश कर रही है। लू का असर हृदय तथा फेफड़े जैसे अंगों पर सर्वाधिक पड़ता है, जो बेहद खतरनाक हो सकता है। हीट वेव से ऐसे लोगों की स्थिति और खराब होने की संभावना होती है, जो हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी इत्यादि समस्याओं से पीड़ित हैं। आईएमडी के मुताबिक वैसे तो हर साल दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, पंजाब, राजस्थान, गुजरात, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना इत्यादि उत्तर पश्चिमी भारत, मध्य, पूर्व और उत्तर प्रायद्वीपीय भारत के मैदानी इलाकों में मार्च से जून के दौरान हीट वेव का दौर चलता है लेकिन जैसे-जैसे पृथ्वी की जलवायु गर्म होती जा रही है, दिन और रात भी सामान्य से अधिक गर्म होते जा रहे हैं, जिससे हीट वेव की घटनाएं बढ़ रही हैं और मौतों तथा बीमारियों की आशंका भी बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>प्रश्न यह है कि भारत में हीट वेव को लेकर ऐसी स्थिति क्यों निर्मित हो रही है? पिछले 30 वर्षों के तापमान तथा गर्म हवाओं का आकलन करते हुए आईआईटी खड़गपुर के एक अध्ययन में यह स्पष्ट किया गया था कि घटती हरियाली, शहरीकरण तथा कंक्रीट से निर्माण के कारण ही अब प्रतिवर्ष हीट वेव में वृद्धि हो रही है। प्रायः देखा जाता है कि एक ही शहर में कुछ जगहों पर उच्च तापमान दर्ज किया जाता है तो कुछ जगहों पर तापमान कम रहता है। कुछ स्थानीय कारण इसके लिए जिम्मेदार होते हैं। दरअसल अधिक हरे-भरे इलाकों में तापमान कम दर्ज किया जाता है जबकि चारों ओर बसी कालोनियों तथा ऊंची-ऊंची इमारतों वाले इलाकों में तापमान ज्यादा दर्ज होता है। तकनीकी भाषा में इसे ‘अर्बन हीट आईलैंड इफैक्ट’ कहा जाता है। पेड़-पौधों की कमी, अधिक शहरीकरण तथा कंक्रीट से अधिक निर्माण इत्यादि विविध कारणों से शहर ज्यादा तप रहे हैं। इसके पीछे एक बड़ी वजह शहरों में निरन्तर बढ़ता जनसंख्या घनत्व भी है। जनसंख्या का घनत्व बढ़ते जाने से हरियाली नष्ट हो रही है और शहरों में हरे-भरे प्राकृतिक क्षेत्रों को भी सीमेंट तथा कंक्रीट के तपते जंगलों में तब्दील किया जा रहा है। दुनियाभर में विभिन्न शोधों के आधार पर वैज्ञानिक जलवायु संकट को ही लू के लिए जिम्मेदार मान रहे है, जिनका कहना है कि शहरीकरण तथा जनसंख्या घनत्व इसमें बड़ा योगदान देते हैं।</div><div><br></div><div>विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) के मुताबिक लू से अर्थव्यवस्था को चौतरफा नुकसान होता है। डब्ल्यूएमओ का कहना है कि बढ़ते तापमान का अर्थ हीट वेव का बढ़ना, बहुत ज्यादा मात्रा में बर्फ का पिघलना, समुद्र जलस्तर का बढ़ना तथा मौसम की चरम घटनाओं का और ज्यादा विनाशकारी होना है, जिसका सीधा प्रभाव पर्यावरण, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और सतत विकास पर पड़ेगा। इतिहास के सबसे गर्म वर्षों में लगभग सभी साल पिछले तथा इस दशक से ही रहे हैं। ब्रिटिश मौसम कार्यालय के एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने कहा है कि यदि जलवायु पविर्तन नहीं हो रहा होता तो ऐसा चरम तापमान प्रत्येक 312 वर्षों में एक बार ही देखने को मिलता। अध्ययन में शोधकर्ताओं ने भारत और पाकिस्तान में हर तीन साल बाद प्रचण्ड लू की आशंका जताते हुए दावा किया कि जलवायु परिवर्तन गर्मी की तीव्रता को जिस तेजी से बढ़ा रहा है, उससे इन क्षेत्रों के लोगों को आने वाले वर्षों में सौ गुना ज्यादा लू के थपेड़े झेलने पड़ सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अत्यधिक तापमान से जहां सार्वजनिक और निजी क्षेत्रों में प्राथमिक तथा माध्यमिक स्तर की स्वास्थ्य प्रणालियों की चिंता बढ़ जाती है, वहीं हीट वेव का श्रमिकों की उत्पादकता पर भी प्रतिकूल असर पड़ता है, जिससे देश की समग्र अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत अत्यधिक गर्मी के कारण करीब 101 अरब घंटे खो देता है, जो पूरी दुनिया में सर्वाधिक है और 3.5 करोड़ लोगों द्वारा एक वर्ष में 8 घंटे कार्य करने वाले लोगों द्वारा किए गए कार्य के बराबर है। आईएलओ की रिपोर्ट में भीषण गर्मी तथा लू के कारण 2030 तक दुनियाभर में अर्थव्यवस्था को 4.2 ट्रिलियन डॉलर की क्षति का अनुमान लगाया गया है। भारत के संदर्भ में इम्पीरियल कॉलेज में जलवायु विज्ञान के सीनियर लेक्चरर डॉ. फ्रेडरिक औटो कहते हैं कि भारत में मौजूदा गर्म हवाओं का एक बड़ा कारण कोयला तथा अन्य जीवाश्म ईंधन का जलाया जाना है और जब तक ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन बंद नहीं होगा, तब तक भारत तथा अन्य स्थानों पर हीट वेव और भी गर्म व खतरनाक होती जाएगी। इन घातक स्थितियों से बचने के लिए जलवायु संकट से निपटने के अन्य उपायों के अलावा प्राकृतिक जंगलों के संरक्षण तथा आवासीय इलाकों में भी हरियाली बढ़ाने के लिए वृक्षारोपण अभियान को भी बढ़ावा देना होगा।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार, पर्यावरण मामलों के जानकार तथा पर्यावरण पर ‘प्रदूषण मुक्त सांसें’ पुस्तक के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 16:11:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-in-the-grip-of-a-heatwave-scorching-earth-suffering-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[India के साथ खड़ा हो गया China! Pakistan हैरान, Shehbaz Sharif, Asim Munir के लौटते ही Jinping ने किया बड़ा खेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-china-border-talks-related-news-and-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेनाध्यक्ष आसिम मुनीर के चीन दौरे से लौटते ही चीन ने एक बड़ा सामरिक और कूटनीतिक खेल खेल दिया। एक ओर बीजिंग में पाकिस्तान के साथ चीन ने अपने रिश्तों को अटूट बताते हुए सुरक्षा, रक्षा और पश्चिम एशिया में साझा रणनीति पर खुला समर्थन दिया, वहीं दूसरी ओर उसी समय भारत के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर रचनात्मक और भविष्य उन्मुख वार्ता कर संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत भी दे दिया।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि बीजिंग में भारत और चीन के बीच परामर्श एवं समन्वय कार्य तंत्र की बैठक में दोनों पक्षों ने पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा यानि एलएसी की स्थिति पर विस्तार से चर्चा की। भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि वार्ता रचनात्मक और भविष्य उन्मुख रही तथा दोनों देशों ने सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बनाए रखने में हुई प्रगति पर संतोष व्यक्त किया। दोनों पक्ष इस बात पर सहमत हुए कि सीमा पर शांति बनाए रखने से द्विपक्षीय संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में प्रगति संभव हुई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-holds-major-meeting-in-china-to-decide-on-lac" target="_blank">LAC पर फैसले के लिए चीन में भारत की बड़ी बैठक, शांति और स्थिरता पर फोकस</a></h3><div>यह बैठक ऐसे समय हुई जब 2020 के गलवान संघर्ष के बाद पैदा हुए लंबे सैन्य गतिरोध को समाप्त करने की दिशा में दोनों देश धीरे धीरे आगे बढ़ रहे हैं। कई दौर की सैन्य और कूटनीतिक वार्ताओं के बाद देपसांग और डेमचोक जैसे अंतिम तनाव वाले क्षेत्रों में भी सैनिकों की वापसी का समझौता हुआ था। हम आपको यह भी याद दिला दें कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच कजान और तियानजिन में हुई बैठकों ने रिश्तों को नई दिशा देने का प्रयास किया। भारत ने स्पष्ट किया है कि वह आपसी विश्वास, सम्मान और संवेदनशीलता के आधार पर चीन के साथ संबंध आगे बढ़ाना चाहता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर चीन ने पाकिस्तान के साथ भी अपने संबंधों को और मजबूत करने का खुला संकेत दिया। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री की हालिया बीजिंग यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शहबाज शरीफ को पुराना मित्र बताते हुए कहा कि चीन और पाकिस्तान की मित्रता अटूट है। उन्होंने पाकिस्तान की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन का भरोसा दोहराया। इतना ही नहीं, चीन ने पाकिस्तान की उस भूमिका की भी सराहना की जिसमें उसने पश्चिम एशिया में अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थता का प्रयास किया। शी जिनपिंग ने कहा कि दोनों देशों को सुरक्षा सहयोग और अधिक व्यापक बनाना चाहिए तथा क्षेत्रीय स्थिरता के लिए साथ मिलकर काम करना चाहिए।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर का यह दौरा केवल औपचारिक नहीं था। दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, जलवायु परिवर्तन, कृषि और सुरक्षा सहयोग से जुड़े पंद्रह समझौतों पर हस्ताक्षर हुए। पाकिस्तान ने चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे के अगले चरण को तेजी से आगे बढ़ाने का भरोसा भी दिया। साथ ही पाकिस्तान ने चीन के अंतरिक्ष कार्यक्रम और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञ मानते हैं कि चीन की यह दोहरी रणनीति बेहद महत्वपूर्ण है। एक तरफ वह पाकिस्तान को अपने सबसे भरोसेमंद सामरिक साझेदार के रूप में मजबूत कर रहा है, वहीं दूसरी ओर भारत के साथ सीमा पर तनाव कम करके एशिया में स्थिरता बनाए रखना चाहता है। इसका सबसे बड़ा कारण अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा है। चीन नहीं चाहता कि भारत पूरी तरह अमेरिका के रणनीतिक खेमे में चला जाए। इसलिए वह सीमा विवाद को नियंत्रित रखते हुए आर्थिक और राजनीतिक संबंधों को सामान्य बनाने का प्रयास कर रहा है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, सिंगापुर में जारी एशिया प्रशांत क्षेत्रीय सुरक्षा आकलन रिपोर्ट ने भी भारत की सामरिक चुनौतियों को रेखांकित किया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के लिए पारंपरिक सैन्य खतरे का केंद्र आगे भी चीन और पाकिस्तान ही रहेंगे। रिपोर्ट के अनुसार भारत की स्थिति ऐसी है जिसमें न युद्ध है और न पूर्ण शांति। भारत अपनी सेना को बड़े पारंपरिक युद्धों के लिए तैयार कर रहा है क्योंकि उसे दोनों परमाणु शक्ति संपन्न पड़ोसियों के साथ सीमा विवादों का सामना करना पड़ रहा है।</div><div><br></div><div>रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि भारत की सैन्य नीति लगातार विकसित हो रही है और पाकिस्तान के खिलाफ 2016, 2019 और 2025 में की गई कार्रवाईयों ने उसकी रणनीतिक सोच को नया रूप दिया है। दूसरी ओर चीन हिंद महासागर क्षेत्र और मलक्का जलडमरूमध्य जैसे क्षेत्रों में अपनी सैन्य उपस्थिति तेजी से बढ़ा रहा है, जिससे एशिया में शक्ति संतुलन का नया दौर शुरू हो गया है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, चीन ने एक ही समय में भारत और पाकिस्तान दोनों के साथ सक्रिय कूटनीतिक चाल चलकर यह स्पष्ट कर दिया है कि वह एशिया में अपनी रणनीतिक पकड़ और प्रभाव को हर हाल में बनाए रखना चाहता है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि मोदी सरकार की आक्रामक और संतुलित कूटनीति ने चीन को भी अपने रुख में नरमी लाने के लिए मजबूर किया है। गलवान संघर्ष के बाद भारत ने जिस मजबूती से सीमा पर सैन्य दबाव बनाया, आर्थिक मोर्चे पर सख्ती दिखाई और वैश्विक मंचों पर अपनी स्थिति मजबूत की, उसका असर अब साफ दिखाई दे रहा है। यही कारण है कि चीन एक तरफ पाकिस्तान को साधने की कोशिश कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत के साथ संबंध सामान्य करने के लिए लगातार संवाद बढ़ा रहा है। भारत ने यह संदेश दे दिया है कि नया भारत दबाव में झुकने वाला नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर बातचीत करने वाला देश है। आने वाले समय में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नजदीकियां निश्चित रूप से भारत के लिए चुनौती रहेंगी, लेकिन मोदी सरकार की रणनीतिक तैयारी, सैन्य मजबूती और वैश्विक कूटनीतिक सक्रियता ने भारत की स्थिति पहले से कहीं अधिक मजबूत कर दी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Thu, 28 May 2026 15:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-china-border-talks-related-news-and-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या एआई मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-ai-cause-the-mass-extinction-of-humanity]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआई आज केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं रह गई है, बल्कि वह मानव सभ्यता के भविष्य का निर्णायक मोड़ बनती जा रही है। जिस गति से यह तकनीक विकसित हुई है, उसने दुनिया को आश्चर्यचकित भी किया है और चिंतित भी। अभी तक विज्ञान और तकनीक मनुष्य के हाथों में उपकरण थे, किंतु कृत्रिम बुद्धिमत्ता पहली ऐसी शक्ति है जो निर्णय लेने, सीखने, विश्लेषण करने और सृजन करने की क्षमता के साथ स्वयं को निरंतर विकसित कर रही है। यही कारण है कि विश्व के प्रमुख धर्मगुरु, वैज्ञानिक और नीति-निर्माता इसके खतरों को लेकर गंभीर चेतावनियां दे रहे हैं। हाल ही में वर्तमान पोप लियो चौदहवें द्वारा कृत्रिम बुद्धिमत्ता के संदर्भ में व्यक्त की गई चिंताएं अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा कि युद्ध को नैतिक नहीं बनाया जा सकता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणाली मानवता के लिए गंभीर खतरा बन सकती है। यह चेतावनी केवल धार्मिक दृष्टि नहीं, बल्कि मानवीय अस्तित्व की रक्षा का प्रश्न है। दुनिया को इसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>पोप ने सामाजिक और वैश्विक मुद्दों पर जारी अपने आधिकारिक संदेश में एआई को मानवता के समक्ष उभरती सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बताया। उन्होंने विशेष रूप से इस बात पर चिंता व्यक्त की कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता केवल तकनीकी परिवर्तन का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह युद्ध, राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संरचना को प्रभावित करने वाली शक्ति बनती जा रही है। उन्होंने दुनिया को चेताया कि तकनीक का उद्देश्य मनुष्य पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि उसकी सेवा करना होना चाहिए। उनका संदेश मानव-केंद्रित विकास की अवधारणा को बल देता है, जिसमें विज्ञान और तकनीक को नैतिकता, मानवीय गरिमा और करुणा के अधीन रखा जाए। पोप की यह चेतावनी केवल धार्मिक दृष्टिकोण नहीं है, बल्कि एक वैश्विक मानवीय आह्वान है कि एआई की अंधी दौड़ में मानवता, संवेदना और नैतिकता का क्षरण न होने दिया जाए। आज जब महाशक्तियां एआई के माध्यम से प्रभाव और नियंत्रण की प्रतिस्पर्धा में लगी हैं, तब पोप का यह संदेश विश्व समुदाय को संयम, उत्तरदायित्व और मानवीय मूल्यों की ओर लौटने का मार्ग दिखाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/global-challenges-facing-india-arising-from-china-us-rapprochement" target="_blank">चीन-अमेरिका की निकटता से भारत के सामने वैश्विक चुनौतियाँ</a></h3><div>पोप ने स्पष्ट कहा कि कोई भी एल्गोरिद्म युद्ध को नैतिक नहीं बना सकता और तकनीक को मानव विवेक का विकल्प नहीं बनने दिया जा सकता। पोप ने चर्च के सामाजिक सरोकारों से जुड़े अपने इस आधिकारिक पत्र में पहली बार एआई को प्रमुख विषय बनाया, जो इस बात का संकेत है कि इसका प्रभाव केवल तकनीकी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा, बल्कि मानव जीवन, समाज और वैश्विक व्यवस्था को व्यापक रूप से प्रभावित कर रहा है। उन्होंने विशेष रूप से एआई आधारित स्वायत्त हथियार प्रणालियों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यदि इस तकनीक को पूर्णतः मानवीय नियंत्रण में नहीं रखा गया तो यह युद्ध, शोषण और दासता के नए रूपों को जन्म दे सकती है। पोप ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता को “निरस्त्र” करने का आह्वान करते हुए उसका आशय तकनीक का विरोध नहीं, बल्कि उसके अनियंत्रित और अमानवीय उपयोग पर रोक लगाना बताया। उनका कहना था कि युद्ध और शांति से जुड़े निर्णय अंततः नैतिकता, करुणा और विवेक पर आधारित होने चाहिए, उन्हें मशीनों के हवाले नहीं किया जा सकता। आज जब अमेरिका, चीन और अन्य महाशक्तियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की होड़ में लगी हैं और युद्ध तकनीकों में इसका उपयोग बढ़ रहा है, तब पोप का यह संदेश मानवता के लिए एक नैतिक दिशा-सूचक के रूप में सामने आया है कि तकनीक मनुष्य की सेवक बने, स्वामी नहीं; और विकास का केंद्र मानव गरिमा, संवेदना तथा विश्वशांति ही रहे।</div><div><br></div><div>निश्चित रूप से कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने शिक्षा, चिकित्सा, स्वास्थ्य, सुरक्षा, बैंकिंग, व्यापार, प्रशासन और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व परिवर्तन किए हैं। रोगों के निदान से लेकर वित्तीय प्रबंधन तक और शिक्षा से लेकर अनुसंधान तक, इसकी उपयोगिता निर्विवाद है। लेकिन हर तकनीकी क्रांति अपने साथ संकट भी लाती है। आज वही संकट स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ा संकट रोजगार का है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने लाखों लोगों के कार्यों को प्रतिस्थापित करना शुरू कर दिया है। ग्राहक सेवा, लेखन, अनुवाद, लेखांकन, सूचना प्रबंधन, प्रोग्रामिंग और कार्यालयी कार्यों में मनुष्य की आवश्यकता तेजी से घट रही है। मशीनें कम लागत, अधिक गति और निरंतर कार्य क्षमता के कारण मनुष्य का स्थान ले रही हैं। इससे केवल बेरोजगारी नहीं बढ़ेगी, बल्कि सामाजिक असंतुलन और आर्थिक विषमता भी गहराएगी। जिन देशों और कंपनियों के पास कृत्रिम बुद्धिमत्ता का नियंत्रण होगा, आर्थिक शक्ति भी उन्हीं के हाथों में केंद्रित हो जाएगी। इससे विश्व व्यवस्था में असमानता का नया स्वरूप उभरेगा।</div><div>इससे भी अधिक गंभीर प्रश्न वैश्विक सुरक्षा का है। आज अमेरिका, चीन और अन्य महाशक्तियां कृत्रिम बुद्धिमत्ता की होड़ में लगी हुई हैं। यह प्रतिस्पर्धा केवल तकनीकी श्रेष्ठता तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक प्रभुत्व का नया संघर्ष बन चुकी है। जैसे कभी परमाणु हथियारों और घातक अस्त्र-शस्त्रों के माध्यम से शक्ति संतुलन स्थापित हुआ था, वैसे ही अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता भविष्य की सामरिक शक्ति बन रही है। स्वायत्त हथियार प्रणाली, बुद्धिमान ड्रोन और बिना मानवीय हस्तक्षेप के निर्णय लेने वाली युद्ध तकनीकें मानवता के लिए भयावह संकेत हैं। यदि युद्ध का निर्णय मशीनों के हाथों में चला गया तो संवेदना, विवेक और नैतिकता समाप्त हो जाएगी। मशीनों के लिए मानव जीवन केवल आंकड़े होंगे। ऐसी स्थिति महाविनाश की संभावना को जन्म दे सकती है। पोप की यह चेतावनी इसी संदर्भ में अत्यंत प्रासंगिक है कि युद्ध का अंतिम निर्णय मानव विवेक के अधीन रहना चाहिए।</div><div><br></div><div>साइबर सुरक्षा भी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के कारण नई चुनौतियों से घिर गई है। बैंकिंग व्यवस्था, विद्युत तंत्र, रक्षा नेटवर्क और संचार प्रणाली आज डिजिटल माध्यमों पर निर्भर हैं। एआई आधारित साइबर हमले किसी भी राष्ट्र को कुछ घंटों में अस्थिर कर सकते हैं। झूठे संदेश, भ्रामक वीडियो, कृत्रिम चित्र और आवाजों के माध्यम से सामाजिक तनाव उत्पन्न किए जा सकते हैं। सत्य और असत्य का अंतर मिटने लगा है। यह सूचना तंत्र और लोकतंत्र दोनों के लिए गंभीर संकट है। एआई का एक और चिंताजनक पक्ष है-मानवीय नियंत्रण का कमजोर पड़ना। वैज्ञानिक समुदाय का एक वर्ग मानता है कि भविष्य में ऐसी बुद्धिमत्ता विकसित हो सकती है जो मनुष्य की क्षमता से कई गुना आगे निकल जाए। यदि ऐसा हुआ तो नियंत्रण का प्रश्न सबसे बड़ा संकट बनेगा। यह केवल तकनीकी विषय नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व का प्रश्न होगा।</div><div>भारत के लिए यह विषय और अधिक महत्वपूर्ण है। भारत युवा शक्ति, विशाल जनसंख्या और तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था वाला देश है। यदि एआई को बिना स्पष्ट नीति और नियंत्रण के बढ़ने दिया गया तो रोजगार, शिक्षा और सामाजिक संरचना पर व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। भारत को विकास और नियंत्रण दोनों के बीच संतुलन बनाना होगा। एआई को रोकना समाधान नहीं है, लेकिन इसे मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के अधीन रखना अनिवार्य है। भारत को ऐसी राष्ट्रीय नीति बनानी होगी जिसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग मानव कल्याण, शिक्षा, चिकित्सा और आर्थिक विकास के लिए हो, लेकिन रोजगार संरक्षण, डेटा सुरक्षा, नैतिक मानदंड और युद्ध नियंत्रण को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए। साथ ही वैश्विक स्तर पर भी एआई के उपयोग हेतु साझा नियम और अंतरराष्ट्रीय संधियां आवश्यक हैं।</div><div><br></div><div>आज सबसे बड़ा प्रश्न तकनीक का नहीं, मानवता का है। क्या मनुष्य अपनी बनाई हुई शक्ति पर नियंत्रण बनाए रख सकेगा? क्या कृत्रिम बुद्धिमत्ता मानव जीवन को समृद्ध बनाएगी या उसे नियंत्रित करेगी? क्या विकास संवेदनाओं से बड़ा हो जाएगा? क्या एआई रूपी विस्फोट मानवता के महाविनाश का कारण बनेगी? यही वे प्रश्न हैं जिन पर दुनिया को गंभीर चिंतन करना होगा। कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दिशा यदि मानवता केंद्रित रही तो यह सभ्यता को नई ऊंचाइयां दे सकती है, लेकिन यदि यह शक्ति नियंत्रण और नैतिकता से मुक्त हो गई तो यह मानव इतिहास के सबसे बड़े संकट एवं महाविनाश का कारण भी बन सकती है। इसलिए आज आवश्यकता तकनीकी प्रगति की नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण प्रगति की है-जहां मशीनें विकसित हों, किंतु मानवता सर्वोच्च बनी रहे।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 16:58:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-ai-cause-the-mass-extinction-of-humanity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका-ईरान युद्ध से महंगाई के कारण आमजन प्रभावित]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/common-people-affected-by-inflation-caused-by-the-us-iran-conflict]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भले ही 1970 के तेल संकट जैसे हालात होने की संभावना ना हो या 2008 जैसी वित्तीय मंदी के हालात ना हो फिर भी एक बात साफ है कि अमेरिका-ईरान के बीच करीब तीन माह से चल रहे युद्ध के नकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं। चाहे एशिया के देश हो या फिर योरोपीय देश सभी केवल वैश्विक तनाव ही नहीं अपितु ईंधन आपूर्ति प्रभावित होने से बढ़ते दामों को रोकने में विफल ही हो रहे हैं। पिछले दस-पन्द्रह दिनों में ही हमारे देश में पेट्रोल- एलपीजी-सीएनजी- पीएनजी के दामों में एक बार नहीं अपितु तीन बार बढ़ोतरी हो चुकी है। हांलाकि वर्तमान हालातों में सरकार को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। विपक्ष चाहे लाख आरोप लगाये या आंदोलन-प्रदर्शन करें पर अंतरराष्ट्रीय हालातों से आंख नहीं मूंदनी चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आमजन से आग्रह को भी इसी संदर्भ में सकारात्मकता से लिया जाना चाहिए। वैसे भी जब संकट का दौर हो और उस संकट के लिए हम या हमारी सरकार जिम्मेदार नहीं हो तो फिर देश में नकारात्मक माहौल बनाने के स्थान पर सकारात्मक माहौल बनाया जाना चाहिए। यह किसी एक व्यक्ति या किसी एक दल का नहीं अपितु सभी राजनीतिक दलों का दायित्व हो जाता है। अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल और एलपीजी की आपूर्ति बुरी तरह से प्रभावित हुई है। ईधन संकट का बड़ा कारण अमेरिका-ईरान युद्ध ना होकर अमेरिका-ईरान युद्ध के कारण हार्मुज संकट बन गया है। हार्मुज के रास्ते से ही कच्चे तेल की आपूर्ति होती है और तनाव के चलते हार्मुज जनडमरुमध्य रास्ते को अवरुद्ध कर दिया गया है इससे आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह तो वैकल्पिक उर्जा के रुप में देश में सोलर, विण्ड एनर्जी के क्षेत्र में पिछले सालों में योजनावद्ध तरीके से तेजी से और बेहतर काम हुआ है और इसी का परिणाम है कि आज प्रधानमंत्री इलेक्ट्रोनिक वाहनों के उपयोग या सोलर एनर्जी के उपयोग पर खुले तौर पर आग्रह करने की स्थिति में है। नवीकरणीय उर्जा के क्षेत्र में देश में तेजी से काम हुआ है और हो रहा है जो एक हद तक संकट को कम करने में सहायक बन रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>आज की दुनिया आइसोलेट दुनिया नहीं है। एक देश की दूसरे देश पर निर्भरता बढ़ी है। कहीं से ईंधन के लिए तो कहीं से खाद्यान्न, कहीं दवा, कहीं अन्य किसी वस्तु के लिए निर्भरता बढ़ी है। युद्ध के चलते इंटरनेशनल लोजिस्टिक सेवाएं प्रभावित हुई है। जहां तक देश की ही बात की जाएं तो पेट्रोल, डीजल, एलपीजी आदि के कीमत में बढ़ोतरी का व्यापक प्रभाव पड़ने लगा है। सीधी सी बात है जब आवागमन महंगा होगा चाहे वह आम आदमी, सार्वजनिक क्षेत्र या लोजिस्टिक का हो तो उसका सीधा सीधा वस्तुओं और सेवाओं पर पड़ेगा ही। यही कारण है ईंधन यानी तेल के भावों में बढ़ोतरी के साथ ही वस्तुओं और सेवाओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। इसके साथ ही आयात पर निर्भर वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक तेल का प्रष्न है देश में खाद्य तेल ओैर अखाद्य तेल दोनों ही प्रभावित हो रहे हैं। खाद्य तेलों में भी आयात पर निर्भरता अधिक है। लाख प्रयासों के बावजूद तिलहन मिशन से तिलहनों का उत्पादन तो बढ़ा है पर अभी विदेशी निर्भरता बनी हुई ही है। इसी तरह से अन्य वस्तुओं के भाव प्रभावित होने लगे हैं। जहां तक सेवा क्षेत्र का प्रष्न है स्वीगी-जोमेटो आदि सेवा प्रदाताओं ने पिछले दिनों में अपने दामों में 16 फीसदी से भी अधिक की बढ़ोतरी कर दी है। मोबाइल सेवा प्रदाताओं ने प्लानों को रिवाइज किया हैं तो उबेर-ओला जैसे सेवा प्रदाताओं ने किराया बढ़ा दिया है। हो तो यहां तक रहा हैं कि बैंकों द्वारा जमाओं पर ब्याज दर में कमी लाना शुरु कर दिया है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/what-is-the-real-meaning-of-the-abraham-accords" target="_blank">आखिर क्या है Abraham Accords का असली मतलब, इस पर साइन करने वाले मुस्लिम देशों को क्या-क्या करना पड़ेगा?</a></h3><div>एक बात साफ हो जानी चाहिए कि लोजिस्टिक लागत बढ़ेगी तो उसका असर सभी वस्तुओं में देखने को मिलेगा। भारत सरकार वेनेजुएला से वैकल्पिक तरीके से कच्चे तेल लाने का प्रयास कर रही है तो अन्य विकल्प भी खोजे जा रहे हैं। पर यह साफ हो जाना चाहिए कि कच्चे तेल की आपूर्ति जब तक सामान्य नहीं हो जाती तब तक पूरी तरह से संकट समाप्त होने की कल्पना नहीं की जा सकती। इन वैश्विक हालातों के पीछे अमेरिका-ईरान की हठधर्मिता ही है। अमेरिका-इजरायल ने ईरान से लड़ाई शुरु करते समय रुस यूक्रेन युद्ध के हालातों से सबक नहीं लिया। रुस के सामने यूक्रेन पिद्दी सा देश होने के बावजूद आज तीन साल से भी अधिक समय होने के बावजूद निर्णायक स्तर पर नहीं पहुंचा है। पर अमेरिका ने यह सोचा था कि दो-तीन दिन में ही ईरान को घुटने टिकवा देंगे और यही अमेरिका की नासमझी रही। मानो या ना मानो पर वास्तविकता यह है कि आज अमेरिका के सामने अपनी प्रतिष्ठा बनाये रखने का संकट आ गया है और यही कारण है कि अंदरखाने अमेरिका और ट्रंप किसी भी तरह से सीज फायर के लिए प्रयासरत है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि युद्ध में नुकसान अमेरिका को ही अधिक हो रहा है। ईरान तो अपने घर से लड़ रहा है और उसके निशाने पर आसपास के देश है। ऐसे में स्टेक तो अमेरिका-इजरायल का ही हो जाता है। इसके अलावा एक बात और समझनी होगी कि ट्रंप 2 में अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने आये दिन तुगलकी फरमान जारी कर दुश्मन ही दुश्मन बनाएं है। गली के गुंडे जैसी पहचान बन गई है ट्रंप की तो दूसरी और अमेरिका के ही अधिकांश लोगों का भरोसा ट्रंप ने खो दिया है। ऐसे में सम्मानजनक सीजफायर ही अमेरिका के लिए अब इस संकट से निकलने का रास्ता रह गया है और इसके लिए ही अंदरखाने प्रयास जारी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 26 May 2026 15:23:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/common-people-affected-by-inflation-caused-by-the-us-iran-conflict</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[देश व समाज हित में डीजल व पेट्रोल की बचत के साथ-साथ स्थाई सादगी समय की मांग!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/in-the-interest-of-the-nation-and-society-the-conservation-of-diesel-and-petrol]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका-ईरान युद्ध के चलते जिस समय पूरे विश्व के सामने ऊर्जा संकट व मंहगाई सुरसा राक्षसी की तरह मूंह खोलकर के देश की दौलत को निगलने के लिए खड़ी है, उस दौर में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने डीजल व पेट्रोल को बचाने व सोना ना खरीदने की सभी देशवासियों से अपील की है, क्योंकि मोदी की इस अपील पर अमल करने से भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला बोझ कम से कम कुछ तो कम होगा, जिससे देश की अर्थव्यवस्था को बेहतर होने का अवसर भी मिलेगा। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की इस अपील के बाद से ही देश के विभिन्न हिस्सों में मोदी के द्वारा चलाई जा रही इस राष्ट्रहित की मुहिम में शामिल होने की होड़ लग गई है। हालांकि अभी तो अधिकतर लोग सांकेतिक रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस मुहिम में ज्यादा जुड़ रहे हैं, लेकिन सांकेतिक ही सही एक बहुत अच्छी पहल में कम से कम लोगों के जुड़ने की शुरुआत तो हुई और आने वाले दिनों में उम्मीद है कि इस पहल पर बड़े पैमाने पर आम लोग भी अमल करेंगे।</div><div><br></div><div>वैसे तो देशभर में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही यह मुहिम धरातल पर धीरे-धीरे रंग लाती जा रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अपील के बाद से ही भाजपा के शीर्ष नेतृत्व से लेकर के आम कार्यकर्ताओं तक ने सर्वप्रथम बड़े पैमाने पर इस मुहिम में शामिल होकर के इसको एक आंदोलन का रूप देने का कार्य किया। जिसके बाद से ही देश भर में ज्यूडिशियरी, शीर्ष नौकरशाह, कर्मचारी व आम जनमानस तक भी मोदी की इस मुहिम में अब बड़े पैमाने पर शामिल होते हुए नज़र आ रहे हैं। शासन-प्रशासन के शीर्ष स्तर पर काबिज बैठे हुए ताकतवर लोगों में देश भर में वाहनों के लंबे-चौड़े काफिले का त्याग करने की फिलहाल तो एक होड़ लगी हुई है। हालांकि उन लोगों का यह कदम वास्तव में दिल से खर्चों में कटौती करते हुए जीवन में सादगी अपनाने की धरातल पर एक स्थाई पहल है या सिर्फ मीडिया व सोशल मीडिया के विभिन्न प्लेटफार्मों पर अपनी कुछ पोस्ट डालकर के वाहवाही लूटने की एक नौटंकी मात्र है, यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन अच्छी बात यह है कि कम से कम युद्ध के माहौल के चलते जब पूरी दुनिया ऊर्जा व आर्थिक संकट के मुहाने पर खड़ी है, उस वक्त प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस अपील पर भारत में धरातल पर अमल शुरू होना देश व समाज हित के लिए एक बहुत अच्छा संकेत है।</div><div><br></div><div>लेकिन विचारणीय तथ्य यह भी है कि क्या प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह मुहिम कुछ समय की ना होकर के देश व समाज हित में धरातल पर दीर्घकालीन स्थाई रूप ले पायेगी, हालांकि यह तो आने वाला समय ही बता पायेगा। लेकिन पूरी दुनिया में जिस तरह से युद्धों के चलते बेहद ही तनावपूर्ण माहौल चल रहा है, उस माहौल का स्पष्ट रूप से संदेश है कि अब वह दौर आ गया है जब देश व समाज के हित में जनता के टैक्स के पैसे के दम पर राजा-महाराजाओं की तरह पूरी शानो-शौकत व ठाट-बाट से जीवन व्यतीत कर रहे शासन-प्रशासन के लोग सादगी से जीवनयापन करने की आम जनमानस के सामने नज़ीर पेश करते हुए लोगों को भी "सादा जीवन उच्च विचार" के लिए प्रेरित करें। वैसे भी देखा जाए तो अब देश व दुनिया में वह दौर शुरू हो गया है, जब देश व समाज के हित की बातें सिर्फ और सिर्फ सरकारी दफ्तरों में बैठकर के आम जनमानस पर अपने विचार या नियम-कानून बना कर के थोप देने मात्र से ही पूरी नहीं हो जाती है, बल्कि उस पर अमल करवाने के लिए शासन-प्रशासन में बैठे हुए ताकतवर लोगों को भी स्वयं अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सादगी व जवाबदेही को अपनाकर उदाहरण पेश करना चाहिए, तब ही आम जनमानस भी उन लोगों की देखा-देखी उस पर अमल करने का कार्य करेगा। लेकिन आज के वीवीआईपी बनकर के दिखाने वाले दौर में जिस तरह के राजसी ठाट-बाट के साथ कुछ राजनेताओं व शासन-प्रशासन में बैठे हुए कुछ लोग सरकारी व निजी दौरों के दौरान अनाप-शनाप खर्चा करते हैं, क्या ऐसे लोग के द्वारा देश व समाज हित में उन सभी अनावश्यक खर्चों में स्वयं ही कटौती करने की पहल करके जनता के सामने एक बड़ी मिसाल कायम नहीं करनी चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/fuel-price-hike-prices-hiked-for-the-fourth-time-in-10-days-rahul-gandhi-target-pm-modi" target="_blank">Fuel Price Hike: 10 दिन में चौथी बार बढ़े दाम, Rahul Gandhi बोले - महंगाई के सरगना मोदी ने फिर दिखाया खेल</a></h3><div>विचारणीय तथ्य यह भी है कि आजकल देश में जिस तरह से सरकारी या गैरसरकारी लोगों के मन में अपने आपको एक बड़ा वीवीआईपी दिखाने की चाह रहती है, वह चाहते देश व समाज हित में ठीक नहीं है, क्योंकि इन लोगों को वीवीआईपी दिखाने की चाहत में सिस्टम का बड़ा तामझाम, लग्जरी मंहगी गाड़ियों के लंबे-चौड़े काफिले, चार्टर प्लेन आदि दिखावे पर जनता के द्वारा देश के विकास के लिए दिये गये टैक्स की काफी धनराशि का दुरुपयोग होता है, जिसको तत्काल रोका जाना चाहिए। वहीं कुछ लोगों के द्वारा अपना भौकाल बनाने के लिए व दिखावे के लिए ली गयी अत्यधिक सुरक्षा व्यवस्था और रखरखाव में होने वाले अतिरिक्त खर्चों को भी अब बिल्कुल सीमित करना चाहिए। क्योंकि जिस तरह से चंद लोग सिस्टम में बैठे कुछ ताकतवर लोगों की कृपा से सरकारी अमले की आड़ में जनता के टैक्स के पैसों पर मौज मस्ती करते हुए जनता का ही आये दिन उत्पीड़न करते हैं, यह किसी से भी छिपा हुआ नहीं है, सिस्टम में बैठे हुए कुछ लोगों से सांठ-गांठ करके हमारे प्यारे&nbsp; देश में धनपशु, दलाल व अपराधी तक भी सरकारी सुरक्षा व सुविधाओं के भौकाल का आनंद लें रहे हैं, जो नियम कायदे व कानून पसंद देशभक्त देशवासियों के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है। देश व समाज हित में जनता के द्वारा टैक्स के रूप में दी गई धनराशि शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, युवाओं, महिलाओं, किसानों और उधोग-धंधों आदि के साथ-साथ देश के सर्वांगीण विकास पर खर्च हो। देश की जनता के टैक्स का धन देश के विकास और आम जनमानस की भलाई में लगे, न कि वीवीआईपी बनने की चाहत के बेफिजूल के खर्चो और शानो-शौकत में लगे। इसलिए अब देश व समाज हित में वह समय आ गया है जब शासन व प्रशासन में बैठे लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सोना ना खरीदने व डीजल और पेट्रोल बचाने की पहल को दो कदम आगे बढ़ाते हुए स्वयं ही अनुशासित होकर के जीवन पथ पर सरलता व सादगी अपनाकर देश व समाज हित को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करेंगें और भारत का नव निर्माण करते हुए देश को विश्व गुरु बनायेंगे।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 25 May 2026 13:23:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/in-the-interest-of-the-nation-and-society-the-conservation-of-diesel-and-petrol</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[जन अपेक्षाओं पर खरे उतरने की एक मुख्यमंत्री की सकारात्मक पहल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समूचा उत्तरी भारत भीषण गर्मी की चपेट में चल रहा है तो दूसरी और ना तो राजस्थान में कोई आसन्न विधानसभा या लोकसभा के चुनाव है और ना ही कोई ऐसी आपात् स्थिति जिसमें जनता से सीधा संवाद कायम करना आवश्यक हो, ऐसी स्थिति में ही एक संवेदनशील मुख्यमंत्री के नाते राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा गावों में चौपाल आयोजित कर सीधे ग्रामीणों से रुबरु हो रहे हैं, यह वास्तव में जननेता की पहचान व उसकी आमजन के प्रति सोच का परिणाम है। 40 डिग्री से अधिक के तापमान में मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल और फिर रात्रि विश्राम आज के सुविधाभोगी युग में लगभग असंभव लग रहा है पर राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा इस लपलपाती गर्मी में गांवों में रात्रि चौपालों के माध्यम से ग्रामीणों से संवाद कायम कर रहे हैं। 5 मई से 16 मई तक राजधानी जयपुर ही नहीं अपितु दूरदराज के इलाकों के गांवों में पांच चौपाल आयोजित कर ग्रामीणों से सीधा संवाद कायम करने के साथ ही रात को उसी गांव के सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम और फिर सुबह गांव में ही प्रातःकालीन भ्रमण के माध्यम से गांववासियों से आत्मीय संवाद कायम कर रहे हैं। मई माह में मुख्यमंत्री 5 से 16 मई के दौरान प्रतापगढ़ के बम्बोरी, सीकर के जाजोर, अजमेर के पुष्कर के पास कड़ेल, जालौर के पंसेरी और जयपुर के ठिकरिया में ग्राम विकास चौपाल में ग्रामीणों के बीच बैठकर उनसे रुबरु हो चुके हैं। 20 मई को बांसवाड़ा के चुड़ावा और 21 मई को धुम्बाला को ग्रामीण चौपाल और गांव की सरकारी स्कूल में रात्रि विश्राम कर रहे हैं। यह गांव कोई राजधानी जयपुर के पास के नहीं है अपितु प्रदेश के दूरदराज के गांव है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा समय निकाल कर इन गांवों में रात्रि चौपाल में ग्रामवासियों की परिवेदनाओं को सुनते हैं, यथा सभव मौके पर ही समाधान करने का प्रयास करते हैं और रात्रि को भोजन भी गांव के ही किसी ग्रामवासी के घर बिना किसी तामझाम के करते हुए देखा जा सकता है। इसके साथ ही खासबात यह है कि इस भीषण गर्मी के दौर में गांव के स्कूल में ही रात्रि को विश्राम करने के साथ ही प्रातःकालीन भ्रमण के दौरान गांववासियों से अपनत्व के साथ मेलमिलाप कर रहे हैं। यह धरातलीय हालातों को समझने, लोगों से सीधे बातचीत कर उनकी समस्याओं, आवश्यकताओं की जानकारी लेने, स्थानीय समस्याओं को समझने और उनके निराकरण का बेहतरीन माध्यम होने के साथ ही मुख्यमंत्री को अपने बीच पाकर ग्रामवासियों में जिस तरह का संदेश जाता हे उसे हम भलीभांति समझ सकते हैं। क्योंकि आज के हालातों में मुख्यमंत्री तो दूर की बात जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों से मिलना भी इतना आसान नहीं होता। फिर सबसे बड़ी बात यह कि मुख्यमंत्री मतलब सरकार आपके बीच आती है तो फिर उसके परिणाम निश्चित रुप से सकारात्मक होते हैं और धरातलीय हालातों को समझने का बेहतर अवसर आसानी से मिल जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यह पहल सीधा ग्रामीणों से रुबरु होने का सशक्त माध्यम बनता जा रहा है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की ही माने तो इससे गांवों की समस्याओं से रुबरु होने का अवसर मिलता है तो आवश्यक निर्देश मौके पर ही जारी होने से समस्याओं का समाधान भी मौके पर ही हो पाता है। इसके माध्यम से सरकारी योजनाओं व कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के साथ ही स्थानीय समस्याओं यथा पानी, बिजली, स्कूल, स्वास्थ्य, सड़क और इसी तरह की सुविधाओं के धरातल पर हालात को समझने का अवसर मिल जाता है। मौके पर ही समस्याओं के समाधान को इस तरह से भी समझा जा सकता है कि सीकर के जाजोद गांव में ग्रामीण चौपाल के दौरान छात्राओं की मांग पर एक रात में विद्यालय में विज्ञान संकाय खोलने के आदेश जारी हो गए। यही नहीं अजमेर के कड़ेल गांव में ग्रामीणों से चर्चा के दौरान सामने आया तो प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र का सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में क्रमोन्नयन के आदेश मुख्यमंत्री के निर्देश पर तत्काल जारी हो गए। यह तो उदाहरण मात्र है पर इससे साफ संदेश जाता है कि ग्रामीण विकास चौपाल कोई दिखावा या औपचारिकता ना होकर ग्रामीणों व आमजन को सीधे राहत पहुंचाने वाली पहल है। निश्चित रुप से यह सराहनीय पहल मानी जानी चाहिए।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india" target="_blank">भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए</a></h3><div>एक खास बात यह है कि मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की यात्रा में जहां काफिले को सीमित किया गया हैं वहीं दौरों के दौरान ईवी वाहन का उपयोग कर ईंधन बचत पर जोर दिया जा रहा सरकारी स्कूल में ही रात्रि विश्राम से गांववासियों और आमजन में एक अपनेपन का संदेश जा रहा है। लगता है जैसे मुख्यमंत्री अपनो के बीच अपनेपन के साथ मिल रहे हैं, अपनी बात कह रहे हैं, उनकी बात सुन रहे हैं और आवश्यकता के अनुसार समाधान भी कर रहे हैं। इसके साथ ही स्थानीय सरकारी मशीनरी मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल को देखते हुए एक्टिव मोड पर आ जाती है और इसका परिणाम यह होता है कि बहुत सी समस्याओं का समाधान तो मुख्यमंत्री की रात्रि चौपाल से पहले ही हो जाता है। मुख्यमंत्री के दौरे और फिर रात्रि चौपाल की हो तो फिर किसी एक विभाग तक बात सीमित ना रहकर सभी आधारभूत सुविधाओं और समस्याओं के समाधान की हो जाती है और निश्चित रुप से समस्याओं का समाधान होता भी है। इस सबसे अलग ग्राम विकास चौपाल के माध्यम से मुख्यमंत्री और सरकार को लोगों की भावनाओं, क्षेत्र विशेष की समस्याओें, आवश्यकताओं को समझने का अवसर मिलता है वहीं स्थानीय प्रशासन, कानून व्यवस्था आदि का भी चर्चा से फीड बैक मिल जाता है। यह तो सभी जानते हैं कि सभी गांवों में मुख्यमंत्री की ग्रामीण चौपाल नहीं हो सकती पर ग्रामीण चौपाल के माध्यम से संवेदनषील सरकार का संदेश आमजन में जा रहा है। सबसे बड़ी बात यह कि विकसित राजस्थान का सपना पूरा करने में यह ग्रामीण विकास चौपाल अहम् भूमिका निभाएगी ही साथ ही सरकार की भावी योजनाएं करते समय फील्ड का यह व्यावहारिक अनुभव निश्चित रुप से कागजी नहीं रह पायेगा और इससे व्यावहारिक योजनाएं बनने के साथ ही विकास को नई गति मिल सकेगी। यह साफ हो जाना चाहिए कि यह किसी मुख्यमंत्री या राजनेता के महिमा मंडन का प्रयास ना होकर एक राजनेता से आमजन की अपेक्षाओं पर खरा उतरने व आमजन के प्रति सीधे संवाद और जनभावना को समझने का बेहतरीन प्रयास माना जाना चाहिए। आज आमजन अपने जनप्रतिनिधि व मुख्यमंत्री से यही अपेक्षा रखती है कि वहां तक आमजन की सहज पहुंच हो सके। राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा की इस पहल की सराहना की जानी चाहिए और संभव हो तो अन्य प्रदेशों के मुख्यमंत्रियों व जनप्रतिनिधियों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 18:27:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-chief-minister-positive-initiative-to-live-up-to-public-expectations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[भारत में जानलेवा हुई गर्मी के साइड इफेक्ट्स समझिए, इसके कारण और बचाव के उपाय जानिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हमारे देश का राजनीतिक तापमान तो वर्षपर्यंत उच्च रहता आया है और चुनावी इलाकों में इसके वैचारिक हीट स्ट्रोक से सिस्टम का झुलसना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन जब मई-जून के महीने में मौसमी तापमान जानलेवा स्तर तक खतरनाक रूप से चढ़ता जाता है तो लोग बाग परेशान हो उठते हैं। फिर अपनी राजनीतिक, प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक गलतियों पर पछतावा के अलावा कुछ नहीं मिलता, क्योंकि विकास के नाम पर आधुनिक भारतीय सभ्यता विनाश की ओर बढ़ती चली जा रही है और पश्चिमी शिक्षा प्राप्त हमारे हुक्मरान तमाशबीन बने बैठे हैं, क्योंकि हरेक आपदा को अवसरों में बदलकर&nbsp; अपनी कमाई बढ़ाने का धंधा उन्होंने सीख लिया है। बेशक अपवाद भी होंगे, लेकिन अल्पमत में, जिनकी लोकतंत्र में कम कद्र होती आई है।</div><div><br></div><div>वहीं, भारत में बढ़ती खतरनाक गर्मी केवल “मौसमी बदलाव” नहीं है, बल्कि जलवायु परिवर्तन, तेजी से शहरीकरण, जंगलों की कटाई और प्रदूषण का संयुक्त परिणाम बन चुकी है। हाल के वर्षों में उत्तर भारत, महाराष्ट्र, गुजरात और मध्य भारत में 46°C–48°C तक तापमान दर्ज हुआ है।&nbsp; मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, देश का एक बड़ा हिस्सा इस समय भट्ठी बना हुआ है। हमारे शहर हीट आइलैंड में तब्दील होते जा रहे हैं। उत्तर भारत से लेकर मध्य भारत तक, ज्यादातर शहरों में औसत तापमान सामान्य से 3-5 डिग्री सेल्सियस ऊपर चल रहा है। कहीं कहीं तो पिछले 14-15 वर्षों के रिकॉर्ड टूट चुके हैं। कोढ़ में खाज यह कि फिलहाल राहत के संकेत नहीं है, क्योंकि अल-नीनो की वजह से मौसम आगे और कड़ी परीक्षा ले सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/severe-heatwave-increases-the-risk-of-heat-stroke-with-intense-heat-even-at-night" target="_blank">देशभर में आग उगल रहा आसमान, Severe Heatwave ने बढ़ाया Heat Stroke का खतरा, रात में भी पड़ रही भयंकर गर्मी, जीना हुआ मुहाल</a></h3><div>अलबत्ता आप मानें या न मानें, लेकिन गर्मी की बढ़ती प्रवृति में भविष्य के लिए सबसे बड़ा संदेश छिपा हुआ है। वह यह कि यदि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो भारत में गर्मी केवल असुविधा नहीं बल्कि “राष्ट्रीय स्वास्थ्य और आर्थिक संकट” बन सकती है। लिहाजा, आने वाले वर्षों में जल संरक्षण, हरित विकास और स्वच्छ ऊर्जा ही सबसे बड़े समाधान होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>विभिन्न अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के अनुसार, इस सीजन 27 अप्रैल और 19 मई दो ऐसे दिन रहे, जब धरती के सबसे ज्यादा गर्म 50 शहरों में सभी भारत के थे। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की रिपोर्ट हमें चेताती है कि देश के 50% से ज्यादा शहरों में भीषण गर्मी का खतरा 'अधिक' से लेकर 'बेहद अधिक' के स्तर तक पहुंच चुका है। और तो और, साल 2015 से 2020 के दरम्यान लू वाले दिनों का औसत 7.4 दिन से बढ़कर 32.2 दिन हो गया है, और यह लगातार बढ़ रहा है। इसका गहरा दुष्प्रभाव हमारी सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ने के आसार प्रबल हैं।</div><div><br></div><div>हमारे शहरों पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं, क्योंकि वो अंधाधुंध विकास की होड़ में अपनी हरियाली उजाड़कर उन्हें कंक्रीट के जंगलों में तब्दील करते जा रहे हैं। लिहाजा, भारत में गर्मी अब हर साल एक नया रेकॉर्ड बना रही है। चिंताजनक बात यह है कि दिन तो तपते ही हैं, अब रातें भी तपने लगी हैं और राहत देने वाली नहीं रहीं। इस 20 मई को दिल्ली ने मई महीने में 13 साल की सबसे गर्म रात देखी, जब न्यूनतम तापमान सामान्य से 5.2 डिग्री सेल्सियस ऊपर रहा। 21 मई को स्थिति उससे भी ज्यादा बुरी हुई।इस प्रकार से हाल के बरसों में हीटवेव की तीव्रता, उसका समय और सीमा अभूतपूर्व रूप से बढ़े हैं। इससे शहरों पर संकट ज्यादा है, जो घटती हरियाली, बढ़ते कंक्रीट स्ट्रक्चर और प्रदूषण की वजह से अर्बन हीट आईलैंड इफेक्ट' झेल रहे हैं।</div><div><br></div><div>इससे हमारे कामकाज पर भी नकारात्मक असर पड़ चुका है, क्योंकि मौसम की यह मार दोतरफा है- सेहत और अर्थव्यवस्था दोनों पर पड़ चुकी है। नैशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक, 2025 में हीट स्ट्रोक के सात हजार से ज्यादा सस्पेक्टेड केस सामने आए थे। हालांकि माना जाता है कि भारत में हीट स्ट्रोक और उससे होने वाली मौतों का सही आंकड़ा रिपोर्ट नहीं हो पाता। क्योंकि देश की एक बड़ी आबादी मौसम का सीधा वार झेलती रहती है। इनमें गिग वर्कर्स, दिहाड़ी मजदूर, स्ट्रीट वेंडर्स वगैरह भी शामिल हैं। चूंकि घर बैठने से न इनका काम चलेगा और न अपने देश का। लिहाजा इस मौसम में ये सबसे ज्यादा जोखिम में ये लोग ही होते हैं। किसान और मजदूर भी इन्हीं जैसे होते हैं। ऐसे में इनकी सुरक्षा के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते है, जैसे सार्वजनिक शेल्टर, पेयजल की व्यवस्था और जहां संभव हो वहां काम के घंटों और चरित्र में बदलाव। इसे गंभीर चेतावनी के रूप में लिया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>चूंकि बढ़ती हुई गर्मी से हमारी आपकी कार्यक्षमता पर सीधा असर पड़ता है, काम के घंटे कम होते हैं और प्रॉडक्टिविटी भी घट जाती है। लिहाजा यह बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है। एक आकलन के मुताबिक, यदि यही हाल रहा तो 2030 तक गर्मी की वजह से भारत की जीडीपी का 4.5 प्रतिशत प्रभावित होगा। ये सारे आंकड़े एक गंभीर चेतावनी हैं। चूंकि क्लाइमेट चेंज की वजह से मौसम के और बिगड़ने की आशंका है, इसलिए बेहतर रहेगा अगर हमलोग अपनी तैयारी पहले से कर लें।</div><div><br></div><h2># भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण जानिए</h2><div>भारत में खतरनाक गर्मी बढ़ने के प्रमुख कारण इस प्रकार हैं- पहला, जलवायु परिवर्तन: धरती का औसत तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिक रिपोर्टों के अनुसार मानव गतिविधियों से पैदा हुई ग्लोबल वार्मिंग ने भारत में हीटवेव को अधिक लंबा और तीव्र बना दिया है। दूसरा,&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">जंगलों की कटाई: पेड़ प्राकृतिक “कूलिंग सिस्टम” होते हैं। लिहाजा बड़े पैमाने पर वनों की कटाई से नमी कम हो रही है, वर्षा चक्र प्रभावित हो रहा है, जमीन अधिक गर्म हो रही है। तीसरा, शहरी हीट आइलैंड प्रभाव :कंक्रीट, डामर, वाहन, एसी और उद्योग शहरों को “हीट ट्रैप” बना रहे हैं। शहर रात में भी गर्म बने रहते हैं। चौथा, प्रदूषण और ग्रीनहाउस गैसें: कोयला, पेट्रोल-डीजल, फैक्ट्रियों और वाहनों से निकलने वाली गैसें वातावरण में गर्मी रोकती हैं। पांचवां, कमजोर मानसून और एल-नीनो: एल-नीनो जैसी वैश्विक मौसमी घटनाएँ भारत में सूखा और गर्म हवाएँ बढ़ाती हैं। छठा, भूजल की कमी और सूखी जमीन जब मिट्टी में नमी कम होती है तो धरती तेजी से गर्म होती है। इससे लू और अधिक खतरनाक हो जाती है। सातवां, अनियोजित विकास: खुले मैदान कम होना, झीलों और तालाबों का खत्म होना, अत्यधिक कंक्रीट निर्माण इनसे स्थानीय तापमान तेजी से बढ़ रहा है।</span></div><div><br></div><h2># गर्मी से होने वाले खतरे को समझिए</h2><div>गर्मी से होने वाले खतरे निम्नलिखित हैं:- हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट और बीपी की समस्या, बच्चों और बुजुर्गों में मृत्यु जोखिम, फसल नुकसान, बिजली और पानी संकट श्रमिकों की कार्यक्षमता में कमी, भारत में हीटवेव से स्वास्थ्य संकट तेजी से बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।</div><div>&nbsp;</div><h2># ये हैं व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान&nbsp;</h2><div>व्यक्तिगत स्तर पर बचने के प्रमुख निदान इस प्रकार हैं- पहला, दोपहर में बाहर निकलने से बचें, विशेषकर 12 बजे से 4 बजे तक। दूसरा, पर्याप्त पानी पिएँ, ओआरएस, नींबू पानी, छाछ, नारियल पानी। तीसरा, हल्के सूती कपड़े पहनें, गहरे रंग और टाइट कपड़ों से बचें। चौथा, शरीर को ठंडा रखें, सिर ढकें, छाता प्रयोग करें, गीला कपड़ा रखें। पांचवां, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान, उन्हें बंद और गर्म कमरों में न रखें।</div><div><br></div><h2># हमें सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए</h2><div>सामाजिक और सरकारी स्तर पर निम्नलिखित कदम उठाने चाहिए- पहला, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण- यह सबसे सस्ता और प्रभावी उपाय है। दूसरा, तालाब और जलस्रोत बचाना: स्थानीय तापमान कम करने में मदद मिलती है। तीसरा, “कूल रूफ” अभियान: सफेद या परावर्तक छतें घरों को ठंडा रखती हैं। चौथा, शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाना: पार्क ग्रीन कॉरिडोर, छायादार सड़कें। पांचवां, प्रदूषण नियंत्रण:&nbsp; स्वच्छ ऊर्जा और इलेक्ट्रिक परिवहन को बढ़ावा देना। छठा, हीट एक्शन प्लान: कई शहर अब हीट अलर्ट, कूलिंग सेंटर और स्वास्थ्य सुविधाएँ बढ़ा रहे हैं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 22 May 2026 18:07:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/understand-the-life-threatening-side-effects-of-the-heat-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बिहार की राजनीति के वर्तमान व भविष्य की 'सियासी धुरी' बन चुके हैं सीएम सम्राट चौधरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति में जुझारू युवा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को केवल सुलझते हुए वर्तमान का एक नेता ही नहीं, बल्कि “भविष्य की राजनीतिक धुरी” के रूप में देखने वालों की संख्या पिछले 5 वर्षों में तेजी से बढ़ती ही जा रही है और यह सिलसिला निरंतर आगे भी चलता रहेगा। ऐसा इसलिए कि उनके पीछे कई राजनीतिक, सामाजिक और संगठनात्मक कारण सक्रिय हैं, जो उन्हें राजनीतिक रूप से अजेय बनाते हैं। आइए इन्हें समझते हैं विस्तार से-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, बिहार में भाजपा के भीष्म पितामह कैलाशपति मिश्रा के संजोए हुए सपनों को पूरा करते हुए पार्टी के&nbsp; पहले मुख्यमंत्री बनने का ऐतिहासिक महत्व है। निःसन्देह साल 2026 में सम्राट चौधरी का बिहार का मुख्यमंत्री बनना भाजपा के लिए ऐतिहासिक मोड़ माना गया, क्योंकि पहली बार बिहार में भाजपा ने मुख्यमंत्री पद अपने हाथ में लिया। इससे प्रदेशवासियों में&nbsp; यह संदेश गया कि भाजपा अब बिहार में “जूनियर पार्टनर” नहीं रहना चाहती बल्कि पार्टी ने बिहार में अपना सूझबूझ युक्त स्वतंत्र नेतृत्व स्थापित कर दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prashant-kishor-has-a-new-destination-will-he-now-formulate-his-next-strategy-from-patna-ashram" target="_blank">Bihar में Jan Suraj की हार के बाद Prashant Kishor का नया ठिकाना, अब Patna आश्रम से बनाएंगे अगली रणनीति?</a></h3><div>पार्टी मामलों के जानकारों की मानें तो अब सम्राट चौधरी को केवल अंतरिम चेहरा नहीं, बल्कि दीर्घकालिक नेतृत्व के मोहरे के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो ओबीसी सियासत के लिए सौभाग्य की बात है। चूंकि उनमें सामाजिक न्याय के सूत्रधार लालू प्रसाद वाली हाजिर जवाबी, सुशासन बाबू नीतीश कुमार वाली सियासी चतुराई के अलावा सद्भावी कैलाशपति मिश्रा वाली सूझबूझ भी भरी हुई है जिससे हरेक जाति-धर्म के लोगों में उनकी स्वीकार्यता दिनप्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है।</div><div><br></div><div>दूसरा, सामाजिक समीकरणों में मजबूत पकड़: बिहार की राजनीति के भाजपाई नव चाणक्य सम्राट चौधरी का सबसे बड़ा राजनीतिक बल उनका व्यापक सामाजिक आधार माना जाता है। चूंकि वे पिछड़े वर्ग, विशेषकर कुशवाहा-कोइरी यानी लव कुश समाज या त्रिवेणी संघ से आते हैं, जो बिहार की राजनीति में निर्णायक प्रभाव रखता है। इससे भाजपा को लालू प्रसाद/नीतीश कुमार के सामाजिक न्याय के बीच यादव बनाम गैर-यादव ओबीसी राजनीति में बढ़त मिली ही, साथ ही ग्रामीण वोटबैंक में विस्तार आया, और मंडल राजनीति का नया जवाब देने का अवसर मिला।</div><div><br></div><div>चूंकि भाजपा लंबे समय से बिहार में एक ऐसा चेहरा खोज रही थी जो हिंदुत्व, ओबीसी राजनीति, और संगठनात्मक निष्ठा तीनों को एक साथ लेकर चल सके। लिहाजा सम्राट चौधरी उस समीकरण में फिट बैठते दिखे। उनकी सबसे बड़ी ताकत यह है कि राजपूत, भूमिहार, ब्राह्मण, वैश्य, दलितों के साथ-साथ प्रगतिशील यादवों पर भी पूरी पकड़ है, जिसका फायदा भाजपा नीत एनडीए को बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में उन्होंने दिलवाया और पुरस्कार स्वरूप पहले गृहमंत्री, फिर मुख्यमंत्री बने।</div><div><br></div><div>तीसरा, व्यवहारिक आक्रामक भरा लेकिन नियंत्रित राजनीतिक शैली: राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि सम्राट चौधरी की राजनीति, तेजस्वी यादव की तरह ही पलटवारी आक्रामक, लेकिन संगठन के प्रति अनुशासित मानी जाती है। वे सड़क से लेकर सदन तक मुखर सियासी शैली अपनाते रहे हैं। इससे भाजपा कार्यकर्ताओं में ऊर्जा पैदा हुई। भाजपा नेतृत्व अक्सर ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाता है जो जनसभाओं में भीड़ खींच सकें, विपक्ष पर हमला कर सकें, और संगठन के प्रति पूर्ण निष्ठावान रहें। ये सभी गुण सम्राट चौधरी में कूट कूट कर भरे हुए हैं। इसलिए उनका सियासी उदय पूर्वी भारत की राजनीति में अहम मायने रखती है।</div><div><br></div><div>चौथा, दिल्ली नेतृत्व का भरोसा: भाजपा के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की राजनीति में “विश्वसनीय नेतृत्व” बहुत महत्व रखता है। चूंकि सम्राट चौधरी इन कसौटियों पर भी खरे उतरते हैं, इसलिए उनपर सबका भरोसा बढ़ा है। वाकई सम्राट चौधरी जमीनी संगठन से निकले नेता हैं, जो भाजपा की स्थापित लाइन से थोड़ा-सा भी विचलित नहीं होते, और गठबंधन राजनीति को भी संभालने की क्षमता रखते हैं। यही कारण है कि बिहार में नेतृत्व परिवर्तन के समय उनके नाम पर सहमति बनी। इससे भाजपा की सूबाई राजनीति को एक नई धार मिली है।</div><div><br></div><div>पांचवां, सूबाई चाणक्य नीतीश युग के बाद की राजनीति का केंद्र बना सम्राट युग: बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के लंबे राजनीतिक दौर के बाद बिहार में नेतृत्व का संक्रमण होना तय माना जा रहा था। ऐसे विचित्र समय में भी भाजपा ने युवा, ओबीसी, और आक्रामक राजनीतिक छवि वाले नेता के रूप में सम्राट चौधरी को आगे बढ़ाकर भविष्य की राजनीति का संकेत दे दिया है। इसका उद्देश्य केवल सरकार चलाना नहीं, बल्कि अगले 10–15 वर्षों का राष्ट्रवादी राजनीतिक आधार तैयार करना भी माना जा रहा है। पार्टी की इस रणनीति को अमलीजामा पहनाने के प्रति सम्राट चौधरी ने भी प्रतिबद्धता दिखाई है।</div><div><br></div><div>छठा, सत्ताप्रतिष्ठान की राह में चुनौतियाँ भी कम नहीं:&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">हालाँकि सम्राट चौधरी के सामने कतिपय बड़ी चुनौतियाँ हैं, जिसमें बेरोजगारी, पलायन, कानून व्यवस्था, शिक्षा और स्वास्थ्य, जातीय संतुलन, और गठबंधन राजनीति के प्रबंधन में सम्राट चौधरी निरंतर सधी चाल चल रहे हैं और अहम फैसले ले रहे हैं। इससे बिहार वासियों के दिलोदिमाग पर सकारात्मक असर पड़ा है। भले ही सियासी ईर्ष्यावश विपक्ष लगातार उनकी सरकार को अपराध और प्रशासनिक मुद्दों पर घेर रहा है। लेकिन सम्राट चौधरी लगातार विकास,</span></div><div>रोजगार, और प्रशासनिक सुधार पर ठोस परिणाम देते ।नजर आते हैं, इसलिए सूबे में “भविष्य के नेता” वाली उनकी छवि स्थायी बनती जा रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सातवां, बिहार की नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता: सम्राट चौधरी का उदय केवल व्यक्ति विशेष का उत्थान नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में तीन बड़े परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है: पहला, भाजपा का स्वतंत्र प्रभुत्व, दूसरा, ओबीसी नेतृत्व का नया संस्करण, और तीसरा, पोस्ट-नीतीश युग की शुरुआत। चूंकि इस नई राजनीतिक कथा के अहम सूत्रधार और नेतृत्वकर्ता खुद सम्राट चौधरी ही हैं, इसीलिए समर्थक उन्हें “बिहार का वर्तमान और भविष्य” दोनों कह रहे हैं। उनकी तमाम कोशिशें भी इसी ओर इंगित करती दिखाई देती हैं। इसलिए हर ओर उल्लास की स्थिति देखी जा रही है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 19:33:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/samrat-chaudhary-has-emerged-as-political-axis-of-both-the-present-and-future-of-bihar-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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