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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[आखिर कब थमेगा धार्मिक आयोजनों में मौत का सिलसिला?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/when-will-the-series-of-deaths-at-religious-events-finally-come-to-an-end]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>धर्म, आस्था और विश्वास के केंद्रों पर इंसान सुकून, शांति और सुख-समृद्धि की कामना लेकर पहुंचता है लेकिन जब वही स्थान चीख-पुकार, दमघोंटू भीड़ और मौत के मंजर में तब्दील हो जाएं तो यह हमारी व्यवस्था की संवेदनहीनता और सुरक्षा संबंधी तैयारियों की विफलता का भयावह प्रमाण है। कोलकाता के चोरबागान दुर्गा पूजा पंडाल में 17 अक्तूबर की शाम भगदड़ जैसी स्थिति में 19 लोगों की मौत और दो दर्जन से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने एक बार फिर देश को झकझोर दिया। सप्तमी की शाम मां दुर्गा के दर्शन की लालसा लेकर निकले श्रद्धालुओं को क्या पता था कि घर लौटने के बजाय कई परिवारों को अपने प्रियजनों के शव मिलेंगे? जिस उत्सव में जीवन, शक्ति और विजय का संदेश गूंजना चाहिए था, वहां मातम पसरा था। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर हमारी आस्था के स्थलों पर इंसानी जिंदगी इतनी सस्ती क्यों हो जाती है?</p><p>चोरबागान की घटना को केवल अचानक उमड़ी भीड़ या दुर्भाग्यपूर्ण हादसा बताकर जिम्मेदारी से बचना आसान है लेकिन ऐसा करना त्रासदी के वास्तविक कारणों से आंखें मूंदना होगा। बारिश के बीच पंडाल में प्रवेश और निकास के रास्तों पर भीड़ का दबाव बढ़ा और अफरा-तफरी की स्थिति पैदा हुई। घटनास्थल की संकरी गलियों, लोगों की आवाजाही तथा सुरक्षा प्रबंधों को लेकर भी सवाल उठे हैं। हालांकि, दुर्घटना के वास्तविक कारणों और जिम्मेदारी का निर्धारण निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए। फिर भी, यदि भारी भीड़ और खराब मौसम के बावजूद आवाजाही को सुरक्षित रखने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं थी तो यह गंभीर प्रशासनिक और आयोजन संबंधी विफलता का मामला है। जब किसी आयोजन में हजारों लोगों के जुटने की संभावना पहले से मालूम हो, तब संभावित खतरे का अनुमान लगाने के लिए दुर्घटना होने की प्रतीक्षा क्यों की जाती है?<br>भारत में धार्मिक स्थलों और सार्वजनिक आयोजनों में भगदड़ कोई नई समस्या नहीं है। मंदिरों, तीर्थस्थलों, धार्मिक मेलों, जुलूसों और पर्व-समारोहों में भीड़ का बेकाबू होना बार-बार जानलेवा साबित होता रहा है। वर्ष 2005 में महाराष्ट्र के मांढरदेवी मंदिर में भगदड़ से 300 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। 2011 में केरल के सबरीमाला में भगदड़ ने 100 से अधिक लोगों की जान ले ली थी। 2013 में मध्य प्रदेश के रतनगढ़ मंदिर में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई। 2022 में जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर में भगदड़ से 12 श्रद्धालुओं की जान गई। 2024 में हाथरस में धार्मिक सत्संग के बाद मची भगदड़ में 121 लोगों की मौत ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। 2025 में प्रयागराज महाकुंभ और नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भी भीड़ से जुड़ी जानलेवा घटनाओं ने सार्वजनिक सुरक्षा की तैयारियों पर गंभीर प्रश्न खड़े किए थे। हालांकि अलग-अलग घटनाओं के कारण और परिस्थितियां भिन्न थी लेकिन इनके बीच एक चिंताजनक समानता रही, भीड़ के दबाव में इंसानी जीवन की असुरक्षा।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/for-how-much-longer-will-lives-continue-to-be-lost-in-the-surging-tide-of-faith" target="_blank" rel="noopener">आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां?</a></p><p>हर त्रासदी के बाद शोक संदेश जारी होते हैं, मुआवजे की घोषणाएं होती हैं, जांच समितियां गठित की जाती हैं और इसके बाद व्यवस्था फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट जाती है। यही हमारी सबसे बड़ी विफलता है। यदि पिछली दुर्घटनाओं से सबक लेकर प्रभावी सुरक्षा तंत्र विकसित किया गया होता तो बार-बार ऐसी मौतों का सामना नहीं करना पड़ता। जांच का उद्देश्य केवल दोषियों की पहचान करना नहीं, उन खामियों को दूर करना भी होना चाहिए, जिनके कारण एक ही प्रकार की त्रासदियां बार-बार सामने आती हैं। सवाल यह नहीं कि अगला हादसा कहां होगा बल्कि यह है कि उसे रोकने के लिए हमने अब तक क्या किया है? यह समझना जरूरी है कि भगदड़ केवल लोगों के अचानक दौड़ने से नहीं होती। जब किसी सीमित स्थान में भीड़ की संख्या उसकी क्षमता से अधिक हो जाती है, प्रवेश और निकास का प्रवाह बाधित होता है, लोग एक-दूसरे को धक्का देने लगते हैं या अफवाह के कारण एक साथ आगे बढ़ते हैं, तब स्थिति तेजी से जानलेवा बन सकती है। भीड़ के अत्यधिक दबाव में व्यक्ति के लिए सांस लेना और स्वयं को संभालना कठिन हो जाता है। गिरने वाला व्यक्ति दूसरों के लिए भी गंभीर खतरा पैदा कर सकता है। ऐसे हालात में कुछ क्षणों की अव्यवस्था भी अनेक जिंदगियां लील सकती है। इसलिए भीड़ प्रबंधन का अर्थ केवल पुलिसकर्मियों की तैनाती, बैरिकेडिंग या लाउडस्पीकर से घोषणाएं करना नहीं है। इसके लिए भीड़ की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन, आवाजाही की सतत निगरानी, प्रशिक्षित कर्मियों और स्पष्ट आपातकालीन योजना की आवश्यकता होती है।</p><p>धार्मिक आयोजनों में सुरक्षा को अक्सर आस्था के उत्साह और आयोजन की भव्यता के पीछे गौण कर दिया जाता है। ऊंचे-ऊंचे पंडाल, आकर्षक सजावट, रोशनी, प्रचार और प्रायोजकों की प्रतिस्पर्धा पर भरपूर ध्यान दिया जाता है लेकिन प्रवेश द्वार कितने हैं, निकास कितना चौड़ा है, आपातकालीन रास्ते खुले हैं या नहीं, पर्याप्त रोशनी है या नहीं और भीड़ बढ़ने पर क्या किया जाएगा, इन बुनियादी सवालों की अनदेखी कर दी जाती है। लोकप्रियता के नाम पर भीड़ को आमंत्रित करना और फिर उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी से बचना किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं हो सकता। आयोजकों को समझना होगा कि किसी पूजा पंडाल की सफलता श्रद्धालुओं की संख्या से नहीं बल्कि इस बात से तय होती है कि प्रत्येक श्रद्धालु सुरक्षित घर लौटे। सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी भी आयोजन स्थल पर पुलिस तैनात कर देने तक सीमित नहीं हो सकती। अनुमति देने से पहले स्थल की क्षमता, प्रवेश-निकास मार्गों, अग्नि सुरक्षा, संरचनात्मक मजबूती और आपातकालीन निकासी की व्यवस्था का वास्तविक निरीक्षण होना चाहिए। कोई भी तकनीक तभी कारगर होगी, जब उसके आधार पर समय रहते निर्णय लेने वाले जिम्मेदार लोग मौजूद हों।</p><p>जवाबदेही तय करने में किसी प्रकार का पक्षपात नहीं होना चाहिए। यदि आयोजकों, अधिकारियों या अन्य जिम्मेदार व्यक्तियों की लापरवाही प्रमाणित होती है तो कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। केवल कुछ गिरफ्तारियों या इस्तीफों को न्याय की पूर्णता नहीं माना जा सकता। साथ ही, जांच निष्पक्ष होनी चाहिए और दोष का निर्धारण राजनीतिक बयानबाजी के बजाय साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। श्रद्धालुओं की भी अपनी जिम्मेदारी है। धक्का-मुक्की से बचना, अफवाहों पर विश्वास न करना, सुरक्षा निर्देशों का पालन करना और अत्यधिक भीड़ दिखाई देने पर प्रवेश करने की जिद न करना आवश्यक है। आयोजकों को भीड़ को आकर्षित करने के लिए सोशल मीडिया पर प्रचार करते समय सुरक्षा क्षमता का ध्यान रखना चाहिए। हालांकि, नागरिकों से सावधानी की अपेक्षा प्रशासनिक लापरवाही का विकल्प नहीं हो सकती। सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी उन लोगों की है, जो आयोजन की योजना बनाते हैं, अनुमति देते हैं और व्यवस्था संचालित करते हैं।</p><p>बहरहाल, चोरबागान की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि आस्था का सम्मान केवल पूजा-अर्चना, भव्य पंडालों और धार्मिक नारों से नहीं होता। उसका वास्तविक सम्मान मानव जीवन की रक्षा से होता है। मां दुर्गा की आराधना शक्ति, विवेक और अन्याय के विरुद्ध संघर्ष की प्रेरणा देती है। यदि उनके दर्शन के लिए उमड़े श्रद्धालु अव्यवस्था के कारण अपनी जान गंवा दें तो हमें अपनी व्यवस्थाओं का कठोर आत्ममंथन करना ही होगा। अब वक्त शोक जताकर आगे बढ़ जाने का नहीं बल्कि व्यवस्था बदलने का है। हर धार्मिक स्थल, हर पूजा पंडाल और हर बड़े सार्वजनिक आयोजन में सुरक्षा को सर्वाेच्च प्राथमिकता देनी होगी। जब तक लापरवाही पर जवाबदेही तय नहीं होगी, सुरक्षा नियमों का कठोरता से पालन नहीं होगा और पिछली दुर्घटनाओं से मिले सबक जमीन पर नहीं उतरेंगे, तब तक श्रद्धालुओं की जान पर मंडराता खतरा समाप्त नहीं होगा। आस्था के नाम पर मौत को नियति मान लेना सबसे बड़ी भूल है। भगवान के दरबार में इंसान जिंदगी की दुआ मांगने जाता है, जान गंवाने नहीं। किसी भी सभ्य समाज और संवेदनशील शासन व्यवस्था की असली परीक्षा यही है कि श्रद्धालु विश्वास के साथ घर से निकलें और सुरक्षित अपने घर लौटें।</p><p>- योगेश कुमार गोयल<br>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और हिन्दी अकादमी दिल्ली के सौजन्य से प्रकाशित ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ पुस्तक के लेखक हैं)</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 23 Oct 2026 12:51:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/when-will-the-series-of-deaths-at-religious-events-finally-come-to-an-end</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Driving Licence New Rules सामने आये, DL पर नागरिकता भी होगी दर्ज, जानिये अब क्या-क्या Documents देने पड़ेंगे?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/driving-licence-new-rules-2026-blood-group-nationality-document-verification]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देश में अब ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने के नियम बदलने की तैयारी है। नए नियम लागू हुए तो लाइसेंस पर न सिर्फ आपका ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट दर्ज होगा, बल्कि आपकी नागरिकता की पहचान भी साफ होगी। भारतीय और विदेशी नागरिकों के ड्राइविंग लाइसेंस के रंग भी अलग-अलग हो सकते हैं। इतना ही नहीं, फर्जी पते और जन्मतिथि के सहारे लाइसेंस बनवाने वालों पर लगाम कसने के लिए उम्र और पते के प्रमाण के रूप में शपथपत्र और जीवन बीमा पॉलिसी की मान्यता खत्म करने का प्रस्ताव है। हम आपको बता दें कि सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने मोटर वाहन नियमों में इन बड़े बदलावों का मसौदा जारी किया है, जिसमें लाइसेंस बनवाने से लेकर उसमें संशोधन कराने तक की प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, पारदर्शी और आसान बनाने की तैयारी है।</p><h2>लाइसेंस पर दर्ज होंगे ब्लड ग्रुप और इमरजेंसी कॉन्टैक्ट</h2><p>प्रस्तावित बदलावों के अनुसार, ड्राइविंग लाइसेंस पर धारक का ब्लड ग्रुप, मोबाइल नंबर और आपातकालीन संपर्क विवरण दर्ज करना अनिवार्य किया जा सकता है। किसी दुर्घटना या आपात स्थिति में ये जानकारियां उपयोगी साबित हो सकती हैं और जरूरत पड़ने पर संबंधित व्यक्ति या उसके परिजनों से संपर्क करना आसान होगा। इसके अलावा, भारतीय और विदेशी नागरिकों की पहचान स्पष्ट करने के लिए दोनों श्रेणियों के लाइसेंस के रंग अलग-अलग रखने का प्रस्ताव भी किया गया है। लाइसेंस पर राष्ट्रीयता का उल्लेख होने से संबंधित अधिकारियों को धारक की नागरिकता की पहचान करने में भी सुविधा मिल सकती है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/indians-stranded-saudi-arabia-umrah-pilgrims-return-modi-government" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे</a></p><h2>फर्जी दस्तावेजों पर रोक लगाने की तैयारी</h2><p>हम आपको बता दें कि मौजूदा व्यवस्था में निर्धारित 12 दस्तावेजों में से कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं होने पर लाइसेंसिंग प्राधिकरण कार्यपालक मजिस्ट्रेट, न्यायिक मजिस्ट्रेट या नोटरी पब्लिक के समक्ष शपथपत्र को उम्र और पते के प्रमाण के रूप में स्वीकार कर सकता है। लेकिन इस सुविधा का दुरुपयोग कर गलत पता और जन्मतिथि दर्ज कराने की आशंकाएं सामने आती रही हैं। इसलिए शपथपत्र के जरिए गलत जानकारी देने की घटनाओं के मद्देनजर अब सत्यापन योग्य दस्तावेजों पर जोर दिया जा रहा है।</p><p>मसौदे में उम्र, पता और पहचान प्रमाण के लिए अलग-अलग दस्तावेजों की सूची निर्धारित की गई है। पते के प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड, मतदाता पहचान पत्र, ई-राशन कार्ड और पिछले तीन महीनों के बिजली या गैस बिल स्वीकार किए जा सकेंगे। विदेशी नागरिकों को भारत में वैध रूप से रहने से संबंधित प्रमाण देना होगा। उम्र के प्रमाण के लिए पासपोर्ट, स्कूल बोर्ड की अंकतालिका, जन्म प्रमाणपत्र और सरकारी विभागों द्वारा जारी पहचान पत्र शामिल किए गए हैं। वहीं, आधार कार्ड, पासपोर्ट, ई-राशन कार्ड और पैन कार्ड को पहचान प्रमाण के रूप में सूचीबद्ध किया गया है। जीवन बीमा पॉलिसी को भी प्रमाण के तौर पर स्वीकार नहीं करने का प्रस्ताव है।</p><h2>ऑनलाइन ड्राइविंग टेस्ट होगा और सख्त</h2><p>मोदी सरकार ने सुरक्षित ड्राइविंग से जुड़े ऑनलाइन ट्यूटोरियल के आकलन की न्यूनतम उत्तीर्ण सीमा बढ़ाने का प्रस्ताव रखा है। फिलहाल इस परीक्षा में 60 प्रतिशत अंक हासिल करना जरूरी है, जिसे बढ़ाकर 75 प्रतिशत किया जा सकता है। इसके अलावा, सुरक्षित ड्राइविंग ट्यूटोरियल की अवधि कम से कम 30 मिनट निर्धारित करने का प्रस्ताव है। इससे लाइसेंस आवेदकों के लिए सड़क सुरक्षा संबंधी जानकारी हासिल करना और उसका आकलन पास करना अधिक गंभीर प्रक्रिया बन सकता है।</p><h2>ऑनलाइन सेवाओं के लिए शुल्क में राहत</h2><p>साथ ही प्रस्तावित बदलावों में लाइसेंस से संबंधित सेवाओं को अधिक सुविधाजनक बनाने पर भी जोर दिया गया है। यदि आवेदक आधार प्रमाणीकरण के जरिए ऑनलाइन आवेदन करते हैं, तो पता, नाम और संपर्क नंबर में बदलाव जैसी निर्धारित सेवाओं के लिए शुल्क माफ करने का प्रस्ताव है। इससे लोगों को छोटे-छोटे संशोधनों के लिए बार-बार कार्यालय जाने की जरूरत कम हो सकती है और प्रक्रिया अधिक किफायती बन सकती है।</p><h2>15 दिन में आवेदन पर फैसला, देरी पर भी प्रावधान</h2><p>हम आपको यह भी बता दें कि मसौदे के अनुसार, लाइसेंस में नाम, पता या अन्य विवरण बदलने के लिए ऑनलाइन किए गए आवेदन को संबंधित लाइसेंसिंग प्राधिकरण को 15 दिनों के भीतर मंजूर या खारिज करना होगा। आवेदन खारिज करने की स्थिति में कारण बताना भी अनिवार्य होगा। पते में बदलाव का आवेदन यदि 30 दिनों तक लंबित रहता है, तो उसे स्वतः स्वीकृत मानने का प्रस्ताव किया गया है। इससे आवेदकों को अनिश्चितकाल तक फैसले का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।</p><p>इसके अलावा, ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण, डुप्लीकेट लाइसेंस जारी करने, लाइसेंस में वाहन की नई श्रेणी जोड़ने और व्यक्तिगत विवरण बदलने जैसी सेवाओं के लिए एक संयुक्त आवेदन फॉर्म लाने की योजना है। जहां उपलब्ध होगा, वहां आवेदक का संबंधित विवरण सारथी पोर्टल से इलेक्ट्रॉनिक रूप में प्राप्त किया जाएगा।</p><p>बहरहाल, प्रस्तावित संशोधनों का उद्देश्य ड्राइविंग लाइसेंस व्यवस्था में फर्जीवाड़े पर अंकुश लगाना, सड़क सुरक्षा संबंधी आकलन को मजबूत करना और ऑनलाइन सेवाओं को अधिक तेज एवं पारदर्शी बनाना है। हालांकि, ये बदलाव फिलहाल मसौदा प्रस्ताव हैं। इनके अंतिम नियमों और लागू होने की तारीख की पुष्टि संबंधित अधिसूचना के अंतिम रूप के बाद ही होगी।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 23 Oct 2026 11:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/driving-licence-new-rules-2026-blood-group-nationality-document-verification</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Maldives President Mohamed Muizzu ने खेला डबल गेम, India से 3000 करोड़ की मदद लेने के बाद Pakistan जाकर कर लिया Defence Agreement]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maldives-president-muizzu-pakistan-visit-india-3000-crore-aid-defence-deal]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>एक ओर मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू भारत से 3,000 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता का लाभ ले रहे हैं, तो दूसरी ओर पाकिस्तान पहुंचकर रक्षा और समुद्री सहयोग सहित 20 समझौतों पर हस्ताक्षर कर रहे हैं। जिस भारत ने आर्थिक संकट के समय मालदीव को सहारा दिया, उसकी उदारता का लाभ उठाकर इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति अब पाकिस्तान के साथ सामरिक रिश्ते मजबूत करने में जुटे हैं। यह महज कूटनीतिक सक्रियता नहीं, बल्कि भारत के लिए एक गंभीर रणनीतिक सवाल है कि क्या उसका पड़ोसी उसकी आर्थिक सहायता को अपना अधिकार और उसके सामरिक हितों की अनदेखी को अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता समझने लगा है?</p><p>देखा जाये तो मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने भारत की इसी चिंता को हवा दी है। एक दशक से अधिक समय बाद मालदीव का कोई राष्ट्रपति पाकिस्तान गया है। तीन दिवसीय इस यात्रा के दौरान पाकिस्तान के सेना प्रमुख और चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के साथ उनकी मुलाकात और रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। दोनों देशों ने रक्षा, समुद्री सुरक्षा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए 20 समझौता ज्ञापनों पर हस्ताक्षर किए हैं। सवाल यह है कि इन समझौतों का वास्तविक स्वरूप क्या होगा, इनके क्रियान्वयन की दिशा क्या होगी और हिंद महासागर में इनका इस्तेमाल किस तरह किया जाएगा? इन सवालों के जवाब सामने आना अभी बाकी है, लेकिन भारत के लिए सतर्क होने की वजहें स्पष्ट हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/fox-news-global-protest-network-101-organisations-india-france" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: France से लेकर India तक हुए प्रदर्शनों के पीछे काम कर रहा था 13 देशों के 101 संगठनों का Network, Fox News ने किया बड़ा खुलासा!</a></p><p>देखा जाये तो मालदीव कोई साधारण भौगोलिक इकाई नहीं है। हिंद महासागर में उसकी स्थिति उसे समुद्री व्यापार मार्गों, नौवहन की सुरक्षा और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन के लिहाज से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाती है। भारत की समुद्री सुरक्षा का सीधा संबंध इस क्षेत्र में स्थिरता से है। मालदीव के साथ भारत के संबंध इसलिए भी अहम हैं, क्योंकि दोनों देशों के बीच समुद्री निगरानी, रक्षा प्रशिक्षण, आपदा प्रबंधन और सुरक्षा सहयोग का लंबा इतिहास रहा है। ऐसे में यदि पाकिस्तान इस रिश्ते में रक्षा और समुद्री सहयोग के माध्यम से अपनी जगह बनाने की कोशिश करता है, तो भारत को केवल द्विपक्षीय समझौतों की सूची नहीं, बल्कि उनके दीर्घकालीन सामरिक परिणामों पर भी नजर रखनी होगी।</p><p>दूसरी ओर, पाकिस्तान की अपनी सीमाएं हैं। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा संबंधी चुनौतियों से जूझ रहा पाकिस्तान मालदीव को भारत जैसी व्यापक आर्थिक सहायता देने की स्थिति में नहीं दिखता। फिर भी इस्लामाबाद के लिए माले के साथ बढ़ती नजदीकी का महत्व आर्थिक लाभ से कहीं अधिक कूटनीतिक और रणनीतिक हो सकता है। भारत के निकटवर्ती समुद्री क्षेत्र में अपना प्रभाव बढ़ाने, दक्षिण एशिया में भारत की भूमिका को चुनौती देने और क्षेत्रीय मंचों पर अपने लिए समर्थन जुटाने की उसकी कोशिशों को इसी संदर्भ में देखना चाहिए।</p><p>साथ ही मुइज्जू का पाकिस्तान में दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन (सार्क) के शिखर सम्मेलन को जल्द बुलाने का आह्वान भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। उन्होंने कहा कि मालदीव सदस्य देशों से परामर्श कर सार्क की गतिविधियां दोबारा शुरू कराने के लिए तैयार है। सुनने में यह क्षेत्रीय सहयोग की सकारात्मक पहल लग सकती है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। वर्ष 2016 में इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क शिखर सम्मेलन जम्मू-कश्मीर के उरी में हुए आतंकी हमले के बाद रद्द हो गया था। भारत का स्पष्ट रुख रहा है कि आतंकवाद और क्षेत्रीय सहयोग साथ-साथ नहीं चल सकते। पाकिस्तान को पहले ऐसा वातावरण बनाना होगा जिसमें आतंकवाद से मुक्त होकर सार्थक सहयोग संभव हो।</p><p>ऐसे में मुइज्जू का पाकिस्तान की धरती से सार्क सम्मेलन बहाल करने की पैरवी करना भारत के लिए असहज करने वाला है। इससे पहले भी वह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत आगे बढ़ाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने की पेशकश कर चुके हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या दक्षिण एशिया की समस्याओं का समाधान आतंकवाद पर पाकिस्तान की जवाबदेही तय किए बिना हो सकता है? क्या क्षेत्रीय सहयोग के नाम पर उस बुनियादी समस्या को किनारे रखा जा सकता है, जिसने सार्क को वर्षों से निष्क्रिय बना रखा है? भारत के लिए यह स्वीकार करना कठिन होगा कि आतंकवाद पर ठोस कार्रवाई के बिना पाकिस्तान को क्षेत्रीय कूटनीति के केंद्र में वापस लाने की कोशिश की जाए।</p><p>हैरानी की बात यह भी है कि इसी दौरान भारत ने मालदीव की आर्थिक स्थिरता बनाए रखने के लिए 30 अरब रुपये की मुद्रा अदला-बदली सुविधा को आगे बढ़ाने की मंजूरी दी है। अप्रैल में दी गई इस राशि की सुविधा के तहत भारतीय रुपये तक पहुंच मालदीव को तरलता संबंधी दबाव से निपटने में मदद करती है। भारत 2012 से अब तक मालदीव को 1.1 अरब डॉलर से अधिक की मुद्रा अदला-बदली सहायता भी दे चुका है। इसके अलावा भारतीय निवेश से मालदीव के सरकारी ऋण-पत्रों को समर्थन मिला है। मालदीव की विदेश मंत्री ने इस फैसले के लिए भारत के प्रति आभार जताया और इसे दोनों देशों की पुरानी मित्रता का प्रमाण बताया है।</p><p>देखा जाये तो भारत की सहायता को कमजोरी समझना मुइज्जू की सबसे बड़ी भूल होगी। भारत का सहयोग किसी राजनीतिक दल या राष्ट्रपति पर एहसान नहीं, बल्कि पड़ोस में स्थिरता, समृद्धि और साझा सुरक्षा सुनिश्चित करने की दीर्घकालीन नीति का हिस्सा है। लेकिन मित्रता का अर्थ सामरिक हितों के प्रति उदासीनता भी नहीं होता। आर्थिक सहायता और रक्षा सहयोग दो अलग-अलग विषय हैं, फिर भी जब कोई देश एक ओर भारत से वित्तीय सहारा ले और दूसरी ओर पाकिस्तान के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाए, तो नई दिल्ली को अपने हितों की रक्षा के लिए स्पष्ट कूटनीतिक संदेश देना चाहिए।</p><p>समय की मांग यही है कि भारत को मालदीव के साथ संवाद बनाए रखते हुए इन 20 समझौतों के वास्तविक क्रियान्वयन, रक्षा प्रशिक्षण, समुद्री सूचनाओं के आदान-प्रदान और संभावित सुरक्षा प्रभावों पर करीबी नजर रखनी चाहिए। साथ ही मालदीव को यह समझाना होगा कि हिंद महासागर में स्थिरता किसी तीसरे देश के विरुद्ध खेमेबंदी से नहीं, बल्कि पारदर्शी और भरोसेमंद सहयोग से मजबूत होती है। मुइज्जू को तय करना होगा कि उनकी विदेश नीति का आधार दीर्घकालीन राष्ट्रीय हित हैं या भारत-विरोधी संतुलन साधने की राजनीतिक कवायद। मालदीव की भौगोलिक स्थिति उसे रणनीतिक महत्व देती है, लेकिन यही स्थिति उसे बड़ी शक्तियों की प्रतिस्पर्धा का मैदान भी बना सकती है। पाकिस्तान के साथ समझौते करना मालदीव का संप्रभु निर्णय है; मगर उन समझौतों के वास्तविक परिणामों को लेकर भारत की चिंता भी उतनी ही जायज है।</p><p>बहरहाल, हिंद महासागर में भारत अपनी सुरक्षा को लेकर कोई जोखिम नहीं उठा सकता। मित्रता का हाथ बढ़ाना उसकी ताकत है, लेकिन उस ताकत का अर्थ यह नहीं कि उसके सामरिक हितों की अनदेखी की जाए और वह चुपचाप तमाशा देखता रहे। मुइज्जू की पाकिस्तान यात्रा ने नई दिल्ली के सामने एक स्पष्ट चुनौती रख दी है। यह चुनौती है पड़ोसियों की आर्थिक मदद जारी रखते हुए यह सुनिश्चित करना कि भारत की उदारता उसके अपने सामरिक हितों के विरुद्ध इस्तेमाल न होने पाए।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 16:50:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maldives-president-muizzu-pakistan-visit-india-3000-crore-aid-defence-deal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mecca Mosque में हुआ 'अशोभनीय कृत्य' क्या था? Saudi Arabia ने दो बांग्लादेशियों को फाँसी पर क्यों लटकाया? Muslim World क्यों हैरान रह गया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/bangladeshis-executed-saudi-arabia-mecca-mosque-case]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>इस्लाम के सबसे पवित्र शहर मक्का की एक मस्जिद में अशोभनीय कृत्य के मामले में सऊदी अरब ने दो बांग्लादेशी नागरिकों को मृत्युदंड दे दिया है। 14 अक्टूबर को हुई इन फाँसियों ने न केवल धार्मिक स्थलों की मर्यादा और सऊदी अरब के कठोर दंड कानूनों पर बहस छेड़ दी है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर न्यायिक पारदर्शिता और विदेशों में काम करने वाले प्रवासी नागरिकों के अधिकारों को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि बांग्लादेश सरकार के अनुसार, उसे इन मृत्युदंडों के क्रियान्वयन से पहले आधिकारिक सूचना नहीं दी गई थी। ढाका अब रियाद से पूरे मामले का ब्योरा माँग रहा है।</p><h2>पवित्र स्थल में कथित कृत्य, फिर मृत्युदंड</h2><p>सऊदी अरब के गृह मंत्रालय के अनुसार, मृत्युदंड पाने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की पहचान नज़रुल इस्लाम अब्दुल बशीर और सिटी अख्तर के रूप में की गई है। अधिकारियों का कहना है कि दोनों को मक्का की एक मस्जिद में अनैतिक कृत्य करने के मामले में गिरफ्तार किया गया था। जाँच के बाद मामला अदालत में पहुँचा, जहाँ आरोप सिद्ध होने पर दोनों को मृत्युदंड सुनाया गया। संबंधित न्यायिक प्राधिकरण से फैसले की पुष्टि और शाही आदेश के बाद 14 अक्टूबर को सजा लागू कर दी गई।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/saudi-aramco-shaybah-oil-facility-hit-by-deadly-drone-attack" target="_blank" rel="noopener">Saudi Aramco Attack | सऊदी अरामको पर दहलाने वाला ड्रोन हमला! दो की मौत और घायल लोगों में एक भारतीय भी शामिल, अमेरिका ने जारी किया देश छोड़ने का फरमान</a></p><p>सऊदी अधिकारियों ने अपने बयान में धार्मिक स्थल की पवित्रता, अपराध की गंभीरता और समय-स्थान की मर्यादा के उल्लंघन को सजा का आधार बताया। हालाँकि, उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि कथित कृत्य वास्तव में क्या था, घटना किस मस्जिद में हुई थी और आरोपियों के खिलाफ कौन-कौन से साक्ष्य प्रस्तुत किए गए थे। हालांकि सोशल मीडिया पर दावे किये जा रहे हैं कि दोनों को केवल चुंबन लेने या किसी खास प्रकार की शारीरिक निकटता के कारण मृत्युदंड दिया गया। हालांकि ये सोशल मीडिया के दावे हैं इसके बारे में कोई प्रमाण नहीं हैं।</p><h2>बांग्लादेश सरकार ने उठाए सवाल</h2><p>देखा जाये तो इस मामले का सबसे गंभीर पहलू केवल मृत्युदंड नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को लेकर पैदा हुआ विवाद है। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय और जेद्दा स्थित उसके वाणिज्य दूतावास ने कहा है कि उन्हें फाँसी से पहले इसकी सूचना नहीं मिली थी। ढाका ने सऊदी अधिकारियों को राजनयिक पत्र भेजकर आरोपों का पूरा विवरण, अदालत के फैसलों की प्रतियाँ और मृत्युदंड की प्रक्रिया से संबंधित जानकारी माँगी है। बांग्लादेश सरकार ने यह भी जानना चाहा है कि उसके नागरिकों को मुकदमे के दौरान किस प्रकार की कानूनी सहायता उपलब्ध कराई गई और राजनयिक मिशन को समय रहते जानकारी क्यों नहीं दी गई? देखा जाये तो किसी विदेशी नागरिक को मृत्युदंड देने से पहले उसके देश को हर परिस्थिति में सूचना देना और हिरासत में लिए गए व्यक्ति के कांसुलर अधिकारों की रक्षा करना सभी सरकारों का दायित्व होता है।</p><h2>इस्लामी कानून में ताज़ीर का क्या अर्थ है?</h2><p>उधर, सऊदी अरब ने इस मामले में ‘ताज़ीर’ के अंतर्गत मृत्युदंड दिए जाने की बात कही है। इस्लामी न्यायशास्त्र में ताज़ीर उन अपराधों के लिए विवेकाधीन दंड की श्रेणी है, जिनकी सजा निर्धारित करने में न्यायाधीश को लागू कानूनी व्यवस्था के अंतर्गत भूमिका मिलती है। यह ऐसा प्रावधान नहीं है जिसके अंतर्गत प्रत्येक अनुचित व्यवहार के लिए स्वतः मृत्युदंड निर्धारित हो जाता हो। यही इस मामले का सबसे संवेदनशील प्रश्न है: यदि अपराध की प्रकृति और उसके प्रमाण सार्वजनिक नहीं हैं, तो आम लोग यह कैसे समझें कि इतनी कठोर सजा किन परिस्थितियों में उचित मानी गई? देखा जाये तो न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता केवल सजा देने से नहीं, बल्कि स्पष्ट आरोप, विश्वसनीय साक्ष्य, निष्पक्ष सुनवाई और जवाबदेह प्रक्रिया से भी स्थापित होती है।</p><p>यह भी ध्यान रखना होगा कि इस्लामी कानून की व्याख्या और उसका क्रियान्वयन हर मुस्लिम देश में एक समान नहीं है। सऊदी अरब की कानूनी व्यवस्था को सीधे बांग्लादेश या दुनिया के सभी मुसलमानों की धार्मिक समझ का प्रतिनिधि मानना उचित नहीं होगा।</p><h2>धार्मिक स्तर पर क्या होंगे प्रभाव?</h2><p>उल्लेखनीय है कि मक्का और मदीना दुनिया भर के मुसलमानों के लिए अत्यंत पवित्र स्थान हैं। मक्का में मस्जिद अल-हरम और काबा का विशेष धार्मिक महत्त्व है। ऐसे स्थान पर मर्यादा के उल्लंघन का आरोप स्वाभाविक रूप से धार्मिक भावनाओं को प्रभावित करता है। सऊदी सरकार की दृष्टि में कठोर कार्रवाई पवित्र स्थलों की प्रतिष्ठा और अनुशासन बनाए रखने का संदेश हो सकती है। लेकिन इस घटना का दूसरा पहलू भी है। धार्मिक आस्था और न्यायिक प्रक्रिया को एक-दूसरे का विरोधी नहीं होना चाहिए। यदि किसी अपराध के लिए कठोरतम दंड दिया जाता है, तो उसके आधार और प्रक्रिया की स्पष्टता भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण हो जाती है। धार्मिक स्थलों के सम्मान की रक्षा के नाम पर न्यायिक पारदर्शिता के प्रश्नों को अनदेखा नहीं किया जा सकता।</p><h2>बांग्लादेश में सामाजिक और राजनीतिक असर</h2><p>दूसरी ओर, बांग्लादेश में इस मामले का प्रभाव तीन स्तरों पर पड़ सकता है। एक तो विदेशों में काम करने वाले नागरिकों की सुरक्षा और उनके कानूनी अधिकारों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरा, सऊदी अरब में काम कर रहे लाखों बांग्लादेशी श्रमिकों के परिवारों के बीच चिंता पैदा हो सकती है। साथ ही धार्मिक आस्था और मृत्युदंड की कठोरता को लेकर सार्वजनिक बहस तेज हो सकती है।</p><p>रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब में लगभग 35 लाख बांग्लादेशी कामगार रहते हैं और वहाँ से भेजी जाने वाली रकम बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था तथा अनेक परिवारों की आजीविका के लिए महत्त्वपूर्ण है। ऐसे में यह मामला केवल दो व्यक्तियों तक सीमित नहीं रह जाता; यह प्रवासी श्रमिकों की कानूनी सुरक्षा और दोनों देशों के राजनयिक संबंधों से भी जुड़ जाता है।</p><p>बहरहाल, मक्का की मस्जिद से जुड़ा यह मामला एक बुनियादी सवाल सामने रखता है कि क्या किसी पवित्र स्थल की मर्यादा की रक्षा और न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता साथ-साथ सुनिश्चित नहीं की जानी चाहिए? सऊदी अरब ने धार्मिक स्थल की पवित्रता के उल्लंघन को मृत्युदंड का आधार बताया है, जबकि बांग्लादेश अब आरोपों, अदालती फैसलों और राजनयिक सूचना की पूरी जानकारी माँग रहा है। सजा के पक्ष में कोई भी तर्क दिया जाये लेकिन किसी भी न्याय व्यवस्था की वास्तविक कसौटी केवल उसकी कठोरता नहीं, बल्कि उसका न्यायपूर्ण, पारदर्शी और जवाबदेह होना भी है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 13:33:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/bangladeshis-executed-saudi-arabia-mecca-mosque-case</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/take-a-close-look-at-the-strategic-partnership-behind-marco-rubio-visit-to-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा का महत्त्व केवल भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके केंद्र में व्यापार समझौता, रूस से भारत की तेल खरीद, ऊर्जा सुरक्षा, रक्षा सहयोग, अत्याधुनिक तकनीक और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति-संतुलन जैसे मुद्दे भी अहम हैं। साथ ही, यह यात्रा एक बुनियादी प्रश्न भी उठाती है, वह यह कि क्या भारत अमेरिका के साथ सहयोग करते हुए अपनी रणनीतिक स्वायत्तता और राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर सकता है? क्योंकि अमेरिका की दुश्मनी से ज्यादा दोस्ती खतरनाक होती है! अमेरिकी नेताओं ने भारत और भारतीय पेशेवरों के लिए जिन निकृष्टम शब्दों का उपयोग किया, तरह तरह की प्रतिबंधक चालें चलीं, उसको भूलना बिल्कुल कठिन है। आखिर भारत के खिलाफ कभी पाकिस्तान, कभी बांग्लादेश और कभी नेपाल को भड़काने वाला अमेरिका भारत से कितनी दोस्ती निभा पाएगा, वह गुजश्ता वक्त ही बताएगा!</p><p>यूं तो 20 अक्टूबर को विजयदशमी जैसे अहम दिनों में मुंबई में रूबियो और विदेश मंत्री एस. जयशंकर की वार्ता हुई। जहां अमेरिकी पक्ष ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने की दिशा में प्रगति की बात कही। वहीं, दोनों देशों ने ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग पर भी चर्चा की। हालांकि, बातचीत में प्रगति को किसी अंतिम समझौते के संपन्न होने के बराबर नहीं माना जाना चाहिए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/marco-rubio-pakistan-relations-2611-terrorism-india-us-ties" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: कभी Pakistan पर सख्त कार्रवाई चाहते थे Marco Rubio, अब उसी की पैरवी कर रहे हैं! सीनेटर से विदेश मंत्री बनते ही क्यों बदल गये सुर?</a></p><p>अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो की भारत यात्रा के कुछ प्रमुख कूटनीतिक निहितार्थ इस प्रकार हैं:-</p><p>पहला, व्यापार समझौता एक अवसर भी और एक दबाव भी: अमेरिका भारत के लिए एक बड़ा निर्यात बाजार है। दूसरी ओर, अमेरिकी टैरिफ नीति भारतीय उद्योगों, निर्यातकों और रोजगार को प्रभावित कर सकती है। अगस्त 2025 में व्यापार वार्ता टूटने के बाद अमेरिका ने भारतीय वस्तुओं पर कुछ मामलों में 50% तक टैरिफ लगाया था। लेकिन फरवरी 2026 में घोषित रूपरेखा के तहत यह दर घटाकर 18% की गई, लेकिन व्यापक व्यापार समझौते पर वार्ता अटकी रही। ऐसी परिस्थितियों में रूबियो ने 20 अक्टूबर को कहा कि समझौता लगभग अंतिम चरण में है, हालांकि अभी कुछ मुद्दे सुलझने बाकी हैं। ऐसे में भारत के लिए असली सवाल क्या है? क्या समझौते से भारतीय निर्यात, विनिर्माण और रोजगार को दीर्घकालीन लाभ मिलेगा, या भारत को अपने कृषि, डेयरी, डिजिटल कारोबार और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में असमान रियायतें देनी पड़ेंगी?</p><p>दूसरा, रूसी तेल से जुड़ी भारत की ऊर्जा नीति पर अमेरिकी प्रभाव: भारत की रूस से रियायती कच्चा तेल खरीदने की नीति ऊर्जा लागत और आपूर्ति के विविधीकरण से जुड़ी है। अमेरिका चाहता है कि भारत अमेरिकी ऊर्जा की खरीद बढ़ाए और अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाए। अलबत्ता यहाँ दो अलग हित आमने-सामने हैं। जहां अमेरिका का हित अपने ऊर्जा निर्यात को बढ़ाना और रूस पर आर्थिक दबाव की नीति को आगे बढ़ाना है। वहीं, भारत का हित सस्ती तथा विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्ध रखना, महँगाई नियंत्रित करना और अपनी विदेश नीति के विकल्प सुरक्षित रखना है। ऐसे में रूबियो ने अमेरिकी ऊर्जा व्यापार को भारत की आपूर्ति शृंखला विविधता से जोड़कर प्रस्तुत किया। वहीं, रूसी तेल पर संभावित प्रतिबंधों और शुल्क का प्रश्न दोनों देशों के संबंधों में तनाव का सबसे बड़ा कारण बना हुआ है, क्योंकि रूस भारत का भरोसेमंद साझीदार देश रहा है। संयुक्त राष्ट्र संघ में उसने भारत के पक्ष में कई बार वीटो का प्रयोग किया है। दरअसल, भारत के लिए चुनौती अमेरिकी तेल खरीदने या रूसी तेल खरीदने में से किसी एक को राजनीतिक निष्ठा का प्रमाण बनाने की नहीं, बल्कि लागत, उपलब्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा और कूटनीतिक परिणामों के आधार पर निर्णय लेने की है।</p><p>तीसरा, रक्षा सहयोग से तकनीक मिलेगी, लेकिन निर्भरता का जोखिम भी रहेगा: अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग से भारत को उन्नत तकनीक, खुफिया सहयोग, सैन्य उपकरणों और संयुक्त अनुसंधान के अवसर मिल सकते हैं। लेकिन अत्याधुनिक अमेरिकी प्रणालियों पर बहुत अधिक निर्भरता होने पर स्पेयर पार्ट्स, रखरखाव, सॉफ्टवेयर, निर्यात नियंत्रण और राजनीतिक शर्तों का प्रश्न उठ सकता है? लिहाजा भारत को तीन बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिए: एक, रक्षा खरीद के साथ तकनीक हस्तांतरण और भारत में उत्पादन की ठोस व्यवस्था हो। दो, किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता के बजाय स्वदेशी क्षमता तथा विविध स्रोत विकसित हों। तीन, समझौते भारत की स्वतंत्र निर्णय क्षमता को सीमित न करें। इस दौरान रूबियो ने रक्षा और असैन्य परमाणु सहयोग में प्रगति का उल्लेख किया और अमेरिकी तकनीक तथा प्रणालियों की अधिक खरीद की वकालत की। यह सहयोग का अवसर है, लेकिन भारत को हर प्रस्ताव का मूल्यांकन उसकी लागत, तकनीकी शर्तों और दीर्घकालीन निर्भरता के आधार पर करना होगा।</p><p>चौथा, हिंद-प्रशांत और चीन के दृष्टिगत अमेरिका व भारत का साझा हित, लेकिन समान प्राथमिकताएँ जरूरी नहीं: भारत और अमेरिका दोनों के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय शक्ति-संतुलन महत्त्वपूर्ण हैं। चीन की बढ़ती सामरिक भूमिका भी दोनों के बीच सहयोग का एक प्रमुख कारण है। फिर भी दोनों देशों की प्राथमिकताएँ हमेशा एक जैसी नहीं होतीं। जहां अमेरिका अपनी वैश्विक रणनीति, गठबंधनों और घरेलू राजनीतिक हितों के अनुसार नीतियाँ बदल सकता है। वहीं, भारत को चीन के साथ सीमा विवाद, पड़ोसी देशों के साथ संबंध और अपनी आर्थिक जरूरतों को स्वतंत्र रूप से देखना होता है। इसलिए भारत रूस सहित अन्य देशों के साथ भी संबंध बनाए रखना चाहता है। इसलिए भारत-अमेरिका सहयोग को किसी तीसरे देश के विरुद्ध स्थायी प्रतिबद्धता में बदलने के बजाय, साझा हितों पर आधारित रखना भारत की कूटनीतिक स्वायत्तता के अनुकूल होगा।</p><p>पांचवां, मुंबई और जामनगर की पूंजीवादी आर्थिक कूटनीति का संकेत: रूबियो की यात्रा में मुंबई में सरकारी तथा कारोबारी वार्ताएँ और गुजरात के जामनगर में ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ा कार्यक्रम शामिल था। इससे स्पष्ट है कि यात्रा का आर्थिक पक्ष भी प्रमुख है। एक मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका भारत की रिलायंस इंडस्ट्रीज को वेनेजुएला के कच्चे तेल के अधिक प्रसंस्करण और संभावित उत्पादन संबंधी अवसरों से जोड़ने में रुचि रखता है। भारत के लिए इसका अर्थ केवल ऊर्जा आयात का स्रोत बदलना नहीं है, बल्कि उसे देखना होगा कि ऐसे सहयोग से भारतीय कंपनियों को क्या लाभ होगा, ऊर्जा आपूर्ति कितनी सुरक्षित होगी और किसी बाहरी नीति-परिवर्तन से निवेश या कारोबार पर क्या असर पड़ सकता है।</p><p>सुलगता सवाल है कि क्या अमेरिका के अतीत के ट्रैक रिकॉर्ड के कारण उस पर भरोसा करना जोखिमपूर्ण है? इस प्रश्न का उत्तर अमेरिकी विदेश नीति के कुछ महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक उदाहरणों को देखकर अधिक स्पष्ट होता है। अमेरिका को न तो हर परिस्थिति में अविश्वसनीय मानना उचित है, न ही उसकी घोषणाओं को स्थायी प्रतिबद्धता समझना। कुछ प्रमुख उदाहरण पर गौर फरमाना उचित होगा।</p><p>एक, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिकी प्रतिबंध: भारत के पोखरण-II परमाणु परीक्षणों के बाद अमेरिका ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगाए। इससे स्पष्ट हुआ कि परमाणु अप्रसार जैसे मुद्दों पर वाशिंगटन अपने नीतिगत उद्देश्यों के लिए भारत पर आर्थिक दबाव डाल सकता है। बाद के वर्षों में संबंधों में सुधार हुआ और असैन्य परमाणु सहयोग का रास्ता भी खुला।</p><p>दो, पाकिस्तान के साथ अमेरिकी संबंध भारत के लिए चिंता की बात: शीतयुद्ध और अफगानिस्तान संघर्ष के अलग-अलग चरणों में अमेरिका ने पाकिस्तान के साथ सुरक्षा सहयोग किया। यह भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं का विषय रहा है। हालांकि, अमेरिकी-पाकिस्तानी संबंधों में भी उतार-चढ़ाव आए हैं। इससे पता चलता है कि अमेरिकी नीतियाँ अक्सर अपने सामरिक उद्देश्यों के अनुसार बदलती रही हैं।</p><p>तीन, भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौता: 2005–2008 के दौरान दोनों देशों ने असैन्य परमाणु सहयोग की दिशा में ऐतिहासिक प्रगति की। यह इस बात का उदाहरण है कि अलग-अलग राजनीतिक व्यवस्थाओं और हितों के बावजूद, ठोस बातचीत तथा संस्थागत समझौतों से दीर्घकालीन सहयोग संभव है।</p><p>चार, हाल के वर्षों में टैरिफ और रूसी तेल का विवाद: 2025–2026 में अमेरिकी टैरिफ और रूस से भारत की तेल खरीद को लेकर तनाव सामने आया। बाद में टैरिफ में कमी और रूसी तेल से संबंधित प्रतिबंधों पर अस्थायी राहत की दिशा में कदम भी दिखे। यह उदाहरण बताता है कि आर्थिक दबाव की नीति और व्यावहारिक समझौते एक ही संबंध में साथ-साथ चल सकते हैं।</p><p>इन उदाहरणों से एक उपयोगी निष्कर्ष निकलता है, वह यह कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में भरोसा किसी देश की सद्भावना की धारणा से अधिक, उसके व्यवहार, समझौतों की शर्तों और हितों के मेल पर आधारित होना चाहिए। अमेरिका का ऐतिहासिक रिकॉर्ड सहयोग और दबाव—दोनों का रहा है। भारत को इस रिकॉर्ड को ध्यान में रखकर समझौते करने चाहिए, लेकिन अतीत के हर विवाद को भविष्य के हर सहयोग की विफलता का प्रमाण भी नहीं मानना चाहिए।</p><p>सवाल है कि अमेरिका पर भरोसा करने के बजाय भारत को कौन-सी रणनीति अपनानी चाहिए? तो जवाब होगा कि भारत के सामने विकल्प केवल अमेरिका पर भरोसा करने या उससे दूरी बनाने के नहीं हैं। वह सहयोग भी कर सकता है और अपने जोखिमों को सीमित भी रख सकता है। क्षेत्रवार भारत के लिए व्यावहारिक दृष्टिकोण इस प्रकार है। व्यापार क्षेत्र में पारस्परिक लाभ, स्पष्ट शर्तें और विवाद समाधान की व्यवस्था होनी चाहिए। ऊर्जा क्षेत्र में अमेरिका, रूस तथा अन्य आपूर्तिकर्ताओं के बीच विविधता का उदाहरण बन सकता है। रक्षा क्षेत्र में स्वदेशी उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और बहु-स्रोत खरीद महत्वपूर्ण नीति है। विदेश नीति के क्षेत्र में अमेरिका, रूस, यूरोप और अन्य साझेदारों के साथ स्वतंत्र संबंध विकसित कर सकता है। प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में घरेलू अनुसंधान, डेटा सुरक्षा और महत्त्वपूर्ण तकनीकों में आत्मनिर्भरता जरूरी है।<br>कूटनीति के क्षेत्र में लिखित समझौते, नियमित समीक्षा और उल्लंघन की स्थिति में सुरक्षा उपाय नितांत जरूरी है। इन उपायों का उद्देश्य अमेरिका से दूरी बनाना नहीं, बल्कि किसी एक बाहरी शक्ति के नीतिगत बदलाव से भारत की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को कम करना है।</p><p>सवाल है कि रूबियो की यात्रा के बाद भारत को किन संकेतों पर नजर रखनी चाहिए? तो जवाब होगा कि किसी राजनयिक यात्रा की सफलता का आकलन स्वागत, भाषणों या संयुक्त तस्वीरों से नहीं, बल्कि उसके बाद सामने आने वाले परिणामों से होना चाहिए।</p><p>एक, व्यापार समझौता: क्या अंतिम समझौता वास्तव में संपन्न होता है? क्या भारतीय निर्यातकों को प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले उचित अवसर मिलते हैं?</p><p>दो, रूसी तेल: क्या भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के अनुसार निर्णय ले सकता है, या उस पर खरीद घटाने के लिए अतिरिक्त दबाव आता है?</p><p>तीन, रक्षा और तकनीक: क्या भारत को वास्तविक तकनीक, घरेलू उत्पादन और अनुसंधान के अवसर मिलते हैं?</p><p>चार, पाकिस्तान और क्षेत्रीय सुरक्षा: क्या अमेरिका भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को समझते हुए संतुलित और स्पष्ट नीति अपनाता है?</p><p>पांच, समझौतों का पालन: क्या अमेरिका की नीतियों में बदलाव होने पर भी पहले से तय प्रतिबद्धताएँ सुरक्षित रहती हैं?</p><p>वस्तुत:, भारत का अमेरिका पर भरोसा हो, लेकिन राष्ट्रीय हितों की कीमत पर कतई नहीं। मार्को रूबियो की भारत यात्रा को एक साथ दो दृष्टियों से देखना चाहिए। पहली, भारत-अमेरिका सहयोग से व्यापार, ऊर्जा, रक्षा और प्रौद्योगिकी में वास्तविक लाभ हासिल किए जा सकते हैं। दूसरी, अमेरिकी सरकारों की नीतियाँ बदल सकती हैं और वाशिंगटन अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देता है—जैसा कि अन्य बड़ी शक्तियाँ भी करती हैं। इसलिए भारत की नीति का आधार न तो अमेरिका-विरोध होना चाहिए, न अमेरिका पर असीमित निर्भरता। उसे मुद्दा-आधारित सहयोग, रणनीतिक स्वायत्तता, विविध साझेदारियों और अपने राष्ट्रीय हितों की स्पष्ट रक्षा पर आधारित होना चाहिए।</p><p>सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अमेरिका से संबंध अच्छे हों, फिर भी भारत के पास स्वतंत्र निर्णय लेने के विकल्प बने रहें। किसी भी समझौते में भारत को यह देखना चाहिए कि लाभ और जोखिम क्या हैं, प्रतिबद्धताएँ कितनी स्पष्ट हैं और भविष्य में परिस्थितियाँ बदलने पर उसके पास कितनी गुंजाइश बचती है। यही कसौटी रूबियो की इस यात्रा और भविष्य के भारत-अमेरिका संबंधों के मूल्यांकन में उपयोगी होगी।</p><p>- कमलेश पांडेय<br>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 12:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/take-a-close-look-at-the-strategic-partnership-behind-marco-rubio-visit-to-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का त्योहार है दशहरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dussehra-is-a-festival-of-religion-culture-and-national-consciousness]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दशहरा केवल धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि भारतीय समाज और राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना, शौर्य तथा नवसंकल्प का महापर्व है। यह एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह राष्ट्रीय चेतना, सांस्कृतिक एकता और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक है।</p><p>भारत में प्रत्येक पर्व केवल धार्मिक आस्था का अवसर नहीं होता, बल्कि वह समाज को नैतिक मूल्यों, सांस्कृतिक विरासत और सामूहिक चेतना से जोड़ने का माध्यम भी बनता है। दशहरा एक महत्त्वपूर्ण पर्व है जो धर्म की प्रतिष्ठा, संस्कृति की निरंतरता और राष्ट्रीय चेतना के जागरण का संदेश देता है। रावण के पुतले का दहन केवल बाहरी बुराई का अंत नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का संदेश देता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dussehra-the-great-festival-of-bravery-spiritual-practice-and-new-determination" target="_blank" rel="noopener">दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व</a></p><h2>सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है दशहरा का त्योहार</h2><p>दशहरा सांस्कृतिक एकता का प्रतीक माना जाता है क्योंकि पूरे भारत में उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। दशहरा से अधर्म पर धर्म की विजय प्राप्ति का संदेश पूरे राष्ट्र की आध्यात्मिकता एकता का परिचायक है। साथ ही यह पर्व भगवान श्रीराम द्वारा अहंकार और अधर्म के प्रतीक रावण पर विजय का प्रतीक है, जो सिखाता है कि अंततः सत्य की ही जीत होती है।</p><h2>धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक है दशहरा</h2><p>भारतीय चिंतन में धर्म का अर्थ केवल पूजा-पद्धति या धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म का व्यापक अर्थ है कर्तव्य, न्याय, सत्य, मर्यादा और लोककल्याण। दशहरे का मूल संदेश इसी व्यापक धर्मबोध में निहित है। रामायण की परंपरा के अनुसार, भगवान श्रीराम ने रावण का वध करके अन्याय और अहंकार पर विजय प्राप्त की। इसी प्रकार, देवी दुर्गा द्वारा महिषासुर पर विजय शक्ति, साहस और न्याय की स्थापना का प्रतीक है। यह परंपरा हमें अन्याय के विरुद्ध संघर्ष करने तथा निर्बल और पीड़ित लोगों की रक्षा करने की प्रेरणा देती है। इस दृष्टि से दशहरा धर्म की विजय के साथ-साथ मानवीय गरिमा और न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना का भी पर्व है।</p><h2>दशहरा के दिन होती है शक्ति और शस्त्र की पूजा</h2><p>आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाने वाला यह त्योहार देवी दुर्गा की शक्ति की उपासना तथा शस्त्र-पूजन (आयुध पूजा) का पावन अवसर होता है।</p><h2>भारतीय संस्कृति का जीवंत उत्सव है दशहरा</h2><p>दशहरा भारतीय संस्कृति की समृद्धि, विविधता और जीवंतता का परिचायक है। भारत के विभिन्न क्षेत्रों में यह पर्व अलग-अलग परंपराओं और उत्सवों के माध्यम से मनाया जाता है। उत्तर भारत में रामलीला और रावण-दहन इसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं। पश्चिम बंगाल और पूर्वी भारत के अनेक क्षेत्रों में दुर्गापूजा के समापन के साथ विजयादशमी का विशेष महत्त्व है। मैसूर का दशहरा अपनी भव्य सांस्कृतिक परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है, जबकि अनेक स्थानों पर शस्त्र-पूजन और आयुध-पूजन की परंपरा भी प्रचलित है। दशहरा हमारी लोककलाओं, संगीत, नाटक, शिल्प और सामुदायिक परंपराओं को भी जीवित रखता है। रामलीला के मंचन से नई पीढ़ी को भारतीय महाकाव्यों, आदर्श चरित्रों और नैतिक शिक्षाओं से परिचित होने का अवसर मिलता है। इस प्रकार यह पर्व अतीत की विरासत को वर्तमान से जोड़ते हुए भविष्य की पीढ़ियों तक पहुँचाने का महत्त्वपूर्ण माध्यम बनता है।</p><h2>आंतरिक बुराइयों का दहन करता है दशहरा</h2><p>रावण के पुतले का दहन केवल बाहरी बुराई का अंत नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति के भीतर छिपे काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और आलस्य जैसी प्रवृत्तियों को त्यागने का संदेश देता है।</p><h2>राष्ट्रीय चेतना के जागरण का माध्यम है दशहरा</h2><p>राष्ट्रीय चेतना केवल राष्ट्र के प्रति भावनात्मक लगाव का नाम नहीं है। इसमें देश की सांस्कृतिक विरासत के प्रति सम्मान, संविधान के मूल्यों के प्रति निष्ठा, नागरिक कर्तव्यों का निर्वहन और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की भावना भी शामिल है। दशहरा इन मूल्यों को सुदृढ़ करने की प्रेरणा देता है। भारत की राष्ट्रीय एकता उसकी विविध भाषाओं, धर्मों, परंपराओं और जीवन-पद्धतियों के बीच पारस्परिक सम्मान पर आधारित है। दशहरा इस सांस्कृतिक विविधता के भीतर विद्यमान साझा नैतिक मूल्यों को रेखांकित करता है। सत्य, न्याय, साहस, करुणा और लोककल्याण जैसे आदर्श किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि समूची मानवता के लिए प्रासंगिक हैं।</p><p>राष्ट्रीय चेतना का वास्तविक अर्थ यह भी है कि नागरिक अपने अधिकारों के साथ-साथ अपने कर्तव्यों को समझें। देश के प्रति निष्ठा केवल नारों और उत्सवों तक सीमित न रहे, बल्कि ईमानदारी, अनुशासन, सामाजिक सहयोग और सार्वजनिक संपत्ति के संरक्षण जैसे व्यवहारों में दिखाई दे। यदि दशहरे के अवसर पर हम इन संकल्पों को अपने जीवन में अपनाते हैं, तो यह पर्व राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।</p><h2>सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का प्रतीक है दशहरा</h2><p>देशभर में रामलीलाओं का मंचन, कुल्लू और मैसूर के भव्य आयोजन, तथा बंगाल में दुर्गा विसर्जन के साथ यह पर्व विविधता में एकता और सामाजिक सौहार्द को मजबूत करता है।</p><h2>आध्यात्मिक राष्ट्रवाद और दशहरा</h2><p>भारतीय परंपरा में राष्ट्र को केवल भौगोलिक सीमाओं से परिभाषित नहीं किया गया है; उसके साथ भूमि, जनसमुदाय, संस्कृति, इतिहास और साझा जीवन-मूल्यों का गहरा संबंध है। आध्यात्मिक राष्ट्रवाद की दृष्टि से राष्ट्रप्रेम का आधार केवल राजनीतिक या भौतिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि नैतिकता, आत्मानुशासन, सेवा और व्यापक मानवीय कल्याण भी है।</p><h2>कृषि और नई शुरुआत का पर्व है दशहरा</h2><p>भारत में यह पर्व खरीफ की फसलों के आने और कृषि समृद्धि का भी प्रतीक है। ऐतिहासिक रूप से इसी दिन से राजा-महाराजा और योद्धा अपने नए अभियानों की शुरुआत करते थे।</p><h2>आज भी प्रासंगिक है दशहरा</h2><p>रावण-दहन की परंपरा तभी सार्थक होगी, जब हम अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ, ईर्ष्या और अन्यायपूर्ण प्रवृत्तियों को पहचानने का प्रयास करेंगे। केवल पुतले जलाने से सामाजिक बुराइयों का अंत नहीं हो सकता। इसके लिए शिक्षा, नैतिक जागरूकता, सामाजिक सहभागिता और कानून के प्रति सम्मान आवश्यक हैं। निष्कर्षतः दशहरा धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना का ऐसा महापर्व है, जो भारतीय जीवन-दृष्टि के अनेक महत्त्वपूर्ण आदर्शों को एक सूत्र में पिरोता है। यह धर्म के माध्यम से कर्तव्य और न्याय का बोध कराता है, संस्कृति के माध्यम से हमारी ऐतिहासिक एवं सामूहिक स्मृति को सुरक्षित रखता है और राष्ट्रीय चेतना के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण के प्रति उत्तरदायित्व जगाता है।</p><p>दशहरा की वास्तविक विजय तब होगी, जब सत्य हमारे आचरण में, संस्कृति हमारे व्यवहार में, धर्म हमारे कर्तव्यपालन में और राष्ट्रप्रेम हमारे जनसेवा के कार्यों में दिखाई देगा। आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पर्व को केवल परंपरा के निर्वाह का अवसर न मानें, बल्कि आत्ममंथन और सामाजिक परिवर्तन का संकल्प-दिवस बनाएं। जब व्यक्ति अपने भीतर की बुराइयों पर विजय प्राप्त करेगा, तभी समाज सशक्त बनेगा और राष्ट्र की प्रगति को स्थायी आधार मिलेगा। यही दशहरे की आत्मा सांस्कृतिक गरिमा और राष्ट्रीय प्रासंगिकता है।</p><p>- प्रज्ञा पाण्डेय&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 17:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dussehra-is-a-festival-of-religion-culture-and-national-consciousness</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दशहराः शौर्य, साधना एवं नवसंकल्प का महापर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dussehra-the-great-festival-of-bravery-spiritual-practice-and-new-determination]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसने जीवन के उत्सवों को केवल आनंद और उल्लास तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उन्हें आत्मचिंतन, साधना, संस्कार और जीवन-परिवर्तन का माध्यम बनाया है। यहां प्रत्येक पर्व अपने भीतर कोई न कोई शाश्वत संदेश समेटे हुए है। दशहरा अथवा विजयादशमी ऐसा ही प्रेरणाप्रद पर्व है, जो भारतीय संस्कृति की गहरी जड़ों, आध्यात्मिक परंपराओं और जीवन-दर्शन से जुड़कर मनुष्य को सत्य, साहस, सदाचार और आत्मविजय की राह दिखाता है। यह पर्व हमें स्मरण कराता है कि जीवन की वास्तविक विजय दूसरों को पराजित करने में नहीं, बल्कि अपने भीतर विद्यमान दुर्बलताओं, विकारों और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करने में है। असत्य पर सत्य, अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और अधर्म पर धर्म की विजय का यह उत्सव भारतीय जनमानस में सदियों से नई ऊर्जा, नया विश्वास और नया संकल्प भरता आया है।</p><p>दशहरे की सांस्कृतिक चेतना का सबसे प्रभावशाली आधार भगवान श्रीराम की रावण पर विजय है। रामायण का यह प्रसंग केवल एक ऐतिहासिक अथवा पौराणिक युद्ध की परिणति नहीं, बल्कि मानवीय मूल्यों और अहंकार के बीच संघर्ष का शाश्वत आख्यान है। श्रीराम मर्यादा, करुणा, सत्य, कर्तव्य और धर्मनिष्ठा के प्रतीक हैं, जबकि रावण ज्ञान, सामर्थ्य और वैभव से संपन्न होने के बावजूद अहंकार, अनियंत्रित इच्छाओं और अनैतिक आचरण का प्रतीक बन जाता है। रावण का व्यक्तित्व इस सत्य को उजागर करता है कि ज्ञान यदि विवेक से, शक्ति यदि मर्यादा से और समृद्धि यदि नैतिकता से विमुख हो जाए, तो मनुष्य के पतन का कारण बन जाती है। श्रीराम की विजय इसलिए महत्वपूर्ण है कि उन्होंने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने आदर्शों का परित्याग नहीं किया। दशहरा हमें सिखाता है कि परिस्थितियां कितनी ही कठिन क्यों न हों, सत्य और धर्म के मार्ग पर चलने वाला व्यक्ति अंततः समाज की आस्था और इतिहास की प्रेरणा बनता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/dussehra-is-a-symbol-of-the-victory-of-good" target="_blank" rel="noopener">Dussehra 2026: अच्छाई की जीत का प्रतीक है दशहरा</a></p><p>भारतीय संस्कृति में दशहरे का संबंध केवल राम की विजय से नहीं, बल्कि मां दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा है। नवरात्र के नौ दिनों में शक्ति की आराधना और दसवें दिन विजयादशमी का उत्सव इस बात का प्रतीक है कि साधना के बाद सिद्धि, संघर्ष के बाद सफलता और आत्मबल के जागरण के बाद विजय का मार्ग प्रशस्त होता है। मां दुर्गा की उपासना हमें यह संदेश देती है कि जीवन की चुनौतियों का सामना करने के लिए शक्ति और संवेदना, साहस और विवेक तथा पराक्रम और करुणा का समन्वय आवश्यक है। भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में शक्ति का अर्थ केवल बाहुबल अथवा प्रभुत्व नहीं है, बल्कि आत्मबल, इच्छाशक्ति, धैर्य, आत्मसंयम और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने की नैतिक क्षमता भी है। इसीलिए दशहरा शक्ति की साधना के साथ-साथ उस शक्ति के सदुपयोग का भी पर्व है।</p><p>दशहरा पर्व का आध्यात्मिक पक्ष अत्यंत गहरा है। बाहरी रावण का दहन तभी सार्थक है, जब मनुष्य अपने भीतर बैठे रावण को पहचानने और परास्त करने का साहस जुटाए। काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, आलस्य, हिंसा और चोरी जैसी प्रवृत्तियां मनुष्य के व्यक्तित्व को भीतर से दुर्बल बनाती हैं। रावण के दस सिरों को इन दस विकारों के प्रतीक के रूप में भी देखा जा सकता है। प्रतिवर्ष रावण के पुतले जलते हैं, आतिशबाजी होती है और उत्सव संपन्न हो जाता है, लेकिन यदि हमारे भीतर ईर्ष्या, छल, स्वार्थ, द्वेष और अहंकार जीवित रहें, तो विजयादशमी का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है। सच्चा दशहरा वह है, जब हम किसी के प्रति अपने मन में पल रहे द्वेष को समाप्त करें, अपने व्यवहार से छल को निकालें, अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों को स्वीकारें और अपनी सफलता में दूसरों के योगदान को भी सम्मान दें। आत्मविजय ही सभी विजयों का आधार है।</p><p>भारतीय संस्कृति उत्सव को साधना और साधना को जीवन की श्रेष्ठता से जोड़ती है। विजयादशमी इसी परंपरा का जीवंत उदाहरण है। इस दिन शस्त्रपूजा की जाती है, नए कार्यों का शुभारंभ होता है और विजय की कामना के साथ जीवन में आगे बढ़ने का संकल्प लिया जाता है। शस्त्रपूजा का वास्तविक अर्थ केवल अस्त्रों की आराधना नहीं, बल्कि शक्ति के प्रति श्रद्धा और उसके उत्तरदायी उपयोग का संकल्प है। आज के संदर्भ में हमारे शस्त्र ज्ञान, विवेक, शिक्षा, विज्ञान, श्रम, नैतिकता और सत्यनिष्ठा भी हैं। यदि इन शक्तियों का उपयोग मानवता के कल्याण के लिए किया जाए, तो वे राष्ट्रनिर्माण के प्रभावशाली साधन बन सकती हैं। दशहरा हमें अकर्मण्यता से कर्मशीलता, निराशा से आशा और निष्क्रियता से सृजनशीलता की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है। यह दिन अपने अधूरे संकल्पों को पूरा करने, नई संभावनाओं के द्वार खोलने और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देने का अवसर है।</p><p>दशहरे का एक महत्वपूर्ण पक्ष प्रकृति, कृषि और लोकजीवन से उसका संबंध भी है। भारतीय समाज में यह पर्व फसल, समृद्धि, ऋतु-परिवर्तन और सामुदायिक उल्लास की परंपराओं से जुड़ा रहा है। शमी वृक्ष की पूजा, उसके पत्तों का आदान-प्रदान और नए कार्यों का शुभारंभ प्रकृति के प्रति श्रद्धा तथा मंगलकामना की भावना को व्यक्त करते हैं। कृषि प्रधान भारत में फसल की समृद्धि केवल आर्थिक उपलब्धि नहीं, बल्कि धरती, किसान और प्रकृति के परस्पर सहयोग का उत्सव भी है। यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि मनुष्य की प्रगति प्रकृति से अलग होकर संभव नहीं है। जिस संस्कृति ने वृक्षों, नदियों, पर्वतों और धरती में पवित्रता का अनुभव किया, उसकी उत्सवधर्मिता में पर्यावरण संरक्षण और सह-अस्तित्व की प्रेरणा भी अंतर्निहित है। आज जब पर्यावरणीय संकट मानवता के सामने गंभीर चुनौती बन रहा है, तब दशहरा हमें प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को पुनः समझने का अवसर देता है।</p><p>विजयादशमी भारतीय संस्कृति की समन्वयकारी चेतना का भी उत्सव है। देश के अलग-अलग क्षेत्रों में इसे विविध रूपों में मनाया जाता है। कहीं रामलीला और रावण-दहन होता है, कहीं दुर्गापूजा के बाद मां की विदाई, कहीं शस्त्रपूजा तो कहीं लोकपरंपराओं के माध्यम से विजय का उल्लास व्यक्त किया जाता है। इन विविधताओं के पीछे एक साझा सांस्कृतिक सूत्र है-सत्य के प्रति आस्था, धर्म के प्रति निष्ठा, शक्ति के प्रति सम्मान और जीवन में मंगल की कामना। आज दशहरे के संदेश को अपने सामाजिक और राष्ट्रीय जीवन में उतारना पहले से अधिक आवश्यक है। भ्रष्टाचार, हिंसा, सामाजिक विद्वेष, अनैतिक प्रतिस्पर्धा, छलपूर्ण व्यवहार और स्वार्थपरक राजनीति जैसी प्रवृत्तियां समाज की नैतिक शक्ति को कमजोर करती हैं। इन बुराइयों का अंत केवल भाषणों, नारों अथवा प्रतीकात्मक आयोजनों से नहीं हो सकता। इसके लिए व्यक्तिगत चरित्र, सामाजिक उत्तरदायित्व और संस्थागत ईमानदारी को मजबूत करना होगा। यदि हम अपने कार्यक्षेत्र में प्रामाणिकता अपनाएं, सार्वजनिक जीवन में कर्तव्यनिष्ठ रहें, शिक्षा और चिकित्सा को मानवीय संवेदना से जोड़ें तथा समाज में प्रेम और सद्भाव को बढ़ावा दें, तो यही दशहरे की वास्तविक साधना होगी। राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी आर्थिक समृद्धि, सैन्य क्षमता अथवा तकनीकी उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के चरित्र, नैतिकता, अनुशासन और परस्पर विश्वास में भी निहित होती है।</p><p>दशहरा अंततः बाहरी विजय से अधिक आंतरिक जागरण का पर्व है। यह हमें अपने भीतर प्रकाश का दीप जलाने, निराशाओं के बीच आशा खोजने, कठिनाइयों में साहस बनाए रखने और जीवन को नवसृजन की दिशा देने का संदेश देता है। आइए, इस विजयादशमी पर हम केवल रावण का पुतला जलाने तक सीमित न रहें, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, स्वार्थ, असत्य और दुर्बलताओं को समाप्त करने का संकल्प लें। सत्य को अपना आधार, विवेक को अपना मार्गदर्शक, करुणा को अपना स्वभाव और कर्म को अपनी साधना बनाएं। यही भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिक विरासत का सम्मान है, यही उत्सव की सार्थकता है और यही वह विजय है, जो व्यक्ति के जीवन को प्रकाशित करते हुए परिवार, समाज और राष्ट्र में नई चेतना का संचार कर सकती है। क्योंकि सच्चा दशहरा तभी है, जब रावण का दहन मैदान में ही नहीं, मन में भी हो; विजय का उत्सव केवल आतिशबाजी में नहीं, आचरण में दिखाई दे; और प्रकाश केवल दीपों में नहीं, हमारे विचारों, संस्कारों तथा कर्मों में भी प्रकट हो।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 11:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/dussehra-the-great-festival-of-bravery-spiritual-practice-and-new-determination</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[न्याय की चौखट पर सियासत और संवैधानिक मर्यादा का संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-crisis-of-politics-and-constitutional-propriety-at-the-threshold-of-justice]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में 12 अक्टूबर 2026 की तारीख एक ऐसी असाधारण और चिंताजनक घटना के रूप में दर्ज हो चुकी है, जिसने संवैधानिक संस्थाओं के बीच पारस्परिक सम्मान की सीमाओं को पूरी तरह से धुंधला कर दिया है। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे 'स्पेशल इनटेंसिव रिवीजन' की प्रक्रिया के खिलाफ विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के तमाम शीर्ष नेताओं द्वारा सुप्रीम कोर्ट परिसर तक निकाला गया विरोध मार्च सिर्फ एक राजनीतिक प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह न्याय की सर्वोच्च देहरी पर जन-दबाव बनाने का एक ऐसा अभूतपूर्व प्रयास था, जिसकी अनुमति हमारा संवैधानिक ढांचा कभी नहीं देता। 15 अक्टूबर 2026 को इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जो बेहद सख्त रुख अपनाया, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि लोकतंत्र की आत्मा उसकी संस्थाओं की गरिमा और उनकी स्वतंत्रता में बसती है, न कि सड़कों पर उमड़ने वाली राजनीतिक भीड़ के कोलाहल में।<br><br>अदालत का सुनवाई के दौरान यह कहना कि "हम आइवरी टावर (हाथीदांत के मीनारों) में नहीं बैठे हैं, हमें सब पता है कि बाहर क्या बयान दिए जा रहे हैं और कोर्ट के भीतर क्या कहा जा रहा है", देश के पूरे राजनीतिक नेतृत्व के लिए एक गंभीर और ऐतिहासिक चेतावनी है। जब देश का विपक्ष का नेता, जिसके पास कैबिनेट मंत्री का दर्जा होता है और जो संसद के भीतर देश की जनता की आवाज का प्रतिनिधित्व करता है, स्वयं समर्थकों की भारी भीड़, नारेबाजी और हंगामे के बीच देश की सर्वोच्च अदालत की रजिस्ट्री में याचिका दाखिल करने पहुंचता है, तो यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या अब न्यायिक प्रक्रियाओं का फैसला भी सड़कों के संख्याबल से तय होगा? यह संपादकीय इसी गहरे और गंभीर संवैधानिक संकट का निष्पक्ष विश्लेषण करने का प्रयास है कि आखिर विपक्ष के इस कदम के पीछे की राजनीति क्या है, न्यायपालिका की चिंताएं कितनी जायज हैं और भारतीय लोकतंत्र को इस अभूतपूर्व संस्थागत टकराव से बचाने के लिए किस तरह के संतुलन की आवश्यकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/central-government-the-election-commission-and-the-delhi-police-all-have-been-issued-notices" target="_blank" rel="noopener">Yes Milord: केंद्र सरकार,चुनाव आयोग और दिल्ली पुलिस...सबको एक लाइन से नोटिस, सुप्रीम कोर्ट ने किसी को भी नहीं बख्शा</a><br><br>इस पूरे विवाद की जड़ें किसी न्यायिक फैसले या अदालती आदेश में नहीं, बल्कि देश की चुनावी प्रक्रिया की शुचिता से जुड़ी हैं। चुनाव आयोग द्वारा हाल ही में शुरू की गई 'स्पेशल इनटेंसिव रिवीजन' की कवायद को लेकर गठबंधन और एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने गंभीर सवाल उठाए हैं। विपक्ष का मुख्य आरोप है कि इस विशेष मतदाता सूची पुनरीक्षण प्रक्रिया के नाम पर देश भर में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए हैं। विपक्ष इसे 'वोटों की चोरी' और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने की एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश करार दे रहा है। इसी के विरोध में पिछले सप्ताह दिल्ली की सड़कों पर विपक्षी कार्यकर्ताओं द्वारा बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन किए गए थे, जहां पुलिस द्वारा किए गए लाठीचार्ज ने आग में घी का काम किया था।<br><br>राजनीतिक रूप से चुनाव आयोग के फैसलों का विरोध करना और उस पर सवाल उठाना विपक्ष का न सिर्फ लोकतांत्रिक अधिकार है, बल्कि उसका कर्तव्य भी है। भारतीय चुनावी राजनीति में ईवीएम &nbsp;से लेकर मतदाता सूचियों में विसंगतियों के दावों तक, विपक्ष हमेशा से मुखर रहा है। इसी सिलसिले में जब कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, तृणमूल कांग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी, समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव और राष्ट्रीय जनता दल &nbsp;के तेजस्वी यादव सहित 13 विपक्षी दलों के नेताओं ने एक संयुक्त रिट याचिका के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया, तो देश को लगा कि यह लड़ाई अब पूरी तरह से कानूनी और संवैधानिक दायरे में लड़ी जाएगी। लेकिन, कानूनी याचिका दायर करने की सामान्य प्रक्रिया को जिस तरह से एक विशाल 'राजनीतिक जुलूस' में तब्दील कर दिया गया, उसने इस कानूनी लड़ाई के वास्तविक उद्देश्य पर ही बड़े सवालिया निशान खड़े कर दिए।<br><br>12 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली के लुटियंस जोन में जो दृश्य दिखाई दिए, वे देश के न्यायिक इतिहास में बेहद दुर्लभ और विचलित करने वाले थे। राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा के नेतृत्व में हजारों की संख्या में कांग्रेस कार्यकर्ता, विपक्षी दलों के सांसद, छात्र संगठन और समर्थक संसद मार्ग से होते हुए सुप्रीम कोर्ट परिसर की ओर बढ़े। हालांकि सुरक्षा कारणों से पुलिस ने भीड़ को रोकने की कोशिश की, लेकिन विपक्षी नेताओं का एक बड़ा प्रतिनिधिमंडल और समर्थकों की एक अनियंत्रित भीड़ सुप्रीम कोर्ट के भीतर स्थित 'फाइलिंग काउंटर' &nbsp;तक पहुंच गई।एक ऐसे समय में जब कोर्ट की रजिस्ट्री अपने दैनिक कार्य को समेट रही थी, परिसर के भीतर अचानक पैदा हुए इस राजनीतिक कोलाहल, नारेबाजी और समर्थकों के हुजूम ने सुप्रीम कोर्ट के प्रशासनिक तंत्र को कुछ समय के लिए ठप कर दिया। इसके साथ ही, एक तकनीकी और कानूनी पहलू यह भी सामने आया कि इस संयुक्त याचिका में सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने 14 प्रक्रियात्मक खामियां पाई थीं। इनमें कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के पहचान पत्र का धुंधला होना, जरूरी प्राधिकरण दस्तावेजों का गायब होना और यहां तक कि कोर्ट फीस में ₹220 की कमी होना शामिल था। इन मामूली प्रक्रियात्मक त्रुटियों को दूर करने के बजाय, जिस तरह से नेताओं और कार्यकर्ताओं की फौज ने रजिस्ट्री पर दबाव बनाने की कोशिश की, उसने देश के जागरूक वकीलों और नागरिकों को हैरान कर दिया। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन से जुड़े करीब 200 वकीलों ने तत्काल इस घटना का संज्ञान लिया और पत्र लिखकर इस बात पर गहरी चिंता जताई कि देश की सर्वोच्च अदालत को राजनीतिक शक्ति-प्रदर्शन का अखाड़ा बनाया जा रहा है।</p><p>जब यह पूरा मामला 15 अक्टूबर को सुनवाई के लिए आया, तो मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ का रुख बेहद कड़ा और मुखर था। कोर्ट ने दो अलग-अलग याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की—पहली याचिका विपक्ष की वह मूल याचिका थी जिसमें चुनाव आयोग की SIR प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी; और दूसरी याचिका उन वकीलों की थी जिन्होंने सुप्रीम कोर्ट परिसर के भीतर राजनीतिक रैलियों, नारेबाजी, और राजनीतिक प्रेस कॉन्फ्रेंस पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने की मांग की थी।अदालत ने दोनों मामलों को बेहद संतुलित लेकिन सख्त तरीके से संभाला। CJI सूर्यकांत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "कोई भी बाहरी दबाव या भीड़ लाकर हमारी न्यायपालिका को डरा-धमका &nbsp;नहीं सकता।" कोर्ट ने सीधे तौर पर याचिकाकर्ता राहुल गांधी के आचरण और उनके इरादों पर सवाल उठाए। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि विपक्ष की मुख्य याचिका पर विचार करना पूरी तरह से 'अनंतिम' &nbsp;है, और राहुल गांधी को सबसे पहले 12 अक्टूबर को कोर्ट परिसर के भीतर और आसपास पैदा हुई अराजकता, भीड़ के प्रवेश और अव्यवस्था पर अपने आचरण की लिखित सफाई देनी होगी। इसके अलावा, कोर्ट ने कानून प्रवर्तन एजेंसियों को आदेश दिया कि वे उस दिन की सभी सीसीटीवी &nbsp;और डिजिटल फुटेज को सुरक्षित रखें, ताकि यह जांचा जा सके कि इस राजनीतिक जुलूस के दौरान कोर्ट की सुरक्षा से क्या खिलवाड़ हुआ था<br><br>यह कानूनी टकराव अब एक ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है जहां अदालत ने चुनाव आयोग , मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्तों (सुखबीर सिंह संधू व विवेक जोशी) को नोटिस जारी कर जवाब तो मांग लिया है—जो कि विपक्ष के लिए एक बड़ी वैधानिक राहत हो सकती थी—लेकिन जजों ने तुरंत स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि अदालत ने नेताओं के इस आचरण या व्यवहार को स्वीकार या नजरअंदाज कर दिया है।<br><br>इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक और दूरगामी पहलू यह है कि यह हमारे संविधान के बुनियादी सिद्धांत 'शक्तियों के पृथक्करण' &nbsp;पर सीधा प्रहार करता है। हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में संसद कानून बनाती है, कार्यपालिका (जिसमें चुनाव आयोग जैसी स्वायत्त संस्थाएं शामिल हैं) उन्हें लागू करती है, और न्यायपालिका इस बात की समीक्षा करती है कि क्या वे कानून और प्रशासनिक कदम संविधान के अनुरूप हैं या नहीं। इन तीनों अंगों के बीच एक बेहद महीन और अदृश्य मर्यादा रेखा होती है। जब विधायिका या विपक्ष के नेता न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए 'अदालती घेराव' जैसी शैली अपनाते हैं, तो वह मर्यादा रेखा पूरी तरह टूट जाती है।सुप्रीम कोर्ट कोई राजनीतिक मंच या दिल्ली का जंतर-मंतर नहीं है, जहां धरने, प्रदर्शन या संख्याबल के जरिए अपनी मांगों को मनवाया जा सके। अदालतें केवल और केवल तथ्यों, साक्ष्यों, नजीरों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर चलती हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो अदालत में राहुल गांधी का पक्ष रख रहे हैं—और जो स्वयं देश के जाने-माने कानूनविद और पूर्व केंद्रीय कानून मंत्री रह चुके हैं—वे भली-भांति जानते हैं कि अदालत के भीतर पेश किए जाने वाले तर्कों का वजन इस बात से तय नहीं होता कि कोर्ट रूम के बाहर कितने हजार लोग नारे लगा रहे हैं। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कोर्ट में जो चिंताएं उठाईं कि "अदालत को राजनीतिक जुलूसों से घेरना पूरी तरह से अस्वीकार्य है", वह किसी एक राजनीतिक दल की चिंता नहीं, बल्कि देश के पूरे कानूनी तंत्र की सामूहिक चिंता होनी चाहिए।<br><br>- अशोक भाटिया<br>वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 17:59:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-crisis-of-politics-and-constitutional-propriety-at-the-threshold-of-justice</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भोजन की बर्बादी से निपटने की वैश्विक चुनौती?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-global-challenge-of-tackling-food-waste]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भोजन मूलभूत आवश्यकताओं के अलावा, प्रत्येक इंसान का बुनियादी अधिकार भी है। भोजन अनमोल है जिसका सम्मान करना सभी का कर्तव्य है। आज ‘विश्व खाद्य दिवस’ है जो सालाना 16 अक्टूबर को पूरे संसार में इस मकसद से मनाया जाता है कि अन्न की बर्बादी को रोकने के लिए जनमानस को जागरूक किया जाए। नवंबर 1979 को संयुक्त राष्ट् के खाद्य एवं कृषि संगठन के 20वें सम्मेलन में खाद्य दिवस को मनाने का निर्णय हुआ जिसका पहली बार आयोजन वर्ष 1981 में हुआ। दुनिया में भूख से बढ़ते कुपोषण पर नियंत्रण को ध्यान में रखकर संयुक्त राष्ट्र ने वैश्विक संघों को चेताया था। ये दिवस इस बात पर ज्यादा जोर देता है कि हमें थाली में उतना ही भोजन परोसना चाहिए, जितने की पेट को जरूरत हो। ज्यादा भोजन लेंगे तो निश्चित रूप से बर्बाद ही होगा। फूड इंडेक्स पर यूएनईपी-2024 की रिपोर्ट के मुताबिक हिंदुस्तान में सालाना करीब 7.8 करोड़ टन भोजन बर्बाद होता है, जिसका औसत लगभग 21.4 करोड़ किलोग्राम प्रतिदिन आंका गया। विश्व खाद दिवस-2025 की थीम थी ‘बेहतर भोजन और बेहतर भविष्य साथ-साथ’ जो एग्रीफूड सिस्टम को बदलने में वैश्विक सहयोग की शक्ति को उजागर करती है।</p><p>भोजन बर्बादी की समस्या संसार में बड़ी आफत के रूप में उभरी है। ऐसे तमाम मुल्क हैं जहां अन्न का उत्पादन शून्य है और दूसरे देशों के उत्पाद-भोजन पर ही निर्भर हैं, बावजूद इसके बेहताशा भोजन बर्बाद करते हैं। हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण की ‘फूडवेस्टाइज इंडेक्स रिपोर्ट-2026’ सामने आई जिसमें दुनिया भर में 1.05 अरब टन भोजन बर्बाद होता बताया गया जिससे नई किस्म की न सिर्फ बीमारियां-वायरस फैले, बल्कि पर्यावरण भी दूषित हुआ। भारत में पिछले 10 वर्षों में अन्न उत्पादन 90 मिलियन मीट्रिक टन पिछले एक दशक से ज्यादा हुआ है। धरती पर मात्र भारत ही एक ऐसा मुल्क है जो करीब 76 देशों को विभिन्न किस्म का अन्न सप्लाई करता है जिसमें चीनी, दालें, चावल, मखाने, सरसों और सब्जियां प्रमुख रूप से शामिल हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/students-from-the-flight-of-dreams-to-the-discovery-of-creativity" target="_blank" rel="noopener">छात्रः सपनों की उड़ान से सृजन की पहचान तक</a></p><p>तमाम ऐसे इस्लामिक देश हैं जो भारत में उत्पादित बासमती चावल ही पसंद करते हैं। ईरान-ईराक में चावल की सप्लाई सिर्फ भारत से ही होती है। अन्न निर्यात के लिहाज से भारत विश्व का बड़ा बाजार बनकर इस समय उभरा है। संसार में भारत दूध और बाजरे के निर्माण में नंबर वन पायदान है। वर्ष 2014 के बाद से हिंदुस्तान शहद, अंडे, मछलियां और फल-सब्जियों के उत्पादन में दूसरे स्थान पर काबिज हुआ है। जबकि, कभी चौथे स्थान पर हुआ करता था।</p><p>भूखे सोना विकसित संसार के माथे पर कलंक जैसा है। भूख के आंकड़े आज भी डरावने हैं। संसार का एक बड़ा इंसानी हिस्सा अभी भी रात में भूखे पेट सोता है। जबकि, रोजाना जितनी भोजन की बर्बादी होती है, थालियों में खाने को व्यर्थ करके लोग फेंक देते हैं, अगर ऐसा ना किया जाए, तो भूखे सोने वालों के आंकड़ों में कमी लाई जा सकती है।</p><p>भोजन की बर्बादी से न केवल अन्न और धन का नुकसान होता है, बल्कि पानी, बिजली और अन्नदाताओं की सालाना मेहनत भी बेकार होती है। इससे पर्यावरण पर भी बुरा प्रभाव पड़ता है। भूख से निपटने के लिए वैश्विक स्तर पर सभी देशों को चेताना होगा। भूख और अन्न बर्बादी के नियंत्रण पर भारत जैसी पहल अन्य देशों को भी करनी होगी। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम-2013 से प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना, पीएम पोषण योजना, अंत्योदय अन्न योजना, राइस फोर्टिफिकेशन और प्राइस स्अेबिलाइजेशन फंड जैसी प्रमुख पहले भारत की खाद्य और पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता को सुदृढ़ कर रही हैं। भारत में 80 करोड़ लोग मुफत अन्न वितरण योजना के लाभार्थी हैं, इसलिए सरकार का प्रयास है कि कोई भी व्यक्ति भूखे पेट नहीं सोए। लेकिन भोजन की बर्बादी भारत में भी कम नहीं है। आंकड़े इस समस्या के गवाह हैं।</p><p>विश्व खाद्य दिवस संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना का प्रतीक है जिसे पहली बार औपचारिक रूप से 1981 में ‘भोजन सर्वप्रथम’ विषय वस्तु के साथ मनाया गया था। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1984 में इस दिवस को मान्यता दी जिसके बाद एक साथ 150 देशों का समूह बना, जो सामूहिक प्रयासों से भूख और अन्न बर्बादी से लड़ाई लड़ रहे हैं। हालांकि, सफलता उतनी नहीं मिली, जितनी उम्मीदें लगाई गईं थीं। बहरहाल, आज का दिन खाद्य सुरक्षा, पोषण टिकाउ, कृषि पद्वतियों के विषय में ना सिर्फ जागरूक करता है, बल्कि सुरक्षित, पर्याप्त और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता में आने वाली चुनौतियों से लड़ने की सीख भी देता है। भोजन मानव जीवन का आधार है। स्वास्थ्य विकास और कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक भी। हालांकि, दुख तब होता है जब खाद्य उत्पादन में वैश्विक प्रगति के बाद भी असंख्य लोग अभी भी भूख और कुपोषण का सामना कर रहे हैं। भोजन पर सभी का मौलिक अधिकार है, जिसे कोई नहीं छीन सकता। भोजन हीन इंसान को भोजन उपलब्ध करवाना प्रत्येक हुकूमत का पहला कर्तव्य होता है।</p><p>- डॉ. रमेश ठाकुर<br>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 13:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-global-challenge-of-tackling-food-waste</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[छात्रः सपनों की उड़ान से सृजन की पहचान तक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/students-from-the-flight-of-dreams-to-the-discovery-of-creativity]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>किसी राष्ट्र का भविष्य उसकी संसदों में पारित कानूनों से कम और उसके शिक्षण संस्थानों में गढ़े जा रहे विद्यार्थियों के चरित्र से अधिक निर्धारित होता है। छात्र केवल किसी देश की युवा आबादी नहीं, बल्कि उसकी संभावनाओं, विचारों, मूल्यों और विकास की जीवंत पूंजी होते हैं। उनकी आंखों में पलते सपने राष्ट्र की तकदीर लिखते हैं और उनके हाथों में संवरता भविष्य सभ्यता की दिशा तय करता है। किंतु जब यही हाथ सृजन के औजारों के बजाय विध्वंस के हथियार उठाने लगें, जब ज्ञान की जिज्ञासा हिंसा की उत्तेजना में बदलने लगे और जब शिक्षा के मंदिरों में अनुशासन की जगह अराजकता पनपने लगे, तब यह केवल छात्र जीवन का संकट नहीं, बल्कि समाज और राष्ट्र की चेतना के लिए खतरे की घंटी है। विश्व छात्र दिवस इसी संदर्भ में आत्ममंथन का अवसर है। प्रतिवर्ष 15 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व छात्र दिवस भारत के पूर्व राष्ट्रपति, महान वैज्ञानिक और ‘मिसाइल मैन’ डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम की जयंती को समर्पित है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा इस दिवस को आधिकारिक अंतरराष्ट्रीय दिवस घोषित किए जाने का दावा नहीं करना चाहिए, फिर भी भारत में यह दिन व्यापक रूप से कलाम के विद्यार्थी-केंद्रित विचारों, शिक्षा के प्रति समर्पण और युवाओं के स्वप्नशील व्यक्तित्व के सम्मान के रूप में मनाया जाता है। डॉ. कलाम के लिए विद्यार्थी केवल परीक्षाओं में अंक प्राप्त करने वाले छात्र नहीं थे, बल्कि वे ऐसे स्वप्नदृष्टा थे, जिनके भीतर देश की तस्वीर बदलने की क्षमता थी। वे बच्चों के बीच जाते, उनसे संवाद करते, उनके प्रश्नों को प्रोत्साहित करते और उन्हें बड़े सपने देखने की प्रेरणा देते थे। उनका विश्वास था कि सपने वे नहीं होते जो नींद में आते हैं, बल्कि वे होते हैं जो व्यक्ति को सोने नहीं देते। उनका जीवन इस बात का प्रमाण था कि साधारण परिस्थितियों में जन्मा व्यक्ति भी असाधारण संकल्प, ज्ञान और परिश्रम से इतिहास रच सकता है।</p><p>डॉ. कलाम का मिशन केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं था। उनका व्यापक स्वप्न भारत को विकसित, आत्मनिर्भर, ज्ञान-संपन्न और नैतिक रूप से सशक्त राष्ट्र बनाना था। उन्होंने युवाओं को वैज्ञानिक दृष्टिकोण, नवाचार, आत्मविश्वास और राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने का प्रयास किया। उनकी दृष्टि में शिक्षा का उद्देश्य केवल आजीविका कमाने की योग्यता पैदा करना नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर विवेक, संवेदना, चरित्र और उत्तरदायित्व का विकास करना भी था। वे चाहते थे कि प्रत्येक विद्यार्थी अपनी प्रतिभा पहचाने, असफलताओं से सीखे और अपनी ऊर्जा को समाज की समस्याओं के समाधान में लगाए। आज प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था और छात्र राजनीति उनके इस स्वप्न को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ रही हैं? समकालीन परिदृश्य का एक चिंताजनक पक्ष यह है कि अनेक शिक्षण संस्थानों में हिंसक टकराव, तोड़फोड़, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, अनुशासनहीनता और शक्ति प्रदर्शन जैसी घटनाएं चिंता उत्पन्न कर रही हैं। यह कहना उचित नहीं होगा कि समूचा छात्र समुदाय इस प्रवृत्ति का शिकार है, क्योंकि इसी पीढ़ी के विद्यार्थी विज्ञान, तकनीक, खेल, पर्यावरण संरक्षण, उद्यमिता और सामाजिक सेवा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य भी कर रहे हैं। फिर भी जहां छात्र जीवन की रचनात्मक ऊर्जा नकारात्मक गतिविधियों में खपती है, वहां समाज को उसके कारणों की पड़ताल करनी चाहिए। आखिर जिस उम्र में प्रयोगशालाओं में नए आविष्कार होने चाहिए, उस उम्र में यदि परिसर संघर्ष के अखाड़े बन जाएं, तो यह हमारी सामूहिक विफलता का संकेत है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/promoting-innovation-and-education-on-apj-abdul-kalam-world-students-day" target="_blank" rel="noopener">Education और Innovation को बढ़ावा देने के लिए 15 October को मनाते हैं World Students Day</a></p><p>छात्र आंदोलनों का इतिहास बताता है कि युवाओं की आवाज ने अनेक बार सामाजिक परिवर्तन, लोकतांत्रिक अधिकारों और जनहित के प्रश्नों को नई धार दी है। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना, व्यवस्था से जवाबदेही मांगना और शिक्षा संबंधी समस्याओं पर संगठित होना छात्र जीवन का सकारात्मक पक्ष है। लेकिन आंदोलन और अराजकता के बीच एक महीन, किंतु निर्णायक रेखा होती है। जब तर्क की जगह ताव, संवाद की जगह टकराव और विरोध की जगह हिंसा ले लेती है, तब उद्देश्य पीछे छूट जाता है और अहंकार आगे आ जाता है। लोकतंत्र में असहमति का अधिकार अनिवार्य है, लेकिन असहमति के नाम पर सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, शिक्षकों का अपमान करना अथवा दूसरे विद्यार्थियों की पढ़ाई बाधित करना किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता। आग लगाकर उजाला नहीं किया जा सकता और शाख काटकर वृक्ष को मजबूत नहीं बनाया जा सकता। इस स्थिति के लिए केवल विद्यार्थियों को दोष देना भी समस्या का सरलीकरण होगा। परिवारों में संवाद का अभाव, शिक्षा का बढ़ता व्यावसायीकरण, रोजगार को लेकर अनिश्चितता, मानसिक दबाव, सोशल मीडिया पर आक्रामकता का महिमामंडन, नशे की आसान उपलब्धता और छात्र राजनीति में बाहरी स्वार्थों का हस्तक्षेप भी इस संकट को गहरा सकते हैं। जब युवाओं की ऊर्जा को सकारात्मक दिशा नहीं मिलती, तब वह कभी निराशा, कभी आक्रोश और कभी अनुकरण की प्रवृत्ति में बहने लगती है। खाली दिमाग शैतान का घर होता है, यह लोकोक्ति हर परिस्थिति में सत्य नहीं, लेकिन इतना अवश्य है कि उद्देश्यहीन ऊर्जा भटकाव का कारण बन सकती है। इसलिए विद्यार्थियों को केवल उपदेश नहीं, अवसर, मार्गदर्शन, विश्वास और सार्थक भागीदारी भी चाहिए।</p><p>यहां जैन दर्शन की अहिंसा, अनेकांत और आत्मानुशासन की शिक्षाएं विशेष प्रासंगिक हो जाती हैं। जैन परंपरा में अहिंसा का अर्थ केवल शारीरिक हिंसा से बचना नहीं, बल्कि विचार, वाणी और व्यवहार में भी संयम रखना है। अनेकांतवाद सिखाता है कि सत्य को समझने के लिए दूसरे पक्ष को सुनना और अपने विचारों की सीमाओं को स्वीकार करना आवश्यक है। यदि इन मूल्यों को छात्र जीवन में व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए, तो मतभेद शत्रुता में नहीं बदलेंगे और विरोध संवाद का माध्यम बनेगा। विद्यार्थी यह समझ सकेंगे कि साहस का अर्थ किसी को पराजित करना नहीं, बल्कि अपने क्रोध, आवेग और अहंकार पर विजय पाना है। विश्व छात्र दिवस पर डॉ. कलाम को सच्ची श्रद्धांजलि तभी होगी, जब हम शिक्षा को परीक्षा-केंद्रित संकीर्णता से निकालकर जीवन निर्माण का माध्यम बनाएंगे। विद्यालयों और महाविद्यालयों में पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, खेलों, कला, साहित्य, सामाजिक सेवा और नवाचार को प्रोत्साहित करना होगा। नशे के विरुद्ध जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य पर खुला संवाद, शिक्षक-विद्यार्थी संबंधों में विश्वास और छात्र राजनीति में लोकतांत्रिक मर्यादाओं का विकास भी आवश्यक है। विद्यार्थियों को स्थानीय समस्याओं के समाधान, पर्यावरण संरक्षण, वंचित बच्चों की शिक्षा और सामुदायिक सेवा से जोड़कर उनकी ऊर्जा को सकारात्मक कर्मभूमि दी जा सकती है। साथ ही शिक्षण संस्थानों को भयमुक्त, न्यायपूर्ण और उत्तरदायी वातावरण उपलब्ध कराना होगा, क्योंकि अनुशासन का अर्थ दमन नहीं और स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है।</p><p>डॉ. कलाम का विद्यार्थी-दर्शन हमें याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण किसी एक नेता, सरकार या वैज्ञानिक का अकेला अभियान नहीं, बल्कि करोड़ों जाग्रत मस्तिष्कों की सामूहिक साधना है। आज के विद्यार्थी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल प्रतियोगिता में आगे निकलना नहीं, बल्कि अपनी सफलता को सार्थक बनाना है। उसे यह तय करना होगा कि उसकी प्रतिभा समाज को जोड़ने में लगेगी या तोड़ने में, उसकी बुद्धि समाधान खोजेगी या संकट बढ़ाएगी और उसका साहस निर्माण का इतिहास लिखेगा या विनाश की कहानी। विश्व छात्र दिवस का वास्तविक संदेश यही है कि युवा शक्ति को केवल नियंत्रित करने की नहीं, सही दिशा देने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों के सपनों को पंख मिलें, उनकी जिज्ञासा को अवसर मिले और उनके चरित्र को नैतिक आधार मिले, तभी शिक्षा राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति बनेगी। क्योंकि देश का भविष्य केवल इस बात से तय नहीं होता कि उसके विद्यार्थी कितना जानते हैं, बल्कि इससे भी तय होता है कि वे अपने ज्ञान का उपयोग किसके लिए और किस उद्देश्य से करते हैं। डॉ. कलाम का भारत तभी साकार होगा, जब कक्षाओं से चरित्र, प्रयोगशालाओं से नवाचार, आंदोलनों से उत्तरदायित्व और युवाओं के संकल्पों से सृजन की नई संस्कृति जन्म लेगी। यही विश्व छात्र दिवस की सार्थकता है और यही विकसित भारत की वास्तविक आधारशिला।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 13:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/students-from-the-flight-of-dreams-to-the-discovery-of-creativity</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[OpenAI में जासूसी के खुलासे से हड़कंप! AI ने पकड़ा अपना ही इंजीनियर Abdulrahman Alfozan, Silicon Valley में मचा घमासान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/openai-spy-scandal-apple-trade-secrets-ai-espionage]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दुनिया को AI की ताकत दिखाने वाली अमेरिकी कंपनी OpenAI के अपने दफ्तर में ही जासूसी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। इस खबर के सामने आते ही सैन फ्रांसिस्को से लेकर सिलिकॉन वैली तक हड़कंप मच गया है। दरअसल, कंपनी के एक इंजीनियर पर आरोप है कि उसने बड़े अधिकारियों की गुप्त बातचीत रिकॉर्ड करने के लिए कमरे में छिपकर एक डिवाइस लगा दिया। मामला खुला तो OpenAI ने अपने ही AI की मदद से आरोपी का सुराग खोज निकाला और बात FBI तक पहुंच गई। उधर, Apple पर भी आरोप लगे हैं कि उसके पास OpenAI के 100 से ज्यादा गोपनीय दस्तावेज पहुँचे हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि AI की दुनिया में आखिर कौन किसके राज चुरा रहा है? सवाल यह भी है कि क्या तकनीक की इस जंग में कंपनियों के सबसे बड़े रहस्य भी सुरक्षित नहीं रहे?</p><h2>टॉयलेट पेपर के पीछे छिपा था जासूसी का कथित उपकरण</h2><p>अमेरिकी जांच एजेंसियों के अनुसार, OpenAI के सैन फ्रांसिस्को कार्यालय में 30 सितंबर को सुरक्षा जांच के दौरान एक अंगूठे के आकार का रिकॉर्डिंग डिवाइस मिला। इसे एक कॉन्फ्रेंस रूम में टीवी के पीछे USB पोर्ट में लगाया गया था और कथित तौर पर टॉयलेट पेपर से छिपाया गया था, ताकि सामान्य जांच में इसका पता न चले। जांच में सामने आए विवरणों के मुताबिक, डिवाइस में माइक्रोफोन, अलग किया जा सकने वाला कैमरा सेंसर और माइक्रोएसडी स्टोरेज जैसी सुविधाएं थीं। इसमें रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखने के लिए एन्क्रिप्शन और डेटा ट्रांसफर की क्षमता होने की भी बात कही गई है। बताया गया कि यह कमरा OpenAI के अधिकारियों की उन बैठकों के लिए इस्तेमाल होता था, जिनमें कंपनी की अत्याधुनिक AI तकनीक, भविष्य के उत्पादों, कारोबारी रणनीति और संभावित साझेदारियों पर चर्चा होती थी। अमेरिकी जांच एजेंसी FBI के मुताबिक, डिवाइस को लगभग 28 सितंबर को लगाया गया था। हालांकि, उसकी सामग्री एन्क्रिप्टेड होने के कारण रिकॉर्डिंग तक पहुंच नहीं बन सकी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/openai-engineer-arrested-for-planting-recording-device-in-meeting-room" target="_blank" rel="noopener">OpenAI के बैठक कक्ष में गुप्त रिकॉर्डिंग डिवाइस लगाने पर इंजीनियर गिरफ्तार</a></p><h2>AI ने ही खोज निकाला कथित आरोपी का सुराग</h2><p>इस मामले में सबसे दिलचस्प मोड़ तब आया, जब OpenAI ने बताया कि उसने डिवाइस को समझने और उसके स्रोत का पता लगाने के लिए अपने AI मॉडल्स का इस्तेमाल किया। कंपनी के मुताबिक, इस विश्लेषण से उसे उस कर्मचारी की पहचान करने में मदद मिली, जिसने डिवाइस लगाया था। अमेरिकी अधिकारियों ने 35 वर्षीय सऊदी नागरिक अब्दुलरहमान अलफोजान को 9 अक्टूबर को गिरफ्तार किया। वह OpenAI में इंजीनियरिंग लीड के रूप में काम कर चुका था और जुलाई 2025 में कंपनी से जुड़ा था। वह अमेरिका का स्थायी निवासी भी बताया गया है।</p><p>साथ ही अभियोजन पक्ष के आरोप इससे भी आगे जाते हैं। जांचकर्ताओं का दावा है कि अलफोजान ने कंपनी की इमारतों, मीटिंग रूम, बैठकों के कैलेंडर और अधिकारियों की गतिविधियों से जुड़ी जानकारी जुटाने के लिए एक प्रोडक्टिविटी टूल का इस्तेमाल किया। आरोप है कि 24 से 30 सितंबर के बीच उसने अपनी पत्नी से जुड़े AI चैटबॉट अकाउंट पर रिकॉर्डिंग डिवाइस बनाने, लगाने, छिपाने और दूर से संचालित करने से संबंधित सवाल भी पूछे।</p><p>शिकायत में CCTV फुटेज का भी उल्लेख है। जांचकर्ताओं के मुताबिक, कुछ मौकों पर अलफोजान को उस कॉन्फ्रेंस रूम के आसपास देखा गया, जहां जाने या बैठक में शामिल होने की उसे अनुमति नहीं थी। पांच अक्टूबर की फुटेज में कथित तौर पर उसे टीवी के पीछे देखते हुए दिखाया गया। उसी दिन दूसरे कमरे में छोड़े गए एक बैग की तलाशी के दौरान सुरक्षा कर्मियों को एक अन्य एन्क्रिप्टेड रिकॉर्डिंग डिवाइस मिलने का भी दावा किया गया है।</p><p>अलफोजान पर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण के जरिए मौखिक बातचीत को अवैध रूप से रिकॉर्ड करने या ऐसा करने का प्रयास करने का आरोप है। बताया जा रहा है कि दोषी पाए जाने पर उसे पांच साल तक की जेल, 2.5 लाख डॉलर का जुर्माना और तीन साल तक निगरानी में रिहाई की सजा हो सकती है।</p><h2>OpenAI का दावा: डेटा चोरी का सबूत नहीं</h2><p>उधर, इतने गंभीर आरोपों के बावजूद OpenAI ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उसे ऐसा कोई संकेत नहीं मिला है कि आरोपी ने कंपनी के मॉडल वेट्स, सोर्स कोड या ग्राहकों के डेटा तक अनुचित पहुंच बनाई अथवा उन्हें बाहर भेजा। कंपनी ने मामला FBI को सौंपने और जांच में सहयोग करने की बात कही है। FBI निदेशक काश पटेल ने इसे अमेरिकी AI नवाचार की सुरक्षा से जुड़ा महत्वपूर्ण मामला बताया है। वहीं अब्दुलरहमान अलफोजान का पेशेवर अनुभव भी ध्यान खींचता है। वह इससे पहले Meta, Microsoft और SAP जैसी कंपनियों में काम कर चुका है। वह MIT से कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग की डिग्रीधारी बताया गया है और निवेश फर्म Raed Ventures से भी जुड़ा है।</p><h2>Apple और OpenAI की जंग में 100 से ज्यादा फाइलों का विवाद</h2><p>उधर, Apple के साथ चल रहे कानूनी विवाद ने इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बना दिया है। OpenAI का आरोप है कि उसका एक पूर्व कर्मचारी कंपनी के उत्पाद से जुड़ी 100 से अधिक फाइलें अपने निजी अकाउंट पर भेजने के बाद Apple के वरिष्ठ अधिकारियों के सामने उस उत्पाद का प्रेजेंटेशन दे चुका था। हालांकि, Apple ने इन आरोपों को खारिज किया है। OpenAI की ओर से अदालत में दाखिल याचिका के मुताबिक, Apple में नौकरी करने पहुंचे उसके एक पूर्व कर्मचारी ने 100 से अधिक फाइलें अपने निजी अकाउंट पर भेजी थीं। आरोप है कि उसने बाद में अपने उत्पाद से जुड़ी प्रस्तुति Apple के वरिष्ठ नेतृत्व के सामने दी। OpenAI को आशंका है कि उसकी गोपनीय जानकारी अब Apple के भीतर मौजूद हो सकती है और कंपनी के इंजीनियर इसका इस्तेमाल अपने आगामी उत्पादों को विकसित करने में कर सकते हैं। हालांकि Apple ने कहा है कि उसके पास पूर्व नियोक्ताओं की गोपनीय जानकारी के इस्तेमाल को रोकने के लिए नीतियां और प्रक्रियाएं हैं तथा उसकी जांच में अब तक OpenAI की फाइलें Apple के सर्वरों पर नहीं मिली हैं।</p><p>Apple के वकीलों ने यह भी कहा कि OpenAI द्वारा बताए गए दो निजी फोन नंबर उस कर्मचारी के Apple कार्य-संबंधी नंबर से मेल नहीं खाते। Apple के अनुसार, उसे कथित प्रेजेंटेशन की जानकारी भी नहीं थी और उसने OpenAI से अतिरिक्त विवरण मांगे थे। कंपनी का आरोप है कि OpenAI ने जवाब देने के बजाय अदालत का रुख किया। हम आपको यह भी बता दें कि OpenAI की ओर से Apple के पूर्व कर्मचारियों द्वारा गोपनीय जानकारी ले जाने के आरोपों को भी पहले खारिज किया जा चुका है।</p><p>इस बीच, अदालत ने Apple को अपने कुछ पूर्व कर्मचारियों के डिजिटल उपकरणों से डेटा जुटाने और तीन लोगों से निर्धारित समय से पहले पूछताछ करने की अनुमति दी है। इनमें पूर्व वरिष्ठ सिस्टम इंजीनियर चांग लियू और iPhone तथा Apple Watch के डिजाइन से जुड़े रहे पूर्व उपाध्यक्ष टैंग येव टैन शामिल हैं। मुकदमे की सुनवाई अक्टूबर 2027 में होने की संभावना है, हालांकि OpenAI ने जून 2027 तक तैयार होने की बात कही है। देखा जाये तो इन दोनों मामलों में अभी कई सवाल अनुत्तरित हैं। रिकॉर्डिंग डिवाइस से कोई संवेदनशील जानकारी बाहर गई या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है। इसी तरह Apple के पास OpenAI की गोपनीय जानकारी पहुंचने के आरोप भी अभी साबित नहीं हुए हैं।</p><p>बहरहाल, एक बात साफ है। AI की दुनिया में जंग अब सिर्फ सबसे ताकतवर मॉडल बनाने की नहीं, बल्कि एक-दूसरे के तकनीकी राज हथियाने और अपने रहस्यों को बचाने की भी है। किसके पास कितनी उन्नत तकनीक है, कौन अगली बड़ी छलांग लगाने वाला है और किसकी गोपनीय जानकारी किसके हाथ लग रही है, इन्हीं सवालों के बीच दुनिया की दिग्गज टेक कंपनियां आमने-सामने हैं। हैरानी देखिए, जिस AI को इंसानी दिमाग की सबसे जटिल पहेलियां सुलझाने के लिए बनाया गया, वही अब जासूसी के सुराग खोजने और साजिशों का पर्दाफाश करने में जुटा है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब तकनीक के महारथी ही एक-दूसरे के राज तलाशने में लगे हों, तो इस डिजिटल महायुद्ध में आखिर किसके रहस्य सुरक्षित हैं और किसकी अगली चाल पहले ही बेनकाब हो जाएगी?</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 11:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/openai-spy-scandal-apple-trade-secrets-ai-espionage</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष ने बढ़ाई भारत की विकास दर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-monetary-fund-raises-india-growth-rate]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद की विकास दर के अनुमान को 6.4 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत करना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक और सकारात्मक संकेत है। वैश्विक पटल पर जब कई बड़ी और विकसित अर्थव्यवस्थाएं मंदी, महंगाई और अस्थिरता के दौर से गुजर रही हैं, तब भारत की विकास दर में इस तरह का सकारात्मक संशोधन देश की आर्थिक नीतियों और मजबूत आधारभूत संरचना की सफलता को प्रमाणित करता है। यह केवल एक संख्यात्मक वृद्धि नहीं है, बल्कि यह विश्व समुदाय के उस अटूट भरोसे का प्रतीक है जो उसने भारत की आर्थिक संभावनाओं पर जताया है। सात प्रतिशत की यह जादुई विकास दर भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की सूची में सबसे ऊपर रखती है और यह स्पष्ट करती है कि वैश्विक चुनौतियों के बावजूद देश का आर्थिक पहिया तेज गति से घूम रहा है।<br><br>इस शानदार आर्थिक वृद्धि के पीछे सबसे बड़ा कारण देश की अपनी मजबूत घरेलू मांग है। पश्चिमी देशों की तरह भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से केवल निर्यात पर निर्भर नहीं है, बल्कि यहां का विशाल मध्यवर्ग और उसकी उपभोग क्षमता अर्थव्यवस्था को एक मजबूत ढाल प्रदान करती है। जब वैश्विक बाजारों में मांग कम होती है, तब देश के भीतर की खपत उत्पादन को गिरने नहीं देती। पिछले कुछ वर्षों में लोगों की क्रय शक्ति में जो सुधार आया है, उसने बाजार में उत्पादों और सेवाओं की मांग को निरंतर बनाए रखा है। यह घरेलू मांग ही है जिसके कारण छोटे से लेकर बड़े उद्योगों तक का चक्र सुचारू रूप से चल रहा है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में खपत बढ़ने से विनिर्माण और खुदरा व्यापार को भारी लाभ मिल रहा है, जो अंततः सकल घरेलू उत्पाद के आंकड़ों में परिलक्षित हो रहा है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/two-and-a-half-decades-of-tough-decisions-made-modi-modi" target="_blank" rel="noopener">ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी</a><br><br>घरेलू मांग के साथ ही सेवा क्षेत्र इस विकास यात्रा का एक बहुत महत्वपूर्ण स्तंभ बनकर उभरा है। भारत का सेवा क्षेत्र, विशेष रूप से सूचना प्रौद्योगिकी, वित्तीय सेवाएं, स्वास्थ्य और शिक्षा, न केवल देश के भीतर बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी धाक जमा रहा है। तकनीक के निरंतर विस्तार और नवाचार ने भारतीय उद्यमों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने योग्य बनाया है। वित्तीय सेवाओं के आधुनिकीकरण और लेनदेन की नई तकनीकी प्रणालियों ने भी व्यापार को आसान और पारदर्शी बनाया है। सेवा क्षेत्र का लगातार विस्तार न केवल विदेशी मुद्रा भंडार को बढ़ा रहा है, बल्कि यह लाखों युवाओं के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा कर रहा है। ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में भारत की बढ़ती पैठ उसे भविष्य की चुनौतियों के लिए तैयार कर रही है।<br><br>सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास पर किया जा रहा भारी पूंजीगत व्यय भी इस सात प्रतिशत की वृद्धि का एक प्रमुख वाहक है। नई सड़कों, राजमार्गों, रेलवे मार्गों, हवाई अड्डों और बंदरगाहों के निर्माण से न केवल देश के विभिन्न हिस्से आपस में बेहतर तरीके से जुड़ रहे हैं, बल्कि इससे माल ढुलाई और व्यापार की लागत में भी भारी कमी आ रही है। बुनियादी ढांचे पर खर्च किया गया धन अर्थव्यवस्था में कई गुना अधिक प्रभाव डालता है। इससे निर्माण सामग्री उद्योगों को सीधा लाभ मिलता है और दिहाड़ी मजदूरों से लेकर तकनीकी विशेषज्ञों तक हर स्तर पर रोजगार का सृजन होता है। सरकार की यह दूरदर्शी सोच अर्थव्यवस्था को दीर्घकालिक मजबूती प्रदान कर रही है, जिससे भविष्य में विकास की रफ्तार को और भी तेज किया जा सकेगा।<br><br>इसके अतिरिक्त विनिर्माण क्षेत्र में जान फूंकने के लिए लागू की गई उत्पादन आधारित प्रोत्साहन जैसी योजनाओं का भी सकारात्मक असर दिखने लगा है। देश को वैश्विक विनिर्माण का केंद्र बनाने की दिशा में यह एक बड़ा कदम है। अब संचार उपकरणों से लेकर रक्षा सामग्री और बिजली से चलने वाले उपकरणों तक का निर्माण बड़े पैमाने पर देश के भीतर ही हो रहा है। इससे आयात पर निर्भरता कम हो रही है और व्यापार घाटा भी सुधर रहा है। जब देश में नई औद्योगिक इकाइयां लगती हैं, तो वे अपने साथ कुशल और अकुशल दोनों तरह के कामगारों के लिए आजीविका लेकर आती हैं। युवाओं को रोजगार मिलने से उनकी आमदनी बढ़ती है, जिससे वे बाजार में अधिक पैसा खर्च करते हैं, और यह चक्र पूरी अर्थव्यवस्था को लगातार गति प्रदान करता है।<br><br>भारत जैसे विशाल देश में असली आर्थिक विकास तब तक संभव नहीं है जब तक कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से कदम मिलाकर न चले। कृषि और उससे जुड़े उद्योगों का देश के सकल घरेलू उत्पाद में बहुत बड़ा योगदान है। अच्छी उपज और बेहतर समर्थन मूल्य के कारण ग्रामीण आय में जो वृद्धि दर्ज की गई है, उसने कृषि उपकरणों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं की मांग को तेज किया है। ग्रामीण क्षेत्रों में बढ़ता उपभोग इस बात का संकेत है कि विकास का लाभ केवल शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह समाज के निचले पायदान तक भी पहुंच रहा है। आर्थिक समावेशन की यह प्रक्रिया विकास को अधिक टिकाऊ और संतुलित बनाती है।<br><br>अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के इस नए अनुमान का सीधा असर विदेशी निवेशकों की मानसिकता पर भी पड़ेगा। दुनिया भर के निवेशक हमेशा ऐसे बाजारों की तलाश में रहते हैं जहां उन्हें स्थिरता, सुरक्षा और उच्च लाभ की गारंटी मिल सके। जब एक शीर्ष वैश्विक संस्था भारत की विकास दर को बढ़ाती है, तो यह निवेशकों के लिए एक स्पष्ट संकेत होता है कि भारत निवेश के लिए सबसे सुरक्षित और लाभदायक स्थान है। प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के बढ़ने से देश में नई तकनीक आती है, उत्पादन क्षमता का विस्तार होता है और वैश्विक बाजारों तक हमारी पहुंच आसान हो जाती है। इसके साथ ही, देश के प्रतिभूति बाजारों में भी सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है, जिससे आम निवेशकों की संपत्ति में भी इजाफा होता है।<br><br>हालांकि, इस उच्च विकास दर के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं, जिन पर निरंतर ध्यान देने की आवश्यकता है। मुद्रास्फीति यानी महंगाई दर को नियंत्रित रखना सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है। यदि वस्तुओं और सेवाओं के दाम तेजी से बढ़ते हैं, तो वह आम आदमी की क्रय शक्ति को कम कर देता है, जिससे अंततः घरेलू मांग प्रभावित हो सकती है। इसके अलावा, वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, जैसे युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला में आने वाली बाधाएं, कच्चे तेल और अन्य आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को अस्थिर कर सकते हैं। कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन और अनियमित मौसम का प्रभाव भी एक बड़ी चिंता का विषय बना रहता है। इसलिए विकास के इस आंकड़े को बनाए रखने के लिए जोखिम प्रबंधन पर विशेष जोर देना होगा।<br><br>निष्कर्ष के तौर पर कहा जा सकता है कि 6.4 प्रतिशत से 7 प्रतिशत तक का यह सफर केवल एक मामूली सा गणितीय बदलाव नहीं है, बल्कि यह एक सशक्त और आत्मनिर्भर राष्ट्र की मजबूत बुनियाद का परिचायक है। सरकार की नीतियां, उद्यमियों का साहस और आम नागरिक की मेहनत मिलकर इस आर्थिक महाकाव्य को लिख रहे हैं। यदि आर्थिक सुधारों की यह प्रक्रिया इसी तरह बिना रुके चलती रही और सामने आने वाली चुनौतियों का कुशलतापूर्वक प्रबंधन किया गया, तो भारत को एक विकसित और समृद्ध अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य को प्राप्त करने से कोई नहीं रोक सकता। अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष का यह अनुमान इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि भारत सही दिशा में आगे बढ़ रहा है और आने वाले दशक पूरी तरह से भारतीय अर्थव्यवस्था के स्वर्णिम काल होने वाले हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 17:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/international-monetary-fund-raises-india-growth-rate</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[चुनाव आयोग के अधिकारियों को नहीं, मतदाता सूची की नीति बदलिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/change-the-policy-on-the-electoral-roll-not-the-election-commission-officials]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>किसी भी लोकतंत्र की मजबूती के लिए पारदर्शी, विश्वसनीय और समावेशी मतदाता सूची जरूरी है। लेकिन भारत के नेताओं और नौकरशाहों के गठजोड़ ने इसे एक हास्यास्पद विषय बना दिया है। यदि प्रत्येक व्यक्ति के जन्मभूमि पर ही मतदाता पहचान पत्र बना दिया जाए, और उसके पलायन के बावजूद उसका स्थाई नंबर नहीं बदलने दिया जाए, तो इससे बहुत सारे गड़बड़ झाले को रोका जा सकता है। इसे आधार कार्ड से लिंक करने पर व्यक्ति की वास्तविक पहचान भी सुनिश्चित होती है। लेकिन हमारी नौकरशाही ऐसा कभी नहीं होने देगी।</p><p>भारत में राजनीतिक कारणों से जितने पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों के मतदाता पहचान पत्र बनाए गए, उसके लिए तत्कालीन बीएलओ, एसडीएम और डीएम के अलावा राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि जिम्मेदार नहीं हैं, तो कौन है? क्या कभी इस लापरवाही की जिम्मेदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई? इनकी जमीनी लापरवाहियों या राजनीतिक पक्षपात के लिए इन्हें कड़ी सजा मिलनी चाहिए, न कि राज्य के मुख्य चुनाव आयुक्त और केंद्रीय मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ अनर्गल आरोप लगाए जाने चाहिए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/immunity-shielding-cec-from-litigation-is-now-under-supreme-court-scrutiny-what-is-section-16" target="_blank" rel="noopener">सुप्रीम कटघरे में अब CEC को मुकदमों से बचाने वाला 'अभयदान', क्या है धारा-16 का 'कवच' जिस पर SC करेगा सुनवाई?</a></p><p>एडॉल्फ हिटलर ने कहा था कि यदि तुम एक झूठ को सौ बार दोहराओगे तो वह लोगों को सच लगने लगेगा। जिन नेताओं ने अल्पसंख्यकों की आड़ में, झुग्गी-झोपड़ियों की आड़ में गलत मतदाता पहचान पत्र बनवा लिए, जब एसआईआर में ये पकड़ में आने लगे तो विपक्ष का बेचैन होना स्वाभाविक है। चाहे कांग्रेस हो भाजपा हो या क्षेत्रीय दल, अब इस खेल में सभी पारंगत दिख रहे हैं। यदि नौकरशाही तभी इस खेल को पकड़ लेती तो आज चुनाव आयोग को इतनी कड़ी मशक्कत नहीं करनी पड़ती। इस पूरे खेल में ग्राम पंचायत, नगर पंचायत, नगरपालिका, नगर निगम, विधानसभा और लोकसभा की मतदाता सूची में जो गड़बड़झाला है, उसे भी यदि समय रहते नहीं रोका गया, तो मतदाताओं को न्याय मिल पाएगा, इस बात की कोई गारंटी नहीं है। क्योंकि हर चुनाव में मतदाता सूची बदल जाना राजनीतिक व प्रशासनिक खेल नहीं तो क्या है? हर चुनाव के वक्त कुछ ऐसे वास्तविक लोग मिल जाएंगे, जिनके नाम ही मतदाता सूची से गायब मिलेंगे। आखिर इस लापरवाही के लिए सरकारी अधिकारियों की जिम्मेदारी कौन सुनिश्चित करेगा।</p><p>इस बात में कोई दो राय नहीं कि लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति मतदाता के मताधिकार में निहित है। यह अधिकार तभी सार्थक है, जब प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम मतदाता सूची में दर्ज हो और कोई अपात्र व्यक्ति गलत तरीके से उसमें शामिल न रहे। इसलिए मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने और उसकी शुद्धता सुनिश्चित करने की प्रक्रिया लोकतांत्रिक व्यवस्था का अत्यंत महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि कोई अधिकारी इसमें लापरवाही बरतता पाया जाता है तो उसके लिए भी सख्त सजा का प्रावधान हो।</p><p>जब भी मतदाता सूची में गड़बड़ियों, नाम कटने, दोहरी प्रविष्टियों अथवा पात्र मतदाताओं के छूट जाने की शिकायतें सामने आती हैं, तो चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका पर सवाल उठने लगते हैं। लेकिन क्या हर समस्या के लिए मैदानी स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों व राजनीतिक कार्यकर्ताओं को जिम्मेदार ठहराना उचित है? या हमें उन नीतियों, नियमों और प्रक्रियाओं की समीक्षा करनी चाहिए, जिनके तहत मतदाता सूची तैयार की जाती है? नए मतदाताओं के नाम जोड़ना और मृतकों के नाम डिलीट करना चुनाव आयोग की वार्षिक जिम्मेदारी है। इस हेतु हर वर्ष अभियान चलाया जाता है।</p><p>सवाल है कि अधिकारियों की जवाबदेही के साथ नीतिगत सुधार भी जरूरी है। इसके लिए संसद को भी सचेष्ट होना पड़ेगा। मतदाता सूची तैयार करने का काम व्यापक और संवेदनशील है। इसमें करोड़ों नागरिकों के विवरण का सत्यापन, नए मतदाताओं का पंजीकरण, मृत व्यक्तियों के नाम हटाना, स्थानांतरित नागरिकों के विवरण का अद्यतन और दोहरी प्रविष्टियों की पहचान जैसे अनेक कार्य शामिल होते हैं।</p><p>यदि इन प्रक्रियाओं में त्रुटियां होती हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। जानबूझकर लापरवाही, पक्षपात या नियमों के उल्लंघन के प्रमाण मिलने पर संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। लेकिन प्रत्येक प्रशासनिक त्रुटि को केवल कर्मचारियों की विफलता मान लेना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।</p><p>यह भी देखना होगा कि निर्धारित समयसीमा व्यावहारिक है या नहीं, उपलब्ध संसाधन पर्याप्त हैं या नहीं, सत्यापन की प्रक्रिया कितनी सरल है और नागरिकों को अपनी शिकायतों के समाधान के लिए कितनी आसानी से अवसर मिलता है।</p><p>सवाल है कि मतदाता सूची की नीति में किन बदलावों की जरूरत है?</p><p>पहला, प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम जोड़ने की प्राथमिकता। मतदाता सूची की शुद्धता का अर्थ केवल गलत नाम हटाना नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को सूची में शामिल करना भी है। किसी पात्र मतदाता का नाम हटने या दर्ज न होने से उसके मताधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए नाम हटाने की प्रक्रिया में उचित सूचना, सत्यापन और अपना पक्ष रखने का अवसर सुनिश्चित किया जाना चाहिए।</p><p>दूसरा, नाम काटने की प्रक्रिया पारदर्शी हो। किसी मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए स्पष्ट नियम, सत्यापन योग्य आधार और निर्धारित प्रक्रिया होनी चाहिए। नागरिक को, जहां नियमों के तहत आवश्यक हो, प्रस्तावित कार्रवाई की सूचना और आपत्ति दर्ज कराने का अवसर मिलना चाहिए। केवल तकनीकी रिकॉर्ड या अपूर्ण जानकारी के आधार पर किसी पात्र मतदाता का अधिकार प्रभावित नहीं होना चाहिए।</p><p>तीसरा, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के मामलों में सावधानी जरूरी है। मृत व्यक्तियों के नाम हटाना और स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं के रिकॉर्ड को अद्यतन करना आवश्यक है। लेकिन एक ही नाम, समान आयु या मिलते-जुलते पते के आधार पर किसी व्यक्ति को गलत तरीके से सूची से बाहर नहीं किया जाना चाहिए। पहचान और निवास के सत्यापन के लिए विश्वसनीय प्रक्रिया जरूरी है।</p><p>चौथा, तकनीक का उपयोग हो, लेकिन मानवीय सत्यापन के साथ जरूरी है। डिजिटल डेटाबेस, ऑनलाइन आवेदन और स्वचालित प्रणाली मतदाता सूची को बेहतर बनाने में सहायक हो सकते हैं। हालांकि, तकनीकी गड़बड़ी, डेटा में विसंगति या गलत मिलान की स्थिति में मानवीय समीक्षा और सुधार का अवसर उपलब्ध होना चाहिए। तकनीक नागरिकों की सुविधा बढ़ाए, उनके अधिकारों में बाधा न बने।</p><p>पांचवां, शिकायत निवारण की प्रभावी व्यवस्था सुनिश्चित हो। नाम जुड़वाने, संशोधन कराने या गलत तरीके से नाम हटाए जाने की शिकायतों के लिए सरल और समयबद्ध व्यवस्था होनी चाहिए। नागरिकों को आवेदन की स्थिति जानने, निर्णय का कारण समझने और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपील करने की सुविधा मिलनी चाहिए।</p><p>छठा, अधिकारियों को पर्याप्त संसाधन और प्रशिक्षण मिलना चाहिए। मतदाता सूची तैयार करने वाले कर्मचारियों पर यदि सीमित समय में अत्यधिक काम का दबाव है, तो त्रुटियों की आशंका बढ़ सकती है। इसलिए पर्याप्त कर्मचारी, व्यावहारिक समयसीमा, स्पष्ट दिशा-निर्देश और उचित प्रशिक्षण भी नीतिगत सुधार का हिस्सा होने चाहिए।</p><p>सबसे बड़ी बात यह कि राजनीतिक विवाद से ऊपर उठकर &nbsp;समीक्षा हो। मतदाता सूची का मुद्दा अक्सर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का विषय बन जाता है। एक पक्ष नामों को हटाए जाने पर सवाल उठाता है, तो दूसरा पक्ष सूची की शुद्धता और दोहरी प्रविष्टियों को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर देता है।</p><p>इन दोनों चिंताओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है। न तो हर नाम हटाए जाने को गलत मानना उचित है और न ही प्रत्येक कार्रवाई को स्वतः सही मान लेना। महत्वपूर्ण यह है कि हर निर्णय के पीछे स्पष्ट आधार हो, नियम सभी पर समान रूप से लागू हों और शिकायतों का समाधान प्रमाणों के आधार पर किया जाए। मतदाता सूची की विश्वसनीयता केवल चुनाव आयोग की प्रतिष्ठा का प्रश्न नहीं है। यह नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया पर जनता के भरोसे से जुड़ा विषय है।</p><p>सवाल है कि अब आगे का रास्ता क्या है? तो जवाब यही होगा कि मतदाता सूची की नीति की नियमित समीक्षा की जानी चाहिए। इसमें राजनीतिक दलों, नागरिक समाज, चुनाव संबंधी विशेषज्ञों और आम मतदाताओं से सुझाव लिए जा सकते हैं। नाम जोड़ने और हटाने के आंकड़े, शिकायतों की स्थिति तथा उनके निस्तारण की जानकारी उचित गोपनीयता और कानूनी सीमाओं के भीतर सार्वजनिक की जानी चाहिए।</p><p>साथ ही, मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अनावश्यक प्रशासनिक बाधाओं के कारण अपने मताधिकार से वंचित न हो और सूची की शुद्धता भी बनी रहे। यदि किसी के पास वैध मतदाता पहचान पत्र है, लेकिन मतदाता सूची से उनका नाम नदारत है तो ऐसे व्यक्तियों को वोट डालने का अधिकार मिलना चाहिए।</p><p>वस्तुतः चुनाव आयोग के अधिकारियों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन जवाबदेही का अर्थ केवल दोष तय करना नहीं, बल्कि व्यवस्था की कमियों को दूर करना भी है। यदि नियम जटिल हैं, प्रक्रियाएं अस्पष्ट हैं या संसाधन अपर्याप्त हैं, तो केवल अधिकारियों को बदलने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। लोकतंत्र को मजबूत बनाने के लिए ऐसी मतदाता सूची चाहिए, जिसमें प्रत्येक पात्र नागरिक का नाम हो, प्रत्येक गलत प्रविष्टि को निष्पक्ष प्रक्रिया से सुधारा जाए और किसी का मताधिकार मनमाने ढंग से प्रभावित न हो।</p><p>इसलिए मूल प्रश्न यही है—क्या हम हर विवाद के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई तक सीमित रहेंगे, या ऐसी पारदर्शी, जवाबदेह और नागरिक-अनुकूल नीति बनाएंगे, जिससे गलतियों की संभावना ही कम हो जाए? मतदाता सूची की नीति में सुधार लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।</p><p>- कमलेश पांडेय<br>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 16:33:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/change-the-policy-on-the-electoral-roll-not-the-election-commission-officials</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अपनी ही पार्टी की मध्य प्रदेश सरकार के खिलाफ Shivraj Singh Chouhan ने क्यों खोला मोर्चा? Madhya Pradesh BJP में सब ठीक है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/shivraj-singh-chouhan-mohan-yadav-mp-bjp-tribal-demolition-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>विपक्षी नेता किसी सरकार पर हमला बोलें तो समझ आता है, लेकिन मध्य प्रदेश में तो राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी ही पार्टी की सरकार के मुख्यमंत्री मोहन यादव को घेरकर पूरी भाजपा को सकते में डाल दिया है। हम आपको बता दें कि आदिवासियों के घरों पर बुलडोजर चलाए जाने के मुद्दे पर शिवराज की नाराजगी ने मध्य प्रदेश की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है। सवाल सिर्फ आदिवासी परिवारों के घरों को तोड़े जाने का नहीं है, बल्कि यह भी है कि क्या भारतीय जनता पार्टी के भीतर सत्ता और नेतृत्व को लेकर कोई ऐसी खींचतान चल रही है, जिसकी झलक अब सार्वजनिक रूप से दिखाई देने लगी है? मुख्यमंत्री मोहन यादव और शिवराज सिंह चौहान के बीच कथित मतभेदों की चर्चाओं के बीच इस घटनाक्रम के राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं।</p><p>हम आपको बता दें कि मामला सीहोर जिले के कोसमी गांव का है, जहां 11 अक्टूबर को वन विभाग और वन विकास निगम की कार्रवाई में बारेला आदिवासी समुदाय के 12 परिवारों के घर तोड़े जाने की खबर सामने आई। आरोप है कि इस कार्रवाई में खेतों में खड़ी मक्का और अरहर की फसलें भी नष्ट हुईं और पानी के लिए इस्तेमाल होने वाले कुएं को मिट्टी से भर दिया गया। अधिकारियों की दलील वन भूमि पर कथित अतिक्रमण हटाने की है, लेकिन कार्रवाई के तरीके ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/shivraj-singh-chouhan-slams-congress-for-spreading-anarchy-to-gain-power" target="_blank" rel="noopener">Rahul Gandhi के आरोपों पर Shivraj का पलटवार, अराजकता से सत्ता पाना चाहती है Congress</a></p><p>शिवराज सिंह चौहान को इसकी जानकारी मिली तो वह सीधे गांव पहुंच गए। पीड़ित परिवारों से मुलाकात की, उनके साथ धरने पर बैठे और मौके से ही मुख्य सचिव अशोक वर्णवाल तथा भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल से बात की। शिवराज ने प्रभावित परिवारों को नए मकान बनवाने और तब तक रहने-खाने की व्यवस्था कराने का भरोसा दिया। उन्होंने अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि गरीब आदिवासियों के साथ हुआ अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।</p><p>लेकिन शिवराज के बयान का सबसे अहम हिस्सा वह था, जिसमें उन्होंने सवाल उठाया कि जिन लोगों के वोट से भाजपा को जीत मिलती है, उन्हीं के घर क्यों उजाड़े जा रहे हैं? उन्होंने यह आशंका भी जताई कि कुछ अधिकारी मुख्यमंत्री मोहन यादव की छवि खराब करने की साजिश कर रहे हो सकते हैं। यानी शिवराज ने एक तरफ मुख्यमंत्री के प्रति अपनी चिंता जताई, तो दूसरी तरफ उनके अधीन काम करने वाले प्रशासनिक तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया।</p><p>सवाल उठता है कि क्या यह शिवराज बनाम मोहन यादव की लड़ाई है? देखा जाये तो राजनीतिक गलियारों में इस घटनाक्रम को सिर्फ प्रशासनिक कार्रवाई के विरोध तक सीमित करके नहीं देखा जा रहा है। दिसंबर 2023 में शिवराज सिंह चौहान की जगह मोहन यादव को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद से ही दोनों नेताओं की राजनीतिक भूमिका और उनके बीच संबंधों को लेकर समय-समय पर चर्चाएं होती रही हैं। शिवराज लंबे समय तक राज्य के मुख्यमंत्री रहे हैं और बुधनी उनकी पुरानी राजनीतिक कर्मभूमि रही है। ऐसे क्षेत्र में आदिवासी परिवारों के घर उजड़ना और फिर उनका खुद मौके पर पहुंचकर प्रशासन के खिलाफ खड़ा होना, उनकी स्थानीय राजनीतिक पकड़ और जननेता की छवि से भी जुड़ा है। ऐसे में उनकी प्रतिक्रिया को जनहित की चिंता और अपने राजनीतिक प्रभाव को बनाए रखने, दोनों संभावित संदर्भों में भी देखा जा सकता है।</p><p>उधर, कांग्रेस ने इस प्रकरण को भाजपा के अंदरूनी मतभेदों से जोड़ते हुए मुख्यमंत्री पर निशाना साधा है। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने आरोप लगाया कि भाजपा की अंदरूनी खींचतान का खामियाजा आदिवासी परिवारों को भुगतना पड़ रहा है। हालांकि, भाजपा के लिए असली चुनौती विपक्ष के आरोपों से ज्यादा इस सवाल का जवाब देना है कि कथित अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई में प्रभावित परिवारों के पुनर्वास, आजीविका और बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखा गया या नहीं। अगर केंद्रीय मंत्री को अपनी ही राज्य सरकार के अधिकारियों के खिलाफ सार्वजनिक रूप से हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तो प्रशासनिक समन्वय और जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है।</p><p>वैसे यह पहली बार नहीं है जब शिवराज ने मध्य प्रदेश सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हों। उन्होंने पहले भी आदिवासियों से जुड़े मामलों और मूंग की खरीद के मुद्दे पर हस्तक्षेप किया था। अब निगाहें मुख्यमंत्री मोहन यादव की प्रतिक्रिया और प्रभावित परिवारों को मिलने वाली राहत पर हैं। शिवराज का कहना है कि वह मुख्यमंत्री के सामने पूरा मामला उठाएंगे। यदि दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और परिवारों का पुनर्वास सुनिश्चित किया जाता है, तो विवाद का प्रशासनिक समाधान निकल सकता है। लेकिन यदि मामला लंबा खिंचता है, तो भाजपा के भीतर समन्वय और नेतृत्व की कार्यशैली पर बहस और तेज हो सकती है। बहरहाल, कोसमी की घटना को शिवराज और मोहन यादव के बीच टकराव कहना जल्दबाजी होगी। लेकिन इतना स्पष्ट है कि केंद्रीय मंत्री का सार्वजनिक विरोध राज्य सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा करता है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 16:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/shivraj-singh-chouhan-mohan-yadav-mp-bjp-tribal-demolition-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jio IPO को नुकसान पहुँचाने के लिए Elon Musk ने चला बड़ा दाँव, Mukesh Ambani का पलटवार Starlink को पड़ सकता है भारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/musk-vows-affordable-starlink-india-days-before-ambanis-record-jio-ipo]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का दुस्साहस बढ़ता ही चला जा रहा है। भारतीय उद्योगपति और रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी पर सोशल मीडिया के जरिये निशाना साधने के बाद अब जियो के प्रस्तावित आईपीओ से ठीक पहले एलन मस्क ने तीखे बयान दिये हैं। जिन्हें भारतीय बाजार में अपनी एंट्री के लिए दबाव बनाने और रिलायंस के खिलाफ माहौल तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। गौरतलब है कि एलन मस्क ने आरोप लगाया है कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित उनकी कंपनी स्टारलिंक का रास्ता रोक रहे हैं। साथ ही, उन्होंने भारत में सस्ती सैटेलाइट इंटरनेट सेवा देने का वादा किया है। हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड बताते हैं कि जियो और भारती समर्थित वनवेब भी जरूरी मंजूरियों के लिए लंबे समय से इंतजार कर रहे हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या मस्क के आरोप तथ्यों पर आधारित हैं या जियो के आईपीओ से पहले प्रतिस्पर्धा को लेकर एकतरफा नैरेटिव बनाने की कोशिश की जा रही है?</p><p>उल्लेखनीय है कि मस्क ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर दावा किया कि भारत में कुछ प्रभावशाली कारोबारी हित स्टारलिंक की एंट्री रोककर अपने एकाधिकार को बचाना चाहते हैं। उन्होंने अंबानी पर भी निशाना साधते हुए प्रतिस्पर्धा की अनुमति देने की बात कही। साथ ही वादा किया कि भारत में स्टारलिंक की सेवा सस्ती रखी जाएगी, क्योंकि महंगी सेवा होने पर ग्राहक उसे नहीं अपनाएंगे। मस्क का तर्क है कि प्रतिस्पर्धा से भारतीय उपभोक्ताओं को अधिक विकल्प मिलेंगे, भले ही इससे अंबानी के मुनाफे पर दबाव पड़े।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/regarding-the-elon-musk-episode-rahul-should-not-become-a-mouthpiece-for-foreign-voices" target="_blank" rel="noopener">एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी</a></p><p>लेकिन सवाल यह है कि क्या भारत में स्टारलिंक की व्यावसायिक शुरुआत में देरी के लिए वास्तव में जियो या अंबानी जिम्मेदार हैं? दूरसंचार विभाग (DoT) के रिकॉर्ड पर आधारित रिपोर्ट इस दावे की दूसरी तस्वीर पेश करती है। रिपोर्ट के मुताबिक, जियो सैटेलाइट कम्युनिकेशंस और भारती समर्थित वनवेब ने स्टारलिंक से पहले अपनी सुरक्षा और तकनीकी अनुपालन संबंधी प्रक्रियाएं पूरी कर ली थीं। जियो ने 20 मार्च 2025 को अपना सुरक्षा एवं तकनीकी प्रदर्शन पूरा किया, जबकि वनवेब ने 2025 की दूसरी छमाही में यह प्रक्रिया पूरी की। स्टारलिंक का प्रदर्शन 2026 की शुरुआत में हुआ। ऐसे में यह कहना कि केवल भारतीय प्रतिस्पर्धियों के प्रभाव के कारण स्टारलिंक को रोका जा रहा है, यह सरासर गलत है।</p><p>देखा जाये तो लाइसेंस और मंजूरी की समयरेखा भी इस बहस को समझने में मदद करती है। वनवेब को अगस्त 2021 में दूरसंचार विभाग से आशय-पत्र मिला और अप्रैल 2022 में उसे जीएमपीसीएस लाइसेंस मिला। जियो ने नवंबर 2021 में लाइसेंस के लिए आवेदन किया और अक्टूबर 2022 में प्राधिकरण हासिल किया। इसके विपरीत, स्टारलिंक को जीएमपीसीएस लाइसेंस 6 जून 2025 को मिला। यानी भारतीय कंपनियां इस प्रक्रिया में पहले से मौजूद थीं, फिर भी उनकी सेवाएं व्यावसायिक रूप से शुरू नहीं हो सकी हैं। तीनों कंपनियों को अंतिम सुरक्षा मंजूरी और स्पेक्ट्रम आवंटन की प्रतीक्षा है। यदि जियो और वनवेब को बाजार में स्टारलिंक को रोकने के लिए विशेष सुविधा मिल रही होती, तो सवाल उठाए जा सकते थे।</p><p>इसके अलावा, सैटेलाइट इंटरनेट का मामला सामान्य दूरसंचार सेवा से अलग है। इसके नेटवर्क की पहुंच सीमाओं से परे हो सकती है, इसलिए नेटवर्क की निगरानी, वैध अवरोधन और भारतीय कानूनों के अनुपालन जैसे विषय महत्वपूर्ण हैं। सुरक्षा संबंधी शर्तें पूरी होने के बाद ही स्पेक्ट्रम आवंटन और व्यावसायिक परिचालन का रास्ता साफ हो सकता है। हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने मस्क के भेदभाव के आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि नियामकीय ढांचा निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण है। दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी स्पष्ट किया है कि कंपनियां जरूरी सुरक्षा और नियामकीय शर्तें पूरी करने के बाद ही सेवाएं शुरू कर सकती हैं।</p><p>देखा जाये तो भारत के लिए इस मामले में प्राथमिकता किसी कारोबारी घराने के हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार करना होना चाहिए। स्टारलिंक को भी अन्य कंपनियों की तरह समान नियमों का पालन करना होगा। केवल वैश्विक प्रतिष्ठा, तकनीकी क्षमता या बाजार में निवेश की इच्छा के आधार पर सुरक्षा संबंधी शर्तों में छूट नहीं दी जा सकती।</p><p>अब सवाल उठता है कि जियो के आईपीओ पर कितना असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि जियो प्लेटफॉर्म्स 106 अरब डॉलर के मूल्यांकन को लक्ष्य बनाकर अपना आईपीओ लाने की तैयारी में है। ऐसे समय में मस्क का अंबानी पर सार्वजनिक हमला और सस्ती स्टारलिंक सेवा का वादा बाजार में चर्चा पैदा कर रहा है। लेकिन निवेशकों के लिए एलन मस्क के बयान की बजाय जियो कंपनी की वित्तीय स्थिति, विकास की संभावनाएं, प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति और नियामकीय जोखिम जैसे कई कारक महत्वपूर्ण होंगे। इसी तरह, स्टारलिंक की भारतीय बाजार में वास्तविक चुनौती उसकी कीमत, कवरेज, सेवा की गुणवत्ता और आवश्यक मंजूरियां मिलने पर निर्भर करेगी।</p><p>बहरहाल, भारत में कारोबार करने की इच्छा रखने वाली किसी भी विदेशी कंपनी का स्वागत प्रतिस्पर्धा और उपभोक्ता हितों के आधार पर होना चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की शर्तों के साथ। मस्क की बयानबाजी से मंजूरी की प्रक्रिया तेज हो या न हो, उसका फैसला नियमों और तथ्यों के आधार पर ही होना चाहिए। जियो और वनवेब के इंतजार का रिकॉर्ड यह भी बताता है कि मामला केवल स्टारलिंक बनाम अंबानी का नहीं, बल्कि भारत में सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं के लिए सुरक्षा, नियमन और समान अवसर सुनिश्चित करने का है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 14:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/musk-vows-affordable-starlink-india-days-before-ambanis-record-jio-ipo</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[उच्च शिक्षा का दशक और गुणवत्ता की परीक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-decade-of-higher-education-and-the-test-of-quality]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>समावेशी विकास के हिमायती अर्थशास्त्री मानव पूंजी सिद्धांत के तहत शिक्षा को महज सामाजिक कल्याण या व्यक्तिगत उन्नति का माध्यम नहीं, बल्कि उत्पादकता, नवाचार और दीर्घकालिक आर्थिक विकास की बुनियादी पूंजी के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से कह सकते हैं कि किसी देश की युवा आबादी अपने आप में विकास की गारंटी नहीं होती। उसकी वास्तविक आर्थिक और सामाजिक क्षमता इस बात से निर्धारित होती है कि उसे उपलब्ध शिक्षा ज्ञान, कौशल और निर्णय क्षमता में कितना रूपांतरित कर पाती है। भारत आज इसी द्वंद्व के बीच खड़ा है। एक ओर विशाल युवा आबादी जनसांख्यिकीय लाभांश की संभावना प्रस्तुत करती है, दूसरी ओर कृत्रिम बुद्धिमत्ता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक श्रम बाजार में आते बदलाव मानव पूंजी निर्माण की पारंपरिक धारणाओं को चुनौती दे रहे हैं।</p><p>ह्यूमनिटीज एंड सोशल साइंसेज कम्युनिकेशंस में 2025 में प्रकाशित एक अध्ययन ने भी रेखांकित किया कि भारत में जनसांख्यिकीय बदलाव का आर्थिक लाभ अनुकूल नीतिगत वातावरण, बेहतर स्वास्थ्य, सम्मानजनक रोजगार और लैंगिक सशक्तीकरण पर निर्भर करता है। इसलिए पिछले एक दशक में उच्च शिक्षा के विस्तार और सुधारों का मूल्यांकन केवल संस्थानों तथा नामांकन की बढ़ती संख्या से नहीं, बल्कि इस कसौटी पर किया जाना चाहिए कि भारत अपनी युवा आबादी को ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था की सक्षम मानवीय शक्ति में कितना बदल पाया है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/gen-z-revolt-is-the-same-thing-happening-in-the-country-of-modis-friend-as-what-happened-in-india" target="_blank" rel="noopener">Gen Z Revolt: मोदी के दोस्त के देश में भी वही हो रहा,जो भारत में हुआ था? भयंकर साज़िश का पर्दाफ़ाश!</a></p><p>इस दशक में भारतीय उच्च शिक्षा का सामाजिक आधार उल्लेखनीय रूप से विस्तृत हुआ है। अखिल भारतीय उच्च शिक्षा सर्वेक्षण के अनुसार, कुल नामांकन 2014 से 15 के लगभग 3.42 करोड़ से बढ़कर 2023 से 24 में करीब 4.50 करोड़ हो गया। महिलाओं के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के विद्यार्थियों की भागीदारी भी बढ़ी है, जो उच्च शिक्षा के व्यापक सामाजिक विस्तार का संकेत है। हालांकि, नामांकन वृद्धि अपने आप में पर्याप्त नहीं है। वास्तविक लोकतंत्रीकरण के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, पर्याप्त संसाधन और रोजगारपरक अवसरों तक समान पहुंच जरूरी है। महानगरों और छोटे शहरों के संस्थानों के बीच गुणवत्ता का अंतर अब प्रमुख चुनौती है।</p><p>राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने उच्च शिक्षा सुधार के लिए व्यापक वैचारिक ढांचा प्रस्तुत किया। बहुविषयक अध्ययन, लचीली पाठ्यचर्या, शोध उन्मुख शिक्षा, कौशल विकास और अकादमिक क्रेडिट की हस्तांतरणीयता इसके प्रमुख प्रावधान हैं। अकादमिक बैंक ऑफ क्रेडिट विद्यार्थियों को शैक्षणिक यात्रा में अधिक लचीलापन देता है, जबकि समर्थ जैसे डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रवेश, परीक्षा और प्रशासनिक प्रक्रियाओं को व्यवस्थित करने की क्षमता रखते हैं। इन पहलों का महत्व संस्थागत विस्तार से आगे बढ़कर सीखने की गुणवत्ता, शैक्षणिक गतिशीलता और प्रशासनिक दक्षता बढ़ाने में है।</p><p>फिर भी नीतिगत महत्वाकांक्षा और संस्थागत वास्तविकता के बीच की दूरी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। बहुविषयक शिक्षा के लिए विभिन्न विषयों के सक्षम विभाग, प्रशिक्षित शिक्षक और पर्याप्त अकादमिक संसाधन चाहिए। शोध आधारित शिक्षा के लिए प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, शोध अनुदान और मार्गदर्शन की व्यवस्था आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म प्रशासनिक प्रक्रियाओं को सरल बना सकते हैं, लेकिन वे कमजोर शिक्षण व्यवस्था की भरपाई नहीं कर सकते। इसलिए राष्ट्रीय शिक्षा नीति का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके प्रावधानों ने कक्षाओं में शिक्षण, विद्यार्थियों के सीखने के स्तर और विश्वविद्यालयों की अकादमिक संस्कृति में कितना बदलाव पैदा किया है।</p><p>उच्च शिक्षा सुधार की केंद्रीय कसौटी शिक्षक व्यवस्था और शोध क्षमता है। शिक्षक केवल पाठ्यक्रम पूरा करने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि ज्ञान सृजन, आलोचनात्मक विवेक और बौद्धिक स्वतंत्रता के वाहक हैं। अनेक संस्थानों में रिक्त पदों, संविदा नियुक्तियों और गैर शैक्षणिक दायित्वों का दबाव शिक्षण, शोध निर्देशन और विद्यार्थियों से संवाद को प्रभावित करता है। इसलिए पारदर्शी नियुक्ति, अकादमिक स्वतंत्रता और निरंतर प्रशिक्षण को दीर्घकालिक निवेश के रूप में देखना आवश्यक है।</p><p>गौरतलब है कि विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता शोध और नवाचार में उनके योगदान से भी निर्धारित होती है। भारत ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी में उल्लेखनीय प्रगति की है, लेकिन व्यापक विश्वविद्यालय व्यवस्था में शोध संस्कृति को और मजबूत करने की आवश्यकता है। कृषि, जलवायु परिवर्तन, सार्वजनिक स्वास्थ्य, शहरीकरण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसे क्षेत्र भारतीय संदर्भ में महत्वपूर्ण शोध अवसर प्रस्तुत करते हैं। इसके लिए शोध वित्तपोषण बढ़ाने, उद्योग और अकादमिक संस्थानों के सहयोग तथा युवा शोधकर्ताओं को स्वतंत्र अवसर देने की जरूरत है। विश्वविद्यालयों को ज्ञान के उपभोक्ता नहीं, बल्कि उसके उत्पादक केंद्र बनाना होगा।</p><p>इसी तरह रोजगार और उच्च शिक्षा के संबंध को भी अधिक सूक्ष्मता से समझने की जरूरत है। डिग्री और रोजगार के बीच बढ़ती दूरी पाठ्यक्रमों की प्रासंगिकता, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्योग की बदलती मांगों पर प्रश्न उठाती है। तकनीकी दक्षता, डिजिटल साक्षरता, संचार क्षमता और समस्या समाधान जैसे कौशल अब अनेक क्षेत्रों में आवश्यक हो गए हैं। फिर भी, रोजगारोन्मुखी शिक्षा का अर्थ विश्वविद्यालयों को उद्योग की तात्कालिक जरूरतों के अधीन कर देना नहीं है। मानविकी और सामाजिक विज्ञान विषय विद्यार्थियों में ऐतिहासिक चेतना, नैतिक विवेक, लोकतांत्रिक समझ और समाज के जटिल प्रश्नों का विश्लेषण करने की क्षमता विकसित करते हैं। एक सक्षम उच्च शिक्षा व्यवस्था को आर्थिक उपयोगिता और बौद्धिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन कायम करना होगा। उसका उद्देश्य केवल रोजगार पाने योग्य व्यक्ति तैयार करना नहीं, बल्कि ज्ञानवान, विवेकशील और उत्तरदायी नागरिक बनाना भी है।</p><p>हाल में बिहार में 211 नए सरकारी डिग्री कॉलेजों की शुरुआत, 2,451 संविदा सहायक प्राध्यापकों की नियुक्ति तथा विश्वविद्यालयों में प्रशासनिक और डिजिटल सुधारों की पहल इसी राष्ट्रीय चुनौती का एक प्रासंगिक उदाहरण है। इन प्रयासों से उच्च शिक्षा की भौगोलिक पहुंच और संस्थागत क्षमता बढ़ाने की संभावना बनती है। लेकिन इनकी दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि कॉलेजों में नियमित शिक्षण, पर्याप्त संसाधन, अकादमिक नेतृत्व और गुणवत्तापूर्ण अध्ययन का वातावरण कितना विकसित होता है। बिहार का अनुभव इस व्यापक तथ्य को रेखांकित करता है कि संस्थानों की संख्या बढ़ाना सुधार का प्रारंभिक चरण है, उसकी परिणति गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में ही हो सकती है।</p><p>ये पूरा दशक भारतीय उच्च शिक्षा में विस्तार और संस्थागत परिवर्तन का दौर रहा है, लेकिन अगली चुनौती कहीं अधिक जटिल है। बढ़ता नामांकन, महिलाओं और वंचित समूहों की भागीदारी तथा डिजिटल प्रशासन सकारात्मक आधार तैयार करते हैं, पर गुणवत्ता, शिक्षक उपलब्धता, शोध क्षमता और रोजगारपरकता की चुनौतियां अभी बनी हुई हैं। इसलिए उच्च शिक्षा नीति का केंद्र अब मात्र विस्तार नहीं, बल्कि गुणवत्तापूर्ण और समान अवसरों का निर्माण होना चाहिए। भारत की युवा आबादी तभी वास्तविक जनसांख्यिकीय लाभांश में बदल सकती है, जब शिक्षा उसे ज्ञान, कौशल और नवाचार की क्षमता प्रदान करे। आने वाले दशक की अग्निपरीक्षा इसी रूपांतरण में निहित है।</p><p>- संजीव कुमार मिश्र</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 14:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-decade-of-higher-education-and-the-test-of-quality</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[शक्ति की आराधना: मंत्रों से अधिक भावना का महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/worship-of-shakti-importance-of-feelings-more-than-mantras]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारतवर्ष पर्वों और उत्सवों की पावन भूमि है। यहाँ मनाए जाने वाले सभी त्योहारों का अपना एक विशेष आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। इन सभी पर्वों में शारदीय नवरात्र का स्थान अत्यंत विशिष्ट और पवित्र माना गया है। नव का अर्थ है 9 और रात्रि का अर्थ है रातों का समूह। यह 9 रातों और 10 दिनों का एक ऐसा पावन समय है जब संपूर्ण ब्रह्मांड में आदि शक्ति माँ भगवती की विशेष कृपा बरसती है। नवरात्र केवल एक साधारण व्रत या उत्सव मात्र नहीं है, बल्कि यह मानव मन और आत्मा की शुद्धि तथा दैवीय शक्ति के संचय का एक अत्यंत दुर्लभ अवसर है। यह समय हमें हमारी आंतरिक ऊर्जा को जागृत करने और जीवन में व्याप्त अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर ले जाने का मार्ग प्रशस्त करता है।<br><br>शारदीय नवरात्र का आगमन वर्षा ऋतु के समापन और शीत ऋतु के आरंभ के समय होता है। प्रकृति भी इस समय एक नए रूप में सजती है और संपूर्ण वातावरण में एक नई ताजगी तथा पवित्रता का वास होता है। इन 9 रातों में माँ दुर्गा के 9 अलग अलग स्वरूपों की उपासना की जाती है। प्रत्येक स्वरूप का अपना एक विशेष संदेश और महत्व है। माता के यह रूप हमें जीवन के विभिन्न चरणों और संघर्षों में साहस, धैर्य, करुणा और विजय की प्रेरणा देते हैं। शक्ति की उपासना का यह पर्व हमें यह सिखाता है कि सत्य और धर्म की रक्षा के लिए शक्ति का होना अत्यंत आवश्यक है। बिना शक्ति के शांति और प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। यह शक्ति केवल शारीरिक नहीं है, बल्कि मानसिक और आत्मिक भी है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/shardiya-navratri-2026-complete-puja-samagri-list-and-ghatasthapana-vidhi" target="_blank" rel="noopener">Shardiya Navratri 2026: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि की शुरुआत, घटस्थापना और पूजा सामग्री की पूरी लिस्ट</a><br><br>अखबार हिन्दी मिलाप में प्रकाशित आराम से नामक स्तंभ में दी गई पूजन विधि के अनुसार, नवरात्र की उपासना अत्यंत सरल, क्रमबद्ध और भावपूर्ण है। किसी भी शुभ और मांगलिक कार्य का आरंभ सदैव विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश के पूजन से ही होता है। नवरात्र की उपासना में भी सबसे पहले भगवान गजानन का स्मरण और पूजन करना अनिवार्य माना गया है। साधक अपने हाथ में पवित्र जल, अक्षत अर्थात बिना टूटे हुए चावल, और पुष्प लेकर संकल्प करता है। संकल्प एक प्रकार की दृढ़ प्रतिज्ञा है। साधक माता से प्रार्थना करता है कि हे जगदम्बे, मैं इस पवित्र पूजन और व्रत के माध्यम से अपने संकल्प को पूर्ण करने के लिए आपका हृदय से आह्वान करता हूँ। संकल्प के पश्चात जल, अक्षत और कुमकुम से विधि विधान के साथ पूजन की शुरुआत होती है।<br><br>पूजन के मुख्य क्रम में सबसे पहला चरण माता का आह्वान और ध्यान है। साधक अपनी आँखें बंद करके माँ भगवती के उस दिव्य और भव्य स्वरूप का ध्यान करता है, जब भगवान विष्णु योगनिद्रा में लीन थे और माता ने प्रकट होकर सृष्टि की रक्षा के लिए मधु और कैटभ नामक भयंकर राक्षसों का वध किया था। ध्यान का यह चरण मन को सांसारिक चिंताओं से मुक्त करके पूरी तरह से माता के चरणों में केंद्रित करने का एक माध्यम है। जब मन पूरी तरह से एकाग्र हो जाता है, तब माता की उपस्थिति का अनुभव हृदय में होने लगता है।<br><br>ध्यान के उपरांत माता को स्नान कराने की प्रक्रिया होती है। सर्वप्रथम शुद्ध और पवित्र जल से माता की प्रतिमा या यंत्र को स्नान कराया जाता है। इसके पश्चात पंचामृत से स्नान कराया जाता है। पंचामृत 5 अत्यंत पवित्र वस्तुओं का मिश्रण होता है जिसमें गाय का दूध, दही, घी, शहद और शर्करा मिलाई जाती है। स्नान कराते समय साधक यह भाव रखता है कि हे महादेवी, दूध, दही, घी, शहद और शर्करा के मिश्रण से तैयार यह उत्तम पंचामृत आपकी सेवा में प्रस्तुत है, कृपया इसे स्वीकार करें। पंचामृत स्नान के पश्चात एक बार फिर से शुद्ध जल से स्नान कराया जाता है ताकि माता का श्री विग्रह पूरी तरह से स्वच्छ हो जाए।<br><br>स्नान के बाद माता के श्रृंगार का चरण आता है। माँ भगवती को अत्यंत सुंदर और पवित्र वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। मुख्य वस्त्र के साथ साथ उपवस्त्र भी चढ़ाया जाता है। इसके बाद मस्तक पर चंदन और सिंदूर का तिलक लगाया जाता है जो सौभाग्य और सुहाग का प्रतीक है। माता को ताजे और सुगंधित पुष्पों की माला पहनाई जाती है। वस्त्र अर्पित करते समय साधक कहता है कि हे देवी, नाना प्रकार के सुंदर बेल बूटों और जरी गोटों से सुसज्जित यह अत्यंत उत्तम और मनमोहक वस्त्र मैं आपको समर्पित कर रहा हूँ। श्रृंगार का यह भाव हमें यह सिखाता है कि हम अपने जीवन में भी सुंदरता, पवित्रता और सदगुणों को धारण करें।<br><br>श्रृंगार के पश्चात माता को भोग अर्पित किया जाता है और दीप दर्शन कराया जाता है। माता के समक्ष अत्यंत श्रद्धा के साथ विविध प्रकार के उत्तम नैवेद्य, ऋतु फल, और स्वादिष्ट मिष्ठान्न रखे जाते हैं। इसके बाद सुगंधित धूप और दीप जलाकर माता को दिखाया जाता है। दीप का प्रकाश ज्ञान का प्रतीक है और धूप की सुगंध हमारी प्रार्थनाओं की पवित्रता को दर्शाती है। यह प्रकाश अज्ञानता और बुराई के अंधकार को समाप्त करने का संदेश देता है।<br><br>पूजन के अंतिम चरण में माता की आरती, प्रदक्षिणा और क्षमा प्रार्थना की जाती है। आरती के लिए विशेष रूप से कर्पूर का उपयोग किया जाता है। कर्पूर के साथ भीगे हुए ईंधन को जलाकर उसमें 1, 3, 5, 7 या इससे अधिक संख्या में बत्तियां बनाकर माता की मंगल आरती उतारी जाती है। कर्पूर जलकर पूरी तरह से समाप्त हो जाता है और कोई अवशेष नहीं छोड़ता, जो यह दर्शाता है कि हमारा अहंकार भी माता के समक्ष पूरी तरह से भस्म हो जाना चाहिए। आरती के बाद साधक अपने स्थान पर गोल घूमकर प्रदक्षिणा करता है। अंत में सबसे महत्वपूर्ण भाग होता है क्षमा प्रार्थना। साधक हाथ जोड़कर कहता है कि हे माता, न तो मुझे आपकी भक्ति का कोई गहरा ज्ञान है और न ही मैं पूजा के कठिन मंत्रों को जानता हूँ। मैंने अपनी अल्प बुद्धि और क्षमता के अनुसार जो भी पूजन किया है, आप अपनी उदारता से उसे परिपूर्ण मानकर स्वीकार करें और मेरी सभी भूलों को क्षमा करें।<br><br>नवरात्र पूजन का सबसे मूल और महत्वपूर्ण भाव यही है कि यदि पूजा के दौरान कोई मंत्र भूल भी जाए, या कोई सामग्री छूट भी जाए, तो साधक की भावना और श्रद्धा में कोई कमी नहीं आनी चाहिए। अज्ञानवश या अधिकता में किए गए पूजन से जगदम्बा सर्वकल्याणी महादेवी संतुष्ट ही होती हैं, क्योंकि वे केवल अपने भक्तों का सच्चा भाव देखती हैं। कर्मकांड से अधिक महत्व हृदय की पवित्रता का है।<br><br>यह पावन पर्व हमें एक बहुत ही गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी देता है। यह हमें सिखाता है कि संसार की हर एक स्त्री में देवी का ही वास है। स्त्री का सम्मान करना, उसकी गरिमा की रक्षा करना और उसे समाज में उचित स्थान देना ही देवी की सच्ची आराधना है। जब तक समाज में नारी का सम्मान नहीं होगा, तब तक कोई भी पूजा या व्रत सफल नहीं हो सकता। शक्ति की इस आराधना से ही हमारे व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में फैला हुआ अज्ञानता और बुराइयों का अंधकार दूर होता है।<br><br>यही कारण है कि दीपावली के महापर्व से ठीक पहले आने वाली यह शारदीय नवरात्र, केवल एक उत्सव नहीं है, बल्कि यह दीपावली के प्रकाश पर्व की तैयारी का एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आरंभ है। नवरात्र में हम अपने भीतर शक्ति और पवित्रता का संचय करते हैं, ताकि दीपावली के दिन हम अपने अंतर्मन के दीयों को सत्य और ज्ञान के प्रकाश से पूरी तरह से प्रज्वलित कर सकें। यह संपूर्ण कालखंड हमें अंधकार से प्रकाश की ओर, असत्य से सत्य की ओर और मृत्यु से अमरता की ओर ले जाने का एक दिव्य मार्ग प्रशस्त करता है। माता की यह आराधना हमारे जीवन को सुख, शांति, समृद्धि और अपार सफलता से भर दे, यही इस पर्व की सच्ची सार्थकता है।</p><p>- महेन्द्र तिवारी<br>216 बी, द्वितीय तल, राधिका ज्वेलर्स के पास, गली नंबर-10,&nbsp;<br>साध नगर, पालम कॉलोनी, नई दिल्ली - 110045</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 18:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/worship-of-shakti-importance-of-feelings-more-than-mantras</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[सिनेमा और समाज सेवा का अनूठा संगम थे नाना पाटेकर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nana-patekar-was-a-unique-blend-of-cinema-and-social-service]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारतीय कला जगत ने 8 अक्टूबर 2026 को अपना एक ऐसा अनमोल रत्न खो दिया जिसकी भरपाई करना शायद आने वाले कई दशकों तक संभव नहीं होगा। प्रख्यात अभिनेता नाना पाटेकर का 75 वर्ष की आयु में अचानक हृदय गति रुकने से निधन हो गया। यह दुखद समाचार दावानल की तरह पूरे देश में फैल गया और हर कोई स्तब्ध रह गया। नाना केवल एक साधारण अभिनेता नहीं थे, बल्कि वे एक ऐसी बुलंद आवाज थे जो पर्दे पर आम इंसान की पीड़ा, उसके क्रोध और उसकी लाचारी को बेहद जीवंत रूप में प्रस्तुत करते थे। उनका जाना केवल कला जगत की ही क्षति नहीं है, बल्कि समाज के उस शोषित और वंचित वर्ग की भी बहुत बड़ी क्षति है, जिसके लिए वे हमेशा एक मसीहा बनकर खड़े रहे। उनके निधन से कला, संस्कृति और समाज सेवा के क्षेत्र में जो गहरा सन्नाटा पसरा है, उसे शब्दों में बांधना बेहद कठिन है।</p><p>नाना पाटेकर का जन्म महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले के मुरुड जंजीरा में हुआ था। उनका बचपन बेहद संघर्षपूर्ण और अभावों में बीता था। उन्होंने अपने जीवन के शुरुआती दिनों में ही जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना किया। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक न होने के कारण उन्होंने छोटी उम्र में ही काम करना शुरू कर दिया था। एक समय ऐसा भी था जब वे सड़कों पर पैदल यात्रियों के सड़क पार करने के लिए सफेद पट्टियां रंगने का काम करते थे और उसी से अपनी आजीविका चलाते थे। यह उनके जीवट और अथक परिश्रम का ही परिणाम था कि उन्होंने कभी परिस्थितियों के सामने घुटने नहीं टेके। इस कठोर संघर्ष ने उन्हें जीवन की उन गहराइयों से परिचित कराया, जो बाद में उनके अभिनय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती थीं। उनके भीतर का कलाकार इसी भट्टी में तपकर कुंदन बना था। नाटकों और रंगमंच के प्रति उनका आकर्षण उन्हें धीरे-धीरे अभिनय की दुनिया की ओर ले गया, जहां उन्होंने अपनी एक अलग और अमिट पहचान बनाई।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/bollywood/amitabh-bachchan-pays-emotional-tribute-to-veteran-actor-nana-patekar" target="_blank" rel="noopener">नाना पाटेकर के निधन पर अमिताभ बच्चन ने व्यक्त किया गहरा शोक! कहा- अद्वितीय कलाकार और सच्चे समाजसेवी को नमन</a></p><p>रंगमंच से अपने अभिनय की शुरुआत करने वाले नाना पाटेकर ने जब रूपहले पर्दे पर कदम रखा, तो उन्होंने नायक की उस पारंपरिक छवि को पूरी तरह से तोड़ दिया जो उस समय तक सिनेमा में स्थापित थी। उनकी आंखें बोलती थीं और उनकी आवाज में वह कशिश थी जो दर्शकों को अंत तक बांधे रखती थी। उनका संवाद अदायगी का तरीका इतना स्वाभाविक और तेज होता था कि सामने बैठा दर्शक खुद को उस दृश्य का हिस्सा समझने लगता था। उन्होंने क्रांतिवीर, परिंदा, तिरंगा, खामोशी, प्रहार और नटसम्राट जैसी तमाम बेहतरीन रचनाओं में अपने अभिनय का जो उत्कृष्ट प्रदर्शन किया, वह अभिनय की पाठशाला में हमेशा एक मानक के रूप में पढ़ाया जाएगा। चाहे वह एक भ्रष्ट व्यवस्था से लड़ने वाला आम नागरिक हो, एक सख्त सैन्य अधिकारी हो या फिर एक गूंगे बहरे दंपति का संवेदनशील पिता, हर भूमिका में उन्होंने अपने प्राण फूंक दिए। उनके द्वारा बोले गए संवाद आज भी लोगों की जुबान पर हैं और वे मात्र संवाद न होकर समाज की कुरीतियों पर एक गहरा कटाक्ष प्रतीत होते हैं।</p><p>नाना पाटेकर की एक और बहुत बड़ी विशेषता यह थी कि वे अपनी मातृभाषा मराठी और हिंदी, दोनों ही भाषाओं पर समान अधिकार रखते थे। उन्होंने जितनी सफलता हिंदी सिनेमा में प्राप्त की, उतनी ही ऊंचाई उन्होंने मराठी सिनेमा और रंगमंच में भी हासिल की। उनकी वाणी में एक विशेष प्रकार का ओज था। जब वे अपने संवाद बोलते थे, तो शब्दों के आरोह और अवरोह पर उनका नियंत्रण अद्भुत होता था। उन्होंने कभी भी किसी विदेशी भाषा या पाश्चात्य संस्कृति को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। वे अपनी जड़ों से जुड़े रहे और अपनी भारतीय संस्कृति पर हमेशा गर्व करते रहे। उनकी वेशभूषा, उनके विचार और उनका रहन सहन सब कुछ पूरी तरह से भारतीय था। चकाचौंध के इस दौर में भी उन्होंने अपनी भारतीयता को कभी नहीं छोड़ा।</p><p>अभिनय की दुनिया में सर्वोच्च शिखर पर पहुंचने के बावजूद नाना पाटेकर ने कभी दिखावे की दुनिया को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने हमेशा एक बेहद सादा और संयमित जीवन व्यतीत किया। जब अन्य कलाकार विलासिता पूर्ण जीवन जी रहे थे, तब नाना अपने गांव में खेती कर रहे थे और एक साधारण इंसान की तरह जीवन बिता रहे थे। उनका यही गुण उन्हें अन्य सभी कलाकारों से अलग और श्रेष्ठ बनाता था। वे हमेशा अपनी जड़ों से जुड़े रहे और उन्होंने कभी अपने अतीत को नहीं भुलाया। यह उनकी महानता ही थी कि उन्होंने अपनी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा समाज की भलाई के लिए दान कर दिया।</p><p>विशेषकर महाराष्ट्र के सूखाग्रस्त क्षेत्रों में किसानों की आत्महत्या की घटनाओं ने उनके हृदय को गहरे तक झकझोर दिया था। किसानों की पीड़ा को उन्होंने अपना दर्द समझा और उनकी सहायता के लिए एक संस्था का निर्माण किया। इस संस्था के माध्यम से उन्होंने हजारों अनाथ बच्चों, विधवाओं और कर्ज में डूबे किसानों के परिवारों को आर्थिक और मानसिक संबल प्रदान किया। उन्होंने गांव गांव जाकर लोगों की समस्याएं सुनीं और उनके समाधान के लिए जमीनी स्तर पर कार्य किया। उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव ने उन्हें जनता के बीच एक भगवान के समान दर्जा दिला दिया था। लोग उन्हें केवल एक कलाकार के रूप में नहीं बल्कि अपने परिवार के एक बड़े बुजुर्ग के रूप में देखते थे जो संकट के समय हमेशा उनके साथ खड़ा रहता था।</p><p>वर्तमान समय में जहां युवा पीढ़ी बहुत जल्दी मानसिक तनाव का शिकार हो जाती है, नाना पाटेकर का जीवन उनके लिए एक खुला मार्गदर्शन है। उनका जीवन सिखाता है कि चाहे परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य के भीतर इच्छाशक्ति और दृढ़ संकल्प है, तो वह किसी भी बाधा को पार कर सकता है। उन्होंने बिना किसी बाहरी सहारे के अपने दम पर वह मुकाम हासिल किया, जो लाखों लोगों के लिए केवल एक सपना होता है। उनकी यात्रा शून्य से शिखर तक की एक बेहद प्रेरणादायक कहानी है।</p><p>8 अक्टूबर 2026 की वह मनहूस सुबह भारतीय कला जगत के लिए एक काला अध्याय लेकर आई। वे गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर थे, जब सुबह के समय उन्हें अचानक गंभीर हृदयघात हुआ। परिजनों द्वारा उन्हें तुरंत समीप के एक बड़े अस्पताल ले जाया गया। वहां मौजूद चिकित्सकों ने करीब 45 मिनट तक उनके हृदय को पुनः सक्रिय करने का हर संभव प्रयास किया, लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था। सुबह 5 बजकर 20 मिनट पर चिकित्सकों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया। यह समाचार जैसे ही बाहर आया, पूरे देश में शोक की लहर दौड़ गई। जो आंखें उनकी कला को देखकर चमक उठती थीं, वे आंसुओं से नम थीं।</p><p>चिकित्सकीय और कानूनी प्रक्रियाओं के बाद उनके पार्थिव शरीर को विशेष विमान और वाहन के माध्यम से महाराष्ट्र के पुणे लाया गया। उनका अंतिम संस्कार उनके पैतृक गांव डोंजे में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ संपन्न हुआ। इस अवसर पर जनसैलाब उमड़ पड़ा था। हर कोई अपने चहेते नायक के अंतिम दर्शन करना चाहता था। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने स्वयं वहां पहुंचकर उनके पार्थिव शरीर को कंधा दिया, जो इस बात का प्रतीक था कि उनका कद राजनीति और कला की सीमाओं से कहीं बहुत ऊपर था।<br>उनके अंतिम सफर में उनके पुराने मित्र, सहकर्मी और हजारों की संख्या में आम लोग शामिल हुए। हर आंख नम थी और हर दिल भारी था। नाना पाटेकर का जाना एक युग का अंत है। उन्होंने अपने अभिनय और अपने कर्मों से जो लकीर खींची है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी। उनका भौतिक शरीर आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी कला, उनके विचार और मानवता के लिए किए गए उनके निस्वार्थ कार्य उन्हें हमेशा हमारे दिलों में जीवित रखेंगे। रूपहले पर्दे का वह शेर आज हमेशा के लिए शांत हो गया है, लेकिन उसकी दहाड़ भारतीय सिनेमा और समाज की चेतना में हमेशा गूंजती रहेगी।</p><p>- महेन्द्र तिवारी</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 19:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nana-patekar-was-a-unique-blend-of-cinema-and-social-service</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Congress और CJP के प्रदर्शनों के चलते Delhi में व्यापार ठप, त्योहारों के मौके पर बिक्री बढ़ने की जगह बाजार सूने पड़े]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/delhi-protests-traders-loss-navratri-diwali-shopping-season]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दिल्ली में राजनीतिक प्रदर्शनों और सुरक्षा व्यवस्था के चलते यातायात पर लग रही पाबंदियों का असर अब केवल आम यात्रियों तक सीमित नहीं रह गया है। राजधानी के बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही घटने, कारोबार प्रभावित होने और दूसरे शहरों से खरीदारी के लिए आने वाले व्यापारियों की संख्या कम होने की शिकायतें सामने आ रही हैं। चिंता इसलिए भी गंभीर है क्योंकि नवरात्रि से दिवाली तक का समय खुदरा कारोबार, थोक खरीदारी, कपड़ों, इलेक्ट्रॉनिक्स, आभूषणों, सजावटी सामान और शादी-ब्याह की खरीदारी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण होता है।</p><p>दिल्ली के व्यापारिक संगठनों के ताजा दावों के मुताबिक, पिछले कुछ दिनों में बाजारों की कारोबारी गतिविधियां लगभग 70 प्रतिशत तक गिर गई हैं। यह स्थिति बताती है कि सड़कों पर लगने वाली पाबंदियों और मेट्रो सेवाओं में व्यवधान का आर्थिक असर कितना व्यापक हो सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/rejects-plea-seeking-a-complete-halt-to-delhi-metro-operations-ahead-of-cjps-protest" target="_blank" rel="noopener">पूरा ट्रांसपोर्ट बंद नहीं कर सकते, मेट्रो और ट्रेन रद्द करने पर दोबारा करें विचार, CJP प्रोटेस्ट से पहले पाबंदियों पर सरकार को SC का निर्देश</a></p><p>हम आपको बता दें कि 8 अक्टूबर को दिल्ली में कांग्रेस और विपक्षी दलों के प्रदर्शन के दौरान राजघाट और कनॉट प्लेस के आसपास यातायात बाधित हुआ। इसके चलते, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन तक पहुंचने के रास्ते बंद होने और ट्रैफिक प्रतिबंधों के कारण 5,000 से अधिक यात्री अपनी ट्रेनें नहीं पकड़ सके। साथ ही इस घटना का सीधा संबंध व्यापारिक नुकसान से भी है। दिल्ली में दूसरे राज्यों से आने वाले कारोबारी अक्सर ट्रेन से पहुंचते हैं। उन्हें स्टेशन से थोक बाजारों तक जाना होता है, माल खरीदना होता है और फिर निर्धारित समय में वापसी करनी होती है। जब स्टेशन तक पहुंचना ही मुश्किल हो जाए, तो उनकी यात्रा, खरीदारी और माल की ढुलाई तीनों प्रभावित होती हैं।</p><p>कांग्रेस के प्रदर्शन के ठीक बाद अब 10 अक्टूबर को सीजेपी के प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर दिल्ली में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी की जा रही है। देखा जाये तो सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य कानून-व्यवस्था बनाए रखना है। लेकिन जब बैरिकेडिंग, ट्रैफिक डायवर्जन, मेट्रो स्टेशन के प्रवेश-द्वारों पर प्रतिबंध और वाहनों की आवाजाही पर नियंत्रण जैसे कदम व्यावसायिक इलाकों को प्रभावित करते हैं, तो उनका आर्थिक असर भी होता है।<br>विशेष चिंता यह है कि नई दिल्ली, कनॉट प्लेस, जनपथ और आसपास के बाजारों में ग्राहक पहुंचने से कतराने लगते हैं। ग्राहक यह सोचकर खरीदारी टाल देते हैं कि बाजार पहुंचना और वहां से लौटना मुश्किल होगा। यहां नुकसान केवल उस दिन की बिक्री का नहीं है। दुकानों में काम करने वाले कर्मचारियों की उपस्थिति, माल की डिलीवरी, थोक खरीदारों की यात्राएं, रेस्तरां की बिक्री और पार्किंग पर निर्भर कारोबारी गतिविधियां भी प्रभावित होती हैं।</p><p>देखा जाये तो दिल्ली के व्यापारियों की चिंता का सबसे बड़ा कारण समय है। 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्र शुरू होने वाले हैं। इसके बाद रामलीला, दशहरा, दिवाली और शादी-ब्याह का सीजन कारोबार को गति देते हैं। इस दौरान कपड़े, साड़ियां, रेडीमेड गारमेंट, जूते, इलेक्ट्रॉनिक्स, मोबाइल फोन, सजावट के सामान, पूजा सामग्री, आभूषण और उपहारों की मांग बढ़ती है। दिल्ली के बाजार केवल राजधानी के स्थानीय ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं। देश के अनेक शहरों और कस्बों से छोटे व्यापारी थोक खरीदारी करने आते हैं। वे दिल्ली से माल खरीदकर अपने इलाकों में बेचते हैं। इस तरह दिल्ली के थोक बाजारों की गतिविधियां दूसरे राज्यों के खुदरा कारोबार से भी जुड़ी हैं। दूसरी तरफ, खुदरा खरीदारी करने वाले परिवार भी त्योहारों के लिए कपड़े, उपहार, घरेलू सामान और दूसरी जरूरतें खरीदने बाजार पहुंचते हैं। दुकानदार इसी समय के लिए पहले से स्टॉक जुटाते हैं, कर्मचारियों की व्यवस्था करते हैं और ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए छूट तथा विशेष सेल चलाते हैं।</p><p>ऐसे में यदि बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही बाधित होती है, तो माल दुकान में पड़ा रह सकता है। व्यापारी को किराया, कर्मचारियों का वेतन, बिजली, परिवहन और स्टॉक पर लगी पूंजी की लागत फिर भी चुकानी पड़ती है। यहां सवाल उठता है कि प्रदर्शनों के चलते आखिर व्यापारियों को कितना नुकसान हुआ और कितना हो सकता है? इस सवाल का सबसे महत्वपूर्ण आधार चैंबर ऑफ ट्रेड एंड इंडस्ट्री (CTI) का 9 अक्टूबर को सामने आया आकलन है। संगठन ने अपने सर्वे के हवाले से कहा है कि पिछले तीन दिनों में दिल्ली के बाजारों की कारोबारी गतिविधियों में करीब 70 प्रतिशत गिरावट आई है। CTI के अनुसार, दिल्ली से बाहर से खरीदारी के लिए आने वाले ग्राहकों की संख्या सामान्य अनुमानित 2 से 3 लाख प्रतिदिन से घटकर करीब 40,000 से 50,000 रह गई। स्थानीय बाजारों में ग्राहकों की आवाजाही भी 50 प्रतिशत से अधिक कम होने का दावा किया गया है।</p><p>हम आपको यह भी बता दें कि CTI ने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में नवरात्रि से दिवाली तक प्रमुख व्यावसायिक इलाकों में बड़े प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने या उन्हें नियंत्रित करने की मांग की है। संगठन ने बड़े जमावड़ों के लिए मध्य दिल्ली से बाहर कोई स्थायी प्रदर्शन स्थल निर्धारित करने का सुझाव भी दिया है, जिसमें बुराड़ी या रामलीला मैदान जैसे स्थानों का उल्लेख है।</p><p>बहरहाल, त्योहारों के इस अहम कारोबारी मौसम में दिल्ली के बाजारों को बार-बार ठप होने से बचाना केवल व्यापारियों का मुद्दा नहीं है। यह रोजगार, छोटे कारोबार, थोक-खुदरा आपूर्ति और उपभोक्ताओं की सुविधा से जुड़ा सवाल है। प्रदर्शन करने वालों को अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, लेकिन ऐसी व्यवस्था भी जरूरी है कि राजनीतिक गतिविधियों और सुरक्षा प्रबंधों की कीमत आम नागरिकों और कारोबारियों को अपनी रोजी-रोटी गंवाकर न चुकानी पड़े।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 16:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/delhi-protests-traders-loss-navratri-diwali-shopping-season</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Jantar Mantar Protest वाली FIRs वापस लेने का गलत असर पड़ा, प्रदर्शनकारियों के मन से खत्म हो रहा Delhi Police का डर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/delhi-police-jantar-mantar-protest-police-restraint-body-cameras-fir]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दिल्ली की सड़कों पर इन दिनों जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसमें केवल प्रदर्शनकारी और पुलिस आमने-सामने नहीं हैं। उनके बीच अब मोबाइल कैमरा भी खड़ा है, सोशल मीडिया भी खड़ा है और कुछ सेकंड में किसी घटना को देशभर में पहुंचा देने वाली तकनीक भी खड़ी है। शायद इसीलिए दिल्ली पुलिस के लिए आज किसी प्रदर्शन को नियंत्रित करना केवल बैरिकेड लगाने, भीड़ को रोकने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मामला नहीं रह गया है। पुलिस को कानून लागू भी करना है, स्वयं को उकसावे से बचाना भी है और साथ-साथ यह सुनिश्चित भी करना है कि अगले कुछ सेकंड में उसकी कोई प्रतिक्रिया काट-छांटकर वायरल वीडियो न बन जाए।</p><p>दो अक्टूबर से नई दिल्ली क्षेत्र में शुरू हुए प्रदर्शनों ने कुछ ही दिनों में पुलिस के सामने बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है। अलग-अलग राजनीतिक दलों, छात्र संगठनों, कार्यकर्ताओं और दूसरे समूहों के प्रदर्शन तथा प्रतिबंधित क्षेत्रों की तरफ बढ़ने की कोशिशों के कारण पुलिस को लगातार अपनी रणनीति बदलनी पड़ रही है। केवल एक स्थान पर खड़ी भीड़ के बजाय अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ते समूहों को संभालना पुलिस के लिए नई चुनौती बन गया है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक असहज सवाल भी उठता है।</p><p>सवाल यह है कि क्या जुलाई में जंतर-मंतर के प्रदर्शन से जुड़े मामलों में प्राथमिकी निरस्त किए जाने के चलते ही प्रदर्शनकारियों के बीच यह संदेश गया कि पुलिस के साथ टकराव का कानूनी परिणाम गंभीर नहीं होगा? क्या इसी कारण प्रदर्शनकारियों के मन में पुलिस का डर कम हो गया है? क्या इसी कारण कुछ लोग अब पुलिसकर्मियों से आक्रामक भाषा में बात करने, उन्हें चुनौती देने, धक्का-मुक्की करने या जानबूझकर उकसाने का जोखिम अधिक आसानी से उठा रहे हैं? हम आपको याद दिला दें कि जुलाई में हुए प्रदर्शनों के बाद दिल्ली पुलिस ने कई मामले दर्ज किए थे। मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। सुप्रीम कोर्ट ने प्राथमिकियों को निरस्त कर दिया था। साथ ही अदालती आदेश में यह भी कहा गया था कि शांतिपूर्ण प्रदर्शन में केवल भागीदारी अपने आप में अपराध नहीं मानी जा सकती। ऐसे में जब महिला पुलिसकर्मियों के साथ बदसलूकी और शारीरिक खींचतान के मामले सामने आ रहे हैं और पुरुष पुलिसकर्मियों पर दुर्व्यवहार के झूठे आरोप तक लगाये जा रहे हैं तब यह सवाल प्रमुखता से उठता है कि क्या एफआईआर निरस्त कर प्रदर्शनकारियों को सुधरने का जो मौका दिया गया था उसका उन्होंने गलत फायदा उठाया?</p><p>दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस भी आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में तकनीक के सहारे अपना बचाव कर रही है। नई दिल्ली क्षेत्र में तैनात पुलिसकर्मियों की वर्दी पर बॉडी-वॉर्न कैमरे लगाए गए हैं। संसद मार्ग पर प्रदर्शन से निपटने के लिए तैयार पुलिसकर्मियों की वर्दी पर ये छोटे कैमरे साफ दिखाई दे रहे हैं। पुलिस की रणनीति में सार्वजनिक उद्घोषणा के लिए लाउडस्पीकर का इस्तेमाल बढ़ाया गया है और कई पुलिसकर्मी डंडों के बिना तैनात दिखाई दिए। देखा जाये तो बॉडीकैम का अर्थ केवल पुलिस को आरोपों से बचाना नहीं है। यदि कोई पुलिसकर्मी सीमा पार करता है तो वही कैमरा उसके खिलाफ भी प्रमाण बन सकता है। यदि कोई प्रदर्शनकारी पुलिस को जानबूझकर उकसाता है, बैरिकेड तोड़ता है, हमला करता है या बाद में घटनाक्रम का अधूरा वीडियो प्रस्तुत करता है तो पुलिस के पास पूरी घटना का अपना दृश्य रिकॉर्ड मौजूद रहेगा।</p><p>इसके अलावा, सुरक्षा व्यवस्था में दूसरा बड़ा परिवर्तन बहुस्तरीय बैरिकेडिंग है। प्रदर्शनकारियों को प्रतिबंधित क्षेत्रों की ओर बढ़ने से रोकने के लिए कई स्तरों पर अवरोध लगाए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि जुलाई की घटनाओं के बाद दिल्ली पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों ने अपनी तैयारियों की व्यापक समीक्षा की। ताजा प्रदर्शनों से पहले उन स्थानों तक की पहचान की गई जहाँ टूटा हुआ फुटपाथ, पत्थर अथवा दीवार का हिस्सा तनाव बढ़ने पर हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सकता है। जुलाई के अनुभवों के बाद सुरक्षा व्यवस्था की इस तरह समीक्षा बताती है कि अब भीड़ प्रबंधन में केवल पुलिस बल की संख्या नहीं, बल्कि प्रदर्शन-स्थल के भौतिक वातावरण को भी सुरक्षा का हिस्सा माना जा रहा है।</p><p>एक और समस्या सोशल मीडिया की है। पुलिसकर्मी के चेहरे के बिल्कुल सामने कैमरा रख देना, लगातार सवाल करना, नारे लगाना अथवा ऐसी परिस्थिति बनाना जिसमें उससे कोई तीखी प्रतिक्रिया निकल जाए, ऐसे माहौल में पुलिसकर्मी के कुछ सेकंड के नियंत्रण खोने का परिणाम लाखों लोगों तक पहुंचने वाला वीडियो हो सकता है। इसीलिए नई पुलिस रणनीति में आत्मसंयम स्वयं एक सुरक्षा उपकरण बन गया है। इस चुनौती की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब तकनीक के जरिये फर्जी दृश्य भी बनाए जाने लगें। दिल्ली पुलिस ने हाल में एक ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार किया है जिसने एआई की मदद से ऐसा वीडियो बनाया जिसमें एक पुलिसकर्मी को महिला के साथ दुर्व्यवहार करते दिखाया गया था।</p><p>बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली पुलिस के सामने इस समय बेहद कठिन चुनौती है। उसे प्रदर्शन के लोकतांत्रिक अधिकार की रक्षा करनी है। उसे प्रदर्शनकारियों की सुरक्षा करनी है। अपने जवानों विशेषकर महिला पुलिसकर्मियों की सुरक्षा करनी है। उसे आरोप लगने पर जवाबदेह भी होना है। साथ ही बैरिकेड टूटने, प्रतिबंधित क्षेत्र में भीड़ घुसने अथवा हिंसा होने की स्थिति में कानून भी लागू करना है। शायद इसीलिए राजधानी की पुलिसिंग तेजी से बदल रही है। वर्दी पर बॉडीकैम, बहुस्तरीय बैरिकेड, लाउडस्पीकर से लगातार चेतावनी और सूचना, अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बल, संवेदनशील रास्तों की पहले से पहचान, मोबाइल वीडियो के समानांतर पुलिस की अपनी रिकॉर्डिंग और सोशल मीडिया पर फैलने वाली संदिग्ध सामग्री की डिजिटल जांच। लेकिन तकनीक चाहे जितनी बढ़ जाए, अंततः सबसे बड़ी परीक्षा सड़क पर खड़े पुलिसकर्मी के धैर्य की ही है। जनता भी पुलिस की दिक्कतों को समझ रही है और उसका हौसला बढ़ाने के लिए सड़कों पर उतर रही है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 07 Oct 2026 13:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/delhi-police-jantar-mantar-protest-police-restraint-body-cameras-fir</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भरोसे पर भी खरे उतरे सेलिब्रिटिज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/celebrities-lived-up-to-the-trust-placed-in-them]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>विज्ञापनों के प्रति सेलिब्रिटिज की जवाबदेही को लेकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु की हालिया टिप्पणी इसलिए महत्वपूर्ण हो जाती है कि अपने उत्पादों को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज का उपयोग सबसे अधिक किया जाता रहा है। विज्ञापनदाता जानते हैं कि लक्षित उपभोक्ता तक पहुंचने में सेलिब्रिटिज की भागीदारी महत्वपूर्ण हो जाती हैं। लोग सेलिब्रिटिज पर विष्वास करते हैं और विज्ञापनदाता कंपनियां इसी का लाभ अपने उत्पादों को बाजार दिलाने में करते आये हैं। इसीलिए राष्ट्र्पति द्रौपदी मुर्मु की टिप्पणी कि सच्चा सितारा रोशनी फैलाता है, अंधेरापन नहीं, आज के संदर्भ में महत्वपूर्ण होने के साथ ही सितारों और सेलिब्रिटिज को समाज के प्रति जवाबदेही समझने का संकेत भी है। दर असल हो रहा है कि पैसे की चकाचोंध में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति जवाबदेही से मुहं मोड़ते दिखाई देते हैं। जब आम जन का सेलेब्रिटिज का भरोसा है तो सेलिब्रिटिज की भी इस भरोसे को बनाए रखने की नैतिक जिम्मेदारी हो जाती है। दरअसल सेलिब्रिटिज को उत्पाद के साथ देखकर आमआदमी आंख मींच कर भरोसे के सहारे खरीदारी करता है। वह उस उत्पाद और सेलिब्रिटिज द्वारा किये जा रहे वादे को सत्य समझता है। ऐसे में सेलिब्रिटी का समाज या लक्षित वर्ग के प्रति और अधिक जिम्मेदारी बन जाती है। विकेता या निर्माता अपने उत्पाद को बेचने पर ध्यान देता है। इसलिए वह अपने उत्पाद के गुणगान अधिक ही करने लगता है तो सेलिब्रिटी के विज्ञापन के सहारे अतिशयोक्तिपूर्ण दावें करने लग जाते हैं। यहां तक कि कई विज्ञापन के दावें तो सत्य के आसपास भी नहीं होते जैसा कि अक्षय कुमार का डॉबर च्यवनप्राश को लेकर विज्ञापन। यह तो एक उदाहरण मात्र है। आज तो सेरोगेट विज्ञापनों का दौर भी चल निकला है। शाहरुख खान, अजय देवगन और टाइगर श्राप का इलायची का विज्ञापन सबके सामने है जिसके माध्यम से छद्म रुप से प्रतिबंधित पान मसाला का विज्ञापन किया जा रहा था। इसी तरह के अनेक विज्ञापन हमारे सामने हैं। हांलाकि इसमें कोई दो राय नहीं कि निर्माता अपने उत्पाद का विज्ञापन करने के लिए सेलिब्रिटिज को बहुत अधिक पेमेंट किया जाता है और इस पेमेंट के चक्कर में सेलिब्रिटिज समाज के प्रति अपने दायित्व और कानूनी प्रावधानों को भी दरकिनार कर देते हैं। यही कारण है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने दुखती रग पर हाथ रखते हुए 72 वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार समारोह में पिछले माह सितंबर में आयोजित समारोह में आमआदमी का दर्द सामने रखा।</p><p>विवादित विज्ञापनों का दौर लंबे समय से चला आता रहा है। इसमें भी कोई दो राय नहीं कि अपने उत्पाद को बेचने के लिए सेलिब्रिटिज, महिलाओं और बच्चों को केन्द्र में रखा जाता है। दरअसल लक्ष्यित वर्ग को सम्मोहित करना इन विज्ञापनों का खास उद्देश्य हो जाता है। विज्ञापन करते समय कई बार तो सांप्रदायिकता तक सामने आ जाती है। 2020 का तनिष्क का विज्ञापन इसका उदाहरण है तो 2026 का कृति सेनन का गीवा ज्वेलरी का विज्ञापन सामने हैं। विमल इलायची का फिल्म कलाकर त्रय का विज्ञापन सर्वविदित है जिसमें इलायची के नाम पर छद्म रुप से पान मसाला तंबाकू का ही विज्ञापन था। इस तरह के सेरेगेट विज्ञापन आम होते जा रहे हैं। लेविस 501 जिंस का अक्षय कुमार का विज्ञापन, 2021 का आलिया भट्ट का कन्यादान के बहाने कन्यामान विज्ञापन यह फिर 1995 में अजगर से जिस्म को लपेटे मिलिंद सोयन और मधु सप्रे का टफ जूते का विज्ञापन का विवाद आज तक चर्चा में है। 2026 का विक्की कौशल-रश्मिका संधाना का माचो अंडरवियर का विज्ञापन भी विवादों में रहा है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/india-switzerland-relations-modi-parmelin-strategic-partnership-trade-defence-technology" target="_blank" rel="noopener">Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल</a></p><p>विज्ञापनों को लेकर सरकार भी गंभीर रही है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 द्वारा जवाबदेही तय की गई है। 10 लाख से 50 लाख तक के जुर्माने के प्रावधान के साथ ही ऐसे विज्ञापनकर्ताओं पर एक साल से तीन साल तक प्रतिबंध के प्रावधान भी है। भ्रामक विज्ञापनों को लेकर माननीय सर्वोच्च न्यायालय भी गंभीर रहा है और समय समय पर टिप्पणियां की गई है। इस दायरें में चार लाख से अधिक कमाई वाले व 5 लाख फालोवर्स वाले सेलिब्रिटिज को रखा गया है। हालात की गंभीरता को इसी से समझना होगा कि फिल्म कलाकारों के समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को इस तरह का संदेश देना पड़ा। वैसे भी जिस पर भरोसा होता है या किया जाता है तो भरोसे वाले व्यक्ति पर भी भरोसे को बनाये रखने का दायित्व हो जाता है। विज्ञापननिर्माताओं को भी समाज के प्रति दायित्व को समझना होगा तभी सभी अपने भरोसे पर खरे उतर सकते हैं।</p><p>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 19:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/celebrities-lived-up-to-the-trust-placed-in-them</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पाकिस्तानियों से ज्यादा लंबी जिंदगी जीते हैं भारतीय, मगर Indians से भी ज्यादा जीते हैं Bangladeshis: WHO]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-life-expectancy-who-report-2023]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पाकिस्तानियों से ज्यादा जीते हैं भारतीय, मगर भारतीयों से भी ज्यादा जीते हैं बांग्लादेशी। विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा आंकड़े भारत की जीवन-प्रत्याशा की एक दिलचस्प तस्वीर सामने रखते हैं। वर्ष 2023 में एक भारतीय की औसत जीवन-प्रत्याशा 71 वर्ष रही, जबकि पाकिस्तान में यह 68.2 वर्ष थी। लेकिन बांग्लादेश 72.7 वर्ष के साथ भारत से आगे निकल गया। अमेरिका और कनाडा तो इससे भी काफी आगे हैं। यानी भारत ने पाकिस्तान को पीछे जरूर छोड़ा है, लेकिन लंबी जिंदगी के मामले में अभी बांग्लादेश से भी पिछड़ रहा है। कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारतीयों की बढ़ती उम्र के साथ सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस जिंदगी में स्वस्थ रहने के कितने साल शामिल हैं।</p><p>हम आपको बता दें कि विश्व स्वास्थ्य संगठन के ताजा वैश्विक स्वास्थ्य आकलन ने भारत की सेहत की ऐसी तस्वीर सामने रखी है, जिसमें एक तरफ महामारी के बाद जीवन-प्रत्याशा तेजी से संभली है, तो दूसरी तरफ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की पुरानी बीमारियां मौत की सबसे बड़ी वजह बनती जा रही हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा वर्ष 2023 में केवल 60.6 वर्ष रही। यानी औसतन जीवन के अंतिम करीब दस वर्ष किसी न किसी बीमारी, अक्षमता या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी के साथ गुजरने की आशंका बनी रहती है। वर्ष 2019 में यही आंकड़ा 60.5 वर्ष था। महामारी के दौरान यह 2021 में घटकर 58.4 वर्ष रह गया और फिर 2022 में 60.2 तथा 2023 में 60.6 वर्ष तक पहुंचा।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/us-pakistan-defence-deal-powerus-drone-technology-jaishankar-strategic-threat" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: Jaishankar की बात एकदम सही निकली, Pakistan के साथ नई Defence Deal कर America ने India के लिए बढ़ाया खतरा!</a></p><p>रिपोर्ट के मुताबिक, महामारी के बाद भारत ने जीवन-प्रत्याशा में उल्लेखनीय वापसी की है। वर्ष 2019 में यह 70.5 वर्ष थी, जो 2021 में गिरकर 68.1 वर्ष हो गई। इसके बाद 2022 में यह फिर 70.5 वर्ष और 2023 में 71 वर्ष पहुंच गई। यानी महज दो वर्षों में भारत ने अनुमानित जीवन के 2.9 वर्ष वापस हासिल कर लिए। लेकिन स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा की वापसी केवल 2.2 वर्ष रही। यही अंतर भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने सबसे गंभीर चुनौती को उजागर करता है।</p><p>बुजुर्गों के मामले में भी तस्वीर कुछ बेहतर हुई है। वर्ष 2023 में 60 वर्ष की उम्र तक पहुंच चुके व्यक्ति के औसतन 18.8 वर्ष और जीने की उम्मीद थी, जबकि 2019 में यह 18.4 वर्ष थी। लेकिन इनमें पूरी तरह स्वस्थ रहने वाले वर्षों की संख्या 13.7 वर्ष ही थी। साफ है कि उम्र बढ़ रही है, मगर स्वस्थ उम्र उतनी तेजी से नहीं बढ़ रही। इसके अलावा, भारत की बीमारियों की तस्वीर भी पिछले दो दशकों में पूरी तरह बदल गई है। वर्ष 2000 में देश में मौत के दस प्रमुख कारणों में संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी करीब 62 प्रतिशत थी, जबकि गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत थी। वर्ष 2023 तक तस्वीर उलट गई। गैर-संचारी बीमारियां करीब 75 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ मौत की सबसे बड़ी वजह बन गईं, जबकि संक्रामक बीमारियों की हिस्सेदारी घटकर करीब 16 प्रतिशत रह गई। बाकी हिस्सेदारी चोट और दुर्घटनाओं जैसी वजहों की रही।</p><p>बीमारियों की बदलती तस्वीर को मौत के आंकड़ों से आसानी से समझा जा सकता है। वर्ष 2000 में भारत में क्षय रोग और दस्त जैसी संक्रामक बीमारियां मौत की बड़ी वजह थीं। तब प्रति एक लाख आबादी पर क्षय रोग से 92.4 और दस्त से 87.8 मौतें होती थीं। लेकिन वर्ष 2023 तक तस्वीर पूरी तरह बदल चुकी थी। अब हृदय रोग सबसे बड़ा जानलेवा कारण बन गया, जिससे प्रति एक लाख आबादी पर 138.5 मौतें दर्ज हुईं। इसके बाद फेफड़ों की पुरानी बीमारी से 83.19, पक्षाघात से 74.8 और मधुमेह से 49.01 मौतें प्रति एक लाख आबादी पर हुईं। यानी भारत अब केवल संक्रमण से नहीं, बल्कि दिल, फेफड़ों, मधुमेह और पक्षाघात जैसी लंबी बीमारियों से भी बड़ी जंग लड़ रहा है।</p><p>फिर भी संक्रामक बीमारियों को समाप्त मान लेना बड़ी भूल होगी। दस्त, क्षय रोग और निचले श्वसन तंत्र के संक्रमण अब भी भारत में मौत के दस प्रमुख कारणों में शामिल हैं। यानी भारत को एक साथ पुरानी बीमारियों और नई जीवनशैली वाली बीमारियों, दोनों मोर्चों पर लड़ना पड़ रहा है।</p><p>दूसरी ओर, दुनिया की तस्वीर भी भारत से बहुत अलग नहीं है। वर्ष 2023 में वैश्विक जीवन-प्रत्याशा 73.3 वर्ष पहुंच गई, जो 2019 के 73.4 वर्ष के लगभग बराबर है। लेकिन वैश्विक स्वस्थ जीवन-प्रत्याशा 62.8 वर्ष ही रही, जो 2019 से अब भी 0.4 वर्ष कम है। दुनिया में होने वाली कुल मौतों में गैर-संचारी बीमारियों की हिस्सेदारी 2000 के 58 प्रतिशत से बढ़कर 2023 में 74 प्रतिशत हो गई। दुनिया की दस प्रमुख जानलेवा वजहों में आठ अब गैर-संचारी बीमारियां हैं।</p><p>बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक महामारी से स्वास्थ्य संकेतकों को लगा झटका अब काफी हद तक संभल चुका है, लेकिन असली अगली चुनौती लंबी जिंदगी नहीं, स्वस्थ जिंदगी सुनिश्चित करना है। इस तरह भारत के लिए संदेश बिल्कुल साफ है कि सिर्फ लोगों की औसत उम्र बढ़ना स्वास्थ्य क्षेत्र की सफलता का अंतिम पैमाना नहीं हो सकता। अगर बढ़ती उम्र के साथ हृदय रोग, मधुमेह, पक्षाघात और फेफड़ों की बीमारियां भी बढ़ती रहीं, तो देश लंबी जिंदगी तो पाएगा, लेकिन स्वस्थ जिंदगी नहीं। यही वह मोर्चा है, जहां आने वाले वर्षों में भारत की स्वास्थ्य नीतियों की असली परीक्षा होगी।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 11:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-life-expectancy-who-report-2023</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी ने टाली बड़ी हवाई त्रासदी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/captain-smit-machchhar-bravery-averted-a-major-air-tragedy]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आसमान में उड़ता हुआ विमान सामान्यतः यात्रियों के लिए सुरक्षित यात्रा और मंजिल तक पहुंचने का भरोसा लेकर चलता है। विमान के भीतर बैठे लोग यह कल्पना भी नहीं करते कि कुछ ही क्षणों में वही यात्रा जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष में बदल सकती है। 30 सितंबर 2026 को दुबई से तेल अवीव जा रहे एक विमान में कुछ ऐसा ही हुआ। उड़ान के दौरान ऐसी भयावह स्थिति पैदा हुई, जिसमें विमान में सवार लोगों की जान पर गंभीर खतरा मंडराने लगा। उस समय भारतीय विमान चालक कैप्टन स्मित मच्छार ने जिस साहस, धैर्य और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया, उसकी चर्चा भारत ही नहीं, दुनिया के अनेक हिस्सों में हो रही है।</p><p>दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान संख्या एफजेड1073 में लगभग 174 यात्री सवार थे। विमान बोइंग 737 मैक्स 8 था। उड़ान के दौरान विमान में कार्यरत सह-पायलट ने कथित तौर पर कैप्टन स्मित मच्छार पर चाकू से हमला किया। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, हमले के बाद विमान की स्थिति अचानक गंभीर हो गई और वह कुछ ही क्षणों में लगभग 14000 फुट नीचे चला गया। इस घटना ने विमान में मौजूद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों को भारी संकट में डाल दिया।</p><p>सबसे कठिन स्थिति यह थी कि जिस व्यक्ति के हाथ में विमान की सुरक्षित उड़ान की जिम्मेदारी थी, उसी पर हमला कर दिया गया था। कैप्टन मच्छार गंभीर रूप से घायल हो गए, लेकिन उन्होंने अपना धैर्य नहीं खोया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्होंने घायल अवस्था में भी विमान के नियंत्रण और यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने कक्ष का दरवाजा खोलने में सफलता प्राप्त की, जिसके बाद यात्रियों और चालक दल के सदस्यों ने मिलकर हमलावर को काबू करने में मदद की। विमान में मौजूद दो अन्य विमान चालकों ने भी स्थिति संभालने में सहायता की। अंततः विमान को सऊदी अरब के तबूक हवाई अड्डे पर आपात स्थिति में उतारा गया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/from-neerja-bhanot-to-smit-machchhar-the-world-admires-the-valor-of-hindus" target="_blank" rel="noopener">नीरजा भनोट से स्मित मच्छार तक, हिन्दुओं की शूरवीरता की कायल दुनिया</a></p><p>इस पूरी घटना का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि संकट के उस क्षण में कैप्टन मच्छार ने केवल अपने जीवन की चिंता नहीं की। उनके सामने विमान में बैठे सैकड़ों लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी थी। एक विमान चालक के लिए सामान्य परिस्थितियों में भी निर्णय लेना अत्यंत महत्वपूर्ण होता है, लेकिन जब स्वयं चालक घायल हो, विमान असामान्य स्थिति में हो और कुछ ही क्षणों में बड़ा हादसा हो सकता हो, तब निर्णय लेने की क्षमता की वास्तविक परीक्षा होती है। कैप्टन मच्छार ने इसी परीक्षा में असाधारण धैर्य दिखाया।</p><p>घटना के बाद कैप्टन मच्छार को तबूक के अस्पताल में भर्ती कराया गया। भारतीय अधिकारियों के अनुसार वह गंभीर रूप से घायल हुए थे, लेकिन उनका उपचार किया जा रहा था और उनकी स्थिति सुरक्षित बताई गई। उनकी बहादुरी की प्रशंसा भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भी की। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी कैप्टन मच्छार के साहस की सराहना करते हुए उन्हें सच्चा नायक बताया।</p><p>कैप्टन स्मित मच्छार का विमानन क्षेत्र में लंबा अनुभव भी इस घटना के संदर्भ में उल्लेखनीय है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार वह मुंबई के घाटकोपर क्षेत्र से हैं और इससे पहले स्पाइसजेट में कार्य कर चुके हैं। जून 2022 में वह फ्लाईदुबई से जुड़े थे। उनके पास बोइंग 737 विमानों को उड़ाने का लगभग 9750 घंटे का अनुभव बताया गया है। इतने लंबे अनुभव ने निश्चित रूप से उन्हें कठिन परिस्थितियों में निर्णय लेने की व्यावसायिक क्षमता प्रदान की होगी, लेकिन केवल अनुभव से उस क्षण का साहस नहीं समझाया जा सकता। घायल होने के बावजूद यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना उनके कर्तव्यबोध को भी सामने लाता है।</p><p>इस घटना की एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रियों ने भी संकट के समय असाधारण सहयोग किया। विमान के भीतर उत्पन्न खतरे को केवल चालक दल ने ही नहीं संभाला, बल्कि यात्रियों ने भी हमलावर को काबू करने में मदद की। इससे पता चलता है कि आपात स्थिति में सामूहिक सहयोग कितना महत्वपूर्ण हो सकता है। एक व्यक्ति की बहादुरी ने रास्ता बनाया, लेकिन उसके बाद कई लोगों के सहयोग ने स्थिति को नियंत्रण में लाने में भूमिका निभाई। इस घटना को केवल एक व्यक्ति की कहानी मानना पूरी तस्वीर को छोटा कर देना होगा। यह साहस, प्रशिक्षण, जिम्मेदारी और सामूहिक सहयोग की कहानी भी है।</p><p>घटना के बाद विमान सुरक्षित रूप से तबूक पहुंचा और यात्रियों को आगे उनकी मंजिल तक पहुंचाने की व्यवस्था की गई। उपलब्ध समाचारों के अनुसार सभी यात्री सुरक्षित रहे। जिस स्थिति में विमान हजारों फुट नीचे आ गया था, उसमें सुरक्षित अवतरण अपने आप में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। विमान की आपात स्थिति और उसके बाद हुई घटनाओं की जांच संबंधित अधिकारियों द्वारा की जा रही है। इसलिए सह-पायलट की वास्तविक मंशा, हमले का कारण और घटना के पीछे की पूरी परिस्थितियों के बारे में अंतिम निष्कर्ष जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।</p><p>कैप्टन मच्छार की बहादुरी को लेकर भारत में भी भावनात्मक प्रतिक्रिया देखने को मिली। उत्तर प्रदेश के कुंडा क्षेत्र से विधायक रघुराज प्रताप सिंह, जिन्हें राजा भैया के नाम से भी जाना जाता है, ने उनकी बहादुरी की प्रशंसा करते हुए एक महत्वपूर्ण सुझाव रखा। उन्होंने कहा कि यदि ऐसे बहादुर विमान चालक को सम्मानपूर्वक भारतीय सेना में विमान चालक के पद पर नियुक्त किया जाए तो यह गर्व की बात होगी। उन्होंने केंद्रीय नेतृत्व से इस विषय पर विचार करने का आग्रह किया। यह फिलहाल एक राजनीतिक नेता द्वारा किया गया सुझाव है, कोई सरकारी नियुक्ति या निर्णय नहीं।</p><p>राजा भैया की इस मांग ने एक अलग बहस को भी जन्म दिया है। भारतीय सेना में नियुक्तियां निर्धारित नियमों, पात्रताओं और प्रक्रियाओं के अनुसार होती हैं। किसी व्यक्ति की असाधारण बहादुरी निश्चित रूप से सम्मान का विषय हो सकती है, लेकिन किसी विशिष्ट पद पर नियुक्ति का निर्णय संबंधित नियमों और संस्थागत प्रक्रियाओं के अनुसार ही किया जा सकता है। इसलिए राजा भैया की मांग को एक सम्मानजनक सुझाव के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि किसी घोषित सरकारी फैसले के रूप में।</p><p>कैप्टन मच्छार की कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि किसी पेशे की असली परीक्षा तब होती है, जब सामान्य परिस्थितियां अचानक असामान्य हो जाएं। विमान चालक के लिए यात्रियों की सुरक्षा केवल नौकरी की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि एक नैतिक दायित्व भी है। कैप्टन मच्छार ने जिस परिस्थिति में अपना संयम बनाए रखा, उसमें उनके सामने अपने जीवन का खतरा भी था और विमान में सवार लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी भी। ऐसे समय में भय स्वाभाविक है, लेकिन भय के बावजूद जिम्मेदारी निभाना ही साहस का वास्तविक अर्थ है।</p><p>इस घटना के संदर्भ में कैप्टन मच्छार के कुछ पुराने विचार भी उल्लेखनीय हैं। विमानन क्षेत्र से जुड़ी एक रिपोर्ट में उनके पूर्व कथनों का उल्लेख किया गया है, जिनमें उन्होंने यात्रियों के सुरक्षित विमान से बाहर निकलने को अपनी प्राथमिकता बताया था। उन्होंने यह भी कहा था कि कठिन परिस्थितियों में यात्रियों से संवाद बनाए रखना महत्वपूर्ण होता है। आज जब उनकी अपनी उड़ान में असाधारण संकट आया, तब उनके व्यवहार में भी यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की वही भावना दिखाई दी।</p><p>आकाश में घटित यह घटना कई सवाल भी छोड़ गई है। विमान में चालक दल की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए? यदि चालक दल के किसी सदस्य से ही अचानक खतरा उत्पन्न हो जाए तो ऐसी परिस्थिति से निपटने के लिए क्या अतिरिक्त व्यवस्थाएं होनी चाहिए? आपातकालीन प्रशिक्षण में ऐसी घटनाओं को किस तरह शामिल किया जाना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर संबंधित विमानन संस्थाओं और जांच एजेंसियों को देना होगा। घटना की जांच से सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर विमानन सुरक्षा व्यवस्था में आवश्यक सुधार किए जा सकते हैं।</p><p>फिलहाल सबसे बड़ी बात यह है कि एक बेहद कठिन परिस्थिति में विमान सुरक्षित रूप से जमीन पर पहुंचा और उसमें सवार यात्रियों की जान बच गई। कैप्टन स्मित मच्छार स्वयं घायल हुए, लेकिन उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटने के बजाय संकट का सामना किया। यही कारण है कि उनकी बहादुरी की चर्चा सीमाओं से परे हो रही है। भारत के प्रधानमंत्री से लेकर इजरायल के प्रधानमंत्री तक ने उनके साहस की सार्वजनिक रूप से सराहना की है।</p><p>कैप्टन स्मित मच्छार की कहानी केवल एक विमान दुर्घटना को टालने की कहानी नहीं है। यह उस मानवीय साहस की कहानी है, जिसमें व्यक्ति अपने सामने उपस्थित खतरे के बावजूद दूसरों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। यह कहानी विमान चालकों, सुरक्षा कर्मियों, चिकित्सकों, सैनिकों और उन सभी लोगों के लिए प्रेरणा का विषय बन सकती है, जिनके काम में दूसरों के जीवन की जिम्मेदारी जुड़ी होती है।</p><p>किसी भी बहादुरी का सबसे बड़ा पुरस्कार लोगों का सुरक्षित घर लौटना होता है। कैप्टन मच्छार के लिए भी शायद यही सबसे महत्वपूर्ण बात होगी कि जिस विमान की जिम्मेदारी उनके हाथों में थी, उसके यात्री सुरक्षित अपनी मंजिल तक पहुंचे। सम्मान, प्रशंसा और पुरस्कार बाद की बातें हैं। संकट की घड़ी में कर्तव्य से पीछे न हटना ही उनकी कहानी का सबसे मजबूत पक्ष है। घायल शरीर के बावजूद जिम्मेदारी निभाने वाले इस विमान चालक ने यह दिखाया कि साहस केवल युद्धभूमि में ही नहीं, बल्कि जीवन के किसी भी मोर्चे पर सामने आ सकता है। आकाश में कुछ क्षणों तक चली इस असाधारण घटना ने एक बात स्पष्ट कर दी कि संकट कितना भी बड़ा क्यों न हो, धैर्य, प्रशिक्षण, कर्तव्यबोध और सामूहिक सहयोग मिलकर बड़ी से बड़ी त्रासदी को टालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 18:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/captain-smit-machchhar-bravery-averted-a-major-air-tragedy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[समुद्र में चीन रहा चाल, जवाब देने को भारत भी तैयार! South China Sea के Antelope Reef पर China बना रहा Military Airstrip, India ने भी शुरू की जवाबी तैयारी!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-antelope-reef-military-base-south-china-sea-india-strategic-threat]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दक्षिण चीन सागर में विस्तारवाद की दिशा में आगे बढ़ते हुए चीन अब समुद्र के बीच अपनी सैन्य ताकत का ऐसा किला खड़ा करने में जुटा हुआ है, जो आने वाले दिनों में पूरे हिंद-प्रशांत के सामरिक समीकरण को हिला सकता है। ताजा उपग्रह तस्वीरों से हुए खुलासे से पता चला है कि विवादित पैरासेल द्वीपसमूह के एंटीलोप रीफ पर चीन तेजी से रनवे और विशाल सैन्य ढांचे का निर्माण कर रहा है। इस कदम ने उसके इरादों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दरअसल, यह निर्माण पूरा होने के बाद यहां से लड़ाकू विमानों, निगरानी विमानों और अन्य सैन्य संसाधनों के संचालन की क्षमता विकसित की जा सकती है। यानी चीन समुद्र के बीच एक और ऐसा ठिकाना तैयार कर रहा है, जहां से वह अपने प्रतिद्वंद्वियों की गतिविधियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर अपनी सैन्य शक्ति को तेजी से आगे बढ़ाने की स्थिति में होगा। साफ है कि बीजिंग दक्षिण चीन सागर को सिर्फ अपने प्रभाव का क्षेत्र नहीं, बल्कि सैन्य शक्ति के विस्तार का विशाल मंच बनाने की रणनीति पर तेजी से आगे बढ़ रहा है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि यह रनवे 2027 के मध्य तक परिचालन में आ सकता है।</p><p>तस्वीरों में मिट्टी समतल करने, बजरी और कंक्रीट डालने तथा भारी निर्माण मशीनों की गतिविधियां साफ दिखाई देती हैं। एक लदा हुआ बजरा नवनिर्मित घाट की ओर जाता हुआ भी देखा गया है। चीन ने आधिकारिक तौर पर इसे सैन्य अड्डा नहीं माना है और सरकारी माध्यमों ने इसे मौसम पूर्वानुमान, समुद्री वैज्ञानिक अनुसंधान तथा अन्य नागरिक उद्देश्यों से जोड़ने की कोशिश की है। लेकिन जिस पैमाने पर निर्माण हो रहा है, वह इस परियोजना के संभावित सामरिक उपयोग को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/russia-ukraine-war-modi-peace-initiative-putin-ukraine" target="_blank" rel="noopener">4 साल में पहली बार एक सुर में बोले रूस और यूक्रेन, दोनों को पसंद आया मोदी का प्रस्ताव</a></p><h2>एंटीलोप रीफ क्यों इतना महत्वपूर्ण है?</h2><p>हम आपको बता दें कि एंटीलोप रीफ कोई सामान्य समुद्री निर्माण परियोजना नहीं है। यह पैरासेल द्वीपसमूह में स्थित है, जिस पर चीन के साथ वियतनाम और ताइवान भी दावा करते हैं। चीन ने 1974 में दक्षिण वियतनाम की सेनाओं को पैरासेल क्षेत्र से हटाकर वहां अपना नियंत्रण स्थापित किया था और तब से इस क्षेत्र पर उसका कब्जा बना हुआ है। यदि यहां सैन्य श्रेणी का रनवे और पूरा अड्डा तैयार हो जाता है तो चीन के युद्धक विमानों, निगरानी विमानों और नौसैनिक शक्ति की पहुंच दक्षिण चीन सागर के उत्तरी हिस्से में काफी बढ़ सकती है। इससे चीन को अपने परमाणु-सक्षम पनडुब्बी बेड़े वाले हैनान द्वीप के आसपास के समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा और निगरानी मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है।</p><p>हम आपको बता दें कि चीन पहले ही स्प्रैटली द्वीपसमूह में फिएरी क्रॉस, मिसचीफ और सुबी रीफ पर बड़े रनवे, बंदरगाह, निगरानी और वायु रक्षा सुविधाएं विकसित कर चुका है। अब पैरासेल क्षेत्र में निर्माण उस व्यापक रणनीति का अगला चरण दिखाई देता है, जिसमें बीजिंग समुद्र के भीतर अपनी स्थायी सैन्य पहुंच और निगरानी का जाल मजबूत कर रहा है। तस्वीर यहीं खत्म नहीं होती। एंटीलोप रीफ के निकट यागोंग द्वीप पर भी नई संरचनाएं दिखाई दी हैं। अगस्त में सामने आई उपग्रह तस्वीरों के आधार पर कुछ विश्लेषकों ने वहां संभावित रडार या प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली जैसी संरचनाओं की संभावना जताई थी, हालांकि उनके वास्तविक उपयोग की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है।</p><p>इसी बीच ताइवान को अमेरिका से नए एफ-16वी ब्लॉक 70 लड़ाकू विमानों की पहली दो इकाइयां मिल गई हैं। ये 2019 में किए गए करीब 8 अरब डॉलर के 66 विमानों के सौदे का हिस्सा हैं। ताइवान के पास पहले से 139 पुराने एफ-16 विमानों को एफ-16वी मानक तक उन्नत किया जा चुका है; नई खेप पूरी होने पर उसका एफ-16 बेड़ा 200 से अधिक विमानों का हो जाएगा। इन विमानों में आधुनिक सक्रिय इलेक्ट्रॉनिक रूप से स्कैन किए जाने वाले रडार और उन्नत युद्ध प्रणालियां हैं। ताइवान के लिए इनका महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि उसे चीन की वायुसेना की नियमित गतिविधियों का सामना करना पड़ता है। हालांकि पूरी खेप की आपूर्ति में देरी हुई है और ताइवान को आगे की डिलीवरी का इंतजार है। इस प्रकार एक तरफ चीन दक्षिण चीन सागर में अपने ठिकाने मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ ताइवान अपनी वायु रक्षा क्षमता बढ़ा रहा है। यह हिंद-प्रशांत में तेजी से कठोर होते सैन्य संतुलन का स्पष्ट संकेत है।</p><p>दूसरी ओर, भारत से हजारों किलोमीटर दूर दक्षिण चीन सागर में बन रहा चीनी अड्डा देखने में भले ही क्षेत्रीय विवाद लगे, लेकिन इसका सामरिक प्रभाव सीधे भारतीय समुद्री हितों तक पहुंचता है। कारण है मलक्का जलडमरूमध्य। दक्षिण चीन सागर और हिंद महासागर को जोड़ने वाला यह समुद्री मार्ग एशिया की ऊर्जा और व्यापार व्यवस्था की महत्वपूर्ण धुरी है। अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह इसकी पश्चिमी दिशा के बेहद करीब स्थित है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, मलक्का क्षेत्र भारतीय समुद्री सुरक्षा और व्यापार के लिए लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। यही वह बिंदु है जहां चीन की दक्षिण चीन सागर रणनीति और भारत की समुद्री सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ती हैं। यदि चीन दक्षिण चीन सागर में एयरफील्ड, निगरानी केंद्र, बंदरगाह और नौसैनिक सुविधाओं की श्रृंखला बनाता है, तो संकट की स्थिति में उसके विमानों और युद्धपोतों की परिचालन पहुंच दक्षिण-पूर्व एशिया और मलक्का की दिशा में बढ़ सकती है। भारत के लिए इसका सीधा अर्थ है कि अंडमान-निकोबार अब केवल द्वीपसमूह नहीं, बल्कि हिंद-प्रशांत की सामरिक अग्रिम चौकी हैं।</p><p>भारत ने इसी दिशा में अपनी तैयारी तेज की है। जनवरी 2026 में कार निकोबार वायुसेना स्टेशन के उन्नत रनवे का उद्घाटन किया गया। अधिकारियों के अनुसार इससे मलक्का जलडमरूमध्य की दिशा में भारत की निगरानी और त्वरित हवाई संचालन क्षमता मजबूत होती है। ग्रेट निकोबार में प्रस्तावित विशाल परियोजना भी इसी व्यापक रणनीतिक संदर्भ में महत्वपूर्ण है। इसमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट टर्मिनल, हवाई अड्डा, ऊर्जा संयंत्र और अन्य आधारभूत सुविधाएं शामिल हैं। मोदी सरकार इसे समुद्री व्यापार के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक जरूरतों से भी जोड़ रही है।</p><p>बहरहाल, चीन समुद्र में धीरे-धीरे नहीं, बल्कि ईंट, कंक्रीट, रनवे, रडार और बंदरगाहों के जरिए अपना सामरिक भूगोल बदल रहा है। भारत के लिए जवाब केवल हथियारों की संख्या बढ़ाना नहीं हो सकता। उसे अंडमान-निकोबार में हवाई और नौसैनिक आधारभूत ढांचे, समुद्री निगरानी, लंबी दूरी की मारक क्षमता, पनडुब्बी रोधी युद्धक क्षमता, मानवरहित प्रणालियों और समुद्री क्षेत्र जागरूकता को एकीकृत करना होगा।</p><p>एंटीलोप रीफ का निर्माण इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह बताता है कि चीन भविष्य के युद्ध को केवल महाद्वीपीय सीमा पर नहीं, बल्कि समुद्री गलियारों, द्वीपों और दूरदराज के सैन्य अड्डों पर भी आकार दे रहा है। भारत के लिए सबसे बड़ा सबक यही है कि दक्षिण चीन सागर की हर नई चीनी चौकी को केवल बीजिंग और उसके पड़ोसियों का विवाद मानना रणनीतिक भूल होगी। भारत की पूर्वी समुद्री सीमा, मलक्का और अंडमान-निकोबार अब एक ही व्यापक सामरिक तस्वीर के हिस्से हैं।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 03 Oct 2026 12:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-antelope-reef-military-base-south-china-sea-india-strategic-threat</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गांधी का पुनर्जन्म ही नहीं, गांधी-दृष्टि का पुनर्जागरण हो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/let-there-be-not-merely-a-rebirth-of-gandhi-but-a-renaissance-of-the-gandhian-vision]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>महात्मा गांधी को याद करना केवल अतीत के एक महान व्यक्तित्व को श्रद्धांजलि देना नहीं है, बल्कि अपने वर्तमान की दिशा और भविष्य की दशा पर विचार करना भी है। गांधी किसी एक कालखंड, राजनीतिक दल या विचारधारा की संपत्ति नहीं हैं। वे एक ऐसे जीवन-दर्शन का नाम हैं, जिसकी धुरी सत्य, अहिंसा, आत्मानुशासन, स्वावलंबन, सेवा, स्वदेशी, ग्रामोदय, सामाजिक समरसता और मानव-मर्यादा है। इसलिए आज आवश्यकता गांधी के पुनर्जन्म की ही नहीं, गांधी-दृष्टि के पुनर्जागरण की है। गांधी को जितना इतिहास में खोजेंगे, उतना ही वे अतीत के लगेंगे; उन्हें वर्तमान के प्रश्नों से जोड़ेंगे तो वे भविष्य के मार्गदर्शक बन जाएंगे। क्योंकि महात्मा गांधी बीसवीं शताब्दी में दुनिया के सबसे सशक्त, बड़े एवं प्रभावी नेता के रूप में उभरे, वे बापू एवं राष्ट्रपिता के रूप में लोकप्रिय हुए, वे एक रचनात्मक व्यक्तित्व थे जिन्होंने अपने ही मूल्यों के बल पर देश को आजादी दिलाई, नैतिक एवं स्वस्थ मूल्यों को स्थापित किया। उनके द्वारा निरुपित सिद्धान्त आज की दुनिया की चुनौतियों एवं समस्याओं के समाधान के सबसे सशक्त माध्यम है। लेकिन वक्त की विडम्बना देखिये कि गांधी को हम बार-बार कटघरे में खड़ा करते हैं और उनकी छवि को धुंधलाने की कोशिश में कोई कमी नहीं छोड़ते। जो मानसिकता गोली मार सकती है, वह गाली दे तो क्या आश्चर्य? पर महात्मा गांधी भारत के अकेले ऐसे महापुरुष हैं जिन्हें कोई गोली या गाली नहीं मार सकती।</p><p>आज भारत ‘नए भारत’ और ‘विकसित भारत’ के निर्माण के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। इस यात्रा में गांधी को नए संदर्भ में देखने की जरूरत है। गांधी का स्वदेशी केवल चरखे तक सीमित नहीं था; उसका मूल भाव आत्मनिर्भरता था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 30 जनवरी 2026 को गांधीजी की पुण्यतिथि पर भी स्वदेशी को विकसित और आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का आधारस्तंभ बताते हुए उनके कर्तव्य-बोध को स्मरण किया। आज जब भारत स्थानीय उत्पादन, आत्मनिर्भरता, नवाचार, डिजिटल क्षमता और उद्यमिता को आगे बढ़ाने की बात करता है, तब गांधी का स्वावलंबन एक नए आर्थिक और सामाजिक संदर्भ में दिखाई देता है। गांधी के लिए विकास का अर्थ केवल उत्पादन और संपन्नता बढ़ाना नहीं था। विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य था। उनकी दृष्टि में सबसे कमजोर व्यक्ति की चिंता विकास की कसौटी थी। आज ‘सबका साथ, सबका विकास’ और अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं तथा अवसरों की पहुंच की चर्चा इसी व्यापक मानवीय विकास के संदर्भ में की जा सकती है। गांधी का ‘अंत्योदय’ किसी सरकारी योजना का नाम नहीं, बल्कि विकास की नैतिक कसौटी है-जिसके केंद्र में वह व्यक्ति हो जो सबसे पीछे है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-narendra-modi-pays-tribute-to-mahatma-gandhi-on-gandhi-jayanti-urges-buying-khadi" target="_blank" rel="noopener">Gandhi Jayanti: PM Narendra Modi ने दी श्रद्धांजलि, खादी उत्पाद खरीदने का किया आह्वान</a></p><p>गांधी की सबसे बड़ी शक्ति यह थी कि उन्होंने राजनीति को केवल सत्ता प्राप्ति का माध्यम नहीं माना। उनके लिए राजनीति का नैतिक आधार सेवा था। आज लोकतंत्र को केवल चुनावों और संस्थाओं तक सीमित न रखकर संवाद, सहभागिता, उत्तरदायित्व और जनविश्वास से जोड़ने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री मोदी ने विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की लोकतांत्रिक परंपरा, संवाद और सहभागिता की विरासत को रेखांकित किया है। 2023 के जी-20 सम्मेलन में उन्होंने भारत की प्राचीन सभा-परंपराओं और सामूहिक निर्णय की ऐतिहासिक परंपरा का उल्लेख किया था। &nbsp;यह दृष्टि गांधी की उस राजनीति से संवाद करती है जिसमें जनता केवल शासन की प्रजा नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की सहभागी थी। भारत की विदेश नीति और वैश्विक भूमिका में भी गांधी-दृष्टि के नए संकेत दिखाई देते हैं। 2023 में भारत की जी-20 अध्यक्षता का सूत्र था-‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य।’ प्रधानमंत्री ने इसे भारतीय सभ्यता के ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के भाव से जोड़ा और विश्व की समस्याओं के समाधान के लिए सहयोग की आवश्यकता पर बल दिया। नई दिल्ली में जी-20 नेताओं का राजघाट जाकर गांधी को श्रद्धांजलि देना भी प्रतीकात्मक रूप से महत्वपूर्ण था। उस अवसर पर गांधी के शांति, सेवा, करुणा और अहिंसा के आदर्शों को सामंजस्यपूर्ण और समावेशी वैश्विक भविष्य से जोड़ा गया।</p><p>सचमुच आज विश्व को गाँधीजी के जीवन-मूल्यों की ज्यादा आवश्यकता है । आज धार्मिक कट्टरता बढ़ रही है। कुछ लोग जेहाद के नाम पर घृणित कृत्यों को अंजाम दे रहे हैं। कहीं दंगे हो रहे हैं तो कहीं महिलाओं और बच्चों के साथ अत्याचार की घटनाएँ हो रही हैं। धर्म और संप्रदाय के नाम पर समाज में विष घोला जा रहा है। दुनिया में शस्त्रों की होड़ चल रही है। आतंकवाद जीवन का अनिवार्य सत्य बन गया है। ऐसे में गाँधी बहुत याद आते हैं। इनके विचारों को फैलाकर ही दुनिया में शांति लाई जा सकती है। यहां गांधी की प्रासंगिकता एक और बड़े आयाम में सामने आती है। दुनिया आज युद्ध, आतंकवाद, धार्मिक कट्टरता, आर्थिक असमानता, जलवायु संकट और अविश्वास की चुनौतियों से गुजर रही है। तकनीक ने मानव की शक्ति बढ़ाई है, लेकिन क्या उसने मानवता बढ़ाई है-यह बड़ा प्रश्न है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लेकर परमाणु हथियारों तक, मनुष्य ने अभूतपूर्व शक्ति हासिल की है; लेकिन शक्ति के साथ संयम, करुणा और नैतिकता न हो तो वही शक्ति विनाश का कारण बन सकती है। गांधी का संदेश इसलिए आज और महत्वपूर्ण है कि उन्होंने साधन और साध्य की पवित्रता को एक-दूसरे से अलग नहीं किया। गांधी को किसी एक राजनीतिक खेमे में बांधना उनके विराट व्यक्तित्व को छोटा करना है। गांधी को केवल कांग्रेस, केवल स्वतंत्रता आंदोलन, केवल खादी या केवल किसी एक राजनीतिक व्याख्या तक सीमित करना उनके वैश्विक स्वरूप के साथ न्याय नहीं है। गांधी भारत की आत्मा से निकले और मानवता की चेतना का हिस्सा बने। वे सीमाओं से आबद्ध नहीं हैं। वे अतीत के हैं, लेकिन केवल अतीत के नहीं हैं। वे आज के हैं और आने वाले हर कल के लिए उपयोगी हैं।</p><p>भारत जब विश्व में अपनी भूमिका का विस्तार कर रहा है, तब गांधी-दर्शन उसके लिए नैतिक पूंजी बन सकता है। आर्थिक शक्ति भारत को प्रभावशाली बना सकती है, तकनीकी शक्ति उसे सक्षम बना सकती है और सामरिक शक्ति उसे सुरक्षित कर सकती है; लेकिन नैतिक शक्ति ही भारत को विश्वसनीय बना सकती है। विश्वगुरु होने का अर्थ दुनिया पर प्रभुत्व स्थापित करना नहीं, बल्कि दुनिया के सामने ऐसा जीवन-मूल्य प्रस्तुत करना है जिससे मानवता लाभान्वित हो। गांधी इसी नैतिक नेतृत्व की सबसे बड़ी भारतीय संभावनाओं में से एक हैं। प्रधानमंत्री द्वारा अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं, लोकतांत्रिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ को प्रस्तुत करना इसी व्यापक संदर्भ में देखा जा सकता है। नए भारत की वास्तविक उपलब्धि केवल यह नहीं होगी कि भारत कितना बड़ा आर्थिक राष्ट्र बनता है; बड़ी उपलब्धि यह होगी कि उसकी विकास यात्रा कितनी मानवीय, समावेशी, संवेदनशील और टिकाऊ होती है। सड़कें, उद्योग, डिजिटल क्रांति, अंतरिक्ष अभियान, स्टार्टअप और आर्थिक विकास आवश्यक हैं, लेकिन इनके साथ सत्य, नैतिकता, सामाजिक समरसता, स्वच्छता, पर्यावरण-संरक्षण और कमजोर के प्रति संवेदना भी आवश्यक है। यही वह स्थान है जहां गांधी आधुनिक भारत की विकास-यात्रा के साथ खड़े दिखाई देते हैं।</p><p>गांधी की प्रासंगिकता का सबसे बड़ा प्रमाण शायद यही है कि उन्हें समाप्त करने की जितनी कोशिश हुई, वे उतने ही व्यापक होते गए। आज गांधी केवल भारत के नहीं, विश्व के नैतिक विमर्श का हिस्सा हैं। हिंसा से भरी दुनिया में अहिंसा, विभाजन के बीच संवाद, उपभोगवाद के बीच संयम, केंद्रीकरण के बीच विकेंद्रीकरण, निराशा के बीच सत्य और सत्ता-केंद्रित राजनीति के बीच सेवा-ये गांधी के वे सूत्र हैं जिनकी जरूरत भविष्य की सभ्यता को भी रहेगी। इसलिए इस गांधी जयंती पर हमें केवल गांधी की प्रतिमा पर पुष्प अर्पित नहीं करने हैं; हमें यह देखना है कि हमारे जीवन, समाज, राजनीति, अर्थव्यवस्था और विश्व-दृष्टि में गांधी के कितने मूल्य जीवित हैं। गांधी का पुनर्जन्म किसी व्यक्ति के रूप में नहीं हो सकता; गांधी का पुनर्जन्म तभी होगा जब सत्य फिर से साहस बने, अहिंसा फिर से शक्ति बने, स्वदेशी फिर से आत्मविश्वास बने, सेवा फिर से राजनीति का संस्कार बने और मानवता फिर से विकास का केंद्र बने। नया भारत यदि विकसित भारत बनना चाहता है और भारत यदि विश्व में नैतिक नेतृत्व की भूमिका निभाना चाहता है, तो उसे आधुनिकता और आध्यात्मिकता, विज्ञान और विवेक, शक्ति और शांति, विकास और करुणा का संतुलन साधना होगा। गांधी इस संतुलन के सबसे प्रखर भारतीय प्रतीकों में हैं। गांधी को अतीत की तस्वीर से निकालकर भविष्य की दृष्टि बनाना होगा। यही गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी और यही उस भारत की पहचान होगी जो केवल विकसित नहीं, बल्कि संवेदनशील, शांतिप्रिय, नैतिक और मानवता के कल्याण का मार्गदर्शक भारत बनना चाहता है।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 02 Oct 2026 10:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/let-there-be-not-merely-a-rebirth-of-gandhi-but-a-renaissance-of-the-gandhian-vision</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[हाईटेक होते वृद्धाश्रम और बेदखल होता बुढ़ापा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/high-tech-old-age-homes-and-the-marginalization-of-old-age]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पुणे के समीप संचालित एक आधुनिक वृद्धाश्रम में जब एक बेसहारा बुजुर्ग के दाखिले के लिए संपर्क किया गया, तो वहां का मासिक शुल्क पचास हजार रुपये बताया गया। यह केवल एक आर्थिक आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह हमारे समकालीन समाज के बदलते चरित्र, नैतिक पतन और बुजुर्गों के प्रति संवेदनहीनता का एक भयावह दस्तावेज़ है। भारत जैसे विकासशील देश में, जहां एक आम कामकाजी नागरिक या सेवानिवृत्त व्यक्ति की पूरी मासिक आय भी अक्सर इस आंकड़े तक नहीं पहुंच पाती, वहां बुढ़ापे की शरणस्थली का इतना खर्चीला होना एक गंभीर सामाजिक संकट की ओर इशारा करता है। यह इस कड़वी हकीकत को उजागर करता है कि जो वृद्धाश्रम कभी करुणा, सेवा और निस्वार्थ आश्रय के पवित्र केंद्र हुआ करते थे, वे अब कॉर्पोरेट शैली के आलीशान रिसॉर्ट्स और फाइव स्टार होटलों में तब्दील हो चुके हैं। जब जीवन के अंतिम पड़ाव पर मिलने वाली सुरक्षा और गरिमा भी पूरी तरह से बाजारवाद की वस्तु बन जाए, तो समाज के गरीब, निम्न-मध्यमवर्गीय और सर्वहारा बुजुर्गों के जीवित रहने की उम्मीदें ही दम तोड़ने लगती हैं। यह स्थिति इस बुनियादी लोकतांत्रिक और मानवीय सवाल को जन्म देती है कि क्या सम्मान से जीने और शांति से मरने का अधिकार केवल समाज के धनाढ्य वर्ग तक ही सीमित रह गया है?<br><br>इस संकट की जड़ें हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे में आए गहरे बिखराव से जुड़ी हुई हैं। भारत की पहचान सदियों से संयुक्त परिवार की उस व्यवस्था से रही है, जहां बुजुर्गों को घर का 'बरगद' माना जाता था, जिनकी छत्रछाया में पूरी गोत्र और पीढ़ियां खुद को सुरक्षित महसूस करती थीं। लेकिन वैश्वीकरण, तीव्र शहरीकरण और आधुनिक जीवनशैली की अंधी दौड़ ने इस पारंपरिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न कर दिया है। आज की युवा पीढ़ी रोजगार, करियर और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की तलाश में महानगरों या सुदूर विदेशों की ओर पलायन कर रही है, जहां उनके जीवन में माता-पिता के लिए स्थान संकुचित होता जा रहा है। कई मामलों में तो युवा दंपति बुजुर्गों को अपने साथ रखना एक अनुत्पादक बोझ समझने लगते हैं। इसी पारिवारिक अलगाव और सामाजिक लाचारी को आज कॉर्पोरेट जगत ने एक बहुत बड़े व्यावसायिक अवसर के रूप में पहचान लिया है। अब इन संस्थानों को 'वृद्धाश्रम' जैसे पारंपरिक और संवेदनशील नामों के बजाय 'सीनियर लिविंग सोसाइटीज', 'सिल्वर होम्स' या 'रिटायरमेंट रिसॉर्ट्स' जैसे आकर्षक और भ्रामक नामों से प्रचारित किया जा रहा है, ताकि समाज में बुजुर्गों को छोड़ने के अपराध बोध को एक स्टेटस सिंबल में बदला जा सके।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/elderly-individuals-are-not-a-burden-on-the-family-they-are-a-living-asset-to-both-the-family-and-so" target="_blank" rel="noopener">International Day for Older Persons: वृद्ध व्यक्ति परिवार पर बोझ नहीं, बल्कि परिवार और समाज की जीवित पूंजी हैं!</a><br><br>महीने के पचास हजार रुपये या उससे अधिक की भारी-भरकम राशि वसूलने वाले ये हाईटेक आश्रम अपने विज्ञापनों में वातानुकूलित कमरों, आलीशान आंतरिक सज्जा, चौबीस घंटे वाई-फाई, आधुनिक जिम, स्विमिंग पूल, क्लब हाउस और कस्टमाइज्ड डाइट प्लान जैसी सुख-सुविधाओं का बढ़-चढ़कर दावा करते हैं। यह पूरा परिदृश्य बाहर से देखने पर अत्यंत आकर्षक और किसी पर्यटन स्थल जैसा प्रतीत हो सकता है, परंतु गहराई से विचार करने पर इसकी खोखली और वीरान प्रकृति साफ दिखाई देती है। जीवन के सांध्यकाल में पहुंचे, अपनों से उपेक्षित और अकेलेपन से जूझ रहे किसी बुजुर्ग को बुढ़ापे में इन कृत्रिम और यांत्रिक सुख-सुविधाओं की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि उन्हें दो पल के सच्चे प्यार, अपनों के साथ संवाद और मानसिक संबल की दरकार होती है। इन कॉर्पोरेट संस्थानों ने सुख और विलासिता के साधन तो ऊंचे दामों पर बेच दिए, लेकिन वे उस मानवीय अपनत्व और मानसिक शांति को नहीं बेच पाए जो केवल एक परिवार के भीतर ही संभव है। यह एक ऐसी विडंबना है जहां बुजुर्गों के पास सोने के लिए मखमली बिस्तर तो मौजूद है, लेकिन उस पर चैन की नींद सोने के लिए जरूरी पारिवारिक स्नेह और मानसिक संतोष पूरी तरह नदारद है।<br><br>इस पूरे परिदृश्य का सबसे मार्मिक और चिंताजनक पहलू यह है कि इस नई व्यवस्था ने देश के गरीब और मध्यम वर्ग के बुजुर्गों को पूरी तरह से हाशिए पर धकेल दिया है। भारत की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी असंगठित क्षेत्रों में दिहाड़ी मजदूरी या छोटे-मोटे काम करके अपना जीवन यापन करती है, जिनके पास न तो भविष्य के लिए कोई बड़ी जमापूंजी होती है और न ही बुढ़ापे को सुरक्षित करने के लिए कोई सरकारी पेंशन। यदि ऐसे परिवारों में संतानों द्वारा माता-पिता का परित्याग कर दिया जाए, तो वे इन महंगे आश्रमों की चौखट तक लांघने की कल्पना भी नहीं कर सकते। परिणामस्वरूप, ऐसे बेसहारा वृद्ध सड़कों पर, रेलवे स्टेशनों पर या धार्मिक स्थलों के बाहर अत्यंत दयनीय परिस्थितियों में भीख मांगने या लावारिस मौत मरने को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर, देश की विशाल जनसंख्या के अनुपात में सरकारी वृद्धाश्रमों की संख्या नगण्य है, और जो गिने-चुने मुफ्त या चैरिटेबल आश्रम संचालित भी हो रहे हैं, उनमें से अधिकांश की स्थिति इतनी जर्जर और अमानवीय है कि वहां बुनियादी स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और न्यूनतम चिकित्सा सुविधाओं का भी घोर अभाव रहता है। ऐसे में देश के निर्धन बुजुर्गों के लिए बुढ़ापा एक अभिशाप और अंतहीन यातना का पर्याय बन चुका है।</p><p>यद्यपि भारत सरकार ने बुजुर्गों के अधिकारों और उनके भरण-पोषण की रक्षा के लिए 'माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम, 2007' जैसा कड़ा कानून बनाया है, जिसके तहत संतानों के लिए अपने वृद्ध माता-पिता की देखभाल करना कानूनी रूप से अनिवार्य है। लेकिन व्यावहारिक धरातल पर इस कानून की सीमाएं और विफलताएं साफ नजर आती हैं। कोई भी भारतीय माता-पिता, चाहे उन पर दुखों का कितना भी पहाड़ क्यों न टूट पड़े, अपने ही बच्चों के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज कराने या उन्हें जेल भिजवाने के लिए कोर्ट-कचहरी के चक्कर काटने की हिम्मत नहीं जुटा पाता। वे सामाजिक लोक-लाज, समाज के उपहास और अपनी अगाध ममता के वशीभूत होकर चुपचाप अपमान और प्रताड़ना को सहना ही अपनी नियति मान लेते हैं। इसी कानूनी लाचारी और सामाजिक संकोच का अनुचित लाभ उठाकर कई असंवेदनशील संतानें बुजुर्गों को उनकी अपनी ही गाढ़ी कमाई से बनाए गए घरों से बेदखल कर देती हैं और व्यवस्था मूकदर्शक बनी रहती है।<br><br>जब जीवन की बुनियादी आवश्यकताएं जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य और अब बुढ़ापे का आश्रय भी पूरी तरह से बेलगाम बाजारवाद और पूंजीपतियों के हवाले कर दिए जाते हैं, तो समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता की खाई और अधिक चौड़ी तथा हिंसक हो जाती है। इसलिए, निजी वृद्धाश्रमों के इस अनियंत्रित और संवेदनहीन व्यावसायीकरण पर तुरंत रोक लगाना अनिवार्य हो गया है। सरकार को इन निजी संस्थानों की मनमानी फीसों और कार्यप्रणाली को नियंत्रित करने के लिए एक सख्त नियामक संस्था या वैधानिक निकाय का गठन करना चाहिए, जो यह सुनिश्चित करे कि कोई भी व्यावसायिक घराना किसी बुजुर्ग की मजबूरी और लाचारी का सौदा न कर सके। इसके साथ ही, सरकार को देश के प्रत्येक जिले में सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) मॉडल के आधार पर ऐसे किफायती, स्वच्छ और सुरक्षित वृद्धाश्रमों का निर्माण करना चाहिए, जहां मध्यम और गरीब वर्ग के बुजुर्ग बिना किसी आर्थिक मानसिक तनाव के गरिमापूर्ण जीवन व्यतीत कर सकें। साथ ही, कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के नियमों में संशोधन करके बड़ी कंपनियों के मुनाफे का एक निश्चित हिस्सा गरीब बुजुर्गों के मुफ्त आश्रय, भोजन और चिकित्सा के लिए अनिवार्य रूप से आरक्षित किया जाना चाहिए।<br><br>अंततः, केवल कड़े कानून बनाने, अदालती आदेशों या सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन मात्र से इस अत्यंत संवेदनशील समस्या का पूर्ण और स्थाई समाधान संभव नहीं है। यह एक गंभीर सामाजिक, मानसिक और नैतिक व्याधि है, जिसका उपचार हमें अपने परिवारों और व्यक्तिगत चेतना से प्रारंभ करना होगा। हमें अपनी शिक्षा प्रणाली और पारिवारिक संस्कारों में ऐसे नैतिक मूल्यों को पुनर्जीवित करना होगा जो नई पीढ़ी को यह समझा सकें कि माता-पिता कोई उपयोग के बाद फेंक दी जाने वाली वस्तु या वित्तीय दायित्व नहीं हैं, बल्कि वे हमारे जीवन की सबसे अमूल्य धरोहर और सांस्कृतिक पूंजी हैं। जिस समाज या राष्ट्र में उसके बुजुर्गों की आंखों में अकेलेपन का आंसू, तिरस्कार का दर्द और असुरक्षा का भाव व्याप्त हो, वह समाज विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में कितनी भी प्रगति क्यों न कर ले, आत्मिक और नैतिक रूप से सदैव दरिद्र ही रहेगा। पुणे के आश्रम का यह पचास हजार रुपये का मासिक शुल्क हम सभी के लिए एक गंभीर चेतावनी है, जिसे यदि आज हमने अनदेखा कर दिया, तो आने वाले समय में बुढ़ापा केवल धनवानों का एक विशेषाधिकार बनकर रह जाएगा और देश की एक बहुत बड़ी गरीब आबादी के हिस्से में केवल लाचारी, सड़कों की धूल और घोर उपेक्षा ही आएगी। समय रहते इस बाजारवाद के विरुद्ध खड़े होना और अपनी सामाजिक आत्मा को जगाना आज के समय की सबसे बड़ी पुकार है।</p><p>- अशोक भाटिया<br>वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार, लेखक, समीक्षक एवं टिप्पणीकार</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 01 Oct 2026 11:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/high-tech-old-age-homes-and-the-marginalization-of-old-age</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[डिजिटल रुपया क्या है? यह यूपीआई से कैसे अलग है? इसे बिना इंटरनेट के चलाने के लिए आरबीआई क्या तैयारी कर रही है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/what-is-the-digital-rupee-how-is-it-different-from-upi]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>डिजिटल रुपया (e₹) और यूपीआई (UPI) दोनों डिजिटल भुगतान से जुड़े हैं, लेकिन दोनों की प्रकृति अलग है। आइए सबसे पहले जानते हैं कि डिजिटल रुपया क्या है? दरअसल डिजिटल रुपया या e₹ भारत की केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (CBDC) है। इसे भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) जारी करता है, इसलिए यह स्वयं रुपये का डिजिटल रूप है—जैसे ₹100 का नोट भौतिक रूप में है, वैसे ही e₹ डिजिटल रूप में। इसे डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है।</p><p>भारतीय रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि डिजिटल रुपया अब खुदरा व थोक दोनों क्षेत्रों में पायलट चरण में है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 'ई' ₹ को बैंकों और गैर-बैंक संस्थाओं के डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है। इससे व्यक्ति-से-व्यक्ति और व्यक्ति-से-दुकानदार भुगतान किया जा सकता है। गौरतलब है कि आरबीआई के 'ई'₹ वॉलेट में न्यूनतम राशि रखने की जरूरत नहीं है और इसके इस्तेमाल पर अलग से शुल्क नहीं है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/technologyarticles/tracking-upi-payments-is-now-simple-learn-how-to-check-transactions-from-various-apps" target="_blank" rel="noopener">UPI पेमेंट्स का हिसाब रखना हुआ आसान, ऐसे देखें अलग-अलग ऐप के लेनदेन</a></p><p>आरबीआई ने यह भी साफ किया है कि बिना इंटरनेट से संभव हो सकने वाला 'ई'₹ भुगतान अभी बड़े पैमाने पर आम लोगों के लिए शुरू नहीं हुआ है, क्योंकि इसके अलग-अलग तकनीकी विकल्पों का लगातार परीक्षण किया जा रहा है। इसलिए इसकी अंतिम तकनीक, लेन-देन की सीमा, सुरक्षा व्यवस्था और आम लोगों के लिए लॉन्च की तारीख को लेकर अभी कोई निश्चित घोषणा नहीं हुई है।</p><p>उल्लेखनीय है कि भारतीय रिजर्व बैंक &nbsp;ने 2022 में जारी ढांचे के तहत कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट या दूरसंचार कनेक्टिविटी के भी कुछ ऑफलाइन भुगतान की अनुमति दी थी, जिसके तहत भुगतान आमने-सामने यानी निकट दूरी पर किया जाता है। बाद में यूपीआई लाइट एक्स के जरिये एनएफसी आधारित ऑफलाइन भुगतान की सुविधा भी विकसित की गई।</p><p># अब आइए जानते हैं कि e₹ और UPI में मुख्य अंतर क्या है?</p><p>एक, डिजिटल रुपया (e₹) आरबीआई की डिजिटल मुद्रा है, जबकि UPI भुगतान का आधुनिक डिजिटल माध्यम है।</p><p>दो, डिजिटल रुपया (e₹) डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है, जबकि यूपीआई में बैंक खाते से सीधे भुगतान होता है।</p><p>तीन, डिजिटल रुपया व्यक्ति और दुकानदार के बीच सीधा भुगतान किया जा सकता है। जबकि यूपीआई क्यूआरकोड, मोबाइल नंबर या यूपीआई आईडी से भुगतान किया जा सकता है।</p><p>चार, भविष्य में ब्लू टूथ, एनएफसी के जरिए बिना इंटरनेट भुगतान की सुविधा देने पर काम हो रहा है। जबकि यूपीआई में सीमित ऑफलाइन विकल्प विकसित किए हुए हैं।</p><p>पांच, डिजिटल रुपया रुपये का डिजिटल रूप है जो&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;भुगतान करने का माध्यम/प्रणाली है। इसे आरबीआई जारी करता है। जबकि UPI का संचालन NPCI करता है।</p><p>छह, डिजिटल रुपया कहाँ रहता है? e₹ वॉलेट में बैंक खाते से भुगतान होता है। जबकि यूपीआई की भूमिका डिजिटल मुद्रापैसा भेजने का माध्यम है।</p><p>सात, डिजिटल रुपया भुगतान का आधार e₹ से e₹ वॉलेट में लेन-देन हो सकता है। बैंक खाते से बैंक खाते में भुगतान हो एकता &nbsp;है। अब इंटरनेट के बिना RBI इसके लिए ऑफलाइन तकनीकें विकसित/परीक्षण कर रहा है। जबकि UPI में भी UPI Lite X जैसी NFC-आधारित ऑफलाइन सुविधा है।</p><p>RBI स्वयं स्पष्ट करता है कि e₹ डिजिटल रुपये का रूप है, जबकि UPI भुगतान का माध्यम है। e₹ को बैंक खाते से निकालकर अलग डिजिटल वॉलेट में रखा जा सकता है और CBDC लेन-देन में धन सीधे दो e₹ वॉलेट के बीच स्थानांतरित हो सकता है। चूंकि बिना इंटरनेट e₹ चलाने की RBI की तैयारी है। इसलिए यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। RBI के अनुसार ऑफलाइन e₹ के लिए अलग-अलग तकनीकी समाधान तलाशे और परीक्षण किए जा रहे हैं। इनमें प्रमुख रूप से:</p><p>एक, Telecom-assisted offline: ऐसी व्यवस्था जिसमें इंटरनेट उपलब्ध न हो, लेकिन मोबाइल/टेलीकॉम कनेक्टिविटी उपलब्ध हो।</p><p>दो, NFC आधारित भुगतान: दो पास-पास रखे NFC-सक्षम उपकरणों के बीच संचार के जरिए लेन-देन। यानी भविष्य में इंटरनेट न होने पर भी बहुत छोटी दूरी में फोन को टैप करके भुगतान संभव बनाने की दिशा में काम हो रहा है। RBI ने इसे e₹ के ऑफलाइन प्रयोगों में शामिल बताया है।</p><p>तीन, RBI ने छोटे मूल्य के ऑफलाइन डिजिटल भुगतानों के लिए व्यापक ढांचा बनाया है: इसमें कार्ड, वॉलेट और मोबाइल उपकरणों के जरिए बिना इंटरनेट/टेलीकॉम कनेक्टिविटी के proximity यानी आमने-सामने भुगतान की व्यवस्था का प्रावधान है।</p><p>चार, एक आसान उदाहरण: मान लीजिए किसी दूरदराज के गांव में इंटरनेट बंद है। सामान्य UPI भुगतान में बैंक से भुगतान कराने के लिए नेटवर्क की समस्या आ सकती है। भविष्य के ऑफलाइन e₹ मॉडल में फोन के डिजिटल वॉलेट में पहले से मौजूद e₹ का इस्तेमाल स्थानीय रूप से किया जा सकेगा।</p><p>NFC जैसे समाधान में दो नजदीकी उपकरण आपस में डेटा का आदान-प्रदान कर सकते हैं। इसका उद्देश्य मूलतः डिजिटल भुगतान को नकदी जैसी उपलब्धता देना है—विशेषकर कमजोर इंटरनेट वाले ग्रामीण, दूरदराज या नेटवर्क-विहीन क्षेत्रों में।</p><p>एक पंक्ति में यदि कहूं तो UPI पैसे भेजने का डिजिटल रास्ता है, जबकि e₹ स्वयं डिजिटल रुपया है। RBI की ऑफलाइन रणनीति का लक्ष्य e₹ को इस तरह विकसित करना है कि इंटरनेट न होने पर भी डिजिटल भुगतान के कुछ रूप संभव हों।</p><p>- कमलेश पांडेय<br>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 18:02:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/what-is-the-digital-rupee-how-is-it-different-from-upi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[राजाओं को लड़ने के लिए देवियों ने दी तलवारें, NCERT Book के नये अध्याय में भारतीय प्रतिरोध की कहानी ने बदल डाली तस्वीर!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/ncert-class-9-textbook-resistance-resilience-goddess-swords-indian-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानि एनसीईआरटी एक बार फिर से सुर्खियों में है। दरअसल कक्षा नौ की सामाजिक विज्ञान पुस्तक ने भारतीय मध्यकालीन इतिहास को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है। मंगलवार को जारी ‘अंडरस्टैंडिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड—भाग दो’ में ‘रेजिस्टेंस एंड रेजिलिएंस’ यानी प्रतिरोध और दृढ़ता नामक अध्याय के जरिए सातवीं शताब्दी के बाद भारतीय उपमहाद्वीप में हुए लगातार आक्रमणों और उनके खिलाफ हुए प्रतिरोध को प्रमुखता दी गई है। पुस्तक में युद्ध और धार्मिक परंपराओं के संबंध का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सातवीं शताब्दी से अनेक राजा और राजकुमार संघर्ष के समय काली, दुर्गा, भवानी और शक्ति के अन्य रूपों को रक्षक के रूप में मानते थे।</p><p>सबसे चर्चित हिस्सा उन देवी-प्रदत्त तलवारों का है, जिनका उल्लेख पुस्तक ऐतिहासिक परंपराओं के संदर्भ में करती है। पुस्तक के अनुसार, बस्तर के शासक अन्नमरजा के बारे में मान्यता है कि उन्हें माणिक्यदेवी यानी दंतेश्वरी से तलवार प्राप्त हुई थी। इसी तरह विजयनगर के कुमार कम्पण के बारे में कहा गया है कि उन्होंने मदुरै में सल्तनत की सेनाओं के खिलाफ देवी से प्राप्त तलवार का इस्तेमाल किया। मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के बारे में भी पारंपरिक मान्यता का उल्लेख है कि उन्हें तुलजा भवानी से तलवार मिली थी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bpsc-receives-zero-applications-for-218-polytechnic-hod-posts-in-bihar" target="_blank" rel="noopener">BPSC को पॉलिटेक्निक संस्थानों में विभागाध्यक्ष के 218 पदों पर नहीं मिला एक भी आवेदन</a></p><p>हम आपको बता दें कि पुस्तक मध्यकालीन भारत को केवल राजवंशों के उत्थान-पतन के रूप में नहीं, बल्कि आक्रमण, संघर्ष और प्रतिरोध के लंबे दौर के रूप में प्रस्तुत करती है। इसमें कहा गया है कि सातवीं शताब्दी के बाद उपमहाद्वीप में लगातार आक्रमण हुए, जिनके पीछे क्षेत्रीय विस्तार के साथ धार्मिक उद्देश्य भी रहे। पुस्तक अरब, तुर्क, मुगल और यूरोपीय शक्तियों के खिलाफ भारतीय शासकों और समुदायों के प्रतिरोध को दर्ज करती है। राजपूतों, अहोमों, विजयनगर, मराठों, सिखों और जाटों के संघर्षों को भी इसमें स्थान दिया गया है।</p><p>अध्याय में यह भी कहा गया है कि भारतीय समाज ने बाहरी चुनौतियों का सामना केवल सैन्य स्तर पर नहीं किया, बल्कि अपनी परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखा। महाराणा प्रताप का अकबर के खिलाफ संघर्ष, अहोमों द्वारा मुगल विस्तार का प्रतिरोध और सरायघाट का युद्ध, विजयनगर की भूमिका तथा मराठों की स्वराज्य की अवधारणा को इसी संदर्भ में रखा गया है। हालांकि पुस्तक में मुगलों के साथ कछवाहों जैसे कुछ राजपूत समूहों के सहयोग का भी उल्लेख है, लेकिन समग्र प्रस्तुति में प्रतिरोध को अपेक्षाकृत अधिक प्रमुखता मिली है।</p><p>वहीं सिख इतिहास के हिस्से में मुगल शासन के दौरान गुरु अर्जन देव, गुरु तेग बहादुर और गुरु गोबिंद सिंह से जुड़े संघर्ष और बलिदान का उल्लेख करते हुए पुस्तक मुगल राज्य की सिख गुरुओं के प्रति क्रूरता को इतिहास में दुर्लभ उदाहरणों वाला बताती है। मंदिरों के विध्वंस और पुनर्निर्माण, काशी विश्वनाथ मंदिर, भक्ति परंपरा और सूफी परंपरा का भी अध्याय में उल्लेख है।</p><p>इस पूरी तस्वीर के बीच एनसीईआरटी प्रमुख दिनेश सकलानी ने कहा है कि माध्यमिक स्तर पर सामाजिक विज्ञान की पढ़ाई का उद्देश्य विद्यार्थियों में विश्लेषणात्मक क्षमता, आलोचनात्मक जिज्ञासा, संवाद की क्षमता और विभिन्न संस्कृतियों को समझने की क्षमता विकसित करना है। उनके अनुसार, नई पुस्तक इसी उद्देश्य को ध्यान में रखकर तैयार की गई है। देखा जाये तो नई किताब इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह केवल इतिहास के कुछ नए प्रसंग नहीं जोड़ती, बल्कि विद्यार्थियों के सामने मध्यकालीन भारत को देखने का एक अलग ढांचा रखती है, जहां आक्रमण के साथ प्रतिरोध, युद्ध के साथ आस्था और सत्ता के साथ सांस्कृतिक अस्तित्व की लड़ाई को केंद्रीय स्थान दिया गया है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 30 Sep 2026 13:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/ncert-class-9-textbook-resistance-resilience-goddess-swords-indian-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Surgical Strike की उस रात भारत ने दुश्मनों को कर दिया था स्पष्ट, छत पर छिपो या पाताल में, भारतीय सुरक्षा बल हर हाल में ढूँढ़ कर मार गिराएंगे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-surgical-strikes-10-years-uri-balakot-operation-sindoor-strategic-shift]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दस साल पहले 28-29 सितंबर की रात भारत ने नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के उन ठिकानों पर प्रहार किया था, जिन्हें लंबे समय से सीमा पार आतंक की मशीनरी का हिस्सा माना जाता रहा था। यह केवल कुछ आतंकी ठिकानों पर की गई सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि भारत की सुरक्षा नीति में एक निर्णायक मोड़ था। उरी हमले में 19 भारतीय सैनिकों की शहादत के बाद हुई 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने यह संकेत दिया था कि सीमा पार से आतंकवाद को केवल कूटनीतिक या सीमित सैन्य प्रतिक्रिया तक सीमित रखने का पुराना ढांचा बदल रहा है।</p><p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीते सप्ताह यानि 27 सितंबर 2026 को ‘मन की बात’ में इसी बदलाव को रेखांकित करते हुए 2016 की कार्रवाई को ऐतिहासिक उपलब्धि बताया था। उन्होंने कहा कि भारतीय सैनिक नियंत्रण रेखा पार कर आतंकवाद के खिलाफ कार्रवाई करने में सक्षम हैं, यह देखकर दुनिया हैरान रह गई थी। प्रधानमंत्री ने 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक को बालाकोट और 2025 के ऑपरेशन सिंदूर से जोड़ते हुए भारत की आतंकवाद विरोधी नीति में लगातार आए बदलाव को सामने रखा था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pakistan-absurd-questions-india-precise-answers" target="_blank" rel="noopener">पाकिस्तान के बेतूके सवालः भारत के सटीक जबाव</a></p><p>देखा जाये तो असल बदलाव समझने के लिए 2016 से पहले की तस्वीर देखनी होगी। संसद हमले और 2008 के मुंबई हमले जैसे बड़े आतंकवादी हमलों के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी रणनीतिक दुविधा यही थी कि पाकिस्तान की धरती से संचालित आतंकवाद का सैन्य जवाब देने पर कहीं दो परमाणु-संपन्न देशों के बीच व्यापक युद्ध न छिड़ जाए। इसी आशंका ने लंबे समय तक भारत की नीति को संयम की सीमा में रखा। लेकिन उरी ने इस गणित को बदल दिया।</p><p>28-29 सितंबर 2016 को भारतीय विशेष बलों ने नियंत्रण रेखा पार कर पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में आतंकी घुसपैठ के लिए इस्तेमाल किए जा रहे ठिकानों को निशाना बनाया। सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि सरकार ने इस कार्रवाई को सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया। संदेश बिल्कुल स्पष्ट था कि आतंकवाद और उसके बुनियादी ढांचे के बीच दूरी बनाकर भारत को रोकने की रणनीति अब पहले जैसी प्रभावी नहीं मानी जाएगी।</p><p>यहीं से भारत की प्रतिरोधक रणनीति का नया अध्याय शुरू हुआ। 2019 में पुलवामा हमले के बाद बालाकोट में हवाई कार्रवाई ने जवाब की भौगोलिक सीमा को नियंत्रण रेखा से आगे बढ़ाया। यानी 2016 में जहाँ जमीनी कार्रवाई नियंत्रण रेखा के पार आतंकी ठिकानों तक पहुँची थी, वहीं बालाकोट एअर स्ट्राइक ने यह दिखाया कि भारत आवश्यकता पड़ने पर पाकिस्तान के भीतर भी आतंकवादी बुनियादी ढांचे को निशाना बना सकता है।</p><p>फिर 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर ने इस रणनीति को एक और स्तर पर पहुँचा दिया। 7 मई 2025 को पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मोदी सरकार ने इसे केंद्रित और नियंत्रित कार्रवाई बताया तथा कहा कि पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना नहीं बनाया गया। यानी उरी, बालाकोट और ऑपरेशन सिंदूर, यह तीनों एक जैसी सैन्य कार्रवाइयाँ नहीं थीं। इनके तरीके, हथियार, लक्ष्य और भौगोलिक दायरे अलग थे। लेकिन इनके पीछे दिखाई देने वाला रणनीतिक संदेश एक ही था कि भारत आतंकवादी हमले और उसके पीछे मौजूद बुनियादी ढांचे को पूरी तरह अलग-अलग घटनाएँ मानकर नहीं चलेगा।</p><p>इस तरह 2016 का अभियान भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा सोच में निर्णायक बदलाव था। भारत ने तथाकथित ‘रणनीतिक संयम’ से आगे बढ़कर ऐसी प्रतिरोधात्मक कार्रवाई की दिशा पकड़ी जिसमें पूर्ण युद्ध की सीमा पार किए बिना अपनी क्षमता दिखाई गई। यही इस बदलाव का सबसे बड़ा रणनीतिक अर्थ है। इसका निशाना केवल आतंकवादी संगठन नहीं, बल्कि प्रॉक्सी युद्ध का पूरा गणित है। हालांकि भारत की कार्रवाइयों के बावजूद प्रॉक्सी युद्ध समाप्त नहीं हुआ है। खतरे ने अपना रूप बदला है। ड्रोन के जरिए हथियार और मादक पदार्थ भेजना, छोटे प्रशिक्षित घुसपैठ दल और कम दृश्यता वाली आतंकवादी कार्रवाइयाँ इसी बदलती रणनीति का हिस्सा मानी जा रही हैं। जम्मू क्षेत्र और पीर पंजाल के दक्षिण में बढ़ा सुरक्षा फोकस भी इसी बदलाव को दर्शाता है।</p><p>बहरहाल, दस साल पहले सवाल था कि आतंकी हमले के बाद भारत जवाब देगा या नहीं? उरी के बाद वह सवाल बदल गया। अब सवाल यह है कि जवाब किस स्तर पर होगा, उसकी सीमा क्या होगी और आतंकवाद के पीछे मौजूद ढांचे पर उसकी कीमत कितनी भारी पड़ेगी। 2016 की सर्जिकल स्ट्राइक ने इस बदलाव को दृश्यमान किया; बालाकोट ने उसे आगे बढ़ाया और ऑपरेशन सिंदूर ने उसकी अगली तस्वीर सामने रख दी। यही बीते दशक का सबसे बड़ा सामरिक संदेश है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 29 Sep 2026 13:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-surgical-strikes-10-years-uri-balakot-operation-sindoor-strategic-shift</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pakistan के भीतर जाकर भारत ने किया आतंकवाद पर करारा प्रहार! Islamabad में SCO Meeting Attend कर India ने चल दिया बड़ा दाँव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-pakistan-sco-islamabad-counter-terrorism-diplomacy]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच दुश्मनी की तलवारें खिंची हुई हों, भले ही हाल ही में संयुक्त राष्ट्र महासभा के वार्षिक सत्र के दौरान दोनों देशों के बीच चले वाकयुद्ध को पूरी दुनिया ने देखा हो, लेकिन भारत ने पाकिस्तान की अध्यक्षता में हुई शंघाई सहयोग संगठन यानि एससीओ की राष्ट्रीय समन्वयक बैठक में हिस्सा लेकर दुनिया को एक बड़ा कूटनीतिक संदेश दे दिया है। 28 से 30 सितंबर तक इस्लामाबाद में हो रही इस बैठक में भारत की ओर से संयुक्त सचिव आलोक डिमरी प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। पाकिस्तान की 2026-27 की अध्यक्षता में यह पहली बड़ी बैठक है, जिसमें संगठन के आगामी कार्यक्रमों और बैठकों का कैलेंडर तय किया जाना है। भारत की इस भागीदारी ने साफ कर दिया है कि नई दिल्ली बहुपक्षीय मंचों से पीछे हटने की बजाय वहां अपनी रणनीतिक मौजूदगी और प्रभाव को और मजबूत करने की नीति पर आगे बढ़ रही है। साथ ही, आतंकवाद और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर भारत का कड़ा रुख भी बरकरार है।</p><p>हम आपको बता दें कि पाकिस्तान ने अपनी अध्यक्षता के लिए ‘दृष्टि को कार्रवाई में बदलना: संपर्क, नवाचार और साझा समृद्धि’ का विषय चुना है। इस एजेंडे के जरिए इस्लामाबाद क्षेत्रीय संपर्क, आर्थिक सहयोग, नवाचार और लोगों के बीच संपर्क बढ़ाने का संदेश देना चाहता है। लेकिन पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती यही है कि जिस मंच को वह अपनी कूटनीतिक सक्रियता दिखाने के अवसर के रूप में पेश कर रहा है, उसी मंच पर भारत लगातार आतंकवाद के प्रश्न को केंद्रीय सुरक्षा मुद्दे के रूप में सामने रखता आया है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/india-delivers-a-scathing-retort-to-pakistan-at-the-un" target="_blank" rel="noopener">UN में भारत का पाकिस्तान पर जोरदार पलटवार, कश्मीर से ओसामा तक की याद दिलाई</a></p><p>उल्लेखनीय है कि भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय स्तर पर लंबे समय से कोई सार्थक व्यापक संवाद नहीं है। इसके बावजूद भारत ने शंघाई सहयोग संगठन के बहुपक्षीय ढांचे को द्विपक्षीय विवादों से अलग रखा है। यही नई दिल्ली की कूटनीतिक रणनीति का महत्वपूर्ण पहलू है। पाकिस्तान के साथ सामान्य द्विपक्षीय संबंधों की बहाली और बहुपक्षीय मंच पर भारत की भागीदारी, दोनों को अलग-अलग रखा गया है।</p><p>यहीं पाकिस्तान की कूटनीतिक चुनौती स्पष्ट होती है। इस्लामाबाद को एससीओ की अध्यक्षता मिली है, लेकिन भारत के साथ उसके संबंधों में वह परिस्थितियां अब भी मौजूद हैं जिनके कारण व्यापक द्विपक्षीय संवाद बंद पड़ा है। इसके बावजूद भारत पाकिस्तान की मेजबानी में होने वाली संगठनात्मक बैठकों में भाग लेकर यह संदेश दे रहा है कि बहुपक्षीय संस्थाओं को बंधक बनाकर द्विपक्षीय विवादों का समाधान नहीं किया जा सकता।</p><p>हम आपको यह भी बता दें कि भारत के एजेंडे में आतंकवाद का मुद्दा एक बार फिर सबसे ऊपर रहने वाला है। खास बात यह है कि इस बार जवाब पाकिस्तान की जमीन पर, उसी के मंच पर दिया जाएगा। पाकिस्तान जब एससीओ के क्षेत्रीय आतंकवाद-रोधी ढांचे की अध्यक्षता कर रहा है, तब भारत के लिए यह मंच इस्लामाबाद को आतंकवाद के सवाल पर सीधे घेरने का महत्वपूर्ण अवसर है। नई दिल्ली लगातार आतंकवाद, उग्रवाद और अलगाववाद के खिलाफ सामूहिक कार्रवाई की मांग करती रही है। साथ ही भारत सीमा पार आतंकवाद तथा संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रतिबंधित आतंकी संगठनों के खिलाफ ठोस कार्रवाई को पाकिस्तान के साथ संबंध सुधारने की बुनियादी शर्त मानता है। ऐसे में एससीओ के मंच से पाकिस्तान में ही आतंकवाद का मुद्दा उठाना इस्लामाबाद के लिए कहीं अधिक कड़ा कूटनीतिक संदेश होगा।</p><p>साथ ही कनेक्टिविटी के सवाल पर भी भारत की स्थिति स्पष्ट है। नई दिल्ली एससीओ के संपर्क और क्षेत्रीय आर्थिक सहयोग से जुड़े प्रयासों का समर्थन करती है, लेकिन उसकी स्पष्ट शर्त है कि ऐसी कोई भी परियोजना सदस्य देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का उल्लंघन नहीं कर सकती। यानी भारत संपर्क के खिलाफ नहीं है, बल्कि वह संपर्क के नाम पर विवादित क्षेत्रों अथवा संप्रभुता से जुड़े सिद्धांतों को दरकिनार करने के खिलाफ अपनी स्थिति कायम रखता है।</p><p>भारत की यही नीति पिछले वर्षों में भी दिखाई दी है। 2017 में एससीओ का पूर्ण सदस्य बनने के बाद भारत ने संगठन की विभिन्न गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की। अक्टूबर 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर पाकिस्तान में एससीओ के शासनाध्यक्षों की बैठक में शामिल हुए थे। जुलाई 2026 में भी भारतीय प्रतिनिधिमंडल सीमा सुरक्षा से जुड़े एससीओ कार्यक्रम के लिए इस्लामाबाद गया था। भारतीय अधिकारी एससीओ के आतंकवाद-रोधी ढांचे से जुड़े अभ्यासों और विशेषज्ञ बैठकों में भी भाग लेते रहे हैं।</p><p>अब नजर 2027 पर है। पाकिस्तान अगस्त 2027 में इस्लामाबाद में एससीओ राष्ट्राध्यक्ष शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। पाकिस्तान ने संकेत दिया है कि संगठन के सभी सदस्य देशों के नेताओं को निमंत्रण दिया जाएगा, जिसमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी शामिल होंगे। लेकिन निमंत्रण मिलना और प्रधानमंत्री का पाकिस्तान जाना दो अलग-अलग विषय हैं।</p><p>हम आपको यह भी बता दें कि शंघाई सहयोग संगठन की स्थापना 2001 में चीन, रूस, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान और उज्बेकिस्तान ने की थी। भारत और पाकिस्तान 2017 में पूर्ण सदस्य बने थे। बाद में ईरान और बेलारूस भी इसमें शामिल हुए। संगठन का दायरा सुरक्षा से लेकर आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय संपर्क और आतंकवाद, अलगाववाद तथा उग्रवाद के खिलाफ सहयोग तक फैला हुआ है।</p><p>बहरहाल, इस्लामाबाद की बैठक महज एक प्रशासनिक बैठक नहीं है। पाकिस्तान इसे अपनी अध्यक्षता के प्रभाव को स्थापित करने के अवसर के रूप में देख रहा है, जबकि भारत इसी मंच का इस्तेमाल अपनी सुरक्षा प्राथमिकताओं, आतंकवाद-विरोधी दृष्टिकोण और क्षेत्रीय संपर्क संबंधी सिद्धांतों को मजबूती से रखने के लिए कर रहा है। पाकिस्तान के सामने चुनौती यह है कि संगठन की अध्यक्षता उसके हाथ में होने के बावजूद भारत की भागीदारी उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि भारत की घोषित रणनीतिक प्राथमिकताओं के साथ आगे बढ़ रही है। यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण सामरिक और कूटनीतिक संदेश है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 28 Sep 2026 18:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-pakistan-sco-islamabad-counter-terrorism-diplomacy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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