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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[आप सांसद राघव चड्डा के भाजपा में शामिल होने से पंजाब में आप सरकार की हिल सकती है नींव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/raghav-chadha-joining-the-bjp-could-shake-the-foundations-of-the-aap-government-in-punjab]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली के बाद भाजपा अब पंजाब से भी आम आदमी पार्टी को बेदखल करेगी। इसी के चलते उसने ऑपरेशन लोटस राज्यसभा को अंजाम दिया। बता दें कि आम आदमी पार्टी से राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा ने उपनेता पद से हटाए जाने के बाद हाल ही में आप (AAP) छोड़कर भाजपा में खुशी खुशी शामिल होने का ऐलान किया, जिसमें राज्यसभा के दो-तिहाई आप सांसद (लगभग 7 में से 10) उनके साथ हैं। इससे साफ है कि अब पंजाब में आप की सरकार भी हिलाई जाएगी।</div><div><br></div><div>संविधान के जानकार बताते हैं कि चड्डा का यह कदम संविधान के विलय प्रावधानों के तहत लिया गया, जिससे आप को संसदीय ताकत में बड़ा झटका लगा। लिहाजा, इसके राजनीतिक मायने तलाशे जा रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सांसद राघव चड्ढा ने गत 24 अप्रैल को प्रेस कॉन्फ्रेंस में घोषणा की कि वे संदीप पाठक, अशोक मित्तल समेत अन्य सांसदों के साथ बीजेपी में विलय कर रहे हैं। उन्होंने आप पर सिद्धांतों से भटकने का आरोप लगाया और खुद को "गलत पार्टी में सही आदमी" बताया। आप ने इसे ऑपरेशन लोटस करार दिया, लेकिन विलय के कारण एंटी-डिफेक्शन कानून लागू नहीं होता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/major-crisis-for-the-aap-when-will-kejriwal-step-down-from-the-post-of-party-supremo" target="_blank">आम आदमी पार्टी पर बड़ा संकट- केजरीवाल कब छोड़ेंगे पार्टी सुप्रीमो की कुर्सी?</a></h3><div>चूंकि भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित लाभ की स्थिति है क्योंकि बीजेपी को युवा, वाक्पटु और शहरी चेहरे के रूप में चड्ढा मिला, जो विपक्ष के सॉफ्ट वोट बैंक में घुसपैठ करेगा। राज्यसभा में संख्या बढ़ेगी और दिल्ली-पंजाब में आप के संगठन को कमजोर करने में मदद मिलेगी। यह नैरेटिव वॉर में बीजेपी को बढ़त देता है, जहां चड्ढा आप मॉडल पर सवाल उठा सकते हैं। आपने गौर किया होगा कि जनहितकारी मुद्दों को लेकर चड्डा ने सोशल मीडिया में एक अभियान चलवाया था और राज्यसभा में भी आमलोगों के मुद्दे को उठाया, जिससे उनकी राष्ट्रीय लोकप्रियता बढ़ी और भाजपा ने उन्हें हाथोंहाथ लोक लिया।</div><div><br></div><div>समझा जा रहा है कि पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में भाजपा उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार भी घोषित कर सकती है। इससे आप भी भावी रणनीति पर गहरा प्रभाव पड़ेगा। जहां तक आप पर प्रभाव की बात है तो आप की राज्यसभा ताकत 10 से घटकर 3 रह गई, जो राष्ट्रीय महत्वाकांक्षा को चोट पहुंचाएगी। वहीं दूसरी पंक्ति लीडरशिप कमजोर हुई, क्लीन पॉलिटिक्स की इमेज पर दरार आई और कैडर मनोबल गिरा। पंजाब में संगठनात्मक नुकसान होगा, खासकर 2027 चुनावों से पहले। चूंकि राघव चड्ढा ने आप&nbsp; छोड़ने का मुख्य कारण पार्टी के मूल सिद्धांतों, मूल्यों और नैतिकता से भटक जाना बताया। उन्होंने कहा कि उन्होंने 15 साल अपनी जवानी दी, लेकिन अब पार्टी व्यक्तिगत फायदे के लिए काम कर रही है और भ्रष्टाचार हटाने वाली पार्टी समझौतों में उलझ गई।</div><div><br></div><div>जहां तक व्यक्तिगत कारण की बात है तो चड्ढा ने पार्टी की गतिविधियों से खुद को अलग किया क्योंकि वे "उनके गुनाहों में शामिल नहीं होना चाहते थे।" उन्होंने खुद को "गलत पार्टी में सही आदमी" करार दिया। प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि आप अब देश के लिए नहीं, पर्सनल एजेंडे पर चल रही है। समझा जाता है कि यह पार्टी कार्रवाई का दुष्प्रभाव है क्योंकि आप ने उन्हें राज्यसभा उपनेता पद से हटाया और सदन में बोलने पर रोक लगाई, जिसे अशोक मित्तल को सौंपा गया। संजय सिंह की गिरफ्तारी के बाद राज्यसभा नेता बनने की कोशिश नाकाम रही, जो तल्खी बढ़ाने वाला था। ये कदम चड्ढा को पंजाब जाने पर मजबूर कर दिए।</div><div><br></div><h2># जानिए, आप के बाकी सांसद कौन थे जो बीजेपी में शामिल हुए</h2><div><br></div><div>राघव चड्ढा के अलावा आप के 6 अन्य राज्यसभा सांसदों ने बीजेपी में विलय किया, जो कुल 7 सांसदों का समूह बनाते हैं। यह विलय पंजाब और अन्य क्षेत्रों के सांसदों पर केंद्रित था, जिससे आप की राज्यसभा ताकत 10 से घटकर 3 रह गई। भाजपा में शामिल अन्य सांसदों की सूची निम्नलिखित है- संदीप पाठक (राष्ट्रीय संगठन महामंत्री, IIT ग्रेजुएट), अशोक मित्तल (शिक्षाविद, लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी संस्थापक), हरभजन सिंह (क्रिकेटर), स्वाति मालीवाल (पूर्व DCW चीफ), राजेंद्र गुप्ता (ट्राइडेंट ग्रुप संस्थापक, पद्म श्री), विक्रमजीत सिंह साहनी (उद्योगपति, सन फाउंडेशन प्रमुख)। ये ज्यादातर पंजाब से राज्यसभा सदस्य थे, जिन्होंने चड्ढा के नेतृत्व में विलय का हस्ताक्षर किया।।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, आप ने इसे ऑपरेशन लोटस बताया, लेकिन विलय प्रावधान के तहत कोई अयोग्यता नहीं हुई। अरविंद केजरीवाल ने राघव चड्ढा और अन्य आप सांसदों की बगावत पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए बीजेपी पर पंजाबियों को धोखा देने का आरोप लगाया। उन्होंने सोशल मीडिया X पर ट्वीट किया, "बीजेपी ने एक बार फिर पंजाबियों को धोखा दिया है।" केजरीवाल ने इसे पंजाब सरकार को कमजोर करने की साजिश बताया और अमित शाह व नरेंद्र मोदी से अपील की कि "यह घिनौना काम पंजाब की जनता कभी माफ नहीं करेगी।" यह पहली प्रतिक्रिया थी, जिसमें उन्होंने सांसदों पर सीधे निशाना साधने से परहेज किया।</div><div><br></div><div>वहीं, आप नेताओं की प्रतिक्रिया भी आई है। संजय सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसे "ऑपरेशन लोटस" करार दिया और कहा कि पंजाब की जनता भाजपा को माफ नहीं करेगी। पार्टी ने इसे भाजपा की साजिश बताया, लेकिन विलय प्रावधान के कारण कानूनी कार्रवाई मुश्किल हुई।</div><div>&nbsp;</div><div>संजय सिंह ने राघव चड्ढा और अन्य 7 आप सांसदों की बगावत को "पंजाब के साथ गद्दारी" करार दिया। उन्होंने इसे BJP का "ऑपरेशन लोटस" बताया, जिसमें प्रशासनिक तंत्र का दुरुपयोग कर भगवंत मान सरकार को तोड़ने की साजिश रची गई। संजय सिंह ने कहा, "प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से कहना चाहता हूं कि भगवंत मान के अच्छे कार्यों को रोकने के लिए आपने जो किया, पंजाब की जनता कभी माफ नहीं करेगी।" उन्होंने दलबदलुओं को चेतावनी दी कि आप ने इन्हें संसद तक पहुंचाया, लेकिन इन्होंने पंजाब जनता को धोखा दिया।</div><div><br></div><div>वहीं राजनीतिक निशाना साधते हुए&nbsp; सिंह ने बीजेपी पर पंजाब सरकार के शिक्षा-स्वास्थ्य मॉडल को नष्ट करने का आरोप लगाया और कहा कि ये सांसदों को पंजाब की जनता माफ नहीं करेगी। यह प्रतिक्रिया पार्टी की रणनीति का हिस्सा बनी, जहां जनता को भावुक अपील की गई।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:58:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/raghav-chadha-joining-the-bjp-could-shake-the-foundations-of-the-aap-government-in-punjab</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या हम कृत्रिम मेधा के प्रयोग से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/are-we-prepared-for-the-crises-arising-from-the-use-of-artificial-intelligence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के इतिहास में तकनीकी क्रांतियों ने सदैव हमारे अस्तित्व की दिशा को बदला है, किंतु वर्तमान में कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का जो तीव्र विस्तार हम देख रहे हैं, वह पूर्ववर्ती सभी आविष्कारों से मौलिक रूप से भिन्न है। यह केवल एक उपकरण नहीं, बल्कि एक समानांतर बुद्धिमत्ता है जो हमारे सोचने, निर्णय लेने और सामाजिक ताने-बाने को समझने के पारंपरिक तरीकों को चुनौती दे रही है। आज जब हम इस प्रश्न पर विचार करते हैं कि क्या हम इस तकनीक से उत्पन्न संकटों के लिए तैयार हैं, तो उत्तर केवल तकनीकी प्रगति में नहीं, बल्कि हमारी नैतिक, कानूनी और सामाजिक तैयारियों में छिपा है। वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में जेनेरेटिव एआई के उदय ने सूचनाओं की सत्यता पर एक गहरा प्रश्नचिह्न लगा दिया है। डीपफेक तकनीक और परिष्कृत एल्गोरिदम के माध्यम से जिस प्रकार से भ्रामक सूचनाएं या मिसइन्फॉर्मेशन फैलाई जा रही हैं, उसने न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को प्रभावित किया है, बल्कि व्यक्तिगत गरिमा को भी जोखिम में डाल दिया है। अंतरराष्ट्रीय साइबर सुरक्षा रिपोर्टों के अनुसार, पिछले 2 वर्षों में एआई-जनित भ्रामक सामग्रियों में 900 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। यह स्थिति दर्शाती है कि हमारी कानूनी प्रणालियां और डिजिटल साक्षरता के मानक इस गति का मुकाबला करने में फिलहाल अक्षम सिद्ध हो रहे हैं।</div><div><br></div><div>आर्थिक दृष्टिकोण से देखें तो कृत्रिम मेधा का प्रभाव रोजगार के बाजारों पर अत्यंत गहरा और बहुआयामी होने वाला है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम की भविष्य की नौकरियों से जुड़ी रिपोर्टों के अनुसार, एआई और ऑटोमेशन के कारण अगले दशक में करोड़ों नौकरियों के स्वरूप में आमूलचूल परिवर्तन आएगा। जहाँ एक ओर यह तकनीक उत्पादकता बढ़ाने और नए प्रकार के व्यवसायों को जन्म देने की क्षमता रखती है, वहीं दूसरी ओर यह निम्न और मध्यम कौशल वाले श्रमिकों के लिए एक बड़ा विस्थापन संकट भी पैदा कर रही है। क्या हमारी शिक्षा प्रणालियां और कौशल विकास कार्यक्रम इस गति से परिवर्तित हो रहे हैं कि वे भविष्य की कार्यशक्ति को इस नई व्यवस्था के अनुकूल बना सकें? यह प्रश्न अनुत्तरित है क्योंकि विकासशील देशों में डिजिटल विभाजन आज भी एक कठोर वास्तविकता है। जब तक हम एक समावेशी तकनीकी ढांचे का निर्माण नहीं करते, तब तक कृत्रिम मेधा केवल वैश्विक असमानता को बढ़ाने का एक माध्यम बनकर रह जाएगी। इसके अतिरिक्त, एआई मॉडल्स के भीतर मौजूद 'एल्गोरिथमिक बायस' या पक्षपात एक और बड़ा संकट है, जो ऐतिहासिक डेटा के आधार पर लिंग, जाति और राष्ट्रीयता के प्रति पूर्वाग्रहों को अनजाने में सुदृढ़ कर रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values" target="_blank">कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुविधा का वरदान या मूल्यों का संकट</a></h3><div>तकनीकी सुरक्षा और स्वायत्त हथियारों का मुद्दा कृत्रिम मेधा के सबसे भयावह संकटों में से एक है। 'लीथल ऑटोनॉमस वेपन्स सिस्टम्स' या स्वायत्त घातक हथियार प्रणालियों का विकास वैश्विक शांति के लिए एक नई चुनौती पेश कर रहा है। जब युद्ध के मैदान में जीवन और मृत्यु का निर्णय एक एल्गोरिदम द्वारा लिया जाने लगेगा, तो मानवीय उत्तरदायित्व और युद्ध के अंतरराष्ट्रीय कानूनों का क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र और कई वैश्विक मानवाधिकार संगठनों ने इस पर नियंत्रण की अपील की है, लेकिन महाशक्तियों के बीच एआई की प्रतिस्पर्धा ने एक नई डिजिटल शीत युद्ध जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। यह तकनीकी रेस हमें एक ऐसे बिंदु पर ले जा सकती है जहाँ नियंत्रण की लगाम मानव के हाथ से निकलकर मशीनों के पास चली जाए। सुरक्षा का अर्थ केवल भौतिक हथियारों से नहीं है, बल्कि डेटा की गोपनीयता और एल्गोरिदम के माध्यम से किए जाने वाले 'बिहेवियरल मैनिपुलेशन' या व्यवहारिक हेरफेर से भी है। बड़ी तकनीकी कंपनियाँ जिस प्रकार डेटा का एकत्रीकरण कर रही हैं, वह व्यक्तिगत स्वतंत्रता और स्वायत्तता को एक संकीर्ण घेरे में बंद कर रहा है।</div><div><br></div><div>पर्यावरणीय दृष्टिकोण से भी कृत्रिम मेधा की तैयारी पर प्रश्न उठना लाजिमी है। विशाल एआई मॉडल्स को प्रशिक्षित करने के लिए अत्यधिक ऊर्जा और जल संसाधनों की आवश्यकता होती है, जो कार्बन उत्सर्जन के लक्ष्यों को प्राप्त करने में बाधा उत्पन्न कर सकता है। एक शोध के अनुसार, एक बड़े लैंग्वेज मॉडल को प्रशिक्षित करने में उतनी कार्बन फुटप्रिंट पैदा होती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में उत्सर्जित करती हैं। जलवायु परिवर्तन के संकट से जूझती दुनिया के लिए यह एक अतिरिक्त भार है। इसलिए, जब हम एआई के संकटों की बात करते हैं, तो हमें 'सस्टेनेबल एआई' या संवहनीय कृत्रिम मेधा की दिशा में भी ठोस कदम उठाने होंगे। क्या हमारे पास ऐसी नीतियां हैं जो इन कंपनियों को पर्यावरणीय रूप से उत्तरदायी बना सकें? वर्तमान में अधिकांश विनियमन केवल लाभ और तकनीकी श्रेष्ठता पर केंद्रित हैं, जबकि पारिस्थितिक संतुलन को हाशिए पर धकेल दिया गया है।</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः कृत्रिम मेधा के संकटों के लिए हमारी तैयारी अभी भी प्रारंभिक और खंडित अवस्था में है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर 'यूरोपीय संघ एआई अधिनियम' जैसे प्रयास एक सकारात्मक दिशा दिखाते हैं, लेकिन यह वैश्विक स्तर पर एक समान मानकों के बिना अपर्याप्त हैं। हमें एक ऐसे वैश्विक गठबंधन की आवश्यकता है जो न केवल तकनीक के विकास की निगरानी करे, बल्कि मानवीय मूल्यों, नैतिकता और न्याय को इसके केंद्र में रखे। तैयारी का अर्थ केवल उन्नत फायरवॉल बनाना नहीं है, बल्कि एक जागरूक समाज का निर्माण करना है जो सत्य और मिथ्या के बीच अंतर कर सके। कृत्रिम मेधा एक शक्तिशाली लहर की तरह है, जिसे रोका नहीं जा सकता, लेकिन यदि हम इसके लिए सही बांध और नहरें तैयार नहीं करते, तो यह हमारी सामाजिक व्यवस्था के तटबंधों को नष्ट कर सकती है। हमें तकनीकी प्रगति के साथ-साथ अपनी नैतिक चेतना को भी उन्नत करना होगा, क्योंकि अंततः तकनीक का उद्देश्य मानव कल्याण होना चाहिए, न कि उसका विनाश। समय कम है और चुनौतियां अपार हैं, अतः भविष्य की तैयारी के लिए हमें आज ही अपनी प्राथमिकताओं को पुन: परिभाषित करना होगा।</div><div><br></div><div>- डॉ. शैलेश शुक्ला</div><div>वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह</div><div>सलाहकार संपादक, नईदुनिया</div><div>आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:28:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/are-we-prepared-for-the-crises-arising-from-the-use-of-artificial-intelligence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[पुस्तकें हैं जीवन का दीप, समाधान का सेतु]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/books-are-the-lamp-of-life-the-bridge-to-solutions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर वर्ष 23 अप्रैल को समूचा विश्व ज्ञान, सृजनशीलता और मानवीय सभ्यता की अमूल्य धरोहर पुस्तकों का उत्सव मनाता है। यूनेस्को द्वारा 1995 में प्रारंभ किया गया यह दिवस केवल औपचारिक आयोजन नहीं, बल्कि लेखकों के सम्मान, सृजनाधिकार की रक्षा और पठन संस्कृति के संवर्धन का वैश्विक संकल्प है। इस तिथि का चयन भी अत्यंत अर्थपूर्ण है, क्योंकि इसी दिन विलियम शेक्सपियर और मिगुएल डी सर्वांटेस जैसे महान साहित्यकारों का अवसान हुआ, जिनकी रचनाओं ने मानव सभ्यता को नई दिशा दी। वर्ष 2026 में इस दिवस का मुख्य संदेश यह है कि व्यक्ति अपनी रुचियों के अनुसार पढ़े और पठन को आनंदमय अनुभव बनाए। आज आवश्यकता इस बात की है कि पढ़ने को बोझ नहीं, बल्कि आत्मविकास और आत्मानंद का माध्यम माना जाए। इसी क्रम में मोरक्को की राजधानी रबात को वर्ष 2026 के लिए विश्व पुस्तक राजधानी घोषित किया गया है, जो इस तथ्य को रेखांकित करता है कि पुस्तक संस्कृति किसी एक देश की नहीं, बल्कि समूची मानवता की साझा धरोहर है।</div><div><br></div><div>पुस्तकें केवल कागज और शब्दों का संयोजन नहीं होतीं, वे जीवन का साक्षात अनुभव कराती हैं। वे समय, समाज और संवेदनाओं का जीवंत इतिहास होती हैं। महान कवि रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था कि उच्च शिक्षा केवल जानकारी प्रदान नहीं करती, बल्कि जीवन को संतुलित और शांतिपूर्ण बनाती है। यही कार्य पुस्तकें करती हैं, वे मनुष्य के भीतर विवेक, करुणा और सहिष्णुता का विकास करती हैं। संकट के समय में पुस्तकें सच्चे मित्र की तरह साथ निभाती हैं, यह तथ्य वैश्विक महामारी के दौर में स्पष्ट रूप से देखने को मिला, जब लोगों ने अकेलेपन और अनिश्चितता के बीच पुस्तकों में ही आश्रय पाया। भारत में पुस्तक संस्कृति का इतिहास अत्यंत प्राचीन और गौरवपूर्ण रहा है। वेद, उपनिषद, रामायण और महाभारत जैसे ग्रंथों ने न केवल भारतीय समाज को दिशा दी, बल्कि समूचे विश्व को ज्ञान का प्रकाश प्रदान किया। नालंदा विश्वविद्यालय और तक्षशिला विश्वविद्यालय जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय ज्ञान के ऐसे केंद्र थे, जहाँ दूर-दूर से विद्यार्थी अध्ययन हेतु आते थे। ताड़पत्रों और भोजपत्रों पर लिखी गई पांडुलिपियों ने भारतीय ज्ञान परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित रखा। यह परंपरा केवल धार्मिक ग्रंथों तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें विज्ञान, चिकित्सा, साहित्य और दर्शन के विविध आयाम समाहित थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/the-erosion-of-book-culture-the-harbinger-of-an-impending-crisis" target="_blank">World Book and Copyright Day: पुस्तक संस्कृति का क्षरण, आने वाले संकट की आहट</a></h3><div>जीवन के अंधकारमय क्षणों में पुस्तकें सचमुच एक दीपक की तरह मार्ग को प्रकाशित करती हैं। जब मनुष्य समस्याओं, तनाव और द्वंद्व से घिर जाता है, तब पुस्तकें उसे नया दृष्टिकोण प्रदान करती हैं। वे केवल ज्ञान का भंडार नहीं, बल्कि एक सच्चे मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक के रूप में उसकी चेतना को जागृत करती हैं। पुस्तकें हमें यह सिखाती हैं कि हर समस्या का समाधान बाहर नहीं, भीतर की समझ और दृष्टि में छिपा होता है। चीनी दार्शनिक कन्फ्यूशियस ने भी कहा था कि “अज्ञानता मन का अंधकार है और ज्ञान ही उसका प्रकाश।” इसी प्रकार महान् दार्शनिक आचार्य महाप्रज्ञ ने जीवन की सरलता और संतुलन पर बल देते हुए बताया कि सच्चा ज्ञान वही है जो मन को शांत और संतुलित बनाए। पुस्तकें इसी संतुलन की साधना कराती हैं-वे हमें सोचने, समझने और धैर्यपूर्वक निर्णय लेने की क्षमता प्रदान करती हैं। आधुनिक भारत में भी पुस्तक संस्कृति को सशक्त बनाने के लिए अनेक प्रयास किए गए हैं। आचार्य विनोबा भावे द्वारा स्थापित सर्वोदय साहित्य भंडार तथा आचार्य तुलसी द्वारा स्थापित आदर्श साहित्य संघ जैसे संस्थानों ने नैतिक और प्रेरणादायक साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन प्रयासों का उद्देश्य केवल ज्ञान का प्रसार नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और मानवीय मूल्यों का संवर्धन भी रहा है। वर्तमान समय में जब तकनीकी साधनों का विस्तार हुआ है, तब भी पुस्तकों की उपयोगिता और महत्ता में कोई कमी नहीं आई है। यद्यपि अध्ययन के अनेक नए माध्यम विकसित हुए हैं, फिर भी मुद्रित पुस्तकों का आत्मीय स्पर्श और उनकी गहराई अद्वितीय है। पुस्तकें मनुष्य के विचारों को विस्तार देती हैं, उसे सही और गलत का बोध कराती हैं तथा जीवन के प्रति एक संतुलित दृष्टिकोण प्रदान करती हैं।</div><div><br></div><div>भारत में पुस्तक संस्कृति को प्रोत्साहित करने में नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में कई उल्लेखनीय पहलें हुई हैं। उन्होंने उपहार के रूप में पुष्पगुच्छ के स्थान पर पुस्तक देने का संदेश देकर समाज में ज्ञान के प्रति सम्मान की भावना को प्रबल किया है। इसके साथ ही देशभर में पठन-पाठन और पुस्तकालयों के विकास को लेकर विभिन्न अभियान चलाए गए हैं, जिनका उद्देश्य युवाओं में अध्ययन के प्रति रुचि जागृत करना है। यह प्रयास केवल साक्षरता बढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक जागरूक, संवेदनशील और सशक्त समाज के निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। महान वैज्ञानिक एवं पूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि एक अच्छी पुस्तक अनेक मित्रों के समान होती है। वास्तव में पुस्तकें मनुष्य के मानसिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और नैतिक विकास में अत्यंत सहायक होती हैं। वे व्यक्ति को आत्मचिंतन के लिए प्रेरित करती हैं, समाज की विसंगतियों को समझने का दृष्टिकोण देती हैं और सकारात्मक परिवर्तन के लिए प्रेरित करती हैं। प्रसिद्ध लेखिका टोनी मोरिसन का यह कथन भी उल्लेखनीय है कि यदि वह पुस्तक उपलब्ध नहीं है जिसे आप पढ़ना चाहते हैं, तो आपको स्वयं उसे लिखना चाहिए। यह विचार सृजनशीलता और आत्मविश्वास को प्रोत्साहित करता है। आज के त्वरित सूचना युग में जब ध्यान भटकाने वाले साधनों की भरमार है, तब गहन अध्ययन और मनन की आवश्यकता और भी बढ़ गई है। पुस्तकें ही वह माध्यम हैं जो मनुष्य को एकाग्रता, धैर्य और गहराई प्रदान करती हैं। वे केवल जानकारी नहीं देतीं, बल्कि जीवन को दिशा देती हैं और व्यक्ति को बेहतर मनुष्य बनने के लिए प्रेरित करती हैं।</div><div><br></div><div>पुस्तकें मानसिक शांति और भावनात्मक स्थिरता का आधार भी हैं। जब जीवन की भागदौड़ मन को विचलित करती है, तब एक अच्छी पुस्तक ध्यान के समान कार्य करती है, जो मन को एकाग्र और शांत बनाती है। महान चीनी चिंतक मेन्शियस ने कहा था कि मनुष्य का स्वभाव मूलतः शुभ होता है, उसे केवल सही दिशा की आवश्यकता होती है। पुस्तकें वही दिशा प्रदान करती हैं। वे अकेलेपन में सच्चा साथी बनती हैं, दुःख में सहारा देती हैं और निराशा में आशा का संचार करती हैं। पुस्तक के माध्यम से हम अनेक महापुरुषों के अनुभवों से जुड़ते हैं, उनके संघर्षों को समझते हैं और अपने जीवन के लिए प्रेरणा प्राप्त करते हैं। वास्तव में पुस्तकें जीवन-निर्माण का कल्पवृक्ष और कामधेनु हैं। उनकी छाया में बैठकर मनुष्य ज्ञान, विवेक, शांति और समाधान सब कुछ प्राप्त कर सकता है। वे हमारे भीतर ऐसी मानसिकता का विकास करती हैं, जिसमें हम हर परिस्थिति में समाधान खोजने लगते हैं। पुस्तकें हमारे विचारों को व्यापक बनाती हैं, हमारी संवेदनाओं को परिष्कृत करती हैं और हमें एक बेहतर मनुष्य बनने की दिशा में अग्रसर करती हैं। इसलिए कहा जा सकता है कि पुस्तकें केवल जीवन को प्रकाशित ही नहीं करतीं, बल्कि उसे सार्थक, संतुलित और समृद्ध भी बनाती हैं।</div><div><br></div><div>विश्व पुस्तक दिवस मनाते हुए यह स्पष्ट है कि पुस्तकें केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि भविष्य की आधारशिला हैं। वे समाज में स्थायी और सकारात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती हैं। ऐसा परिवर्तन जो किसी बाहरी दबाव से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना से उत्पन्न होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम पुस्तक संस्कृति को अपने जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाएं, घर-घर में अध्ययन का वातावरण निर्मित करें और आने वाली पीढ़ियों को ज्ञान के इस अमूल्य स्रोत से जोड़ें। विश्व पुस्तक एवं कॉपीराइट दिवस हमें यही प्रेरणा देता है कि हम पढ़ने की आदत को विकसित करें, पुस्तकों के प्रति सम्मान की भावना को जागृत करें और एक ऐसे समाज के निर्माण में योगदान दें, जो ज्ञान, संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों पर आधारित हो।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 17:40:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/books-are-the-lamp-of-life-the-bridge-to-solutions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA["ग्रामीण भारत के 30% स्कूलों में मैदान नहीं, कहीं झाड़ियाँ उगीं तो कहीं दबंगों का कब्ज़ा"]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-bitter-reality-of-rural-schools]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत की अधिकांश जनसंख्या गाँवों में बसती है, जहाँ की मिट्टी ने मिल्खा सिंह, पी.टी. उषा और नीरज चोपड़ा जैसे महान खिलाड़ी दिए हैं। इसके बावजूद, ग्रामीण क्षेत्रों के प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में खेलों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। विभिन्न शिक्षा रिपोर्टों और सरकारी आंकड़ों (जैसे UDISE+) के अनुसार, आज भी लगभग 30 प्रतिशत से अधिक सरकारी स्कूलों के पास अपना स्वयं का खेल का मैदान नहीं है। जहाँ मैदान उपलब्ध भी हैं, वहाँ उनका रखरखाव इतना खराब है कि वे खेल गतिविधियों के लिए सुरक्षित नहीं माने जा सकते। बाउंड्री वॉल का न होना, मैदान में झाड़ियाँ उगना या स्थानीय लोगों द्वारा अतिक्रमण करना एक आम समस्या बन गई है, जिसके कारण बच्चों को सड़कों या संकरी गलियों में खेलने को मजबूर होना पड़ता है।</div><div><br></div><div>संसाधनों की यह कमी केवल बुनियादी ढांचे तक सीमित नहीं है, बल्कि उपकरणों के स्तर पर भी काफी चिंताजनक है। बजट का अभाव ग्रामीण विद्यालयों के लिए सबसे बड़ी बाधा है। शिक्षा का अधिकांश बजट शिक्षकों के वेतन और मिड-डे मील जैसी अनिवार्य योजनाओं में ही समाप्त हो जाता है, जिससे खेलों के लिए नगण्य राशि बचती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, एक बड़े प्रतिशत स्कूलों में खेल के नाम पर केवल एक फटी हुई फुटबॉल या कुछ पुराने क्रिकेट बैट ही होते हैं। बास्केटबॉल, वॉलीबॉल या एथलेटिक्स जैसे खेलों के लिए आवश्यक नेट, पोल और ट्रैक तो ग्रामीण भारत के अधिकांश विद्यालयों के लिए आज भी एक विलासिता जैसे हैं। इसके अतिरिक्त, शारीरिक शिक्षकों के रिक्त पद एक और गंभीर संकट हैं। देश के लगभग 50 प्रतिशत ग्रामीण माध्यमिक स्कूलों में प्रशिक्षित खेल प्रशिक्षक नहीं हैं, जिसके कारण बच्चों को खेलों की बारीकियों और नियमों की जानकारी नहीं मिल पाती। बिना सही मार्गदर्शन के, प्रतिभाशाली बच्चे भी जिला या राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं तक पहुँचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/student-suicides-the-burden-of-dreams-or-the-failure-of-the-system" target="_blank">छात्रों का आत्मघातः सपनों का बोझ है या सिस्टम की नाकामी?</a></h3><div>सामाजिक और नीतिगत स्तर पर भी ग्रामीण खेल प्रतिभाओं को वह सहयोग नहीं मिल पाता जिसकी वे हकदार हैं। ग्रामीण परिवेश में आज भी 'पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब' वाली कहावत हावी है, जहाँ खेलों को पढ़ाई में बाधा माना जाता है। केंद्र सरकार की 'खेलो इंडिया' जैसी योजनाएं निस्संदेह सराहनीय हैं, लेकिन इनका वास्तविक लाभ अभी भी शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्रों तक ही सिमटा हुआ है। ग्रामीण ब्लॉकों में इन योजनाओं का क्रियान्वयन बेहद सुस्त है। संसाधनों के इस अभाव का सीधा परिणाम ग्रामीण युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। खेलों की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीण बच्चे शारीरिक गतिविधियों से दूर होकर मोबाइल गेमिंग और डिजिटल व्यसनों की ओर आकर्षित हो रहे हैं। यदि भारत को वास्तव में एक वैश्विक खेल महाशक्ति बनना है, तो हमें अपनी नीतियों के केंद्र में ग्रामीण विद्यालयों को रखना होगा। जब तक गाँव के हर स्कूल में एक समतल मैदान, आवश्यक खेल उपकरण और एक समर्पित कोच की व्यवस्था नहीं होगी, तब तक 'फिट इंडिया' और ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना अधूरा ही रहेगा। इसके लिए पंचायत स्तर पर बजटीय आवंटन बढ़ाना और निजी क्षेत्रों को खेल बुनियादी ढांचे में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना अनिवार्य है।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>- भारत भूषण अड़जरिया&nbsp;</div><div>(मीडिया प्रभारी, दिल्ली विश्वविद्यालय)</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 12:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-bitter-reality-of-rural-schools</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कृत्रिम बुद्धिमत्ता: सुविधा का वरदान या मूल्यों का संकट]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मानव सभ्यता के विकास का इतिहास यदि देखा जाए तो यह स्पष्ट होता है कि हर नई तकनीक अपने साथ संभावनाओं और संकटों का एक द्वंद्व लेकर आती है। आज का समय भी इसी द्वंद्व से गुजर रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता के रूप में विकसित हो रही नवीन तकनीक ने जीवन को सरल, तीव्र और सुविधाजनक बनाया है, किंतु इसके साथ ही यह मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक संतुलन के लिए एक गंभीर चुनौती भी बनकर उभर रही है। समाज के चिंतकों, दार्शनिकों और आध्यात्मिक नेतृत्व ने समय-समय पर इस विषय पर चिंता व्यक्त की है और हाल ही में पोप लियो 14 द्वारा व्यक्त आशंकाओं ने इस चिंता को वैश्विक विमर्श का केंद्र बना दिया है। उन्होंने स्पष्ट रूप से कहा कि यदि इस तकनीक का उपयोग नैतिक मर्यादाओं से परे जाकर किया गया, तो यह विश्व में विभाजन, भय, हिंसा और संघर्ष को बढ़ावा दे सकती है। यह चेतावनी केवल एक धार्मिक नेता की भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस गहरी चिंता का संकेत है जो आज पूरी मानवता के भीतर कहीं न कहीं विद्यमान है। तकनीक अपने आप में न तो नैतिक होती है और न ही अनैतिक, किंतु उसका उपयोग उसे किसी भी दिशा में ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>वर्तमान समय में यह देखा जा रहा है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग केवल रचनात्मक और सकारात्मक कार्यों तक सीमित नहीं रह गया है। इसके माध्यम से झूठी सूचनाओं का निर्माण, नकली चित्रों और ध्वनियों का सृजन तथा जनमत को प्रभावित करने के प्रयास तेजी से बढ़े हैं। चुनावी प्रक्रियाओं में इसका उपयोग लोकतंत्र की जड़ों को कमजोर कर सकता है। जब कोई मतदाता यह समझ ही नहीं पाता कि जो वह देख रहा है या सुन रहा है वह सत्य है या निर्मित भ्रम, तब उसकी निर्णय क्षमता प्रभावित होती है। यह स्थिति लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास को कमजोर करती है। आज सोशल माध्यमों पर ऐसी अनेक घटनाएँ सामने आती हैं, जहाँ किसी व्यक्ति को नरेंद्र मोदी जैसे बड़े नेताओं के साथ दिखाया जाता है, जबकि वास्तविकता में ऐसा कभी हुआ ही नहीं होता। यह केवल व्यक्तिगत भ्रम नहीं, बल्कि सामाजिक स्तर पर विश्वास की संरचना को कमजोर करने वाला प्रवाह है। जब झूठ और सत्य के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, तब समाज में संशय, अविश्वास और अस्थिरता का वातावरण बनता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/ai-adoption-and-education-reform-veteran-banker-kv-kamath-outlines-roadmap-for-the-next-decade" target="_blank">एआई का उपयोग और शिक्षा सुधार: दिग्गज बैंकर  K.V. Kamath ने बताया अगले दशक का रोडमैप</a></h3><div>कृत्रिम बुद्धिमत्ता का एक और चिंताजनक पक्ष है साइबर अपराधों में इसका बढ़ता उपयोग। आज अपराधी किसी व्यक्ति की आवाज की नकल करके उसके परिचितों को धोखा देने में सक्षम हो गए हैं। परिवार के सदस्य या अधिकारी बनकर धन की ठगी करना अब अत्यंत सरल हो गया है। इस प्रकार की घटनाओं ने अनेक लोगों की जीवन भर की कमाई को पल भर में समाप्त कर दिया है। यह केवल आर्थिक क्षति नहीं, बल्कि विश्वास और सुरक्षा की भावना पर गहरा आघात है। वित्तीय क्षेत्र में भी इस तकनीक का दुरुपयोग गंभीर संकट उत्पन्न कर सकता है। स्वचालित हमलों के माध्यम से बैंकिंग व्यवस्था की कमजोरियों का लाभ उठाया जा सकता है। यदि इस प्रकार के हमले व्यापक स्तर पर होते हैं, तो यह केवल व्यक्तिगत हानि तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि राष्ट्रीय और वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी अस्थिर कर सकते हैं। यह स्थिति उस समय और भी गंभीर हो जाती है जब नियामक संस्थाएँ इन जटिल तकनीकों की गति और स्वरूप को समझने में पीछे रह जाती हैं।</div><div><br></div><div>पर्यावरणीय दृष्टि से भी यह तकनीक पूरी तरह निर्दोष नहीं है। विशाल आंकड़ा केंद्रों की स्थापना, ऊर्जा की अत्यधिक खपत, तथा खनिज संसाधनों का दोहन-ये सभी प्रकृति पर अतिरिक्त दबाव डालते हैं। कोबाल्ट और लिथियम जैसे खनिजों की बढ़ती मांग पर्यावरणीय असंतुलन और मानवीय शोषण दोनों को जन्म देती है। इस प्रकार यह तकनीक केवल सामाजिक या नैतिक ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय चुनौती भी बन रही है। इन सभी चिंताओं के बीच यह समझना आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता को नकारा नहीं जा सकता। यह आधुनिक जीवन का अभिन्न अंग बन चुकी है और चिकित्सा, शिक्षा, आपदा प्रबंधन तथा उत्पादन के क्षेत्र में इसके योगदान को अनदेखा नहीं किया जा सकता। समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके उपयोग के स्वरूप में है। यदि इसे मानवीय मूल्यों, नैतिकता और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए, तो यह एक वरदान सिद्ध हो सकती है।</div><div><br></div><div>इसके लिए सबसे पहले आवश्यक है कि इसके विकास और उपयोग के लिए स्पष्ट और सशक्त नियम बनाए जाएं। सरकारों और संस्थाओं को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस तकनीक का उपयोग पारदर्शी, सुरक्षित और उत्तरदायी तरीके से हो। कंपनियों को अपने तंत्र में ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित करनी चाहिए, जिससे किसी भी प्रकार की भ्रामक सामग्री की पहचान और नियंत्रण संभव हो सके। साथ ही नागरिकों की जागरूकता भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। डिजिटल साक्षरता के बिना कोई भी समाज इस चुनौती का सामना नहीं कर सकता। लोगों को यह समझना होगा कि जो कुछ वे देख या सुन रहे हैं, वह हमेशा सत्य नहीं हो सकता। सत्यापन की प्रवृत्ति को विकसित करना समय की आवश्यकता है। नैतिकता के स्तर पर यह भी आवश्यक है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रशिक्षण के लिए उपयोग किए जाने वाले आंकड़े निष्पक्ष और उच्च गुणवत्ता वाले हों। यदि आधार ही पक्षपाती होगा, तो परिणाम भी पक्षपाती होंगे। इससे सामाजिक असमानता और भेदभाव को बढ़ावा मिल सकता है। इसलिए निष्पक्षता, पारदर्शिता, गोपनीयता और उत्तरदायित्व जैसे सिद्धांतों को इसके विकास का आधार बनाना होगा।</div><div><br></div><div>सांस्कृतिक दृष्टि से भी यह ध्यान रखना आवश्यक है कि तकनीकी विकास हमारी परंपराओं और मूल्यों के साथ संतुलन बनाए रखे। हमारी सांस्कृतिक धरोहर का डिजिटलीकरण और संरक्षण इस दिशा में एक सकारात्मक कदम हो सकता है, किंतु यह भी सुनिश्चित करना होगा कि इसका उपयोग सम्मानपूर्वक और संवेदनशीलता के साथ किया जाए। साररूप में यह कहा जा सकता है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एक शक्तिशाली साधन है, जो मानव जीवन को नई दिशा दे सकता है। किंतु यदि इसे नैतिकता से अलग कर दिया जाए, तो यह उसी गति से विनाश का कारण भी बन सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम तकनीक के विकास के साथ-साथ अपने नैतिक मूल्यों को भी सुदृढ़ करें। विज्ञान और मानवीय संवेदना के बीच संतुलन ही वह मार्ग है, जो हमें सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की ओर ले जा सकता है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:28:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/artificial-intelligence-a-boon-of-convenience-or-a-crisis-of-values</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अक्षय तृतीया पर्व है लोक से लोकोत्तर की दिव्य यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-akshaya-tritiya-is-a-divine-journey-from-the-mundane-to-the-transcendental]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अक्षय तृतीया महापर्व का न केवल सनातन परम्परा में बल्कि जैन परम्परा में विशेष महत्व है। इसका लौकिक और लोकोत्तर-दोनों ही दृष्टियों में महत्व है। अक्षय शब्द का अर्थ है कभी न खत्म होने वाला। संस्कृत में, अक्षय शब्द का अर्थ है ‘समृद्धि, आशा, खुशी, सफलता’, जबकि तृतीया का अर्थ है ‘चंद्रमा का तीसरा चरण’। इस त्यौहार के साथ-साथ एक अबूझा मांगलिक एवं शुभ दिन भी है, जब बिना किसी मुहूर्त के विवाह एवं मांगलिक कार्य किये जा सकते हैं। विभिन्न सांस्कृतिक एवं मांगलिक ढांचांे में ढले अक्षय तृतीया पर्व में हिन्दू-जैन धर्म, संस्कृति एवं परम्पराओं का अनूठा संगम है। इस प्रकार अक्षय तृतीया पर किए गए कार्यों जैसे जप-तप, यज्ञ, पितृ-तर्पण, दान-पुण्य आदि का साधक को अक्षय फल प्राप्त होता है। भगवान आदिनाथ ने ही सबसे पहले समाज में दान का महत्व समझाया था, इसलिए इस दिन पर जैन धर्म के लोग आहार दान, ज्ञान दान, औषधि दान करते हैं। रास्ते चाहे कितने ही भिन्न हों पर इस पर्व त्यौहार के प्रति सभी जाति, वर्ग, वर्ण, सम्प्रदाय और धर्मों का आदर-भाव अभिन्नता में एकता का प्रिय संदेश दे रहा है। आज के युद्ध, आतंक, आर्थिक प्रतिस्पर्धा एवं अशांति के समय में संयम एवं तप की, भौतिकता एवं आध्यात्मिकता की अक्षय परम्परा को जन-जन की जीवनशैली बनाने की जरूरत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया यह केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारतीय चेतना की उस अखंड धारा का प्रतीक है, जो जीवन को क्षणभंगुरता से उठाकर ‘अक्षयता’ की ओर ले जाती है। ‘अक्षय’ अर्थात् जो कभी क्षीण न हो, जो निरंतर प्रवहमान रहे, ऐसी ही भावना का यह पर्व है, जो हमारे लौकिक व्यवहार से लेकर लोकोत्तर साधना तक, हर स्तर पर गहन अर्थ रखता है। यह दिन केवल शुभारंभ का नहीं, बल्कि आत्मारंभ का भी दिन है। भारतीय परंपरा में अक्षय तृतीया को ‘अबूझ मुहूर्त’ कहा गया है-अर्थात् ऐसा समय, जिसमें किसी विशेष गणना या ज्योतिषीय विचार की आवश्यकता नहीं होती। यह स्वयं ही शुभता का पर्याय है। यही कारण है कि इस दिन विवाह, गृहप्रवेश, व्यापारारंभ जैसे अनेक मांगलिक कार्य बिना किसी संकोच के सम्पन्न किए जाते हैं। यह विश्वास केवल आस्था नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक अनुभव का परिणाम है, जिसने इस दिन को ‘सर्वसिद्धिदायक’ मान्यता प्रदान की है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/donations-made-on-akshaya-tritiya-yield-greater-rewards" target="_blank">Akshaya Tritiya 2026: अक्षय तृतीया पर किए गए दान का मिलता है अधिक फल</a></h3><div>लौकिक दृष्टि से देखें तो अक्षय तृतीया भारतीय अर्थव्यवस्था और श्रम-संस्कृति से गहराई से जुड़ी हुई है। यह दिन किसानों के लिए नई आशा का संदेश लेकर आता है। प्राचीन काल में राजाओं द्वारा श्रेष्ठ किसानों को बीज भेंट करने की परंपरा केवल सम्मान का प्रतीक नहीं थी, बल्कि कृषि को राष्ट्र की आत्मा मानने का सजीव प्रमाण थी। यह विश्वास कि इन बीजों से उत्पन्न अन्न कभी समाप्त नहीं होगा, दरअसल उस श्रम और प्रकृति के समन्वय पर आस्था थी, जो भारतीय जीवन का आधार है। कुम्हारों, शिल्पकारों, पशुपालकों-विशेषकर बैलों के लिए भी यह दिन विशेष महत्व रखता है। यह पर्व हमें यह स्मरण कराता है कि सृजन, श्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता ही समृद्धि का वास्तविक आधार है। किन्तु अक्षय तृतीया का वास्तविक सौंदर्य उसके लोकोत्तर आयाम में प्रकट होता है, जहाँ यह पर्व आत्मशुद्धि, तप और साधना का महापर्व बन जाता है। जैन परंपरा में यह दिन विशेष रूप से पूज्य है, क्योंकि इसका संबंध प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जीवन की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना से जुड़ा हुआ है। यह वह दिन है, जब दीर्घकालीन तपस्या के उपरांत उनका पारणा हुआ, एक ऐसा क्षण, जिसने तप को तृप्ति और साधना को पूर्णता प्रदान की।</div><div><br></div><div>कथा के अनुसार, जब भगवान ऋषभदेव ने राजपाट त्यागकर संन्यास धारण किया, तब एक वर्ष से अधिक समय तक उन्हें उचित आहार नहीं मिला। यह केवल भौतिक अभाव नहीं था, बल्कि उस युग की सामाजिक अपरिपक्वता का द्योतक था, जहाँ लोग ‘अहिंसक आहार’ और ‘संयमित जीवन’ की अवधारणा से अनभिज्ञ थे। अंततः हस्तिनापुर में राजकुमार श्रेयांस ने उन्हें इक्षुरस अर्पित कर उनकी तपस्या का पारणा कराया। उस क्षण ‘अहोदानम्, अहोदानम्’ की ध्वनि गूंजी, यह केवल एक आह्लाद नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक चेतना का उद्घोष था, जिसने दान, संयम और साधना को एक नई दिशा दी। यही कारण है कि अक्षय तृतीया जैन साधकों के लिए ‘वर्षीतप’ जैसे महान तप-अनुष्ठानों का पूर्णाहुति दिवस है। एक वर्ष तक एकान्तर उपवास करने वाले साधक इस दिन पारणा करते हैं। यह तप केवल शरीर को कष्ट देने का साधन नहीं, बल्कि आत्मा को निर्मल करने की प्रक्रिया है। यह हमें सिखाता है कि भोग से नहीं, त्याग से जीवन अक्षय बनता है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का आध्यात्मिक संदेश अत्यंत गहन है। यह हमें बताता है कि जीवन का वास्तविक उद्देश्य केवल संसाधनों का संचय नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि है। भारतीय संस्कृति में ‘आत्मा’ को सर्वोपरि सत्य माना गया है, और उसकी खोज को जीवन की सर्वोच्च साधना। यह पर्व उसी खोज का निमंत्रण है, एक ऐसा निमंत्रण, जो हमें बाह्य जगत से भीतर की यात्रा पर ले जाता है। ऋषभदेव का जीवन इस संदर्भ में अत्यंत प्रेरणादायक है। ‘ऋषभ’ शब्द का एक अर्थ बैल भी है-जो श्रम, धैर्य और स्थिरता का प्रतीक है और दूसरा अर्थ है तीर्थंकर-जो आत्मोद्धार और लोकमंगल का मार्ग प्रशस्त करता है। इस प्रकार उनका जीवन भौतिक और आध्यात्मिक-दोनों आयामों का अद्भुत समन्वय है। उन्होंने समाज को कृषि, शिल्प, व्यापार जैसी जीवनोपयोगी विधाएं दीं, और साथ ही आत्मा की मुक्ति का मार्ग भी दिखाया। यही समग्रता अक्षय तृतीया के दर्शन में भी झलकती है।</div><div><br></div><div>आज के संदर्भ में यह पर्व और भी प्रासंगिक हो उठता है। जब मानव जीवन भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में उलझा हुआ है, तब अक्षय तृतीया हमें संतुलन का पाठ पढ़ाती है। यह हमें याद दिलाती है कि केवल भौतिक समृद्धि से जीवन पूर्ण नहीं होता। यदि भीतर शांति नहीं, तो बाहरी वैभव भी निरर्थक है। और यदि भीतर संतोष है, तो सीमित साधनों में भी जीवन अक्षय बन सकता है। यह पर्व हमें यह भी सिखाता है कि साधना केवल मठों और आश्रमों तक सीमित नहीं है। यह जीवन की प्रत्येक क्रिया में संभव है, यदि उसमें सजगता, संयम और समर्पण का भाव हो। एक किसान जब श्रद्धा से बीज बोता है, एक कुम्हार जब मिट्टी को आकार देता है, एक गृहस्थ जब ईमानदारी से अपने कर्तव्यों का पालन करता हैकृतब वह भी एक प्रकार की साधना ही कर रहा होता है।</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया का सांस्कृतिक महत्व भी अत्यंत व्यापक है। यह पर्व भारतीय जीवन की उस समन्वयकारी दृष्टि का प्रतीक है, जिसमें भौतिकता और आध्यात्मिकता विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। यहाँ अन्न का भी सम्मान है और आत्मा का भी। यहाँ श्रम का भी महत्व है और ध्यान का भी। यही संतुलन भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। व्यक्तिगत स्तर पर यह दिन आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। यह हमें प्रेरित करता है कि हम अपने जीवन में झांकें, क्या हमारा जीवन केवल उपभोग में व्यतीत हो रहा है, या उसमें कोई उच्च उद्देश्य भी है? क्या हम केवल संग्रह कर रहे हैं, या कुछ त्याग भी कर पा रहे हैं? क्या हम केवल बाहर की दुनिया को संवार रहे हैं, या भीतर की दुनिया को भी प्रकाशित कर रहे हैं?</div><div><br></div><div>अक्षय तृतीया हमें यह संदेश देती है कि यदि हम अपने जीवन में तप, संयम और सेवा को स्थान दें, तो हमारा जीवन भी ‘अक्षय’ बन सकता है। यह अक्षयता केवल धन या वस्तुओं की नहीं, बल्कि पुण्य, शांति और आत्मिक संतोष की होती है, जो कभी समाप्त नहीं होती। आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व को केवल औपचारिकता तक सीमित न रखें, बल्कि इसके गूढ़ संदेश को अपने जीवन में उतारें। यदि इस दिन हम एक संकल्प लें, संयम का, सेवा का, साधना का, तो यह दिन वास्तव में हमारे जीवन में परिवर्तन का सूत्रधार बन सकता है। अंततः अक्षय तृतीया एक ऐसी पावन गंगा है, जिसमें तप की धारा, संस्कृति की सुवास, श्रम की गरिमा और आत्मा की पवित्रताकृंसस एक साथ प्रवाहित होती हैं। जो इस धारा में स्नान करता है, वह केवल बाह्य रूप से नहीं, बल्कि भीतर से भी निर्मल हो जाता है। यही इस पर्व की सर्वोच्च उपलब्धि है, और यही इसका सनातन संदेश कि जीवन को अक्षय बनाना है, तो उसे तप, त्याग और आत्मबोध से आलोकित करना होगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 17:59:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-akshaya-tritiya-is-a-divine-journey-from-the-mundane-to-the-transcendental</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नारी शक्ति वंदन अधिनियम: सत्ता में समानता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nari-shakti-vandan-adhiniyam-equality-in-power]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का लोकतंत्र केवल एक प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि समानता, न्याय और जनभागीदारी की सशक्त अभिव्यक्ति है। जब इस व्यवस्था में आधी आबादी—नारी शक्ति—को सार्थक और प्रभावी प्रतिनिधित्व मिलता है, तभी विकास संतुलित और समावेशी बनता है। “नारी शक्ति वंदन अधिनियम” इसी विचार का प्रतीक है, जो केवल संवैधानिक संशोधन नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना और ऐतिहासिक संघर्ष की परिणति है। भारतीय इतिहास इस सत्य का साक्षी है कि महिलाओं ने सदैव नेतृत्व और सुशासन में अपनी क्षमता सिद्ध की है। अहिल्याबाई होलकर इसका उत्कृष्ट उदाहरण हैं, जिन्हें ‘प्रजा की माता’ और आदर्श शासिका के रूप में स्मरण किया जाता है। उनके शासन में न्याय, संवेदनशीलता और लोक कल्याण सर्वोपरि रहे।</div><div><br></div><div>स्वतंत्र भारत में 73वें संविधान संशोधन (1993) ने पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई आरक्षण सुनिश्चित कर लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर सशक्त बनाया। आज लगभग 13 लाख निर्वाचित महिला प्रतिनिधि इस परिवर्तन की सशक्त मिसाल हैं। कई राज्यों ने इसे बढ़ाकर 50% तक कर दिया है, जिससे स्थानीय शासन में महिलाओं की निर्णायक भूमिका स्थापित हुई है। भले ही “सरपंच पति” जैसी प्रवृत्तियाँ सामने आईं, परंतु इसके पीछे एक गहरी क्रांति थी—ग्रामीण भारत में पहली पीढ़ी की महिला नेताओं का उदय। धीरे-धीरे महिलाएँ निष्क्रिय मतदाता से सक्रिय राजनीतिक शक्ति में परिवर्तित हो गईं। उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों में महिला प्रतिनिधियों ने शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है।</div><div><br></div><div>सितंबर 2023 में भारतीय संसद ने इस ऐतिहासिक विधेयक को पारित कर लोकतांत्रिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ा। 106वें संविधान संशोधन के रूप में लाया गया यह अधिनियम लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करता है, जिसमें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्ग की महिलाओं को भी समुचित प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह कदम केवल विधायी परिवर्तन नहीं, बल्कि लोकतंत्र को अधिक न्यायपूर्ण, समावेशी और प्रतिनिधिक बनाने का दूरदर्शी प्रयास है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/women-reservation-the-foundation-of-a-new-india-and-the-pinnacle-of-possibilities" target="_blank">नारी-आरक्षणः नये भारत का आधार एवं संभावनाओं का शिखर</a></h3><div>वर्तमान भारत में एक दिलचस्प किंतु चिंताजनक विरोधाभास उभरकर सामने आता है। महिलाएँ मतदान में पुरुषों के बराबर, बल्कि कई बार उनसे अधिक सक्रिय भागीदारी निभा रही हैं। 2024 के आम चुनावों में महिलाओं का मतदान प्रतिशत लगभग 65.8% रहा, जो पुरुषों से थोड़ा अधिक है। पिछले वर्षों में असम, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में भी महिलाओं ने मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया है, जो उनकी जागरूकता और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इसके बावजूद, संसद में उनका प्रतिनिधित्व अब भी लगभग 14–15% तक सीमित है। उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया में पुरुष वर्चस्व आज भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यह अंतर केवल संख्याओं का नहीं, बल्कि संरचनात्मक असमानताओं का परिणाम है। चुनावी राजनीति में वित्तीय संसाधनों तक महिलाओं की सीमित पहुँच, सामाजिक जिम्मेदारियों का असंतुलित बोझ और व्यक्तिगत सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियाँ उनके राजनीतिक सफर को कठिन बनाती हैं। यह स्पष्ट करता है कि केवल इच्छा और क्षमता पर्याप्त नहीं—सशक्त भागीदारी के लिए उन्हें ठोस संस्थागत और संरचनात्मक समर्थन की आवश्यकता है।</div><div><br></div><div>इसी निरंतर जागरूकता, संघर्ष और सहभागिता का परिणाम है—“नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, जो भारत के लोकतांत्रिक विकास में एक नए युग का उद्घोष करता है। यह अधिनियम केवल एक नीति नहीं, बल्कि सशक्त भारत के संकल्प का सजीव प्रतीक है। यह महिलाओं के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने का माध्यम भर नहीं, बल्कि उस लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार है जहाँ निर्णय प्रक्रिया में नारी की आवाज़ समान रूप से गूंजती है और उसे सम्मानपूर्वक स्थान मिलता है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने नारी सशक्तिकरण .. “बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ”, “उज्ज्वला योजना”, “जन धन योजना”, “प्रधानमंत्री आवास योजना” और “सुकन्या समृद्धि योजना” जैसी पहलों ने देश की करोड़ों महिलाओं के जीवन में आत्मविश्वास, सुरक्षा और स्वाभिमान का संचार किया है। 10 करोड़ से अधिक महिलाओं को उज्ज्वला योजना का लाभ, 70% से अधिक घरों का स्वामित्व महिलाओं के नाम, और 3 करोड़ से अधिक सुकन्या समृद्धि खाते—ये आंकड़े नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर भारत की नई कहानी हैं, जहाँ नारी अब लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन की वाहक बन चुकी है।.. इसी सशक्त यात्रा का अगला स्वाभाविक और निर्णायक कदम —“नारी शक्ति वंदन अधिनियम”, जो नारी नेतृत्व को नई ऊँचाइयों तक ले जाने का सशक्त माध्यम है। इसकी रोटेशन व्यवस्था सुनिश्चित करती है कि देश के विभिन्न क्षेत्रों की महिलाओं को नेतृत्व का अवसर मिले, जिससे लोकतंत्र अधिक व्यापक, समावेशी और गतिशील बने।</div><div><br></div><div>इस अधिनियम की सबसे बड़ी शक्ति इसके दूरगामी प्रभाव में निहित है। यह एक मजबूत “क्रिटिकल मास” तैयार करेगा, जो प्रतीकात्मक भागीदारी को वास्तविक शक्ति में बदल देगा। यह पंचायत से संसद तक एक सुदृढ़ नेतृत्व श्रृंखला का निर्माण करेगा और राजनीति की प्राथमिकताओं को नया स्वर देगा—जहाँ शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण और सामाजिक सुरक्षा केंद्र में होंगे। साथ ही, यह अधिनियम राजनीति की संस्कृति को भी रूपांतरित करने की क्षमता रखता है—संवाद, संवेदनशीलता और समावेशन पर आधारित एक नई राजनीतिक धारा का निर्माण करते हुए यह केवल महिलाओं को स्थान नहीं देता, बल्कि लोकतंत्र को अधिक मानवीय, संतुलित और प्रभावी बनाता है।</div><div><br></div><div>यदि यह प्रक्रिया सफलतापूर्वक आगे बढ़ती है, तो भारत एक ऐतिहासिक और प्रेरणादायक उपलब्धि हासिल करेगा—जहाँ सामाजिक वास्तविकता और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के बीच सच्चा सामंजस्य स्थापित होगा। भारतीय महिलाओं ने मतदाता के रूप में अपनी जागरूकता, परिपक्वता और निर्णायक शक्ति पहले ही सिद्ध कर दी है; अब समय है कि राजनीतिक संरचना भी उसी शक्ति और परिपक्वता को प्रतिबिंबित करे। जब महिलाएँ नीति-निर्माण, प्रशासन और सामाजिक परिवर्तन में सक्रिय भूमिका निभाती हैं, तो उनके निर्णयों में पारदर्शिता, संवेदनशीलता, समावेशिता और सामाजिक न्याय का स्वाभाविक समावेश होता है। वे केवल वर्तमान की चुनौतियों का समाधान नहीं करतीं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए स्थायी और संतुलित विकास का मार्ग भी प्रशस्त करती हैं।</div><div><br></div><div>नारी दृष्टि में “गवर्नेंस” केवल नियमों और कानूनों के पालन तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह संवेदना, करुणा और सामाजिक उत्तरदायित्व से परिपूर्ण एक जीवंत प्रक्रिया है। यह दृष्टिकोण नेतृत्व को मानवीय बनाता है और निर्णयों को अधिक व्यापक, न्यायसंगत और प्रभावी दिशा देता है। यही संतुलन—व्यक्तिगत और सामूहिक हितों के बीच—एक सशक्त और टिकाऊ लोकतंत्र की पहचान है। स्थानीय स्तर से लेकर राष्ट्रीय मंच तक, जब नारी शक्ति नेतृत्व का हिस्सा बनती है, तब सुशासन केवल एक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक साकार होती हुई वास्तविकता बन जाता है।</div><div><br></div><div>डॉ शिवानी कटारा</div><div>(लेखिका लोक स्वास्थ्य एवं सामाजिक विषयों की अध्येता हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 18:55:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/nari-shakti-vandan-adhiniyam-equality-in-power</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vishwakhabram: Giorgia Meloni पर इतना क्यों भड़के हुए हैं Trump? कौन है वो जिसने डाली है इस दोस्ती में दरार?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-trump-so-angry-with-meloni-who-is-the-one-who-has-caused-the-rift-in-their-friendship]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>छह महीने पहले शर्म अल शेख के मंच पर खड़ी इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी को शायद अंदाजा भी नहीं था कि जिस राजनीतिक रिश्ते को वह अपनी सबसे बड़ी ताकत समझ रही हैं, वही उनके लिए सबसे बड़ा बोझ बन जाएगा। उस मंच पर डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी तारीफों के पुल बांधे, उन्हें सुंदर बताया, लेकिन वही ट्रंप आज उनके साहस पर सवाल उठा रहे हैं। यह कहानी सिर्फ दो नेताओं के टकराव की नहीं है, बल्कि यह बदलती वैश्विक राजनीति, युद्ध की भयावहता और जनता की बेचैनी की कहानी है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ट्रंप और मेलोनी का रिश्ता शुरुआत से ही विचारधारा पर टिका था। दोनों राष्ट्रवादी राजनीति के चेहरे रहे, दोनों ने सख्त प्रवासन नीतियों का समर्थन किया और दोनों खुद को मजबूत नेता के रूप में पेश करते रहे। मेलोनी ने तो ट्रंप के करीब आने के लिए हर संभव प्रयास किया। वह उनके फ्लोरिडा स्थित आवास तक गईं और यूरोप की इकलौती नेता बनीं जो उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल हुईं। लेकिन राजनीति में रिश्ते उतनी ही तेजी से टूटते हैं जितनी तेजी से बनते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/shehbaz-sharif-and-munir-who-were-roaming-around-to-make-deals-in-the-name-of-peace-were-exposed" target="_blank">Pakistan का बड़ा खेल EXPOSE! शांति के नाम पर सौदा करने को इधर से उधर घूम रहे Shehbaz Sharif और Munir हुए बेनकाब</a></h3><div>ईरान युद्ध ने इस रिश्ते की असलियत सामने ला दी। ट्रंप चाहते थे कि इटली अमेरिका और इजराइल के साथ युद्ध में खुले तौर पर शामिल हो, लेकिन मेलोनी ने साफ इंकार कर दिया। यही वह मोड़ था जहां से ट्रंप का रवैया बदल गया। उन्होंने मेलोनी को कायर तक कह दिया और आरोप लगाया कि वह ईरान के परमाणु खतरे को गंभीरता से नहीं ले रहीं। यह हमला सिर्फ राजनीतिक नहीं था, बल्कि व्यक्तिगत भी था।</div><div>लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जब ट्रंप ने पोप लियो पर हमला किया और उन्हें कमजोर बताया, तब मेलोनी ने इसे अस्वीकार्य कहा। यह बयान भले ही दबाव में दिया गया हो, लेकिन इसका असर गहरा था। इटली एक ऐसा देश है जहां पोप का सम्मान बेहद गहरा है और जनता युद्ध के खिलाफ खड़ी रहती है। ऐसे में मेलोनी ने पहली बार खुलकर ट्रंप के खिलाफ आवाज उठाई।</div><div><br></div><div>विश्लेषकों का मानना है कि यह टकराव मेलोनी के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। हाल ही में हुए जनमत संग्रह में उनकी सरकार को करारी हार मिली थी। जनता में असंतोष बढ़ रहा था और ईरान युद्ध की वजह से बढ़ती महंगाई ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी थीं। ऐसे समय में ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए राजनीतिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। इसीलिए मेलोनी ने धीरे धीरे अपनी रणनीति बदलनी शुरू कर दी है। उन्होंने ईरान युद्ध में भागीदारी से इंकार किया, सिसिली के सैन्य अड्डे के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी और इजराइल के साथ रक्षा समझौते को भी रोक दिया। यह सब संकेत हैं कि वह अब खुद को एक संतुलित और स्वतंत्र नेता के रूप में पेश करना चाहती हैं।</div><div><br></div><div>लेकिन यह बदलाव आसान नहीं है। मेलोनी अभी भी एक पतली रस्सी पर चल रही हैं। एक तरफ उन्हें अमेरिका के साथ अपने पुराने रिश्ते को पूरी तरह तोड़ना नहीं है, दूसरी तरफ उन्हें घरेलू राजनीति में अपनी छवि सुधारनी है। यही वजह है कि उनके बयान कई बार संतुलित और अस्पष्ट नजर आते हैं।</div><div><br></div><div>इस पूरे घटनाक्रम में एक और दिलचस्प पहलू है हंगरी के नेता विक्टर ओर्बान की हार। ओर्बान ट्रंप के करीबी सहयोगी माने जाते थे। उनकी हार ने मेलोनी को यह संकेत दिया कि ट्रंप के साथ खड़े रहना अब राजनीतिक रूप से जोखिम भरा हो सकता है। देखा जाये तो इटली की जनता की प्राथमिकताएं साफ हैं। उन्हें अंतरराष्ट्रीय राजनीति से ज्यादा अपने घरेलू मुद्दों की चिंता है। बढ़ती गैस की कीमतें, महंगाई और आर्थिक दबाव उनके लिए असली मुद्दे हैं। ऐसे में अगर मेलोनी सिर्फ वैश्विक मंच पर बयान देती रहें और घरेलू समस्याओं का समाधान न कर पाएं, तो उनका राजनीतिक भविष्य खतरे में पड़ सकता है।</div><div>&nbsp;</div><div>हालांकि अभी भी उनकी पार्टी और उनका नेतृत्व चुनावी सर्वेक्षणों में आगे है, लेकिन यह बढ़त स्थायी नहीं है। इटली में विपक्ष भले ही बिखरा हुआ हो, लेकिन अगर उसने एक मजबूत विकल्प पेश कर दिया तो समीकरण बदल सकते हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह साफ है कि मेलोनी एक बड़े राजनीतिक मोड़ पर खड़ी हैं। ट्रंप से दूरी बनाना उनके लिए एक रणनीतिक कदम है, लेकिन असली चुनौती घरेलू मोर्चे पर है। अगर वह जनता की आर्थिक परेशानियों को दूर नहीं कर पाईं, तो कोई भी चाल उनकी राजनीति को बचा नहीं पाएगी। बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम एक कड़वा सच उजागर करता है। वैश्विक राजनीति में दोस्ती स्थायी नहीं होती, हित स्थायी होते हैं। और जब हित टकराते हैं, तो सबसे मजबूत रिश्ते भी टूट जाते हैं। मेलोनी और ट्रंप की कहानी इसका ताजा उदाहरण है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 17 Apr 2026 14:47:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/why-is-trump-so-angry-with-meloni-who-is-the-one-who-has-caused-the-rift-in-their-friendship</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सम्राट को सुशासन का हस्तांतरण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-command-of-bihar-is-in-the-hands-of-samrat-choudhary]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लम्बे संघर्ष और राजनैतिक उतार-चढ़ाव के बाद भारतीय जनता पार्टी को बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने का अवसर मिल गया है। यह अवसर राजग गठबंधन के माध्यम से आया है। अभी तक बिहार में भाजपा जद (यू) के साथ छोटे भाई की भूमिका मे थी अब बड़े भाई की भूमिका में आ गई है। जब बिहार से विधायक नितिन नवीन भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए तभी से बिहार में नेतृत्व परिवर्तन की रणनीति पर काम चल रहा था। बिहार के निवर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अपना मन बनाया और राज्यसभा जाने के लिए तैयार हो गए। नीतीश कुमार के राज्यसभा के लिए निर्वाचित होने से लेकर सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण तक सारी प्रक्रिया बहुत ही सधी हुई रही जिससे न तो विरोधी दलों को कोई अवसर मिला और न ही पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के समर्थक नाराज होकर कोई गठबंधन विरोधी कार्य कर सके। बिहार में नीतीश कुमार के युग का नयी पीढ़ी के सम्राट को हस्तांतरण हो गया है। यह निश्चित है कि बिहार में केवल मुख्यमंत्री का केवल चेहरा बदला है सरकार नीतीश कुमार जी के निर्देशन व उनके किए गए कार्यों के आधार पर ही चलने वाली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सम्राट चौधरी के साथ जदयू के दो नेताओं विजय चौधरी और विजेंद्र यादव ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली है। मंत्रिमंडल विस्तार बाद में किया जाएगा। अभी तक भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में गठबंधन की राजनीति में ऐसा सत्ता परिवर्तन किसी भी राज्य में कहीं भी नहीं देखा गया है। यह नेतृत्व परिवर्तन&nbsp; भारतीय राजनीति में एक नया इतिहास लिख रहा है। मुख्यमंत्री के पद पर सम्राट चौधरी के शपथ ग्रहण के बाद भाजपा नेताओं ने दावा किया कि जैसे पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी ने बिहार की जनता की 18 वर्षों से भी अधिक समय तक सेवा की वैसे ही अब सम्राट चौधरी भी 20 वर्षों तक बिहार की सेवा करने वाले हैं।&nbsp;&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/new-emperor-must-transform-the-development-related-challenges-in-bihar-into-opportunities" target="_blank">बिहार में विकास सम्बन्धी चुनौतियों को अवसरों में बदलना होगा नए सम्राट को!</a></h3><div>कौन हैं सम्राट चौधरी- सम्राट चौधरी बिहार के 24वें मुख्यमंत्री बने हैं और राजनीतिक दृष्टिकोण से युवा हैं। सम्राट चौधरी ओबीसी के कोइरी समुदाय से आते हैं। सम्राट चौधरी को बिहार के सवर्ण समाज मे भी पसंद किया जाता है। सवर्णों के मुद्दों पर भी वह मुखर रहे हैं। सम्राट की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत 1990 में हुई और वे लालू यादव की राजद से वर्ष 2000 में परबत्ता विधानसभा सीट से विधायक और लालू यादव की सरकार में मंत्री बने। 2014 में वो नीतीश कुमार जी के साथ आ गए किन्तु जदयू के साथ उनकी मित्रता अधिक दिनों तक नहीं चली और वह 2017 में बीजेपी में शामिल हुए। वर्ष 2023 में बिहार प्रदेश भाजपा अध्यक्ष बनाए गये। जनवरी 2024 में वह नीतीश सरकार में उपमुख्यमंत्री बने और कई महत्वपूर्ण विभागों वित्त, स्वास्थ्य, शहरी विकास, पंचायती राज को संभाला। मात्र आठ से नौ वर्षों मे ही उनकी भाजपा मे तेज तरक्की पार्टी की ओबीसी राजनीति और रणनीति का अहम हिस्सा है। भाजपा ने सम्राट चौधरी का चयन काफी सोच समझ कर किया है ताकि पिछड़ों-दलितों-महादलितों की सियासत में कोई नया खालीपन न पैदा हो।&nbsp;</div><div><br></div><div>सम्राट चौधरी को भले ही भाजपा में बाहर से आया नेता बताया जा रहा हो किंतु वह काफी दमदार हैं और उनकी शैली आक्रामक है। वह लालू यादव के समीकरण को ध्वस्त करने की क्षमता रखते हैं क्योकि उनकी राजनीति का सफर लालू यादव की राजद से ही प्रारंभ हुआ था और फिर वह नीतीश की पार्टी में भी गए और उसके बाद जीतनराम मांझी के साथ रहे। सम्राट के माध्यम से भाजपा ने पश्चिम बंगाल के ओबीसी समाज को एक बहुत बड़ा राजनैतिक संदेश भेजा है। बंगाल में ओबीसी समाज का मतदता बड़ी संख्या में है। वर्ष 2027 की शुरूआत मे ही उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में विधानसभा चुनाव होंगे उसको भी ध्यान में रखा गया है। राजनैतिक विश्लेषकों का मानना है कि जातीय जनगणना की उथल पुथल के बीच बीजेपी को एक कद्दावर ओबीसी नेता की तलाश थी जो सम्राट चौधरी पूरी कर रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-command-of-bihar-is-in-the-hands-of-samrat-choudhary</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कमजोर मानसून और आपदा प्रबंधन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/weak-monsoon-and-disaster-management]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आगामी मानसून को लेकर के पहला पूर्वानुमान जारी करने के साथ ही मौसम विभाग ने आने वाले मानसूनी सत्र में सामान्य से कम बरसात के संकेत दे दिए हैं। हांलाकि अभी मानसून के पूर्वानुमान और भी जारी किये जाएंगे पर यह आरंभिक सूचना आने वाले समय के लिए गंभीर संकेत है। मौसम विभाग के पूर्वानुमान के अनुसार सामान्य से 8 फीसदी तक कम बरसात की संभावना जताई गई है। देश के कई हिस्सों में कम बरसात होने के संकेत है तो कुछ हिस्सों में सामान्य बरसात भी हो सकती है। माना जा रहा है कि अल नीनो इफेक्ट के चलते मानसून कमजोर रहेगा। यह भी सही है कि हमारे मौसम मंत्रालय द्वारा जारी पूर्वानुमान अब काफी हद तक आसपास रहने लगे हैं। यहां तक कि दो से तीन घंटों में बरसात होने या आंधी तूफान या ओलावृष्टि तक के पूर्वानुमान खरे उतरने लगे हैं। ऐसे में मौसम विभाग के पूर्वानुमानों को गंभीरता से लेते हुए केन्द्र व राज्यों की सरकारों को अभी से पूर्व तैयारियां करने में जुट जाना चाहिए। खासतौर से आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से भावी रणनीति तय करनी होगी। देश में मानसून सीजन में 87 सेमी बरसात होती है जिसके अनुमानों के अनुसार 81 सेमी तक रहने की आशंका है। पूर्वानुमानों को माने तो 2018 में 91 प्रतिशत बरसात हुई थी उसके बाद के सालों में मानसून लगभग अच्छा ही रहा है। पिछले आठ सालों में मानसून की स्थिति देखें तो 2023 में मानसून अवश्य कमजोर रहा है अन्यथा देष में मानसूनी वर्षा 100 प्रतिशत के आसापास व इससे अधिक ही रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारे देश में मानसूनी बरसात पर निर्भरता अधिक है। जहां खेती में मानसूनी बरसात की निर्भरता बहुत अधिक है तो दूसरी और पेयजल को लेकर भी मानसून पर निर्भरता अधिक है। जलाशयों में पानी के भण्डारण और भूजल स्तर भी बरसाती पानी पर ही निर्भर है। हमारी खेती मुख्यतः मानसून पर निर्भर हैं। सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता कमी के कारण मानसून पर खेती 55 से 64 प्रतिशत निर्भर है। पीने के पानी की समस्या भी कमजोर मानसून से प्रभावित होती है। हमारे यहां मानसून का समय जून से सितंबर तक का रहता है। अब सवाल उठता है कि पिछले सालों में मानसून सामान्य से अच्छा रहने के बावजूद कमजोर मानसून की स्थिति से निपटने में हमारी तैयारी कोई अच्छी नहीं मानी जा सकती। अत्यधिक भूजल दोहन और जल संचयन की दीर्घकालीक नीति के अभाव में ठोस परिणाम प्राप्त नहीं हो पाये हैं। ऐसा नहीं है कि नीति नहीं बनती हो या ऐसा भी नहीं है कि जल संचयन के प्रयास नहीं होते हो पर जो परिणाम देखने में आए हैं वह कोई आशाजनक नहीं माने जा सकते। पानी के विवेकपूर्ण उपयोग की बात करना तो हमारे यहां बेमानी ही रही है। प्राकृतिक जल स्रोतों के संरक्षण व संधारण में भी हम कुछ अधिक नहीं कर पाये हैं। इसके अलावा हमारे यहां दुर्भाग्यजनक बात यह है कि तात्कालिक प्रयास होते हैं। शहरीकरण की आड़ में प्राकृतिक जल स्रोत या तो नष्ट हो गए हैं या उनमें बरसात के पानी जाने के रास्ते अवरुद्ध या बंद हो गए हैं। नदी नालों के रास्ते या तो बंद हो गए हैं या अवरुद्ध हो गए हैं। बरसात के पानी के जलाशयों में रास्तों में अनधिकृत कब्जें, निर्माण और रिसोर्ट बना दिए है। एक समय ऐसा भी आया कि जब विशेषज्ञों ने बरसात के पानी जाने के रास्तों में जगह जगह एनिकट बनाने की सलाह दे ड़ाली और छोटे छोटे एनिकट बनने से नदियों-जलाशयों में पानी की आवक प्रभावित हो गई। इससे तात्कालीक यानी कि एनिकटों में पहले पानी एकत्र तो हुआ पर बाद में इनका रख रखाव नहीं होने से दोहरा नुकसान हुआ। इसी तरह से वर्षा जल संचयन के लिए वाटर हार्वेंस्टिंग सिस्टम के लिए सरकार ने अरबों रुपये खर्च किये पर उनके निर्माण के आंकड़ें पूरे करने के चक्कर में हम भूल गए कि बरसात के पानी इनमें कितना व कैसे जा पाएगा। फिर बरसात से पहले इनकी देखरेख पर भी ध्यान नहीं देने से जो परिणाम मिलने चाहिए थे वे नहीं मिल सके हैं। एक और हमारे दैनिक उपभोग में भी पानी का उपयोग अधिक बढ़ा है आज पेयजल से कई गुणा अधिक पानी टायलेट और कुलरों में उपयोग होने लगा है। समय रहते टायलेट में कम पानी के उपयोग की कोई राह निकाली जाती तो हालात में सुधार ही होता। इसी तरह से देशभर में वाटर ट्र्टिमेंट सिस्टम लगाने का अभियान चला पर इनके परिणाम भी ज्यादा अच्छे नहीं देखे जा रहे है। रिसाइकिल पानी को लेकर भी कोई स्पष्ट नीति तय हो तो कुछ हद तक समाधान हो सकता है। खैर यह तो हालात की तस्वीर है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-ncr-heavy-rains-send-mercury-tumbling-air-quality-improves-to-satisfactory" target="_blank">दिल्ली-NCR में बदला मौसम का मिजाज! झमाझम बारिश से लुढ़का पारा, 'संतोषजनक' हुई हवा की सेहत</a></h3><div>सौ टके का सवाल यह है कि कमजोर मानसून के हालात से निपटने की कार्ययोजना हमें अभी से बनानी होगी। मौसम विभाग ने अप्रेल में यह चेतावनी दे दी है। मानसून जून में आएगा। ऐसे में अभी मई का महीना हमारे पास है। अभी से सरकार को कमर कसनी होगी। कमजोर मानसून के हालात में हमें कम पानी से अधिक बेहतर हालात बनाने के प्रयास करने होंगे। इसके लिए जहां पानी की एक एक बूंद को सहेजने की रणनीति तैयार करनी होगी वहीं कृषि मंत्रालय को खरीफ के लिए इस तरह की रणनीति बनानी होगी जिसमें कम पानी के उपयोग से बेहतर फसल तैयार होने वाली फसलों और किस्मों के लिए किसानों को प्रेरित हो सके। खेती किसानी भी प्रभावित ना हो और पैदावार भी अच्छी हो इसकी रणनीति बनानी होगी। अधिक पानी की आवश्यकता वाली फसलों की खेती ना करने के लिए किसानों को उत्साहित करना होगा। इसी तरह से जलाशयों, बांधों में उपलब्ध पानी का प्रबंधन योजनाबद्ध तरीके से करना होगा। अभी से आमजन को पानी के अपव्यय को रोकने के लिए प्रेरित करना होगा। कहने का अर्थ है कि जब आने वाले हालात की तस्वीर हमारे सामने कमोबेस आ चुकी है तो फिर समय रहते इस तरह की रणनीति बनानी होगी ताकि कमजोर मानसून में भी हमारी जल प्रबंधन क्षमता बेहतर रह सके। आपदा प्रबंधन मंत्रालय को अभी से संबंधित मंत्रालयों खासतौर से कृषि, जल आपूर्ति करने वाले विभागों, बांधों एवं जलाशयों का प्रबंधन करने वाले विभागों, जल संसाधन विभागों से समन्वय बनाकर रणनीति तैयार करनी होगी। इसके साथ ही आमजन को भी पानी के उपयोग को लेकर अधिक सजग और जिम्मेदार नागरिक के रुप में भूमिका निभानी होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:04:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/weak-monsoon-and-disaster-management</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[फांसी जैसी सजा से ही रुकेंगी पुलिस हिरासत में मौतें]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/deaths-in-police-custody-will-cease-only-through-punishments-such-as-hanging]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश के न्यायालयों ने एक बार फिर पुलिस का वीभत्स चेहरा उजागर कर दिया है। आम लोगों की सुरक्षा के गठित किया गया पुलिस तंत्र किस कदर तानाशाह बन गया है, अदालतों के फैसलों ने इसे बेनकाब किया है। मदुरै की एक अदालत ने सातानुकुलम पुलिस स्टेशन में बाप-बेटे की मौत के मामले में 9 लोगों को फांसी की सज़ा सुनाई है। इसके अलावा सभी दोषियों पर भारी ज़ुर्माना भी लगाया गया है। तूतीकोरिन ज़िले के सातानुकुलम के व्यापारी जयराज और उनके बेटे बेनिक्स को 19 जून 2020 को कोरोना काल के दौरान पुलिस ने हिरासत में लिया और बुरी तरह पीटा। इसके बाद 21 जून को दोनों को कोविलपट्टी जेल में रखा गया। 22 जून की रात क़रीब 9 बजे बेनिक्स की मौत हो गई, जबकि अगली सुबह जयराज की भी मौत हो गई। इस मामले ने पूरे देश में बड़ा हंगामा खड़ा कर दिया। इसके बाद मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने खुद संज्ञान लेते हुए पुलिस से रिपोर्ट मांगी। बाद में यह मामला सीबीआई को सौंप दिया गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी तरह लुधियाना जिले में करीब छह साल पहले रिकवरी एजेंट दीपक शुक्ला की थाना डिविजन नंबर 5 की पुलिस हिरासत में हुई थी। मौत के मामले में लुधियाना की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया। अदालत ने मामले की गंभीरता और साक्ष्यों को देखते हुए चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या के तहत आरोप तय करने के आदेश जारी किए हैं। यह पूरा मामला फरवरी 2020 का है, जब पुलिस ने दीपक शुक्ला को वाहन चोरी के एक मामले में हिरासत में लिया था। दीपक पर चोरी का झूठा मामला दर्ज कर उसे अमानवीय यातनाएं दीं।&nbsp; 26 फरवरी 2020 की रात दीपक ने दम तोड़ दिया, जिसके बाद पुलिसिया तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े हो गए थे। दीपक के परिवार ने इंसाफ के लिए एक लंबी और थका देने वाली कानूनी लड़ाई लड़ी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/sabarimala-debate-justice-faith-or-politics" target="_blank">Sabarimala पर धर्म और कानून में महासंग्राम, Supreme Court के फैसले से सियासत में आएगा तूफान?</a></h3><div>पंजाब के मोगा जिले में भिंदर सिंह की मौत गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं देने से हुई थी। न्यायिक जांच में सामने आया कि भिंदर सिंह को कथित तौर पर गैरकानूनी हिरासत में रखकर यातनाएं दी गईं। इस मामले में स्थानीय अदालत ने पंजाब पुलिस के पांच कर्मियों के खिलाफ हत्या समेत अन्य गंभीर धाराओं में ट्रायल चलाने का आदेश देते हुए केस को सेशन कोर्ट में भेज दिया है। जुलाई 2024 को मध्यप्रदेश के बिलाखेड़ी निवासी युवक की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। पुलिस ने 8 लाख रुपये की कथित चोरी के आरोप में उसे हिरासत में लिया था। हिरासत में मौत के बाद उसकी मां ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया, जिसके परिणामस्वरूप 15 मई को सीबीआई जांच का आदेश जारी हुआ। इस जांच के सिलसिले में एजेंसी ने तीन लोगों को गिरफ्तार किया है, जबकि हिरासत में हुई मौत के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार माने जाने वाले दो वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अभी भी फरार हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट ने 25 नवंबर 2025 को एक मामले की सुनवाई करते हुए हिरासत में हिंसा और मौतों को सिस्टम पर धब्बा बताया था। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा था कि अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं। शीर्ष अदालत पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वतः संज्ञान लेकर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की थी। 4 सितंबर को दिए गए अपने आदेश का हवाला देते हुए बेंच ने कहा कि राजस्थान में आठ महीनों में 11 हिरासत में हुई मौतों की रिपोर्ट सामने आई है।कोर्ट ने कहा कि इससे साफ़ है कि हिरासत में अत्याचार कम होने के बजाय जारी हैं। कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र की ओर से थानों में सीसीटीवी को लेकर मांगी गई रिपोर्ट न सौंपने पर कड़ी नाराज़गी जताई थी। केंद्र सरकार ने एक भी रिपोर्ट जमा नहीं की। जस्टिस नाथ ने इस पर कड़ा एतराज़ जताते हुए कहा था कि केंद्र सरकार अदालत के आदेशों को हल्के में नहीं ले सकती। उन्होंने पूछा, "केंद्र सरकार अदालत को बहुत हल्के में ले रही है, क्यों?</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार, 2016 और 2022 के बीच भारत में हिरासत में 11,650 मौतें हुईं। अकेले उत्तर प्रदेश में 2,630 हिरासत में मृत्युएँ दर्ज की गईं, जो देश में सबसे अधिक है। आंकड़ों के 2023 के विश्लेषण से पता चलता है कि 2017 और 2022 के बीच, हिरासत में हुई मृत्युओं के संबंध में देश भर में केवल 345 मजिस्ट्रियल जाँच के आदेश दिए गए, जिसके परिणामस्वरूप केवल 123 गिरफ्तारियाँ हुईं। एनएचआरसी के आंकड़ों से पता चलता है कि 1996 और 2018 के बीच हिरासत में हुई 71% मौतें गरीब या कमज़ोर पृष्ठभूमि के बंदियों की थीं।</div><div><br></div><div>सर्वोच्च न्यायालय ने डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1997 के फैसले में गिरफ्तारी और हिरासत से संबंधित अनिवार्य सुरक्षा उपाय निर्धारित किए थे। जिसके तहत रिश्तेदारों को सूचित करना, गिरफ्तारी ज्ञापन रखना, चिकित्सा परीक्षण, कानूनी परामर्श, 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना अनिवार्य था। इन दिशा—निर्देशों को अनुच्छेद 141 के अंतर्गत प्रवर्तनीय कानून माना जाता है। न्यायालय का यह आदेश कहीं धूल फांक रहा है। न्यायमूर्ति बी.एस. चौहान की अध्यक्षता में गठित भारतीय विधि आयोग ने 30 अक्टूबर, 2017 को तत्कालीन विधि एवं न्याय मंत्री रवि शंकर प्रसाद को सौंपी गई अपनी 273 वीं रिपोर्ट में केंद्र सरकार से संयुक्त राष्ट्र संघ के यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि करने और यातना निवारण कानून लागू करने की सिफारिश की थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>आयोग ने यातना निवारण के लिए ठोस तर्क प्रस्तुत किए हैं। इस रिपोर्ट में यातना निवारण विधेयक के अलावा विधि आयोग ने यातना उन्मूलन के उद्देश्य को सार्थक बनाने के लिए मौजूदा कानूनों में संशोधन का प्रस्ताव दिया था। रिपोर्ट में यातना के खतरे को कम करने और यातना के कृत्यों पर रोक लगाने और ऐसे कृत्यों के अपराधियों के लिए कठोर दंड की सिफारिश की गई। इस रिपोर्ट के साथ संलग्न विधेयक के मसौदे में आजीवन कारावास और जुर्माने तक के दंड का प्रावधान था। आयोग ने न्यायसंगत मुआवजे का निर्णय न्यायालयों पर छोड़ दिया। इसके अलावा, आयोग ने यातना पीड़ितों, शिकायतकर्ताओं और यातना के मामलों के गवाहों को संभावित खतरों, हिंसा और दुर्व्यवहार से बचाने के लिए एक प्रभावी तंत्र स्थापित करने की सिफारिश भी की गई थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>1997 में भारत ने संयुक्त राष्ट्र यातना-विरोधी सम्मेलन की पुष्टि नहीं की। इसकी पुष्टि करने का अर्थ यह होता कि भारत को यातना निवारण विधेयक पारित करना होगा, जिसे पहली बार 2010 में यूपीए द्वितीय सरकार द्वारा पेश किया गया था। इसमें किसी लोक सेवक द्वारा या लोक सेवक की सहमति से ऐसा कृत्य, जिससे गंभीर चोट पहुंचे या जीवन, अंग या स्वास्थ्य (मानसिक या शारीरिक) को खतरा हो। इसमें जबरन कबूलनामा करवाने के उद्देश्य से, या धर्म, जाति, जन्म स्थान, निवास स्थान, भाषा, समुदाय या किसी अन्य आधार पर दंडित करने के लिए दी गई यातना के लिए न्यूनतम 3 वर्ष की सजा का प्रस्ताव था, जिसे 10 वर्ष तक बढ़ाया जा सकता है, और जुर्माना भी लगाया जा सकता है। विधेयक आज तक कानून नहीं बन पाया।&nbsp;</div><div><br></div><div>इससे साफ जाहिर है जो भी दल सत्ता में आता है, वह देश के मौजदा पुलिस सिस्टम में बदलाव नहीं करना चाहता। कारण साफ है यदि ऐसे कानून बन जाएंगे तो पुलिस अधिकारी नेताओं के इशारे पर नहीं नाचेंगे। जब नाचेंगे नहीं तो नेताओं के मौखिक तौर पर गैर कानूनी काम कैसे होंगे। यही वजह रही है कि केंद्र ने हाल ही में दंड संहिता को न्याय संहिता का नाम दे दिया है। इसमें पुलिस अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की गई। पुलिस अफसरों को लापरवाही बरतने और सही तरीके से ड्यूटी को अंजाम नहीं देने पर जेल भेजे जाने का प्रावधान नहीं किया गया। पुलिस हिरासत में मौतों का इस कानून में जिक्र तक नहीं किया गया। उल्टे पुूलिस हिरासत में जब—जब मौतों का मामला सामने आता है, सरकार और पुलिस अफसर उसके रफा दफा करने में पूरी ताकत लगा देते हैं। सत्तारुढ राजनीतिक दलों की मिलीभगत का ही परिणाम है कि आज 21वीं सदी में भी भारत में पुलिस हिरासत में होने वाली मौतें आदिम युग की याद दिलाती हैं।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 18:20:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/deaths-in-police-custody-will-cease-only-through-punishments-such-as-hanging</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सुरों की आशा बनकर गूंजती रहेगी आशा भोसले]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/asha-bhosle-will-continue-to-resonate-as-the-hope-of-melodies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संगीत का आकाश आज कुछ अधिक मौन, कुछ अधिक रिक्त प्रतीत होता है। स्वर की वह चंचल चिड़िया, जन-जन को चमत्कृत करने वाली आवाज जिसने दशकों तक हर हृदय में मधुरता के बीज बोए, आज भले ही भौतिक रूप से हमारे बीच न हो, पर उसकी गूंज अनंत में विलीन होकर भी अमर बनी हुई है। आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं, वे भारतीय आत्मा की वह स्वर-लहरी थीं, जो हर संस्कृति, हर भावना और हर युग में अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रही। वे एक बेमिसाल गायिका, अनगिनत लोगों की आशा एवं अभिलाषा की करिश्माई आवाज बनकर करीब 12000 गीतों का सृजन कर विश्व रिकार्ड बनाया। हृदयाघात के कारण उनका जाना केवल एक कलाकार का जाना नहीं, बल्कि भारतीय संवेदना के एक पूरे युग का अवसान है, परंतु यह अवसान भी किसी अंत का नहीं, बल्कि उस अमरत्व का संकेत है जहाँ कलाकार अपने शरीर से परे होकर अपनी कृति में जीवित रहता है। “अभी न जाओ छोड़ कर” जैसे गीत आज करोड़ों हृदयों की सच्ची पुकार बन गए हैं। जिनकी आवाज ने विरह को भी मधुर बना दिया, आज उन्हीं के बिछोह में संसार भाव-विह्वल है। आशा जी की आवाज में एक अद्भुत जीवंतता थी, वह कभी किशोरी की चंचलता बन जाती तो कभी विरहिणी की करुण पुकार। उनके गीतों में जीवन की सम्पूर्णता समाहित थी-हंसी, आंसू, प्रेम, पीड़ा, श्रृंगार और भक्ति का ऐसा समन्वय जो दुर्लभ है। यही कारण है कि उनकी गूंज केवल भारत तक सीमित नहीं रही, बल्कि विश्व के अनेक देशों में लोग उनके गीतों को गुनगुनाते रहे। यदि भारतीय संगीत को एक महासागर माना जाए तो आशा भोसले उसमें बहती वह नदी थीं, जिसने हर शैली को अपने भीतर समेट लिया। क्लासिकल से लेकर पॉप, जैज से लेकर गजल और कव्वाली तक, उन्होंने हर विधा में अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी। यह मानना कठिन है कि एक ही स्वर इतनी विविधताओं को इतनी सहजता से व्यक्त कर सकता है, पर आशाजी ने इसे संभव कर दिखाया। वे केवल गाती नहीं थीं, वे हर गीत को जीती थीं और यही कारण है कि उनके गीत केवल ध्वनि नहीं बल्कि अनुभूति बन जाते थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>8 सितंबर 1933 को जन्मी आशाजी ने संगीत को साधना के रूप में जिया। लता मंगेशकर जैसी विराट प्रतिभा की छाया में अपनी अलग पहचान बनाना सरल नहीं था। अनेक प्रतिभाएँ उस छाया में दबकर गुमनामी में खो गईं, पर आशाजी ने संघर्ष को अपनी शक्ति बनाया। पिता दीनानाथ मंगेशकर से मिली संगीत की विरासत को उन्होंने अपने परिश्रम और साहस से विस्तार दिया। निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक दबाव और प्रतिस्पर्धा के बीच भी उन्होंने अपने स्वर की लौ को कभी मंद नहीं होने दिया। ओ.पी. नैयर जैसे संगीतकारों के साथ उनका जुड़ाव उनके करियर का निर्णायक मोड़ बना और उसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उनकी उपलब्धियाँ केवल लोकप्रियता तक सीमित नहीं रहीं। ग्रेमी अवार्ड से सम्मानित होना, पद्म विभूषण प्राप्त करना और गिनीज वर्ल्ड रिकार्ड में सर्वाधिक गीत गाने का रिकॉर्ड दर्ज कराना, यह सब उनकी दीर्घ साधना और असाधारण प्रतिभा के प्रमाण हैं। परंतु इन सबसे बढ़कर उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि वह प्रेम है, जो उन्हें श्रोताओं से मिला और जो आज भी उनके गीतों के माध्यम से जीवित है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/personality/the-passing-of-asha-tai-the-end-of-a-golden-era-of-playback-singing" target="_blank">Legendary Bollywood singer Asha Bhosle: पार्श्व गायन के एक स्वर्णिम युग का अंत</a></h3><div>आशा जी के गीतों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे समय की सीमाओं को लांघ जाते हैं। “पिया तू अब तो आजा”, “दम मारो दम”, “चुरा लिया है तुमने”, “दिल चीज क्या है” जैसे अनगिनत गीत आज भी उतने ही ताजगी भरे लगते हैं जितने अपने समय में थे। उनके गीतों में केवल संगीत नहीं, बल्कि एक जीवंत आत्मा थी, जो हर शब्द को अर्थपूर्ण बना देती थी और उसे कालजयी बना देती थी। संगीत उनके लिए केवल कला नहीं, जीवन का श्वास था। जैसे बिना सांस के जीवन असंभव है, वैसे ही बिना संगीत के जीवन नीरस और अर्थहीन हो जाता है। उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से यह सिद्ध किया कि संगीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि आत्मा का पोषण है। उनके हर गीत में कहीं न कहीं ईश्वर की स्तुति, जीवन की सार्थकता और भावनाओं की पवित्रता का स्पर्श मिलता है।</div><div><br></div><div>आज जब हम उन्हें स्मरण करते हैं, तो यह अनुभव होता है कि उनका जाना केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि एक युग का समापन है। मो. रफी, मुकेश और किशोर कुमार के बाद आशा भोसले का जाना भारतीय संगीत की उस स्वर्णिम परंपरा के एक और दीप का बुझना है, जिसने इस देश की आत्मा को सुरों में पिरोया था। फिर भी यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे कलाकार कभी समाप्त नहीं होते, वे अपनी कृतियों में जीवित रहते हैं, अपने स्वरों में सांस लेते हैं और पीढ़ी दर पीढ़ी लोगों के हृदय में गूंजते रहते हैं। मोहन भागवत द्वारा व्यक्त श्रद्धांजलि इस सत्य को और गहराई देती है कि आशा भोसले केवल एक गायिका नहीं थीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना की प्रतीक थीं। उनका योगदान केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने गीतों के माध्यम से भारतीयता, संवेदनशीलता और जीवन के उत्सव को अभिव्यक्त किया। उनका जाना निस्संदेह एक अपूरणीय क्षति है, पर उनकी आवाज, उनकी लय, उनकी जीवंतता और उनकी आत्मा इस देश की माटी में सदैव गूंजती रहेगी। यही उनकी सच्ची अमरता है और यही हमारे लिए उनकी सबसे बड़ी विरासत है।</div><div><br></div><div>आशा भोसले का व्यक्तिगत जीवन जितना संघर्षमय रहा, उतना ही अदम्य साहस, जीवटता और आत्मविश्वास से भरा हुआ भी था। एक संगीत-साधक परिवार में जन्म लेकर उन्होंने बचपन से ही कठिन परिस्थितियों का सामना किया, परंतु हर चुनौती को उन्होंने अपनी शक्ति में रूपांतरित किया। लता मंगेशकर जैसी विराट विभूति की छाया में रहते हुए भी अपनी स्वतंत्र पहचान बनाना उनके असाधारण व्यक्तित्व का प्रमाण है। निजी जीवन के उतार-चढ़ाव, सामाजिक आलोचनाओं और पारिवारिक जटिलताओं के बीच उन्होंने कभी अपने आत्मबल को क्षीण नहीं होने दिया। उनकी जिंदादिली, बेबाकी, हाजिरजवाबी और जीवन के प्रति उत्सवधर्मी दृष्टिकोण उन्हें केवल एक कलाकार नहीं, बल्कि एक जीवंत प्रेरणा बनाते हैं। वे हर परिस्थिति में मुस्कराते हुए आगे बढ़ने की उस दुर्लभ कला की प्रतीक थीं, जो साधारण मनुष्यों को असाधारण बना देती है। आशाजी की&nbsp; प्रतिभा को तीन मुख्य संगीतकारों ने निखारा एवं संवारा, जिनमें ओ.पी.नैय्यर, रवि और आर.डी. बर्मन मुख्य है। उनका एक गीत मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है, बहुत ही लोकप्रिय है, इसके लिये उन्हें नेशनल अवार्ड मिला था।</div><div>&nbsp;</div><div>आशा भोसले की आवाज में केवल स्वर नहीं, बल्कि एक दिव्य स्पंदन, एक अदृश्य करिश्मा और साधना की सिद्धि निहित थी। वह स्वर कभी शृंगार की मधुरता बनकर मन को मोह लेता, तो कभी विरह की वेदना बनकर आत्मा को छू जाता। उन्होंने अपने गायन के माध्यम से भारतीय संगीत को केवल सरस और मनोरंजक ही नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण, भावपूर्ण, आध्यात्मिक और प्रेरणादायी बनाया। उनके गीतों में जीवन का दर्शन, संवेदना की गहराई और आत्मिक स्पर्श एक साथ विद्यमान रहता था। उन्होंने हर शब्द में प्राण फूँककर उसे कालजयी बना दिया, जिससे संगीत केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीने का अनुभव बन गया। वास्तव में, आशा भोंसले वह अनंत स्वर-धारा थीं, जिन्होंने भारतीय संगीत को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाकर उसे वैश्विक चेतना में प्रतिष्ठित किया और आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अक्षय स्रोत बना दिया।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 17:42:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/asha-bhosle-will-continue-to-resonate-as-the-hope-of-melodies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[महिला आरक्षण विधेयक: भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक शांत क्रांति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/women-reservation-bill-a-silent-revolution-in-india-democratic-journey]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महिला आरक्षण विधेयक—औपचारिक रूप से नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023—को अक्सर संख्याओं, कोटा और राजनीतिक गणित के संदर्भ में चर्चा किया जाता है। लेकिन सुर्खियों और विधायी शब्दजाल से परे इसमें एक से अधिक परिवर्तनकारी पहलू निहित है: यह एक शांत तरीके से इस बात को पुनर्परिभाषित कर रहा है कि भारतीय लोकतंत्र कैसा दिख सकता है, जब वह अपनी आधी आबादी के लिए केवल लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि निर्णयकर्ता के रूप में स्थान बनाता है।</div><div><br></div><div>सकारात्मक दृष्टिकोण से देखें तो यह विधेयक केवल आरक्षण का प्रावधान नहीं है—यह संस्थागत विश्वास का प्रतीक है। यह उस धारणा से बदलाव को दर्शाता है कि महिलाओं को अस्थायी सहारे की आवश्यकता है, और इस स्वीकार्यता की ओर बढ़ता है कि वे शासन व्यवस्था की मूल आधारशिला हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-big-move-on-women-reservation-parliament-ready-to-make-history-from-april-16" target="_blank">Women's Reservation पर PM Modi का बड़ा कदम, बोले- 16 April से इतिहास रचने को तैयार संसद</a></h3><div>लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित करके, भारत केवल ऐतिहासिक बहिष्कार को सुधार नहीं रहा है, बल्कि नेतृत्व की परिभाषा को भी विस्तृत कर रहा है।</div><div><br></div><div>आलोचक अक्सर यह तर्क देते हैं कि आरक्षण स्वतः सशक्तिकरण में परिवर्तित नहीं हो सकता। यह चिंता उचित है, परंतु अधूरी है। लोकतंत्र में हर संरचनात्मक बदलाव—चाहे वह सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार हो या सत्ता का विकेंद्रीकरण—वास्तविकता बनने से पहले विश्वास की एक छलांग की मांग करता है। महिला आरक्षण विधेयक भी इसी लोकतांत्रिक विस्तार की परंपरा का हिस्सा है। यह एक “पाइपलाइन प्रभाव” उत्पन्न करता है। आज विधानसभाओं में अधिक महिलाएं होंगी, तो कल नेतृत्व के हर स्तर—पंचायत से संसद तक—में उनकी भागीदारी बढ़ेगी।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही एक सूक्ष्म सांस्कृतिक परिवर्तन भी चल रहा है।</div><div><br></div><div>प्रतिनिधित्व केवल प्रतीकात्मक नहीं होता। यह शिक्षाप्रद भी होता है। जब युवा लड़कियां महिलाओं को बजट पर चर्चा करते, कानून बनाते और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को निर्धारित करते हुए देखती हैं, तो महत्वाकांक्षा असाधारण नहीं रहती, बल्कि सामान्य बन जाती है। राजनीति, जिसे लंबे समय तक पुरुषों के प्रभुत्व वाले क्षेत्र के रूप में देखा गया, अब एक साझा नागरिक मंच के रूप में उभरने लगती है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुधार शासन की अवधारणा को भी पुनर्परिभाषित करता है। भारत में स्थानीय निकायों के अनुभव से यह स्पष्ट हुआ है कि महिला नेतृत्व अक्सर स्वास्थ्य, शिक्षा, जल और सुरक्षा जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देता है—जो सामाजिक संरचना को सुदृढ़ करते हैं। इस उपस्थिति का राष्ट्रीय स्तर पर विस्तार नीतियों को मानव-केंद्रित विकास की ओर अग्रसर कर सकता है।</div><div><br></div><div>अतः महिला आरक्षण विधेयक केवल संसद में सीटों तक सीमित नहीं है। यह लोकतंत्र की नैतिक कल्पना का विस्तार है—जहां समावेशन कोई अपवाद नहीं, बल्कि मूल सिद्धांत है।</div><div><br></div><div>- न्योमा गुप्ता</div><div>प्रवक्ता</div><div>दिल्ली भाजपा</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 15:35:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/women-reservation-bill-a-silent-revolution-in-india-democratic-journey</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Uttar Pradesh Voter List से दो करोड़ नाम हटाये गये, CM Yogi Adityanath की टेंशन बढ़ी, Akhilesh Yadav का चेहरा खिला!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/two-crore-names-removed-from-uttar-pradesh-voter-list-cm-yogi-adityanaths-tension-increased]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के बाद जारी अंतिम आंकड़ों ने राज्य की चुनावी तस्वीर में बड़ा बदलाव सामने रखा है। राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी नवदीप रिनवा द्वारा जारी अंतिम मतदाता सूची के अनुसार लगभग दो करोड़ मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए हैं। यह संख्या अपने आप में अत्यंत महत्वपूर्ण है और राज्य की कुल जनसंख्या तथा चुनावी भागीदारी पर गहरा प्रभाव डालने वाली है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि उत्तर प्रदेश में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान कुल 166 दिनों तक चला, जिसकी शुरुआत 27 अक्टूबर 2025 को हुई थी। उस समय राज्य में कुल 15 करोड़ 44 लाख मतदाता पंजीकृत थे। प्रारंभिक चरण के बाद छह जनवरी को प्रकाशित प्रारूप सूची में यह संख्या घटकर बारह करोड़ पचपन लाख रह गई थी। हालांकि इसके बाद आपत्तियों, दावों, सुनवाई और सत्यापन की लंबी प्रक्रिया के पश्चात अंतिम सूची में कुल 13 करोड़ 39 लाख 84 हजार 792 वैध मतदाता दर्ज किए गए।</div><div><br></div><div>मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने स्पष्ट किया कि जिन मतदाताओं का नाम अंतिम सूची में शामिल नहीं हो पाया है, वे पंद्रह दिनों के भीतर संबंधित जिला अधिकारी के समक्ष अपील कर सकते हैं। इसके बाद भी समाधान न मिलने पर दूसरी अपील मुख्य निर्वाचन अधिकारी के पास की जा सकती है और अंत में नया मतदाता बनने के लिए प्रपत्र छह भरा जा सकता है।</div><div><br></div><div>यदि जिलावार आंकड़ों पर नजर डालें तो राजधानी लखनऊ में सबसे अधिक नौ लाख चौदह हजार नाम हटाए गए, जो लगभग 22.79 प्रतिशत है। इसके बाद प्रयागराज में आठ लाख छब्बीस हजार, कानपुर में छह लाख सत्तासी हजार, आगरा में छह लाख सैंतीस हजार, गाजियाबाद में पांच लाख चौहत्तर हजार, मेरठ में पांच लाख छह हजार और बरेली में चार लाख छप्पन हजार नाम हटाए गए। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद में तीन लाख सोलह हजार नाम हटाए जाने के साथ यह सूची में सबसे ऊपर रहा, जबकि नोएडा, लखनऊ उत्तर, आगरा कैंट और इलाहाबाद उत्तर भी प्रमुख रहे।</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/veerappans-wife-and-daughter-are-receiving-public-support-in-the-election-field" target="_blank">Veerappan की पत्नी और बेटी को चुनाव मैदान में जनता का मिल रहा समर्थन, Tamilnadu में नई सियासी हलचल</a></h3><div><br></div><div>छह जनवरी से दस अप्रैल के बीच कुल आठ लाख पंद्रह हजार नौ सौ छियानवे मतदाताओं के नाम हटाए गए। इनमें से तीन लाख पचास हजार से अधिक लोगों ने नोटिस का जवाब नहीं दिया, लगभग तीन लाख अट्ठाईस हजार लोग स्थानांतरित पाए गए, उनहत्तर हजार से अधिक नाम बहु प्रविष्टि के कारण हटाए गए, पचपन हजार से अधिक मतदाता मृत पाए गए और दो हजार से अधिक लोग आयु या नागरिकता मानकों पर खरे नहीं उतरे।</div><div><br></div><div>इस पूरी प्रक्रिया के दौरान तीन करोड़ छब्बीस लाख से अधिक नोटिस जारी किए गए। लगभग एक करोड़ चार लाख मतदाता ऐसे पाए गए जिनकी जानकारी पूरी तरह से मेल नहीं खा रही थी, जबकि दो करोड़ 22 लाख मामलों में तार्किक विसंगतियां थीं। चौदह जनवरी से नोटिस जारी होने शुरू हुए और 31 जनवरी से सुनवाई की प्रक्रिया शुरू होकर 27 मार्च तक पूरी की गई।</div><div><br></div><div>मुख्य निर्वाचन अधिकारी ने जोर देकर कहा कि किसी भी मतदाता का नाम बिना उचित प्रक्रिया के नहीं हटाया गया। यदि किसी का नाम प्रारूप सूची में था लेकिन अंतिम सूची में नहीं है तो यह या तो प्रपत्र में त्रुटि के कारण हुआ है या फिर सुनवाई के बाद लिया गया निर्णय है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि अंतिम सूची के अनुसार राज्य में सात करोड़ तीस लाख इकहत्तर हजार इकसठ पुरुष मतदाता, छह करोड़ नौ लाख नौ हजार पांच सौ पच्चीस महिला मतदाता और चार हजार दो सौ छह तृतीय लिंग मतदाता हैं। अठारह से उन्नीस वर्ष आयु वर्ग के मतदाताओं की संख्या सत्रह लाख तिरसठ हजार तीन सौ साठ है।</div><div><br></div><div>एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि प्रारूप और अंतिम सूची के बीच कुल चौरासी लाख अट्ठाईस हजार सात सौ सड़सठ मतदाताओं की शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई। इसमें बयालीस लाख से अधिक पुरुष और लगभग इतने ही महिला मतदाता शामिल हैं। इससे लिंग अनुपात में भी सुधार हुआ है, जो आठ सौ चौबीस से बढ़कर आठ सौ चौंतीस हो गया है।</div><div><br></div><div>जिलों में मतदाता वृद्धि के मामले में प्रयागराज सबसे आगे रहा, जहां तीन लाख उनतीस हजार से अधिक नए मतदाता जुड़े। इसके बाद लखनऊ, बरेली, गाजियाबाद और जौनपुर प्रमुख रहे। विधानसभा क्षेत्रों में साहिबाबाद, जौनपुर, लखनऊ पश्चिम, लोनी और फिरोजाबाद में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज की गई।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में उत्तर प्रदेश मतदाता विलोपन प्रतिशत के मामले में दूसरे स्थान पर रहा, जहां यह आंकड़ा तेरह दशमलव चौबीस प्रतिशत रहा। इससे आगे गुजरात रहा, जबकि अन्य राज्यों में यह प्रतिशत अपेक्षाकृत कम रहा। तीसरे पक्ष द्वारा दिए गए आवेदनों के आधार पर एक लाख बीस हजार से अधिक नाम हटाए गए। इनमें अधिकतर मामले मृत्यु, स्थायी स्थान परिवर्तन या अन्यत्र पंजीकरण से जुड़े थे।</div><div><br></div><div>इस पूरी प्रक्रिया में राजनीतिक दलों की भी सक्रिय भागीदारी रही। पांच प्रमुख बैठकों के अलावा नौ सौ चार बैठकों का आयोजन जिला स्तर पर किया गया। पांच लाख से अधिक बूथ स्तरीय एजेंटों ने इस प्रक्रिया में भाग लिया। इसके अतिरिक्त हजारों अधिकारियों और कर्मचारियों के सहयोग से यह विशाल अभियान सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। इस प्रकार उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची का यह पुनरीक्षण न केवल प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण रहा बल्कि इससे चुनावी पारदर्शिता और सटीकता को भी नई दिशा मिली है।</div><div><br></div><div>लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि इससे उत्तर प्रदेश की राजनीति पर क्या असर पड़ेगा? हम आपको बता दें कि उत्तर प्रदेश की अंतिम मतदाता सूची ने राजनीतिक हलकों में हलचल बढ़ा दी है। नई सूची में खासकर शहरी क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई है, जिससे सत्तारुढ़ दल भाजपा की चिंता बढ़ सकती है। लखनऊ, मेरठ, नोएडा, गाजियाबाद और कानपुर जैसे प्रमुख शहरों में अक्तूबर 2025 की तुलना में लगभग 19 से 23 प्रतिशत तक मतदाता घटे हैं। ये वही क्षेत्र हैं जहां पिछले चुनावों में भाजपा का मजबूत प्रभाव रहा है। विधानसभा स्तर पर भी साहिबाबाद, नोएडा, लखनऊ उत्तर और आगरा कैंट जैसी सीटों पर बड़ी संख्या में मतदाता कम हुए हैं। आंकड़ों के अनुसार जिन सीटों पर एक लाख से अधिक वोट घटे हैं, उनमें अधिकांश पर भाजपा का कब्जा है। इसके विपरीत, मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में गिरावट अपेक्षाकृत कम रही, जहां लगभग 9 से 14 प्रतिशत तक ही कमी दर्ज की गई।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 15:05:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/two-crore-names-removed-from-uttar-pradesh-voter-list-cm-yogi-adityanaths-tension-increased</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत की Nuclear Power देख काँपा चीन, डर गया पाकिस्तान, India की वैज्ञानिक तरक्की देख दुनिया भी हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-trembles-at-india-nuclear-power-world-is-also-astonished-by-india-scientific-progress]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का परमाणु सपना आखिरकार निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुका है। दशकों की प्रतीक्षा, संघर्ष और वैज्ञानिक जिद के बाद कलपक्कम में तैयार प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर अब केवल एक परियोजना नहीं, बल्कि भारत की ऊर्जा और सामरिक स्वतंत्रता का उद्घोष बन गया है। यह वह क्षण है जब भारत न केवल अपनी ऊर्जा जरूरतों को नई दिशा दे रहा है, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में अपनी स्थिति भी मजबूत कर रहा है।</div><div><br></div><div>कलपक्कम में स्थापित यह रिएक्टर देश के तीन चरण वाले परमाणु कार्यक्रम का सबसे अहम पड़ाव है। भारत के पास यूरेनियम की सीमित उपलब्धता है, लेकिन थोरियम के विशाल भंडार मौजूद हैं। यही वजह है कि इस रिएक्टर का महत्व कई गुना बढ़ जाता है। यह केवल बिजली पैदा नहीं करता, बल्कि प्लूटोनियम और भविष्य के लिए जरूरी ईंधन भी तैयार करता है। यही इसे साधारण रिएक्टर से अलग और रणनीतिक रूप से बेहद ताकतवर बनाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-historic-success-in-the-field-of-nuclear-energy" target="_blank">परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक सफलता</a></h3><div>इस रिएक्टर की सबसे बड़ी खासियत इसकी ब्रीडिंग क्षमता है, यानी यह जितना ईंधन इस्तेमाल करता है उससे अधिक ईंधन पैदा करता है। इसमें मिश्रित ऑक्साइड ईंधन का इस्तेमाल होता है और सोडियम कूलिंग प्रणाली इसे तेज और प्रभावी बनाती है। यह तकनीक भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में खड़ा करती है जिनके पास उन्नत परमाणु क्षमता है।</div><div><br></div><div>लेकिन यह सफर आसान नहीं रहा। यह परियोजना लंबे समय तक देरी, लागत वृद्धि और तकनीकी चुनौतियों से जूझती रही। शुरुआती अनुमान से कहीं अधिक खर्च हुआ और समय सीमा भी कई बार आगे बढ़ी। फिर भी भारत ने हार नहीं मानी। वैज्ञानिकों और इंजीनियरों की लगातार मेहनत ने इस परियोजना को आखिरकार सफलता के करीब पहुंचा दिया।</div><div><br></div><div>यहां सबसे अहम सवाल यह है कि इस उपलब्धि का सामरिक महत्व क्या है। इसका जवाब सीधा है, ऊर्जा आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता। आज दुनिया ऊर्जा संकट, तेल और गैस की राजनीति और वैश्विक अस्थिरता से जूझ रही है। ऐसे समय में भारत का यह कदम उसे बाहरी निर्भरता से मुक्त करने की दिशा में निर्णायक साबित होगा।</div><div><br></div><div>परमाणु ऊर्जा केवल बिजली का स्रोत नहीं है, यह शक्ति संतुलन का आधार भी है। जिन देशों के पास उन्नत परमाणु तकनीक होती है, वह वैश्विक राजनीति में अधिक प्रभावी भूमिका निभाते हैं। यह रिएक्टर भारत को उसी श्रेणी में पहुंचाने का माध्यम है। इससे न केवल ऊर्जा उत्पादन बढ़ेगा, बल्कि भारत की रक्षा और तकनीकी क्षमता भी मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>रणनीतिक नजरिए से देखें तो यह परियोजना भारत के दीर्घकालिक दृष्टिकोण का हिस्सा है। थोरियम आधारित कार्यक्रम भारत को आने वाले दशकों तक स्थायी ऊर्जा उपलब्ध करा सकता है। इससे न केवल उद्योगों को बल मिलेगा, बल्कि छोटे और मध्यम स्तर के उद्यम भी सशक्त होंगे।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, यह परियोजना भारत की वैज्ञानिक क्षमता का भी प्रमाण है। यह संदेश साफ है कि भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि तकनीक का निर्माता भी है। यह आत्मनिर्भर भारत की दिशा में एक ठोस कदम है, जो देश को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे ले जाएगा। हालांकि चुनौतियां अभी खत्म नहीं हुई हैं। सुरक्षा, अपशिष्ट प्रबंधन और लागत नियंत्रण जैसे मुद्दे अब भी अहम हैं। लेकिन इन चुनौतियों के बावजूद यह उपलब्धि भारत के लिए ऐतिहासिक है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह रिएक्टर केवल एक मशीन नहीं, बल्कि एक विचार है, एक विजन है। यह उस भारत की तस्वीर पेश करता है जो अपने संसाधनों का सही उपयोग करके दुनिया में अपनी अलग पहचान बना रहा है। अगर यह परियोजना सफलतापूर्वक संचालित होती है, तो भारत आने वाले समय में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैश्विक नेता बन सकता है। यह न केवल देश की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करेगा, बल्कि उसे निर्यातक देश के रूप में भी स्थापित कर सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहना गलत नहीं होगा कि कलपक्कम का यह रिएक्टर भारत के परमाणु सपने का वह पड़ाव है, जहां से भविष्य की दिशा तय होगी। यह केवल एक तकनीकी उपलब्धि नहीं, बल्कि एक रणनीतिक क्रांति है जो भारत को नई ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए तैयार है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:23:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/china-trembles-at-india-nuclear-power-world-is-also-astonished-by-india-scientific-progress</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[युद्ध के माहौल में ऊर्जा की मांग को पूरा करना बड़ी चुनौती!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/meeting-energy-demand-amidst-a-wartime-environment-is-a-major-challenge]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश व दुनिया के नीति-निर्माता यह अच्छे से जानते हैं कि किसी भी देश की ऊर्जा प्रणाली उस देश के विकास की नींव होती है, लेकिन पिछले एक माह से भी अधिक समय से चल रहे ईरान अमेरिका व इज़रायल के भीषण युद्ध ने इस नींव को जबरदस्त ढंग से हिलाने का कार्य कर दिया है। अमेरिका-इज़रायल व ईरान के इस युद्ध ने पूरी दुनिया को एक बहुत बड़ा कटु सबक दे दिया है, इस युद्ध ने बता दिया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में किसी भी दूसरे देश पर बहुत ज्यादा ही निर्भर रहना आज के जबरदस्त प्रतियोगिता व व्यावसायिक दौर में ख़तरे से खाली नहीं है। इस युद्ध ने दिखा दिया है कि ऊर्जा के लिए किसी भी अन्य देश पर बहुत अधिक निर्भर रहना राष्ट्र के विकास से बहुत बड़ी बाधा उत्पन्न कर सकता है। आज के युग में विकास के पहिए को अनवरत चलाने के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में विविधता अवश्य होनी चाहिए, देश को किसी भी एक तरह की ऊर्जा प्रणाली पर बिल्कुल भी निर्भर नहीं होना चाहिए, ऊर्जा के क्षेत्र में हर समय विकल्प अवश्य उपलब्ध होने चाहिए। वैसे भी देखा जाएं तो ऊर्जा क्षेत्र में विविधता जोखिम को अवश्य कम करने का कार्य करती है।</div><div><br></div><div>इसलिए यह आवश्यक है कि युद्ध व किसी भी अन्य आपदा जैसी विषम परिस्थितियों में जीवन को सुचारू रूप है चलाने के लिए अपने प्यारे देश भारत में ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति को सुनिश्चित करने के लिए ऊर्जा क्षेत्र में तेज़ी से विविधता लाने की आवश्यकता है। ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों की बात करें तो हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने 'ऊर्जा सांख्यिकी भारत 2026' से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़े जारी किये हैं, जिसमें भारत के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े हुए ऊर्जा संसाधनों के भंडार, उत्पादन, खपत और व्यापार के आंकड़े शामिल हैं। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश की कुल प्राथमिक ऊर्जा आपूर्ति (टीपीईएस) वित्त वर्ष 2024-25 में 2.95% बढ़कर 9,32,816 किलो टन तेल समतुल्य (केटीओई) तक पहुंच गई। रिपोर्ट देश में नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता में हो रही तीव्र वृद्धि को दर्शाती है, जोकि 31 मार्च, 2025 तक 47,04,043 मेगावाट तक पहुंच गई, जिसमें सौर ऊर्जा का कुल क्षमता का लगभग 71 प्रतिशत हिस्सा है, फिर पवन ऊर्जा और जलविद्युत परियोजनाएं हैं। इस रिपोर्ट में नवीकरणीय ऊर्जा की क्षमता में भी जबरदस्त वृद्धि देखी गई है, जो 2016 में 90,134 मेगावाट से बढ़कर 2025 में 2,29,346 मेगावाट हो गई है, नवीकरणीय स्रोतों से बिजली उत्पादन वित्त वर्ष 2015-16 में 1,89,314 गीगावाट घंटे से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 4,16,823 गीगावाट घंटे तक हो गया है।</div><div><br></div><div>हालांकि इस रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार देश में कोयला आज भी ऊर्जा प्रदान का सबसे अहम स्रोत बना हुआ है, जिसके चलते ही कोयला की आपूर्ति वित्त वर्ष 2015-16 में 3,87,761 किलोटाइम ई.ई. से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 5,52,315 किलोटाइम ई.ई. हो गई है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों के मुताबिक देश में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस जैसे ऊर्जा के अन्य स्रोतों में भी लगातार वृद्धि हो रही है। देश में प्रति व्यक्ति ऊर्जा खपत में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है, जोकि वित्त वर्ष 2015-16 में 15,296 मेगाजूल प्रति व्यक्ति से बढ़कर वित्त वर्ष 2024-25 में 18,096 मेगाजूल हो गई है। वहीं सभी क्षेत्रों में ऊर्जा की कुल अंतिम खपत (टीएफसी) में 30% से अधिक की वृद्धि हो गयी है, जोकि वित्त वर्ष 2024-25 में 6,08,578 केटीओई तक पहुंच गई, जोकि देश में औद्योगिक मांग और उपभोक्ता मांग में विस्तार का संकेत देती है। वैसे भी विकास की तेज गति के चलते भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा खपत करने वाला देश पहले से ही बन गया है और ऊर्जा जरूरतों में हर वर्ष 6.5 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हो रही है। ऐसी स्थिति में युद्ध के इस माहौल में जब ईरान के द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को बंद करके दुनिया की गैस व कच्चे तेल की सप्लाई को बड़े पैमाने पर बाधित किया गया है, उस दौर में ऊर्जा आपूर्ति को सुचारू रूप से निरंतर बनायें रखने के भारत की नरेन्द्र मोदी की सरकार के कूटनीतिक प्रयास काबिले-तारीफ हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/after-gaza-and-iran-wars-arab-countries-lost-trust-in-us-and-increased-trust-in-china-and-russia" target="_blank">गाजा और ईरान युद्ध के बाद अरब देशों का भरोसा अमेरिका से उठा, चीन-रूस पर बढ़ा</a></h3><div>अमेरिका-इज़रायल व ईरान के इस युद्ध ने हमारे प्यारे देश के नीति-निर्माताओं को यह सबक दे दिया है कि ऊर्जा क्षेत्र में अब विविधता बेहद ही आवश्यक है, क्योंकि देश को फिर कभी युद्ध के दौर में होर्मुज जलडमरूमध्य संकट जैसे हालातों से गुजरना ना पड़े। देश को तेल व गैस के रिजर्व के साथ-साथ रणनीतिक भंडार बढ़ानें और विभिन्न प्रकार के स्रोतों से प्राप्त होने वाली बिजली के उत्पादन को बढ़ाने की जरूरत है। जिससे कि देश में फिर कभी भी युद्ध या किसी भी अन्य तरह की आपदा जैसे हालात में ऊर्जा संकट के बादल ना मंडराएं। वैसे भी हमें यह समझना होगा कि युद्ध या युद्ध जैसी उत्पन्न स्थितियां अब पूरी दुनिया में ऊर्जा की आपूर्ति और अन्य सभी आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को तुरंत प्रभावित करने का कार्य करती हैं, युद्ध के प्रभाव से मंहगाई का विस्फोट होना एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया है। जिस तरह से पिछले एक माह से अधिक समय से ईरान होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग को बंद करके बैठा हुआ है, उससे पूरी दुनिया में लगभग 20 प्रतिशत कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बाधित हुई है, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल व गैस आदि का गंभीर संकट पैदा हो गया है, जिस वज़ह कुछ देशों&nbsp; में लॉकडाउन तक लगने लग गया है।</div><div><br></div><div>वैसे भी अगर हम युद्ध के समय के हालातों पर ध्यान दें तो हमें यह बिल्कुल स्पष्ट नज़र आता है युद्ध के समय में ऊर्जा स्रोतों को निशाना बनाना दुश्मन देश का सबसे अहम लक्ष्य होता ही है, जिसके चलते ही तेल, गैस व बिजली आदि के बाधित होने का जबरदस्त खतरा बना रहता है, जिससे विभिन्न प्रकार की ऊर्जा के दामों में बढ़ोत्तरी होनी शुरू हो जाती है। दुनिया को वर्ष 1970 के दशक में भी युद्ध के चलते इस तरह के गंभीर ऊर्जा संकट से रूबरू होना पड़ा था। इसलिए हमारे नीति-निर्माताओं ने जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करने की तेज़ी से शुरुआत करते हुए विभिन्न घरेलू ऊर्जा स्रोतों का विकास तेज़ी से करना शुरू किया था। उन्होंने भारत में एथेनॉल, कोयला, जल, परमाणु, सौर व पवन ऊर्जा आदि की विविधता वाली एक बृहद ऊर्जा व्यवस्था को विकसित किया था। क्योंकि वह अच्छे से जानते हैं कि राष्ट्र के तेज़ गति से विकास के लिए एक ऐसी सुरक्षित ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला की आवश्यकता है जोकि युद्ध या किसी भी अन्य प्रकार की आपदा जैसी बेहद विषम परिस्थितियों में भी ऊर्जा की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित करने का कार्य निर्बाध रूप से करती रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी के चलते ही युद्ध के समय में कोयला व अन्य ऊर्जा स्रोतों की मांग बढ़ जाती है, लेकिन परिवहन व्यवस्था में रुकावट होने के चलते कोयला, गैस व तेल आदि को उपभोक्ता के पास तक समय पर पहुंचाना बेहद ही चुनौतीपूर्ण व जोखिम भरा कार्य होता है, हर पल यह दुश्मन के निशाने पर बने रहते हैं। ऐसी स्थिति में परमाणु, जल, सौर व पवन ऊर्जा की अहमियत लोगों को समझ आती है। आज फिर युद्ध के चलते भारत सरकार के सामने देश की ऊर्जा प्रणाली को औद्योगिक क्षेत्र व लोगों की मांग के अनुरूप चलाने की एक बड़ी चुनौती खड़ी है। क्योंकि भारत में अभी भी ऊर्जा पैदा करने के क्षेत्र में बहुत ज्यादा कार्य करने की आवश्यकता है। भारत अब भी ऊर्जा क्षेत्र की मांग को पूरा करने के लिए काफी हद तक दूसरे देशों से आयात पर निर्भर है। युद्ध के चलते भारत में कच्चे तेल व गैस की आपूर्ति प्रभावित हो रही है, वहीं खाड़ी देशों में युद्ध के चलते कच्चे तेल व गैस के उत्पादन में भारी कमी होने से वैश्विक स्तर पर तेल व गैस की कीमतें अब रोज़ाना बढ़ रही हैं।</div><div><br></div><div>भारत सरकार चाहे लाख दावे करें की कच्चा तेल व गैस की देश में विभिन्न देशों से आपूर्ति निर्बाध रूप से आपूर्ति जारी है, लेकिन कटु सत्य यह भी है कि मांग के अनुरूप तेल व गैस की आपूर्ति पर दबाव बढ़ता जा रहा है। हालांकि नरेन्द्र मोदी सरकार विपरीत से विपरीत परिस्थितियों के बाद भी वैश्विक घटनाक्रमों से उत्पन्न कच्चे तेल व गैस की इस किल्लत की स्थिति को निरंतर संभालने के लिए धरातल पर लगातार ठोस प्रयास कर रही है। जिसके परिणामस्वरूप ही आज भारत के झंडे लगे हुए जहाज ईरान के शासकों के द्वारा दुनिया के अधिकांश देशों के लिए बंद किये गये होर्मुज जलडमरूमध्य समुद्री मार्ग से कच्चा तेल व गैस लेकर के निकल रहे है़। भारत की नरेन्द्र मोदी सरकार भी विभिन्न देशों से तेल व गैस खरीदकर के इन चुनौतियों से निपटने का प्रयास लगातार कर रही है, जिसके परिणामस्वरूप ही आज भी भारत के अधिकांश हिस्सों में ऊर्जा आपूर्ति धरातल पर निर्बाध रूप से चल रही है। लेकिन सरकार को अब देश में जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को तैयार करने पर विशेष ध्यान देना चाहिए। नवीकरणीय और पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा साधन विकसित करने चाहिए, जिससे कि उपभोक्ता जीवाश्म ईंधन (कोयला, पेट्रोलियम) के स्थान पर वैकल्पिक ऊर्जा प्रणाली के मुख्य स्रोतों सौर, पवन, जलविद्युत, भूतापीय और बायोमास आदि ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करें। वैसे भी यह देश व दुनिया में प्रचुर मात्रा के साथ-साथ, टिकाऊ और शून्य कार्बन उत्सर्जन करने वाली ऊर्जा प्रणाली होती है, जिससे ऊर्जा आपूर्ति अनवरत चलती रहती है वहीं पर्यावरण अनुकूल प्रणाली होने के चलते ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव को कम करने में सहायक हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:15:36 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/meeting-energy-demand-amidst-a-wartime-environment-is-a-major-challenge</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में भारत की ऐतिहासिक सफलता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-historic-success-in-the-field-of-nuclear-energy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिमी एशिया युद्ध और तनाव के मध्य भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र मे आत्मनिर्भरता प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि प्राप्त की है। भारत ने तमिलनाडु के कलपक्कम स्थित परमाणु ऊर्जा संयंत्र में क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली है। अब रूस के बाद भारत दूसरा ऐसा देश बन गया है जहां ऑटो मोड में परमाणु चेन रिएक्शन प्रारंभ हो गया है। यह सपना महान वैज्ञानिक स्वर्गीय होमी जहांगीर भाभा का थो जो अब पूर्ण हुआ है।वैज्ञानिकों की यह सफलता भारत को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में सहायता देगी। यह 2070 के नेट जीरो लक्ष्य की ओर बड़ा कदम है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अगर यह कार्य सफलता पूर्वक आगे बढ़ता रहा तो भारत जल्द ही पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा बनाने की जगह स्वच्छ अक्षय ऊर्जा बनाने के लिए तैयार हो जाएगा। भारत के 500 मेगावाट क्षमता वाले प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर के प्रथम क्रिटिकैलिटी स्तर पर पहुंचने के बाद सरकार ने कहा कि फास्ट ब्रीडर रिएक्टर उच्च तापीय दक्षता के साथ विश्वसनीय, कम कार्बन उर्त्सजन वाली बेस लोड बिजली आपूर्ति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। नियंत्रित परमाणु विखंडन श्रृंखला प्रतिक्रिया की शुरूआत का यह मील का पत्थर देश को दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने और स्वदेशी परमाणु प्रौद्योगिकी क्षमताओं को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड द्वारा निर्धारित सभी सुरक्षा मानदंडों को पूरा करने के बाद पीएफबीआर ने क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर ली।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/what-america-france-could-not-achieve-after-pouring-in-billions-of-dollars-india-accomplished" target="_blank">Explained India Nuclear Energy | भारत का परमाणु धमाका... जो काम अमेरिका और फ्रांस अरबों डॉलर फेंक कर भी नहीं कर पाए, वो भारत ने कर दिखाया!</a></h3><div>तमिलनाडु के कलपक्कम में स्थित प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर भारत का पहला स्वदेशी फास्ट ब्रीडर परमाणु रिएक्टर है। 500 मेगावाट क्षमता वाले इस उन्नत रिएक्टर को इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने डिजाइन और भारतीय नाभिकीय विद्युत् निगम लिमिटेड ने निर्मित किया है। इसे बनाने में 200 से अधिक भारतीय उद्योगों ओर लघु एवं मध्यम उद्योगों की भूमिका रही है। इस रिएक्टर को भविष्य में थोरियम- 232 का उपयोग करने के लिए भी डिजाइन किया गया है। जो स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन के लिए भारत के विशाल थोरियम भंडार का दोहन करने के दीर्घकालिक लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>क्या होती है क्रिटिकैलिटी- यह परमाणु रिएक्टर के संचालन की वह स्थिति है जिसमें परमाणु विखंडन की श्रृंखला प्रक्रिया स्थिर हो जाती है। इसका अर्थ यह है कि यह रिएक्टर अब बिना किसी बाहरी दखल के मौजूदा ईंधन के द्वारा ऊर्जा बनाने के लिए तैयार हो गया है। क्रिटिकैलिटी प्राप्त करना सीधे बिजली बनाना नहीं है अपितु यह उसके लिए पहली अनिवार्यता है। अब इस रिएक्टर की क्षमता और कुशलता को समझने के लिए कम क्षमता वाले कुछ परीक्षण किये जाएंगे जिसके बाद इसे पावर ग्रिड से जोड़कर बिजली उत्पादन शुरू किया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह उपलब्धि मात्र एक रिएक्टर चलाने की नहीं है, इससे भारत की परमाणु ऊर्जा क्षमता बढ़ेगी। इससे 2070 तक नेट जीरो लक्ष्य प्राप्त करने में सफलता मिलेगी। फास्ट ब्रीडर रिएक्टर कम कचरा पैदा करता है यह यूरेनियम और प्लूटोनियम का बेहतर उपयोग करता है । इससे भविष्य में&nbsp; बिजली सस्ती होगी। देश ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में मजबूत बनेगा। भविष्य में और अधिक ऐसे रिएक्टर बनाए जा सकेंगे जो थोरियम का इस्तेमाल कर बिजली बनाएंगे ।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह रिएक्टर 2004 में शुरू हुआ था लेकिन कई तकनीकी चुनौतियों, देरी और लागत बढ़ने के कारण अब जाकर क्रिटिकैलिटी प्राप्त कर सका है। तरल सोडियम को संभालना, सुरक्षा मानक पूरा करना और बहुत सारे परीक्षण करना असान नहीं था। इसका बजट बढ़ा&nbsp; किंतु सरकार का पूरा समर्थन मिलता रहा। अब यह सफलता दिखाती है कि भारत कठिन टेक्नोलॉजी में भी आत्मनिर्भर हो सकता है। पूर्व परमाणु ऊर्जा आयोग अध्यक्ष डा. अनिल काकोदकर ने इस सफलता को ऐतिहासिक बताया है&nbsp; और कहा कि यह भारत के तीन चरण के कार्यक्रम को नई दिशा व गति देगा। यह उन्नत रिएक्टर खपत से अधिक ईधन उत्पादन करने में सक्षम है जो देश की वैज्ञानिक क्षमता को और इंजीनियरिंग कौशल की मजबूती को दर्शाता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे कार्यक्रम के तीसरे चरण में भारत के विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है। प्रधानमंत्री मोदी ने इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिकों और इंजीनियरों&nbsp; को बधाई दी और इस सफलता को भारत वैज्ञानिक कौशल का प्रमाण बताया।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>सरकार ने 2047 तक 100 गीगावाट परमाणु ऊर्जा का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया है। जापान फ्रांस और&nbsp; अमेरिका आदि देश सुरक्षा चिंताओं के कारण ऐसी परियोजनाएं बंद कर चुके हैं परंतु भारत की स्थिति और जरूरत दोनों ही अलग है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- मृत्युंजय दीक्षित&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 12:53:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-historic-success-in-the-field-of-nuclear-energy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गाजा और ईरान युद्ध के बाद अरब देशों का भरोसा अमेरिका से उठा, चीन-रूस पर बढ़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/after-gaza-and-iran-wars-arab-countries-lost-trust-in-us-and-increased-trust-in-china-and-russia]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मध्य पूर्व आज बदलते वैश्विक शक्ति संतुलन का ज्वलंत उदाहरण बन चुका है। जिस अमेरिका ने दशकों तक इस क्षेत्र को अपनी रणनीतिक मुट्ठी में रखा, वही आज यहां अपनी पकड़ खोता नजर आ रहा है। पहले गाजा में तबाही और अब ईरान युद्ध से उपजे हालात अरब देशों को गहरी चिंता में डाल गये हैं। गाजा में हमले और ईरान युद्ध से लाखों लोग बेघर हुए, हजारों जिंदगियां खत्म हुईं और पूरे क्षेत्र में तबाही का मंजर फैल गया। इस सबसे अरब दुनिया के लोगों के दिल और दिमाग में बड़ा बदलाव आया है। हम आपको बता दें कि अरब दुनिया में अब अमेरिका के लिए भरोसा लगभग खत्म हो चुका है। जनता उसे एक पक्षीय, अवसरवादी और नैतिक रूप से कमजोर शक्ति के रूप में देख रही है। इसके उलट चीन और रूस को अधिक संतुलित और भरोसेमंद विकल्प माना जाने लगा है। लोग अब यह मानने लगे हैं कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय कानून की बात केवल तब करता है जब उसे फायदा हो। अरब देश यह भी देख रहे हैं कि गाजा अब भी मलबे में दबा है और वहां पुनर्निर्माण की कोई ठोस पहल नजर नहीं आती।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, इस युद्ध की सबसे भारी कीमत खाड़ी देशों को चुकानी पड़ रही है। पर्यटन, जो उनकी अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, वह बुरी तरह हिल गया है। अनुमान है कि पर्यटन राजस्व में 13 अरब से 32 अरब डॉलर तक की गिरावट आ सकती है। यह गिरावट तब हो रही है जब 2024 में इन देशों ने पयर्टन से 120 अरब डॉलर का राजस्व कमाया था। इतना ही नहीं, एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार अरब देशों को इस युद्ध से करीब 200 अरब डॉलर तक का कुल नुकसान हो सकता है। यानी यह सिर्फ आर्थिक झटका नहीं, बल्कि दीर्घकालिक संकट का संकेत है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-us-iran-conflict-will-china-now-rule-the-world-with-a-5-star-strategy" target="_blank">कभी कुछ न करके भी देखो...अमेरिका-ईरान युद्ध के बीच 5 Star स्ट्रैटर्जी से अब चीन दुनिया पर राज करेगा?</a></h3><div>इसके अलावा, खाड़ी देशों ने दशकों तक अमेरिका को अपने यहां सैन्य अड्डे बनाने की अनुमति देकर यह भरोसा किया था कि इससे उनकी सुरक्षा मजबूत होगी और वह किसी भी बाहरी खतरे से सुरक्षित रहेंगे। लेकिन ईरान के साथ हालिया युद्ध ने इस धारणा को गहरे स्तर पर झकझोर दिया है। हकीकत यह सामने आई कि यही अमेरिकी अड्डे खाड़ी देशों के लिए सबसे बड़ा जोखिम बन गए। ईरान ने सीधे तौर पर उन ठिकानों और संपत्तियों को निशाना बनाया जहां अमेरिकी मौजूदगी थी और इसके चलते हमले खाड़ी देशों की जमीन पर हुए। नतीजा यह हुआ कि नुकसान केवल अमेरिका का नहीं, बल्कि खाड़ी देशों का भी हुआ और उनकी सुरक्षित निवेश गंतव्य तथा स्थिर क्षेत्र की छवि को गहरा आघात पहुंचा। इसलिए सबसे गंभीर सवाल यह उठता है कि जब संकट की घड़ी आई तो अमेरिका अपने ही सैन्य अड्डों के आसपास स्थित देशों को पूर्ण सुरक्षा नहीं दे सका। ऐसे में अब यह बहस तेज हो रही है कि क्या खाड़ी देश भविष्य में अमेरिका को अपने यहां सैन्य मौजूदगी जारी रखने देंगे या वह इस मॉडल पर पुनर्विचार करेंगे। यह घटनाक्रम पूरी दुनिया को यह संदेश भी देता है कि किसी बाहरी शक्ति को अपने भूभाग पर सैन्य अड्डे देने की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है।</div><div><br></div><div>इसलिए मध्य पूर्व में आने वाले समय में रणनीतिक स्तर पर बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं। अरब देश समझ रहे हैं कि अमेरिका की अगुवाई वाली व्यवस्था अब दरक रही है। अरब देश अब खुलकर या चुपचाप अपने विकल्प तलाश रहे हैं। चीन और रूस के साथ रिश्ते मजबूत हो रहे हैं। रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, व्यापारिक साझेदारियां गहरी हो रही हैं और नए बहुपक्षीय मंचों की ओर झुकाव साफ दिख रहा है। साथ ही खाड़ी देशों ने युद्ध से पहले अमेरिका को चेताया था, लेकिन उनकी अनदेखी की गई। अब जब वह खुद नुकसान झेल रहे हैं, तो वह अपने निवेश और गठबंधनों पर दोबारा सोचने को मजबूर हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो अमेरिका की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी इजराइल के प्रति अंध समर्थन बन चुकी है। अरब जनता इसे अन्याय और दोहरे मापदंड के रूप में देखती है। लोगों का मानना है कि अमेरिका ने न तो मानवाधिकारों की रक्षा की और न ही अंतरराष्ट्रीय कानून का पालन किया। यही कारण है कि अब चीन को ज्यादा जिम्मेदार और संतुलित शक्ति माना जा रहा है। यह अमेरिका के प्रभाव के खत्म होने का संकेत है।</div><div><br></div><div>साथ ही इस पूरे संकट ने वैश्विक संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं को भी पक्षपाती माना जा रहा है। लोगों का भरोसा नियम आधारित व्यवस्था से उठ रहा है। यह संकेत है कि दुनिया अब एक नई, बहुध्रुवीय व्यवस्था की ओर बढ़ रही है जहां पश्चिम का प्रभुत्व कमजोर होगा।</div><div><br></div><div>वैसे, अमेरिका के पास अभी भी मौका है, लेकिन समय तेजी से निकल रहा है। अगर वह ईरान युद्ध को जल्द खत्म करता है और फिलिस्तीन मुद्दे पर न्यायपूर्ण रुख अपनाता है, तो कुछ हद तक अपनी साख बचा सकता है। लेकिन अगर वही नीतियां जारी रहीं, तो मध्य पूर्व में उसका प्रभाव इतिहास बन सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अमेरिका की गिरती साख, खाड़ी देशों का आर्थिक संकट और बदलता जनमत यह साफ संकेत दे रहे हैं कि शक्ति संतुलन तेजी से बदल रहा है। अगर अब भी अमेरिका ने दिशा नहीं बदली, तो मध्य पूर्व में उसकी जगह कोई और लेने के लिए पूरी तरह तैयार है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 16:07:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/after-gaza-and-iran-wars-arab-countries-lost-trust-in-us-and-increased-trust-in-china-and-russia</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अब नहीं पनपेंगे माओवादी: जरा याद इन्हें भी कर लो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maoists-will-no-longer-thrive-do-spare-a-thought-for-them-too]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश से सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का माड्यूल अभी भी सक्रिय है। नक्सलवाद-माओवाद के ख़ूनी पंजों ने चारो ओर कैसे दहशत फैला रखी थी? उसकी गवाह हर वो तारीख़े हैं जब-जब हमारे वीर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में, बस्तर में सुख-शांति के लिए अपना बलिदान दे दिया। ऐसी ही इतिहास की एक तारीख़ है 6 अप्रैल 2010।&nbsp;</div><div><br></div><div>ये तारीख़ याद कर लीजिए। ये वो तारीख़ थी जब दंतेवाड़ा में CRPF की 62 वीं बटालियन पर घात लगाकर माओवादी आतंकियों ने हमला किया था। सुकमा (तत्कालीन दंतेवाड़ा) के चिंतागुफा, ताड़मेटला के पास माओवादियों ने क्रूरता की अति कर दी थी। लेकिन जवानों का हौसला कम नहीं था। माओवादियों के साथ हुए संघर्ष में 76 जवानों ने अपना बलिदान दे दिया था। CRPF ने वीर बलिदानियों को याद करते हुए लिखा —“हमारे 75 श्रेष्ठ जवानों ने 6 घंटे तक चले भीषण संघर्ष में 7 माओवादियों को ढेर किया और 8 को घायल किया, इसके बाद उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। 500 से अधिक भारी हथियारों से लैस माओवादियों और सैकड़ों IEDs से घिरे होने के बावजूद—जो लगभग हर उस स्थान पर लगाए गए थे। जहाँ हमारे जवान शरण लेकर जवाबी कार्रवाई कर सकते थे। उनका साहस अद्वितीय और अविस्मरणीय था।हमारे कुछ वीरों ने अपने साथियों की रक्षा करने और दुश्मन को निष्क्रिय करने के लिए ग्रेनेड पर लेटकर सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम क्षणों में भी वीर सैनिकों ने अपने हथियार अपने नीचे छिपा लिए।”</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-eradication-of-maoism-and-the-sai-government-rehabilitation-policy" target="_blank">माओवाद का खात्मा और साय सरकार की पुनर्वास नीति</a></h3><div>इस क्रूर हमले का मास्टरमाइंड माडवी हिड़मा था। इसके बाद जेएनयू में अर्बन नक्सलियों ने जश्न मनाया था। दंतेवाड़ा क्षेत्र में हमले के समय डीआईजी रहे आईपीएस कल्लूरी ने जेनएयू में हमले के बाद हुए जश्न की चर्चा करते हुए कहा था —“मुझे काफी दुःख पहुँचा था जब मुझे यह पता चला कि जेनएयू में (कुछ विद्यार्थियों द्वारा) ताड़मेटला में 76 बलिदानी जवानों के बलिदान का जश्न मनाया गया।”</div><div><br></div><div>साथ ही छत्तीसगढ़ के कांकेर समेत कई अलग-अलग इलाकों में अर्बन नक्सलियों ने जवानों के बलिदान पर जश्न मनाया।‌ इस घटना को अर्बन नक्सली कही जाने वाली अरुंधति राय की पुस्तक, रिपोर्टिंग के लिए भी देखा जाना चाहिए। क्योंकि इस घटना वाले दिन से अगले— 19 दिन तक अरुंधति राय दंतेवाड़ा में रुकीं। उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई थी, जो सेना, प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के विरोध में थी। अब आप सोचिए कि जहां एक ओर हमारे 76 जवानों का बलिदान हो गया। वहीं दूसरी ओर अर्बन नक्सली। इसे जीत के तौर पर देख रहे थे। भारत के ख़िलाफ़ छेड़े गए सशस्त्र युद्ध के इस घटनाक्रम पर जश्न मना रहे थे। सेना, पुलिस और सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा वाली रिपोर्टिंग की जा रही थी। उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। जबकि माओवादी आतंकियों की रहनुमाई की जा रही थी।‌ क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए माओवादियों के द्वारा जवानों की हत्या—जीत थी।‌ इसे वो बड़े माड्यूल के तौर पर फैलाना चाहते थे।</div><div><br></div><div>ये ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। ये दोनों न तो देश के संविधान को मानते हैं। न ही इनमें राष्ट्र के प्रति कोई निष्ठा है। इनका हमेशा से एक ही उद्देश्य रहा है कि- कैसे भारत में रक्तपात किया जाए। 'जल-जंगल, जमीन' के नाम पर हिंसा की जाए। ये दोनों जनजातीय समाज के, वनवासियों के घोर शत्रु हैं।अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों के रक्तपात के चलते ही— सुदूर वनांचल क्षेत्र विकास से बहुत पीछे रह गए। हालांकि जैसा केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा है कि— “यह अर्बन नक्सल खुद हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, लेकिन गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं। मगर उनके भी दिन लद गए हैं।”&nbsp;</div><div><br></div><div>ये कथन इस बात की प्रतिपुष्टि करता है कि हथियारबंद माओवादियों के बाद अगला नंबर अर्बन नक्सलियों का है। जो भी भारत की अखंडता, संप्रभुता और संविधान के ख़िलाफ़ आएगा। वो बख़्शा नहीं जाएगा। मातृभूमि भारतभूमि को हम रक्तरंजित नहीं होने दे सकते।&nbsp;</div><div><br></div><div>हमारे वीर जवानों ने सुरक्षा के लिए जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है। वर्षों तक माओवादियों की मांद में घुसकर उन्हें नेस्तनाबूद किया है।आज उन वीर बलिदानियों के कारण ही छत्तीसगढ़ ख़ूनी आतंक से बाहर आया है। सशस्त्र माओवादी आतंक का सफाया हो चुका है। अर्बन नक्सली हमेशा से हथियारबंद माओवादियों की ढाल बनकर खड़े रहते थे। अभी भी ये सिलसिला रुका नहीं है। अर्बन नक्सली —</div><div>नक्सलवाद के समर्थन में साहित्य लिखते, इंटरव्यू करते, एडिटोरियल लिखते, नाट्य मंचन करते, ढफली बजाते, रैली करते और चिंघाड़ते हुए अर्बन नक्सली नज़र आते थे।‌ ये मानवाधिकार&nbsp;</div><div>के नाम पर माओवादी हिंसा को जायज़ ठहराते थे। लेकिन माओवादी आतंकी जिन निर्दोषों की हत्या करते थे। उनके मानवाधिकार पर ये चुप्पी ओढ़ लेते थे। वो माओवादी जो बस्तर के जनजातीय समाज का दमन करते थे। स्थानीय लोगों के जवान बच्चों और महिलाओं को अर्बन नक्सलियों के कॉन्सेप्ट पर उठा ले जाते थे। फिर उनके हाथों में हथियार थमा देते थे। रक्तपात कराते थे। बस्तर के वो बच्चे जिन्हें हाथों में किताबें थामनी थी। अर्बन नक्सलियों, माओवादियों ने - उन्हें बंदूक पकड़ने के लिए मजबूर किया। उनका बचपन, घर-परिवार और समाज सबकुछ छीन लिया। बारूदी गंध की ज़िंदगी जीने को विवश किया। भोले-भाले, सरल हृदय जनजातीय समाज को अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया। माओवादियों ने उन्हें रक्तपात करने का हथियार बनाने का जघन्य अपराध किया। क्या इनसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति की दिखाई जा सकती है ?</div><div><br></div><div>आज जिस माडवी हिड़मा को अर्बन नक्सली हीरो बना रहे हैं। अर्बन नक्सली जिस हिड़मा के लिए नारे लगा रहे हैं। मत भूलिए कि वो आतंकी इन 76 जवानों की हत्या का असल मास्टरमाइंड था। माडवी हिड़मा वो खूंखार आतंकी था जिसने न जाने कितने घर-परिवार उजाड़ दिए। न जाने कितने निर्दोषों को गोली से भून दिया।‌ नृशंसता के साथ सिलसिलेवार ढंग से हत्याओं को अंज़ाम दिया। अब, उस हिड़मा को महान बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा से जोड़ने का अपराध, अर्बन नक्सली कर रहे हैं। बिरसा मुंडा जिन्होंने राष्ट्रीय अस्मिता के लिए अपना जीवन न्यौछावर कर दिया। ईसाई मिशनरियों, अंग्रेज़ों की नाक में दम कर दिया। स्वतंत्रता, जनजातीय अस्मिता, भारत की संस्कृति और कन्वर्जन के ख़िलाफ़ जिन्होंने अंग्रेजों से लड़ाई लड़ी। अगर कोई भी भगवान बिरसा मुंडा से हिड़मा जैसे माओवादी क्रूर हत्यारे को जोड़ता है तो ये सबसे बड़ा अपराध है। यह हमारे आदर्शों, हमारी संस्कृति, जनजातीय समाज का घोर अपमान है। ये किसी भी क़ीमत में स्वीकार नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>अब भी जो लोग माओवाद के समर्थन में लोगों को बरगलाते दिखाई दें। जो हिड़मा जैसे माओवादी आतंकी को ग्लोरीफाई करते दिखें। जो ये विमर्श करते दिखें कि— अजी ! जल-जंगल जमीन के लिए नक्सलवाद फिर से वापस आ सकता है। ऐसे में ये तय मानिए कि या तो ये अर्बन नक्सली हैं। याकि ये अर्बन नक्सलियों के नैरेटिव के ट्रैप में फंस गए हैं। याकि ये किसी पॉलिटिकल लाइन को एड्रेस कर रहे हैं। देश समेत छत्तीसगढ़ से माओवादी आतंक का सफ़ाया ये बता रहा है कि- अगर दृढ़ इच्छाशक्ति हो। संकल्प हो। समाज के लिए बेहतरी की चिंता हो तो कोई भी लक्ष्य कठिन नहीं हो सकता है। हमारे सुरक्षाबल, हमारे गौरव है। उनके असंख्य बलिदानों के प्रति ये राष्ट्र और समाज अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। हमारा छत्तीसगढ़, हमारे बस्तर की माटी और उसकी संतानें अब सृजन का नया विहान रच रही हैं। अब बस्तर में बारूद की गंध कभी नहीं लौटेगी। हमारा पूरा समाज-एक साथ खड़ा है। बस्तर के युवाओं के कंधों पर अब वहां की शिक्षा-रक्षा, स्वास्थ्य-रोजगार, विकास की कमान है। जो अभावग्रस्त हैं। उन तक अब सारे संसाधन तेजी से पहुंचेंगी। वीर गुंडाधुर, भगवान बिरसा मुंडा, दंतेश्वरी माई की संतानें अब मूल को पहचानकर सृजन के गीत गा रही हैं। प्रकृति की लय ताल के साथ एकाकार होकर शांत और सुरम्य तस्वीरें रच रही हैं।</div><div><br></div><div>— कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल&nbsp;</div><div>(साहित्यकार, स्तंभकार एवं पत्रकार)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 18:37:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maoists-will-no-longer-thrive-do-spare-a-thought-for-them-too</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[West Bengal में कानून व्यवस्था की स्थिति के बारे में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट की राय मतदाताओं को जरूर जाननी चाहिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/voters-must-know-opinion-of-president-pm-and-sc-regarding-the-law-and-order-situation-in-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के बंगाल दौरे के दौरान जो कुछ हुआ, उस पर उनकी तीखी नाराजगी, मालदा की शर्मनाक घटना पर उच्चतम न्यायालय की कड़ी और असहज कर देने वाली टिप्पणियां और कूच बिहार की जनसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का प्रचंड प्रहार यह साबित करने के लिए काफी है कि पश्चिम बंगाल में कानून व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है। देखा जाये तो हालात इतने बदतर हैं कि देश की संवैधानिक प्रमुख राष्ट्रपति और न्याय के सर्वोच्च मंदिर उच्चतम न्यायालय की चिंता एक ही दिशा में इशारा कर रही है कि पश्चिम बंगाल आज अराजकता और भय के माहौल में जी रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि पिछले माह बंगाल में कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की नाराजगी केवल एक प्रोटोकॉल का मुद्दा नहीं थी, बल्कि यह उस प्रशासनिक अव्यवस्था का प्रतीक थी जो राज्य में गहराई तक पैठ बना चुकी है। उस घटना ने दर्शाया था कि शासन तंत्र किस हद तक असंवेदनशील और मनमानी का शिकार हो चुका है। जब देश की प्रथम नागरिक के साथ ऐसा व्यवहार हो सकता है, तो आम नागरिक की सुरक्षा और सम्मान की स्थिति का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/rising-anarchy-in-west-bengal-a-challenge-to-democracy" target="_blank">पश्चिम बंगाल में बढ़ती अराजकता लोकतंत्र के लिए चुनौती</a></h3><div>वहीं मालदा की घटना ने तो इस अराजकता को और भी भयावह रूप में उजागर कर दिया। सात न्यायिक अधिकारियों को घंटों तक घेर कर रखना, उन्हें भोजन और पानी तक नहीं मिलने देना और प्रशासन का पूरी तरह निष्क्रिय बने रहना, यह पूरे सिस्टम के पतन की कहानी है। उच्चतम न्यायालय ने इसे राज्य प्रशासन की पूर्ण विफलता बताया और स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह न्यायिक व्यवस्था को डराने का सुनियोजित प्रयास है। न्यायालय ने सीबीआई या एनआईए से जांच कराने का निर्देश देकर यह साबित कर दिया कि राज्य सरकार पर भरोसा करने की स्थिति नहीं बची है।</div><div><br></div><div>उधर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूच बिहार की रैली में इस घटना को तृणमूल कांग्रेस का महा जंगलराज करार देते हुए बिल्कुल सही तस्वीर सामने रखी। उन्होंने साफ कहा कि यह चुनाव भय और भरोसे के बीच की लड़ाई है। एक तरफ वह सरकार है जिसने बंगाल को हिंसा, भ्रष्टाचार और असुरक्षा में धकेल दिया है, और दूसरी तरफ वह संकल्प है जो कानून का राज स्थापित करने की बात करता है। प्रधानमंत्री का यह आश्वासन कि इस बार भय भागेगा और हर अपराध का हिसाब होगा, बंगाल की जनता के लिए उम्मीद की किरण बनकर उभरा है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, चुनाव आयोग ने भी इस बिगड़ती स्थिति को गंभीरता से लेते हुए अभूतपूर्व कदम उठाए हैं। केंद्रीय बलों की भारी तैनाती, संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा का कड़ा बंदोबस्त, न्यायिक अधिकारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और यहां तक कि चुनाव के बाद भी केंद्रीय बलों को तैनात रखने का निर्णय यह दर्शाता है कि आयोग किसी भी कीमत पर निष्पक्ष और भयमुक्त चुनाव कराने के लिए प्रतिबद्ध है। लगभग दो हजार से ढाई हजार कंपनियों की तैनाती, ईवीएम और मतगणना केंद्रों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त बल और आपराधिक तत्वों पर सख्त कार्रवाई, यह सब इस बात का प्रमाण है कि इस बार का चुनाव लोकतंत्र की असली परीक्षा है।</div><div><br></div><div>इतना ही नहीं, निर्वाचन आयोग ने तृणमूल कांग्रेस से जुड़े लोगों को दी जा रही पुलिस सुरक्षा की समीक्षा के आदेश देकर यह स्पष्ट संदेश दिया है कि सत्ता का दुरुपयोग अब नहीं चलेगा। अपराधियों को संरक्षण देने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई, यहां तक कि थाना प्रभारी का निलंबन, यह दिखाता है कि अब जवाबदेही तय होगी और हर गलती का हिसाब लिया जाएगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो आज बंगाल की जनता एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां उसे तय करना है कि वह भय और हिंसा के इस चक्र को जारी रखेगी या बदलाव का रास्ता चुनेगी। यह चुनाव केवल सरकार बदलने का नहीं बल्कि व्यवस्था को पुनर्जीवित करने का अवसर है। हर मतदाता का वोट इस अराजकता के खिलाफ एक मजबूत हथियार बन सकता है।</div><div><br></div><div>समय आ गया है कि बंगाल अपनी खोई हुई पहचान को वापस हासिल करे। वह बंगाल जो कभी विकास, संस्कृति और प्रगति का प्रतीक था, आज भय और असुरक्षा का पर्याय बन गया है। लेकिन बदलाव संभव है, और वह बदलाव जनता के एकजुट संकल्प से ही आएगा।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री का यह वादा कि चुनाव परिणाम के बाद कानून अपना काम करेगा और हर गुनाह का हिसाब होगा, केवल एक राजनीतिक बयान नहीं बल्कि एक मजबूत संदेश है कि अब अन्याय का अंत होगा। बंगाल की जनता को इस अवसर को पहचानना होगा और अपने मताधिकार का उपयोग कर उस बदलाव की नींव रखनी होगी जो आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाए।</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर देखें तो यह चुनाव बंगाल के आत्मसम्मान की लड़ाई है, यह लोकतंत्र की प्रतिष्ठा की लड़ाई है और यह उस विश्वास की लड़ाई है जो हर नागरिक को एक सुरक्षित और न्यायपूर्ण समाज में जीने का अधिकार देता है। अब फैसला जनता के हाथ में है कि वह भय के साथ जीना चाहती है या भरोसे के साथ आगे बढ़ना चाहती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 15:32:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/voters-must-know-opinion-of-president-pm-and-sc-regarding-the-law-and-order-situation-in-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[प्रधानमंत्री 'नरेन्द्र मोदी' के नेतृत्व में सफलता के नित-नए आयाम स्थापित करती 'भाजपा']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-bjp-setting-ever-newer-benchmarks-of-success-under-the-leadership-of-pm-narendra-modi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत को एक समर्थ शक्तिशाली राष्ट्र बनाने के लक्ष्य के साथ राष्ट्र को प्रथम मानने का दावा करने वाले राजनेताओं के एक समूह ने वर्ष 1980 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का गठन किया था। भाजपा का गठन नई दिल्ली के कोटला मैदान में 6 अप्रैल 1980 को आयोजित एक कार्यकर्ता अधिवेशन में तत्कालीन दिग्गज नेताओं की उपस्थिति किया गया था। उस वक्त भाजपा के प्रथम अध्यक्ष के रूप में लोकप्रिय नेता अटल बिहारी वाजपेयी निर्वाचित हुए थे, जो बाद में देश के प्रधानमंत्री पद तक पहुंचे थे।&nbsp;</div><div><br></div><div>भाजपा नेतृत्व व कार्यकर्ताओं ने सनातन धर्म संस्कृति परंपराओं को अपनाते हुए, अंतर्राष्ट्रीय, राष्ट्रीय, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद एवं लोकहित के विषयों पर कांग्रेस के प्रति मुखर रहते हुए उसको जनता की अदालत में घेरकर के भारतीय लोकतंत्र में अपनी एक अलग ही विशिष्ट पहचान बनाते हुए सशक्त भागीदारी दर्ज करते हुए देश की राजनीति को नए आयाम देने का कार्य किया है। जनता पार्टी की गठबंधन वाली सरकार के दौर के बाद से ही भाजपा नेता अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी आदि ने दिन-रात मेहनत करके भाजपा को अपने पैरों पर खड़ा होने लायक़ बनाया और भाजपा ने अपना पहला लोकसभा चुनाव वर्ष 1984 में लड़ा था, जिसमें उसने 2 सीटों पर जीती हासिल करके भाजपा ने खाता खोला था। उसके बाद भाजपा के नेता लालकृष्ण आडवाणी अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण के मुद्दे को जोर-शोर से उठाया, जिसके चलते उस वक्त भाजपा की देश के कई राज्यों में सरकार बनी और भाजपा को कल्याण सिंह जैसा फॉयर ब्रांड राजनेता मिला था। शीर्ष नेतृत्व व कार्यकर्ताओं की वर्षों की मेहनत के दम पर ही वर्ष 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी को गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने का अवसर मिला था। जिसके बाद भाजपा ने अपनी जड़ें देश के अधिकांश हिस्सों में जमाने के लिए कार्य तेज़ी से करना शुरू किया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-issues-stern-warning-to-tmc-in-west-bengal" target="_blank">PM Modi की West Bengal में बड़ी चेतावनी, 4 May के बाद TMC के हर पाप का होगा हिसाब</a></h3><div>अटल युग के बाद 10 वर्ष तक केन्द्र में विपक्ष में बैठने के लंबे वनवास के बाद वर्ष 2014 में प्रचंड बहुमत के साथ नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने। भाजपा में यह नरेन्द्र मोदी व अमित शाह के युग जबरदस्त ढंग से प्रारंभ था। मोदी-शाह के इस दौर में भाजपा ने राजनीति के नित-नए कीर्तिमान स्थापित किए, अपने लोकप्रिय राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में लगभग 11 करोड़ सदस्य बनाकर के विश्व की सबसे बड़ी राजनैतिक पार्टी बनने का खिताब हासिल किया। वहीं मोदी-शाह की इस जोड़ी ने आज भी अपनी चाणक्य नीति व देश में विकास पर आधारित राजनीति की मजबूत नींव रखकर विपक्षी दलों की नींद उड़ानें का काम कर रखा है। आज देश में देश में दिल्ली, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, गोवा, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, असम, नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय, मिजोरम, बिहार और आंध्र प्रदेश में भाजपा या एनडीए सरकार हैं। देशभर में भारतीय जनता पार्टी के पास लगभग सर्वाधिक 1654 विधायक हो गए हैं। भाजपा के पास लगभग 240 लोकसभा सांसद हैं, वहीं लगभग 106 राज्यसभा सांसद हैं। देश की राजनीति में मोदी-शाह की जोड़ी का जलवा कायम है, विपक्षी दल उनकी राजनीति की काट नहीं ढूंढ पा रहे हैं। जिसके चलते देश के हृदय गुजरात, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, दिल्ली, राजस्थान आदि राज्यों में भाजपा काबिज है, केन्द्र के साथ कई राज्यों में भाजपा लगातार सरकार बनाने में सफल हो रही है‌।</div><div><br></div><div>बहुत सारे लोगों का मानना है कि देश में आम लोगों को मोदी राज में विकास कार्यों का बड़ा सकारात्मक परिवर्तन धरातल पर नज़र आने लगा है। देश के विश्वस्तरीय नव निर्माण के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर पर बहुत तेज़ी से कार्य चल रहे हैं। मोदी सरकार एक सुदृढ़, सशक्त, समृद्ध, समर्थ एवं स्वावलम्बी भारत के निर्माण हेतु निरंतर सक्रिय है। वह भारत को ‘विश्व गुरू’ के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करने के लिए निरंतर कार्य कर रही है। मोदी भारत को विश्व के विभिन्न राष्ट्रों को प्रभावित करने की क्षमता विकसित करने के लिए निरंतर कार्य कर रहे है। देश में आज भाजपा एक ऐसे प्रमुख राष्ट्रवादी दल के रूप में उभर कर सामने आ रही है जिस दल का लक्ष्य देश में सुशासन, विकास, एकता एवं अखंडता के लिए कार्य करना है। 26 मई, 2014 को नरेन्द्र मोदी ने जब से भारत के प्रधानमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण की है तब से ही मोदी सरकार ने अपनी अनेक&nbsp; योजनाओं के माध्यम से देश में नव निर्माण के एक नए युग की शुरुआत की है। आज मोदी सरकार की नीतियां आम जनमानस के बीच लोकप्रिय हैं, मोदी सरकार की योजनाएं अन्त्योदय, सुशासन, विकास एवं समृद्धि के रास्ते पर देश को आगे बढ़ाने का कार्य कर रही हैं। आम लोगों को आर्थिक और सामाजिक सुधार से परिपूर्ण सुरक्षित जीवन जीने का मार्ग उपलब्ध करा रही हैं। किसानों के लिये ऋण से लेकर खाद तक की नयी नीतियां जैसे प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना, सॉयल हेल्थ कार्ड, आदि ने कृषि के तीव्र विकास की देशभर में एक नयी अलख जगायी है। आम जनमानस के बीच मोदी सरकार के दौर को एक नये युग के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा की मोदी सरकार सुशासन, आदर्श ग्राम योजना, स्वच्छता अभियान, योग के सहारे भारत को स्वथ्य बनाने का अभियान आदि से देश को एक नयी ऊर्जा देने का कार्य कर रही है। भाजपा की मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया, स्किल इंडिया, अमृत मिशन, दीनदयाल ग्राम ज्योति योजना, डिजिटल इंडिया आदि जैसी योजनाओं से भारत को आधुनिक और सशक्त बनाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। जनधन योजना, बेटी बचाओ-बेटी पढाओ, सुकन्या समृद्धि योजना जैसी अनेक योजनाएं देश में एक नयी क्रांति का सूत्रपात कर रही हैं। वहीं राम मंदिर निर्माण, धारा 370 की समाप्ति व पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब देकर भाजपा के शीर्ष नेतृत्व ने अपनी पैठ आम जनमानस के बीच और मजबूत करने का काम किया है। भाजपा के तेजतर्रार मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के बुलडोजर न्याय और हेमंत बिस्वा शर्मा की कार्यशैली की पूरे देश में चर्चा है। भारतीय जनता पार्टी ने जनता की अदालत में यह साबित कर दिया है कि भारतीय लोकतंत्र के लिए अपेक्षित ओजस्वी नेतृत्व आज केवल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पास मौजूद है।</div><div><br></div><div>- दीपक कुमार त्यागी</div><div>अधिवक्ता, स्वतंत्र पत्रकार, स्तंभकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 12:41:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-bjp-setting-ever-newer-benchmarks-of-success-under-the-leadership-of-pm-narendra-modi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[रात रात भर बमबारी से परेशान हुए ईरानी, जान बचाने के लिए सरहदें पार करने की होड़, सीमाओं पर बिठाया गया सख्त पहरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/iranians-rushed-to-cross-borders-to-save-their-lives-strict-vigil-was-maintained-at-the-borders]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ईरान की सरहदें अब केवल नक्शे पर खिंची रेखाएं नहीं रहीं, बल्कि वह इंसानी दर्द, डर और बिखरती उम्मीदों की सबसे मार्मित कहानी बन चुकी हैं। अप्रैल की शुरुआत तक हालात इतने बिगड़ चुके हैं कि हर सीमा चौकी पर मार्मिक कहानियां दिखाई दे रही हैं। युद्ध, आर्थिक तबाही और संचार ठप होने की स्थिति ने पूरे ईरान को भीतर से झकझोर दिया है जिससे बड़ी संख्या में लोग पलायन कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>तुर्की की कपिकोय सीमा पर खड़े लोगों ने पलायन का कारण पूछे जाने पर बताया कि हर रात बम गिरते हैं और हर सुबह खुद को जिंदा पाकर हम खुश होते हैं लेकिन ऐसा कब तक चलेगा। उन्होंने बताया कि राजधानी तेहरान से लेकर औद्योगिक इलाकों तक धमाकों की आवाज अब लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/not-in-iran-but-regime-chang-is-definitely-happening-in-the-white-house-know-how" target="_blank">Iran में तो नहीं, लेकिन ट्रंप के White House में जरूर हो रहा रिजीम चेंज, जानिए कैसे?</a></h3><div>इंटरनेट बंद है, कारोबार ठप है और भविष्य पूरी तरह अनिश्चित है। ऐसे में लोग केवल जान बचाने के लिए नहीं, बल्कि दुनिया से जुड़ने के लिए भी देश छोड़ रहे हैं। यह पलायन अब रोटी या नौकरी का नहीं, बल्कि अस्तित्व और संवाद का संकट बन गया है। कुछ लोग तो सिर्फ इंटरनेट इस्तेमाल करने के लिए पहाड़ों के रास्ते तुर्की की सीमा पार कर रहे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि ईरान से निकलने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जबकि देश के भीतर भी लाखों लोग विस्थापित हो चुके हैं। तुर्की सबसे बड़ा रास्ता बनकर उभरा है, क्योंकि वहां वीजा मुक्त प्रवेश की सुविधा है। इसके अलावा अफगानिस्तान और पाकिस्तान की ओर भी लोगों का रुख बढ़ा है। लेकिन इन रास्तों पर अब पहले जैसा खुलापन नहीं है। तुर्की ने अपनी सीमा को लगभग किले में बदल दिया है। सैंकड़ों किलोमीटर लंबी दीवार, रडार, थर्मल कैमरे और ड्रोन निगरानी, सब कुछ तैनात है। इसके साथ ही सीमा के भीतर बफर जोन और टेंट शहर बनाने की तैयारी की गई है ताकि शरण लेने वालों को शहरों तक पहुंचने से पहले ही रोक दिया जाए। यहां एक अजीब विडंबना दिखाई देती है। एक तरफ इंसान मदद के लिए दरवाजे खटखटा रहा है, दूसरी तरफ वही दरवाजे सुरक्षा के नाम पर बंद किए जा रहे हैं।</div><div><br></div><div>अफगानिस्तान सीमा पर हालात और भी ज्यादा तनावपूर्ण हैं। तालिबान और ईरानी सुरक्षा बलों के बीच झड़पें हो चुकी हैं। हजारों अफगान जो कभी ईरान में रह रहे थे, अब वापस लौट रहे हैं, जबकि कुछ ईरानी उसी दिशा में शरण लेने की कोशिश कर रहे हैं। यह उल्टा बहाव बताता है कि हालात कितने जटिल हो चुके हैं।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान ने भी अपनी सीमा पर सख्ती बढ़ा दी है। हर आने जाने वाले की कड़ी जांच हो रही है। वहीं अजरबैजान ने अपनी जमीन पूरी तरह बंद कर दी है। वहां प्रवेश अब केवल विशेष अनुमति से ही संभव है।</div><div><br></div><div>इन सबके बीच आर्मेनिया की नोरदुज सीमा एक उम्मीद की तरह सामने आई है। यह फिलहाल उन लोगों के लिए सबसे सुरक्षित रास्ता है जो किसी भी तरह इस संकट से बाहर निकलना चाहते हैं। लेकिन यह रास्ता भी कब तक खुला रहेगा, यह कोई नहीं जानता।</div><div><br></div><div>युद्ध का सबसे गहरा असर ईरान की अर्थव्यवस्था पर पड़ा है। कारोबार बंद हो रहे हैं, मुद्रा लगातार गिर रही है और लोगों की बचत खत्म होती जा रही है। एक कारोबारी को अपना पूरा व्यापार बंद करना पड़ा और अपने कर्मचारियों को यह कहकर घर भेजना पड़ा कि अब आगे क्या होगा, कोई नहीं जानता।</div><div><br></div><div>सबसे डरावनी बात यह है कि लोग अब इस डर के साथ जीना सीख रहे हैं। शुरुआत में जो धमाके दिल दहला देते थे, अब वे सामान्य लगने लगे हैं। लेकिन इस सामान्यता के पीछे छिपा है गहरा मानसिक आघात। एक महिला बताती है कि उसकी मां की मौत किसी हमले से नहीं, बल्कि लगातार तनाव के कारण हुई। देखा जाये तो युद्ध केवल शरीर को नहीं, बल्कि मन को भी तोड़ देता है।</div><div><br></div><div>हालांकि हर ईरानी इस पलायन का हिस्सा नहीं है। कुछ लोग अब भी अपने देश के साथ खड़े हैं। वह मानते हैं कि मुश्किल समय है, लेकिन देश छोड़ना समाधान नहीं है। यह सोच दिखाती है कि ईरान के भीतर भी एक गहरी मानसिक और भावनात्मक लड़ाई चल रही है।</div><div><br></div><div>दिलचस्प बात यह भी है कि जहां एक तरफ लोग देश छोड़ रहे हैं, वहीं कई लोग वापस भी लौट रहे हैं। कुछ अपने परिवार के पास रहने के लिए, तो कुछ मजबूरी में। यह स्थिति बताती है कि यह संकट केवल भागने या बचने का नहीं, बल्कि रिश्तों और जिम्मेदारियों के बीच फंसी जिंदगी का भी है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो आज ईरान की सीमाएं दुनिया के सबसे बड़े मानवीय संकट का केंद्र बन चुकी हैं। एक तरफ युद्ध और आर्थिक तबाही से जूझती जनता, दूसरी तरफ पड़ोसी देशों की सख्त सुरक्षा नीतियां, इन दोनों के बीच इंसान पिस रहा है। यह केवल सीमाओं का संकट नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई है। अगर हालात जल्द नहीं बदले, तो इसका असर केवल ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे क्षेत्र और दुनिया को अपनी चपेट में ले लेगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 17:40:41 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/iranians-rushed-to-cross-borders-to-save-their-lives-strict-vigil-was-maintained-at-the-borders</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[नौकरी के लिए न्यूनतम अंक भी प्राप्त नहीं होना अध्ययन गुणवत्ता पर उठाते सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/failure-to-even-secure-minimum-qualifying-marks-for-job-raises-questions-quality-of-education]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अभी मेडिकल पीजी में 0 पर्सेंटाइल पर प्रवेश का मुद्दा पुराना भी नहीं हुआ है कि राजस्थान लोक सेवा आयोग द्वारा स्कूल लेक्चरर के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा के परिणाम ने देश की शिक्षा के हालातों के पोल खोलकर ही रख दी है। शिक्षा के मंदिर में बच्चों को पढ़ाने के लिए लेक्चरर के पद पर नियुक्ति के लिए आयोजित प्रतियोगिता परीक्षा में पोलिटिकल साइंस के लेक्चरर के पद के लिए हजारों युवाओं ने परीक्षा दी और 225 पद होने के बावजूद केवल 6 परीक्षार्थी चयन के योग्य पाये गये। मजे की बात है कि परीक्षा देने वाले हजारों युवाओं में मात्र 219 युवा भी न्यूनतम प्राप्तांक 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पायें। हालात की गंभीरता को इसी से समझा जा सकता है कि फिजिकल एजुकेशन के 37 पदों के लिए एक भी नहीं और होमसाइंस जैसे विषय के लेक्चरर के पद के लिए केवल एक परीक्षार्थी ही सफल हो सका। अब एक और देश में प्रतिपक्ष बेरोजगारी की समस्या को गंभीरता से उठा रहे हैं तो दूसरी और भर्ती वाले पदों के लिए न्यूनतम अर्हता अंक प्राप्त करने में भी आज के युवा सफल नहीं हो पा रहे हैं। यह कोई राजस्थान की ही बात नहीं है अपितु यह समूचे देश की शिक्षा के स्तर की बानगी है। क्योंकि निश्चित रुप से राजस्थान लोक सेवा आयोग की परीक्षा में अन्य प्रदेशों के युवा भी परीक्षार्थी रहे होंगे। बेरोजगारी की समस्या अपनी जगह पर है पर दूसरी और स्नातक, स्नातकोत्तर और तकनीकी शिक्षा प्राप्त युवाओं के ज्ञान के स्तर को इससे आंका जा सकता है।</div><div><br></div><div>यही कारण है कि आज मल्टी टास्क सर्विस जिसे परपंरागत शब्दों में कहा जाए तो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के पद या शहरी निकायों में सफाई कर्मचारी के कुछ पदों के लिए ही हजारों लाखों युवा आवेदन करने लगे हैं और तस्वीर का एक पहलू यह है कि इन युवाओं में उच्च और तकनीकी शिक्षा यहां तक की इंजीनियर, डॉक्टर, एमबीए तक आवेदन कर रहे हैं। यह हमारे शैक्षणिक संस्थानों के लिए किसी तमाचे से कम नहीं होना चाहिए। अब पोलिटिकल साइंस के स्कूल लेक्चरर के लिए परीक्षा देने वाले युवा निश्चित रुप से पोलिटिकल साइंस से स्नातक या स्नातकोत्तर और हो सकता है कि पीएच डी तक हो पर उनके द्वारा केवल और केवल न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं करना कहीं ना कहीं शिक्षा की स्थिति को स्पष्ट करती है। वैसे देखा जाएं तो 40 प्रतिशत अंक प्राप्त कर चयनित होने वाले स्कूल लेक्चरर से आप बच्चों को अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने की अपेक्षा करेंगे तो बेमानी होगी। हालात वास्तव में गंभीर है और यही कारण है कि नौकरी के लिए आयोजित परीक्षाओं में नकल, गलत प्रयोग और पेपर आउट व डमी केंडिडेट द्वारा परीक्षाएं देने के माफियायों की बन पड़ी है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/ncert-granted-deemed-university-status-can-now-launch-its-own-degree-courses" target="_blank">शिक्षा के क्षेत्र में नया अध्याय! NCERT को मिला Deemed University का दर्जा, अब खुद शुरू कर सकेगा डिग्री कोर्स</a></h3><div>जहां तक मेडिकल पीजी में जीरो पर्सेंटाइल पर प्रवेश के निर्णय पर यह अवश्य संतोष की बात है कि फैडरेशन ऑफ ऑल इंडिया मेडिकल एसोसिएशन ने सरकार के इस निर्णय की खिलाफत करने की हिम्मत दिखाई है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देष में षिक्षण संस्थाओं का जाल बिछा कर सबके लिए शिक्षा की सुविधा उपलब्ध हो सकी। अब तो डीम्ड यूनिवर्सिटी सहित यूनिवर्सिटी नित नई खुलती जा रही है। इसे अच्छा भी माना जा सकता है पर सौ टके का सवाल यह है कि क्या शिक्षण संस्थान केवल डिग्री देने के माध्यम ही बन कर रह गए हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>पोलिटिकल साइंस स्कूल लेक्चरर या अन्य पदों के लिए न्यूनतम योग्यता प्राप्त करने वाली युवाओं की पीढ़ी तैयार हो रही है तो इसके लिए सबसे अधिक शर्म की बात इन शिक्षण संस्थानों के लिए होनी चाहिए। पोलिटिकल साइंस तो उदाहरण मात्र है, सवाल यह है कि परीक्षा देने वाले हजारों प्रतियोगी किसी एक संस्थान से तो डिग्री प्राप्त नहीं होंगे। मजे और शर्म की बात यह है कि इन हजारों प्रतियोगी छात्रों में से कई युवा तो स्तरीयता का दावा करने वाले संस्थान के शिक्षार्थी रहे होंगे, उसके बाद नौकरी के लिए परीक्षा में न्यूनतम 40 प्रतिशत अंक भी प्राप्त नहीं कर पाते हैं तो इससे अधिक बुरी बात क्या होगी? आखिर हम जा कहां रहे हैं। शिक्षण संस्थानों की स्तरीयता पर ही सवाल खड़े हो जाते हैं। इसके अलावा जिस तरह से कोचिंग संस्थानों और लाइब्रेरियों की बाढ़ आई हुई है उसके परिणाम भी इन परिणामों में कहीं दूर दूर तक लक्षित नहीं हो रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>सरकार और तकनीकी शिक्षण संस्थानों को कम से कम अपने स्तर का तो ध्यान रखना ही होगा। शिक्षा की गुणवत्ता और तकनीकी अध्ययन की वैश्विक पहचान बनाना सरकार और अध्ययन केन्द्रों की पहली और अंतिम प्राथमिकता होनी चाहिए, पर यहां तो स्थानीय स्तर पर ही खरे नहीं उतर पा रहे हैं। कल्पना कीजिए कि जीरो पर्सेंटाइल वालों को विशेषज्ञ बनाकर ईलाज का लाइसेंस देंगे तो यह आमनागरिकों की जिंदगी से खिलवाड़ और शिक्षा पद्धति को मजाक बनाना ही है। सरकार और आयोग को समय रहते शिक्षा के स्तर को बनाए रखने की पहल करनी होगी। इसी से देश की शिक्षा की गुणवत्ता देश दुनिया में बनी रह सकेगी। सरकारी और गैरसरकारी संस्थाओं को खासतौर से आगे आना होगा। हालात शिक्षण संस्थानों को शर्मिंदा करने के लिए काफी होने चाहिए। परिणाम एक बार युवाओं को तैयार कर रही इन संस्थानों के लिए भी आत्मचिंतन के होने चाहिए। परिणाम साफतौर पर इन संस्थानों को चेहरा दिखाते नजर आ रहे हैं।</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 13:15:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/failure-to-even-secure-minimum-qualifying-marks-for-job-raises-questions-quality-of-education</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विवाह संस्था और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच नई खाई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-new-rift-between-the-institution-of-marriage-and-individual-liberty]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आधुनिकता के संक्रमणकालीन दौर में सबसे अधिक यदि कोई संस्था प्रश्नों के घेरे में है, तो वह विवाह और रिश्तों की पारंपरिक अवधारणा है। बदलती जीवनशैली, आर्थिक आत्मनिर्भरता, तकनीक, वैश्वीकरण और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती चेतना ने रिश्तों की परिभाषा, अपेक्षाएँ और संरचना-सब कुछ बदल दिया है। यही कारण है कि आज रिश्तों से जुड़े प्रश्न केवल सामाजिक विमर्श का विषय नहीं रहे, बल्कि अदालतों तक पहुँच रहे हैं। हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के दो फैसलों ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विवाह संस्था के बीच उत्पन्न हो रही नाजुक खाई को उजागर किया है। एक निर्णय में न्यायालय ने कहा कि वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बना लिव-इन रिलेशनशिप, भले ही एक साथी विवाहित हो, अपराध नहीं है; वहीं दूसरे मामले में न्यायालय ने ऐसे ही एक जोड़े को संरक्षण देने से इनकार कर दिया और कहा कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर पति या पत्नी के कानूनी अधिकारों को कमजोर नहीं किया जा सकता। यह विरोधाभास वास्तव में न्यायिक असंगति से अधिक एक कानूनी रिक्तता और सामाजिक संक्रमण का संकेत है। वास्तव में एक हकीकत यह भी है कि भारतीय समाज में वैवाहिक अधिकारों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाने वाले एक प्रभावी ढांचे की लंबे समय से आवश्यकता महसूस की जाती रही है। हमें मौजूदा परिदृश्य में यह बात स्वीकार करनी होगी कि यद्यपि विवाह संस्था संरक्षण की हकदार है, फिर भी पुरुष या स्त्री की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को अनिश्चित काल तक इसके अधीन बंधक बनाकर नहीं रखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>निश्चित ही भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार देता है और इसी के दायरे में न्यायालयों ने समय-समय पर लिव-इन रिलेशनशिप को अपराध की श्रेणी से बाहर माना है। लेकिन दूसरी ओर, भारतीय कानून विवाह को एक कानूनी और सामाजिक संस्था के रूप में सर्वोच्च प्राथमिकता देता है, जिसमें अधिकार और दायित्व दोनों शामिल हैं। यही वह बिंदु है जहाँ व्यक्तिगत स्वतंत्रता और वैवाहिक अधिकारों के बीच टकराव उत्पन्न होता है। न्यायालय लिव-इन संबंधों को अपराध नहीं मानता, परंतु उनके सभी परिणामों को वैध मानने में संकोच करता है। यह स्थिति न केवल कानूनी भ्रम उत्पन्न करती है, बल्कि सामाजिक असुरक्षा भी पैदा करती है। वास्तव में समस्या न्यायिक निर्णयों की नहीं, बल्कि स्पष्ट विधायी ढाँचे की कमी की है। यदि व्यापक सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो भारतीय समाज इस समय एक बड़े संक्रमणकाल से गुजर रहा है। एक ओर सदियों से स्थापित पारंपरिक जीवन मूल्य हैं, जिनमें विवाह केवल एक अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार, सामाजिक स्वीकृति और पारिवारिक व्यवस्था का आधार है; दूसरी ओर आधुनिक जीवन की वास्तविकता है, जहाँ व्यक्ति की स्वतंत्रता, आत्म-विकास, करियर, आर्थिक स्वायत्तता और व्यक्तिगत संतुष्टि को भी समान महत्व दिया जा रहा है। विशेष रूप से महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता ने रिश्तों की शक्ति-संतुलन व्यवस्था को बदल दिया है। अब रिश्ते केवल सामाजिक दबाव से नहीं, बल्कि आपसी समझ और संतुष्टि के आधार पर टिके रहते हैं। परिणामस्वरूप, रिश्तों की स्थायित्व की अवधारणा बदल रही है और प्रतिबद्धता अब आजीवन वचन से अधिक एक निरंतर पुनर्मूल्यांकन की प्रक्रिया बनती जा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-becomes-a-new-hub-for-marital-infidelity-4-million-indians-on-extra-marital-dating-apps" target="_blank">शादी में धोखेबाजी करने का नया केंद्र बना भारत! Extra-Marital Dating Apps पर 40 लाख भारतीय, बेंगलुरु सूची में सबसे ऊपर</a></h3><div>पिछली पीढ़ियों में विवाह जीवन का अनिवार्य चरण माना जाता था। हमारे माता-पिता और दादा-दादी के लिए विवाह केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि दो परिवारों का संबंध था और जीवन भर साथ निभाना ही उसका लक्ष्य था। लेकिन आधुनिक पीढ़ी रिश्तों को अलग दृष्टि से देख रही है। आज के युवा पहले शिक्षा, करियर और आर्थिक स्थिरता को प्राथमिकता देते हैं, उसके बाद रिश्तों के बारे में निर्णय लेते हैं। कुछ लोग विवाह से पहले साथ रहने का विकल्प चुनते हैं, कुछ रिश्तों को नाम देने से भी बचते हैं और कुछ लोग विवाह के बजाय साझेदारी को अधिक उपयुक्त मानते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि आधुनिक पीढ़ी रिश्तों को महत्व नहीं देती, बल्कि इसका अर्थ यह है कि वे रिश्तों में स्वतंत्रता, सम्मान, संवाद और समानता को अधिक महत्व देते हैं। रिश्तों में सबसे बड़ा परिवर्तन लिंग भूमिकाओं के बदलाव से भी आया है। पहले पुरुष कमाने वाला और महिला घर संभालने वाली मानी जाती थी, लेकिन आज दोनों काम करते हैं, दोनों निर्णय लेते हैं और दोनों भावनात्मक सहयोग चाहते हैं। आधुनिक रिश्तों में समानता, खुलकर संवाद और साझा जिम्मेदारियों पर जोर है। हालांकि पुरुष और महिलाओं की अपेक्षाएँ पूरी तरह समान नहीं होतीं-अक्सर महिलाएँ भावनात्मक सहयोग और संवाद को अधिक महत्व देती हैं, जबकि पुरुष स्वतंत्रता और बौद्धिक जुड़ाव को महत्वपूर्ण मानते हैं लेकिन इन अंतरों को समझकर ही मजबूत रिश्ते बनाए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>आज आत्म-प्रेम और आत्म-देखभाल को स्वार्थ नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन का आधार माना जाने लगा है। तकनीक और सोशल मीडिया ने भी रिश्तों की प्रकृति को गहराई से प्रभावित किया है। सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ने का काम किया है, लेकिन इसके साथ तुलना की संस्कृति भी बढ़ी है। अब लोग अपने रिश्तों की तुलना दूसरों की ऑनलाइन तस्वीरों और पोस्ट से करने लगे हैं, जिससे असंतोष और अवास्तविक अपेक्षाएँ बढ़ती हैं। कई बार डिजिटल दुनिया में मिलने वाला ध्यान वास्तविक रिश्तों की आत्मीयता को कम कर देता है। ऑनलाइन फ्लर्टिंग, डिजिटल बेवफाई और लगातार उपलब्ध रहने की अपेक्षा जैसी नई समस्याएँ भी सामने आई हैं। इसलिए आज डिजिटल सीमाएँ भी उतनी ही आवश्यक हो गई हैं जितनी व्यक्तिगत सीमाएँ।</div><div><br></div><div>ऑनलाइन डेटिंग ने रिश्तों की दुनिया को पूरी तरह बदल दिया है। जीवनसाथी ढूँढना पहले परिवार, समाज या परिचितों के माध्यम से होता था, लेकिन अब मोबाइल एप और वेबसाइटों के माध्यम से लोग साथी ढूँढते हैं। इससे विकल्प बढ़े हैं, लेकिन साथ ही रिश्तों की स्थिरता कम हुई है। “स्वाइप संस्कृति” ने रिश्तों को कई बार उपभोक्ता वस्तु की तरह बना दिया है, जहाँ विकल्प हमेशा खुले रहते हैं और प्रतिबद्धता कठिन हो जाती है। इसके बावजूद, यह भी सत्य है कि कई सफल विवाह और रिश्ते भी ऑनलाइन माध्यम से ही बने हैं। इसलिए समस्या तकनीक में नहीं, बल्कि उसके उपयोग की मानसिकता में है। आज की तेज़ रफ्तार दुनिया में रिश्तों को समय देना भी एक बड़ी चुनौती बन गया है। करियर, प्रतिस्पर्धा, आर्थिक दबाव, सोशल मीडिया और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएँ-इन सबके बीच रिश्ते अक्सर प्राथमिकता सूची में नीचे चले जाते हैं। लेकिन यह भी एक सत्य है कि अंततः मनुष्य को भावनात्मक सहारा, अपनापन और संबंधों की ही आवश्यकता होती है। इसलिए आधुनिक जीवन में रिश्तों को बनाए रखने के लिए संवाद, समय, सम्मान और समझ पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गए हैं।</div><div><br></div><div>विभिन्न पीढ़ियों के बीच रिश्तों को लेकर दृष्टिकोण में भी बड़ा अंतर दिखाई देता है। पुरानी पीढ़ी स्थायित्व और त्याग को महत्व देती है, जबकि नई पीढ़ी संतुष्टि और स्वतंत्रता को। पुरानी पीढ़ी रिश्ते बचाने के लिए समझौता करती थी, नई पीढ़ी रिश्ते में सम्मान और खुशी नहीं मिलने पर उसे छोड़ने का साहस रखती है। दोनों दृष्टिकोणों में अपनी-अपनी सच्चाई है। इसलिए आवश्यकता पीढ़ियों के संघर्ष की नहीं, बल्कि संवाद और समझ की है। वास्तव में विवाह बनाम स्वतंत्रता का प्रश्न किसी एक पक्ष की जीत या हार का प्रश्न नहीं है। यह समाज के विकास और परिवर्तन का स्वाभाविक चरण है। विवाह संस्था समाज के लिए आवश्यक है, क्योंकि वह स्थिरता, परिवार और सामाजिक व्यवस्था का आधार है। लेकिन व्यक्तिगत स्वतंत्रता भी उतनी ही आवश्यक है, क्योंकि बिना स्वतंत्रता के कोई भी रिश्ता केवल बंधन बन जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि कानून, समाज और परिवार-तीनों मिलकर ऐसा संतुलन बनाएं, जिसमें विवाह संस्था भी सुरक्षित रहे और व्यक्ति की स्वतंत्रता भी सुरक्षित रहे। निश्चिततौर पर यह स्वीकार करना होगा कि जब रिश्ते टूट जाते हैं, तो व्यक्तियों को गरिमा के साथ आगे बढ़ने की अनुमति देना समाज के लिए खतरा नहीं है, बल्कि यह सामाजिक व्यवस्था का एक आवश्यक अनुकूलन है। दुनिया तेजी से बदल रही है, संस्कृतियाँ एक-दूसरे से जुड़ रही हैं और सोच भी बदल रही है। ऐसे समय में हमें परंपरा और आधुनिकता के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि समन्वय का मार्ग खोजना होगा। रिश्तों का भविष्य न पूरी तरह परंपरागत होगा, न पूरी तरह आधुनिक, बल्कि दोनों के संतुलन से ही एक नई सामाजिक व्यवस्था का निर्माण होगा, जहाँ विवाह भी सम्मानित होगा और स्वतंत्रता भी सुरक्षित होगी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 14:40:56 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-new-rift-between-the-institution-of-marriage-and-individual-liberty</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संकल्प के साथ राष्ट्रीय समस्या नक्सलवाद का अंत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-end-of-naxalism-a-national-problem-through-resolve]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में संकट बन चुकी राष्ट्रीय समस्याओं का समय-सीमा में अंत होना दुर्लभ है, लेकिन केंद्र की भाजपा नेतृत्व वाली सरकार ने यह कार्य करके दिखा दिया। गृहमंत्री अमित शाह लगातार कहते रहे हैं कि माओवादी नक्सलवाद का अंत 31 मार्च 2026 तक कर लिया जाएगा। उन्होंने यह करके दिखा भी दिया। वरना नक्सलवाद को संरक्षण दे रहे नगरीय तथाकथित बौद्धिक इस सशस्त्र खूनी क्रांति को राष्ट्र विरोधी संघर्ष मानते ही नहीं थे। बस्तर में 25 लाख के इनामी नक्सली सरगना पापा राव ने अपने 17 साथियों के साथ जिस तरह से हथियारों सहित समर्पण किया, उससे देश के सबसे बड़े गढ़ में माओवादी हिंसा का निर्णायक अंत हो गया। क्योंकि इस क्षेत्र का यही अंतिम सरगना शेष बचा था। नक्सलवाद का अंत ठीक उसी तरह हुआ है, जिस तरह प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव के कार्यकाल में पंजाब के उग्रवाद का अंत हुआ था। इस उपलब्धि का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की दृढ़ इच्छा शक्ति को जाता है। अब पूरा देश मान रहा हैं कि भारत में राजनीतिक नेतृत्व दृढ़ हो तो किसी भी समस्या का निपटारा किया जा सकता है। क्योंकि देश की जिस तरह की सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियां हैं और सषक्त प्रशासनिक ढांचा है, उसके चलते किसी भी प्रकार की सशस्त्र क्रांति का उग्रवाद और नक्सलवाद की तरह अंत होना निश्चित है। कश्मीर का पाक प्रायोजित आतंकवाद का भी यही हश्र होना है।</div><div>&nbsp; &nbsp;</div><div>छत्तीसगढ और आंध्रप्रदेश की सीमा पर हुई मुठभेड़ में सुरक्षाबलों ने शीर्ष माओवादी क्रूर हिंसा के प्रतीक बन चुके हिड़मा को मार गिराने के पहले छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ के जंगल में सुरक्षा बलों के नक्सल विरोधी अभियान में बड़ी सफलता तब मिली थी, जब डेढ़ करोड़ के इनामी बसव राजू समेत 27 माओवादियों को सुरक्षा बलों ने मार गिराया था। यह कुख्यात दरिंदा होने के साथ गुरिल्ला लड़ाका था। माओवादी पार्टी का इसे पर्याय माना जाता था। इसका नक्सली सफर 1985 से शुरू हुआ था। इसने वारंगल के क्षेत्रीय इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाई की थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/deadline-for-naxal-free-india-expires-dream-remains-unfulfilled-focus-shifts-to-urban-naxals" target="_blank">नक्सलवाद मुक्त भारत की डेडलाइन पूरी, ख्वाब अधूरी, अब अर्बन नक्सलियों पर नजर!</a></h3><div>नक्सली हिंसा लंबे समय से देश के अनेक प्रांतों में आंतरिक मुसीबत बनी हुई है। वामपंथी माओवादी उग्रवाद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा माना जाता रहा है। लेकिन चाहे जहां रक्तपात की नदियां बहाने वाले इस उग्रवाद पर लगभग नियंत्रण किया जा चुका है। इसलिए अमित शाह ने लोकसभा में ‘नक्सल मुक्त भारत‘ मुद्दे पर चली चर्चा का उत्तर देते हुए कहा कि ‘एक समय 12 राज्य लाल आतंक का गलियारा बन गए थे। कानून व्यवस्था नहीं थी। देश में अब नक्सलवाद खत्म हो गया है।‘ शाह ने बताया कि इस दौरान 706 नक्सली मारे गए, 4800 ने समर्पण किया हैं और 2000 गिरफ्तार हुए हैं। इस समस्या के परिप्रेक्ष्य में कांग्रेस को घेरते हुए शाह ने कहा, ‘75 साल में 60 साल कांग्रेस ने राज किया। लेकिन उसने आदिवासियों को न घर दिए, न पानी न स्कूल बनाए और न ही बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाई।' शाह का यह बयान तर्कसंगत है, क्योंकि शहरी वामपंथियों से भयभीत कांग्रेस नेतृत्व नक्सलवाद को कश्मीर के आतंकवाद और पूर्वोत्तर के उग्रवाद की तरह बड़ी चुनौती तो मानती थी, लेकिन उससे निपटने की कभी कोई कठोर रणनीति नहीं बनाई। यही कारण रहा कि छत्तीसगढ़ के जगदलपुर इलाके में नक्सली आतंक बेखौफ फलता-फूलता रहा।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसमें कोई दो राय नहीं कि छत्तीसगढ़ में नक्सली तंत्र को कमजोर करने की दृष्टि से सरकार ने बहुआयामी कदम उठाएं। सबसे पहले उन नगरीय बौद्धिकों पर शिकंजा कसा, जो इन्हें राष्ट्रविरोधी वामपंथी वैचारिक खुराक देते थे। केंद्र सरकार ने सुरक्षाबलों को आधुनिक हथियार एवं यांत्रिक सुविधाएं देकर इन्हें सशक्त बनाया। कुछ कानून शिथिल करके नक्सलवाद को खत्म करने का अभियान छेड़ दिया। इसका परिणाम निकला कि एक के बाद एक खून की इबारत लिखने वाले नक्सली मारे जाने लगे। जो नक्सली समर्पण के लिए तैयार हुए उन्हें समर्पण का अवसर और समझौते में बताई गई शर्तों पालन करने का भरोसा दिया। नतीजतन इसके पहले तक गुप्तचर एजेंसियां नक्सलियों का सुराग लगाने में असफल रहती थीं, उन्हें नक्सलियों पर शिकंजा कसने के बाद भरोसे की सूचनाएं मिलने लगीं। इस रणनीति के बाद से सैन्यबलों को सटीक सूचनाएं मिलीं और वे नक्सलियों को निशाना बनाने में लगातार कामयाब होने लगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>छत्तीसगढ़ के ज्यादातर नक्सली आदिवासी हैं। इनका कार्यक्षेत्र वह आदिवासी बहुल इलाके हैं, जिनमें ये खुद आकर नक्सली बने हैं। इसलिए इनका सुराग सुरक्षाबलों को लगा पाना मुश्किल होता है। लेकिन ये इसी आदिवासी तंत्र से बने मुखबिरों से सूचनाएं आसानी से हासिल कर एजेंसियों को खबर देने लगे। दुर्गम जंगली क्षेत्रों के मार्गों में छिपने के स्थलों और जल स्रोतों से भी ये खूब परिचित थे। इसलिए ये और इनकी शक्ति लंबे समय से यहीं के खाद-पानी से पोषित होती रही है। दरअसल इन वनवासियों में अर्बन माओवादी नक्सलियों ने यह भ्रम फैला दिया था कि सरकार उनके जंगल, जमीन और जल-स्रोत उद्योगपतियों को सौंपकर उन्हें बेदखल करने में लगी है, इसलिए यह सिलसिला जब तक थमता नहीं है, विरोध की रक्तरंजित मुहिम जारी रखनी है। सरकारें इस समस्या के निदान के लिए बातचीत के लिए भी आगे आईं, लेकिन कामयाबी नहीं मिली। इन्हें बंदूक के जरिए भी काबू में लेने की कोशिशें हुई हैं। लेकिन नतीजे पूरी तरह अनुकूल नहीं रहे। एक उपाय यह भी हुआ कि जो नक्सली आदिवासी समर्पण कर मुख्यधारा में आ गए थे, उन्हें बंदूकें देकर नक्सलियों के विरुद्ध खड़ा करने की रणनीति भी अपनाई गई। इस उपाय में खून-खराबा तो बहुत हुआ, लेकिन समस्या बनी रही। गोया, आदिवासियों को मुख्यधारा में लाने से लेकर विकास योजनाएं भी इस क्षेत्र को नक्सल मुक्त करने में असफल रहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>दरअसल, देश में अब तक तथाकथित शहरी बुद्धिजीवियों का एक तबका ऐसा भी रहा, जो माओवादी हिंसा को सही ठहराकर संवैधानिक लोकतंत्र को मुखर चुनौती देकर नक्सलियों का हिमायती बना हुआ था। यह न केवल उनको वैचारिक खुराक देकर उन्हें उकसाने का काम करता था, बल्कि उनके लिए धन और हथियार जुटाने के माध्यम भी खोले हुए था। बावजूद इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि जब ये राष्ट्रघाती बुद्धिजीवी पुख्ता सबूतों के आधार पर गिरफ्तार किए गए तो बौद्धिकों और वकीलों के एक गुट ने देश के सर्वोच्च न्यायालय को भी प्रभाव में लेने की कोशिश की थी और गिरफ्तारियों को गलत ठहराया था। माओवादी किसी भी प्रकार की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पसंद नहीं करते थे। इसलिए जो भी उनके खिलाफ जाता था, उसकी बोलती बंद कर दी जाती थी। हालांकि तत्काल तो इस चरमपंथ पर पूर्ण अंकुश लगता दिखाई दे रहा है, लेकिन सरकार को ध्यान रखना होगा कि नक्सलियों के जो भी नगरीय बौद्धिक समर्थक हैं, उनके तार देश-विदेश में उन नक्सल समर्थक वामपंथियों से जुड़े हैं, जो माओवादियों को वैचारिक खुराक, धन और हथियार उपलब्ध कराते रहे हैं। सरकार की सतर्कता कम होती दिखाई देगी तो ये वामपंथी हताश एवं निराश माओवादियों को सिर उठाने के संसाधन फिर से देने लग जाएंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>- प्रमोद भार्गव</div><div>वरिष्ठ साहित्यकार और पत्रकार</div><div>शब्दार्थ 49, श्रीराम कॉलोनी</div><div>शिवपुरी (म.प्र.)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 11:30:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-end-of-naxalism-a-national-problem-through-resolve</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Hanuman Janmotsav 2026: अपने भीतर के हनुमान को जगाने का पर्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-awakening-the-hanuman-within]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हनुमान जन्मोत्सव केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि मानव जीवन के चरित्र-निर्माण, आत्मबल, संयम, सेवा और समर्पण की प्रेरणा देने वाला महान दिवस है। यह दिन हमें मंदिरों में दीप जलाने से अधिक अपने भीतर के अंधकार को दूर करने का संदेश देता है। हनुमान केवल शक्ति के प्रतीक नहीं हैं, वे शक्ति के सदुपयोग, ज्ञान की विनम्रता, भक्ति की पराकाष्ठा और सेवा की परंपरा के प्रतीक हैं। इसलिए हनुमान जन्मोत्सव मनाने का वास्तविक अर्थ है- अपने भीतर के हनुमान को जगाना। हनुमान जी को मंगलकर्ता और विघ्नहर्ता कहा गया है। लेकिन वे विघ्न केवल बाहरी नहीं हटाते, वे मनुष्य के भीतर के विघ्न-अहंकार, भय, आलस्य, क्रोध, लोभ, मोह, इन सबका भी नाश करते हैं। आज का मनुष्य बाहरी समस्याओं से कम और आंतरिक कमजोरियों से अधिक परेशान है। इसलिए आज हनुमान की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक है।</div><div><br></div><div>हनुमान शक्ति के प्रतीक हैं, लेकिन उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उन्होंने कभी अपनी शक्ति का प्रदर्शन नहीं किया। उन्होंने अपनी शक्ति को सेवा में लगाया। आज का युग शक्ति प्रदर्शन का युग बन गया है-धन का प्रदर्शन, पद का प्रदर्शन, ज्ञान का प्रदर्शन, शक्ति का प्रदर्शन। लेकिन हनुमान हमें सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का प्रदर्शन नहीं, उसका संरक्षण और सदुपयोग ही महानता है। सर्वशक्तिमान होकर भी उन्होंने स्वयं को “राम का दास” कहा। इससे बड़ी विनम्रता और क्या हो सकती है? हनुमान हमें यह भी सिखाते हैं कि शक्ति और ज्ञान का अहंकार नहीं होना चाहिए। ज्ञान यदि विनम्रता नहीं देता, तो वह अज्ञान है। शक्ति यदि सेवा में नहीं लगती, तो वह विनाश का कारण बनती है। इसलिए हनुमान शक्ति और ज्ञान के साथ-साथ विनम्रता और सेवा के भी प्रतीक हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/perform-these-special-rituals-on-hanuman-janmotsav" target="_blank">Hanuman Janmotsav पर करें ये खास उपाय, बजरंगबली की कृपा से जीवन की हर बाधा होगी दूर</a></h3><div>हनुमान को ज्ञानियों में अग्रगण्य कहा गया है-“ज्ञानिनामग्रगण्यम”। वे केवल बलवान नहीं थे, वे महान विद्वान, व्याकरणाचार्य, तर्कशास्त्री, संगीतज्ञ और नीतिज्ञ भी थे। लेकिन इतनी विद्या होने पर भी उनमें अहंकार नहीं था। वे सरलता, सादगी और सेवा के प्रतीक बने रहे। आज शिक्षा बढ़ रही है, लेकिन विनम्रता घट रही है। डिग्रियाँ बढ़ रही हैं, लेकिन चरित्र घट रहा है। ऐसे समय में हनुमान का चरित्र हमें ज्ञान के साथ विनम्रता का संतुलन सिखाता है। हनुमानजी को हिन्दू देवताआंे में सबसे शक्तिशाली माना गया है, वे रामायण जैसे महाग्रंथ के सह पात्र थे। वे भगवान शिव के ग्यारवें रूद्र अवतार थे जो श्रीराम की सेवा करने और उनका साथ देने त्रेता युग में अवतरित हुए थे। उनको बजरंग बलि, मारुतिनंदन, पवनपुत्र, केशरीनंदन आदि अनेकों नामों से पुकारा जाता है। उनका एक नाम वायुपुत्र भी है, उन्हें वातात्मज भी कहा गया है अर्थात् वायु से उत्पन्न होने वाला। इन्हें सात चिरंजीवियो में से एक माना जाता है। वे सभी कलाओं में सिद्धहस्त एवं माहिर थे। वीरो में वीर, बुद्धिजीवियों में सबसे विद्वान। इन्होंने अपने पराक्रम और विद्या से अनेकों कार्य चुटकीभर समय में पूर्ण कर दिए है। वे शौर्य, साहस और नेतृत्व के भी प्रतीक हैं। समर्पण एवं भक्ति उनका सर्वाधिक लोकप्रिय गुण है। रामभक्त हनुमान बल, बुद्धि और विद्या के सागर तो थे ही, अष्ट सिद्धि और नौ निधियों के दाता और ज्योतिष के भी प्रकांड विद्वान थे।</div><div><br></div><div>हनुमान के जीवन में तीन महान तत्व दिखाई देते हैं- ज्ञान, भक्ति और कर्म। ज्ञान उन्हें दिशा देता है, भक्ति उन्हें प्रेरणा देती है और कर्म उन्हें महान बनाता है। यदि किसी व्यक्ति के जीवन में ज्ञान है पर कर्म नहीं, तो वह अधूरा है। यदि कर्म है पर भक्ति नहीं, तो उसमें संवेदना नहीं होगी। यदि भक्ति है पर ज्ञान नहीं, तो वह अंधविश्वास बन सकती है। इन तीनों का समन्वय यदि किसी चरित्र में दिखाई देता है, तो वह हनुमान का चरित्र है। हनुमान का जीवन संयम का जीवन था। वे बलशाली थे, पर ब्रह्मचारी थे। वे विद्वान थे, पर विनम्र थे। वे वीर थे, पर शांत थे। वे शक्तिशाली थे, पर सेवक थे। यह संतुलन ही उन्हें महान बनाता है। आज मनुष्य के पास साधन हैं, पर संयम नहीं। ज्ञान है, पर दिशा नहीं। शक्ति है, पर सेवा नहीं। इसलिए समाज में अशांति बढ़ रही है। हनुमान का जीवन हमें संयम और संतुलन का संदेश देता है।</div><div><br></div><div>हनुमान के बाल स्वरूप की कथा भी अत्यंत प्रेरणादायक है। बालक हनुमान ने सूर्य को फल समझकर पकड़ने का प्रयास किया। यह केवल एक पौराणिक कथा नहीं, बल्कि एक महान संदेश है। यह बालकों की असीम जिज्ञासा, उत्साह और ऊर्जा का प्रतीक है। यह कथा समाज को संदेश देती है कि बच्चों की जिज्ञासा को दबाया नहीं जाना चाहिए, उसे सही दिशा देनी चाहिए। यदि बालकों को सही मार्गदर्शन मिले, तो उनमें से हर बालक हनुमान बन सकता है- ऊर्जावान, जिज्ञासु, साहसी और रचनात्मक। आज के माता-पिता और समाज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है कि वे बच्चों में हनुमान जैसे गुण विकसित करें-साहस, जिज्ञासा, अनुशासन, सेवा, विनम्रता और भक्ति। यदि बचपन में ही यह संस्कार मिल जाएं, तो समाज का भविष्य उज्ज्वल हो सकता है। हनुमान भक्ति का वास्तविक अर्थ भी समझना जरूरी है। हनुमान भक्ति केवल चालीसा पढ़ना नहीं है, बल्कि हनुमान के गुणों को जीवन में उतारना है।</div><div><br></div><div>हनुमान भक्ति का अर्थ है- अहंकार छोड़ना, सेवा करना, सत्य का साथ देना, संयम रखना, कर्तव्य निभाना और अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य से जोड़ना। जब तक भक्ति केवल मंदिर तक सीमित रहेगी, तब तक भगवान अलग रहेंगे और भक्त अलग रहेगा। जब भक्ति जीवन बन जाती है, तब भगवान और भक्त अलग नहीं रहते। हनुमान की भक्ति प्रदर्शन नहीं, आत्मपरिवर्तन की प्रक्रिया है। यह भक्ति व्यक्ति को भीतर से बदल देती है-अहंकार की जगह विनम्रता, क्रोध की जगह क्षमा, भय की जगह साहस और निराशा की जगह आशा भर देती है। आज समाज में सबसे बड़ी समस्या शक्ति की नहीं, चरित्र की है; ज्ञान की नहीं, दिशा की है; साधनों की नहीं, संयम की है। इसलिए आज समाज को हनुमान की जरूरत है-मंदिरों में नहीं, जीवन में; मूर्तियों में नहीं, व्यक्तित्व में। हर व्यक्ति के भीतर एक हनुमान सोया हुआ है- किसी में साहस का हनुमान, किसी में सेवा का हनुमान, किसी में ज्ञान का हनुमान, किसी में भक्ति का हनुमान। जरूरत केवल उसे जगाने की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अपने भीतर के हनुमान को जगाने का अर्थ है- अपने भीतर के भय को हराना, अपने भीतर के अहंकार को मिटाना, अपने भीतर की शक्ति को सेवा में लगाना, अपने ज्ञान को समाज के काम में लगाना, अपने जीवन को किसी महान उद्देश्य से जोड़ना। यदि हनुमान जयंती पर हम केवल पूजा करें और जीवन न बदलें, तो यह पर्व अधूरा है। यदि हम अपने जीवन में साहस, सेवा, संयम, विनम्रता और भक्ति का एक भी गुण उतार लें, तो हनुमान जयंती सार्थक हो जाएगी। आज आवश्यकता मंदिरों में हनुमान खोजने की नहीं, अपने भीतर हनुमान जगाने की है। जब व्यक्ति के भीतर हनुमान जागेगा, तब उसका भय समाप्त होगा। जब समाज के भीतर हनुमान जागेगा, तब अन्याय समाप्त होगा। जब राष्ट्र के भीतर हनुमान जागेगा, तब कमजोरी समाप्त होगी।</div><div><br></div><div>हनुमान जन्मोत्सव हमें यही संदेश देती है कि महानता शक्ति में नहीं, शक्ति के सदुपयोग में है; ज्ञान में नहीं, ज्ञान की विनम्रता में है; भक्ति में नहीं, भक्ति के समर्पण में है। इस हनुमान जन्मोत्सव पर हमें संकल्प लेना चाहिए- हम शक्ति का प्रदर्शन नहीं, संरक्षण करेंगे। हम ज्ञान का अहंकार नहीं, विनम्रता रखेंगे। हम भक्ति का प्रदर्शन नहीं, जीवन में समर्पण लाएंगे। हम अपने भीतर के हनुमान को जगाएंगे। यदि हर व्यक्ति अपने भीतर के हनुमान को जगा ले, तो परिवार सुधर जाएगा, समाज सुधर जाएगा, राष्ट्र सुधर जाएगा और मानवता का भविष्य उज्ज्वल हो जाएगा। यही हनुमान जन्मोत्सव का वास्तविक संदेश है- अपने भीतर के हनुमान को जगाइए, जीवन को शक्ति, ज्ञान, भक्ति और सेवा का संगम बनाइए।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 10:50:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-festival-of-awakening-the-hanuman-within</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मुश्किल के समय भारत बना पड़ोसियों के लिए संकटमोचक, Nepal, Bangladesh, Maldives, Sri Lanka की कर रहा मदद]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-has-become-a-saviour-for-its-neighbours-in-times-of-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दक्षिण एशिया की राजनीति में अचानक आया यह मोड़ किसी भूचाल से कम नहीं है। कुछ महीने पहले तक भारत को घेरने की साजिश रचने वाले पड़ोसी देश आज उसी भारत के दरवाजे पर खड़े हैं। ईरान युद्ध से पैदा हुए ऊर्जा संकट ने पूरे क्षेत्र की असलियत उजागर कर दी है। जो देश कभी "इंडिया आउट" का नारा लगा रहे थे, आज वही भारत से तेल और गैस की मदद मांग रहे हैं। यह सिर्फ कूटनीतिक बदलाव नहीं, बल्कि क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का निर्णायक पल है।</div><div><br></div><div>सबसे बड़ी सच्चाई यह है कि होरमुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कच्चे तेल का लगभग नब्बे प्रतिशत हिस्सा एशिया के देशों के लिए होता है। ईरान युद्ध ने इस जीवनरेखा को झकझोर दिया है। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे देश ऊर्जा निर्भरता के दलदल में फंस गए हैं। भारत भी आयात पर निर्भर है, लेकिन उसकी रणनीतिक तैयारी और संतुलित कूटनीति ने उसे संकट में भी मजबूत बनाए रखा है। ईरान ने भारत को मित्र मानते हुए तेल और रसोई गैस के जहाजों को रास्ता दिया, जो भारत के लिए बड़ी राहत साबित हुआ।</div><div><br></div><div>लेकिन असली कहानी यहां से शुरू होती है। भारत ने सिर्फ अपनी जरूरतों की चिंता नहीं की, बल्कि अपने पड़ोसियों को संकट से निकालने का बीड़ा उठाया। यही है भारत की "पड़ोस पहले" नीति का असली चेहरा, जो केवल नारा नहीं बल्कि जमीनी हकीकत बन चुकी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-touts-assam-decade-of-transformation-under-bjp" target="_blank">Assam के Highway पर उतर रहे Fighter Jet, PM Modi ने बताया कैसे बदला North-East</a></h3><div>हम आपको बता दें कि युद्ध से उपजे संकट का बांग्लादेश सबसे बड़ा शिकार बना है। अपनी जरूरत का 95 प्रतिशत तेल और तीस प्रतिशत गैस आयात करने वाला यह देश अब अंधेरे में डूब रहा है। बिजली कटौती, उद्योगों का ठप होना और विश्वविद्यालयों का बंद होना इस बात का सबूत है कि ऊर्जा संकट किसी देश की रीढ़ कैसे तोड़ सकता है। कपड़ा उद्योग, जो बांग्लादेश की अर्थव्यवस्था की जान है, इस समय डीजल की कमी से जूझ रहा है।</div><div><br></div><div>ऐसे में बांग्लादेश सरकार ने भारत की ओर रुख किया और भारत ने बिना देरी किए मदद का हाथ बढ़ाया। असम के नुमालीगढ़ रिफाइनरी से पाइपलाइन के जरिए डीजल की आपूर्ति तेज कर दी गई। हजारों टन ईंधन भेजा गया और आगे भी आपूर्ति जारी है। हम आपको याद दिला दें कि यह वही बांग्लादेश है जहां हाल ही में भारत विरोधी माहौल चरम पर था और पाकिस्तान के साथ नजदीकियां बढ़ रही थीं। लेकिन संकट ने उसे सच्चाई दिखा दी कि असली सहारा कौन है।</div><div><br></div><div>मालदीव का मामला और भी दिलचस्प है। एक साल पहले तक भारत के खिलाफ सबसे ज्यादा जहरीली भाषा बोलने वाले इस द्वीपीय देश के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जु आज भारत को "विश्वसनीय साथी" बता रहे हैं। हम आपको याद दिला दें कि राष्ट्रपति मुइज्जु ने सत्ता में आते ही भारतीय सैनिकों को देश से बाहर कर दिया था और चीन की तरफ झुकाव दिखाया था। लेकिन जैसे ही ऊर्जा संकट और पर्यटन पर असर पड़ा, पूरी अर्थव्यवस्था डगमगाने लगी। अब पेट्रोल, डीजल और विमान ईंधन के लिए मालदीव को वही भारत याद आ रहा है।</div><div><br></div><div>श्रीलंका की स्थिति भी कम गंभीर नहीं है। 2022 के आर्थिक पतन की यादें अभी ताजा हैं। उस समय चीन पर जरूरत से ज्यादा भरोसा करने की कीमत उसे भारी पड़ी थी। अब फिर वही स्थिति बन रही है। ऊर्जा जरूरत का साठ प्रतिशत आयात करने वाला श्रीलंका एक महीने से ज्यादा का भंडारण भी नहीं रख पाता। उसे ईंधन के दाम तैंतीस प्रतिशत तक बढ़ाने पड़े हैं। ऐसे समय में भारत ने एक बार फिर "पहला सहायक" बनकर दिखाया। हजारों टन पेट्रोल और डीजल तुरंत भेजा गया। श्रीलंका के राष्ट्रपति ने सार्वजनिक रूप से भारत का आभार जताया। यह केवल सहायता नहीं, बल्कि रणनीतिक संकेत है कि संकट के समय कौन साथ खड़ा होता है।</div><div><br></div><div>दक्षिण एशिया के इस बदलते परिदृश्य में नेपाल का जिक्र भी उतना ही जरूरी है, क्योंकि यह वह पड़ोसी है जहां भारत की मदद लगातार और बिना किसी शोर के पहुंच रही है। ऊर्जा संकट के इस दौर में भारत ने नेपाल को ईंधन और आवश्यक आपूर्ति की निर्बाध आपूर्ति जारी रखी है। दरअसल, हिमालयी भूगोल और सीमित संसाधनों के कारण नेपाल पूरी तरह बाहरी आपूर्ति पर निर्भर है और ऐसे समय में भारत की स्थिर सप्लाई लाइन उसके लिए जीवनरेखा बनी हुई है। यह संबंध केवल व्यापारिक नहीं, बल्कि भरोसे और पारस्परिक सहयोग का प्रतीक है। भारत ने यह साफ कर दिया है कि वह अपने पड़ोसियों को संकट में कभी अकेला नहीं छोड़ेगा, चाहे हालात कितने भी चुनौतीपूर्ण क्यों न हों।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस पूरे घटनाक्रम का सामरिक महत्व बेहद गहरा है। भारत ने यह साबित कर दिया है कि दक्षिण एशिया की ऊर्जा सुरक्षा की धुरी वही है। साथ ही यह इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को सीधी चुनौती है। जिन देशों ने चीन के भरोसे अपनी नीतियां बनाई थीं, वह अब भारत की ओर लौट रहे हैं। इसके अलावा, भारत ने मानवीय सहायता को रणनीतिक हथियार में बदल दिया है।</div><div><br></div><div>रणनीतिक रूप से देखें तो यह भारत के लिए सुनहरा मौका है। ऊर्जा आपूर्ति के जरिए भारत न केवल अपने पड़ोसियों को स्थिर कर रहा है, बल्कि उनके भीतर अपनी विश्वसनीयता भी मजबूत कर रहा है। यह भविष्य में सुरक्षा, व्यापार और राजनीतिक सहयोग के नए रास्ते खोलेगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह साफ है कि भाषण और नारे अपनी जगह हैं, लेकिन भूगोल और जरूरतें अपनी जगह। संकट के समय वही देश मायने रखता है जो मदद कर सके। और इस परीक्षा में भारत न केवल पास हुआ है, बल्कि पूरे क्षेत्र का केंद्र बनकर उभरा है। यही नया दक्षिण एशिया है, जहां भारत सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि जीवनरेखा बन चुका है। खासतौर पर इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में अगर किसी एक नेतृत्व की छाप सबसे स्पष्ट दिखती है, तो वह है प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति। उन्होंने भावनाओं से ऊपर उठकर रणनीति और दूरदर्शिता के साथ फैसले लिए हैं। जहां एक तरफ पड़ोसी देश कभी भारत विरोधी एजेंडा चला रहे थे, वहीं आज वही देश भारत को सबसे भरोसेमंद साथी मान रहे हैं। यह बदलाव अपने आप नहीं आया, बल्कि लगातार संवाद, सहायता और मजबूत नेतृत्व का परिणाम है। मोदी की नीति ने यह साबित कर दिया है कि सख्ती और संवेदनशीलता का संतुलन ही असली कूटनीति है। आज भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि संकट में भरोसे का दूसरा नाम बन चुका है और यह उपलब्धि सीधे तौर पर मोदी की रणनीतिक सोच और निर्णायक नेतृत्व का नतीजा है।</div><div><br></div><div>- नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 18:11:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-has-become-a-saviour-for-its-neighbours-in-times-of-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नक्सलवाद की समाप्ति की घोषणा के बाद भी बहुत कुछ करना होगा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/much-remains-to-be-done-even-after-the-declaration-of-the-end-of-naxalism]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>काफी पहले केंद्र सरकार ने घोषणा की थी कि मार्च 2026 तक देश से नक्सलवाद समाप्त हो जाएगा। मार्च 2026 की अवधि से एक दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने लोकसभा में बड़ी घोषणा की। नक्सलवाद पर चर्चा के दौरान गृह मंत्री ने कहा कि देश में नक्सलवाद अब लगभग समाप्त हो चुका है। आदिवासी इलाकों में असली न्याय पहुंचा है। उन्होंने कहा कि यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि 2014 के बाद केंद्र सरकार की सख्त नीति, सुरक्षा अभियान और विकास योजनाओं के कारण संभव हुआ है। उन्होंने कहा कि सरकार&nbsp; नकसल प्रभावित क्षेत्र में तेजी से विकास करा रही है। शिक्षा के लिए स्कूल और उपचार के लिए वहां अस्पताल खुल रहे हैं। अमित शाह ने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें खत्म हो रही हैं और आदिवासियों की आवाज अब संसद तक पहुंची है। उन्होंने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि उसने समस्या को बढ़ने दिया। मोदी सरकार के फैसलों से हालात बदले हैं। उन्होंने कहा कि नक्सल विचारधारा आदिवासियों को गुमराह करती है और अब देश नक्सलवाद मुक्त बनने की ओर बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>उन्होंने साफ कहा कि सरकार ने नक्सलियों से बातचीत नहीं, बल्कि उन्हें खत्म कर विकास को आगे बढ़ाने का रास्ता चुना। उन्होंने कहा कि जो हथियार उठाएगा, उसे कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने दावा किया कि नक्सलियों का पूरा केंद्रीय नेतृत्व, पोलित ब्यूरो और कमेटी अब खत्म हो चुकी है। काफी मारे गए, बहुतों ने सरेंडर किया। कुछ अभी फरार हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/new-possibilities-for-peace-and-balance-arising-from-maoist-liberation" target="_blank">माओवादी मुक्ति से शांति एवं संतुलन की नई संभावनाएं</a></h3><div>शाह ने कहा कि देश अब नक्सलमुक्त होने की स्थिति में पहुंच चुका है। उन्होंने बताया कि कई बड़े ऑपरेशन जैसे बुढ़ा, थंडरस्टॉर्म और ब्लैक फॉरेस्ट चलाए गए। इनमें भारी मात्रा में हथियार, आईईडी फैक्ट्री और अनाज बरामद हुआ। उन्होंने बताया कि छत्तीसगढ़, तेलंगाना और ओडिशा के बड़े इलाके अब नक्सल प्रभाव से बाहर आ चुके हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय पुलिस की भूमिका को उन्होंने अहम बताया।</div><div><br></div><div>केंद्रीय गृहमंत्री ने बताया कि आजादी के समय देश संसाधनों की कमी और विकास की चुनौतियों से जूझ रहा था। कई दूर-दराज के इलाकों तक सरकार की पहुंच नहीं थी, सड़कों और सुविधाओं का अभाव था। ऐसे हालात में कुछ संगठनों ने इन कमजोरियों का फायदा उठाया। जहां राज्य की पकड़ कम थी, उन्हीं इलाकों को रेड कॉरिडोर बनाया गया। भोले-भाले आदिवासियों को भेदभाव और शोषण के नाम पर भड़काया गया और उनके हाथों में हथियार थमा दिए गए। हकीकत यह है कि इन क्षेत्रों में योजनाबद्ध भेदभाव नहीं, बल्कि विकास की कमी थी, जिसका इस्तेमाल कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया।</div><div><br></div><div>शाह ने बताया कि केंद्र सरकार ने ऑल एजेंसी अप्रोच अपनाई। इसमें सीएपीएफ, राज्य पुलिस और खुफिया एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाया गया। फंडिंग और स्पोर्ट सिस्टम पर प्रहार किया गया। सरेंडर नीति लागू की गई। इसमें आत्मसमर्पण करने वालों को आर्थिक मदद और पुनर्वास दिया गया। उन्होंने कहा कि सरकार ने हर गांव तक अपनी पहुंच बनाई, इससे नक्सलवाद कमजोर हुआ।</div><div><br></div><div>उन्होंने दावा किया कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर विकास हुआ। हजारों किलोमीटर सड़कें बनीं, मोबाइल टावर लगाए गए, बैंक, एटीएम और डाकघर खोले गए। शिक्षा के लिए एकलव्य स्कूल, आईटीआई और कौशल केंद्र बनाए गए। उन्होंने कहा कि विकास ही नक्सलवाद खत्म करने का सबसे बड़ा कारण बना।</div><div><br></div><div>शाह ने कहा कि नक्सलवाद गरीबी से नहीं, बल्कि विचारधारा से पैदा हुआ। उन्होंने कहा कि यह विचारधारा लोकतंत्र में विश्वास नहीं करती और बंदूक के जरिए सत्ता चाहती है। उन्होंने यह भी कहा कि आदिवासियों को बरगलाकर उनके हाथ में हथियार दिए गए और विकास को रोका गया।</div><div><br></div><div>गृह मंत्री ने कहा कि सरकार आगे भी सख्ती और विकास दोनों पर काम जारी रखेगी। उन्होंने आदिवासी समाज को भरोसा दिलाया कि उनकी सुरक्षा और विकास सरकार की प्राथमिकता है। उन्होंने कहा कि अब देश बंदूक से नहीं, संविधान से चलेगा और यही असली जीत है। गृह मंत्री के अनुसार, जिस "रेड कॉरिडोर" का विस्तार कभी पशुपति से तिरुपति तक माना जाता था, वह अब सिमटकर केवल कुछ जिलों तक रह गया है। 2014 में जहाँ 126 जिले वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित थे, वहीं 2025-26 तक यह संख्या घटकर मात्र एक अंक में रह गई है। छत्तीसगढ़ का बस्तर संभाग, जो कभी नक्सलियों का अभेद्य किला माना जाता था। अब वह सुरक्षा बलों के नियंत्रण में है और वहां विकास की किरणें पहुँच रही हैं।</div><div><br></div><div>सरकार के इन दावों की पुष्टि जमीनी आंकड़ों से भी होती है। पिछले कुछ वर्षों में नक्सली हिंसा की घटनाओं में 70 प्रतिशत से अधिक की कमी आई है। सुरक्षा बलों की शहादत के आंकड़ों में भी भारी गिरावट दर्ज की गई है। "ऑपरेशन कगार" और "ऑपरेशन ब्लैक फॉरेस्ट" जैसे लक्षित अभियानों के माध्यम से सुरक्षा बलों ने नक्सली नेतृत्व की कमर तोड़ दी है। 2025 के दौरान ही 300 से अधिक नक्सली मारे गए। इनमें कई शीर्ष कमांडर शामिल थे। इसके साथ ही, हजारों की संख्या में कैडरों ने आत्मसमर्पण किया है,। यह समर्पण इस बात का प्रतीक है कि अब इस विचारधारा का आकर्षण खत्म हो रहा है। इतना सब होने के बावजूद, इन सफलताओं के बावजूद नक्सलवाद की चुनौतियां पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। सबसे बड़ी चुनौती भौगोलिक विषमता है। छत्तीसगढ़ के अबूझमाड़ जैसे घने वन क्षेत्र आज भी सुरक्षा बलों के लिए कठिन परीक्षा बने हुए हैं। नक्सलियों ने अपने पैर पीछे जरूर खींचे हैं, लेकिन वे पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। वे अक्सर घने जंगलों और दुर्गम पहाड़ियों का लाभ उठाकर छापामार हमले करने की ताक में रहते हैं। इसके अलावा, "अर्बन नक्सलिज्म" या वैचारिक उग्रवाद एक नई चुनौती बनकर उभरा है। शहरों में बैठे कुछ बौद्धिक समूह नक्सलियों को वैचारिक और रसद सहायता प्रदान करते हैं। इससे इस समस्या की जड़ें गहरी बनी रहती हैं। जब तक इन वैचारिक और वित्तीय नेटवर्क को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया जाता, तब तक उग्रवाद के पुनर्जीवित होने का खतरा बना रहेगा।</div><div><br></div><div>एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती स्थानीय आदिवासियों के बीच विश्वास की बहाली है। दशकों से विकास की मुख्यधारा से कटे होने के कारण, कई क्षेत्रों में ग्रामीण अब भी सुरक्षा बलों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं। नक्सली अक्सर इस अविश्वास का फायदा उठाते हैं और ग्रामीणों को ढाल के रूप में उपयोग करते हैं। सुरक्षा बलों और स्थानीय जनता के बीच के इस "गवर्नेंस वैक्यूम" को भरना एक लंबी प्रक्रिया है। केवल सड़कों या मोबाइल टावरों का निर्माण पर्याप्त नहीं है; लोगों को यह महसूस कराना होगा कि सरकार उनकी संस्कृति और अधिकारों की रक्षक है। इसके साथ ही, पड़ोसी राज्यों के बीच समन्वय की कमी भी कई बार बाधा बनती है, क्योंकि नक्सली एक राज्य में दबाव बढ़ने पर दूसरे राज्य की सीमा में शरण ले लेते हैं।</div><div><br></div><div>विकास के मोर्चे पर, सरकार को "नियत नेल्लानार" (आपका अच्छा गांव) जैसी योजनाओं को और विस्तार देना चाहिए, जो अंतिम छोर तक बुनियादी सुविधाएं पहुँचाने पर केंद्रित हैं। शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं का सुदृढ़ीकरण सबसे प्रभावी हथियार है। जब आदिवासियों के बच्चों के पास स्कूल होंगे और उनके युवाओं के पास रोजगार के अवसर होंगे, तो नक्सलियों की भर्ती प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी। कौशल विकास केंद्रों के माध्यम से स्थानीय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाना नक्सली विचारधारा के ताबूत में आखिरी कील साबित हो सकता है। साथ ही, वन अधिकारों (फोरेस्ट राइट एक्ट) का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा ताकि आदिवासियों को अपनी जमीन पर मालिकाना हक का अहसास हो और वे उग्रवाद के बहकावे में न आएं।</div><div><br></div><div>मान्यता है कि नक्सलवाद का पूर्ण उन्मूलन केवल बंदूकों के दम पर संभव नहीं है। वास्तव में ऐसा भी नहीं हैं। कभी श्रीलंका में लिट्टे बहुत मजबूत संगठन था। उसके लड़ाके बेमिसाल थे। श्रीलंका के साथ भारतवर्ष को भी वह प्रभावित कर रहा था। इस पर भारतीय प्रधानमंत्री राजीव गांधी (1991), श्रीलंकाई राष्ट्रपति प्रेमदासा रनसिंघे (1993) सहित कई लोगों की हत्या का आरोप है। श्रीलंका सरकार से इस संगठन को खत्म करने का निर्णय लिया। एक झटके में 2009 में लिट्टे पूरी तरह खत्म हो गया। न श्रीलंका सरकार ने उसके लड़ाकों को फुसलाया। न समर्पण के लिए कहा। बंदूक के बल पर लिट्टे को खत्म कर दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत सरकार तो नक्सलवाद को खत्म करने के लिए इन्हें समझाने और आत्मसमर्पण के लिए प्रेरित कर रही है। सरकार को अपनी आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को और अधिक उदार और प्रभावी बनाना चाहिए, ताकि भटक चुके युवा बिना किसी डर के मुख्यधारा में लौट सकें।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस सबके लिए तकनीकी और खुफिया तंत्र को भी मजबूत करना होगा। आधुनिक तकनीक का उपयोग करके नक्सली गतिविधियों पर नजर रखना और उन्हें समय रहते रोकना संभव है। इसके अलावा, राज्यों और केंद्र के बीच बेहतर समन्वय भी आवश्यक है, क्योंकि नक्सलवाद कई राज्यों में फैला हुआ है। इससे निपटने के लिए संयुक्त प्रयासों की जरूरत होती है। मजबूत इच्छा शक्ति की भी आवश्यक्ता है।</div><div><br></div><div>- अशोक मधुप</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 11:35:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/much-remains-to-be-done-even-after-the-declaration-of-the-end-of-naxalism</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तेल कम, गैस कम...आने वाले दिनों में क्या बिजली भी होगी कम? बढ़ती गर्मी के बीच लोगों के मन में नई टेंशन!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-electricity-also-be-scarce-in-coming-days-amid-rising-heat-people-are-facing-new-tensions]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भीषण गर्मी ने अभी से ही लोगों को परेशान करना शुरू कर दिया है, जिससे यह सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि आने वाले महीनों में तापमान किस स्तर तक पहुंच सकता है। देश के कई हिस्सों में मार्च के अंतिम सप्ताह से ही तापमान सामान्य से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। इस बीच पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में चल रहे तनाव ने ऊर्जा आपूर्ति को लेकर नई चिंताएं खड़ी कर दी हैं। हालात ऐसे बन रहे हैं कि लोग अब खाना पकाने जैसे घरेलू कार्यों के लिए भी बिजली पर निर्भर होते जा रहे हैं। ऐसे में जब अप्रैल से जून के बीच भीषण गर्मी अपने चरम पर होगी, तब बिजली की मांग में भारी उछाल आना लगभग तय माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>ऊर्जा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इस वर्ष भारत में अधिकतम बिजली मांग दो लाख पचास हजार मेगावाट तक पहुंच सकती है, जो अब तक का सबसे ऊंचा स्तर होगा। पिछले वर्ष भी गर्मी के मौसम में मांग ने कई रिकॉर्ड तोड़े थे और करीब दो लाख तीस हजार मेगावाट तक पहुंच गई थी। इस बार तापमान अधिक रहने की संभावना के चलते मांग और अधिक बढ़ सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-global-tourism-industry-is-in-a-time-of-global-crisis" target="_blank">वैश्विक संकट के दौर में वैश्विक पर्यटन उद्योग</a></h3><div>हम आपको बता दें कि पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व क्षेत्र दुनिया के प्रमुख ऊर्जा आपूर्तिकर्ता माने जाते हैं। यहां जारी तनाव का सीधा असर कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति पर पड़ रहा है। हालांकि भारत अपनी बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा कोयले से पूरा करता है, लेकिन गैस आधारित बिजली संयंत्र और आयातित ईंधन भी ऊर्जा संतुलन में अहम भूमिका निभाते हैं। यदि वैश्विक आपूर्ति प्रभावित होती है तो इसका असर भारत की ऊर्जा लागत पर भी पड़ सकता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा घरेलू स्तर पर भी बदलाव देखने को मिल रहा है। शहरों में तेजी से बढ़ते शहरीकरण और जीवनशैली में बदलाव के कारण लोग अब गैस की जगह बिजली आधारित उपकरणों का अधिक उपयोग करने लगे हैं। इंडक्शन चूल्हे, बिजली से चलने वाले हीटर और अन्य उपकरणों के बढ़ते इस्तेमाल ने कुल बिजली खपत को और बढ़ा दिया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि भारत की बिजली व्यवस्था अभी भी काफी हद तक कोयले पर निर्भर है। कुल बिजली उत्पादन का लगभग सत्तर प्रतिशत हिस्सा कोयला आधारित बिजली घरों से आता है। गर्मी के मौसम में जब मांग बढ़ती है, तब कोयले की खपत भी तेजी से बढ़ती है। कई बार यह स्थिति पैदा हो जाती है कि बिजली घरों के पास सीमित दिनों का ही कोयला भंडार बचता है।</div><div><br></div><div>कोयला खदानों से उत्पादन, रेलवे के जरिए परिवहन और बिजली घरों तक आपूर्ति की पूरी श्रृंखला पर दबाव बढ़ जाता है। यदि इस श्रृंखला में कहीं भी बाधा आती है तो इसका सीधा असर बिजली उत्पादन पर पड़ सकता है। यही कारण है कि हर साल गर्मी के मौसम में कोयले की उपलब्धता एक बड़ा मुद्दा बन जाती है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो बढ़ती मांग और ईंधन की लागत में संभावित वृद्धि के चलते बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी की आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता। यदि बिजली उत्पादन की लागत बढ़ती है, तो वितरण कंपनियों पर भी दबाव बढ़ेगा, जिसका असर अंततः उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है। हालांकि सरकार आम जनता पर बोझ कम रखने के लिए सब्सिडी और अन्य उपायों का सहारा ले सकती है, लेकिन लंबे समय तक यह व्यवस्था टिकाऊ नहीं मानी जाती। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैश्विक ऊर्जा कीमतें ऊंची बनी रहती हैं और घरेलू मांग लगातार बढ़ती है, तो भविष्य में बिजली दरों में संशोधन करना पड़ सकता है।</div><div><br></div><div>साथ ही सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या आने वाले महीनों में बिजली कटौती बढ़ेगी? यदि मांग और आपूर्ति के बीच अंतर अधिक बढ़ता है, तो कई राज्यों में बिजली कटौती की स्थिति बन सकती है। खासकर ग्रामीण और अर्ध शहरी क्षेत्रों में इसका प्रभाव अधिक देखने को मिल सकता है। इसके अलावा, शहरी क्षेत्रों में भी पीक समय के दौरान दबाव बढ़ सकता है। जब घरों, दफ्तरों और बाजारों में एक साथ बिजली की खपत बढ़ती है, तब ग्रिड पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है। यदि पर्याप्त उत्पादन उपलब्ध नहीं होता, तो लोड प्रबंधन के तहत कटौती करनी पड़ सकती है।</div><div><br></div><div>उधर, केंद्र सरकार ने इस चुनौती को देखते हुए पहले से ही कई कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। कोयले के उत्पादन और आपूर्ति को बढ़ाने, बिजली घरों में न्यूनतम भंडार सुनिश्चित करने और राज्यों के साथ समन्वय बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसके साथ ही सौर और पवन ऊर्जा जैसे नवीकरणीय स्रोतों को तेजी से बढ़ाने की दिशा में भी काम हो रहा है। हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि मांग प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है। ऊर्जा दक्षता को बढ़ावा देना, स्मार्ट ग्रिड तकनीक का उपयोग और उपभोक्ताओं को जागरूक करना इस दिशा में अहम कदम हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, स्पष्ट है कि वर्ष 2026 में भारत के सामने बिजली आपूर्ति को लेकर एक कठिन परीक्षा हो सकती है। भीषण गर्मी, वैश्विक ऊर्जा संकट, बढ़ती घरेलू खपत और कोयले पर निर्भरता जैसे कई कारक मिलकर इस चुनौती को और जटिल बना रहे हैं। ऐसे में यह देखना बेहद महत्वपूर्ण होगा कि सरकार और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े सभी पक्ष मिलकर किस तरह इस स्थिति से निपटते हैं और आम लोगों तक बिजली की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करते हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 14:20:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/will-electricity-also-be-scarce-in-coming-days-amid-rising-heat-people-are-facing-new-tensions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सड़कों से गायब हुए फुटपाथ: अतिक्रमण पर आँख बंद करके बैठा प्रशासन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/footpaths-vanish-from-roads-administration-turns-a-blind-eye-to-encroachment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सड़कों से गायब होते फुटपाथ आज भारत के शहरी जीवन की एक कठोर सच्चाई बन चुके हैं, और अभी तक की स्थिति तक उपलब्ध नवीनतम सरकारी रिपोर्टों, नीतिगत दस्तावेजों और विश्वसनीय अध्ययनों को देखने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि यह समस्या न तो नई है और न ही आकस्मिक, बल्कि यह लगातार उपेक्षा, कमजोर शहरी नियोजन और प्रशासनिक निष्क्रियता का परिणाम है। भारत सरकार के सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय द्वारा प्रकाशित रिपोर्ट “रोड एक्सीडेंट इन इंडिया 2022” के अनुसार देश में कुल सड़क दुर्घटना मृत्यु में लगभग 19 प्रतिशत पैदल यात्रियों की हिस्सेदारी रही। इसका सीधा अर्थ यह है कि हर पाँच में से लगभग एक व्यक्ति, जो सड़क पर जान गंवा रहा है, वह पैदल चल रहा था। यह आँकड़ा केवल दुर्घटना का नहीं, बल्कि शहरी ढाँचे की प्राथमिकताओं का दर्पण है, जहाँ पैदल चलने वालों की सुरक्षा को व्यवस्थित रूप से नजरअंदाज किया गया है।</div><div><br></div><div>भारत के शहरी ढांचे में पैदल यात्रियों की भूमिका को समझना आवश्यक है। विभिन्न शहरी परिवहन अध्ययनों, जैसे कि “नैशनल अर्बन ट्रांसपोर्ट पॉलिसी 2006” और उसके बाद के संशोधित दृष्टिकोणों में यह स्वीकार किया गया है कि भारतीय शहरों में 20 से 40 प्रतिशत तक यात्राएँ छोटी दूरी की होती हैं, जिन्हें लोग पैदल या गैर-मोटर चालित साधनों से तय करते हैं। इसके बावजूद, शहरों की सड़क योजना मुख्यतः मोटर वाहनों की गति और संख्या को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। नीति और व्यवहार के इस अंतर ने फुटपाथों को ‘वैकल्पिक’ बना दिया है, जबकि वे वास्तव में शहरी जीवन की मूलभूत आवश्यकता हैं। परिणामस्वरूप, आज अधिकांश शहरों में या तो फुटपाथ मौजूद ही नहीं हैं, या वे इतने खंडित, संकरे और अव्यवस्थित हैं कि उनका उपयोग करना जोखिम भरा हो जाता है।</div><div><br></div><div>फुटपाथों के अतिक्रमण की समस्या इस संकट को और गहरा करती है। शहरी स्थानीय निकायों के अधिकार क्षेत्र में आने वाले फुटपाथ, व्यवहार में बहुउद्देश्यीय और अनियंत्रित उपयोग के स्थल बन गए हैं। उन पर रेहड़ी-पटरी, अस्थायी दुकानें, अवैध पार्किंग, निर्माण सामग्री और कई बार स्थायी संरचनाएँ तक देखी जा सकती हैं। यह स्थिति केवल अवैधता का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह शहरी अर्थव्यवस्था और नियोजन के बीच असंतुलन का भी संकेत है। “Street Vendors (Protection of Livelihood and Regulation of Street Vending) Act, 2014” ने स्पष्ट रूप से यह प्रावधान किया था कि स्ट्रीट वेंडर्स को व्यवस्थित तरीके से निर्दिष्ट क्षेत्रों में स्थान दिया जाए, ताकि उनकी आजीविका भी सुरक्षित रहे और सार्वजनिक स्थानों का अतिक्रमण भी नियंत्रित हो। लेकिन 2026 तक उपलब्ध विभिन्न राज्य स्तरीय क्रियान्वयन रिपोर्टों और मीडिया विश्लेषणों से यह स्पष्ट है कि अधिकांश शहरों में टाउन वेंडिंग कमेटियाँ पूरी तरह सक्रिय नहीं हैं और न ही पर्याप्त वेंडिंग जोन विकसित किए गए हैं। इस नीति-क्रियान्वयन अंतर ने फुटपाथों को अव्यवस्था के हवाले कर दिया है।</div><div><br></div><div>प्रशासनिक दृष्टि से देखें तो समस्या और भी जटिल दिखाई देती है। नगर निगमों और विकास प्राधिकरणों के पास अतिक्रमण हटाने के लिए पर्याप्त कानूनी शक्तियाँ मौजूद हैं, लेकिन कार्रवाई प्रायः असंगत और अल्पकालिक होती है। समय-समय पर चलाए जाने वाले अतिक्रमण हटाओ अभियान कुछ दिनों के लिए दृश्य परिवर्तन अवश्य लाते हैं, लेकिन स्थायी सुधार नहीं कर पाते। इसका एक प्रमुख कारण राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव है, क्योंकि अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई अक्सर स्थानीय स्तर पर विरोध और दबाव का कारण बनती है। इसके अतिरिक्त, विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय की कमी भी एक बड़ी बाधा है, जहाँ सड़क, यातायात, नगर नियोजन और पुलिस विभाग अलग-अलग काम करते हैं, लेकिन साझा रणनीति का अभाव रहता है। यह संस्थागत विफलता फुटपाथों की दुर्दशा को स्थायी बना देती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/amidst-the-global-crisis-energy-conservation-is-humanity-last-line-of-defense" target="_blank">वैश्विक संकट के बीच मानवता की अंतिम सुरक्षा-रेखा है ऊर्जा संरक्षण</a></h3><div>फुटपाथों की गुणवत्ता और डिजाइन भी उतनी ही गंभीर समस्या है। भारतीय सड़क कांग्रेस (IRC) द्वारा जारी दिशानिर्देश स्पष्ट रूप से बताते हैं कि शहरी सड़कों पर फुटपाथों की न्यूनतम चौड़ाई, समतल सतह, बाधा-रहित मार्ग और दिव्यांगजन के लिए सुगम डिजाइन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। लेकिन जमीनी स्तर पर इन मानकों का पालन अपवाद के रूप में ही देखने को मिलता है। कई शहरों में फुटपाथ बीच-बीच में टूट जाते हैं, कहीं बिजली के खंभे या पेड़ रास्ता रोक लेते हैं, तो कहीं ऊँचाई और ढलान इतनी असमान होती है कि पैदल चलना लगभग असंभव हो जाता है। इस प्रकार की अव्यवस्थित संरचना पैदल यात्रियों को सड़क पर उतरने के लिए मजबूर करती है, जिससे दुर्घटनाओं का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।</div><div><br></div><div>इस समस्या का एक महत्वपूर्ण आयाम सामाजिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। पैदल चलने वाले लोग प्रायः समाज के वे वर्ग होते हैं, जिनके पास निजी वाहन नहीं होते—जैसे मजदूर, छात्र, बुजुर्ग, महिलाएँ और निम्न आय वर्ग। जब फुटपाथ सुरक्षित नहीं होते, तो इसका सबसे अधिक प्रभाव इन्हीं वर्गों पर पड़ता है। इस दृष्टि से फुटपाथों का अभाव केवल एक भौतिक कमी नहीं, बल्कि शहरी असमानता का प्रत्यक्ष उदाहरण है। संयुक्त राष्ट्र के “सतत विकास लक्ष्य” विशेष रूप से लक्ष्य 11 (सतत शहर एवं समुदाय) में सुरक्षित, समावेशी और सुलभ सार्वजनिक स्थानों की आवश्यकता पर बल दिया गया है। भारत ने इन लक्ष्यों को अपनाया है, लेकिन फुटपाथों की वर्तमान स्थिति यह संकेत देती है कि इन लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में अभी लंबा रास्ता तय करना बाकी है।</div><div><br></div><div>अंतरराष्ट्रीय अनुभव यह दिखाते हैं कि यदि नीति-निर्माण में पैदल यात्रियों को प्राथमिकता दी जाए, तो शहरी जीवन की गुणवत्ता में व्यापक सुधार संभव है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अध्ययन यह बताते हैं कि जिन शहरों में पैदल और साइकिल आधारित परिवहन को बढ़ावा दिया गया है, वहाँ न केवल सड़क दुर्घटनाओं में कमी आई है, बल्कि प्रदूषण, ट्रैफिक जाम और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएँ भी कम हुई हैं। इसके विपरीत, भारत के अधिकांश शहर अभी भी वाहन-केंद्रित विकास मॉडल पर आधारित हैं, जहाँ सड़कों का विस्तार तो होता है, लेकिन फुटपाथों को या तो नजरअंदाज किया जाता है या बाद में जोड़ने की कोशिश की जाती है, जो अक्सर असफल रहती है।</div><div><br></div><div>समाधान की दिशा में सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता दृष्टिकोण में बदलाव की है। फुटपाथों को ‘सप्लीमेंटरी’ नहीं, बल्कि ‘प्राथमिक’ अवसंरचना के रूप में देखा जाना चाहिए। प्रत्येक नई सड़क परियोजना में फुटपाथों को अनिवार्य घटक बनाया जाए और उनके लिए अलग से बजट और समयसीमा तय की जाए। इसके साथ ही, अतिक्रमण के समाधान के लिए केवल दमनात्मक कार्रवाई पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि समावेशी नीति की आवश्यकता है, जिसमें स्ट्रीट वेंडर्स के लिए व्यवस्थित और कानूनी स्थान उपलब्ध कराए जाएँ। “स्ट्रीट वेंडर्स ऐक्ट 2014” का प्रभावी क्रियान्वयन इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है, बशर्ते इसे गंभीरता से लागू किया जाए।</div><div><br></div><div>अंततः, फुटपाथों का प्रश्न केवल शहरी नियोजन या यातायात प्रबंधन का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह नागरिक अधिकारों, गरिमा और लोकतांत्रिक समानता से जुड़ा हुआ विषय है। जब कोई नागरिक अपने ही शहर में सुरक्षित और सम्मानजनक तरीके से पैदल नहीं चल सकता, तो यह केवल प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि शासन के मूल उद्देश्यों पर भी प्रश्नचिह्न है। 2026 के इस समय में, जब भारत ‘स्मार्ट सिटी’, ‘अमृत योजना’ और सतत विकास की बात कर रहा है, तब यह आवश्यक है कि विकास की परिभाषा को पुनः परिभाषित किया जाए। सड़कों की चौड़ाई और वाहनों की गति से आगे बढ़कर, यह सुनिश्चित करना होगा कि हर व्यक्ति—चाहे वह पैदल हो—सुरक्षित, सुलभ और सम्मानजनक तरीके से शहर में चल सके। फुटपाथों की वापसी दरअसल शहरों को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में पहला और अनिवार्य कदम है, और जब तक प्रशासन इस सत्य को स्वीकार नहीं करता, तब तक अतिक्रमण और अव्यवस्था की यह कहानी यूँ ही दोहराई जाती रहेगी।</div><div>&nbsp;</div><div>- डॉ. शैलेश शुक्ला</div><div>वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह</div><div>सलाहकार संपादक, नईदुनिया</div><div>आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 30 Mar 2026 11:41:18 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/footpaths-vanish-from-roads-administration-turns-a-blind-eye-to-encroachment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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