<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[खाड़ी में मोदी ने पलटा खेल! सऊदी ने पाक से बढ़ाए रक्षा संबंध तो जवाब में UAE भारत से करेगा बड़ी Defence Deal]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-uae-brahmos-deal-pakistan-tension]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया की बदलती शक्ति राजनीति के बीच भारत के लिए एक जबरदस्त रणनीतिक अवसर उभरता दिखाई दे रहा है। संयुक्त अरब अमीरात अब भारत से ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल और आकाशतीर वायु रक्षा प्रणाली खरीदने पर गंभीर बातचीत कर रहा है। यह खाड़ी क्षेत्र की बदलती सामरिक दिशा का खुला संकेत है। देखा जाये तो यह वही क्षेत्र है जहां पाकिस्तान दशकों तक इस्लामी सैन्य एकजुटता के नाम पर अपना प्रभाव जमाने की कोशिश करता रहा, लेकिन अब हालात तेजी से बदल रहे हैं।</div><div><br></div><div>भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच चल रही यह बातचीत उस समय सामने आई है जब सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हुआ है। दोनों देशों के बीच ऐसे समझौते हुए हैं जिनमें सुरक्षा सहयोग और सैन्य प्रतिक्रिया का पहलू भी शामिल है। ऐसे में सऊदी अरब के पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात का भारत की सबसे घातक और चर्चित मिसाइल प्रणाली में रुचि दिखाना केवल व्यापारिक फैसला नहीं माना जा सकता। इसके पीछे पश्चिम एशिया की गहरी शक्ति प्रतिस्पर्धा और पाकिस्तान को लेकर बदलती सोच साफ दिखाई देती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-g7-summit-france-bilateral-meetings" target="_blank">PM Modi की UAE, UK, Canada, Japan, Egypt, Korea, Italy, Germany के नेताओं के साथ बैठक से भारत को क्या फायदा हुआ?</a></h3><div>हम आपको बता दें कि ब्रह्मोस दुनिया की सबसे तेज परिचालन सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल मानी जाती है। इसे जमीन, समुद्र और हवा तीनों माध्यमों से दागा जा सकता है। भारत और रूस ने मिलकर इसे विकसित किया है। फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया के बाद यदि संयुक्त अरब अमीरात इसे खरीदता है तो यह भारत के रक्षा निर्यात इतिहास की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल होगा। इससे भारत केवल हथियार बेचने वाला देश नहीं बल्कि वैश्विक सामरिक संतुलन बनाने वाला शक्ति केंद्र बनकर उभरेगा।</div><div><br></div><div>आकाशतीर प्रणाली की चर्चा भी बेहद महत्वपूर्ण है। यह भारत की स्वदेशी स्वचालित वायु रक्षा नियंत्रण प्रणाली है, जिसे भारतीय सेना और भारत इलेक्ट्रोनिक्स लिमिटेड ने विकसित किया है। हाल के संघर्षों में ड्रोन और मिसाइल हमलों ने जिस तरह युद्ध की तस्वीर बदल दी है, उसके बाद खाड़ी देश अपनी वायु सुरक्षा को लेकर बेहद सतर्क हो गए हैं। ईरान, इजराइल और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण पूरा पश्चिम एशिया अस्थिरता के दौर से गुजर रहा है। ऐसे माहौल में संयुक्त अरब अमीरात ऐसी रक्षा प्रणाली चाहता है जो तेज, सटीक और बहुस्तरीय सुरक्षा दे सके।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि संयुक्त अरब अमीरात अब केवल अमेरिका या पश्चिमी देशों पर निर्भर नहीं रहना चाहता। वह अपने रक्षा आपूर्तिकर्ताओं का दायरा बढ़ा रहा है ताकि किसी एक शक्ति के दबाव में न आना पड़े। भारत उसके लिए आदर्श विकल्प बनकर उभरा है क्योंकि भारत तकनीकी रूप से सक्षम है, तेजी से उभरती सैन्य शक्ति है और पश्चिम के साथ भी उसके अच्छे संबंध हैं।</div><div><br></div><div>यहीं पर पाकिस्तान की बेचैनी शुरू होती है। दशकों तक पाकिस्तान खाड़ी देशों के लिए सैन्य सहयोगी बना रहा। पाकिस्तानी सेना ने सऊदी अरब और खाड़ी देशों में प्रशिक्षण से लेकर सुरक्षा तक में भूमिका निभाई। लेकिन अब वही खाड़ी देश भारत की सैन्य तकनीक पर भरोसा दिखा रहे हैं। यह पाकिस्तान की रणनीतिक हार है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो संयुक्त अरब अमीरात के पाकिस्तान से दूर जाने के पीछे केवल सामरिक कारण नहीं हैं, बल्कि भरोसे का संकट भी है। पिछले कुछ वर्षों में पाकिस्तान की आर्थिक बदहाली, कट्टरपंथी संगठनों को लेकर उसकी खराब छवि, आतंकवाद को लगातार समर्थन और राजनीतिक अस्थिरता ने खाड़ी देशों का विश्वास कमजोर किया है। संयुक्त अरब अमीरात को यह समझ आ गया है कि पाकिस्तान भरोसेमंद साझेदार नहीं रह गया, जबकि भारत एक स्थिर, मजबूत और तेजी से उभरती वैश्विक शक्ति बन चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और संयुक्त अरब अमीरात के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नहयान के बीच बनी व्यक्तिगत केमिस्ट्री ने दोनों देशों के रिश्तों को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है। मोदी के कार्यकाल में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि रक्षा, ऊर्जा, निवेश, आतंकवाद विरोधी सहयोग और समुद्री सुरक्षा तक फैल गए। यही वजह है कि आज अबू धाबी को भारत केवल हथियार बेचने वाला देश नहीं, बल्कि ऐसा रणनीतिक साथी नजर आ रहा है जो संकट की घड़ी में मजबूती से साथ खड़ा रह सकता है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब के रिश्तों में हाल के वर्षों में तनाव बढ़ा है। तेल उत्पादन, यमन नीति, क्षेत्रीय नेतृत्व और आर्थिक प्रतिस्पर्धा जैसे कई मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद सामने आए हैं। ऐसे में यदि सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ गहरे रक्षा संबंध बना रहा है तो संयुक्त अरब अमीरात का भारत की ओर झुकाव एक संतुलनकारी रणनीति के रूप में देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि अब खाड़ी की राजनीति दो अलग ध्रुवों की तरफ बढ़ रही है। एक तरफ सऊदी अरब और पाकिस्तान का पारंपरिक सामरिक समीकरण है, तो दूसरी तरफ संयुक्त अरब अमीरात भारत के साथ नई रणनीतिक धुरी बनाता दिख रहा है। भारत के लिए यह स्थिति बेहद लाभकारी है क्योंकि इससे उसे पश्चिम एशिया में अभूतपूर्व सामरिक पहुंच मिल सकती है।</div><div><br></div><div>भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि पिछले वर्ष पाकिस्तान के साथ संघर्ष के दौरान ब्रह्मोस के प्रभावी उपयोग ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। इसके बाद कई देशों ने इस मिसाइल में रुचि दिखाई। थाईलैंड, दक्षिण अफ्रीका, ब्राजील और चिली जैसे देश भी इसे खरीदने की इच्छा जता चुके हैं। यानी भारत अब केवल हथियार आयात करने वाला देश नहीं रहा, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार का निर्णायक खिलाड़ी बन चुका है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2026 में समाप्त वित्तीय वर्ष में भारत का रक्षा निर्यात चार अरब डॉलर के पार पहुंच गया, जबकि 2013-14 में यह केवल 7.26 करोड़ डॉलर था। यह उछाल बताता है कि भारत की रक्षा तकनीक अब विश्व स्तर पर भरोसेमंद मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यदि संयुक्त अरब अमीरात के साथ यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो इसके कई दूरगामी परिणाम होंगे। एक तो इससे भारत की सामरिक साख अभूतपूर्व स्तर पर पहुंचेगी। साथ ही पाकिस्तान को यह स्पष्ट संदेश जाएगा कि खाड़ी में उसका एकाधिकार खत्म हो चुका है। इसके अलावा, पश्चिम एशिया में भारत की सैन्य और कूटनीतिक मौजूदगी और मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

<iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/EmWJQ0aG0JI?si=VMcaKRAQpmCSuVDJ" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:12:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-uae-brahmos-deal-pakistan-tension</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/23/india-uae-defence-deal_large_1312_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[युद्धविराम से आगे: क्या विश्व अहिंसा की ओर बढ़ेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/beyond-the-ceasefire-will-the-world-move-towards-non-violence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हाल ही में हुआ युद्धविराम ऐसे समय में सामने आया है, जब पश्चिम एशिया युद्ध की लपटों में घिरकर वैश्विक स्थिरता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुका था। कई सप्ताह तक चले संघर्ष ने क्षेत्र को ऐसे ज्वालामुखी में बदल दिया था, जिसकी प्रत्येक विस्फोटक घटना विश्व अर्थव्यवस्था को झकझोर रही थी। तेल बाजारों में भारी उथल-पुथल थी, निवेशकों में घबराहट बढ़ रही थी और वैश्विक मंदी की आशंकाएं गहराने लगी थीं। ऐसे में युद्धविराम ने विश्व को तत्काल राहत तो दी है, लेकिन सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या यह समझौता स्थायी शांति की नींव बनेगा या केवल अगले युद्ध से पहले का एक अस्थायी विराम सिद्ध होगा? इतिहास साक्षी है कि युद्धविराम और शांति समझौते तभी टिकाऊ सिद्ध होते हैं, जब उनके पीछे केवल सामरिक विवशता नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति, पारस्परिक विश्वास और मानवता के प्रति प्रतिबद्धता भी हो। अन्यथा वे केवल संघर्षों के बीच का अंतराल बनकर रह जाते हैं। पश्चिम एशिया का इतिहास ऐसे असंख्य समझौतों का गवाह है, जो कागजों पर तो बने, लेकिन जमीन पर टिक नहीं सके।</div><div><br></div><div>इस युद्ध के परिणामों का विश्लेषण किया जाए तो सबसे बड़ा लाभार्थी ईरान दिखाई देता है। अमेरिका और इजरायल के सैन्य दबाव, आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय अलगाव के बावजूद तेहरान न केवल अपने राजनीतिक ढांचे को बचाने में सफल रहा, बल्कि उसने अपने विरोधियों को वार्ता की मेज पर आने के लिए भी बाध्य किया। ईरान अब अपने नागरिकों के समक्ष यह दावा कर सकता है कि उसने दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों के सामने घुटने नहीं टेके। ईरानी नेतृत्व इसे प्रतिरोध की जीत के रूप में प्रस्तुत करेगा। दूसरी ओर इस संघर्ष ने अमेरिका की अजेयता की छवि को भी चुनौती दी है। वियतनाम, इराक और अफगानिस्तान के बाद यह एक और अवसर है, जिसने यह स्पष्ट किया कि केवल सैन्य शक्ति राजनीतिक परिणाम सुनिश्चित नहीं कर सकती। वाशिंगटन ने दबाव बनाया, अपनी सैन्य क्षमता का प्रदर्शन किया, लेकिन अंततः उसे वार्ता और समझौते का रास्ता अपनाना पड़ा। इससे यह संदेश गया है कि इक्कीसवीं सदी की दुनिया अब केवल शक्ति संतुलन से नहीं, बल्कि संवाद, कूटनीति और बहुपक्षीय सहयोग से संचालित होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-g7-meeting-should-focus-on-introspection-regarding-world-peace-and-balance" target="_blank">विश्व शांति एवं संतुलन के लिए आत्ममंथन हो जी-7 बैठक में</a></h3><div>इजरायल के लिए यह स्थिति राजनीतिक रूप से असहज है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू लंबे समय से ईरान की परमाणु और मिसाइल क्षमताओं को अपने देश के अस्तित्व के लिए खतरा बताते रहे हैं। इजरायल को आशा थी कि युद्ध के माध्यम से ईरान की सामरिक क्षमता को निर्णायक रूप से कमजोर किया जाएगा। किंतु युद्धविराम के बाद ईरान स्वयं को विजेता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। इससे इजरायल के भीतर यह बहस और तीव्र हो सकती है कि क्या क्षेत्रीय सुरक्षा चिंताओं की तुलना में महाशक्तियों ने अपने सामरिक हितों को अधिक महत्व दिया। भारत के लिए यह समझौता विशेष महत्व रखता है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए पश्चिम एशिया पर अत्यधिक निर्भर है। युद्ध की स्थिति में तेल आपूर्ति बाधित होने, समुद्री व्यापार मार्गों पर संकट उत्पन्न होने और कीमतों में वृद्धि की आशंका ने भारत की चिंता बढ़ा दी थी। युद्धविराम से तेल कीमतों पर दबाव कम होगा, महंगाई नियंत्रित रहेगी और खाड़ी देशों में कार्यरत लाखों भारतीयों की सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी घटेंगी। लेकिन भारत का महत्व केवल एक उपभोक्ता राष्ट्र के रूप में नहीं है, वह आज वैश्विक शांति के एक नैतिक प्रवक्ता के रूप में भी उभर रहा है।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह युद्ध एक बड़े प्रश्न को जन्म देता है-क्या मानव सभ्यता युद्धों के सहारे अपने भविष्य का निर्माण कर सकती है? आज महाशक्तियों ने ऐसी विनाशकारी सैन्य क्षमता अर्जित कर ली है कि किसी भी देश की एक छोटी-सी भूल संपूर्ण मानवता को विनाश की ओर धकेल सकती है। परमाणु हथियारों, जैविक अस्त्रों और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित युद्ध प्रणालियों के युग में युद्ध अब केवल सीमाओं का प्रश्न नहीं रह गया है, वह समूची मानव सभ्यता के अस्तित्व का प्रश्न बन गया है। यही कारण है कि आज दुनिया को शक्ति की नहीं, शांति की राजनीति की आवश्यकता है। हिंसा, युद्ध, आतंकवाद और शस्त्रीकरण की प्रतिस्पर्धा ने मानवता को भय, अविश्वास और असुरक्षा के गर्त में धकेल दिया है। यदि विश्व को बचाना है, तो उसे निःशस्त्रीकरण, अहिंसा, सह-अस्तित्व और संवाद की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा।</div><div><br></div><div>इस संदर्भ में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाती है। भारत ने सदैव विश्व को शांति, करुणा और अहिंसा का संदेश दिया है। महात्मा गांधी ने कहा था, ‘आंख के बदले आंख पूरे विश्व को अंधा बना देगी।’ आज यह कथन पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। भारत की सांस्कृतिक चेतना ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत पर आधारित रही है, जो सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार मानती है। यही कारण है कि भारत ने सदैव युद्ध के स्थान पर संवाद और टकराव के स्थान पर सहमति का समर्थन किया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी विश्व के अनेक मंचों पर स्पष्ट रूप से कहा है कि ‘यह युग युद्ध का नहीं है।’ संयुक्त राष्ट्र, जी-20, ब्रिक्स तथा अन्य अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि किसी भी समस्या का समाधान युद्ध नहीं, बल्कि वार्ता है। यदि अंततः देशों को बातचीत की मेज पर ही लौटना पड़ता है, तो युद्ध की भयावह कीमत चुकाने की आवश्यकता ही क्या है?</div><div><br></div><div>भारत की विदेश नीति आज एक नए स्वरूप में सामने आ रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, इजरायल-फिलिस्तीन संघर्ष हो अथवा पश्चिम एशिया का वर्तमान संकट-भारत ने किसी पक्ष विशेष का अंध समर्थन करने के बजाय संतुलन, संवाद और शांतिपूर्ण समाधान की नीति अपनाई है। यही संतुलित दृष्टिकोण भविष्य में भारत को वैश्विक मध्यस्थ की भूमिका निभाने की दिशा में अग्रसर कर सकता है। लेकिन केवल सरकारें ही शांति स्थापित नहीं कर सकतीं। शांति का आधार समाजों, संस्कृतियों और मनुष्यों के भीतर निर्मित होता है। जब तक राष्ट्रवाद आक्रामकता का रूप लेता रहेगा, जब तक हथियार उद्योग युद्धों को लाभ का साधन बनाकर चलता रहेगा और जब तक राजनीतिक नेतृत्व युद्ध को लोकप्रियता अर्जित करने के उपकरण के रूप में उपयोग करता रहेगा, तब तक स्थायी शांति का सपना अधूरा रहेगा।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि विश्व समुदाय कुछ ठोस कदम उठाए-परमाणु एवं सामरिक हथियारों की होड़ को नियंत्रित किया जाए, संयुक्त राष्ट्र की भूमिका को अधिक प्रभावी बनाया जाए, अंतरराष्ट्रीय विवादों के समाधान के लिए स्थायी संवाद तंत्र विकसित किए जाएं और शिक्षा प्रणालियों में शांति एवं अहिंसा के मूल्यों को शामिल किया जाए। साथ ही युद्ध अर्थव्यवस्था के स्थान पर मानव कल्याण आधारित विकास मॉडल को प्राथमिकता दी जाए। अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच हुआ युद्धविराम निश्चय ही राहत का क्षण है, किंतु इसे स्थायी शांति में परिवर्तित करना अभी शेष है। यदि यह केवल सामरिक पुनर्संरचना का चरण बनकर रह गया, तो भविष्य में और भी अधिक विनाशकारी संघर्षों का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। लेकिन यदि विश्व समुदाय इस अवसर को आत्ममंथन का क्षण मानकर अहिंसा, संवाद और सह-अस्तित्व की नई वैश्विक संस्कृति विकसित करता है, तो यह युद्धविराम मानव इतिहास के एक नए अध्याय का प्रारंभ भी बन सकता है। दुनिया को आज युद्ध का अंधेरा नहीं, शांति का उजाला चाहिए। मानवता के समक्ष यही सबसे बड़ी चुनौती है और यही सबसे बड़ा अवसर भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 13:03:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/beyond-the-ceasefire-will-the-world-move-towards-non-violence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/23/iran-war_large_1303_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अगर धमकी देते देते पाकिस्तान ने सचमुच युद्ध छेड़ दिया तो भारत क्या करेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-military-strength-vs-pakistan-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बड़बोले ख्वाजा आसिफ कभी भारत को परमाणु बम की धमकी देते हैं, कभी जल युद्ध की हुंकार भरते हैं और कभी देशी विदेशी मीडिया को दिए गए साक्षात्कारों में यह कबूल करते नजर आते हैं कि हर जंग में पाकिस्तान की फौज को भारत के हाथों मुंह की खानी पड़ी है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री की ताजा गीदड़ भभकी भी उसी बौखलाहट का नतीजा है, जो आतंकवाद के सहारे भारत को अस्थिर करने की नाकाम कोशिशों के बाद अब पानी के मुद्दे पर नया शोर मचा रही है। असलियत यह है कि पाकिस्तान की सत्ता और सेना दोनों ही अपने ही देश की नाकामियों को छिपाने के लिए भारत विरोध का सहारा ले रहे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक बार फिर भारत के खिलाफ युद्ध की गीदड़भभकी दी है। एक पाकिस्तानी न्यूज चैनल को दिए इंटरव्यू में आसिफ ने कहा कि यदि पाकिस्तान की जल सुरक्षा से खिलवाड़ हुआ तो इस्लामाबाद भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने पानी को पाकिस्तान की राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा बताते हुए आरोप लगाया कि भारत अगर जल आपूर्ति रोकने की दिशा में आगे बढ़ता है तो हालात युद्ध तक पहुंच सकते हैं। यह बयान ऐसे वक्त में आया है जब पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने सिंधु जल संधि को निलंबित कर पाकिस्तान को साफ संदेश दे दिया था कि आतंकवाद और बातचीत अब साथ-साथ नहीं चल सकते।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/major-impact-on-pakistan-and-qatar-60-day-roadmap-for-us-iran-peace-agreement-prepared" target="_blank">Pakistan-Qatar की मध्यस्थता का बड़ा असर, America-Iran में Peace Deal का 60 दिन का Roadmap तैयार</a></h3><div>उल्लेखनीय है कि विश्व बैंक की मध्यस्थता में हुई सिंधु जल संधि के तहत सिंधु बेसिन से मिलने वाले जल से पाकिस्तान की करीब अस्सी प्रतिशत खेती चलती है। लेकिन दशकों तक आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले पाकिस्तान को अब इस बात का डर सताने लगा है कि संधि स्थगित होने के बाद भारत अपने हिस्से के जल का पूर्ण उपयोग करने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। जैसे जैसे भारत अपने अधिकार के पानी का इस्तेमाल बढ़ाएगा, वैसे वैसे पाकिस्तान की पहले से डगमगाती अर्थव्यवस्था और कृषि व्यवस्था पर संकट और गहराता जाएगा।</div><div><br></div><div>साथ ही ख्वाजा आसिफ ने भारत पर चिनाब नदी के प्रवाह को हथियार की तरह इस्तेमाल करने और जल संबंधी सूचनाएं रोकने का आरोप लगाया है। हम आपको यह भी बता दें कि पाकिस्तान इस समय गंभीर जल संकट से जूझ रहा है। सिंध और बलूचिस्तान जैसे इलाकों में हालात बेहद खराब बताए जा रहे हैं। सिंध के सिंचाई विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कई नहरों में भारी जल कमी दर्ज की गई है, जबकि पंजाब प्रांत पर तय हिस्से से ज्यादा पानी लेने के आरोप लग रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि पाकिस्तान के प्रांतों के बीच पानी को लेकर टकराव लगातार बढ़ता जा रहा है। यानी अपने ही घर में जल संकट और अव्यवस्था संभालने में नाकाम पाकिस्तान अब भारत पर आरोप लगाकर अपनी जनता का ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहा है।</div><div><br></div><h2>ऑपरेशन सिंदूर 2.0 की तैयारी चल रही है</h2><div><br></div><div>लेकिन पाकिस्तान को समझना होगा कि यह पुराना भारत नहीं है। पिछले महीने भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने साफ शब्दों में दुनिया को बता दिया था कि भारत हर चुनौती का जवाब देने के लिए पूरी तरह तैयार है। उन्होंने कहा था कि ऑपरेशन सिंदूर अभी समाप्त नहीं हुआ है और यदि जरूरत पड़ी तो ऑपरेशन सिंदूर 2.0 के लिए तीनों सेनाएं चौबीसों घंटे तैयारी कर रही हैं। सेना, वायुसेना और नौसेना के बीच तालमेल मजबूत किया जा रहा है और भविष्य के युद्ध की हर परिस्थिति को ध्यान में रखकर रणनीति बनाई जा रही है। जनरल द्विवेदी का यह बयान भारत की सैन्य शक्ति और आत्मविश्वास का परिचायक था। उन्होंने कहा कि आधुनिक युद्ध का मैदान पूरी तरह पारदर्शी हो चुका है, जहां दुश्मन की हर गतिविधि पर नजर रखी जाती है। भारतीय सेना सीमावर्ती इलाकों में सैनिकों और नागरिकों की सुरक्षा के लिए हर स्तर पर सजग है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान को यह समझ लेना चाहिए कि भारत अब हर मोर्चे पर निर्णायक जवाब देने की क्षमता रखता है। आतंकवाद, घुसपैठ, जल विवाद या सीमा पर उकसावे की हर हरकत का जवाब नए भारत की सेना उसी भाषा में देना जानती है। ख्वाजा आसिफ की गीदड़ भभकियां पाकिस्तान की कमजोरी और डर को उजागर करती हैं, जबकि भारतीय सेना का शौर्य, अनुशासन और तैयारी यह साबित करती है कि देश की सुरक्षा से खिलवाड़ करने वालों को इस बार बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ सकती है।</div><div><br></div><h2>भारत और पाक सैन्य क्षमता की तुलना देखिये</h2><div><br></div><div>फिर भी यदि मान लिया जाए कि अगर पाकिस्तान भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की हिमाकत करता है तो सवाल उठता है कि भारत क्या करेगा? इसका जवाब यह है कि इस बार भारत की ओर से केवल सीमा पर जवाब नहीं मिलेगा, बल्कि जमीन, आसमान और समंदर तीनों मोर्चों पर पाकिस्तान को ऐसी मार झेलनी पड़ सकती है जिसकी कल्पना भी इस्लामाबाद के हुक्मरानों ने नहीं की होगी। भारतीय सेनाध्यक्ष के बयानों के अलावा, दुनिया भर की रक्षा रिपोर्टों और सैन्य विश्लेषणों का अध्ययन बताता है कि पारंपरिक युद्ध क्षमता, आधुनिक हथियारों, आर्थिक ताकत, सैन्य तकनीक और रणनीतिक तैयारी के मामले में भारत पाकिस्तान पर कई गुना भारी पड़ता है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि दुनिया की सबसे अनुभवी और विशाल सेनाओं में शामिल भारतीय थलसेना के पास सैनिक संख्या, आधुनिक तोपखाना, मिसाइल शक्ति और युद्धक टैंकों का ऐसा जाल है जो पाकिस्तान की जमीनी रक्षा को चंद दिनों में चरमरा सकता है। भारत के पास पिनाका बहु नली रॉकेट प्रणाली, धनुष तोप, K9T अजय टैंक, T90 भीष्म टैंक और ब्रह्मोस जैसी घातक मारक क्षमता है। ब्रह्मोस मिसाइल ध्वनि की गति से कई गुना तेज रफ्तार से दुश्मन के ठिकानों को मिट्टी में मिला सकती है। हाल के वर्षों में भारत ने स्वदेशी रक्षा निर्माण को तेजी से मजबूत किया है, जिसके कारण सेना को लगातार आधुनिक हथियार और तकनीक मिल रही है।</div><div><br></div><div>भारतीय सेना का सबसे बड़ा फायदा उसका वास्तविक युद्ध अनुभव और ऊंचे पर्वतीय इलाकों से लेकर रेगिस्तान तक हर परिस्थिति में लड़ने की क्षमता है। दूसरी ओर पाकिस्तान की सेना लंबे समय से आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सीमित संसाधनों से जूझ रही है। साथ ही भारत की रक्षा बजट क्षमता पाकिस्तान से कई गुना अधिक है, जिससे हथियारों की खरीद, तकनीकी उन्नयन और युद्ध तैयारी लगातार मजबूत होती जा रही है। साथ ही भारत रक्षा क्षेत्र में काफी हद तक आत्मनिर्भर है जबकि पाकिस्तान पूरी तरह चीन और दूसरे देशों पर निर्भर है।</div><div><br></div><div>वहीं भारतीय वायुसेना की बात करें तो यह वह ताकत है जो किसी भी आधुनिक युद्ध का रुख घंटों में बदल सकती है। भारतीय वायुसेना के पास रॉफेल, सुखोई तीस एमकेआई, तेजस और मिराज जैसे अत्याधुनिक लड़ाकू विमान हैं। रॉफेल को दुनिया के सबसे खतरनाक बहुउद्देश्यीय युद्धक विमानों में गिना जाता है। इसकी लंबी दूरी की मारक क्षमता और अत्याधुनिक राडार प्रणाली पाकिस्तान के अधिकतर विमानों पर भारी पड़ सकती है। कई वैश्विक सैन्य अध्ययनों में माना गया है कि भारत की वायु शक्ति संख्या और तकनीक दोनों में पाकिस्तान से बहुत आगे है।</div><div><br></div><div>भारतीय वायुसेना की सबसे घातक ढाल एस-400 वायु रक्षा प्रणाली है। यह प्रणाली सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन के विमान, मिसाइल और ड्रोन को हवा में ही नष्ट कर सकती है। हालिया सैन्य अभियानों और अभ्यासों में इस प्रणाली ने साबित किया कि पाकिस्तान की हवाई घुसपैठ या मिसाइल हमले को भारतीय रक्षा कवच के सामने टिकना बेहद कठिन होगा।</div><div><br></div><div>समंदर की बात करें तो भारतीय नौसेना पाकिस्तान की नौसैनिक क्षमता पर भारी बढ़त रखती है। भारत के पास विमानवाहक पोत विक्रांत, परमाणु पनडुब्बी अरिहंत, अत्याधुनिक युद्धपोत, विध्वंसक जहाज और लंबी दूरी तक मार करने वाली समुद्री मिसाइलें हैं। भारतीय नौसेना अरब सागर में पाकिस्तान के बंदरगाहों और समुद्री आपूर्ति मार्गों को घेर सकती है। हम आपको बता दें कि पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा समुद्री व्यापार पर निर्भर है और यदि भारतीय नौसेना ने नाकेबंदी कर दी तो पाकिस्तान के लिए ईंधन, हथियार और व्यापारिक आपूर्ति बनाए रखना बेहद मुश्किल हो जाएगा।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, भारत की सबसे बड़ी ताकत केवल हथियार नहीं बल्कि तीनों सेनाओं के बीच बढ़ता तालमेल भी है। सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भारत भविष्य के युद्ध के लिए चौबीसों घंटे तैयारी कर रहा है और तीनों सेनाएं मिलकर समन्वित युद्ध रणनीति पर काम कर रही हैं। आधुनिक निगरानी प्रणाली, सूचना युद्ध, उपग्रह क्षमता और त्वरित हमला करने की तैयारी भारत को निर्णायक बढ़त देती है।</div><div><br></div><div>हालांकि यह भी सच है कि दोनों देशों के पास परमाणु हथियार हैं और किसी भी पूर्ण युद्ध का परिणाम पूरे क्षेत्र के लिए विनाशकारी हो सकता है। लेकिन पारंपरिक युद्ध क्षमता की बात करें तो वैश्विक रक्षा विश्लेषण साफ संकेत देते हैं कि भारत संख्या, तकनीक, अर्थव्यवस्था, हथियारों और रणनीतिक तैयारी के मामले में पाकिस्तान पर स्पष्ट रूप से भारी पड़ता है। यही कारण है कि पाकिस्तान बार बार गीदड़ भभकियां तो देता है, लेकिन सीधे युद्ध की कीमत चुकाने का साहस शायद ही जुटा पाए।</div><div><br></div><h2>निर्णायक है मोदी का नेतृत्व</h2><div><br></div><div>बहरहाल, सैन्य ताकत के साथ-साथ भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसका निर्णायक नेतृत्व भी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के सामने एक ऐसे सख्त और स्पष्ट नेता की छवि बनाई है जो देश की सुरक्षा के मुद्दे पर किसी भी तरह का समझौता नहीं करता। सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर बालाकोट एयर स्ट्राइक और ऑपरेशन सिंदूर से लेकर आतंकवाद के खिलाफ कड़े वैश्विक अभियान तक, मोदी ने यह साबित किया है कि नया भारत केवल चेतावनी नहीं देता बल्कि जवाब भी देता है। आज दुनिया के प्रमुख देशों के साथ भारत के मजबूत रणनीतिक संबंध हैं और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मोदी की बात को गंभीरता से सुना जाता है। दूसरी ओर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर की स्थिति अपने ही देश में कमजोर और विवादों से घिरी हुई है। आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और आतंकवाद की छाया से जूझते पाकिस्तान के नेतृत्व की तुलना भारत के मजबूत और आत्मविश्वासी नेतृत्व से नहीं की जा सकती। यही कारण है कि जब भारत का नेतृत्व दृढ संकल्प के साथ खड़ा होता है तो पाकिस्तान की धमकियां दुनिया को खोखली और बौखलाहट भरी ही नजर आती हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 13:44:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-military-strength-vs-pakistan-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/22/india-vs-pakistan_large_1344_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अपने घरों की ओर भी लौटें घरेलू पर्यटक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/domestic-tourists-should-also-return-to-their-homes]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उदारीकरण के पहले तक गर्मी की छुट्टियों का मतलब, जरूरी सेवाओं को छोड़ सबकी छुट्टियां होती थीं, स्कूल बंद हो जाते थे, अदालतों में जरूरी फौजदारी मामलों को छोड़ सुनवाई रूक जाती थी, और अदालतें बंद हो जाती थीं, तहसीलों में भी सूनापन छा जाता था, बैंकों में भी आधे से ज्यादा लोग गर्मी की छुट्टियां ले लेते थे। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं। सूचना और संचार क्रांति के कारण पहले की तुलना में बिजली ज्यादा मिलने के चलते अब शहरों को कौन कहें, गांव तक पूरी रात गुलजार हो रहे हैं। इसका असर छुट्टियां मनाने के अंदाज और छुट्टियों के लिए जगह के चयन पर भी पड़ रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पहले छुट्टियों का मतलब होता था, नौकरीपेशा लोगों की गांवों में वापसी। गांव में रहने वाले बच्चे छुट्टियों में नानी, मामा, मौसी के घर जाते थे। बहुत हुआ तो कोई तीर्थ यात्रा कर ली गई या शहर में रह रहे रिश्तेदार के यहां यात्रा कर ली गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब छुट्टियों का मतलब साफ तौर पर बदल गया है। उत्तर भारत के पहाड़ी इलाके हों या फिर मैदानी, ज्यादातर गांव खाली हो चुके हैं। गांवों में वे ही लोग रह रहे हैं, जिनके पास जायदाद ज्यादा है या जिनकी हैसियत नहीं है कि शहर जा सकें। उत्तर भारत के गांवों का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि हर तीसरे घर में या तो ताला लगा है कि उस घर के पांच सदस्यों में से तीन किसी शहर में हैं। शहर बड़ा भी हो सकता है, छोटा भी या बगल का कस्बा भी। जिसको जहां नौकरी मिली, कम से कम उसका परिवार वहीं रह रहा है। सरकारी तंत्र की शिक्षा पर विशेषकर राज्यों की ओर से खूब खर्च हो रहा है। अध्यापक भी तैनात हैं। कागजों में ग्रामीण स्कूलों को सहूलियतें भी खूब दी जा रही हैं, लेकिन गांवों के स्कूलों में उन्हीं के बच्चे पढ़ रहे हैं, जिनकी माली हालत छोटे स्कूल का खर्च उठाने लायक नहीं है। अन्यथा सभी अपनी हैसियत के मुताबिक महानगर, शहर या बगल के कस्बे के स्कूल में अपने बच्चों को पढ़ा रहे हैं। रिकॉर्ड पर ग्रामीण जनसंख्या अब भी करीब दो तिहाई से ज्यादा है। लेकिन हकीकत में इसकी संख्या बेहद कम है। 2011 की जनगणना के अनुसार करीब 68.8 आठ फीसद जनसंख्या गांवों में रहती थी। लेकिन भारत सरकार के हालिया अनुमानों के मुताबिक, करीब 63 प्रतिशत जनसंख्या ही गांवों में रह रही है। लेकिन यहां एक बार फिर ध्यान देने की है कि इसका भी बड़ा हिस्सा शहरों में रह रहा है। भले ही शहर में उसकी रिहायश किसी झुग्गी या किसी झुग्गीनुमा शहरीकृत गांव में हो। औद्योगिक इलाकों में रहने वाले लोगों की रिहायशी स्थिति बहुत अच्छी नहीं हैं, उसकी तुलना में उनका ग्रामीण घर बढ़िया है। फिर भी रोजगार और शिक्षा के लिए कम कमाई के बावजूद ग्रामीण परिवार शहरों में रहने को मजबूर हैं। यह चर्चा लंबी हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/modi-government-big-decision-changes-in-visa-rules-for-foreigners-in-india" target="_blank">मोदी सरकार का बड़ा फैसला, भारत में बदले विदेशियों के वीजा नियम</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div>आज छुट्टियों में हर परिवार अपनी हैसियत के हिसाब से घूमने जा रहा है, लेकिन इनमें से ज्यादातर घूमने के लिए पहले की तरह अपने गांवों की ओर नहीं लौट रहे हैं। भारत सरकार के आंकड़ों के अनुसार, भारत के घरेलू पर्यटन में साल 2023-24 की तुलना में 2024-25 में करीब 95 प्रतिशत की बढ़ोत्तरी दिख रही है। इस साल 250 करोड़ से ज्यादा लोगों ने घरेलू पर्यटन किया। इन पर्यटकों का पूरा विवरण यानी किस इलाके के कितने पर्यटक किस इलाके में घूमने गए। लेकिन मोटे तौर पर सबसे ज्यादा नए तीर्थस्थलों मसलन काशी के विश्वनाथ कारीडोर, उज्जैन के महाकाल कारीडोर या केदारनाथ आदि की यात्राएं कीं। लेकिन गर्मियों में सबसे ज्यादा लोग पहाड़ों की ओर जा रहे हैं। एक दौर ऐसा भी आता है कि पहाड़ों में लोगों को ठहरने के लिए जगह तक नहीं मिलती, लोग कारों में सड़कों के किनारे ही रहने और अपनी दैनिक क्रिया करने को मजबूर हो जाते हैं। स्पष्ट है कि ये पर्यटक इन जगहों पर जाकर वहां खर्च भी कर रहे हैं। इसका आर्थिक फायदा उन्हीं इलाकों को मिल रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यहीं पर एक सवाल उठता है कि अगर इन पर्यटकों में से एक हिस्सा अपने गांवों की यात्रा करेगा तो वह जो खर्च करेगा, उस खर्च से उसके गांव-परिवार के आसपास की आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी। इसका असर यह होगा कि उन इलाकों में आर्थिक विकास बढ़ेगा। आर्थिक गतिविधियां बढ़ने से उन इलाकों की सूरत भी सुधरेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय परंपरा में व्यक्ति के विकास के लिए पूरे परिवेश के योगदान को स्वीकार किया जाता रहा है। इसीलिए व्यक्ति की कमाई और उपलब्धि में उसके परिवेश और परिवार का हिस्सा माना जाता रहा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने शतक वर्ष में पंच परिवर्तन की जो सैद्धांतिकी और कार्ययोजना स्वीकार की है, उसका दूसरा अंग कुटुंब प्रबोधन है। संघ के पंच परिवर्तन में भारतीय संस्कृति की उस अवधारणा को स्पष्ट रूप से स्वीकार किया गया है, जिसमें परिवार सिर्फ सामाजिक संस्था नहीं माना जाता, बल्कि संस्कार की प्रयोगशाला के रूप में स्वीकार्य है। आर्थिक उदारीकरण के बाद जीवन में यांत्रिकता बढ़ी है। इसकी वजह से आपसी संवाद भी घटा है। उपभोक्तावाद को बढ़ावा तो खैर मिला है, इससे परिवार टूट रहे हैं। ऐसे में कुटुंब यानी परिवार प्रबोधन की आवश्यकता पहले से अधिक बढ़ जाती है। इसीलिए संघ ने अपने 'परिवार प्रबोधन अभियान' के तहत देशभर में मिलकर भोजन करने, साप्ताहिक पारिवारिक संवाद की परंपरा को बढ़ावा देने, पारिवारिक सांस्कृतिक आयोजन करने जैसी कोशिशें तेज कर दी हैं। घरेलू पर्यटन के तहत अगर लोगों को छुट्टियों में उनके ही गांवों में कुछ दिन गुजारने के लिए अगर प्रेरित किया जाए तो यह कुटुंब प्रबोधन का विस्तार होगा। अगर घरेलू पर्यटन को पर्यटकों को उनके मूल गांवों, ढाणियों और कस्बों की ओर मोड़ा जाएगा तो उनके साथ उनके बच्चे भी अपने गांवों जाएंगे, इससे शहरों में रह रहे बच्चों का अपनी मूल भूमि और कुटुंब से जुड़ाव बढ़ेगा। फिर हो सकता है कि भविष्य में वे अपने गांवों से कहीं ज्यादा गहरा जुड़ाव महसूस करेंगे। इससे सामाजिक संबंधों पर जहां सकारात्मक असर पड़ेगा, वहीं लोगों का अपनी माटी, अपने परिवार और अपने समाज से रिश्ता और गहरा होगा। चूंकि वे अपने गांव नियमित अंतराल पर लौटते रहेंगे, छुट्टियों का हिस्सा अपने गांवों में गुजारेंगे तो उनके जरिए उनके अपनी माटी और इलाके में भी आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>पड़ोसी देश चीन ने आर्थिक मंदी के दौर में घरेलू खर्च और स्ट्रीट कारोबार को बढ़ावा देने की नीति पर काम किया। इससे घरेलू पर्यटन को वहां बढ़ावा मिला, घरेलू स्तर पर खर्च भी बढ़ा, इसका अच्छा प्रभाव चीन की घरेलू आर्थिकी पर पड़ा। अब तो बसंत के मौसम में चीन की सरकार लोगों को अपने गांवों की यात्रा करने के लिए लंबी छुट्टियां देती हैं। उस दौरान लोग अपने मूल निवास, गांव, कस्बे आदि की यात्रा करते हैं। अपने गांव वाले घरों के लिए तब वे खरीददारी भी करते हैं। तब ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियां तेज हो जाती हैं। इसका असर है कि चीन के स्ट्रीट कारोबार में तेजी आई है। भारत में भी इस तरीके को स्वीकार किया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बेशक चार दशक पहले जैसी गर्मी की छुट्टियों का माहौल नहीं है। फिर भी लोग छुट्टियां मनाने जा रहे हैं, उनका रूझान पहाड़ों की तरफ ज्यादा है। इससे पहाड़ों में पर्यटकों के चलते कचरा भी बढ़ रहा है। अगर ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा मिले तो पहाड़ भी सांस ले सकेंगे, उनके यहां कचरे का बोझ कम होगा और उन ग्रामीण इलाकों में आर्थिक गतिविधियां बढ़ेंगी, जो आर्थिक गतिविधियों की दौड़ में किंचित पीछे हैं। इससे परिवार का प्रबोधन भी होगा। पारिवारिक रिश्ते मजबूत होंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 12:22:46 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/domestic-tourists-should-also-return-to-their-homes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/22/tourists_large_1222_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[INS Dunagiri, INS Sanshodhak और INS Agray के जरिये समुद्र पर भी राज करेगा भारत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-navy-dunagiri-sanshodhak-agray-warships-pm-modi-kolkata]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कोलकाता के श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारतीय नौसेना को तीन ताकतवर स्वदेशी युद्धपोत दुनागिरी, संशोधक और अग्रय सौंपेंगे। यह नौसेना में सिर्फ तीन नए जहाजों के शामिल होने का कार्यक्रम नहीं, बल्कि हिंद महासागर में भारत की बढ़ती समुद्री ताकत और आत्मनिर्भर रक्षा क्षमता का बड़ा प्रदर्शन भी माना जा रहा है। स्वदेशी तकनीक से बने ये तीनों युद्धपोत समुद्री युद्ध, समुद्री निगरानी और पनडुब्बियों से मुकाबले में भारतीय नौसेना को नई ताकत देने वाले साबित होंगे।</div><div><br></div><div>इन तीनों युद्धपोतों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें भारतीय नौसेना के युद्धपोत डिजाइन ब्यूरो ने तैयार किया है और कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स ने निर्मित किया है। इन जहाजों में 75 प्रतिशत से अधिक स्वदेशी सामग्री का उपयोग हुआ है। इस परियोजना में दो सौ से अधिक सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की भागीदारी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब रक्षा आयात पर निर्भर रहने वाला देश नहीं, बल्कि अत्याधुनिक युद्धक क्षमता विकसित करने वाली शक्ति बन चुका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-gifts-projects-worth-47000-crore-to-odisha-calls-celebration-of-democracy-and-development" target="_blank">PM Modi ने Odisha को दी 47000 करोड़ की सौगात, बोले- यह लोकतंत्र और विकास का उत्सव</a></h3><div>हम आपको बता दें कि तीनों प्लेटफार्म अपने आप में अलग सामरिक जिम्मेदारियां निभाने वाले समुद्री हथियार हैं। दुनागिरी जहां गहरे समुद्र में आक्रामक युद्ध क्षमता का प्रतीक है, वहीं संशोधक समुद्री खुफिया और महासागरीय जानकारी जुटाने का अत्याधुनिक साधन है। दूसरी ओर अग्रय तटीय क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का शिकार करने वाला घातक हथियार है। इन तीनों को एक साथ नौसेना में शामिल करना इस बात का संकेत है कि भारत अब समुद्री सुरक्षा को केवल युद्ध तक सीमित नहीं देख रहा, बल्कि निगरानी, सूचना वर्चस्व और समुद्री प्रभुत्व की व्यापक रणनीति पर काम कर रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि दुनागिरी परियोजना सत्रह ए के तहत निर्मित पांचवां स्टील्थ युद्धपोत है। इसकी बनावट ऐसी है कि दुश्मन के राडार इसे आसानी से पकड़ नहीं सकते। इसमें ब्रह्मोस सुपरसोनिक प्रहारक मिसाइलें और मध्यम दूरी की वायु रक्षा प्रणाली तैनात है। इसका अर्थ यह है कि यह युद्धपोत समुद्र से दुश्मन के जहाजों, ठिकानों और हवाई खतरों पर एक साथ हमला करने में सक्षम है। हिंद महासागर में चीन की बढ़ती मौजूदगी और पाकिस्तान की नौसैनिक गतिविधियों को देखते हुए दुनागिरी का शामिल होना भारतीय नौसेना की मारक क्षमता को कई गुना बढ़ाने वाला कदम माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>रणनीतिक नजरिये से देखें तो यह युद्धपोत भारत की ब्लू वाटर क्षमता को मजबूत करेगा। ब्लू वाटर क्षमता का मतलब केवल तटों की रक्षा नहीं, बल्कि हजारों किलोमीटर दूर समुद्री क्षेत्रों में भी सैन्य प्रभाव बनाए रखना होता है। भारत लंबे समय से हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी निर्णायक मौजूदगी स्थापित करना चाहता है और दुनागिरी उसी दिशा में एक मजबूत कदम है।</div><div><br></div><div>वहीं संशोधक का महत्व अपेक्षाकृत शांत लेकिन अत्यंत गहरा है। यह विशाल सर्वेक्षण पोत समुद्र की सतह के नीचे की दुनिया का मानचित्र तैयार करेगा। इसमें स्वचालित जलयान, दूर नियंत्रित यंत्र और अत्याधुनिक सर्वेक्षण प्रणाली लगी हुई हैं। यह समुद्री गहराई, समुद्र तल की बनावट, जलधाराओं और भूभौतिकीय आंकड़ों का संग्रह करेगा।</div><div><br></div><div>सामरिक दृष्टि से यह जानकारी युद्ध के समय बेहद महत्वपूर्ण होती है। पनडुब्बियों की आवाजाही, समुद्री सुरंगों की पहचान और नौसैनिक मार्गों की सुरक्षा इसी तरह के आंकड़ों पर निर्भर करती है। यही कारण है कि समुद्री सर्वेक्षण पोतों को आधुनिक नौसैनिक युद्ध का मौन हथियार कहा जाता है। नागरिक उपयोग में भी संशोधक समुद्री व्यापार मार्गों, बंदरगाह विकास और आपदा प्रबंधन के लिए अहम भूमिका निभाएगा।</div><div><br></div><div>साथ ही अग्रय भारतीय नौसेना की तटीय सुरक्षा रणनीति का सबसे तेज और घातक हिस्सा माना जा रहा है। यह अर्णाला श्रेणी का पनडुब्बी रोधी युद्धपोत है, जिसे उथले समुद्री क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने और उन्हें नष्ट करने के लिए तैयार किया गया है। इसमें हल्के टॉरपीडो, स्वदेशी रॉकेट प्रक्षेपक और उथले पानी में काम करने वाली सोनार प्रणाली लगी है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो आज के दौर में पनडुब्बियां समुद्री युद्ध का सबसे खतरनाक हथियार मानी जाती हैं। चीन हिंद महासागर में लगातार अपनी पनडुब्बियों की गतिविधियां बढ़ा रहा है। पाकिस्तान भी चीनी सहयोग से अपनी पनडुब्बी क्षमता मजबूत कर रहा है। ऐसे में अग्रय जैसे युद्धपोत भारत की समुद्री सीमाओं के लिए सुरक्षा कवच साबित होंगे। खासकर बंगाल की खाड़ी और अरब सागर जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में इसकी भूमिका निर्णायक मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इन तीनों युद्धपोतों का एक साथ नौसेना में शामिल होना केवल सैन्य उपलब्धि नहीं, बल्कि रणनीतिक संदेश भी है। भारत दुनिया को यह बता रहा है कि वह अब समुद्री शक्ति संतुलन में निर्णायक भूमिका निभाने के लिए तैयार है। हिंद महासागर क्षेत्र में चीन की विस्तारवादी नीति, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति की रक्षा और समुद्री निगरानी जैसे मुद्दों ने नौसैनिक ताकत को पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण बना दिया है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि भारत ने यह क्षमता विदेशी तकनीक के सहारे नहीं, बल्कि अपने दम पर विकसित की है। आत्मनिर्भर भारत अभियान का वास्तविक चेहरा अब रक्षा क्षेत्र में दिखाई देने लगा है। युद्धपोत निर्माण से लेकर हथियार प्रणालियों तक स्वदेशीकरण का यह विस्तार आने वाले वर्षों में भारत को वैश्विक रक्षा निर्यातक भी बना सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, कोलकाता में होने वाला यह समारोह इसलिए ऐतिहासिक है क्योंकि यह केवल जहाजों का शामिल होना नहीं, बल्कि भारत की समुद्री महत्वाकांक्षा, सैन्य आत्मविश्वास और रणनीतिक उभार का सार्वजनिक उद्घोष है। हिंद महासागर में अब भारत केवल चौकसी नहीं करेगा, बल्कि नेतृत्व की भूमिका निभाने की तैयारी में दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 16:07:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-navy-dunagiri-sanshodhak-agray-warships-pm-modi-kolkata</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/20/modi-indian-navy_large_1607_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[योग है दुनिया के लिए भारत का शाश्वत अवदान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/yoga-is-india-eternal-contribution-to-the-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज जब पूरी दुनिया युद्धों, आतंकवाद, हिंसा, मानसिक तनाव, पर्यावरणीय संकट और नई-नई बीमारियों की चुनौतियों से घिरी हुई है, तब मानवता एक ऐसे मार्ग की तलाश में है जो केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को भी संतुलित कर सके। ऐसे संक्रमणकाल में योग केवल एक व्यायाम पद्धति या स्वास्थ्य विज्ञान नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के लिए आशा का प्रकाश-स्तंभ बनकर उभरा है। यही कारण है कि अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस आज केवल भारत का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण विश्व का उत्सव बन गया है। भारत अनादिकाल से योग की भूमि रहा है। इस भूमि के कण-कण में ऋषियों, मुनियों, तपस्वियों और योगियों की साधना की सुगंध समाई हुई है। वैदिक ऋषियों से लेकर भगवान महावीर, भगवान बुद्ध, आदि शंकराचार्य, रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानन्द, महात्मा गांधी, श्री अरविन्द, आचार्य तुलसी और आचार्य महाप्रज्ञ तक, सभी ने योग को जीवन के उत्कर्ष और मानव कल्याण का आधार माना। योग ने भारत की आध्यात्मिक चेतना को ही नहीं गढ़ा, बल्कि विश्व को यह संदेश भी दिया कि मनुष्य का वास्तविक विकास भीतर से प्रारंभ होता है।</div><div><br></div><div>आज विश्व जिस दिशा में बढ़ रहा है, वह चिंता का विषय है। रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, आतंकवाद की घटनाएं, साम्प्रदायिक तनाव और हथियारों की बढ़ती होड़ मानव सभ्यता को भय और असुरक्षा की ओर धकेल रही है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान और तकनीक ने अभूतपूर्व सुविधाएं दी हैं, लेकिन इनके साथ विनाश की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। ऐसे समय में योग की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। योग मनुष्य को भीतर से शांत, संतुलित और संवेदनशील बनाता है। जब व्यक्ति के भीतर शांति होगी, तभी समाज और राष्ट्र में शांति का वातावरण निर्मित होगा। योग का मूल अर्थ ही है-जोड़ना। यह मनुष्य को मनुष्य से, आत्मा को परमात्मा से, व्यक्ति को समाज से और मानवता को सम्पूर्ण सृष्टि से जोड़ता है। योग विभाजन नहीं, एकता का दर्शन है। इसलिए वह हिंसा, घृणा, आतंक और संघर्ष का स्वाभाविक प्रतिरोधक है। जो व्यक्ति योग के माध्यम से अपने भीतर करुणा, प्रेम और अहिंसा का विकास करता है, वह किसी के प्रति द्वेष नहीं रख सकता। यही कारण है कि महात्मा गांधी की अहिंसा और भगवान महावीर का जीव-दया का संदेश भी योग की व्यापक चेतना से जुड़ा हुआ दिखाई देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/why-yoga-day-celebrated-on-june-21st-learn-about-its-deep-connection-to-summer-solstice" target="_blank">International Yoga Day 2026: क्यों 21 June को ही मनाया जाता है योग दिवस? जानिए Summer Solstice से इसका गहरा Connection</a></h3><div>विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार आज मानसिक तनाव, अवसाद, अनिद्रा, उच्च रक्तचाप, मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियां तेजी से बढ़ रही हैं। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में मनुष्य बाहरी उपलब्धियों के पीछे दौड़ रहा है, लेकिन भीतर से खाली और अशांत होता जा रहा है। ऐसी स्थिति में योग एक समग्र चिकित्सा-पद्धति के रूप में सामने आया है। योग शरीर, मन और भावनाओं के बीच संतुलन स्थापित करता है। नियमित आसन, प्राणायाम और ध्यान व्यक्ति की प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाते हैं, तनाव को कम करते हैं तथा मानसिक स्वास्थ्य को मजबूत बनाते हैं। कोविड-19 महामारी के दौरान भी दुनिया ने अनुभव किया कि स्वस्थ जीवनशैली और मजबूत प्रतिरोधक क्षमता कितनी महत्वपूर्ण है। उस समय योग, प्राणायाम और ध्यान ने करोड़ों लोगों को शारीरिक एवं मानसिक रूप से सशक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। आज भी चिकित्सक और स्वास्थ्य विशेषज्ञ स्वीकार करते हैं कि योग अनेक बीमारियों की रोकथाम और प्रबंधन में अत्यंत प्रभावी सहायक माध्यम है। यह दवाओं का विकल्प नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवन का आधार है।</div><div><br></div><div>योग की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल रोगों से मुक्ति नहीं देता, बल्कि जीवन को दिशा देता है। पातंजलि ने योग को “चित्तवृत्ति निरोध” कहा है। अर्थात् मन की चंचलता और विकारों पर नियंत्रण। जब मन नियंत्रित होता है, तब व्यक्ति में निर्णय क्षमता, धैर्य और आत्मविश्वास का विकास होता है। आज की पीढ़ी, जो तनाव, प्रतिस्पर्धा और डिजिटल व्यसनों के बीच जी रही है, उसके लिए योग मानसिक संतुलन का सबसे सशक्त माध्यम बन सकता है। योग का एक महत्वपूर्ण पक्ष उसका नैतिक और मानवीय आयाम भी है। यम और नियम जैसे सिद्धांत सत्य, अहिंसा, अपरिग्रह, संयम और संतोष की शिक्षा देते हैं। यदि इन मूल्यों को व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में अपनाया जाए, तो हिंसा, भ्रष्टाचार, अपराध और सामाजिक विद्वेष जैसी समस्याओं में स्वाभाविक कमी आ सकती है। इसलिए योग केवल स्वास्थ्य का विषय नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक पुनर्निर्माण का भी अभियान है। भारतीय संस्कृति की वैश्विक स्वीकार्यता में योग की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पहल पर संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भारत की सांस्कृतिक शक्ति और विश्वसनीयता का बड़ा प्रमाण है। आज दुनिया के लगभग सभी देशों में योग का अभ्यास किया जा रहा है। यह केवल एक कूटनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की वैश्विक विजय है। प्रधानमंत्री मोदी ने योग के साथ-साथ भारतीय अहिंसा, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा, मिलेट्स आधारित भारतीय खानपान और “वसुधैव कुटुम्बकम्” की अवधारणा को भी विश्व मंच पर स्थापित करने का प्रयास किया है। यह संदेश अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारत केवल आर्थिक या सैन्य शक्ति बनने का सपना नहीं देखता, बल्कि मानवता को स्वस्थ, संतुलित और शांतिपूर्ण जीवन का मार्ग दिखाने की क्षमता भी रखता है। यही “विश्वगुरु भारत” की अवधारणा का मूल है।</div><div><br></div><div>भारतीय आयुर्वेद और योग का संबंध भी अत्यंत गहरा है। आयुर्वेद शरीर की चिकित्सा करता है, जबकि योग मन और चेतना को संतुलित करता है। दोनों मिलकर स्वस्थ जीवन की संपूर्ण व्यवस्था प्रस्तुत करते हैं। आज जब दुनिया रासायनिक दवाओं के दुष्प्रभावों और जीवनशैली जनित रोगों से चिंतित है, तब योग और आयुर्वेद एक वैकल्पिक नहीं, बल्कि पूरक एवं स्थायी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इतिहास साक्षी है कि योग ने हर युग में एक मौन क्रांति को जन्म दिया है। इसने राजाओं को ऋषि बनाया, योद्धाओं को संत बनाया और सामान्य मनुष्यों को असाधारण व्यक्तित्व प्रदान किए। स्वामी विवेकानन्द ने योग के माध्यम से भारतीय अध्यात्म को विश्व के सामने रखा। महात्मा गांधी ने कर्मयोग और अहिंसा के बल पर एक साम्राज्य को चुनौती दी। श्री अरविन्द ने योग को मानव चेतना के विकास का साधन बनाया। यह सब योग की परिवर्तनकारी शक्ति के उदाहरण हैं। इसलिये योग दिवस उत्सव का नहीं, संकल्प का अवसर बने। विद्यालयों, विश्वविद्यालयों, कार्यालयों, उद्योगों और सामाजिक संस्थाओं में योग को जीवनशैली के रूप में अपनाने की पहल हो। परिवारों में योग, ध्यान और सकारात्मक संवाद की संस्कृति विकसित हो। यदि व्यक्ति स्वस्थ होगा तो परिवार स्वस्थ होगा, परिवार स्वस्थ होगा तो समाज स्वस्थ होगा और समाज स्वस्थ होगा तो राष्ट्र एवं विश्व भी स्वस्थ और शांतिपूर्ण बन सकेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>योग और ध्यान की भारतीय परम्परा को आधुनिक युग की आवश्यकताओं के अनुरूप नई दिशा देने वाले महान दार्शनिक, चिंतक एवं आध्यात्मिक धर्मगुरु आचार्य महाप्रज्ञ का योगदान भी इस संदर्भ में अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने ‘प्रेक्षाध्यान’ पद्धति के माध्यम से ध्यान की पारंपरिक अवधारणाओं को एक नया वैज्ञानिक एवं प्रयोगधर्मी स्वरूप प्रदान किया। सदियों से ध्यान मुख्यतः आध्यात्मिक साधना और मोक्ष के मार्ग के रूप में देखा जाता रहा था, किन्तु आचार्य महाप्रज्ञ ने उसे जीवन-विज्ञान, मानसिक स्वास्थ्य, भावनात्मक संतुलन और व्यक्तित्व विकास से जोड़कर एक नई क्रांति का सूत्रपात किया। उनका मानना था कि मनुष्य यदि अपने शरीर, श्वास, चित्त, भावों और चेतना को ‘प्रेक्षा’ अर्थात् गहराई से देखना सीख जाए, तो उसके भीतर छिपी अनेक मानसिक विकृतियां स्वतः समाप्त होने लगती हैं। प्रेक्षाध्यान ने ध्यान को केवल साधु-संतों की साधना न रहने देकर सामान्य जनजीवन का हिस्सा बनाया।&nbsp;</div><div><br></div><div>वर्तमान समय में मानवता जिस दोराहे पर खड़ी है, वहां योग केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि आवश्यकता बन गया है। यह शरीर को निरोग, मन को शांत, बुद्धि को निर्मल और आत्मा को जागृत करता है। यह युद्ध के स्थान पर शांति, हिंसा के स्थान पर करुणा और तनाव के स्थान पर संतुलन का मार्ग दिखाता है। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का वास्तविक संदेश भी यही है कि मनुष्य बाहर की दुनिया को बदलने से पहले अपने भीतर की दुनिया को बदले। भारत ने योग के माध्यम से विश्व को एक अमूल्य उपहार दिया है। यदि मानवता इस उपहार का सही अर्थों में उपयोग करे, तो एक नई वैश्विक चेतना का उदय संभव है-ऐसी चेतना, जिसमें शांति हो, स्वास्थ्य हो, सह-अस्तित्व हो और समस्त मानवता के कल्याण का भाव हो। यही योग का स्वप्न है, यही भारत का संदेश है और यही भविष्य की सबसे बड़ी आवश्यकता भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 13:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/yoga-is-india-eternal-contribution-to-the-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/20/international-yoga-day-2026_large_1340_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सौ वर्षों से राष्ट्रसेवा में लीन RSS का पंजीकरण प्रमाणपत्र मांग रहे कांग्रेस नेताओं से कुछ सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/rss-registration-controversy-explained]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर कांग्रेस और उसके वैचारिक सहयोगियों ने एक बार फिर वही पुराना शोर उठाया है कि संघ पंजीकृत क्यों नहीं है? कर्नाटक के मंत्री प्रियांक खरगे का पत्र और उसके बाद खड़ा किया गया राजनीतिक कोलाहल इस बात का प्रमाण है कि संघ विरोधियों के पास न तथ्य बचे हैं, न तर्क। वह केवल विवाद पैदा करना चाहते हैं, क्योंकि जिस संगठन को जनता का भरोसा और समाज का समर्थन हासिल हो, उसे बदनाम करने का सबसे आसान तरीका संदेह फैलाना होता है।</div><div><br></div><div>लेकिन इस बार संघ ने भी स्पष्ट और सीधा उत्तर दिया है। मोहन भागवत ने साफ कहा, “हिंदू धर्म भी पंजीकृत नहीं है।” यह उस पूरी मानसिकता पर प्रहार है जो मानती है कि भारत की हर सांस्कृतिक चेतना को सरकारी मुहर से ही वैधता मिलेगी। भागवत ने कहा कि संघ 1925 में स्थापित हुआ था। क्या तब अंग्रेजों से जाकर पंजीकरण कराया जाता? साथ ही स्वतंत्रता के बाद भी भारत के संविधान ने कभी यह अनिवार्य नहीं किया कि हर स्वैच्छिक संगठन सरकारी रजिस्टर में दर्ज हो तभी वह अस्तित्व में रह सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/if-mughal-army-retreated-then-whose-victory-was-it-amohan-bhagwat-referring-to-haldighati-battle" target="_blank">अगर मुगल सेना हटी तो जीत किसकी? Haldighati का जिक्र कर बोले RSS प्रमुख Mohan Bhagwat</a></h3><div>असल में कांग्रेस की समस्या संघ के पंजीकरण से नहीं, संघ के प्रभाव से है। जिस संगठन ने बिना सरकारी धन, बिना विदेशी सहायता और बिना सत्ता के सहारे सौ वर्षों तक राष्ट्रजीवन को दिशा दी हो, उससे कांग्रेस की बेचैनी स्वाभाविक है। संघ ने चरित्र निर्माण किया, अनुशासन दिया, समाज को जोड़ा, सेवा का संस्कार दिया और राष्ट्रवाद को जीवन का व्यवहार बनाया। दूसरी ओर कांग्रेस का एक हिस्सा वर्षों तक विदेशी शक्तियों के सामने वैचारिक समर्पण करता रहा। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौते करने वाली राजनीति आज संघ से राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मांग रही है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है?</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260619/12470655304_0_RSS.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;">&nbsp;</div><div>भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिकों को संगठन बनाने की स्वतंत्रता देता है। यह नागरिकों का मौलिक अधिकार है। संविधान कहीं नहीं कहता कि हर सामाजिक संगठन को पहले सरकार के सामने सिर झुकाकर अनुमति लेनी होगी। सोसाइटी कानून, न्यास कानून और अन्य व्यवस्थाएं केवल कानूनी सुविधाओं के लिए हैं, अस्तित्व के लिए नहीं।</div><div><br></div><div>संघ के पंजीकरण प्रमाणपत्र को देखने की चाह रखने वाले प्रियांक खरगे, पवन खेड़ा और कांग्रेस के नेताओं को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में मंत्री होना कानून से ऊपर होना नहीं होता। किसी मंत्री की व्यक्तिगत इच्छा कानून नहीं बन जाती। यदि कानून में अनिवार्यता नहीं है, तो केवल राजनीतिक नफरत के कारण किसी संगठन को कटघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता। यही विधि का शासन है, यही संविधान की आत्मा है।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260619/12473944550_0_RSS.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;">&nbsp;</div><div>संघ को समझने के लिए उसकी मूल प्रकृति को समझना आवश्यक है। संघ कोई पारंपरिक कार्यालयी संस्था नहीं, बल्कि समाज आधारित आंदोलन है। डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार ने इसे सदस्यता कार्ड, शुल्क और कागजी ढांचे की बजाय शाखा, संस्कार और स्वयंसेवा के आधार पर खड़ा किया। आज भी कोई व्यक्ति शाखा में जाकर स्वयंसेवक बन सकता है। यही कारण है कि संघ समाज के बीच रहता है, किसी फाइल में बंद नहीं रहता। संघ अपने आरम्भकाल से ही सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन के रूप में आगे बढ़ता रहा है। संघ में औपचारिक सदस्यता और कठोर संस्थागत नियंत्रण नहीं होता। शाखाएं अपने संसाधनों से चलती हैं और संगठन का संचालन सामाजिक सहभागिता से होता है।</div><div><br></div><div>इतिहास यह भी बताता है कि संघ को बार-बार राजनीतिक दमन का सामना करना पड़ा। महात्मा गांधी की हत्या के बाद प्रतिबंध लगाया गया, आपातकाल में हजारों स्वयंसेवक जेल भेजे गए, बाबरी प्रकरण के बाद भी हमला हुआ। लेकिन हर बार संघ और अधिक मजबूत होकर निकला। इसका कारण यह था कि संघ की जड़ें सत्ता में नहीं, समाज में हैं। मोहन भागवत ने भी याद दिलाया कि सरकारें संघ पर प्रतिबंध लगाती रहीं, इसका अर्थ ही यह है कि सरकारें संघ के अस्तित्व और प्रभाव को मानती रही हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो संघ विरोधी बार बार पारदर्शिता और कराधान का मुद्दा उठाते हैं। लेकिन वह जानबूझकर न्यायालयों के निर्णयों को नजरअंदाज करते हैं। “गुरु दक्षिणा” को लेकर न्यायालयों ने पारस्परिकता के सिद्धांत को स्वीकार किया था। पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट माना कि स्वयंसेवकों का स्वैच्छिक योगदान करयोग्य आय नहीं माना जा सकता। संघ ने कभी कानून से छूट नहीं मांगी। उसने केवल वही स्वीकार किया जो कानून कहता है। कानून जहां लागू होता है, वहां संघ के सहयोगी संगठन विधिवत पंजीकृत हैं, लेखा परीक्षण कराते हैं और अपने प्रतिवेदन भी प्रकाशित करते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260619/12480719068_0_RSS.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;"></div><div>&nbsp;</div><div>यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस का पाखंड खुलकर सामने आता है। दशकों तक सत्ता में रहने वाली पार्टी आज संघ से पारदर्शिता मांग रही है, जबकि स्वयं उसके इतिहास पर आपातकाल, भ्रष्टाचार, परिवारवाद और विदेशी प्रभाव के आरोप लगे हुए हैं। जो दल लोकतंत्र को कुचलने के लिए आपातकाल थोप सकता है, वह आज लोकतांत्रिक मूल्यों का उपदेश दे रहा है। यह राजनीतिक हास्य से अधिक कुछ नहीं।</div><div><br></div><div>मोहन भागवत ने बिल्कुल सही कहा कि संघ खुलकर काम करता है, किसी गुप्त संगठन की तरह नहीं। लाखों शाखाएं, हजारों सेवा प्रकल्प, शिक्षा, ग्राम विकास, आपदा राहत, सामाजिक समरसता, वनवासी कल्याण, गौ सेवा, पर्यावरण संरक्षण, संघ का हर कार्य समाज के सामने है। यदि संघ में कुछ छिपा होता तो वह सौ वर्षों तक सार्वजनिक जीवन में इतने व्यापक रूप से स्वीकार नहीं किया जाता।</div><div><br></div><div>दरअसल संघ की सबसे बड़ी शक्ति यही है कि उसने राष्ट्रवाद को केवल नारों तक सीमित नहीं रखा। जब भी देश पर संकट आया, स्वयंसेवक सबसे पहले खड़े दिखाई दिए। विभाजन के समय राहत कार्य हो, प्राकृतिक आपदाएं हों, महामारी का दौर हो या सीमा पर सैनिकों के परिवारों की सहायता, संघ के कार्यकर्ता हर जगह सक्रिय रहे। यही कारण है कि भारत का सामान्य नागरिक संघ को कागजी संस्था नहीं, राष्ट्रीय चेतना का प्रहरी मानता है।</div><div><br></div><div>संघ को लेकर सबसे अधिक भ्रम उन लोगों में है जो भारत को केवल सत्ता और चुनाव की नजर से देखते हैं। संघ सत्ता के लिए नहीं, समाज के लिए काम करता है। यही कारण है कि वह राजनीतिक उतार चढ़ाव से अप्रभावित रहता है। मोहन भागवत ने हाल में कहा था कि संघ दुनिया का सबसे बड़ा स्वयंसेवी संगठन है, लेकिन सबसे अधिक गलत समझा जाने वाला संगठन भी है। यह कथन बिल्कुल सही है। जिन लोगों ने कभी शाखा देखी ही नहीं, वह संघ पर सबसे अधिक आरोप लगाते हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो आज आवश्यकता इस बात की है कि संघ को राजनीतिक चश्मे से नहीं, उसके कार्यों से देखा जाए। यदि कोई संगठन बिना सरकारी सहायता के, बिना विदेशी धन के और बिना सत्ता के दबाव के सौ वर्षों तक राष्ट्रसेवा करता है, तो उसकी वैधता किसी सरकारी रजिस्टर से नहीं, जनता के विश्वास से तय होती है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस और संघ विरोधियों को यह समझ लेना चाहिए कि संघ को डराकर, बदनाम करके या कानूनी भ्रम फैलाकर कमजोर नहीं किया जा सकता। संघ की शक्ति कागजों से नहीं, करोड़ों स्वयंसेवकों के समर्पण से आती है। उसका अस्तित्व किसी मंत्री की कृपा पर नहीं, भारत की सांस्कृतिक आत्मा पर आधारित है। जो सौ वर्षों से राष्ट्र को सब कुछ दे रहा हो, उसे अपना परिचय देने की जरूरत नहीं पड़ती। राष्ट्र स्वयं उसका परिचय बन जाता है।</div><div><br></div><div>साथ ही संघ को किसी वंशवादी राजनीति से चरित्र प्रमाणपत्र लेने की आवश्यकता नहीं है। जिस संगठन ने सौ वर्षों तक बिना सत्ता, बिना सरकारी संरक्षण और बिना विदेशी सहारे के राष्ट्रजीवन को दिशा दी हो, उसकी पहचान किसी सरकारी मुहर से नहीं होती। संघ का परिचय उसके करोड़ों स्वयंसेवकों की तपस्या है, उसकी शाखाओं का अनुशासन है, उसकी सेवा का विस्तार है और भारत माता के प्रति उसका अखंड समर्पण है। राजनीतिक दल सत्ता से बनते और मिट जाते हैं, लेकिन संघ जैसी राष्ट्रशक्ति पीढ़ियों तक समाज की चेतना में जीवित रहती है। संघ को मिटाने के सपने देखने वाले आते जाते रहे, लेकिन संघ आज भी उतना ही दृढ़, उतना ही प्रभावशाली और उतना ही राष्ट्रनिष्ठ खड़ा है, क्योंकि उसका आधार सत्ता नहीं, भारत की सनातन आत्मा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, जिस संगठन के स्वयंसेवक प्रतिदिन यही मंत्र जपते हों, “तेरा वैभव अमर रहे मां, हम दिन चार रहें ना रहें”, उससे अपना पंजीकरण कराने को कहना कांग्रेस नेताओं की राजनीतिक हताशा ही नहीं, बल्कि उनकी बेवकूफी भी प्रदर्शित करता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 12:51:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/rss-registration-controversy-explained</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/19/mohan-bhagwat_large_1251_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दलीय टूट-फूट के सवालों से मुठभेड़ जरूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/it-is-essential-to-confront-the-issues-surrounding-party-fragmentation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>डॉक्टर लोहिया ने कहा तो था समाजवादियों से, लेकिन लगता है कि उनकी बात आज के विपक्षी दलों ने ज्यादा शिद्दत से मान ली है। लोहिया ने कहा था, सुधरो या टूट जाओ। लोहिया की इस अपील को उनके समाजवादी चेलों ने तो माना ही, अब गैर समाजवादी अनुयायी भी स्वीकार कर चुके हैं। चार मई को पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद सबसे बड़ी टूट उस ममता की पार्टी में हुई, जिन्हें राजनीतिक मैदान का योद्धा माना जाता था। जो झुकना नहीं जानतीं। पहले उनके 80 में से 53 विधायक टूट गए और विधानसभा में उन्होंने अपना अलग गुट बना लिया। इसके बाद लोकसभा के उनके 29 में से बीस सांसद भी टूट गए। दिलचस्प यह है कि उन्होंने एक अनाम-सी पार्टी नेशनल सिटिजन्स पार्टी में अपना विलय कर लिया। ममता की राह पर उद्धव ठाकरे की शिवसेना के भी सांसद चल पड़े हैं और हो सकता है कि इन पंक्तियों के प्रकाशित होने तक उनके नौ में से छह लोकसभा सांसद पाला बदलकर एकनाथ शिंदे की शिवसेना के धनुष पर तीर चढ़ा रहे होंगे। सुगबुगाहट तमिलनाडु की द्रविड़ मुनेत्र कषगम् के संसदीय दल में भी टूट-फूट की दिख रही है। इस बीच सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के नेता ओमप्रकाश राजभर ने अखिलेश यादव की अगुआई वाली समाजवादी पार्टी में भी टूट की भविष्यवाणी जता दी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय राजनीति में दल-बदल कोई नई बात नहीं है। अतीत में भी दल-बदल होते रहे हैं। हरियाणा में तो तकरीबन पूरा विधायक दल ही दूसरे दल में समा गया था। उसी के बाद से दलबदल के लिए भारतीय राजनीति में ‘आयाराम गयाराम’ का मुहावरा ही चल पड़ा था। लेकिन पश्चिम बंगाल के चुनावों के बाद जिस तरह दल-बदल या दलों में टूटफूट हो रहा है, वह अप्रत्याशित है। इतने बड़े पैमाने पर राजनीतिक दलों में भगदड़ पहले नहीं हुई थी। पहले किसी एक या दो दल में ऐसा होता था। ऐसा लग रहा है कि जैसे बीजेपी विरोधी दलों को दल-बदल या टूट-फूट वाली छूत की बीमारी लग गई है। इस प्रभावित दल इस टूट-फूट के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनका आरोप है कि बीजेपी टूटने वाले नेताओं को मोटी रकम का लालच दे रही है। उनका यह भी आरोप है कि संवैधानिक सुधारों के लिए चूंकि बीजेपी को संसद के दोनों सदनों में दो तिहाई बहुमत की जरूरत है, इसलिए वह धन और बाहुबल का लालच देकर दलों को तोड़ रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/tmc-rebel-mps-merge-with-ncpi-political-crisis" target="_blank">गुमनाम पार्टी में क्यों शामिल हुए TMC के नामी सांसद? दलबदल विरोधी नारे वाला दल क्यों बना तृणमूल के बागियों का नया ठिकाना?</a></h3><div>एक बारगी मान भी लें कि बीजेपी की शह पर ये टूट-फूट हो रही है तो एक प्रश्न जरूर उठता है कि आखिर राजनीतिक दलों ने कैसे नेताओं को अपना सांसद या विधायक बनाने के लिए चुना है? क्या उनके चयन में कोई गलती रही? सवाल यह भी उठता है कि जो टूट रहे हैं, क्या सांसद या विधायक बनाने को लेकर जब उनका चयन किया जा रहा था, तो उनकी कौन की खासियत देखी गई थी? क्या दल के प्रति न उनकी निष्ठा, उनके चरित्र आदि का ध्यान नहीं रखा गया। सवाल यह भी उठता है कि क्या बाहुबल या धन बल ही उनके चयन की बड़ी योग्यता मानी गई। इन सवालों का ईमानदारी से जवाब प्रभावित दल भले ही नहीं दे, लेकिन यह छुपी हुई बात नहीं है कि भारतीय राजनीति में संसद या विधानसभा में नुमाइंदगी के लिए दलीय निष्ठा की बजाय दूसरे कारकों का ज्यादा ध्यान रखा जा रहा है। इसमें चुनाव जीतने की क्षमता, चुनाव में खर्च करने की सामर्थ्य और जरूरत बड़ने पर पार्टी के लिए धन और बाहुबल के साथ खड़ा होने की शक्ति भी देखी जाती है। कई बार तो सिर्फ पैसे के दम पर ही टिकट हासिल कर लिए जाते हैं। यही वजह है कि मौका मिलते ही ये नेता अपनी निष्ठा बदलने में देर नहीं लगाते।&nbsp;</div><div><br></div><div>निश्चित तौर पर राजनीतिक दलों के गठन की बुनियाद उनका राजनैतिक और सामाजिक विचार और सिद्धांत होता है। इसके बावजूद लगातार महंगी होती चुनाव प्रक्रिया ने विचारधारा की राजनीति को पीछे खिसका दिया है। विचारधारा की दुहाई तभी तक दी जाती है, जब तक उसकी राह में धन बल या बाहुबल नहीं आता, जब तक कि सत्ता उससे दूर रहती है। अगर विचारधारा से विचलन के बाद सत्ता आती दिखती है तो राजनीतिक दल और नेता भी अपनी उस विचारधारा को कुछ वक्त के लिए ताक पर रख देते हैं। सिद्धांत और निष्ठाएं भी तब तक के लिए टाल दी जाती हैं। जब दलीय आधार पर ऐसा होता है तो निजी स्तर पर किसी सांसद और विधायक को आर्थिक या सत्ता में भागीदारी का मौका मिलेगा तो वह क्यों न टूटेगा। सवाल यह है कि जब दल और उसका अगुआ ही अपनी निष्ठा और विचारधारा को सत्ता के लिए किनारे रख देगा तो मौका मिलने पर उसका सांसद और विधायक ऐसा क्यों नहीं कर सकता। उद्धव ठाकरे के संसदीय दल में बिखराव की बड़ी वजह सत्ता के लिए पार्टी के सिद्धांतों से समझौता और कांग्रेस का साथ लेना रहा है।</div><div><br></div><div>टूट रहे सांसदों को लेकर आरोप लगाने वाले दलों को भी सोचना होगा कि आखिर उन्होंने किस तरह के लोगों को चुना? सवाल यह है कि जब पैसे लेकर टिकट दिए जाएंगे, जब दल और विचारधारा की निष्ठा के बजाय चुनावी टिकट हासिल करने के अन्य कारण होंगे तो फिर इस प्रक्रिया से चुनकरआए सांसदों और विधायकों की खऱीद-बिक्री पर सवाल कैसे उठाए जा सकते हैं? कैसे उन्हें दलीय निष्ठा के प्रति बांधे रखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>दलीय टूट-फूट का अभी कोई बड़ा नुकसान भले ही नहीं दिख रहा हो, लेकिन आने वाले दिनों में इसका एक बड़ा हश्र लोक विश्वास के दरकने के रूप में दिख सकता है। आज का मतदाता बहुविध सूचनाओं के तमाम स्रोतों से लैस है। उसकी राजनीतिक समझ पहले के मीडिया क्रांति केदौर के पहले के मतदाताओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकसित है। उसका सामान्य ज्ञान कमजोर भले ही हो सकता है, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और उसमें आ रहे निष्ठागत बदलावों की पृष्ठभूमि को वह समझ रहा है। ऐसे में उसका भरोसा मौजूदा राजनीतिक तंत्र से चूक सकता है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उसका भरोसा टूटना लोकतंत्र के लिए खतरनाक हो सकता है। दल बदलने वाले अपने प्रतिनिधि के बारे में वह सवाल उठा सकता है कि उसने जिस सोच के साथ उसे वोट दिया, उसका प्रतिनिधि उस सोच के साथ गद्दारी कर रहा है। कई बार स्थानीय कारणों के साथ ही अपनी वैचारिक निष्ठा के चलते भी अपना मत देता है। हो सकता है कि राष्ट्रीय स्तर पर किसी दल विशेष को बड़ा समर्थन मिला हो, लेकिन उसी दल विशेष के किसी स्थानीय प्रतिनिधि को स्थानीय निष्ठाओं, जरूरतों और कारकों के साथ ही वैचारिक कारणों से मतदाताओं का समर्थन नहीं मिलता। मान लेते हैं कि राष्ट्रीय या राज्य स्तर पर किसी दल विशेष को भारी समर्थन मिला है, लेकिन स्थानीय स्तर पर इसके ठीक उलट किसी अन्य दल या उसके प्रतिनिधि को समर्थन मिला है। इसका मतलब यह है कि राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर समर्थन हासिल करने वाले दल के कार्यक्रमों और योजनाओं की बजाय स्थानीय योजनाओं को लेकर स्थानीय लोगों की अपनी अलग दृष्टि है, या अपनी अलग चाहत है। स्थानीय मतदाताओं का भरोसा उसे इसी वजह से मिला है। लेकिन उसका प्रतिनिधि अपनी निष्ठा बदल लेता है कि स्थानीय मतदाता खुद को आहत और ठगा हुआ महसूस कर सकता है। चूंकि इन दिनों दलीय टूट-फूट व्यापक स्तर पर हो रही है, इसलिए मतदाताओं में इसका व्यापक असर पड़ सकता है। इसके चलते मतदाता आहत महसूस कर स0कते हैं, विश्वासघात भी मान सकते हैं। इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर भरोसा कमजोर हो सकता है। मौजूदा राजनीतिक तंत्र को मतदाताओं के मनमिजाज को इस नजरिए से भी समझना होगा। भारतीय लोकतंत्र को भरोसेमंद बनाने की राह राजनीतिक दलों को ही खोजना होगा। क्योंकि लोहिया की टूटने की अपील के पीछे भी सुधार को खोजना था। लेकिन सवाल यह है कि क्या राजनीतिक दल संपूर्णता में इस सवाल से मुठभेड़ करने को तैयार हैं?</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 10:59:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/it-is-essential-to-confront-the-issues-surrounding-party-fragmentation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/19/indian-politics_large_1059_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Indo Pacific Command नाम से ट्रंप को क्या दिक्कत थी? क्या अब बदल गयी है अमेरिका की Asia Policy?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/america-removes-indo-from-command-what-it-means-for-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका ने एक बार फिर अपने सबसे महत्वपूर्ण सामरिक सैन्य कमान का नाम बदल दिया है। आठ वर्ष पहले डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने अमेरिकी पैसिफिक कमांड का नाम बदलकर इंडो-पैसिफिक कमांड किया था। तब यह कदम चीन के उभार के खिलाफ भारत को अमेरिकी रणनीति के केंद्र में लाने की घोषणा के रूप में देखा गया था। अब उसी कमान से "इंडो" शब्द हटाकर उसे फिर से पैसिफिक कमांड बना देना वैश्विक कूटनीति में नए संकेत पैदा कर रहा है। यह बदलाव ऐसे समय हुआ है जब भारत-अमेरिका संबंधों में व्यापार, रूस, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया को लेकर तनाव दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>अमेरिकी रक्षा विभाग का कहना है कि केवल नाम बदला है, मिशन नहीं। उसका दावा है कि कमान का कार्यक्षेत्र अब भी भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला रहेगा और क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ "मुक्त और खुला क्षेत्र" बनाए रखने की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आएगी। लेकिन सामरिक दुनिया में नाम केवल नाम नहीं होते। वे प्राथमिकताओं, शक्ति संतुलन और भविष्य की दिशा के संकेत भी देते हैं। यही कारण है कि इस बदलाव ने नई बहस छेड़ दी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/global-diplomatic-implications-of-the-highly-anticipated-meeting-between-trump-and-modi-in-france" target="_blank">फ्रांस में हुई ट्रंप-मोदी की बहुप्रतीक्षित मुलाकात के वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थ</a></h3><div>दरअसल, वर्ष 2018 में जब तत्कालीन अमेरिकी रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने "इंडो-पैसिफिक" अवधारणा को आगे बढ़ाया था, तब उसका सीधा संदेश यह था कि हिंद महासागर और प्रशांत महासागर अब एक साझा रणनीतिक क्षेत्र हैं। चीन की बढ़ती समुद्री ताकत, दक्षिण चीन सागर में उसका आक्रामक रवैया, बेल्ट एंड रोड परियोजना के जरिये एशिया-अफ्रीका तक उसका विस्तार और हिंद महासागर में उसकी बढ़ती मौजूदगी ने अमेरिका को नई सामरिक रचना बनाने पर मजबूर किया था। इसी सोच से क्वॉड समूह को भी नई ऊर्जा मिली, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं।</div><div><br></div><div>अब जब "इंडो" शब्द हटाया गया है, तो सवाल उठ रहा है कि क्या अमेरिका अपनी प्राथमिकताएं बदल रहा है? क्या ट्रंप प्रशासन चीन के साथ सीधे टकराव के बजाय समझौते का रास्ता तलाश रहा है? क्या अमेरिका अब एशिया में अपने दायित्व कम करना चाहता है? क्या भारत अब अमेरिकी रणनीति का केंद्रीय स्तंभ नहीं रहा? यही वह प्रश्न हैं जिन पर दुनिया भर के सामरिक विशेषज्ञ चर्चा कर रहे हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260618/16260747950_0_Trump Modi Meeting.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;"><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस पूरे घटनाक्रम का समय भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह फैसला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और ट्रंप की मुलाकात से ठीक पहले सामने आया। कभी दोनों नेताओं की दोस्ती विशाल जनसभाओं और गर्मजोशी भरे आलिंगन की प्रतीक मानी जाती थी, लेकिन इस बार माहौल अलग था। व्यापारिक शुल्कों को लेकर विवाद, रूस से भारत की ऊर्जा खरीद पर अमेरिकी नाराजगी, भारतीय पेशेवरों के लिए वीजा संबंधी दिक्कतें, पाकिस्तान के साथ अमेरिका की नई नजदीकियां और पश्चिम एशिया में अमेरिकी सैन्य कार्रवाइयों से भारतीय नाविकों की मौत जैसे मुद्दों ने भारत और अमेरिका के रिश्तों में खटास पैदा की है।</span></div><div><br></div><div>विशेष रूप से पाकिस्तान को अमेरिकी समर्थन को लेकर भारत की चिंता बढ़ी है। साथ ही ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप ने कई बार दावा किया कि उन्होंने भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध रुकवाया। भारत ने इस दावे को सिरे से खारिज करते हुए स्पष्ट कहा कि युद्धविराम दोनों सेनाओं के बीच सीधे संवाद से हुआ था, किसी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता से नहीं। इसके बावजूद अमेरिका का यह रुख नई दिल्ली के लिए असहजता का कारण बना हुआ है।</div><div><br></div><div>हालांकि अमेरिकी प्रशासन के समर्थक यह तर्क दे रहे हैं कि इंडो पैसिफिक कमांड संबंधी बदलाव को जरूरत से ज्यादा नहीं देखना चाहिए। उनका कहना है कि अमेरिका अभी भी चीन के खिलाफ अपनी सैन्य तैयारी बढ़ा रहा है। अमेरिकी कमांडर सैमुअल पपारो ने चीन के विरुद्ध सैन्य प्रतिरोध मजबूत करने के लिए विशाल रक्षा बजट की मांग की है। अमेरिका और भारत के बीच रक्षा तकनीक, खुफिया साझेदारी और संयुक्त सैन्य अभ्यास भी लगातार जारी हैं। इसलिए केवल नाम बदलने से रणनीति बदल गई है, ऐसा निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी।</div><div><br></div><div>फिर भी यह तर्क पूरी तरह आश्वस्त नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रतीकों की अपनी शक्ति होती है। जब अमेरिका ने "इंडो" शब्द जोड़ा था, तब उसने दुनिया को यह संदेश दिया था कि भारत अब एशियाई शक्ति संतुलन का अनिवार्य हिस्सा है। अब उसी शब्द को हटाना स्वाभाविक रूप से यह आभास देता है कि अमेरिका की सोच में बदलाव आया है। यही कारण है कि कई भारतीय रणनीतिक विशेषज्ञ इसे भारत के लिए चेतावनी के रूप में देख रहे हैं।</div><div><br></div><div>हालांकि इस पूरे विवाद के बीच एक बड़ी सच्चाई यह भी है कि दुनिया की कोई भी महाशक्ति केवल नाम बदलकर भूगोल और वास्तविकता को नहीं बदल सकती। कागजों पर सीमाएं और नाम बदले जा सकते हैं, लेकिन समुद्रों, सभ्यताओं और इतिहास की वास्तविक शक्ति को मिटाना संभव नहीं होता। अमेरिका चाहे इंडो शब्द हटा दे या कोई और देश किसी क्षेत्र को नए नाम से पुकारने लगे, इससे भारत की सामरिक स्थिति कमजोर नहीं हो जाती। हिंद महासागर आज भी भारत की प्राकृतिक सामरिक परिधि है और एशिया की शक्ति संरचना में भारत की भूमिका स्थायी वास्तविकता है। सच यही है कि भारत और हिंद का जो दायरा हजारों वर्षों की सभ्यता, व्यापार, समुद्री संपर्क और भू-राजनीतिक प्रभाव से बना है, उसे समेटना किसी भी शक्ति के लिए संभव नहीं है। नाम बदले जा सकते हैं, लेकिन भारत की केंद्रीय उपस्थिति को समाप्त नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>फिर भी सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है कि क्या "इंडो" शब्द हटने से भारत के हितों पर वास्तविक असर पड़ेगा? इसका उत्तर सीधा भी है और जटिल भी। तात्कालिक रूप से देखें तो भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग, सामरिक साझेदारी और आर्थिक संबंधों पर इसका कोई प्रत्यक्ष प्रभाव नहीं दिखता। भारत अब भी हिंद महासागर की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है और चीन को संतुलित करने में उसकी भूमिका अपरिहार्य बनी हुई है। अमेरिका भी यह समझता है कि भारत के बिना एशिया में चीन को चुनौती देना संभव नहीं। इसलिए केवल नाम बदल जाने से भारत की सामरिक उपयोगिता समाप्त नहीं हो जाती।</div><div><br></div><div>लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से देखें तो यह बदलाव मानसिक और कूटनीतिक संकेत अवश्य देता है। यदि अमेरिका धीरे-धीरे "इंडो-पैसिफिक" अवधारणा से दूरी बनाता है, क्वॉड की सक्रियता घटती है और चीन के साथ समझौते की नीति अपनाई जाती है, तो भारत को अपनी रणनीति नए सिरे से गढ़नी होगी। इसका अर्थ यह होगा कि नई दिल्ली को आत्मनिर्भर सामरिक ढांचे, बहुध्रुवीय कूटनीति और क्षेत्रीय साझेदारियों पर अधिक जोर देना पड़ेगा।</div><div><br></div><div>असल में यह पूरा घटनाक्रम भारत के लिए एक बड़ा संदेश है। विश्व राजनीति में स्थायी मित्रता नहीं होती, केवल स्थायी हित होते हैं। अमेरिका अपने हितों के अनुसार रणनीति बदल सकता है। इसलिए भारत को भी भावनात्मक कूटनीति से आगे बढ़कर कठोर यथार्थवादी दृष्टिकोण अपनाना होगा। यह बात सही है कि "इंडो" शब्द हटने से भारत की शक्ति कम नहीं होती, लेकिन यह अवश्य याद दिलाता है कि वैश्विक मंच पर सम्मान केवल प्रतीकों से नहीं, बल्कि अपनी वास्तविक सामरिक और आर्थिक ताकत से मिलता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 15:55:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/america-removes-indo-from-command-what-it-means-for-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/18/us-pacific-command_large_1555_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विश्व शांति एवं संतुलन के लिए आत्ममंथन हो जी-7 बैठक में]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-g7-meeting-should-focus-on-introspection-regarding-world-peace-and-balance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>फ्रांस में आयोजित जी-7 शिखर सम्मेलन पर इस समय पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था, अंतरराष्ट्रीय राजनीति, व्यापार, जलवायु परिवर्तन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऊर्जा सुरक्षा और युद्ध जैसे अनेक महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा के लिए दुनिया की सात प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं का यह मंच एकत्रित हुआ है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या जी-7 आज भी उतना ही प्रासंगिक और प्रभावशाली है, जितना उसकी स्थापना के समय था? क्या यह संगठन वास्तव में वैश्विक समस्याओं के समाधान का मंच बन पाया है अथवा यह कुछ शक्तिशाली देशों के हितों की रक्षा का माध्यम बनकर रह गया है? क्या इस मंच की प्रासंगिकता एवं उपयोगिता को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अपने स्वार्थों के चलते धुंधलाने में लगे हैं? विश्व में शांति स्थापना, संतुलित आर्थिक विकास और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बने विभिन्न वैश्विक संगठनों की सफलता का मूल्यांकन उनके परिणामों से होता है, न कि उनके घोषणापत्रों से। दुर्भाग्य से जी-7 के संदर्भ में यह प्रश्न बार-बार उठता रहा है कि उसके निर्णयों और घोषणाओं का वास्तविक प्रभाव कितना है। पिछले वर्षों में रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया का संकट, वैश्विक आर्थिक अस्थिरता, जलवायु परिवर्तन की चुनौती और बढ़ती व्यापारिक प्रतिस्पर्धा जैसी समस्याओं के समाधान में यह संगठन अपेक्षित भूमिका निभाने में सफल नहीं दिखा है।</div><div><br></div><div>जी-7 में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और जापान शामिल हैं, लेकिन व्यवहारिक रूप से इसकी दिशा और नीति निर्धारण पर अमेरिका का प्रभाव सबसे अधिक दिखाई देता है। विशेष रूप से राष्ट्रपति ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की विदेश नीति ने सहयोग के बजाय दबाव और वर्चस्व की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। ट्रंप ने अपने सहयोगी देशों के साथ भी कई बार ऐसा व्यवहार किया है, मानो वे साझेदार नहीं बल्कि अमेरिकी नीतियों का अनुसरण करने वाले अनुयायी हों। टैरिफ युद्ध, व्यापारिक प्रतिबंध, रक्षा व्यय को लेकर दबाव और अनेक एकतरफा निर्णयों ने सदस्य देशों के बीच अविश्वास बढ़ाया है। विशेषतः ईरान- इजरायल युद्ध ने समूची दुनिया की अर्थव्यवस्था का धराशायी कर दिया और यह अब अमेरिका के कारण ही हुआ है क्योंकि पिछले कुछ महीनों में हिंसक संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को एक व्यापक युद्ध की आशंका से भर दिया था। ईरान, इजरायल और इस क्षेत्र के अनेक गैर-राज्यीय समूह आमने-सामने खड़े दिखाई दे रहे थे। इस संघर्ष का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र होर्मुज जलमार्ग बन गया था, जहां से विश्व के लगभग पांचवें हिस्से का तेल गुजरता है। जी-7 समूह के देश भी इसको लेकर बंटे हुए थे।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/global-diplomatic-implications-of-the-highly-anticipated-meeting-between-trump-and-modi-in-france" target="_blank">फ्रांस में हुई ट्रंप-मोदी की बहुप्रतीक्षित मुलाकात के वैश्विक कूटनीतिक निहितार्थ</a></h3><div>यही कारण है कि जी-7 के भीतर आज पहले जैसी एकजुटता दिखाई नहीं देती। फ्रांस, जर्मनी, कनाडा और जापान जैसे देश कई मुद्दों पर अमेरिका से अलग दृष्टिकोण रखते हैं। ईरान युद्ध ही नहीं, बल्कि जलवायु परिवर्तन के प्रश्न पर, वैश्विक व्यापार के नियमों पर और बहुपक्षीय संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में यह अपेक्षा करना कठिन है कि यह संगठन विश्व की जटिल समस्याओं के समाधान के लिए कोई सर्वमान्य और प्रभावी रणनीति प्रस्तुत कर पाएगा। इस सम्मेलन में भारत की उपस्थिति विशेष महत्व रखती है। भारत भले ही जी-7 का सदस्य न हो, लेकिन उसकी बढ़ती आर्थिक शक्ति, वैश्विक प्रतिष्ठा और विकासशील देशों के प्रतिनिधि स्वरूप ने उसे इस मंच का एक महत्वपूर्ण सहभागी बना दिया है। यह अवसर केवल भारत की उपलब्धियों को प्रस्तुत करने का नहीं, बल्कि उन विकासशील और निर्धन देशों की आकांक्षाओं को मुखर करने का भी है, जिनकी आवाज अक्सर वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में दब जाती है।</div><div><br></div><div>आज अफ्रीका, एशिया और लैटिन अमेरिका के अनेक देश आर्थिक संकट, खाद्य असुरक्षा, जलवायु आपदाओं और ऋण के बोझ से जूझ रहे हैं। उनकी प्राथमिकताएं जी-7 देशों की प्राथमिकताओं से भिन्न हैं। इसलिए भारत को यह प्रश्न उठाना चाहिए कि क्या विश्व की दिशा तय करने का अधिकार केवल कुछ विकसित देशों तक सीमित रहना चाहिए? क्या वैश्विक शासन व्यवस्था को अधिक लोकतांत्रिक, समावेशी और प्रतिनिधिक नहीं बनाया जाना चाहिए? यह समय विकासशील देशों की आवाज को मजबूती देने और वैश्विक दक्षिण (ग्लोबल साउथ) की चिंताओं को केंद्र में लाने का है। जी-7 की प्रासंगिकता पर सबसे बड़ा प्रश्न उसकी प्रभावशीलता को लेकर है। यदि कोई संगठन विश्व की प्रमुख समस्याओं को रोकने या सुलझाने में सक्षम नहीं है, तो उसकी उपयोगिता स्वतः प्रश्नों के घेरे में आ जाती है। रूस-यूक्रेन युद्ध वर्षों से जारी है। पश्चिम एशिया लगातार अशांत बना हुआ है। आतंकवाद और कट्टरता की चुनौतियां बनी हुई हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण पूरी दुनिया अभूतपूर्व संकटों का सामना कर रही है। इसके बावजूद वैश्विक नेतृत्व देने का दावा करने वाले मंचों की उपलब्धियां सीमित दिखाई देती हैं।</div><div><br></div><div>हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम होने तथा शांति और सहमति की दिशा में बढ़ने की खबरों ने पूरी दुनिया को राहत दी है। लंबे समय से चल रहे तनाव के कारण पश्चिम एशिया में अस्थिरता बढ़ रही थी और इसका प्रभाव वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ रहा था। जैसे ही दोनों देशों के बीच समझौते और संवाद की संभावनाएं मजबूत हुईं, दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में सकारात्मक संकेत दिखाई दिए। निवेशकों का विश्वास बढ़ा, ऊर्जा बाजार में स्थिरता के संकेत मिले और तेल की कीमतों में नरमी आई। इससे स्पष्ट है कि शांति केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं होती, बल्कि उसका सीधा संबंध वैश्विक आर्थिक स्थिरता और आम नागरिक के जीवन से भी होता है। लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठता है। यदि संवाद और समझौता ही अंततः समाधान का मार्ग था, तो फिर टकराव और तनाव की स्थिति को इतना लंबा क्यों खींचा गया? आखिर राष्ट्रपति ट्रंप को समझौते और सहमति के लिए राजी होने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई? क्या इसके पीछे आर्थिक दबाव थे? क्या वैश्विक बाजारों की चिंता थी? क्या अमेरिकी जनता की अपेक्षाएं थीं? या फिर यह स्वीकारोक्ति थी कि युद्ध और दबाव की राजनीति की भी सीमाएं होती हैं? ये ऐसे प्रश्न हैं जिन पर जी-7 जैसे मंचों में गंभीर चर्चा होनी चाहिए।</div><div><br></div><div>विश्व समुदाय केवल औपचारिक शांति समझौतों से संतुष्ट नहीं हो सकता। आवश्यकता इस बात की है कि शांति स्थायी, विश्वसनीय और न्यायपूर्ण हो। यदि समझौते केवल राजनीतिक छवि निर्माण, चुनावी लाभ या अस्थायी रणनीतिक उद्देश्यों के लिए किए जाते हैं, तो वे लंबे समय तक टिक नहीं पाते। जी-7 को यह सुनिश्चित करने की दिशा में पहल करनी चाहिए कि विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में होने वाले शांति प्रयास वास्तविक हों और उनका उद्देश्य मानवता के हितों की रक्षा करना हो। आज वैश्विक व्यवस्था एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है। दुनिया अब एकध्रूवीय नहीं रही। भारत, चीन, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाएं वैश्विक शक्ति संतुलन को नया स्वरूप दे रही हैं। ऐसे समय में जी-7 को भी अपनी कार्यशैली और दृष्टिकोण में परिवर्तन करना होगा। यदि यह मंच केवल अमेरिकी नेतृत्व और पश्चिमी हितों का प्रतिनिधि बना रहेगा, तो इसकी स्वीकार्यता और प्रभावशीलता लगातार घटती जाएगी।</div><div><br></div><div>आवश्यकता इस बात की है कि जी-7 स्वयं को अधिक समावेशी बनाए, विकासशील देशों को निर्णय प्रक्रिया में अधिक स्थान दे, आर्थिक न्याय और जलवायु न्याय के प्रश्नों पर ठोस पहल करे तथा वैश्विक शांति को सर्वाेच्च प्राथमिकता प्रदान करे। अमेरिका को भी यह समझना होगा कि नेतृत्व और प्रभुत्व में अंतर होता है। नेतृत्व विश्वास अर्जित करता है, जबकि प्रभुत्व विरोध को जन्म देता है। फ्रांस में हो रहा यह सम्मेलन केवल आर्थिक या राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा का मंच नहीं होना चाहिए, बल्कि यह आत्ममंथन का अवसर भी बनना चाहिए। जी-7 को यह विचार करना होगा कि बदलती दुनिया में उसकी भूमिका क्या है और वह किस प्रकार अधिक उपयोगी, प्रभावी और विश्वसनीय बन सकता है। यदि यह संगठन अपने भीतर बढ़ते मतभेदों को दूर कर, समानता और सहयोग की भावना के साथ आगे बढ़ता है, तभी वह विश्व समुदाय की अपेक्षाओं पर खरा उतर सकेगा।</div><div><br></div><div>भारत को इस अवसर पर साहसपूर्वक यह संदेश देना चाहिए कि विश्व का भविष्य शक्ति-संतुलन, संवाद, सहयोग और समावेशिता में निहित है। किसी एक देश या समूह की प्रभुत्ववादी सोच से नहीं, बल्कि साझी जिम्मेदारी और साझा विकास की भावना से ही विश्व में स्थायी शांति, आर्थिक स्थिरता और मानव कल्याण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यही इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है और यही जी-7 जैसे मंचों की वास्तविक कसौटी भी।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 13:07:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-g7-meeting-should-focus-on-introspection-regarding-world-peace-and-balance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/18/narendra-modi-g7-summit_large_1307_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जी-7 क्या है? इसके वैश्विक मायने क्या हैं? दुनिया के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-g7-what-is-its-global-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनिया के अस्ताचलगामी शक्तिशाली देशों के रणनीतिक संगठन जी-7 की शिखर बैठक फ्रांस के एवि‍यां (Évian-les-Bains) शहर में 15–17 जून 2026 तक आयोजित हुई, जिसमें महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इसी बैठ में सवा साल मोदी-ट्रंफ की भी मुलाकात हुई, जिसका अपना बहुपक्षीय महत्व है। जी-7 क्या है? इसके वैश्विक मायने क्या हैं? और दुनिया के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? इसकी चुनौतियां क्या हैं और किस बात के लिए आलोचनाएं होती हैं? जवाब निम्नलिखित है-&nbsp;</div><div><br></div><h2># जी-7 क्या है?</h2><div>जी-7 में सात प्रमुख औद्योगिक लोकतांत्रिक देश शामिल हैं: संयुक्त राज्य अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान। इसके अलावा यूरोपीय संघ भी स्थायी भागीदार के रूप में शामिल होता है। यह कोई औपचारिक अंतरराष्ट्रीय संगठन नहीं है; इसका न तो कोई संविधान है और न ही स्थायी सचिवालय।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/g7-summit-2026-major-outcomes-analysis" target="_blank">जी-7 शिखर सम्मेलन में अमेरिका दिखा अलग थलग, दुनिया जता रही मोदी पर भरोसा</a></h3><h2># जी-7 शिखर सम्मेलन का सबसे से बड़ा भू-राजनीतिक संदेश:&nbsp;</h2><div>2026 का फ्रांस जी-7 शिखर सम्मेलन यह संकेत देता है कि विश्व व्यवस्था अब केवल अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा तक सीमित नहीं रही, बल्कि अब तीन बड़े मुद्दे एक साथ उभर रहे हैं:- एक, सुरक्षा (यूक्रेन, मध्य पूर्व); दो, अर्थव्यवस्था (वैश्विक असंतुलन, सप्लाई चेन); और तीन, प्रौद्योगिकी (AI, डिजिटल शासन)। यदि जी-7 इन तीनों क्षेत्रों में साझा रणनीति बना पाता है, तो आने वाले वर्षों में वैश्विक शक्ति-संतुलन पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों और उनके साझेदारों (भारत, दक्षिण कोरिया, ऑस्ट्रेलिया आदि) के पक्ष में झुक सकता है। वहीं चीन और रूस को अपने वैकल्पिक गठबंधनों को और मजबूत करना पड़ेगा।&nbsp;</div><div><br></div><h2># जी 7 शिखर बैठक के प्रमुख वैश्विक मायने&nbsp;</h2><div>जी 7 शिखर बैठक के प्रमुख वैश्विक मायने निम्नलिखित हैं, जिन्हें समझकर और साधकर कोई भी देश आगे बढ़ सकता है।</div><div><br></div><p><b>पहला, यूक्रेन-रूस युद्ध पर पश्चिमी एकजुटता की परीक्षा:</b>&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">जी-7 देशों ने यूक्रेन को समर्थन जारी रखने और रूस पर दबाव बनाए रखने पर चर्चा की। यूक्रेनी राष्ट्रपति Volodymyr Zelensky की मौजूदगी ने संकेत दिया कि यूरोप चाहता है कि युद्ध का समाधान यूक्रेन की शर्तों के अनुरूप हो। लिहाजा इसका प्रभाव यह होगा कि&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">रूस पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ सकता है।</span></p><div>यूरोपीय सुरक्षा ढांचे में नाटो की भूमिका और मजबूत हो सकती है। वैश्विक हथियार एवं रक्षा उद्योग को लाभ मिल सकता है।&nbsp; भू-राजनीतिक संकटों पर सामूहिक प्रतिक्रिया: रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया की स्थिति, समुद्री व्यापार मार्गों की सुरक्षा और प्रतिबंधों जैसे मुद्दों पर जी-7 देशों की सामूहिक रणनीति अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>दूसरा, अमेरिका-ईरान समझौते के बाद पश्चिम एशिया की नई राजनीति:</b> यह सम्मेलन ऐसे समय हो रहा है जब अमेरिका और ईरान के बीच प्रारंभिक शांति समझौता सामने आया है। जी-7 नेताओं ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ की सुरक्षा और ऊर्जा आपूर्ति पर विशेष चर्चा की। इसका&nbsp;&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">प्रभाव यह होगा कि अरब-खाड़ी देशों को राहत मिल सकती है। तेल कीमतों में स्थिरता आ सकती है। ईरान के वैश्विक आर्थिक पुनर्समावेशन की संभावना बढ़ सकती है।</span></div><div><br></div><div><b>तीसरा, चीन के लिए स्पष्ट संदेश: </b>फ्रांस की अध्यक्षता वाले जी-7 का प्रमुख एजेंडा "वैश्विक आर्थिक असंतुलन" और आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा है, जिसे व्यापक रूप से चीन पर निर्भरता कम करने की रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। इसका प्रभाव यह होगा कि चीन पर व्यापारिक दबाव बढ़ सकता है। "फ्रेंड-शोरिंग" और "चाइना+1" रणनीति को बल मिलेगा। भारत, वियतनाम, इंडोनेशिया और मेक्सिको जैसे देशों को निवेश आकर्षित करने का अवसर मिलेगा।&nbsp; हाल के वर्षों में जी-7 चीन की औद्योगिक क्षमता, तकनीकी प्रतिस्पर्धा और वैश्विक निवेश पहलों के विकल्प तैयार करने पर जोर दे रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>चौथा, AI और डिजिटल शासन पर वैश्विक नियमों की दिशाः</b>&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">जी-7 में AI के भविष्य, डिजिटल सुरक्षा और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म नियमन पर भी चर्चा हुई। इसका प्रभाव यह होगा कि AI के लिए अंतरराष्ट्रीय मानक विकसित हो सकते हैं। अमेरिका और यूरोप के बीच तकनीकी सहयोग बढ़ सकता है। चीन की डिजिटल कंपनियों के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), क्वांटम कंप्यूटिंग, साइबर सुरक्षा और महत्वपूर्ण खनिजों (critical minerals) पर साझा मानक विकसित करना अब जी-7 की प्राथमिकताओं में शामिल है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>पांचवां, विश्व अर्थव्यवस्था की दिशा तय करना:</b> जी-7 देश वैश्विक अर्थव्यवस्था का लगभग 29% हिस्सा रखते हैं। इसलिए ब्याज दरों, व्यापार, आपूर्ति श्रृंखलाओं, ऊर्जा और वित्तीय स्थिरता से जुड़े इनके फैसलों का असर पूरी दुनिया पर पड़ता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>छठा: जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा: स्वच्छ ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कमी और ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा पर लिए गए निर्णय विकासशील देशों की नीतियों को भी प्रभावित करते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># विभिन्न देशों पर इस शिखर बैठक के संभावित प्रभाव</h2><div><br></div><div>जहां तक विभिन्न देशों पर इस शिखर बैठक के संभावित प्रभाव की बात है तो-&nbsp;</div><div><br></div><div>अमेरिका: यूएस को वैश्विक नेतृत्व पुनर्स्थापित करने का अवसर मिलेगा। ईरान समझौते और यूक्रेन नीति पर समर्थन जुटाने की कोशिश रंग लाएगी। चीन के विरुद्ध आर्थिक गठबंधन मजबूत करने का प्रयास परवान चढ़ेगा।</div><div><br></div><div>चीन: चीन को जी-7 की आर्थिक और तकनीकी रणनीतियों से सबसे अधिक प्रभावित देश समझा जा रहा है, क्योंकि पश्चिमी देशों द्वारा वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाने की कोशिश चीन के निर्यात मॉडल को चुनौती दे सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>रूस: रूस को नए प्रतिबंधों और यूक्रेन समर्थन के कारण दबाव बढ़ सकता है। रूस को चीन, ईरान और ग्लोबल साउथ देशों के साथ संबंध और मजबूत करने पड़ सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यूरोप: यूक्रेन और रूस मुद्दे पर यूरोप की सामूहिक रणनीति मजबूत होगी। ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा पर नया रोडमैप बन सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अरब-खाड़ी देश: ईरान-अमेरिका वार्ता और होर्मुज़ की स्थिरता से आर्थिक लाभ मिलेगा। ऊर्जा बाज़ार में अनिश्चितता कम हो सकती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत: भारत जी-7 का सदस्य नहीं है, लेकिन आमंत्रित भागीदार के रूप में इसकी भूमिका लगातार बढ़ रही है। लिहाजा भारत के लिए अवसर यह होगा कि पश्चिमी देशों की "चाइना+1" नीति का सबसे बड़ा लाभार्थी बनने की संभावना है। इससे सेमीकंडक्टर, रक्षा, AI और हरित ऊर्जा में निवेश आकर्षित करने का अवसर मिलेगा। साथ ही अमेरिका, फ्रांस और यूरोप के साथ रणनीतिक साझेदारी गहरी हो सकती है। चूंकि भारत को अक्सर विशेष अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है। इससे भारत को: वैश्विक आर्थिक नीति निर्माण में भागीदारी का अवसर मिलता है। तकनीक, निवेश और आपूर्ति श्रृंखला साझेदारी मजबूत करने का मौका मिलता है। विकसित देशों के साथ रणनीतिक संबंध गहरे होते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>जहां तक चुनौतियाँ और आलोचनाएँ सम्बन्धी बात है तो जी-7 की आलोचना भी होती है क्योंकि इसमें उभरती अर्थव्यवस्थाएँ (जैसे चीन) सदस्य नहीं हैं। कई विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व सीमित है। निर्णय कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं होते। सदस्य देशों के बीच व्यापार, जलवायु और विदेश नीति को लेकर मतभेद बढ़ रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्ष: यह कहा जा सकता है कि जी-7 अब केवल अमीर देशों का क्लब नहीं है; बल्कि यह वैश्विक आर्थिक व्यवस्था, तकनीकी शासन, सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण मंच है। हालांकि इसकी प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि यह विकसित देशों के हितों से आगे बढ़कर व्यापक वैश्विक सहमति बना पाता है या नहीं।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 11:30:29 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-is-the-g7-what-is-its-global-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/17/pm-modi-g7-summit_large_1130_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[जी-7 शिखर सम्मेलन में अमेरिका दिखा अलग थलग, दुनिया जता रही मोदी पर भरोसा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/g7-summit-2026-major-outcomes-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जी-7 शिखर सम्मेलन इस बार वैश्विक अर्थव्यवस्था, सुरक्षा और व्यापार का मंच नहीं बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का आईना प्रतीत हुआ। फ्रांस में आयोजित इस सम्मेलन में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहुंचे तो उनके सामने वह यूरोप खड़ा था जो अब आंख मूंदकर वॉशिंगटन के पीछे चलने को तैयार नहीं दिखता। लंबे समय तक टैरिफ की धमकियां, कूटनीतिक दबाव, सार्वजनिक अपमान और अचानक फैसलों का सामना करने के बाद अब यूरोपीय देशों ने यह मान लिया है कि ट्रंप बदलती अमेरिकी सोच का स्थायी चेहरा हैं। यही कारण है कि इस बार जी-7 सम्मेलन पर सबसे गहरी छाया अमेरिका और यूरोप के बीच बढ़ती दूरी की रही।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो ईरान युद्ध के बाद पैदा हुई वैश्विक बेचैनी ने इस सम्मेलन को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। युद्धविराम की घोषणा के बावजूद तेल बाजारों में अस्थिरता बनी हुई है, महंगाई को लेकर चिंता गहरा रही है और दुनिया की अर्थव्यवस्था फिर अनिश्चितता के मोड में पहुंचती दिखाई दे रही है। ट्रंप इस सम्मेलन में यह साबित करने पहुंचे कि उनकी आक्रामक और टकराव वाली विदेश नीति परिणाम दे रही है। वह चाहते हैं कि दुनिया अमेरिकी प्राथमिकताओं को स्वीकार करे, चाहे मामला व्यापार का हो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता का, सुरक्षा का या फिर चीन को घेरने की रणनीति का। लेकिन इस बार यूरोप का स्वर बदला हुआ है। वह अमेरिका के साथ तो रहना चाहता है, मगर उसकी हर बात पर सिर झुकाने को तैयार नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/pm-modi-arrives-in-france-will-show-the-world-the-way-forward-on-global-challenges-at-g7-summit" target="_blank">France पहुंचे PM Modi, G7 Summit में वैश्विक चुनौतियों पर दुनिया को दिखाएंगे रास्ता</a></h3><div>देखा जाये तो यूरोप के भीतर यह बदलाव अचानक नहीं आया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों वर्षों से यूरोप की रणनीतिक स्वायत्तता की वकालत करते रहे हैं। उनका तर्क साफ है कि यूरोप को अपनी सुरक्षा और अपने हितों की रक्षा के लिए हमेशा अमेरिका पर निर्भर नहीं रहना चाहिए। इस बार सम्मेलन की मेजबानी कर रहे मैक्रों ने साफ शब्दों में कह दिया है कि यह ऐसा समय है जब अमेरिकी, रूसी और चीनी नेतृत्व यूरोप के हितों के खिलाफ खड़ा दिखाई देता है। इसलिए यूरोप को अब जागना होगा और अपने हितों की रक्षा खुद करनी होगी।</div><div><br></div><div>हालांकि मैक्रों की रणनीति केवल विरोध की नहीं है। उन्होंने ट्रंप के साथ निजी संबंध बनाए रखने की भी भरपूर कोशिश की है। कभी एफिल टावर पर भोज, कभी सैन्य परेड में विशेष सम्मान और कभी नोट्रे डेम कैथेड्रल के पुनरोद्धार समारोह में आमंत्रण देकर उन्होंने ट्रंप को साधने की कोशिश की है। लेकिन ईरान युद्ध और ग्रीनलैंड विवाद के बाद यूरोप में ट्रंप विरोध चरम पर पहुंच गया। एक समय तो हालात ऐसे बन गए थे कि यूरोपीय नेताओं को लगने लगा कि ट्रंप डेनमार्क के अधीन ग्रीनलैंड पर कब्जे के लिए अमेरिकी सेना भेज सकते हैं। यह केवल एक भू-राजनीतिक विवाद नहीं था, बल्कि उस भरोसे के टूटने का प्रतीक था जिस पर दशकों से अटलांटिक गठबंधन टिका हुआ था।</div><div><br></div><div>दरअसल, ग्रीनलैंड प्रकरण ने यूरोप को यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि कहीं नाटो की सबसे बड़ी सैन्य ताकत ही उसके लिए सबसे बड़ा खतरा न बन जाए। यही कारण है कि अब यूरोपीय देशों में यह बहस तेज हो गई है कि अगर अमेरिका हर वैश्विक संकट में नेतृत्व नहीं करता या करना नहीं चाहता, तो आगे की दुनिया कैसी होगी। इस चिंता ने नाटो और अटलांटिक गठबंधन की नींव तक को हिला दिया है।</div><div><br></div><div>ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टारमर भी इस बार दबाव में दिखे। घरेलू राजनीति में चुनौती झेल रहे स्टारमर को ईरान पर अमेरिकी हमलों का समर्थन न करने के कारण ट्रंप की नाराजगी का सामना करना पड़ा। ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से ब्रिटेन का मजाक उड़ाया और उसे असहयोगी तक कह दिया। नतीजा यह हुआ कि ब्रेक्जिट के बाद अमेरिका के और करीब जाने की कोशिश कर रहा ब्रिटेन अब फिर यूरोप की ओर झुकता दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><div>इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी, जिन्हें कभी ट्रंप का स्वाभाविक सहयोगी माना जाता था, वह भी अब दूरी बनाती नजर आ रही हैं। जापान की प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची इस सम्मेलन में पहली बार शामिल हुईं और उन्होंने अमेरिका, यूरोप तथा पश्चिम एशिया के बीच संवाद की कड़ी बनने की कोशिश की। साफ है कि दुनिया अब केवल अमेरिकी नेतृत्व पर निर्भर रहने की बजाय बहुध्रुवीय संतुलन की तरफ बढ़ रही है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो ट्रंप की सबसे बड़ी चुनौती यह भी है कि वह निजी कूटनीति को सार्वजनिक तमाशे में बदल देते हैं। पिछले वर्ष नाटो प्रमुख मार्क रुटे के निजी संदेश सार्वजनिक कर उन्होंने यह दिखा दिया था कि यूरोपीय नेता निजी तौर पर अमेरिका के दबाव को स्वीकार करते हैं, भले ही सार्वजनिक मंचों पर विरोध का अभिनय करें। इस कारण अब यूरोपीय नेताओं के लिए संतुलन साधना और मुश्किल हो गया है। उन्हें अपने मतदाताओं को भी संतुष्ट रखना है और अमेरिका से रिश्ते भी नहीं बिगाड़ने हैं।</div><div><br></div><div>इसी उथल पुथल के बीच भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी इस सम्मेलन में विशेष महत्व रखती है। जब पश्चिमी दुनिया भीतर से विभाजित दिखाई दे रही है, तब भारत एक ऐसे संतुलित और भरोसेमंद साझेदार के रूप में उभरा है जिस पर हर शक्ति केंद्र भरोसा करना चाहता है। मोदी ने रूस और अमेरिका दोनों से संबंध बनाए रखे, पश्चिम एशिया के संकटों में संतुलन साधा और ग्लोबल साउथ की आवाज को मजबूती से उठाया। यही वजह है कि आज दुनिया भारत को केवल एक बाजार नहीं, बल्कि स्थिर नेतृत्व वाली निर्णायक शक्ति के रूप में देख रही है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी की कूटनीति की सबसे बड़ी ताकत यही है कि उन्होंने भारत को किसी एक खेमे में सीमित नहीं होने दिया। अमेरिका से रणनीतिक साझेदारी भी कायम रखी और रूस के साथ पुराने रिश्ते भी नहीं टूटने दिए। पश्चिम एशिया में भारत की स्वीकार्यता बनी रही और यूरोप के साथ आर्थिक तथा तकनीकी सहयोग भी लगातार बढ़ता गया। जी-7 जैसे मंचों पर मोदी की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि बदलती विश्व व्यवस्था में भारत केंद्र में आ चुका है। जब दुनिया अविश्वास, टकराव और अनिश्चितता से जूझ रही है, तब भारत संवाद, संतुलन और स्थिरता का चेहरा बनकर उभरा है। यही प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीतिक सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, जी-7 शिखर सम्मेलन 2026 की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि गहरे मतभेदों और पश्चिमी देशों के भीतर बढ़ती अविश्वास की राजनीति के बावजूद संवाद की प्रक्रिया टूटी नहीं। ईरान संकट के बाद वैश्विक अर्थव्यवस्था में पैदा हुए तनाव, तेल आपूर्ति को लेकर आशंकाओं और यूक्रेन युद्ध की लंबी खिंचती स्थिति के बीच सदस्य देशों ने कम से कम इस बात पर सहमति दिखाई कि बहुपक्षीय सहयोग को जिंदा रखना जरूरी है। सम्मेलन में कृत्रिम बुद्धिमत्ता, वैश्विक आर्थिक असंतुलन, आपूर्ति श्रृंखला, महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षा और विकासशील देशों के कर्ज संकट जैसे मुद्दों पर साझा चर्चा आगे बढ़ी। यूरोप ने अपनी सामरिक स्वायत्तता का स्वर बुलंद किया, जबकि अमेरिका ने भी यह संकेत दिया कि यूरोपीय देशों को अपनी सुरक्षा जिम्मेदारियों में अधिक भागीदारी निभानी होगी। भारत, ब्राजील, केन्या और दक्षिण कोरिया जैसे देशों की भागीदारी ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि ग्लोबल साउथ को अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विकासशील देशों की आकांक्षाओं को मजबूती से उठाकर भारत की वैश्विक भूमिका को और मजबूत किया।</div><div><br></div><div>हालांकि सम्मेलन कई अहम मुद्दों पर ठोस नतीजे देने में विफल भी रहा। यूक्रेन युद्ध को लेकर कोई निर्णायक रोडमैप सामने नहीं आया, चीन को लेकर पश्चिमी देशों के भीतर मतभेद बने रहे और जलवायु परिवर्तन जैसे गंभीर विषय को जानबूझकर पीछे कर दिया गया ताकि अमेरिका और यूरोप के बीच टकराव नहीं बढ़े। ईरान समझौते पर भी स्पष्टता का अभाव रहा और ट्रंप की आक्रामक शैली के कारण साझा घोषणापत्र को लेकर एकजुटता कमजोर दिखाई दी। कुल मिलाकर यह सम्मेलन उपलब्धियों से अधिक बदलती विश्व राजनीति के अंतर्विरोधों का प्रतीक बनकर सामने आया, जहां संवाद तो जारी रहा लेकिन भरोसे का संकट अब भी गहराता दिखाई दिया।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 17:59:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/g7-summit-2026-major-outcomes-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/16/pm-modi_large_1759_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[रिकॉर्ड के मोर्चे पर कौन भारी, कौन कमजोर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/who-holds-the-edge-and-who-lags-behind-in-terms-of-records]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>इस बार 11 जून की तारीख भारतीय इतिहास के लिए विशेष बनकर आई। इसी दिन निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने सबसे ज्यादा दिन शासन चलाने का रिकॉर्ड कायम कर दिया। इसके पहले निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में सबसे ज्यादा 4398 दिन प्रधानमंत्री रहने का रिकॉर्ड देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के नाम है। मौजूदा दौर विशेषकर विजुअल मीडिया के वर्चस्व का दौर है। विजुअल मीडिया की चूंकि उत्सवधर्मिता केंद्रित है, लिहाजा इस रिकॉर्ड को लेकर सत्ता पक्ष में उत्साह का माहौल होना ही था और ऐसा है भी। लेकिन इसे लेकर आलोचनाओं की बाढ़ भी आ गई है। विशेषकर प्रगतिशील खेमे से मोदी के इस रिकॉर्ड को लेकर तंज में आलोचनाएं की जा रही हैं। इन आलोचनाओं का भाव कुछ वैसे ही है, जैसे कहां राजा भोज, कहां गंगू तेली। आलोचकों की नजर में कहावत के राजा भोज नेहरू हैं और गंगू मोदी।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ अरसा पहले संसद को संबोधित करते हुए देश के विकास में अतीत के हर प्रधानमंत्री के योगदान को याद किया था। इतिहास क्रम में हर प्रधानमंत्री ने कुछ न कुछ योगदान दिया ही है। हर प्रधानमंत्री की युगीन आवश्यकताएं और परिस्थितियां अलग रही हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/modi-france-slovakia-visit-rafale-deal-india-europe-strategic-partnership" target="_blank">मोदी की फ्रांस, स्लोवाकिया यात्रा से बदले वैश्विक समीकरण, दुनिया को दिखा नए भारत का दम</a></h3><div>इसलिए अव्वल तो ऐसी तुलनाएं होनी ही नहीं चाहिए थी। क्योंकि नेहरू के युग में भारत की जो स्थिति थी, वह अब नहीं है। इतिहास का कोई खंड कठिन होता है तो कोई आसान। इसलिए इतिहास के काल खंड की बुनियाद पर उस दौर के शासक की परख होनी चाहिए। इसका मतलब यह नहीं कि भविष्य का शासक अपनी उपलब्धियों का जश्न नहीं मना सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी को लेकर जिस तरह का राजनीतिक माहौल स्थापित हो चुका है, उसमे अगर प्रगतिशील खेमा और कांग्रेस की आलोचना के केंद्र में मोदी ना रहें तो ही हैरत होगी। प्रगतिशील खेमा मोदी को कमतर दिखाने की कोशिश में नेहरू को सबसे ज्यादा दिनों तक प्रधानमंत्री दिखाने की कोशिश कर रहा है। इस आलोक में इतिहास के तथ्यों को जांचना जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि जब 15 अगस्त 1947 को देश को आजादी मिली, तब पंडित जवाहर लाल नेहरू ने ही देश के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ली थी। लेकिन वह किसी एक दल विशेष यानी कांग्रेस की ही सरकार नहीं थी, बल्कि एक तरह से वह राष्ट्रीय सरकार थी, जिसमें अंबेडकर भी थे और श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी।</div><div><br></div><div>द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ऐसा लगने लगा था कि भारत को आजादी मिल जाएगी। इस बीच ब्रिटेन में लेबर पार्टी की सरकार बनी और लॉर्ड एटली प्रधानमंत्री बने। एटली ने चुनावी वादा किया था कि अगर उनकी पार्टी की सरकार बनी तो भारत को स्वाधीनता दी जाएगी। जब उन्होंने ब्रिटेन की कमान संभाल ली तो उन्होंने भारत को आजादी देने की प्रक्रिया तेज कर दी। इसी सिलसिले में 1946 में कैबिनेट मिशन भारत आया। मिशन के सामने सवाल यह था कि सत्ता का हस्तांतरण किसे किया जाएगा, क्योंकि उन दिनों भारत में दो बड़े और प्रमुख दल थे, कांग्रेस और मुस्लिम लीग। लेकिन सत्ता किसे सौंपी जाए, इस सवाल के साथ ही भारत की भावी सरकार और विधान को तैयार करने के लिए संविधान सभा का चुनाव 1946 में हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस को 208 और मुस्लिम लीग को 73 सीटें मिलीं। दूसरे दलों और निर्दलीयों को 15 सीटें मिलीं थी। इसके पहले प्रांतीय विधानसभाओं के चुनाव हुए थे, जिसमें कांग्रेस को 923 और मुस्लिम लीग को 425 सीटें मिली थीं। कांग्रेस को सामान्य सीटों के नब्बे प्रतिशत हिस्से पर जीत मिली, मुस्लिम बहुल 87 प्रतिशत सीटों पर मुस्लिम लीग को जीत मिली। इसके बाद सबसे बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस को ही सत्ता हस्तांतरण होना तय हुआ। इस दौरान कांग्रेस अध्यक्ष का महत्व बढ़ गया। उन दिनों कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए अधिकांश प्रांतीय समितियों ने सरदार पटेल का नाम आगे किया था, जबकि कुछ ही प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने जवाहर लाल नेहरू का नाम आगे किया। चूंकि गांधी जी पहले ही कह चुके थे कि उनके बाद जवाहर उनकी भाषा बोलेगा यानी सत्ता उन्हें मिलेगी, इसलिए वे ही अध्यक्ष बनाए गए। इसके बाद सत्ता हस्तांतरण प्रक्रिया के तहत 2 सितंबर 1946 को 'अंतरिम सरकार' का गठन हुआ, जिसमें नेहरू जी को 'वायसराय की कार्यकारी परिषद का उपाध्यक्ष' बनाया गया, उस पद का नाम प्रधानमंत्री नहीं था। इसे अंतरिम सरकार कहा गया।&nbsp; भले ही कुछ लोग सुविधा के लिए नेहरू के प्रधानमंत्रित्व काल को उसी दिन से मान लेते हैं। यहां याद करना जरूरी है कि वायसराय की कार्यकारी परिषद के पदेन अध्यक्ष खुद वायसराय लॉर्ड वेवेल थे। उनके बाद आए वायसराय माउंटबेटन इसके अध्यक्ष रहे।</div><div><br></div><div>देश को स15 अगस्त 1947 को भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम 1947' के तहत देश को आजाद घोषित किया गया। इस कानून के मूल पाठ में कहीं भी "प्राइम मिनिस्टर" या प्रधानमंत्री शब्द नहीं लिखा हुआ है। हालांकि पंद्रह अगस्त 1947 की आधी रात को नेहरू ने स्वाधीन सरकार के मंत्री के रूप में शपथ ली, भले ही वे उसके मुखिया थे। नेहरू ने अंग्रेजी में शपथ लेते हुए ‘ऑफिस ऑफ मिनिस्टर’ यानी मंत्री पद की शपथ ली थी, प्रधानमंत्री पद की नहीं। इसके बाद ही उन्होंने ‘नियति से साक्षात्कार’ वाला प्रसिद्ध भाषण दिया था। यहां याद करना चाहिए कि भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम के तहत तत्कालीन&nbsp; गवर्नर-जनरल को ब्रिटिश सम्राट के प्रतिनिधि के रूप में दोनों उपनिवेशों भारत और पाकिस्तान का संवैधानिक प्रमुख नियुक्त किया गया था। जिन्हें सलाह देने और शासन चलाने के लिए एक मंत्रि परिषद&nbsp; का प्रावधान था। इस प्रावधान में प्रधानमंत्री या प्रीमियर या प्राइम मिनिस्टर का कोई पद नहीं है। गवर्नर-जनरल को इसी मंत्रि परिषद की सलाह पर शासन चलाना था।&nbsp;</div><div><br></div><div>मोदी को सबसे लंबे समय तक बतौर निर्वाचित प्रधानंत्री काम करने के रिकॉर्ड को गलत साबित करने वाला प्रगतिशील तबके का तर्क है कि 1946 के चुनावों में कांग्रेस सबसे बड़ा दल बन कर उभरी और उसके निर्वाचित नेता के तौर पर नेहरू ने सरकार चलाई। लेकिन हकीकत यह है कि 1946 का चुनाव वयस्क मतदान के अधिकार और एक व्यक्ति, एक वोट के सिद्धांत के तहत नहीं हुआ था। तब वोटर होने की शर्त संपत्ति, शिक्षा, कर भुगतान आदि था। मुसलमान सिर्फ मुस्लिम बहुल सीटों के ही मतदाता थे। एक तरह से यह सार्वभौम वयस्क मतदान के अधिकार से रहित चुनाव था। इसलिए सही मायने में 1946 का&nbsp; चुनाव ना तो समानता और वयस्क मतदान के अधिकार से लैस था, न ही पूरे देश के मतदाताओं का प्रतिबिंब था। एक तरह से कहें तो यह सिर्फ दस प्रतिशत लोगों के मतदान की बुनियाद पर हुआ चुनाव था। जिसमें हर वयस्क की भागीदारी नहीं थी। उन दिनों धार्मिक आधार पर अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्र भी थे। इसलिए 1946 का चुनाव सही मायने में संतुलित मतदान नहीं था। स्वाधीन भारत में पहला आम चुनाव 1951 -52 के बीच हुआ। जिसमें कांग्रेस को 364 सीटें मिलीं। इसी नतीजे के आधार पर पंडित नेहरू ने 13 मई 1952 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और 27 मई 1964 को मृत्यु पर्यंत अपने पद पर रहे। इसी लिहाज से नेहरू का निर्वाचित प्रधानमंत्री के रूप में कार्यकाल 4398 दिन ही होता। आधुनिक सार्वभौम मतदान के अधिकार और सिद्धांत के लिहाज से देखें तो पंडित नेहरू का निर्वाचित प्रधानमंत्री के तौर पर असल कार्यकाल 13 मई 1952 से 27 मई 1964 तक का ही होता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>रही बात नेहरू और मोदी के कार्यकाल की उपलब्धियों की, तो इसकी तुलना की जा सकती है। भारत की आजादी के वक्त देश में बीस विश्वविद्यालय थे, जिसे नेहरू ने अपने कार्यकाल में 64 तक पहुंचा दिया था। इस लिहाज से देखें तो मोदी के कार्यकाल में देश में साढ़े पांच सौ से ज्यादा विश्वविद्यालय हो चुके हैं। नेहरू समर्थक कह रहे हैं कि आजादी के वक्त देश में 15 मेडिकल कॉलेज थे, जिनकी संख्या बढ़ाकर नेहरू ने 81 कर दी थी। लेकिन जब मोदी ने कार्यकाल संभाला तो देश में 393 मेडिकल कॉलेज थे, जिसे उन्होंने 818 तक कर दिया है। 431 मेडिकल कॉलेज तो 2014 के बाद ही बने हैं। बेशक नेहरू अपनी विदेश नीति के लिए जाने जाते हैं, लेकिन मोदी ने भारत के स्वत्व बोध को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खूब बढ़ाया है।</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक राजनीतिक समीक्षक और वरिष्ठ पत्रकार हैं...</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 10:18:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/who-holds-the-edge-and-who-lags-behind-in-terms-of-records</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/16/narendra-modi_large_1018_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मोदी की फ्रांस, स्लोवाकिया यात्रा से बदले वैश्विक समीकरण, दुनिया को दिखा नए भारत का दम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-france-slovakia-visit-rafale-deal-india-europe-strategic-partnership]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ्रांस और स्लोवाकिया यात्रा ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है। खासतौर पर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने मोदी का स्वागत जिस धुरंधर स्टाइल में किया, उसने दुनिया को साफ संदेश दे दिया कि मोदी वैश्विक राजनीति के सबसे बड़े धुरंधरों में गिने जाते हैं। इस यात्रा के दौरान यूरोप की धरती पर भारत की बढ़ती ताकत और मोदी की वैश्विक लोकप्रियता हर तरफ दिखाई दी। फ्रांस से लेकर स्लोवाकिया तक भारतीय समुदाय ने अपने प्रधानमंत्री का जिस उत्साह, जोश और भारतीय अंदाज में स्वागत किया, उसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी। हाथों में तिरंगा, भारत माता के जयकारे और सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने यह दिखा दिया कि दुनिया भर में बसे भारतीय आज अपने देश की बढ़ती प्रतिष्ठा पर गर्व महसूस कर रहे हैं। यही वजह है कि मोदी की यह यात्रा केवल एक विदेशी दौरा नहीं रही, बल्कि दुनिया के सामने नए और शक्तिशाली भारत का दमदार प्रदर्शन बन गई।</div><div><br></div><h2>यूरोप में गूंजी भारत की ताकत</h2><div><br></div><div>देखा जाये तो यूरोप की धरती पर मोदी का स्वागत जिस गर्मजोशी, रणनीतिक सम्मान और राजनीतिक विश्वास के साथ हुआ, उसने दुनिया को यह संदेश दिया कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका निर्णायक होती जा रही है। विशेष रूप से फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को जिस तरह भारतीय रंग दिया, वह भारत की बढ़ती सांस्कृतिक और रणनीतिक ताकत की स्वीकारोक्ति थी। सोशल मीडिया पर साझा किए गए वीडियो, मोदी और मैक्रों की आत्मीयता और नाइस में आयोजित भारत इनोवेट्स सम्मेलन ने यह साबित किया कि भारत और फ्रांस का रिश्ता अब केवल हथियार खरीद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह तकनीक, नवाचार, अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और वैश्विक नेतृत्व की साझेदारी में बदल चुका है।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260615/18051768197_0_modi france slovakia visit.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;">&nbsp;</div><h2>राफेल से बदल जाएगा दक्षिण एशिया का खेल</h2><div><br></div><div>मोदी और मैक्रों की बैठक में जो सबसे महत्वपूर्ण संदेश उभरा, वह था रक्षा सहयोग का नया प्रारूप। भारत ने साफ कर दिया कि अब वह केवल विदेशी हथियारों का खरीदार नहीं रहेगा। राफेल कार्यक्रम को लेकर भारत ने सह विकास, सह डिजाइन, सह उत्पादन और सह निर्माण की नीति अपनाकर अपनी रणनीतिक दिशा स्पष्ट कर दी है। विदेश सचिव विक्रम मिस्री का बयान इस बात का संकेत है कि मोदी सरकार रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य को निर्णायक रूप से आगे बढ़ा रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/make-in-india-initiative-now-resonates-in-europe-too-an-agreement-has-been-reached-with-slovakia" target="_blank">अब Europe में भी 'Make in India' की गूंज, Slovakia के साथ Joint Defence Production पर बनी सहमति।</a></h3><div>देखा जाये तो राफेल केवल एक युद्धक विमान नहीं है बल्कि यह भारत की सामरिक शक्ति का प्रतीक बन चुका है। भारतीय वायुसेना के पास पहले से मौजूद 36 राफेल विमानों ने दक्षिण एशिया में शक्ति संतुलन को बदल दिया है। अब भारतीय नौसेना के लिए 26 राफेल समुद्री विमानों का समझौता और भविष्य में बड़े राफेल कार्यक्रम की तैयारी यह दिखाती है कि भारत हिंद महासागर से लेकर हिमालय तक अपनी सैन्य क्षमता को नई ऊंचाई पर ले जा रहा है। इन विमानों की लंबी दूरी तक मार करने की क्षमता, अत्याधुनिक सेंसर प्रणाली और बहु भूमिका युद्ध कौशल भारत को चीन और पाकिस्तान दोनों के खिलाफ निर्णायक बढ़त देते हैं।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब राफेल का निर्माण और उसके पुर्जों का उत्पादन भारत में करने की दिशा में बातचीत आगे बढ़ रही है। इसके जरिये भारत विश्व का प्रमुख रक्षा विनिर्माण केंद्र बन सकता है। इससे न केवल लाखों कुशल रोजगार पैदा होंगे बल्कि भारत का रक्षा औद्योगिक ढांचा भी मजबूत होगा। यह बदलाव दक्षिण एशिया की सामरिक राजनीति पर गहरा प्रभाव डालेगा। अब तक हथियार आयात पर निर्भर भारत धीरे धीरे रक्षा निर्यातक राष्ट्र बनने की दिशा में बढ़ रहा है। इससे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन भारत के पक्ष में और अधिक झुकता दिखाई देगा।</div><div><br></div><h2>राफेल, एआई और रणनीति... मोदी ने यूरोप में रचा नया इतिहास</h2><div><br></div><div>साथ ही फ्रांस के साथ भारत की साझेदारी केवल रक्षा तक सीमित नहीं है। दोनों देशों ने अगले पांच वर्षों में द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करने का लक्ष्य तय किया है। भारत फ्रांस नवाचार रोडमैप 2030, कृत्रिम बुद्धिमत्ता कार्य समूह, आर्थिक सुरक्षा संवाद और महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति शृंखला पर सहयोग जैसे फैसले इस बात का संकेत हैं कि दोनों देश आने वाले दशकों की वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रतिस्पर्धा को साथ मिलकर आकार देना चाहते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260615/18054127141_0_modi france slovakia visit.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;"></div><div><br></div><div>नाइस में आयोजित भारत इनोवेट्स सम्मेलन इस यात्रा का सबसे प्रतीकात्मक क्षण साबित हुआ। एक सौ बीस से अधिक भारतीय डीप टेक स्टार्टअप, भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों की भागीदारी और वैश्विक निवेशकों की मौजूदगी ने यह साबित कर दिया कि भारत अब केवल बाजार नहीं, बल्कि नवाचार का वैश्विक केंद्र बन चुका है। मोदी ने सही कहा कि भारत और फ्रांस का रिश्ता केवल हितों का नहीं, बल्कि साझा दृष्टि का रिश्ता है। मैक्रों द्वारा भारत की चंद्रयान उपलब्धि और नवाचार क्षमता की खुली प्रशंसा इस बात का प्रमाण है कि विश्व अब भारत को तकनीकी महाशक्ति के रूप में देखने लगा है।</div><div><br></div><div>फ्रांस यात्रा का एक और महत्वपूर्ण पहलू था अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा सहयोग। छोटे और उन्नत परमाणु रिएक्टरों पर सहयोग तथा मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम में साझेदारी भारत को भविष्य की रणनीतिक तकनीकों में अग्रणी स्थान दिला सकती है। यही कारण है कि भारत फ्रांस संबंध अब पारंपरिक कूटनीति से निकलकर भविष्य की वैश्विक व्यवस्था की धुरी बनते दिख रहे हैं।</div><div><br></div><h2>फ्रांस के साथ ही स्लोवाकिया में बजा मोदी का डंका</h2><div><br></div><div>फ्रांस के बाद प्रधानमंत्री मोदी की स्लोवाकिया यात्रा ने भारत की यूरोपीय रणनीति को और गहराई दी। यह किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली स्लोवाकिया यात्रा थी और इसी तथ्य ने इसे ऐतिहासिक बना दिया। ब्रातिस्लावा में प्रधानमंत्री राबर्ट फित्सो और राष्ट्रपति पीटर पेलेग्रिनी के साथ हुई बैठकों ने यह स्पष्ट कर दिया कि भारत अब यूरोप के छोटे लेकिन रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण देशों के साथ भी मजबूत संबंध बना रहा है।</div><div>&nbsp;</div><div><img src="https://images.prabhasakshi.com//static_files/imagegallery/20260615/18060016449_0_modi france slovakia visit.jpeg" data-filename="" style="width: 100%;"><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">भारत और स्लोवाकिया के बीच संबंधों को व्यापक साझेदारी का दर्जा दिया जाना एक महत्वपूर्ण रणनीतिक कदम है। यह मध्य यूरोप में भारत की बढ़ती उपस्थिति का संकेत है। वाहन निर्माण, रेलवे उत्पादन, निवेश, उभरती तकनीक और व्यापार के क्षेत्रों में सहयोग भारत को यूरोपीय संघ के भीतर नई आर्थिक और रणनीतिक पहुंच देगा। विशेष रूप से भारत यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते को शीघ्र लागू करने की दिशा में सक्रिय दिख रहा है, जिसका लाभ भारतीय उद्योग और निर्यात को मिलेगा।</span></div><div><br></div><h2>कूटनीति के मास्टर हैं मोदी</h2><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी की यह पूरी यूरोपीय यात्रा दरअसल भारत की बहुस्तरीय कूटनीति का उदाहरण है। एक ओर फ्रांस जैसे शक्तिशाली राष्ट्र के साथ रक्षा और तकनीकी गठजोड़ को नई ऊंचाई दी जा रही है, वहीं दूसरी ओर स्लोवाकिया जैसे देशों के माध्यम से यूरोप में भारत का प्रभाव क्षेत्र विस्तारित किया जा रहा है। यह नीति भारत को ग्लोबल साउथ और पश्चिमी शक्तियों के बीच एक संतुलित, विश्वसनीय और प्रभावशाली शक्ति के रूप में स्थापित कर रही है।</div><div><br></div><div>इसमें कोई दो राय नहीं कि आज दुनिया के बदलते भू राजनीतिक माहौल में भारत जिस आत्मविश्वास के साथ अपनी रणनीतिक दिशा तय कर रहा है, उसके केंद्र में प्रधानमंत्री मोदी की सक्रिय और दूरदर्शी कूटनीति है। चाहे रक्षा आत्मनिर्भरता का लक्ष्य हो, वैश्विक नवाचार में नेतृत्व की महत्वाकांक्षा हो या यूरोप के साथ बहुआयामी साझेदारी का विस्तार, मोदी सरकार ने हर मोर्चे पर भारत की स्थिति को मजबूत किया है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 18:10:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-france-slovakia-visit-rafale-deal-india-europe-strategic-partnership</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/15/pm-modi-france-slovakia-visit_large_1810_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अमेरिका व ईरान के बीच बने समझौते मसौदे के वैश्विक मायने]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/global-implications-of-the-draft-agreement-between-the-us-and-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका और ईरान के बीच हाल में उभरे समझौता-ढांचे (Framework Agreement) को यदि अंतिम रूप मिल जाता है, तो इसके प्रभाव केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया, वैश्विक ऊर्जा बाजार और विश्व राजनीति पर पड़ेंगे। समझौते में युद्धविराम, परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण, तेल प्रतिबंधों में राहत, ईरान की जमी हुई संपत्तियों की रिहाई तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने जैसे मुद्दे शामिल बताए जा रहे हैं। यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो इसे 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना जा सकता है। आइए इसके वैश्विक मायने को क्रमशः समझते हैं:-</div><div><br></div><div>पहला, वैश्विक ऊर्जा बाजार को मिलेगी बड़ी राहत: होर्मुज जलडमरूमध्य दुनिया के तेल और LNG व्यापार का एक अत्यंत महत्वपूर्ण मार्ग है। इस मार्ग पर रणनीति पूर्वक ईरान ने अपना मजबूत कब्जा जमा लिया है। लिहाजा, इसके खुलने और तनाव घटने से कच्चे तेल की आपूर्ति सामान्य हो सकती है, जिससे तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा। समझौते की खबर आते ही वैश्विक बाजारों में तेल कीमतों में गिरावट और शेयर बाजारों में तेजी देखी गई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-iran-deal-netanyahu-middle-east-war" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: Iran के आगे झुक गया America? Trump ने किया शांति समझौते का ऐलान, मगर Israel बोला Hezbollah पर हमले जारी रहेंगे</a></h3><div>दूसरा, पश्चिम एशिया में घटेगा युद्ध का खतरा: यदि अमेरिका-ईरान टकराव कम होता है, तो लेबनान, इराक, सीरिया और खाड़ी क्षेत्र में भी तनाव कम होने की संभावना बढ़ेगी। समझौते के तहत क्षेत्रीय संघर्षों को शांत करने की बात भी सामने आई है। इससे भारत को लाभ यह होगा कि यूरोप, अरब देशों, मध्य एशिया के देशों और रूस के साथ विकसित होने वाले महत्वपूर्ण व्यापारिक परिवहन कॉरिडोर के काम में गति आएगी।</div><div><br></div><div>तीसरा, परमाणु प्रसार पर नियंत्रण: ईरान द्वारा परमाणु हथियार न बनाने, यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने तथा परमाणु गतिविधियों पर नियंत्रण की दिशा में सहमति अंतरराष्ट्रीय समुदाय के लिए बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। इससे मध्य पूर्व में परमाणु हथियारों की दौड़ पर कुछ हद तक रोक लग सकती है। साथ ही, पाकिस्तान पर भी परमाणु हथियार हटाने का दबाव बढ़ेगा।</div><div><br></div><div>चौथा, चीन और रूस की रणनीति पर असर: पिछले वर्षों में ईरान, चीन और रूस के बीच रणनीतिक निकटता बढ़ी थी। इससे भारत की भी परेशानी बढ़ रही थी, क्योंकि ईरान-पाकिस्तान-अफगानिस्तान के आतंकवादी कॉरिडोर को नियंत्रित करने में अमेरिका-चीन के षड्यंत्रकारी बाधक बन रहे थे। रूस भी मजबूरी में ईरान को साथ दे रहा है। ऐसे में यदि अमेरिका-ईरान संबंध सुधरते हैं, तो तेहरान को पश्चिमी निवेश और बाजारों तक पहुंच मिल सकती है, जिससे उसकी चीन और रूस के अलावा पाकिस्तान पर रणनीतिक निर्भरता कुछ कम हो सकती है। यह वैश्विक शक्ति-संतुलन में महत्वपूर्ण बदलाव होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत के लिए क्या मायने?: भारत के लिए यह समझौता कई कारणों से सकारात्मक हो सकता है:- एक,</div><div>तेल आयात व अन्य सामान के सस्ता होने की संभावना बढ़ेगी। खाड़ी क्षेत्र में भारतीय प्रवासियों की सुरक्षा बेहतर होगी। चाबहार बंदरगाह और भारत-ईरान व्यापार को नई गति मिल सकती है। पश्चिम एशिया में स्थिरता भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगी। यहां चीनी हस्तक्षेप कम होने से भारत पश्चिमी मोर्चे पर मजबूत होगा।</div><div><br></div><div>छठा, लेकिन चुनौतियां अभी बाकी हैं: चूंकि समझौते पर अभी भी पूर्ण सहमति नहीं बनी है, क्योंकि चीन-रूस दिल से ऐसा नहीं चाहते। लिहाजा, ईरान के कट्टरपंथी गुट इसका विरोध कर रहे हैं और इजराइल-हिज्बुल्लाह मोर्चे पर तनाव भी बना हुआ है। चूंकि कट्टरपंथियों ने बलिदान देकर ईरान को इतना मजबूत बनाया है। इसलिए उनके खिलाफ कोई भी ईरानी सरकार नहीं जा सकती। यही वजह है कि कई रिपोर्टों में कहा गया है कि अंतिम हस्ताक्षर और कार्यान्वयन अभी अनिश्चित हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि यदि यह समझौता सफलतापूर्वक लागू होता है, तो इसे 21वीं सदी के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक घटनाक्रमों में गिना जा सकता है। इससे तेल बाजार स्थिर होंगे, परमाणु संकट टलेगा, पश्चिम एशिया में शांति की संभावना बढ़ेगी और भारत सहित अनेक देशों को आर्थिक लाभ मिलेगा। लेकिन इसकी स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका, ईरान, इजराइल और क्षेत्रीय शक्तियां अपने-अपने वादों का कितना पालन करती हैं। मेरी राय में यह समझौता जितनी जल्दी हो जाए, भारतीय हित उतनी जल्दी ही सधने शुरू जाएंगे।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 12:21:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/global-implications-of-the-draft-agreement-between-the-us-and-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/15/trump-mojtaba-khamenei_large_1221_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[PoK की जनता को पाकिस्तानी जुल्मों से निजात दिलाने के लिए क्या भारत को सीधे दखल देना चाहिए?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/pok-crisis-and-india-strategy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में अब हालात सिर्फ बिगड़ नहीं रहे हैं बल्कि यह इस्लामाबाद के खिलाफ खुले जनविद्रोह का रूप ले चुके हैं। जिन लोगों को पाकिस्तान दशकों से अपने कब्जे का हिस्सा बताकर दुनिया के सामने कश्मीर का झूठा राग अलापता रहा, वही लोग आज सड़कों पर उतरकर उसके दमनकारी चेहरे को बेनकाब कर रहे हैं। आटे पर सब्सिडी, बिजली दरों में कमी, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और नागरिक अधिकारों जैसी बुनियादी मांगों को लेकर शुरू हुआ आंदोलन अब पाकिस्तान की औपनिवेशिक नीतियों के खिलाफ व्यापक जनआक्रोश में बदल चुका है।</div><div><br></div><div>जम्मू-कश्मीर ज्वाइंट आवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन को कुचलने के लिए पाकिस्तानी सेना, रेंजर्स और पुलिस ने जिस बर्बरता का प्रदर्शन किया है, उसने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर गोलियां चलाई गईं, लाठीचार्ज हुआ, आंसू गैस के गोले दागे गए और इंटरनेट सेवाएं बंद कर पूरे क्षेत्र को अंधेरे में धकेल दिया गया। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार अब तक दर्जनों नागरिक मारे जा चुके हैं और हजारों गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। रावलाकोट, मीरपुर, कोटली, भीमबर और पुंछ जैसे क्षेत्रों में हालात विस्फोटक बने हुए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/modi-indus-water-strategy-pakistan-crisis" target="_blank">सही कहा था Modi ने... एक एक बूंद पानी के लिए तरस रहा Pakistan, नहरें सूखीं, खेत बंजर हो रहे, शहरों में भी जल संकट</a></h3><div>सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन लोगों की जमीनों को डुबोकर मंगला बांध बनाया गया, उन्हीं लोगों को आज आसमान छूते बिजली बिल थमाए जा रहे हैं। पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ऊर्जा देने वाला यह विशाल बांध स्थानीय जनता के लिए अभिशाप बन चुका है। हजारों परिवार उजड़ गए, लेकिन पुनर्वास तक नहीं मिला। प्राकृतिक संसाधनों का दोहन पाकिस्तान करता है, लेकिन उसका लाभ स्थानीय जनता को नहीं मिलता। यही कारण है कि यह आंदोलन अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि अस्तित्व और सम्मान की लड़ाई बन गया है।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान ने तथाकथित विधानसभा और संविधान का ढांचा तो खड़ा किया, लेकिन असली सत्ता हमेशा इस्लामाबाद और रावलपिंडी के हाथों में रही। वहां की विधानसभा महज कठपुतली संस्था बनकर रह गई है। हाल ही में आरक्षित सीटों को लेकर आए फैसले ने जनता के गुस्से को और भड़का दिया। इन सीटों के जरिये पाकिस्तान अपनी पसंद की सरकारें थोपता है और कश्मीरी आवाजों को कुचल देता है। यही कारण है कि लोग अब खुलकर कह रहे हैं कि पाकिस्तान उन्हें नागरिक नहीं, गुलाम समझता है।</div><div><br></div><div>स्थिति इतनी बिगड़ चुकी है कि पाकिस्तान ने संयुक्त आवामी एक्शन कमेटी को प्रतिबंधित कर दिया है। इसके नेताओं के सिर पर इनाम घोषित किए गए हैं। पत्रकारों को गिरफ्तार किया जा रहा है, मीडिया पर सेंसरशिप थोप दी गई है और इंटरनेट बंद कर सच्चाई छिपाने की कोशिश की जा रही है। लेकिन दमन जितना बढ़ रहा है, जनाक्रोश उतना ही उग्र हो रहा है। ब्रिटेन और अमेरिका में बसे कश्मीरी प्रवासियों ने भी पाकिस्तान के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिए हैं। यह वही प्रवासी समुदाय है जिसे पाकिस्तान वर्षों तक भारत विरोधी प्रचार के लिए इस्तेमाल करता रहा। मगर अब वही लोग इस्लामाबाद के दमन के खिलाफ दुनिया को सच बता रहे हैं। पाकिस्तानी सेना ने पीओके के लोगों के साथ जो बर्बरता की है उसके खिलाफ गुस्सा इतना ज्यादा है कि लोग नारे लगा रहे हैं कि पाकिस्तानी सेना को कुत्ता कहना कुत्ते की तौहीन है। बाइट।</div><div><br></div><div>रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह पाकिस्तान के लिए बेहद खतरनाक स्थिति है। यह संकट उसे सीधे 1971 की याद दिला रहा है, जब दमन और सैन्य बल के सहारे पूर्वी पाकिस्तान को दबाने की कोशिश ने अंततः बांग्लादेश के निर्माण का रास्ता खोला था। आज पीओके में भी वही हालात दिखाई दे रहे हैं। जनता का भरोसा टूट चुका है और पाकिस्तान केवल बंदूक के दम पर कब्जा बनाए रखना चाहता है। लेकिन इतिहास गवाह है कि भय के सहारे किसी क्षेत्र को लंबे समय तक नियंत्रित नहीं रखा जा सकता।</div><div><br></div><div>उधर, भारत के लिए यह स्थिति सामरिक और कूटनीतिक दोनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है। जमीनी हकीकत यह है कि वैसे तो पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न हिस्सा है लेकिन पीओके में पाकिस्तान का कब्जा अवैध है। अब जब वहां की जनता खुद पाकिस्तान के खिलाफ उठ खड़ी हुई है और भारत के साथ मिलने की बातें मुखर होने लगी हैं तो सवाल उठता है कि भारत को क्या पीओके में सीधे हस्तक्षेप करना चाहिए? इस सवाल पर अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ बंटे हुए नजर आ रहे हैं। कई विश्लेषकों का कहना है कि सीधे हस्तक्षेप की बजाय भारत को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान के मानवाधिकार उल्लंघनों को और आक्रामक तरीके से उठाना चाहिए। उनका कहना है कि भारत को संयुक्त राष्ट्र, यूरोपीय देशों और वैश्विक मानवाधिकार संगठनों के सामने यह प्रश्न मजबूती से रखना होगा कि आखिर पाकिस्तान किस नैतिक आधार पर कश्मीर की बात करता है, जब उसके कब्जे वाले क्षेत्र में जनता को जीने तक का अधिकार नहीं है।</div><div><br></div><div>कुछ विश्लेषकों का यह भी कहना है कि यदि भारत ने पीओके में सीधे हस्तक्षेप किया तो यह सीधे सैन्य दखल के रूप में देखा जायेगा और यह दो परमाणु शक्तियों के बीच संघर्ष का खतरा बढ़ा सकता है। वैसे भी पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद और उकसावे की नीति अपनाता रहा है इसलिए वह किसी भी प्रत्यक्ष कार्रवाई को युद्ध का बहाना बना सकता है। इसलिए भारत को अत्यंत संतुलित लेकिन दृढ़ रणनीति अपनानी होगी।</div><div><br></div><div>विश्लेषकों का कहना है कि भारत के पास कई विकल्प हैं। जैसे पीओके की जनता के साथ मानवीय और सामाजिक संपर्क बढ़ाना, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को घेरना, सीमा पर सुरक्षा और सतर्कता बढ़ाना क्योंकि पाकिस्तान ध्यान भटकाने के लिए आतंकवादी घुसपैठ बढ़ा सकता है। साथ ही पीओके के लोगों के लिए राजनीतिक संदेश देना होगा कि भारत उन्हें अपना नागरिक मानता है और उनके अधिकारों के साथ खड़ा है। विश्लेषकों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर विधानसभा में पीओके के लिए आरक्षित 24 सीटों को सक्रिय राजनीतिक प्रक्रिया से जोड़ने पर भी गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>बहरहाल, फिलहाल भारत के लिए सबसे प्रभावी रास्ता यही है कि वह धैर्य, कूटनीति और रणनीतिक दबाव का संयोजन अपनाए। पीओके में जो आग भड़की है, वह केवल आर्थिक संकट का परिणाम नहीं, बल्कि दशकों के दमन, शोषण और राजनीतिक अपमान का विस्फोट है। पाकिस्तान की सबसे बड़ी समस्या यह है कि अब उसका झूठ उसके अपने कब्जे वाले क्षेत्र में ही टूट रहा है। जिस जमीन को वह कश्मीर की आजादी का प्रतीक बताता था, वहीं की जनता आज उसके खिलाफ आजादी की आवाज बुलंद कर रही है। हालात साफ संकेत दे रहे हैं कि आने वाले समय में पीओके का भारत के साथ स्वाभाविक जुड़ाव और तेज हो सकता है। स्थानीय जनता जिस तरह पाकिस्तान के खिलाफ आरपार की लड़ाई के मूड़ में दिखाई दे रही है, उससे स्पष्ट है कि इस्लामाबाद के लिए अब केवल बंदूक और दमन के सहारे वहां अपनी पकड़ बनाए रखना आसान नहीं रहेगा। स्थानीय जनता के भीतर पाकिस्तान विरोधी भावना लगातार गहरी हो रही है। यदि पाकिस्तान ने अपनी दमनकारी नीतियां नहीं बदलीं, तो वह दिन दूर नहीं जब पीओके की जनता खुद पाकिस्तान के कब्जे को खुली चुनौती देते हुए भारत के साथ खड़े होने का रास्ता चुन सकती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 18:03:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/pok-crisis-and-india-strategy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/13/pok-situation_large_1803_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गृहिणी राष्ट्रनिर्माता है तो हिंसा की शिकार क्यों?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/if-the-homemaker-is-a-nation-builder-why-is-she-a-victim-of-violence]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय समाज में महिलाओं को सशक्त बनाने के दावे लंबे समय से किए जाते रहे हैं। उन्हें ‘आधी आबादी’ और विकास की समान भागीदार कहा जाता है। शिक्षा, रोजगार, राजनीति और नेतृत्व के क्षेत्र में उनकी भागीदारी बढ़ाने के लिए अनेक योजनाएं बनाई जाती हैं। संसद और विधानसभाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देने की प्रतिबद्धता जताई जाती है। सरकारें महिला सशक्तीकरण को अपनी प्राथमिकताओं में शामिल करती हैं और समाज भी महिलाओं की उपलब्धियों पर गर्व व्यक्त करता है। लेकिन इन सबके बीच कुछ ऐसे तथ्य सामने आते हैं, जो हमें इस सशक्तीकरण के वास्तविक स्वरूप पर पुनर्विचार करने के लिए विवश करते हैं। हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय ने गृहिणियों के योगदान को राष्ट्र निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उन्हें ‘नेशन बिल्डर’ अर्थात् राष्ट्रनिर्माता कहा। न्यायालय ने यह भी माना कि घरेलू कार्यों और परिवार की देखभाल में महिलाओं द्वारा किए जाने वाले श्रम का आर्थिक मूल्य है और उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दूसरी ओर राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि देश में ग्रामीण क्षेत्रों की प्रत्येक चौथी तथा शहरी क्षेत्रों की प्रत्येक छठी महिला किसी न किसी रूप में हिंसा का शिकार होती है। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है।</div><div><br></div><div>सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय समाज में महिलाओं के अवैतनिक श्रम को मान्यता देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम है। सदियों से गृहिणियों द्वारा किए जाने वाले कार्यों को केवल कर्तव्य या प्रेम का विस्तार मान लिया गया। घर की सफाई, भोजन बनाना, बच्चों का पालन-पोषण, बुजुर्गों की सेवा, परिवार के स्वास्थ्य और संस्कारों की रक्षा, घरेलू प्रबंधन और सामाजिक संबंधों का निर्वहन-इन सभी कार्यों को महिलाओं का स्वाभाविक दायित्व माना गया। परिणामस्वरूप उनके श्रम को कभी आर्थिक दृष्टि से नहीं आंका गया। वास्तव में यदि किसी परिवार में गृहिणी द्वारा किए जाने वाले सभी कार्यों के लिए अलग-अलग व्यक्तियों को नियुक्त किया जाए, तो उस पर भारी आर्थिक व्यय आएगा। इसके बावजूद गृहिणी के श्रम को न तो वेतन मिलता है और न ही सामाजिक मान्यता। वह चौबीस घंटे और वर्ष के तीन सौ पैंसठ दिन कार्यरत रहती है। उसका कोई अवकाश नहीं होता, कोई पदोन्नति नहीं होती और कोई सेवानिवृत्ति नहीं होती। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय का यह कहना कि गृहिणी केवल परिवार नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देती है, सामाजिक चेतना को नई दिशा देने वाला विचार है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/homemakers-are-nation-builders-understand-how-never-underestimate-contribution-through-their-work" target="_blank">गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, समझिए कैसे? उनके कार्यगत योगदान को कदापि कम मत आंकिए</a></h3><div>न्यायालय ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामले में गृहिणी की सेवाओं का मूल्यांकन न्यूनतम 30 हजार रुपये प्रतिमाह के आधार पर करने की बात कही। यह केवल एक कानूनी निर्णय नहीं, बल्कि उस सामाजिक मानसिकता को चुनौती है जो घरेलू श्रम को महत्वहीन समझती रही है। वास्तव में महिलाओं का यह अदृश्य श्रम देश की अर्थव्यवस्था की नींव है। यदि इस श्रम का आर्थिक मूल्यांकन किया जाए और उसे सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शामिल किया जाए, तो भारत की अर्थव्यवस्था की तस्वीर काफी बदल सकती है। लेकिन इसी संदर्भ में दूसरा पक्ष और भी अधिक चिंता पैदा करता है। जिस महिला के योगदान को सर्वोच्च न्यायालय राष्ट्र निर्माण का आधार मान रहा है, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने सफल 12 वर्ष के रिकार्ड प्रधानमंत्री शासन की आयोजनाओं के अवसर पर महिलाओं के सर्वांगीण विकास एवं सम्मान की अधिकारी मान कर रहे हैं, क्या उसे वह सम्मान, सुरक्षा और गरिमा प्राप्त है जिसकी वह अधिकारी है? दुर्भाग्य से इसका उत्तर संतोषजनक नहीं है।</div><div><br></div><div>राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के विरुद्ध हिंसा आज भी एक गंभीर सामाजिक समस्या बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रत्येक चौथी महिला और शहरी क्षेत्रों में प्रत्येक छठी महिला हिंसा का सामना करती है। 18 से 49 वर्ष आयु वर्ग की विवाहित महिलाओं में लगभग 22 प्रतिशत ने स्वीकार किया है कि उन्हें वैवाहिक जीवन में घरेलू हिंसा झेलनी पड़ी। यह स्थिति एक गहरे विरोधाभास को उजागर करती है। जिस महिला को राष्ट्रनिर्माता कहा जा रहा है, वही महिला अपने घर, परिवार और समाज में असुरक्षा और हिंसा का सामना करने को विवश है। यह स्थिति तब है जब महिलाओं की सुरक्षा के लिए अनेक कानून बनाए जा चुके हैं और महिला अधिकारों को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि यदि कानून मौजूद हैं, योजनाएं चल रही हैं और महिला सशक्तीकरण को राष्ट्रीय एजेंडा बनाया जा चुका है, तो फिर महिलाओं के खिलाफ हिंसा क्यों नहीं रुक रही? आखिर क्यों घर से लेकर कार्यस्थल तक महिलाएं स्वयं को पूर्णतः सुरक्षित महसूस नहीं कर पातीं?</div><div><br></div><div>इसका उत्तर केवल कानूनी व्यवस्था में नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में छिपा है। भारतीय समाज का एक बड़ा हिस्सा आज भी पितृसत्तात्मक सोच से प्रभावित है। महिलाओं को परिवार की धुरी तो माना जाता है, लेकिन निर्णय लेने की स्वतंत्रता और समान अधिकार देने में संकोच किया जाता है। एक ओर उनके श्रम पर परिवार की पूरी व्यवस्था निर्भर रहती है, दूसरी ओर उनके योगदान को पर्याप्त सम्मान नहीं मिलता। यही मानसिकता कई बार घरेलू हिंसा, आर्थिक शोषण और सामाजिक भेदभाव का कारण बनती है। आज भी दहेज प्रथा समाज पर कलंक बनी हुई है। अनेक शिक्षित परिवारों में भी दहेज की मांग और उससे जुड़े अपराध सामने आते हैं। हाल के वर्षों में दहेज हत्या और उत्पीड़न के अनेक मामले राष्ट्रीय चर्चा का विषय बने हैं। यह विडंबना ही है कि एक लड़की की शिक्षा, पालन-पोषण और विवाह पर भारी व्यय करने वाले माता-पिता को विवाह के समय अतिरिक्त आर्थिक बोझ उठाने के लिए मजबूर किया जाता है। यह केवल सामाजिक कुरीति नहीं, बल्कि महिलाओं के सम्मान पर सीधा आघात है।</div><div><br></div><div>इसके अतिरिक्त कई क्षेत्रों में महिलाओं को डायन बताकर प्रताड़ित करने, यौन हिंसा, बाल विवाह, मानव तस्करी और लैंगिक भेदभाव जैसी समस्याएं भी मौजूद हैं। विशेष रूप से ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में अंधविश्वासों तथा सामाजिक पिछड़ेपन के कारण महिलाओं के खिलाफ हिंसा की घटनाएं अधिक दिखाई देती हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आर्थिक विकास के बावजूद सामाजिक चेतना का विकास अपेक्षित स्तर तक नहीं पहुंच पाया है। महिला सशक्तीकरण को केवल राजनीतिक प्रतिनिधित्व या आर्थिक अवसरों तक सीमित नहीं किया जा सकता। सशक्तीकरण का वास्तविक अर्थ है-सम्मान, सुरक्षा, समान अवसर और स्वतंत्र निर्णय क्षमता। यदि कोई महिला आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन घर में हिंसा का शिकार है, तो उसे पूर्णतः सशक्त नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार यदि उसे राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल जाए, लेकिन सामाजिक सम्मान न मिले, तो भी सशक्तीकरण अधूरा रहेगा।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि महिला सशक्तीकरण को बहुआयामी दृष्टि से देखा जाए। महिलाओं के घरेलू श्रम को मान्यता देने के साथ-साथ उनकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है। विद्यालयों और परिवारों में लैंगिक समानता के संस्कार विकसित किए जाएं। पुरुषों और लड़कों को भी इस परिवर्तन प्रक्रिया का भाग बनाया जाए। केवल महिलाओं को जागरूक करने से समस्या का समाधान नहीं होगा, समाज की सोच में परिवर्तन लाना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक बनाने, शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाने तथा कानूनी सहायता उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। पुलिस और प्रशासन को महिलाओं से जुड़े मामलों में अधिक संवेदनशील और उत्तरदायी बनाना होगा। कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन सुनिश्चित करना होगा ताकि अपराधियों में दंड का भय उत्पन्न हो और पीड़ित महिलाओं को न्याय प्राप्त हो सके। साथ ही यह भी आवश्यक है कि महिलाओं के अवैतनिक श्रम को राष्ट्रीय आर्थिक विमर्श का हिस्सा बनाया जाए। समय आ गया है कि घरेलू कार्यों को केवल निजी दायित्व न मानकर सामाजिक और आर्थिक योगदान के रूप में स्वीकार किया जाए। इससे न केवल महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ेगा, बल्कि समाज में उनके प्रति सम्मान की भावना भी सुदृढ़ होगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय हमें यह संदेश देता है कि राष्ट्र निर्माण केवल संसद, उद्योग, सेना या प्रशासन तक सीमित नहीं है। परिवार का निर्माण और उसका संरक्षण भी राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है और इस कार्य की सबसे बड़ी वाहक महिला है। लेकिन यदि वही महिला हिंसा, भेदभाव और असुरक्षा का सामना करती रहे, तो राष्ट्र निर्माण का यह सपना अधूरा ही रहेगा। इसलिए आज आवश्यकता केवल महिलाओं के श्रम का मूल्यांकन करने की नहीं, बल्कि उनके जीवन का मूल्य समझने की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 13:06:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/if-the-homemaker-is-a-nation-builder-why-is-she-a-victim-of-violence</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/13/supreme-court_large_1306_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[असम-नगालैंड के बीच दशकों का विवाद खत्म, तेल समझौता संपन्न, शाह ने पूर्वोत्तर का भाग्य ही बदल दिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/assam-nagaland-oil-deal-and-assam-nagaland-border-dispute-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रही मोदी सरकार को पूर्वोत्तर से एक बड़ी रणनीतिक सफलता मिली है। केंद्र, असम और नगालैंड के बीच तेल और प्राकृतिक गैस अन्वेषण को लेकर हुआ त्रिपक्षीय समझौता भारत को ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने के अभियान का निर्णायक अध्याय है। दशकों से विवाद और अस्थिरता में फंसे असम, नगालैंड सीमा क्षेत्र में तेल खोज का रास्ता खोलकर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस मिशन को नई ताकत दे दी है, जिसका लक्ष्य विदेशी तेल निर्भरता घटाकर भारत को ऊर्जा महाशक्ति बनाना है। यही वजह है कि अमित शाह ने इसे विकसित पूर्वोत्तर और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि केन्द्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह की मौजूदगी में भारत सरकार, असम सरकार और नगालैंड सरकार के बीच असम-नगालैंड सीमावर्ती क्षेत्रों में खनिज तेल संचालन के संबंध में एक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इस मौके पर केन्द्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी, असम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा और नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफ्यू रियो सहित केंद्र, असम एवं नगालैंड सरकार के वरिष्ठ अधिकारी मौजूद थे। अमित शाह ने इसे ऐतिहासिक क्षण बताते हुए साफ कहा कि इस समझौते ने विकसित पूर्वोत्तर के रास्ते में खड़ी अंतिम बड़ी बाधा हटा दी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-tightens-border-security-against-bangladeshi-infiltrators" target="_blank">India Bangladesh Border पर BSF और BGB के बीच तीखी बहस, बांग्लादेश को आखिरकार वापस लेना पड़ा घुसपैठिया</a></h3><div>हम आपको बता दें कि असम और नगालैंड की सीमा से लगे विवादित क्षेत्र में तीन दशक से अधिक समय से तेल और खनिज अन्वेषण ठप पड़ा था। अधिकार क्षेत्र को लेकर दोनों राज्यों के बीच तनाव बना रहता था, जिसके कारण हजारों करोड़ रुपये की संपदा जमीन के नीचे दबी रह गई। अब इस समझौते के तहत एक हजार वर्ग किलोमीटर से अधिक क्षेत्र में तेल, गैस और खनिज संसाधनों की खोज और उत्पादन का रास्ता खुल गया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दोनों राज्यों ने संसाधनों के बंटवारे पर 50-50 की सहमति बनाई है। यही वह राजनीतिक परिपक्वता है जिसने इस समझौते को टकराव से निकालकर साझेदारी के मॉडल में बदल दिया।</div><div><br></div><div>अमित शाह ने दावा किया कि इस एक समझौते से प्रतिदिन एक हजार से पंद्रह सौ बैरल तेल उत्पादन क्षमता को दस गुना तक बढ़ाया जा सकता है। केवल एक तेल क्षेत्र से पंद्रह हजार करोड़ रुपये से अधिक की संभावित प्राप्ति का अनुमान जताया गया है। यह बयान केवल आर्थिक संभावना का संकेत नहीं, बल्कि उस रणनीतिक दिशा का संकेत है जिसमें भारत तेजी से आगे बढ़ना चाहता है। वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव, पश्चिम एशिया में अस्थिरता और ऊर्जा आपूर्ति संकटों के दौर में भारत लंबे समय से आयातित तेल पर निर्भरता घटाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे समय में पूर्वोत्तर के विशाल तेल और गैस भंडार भारत के लिए नई ऊर्जा रीढ़ साबित हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल यह समझौता केवल तेल निकालने का मसला नहीं है। यह पूर्वोत्तर को संघर्ष की पहचान से निकालकर सामरिक और आर्थिक शक्ति केंद्र में बदलने की कवायद है। अमित शाह ने कहा कि यदि नगालैंड में फैले तेल और गैस भंडार का पूरा दोहन हुआ तो भारत विदेशी देशों पर अपनी ऊर्जा निर्भरता काफी हद तक कम कर सकेगा। इसका सीधा मतलब है कि भारत अपने ऊर्जा हितों को लेकर अधिक स्वतंत्र रणनीति अपना सकेगा। देखा जाये तो ऊर्जा आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक मुद्दा नहीं होती, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मूल तत्व बन चुकी है।</div><div><br></div><div>साथ ही इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा बड़ा पहलू सुरक्षा और शांति से जुड़ा है। अमित शाह ने पूर्वोत्तर में हिंसा की घटनाओं में लगभग अस्सी प्रतिशत गिरावट का दावा करते हुए कहा कि वर्ष 2019 के बाद 12 शांति समझौते हुए हैं। यही कारण है कि अब सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को भी पूर्वोत्तर के अधिकांश हिस्सों से हटाने की तैयारी चल रही है। अमित शाह ने विश्वास जताया कि अगले वर्ष एक या दो राज्यों को छोड़कर पूरे पूर्वोत्तर से यह कानून हटाया जा सकता है। यह बयान बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि दशकों तक पूर्वोत्तर की पहचान उग्रवाद, सैन्य उपस्थिति और अस्थिरता से जुड़ी रही है। अब केंद्र सरकार यह संदेश देना चाहती है कि क्षेत्र संघर्ष से विकास की ओर बढ़ चुका है।</div><div><br></div><div>रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह समझौता चीन और दक्षिण पूर्व एशिया से जुड़ी भारत की व्यापक नीति से भी मेल खाता है। पूर्वोत्तर भारत लंबे समय तक केवल भौगोलिक सीमा माना जाता रहा, लेकिन अब उसे आर्थिक गलियारे, ऊर्जा केंद्र और संपर्क सेतु के रूप में विकसित किया जा रहा है। सड़क, रेल, निवेश, पर्यटन और ऊर्जा परियोजनाओं के जरिए केंद्र सरकार इस क्षेत्र को राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा में लाने की कोशिश कर रही है। तेल और गैस परियोजनाओं के सक्रिय होने से निजी निवेश बढ़ेगा, रोजगार पैदा होंगे और क्षेत्रीय असंतोष कम होगा। यही वह बिंदु है जहां विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा एक दूसरे के पूरक बन जाते हैं।</div><div><br></div><div>असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा ने भी कहा कि यह समझौता देश की दीर्घकालिक ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद करेगा। वहीं नगालैंड के मुख्यमंत्री नेफियू रियो की सहमति इस बात का संकेत है कि अब पूर्वोत्तर की राजनीति टकराव से अधिक आर्थिक साझेदारी की दिशा में बढ़ रही है। यही कारण है कि अमित शाह ने इसे जीत हार का नहीं, बल्कि सबकी जीत का समझौता बताया।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अब स्पष्ट है कि यह त्रिपक्षीय समझौता केवल सीमाई विवाद सुलझाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूर्वोत्तर के भविष्य को नए सिरे से परिभाषित करने की शुरुआत है। यदि सरकार अपने दावों के अनुरूप तेल उत्पादन, निवेश और शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में सफल रहती है, तो आने वाले वर्षों में पूर्वोत्तर भारत की ऊर्जा शक्ति, सामरिक मजबूती और आर्थिक विस्तार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 13:36:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/assam-nagaland-oil-deal-and-assam-nagaland-border-dispute-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/12/assam-nagaland-oil-deal_large_1337_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, समझिए कैसे? उनके कार्यगत योगदान को कदापि कम मत आंकिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/homemakers-are-nation-builders-understand-how-never-underestimate-contribution-through-their-work]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत के सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court of India) ने हाल ही में गृहिणियों के योगदान पर एक महत्वपूर्ण फैसला देते हुए कहा कि "गृहिणियां राष्ट्र निर्माता (Nation Builders) हैं" और उनके घरेलू व देखभाल संबंधी कार्यों का वास्तविक आर्थिक मूल्य है। सुप्रीम कोर्ट ने अपनी प्रमुख टिप्पणियों में कहा कि गृहिणी को केवल "आश्रित" (dependent) मानना गलत है; वास्तव में पूरा परिवार उनके श्रम और देखभाल पर निर्भर रहता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लिहाजा, महिलाओं द्वारा किया जाने वाला अवैतनिक घरेलू और देखभाल कार्य भारत की GDP में अनुमानतः 15-17% तक योगदान देता है, फिर भी उसे पर्याप्त मान्यता नहीं मिलती। वह गृहणियां ही हैं जो बच्चों के पालन-पोषण, शिक्षा, संस्कार और मानव संसाधन निर्माण के माध्यम से राष्ट्र निर्माण में प्रत्यक्ष भूमिका निभाती हैं। इसलिए अदालत ने कहा कि घरेलू कार्य को आर्थिक विश्लेषण से बाहर रखना उचित नहीं है और कानून को गृहिणियों के श्रम, सेवा और त्याग का मूल्य स्वीकार करना चाहिए। निष्कर्ष यह कि गृहिणियां राष्ट्र निर्माता हैं, इसलिए उनके कार्यगत योगदान को कम मत आंकिए।</div><div><br></div><div>देखा जाए तो एक ऐतिहासिक कदम के रूप में सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजा मामलों में गृहिणी के घरेलू योगदान का मूल्यांकन करते हुए कम-से-कम ₹30,000 प्रतिमाह का मानक निर्धारित किया है तथा "loss of domestic care" को अलग क्षतिपूर्ति मद के रूप में मान्यता दी है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट ने पहले भी कहा था कि, "गृहिणी का घर में किया गया कार्य उसके कार्यालय जाने वाले पति के काम से कम मूल्यवान नहीं है।"&nbsp;</div><div><br></div><div>इसलिए न्यायपालिका का दृष्टिकोण अब स्पष्ट रूप से यह है कि गृहिणियां केवल परिवार की देखभाल करने वाली नहीं, बल्कि आर्थिक योगदानकर्ता और राष्ट्र निर्माता हैं। चुनौती अब यह है कि सरकारें, निजी संस्थान और समाज इस न्यायिक मान्यता को सामाजिक और आर्थिक नीतियों में कितना उतारते हैं। इस बात में कोई दो राय नहीं कि गृहिणियों का योगदान भारतीय समाज और अर्थव्यवस्था की रीढ़ माना जाता है, लेकिन विडंबना यह है कि उनके श्रम को अक्सर "काम" के बजाय "कर्तव्य" मान लिया जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी कारण उनके योगदान को वह संस्थागत मान्यता नहीं मिल पाती जिसकी वे हकदार हैं। सवाल है कि गृहिणियों का आर्थिक योगदान कितना बड़ा है? तो अर्थशास्त्रियों और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार यदि घर के भीतर किए जाने वाले कार्य—जैसे भोजन बनाना, बच्चों की देखभाल, बुजुर्गों की सेवा, घरेलू प्रबंधन, भावनात्मक देखभाल आदि—का बाजार मूल्य जोड़ा जाए, तो इसका योगदान GDP के 15% से 40% तक आंका गया है। भारत में कई अध्ययनों ने इसे लगभग 15-17% या उससे भी अधिक बताया है।</div><div><br></div><h2># सवाल है कि फिर भी उनके इन महत्वपूर्ण कार्यों को मान्यता क्यों नहीं मिलती? तो जवाब निम्नलिखित होगा:-</h2><div><br></div><div>पहला, जीडीपी की गणना का तरीका: GDP केवल उन वस्तुओं और सेवाओं को गिनता है जिनका बाजार में लेन-देन होता है। गृहिणी का श्रम घर के भीतर होता है, इसलिए वह राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में सीधे नहीं दिखता।</div><div><br></div><div>दूसरा, ऐतिहासिक सामाजिक दृष्टिकोण: सदियों से घरेलू कार्यों को महिलाओं का "स्वाभाविक दायित्व" माना गया। जब किसी कार्य को कर्तव्य मान लिया जाता है, तो उसका आर्थिक मूल्यांकन कम हो जाता है।</div><div><br></div><div>तीसरा, श्रम का अदृश्य होना: एक गृहिणी दिनभर में दर्जनों काम करती है, लेकिन वे छोटे-छोटे हिस्सों में बंटे होते हैं। इसलिए उनका श्रम उतना दिखाई नहीं देता जितना किसी कार्यालय या फैक्ट्री में काम करने वाले व्यक्ति का।</div><div><br></div><div>चौथा, नीति निर्माण में कम प्रतिनिधित्व: सत्ता और नीति-निर्माण संस्थानों में लंबे समय तक पुरुषों का वर्चस्व रहा। परिणामस्वरूप घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन का प्रश्न प्राथमिकता नहीं बन पाया।</div><div><br></div><div>पांचवां, वेतन और मूल्य का भ्रम: समाज अक्सर मानता है कि जिस काम के बदले वेतन नहीं मिलता, उसका आर्थिक मूल्य भी नहीं है। जबकि गृहिणी का श्रम परिवार की आय और उत्पादकता को प्रत्यक्ष रूप से बढ़ाता है।</div><div><br></div><h2># सवाल है कि निजी क्षेत्र और सरकारें क्या कर सकती हैं?</h2><div>तो अपेक्षाएं निम्नलिखित होंगीं:-</div><div><br></div><div>पहला, घरेलू श्रम का नियमित आर्थिक मूल्यांकन। दूसरा, जनगणना और राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में गृहिणी श्रम का अलग लेखा-जोखा। तीसरा, सामाजिक सुरक्षा, पेंशन और बीमा योजनाओं का विस्तार। चौथा, घरेलू कार्यों को "अनपेड वर्क" के रूप में नीति दस्तावेजों में मान्यता। और पांचवां, परिवारों में घरेलू जिम्मेदारियों का अधिक समान वितरण।</div><div><br></div><h2># जानिए, राष्ट्र निर्माण में गृहिणियों की भूमिका</h2><div><br></div><div>गृहिणी केवल घर नहीं संभालती, वह भविष्य की पीढ़ी का निर्माण करती है। एक शिक्षक, डॉक्टर, सैनिक, वैज्ञानिक, उद्यमी या नेता बनने से पहले हर व्यक्ति किसी परिवार में पलता-बढ़ता है। उस प्रक्रिया में गृहिणियों का योगदान आधारशिला जैसा होता है। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि गृहिणियां केवल परिवार निर्माता नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माता भी हैं। चुनौती यह है कि समाज और संस्थाएं इस योगदान को भावनात्मक सम्मान के साथ-साथ आर्थिक और नीतिगत मान्यता भी दें।</div><div><br></div><h2># भारतीय हिंदी साहित्य में उन्हें श्रद्धा व भक्ति की दृष्टि से देखा गया है</h2><div><br></div><div>"नारी तुम केवल श्रद्धा हो" — नामक कवि जयशंकर प्रसाद की प्रसिद्ध पंक्ति भारतीय समाज में स्त्री के सम्मान का आदर्श प्रस्तुत करती है। लेकिन आज यह प्रश्न स्वाभाविक है कि केवल श्रद्धा, सम्मान और प्रशंसा के शब्दों से कब तक काम चलेगा? यदि एक ओर स्त्री को "देवी", "शक्ति", "मां" और "राष्ट्र निर्माता" कहा जाए, और दूसरी ओर उसके श्रम, अधिकारों और योगदान को उचित मान्यता न मिले, तो यह विरोधाभास ही माना जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/major-supreme-court-ruling-30000-monthly-compensation-sought-for-homemakers" target="_blank">Supreme Court का बड़ा फैसला, Homemakers को 'राष्ट्र निर्माता' मानकर 30,000 रु. मासिक मुआवज़ा</a></h3><div>गृहिणियों के संदर्भ में यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है। यदि वे परिवार की आधारशिला हैं, बच्चों के माध्यम से भविष्य के नागरिकों का निर्माण करती हैं, उनका अवैतनिक श्रम अर्थव्यवस्था में बड़ा योगदान देता है, और सर्वोच्च न्यायालय भी उन्हें "राष्ट्र निर्माता" मानता है, तो फिर केवल काव्यात्मक सम्मान पर्याप्त नहीं है। इसलिए आज आवश्यकता है कि सम्मान के साथ आर्थिक मान्यता की, प्रशंसा के साथ सामाजिक सुरक्षा की, आदर्शवाद के साथ नीतिगत बदलावों की, और प्रतीकात्मक गौरव के साथ व्यावहारिक अधिकारों की।</div><div><br></div><div>इसी भावना को आधुनिक संदर्भ में यूँ कहा जा सकता है- नारी तुम केवल श्रद्धा हो, यह कहना अब पर्याप्त नहीं, तुम श्रम हो, सृजन हो, सामर्थ्य हो, तुम्हारा मूल्यांकन भी आवश्यक है। सम्मान के शब्द मधुर हैं, पर न्याय उससे भी अधिक आवश्यक है। दरअसल, 21वीं सदी की स्त्री-विमर्श का एक बड़ा संदेश यही है कि स्त्री को केवल पूजने या महिमामंडित करने के बजाय उसके योगदान को वास्तविक अवसर, अधिकार और मान्यता दी जाए। तभी "नारी तुम केवल श्रद्धा हो" जैसी पंक्तियां अपने पूर्ण अर्थ में सार्थक होंगी।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 13:34:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/homemakers-are-nation-builders-understand-how-never-underestimate-contribution-through-their-work</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/12/supreme-court_large_1335_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[सांसद और विधायक भाग रहे, क्या ममता बनर्जी भी TMC छोड़ कर कांग्रेस में जा रही हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-tmc-crisis-congress-merger-bengal-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति इस समय अपने सबसे उथल पुथल भरे दौर से गुजर रही है। कभी बंगाल की निर्विवाद ताकत मानी जाने वाली ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस अब अंदरूनी बगावत, सांसदों और विधायकों के पलायन तथा राजनीतिक अस्तित्व के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। दिल्ली में सोनिया गांधी के साथ ममता बनर्जी और राहुल गांधी के साथ अभिषेक बनर्जी की बैठकों ने इस संकट को और अधिक राजनीतिक रंग दे दिया है। भले ही कांग्रेस और तृणमूल दोनों सार्वजनिक रूप से किसी विलय की संभावना से इंकार कर रहे हों, लेकिन घटनाक्रम यह संकेत दे रहा है कि बंगाल की राजनीति में एक बड़ा पुनर्संयोजन शुरू हो चुका है। एक तरह से यह साफ नजर आ रहा है कि सिर्फ टीएमसी के सांसद, विधायक और पार्षद ही पाला नहीं बदल रहे हैं खुद टीएमसी प्रमुख अपनी पार्टी को खत्म कर कांग्रेस में वापस लौटना चाह रही हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि दिल्ली में राहुल गांधी और अभिषेक बनर्जी की डेढ़ घंटे लंबी मुलाकात तथा उससे पहले सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की बैठक ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। तृणमूल कांग्रेस ने इन बैठकों को लोकतंत्र और संविधान बचाने की साझा प्रतिबद्धता बताया, लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह महज औपचारिक बातचीत नहीं थी। बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद जिस तरह तृणमूल कांग्रेस कमजोर हुई है और पार्टी के भीतर टूट की स्थिति बनी है, उसके बाद कांग्रेस से नजदीकी बनाना ममता बनर्जी की राजनीतिक मजबूरी बन गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/hat-trick-of-resignations-in-mamata-banerjee-tmc-mp-prakash-chik-baraik-also-quits-rajya-sabha" target="_blank">Mamata Banerjee की TMC में इस्तीफों की हैट्रिक, सांसद Prakash Chik Baraik ने भी Rajya Sabha छोड़ी</a></h3><div>स्थिति यह है कि तृणमूल कांग्रेस के भीतर विद्रोह अब खुली चुनौती का रूप ले चुका है। पार्टी के 80 में से 58 विधायक अलग होकर निष्कासित विधायक रितब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गुट के साथ चले गए हैं। इस गुट को विधानसभा में मुख्य विपक्षी दल के रूप में मान्यता भी मिल चुकी है। रितब्रत बनर्जी लगातार दावा कर रहे हैं कि वही “असली तृणमूल कांग्रेस” हैं और कांग्रेस के साथ किसी भी प्रकार के विलय या समझौते के खिलाफ हैं। उनका दावा है कि उनके साथ विधायकों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कई सांसद भी उनके संपर्क में हैं।</div><div><br></div><div>राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस के साथ संभावित विलय या अत्यधिक नजदीकी की अटकलों ने तृणमूल कांग्रेस के भीतर असुरक्षा और बेचैनी को और बढ़ा दिया है। पार्टी के कई विधायक, सांसद और क्षेत्रीय नेता अपनी पूरी राजनीतिक पहचान कांग्रेस विरोध की जमीन पर बनाकर आगे बढ़े थे। ऐसे में उन्हें यह डर सता रहा है कि यदि ममता बनर्जी अंततः कांग्रेस के साथ विलय या व्यापक राजनीतिक समझौते की राह पर चलती हैं, तो उनकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान समाप्त हो जाएगी। यही कारण है कि तृणमूल में भगदड़ और तेज होने की संभावना जताई जा रही है। पार्टी के भीतर एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो कांग्रेस में लौटने के पक्ष में नहीं है और वह या तो अलग गुट के साथ रहना चाहता है या फिर नए राजनीतिक विकल्प तलाश रहा है। यही बेचैनी अब खुले विद्रोह और लगातार इस्तीफों के रूप में सामने आती दिखाई दे रही है।</div><div><br></div><div>संकट केवल विधानसभा तक सीमित नहीं है। संसद में भी तृणमूल कांग्रेस की नींव हिलती दिख रही है। राज्यसभा सांसद प्रकाश चिक बराइक के इस्तीफे ने पार्टी की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। उनसे पहले सुष्मिता देव और सुखेंदु शेखर राय भी पार्टी और राज्यसभा से इस्तीफा दे चुके हैं। सुष्मिता देव की असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा से मुलाकात ने यह अटकलें और तेज कर दी हैं कि तृणमूल कांग्रेस के कई नेता अब भारतीय जनता पार्टी की ओर रुख कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>लोकसभा में भी तृणमूल के भीतर विद्रोही खेमे की ताकत बढ़ती दिखाई दे रही है। काकोली घोष दस्तिदार के नेतृत्व वाला गुट दावा कर रहा है कि उसे बीस से अधिक सांसदों का समर्थन हासिल है। सयोनी घोष, माला राय, युसुफ पठान, शताब्दी राय, शत्रुघ्न सिन्हा और रचना बनर्जी जैसे कई चर्चित नाम विद्रोही खेमे के साथ बताए जा रहे हैं। बताया जा रहा है कि यह गुट राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार को समर्थन देने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिख चुका है।</div><div><br></div><div>इन घटनाओं के बीच कांग्रेस की भूमिका बेहद दिलचस्प हो गई है। बंगाल कांग्रेस के भीतर भी मतभेद खुलकर सामने आ गए हैं। अधीर रंजन चौधरी और अब्दुल मन्नान जैसे वरिष्ठ नेता ममता बनर्जी के साथ किसी भी तरह की नजदीकी के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। मन्नान ने तो यहां तक कह दिया कि “गंदे पानी को साफ पानी में मिलाने से साफ पानी भी गंदा हो जाता है।” अधीर रंजन चौधरी ने ममता पर कांग्रेस को बंगाल से खत्म करने का आरोप लगाते हुए कहा कि अब वही ममता गांधी परिवार के सहारे की तलाश में हैं।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष शुभंकर सरकार ने अपेक्षाकृत नरम रुख अपनाया है। उन्होंने कहा कि जो राहुल गांधी को भविष्य का प्रधानमंत्री और विपक्ष का नेता मानता है, उसका स्वागत है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भ्रष्टाचार के आरोपों से बचने के लिए कांग्रेस की छतरी का इस्तेमाल करने वालों के लिए दरवाजे खुले नहीं हैं। यह बयान सीधे तौर पर तृणमूल के उन नेताओं की ओर इशारा माना जा रहा है जिन पर विभिन्न घोटालों के आरोप लगे हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि ममता बनर्जी का पूरा राजनीतिक उदय ही कांग्रेस के खिलाफ विद्रोह की जमीन पर खड़ा हुआ था। वर्ष 1998 में उन्होंने जोरशोर से कांग्रेस से अलग होकर तृणमूल कांग्रेस का गठन किया था। उस समय ममता ने कांग्रेस नेतृत्व पर बंगाल की राजनीति की अनदेखी करने और वामपंथ के सामने आत्मसमर्पण करने का आरोप लगाया था। इसके बाद उन्होंने खुद को कांग्रेस के विकल्प के रूप में स्थापित किया और धीरे धीरे बंगाल में कांग्रेस की जड़ें कमजोर कर दीं। वर्ष 2011 में वाम मोर्चे को सत्ता से हटाने के बाद ममता बनर्जी ने अपने राजनीतिक विस्तार के लिए कांग्रेस से पूरी दूरी बना ली थी और लगातार गांधी परिवार तथा कांग्रेस नेतृत्व पर तीखे हमले करती रहीं। लेकिन अब जब तृणमूल कांग्रेस भीतर से टूट रही है, सांसद और विधायक पार्टी छोड़ रहे हैं और राजनीतिक जमीन खिसकती दिखाई दे रही है, तब वही ममता बनर्जी एक बार फिर कांग्रेस की जड़ों की ओर लौटती नजर आ रही हैं। यही वजह है कि दिल्ली में गांधी परिवार के साथ उनकी बैठकों को केवल शिष्टाचार मुलाकात मानने को राजनीतिक विश्लेषक तैयार नहीं हैं।</div><div><br></div><div>दरअसल, बंगाल की राजनीति अब केवल सत्ता की लड़ाई नहीं रह गई है, बल्कि यह अस्तित्व की जंग बन चुकी है। तृणमूल कांग्रेस संगठनात्मक बिखराव से जूझ रही है और बात सिर्फ संसद या विधानसभा में उसके सदस्यों तक सीमित नहीं रह गयी है। बंगाल में कई निगमों से उसके महापौर या पार्षद इस्तीफा दे चुके हैं और पंचायतों में भी इसी तरह के इस्तीफों का दौर जारी है। इस सबके बीच भाजपा यह स्पष्ट कर चुकी है कि तृणमूल कांग्रेस के नेताओं के लिए उसके दरवाजे बंद हैं वहीं कांग्रेस इस संकट को अपने पुनर्जीवन के अवसर के रूप में देख रही है। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी एकता की राजनीति को मजबूती देने के लिए कांग्रेस बंगाल में नई संभावनाएं तलाश रही है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ममता बनर्जी कांग्रेस के साथ राजनीतिक समझौते की राह पर चलेंगी, या फिर पार्टी के भीतर का विद्रोह उन्हें और कमजोर कर देगा। यदि तृणमूल कांग्रेस का टूटना जारी रहा तो बंगाल की राजनीति में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल सकता है। आने वाले नगर निकाय चुनाव और उपचुनाव इस बदलाव की पहली बड़ी परीक्षा साबित होंगे। फिलहाल इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में शुरू हुई यह हलचल केवल राज्य तक सीमित नहीं रहने वाली, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष की राजनीति पर भी इसका गहरा असर पड़ने वाला है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 11 Jun 2026 12:46:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-tmc-crisis-congress-merger-bengal-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/11/sonia-mamata_large_1246_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मोदी ने नेहरु का रिकॉर्ड तोड़ने के साथ ही कांग्रेस का घमंड भी चकनाचूर कर दिया है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-becomes-indias-longest-serving-elected-pm]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>“मोदी हैं तो मुमकिन है”, यह केवल एक नारा नहीं, बल्कि पिछले बारह वर्षों में भारत की बदलती राजनीतिक और प्रशासनिक तस्वीर का सबसे सशक्त प्रतीक बन चुका है। जिस उपलब्धि को दशकों तक असंभव माना जाता रहा, उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संभव कर दिखाया है। 10 जून 2026 को नरेंद्र मोदी ने देश के सबसे लंबे समय तक लगातार सेवा देने वाले निर्वाचित प्रधानमंत्री बनकर इतिहास के पन्नों में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज करा लिया। लगातार 4399 दिनों तक देश का नेतृत्व करते हुए उन्होंने भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु के 4398 दिनों के पुराने रिकॉर्ड को पीछे छोड़ दिया।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह उपलब्धि केवल एक रिकॉर्ड टूटने भर की कहानी नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र में आए एक बड़े राजनीतिक परिवर्तन का प्रतीक भी है। नरेंद्र मोदी ने सिर्फ नेहरू का रिकॉर्ड नहीं तोड़ा है बल्कि उस राजनीतिक सोच को भी चुनौती दी है जिसमें लंबे समय तक यह माना जाता रहा कि सत्ता पर केवल एक ही परिवार या एक ही दल का स्वाभाविक अधिकार है। दशकों तक देश की राजनीति गांधी परिवार और कांग्रेस पर केंद्रित रही, लेकिन एक गरीब परिवार से निकले, संघर्षों के बीच पले-बढ़े और कभी रेलवे स्टेशन पर चाय बेचने वाले नरेंद्र मोदी ने लोकतंत्र की ताकत के बल पर देश की सर्वोच्च सत्ता तक पहुंचकर भारतीय राजनीति की दिशा ही बदल दी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality" target="_blank">नरेंद्र मोदी के 12 सालः भरोसे के हकीकत में बदलने का दौर</a></h3><div>मोदी का यह सफर करोड़ों सामान्य भारतीयों के लिए प्रेरणा का विषय है। यह संदेश देता है कि लोकतंत्र में अंतिम शक्ति जनता के पास होती है, और जनता जब ठान ले तो वह किसी भी स्थापित राजनीतिक समीकरण को बदल सकती है। लगातार तीसरी बार केंद्र की सत्ता संभालते हुए और सबसे लंबे कार्यकाल का रिकॉर्ड बनाकर नरेंद्र मोदी ने यह साबित कर दिया है कि मजबूत नेतृत्व, स्पष्ट विजन और जनता के भरोसे के दम पर भारतीय राजनीति में असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी हासिल किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मोदी ने जो रिकॉर्ड बनाया है वह केवल आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि यह उस जनविश्वास की कहानी है जिसने नरेंद्र मोदी को लगातार तीन बार देश की सत्ता सौंपी। आजादी के बाद केवल जवाहरलाल नेहरू ही ऐसे नेता थे जिन्होंने लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतकर सरकार बनाई थी। नरेंद्र मोदी ने भी वही करिश्मा दोहराया, लेकिन उससे आगे जाकर लोकतांत्रिक राजनीति में एक नया अध्याय लिख दिया।</div><div><br></div><div>26 मई 2014 को जब नरेंद्र मोदी ने पहली बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी, तब शायद ही किसी ने सोचा होगा कि आने वाले वर्षों में वह भारतीय राजनीति के सबसे प्रभावशाली और निर्णायक नेता बनकर उभरेंगे। 2019 में उन्होंने पहले से भी अधिक प्रचंड जनादेश हासिल किया और दूसरी बार प्रधानमंत्री बने। 2024 के चुनाव में भले भारतीय जनता पार्टी अकेले दम पर बहुमत के आंकड़े से नीचे रही, लेकिन नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की चमक और प्रभाव जरा भी कम नहीं हुआ। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने फिर सत्ता संभाली और मोदी तीसरी बार प्रधानमंत्री बने।</div><div><br></div><div>दरअसल नरेंद्र मोदी का यह सफर केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है। गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में भी उन्होंने लंबे समय तक प्रशासन संभालते हुए सुशासन का एक अलग मॉडल प्रस्तुत किया। अक्टूबर 2001 में गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने 4610 दिनों तक राज्य की कमान संभाली। मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के रूप में मिलाकर मोदी अब नौ हजार दिनों से अधिक समय तक किसी निर्वाचित सरकार के प्रमुख रह चुके हैं। मार्च 2026 में उन्होंने सिक्किम के पूर्व मुख्यमंत्री पवन कुमार चामलिंग का 8930 दिनों का रिकार्ड भी तोड़ दिया था और देश के सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले निर्वाचित प्रमुख बन गए थे।</div><div><br></div><div>उधर, मोदी के इस ऐतिहासिक मुकाम पर केवल भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया से उन्हें बधाइयों का सिलसिला मिला। इटली की प्रधानमंत्री जियोर्जिया मेलोनी ने प्रधानमंत्री मोदी को शुभकामनाएं देते हुए भारत और इटली के मजबूत होते रिश्तों का उल्लेख किया। अमेरिका के भारत में राजदूत सर्जियो गोर ने इसे दशकों की समर्पित जनसेवा और नेतृत्व का प्रमाण बताया। अमेरिकी सीनेटर जॉन कोर्निन ने मोदी के कार्यकाल को परिवर्तनकारी बताते हुए कहा कि 140 करोड़ लोगों के विश्वास ने उन्हें यह मुकाम दिलाया है। उन्होंने यह भी कहा कि मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था बना और करोड़ों लोग गरीबी से बाहर निकले।</div><div><br></div><div>मलेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहिम ने भी मोदी की उपलब्धि को भारत की समृद्धि, विकास और वैश्विक प्रतिष्ठा से जोड़ा। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुर कुमार दिसानायके और केन्या के राष्ट्रपति विलियम रुटो ने भी प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा को समर्पण, संघर्ष और जनसेवा का प्रतीक बताया। यह साफ संकेत है कि आज नरेंद्र मोदी केवल भारत के नेता नहीं, बल्कि वैश्विक मंच पर एक प्रभावशाली व्यक्तित्व बन चुके हैं।</div><div><br></div><div>उधर, देश के भीतर भी मोदी की इस उपलब्धि को लेकर उत्साह का माहौल है। भाजपा नेताओं ने आज देशभर के विभिन्न धर्म स्थलों में प्रार्थना कर भारत की खुशहाली और प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में विकसित भारत का संकल्प पूरा होने की कामना की। केंद्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में मंत्रियों ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की सराहना करते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा, समावेशी विकास और सामाजिक न्याय के क्षेत्र में मोदी सरकार की उपलब्धियों की प्रशंसा की।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की बैठक में भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व की जमकर तारीफ की गयी और एक अभिनंदन प्रस्ताव भी पारित किया गया। इस बैठक में 22 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री और एनडीए के वरिष्ठ नेताओं ने हिस्सा लिया। यह बैठक सत्तारुढ़ एनडीए की ओर से शक्ति प्रदर्शन भी माना जा रहा है। बैठक में आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री और टीडीपी प्रमुख एन. चंद्रबाबू नायडू ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अभिनंदन का प्रस्ताव पेश किया। इस प्रस्ताव का समर्थन करते हुए एनडीए नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व की जमकर तारीफ की।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नरेंद्र मोदी की राजनीति की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि उन्होंने खुद को केवल एक नेता नहीं, बल्कि बदलाव के प्रतीक के रूप में स्थापित किया है। साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वाला यह सफर आज करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा बन चुका है। यही कारण है कि जब देश की राजनीति में असंभव को संभव करने की बात होती है, तब एक ही आवाज सबसे ज्यादा गूंजती है— मोदी हैं तो मुमकिन है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 18:02:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-becomes-indias-longest-serving-elected-pm</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/10/pm-modi_large_1802_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नरेंद्र मोदी के 12 सालः भरोसे के हकीकत में बदलने का दौर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>यदि मॉनिंग कंसल्ट की माने तो दुनिया के नेताओं की सूची पर एक नजर दौड़ाई जाएं तो केई भी वैश्विक नेता स्वीकार्यता में नरेन्द्र मोदी के आसपास भी नहीं टिकते। विपक्षी पार्टियां द्वारा लगातार देश और विदेश में अभियान चलाने के बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी रेंकिंग या स्वीकार्यता के मामलें में वैश्विक नेताओं से बहुत आगे हैं। 68 प्रतिशत स्वीकार्यता नरेन्द्र मोदी की है जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की स्वीकार्यता रेंक लगातार नेगेटिव जा रही है। फालोवर्स में भी नरेन्द्र मोदी सबसे आगे हैं। दुनिया का संभवतः हमारा ही देश होगा जहां देश के बाहर भारत की छवि खराब करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी जा रही उसके बावजूद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यह स्वीकार्यता निश्चित रुप से भारत ही नहीं दुनिया के अन्य देशों में भी उनकी लोकप्रियता और सर्वमान्यता को दर्शाती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबसे लंबे समय तक प्रधानमंत्री पद पर रहने वाले चुनिंदा प्रधानमंत्री बन गए हैं। चुनिंदा इसलिए कि देश में पहले लोकसभा चुनाव 1952 में हुए पर पं. नेहरु 1947 से 1952 तक भी प्रधानमंत्री रहे।&nbsp; लगातार 12 साल कोई कम नहीं होते और वह भी लगातार 12 साल। सबसे बडी बात यह कि इस दौरान नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा ऐसे साहसिक निर्णय किये गये हैं जिनकी कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। माना तो यही जाता था कि कश्मीर में धारा 370 और 35 ए हटाना, राममंदिर का निर्माण, डिजिटल क्रांति, वैश्विक नेतृत्व, नोटबंदी, एक देश एक कर, घर घर शोचालय, घर घर कचरा संग्रहण, रक्षा उपकरणों का निर्यात, किसान सम्मान, मेक इन इंडिया, इंडिया फर्स्ट, बड़ी अर्थ व्यवस्था, तेजी से ढांचागत विकास, डिजिटल भुगतान, नक्सलवाद की नेस्तनाबूदी, आत्मनिर्भर भारत, परिवहन क्षेत्र में ढांचागत बदलाव आदि आदि समय समय पर की जाने वाली घोषणाएं केवल चुनाव जीतने के जुमले हैं पर लगभग असंभव माने जाने वाले यह काम आज धरातल पर उतरना सबसे बड़ी उपलब्धी मानी जा सकती है। इससे सबके साथ ही सबसे आश्चर्य जनक बात यह है कि लाख विरोध के बावजूद विपक्ष आज हाशिये में चला गया है।</div><div>&nbsp;</div><div>कश्मीर से धारा 370 और 35 ए की समाप्ति हो चुकी है। दुनिया के किसी देश ने खुलकर इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई। बाबरी मस्जिद के स्थान पर राममंदिर का निर्माण हो चुका है तो तीन तलाक, सीएए, यूसीसी और यहां तक कि सर्जीकल स्ट्राइक के बाद ऑपरेशन सिन्दुर तक पर दुनिया के किसी देश की भारत के खिलाफ खुलकर आवाज उठाने की हिम्मत नहीं हो पाई है। आज अर्थ व्यवस्था में जिस तेजी से बदलाव आया है और चौथी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने के बाद अब तीसरी बड़ी अर्थ व्यवस्था बनने की और तेजी से कदम बढ़ चुके हैं। जनधन योजना के समय जिस तरह से आलोचना का दौर चला था आज भुगतान में डिजिटलीकरण में इसकी बड़ी भूमिका तय हो चुकी है। जो लगभग असंभव माना जा सकता था वह आज डिजिटल भुगतान के माध्यम से संभव हो पाया है और पांच रु. के टमाटर का भुगतान भी सब्जीवाले तक को यूपीआई से आसानी से होने लगा है। सरकारी सामाजिक सुरक्षा योजना के भुगतान, पेंशन, अनुदान आदि आज सीधे खातों में जाने लगे हैं। यह किसी दिवा स्वप्न से कम नहीं है। आईपीसी सीपीसी में बदलाव किया जा चुका है। तो जीएसटी में लाख कमियां गिनाने के बावजूद आज समूचा देश एक देश एक कर के छाते के नीचे आ चुका है। बुनियादी ढांचें में तेजी से बदलाव आया है। आज वंदे भारत और नमो भारत ट्रेन चलने लगी है तो 33 किमी प्रतिदिन हाईवे का निर्माण हो रहा है। एक्सप्रेस हाईवे से आवागमन आसान हुआ है। आयुष्मान योजना से 50 करोड़ लोगों को जोड़ा जा चुका है तो सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता का नेटवर्क विस्तारित किया गया है। आज 98 प्रतिशत घरों से घर घर कचरा संग्रहण होने लगा है तो अब घर घर में शोचालय बन चुके हैं। कोरोना के दौरान हमारे प्रयासों को सारी दुनिया द्वारा सराहा गया यहां तक कि कोरोना के दौरान जीवन रक्षक की भूमिका में भारत ने भूमिका निभाई। किसानों की आय में बढ़ोतरी के ठोस प्रयास हुए हैं तो किसान सम्मान निधि के माध्यम से किसानों को उनका आत्मसम्मान उपलब्ध कराया गया है। एमएसपी व्यवस्था में सुधार हुए हैं तो खेती किसानी के क्षेत्र में बदलाव छाप दिखाई दे रहा है। मेक इन इंडिया और इंडिया फर्स्ट भी आज साकार होता दिखाई दे रहा है। आज हम रक्षा उपकरणों का निर्यात करने लगे हैं तो सहस्त्रबलों के आधुनिकीकरण और निर्णय की स्वतंत्रता का परिणाम है कि आज सेनाएं आत्मगौरव के साथ आगे बढ़ रही है। आज देश आत्म निर्भर भारत की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/12-years-of-transformation-development-legacy-and-global-leadership" target="_blank">परिवर्तन के 12 वर्ष: विकास, विरासत और वैश्विक नेतृत्व</a></h3><div>जहां तक कूटनीतिक स्तर पर सफलता की बात है तो भारत आज पिछलग्गू देशों में नहीं बल्कि दुनिया का नेतृत्व करने की स्थिति में आ गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लाख प्रयासों के बावजूद भारत के खिलाफ कुछ खास कर नहीं पा रहे हैं। पाकिस्तान के पक्ष में आज तुरकिया जैसे एकाध को छोड़कर कोई देश बोलने की स्थिति में नहीं है। मालदीव को नरेन्द्र मोदी के एक फोटो ट्वीट ने सबक सीखा दिया तो दूसरे देश भी भारत की ताकत को समझने लगे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>खैर यह सब होते हुए भी नरेन्द्र मोदी सरकार के सामने अभी चुनौतियां कम नहीं हैं। रोजगार सृजन, प्रति व्यक्ति आय में अंतर, शिक्षा व स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार, जल जीवन मिशन के बावजूद पेयजल की सहज उपलब्धता, खेती की बरसात पर निर्भरता, परिसीमन आदि ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जिन पर ठोस काम किया जाना है। देश में जिस तरह से पेपर लीक होने के मामले सामने आये हैं इससे युवाओं में निराशा हुई है उसे दूर करने की चुनौती सामने हैं तो स्टार्ट अप और कौशल विकास के बावजूद बेरोजगारी की दर अभी भी चिंतनीय स्तर पर है। साइबर क्राइम और गेमिंग जैसी नई चुनौतियां तो सोशल मीडिया के दुरुपयोग और अत्यधिक उपयोग के साइड इफेक्ट आदि अनेक समस्याएं समाधान चाहती है। देश आज तेजी से एक देष एक चुनाव के धरातल पर उतरने का इंतजार कर रहा है। रिन्यूवल एनर्जी पर बहुत कुछ हासिल करने के बावजूद अमेरिका ईरान युद्ध के कारण जिस तरह से तेल और एलपीजी का संकट आया है इसका भी दीर्घकालीन समाधान खोजा जाना है। हांलाकि समस्याएं अनवरत और नियमित प्रक्रिया है पर दीर्घकालीन योजनाओं से आसानी से निपटा जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस सबके बावजूद देशवासियों को नरेन्द्र मोदी के प्रति पूरा भरोसा है। यही कारण है कि विपक्ष की लाख आलोचनाओं के बावजूद नरेन्द्र मोदी की स्वीकार्यता और भरोसे व उनके आत्मविश्वास में किसी तरह की कमी नहीं आई है। सौ टके की बात कही जाएं तो नरेन्द्र मोदी की अपार उपलब्धियों के बावजूद चुनौतियां भी अपार है और सबसे अच्छी बात यह कि देशवासियों का उनपर भरोसा भी पूरा है और वैश्विक स्वीकार्यता भी सबसे अधिक है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 15:01:03 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-12-years-a-period-of-turning-trust-into-reality</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/10/pm-modi_large_1501_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Great Nicobar Project के जरिये Modi ने चला बड़ा Masterstroke, Indian Ocean के बीचोंबीच होगा भारत का सबसे बड़ा सैन्य किला]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-played-a-major-masterstroke-through-the-great-nicobar-project]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मोदी सरकार ने हिंद महासागर में ऐसा दांव चला है, जिसने चीन की सबसे बड़ी रणनीतिक चिंता बढ़ा दी है। ग्रेट निकोबार में बनने वाला भारत का नया सैन्य और आर्थिक हब अब दुश्मनों के लिए खुली चेतावनी बन चुका है। जिस समुद्री रास्ते से दुनिया का सबसे बड़ा तेल और व्यापार गुजरता है, वहां अब भारत अपनी ताकत का स्थायी पहरा बैठाने जा रहा है। साफ है कि मोदी सरकार हिंद महासागर में भारत को सिर्फ मजबूत नहीं, बल्कि सबसे प्रभावशाली ताकत बनाने की तैयारी में जुट चुकी है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि केंद्र सरकार ने पिछले वर्ष जिस हरित क्षेत्र हवाई अड्डे को मंजूरी दी थी, वह अगले पांच वर्षों में तैयार होने की उम्मीद है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह हवाई अड्डा भारतीय नौसेना के संचालन नियंत्रण में रहेगा। यानी यह केवल नागरिक उड़ानों का केंद्र नहीं होगा, बल्कि हिंद महासागर में भारत की सैन्य शक्ति का नया अग्रिम मोर्चा बनेगा। यह दोहरे उपयोग वाला हवाई अड्डा भारत की समुद्री निगरानी क्षमता, सैन्य पहुंच और त्वरित कार्रवाई की ताकत को कई गुना बढ़ा देगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/india-strategic-move-great-nicobar-13000-crore-airport-to-be-built-focus-on-malacca-strait" target="_blank">Great Nicobar में भारत का Strategic Move, ₹13,000 करोड़ से बनेगा Airport, Malacca Strait पर नज़र</a></h3><div>हम आपको बता दें कि ग्रेट निकोबार की यह परियोजना चार बड़े स्तंभों पर आधारित है। इनमें अंतरराष्ट्रीय कंटेनर ट्रांसशिपमेंट बंदरगाह, आधुनिक नगर, ऊर्जा संयंत्र और नौसैनिक हवाई अड्डा शामिल हैं। यह पूरा ढांचा भारत को उस समुद्री क्षेत्र में स्थायी उपस्थिति देगा, जहां से दुनिया के दो तिहाई तेल व्यापार और आधा कंटेनर यातायात गुजरता है। ग्रेट निकोबार केवल चालीस किलोमीटर दूर स्थित है उस सिक्स डिग्री चैनल से, जो अदन की खाड़ी से मलक्का जलडमरूमध्य तक फैले समुद्री व्यापार मार्ग का सबसे संवेदनशील हिस्सा माना जाता है।</div><div><br></div><div>यही वह इलाका है जहां चीन लगातार अपनी घुसपैठ बढ़ा रहा है। हिंद महासागर क्षेत्र में कई बाहरी ताकतें आर्थिक और सैन्य दबदबा बनाने में जुटी हैं। ऐसे में मोदी सरकार का यह कदम भारत को दक्षिण पूर्वी हिंद महासागर में निर्णायक बढ़त देगा। यानि अब भारत इस पूरे क्षेत्र में सुरक्षा साझेदार और संकट के समय सबसे पहले सहायता पहुंचाने वाली ताकत के रूप में उभरेगा।</div><div><br></div><div>रक्षा सूत्रों का साफ कहना है कि यह परियोजना तीस वर्ष पहले ही पूरी हो जानी चाहिए थी, लेकिन पिछली सरकारों की सुस्ती और दूरदृष्टि की कमी के कारण भारत ने बहुमूल्य समय गंवा दिया। अब मोदी सरकार उस रणनीतिक भूल को सुधार रही है। यह परियोजना भारत को अपने सैन्य संसाधनों की तेज आवाजाही, अग्रिम रसद आपूर्ति और समुद्री निगरानी में अभूतपूर्व क्षमता देगी।</div><div><br></div><div>विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रेट निकोबार के आसपास समुद्र में विशाल हाइड्रोकार्बन भंडार भी हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो यह परियोजना भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए भी ऐतिहासिक साबित होगी। यानी यह केवल सैन्य ताकत का सवाल नहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता का भी बड़ा आधार बनेगी।</div><div><br></div><div>साथ ही मोदी सरकार ने उन आलोचनाओं को भी करारा जवाब दिया है, जिनमें इस परियोजना को केवल व्यावसायिक योजना बताकर बदनाम करने की कोशिश की जा रही थी। रक्षा सूत्रों ने साफ कहा है कि इसे केवल कारोबारी परियोजना कहना भौगोलिक अज्ञानता का प्रमाण है। यह परियोजना सामरिक, आर्थिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भारत के भविष्य की धुरी है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी परियोजनाएं पूरी पारदर्शिता और विधिवत ठेका प्रक्रिया के तहत संचालित की जा रही हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि परियोजना के विभिन्न हिस्सों पर तेजी से काम चल रहा है। कंटेनर बंदरगाह के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी मूल्यांकन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है। नगर परियोजना पर व्यय वित्त समिति की बैठक हो चुकी है, जबकि द्रवीकृत प्राकृतिक गैस आधारित ऊर्जा संयंत्र की विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार कर ली गई है। इससे स्पष्ट है कि मोदी सरकार केवल घोषणाएं नहीं कर रही, बल्कि जमीन पर तेजी से अमल भी कर रही है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही पर्यावरण को लेकर उठे सवालों पर भी सरकार ने तथ्यात्मक जवाब दिया है। पर्यावरण प्रभाव आकलन के अनुसार पूरे द्वीप के केवल 166.1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को विकास के लिए चिन्हित किया गया है, जबकि 81.74 प्रतिशत क्षेत्र राष्ट्रीय उद्यान, जैवमंडल आरक्षित क्षेत्र, वन और जनजातीय संरक्षण क्षेत्रों के रूप में सुरक्षित रहेगा। वन क्षेत्र के उपयोग में भी आधे से अधिक हिस्से को हरित क्षेत्र के रूप में सुरक्षित रखा जाएगा, जहां पेड़ों की कटाई नहीं होगी।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही वन्यजीवों, प्रवाल भित्तियों और मैंग्रोव संरक्षण के लिए तीस वर्षों में दो हजार दो सौ बीस करोड़ रुपये से अधिक का विशेष संरक्षण कार्यक्रम भी तैयार किया गया है। लेदरबैक कछुए, निकोबार मेगापोड और मगरमच्छों के संरक्षण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।</div><div><br></div><div>इस तरह स्पष्ट है कि ग्रेट निकोबार परियोजना मोदी सरकार का केवल विकास अभियान नहीं, बल्कि भारत की समुद्री शक्ति का नया शंखनाद है। यह वह मास्टरस्ट्रोक है जो आने वाले दशकों में हिंद महासागर की रणनीतिक तस्वीर बदल सकता है। भारत अब अपने समुद्री हितों की रक्षा केवल तटों से नहीं करेगा, बल्कि समुद्र के बीचोंबीच अपनी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कराएगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 13:00:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-played-a-major-masterstroke-through-the-great-nicobar-project</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/great-nicobar-project_large_1300_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर इंडिया गठबंधन की बैठक के राजनीतिक मायने क्या हैं? समझिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-exactly-are-the-political-implications-of-the-india-alliance-meeting]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विगत दो-तीन वर्षों में कांग्रेस की सियासी विसात पर अपना अपना-सबकुछ लुटा-पिटा देने के बाद इंडिया (INDIA) गठबंधन के सहयोगियों की जो "नई दिल्ली बैठक" हुई, उसके राजनीतिक मायने कांग्रेस के लिए बेहद फायदेमंद साबित हुए। क्योंकि इस बैठक में पहली बार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी की आवाज ध्यान से सुनी गई और उनके नेतृत्व को तथा उनकी पार्टी को गाहे-बगाहे चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों के सुरमा भोपाली नेता दबी जुबान में अपनी भावना प्रकट करने को अभिशप्त हुए। खासकर नेशनल कांफ्रेंस के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, सपा प्रमुख अखिलेश यादव को छोड़कर।</div><div><br></div><div>इसलिए यह बैठक केवल एक नियमित विपक्षी बैठक तक सीमित नहीं रही, क्योंकि यह बैठक ऐसे समय हुई, जब कई सहयोगी दलों और कांग्रेस के बीच मतभेदों की बढ़ती-घटती खबरें सामने आई थीं, इसलिए इसके संदेश पर विशेष ध्यान दिया जाएगा। मिली जानकारी के अनुसार, 8 जून को इंडिया (INDIA) गठबंधन की बैठक में लगभग 23 दलों के राजनेता शामिल हुए। बैठक में विपक्षी दलों ने अपनी एकजुटता दिखाने और आगे की राजनीतिक रणनीति पर चर्चा की। प्राप्त रिपोर्टों के अनुसार, बैठक में लगभग 23 विपक्षी दलों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।जिनमें मल्लिकार्जुन खरगे, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, ममता बनर्जी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव, उमर अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, सुप्रिया सुले के अलावा प्रमुख वामपंथी दलों के अनेक नेता उपस्थित रहे।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/former-pm-hd-deve-gowda-wrote-an-article-explaining-the-secret-of-pm-modi-success" target="_blank">पूर्व प्रधानमंत्री HD Deve Gowda ने आलेख लिख कर बताया PM Modi की सफलता का राज, नेहरू और मोदी की तुलना करते हुए कह गये बड़ी बात</a></h3><div>कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने केंद्र सरकार की नीतियों, विदेश नीति और मतदाता सूची पुनरीक्षण (SIR) से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। जबकि विपक्षी दलों ने संसद और सड़क दोनों स्तरों पर समन्वित आंदोलन चलाने तथा राष्ट्रीय मुद्दों पर साझा रुख अपनाने पर चर्चा की। साथ ही, 2029 लोकसभा चुनाव की तैयारी, विपक्षी एकता और गठबंधन के भविष्य की दिशा भी बैठक के एजेंडे में शामिल रही।&nbsp;</div><div><br></div><div>बैठक के दौरान मतदाता सूची पुनरीक्षण और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े सवाल पर मंथन हुआ। फिर केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ संयुक्त रणनीति बनाई गई और संसद में विपक्षी दलों के बेहतर समन्वय की आवश्यकता पर बल दिया गया। इसके अलावा, विभिन्न राज्यों में विपक्षी दलों के बीच तालमेल और राजनीतिक सहयोग होने की पुष्टि की गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, इस बैठक की कतिपय चुनौतियां भी सामने आईं, क्योंकि जहां तमिलनाडु में सत्ता से बेदखल हुई DMK ने कांग्रेस से नाराजगी होने के चलते इस बैठक से दूरी बनाई, जिससे गठबंधन के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज रही। वहीं, आप के सुप्रीमो अरबिंद केजरीवाल की अनुपस्थिति भी चर्चा में रही। जबकि कुछ अन्य सहयोगी दलों की भूमिका और भागीदारी को लेकर भी सवाल बने रहे।</div><div><br></div><div>जहां तक इंडिया गठबंधन की इस बहुप्रतीक्षित बैठक के राजनीतिक मायने की बात है तो यह बैठक लोकसभा चुनाव 2024 के बाद विपक्ष की सबसे महत्वपूर्ण गैर-संसदीय बैठकों में से एक मानी जा रही है। जिसके माध्यम से विपक्ष ने संदेश देने की कोशिश की कि मतभेदों के बावजूद भाजपा के खिलाफ साझा मंच अभी कायम है। वहीं, भाजपा ने DMK की अनुपस्थिति और अन्य अंतर्विरोधों को लेकर गठबंधन की एकता पर सवाल उठाए हैं। इस बैठक के सबसे बड़े राजनीतिक निष्कर्ष निम्नलिखित हैं:-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, INDIA गठबंधन अभी समाप्त नहीं हुआ है: सबसे बड़ा संदेश यही रहा कि तमाम मतभेदों, चुनावी झटकों और सहयोगी दलों की नाराज़गी के बावजूद विपक्षी दलों ने एक साझा मंच बनाए रखने का निर्णय लिया। 23 दलों की भागीदारी ने कांग्रेस को यह कहने का अवसर दिया कि गठबंधन अभी भी प्रासंगिक है। दूसरा, 2029 की तैयारी अभी से शुरू हो गई: बैठक का प्रमुख उद्देश्य केवल वर्तमान राजनीतिक मुद्दों पर प्रतिक्रिया देना नहीं था, बल्कि 2029 लोकसभा चुनाव के लिए दीर्घकालिक रणनीति तैयार करना भी था। विपक्ष भाजपा के विरुद्ध एक व्यापक राष्ट्रीय नैरेटिव गढ़ने की कोशिश में दिखा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, कांग्रेस फिर से समन्वयक की भूमिका में: बैठक से यह संकेत मिला कि कांग्रेस गठबंधन की धुरी बनी रहना चाहती है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने विपक्षी एकता पर जोर दिया और केंद्र सरकार के विरुद्ध साझा संघर्ष का आह्वान किया। चौथा, गठबंधन की कमजोरी भी उजागर हुई: M. K. Stalin की DMK और Arvind Kejriwal की AAP का बैठक से दूर रहना बताता है कि विपक्षी एकता अभी भी कई अंतर्विरोधों से घिरी हुई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि इस बैठक का बिहार की राजनीति पर प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि राजद नेता तेजस्वी यादव को राष्ट्रीय मंच मिला। बैठक में Tejashwi Yadav की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि वे केवल बिहार तक सीमित नेता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विपक्ष के प्रमुख चेहरों में शामिल हैं। वहीं, बिहार चुनाव में विपक्षी एकता का संदेशभी गया। ऐसे में यदि कांग्रेस, राजद और वाम दल तालमेल बनाए रखते हैं तो बिहार में NDA के खिलाफ विपक्षी चुनौती अपेक्षाकृत मजबूत रह सकती है।</div><div><br></div><div>वहीं, जाति और सामाजिक न्याय की राजनीति को भी बल मिला। क्योंकि राहुल गांधी और तेजस्वी यादव पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय गणना और प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को साथ उठाते रहे हैं। बैठक से संकेत मिला कि यह विपक्ष का प्रमुख राजनीतिक एजेंडा बना रह सकता है। जहां तक 2029 के लोकसभा चुनाव पर संभावित प्रभाव की बात है तो इसका सकारात्मक पक्ष यह रहा कि भाजपा के विरुद्ध एक साझा राष्ट्रीय मंच बना रहता है। वहीं, संसदीय मुद्दों पर समन्वय बढ़ सकता है। साथ ही क्षेत्रीय दलों और कांग्रेस के बीच संवाद कायम रहने की संभावना बनी रहती है। वहीं, जहां तक चुनौतियों की बात है तो सीट बंटवारा सबसे बड़ी समस्या रहेगा। क्योंकि कई राज्यों में सहयोगी दल एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। वहीं, DMK और AAP जैसी पार्टियों की दूरी गठबंधन की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगाती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि इस बैठक का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश यह रहा कि INDIA गठबंधन ने अपने अस्तित्व और प्रासंगिकता का प्रदर्शन करने की कोशिश की। लेकिन यह भी स्पष्ट हुआ कि विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकता बनाए रखना है। बिहार में इसका तात्कालिक लाभ महागठबंधन को मिल सकता है, जबकि 2029 के लिए यह बैठक विपक्षी पुनर्गठन की शुरुआत मानी जा सकती है—हालांकि सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि सहयोगी दल भविष्य में अपने मतभेद कितनी प्रभावी ढंग से सुलझा पाते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:53:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-exactly-are-the-political-implications-of-the-india-alliance-meeting</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/india-alliance_large_1253_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[लोकतंत्र का व्यंग्य या लोकतांत्रिक मर्यादाओं पर संकट?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/an-irony-of-democracy-or-a-crisis-of-democratic-norms]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यह केवल मतदान की व्यवस्था नहीं, बल्कि संवाद, सहमति, असहमति, संवैधानिक मर्यादाओं और सामाजिक उत्तरदायित्वों का एक सशक्त तंत्र है। लोकतंत्र की शक्ति विरोध में निहित है, लेकिन उसकी गरिमा विरोध की शैली, उद्देश्य और मर्यादा से निर्धारित होती है। हाल के दिनों में चर्चित हुई तथाकथित ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (सीजेपी) इसी संदर्भ में गंभीर विमर्श की मांग करती है। यह आंदोलन प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर नीट परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के विरोध के नाम पर उभरा। प्रारम्भ में यह सोशल मीडिया पर व्यंग्यात्मक अभियान के रूप में सामने आया और बाद में दिल्ली के जंतर-मंतर तक पहुंच गया। इसके समर्थकों ने इसे युवाओं के आक्रोश की अभिव्यक्ति बताया, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या यह वास्तव में शिक्षा सुधार का आंदोलन है या लोकतांत्रिक असंतोष को व्यंग्य, उपहास और राजनीतिक धु्रवीकरण की दिशा में मोड़ने वाला एक नया प्रयोग?</div><div><br></div><div>भारतीय संविधान प्रत्येक नागरिक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शांतिपूर्ण विरोध का अधिकार देता है। किंतु कोई भी अधिकार निरंकुश नहीं होता। लोकतंत्र में विरोध का उद्देश्य समाधान की खोज होना चाहिए, न कि अराजकता का विस्तार। यदि विरोध का स्वर केवल उपहास, आक्रोश और टकराव तक सीमित रह जाए, तो वह लोकतंत्र को मजबूत करने के बजाय कमजोर करने लगता है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का नाम ही एक नकारात्मक और व्यंग्यात्मक मानसिकता का परिचायक है। किसी राजनीतिक दल की नकल करते हुए स्वयं को “कॉकरोच” के प्रतीक से जोड़ना लोकतांत्रिक विमर्श को गंभीरता से अधिक तमाशे में बदलने का प्रयास प्रतीत होता है। लोकतंत्र में व्यंग्य का स्थान है, लेकिन व्यंग्य यदि विचार का स्थान ले ले, तो वह जनमत को भ्रमित भी कर सकता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/important-questions-arising-from-the-cockroach-janata-party-protest-at-jantar-mantar" target="_blank">'कॉकरोच जनता पार्टी' के जंतर-मंतर प्रदर्शन से उपजते महत्वपूर्ण सवाल!</a></h3><div>किसी भी आंदोलन का मूल्यांकन उसकी मांगों और कार्यप्रणाली से किया जाता है। सीजेपी की प्रमुख मांगें हैं-परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता, पेपर लीक की रोकथाम, शिक्षा मंत्री का इस्तीफा तथा युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना। इनमें से अधिकांश मांगें ऐसी हैं जिन पर देश का हर जिम्मेदार नागरिक सहमत हो सकता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन मांगों को मनवाने का तरीका भी उतना ही जिम्मेदार है? क्या कॉकरोच के मुखौटे पहनना, राजनीतिक व्यंग्य को आंदोलन का आधार बनाना और सोशल मीडिया पर उत्तेजक अभियानों को बढ़ावा देना शिक्षा सुधार का व्यावहारिक मार्ग है? क्या इससे सरकार, विशेषज्ञों और समाज के बीच सार्थक संवाद स्थापित होगा? इतिहास बताता है कि स्थायी परिवर्तन नारेबाजी से नहीं, बल्कि वैचारिक स्पष्टता, संगठनात्मक अनुशासन और रचनात्मक दबाव से आते हैं।</div><div><br></div><div>भारत की युवा आबादी उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। लेकिन यही शक्ति यदि निराशा, बेरोजगारी और असंतोष से घिर जाए तो विभिन्न राजनीतिक शक्तियों के लिए उपयोग का साधन भी बन सकती है। आज देश का युवा प्रतियोगी परीक्षाओं, रोजगार और भविष्य को लेकर चिंतित है। यह चिंता वास्तविक है। लेकिन हर वास्तविक चिंता के साथ एक खतरा भी जुड़ा होता है-उसका राजनीतिक दोहन। जब किसी आंदोलन के पीछे विभिन्न राजनीतिक समूहों, सत्ता-विरोधी संगठनों और वैचारिक एजेंडों की उपस्थिति दिखाई देने लगे, तब यह आशंका स्वाभाविक हो जाती है कि कहीं युवाओं की पीड़ा को राजनीतिक हथियार तो नहीं बनाया जा रहा। यदि छात्र आंदोलन शिक्षा सुधार की जगह सरकार-विरोधी अभियान में बदल जाए, तो सबसे बड़ा नुकसान स्वयं छात्रों का होता है। युवाओं को यह समझना होगा कि वे किसी राजनीतिक प्रयोगशाला के उपकरण नहीं हैं। उनकी ऊर्जा राष्ट्र निर्माण के लिए है, किसी छिपे हुए राजनीतिक एजेंडे के लिए नहीं।</div><div><br></div><div>सीजेपी के समर्थकों द्वारा कभी-कभी नेपाल, बांग्लादेश अथवा अन्य देशों में हुए युवा आंदोलनों का उल्लेख किया जाता है। ऐसी तुलना न केवल जल्दबाजी है बल्कि भ्रामक भी हो सकती है। भारत की लोकतांत्रिक संरचना, संस्थागत शक्ति, न्यायिक व्यवस्था, मीडिया की स्वतंत्रता और संवैधानिक ढांचा पड़ोसी देशों से भिन्न है। जिन परिस्थितियों में अन्य देशों में जनआंदोलन उभरे, वे परिस्थितियां भारत में मौजूद नहीं हैं। भारत में चुनावी परिवर्तन की सशक्त व्यवस्था है। यहां सरकारें जनमत से बनती और बदलती हैं। इसलिए भारत के युवाओं को विदेशी या पड़ोसी देशों के आंदोलनों की भावनात्मक तुलना के बजाय भारतीय लोकतंत्र की विशेषताओं को समझना चाहिए। हर देश की राजनीतिक परिस्थितियां अलग होती हैं। इसलिए विदेशी उदाहरणों के आधार पर भारत में असंतोष को भड़काना न तो बौद्धिक रूप से उचित है और न ही राष्ट्रीय हित में।</div><div><br></div><div>आज सोशल मीडिया किसी भी विचार को कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंचा सकता है। लेकिन यही उसकी सबसे बड़ी चुनौती भी है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लोकप्रियता और वैधता एक जैसी चीजें नहीं हैं। कई बार कोई विचार ट्रेंड तो बन जाता है, लेकिन उसके पास न स्पष्ट दृष्टि होती है, न कोई रचनात्मक कार्यक्रम और न कोई उत्तरदायित्व। सोशल मीडिया पर वायरल होना लोकतांत्रिक स्वीकृति का प्रमाण नहीं है। ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का तेजी से लोकप्रिय होना इस बात का संकेत अवश्य है कि युवाओं में असंतोष है, लेकिन यह इस बात का प्रमाण नहीं कि आंदोलन का मार्ग सही है। लोकतंत्र में ट्रेंडिंग हैशटैग से अधिक महत्व तथ्यों, नीति और संस्थागत संवाद का होता है। यदि राजनीति केवल मीम, व्यंग्य और डिजिटल आक्रोश तक सीमित हो जाए तो लोकतंत्र धीरे-धीरे विचारशील नागरिकता से हटकर भीड़तंत्र में बदल सकता है।</div><div>भारत ने वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का संकल्प लिया है। यह लक्ष्य केवल आर्थिक विकास का नहीं, बल्कि सामाजिक स्थिरता, संस्थागत विश्वास और राष्ट्रीय एकता का भी है। यदि युवा शक्ति का बड़ा हिस्सा निरंतर अविश्वास, नकारात्मकता और टकराव की राजनीति की ओर आकर्षित होता है, तो यह लक्ष्य प्रभावित हो सकता है। विकास के लिए केवल आलोचना नहीं, बल्कि सहभागिता भी आवश्यक है। युवाओं को सरकार से प्रश्न पूछने चाहिए, लेकिन साथ ही समाधान भी प्रस्तुत करने चाहिए। उन्हें जवाबदेही मांगनी चाहिए, लेकिन संस्थाओं के प्रति सम्मान भी बनाए रखना चाहिए। लोकतंत्र की सफलता विरोध और सहयोग के संतुलन में निहित है। इस पूरे प्रकरण का एक महत्वपूर्ण पक्ष उन राजनीतिक दलों और नेताओं की भूमिका है जो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से ऐसे आंदोलनों को समर्थन देते दिखाई देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>यदि कोई राजनीतिक दल वास्तव में शिक्षा सुधार चाहता है तो उसे संसद, विधानसभाओं और नीति मंचों पर ठोस प्रस्ताव रखने चाहिए। लेकिन यदि छात्र असंतोष को केवल सरकार को घेरने के साधन के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है, तो यह लोकतंत्र और युवाओं दोनों के साथ अन्याय है। राजनीतिक दलों को स्पष्ट करना चाहिए कि वे शिक्षा सुधार के लिए क्या ठोस कार्यक्रम रखते हैं। केवल विरोध का समर्थन करना पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में जिम्मेदार विपक्ष का दायित्व विकल्प प्रस्तुत करना भी होता है। परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता, पेपर लीक पर कठोर दंड, रोजगार सृजन, शिक्षा की गुणवत्ता और युवाओं के लिए अवसरों का विस्तार-ये सभी वास्तविक और महत्वपूर्ण मुद्दे हैं। लेकिन इनका समाधान व्यंग्यात्मक राजनीति या प्रतीकात्मक आक्रोश में नहीं है। समाधान सरकार, न्यायपालिका, शिक्षाविदों, विशेषज्ञों, छात्र संगठनों और समाज के बीच निरंतर संवाद में है। आवश्यकता इस बात की है कि युवाओं के असंतोष को रचनात्मक ऊर्जा में बदला जाए। भारत का लोकतंत्र विरोध को स्वीकार करता है, लेकिन वह विरोध तभी सार्थक होता है जब वह व्यवस्था को तोड़ने के बजाय सुधारने की दिशा में आगे बढ़े।</div><div><br></div><div>‘कॉकरोच जनता पार्टी’ जैसी प्रवृत्तियां पहली दृष्टि में लोकतांत्रिक व्यंग्य और युवा असंतोष की अभिव्यक्ति लग सकती हैं, लेकिन इनके दूरगामी प्रभावों की गंभीर समीक्षा आवश्यक है। यदि राजनीति उपहास, प्रतीकात्मक आक्रोश और डिजिटल उत्तेजना तक सीमित हो जाएगी, तो लोकतांत्रिक विमर्श की गुणवत्ता प्रभावित होगी। भारत को आज ऐसे युवाओं की आवश्यकता है जो प्रश्न भी पूछें और समाधान भी खोजें। जो विरोध भी करें और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी भी निभाएं। लोकतंत्र की शक्ति संघर्ष में नहीं-संवाद में है, विभाजन में नहीं-समन्वय में है और तात्कालिक उत्तेजना में नहीं-दीर्घकालिक राष्ट्रहित में है। इसलिए समय की मांग है कि युवा, राजनीतिक दल और समाज सभी मिलकर यह विचार करें कि क्या ‘कॉकरोच राजनीति’ वास्तव में लोकतंत्र को मजबूत करेगी, या फिर वह भारत की लोकतांत्रिक संस्कृति, राजनीतिक मर्यादाओं और विकसित भारत-2047 के राष्ट्रीय संकल्प के सामने एक नई चुनौती बनकर उभरेगी। यही प्रश्न आज सबसे अधिक प्रासंगिक है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 12:43:10 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/an-irony-of-democracy-or-a-crisis-of-democratic-norms</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/9/cockroach-janata-party_large_1243_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली अग्निकाडों के हादसों की राजधानी बनी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली की होटल में हुए अग्निकाड में मारे गए 21 लोगों की मौत से यह एक बार फिर साबित हो गया है कि देश में आम आदमी की जिन्दगी किसी भी सुरक्षित नहीं है। सरकारी की सुरक्षा जिम्मेदारी सिर्फ दिखावटी है। नागरिकों की सुरक्षा भ्रष्टाचार और मिलीभगत की भेट चढ़ रही है। सरकारें ऐसे हादसों से कभी सबक नही लेती। यही वजह हादसे दर हादसे होते चले जाते हैं और सरकारें सिर्फ लीपापोती करने में जुटी रहती हैं। दरअसल ऐसे हादसों में लापरवाही और भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार अफसरों को जब तक जेल भेज जाने का कानून नहीं बनेगा, हादसों की पुनरावृत्ति होती रहेगी।</div><div><br></div><div>दिल्ली के मालवीय नगर स्थित होटल फ्लोरिश स्टेज में भीषण आग लगने से 21 लोगों की मौत हो गई। मरने वाले 21 लोगों में बांग्लादेश-अफ्रीकी देशों के नागरिक भी शामिल हैं। मतलब यहां देश के लोग तो सुरक्षित हैं ही नहीं, विदेशी भी सुरक्षित नहीं हैं। होटल से दमकलकर्मियों ने कुल 37 लोगों को बाहर निकाला। वहीं 12 लोगों ने खिड़की से नीचे कूदकर अपनी जान बचाई।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/how-exactly-can-tragedies-like-the-malviya-nagar-hotel-fire-be-prevented-and-who-is-responsible" target="_blank">आखिर कैसे रूकेंगे मालवीय नगर होटल अग्निकांड जैसे हादसे, जिम्मेदार कौन?</a></h3><div>आश्चर्य यह है कि दिल्ली में केंद्र सरकार और राज्य की सरकार भाजपा की है। चुनाव जीतने के लिए भाजपा भ्रष्टाचार और डबल इंजिन से तेजी से विकास का दावा करती रही। ऐसे हादसे बताते हैं कि सरकार का एक भी इंजिन सही तरीके से काम नहीं कर रहा है। भाजपा ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल पर शराब घोटालों में शामिल होने का आरोप लगाया था। केजरीवाल को न सिर्फ जेल जाना पड़ा बल्कि उनकी पार्टी आप दिल्ली विधानसभा का चुनाव भाजपा के हाथों हार गई। अदालत ने केजरीवाल को बरी कर दिया। तत्कालीन केजरीवाल सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का आरोप दिल्ली में सत्ता हासिल करने में भाजपा के लिए बड़ा कारण साबित हुआ। अदालत के इस फैसले से पहले हुए दिल्ली के विधानसभा चुनाव में भाजपा बहुमत में आ गई।</div><div><br></div><div>दिल्ली की जिस होटल में यह भयानक हादसा हुआ, उसके पास बिल्डिंग की फायर सुरक्षा का अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं था।होटल में 25 कमरे हैं। दिल्ली के दमकल विभाग के मुताबिक बिल्डिंग में बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर के अलावा पांच मंजिलें हैं। इस पूरी बिल्डिंग में सिर्फ एक सीढ़ी और एक एलिवेटर मौजूद है। बिल्डिंग पूरी तरह से सील थी और इसमें वेंटिलेशन का कोई इंतजाम नहीं था। बाथरूम की खिड़कियों सहित सभी खिड़कियां पूरी तरह से बंद थीं। आग लगने पर ऐसी बिल्डिंग एक चिमनी की तरह काम करती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह हालत दिल्ली और राष्ट्र्रीय राजधानी परियोजना क्षेत्र के सैकड़ों होटलों और व्यवसायिक संस्थानों की है। इन संस्थानों के पास अग्नि दुर्घटनाओं से बचाव के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। इस खामी की जांच होती भी है तो मिलीभगत के कारण अफसर आंखे बंद कर लेते हैं। यही वजह है दिल्ली और आस—पास के क्षेत्रों में लगातार ऐसे अग्निकाडों की पुनरावृति हो रही है। ऐसे हादसों में लोग जल कर या दम घुटने से मर रहे हैं, किन्तु सरकारों ने बचाव के ठोस इंतजाम आज तक नहीं किए हैं।</div><div><br></div><div>यह होटल दिल्ली सरकार की बेड एंड ब्रेक फास्ट (बीएनबी) स्कीम के तहत चल रहा था। यह योजना केंद्र सरकार की है, जिसे राष्ट्रमंडल खेल के दौरान वर्ष 2010 में लागू किया गया था। उसके तहत छह कमरों को बीएनबी में स्वीकृति थी। उसे अग्निशमन, एमसीडी या पुलिस से मंजूरी की आवश्यकता नहीं है। दिल्ली में ऐसे 1000 से अधिक प्रतिष्ठानों में बीएनबी है। सवाल यही है कि क्या सरकारी योजना से चलने वाली ये होटलें—गेस्टहाउस क्या अग्नि दुर्घटनाओं के लिहाज से सुरक्षित हैं। इसका पुख्ता जवाब दिल्ली भाजपा सरकार और प्रशासन के पास नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>देश की राजधानी दिल्ली आग के गोले पर बैठी है। पिछले 6 महीनों में दिल्ली में आग की अलग-अलग घटनाओं में 66 लोगों की मौत हो चुकी है। 3 मई 2026 को विवेक विहार में एक एसी में विस्फोट के बाद चार मंजिला इमारत में आग लग गई। इस हादसे में 9 लोगों की मौत हो गई। 18 मार्च 2026 को पालम में पांच मंजिला इमारत में लगी आग ने 9 लोगों की जान ले ली। इसी तरह 14 मार्च 2024 को शाहदरा की एक इमारत में आग लगने से 4 लोगों की मौत हुई। 15 फरवरी 2024 को अलीपुर फैक्ट्री क्षेत्र में स्थित एक पेंट फैक्ट्री में भीषण आग से 11 लोगों की मौत हो गई थी। 13 मई 2022 को पश्चिमी दिल्ली के मुंडका में चार मंजिला व्यावसायिक इमारत में लगी आग में 27 लोगों की मौत हुई थी।</div><div><br></div><div>दिल्ली में अग्नि दुर्घटानाओं की पुनरावृत्ति जारी है। 12 फरवरी 2019 को करोल बाग स्थित होटल अर्पित पैलेस में आग लगने से 17 लोगों की जान चली गई थी। 8 दिसंबर 2019 को रानी झांसी रोड पर पेपर फैक्ट्री में लगी भीषण आग में 45 लोगों की मौत हो गई थी। 31 मई 1999 को दिल्ली के लाल कुंआ क्षेत्र स्थित रासायनिक बाजार में लगी आग में 57 लोगों की मौत हुई थी जबकि 27 लोग घायल हुए थे। इसी क्रम में 13 जून 1997 ग्रीन पार्क स्थित उपहार सिनेमा में लगी आग में 59 लोगों की मौत हुई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे।</div><div><br></div><div>दिल्ली की 80 प्रतिशत इमारतें भी आग से सुरक्षित नहीं हैं। दिल्ली में फायर सेफ्टी कानून है। ये कानून 1983 में आया था, जिसमें 15 मीटर से ऊंची इमारतों के लिए कानून बनाया गया था। लेकिन लोगों ने इस कानून का तोड़ निकालते हुए फायर सेफ्टी के दायरे में आने से बचने के लिए साढ़े 14 मीटर या 14.9 मीटर ऊंची इमारतें बनाने लगे। सिर्फ 25 हजार के करीब ही ऐसी इमारतें होंगी, जिसमे स्ट्रक्चर के लिहाज से फायर सेफ्टी के उपाय किए गए हैं और फायर एनओसी मिली हुई है।</div><div><br></div><div>दिल्ली फायर सर्विसेज ने साल 2025 में मार्च से अप्रैल के बीच 37 सरकारी अस्पतालों का फायर सेफ्टी और स्ट्रक्चरल इंटीग्रिटी यानी ढांचागत मजबूती का जायजा लिया। इनमें से नौ अस्पतालों में फायर क्लीयरेंस की मंजूरी नहीं थी। दिल्ली के मुखर्जी नगर इलाके में 15 जून 2023 को एक कोचिंग सेंटर में आग से 60 से अधिक छात्र हुए थे। इस घटना पर हाई कोर्ट ने स्वत: संज्ञान लेते हुए दिल्ली के कोचिंग सेंटरों में अग्नि सुरक्षा को लेकर दिल्ली अग्निशमन विभाग से ऑडिट रिपोर्ट मांगी थी।</div><div><br></div><div>हाइकोर्ट के निर्देश पर अग्निशमन विभाग ने दिल्ली के पांच जगहों मुखर्जी नगर, करोलबाग, लक्ष्मी नगर, जनकपुरी, कालू सराय और साउथ एक्सटेंशन में 383 इमारतों का सर्वे किया, जिनमें कोचिंग सेंटर संचालित हो रहे हैं। सर्वे में पाया गया अधिकतर इमारतें अग्नि सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक हैं। अधिकतर इमारतों में अग्नि सुरक्षा के उपकरण तो थे, लेकिन उनकी स्थिति ऐसी नहीं थी कि आपात स्थिति में उसका इस्तेमाल किया जा सके।</div><div><br></div><div>सरकारों और राजनीतिक दलों के नेता ऐसे हादसों के बाद सिर्फ घडियालू आंसू बहाते हैं। ऐसे हादसों के बाद सरकार मुआवजा और जांच की घोषणा करके अपनी जिम्मेदारी पूरी कर लेती है। भविष्य में ऐसे हादसों नहीं हो, इसका पुख्ता इंतजाम कभी नहीं किया जाता। यह हालत देश की राजधानी दिल्ली की है। ऐसी दुर्घटनाओं के लिहाज से देश के बाकी हिस्सों में सुरक्षा इंतजामों का अंदाजा लगाया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दिल्ली में अब तक हुए अग्निकांडों में सैकड़ों लोगों की मौत के बावजूद एक भी वरिष्ठ अधिकारी को सीधे जिम्मेदार मानते हुए जेल नहीं भेजा गया। कारण साफ है कि सरकार चाहे किसी भी राजनीतिक दल की हो, जितने भी कानून आज तक बनाए गए हैं, उनमें ऐसा कोई कानून नहीं बना है कि जिम्मेदारी नहीं निभाने पर अफसरों को जेल जाना पड़ेगा। यही वजह है कि अग्नि से सुरक्षा हो या ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों में सुरक्षा मानक हो, ऐसे कानूनों की धज्जियां उड़ती रहती हैं और अफसर और नेता तमाशबीन बने रहते हैं। जब तक इस तरह के हादसों के लिए सीधे अफसरों को जिम्मेदार ठहराते हुए जेल की हवा नहीं खिलाई जाएगी, तब ऐसे हादसे होते रहेंगे।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 18:13:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/delhi-has-become-the-capital-of-fire-tragedies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/8/malviya-nagar-hotel-fire_large_1813_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर आर्थिक सुनामी के राजनीतिक व आर्थिक मायने मायने क्या हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-what-are-the-political-and-economic-implications-of-the-economic-tsunami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राहुल गांधी की "आर्थिक सुनामी" वाली चेतावनी को फिलहाल एक राजनीतिक चेतावनी और आर्थिक जोखिमों पर विपक्षी आक्रमण के रूप में देखा जाना चाहिए। क्योंकि उनका यह कहना कि भारत निश्चित रूप से आर्थिक सुनामी की ओर बढ़ रहा है, अभी उपलब्ध तथ्यों के आधार पर जल्दबाजी होगी। हालांकि वैश्विक परिस्थितियों और घरेलू आर्थिक चुनौतियों को देखते हुए इस बहस को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता।&nbsp;</div><div><br></div><div>आर्थिक मामलों के जानकार बताते हैं कि भारत में वास्तव में "आर्थिक सुनामी" आएगी या नहीं, इसका कोई निश्चित उत्तर अभी नहीं दिया जा सकता। लेकिन विपक्ष के नेता राहुल गांधी द्वारा हाल में दी गई चेतावनी ने आर्थिक और राजनीतिक बहस को तेज कर दिया है। क्योंकि राहुल गांधी का तर्क है कि वैश्विक संकट, विशेषकर पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव, महंगाई, ईंधन कीमतों और आर्थिक असमानता के कारण भारत एक बड़े आर्थिक झटके की ओर बढ़ सकता है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सरकार और भाजपा का कहना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के पास पर्याप्त "शॉक एब्जॉर्बर" हैं—विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित महंगाई, खाद्यान्न भंडार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और मजबूत कर-संग्रह जैसी व्यवस्थाएं—जो बाहरी संकटों का सामना करने में सक्षम हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># सवाल है कि क्या सचमुच आर्थिक संकट का खतरा है?</h2><div><br></div><div>भारत के सामने कुछ वास्तविक चुनौतियाँ हैं: जैसे वैश्विक तेल कीमतों में वृद्धि की आशंका। निर्यात और निवेश पर अंतरराष्ट्रीय तनाव का असर। रोजगार सृजन की चुनौती। और कृषि और एमएसएमई क्षेत्र पर दबाव। लेकिन साथ ही भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है, और कई आर्थिक संकेतक अभी व्यापक संकट की पुष्टि नहीं करते।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh" target="_blank">पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश से रक्षा संबंध बना रहा तुर्किये, भारत को दो तरफ से घेरने की रणनीति!</a></h3><div>जानकार बताते हैं कि आर्थिक सुनामी कोई औपचारिक आर्थिक शब्द नहीं है, बल्कि ऐसी स्थिति को बताने के लिए इस्तेमाल किया जाता है जब अर्थव्यवस्था को अचानक और व्यापक झटका लगे तथा उसके प्रभाव दूरगामी हों। इसके कुछ संकेत हो सकते हैं- जीडीपी वृद्धि दर में तेज गिरावट। बड़े पैमाने पर बेरोजगारी। बैंकिंग या वित्तीय संकट। शेयर बाजार में भारी गिरावट। मुद्रा पर दबाव और महंगाई का बढ़ना। निवेश और उपभोग में तीव्र कमी। इतिहास में Great Depression (1930 का दशक) और Global Financial Crisis (2008) जैसी घटनाओं को आर्थिक सुनामी के उदाहरण माना जा सकता है।</div><div><br></div><h2>सवाल है कि क्या भारत में पीएम मोदी के रहते यह आ सकती है?</h2><div><br></div><div>किसी भी सरकार या प्रधानमंत्री के रहते हुए आर्थिक संकट की संभावना को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता। अर्थव्यवस्था अनेक घरेलू और वैश्विक कारकों से प्रभावित होती है, जैसे—वैश्विक मंदी या वित्तीय संकट। तेल की कीमतों में असाधारण वृद्धि। बड़े युद्ध या भू-राजनीतिक तनाव। प्राकृतिक आपदाएं या महामारी। घरेलू नीति संबंधी गंभीर त्रुटियां। हालांकि भारत की अर्थव्यवस्था में कुछ ऐसी ताकतें भी हैं जो बड़े झटकों को सहने में मदद करती हैं— जैसे- विशाल घरेलू बाजार। अपेक्षाकृत मजबूत बैंकिंग और नियामक व्यवस्था। बढ़ता डिजिटल भुगतान तंत्र। बुनियादी ढांचे और विनिर्माण पर निवेश। विदेशी मुद्रा भंडार का पर्याप्त स्तर। दूसरी ओर, चुनौतियां भी मौजूद हैं—जैसे- युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार सृजन। कृषि आय में सुधार। निर्यात प्रतिस्पर्धा बढ़ाना। वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता। और, आय असमानता और उपभोग मांग का प्रश्न।</div><div><br></div><div>इसलिए निष्पक्ष रूप से कहा जाए तो "पीएम मोदी के रहते आर्थिक सुनामी निश्चित रूप से आएगी" या "कभी नहीं आएगी"— दोनों दावे तथ्यात्मक रूप से सिद्ध नहीं हैं। भारत की आर्थिक स्थिति कई संकेतकों पर अपेक्षाकृत मजबूत दिखती है, लेकिन किसी भी बड़ी अर्थव्यवस्था की तरह यह वैश्विक और घरेलू जोखिमों से पूरी तरह मुक्त नहीं है। आर्थिक सुनामी की संभावना मुख्यतः नीतियों, वैश्विक परिस्थितियों और भविष्य की घटनाओं पर निर्भर करेगी, न कि केवल किसी एक नेता की उपस्थिति या अनुपस्थिति पर।</div><div><br></div><h2># आखिर आर्थिक सुनामी के मायने क्या हैं?</h2><div><br></div><div>"आर्थिक सुनामी" एक रूपक (metaphor) है, जिसका अर्थ है ऐसा व्यापक और तीव्र आर्थिक संकट जो समाज, बाजार, उद्योग, रोजगार और सरकार की वित्तीय स्थिति को एक साथ प्रभावित कर दे। जिस प्रकार समुद्री सुनामी अपने रास्ते में आने वाली हर चीज को झकझोर देती है, उसी प्रकार आर्थिक सुनामी भी अर्थव्यवस्था के लगभग सभी क्षेत्रों पर गहरा असर डालती है।</div><div><br></div><div>आइए जानते हैं आर्थिक सुनामी के प्रमुख संकेत के बारे में- पहला, शेयर बाजार में भारी गिरावट। दूसरा, निवेशकों की संपत्ति तेजी से घटती है। तीसरा, कंपनियों का बाजार मूल्य कम हो जाता है। चौथा, बेरोजगारी में तेज वृद्धि। पांचवां,&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">उद्योगों और कंपनियों में छंटनी बढ़ती है। छठा, नए रोजगार सृजन की गति धीमी पड़ जाती है। सातवां, बैंकिंग और वित्तीय संकट। आठवां, ऋण वसूली की समस्या बढ़ती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">नौवां, बैंकों और वित्तीय संस्थानों पर दबाव आता है। दसवां, मुद्रा और महंगाई पर असर। दसवां, राष्ट्रीय मुद्रा कमजोर हो सकती है। ग्यारहवां, आवश्यक वस्तुओं की कीमतें बढ़ सकती हैं। बारहवां, व्यापार और उद्योग में मंदी। तेरहवां,&nbsp;&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">उत्पादन घटता है। चौदहवां, निवेशक नए निवेश से बचते हैं।</span></div><div><br></div><h2># आर्थिक सुनामी के राजनीतिक मायने</h2><div><br></div><div>आर्थिक संकट केवल आर्थिक नहीं होता, बल्कि इसके राजनीतिक परिणाम भी होते हैं— पहला, सरकार की लोकप्रियता प्रभावित हो सकती है। दूसरा, विपक्ष को सरकार की नीतियों पर हमला करने का अवसर मिलता है। तीसरा, सामाजिक असंतोष और जनाक्रोश बढ़ सकता है। चौथा, चुनावी परिणामों पर असर पड़ सकता है। जहां तक भारत के संदर्भ में इसकी बात है तो भारत जैसी बड़ी अर्थव्यवस्था में "आर्थिक सुनामी" का अर्थ होगाकृ विकास दर में तीव्र गिरावट, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी, निवेश और उपभोग में कमी, राजकोषीय दबाव, तथा आम नागरिकों की क्रय शक्ति पर नकारात्मक प्रभाव। हालांकि भारत की विशाल घरेलू मांग, सेवा क्षेत्र, कृषि आधार, डिजिटल अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा भंडार जैसी ताकतें ऐसे संकटों के प्रभाव को कुछ हद तक कम करने में मदद कर सकती हैं।</div><div><br></div><div>जहां तक राहुल गांधी की आशंका के राजनीतिक मायने का सवाल है तो यह कहा जा सकता है कि आर्थिक मुद्दों को चुनावी केंद्र में लाने की कोशिश कांग्रेस बेरोजगारी, महंगाई, किसानों की आय और छोटे कारोबारों की समस्याओं को प्रमुख चुनावी मुद्दा बनाना चाहती है। "आर्थिक सुनामी" जैसी अभिव्यक्ति इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा सकती है। वैसे भी मोदी सरकार के आर्थिक मॉडल पर सीधा हमला राहुल गांधी लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था बड़े कॉरपोरेट समूहों के पक्ष में झुकी हुई है। यह बयान उसी राजनीतिक विमर्श को आगे बढ़ाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं वैश्विक संकट को घरेलू राजनीति से जोड़ना पश्चिम एशिया में तनाव, तेल की कीमतों में संभावित वृद्धि और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की चुनौतियों को विपक्ष सरकार की आर्थिक नीतियों की परीक्षा के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। कुलमिलाकर 2029 के राजनीतिक नैरेटिव की तैयारी में कांग्रेस यह संदेश देना चाहती है कि यदि भविष्य में आर्थिक कठिनाइयाँ बढ़ती हैं तो उसने पहले ही चेतावनी दी थी। वहीं भाजपा इसे "भय फैलाने की राजनीति" बताकर अपनी आर्थिक उपलब्धियों को सामने रख रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि आर्थिक सुनामी का वास्तविक मायने केवल आर्थिक आंकड़ों का बिगड़ना नहीं, बल्कि आम आदमी की आय, रोजगार, बचत, व्यापार और जीवन-स्तर पर एक साथ पड़ने वाला व्यापक नकारात्मक प्रभाव है। यही कारण है कि जब कोई राजनीतिक नेता या अर्थशास्त्री "आर्थिक सुनामी" की चेतावनी देता है, तो उसका आशय संभावित बड़े आर्थिक और सामाजिक झटके से होता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 17:30:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/after-all-what-are-the-political-and-economic-implications-of-the-economic-tsunami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/rahul-gandhi_large_1730_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[पाकिस्तान के बाद अब बांग्लादेश से रक्षा संबंध बना रहा तुर्किये, भारत को दो तरफ से घेरने की रणनीति!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दक्षिण एशिया की बदलती भू राजनीतिक बिसात पर अब एक नया और बेहद खतरनाक समीकरण तेजी से उभर रहा है। भारत विरोधी रवैये के लिए लंबे समय से चर्चित तुर्किये अब केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उसने बांग्लादेश के साथ भी अपने रक्षा और सामरिक रिश्तों को तेजी से विस्तार देना शुरू कर दिया है। ढाका पहुंचे तुर्किये के विदेश मंत्री हाकान फिदान ने जिस तरह बांग्लादेश को दक्षिण एशिया की सुरक्षा संरचना का महत्वपूर्ण स्तंभ बताया, उसने नई दिल्ली की चिंता और गहरा दी है। इस बयान को भारत के चारों ओर रणनीतिक दबाव बनाने की सुनियोजित चाल के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>तुर्किये ने साफ संकेत दे दिया है कि वह दक्षिण एशिया में अपनी मौजूदगी केवल व्यापार या मानवीय सहायता तक सीमित नहीं रखना चाहता। ढाका में हुई उच्च स्तरीय वार्ता में रक्षा सहयोग, रक्षा उत्पादन, सामरिक साझेदारी और आर्थिक विस्तार पर जिस गंभीरता से चर्चा हुई, वह भारत के लिए साधारण घटना नहीं है। बांग्लादेश ने तुर्किये को रक्षा सामग्री निर्माण में निवेश का खुला न्योता दिया है। दोनों देशों ने पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर रणनीतिक साझेदारी की दिशा में कदम बढ़ाने की बात कही है। यह वही तुर्किये है जिसने पाकिस्तान के साथ मिलकर वर्षों तक भारत विरोधी मोर्चेबंदी की, कश्मीर मुद्दे पर खुलकर इस्लामाबाद का साथ दिया और इस्लामी सहयोग संगठन के मंचों पर भारत के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/bangladeshi-infiltrators-are-in-a-tizzy-as-crackdown-continues-across-the-country" target="_blank">Vanakkam Poorvottar: भागते हैं घुसपैठिये, भगाने वाला चाहिए, Bangladeshi Infiltrators के बीच हड़कंप, देशभर में चल रही ताबड़तोड़ कार्रवाई</a></h3><div>उधर, दिल्ली की सबसे बड़ी चिंता यह है कि तुर्किये अब भारत के पश्चिमी मोर्चे पर पाकिस्तान और पूर्वी मोर्चे पर बांग्लादेश के साथ समानांतर सामरिक रिश्ते बना रहा है। यह दो तरफा दबाव की रणनीति जैसी दिखाई देती है। पाकिस्तान पहले से ही तुर्किये के रक्षा उद्योग, ड्रोन तकनीक और सैन्य प्रशिक्षण का लाभ उठा रहा है। अब यदि वही ढांचा बांग्लादेश तक पहुंचता है, तो भारत के लिए सुरक्षा समीकरण और जटिल हो जाएंगे। खास तौर पर तब, जब बांग्लादेश में सत्ता परिवर्तन के बाद नई सरकार अपनी विदेश नीति को नए ढंग से गढ़ने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, तुर्किये और बांग्लादेश के बीच केवल रक्षा सहयोग ही नहीं, बल्कि आर्थिक और संस्थागत साझेदारी भी तेजी से बढ़ रही है। दोनों देश व्यापार को तेरह अरब डॉलर से बढ़ाकर बीस अरब डॉलर तक ले जाने की तैयारी में हैं। विशेष आर्थिक क्षेत्रों में तुर्किये को निवेश का निमंत्रण दिया गया है। वस्त्र, दवा निर्माण, जहाज निर्माण और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाया जा रहा है। ढाका में अंतरराष्ट्रीय स्तर का अस्पताल और नर्सिंग संस्थान स्थापित करने का प्रस्ताव भी दिया गया है। यह साफ दिखाता है कि तुर्किये केवल सैन्य साझेदारी नहीं, बल्कि दीर्घकालिक प्रभाव स्थापित करने की नीति पर काम कर रहा है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुर्किये दक्षिण एशिया में खुद को मुस्लिम दुनिया के प्रभावशाली संरक्षक के रूप में स्थापित करना चाहता है। रोहिंग्या मुद्दे पर उसकी सक्रियता, गाजा पर आक्रामक बयानबाजी और बांग्लादेश के साथ मानवीय सहयोग इसी रणनीति का हिस्सा हैं। लेकिन इसके पीछे छिपा बड़ा उद्देश्य क्षेत्रीय प्रभाव विस्तार और भारत की सामरिक चुनौती को बढ़ाना है।</div><div><br></div><div>वैसे तो तुर्किये लगातार यह कह रहा है कि भारत को उसके पाकिस्तान से रिश्तों की वजह से उससे दूरी नहीं बनानी चाहिए। लेकिन असली सवाल भरोसे का है। राष्ट्रपति एर्दोआन कई बार खुलकर कश्मीर पर पाकिस्तान के समर्थन में बयान दे चुके हैं। तुर्किये ने पाकिस्तान के साथ अपने रक्षा रिश्ते भी काफी मजबूत कर लिए हैं। इतना ही नहीं, पिछले साल भारत और पाकिस्तान के बीच सैन्य संघर्ष के दौरान तुर्किये ने पाकिस्तान को रक्षा उपकरण और ड्रोन तक मुहैया कराए थे। भारत ने पाकिस्तान की तरफ से आए जिन कई ड्रोनों को मार गिराया था, उनमें तुर्किये में बने ड्रोन भी शामिल थे। ऐसे में तुर्किये का भारत से दोस्ती और संतुलन की बात करना नई दिल्ली को एक सोची समझी रणनीतिक चाल जैसा लगता है। यही वजह है कि भारत भी अब तुर्किये को उसी की भाषा में जवाब दे रहा है।</div><div><br></div><div>दरअसल, भारत ने हाल के वर्षों में साइप्रस और ऑर्मेनिया के साथ अपने रक्षा संबंधों को तेजी से मजबूत किया है। ऑर्मेनिया अब भारतीय हथियारों का बड़ा खरीदार बन चुका है। साइप्रस के साथ भी भारत रणनीतिक और रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है। यह सीधे-सीधे तुर्किये को संदेश है कि यदि अंकारा भारत के पड़ोस में दखल बढ़ाएगा, तो नई दिल्ली भी तुर्किये के सामरिक क्षेत्र में जवाबी दबाव बनाएगी। जिस तरह तुर्किये पाकिस्तान और अब बांग्लादेश के जरिए भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, उसी तरह भारत भी तुर्किये के विरोधी या प्रतिस्पर्धी देशों के साथ संबंध मजबूत कर रहा है। यह नई शीत प्रतिद्वंद्विता का संकेत है।</div><div><br></div><div>उधर, बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान की विदेश नीति भी इस समय भारत के लिए गहरी चिंता का विषय बनती जा रही है। भारत की ओर से सबसे पहले आधिकारिक यात्रा का निमंत्रण मिलने के बावजूद रहमान ने पहले मलेशिया और फिर चीन जाने का फैसला किया। ढाका ने साफ तौर पर यह संदेश देने की कोशिश की कि वह अब केवल भारत पर निर्भर रहने वाली नीति से आगे बढ़ना चाहता है। खास बात यह है कि चीन यात्रा के दौरान तीस्ता परियोजना समेत कई बड़े रणनीतिक मुद्दों पर बातचीत की संभावना जताई जा रही है। साथ ही तारिक रहमान की मलेशिया यात्रा को केवल एक सामान्य विदेश दौरे के तौर पर नहीं देखा जा रहा है। इसके पीछे साफ रणनीतिक सोच दिखाई दे रही है। बांग्लादेश नहीं चाहता था कि नई सरकार की पहली विदेश यात्रा सीधे भारत या चीन में से किसी एक देश की तरफ झुकाव का संकेत दे। यही वजह है कि ढाका ने मलेशिया को पहले पड़ाव के तौर पर चुना, ताकि वह खुद को तटस्थ दिखा सके और भारत, चीन प्रतिस्पर्धा से दूरी बनाने का संदेश दे सके। लेकिन इसके राजनीतिक और सामरिक मायने काफी बड़े हैं। मलेशिया यात्रा के बाद चीन जाने की तैयारी यह संकेत देती है कि बांग्लादेश अब अपनी विदेश नीति को नए संतुलन के साथ आगे बढ़ाना चाहता है। इससे भारत की चिंता इसलिए बढ़ रही है क्योंकि ढाका अब एक साथ चीन, तुर्किये, पाकिस्तान और अन्य इस्लामी देशों के साथ अपने रिश्ते मजबूत करने की दिशा में बढ़ता दिख रहा है। यह आने वाले समय में भारत के लिए कूटनीतिक और रणनीतिक चुनौती को और कठिन बना सकता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो भारत के लिए यह समय बेहद सतर्क रहने का है। पाकिस्तान के साथ तुर्किये की साझेदारी पहले ही चिंता का कारण थी, लेकिन अब यदि बांग्लादेश भी उसी धुरी का हिस्सा बनने लगता है, तो यह भारत की पूर्वी सुरक्षा संरचना के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है। हालांकि भारत को कम करके आंकना ढाका, इस्लामाबाद और अंकारा तीनों की सबसे बड़ी भूल साबित हो सकती है। भले ही बांग्लादेश चीन, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ मिलकर नए समीकरण बनाने की कोशिश करे, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति बेहद दूरदर्शी और बहुस्तरीय मानी जाती है। कभी कभार ऐसा लग सकता है कि भारत चुप क्यों है, लेकिन इतिहास गवाह है कि सही समय आने पर प्रधानमंत्री मोदी का जवाब बेहद सटीक और ताकतवर होता है। कूटनीति का जवाब कूटनीति से और रणनीतिक चालों का जवाब उससे भी बड़ी चाल से देना ही मोदी की कार्यशैली रही है। यही वजह है कि आज भारत केवल अपने विरोधियों की गतिविधियों पर नजर नहीं रख रहा, बल्कि उनके हर कदम का जवाब देने के लिए समानांतर रणनीतिक मोर्चे भी तैयार कर रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:42:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/after-pakistan-turkey-is-now-building-defence-ties-with-bangladesh</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/india-turkey-bangladesh_large_1542_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तृणमूल कांग्रेस में टूट और ममता की बढ़ती चिन्ताएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/fracture-in-trinamool-congress-and-mamatas-growing-concerns]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी), जिसने पिछले डेढ़ दशक से बंगाल की राजनीति पर लगभग एकाधिकार स्थापित कर रखा था, आज आंतरिक असंतोष, नेतृत्व संबंधी प्रश्नों और जनविश्वास के संकट से जूझती दिखाई दे रही है। पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं और विधायकों की गतिविधियों ने यह संकेत दिया है कि संगठनात्मक एकता में दरारें उभर रही हैं। यह स्थिति केवल किसी एक राजनीतिक दल का संकट नहीं है, बल्कि लोकतंत्र में राजनीतिक मूल्यों, जनभावनाओं और नेतृत्व की भूमिका पर पुनर्विचार का अवसर भी है। राजनीति में इतिहास बार-बार यह प्रमाणित करता रहा है कि जब भी सत्ता के साथ अहंकार जुड़ता है, जनता अंततः उसका उत्तर देती है। लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। चाहे वह इंदिरा गांधी का आपातकाल हो, पश्चिम बंगाल में वामपंथी शासन या दिल्ली में आम आदमी पार्टी का अंत या फिर उत्तर प्रदेश एवं बिहार की अनेक राजनीतिक घटनाएँ-हर जगह जनता ने यह संदेश दिया है कि सत्ता जनता की सेवा के लिए है, शासन के अहंकार के लिए नहीं।</div><div><br></div><div>ममता बनर्जी को कभी संघर्षशील, जुझारू और जननेता के रूप में देखा जाता था। उन्होंने वामपंथी शासन के लंबे दौर को समाप्त कर बंगाल में परिवर्तन का नया अध्याय लिखा। किंतु समय के साथ उनकी राजनीति पर अहंकारवाद, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण के आरोप बढ़ते गए। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पार्टी के भीतर निर्णय प्रक्रिया का अत्यधिक केंद्रीकरण और कुछ व्यक्तियों का बढ़ता प्रभाव अनेक वरिष्ठ नेताओं को असहज करता रहा है। यही कारण है कि समय-समय पर असंतोष के स्वर उभरते रहे हैं। राजनीतिक टिप्पणीकारों द्वारा प्रकाशित विश्लेषणों में भी यह प्रश्न उठाया गया है कि यदि किसी दल में संगठन से अधिक व्यक्ति महत्वपूर्ण हो जाए, तो वहां असंतोष स्वाभाविक रूप से जन्म लेता है। हाल के घटनाक्रमों ने इस आशंका को और बल दिया है। जिस प्रकार पार्टी के कुछ वरिष्ठ नेता और विधायक नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठा रहे हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि समस्या केवल व्यक्तियों की नहीं, बल्कि संगठनात्मक संस्कृति की भी है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/only-8-mlas-and-6-mps-turned-up-for-the-meeting-at-mamata-banerjee-residence" target="_blank">Mamata Banerjee के घर बैठक में पहुंचे सिर्फ 8 विधायक और 6 सांसद! तृणमूल में बगावत तेज, लोकसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में दीदी!</a></h3><div>भारतीय राजनीति में हाल के वर्षों में आम आदमी पार्टी और उसके नेता अरविंद केजरीवाल का उदाहरण भी इस संदर्भ में उल्लेखनीय है। वर्ष 2013 से लेकर 2024 तक दिल्ली की राजनीति में आम आदमी पार्टी ने अभूतपूर्व सफलता प्राप्त की। भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन से निकले केजरीवाल को जनता ने ईमानदार, पारदर्शी और वैकल्पिक राजनीति के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया। लेकिन समय के साथ सत्ता का केंद्रीकरण, विरोधियों के प्रति असहिष्णुता, राजनीतिक अहंकार और स्वयं को अजेय मान लेने की प्रवृत्ति उनके नेतृत्व पर हावी होती दिखाई दी। जनता ने देखा कि जो दल कभी राजनीतिक शुचिता और नैतिकता की बात करता था, वह भी सत्ता के उसी मोह और व्यक्तिकेंद्रित राजनीति का शिकार होता जा रहा है, जिसके विरुद्ध उसने संघर्ष प्रारम्भ किया था। परिणामस्वरूप दिल्ली की राजनीति में उसका प्रभाव कमजोर हुआ और जनता ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि लोकतंत्र में कोई भी नेता अथवा दल जनता से बड़ा नहीं होता। यह घटना इस सत्य को पुनः स्थापित करती है कि जनता लंबे समय तक अहंकार, अतिशयोक्ति और आत्ममुग्धता को स्वीकार नहीं करती।</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के समक्ष खड़ी चुनौतियों को भी इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। जब किसी दल का नेतृत्व स्वयं को संगठन और जनता से ऊपर मानने लगता है, तब असंतोष जन्म लेता है, कार्यकर्ता दूर होने लगते हैं और अंततः राजनीतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इतिहास बताता है कि लोकतंत्र में विनम्रता, संवाद, जनभावनाओं का सम्मान और राष्ट्रहित के प्रति प्रतिबद्धता ही स्थायी राजनीतिक सफलता की कुंजी हैं। किसी भी लोकतांत्रिक दल की शक्ति उसके विचार, संगठन और कार्यकर्ताओं में होती है, न कि केवल एक नेता में। जब दल विचारधारा की बजाय व्यक्तिपूजा पर आधारित होने लगते हैं, तब उनका संकट निश्चित हो जाता है। भारतीय राजनीति में अनेक उदाहरण हैं जहाँ परिवारवाद ने दलों की जड़ों को कमजोर किया। महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विभाजन के पीछे भी नेतृत्व और उत्तराधिकार से जुड़े प्रश्न महत्वपूर्ण रहे। बंगाल में भी इसी प्रकार की चर्चाएँ समय-समय पर सामने आती रही हैं। तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट उसकी सार्वजनिक छवि का है। शिक्षक भर्ती, नगर निकायों तथा अन्य प्रशासनिक मामलों से जुड़े विवादों ने जनता के मन में अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। किसी भी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास होता है। यदि जनता को यह महसूस होने लगे कि शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही कम हो रही है, तो राजनीतिक नुकसान होना स्वाभाविक है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में लंबे समय से चल रही पहचान, नागरिकता, सीमा सुरक्षा और अवैध घुसपैठ से जुड़ी बहसों ने भी राजनीतिक वातावरण को प्रभावित किया है। भारतीय जनता पार्टी ने इन मुद्दों को राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता के प्रश्न के रूप में प्रस्तुत किया। भाजपा का तर्क रहा है कि राष्ट्रहित सर्वोपरि होना चाहिए और किसी भी प्रकार की तुष्टिकरण की राजनीति अंततः समाज को विभाजित करती है। यही कारण है कि बंगाल में भाजपा ने अपनी राजनीतिक रणनीति को राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और सुशासन के मुद्दों पर केंद्रित किया। भाजपा की बंगाल यात्रा भी अपने आप में एक महत्वपूर्ण राजनीतिक अध्ययन का विषय है। कभी केवल दो सीटों तक सीमित रहने वाली पार्टी आज राज्य की सत्ता िशक्ति बन चुकी है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ। इसके पीछे वर्षों का संगठनात्मक विस्तार, बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं का निर्माण, राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता तथा स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श से जोड़ने की रणनीति रही है। भाजपा ने बंगाल में यह संदेश देने का प्रयास किया कि वह केवल एक राजनीतिक विकल्प नहीं, बल्कि वैचारिक विकल्प भी है। हालांकि यह भी उतना ही सत्य है कि केवल राष्ट्रवाद या धार्मिक पहचान के आधार पर किसी दल की स्थायी सफलता सुनिश्चित नहीं होती। लोकतंत्र में जनता विकास, रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा भी चाहती है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल के लिए आवश्यक है कि वह राष्ट्रीय भावना के साथ-साथ जनकल्याणकारी नीतियों को भी प्राथमिकता दे।&nbsp;</div><div><br></div><div>राष्ट्र और राजनीति का संबंध अत्यंत गहरा है। कोई भी राजनीतिक दल तभी दीर्घकालिक सफलता प्राप्त कर सकता है जब वह राष्ट्रहित, संविधान, लोकतांत्रिक मूल्यों और जनभावनाओं के प्रति प्रतिबद्ध रहे। यदि कोई दल ऐसे तत्वों का समर्थन करता हुआ दिखाई देता है जो राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध हों, तो जनता धीरे-धीरे उससे दूरी बनाने लगती है। भारत की लोकतांत्रिक चेतना इतनी परिपक्व हो चुकी है कि वह अंततः राष्ट्रहित और जनहित के बीच संतुलन स्थापित करने वाले नेतृत्व को ही स्वीकार करती है। पश्चिम बंगाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य इसी सत्य की पुष्टि करता है। तृणमूल कांग्रेस के सामने चुनौती केवल बगावत या संगठनात्मक असंतोष नहीं है, बल्कि जनता के विश्वास को पुनः अर्जित करने की भी है। यदि पार्टी आत्ममंथन करती है, संगठन को लोकतांत्रिक बनाती है, पारदर्शिता बढ़ाती है और जनभावनाओं को समझने का प्रयास करती है, तो वह अपनी स्थिति को पुनः मजबूत कर सकती है। लेकिन यदि अहंकार, व्यक्तिवाद और तुष्टिकरण की राजनीति जारी रहती है, तो संकट और गहरा सकता है। यही लोकतंत्र का शाश्वत सत्य है और यही पश्चिम बंगाल की वर्तमान राजनीति का सबसे बड़ा सबक भी। लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सत्ता स्थायी नहीं होती, किंतु मूल्य स्थायी होते हैं। राजनीतिक दल आते-जाते रहते हैं, लेकिन जनता की अपेक्षाएँ और राष्ट्र की आवश्यकताएँ हमेशा बनी रहती हैं। जो दल इन अपेक्षाओं को समझते हैं, वे इतिहास बनाते हैं और जो इन्हें अनदेखा करते हैं, वे इतिहास बन जाते हैं। आज बंगाल की राजनीति एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। आने वाले वर्षों में यह स्पष्ट होगा कि तृणमूल कांग्रेस आत्मसुधार का मार्ग चुनती है या राजनीतिक पतन की ओर बढ़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार एवं स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 15:36:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/fracture-in-trinamool-congress-and-mamatas-growing-concerns</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/6/mamata-banerjee_large_1537_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अन्नामलाई का नई पार्टी बनाने का निर्णय आवेश में लिया गया फैसला नहीं, लंबे चिंतन का निष्कर्ष दिखाई देता है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/annamalai-decision-to-form-a-new-party-is-not-a-decision-taken-in-the-heat-of-the-moment]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु की राजनीति में एक नया भूचाल उस समय आ गया जब भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई ने पार्टी से इस्तीफा देकर अपने नए राजनीतिक आंदोलन की घोषणा कर दी। यह फैसला तमिलनाडु की जमी हुई राजनीतिक संस्कृति को चुनौती देने वाला एक बड़ा संदेश है। अन्नामलाई ने जिस साफगोई, साहस और वैचारिक दृढ़ता के साथ अपने फैसले को सामने रखा है, उसने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह अब किसी दल के सीमित दायरे में नहीं, बल्कि तमिल समाज की व्यापक आकांक्षाओं के प्रतिनिधि के रूप में उभरना चाहते हैं।</div><div><br></div><div>अन्नामलाई ने खुलकर कहा कि उनके भीतर लंबे समय से यह संघर्ष चल रहा था कि वह पहले भारतीय हैं या तमिल। यह बयान केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति के उस मूल द्वंद्व को सामने लाता है जिसमें राष्ट्रीय दलों को अक्सर क्षेत्रीय अस्मिता के सामने संघर्ष करना पड़ता है। उन्होंने बताया कि चार दिसंबर 2025 को ही उन्होंने पार्टी नेतृत्व को इस्तीफे का फैसला बता दिया था, लेकिन उनसे चुनाव तक रुकने का अनुरोध किया गया। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारतीय जनता पार्टी का शीर्ष नेतृत्व उनकी लोकप्रियता और प्रभाव को लेकर कितना सजग था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/why-is-someone-who-has-never-won-an-election-more-in-the-news-than-vijay-in-tamil-nadu" target="_blank">जिसने आज तक नहीं जीता कोई चुनाव, तमिलनाडु में विजय से ज्यादा वो चर्चा में क्यों? अन्नामलाई का गेम और शाह का प्लान, पूरी कहानी कुछ और है</a></h3><div>पूर्व पुलिस अधिकारी रहे अन्नामलाई ने भारतीय जनता पार्टी में सकारात्मक बदलाव के उद्देश्य से प्रवेश किया था। उन्होंने कहा कि पार्टी में रहते हुए उन्होंने कभी तमिलनाडु की पहचान से समझौता नहीं किया। पिछले अठारह महीनों में संगठनात्मक मामलों को लेकर उनकी असहमति लगातार बढ़ती गई। यही कारण है कि उन्होंने अब एक स्वतंत्र राजनीतिक रास्ता चुनने का फैसला किया है। यह निर्णय किसी आवेश का परिणाम नहीं, बल्कि लंबे चिंतन और रणनीतिक तैयारी का हिस्सा दिखाई देता है।</div><div><br></div><div>अन्नामलाई ने अपने नए आंदोलन "वी द लीडर" की घोषणा करते हुए साफ कर दिया कि उनका उद्देश्य केवल एक और राजनीतिक दल खड़ा करना नहीं, बल्कि राजनीति की भाषा और संस्कृति को बदलना है। उन्होंने परिवारवाद और व्यक्तिपूजा की राजनीति पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि किसी भी विधायक, सांसद या मंत्री का पद स्थायी नहीं होना चाहिए। यह बयान तमिलनाडु की उस परंपरागत राजनीति पर करारा प्रहार है जिसमें कुछ परिवारों और सीमित चेहरों के इर्दगिर्द सत्ता घूमती रही है।</div><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अन्नामलाई ने राजनीति में तकनीकी विशेषज्ञों, युवाओं और सामान्य नागरिकों की भागीदारी पर जोर दिया है। उन्होंने युवाओं से राजनीति में आने की अपील करते हुए कहा कि अब आम आदमी की नई पीढ़ी की राजनीति की नींव रखी जा रही है। यह सोच उन्हें पारंपरिक नेताओं से अलग करती है। देखा जाये तो तमिलनाडु में जहां लंबे समय से भावनात्मक नारों और जातीय समीकरणों के आधार पर राजनीति चलती रही है, वहां अन्नामलाई प्रशासनिक दक्षता, नैतिकता और प्रतिभा आधारित नेतृत्व की बात कर रहे हैं। यही उनकी सबसे बड़ी ताकत बन सकती है।</div><div><br></div><div>उनके आंदोलन के अंतर्गत कोयंबटूर में डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम सेंटर फोर एथिक्स एंड पॉलिटिक्स की स्थापना का फैसला भी बताता है कि वह केवल चुनावी राजनीति नहीं, बल्कि वैचारिक और नैतिक प्रशिक्षण की स्थायी व्यवस्था खड़ी करना चाहते हैं। यह दृष्टिकोण तमिलनाडु की राजनीति में एक नई बौद्धिक धारा पैदा कर सकता है। उनके आह्वान के कुछ ही समय बाद हजारों लोगों का उनके राजनीतिक आंदोलन से जुड़ना यह संकेत देता है कि जनता के एक हिस्से में बदलाव की बेचैनी पहले से मौजूद थी।</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि अन्नामलाई ने भाजपा नेतृत्व के सामने दो स्पष्ट विकल्प रखे थे। एक तो उन्हें पर्याप्त स्वायत्तता और अधिकारों के साथ कम से कम सात वर्षों तक प्रदेश नेतृत्व दिया जाए, या फिर उन्हें स्वतंत्र राजनीतिक राह चुनने दी जाए। यह मांग उनके आत्मविश्वास और दूरदृष्टि दोनों को दर्शाती है। साथ ही इस्तीफे का ऐलान करने से पहले दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन से उनकी मुलाकात तथा पार्टी नेतृत्व द्वारा उन्हें मनाने की कोशिश इस बात का प्रमाण है कि अन्नामलाई की अहमियत से भाजपा नेतृत्व वाकिफ है।</div><div><br></div><div>वैसे तमिलनाडु की मौजूदा राजनीति भी अन्नामलाई के लिए अवसर लेकर आई है। हालिया विधानसभा चुनावों में द्रविड दलों को झटके लगे और अभिनेता विजय की पार्टी ने अप्रत्याशित सफलता हासिल की। इससे यह स्पष्ट हो गया कि राज्य की जनता अब पारंपरिक राजनीतिक ढांचे से बाहर विकल्प तलाश रही है। अन्नामलाई का मानना है कि राष्ट्रीय दलों के लिए यहां सीमित राजनीतिक जगह है, इसलिए एक मजबूत क्षेत्रीय विकल्प ही जनता की आकांक्षाओं को सही दिशा दे सकता है। उनकी यह समझ राजनीतिक रूप से बेहद व्यावहारिक और दूरदर्शी मानी जा रही है।</div><div><br></div><div>उधर, भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष ने भले ही कहा हो कि अन्नामलाई के जाने से पार्टी को कोई नुकसान नहीं होगा, लेकिन राजनीतिक वास्तविकता इससे अलग दिखाई देती है। अन्नामलाई ने तमिलनाडु में भाजपा को ऊर्जा, आक्रामकता और जनस्वीकार्यता दी थी। अब उनके अलग होने से भाजपा के सामने नेतृत्व और जनाधार दोनों की चुनौती खड़ी होगी। दूसरी ओर, अन्नामलाई यदि अपने आंदोलन को संगठित ढंग से आगे बढ़ाते हैं तो वह तमिलनाडु की राजनीति में तीसरी शक्ति के रूप में तेजी से उभर सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह स्पष्ट है कि अन्नामलाई ने केवल पार्टी नहीं छोड़ी, बल्कि तमिलनाडु की राजनीति को नई दिशा देने की चुनौती स्वीकार की है। उनकी राजनीति में साहस है, वैचारिक स्पष्टता है और बदलाव की बेचैनी भी है। आने वाले वर्षों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या उनका यह आंदोलन तमिलनाडु की राजनीति में वैसा ही परिवर्तन ला पाएगा जिसकी वह कल्पना कर रहे हैं। फिलहाल इतना तय है कि अन्नामलाई ने राजनीति के मैदान में एक नई बहस छेड़ दी है और इस बहस को नजरअंदाज कर पाना किसी के लिए आसान नहीं होगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 05 Jun 2026 15:23:09 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/annamalai-decision-to-form-a-new-party-is-not-a-decision-taken-in-the-heat-of-the-moment</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/6/5/annamalai_large_1523_23.jpeg" />
    </item>
  </channel>
</rss>