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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Delhi में बैठे बैठे मोदी ने Iraq में कर दिया खेल, India के पास अब तेल ही तेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-iraq-oil-deal-modi-masterstroke-energy-security]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि भारत रूस से कितना तेल खरीद रहा है, वेनेजुएला से कितना तेल खरीदेगा और अमेरिकी दबाव के आगे भारत अपने फैसले बदलेगा या नहीं। लेकिन इस पूरे शोर-शराबे के बीच एक बड़ा सवाल जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है कि इराक से भारत कितनी बड़ी मात्रा में तेल खरीद रहा है और इस खरीद से अपने आर्थिक हितों को कैसे साध रहा है? देखा जाये तो रूस और वेनेजुएला के तेल पर दुनिया बहस करती रहे, लेकिन भारत की असली रणनीति समझनी है तो इराक के साथ उसके तेल कारोबार पर नजर डालनी होगी। यही वह मोर्चा है, जहां भारत अपनी जरूरत, बाजार और कीमत के हिसाब से फैसले लेकर दुनिया को यह संदेश दे रहा है कि उसकी ऊर्जा नीति किसी के दबाव से नहीं, बल्कि देश के हितों से तय होती है।</p><h2>इराक: भारत की ऊर्जा सुरक्षा का एक बड़ा स्तंभ</h2><p>देखा जाये तो भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आयातक है। देश की अर्थव्यवस्था, परिवहन व्यवस्था, उद्योग और आम आदमी के जीवन में पेट्रोलियम की अहम भूमिका है। ऐसे में तेल की कीमतों में मामूली वृद्धि भी भारत के आयात बिल, महंगाई और रुपये पर दबाव डाल सकती है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, वित्त वर्ष 2025-26 में इराक ने भारत को 4.711 करोड़ मीट्रिक टन कच्चा तेल उपलब्ध कराया। यह भारत के कुल तेल आयात के मूल्य का लगभग 19.16 प्रतिशत था। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद इराक भारत का दूसरा सबसे बड़ा कच्चा तेल आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। ये आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि इराक भारत के लिए कोई मामूली या वैकल्पिक आपूर्तिकर्ता नहीं है। वह भारत की ऊर्जा व्यवस्था का एक प्रमुख आधार है। भारतीय तेल कंपनियां इराक से नियमित रूप से तेल खरीदती हैं और इस व्यापार के माध्यम से दोनों देशों के आर्थिक संबंध भी मजबूत होते हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/indians-stranded-saudi-arabia-umrah-pilgrims-return-modi-government" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia में हालात बिगड़ते ही भारतीय जायरीनों को सुरक्षित निकालने के लिए एक्शन में आई मोदी सरकार, अब तक 13 हजार से ज्यादा लौटे</a></p><h2>अक्टूबर 2026 की खरीद: क्यों चर्चा में आया इराक का तेल?</h2><p>इराक से भारत की खरीद का महत्व हाल के घटनाक्रमों से और बढ़ गया है। 22 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, सितंबर में भारत ने इराक से प्रतिदिन लगभग 8.30 लाख बैरल तेल आयात किया, जबकि अगस्त में यह मात्रा लगभग 1.71 लाख बैरल प्रतिदिन थी। इसी दौरान भारत का रूस से तेल आयात लगभग 14 प्रतिशत घटकर 18 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। यह बदलाव बताता है कि भारत की तेल खरीद किसी एक राजनीतिक समीकरण से तय नहीं होती। जब मध्य-पूर्व का तेल प्रतिस्पर्धी कीमतों पर उपलब्ध होता है, तो भारतीय रिफाइनरियां उसकी ओर रुख कर सकती हैं। रूस का तेल भी भारतीय बाजार के लिए महत्वपूर्ण बना रहता है, लेकिन खरीद का फैसला कीमत, परिवहन खर्च, उपलब्धता और रिफाइनरी की जरूरतों के आधार पर होता है।</p><p>इस रणनीति का एक और उल्लेखनीय उदाहरण सामने आया। इसी महीने की एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन ने इराक के बसरा टर्मिनल से लगभग 20 लाख बैरल बसरा मीडियम क्रूड की एक खेप खरीदने पर सहमति जताई थी। रिपोर्ट में इस खरीद के लिए दुबई के तेल मूल्य से 32 डॉलर प्रति बैरल कम कीमत का उल्लेख किया गया। यह उदाहरण उस मूल सिद्धांत को सामने लाता है जिस पर भारत की ऊर्जा रणनीति आधारित होनी चाहिए। यानि जहां बेहतर आर्थिक शर्तें मिलें, वहां से तेल खरीदने के विकल्प खुले रखे जाएं।</p><h2>वैश्विक बाजार पर क्या पड़ता है इसका असर?</h2><p>देखा जाये तो तेल बाजार में भारत जैसे बड़े खरीदार का निर्णय केवल उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। भारत प्रतिदिन लाखों बैरल कच्चे तेल का आयात करता है। इसलिए यदि भारतीय कंपनियां रूस के बजाय इराक या दूसरे मध्य-पूर्वी उत्पादकों से अधिक तेल खरीदती हैं, तो अलग-अलग तेल ग्रेड की मांग, व्यापारिक प्रवाह और क्षेत्रीय मूल्य प्रतिस्पर्धा प्रभावित हो सकती है। सितंबर 2026 में मध्य-पूर्व से भारत का कुल तेल आयात बढ़कर लगभग 28 लाख बैरल प्रतिदिन पहुंच गया। यह भारत के कुल तेल आयात का लगभग 54 प्रतिशत था। बताया जा रहा है कि मध्य-पूर्वी तेल की बेहतर उपलब्धता और रूसी तेल पर घटते मूल्य-लाभ ने इस बदलाव में भूमिका निभाई।</p><p>हालांकि इसका अर्थ यह नहीं कि इराक से ज्यादा तेल खरीदते ही दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें गिर जाएंगी। वैश्विक कीमतों पर ओपेक की उत्पादन नीति, युद्ध, समुद्री परिवहन, मांग और आपूर्ति जैसे कई कारक असर डालते हैं। लेकिन भारत का विविध स्रोतों से खरीदना आपूर्तिकर्ताओं के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और अपने लिए बेहतर सौदे हासिल करने में मदद कर सकता है।</p><p>यहां सवाल उठता है कि इस सबसे भारत को क्या फायदा हो सकता है? देखा जाये तो पहला फायदा है आयात लागत में बचत। अगर किसी खेप का वास्तविक पहुंच-मूल्य अन्य विकल्पों की तुलना में कम पड़ता है, तो भारतीय कंपनियों का खर्च घट सकता है। इसका लाभ रिफाइनरियों के मुनाफे और व्यापक अर्थव्यवस्था को मिल सकता है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कम कीमत का लाभ पेट्रोल-डीजल के खुदरा दामों में कितना पहुंचेगा, यह करों, रिफाइनिंग लागत और सरकारी मूल्य निर्धारण जैसे दूसरे कारकों पर भी निर्भर करता है।</p><p>दूसरा फायदा है रणनीतिक स्वतंत्रता। भारत को रूस, इराक, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और जरूरत के अनुसार अन्य उत्पादकों से तेल खरीदने के विकल्प बनाए रखने चाहिए। इससे किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता कम होती है और प्रतिबंधों या आपूर्ति संकट की स्थिति में विकल्प उपलब्ध रहते हैं। तीसरा फायदा है भारत की सौदेबाजी की ताकत। जब भारतीय रिफाइनरियां कई बाजारों से खरीद सकती हैं, तो किसी एक आपूर्तिकर्ता की शर्तों को स्वीकार करना उनकी मजबूरी नहीं रह जाता। लेकिन इस लाभ को बनाए रखने के लिए समुद्री मार्गों की सुरक्षा, तेल की गुणवत्ता, परिवहन बीमा और भुगतान व्यवस्था का भी ध्यान रखना जरूरी है।</p><p>इसके अलावा, इराक से प्रतिस्पर्धी शर्तों पर तेल खरीदना और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बावजूद भारत के हितों को सर्वोपरि रखना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ऊर्जा रणनीति का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक है। दुनिया भर की सरकारें तेल की बढ़ती कीमतों और उसके आर्थिक बोझ से जूझ रही हैं, वहीं भारत ने अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के बीच पेट्रोल-डीजल की घरेलू कीमतों में लगभग स्थिरता बनाए रखकर आम जनता को बड़ी राहत देने की कोशिश की है। रूस हो, इराक हो या कोई दूसरा तेल उत्पादक देश, भारत का जोर इस बात पर रहा है कि तेल जहां से भी मिले, उसकी खरीद देश के आर्थिक हितों और ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में रखकर की जाए। यही मोदी सरकार की रणनीति की खासियत है कि वैश्विक संकट के बीच भारत के लिए बेहतर विकल्प तलाशना और अंतरराष्ट्रीय बाजार के दबाव को सीधे आम आदमी की जेब पर हावी न होने देना। जब दुनिया के कई देश महंगे तेल की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब भारत में कीमतों को अपेक्षाकृत स्थिर बनाए रखना मोदी सरकार की ऊर्जा नीति की एक अहम उपलब्धि के रूप में पेश किया जा सकता है।</p><p>हालांकि इराक से तेल खरीदने में जोखिम भी हैं। खाड़ी क्षेत्र में संघर्ष, होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की सुरक्षा और आपूर्ति में संभावित बाधाएं भारत के लिए गंभीर चुनौती बन सकती हैं। इसलिए सस्ता तेल तभी वास्तविक रणनीतिक लाभ है, जब उसकी आपूर्ति भरोसेमंद और आर्थिक रूप से व्यवहार्य भी हो।</p><p>बहरहाल, दुनिया भारत की रूस से तेल खरीद पर नजर रखे या वेनेजुएला से संभावित खरीद पर बहस करे, भारत की ऊर्जा नीति का मूल्यांकन व्यापक तस्वीर के आधार पर होना चाहिए। इराक से 4.711 करोड़ टन वार्षिक तेल आपूर्ति और सितंबर 2026 में वहां से आयात में आई तेज बढ़ोतरी यह दिखाती है कि मध्य-पूर्व भारत की ऊर्जा सुरक्षा में कितनी अहम भूमिका निभाता है। यदि मोदी सरकार और भारतीय तेल कंपनियां प्रतिस्पर्धी कीमतों, सुरक्षित आपूर्ति और दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को एक साथ साध पाती हैं, तो यह व्यावहारिक कूटनीति की बड़ी सफलता होगी।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p><p><iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/1yMn8L1Pv1k?si=RCO70kpXA-VlZDpT" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe></p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 23 Oct 2026 13:45:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-iraq-oil-deal-modi-masterstroke-energy-security</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[जानलेवा होती हवा: सर्दियों से पहले ही प्रदूषण की चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/deadly-air-the-challenge-of-pollution-even-before-winter-sets-in]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सर्दियों ने अभी पूरी तरह दस्तक भी नहीं दी है कि देश के अनेक शहरों की हवा में प्रदूषण का जहर घुलने लगा है। दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता का तेजी से बिगड़ना इस बात का संकेत है कि प्रदूषण का संकट अब केवल सर्दियों की मौसमी समस्या नहीं, बल्कि हमारे पर्यावरणीय प्रबंधन, शहरी विकास और सार्वजनिक स्वास्थ्य के सामने खड़ी एक गंभीर चुनौती बन चुका है। हर साल अक्टूबर-नवंबर में दमघोंटू धुंध, आंखों में जलन, सांस लेने में कठिनाई और अस्पतालों में बढ़ती मरीजों की संख्या के साथ यह संकट सामने आता है। विडंबना यह है कि समस्या के कारणों की पहचान होने और उपायों की जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद हम हर वर्ष उसी त्रासदी को दोहराने के लिए विवश दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि क्या स्वच्छ हवा में सांस लेना भी अब नागरिकों के लिए एक दुर्लभ सुविधा बनकर रह जाएगा? वायु प्रदूषण किसी एक कारण या किसी एक राज्य की देन नहीं है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक उत्सर्जन, निर्माण स्थलों से उड़ती धूल, सड़कों पर जमा मिट्टी, कचरा और जैविक पदार्थ जलाना, ताप विद्युत संयंत्रों से होने वाला उत्सर्जन तथा कृषि अवशेषों का दहन इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। सर्दियों में तापमान गिरने, हवा की गति कम होने और वायुमंडलीय परिस्थितियों के कारण प्रदूषक जमीन के निकट जमा हो सकते हैं। इससे प्रदूषण का प्रभाव अधिक गंभीर हो जाता है। इस प्रकार मौसम समस्या को बढ़ाता अवश्य है, लेकिन प्रदूषण पैदा करने वाले मूल कारण मुख्यतः मानवीय गतिविधियों और उनके अपर्याप्त नियमन से जुड़े हैं।</p><p>दिल्ली-एनसीआर की स्थिति इस संकट का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। दिल्ली के साथ गाजियाबाद, नोएडा, ग्रेटर नोएडा, गुरुग्राम, फरीदाबाद और आसपास के अनेक शहर एक-दूसरे से जुड़े वायु क्षेत्र का हिस्सा हैं। इसलिए केवल दिल्ली की सीमाओं के भीतर उपाय करने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। हवा किसी प्रशासनिक सीमा को नहीं मानती, वह प्रदूषण को भी एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र तक पहुंचाती है। अतः समाधान भी क्षेत्रीय सहयोग, साझा जवाबदेही और समन्वित कार्ययोजना पर आधारित होना चाहिए। वायु प्रदूषण का सबसे भयावह पक्ष उसका स्वास्थ्य पर पड़ने वाला प्रभाव है। विशेष रूप से पीएम 2.5 जैसे अत्यंत सूक्ष्म कण फेफड़ों की गहराई तक पहुंच सकते हैं और कुछ परिस्थितियों में रक्तप्रवाह तक प्रवेश कर सकते हैं। इनके लंबे समय तक संपर्क में रहने से हृदय एवं फेफड़ों संबंधी बीमारियों, स्ट्रोक और समयपूर्व मृत्यु का जोखिम बढ़ता है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं तथा पहले से बीमार लोगों पर इसका प्रभाव विशेष रूप से गंभीर हो सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-ncr-implements-grap-stage-1-as-air-quality-deteriorates-to-poor" target="_blank" rel="noopener">CAQM ने दिल्ली NCR में लागू किया GRAP 1, प्रदूषण रोकथाम के लिए जारी किए निर्देश</a></p><p>यह संकट केवल सांस के मरीजों तक सीमित नहीं है। स्वस्थ दिखाई देने वाले लोगों की कार्यक्षमता, एकाग्रता और जीवन की गुणवत्ता भी प्रभावित होती है। स्कूल जाने वाले बच्चों को खुले मैदान में खेलने से रोकना पड़े, बुजुर्ग सुबह की सैर छोड़ने को विवश हों और श्रमिकों को जहरीली हवा में काम करना पड़े, तो यह केवल पर्यावरण की समस्या नहीं, बल्कि जीवन की गरिमा और नागरिकों के स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ा प्रश्न है। एयर प्यूरीफायर या मास्क कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत बचाव में सहायक हो सकते हैं, लेकिन वे स्वच्छ हवा की सार्वजनिक व्यवस्था का विकल्प नहीं बन सकते। प्रदूषण बढ़ने पर ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (ग्रैप) लागू करना आवश्यक है। इसके अंतर्गत प्रदूषण की गंभीरता के अनुसार निर्माण गतिविधियों पर प्रतिबंध, वाहनों और उद्योगों पर नियंत्रण तथा अन्य आपातकालीन कदम उठाए जाते हैं। लेकिन इन उपायों की सफलता केवल आदेश जारी करने से नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन और निरंतर निगरानी से सुनिश्चित होती है। यदि प्रतिबंधों का उल्लंघन होता रहे, निर्माण स्थलों पर धूल उड़ती रहे और कचरा खुले में जलता रहे, तो सरकारी घोषणाएं अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकतीं।</p><p>सरकार को प्रदूषण के चरम पर पहुंचने की प्रतीक्षा करने के बजाय सितंबर-अक्टूबर से ही तैयारी शुरू कर देनी चाहिए। प्रदूषण के स्रोतों की पहचान, औद्योगिक इकाइयों का निरीक्षण, सड़कों की नियमित सफाई, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और वाहनों के उत्सर्जन की जांच पहले से सुनिश्चित की जानी चाहिए। सार्वजनिक परिवहन को मजबूत करना, इलेक्ट्रिक बसों को बढ़ावा देना, स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार करना और प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों के विरुद्ध निष्पक्ष कार्रवाई करना दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा होना चाहिए। कृषि क्षेत्र में पराली जलाने की समस्या का समाधान किसानों पर जुर्माना लगाने भर से नहीं होगा। उन्हें फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए सस्ती मशीनें, तकनीकी सहायता, आर्थिक प्रोत्साहन और स्थानीय स्तर पर उपयोग की सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। किसानों को समस्या का भागीदार नहीं, समाधान का सहयोगी बनाना होगा।</p><p>प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल सरकार की नहीं है। नागरिकों को निजी वाहनों का अनावश्यक उपयोग कम करने, सार्वजनिक परिवहन अपनाने, कचरा और पत्तियां न जलाने तथा ऊर्जा की बचत करने जैसे कदम उठाने होंगे। पर्यावरण संबंधी नियमों के उल्लंघन की सूचना संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाना और स्थानीय स्तर पर स्वच्छता एवं हरित क्षेत्र बढ़ाने के प्रयासों में भाग लेना भी आवश्यक है। मीडिया, शैक्षणिक संस्थानों और सामाजिक संगठनों को जनजागरूकता अभियान चलाने चाहिए, ताकि स्वच्छ हवा का महत्व केवल प्रदूषण के चरम पर ही याद न आए। साथ ही, वायु गुणवत्ता के आंकड़े पारदर्शी ढंग से सार्वजनिक किए जाएं और नागरिकों को प्रदूषण के स्तर के अनुरूप स्वास्थ्य संबंधी सलाह दी जाए।</p><p>आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकारें, उद्योग, किसान और नागरिक अपनी-अपनी जिम्मेदारियों से पीछे न हटें। चीन के बीजिंग जैसे शहरों में प्रदूषण घटाने के अनुभव यह बताते हैं कि निरंतर नीतिगत प्रयास, स्वच्छ परिवहन, औद्योगिक नियंत्रण और प्रभावी निगरानी से उल्लेखनीय सुधार संभव है। भारत को भी अपनी परिस्थितियों के अनुरूप ऐसे उपायों को दृढ़ता से लागू करना होगा। हर साल सर्दियों में प्रदूषण से जूझना और फिर मौसम बदलने पर समस्या को भूल जाना किसी भी संवेदनशील समाज की नियति नहीं हो सकती। स्वच्छ हवा कोई विलासिता नहीं, जीवन की बुनियादी आवश्यकता है। यदि आज ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। इसलिए प्रदूषण का मुकाबला संकट गहराने के बाद नहीं, उससे पहले करना होगा। सरकार की सक्रियता, प्रशासन की जवाबदेही और जनता की जागरूकता ही वह त्रिकोण है, जिसके आधार पर हम दमघोंटू हवा से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 23 Oct 2026 12:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/deadly-air-the-challenge-of-pollution-even-before-winter-sets-in</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mukesh Ambani के कारोबारी सामर्थ्य का अचानक मुरीद क्यों हुआ अमेरिका? Marco Rubio ने Jamnagar Refinery में क्या क्या देखा?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/marco-rubio-jamnagar-reliance-refinery-mukesh-ambani-us-india-energy-relations]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>गुजरात स्थित जामनगर में बुधवार को एक ऐसी मुलाकात हुई, जिसके मायने किसी औद्योगिक दौरे से कहीं ज्यादा बड़े हैं। अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो दुनिया की सबसे बड़ी सिंगल-साइट ऑयल रिफाइनरी देखने पहुंचे, जहां रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन और मैनेजिंग डायरेक्टर मुकेश अंबानी तथा एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर अनंत अंबानी ने उनका स्वागत किया। उनके साथ भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर भी मौजूद रहे। सवाल यह है कि अमेरिका के शीर्ष राजनयिक ने दिल्ली के बजाय जामनगर को इतना महत्व क्यों दिया? जवाब है तेल, ऊर्जा सुरक्षा, वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल और अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव।</p><p>हम आपको बता दें कि जामनगर में रुबियो को केवल रिफाइनरी की विशाल मशीनें और अत्याधुनिक तकनीक नहीं दिखाई गई, बल्कि रिलायंस के उस औद्योगिक सामर्थ्य से भी परिचित कराया गया, जिसकी जरूरत आज अमेरिका को भी महसूस हो रही है। कंपनी के मुताबिक, अंबानी ने उन्हें रिफाइनिंग कॉम्प्लेक्स के अलावा निर्माणाधीन डेटा सेंटरों और चरणबद्ध तरीके से शुरू हो रही न्यू एनर्जी गीगा-फैक्ट्रियों की जानकारी दी। बातचीत में पारंपरिक ऊर्जा, नई ऊर्जा, तकनीकी सहयोग, मजबूत सप्लाई चेन और डेटा सेंटरों के लिए भरोसेमंद बिजली की जरूरत जैसे मुद्दे शामिल रहे। यानी चर्चा सिर्फ तेल खरीदने-बेचने की नहीं, बल्कि ऊर्जा और डिजिटल अर्थव्यवस्था के भविष्य की भी थी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/take-a-close-look-at-the-strategic-partnership-behind-marco-rubio-visit-to-india" target="_blank" rel="noopener">मार्को रूबियो की भारत यात्रा के पीछे की रणनीतिक साझेदारी या दबाव की कूटनीति को बारीकी से समझिए</a></p><h2>आखिर जामनगर में ऐसा क्या है?</h2><p>हम आपको बता दें कि जामनगर रिफाइनरी कॉम्प्लेक्स की संयुक्त कच्चा तेल प्रसंस्करण क्षमता प्रतिदिन 14 लाख बैरल है। इसमें 1999 में शुरू हुई पहली रिफाइनरी और 2008 में चालू हुई निर्यात-केंद्रित दूसरी रिफाइनरी शामिल हैं। रिलायंस के मुताबिक, यह कॉम्प्लेक्स 216 से अधिक प्रकार के कच्चे तेल का प्रसंस्करण कर चुका है। इसकी सबसे बड़ी ताकत भारी और अधिक सल्फर वाले कच्चे तेल को भी उपयोगी पेट्रोलियम उत्पादों में बदलने की क्षमता है।</p><p>यही क्षमता इसे अमेरिका के लिए रणनीतिक रूप से अहम बनाती है। वेनेजुएला का भारी कच्चा तेल दुनिया की हर रिफाइनरी आसानी से संसाधित नहीं कर सकती। लेकिन रिलायंस की जामनगर रिफाइनरी इस मामले में विशिष्ट क्षमता रखती है। अमेरिका की वेनेजुएला-केंद्रित तेल रणनीति और वहां से कच्चे तेल की आपूर्ति बढ़ाने की कोशिशों के बीच रिलायंस एक महत्वपूर्ण संभावित साझेदार बनकर उभरी है।</p><p>रुबियो ने साफ कहा कि रिलायंस के पास वेनेजुएला समेत पश्चिमी देशों में निकलने वाले भारी कच्चे तेल को रिफाइन करने की खास क्षमता है। यही वजह है कि अमेरिका रिलायंस के साथ मिलकर काम करने के नए रास्ते तलाश रहा है। अनुमानों के मुताबिक, अक्टूबर में रिलायंस हर दिन वेनेजुएला से करीब 3.5 लाख से 3.7 लाख बैरल कच्चा तेल मंगा सकती है। इससे साफ है कि वेनेजुएला के तेल को इस्तेमाल करने की अमेरिकी रणनीति में जामनगर रिफाइनरी की भूमिका बेहद अहम हो सकती है।</p><h2>अमेरिका की परेशानी और रिलायंस की अहमियत</h2><p>इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा पहलू अमेरिकी घरेलू अर्थव्यवस्था है। अमेरिका में डीजल की कीमतों में उछाल और ईंधन आपूर्ति को लेकर चिंताओं के बीच राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन पर भारी दबाव है। नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगे ईंधन का मुद्दा राजनीतिक रूप से भी संवेदनशील है।</p><p>रिलायंस इस तस्वीर में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जामनगर से डीजल, पेट्रोल और विमानन ईंधन सहित बड़ी मात्रा में रिफाइंड उत्पाद दुनिया भर में भेजे जाते हैं। रिपोर्टों के मुताबिक 2025 की पहली छमाही में जामनगर से 2.166 करोड़ टन रिफाइंड पेट्रोलियम उत्पादों का निर्यात हुआ। इसमें 98.1 लाख टन डीजल, 61.4 लाख टन पेट्रोल और 20.6 लाख टन जेट ईंधन शामिल था। यूरोप इन उत्पादों का सबसे बड़ा क्षेत्रीय बाजार रहा।</p><p>साथ ही अमेरिका के लिए रिलायंस की अहमियत सिर्फ उसकी रिफाइनरी तक सीमित नहीं है। भारत में अमेरिकी गैस की बढ़ती मांग भी इसकी बड़ी वजह है। भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर के मुताबिक, पिछले एक साल में भारत के कुल एलपीजी आयात में अमेरिकी गैस की हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से बढ़कर 67 प्रतिशत हो गई है। यानी अब भारत को एलपीजी सप्लाई करने वाला अमेरिका सबसे बड़ा देश बन गया है।</p><h2>अमेरिका में अंबानी का निवेश भी चर्चा के केंद्र में</h2><p>इसके अलावा, रुबियो के दौरे के पीछे एक और बड़ा आर्थिक पहलू है। ट्रंप प्रशासन अमेरिका में औद्योगिक उत्पादन और रोजगार वापस लाने की नीति को अपनी प्रमुख उपलब्धियों के रूप में पेश करता रहा है। इसी सिलसिले में टेक्सास के पोर्ट ऑफ ब्राउन्सविल में प्रस्तावित नई तेल रिफाइनरी में रिलायंस की भागीदारी को खास महत्व दिया जा रहा है। अमेरिका में करीब पांच दशकों बाद लगने जा रही इस प्रमुख नई रिफाइनरी पर लगभग 3 से 4 अरब डॉलर खर्च होने का अनुमान है। इसकी सालाना प्रसंस्करण क्षमता करीब 6 करोड़ बैरल अमेरिकी कच्चे तेल की होगी। रिलायंस ने इसके उत्पादन का बड़ा हिस्सा खरीदने के लिए 20 साल का समझौता किया है और इसके 2029 के आसपास परिचालन शुरू करने की उम्मीद है।</p><h2>रूस का तेल, यूक्रेन युद्ध और भारत पर अमेरिकी दबाव</h2><p>रिलायंस की अहमियत का तीसरा पहलू रूस-यूक्रेन युद्ध है। 2022 में युद्ध शुरू होने के बाद भारत रूसी तेल का बड़ा खरीदार बनकर उभरा और रिलायंस ने भी रूसी कच्चे तेल का आयात बढ़ाया। कंपनी के तेल स्रोतों में रूस की हिस्सेदारी 2022 से पहले लगभग 3 प्रतिशत थी, जो 2025 में बढ़कर करीब 50 प्रतिशत तक पहुंच गई। रूसी तेल खरीदने के मुद्दे पर ट्रंप प्रशासन ने भारत पर अतिरिक्त टैरिफ का दबाव बनाया। इसके बाद रिलायंस ने रूसी कच्चे तेल का आयात घटाया। रुबियो ने स्वीकार किया कि भारत अपने ऊर्जा स्रोतों में विविधता ला रहा है, लेकिन रूस से बड़ी मात्रा में तेल खरीदना तुरंत बंद करना आसान नहीं है। उन्होंने भारत को अमेरिका का महत्वपूर्ण साझेदार भी बताया।</p><h2>अमेरिकी मीडिया की नजर में यह दौरा क्यों खास है?</h2><p>उधर, अमेरिकी और अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस दौरे को सिर्फ एक कारोबारी मुलाकात के तौर पर नहीं देख रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि रिलायंस अमेरिका के कई अहम हितों से जुड़ी हुई है। अमेरिका चाहता है कि भारत रूसी तेल पर अपनी निर्भरता कम करे, वेनेजुएला के तेल का ज्यादा इस्तेमाल हो, ईंधन की कीमतों पर काबू पाया जा सके और अमेरिकी कंपनियों में निवेश बढ़े। इन सभी मुद्दों पर रिलायंस की भूमिका अहम हो सकती है।</p><h2>अंबानी बनाम मस्क: अमेरिकी हितों की एक और पेचीदगी</h2><p>दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रंप प्रशासन रिलायंस के साथ ऊर्जा सहयोग बढ़ाने की संभावनाएं तलाश रहा है, वहीं ट्रंप के करीबी एलन मस्क का रिलायंस से टकराव भी सामने आया है। मस्क की कंपनी स्टारलिंक भारत में परिचालन लाइसेंस हासिल करने की कोशिश कर रही है। मस्क ने आरोप लगाया कि भारत में जियो को फायदा पहुंचाने के लिए स्टारलिंक के प्रवेश में बाधाएं डाली जा रही हैं। रिलायंस ने जवाब दिया कि उसे प्रतिस्पर्धा से कभी डर नहीं लगा और वह घरेलू तथा अंतरराष्ट्रीय निवेश एवं नवाचार का स्वागत करने वाले भारत में विकसित हुई है। देखा जाये तो यही विरोधाभास इस पूरे घटनाक्रम को और दिलचस्प बनाता है। अमेरिका के कारोबारी और राजनीतिक हित हर मुद्दे पर एक जैसे नहीं हैं, लेकिन ऊर्जा के मोर्चे पर रिलायंस की क्षमता वॉशिंगटन को उसके साथ बातचीत के लिए प्रेरित कर रही है।</p><p>कुल मिलाकर देखें तो जामनगर में मार्को रुबियो का दौरा भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी के कारोबारी सामर्थ्य का भी बड़ा संकेत है। दुनिया के सबसे ताकतवर देशों में शामिल अमेरिका के विदेश मंत्री का भारत आकर किसी उद्योगपति के साथ ऊर्जा और निवेश जैसे अहम मुद्दों पर चर्चा करना अपने आप में खास है। इससे पता चलता है कि वैश्विक ऊर्जा बाजार में रिलायंस की क्षमता और जामनगर रिफाइनरी की अहमियत को अमेरिका भी गंभीरता से लेता है। रिलायंस ने भी अपने बयान में कहा है कि इस दौरे के दौरान पारंपरिक और नई ऊर्जा के क्षेत्र में कारोबारी साझेदारी की संभावनाओं, सस्ती और भरोसेमंद ऊर्जा आपूर्ति, आधुनिक तकनीक और मजबूत सप्लाई चेन पर चर्चा हुई। कंपनी ने अमेरिकी कंपनियों के साथ तकनीक, इंजीनियरिंग और आधुनिक विनिर्माण के क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर भी अपने विचार रखे।</p><p>बहरहाल, जामनगर से निकला संदेश साफ है कि भारत की औद्योगिक ताकत और मुकेश अंबानी की कारोबारी क्षमता को अमेरिका भी नजरअंदाज नहीं कर सकता। अमेरिकी विदेश मंत्री का किसी भारतीय उद्योगपति से मिलने के लिए उसके औद्योगिक परिसर तक पहुंचना इस बात को रेखांकित करता है कि वैश्विक ऊर्जा की राजनीति में रिलायंस की भूमिका कितनी अहम हो गई है। यह सिर्फ अंबानी की कारोबारी सफलता की कहानी नहीं, बल्कि भारत की उस बढ़ती ताकत का भी संकेत है, जिसके साथ अमेरिका अपने ऊर्जा और आर्थिक हितों को जोड़कर देख रहा है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 13:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/marco-rubio-jamnagar-reliance-refinery-mukesh-ambani-us-india-energy-relations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[चुनौतियों के बावजूद बढ़ती हिंदी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/hindi-on-the-rise-despite-challenges]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बांग्ला संस्कृति का मूल स्वर सहिष्णुता, उदारता और समन्वय का रहा है। उन्नीसवीं सदी में बंगाल की धरती ने नवजागरण का स्वागत किया, जिसके मूल में ईश्वरचंद्र विद्यासागर और स्वामी विवेकानंद के विचार रहे। इस समन्वय की संस्कृति का ही असर रहा कि बंगाल की ही धरती से ना सिर्फ हिंदी पत्रकारिता का उद्भव हुआ, बल्कि उसकी जड़ें मजबूत भी हुईं। लेकिन वही बंगाल बदल गया है। बांग्ला संस्कृति समन्वय के सूत्रों को कहीं पीछे छोड़ती नजर आने लगी है। अगर ऐसा नहीं होता तो कोलकाता नगर निगम के उस पोस्टर पर विवाद नहीं होता, जिसमें बांग्ला और हिंदी भाषा के शब्दों का अनूठा और कलात्मक संगम था। बांग्ला संस्कृति के प्रतीक पर्व दुर्गा पूजा के दौर में भाषायी सौंदर्य और कला के अनूठे मेल पर राजनीति ने जब सवाल उठाया तो कोलकाता नगर निगम ने अपना पोस्टर ही वापस ले लिया। शायद निगम ने सोचा होगा कि उत्साह और उल्लास का स्वाद राजनीतिक कंकड़ से खराब ना हो।</p><p>जिस पोस्टर पर विवाद हुआ, उसके बारे में जानना जरूरी है। यह भी जानना जरूरी है कि आखिर उसमें क्या रहा, जिससे पश्चिम बंगाल का विपक्षी दल तृणमूल कांग्रेस परेशान हो गया। दरअसल दुर्गा पूजा के दौरान दस से 21 अक्टूबर तक कोलकाता नगर निगम ने देश की पूर्व राजधानी वाले शहर में चलाए जा रहे सफाई अभियान के लिए एक विशेष पोस्टर जारी किया था। जिसमें लिखा था, 'मायेर कोरबो स्वच्छता से स्वागत' यानी मां दुर्गा का स्वागत स्वच्छता से करेंगे। जैसा कि शब्दों से पता चलता है, पोस्टर के अकेले वाक्य में बांग्ला और हिंदी शब्दों का अनूठा मेल पेश किया गया। विज्ञापन के भाषा की जिन्हें समझ है, उन्हें पता है कि बांग्ला और हिंदी के इस अनूठे मेल के जरिए जो संदेश दिया गया, वह कितना प्रभावी रहा। लेकिन तृणमूल कांग्रेस को इस वाक्य के तीन शब्द ‘स्वच्छता से स्वागत’ बंगाल में हिंदी थोपने का षडयंत्र नजर आने लगा। वैसे भी राज्य में अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार है। भाजपा की पहचान हिंदुत्व और हिंदी को लेकर रही है। इसलिए तृणमूल के लिए यह आरोप लगाना और उसे भाजपा के हिंदी वर्चस्ववाद के छद्म नैरेटिव से जोड़ना आसान रहा। लेकिन कोलकाता नगर निगम ने राजनीति से किनारा करना उचित समझा और इसे बदलने में उसने देर नहीं लगाई। पोस्टर के वाक्य को पूरी तरह बांग्ला कर दिया, 'स्वच्छतार साथे, मां के स्वागत जनाई' कर दिया। बांग्ला के इस वाक्य का भाव वही है, जो पहले वाक्य का रहा। अफसोस यह कि राजनीति की वजह से भाषाई मेल का अनूठापन गायब हो गया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/for-how-much-longer-will-lives-continue-to-be-lost-in-the-surging-tide-of-faith" target="_blank" rel="noopener">आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां?</a></p><p>संविधान सभा में हिंदी को जितनी चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा, उससे ज्यादा हिंदी इन दिनों वह चुनौतियों से जूझ रही है। वैसे तो तमिल जैसी क्षेत्रीय राजनीतिक अस्मिताएं हिंदी की राह में रोड़े डालती रही हैं। इसका साथ कभी कर्नाटक तो कभी महाराष्ट्र देता रहा है। यहां गौर करने की बात यह है कि भारतीय राष्ट्रीयता के अंतर्गत कई उपराष्ट्रीयताएं भी हैं, जिसे हम क्षेत्रीय अस्मिताओं के नाम से भी जानते हैं। भारतीय राष्ट्रीयता का मूल स्वर हिंदी के जरिए उद्घाटित होता है। जिसे हम हिंदी हार्टलैंड या हृदय प्रदेश कहते हैं, वहां राष्ट्रीयता पर अपवादस्वरूप ही सवाल उठते हैं। लेकिन उपराष्ट्रीयताएं अक्सर हिंदी पर हमले के बहाने राष्ट्रीयता को प्रकारांतर से चुनौती देती रहती हैं। तब उनका एक मात्र तर्क यही होता है कि हिंदी थोपी जा रही है। दिलचस्प यह है कि जिस भाषा ने करीब दो सौ साल तक देश को गुलाम बनाए रखा, उसे अपनाने में उपराष्ट्रीयताएं गर्व समझती हैं। संविधान सभा की आखिरी बैठक के दिन सभा के अध्यक्ष राजेंद्र प्रसाद ने खुलेतौर पर स्वीकार किया था कि भाषा की समस्या का ठोस हल सभा नहीं निकाल पायी है। फिर भी उन्हें उम्मीद थी कि आने वाले दिनों में भाषा के मुद्दे पर देश गांधी की तरह सोचेगा। हालांकि महावीर प्रसाद त्यागी को ऐसी उम्मीद नहीं थी। इसीलिए उन्होंने अपने आखिरी भाषण में कहा था कि वे संविधान के पृष्ठों पर गांधीजी को खोज रहे हैं, लेकिन उन्हें गांधी नजर नहीं आए।</p><p>पता नहीं, तृणमूल कांग्रेस को यह पता है या नहीं, लेकिन उसे जानना चाहिए कि आर्य समाज के प्रमुख ग्रंथ सत्यार्थ प्रकाश को हिंदी में लिखने के लिए बांग्ला माटी के सपूत केशवचंद्र सेन ने स्वामी दयानंद सरस्वती को प्रेरित किया था। भावी भारत की संपर्क या राष्ट्रभाषा बनने की क्षमता हिंदी में देखने वाले प्राथमिक लोगों में केशवचंद्र सेन भी रहे। कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद बंगाल की माटी के क्रांतिकारी सपूत सुभाष चंद्र बोस ने ना सिर्फ हिंदी सीखने के लिए शिक्षक रखा था, बल्कि उन्होंने कोलकाता नगर निगम के अध्यक्ष के नाते पिछली सदी के तीस के दशक में हिंदी को लेकर अर्थपूर्ण भाषण भी दिया था।</p><p>हिंदी पर सवाल कभी-कभी कर्नाटक में भी उठता है और किंचित महाराष्ट्र में भी। लेकिन हिंदी को स्वाधीनता से पहले से ही सबसे बड़ी चुनौती तमिलनाडु में मिलती रही है। हाल ही में तमिलनाडु के करूर और कोयंबटूर के सरकारी अस्पतालों में मरीजों को दी जाने वाली दवाओं के पर्चे के कवर पर तमिल और अंग्रेजी के साथ-साथ हिंदी में भी निर्देश छापे गए थे। जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर जारी करते हुए विपक्षी द्रमुक पार्टी के नेता टी.आर.बी. राजा ने सवाल उठाया कि क्या तमिलनाडु में चुपचाप 'तीन-भाषा नीति' लागू की जा चुकी है। हिंदी की ग्रंथि से प्रभावित तमिलनाडु राजनीति सवाल उठाए तो विवाद होना ही था। जब विवाद बढ़ा तो दोनों सरकारी मेडिकल कॉलेजों और अस्पतालों ने मरीजों को दिए जाने वाले त्रिभाषी कवर का वितरण तत्काल रोक दिया और उसकी जगह तमिल और अंग्रेजी लिखी पर्चियां जारी कर दीं। तमिलनाडु में हाल ही में राजमार्ग के साइनबोर्ड पर हिंदी लिखे जाने को लेकर भी विवाद खड़ा किया गया। राज्य के तूतीकोरिन जिले के सत्तानकुलम-नाजरेथ राज्य राजमार्ग 93 पर हिंदी में जगहों का नाम लिखा जाना यहां की विपक्षी राजनीति को रास नहीं आया। जब विवाद बढ़ा तो दो सहायक इंजीनियरों भूमिनाथन और मुथु लक्ष्मी को निलंबित कर दिया गया। इतना ही नहीं, साइनबोर्ड से तत्काल हिंदी नामों को मिटा दिया गया। दरअसल, हाईवे पर लगे नए साइनबोर्ड में तमिल और अंग्रेजी के साथ कस्बों के नाम हिंदी में भी लिखे गए थे। हिंदी उस राज्य के लिए कितनी खतरनाक हो सकती है, जिसकी एक मंत्री एस कीर्तना ने मई में शपथ लेते ही हिंदी बोलकर लोगों का दिल जीत लिया था। तब उनका तर्क था कि हिंदी के जरिए वे अपने नेता यानी जोसेफ विजयन की नीतियों को व्यापक समुदाय तक पहुंचाना चाहती हैं।</p><p>राजनीति के चलते भले ही कोलकाता नगर निगम और तमिलनाडु सरकार झुक गए हों, लेकिन देश की सहज संपर्क भाषा को चुनौती समझने वाले इन राज्यों की राजनीति को समझना होगा कि उनके विरोध के बावजूद हिंदी खुद बढ़ रही है। कोलकाता में पोस्टर तैयार करने वाले दिमाग और हाथों को हिंदी के प्रयोग के जरिए भाषायी चमत्कार करना कलात्मक लगता है तो यह हिंदी की ही जीत है। तमिलनाडु के वे इंजीनियर भी बधाई के पात्र हैं, जिन्होंने लीक पर चलने की बजाय राजमार्ग के पास के शहरों और कस्बों के नामों को देवनागरी में लिखना उचित समझा। चाहे पोस्टर तैयार करने वाला दिमाग हो या फिर कस्बों का नाम हिंदी में उकेरने वाले विचार, उनकी नजर में हिंदी कोई चुनौती नहीं, बल्कि भारतीय अभिव्यक्ति का विस्तार है। इसलिए उन हाथों और दिमागों का स्वागत किया जाना चाहिए।</p><p>- उमेश चतुर्वेदी<br>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 11:43:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/hindi-on-the-rise-despite-challenges</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[दशहरा रैली में उद्धव और शिंदे की ताजा भिड़ंत ने बालासाहेब की विरासत की जंग को और भड़का दिया है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/uddhav-thackeray-eknath-shinde-dussehra-rally-regime-change-maharashtra-politics-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>महाराष्ट्र की राजनीति में दशहरा पर्व सियासी शक्ति प्रदर्शन और एक-दूसरे पर हमले का बड़ा मौका भी है। मुंबई में इस बार भी यही नजारा दिखा। दादर के शिवाजी पार्क में उद्धव ठाकरे की हुंकार थी, तो गोरेगांव के नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे का पलटवार था। दोनों नेता एक-दूसरे पर निशाना साध रहे थे, लेकिन उनकी असली नजर महाराष्ट्र की जनता पर थी, जिसे तय करना है कि बालासाहेब ठाकरे की राजनीतिक विरासत का असली वारिस कौन है। इस बार दोनों रैलियों में ‘रिजीम चेंज’ यानी सत्ता परिवर्तन का मुद्दा भी खास रहा। उद्धव ठाकरे ने केंद्र की भाजपा सरकार को हटाने और सत्ता बदलने की खुली हुंकार भरी। उन्होंने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों और वोटर लिस्ट में कथित गड़बड़ियों का हवाला देते हुए सवाल उठाया कि जब लोगों को न्याय नहीं मिलेगा, तो वे सत्ता परिवर्तन की मांग क्यों न करें? जवाब में एकनाथ शिंदे ने तंज कसते हुए कहा कि सत्ता में कौन रहेगा, इसका फैसला जनता करती है। उन्होंने उद्धव को याद दिलाया कि उनकी अपनी पार्टी में भी सत्ता और नेतृत्व का बदलाव हो चुका है। दोनों के इन बयानों का सियासी मतलब यह है कि जहां उद्धव महाराष्ट्र की लड़ाई को केंद्र की भाजपा सरकार के खिलाफ व्यापक विपक्षी अभियान से जोड़ना चाहते हैं, वहीं शिंदे सत्ता परिवर्तन की मांग को जनता के फैसले के खिलाफ विपक्ष की बेचैनी बताकर खारिज करना चाहते हैं।</p><p>साथ ही उद्धव और शिंदे की दशहरा रैली से जो तस्वीर उभरती है वह साफ बताती है कि यह मुकाबला अब महज दो नेताओं की निजी अदावत नहीं रह गया है। इसके केंद्र में हिंदुत्व की परिभाषा, मराठी अस्मिता, किसानों की बदहाली, चुनावी जनादेश और सत्ता की वैधता जैसे सवाल हैं। दोनों खेमे अपनी-अपनी कहानी सुना रहे हैं, लेकिन असली परीक्षा जनता की अदालत में होनी है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/eknath-shinde-sharp-attack-on-uddhav-thackera-calls-the-2019-alliance-a-robbery-of-the-public" target="_blank" rel="noopener">एकनाथ शिंदे का उद्धव ठाकरे पर तीखा हमला: 2019 का गठबंधन ‘जनादेश की डकैती’, ‘इंडिया’ गठबंधन को बताया रावण</a></p><h2>उद्धव ठाकरे का हमला</h2><p>देखा जाये तो शिवाजी पार्क उद्धव ठाकरे के लिए सिर्फ रैली का मैदान नहीं, राजनीतिक विरासत का प्रतीक है। यही वह जमीन है, जहां बालासाहेब ठाकरे ने शिवसेना की आक्रामक राजनीति को आवाज दी थी। उद्धव इसी विरासत के सहारे अपनी लड़ाई को आगे बढ़ा रहे हैं। उनका संदेश था कि शिवसेना की पहचान किसी चुनाव आयोग के फैसले, किसी सरकारी मुहर या सत्ता के गणित से तय नहीं होगी। उद्धव ने भाजपा के साथ अपने पुराने गठबंधन को बड़ी राजनीतिक भूल बताते हुए कहा कि उसके साथ 25 साल गंवा दिए। उन्होंने कहा कि भाजपा ने बालासाहेब के हिंदुत्व का इस्तेमाल किया और बाद में शिवसेना को ही किनारे कर दिया। यह हमला केवल भाजपा पर नहीं था; इसके जरिए उद्धव ने शिंदे खेमे पर भी सवाल उठाया कि सत्ता की मलाई के लिए शिवसेना की मूल राजनीतिक पहचान से समझौता किसने किया।</p><p>उद्धव ने मतदाता सूची से कथित रूप से नाम हटाए जाने, संवैधानिक संस्थाओं और केंद्र सरकार की कार्यशैली को लेकर भी सवाल उठाए। युवा प्रदर्शनकारियों को उन्होंने अराजक तत्व नहीं, बल्कि बदलाव की मांग करने वाले क्रांतिकारी बताया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के नेतृत्व पर निशाना साधते हुए उन्होंने सत्ता परिवर्तन की जरूरत का संदेश दिया। यानी उद्धव की रणनीति साफ है। शिंदे के पास सरकार हो सकती है, पार्टी का आधिकारिक नाम हो सकता है, विधानसभा में ज्यादा विधायक हो सकते हैं; लेकिन ठाकरे खेमे के पास वह राजनीतिक भावनात्मक पूंजी है, जिसे वह बालासाहेब की विरासत और मराठी अस्मिता के नाम पर भुनाना चाहता है।</p><h2>एकनाथ शिंदे का पलटवार</h2><p>उधर नेस्को सेंटर में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे को उनके ही पुराने फैसलों के कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की। उनका तर्क था कि 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा के साथ चुनाव लड़कर बाद में कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाना मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात था। शिंदे ने इसे ही सबसे बड़ी ‘वोट चोरी’ करार दिया। देखा जाये तो यह एकनाथ शिंदे की सियासत का केंद्रीय तर्क है। वह उद्धव को याद दिलाना चाहते हैं कि सत्ता की राजनीति में नैतिकता का सवाल उठाने से पहले अपने पुराने फैसलों का हिसाब भी देना पड़ता है। उनके लिए 2022 में शिवसेना से बगावत करना पार्टी को बचाने की लड़ाई है, जबकि उद्धव के लिए वही घटना पार्टी तोड़ने और जनादेश की अवमानना का उदाहरण है।</p><p>यानि एक ही घटना, परन्तु दो बिल्कुल उलटी व्याख्याएं! उद्धव कहते हैं कि शिवसेना को तोड़ा गया, शिंदे कहते हैं कि उन्होंने शिवसेना को उसकी मूल विचारधारा की ओर लौटाया। उद्धव के लिए शिंदे सत्ता के सहारे विरासत हथियाने वाले नेता हैं, तो शिंदे के लिए उद्धव कांग्रेस के साथ जाकर बालासाहेब की राजनीति से दूर चले गए नेता हैं। देखा जाये तो यही महाराष्ट्र की इस लड़ाई का सबसे दिलचस्प पहलू है। दोनों बालासाहेब का नाम लेते हैं, दोनों भगवे पर अपना दावा जताते हैं और दोनों अपने प्रतिद्वंद्वी को शिवसेना की मूल आत्मा से भटका हुआ बताते हैं। सवाल यह है कि बालासाहेब की विरासत का फैसला नारों से होगा, संगठन से, चुनावी नतीजों से या जनता के वोटों से?</p><p>हम आपको यह भी बता दें कि इस बार की दशहरा रैलियों में किसानों का मुद्दा भी खूब उछला। महाराष्ट्र के सूखे और संकटग्रस्त किसानों की दुर्दशा ने दोनों नेताओं को एक-दूसरे पर हमला करने का मौका दिया। शिंदे ने किसानों के बीच जाकर मदद पहुंचाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि यह वक्त आरोप-प्रत्यारोप का नहीं, संकट में फंसे किसानों के साथ खड़े होने का है। उनकी ओर से किसानों के लिए राहत सामग्री पहुंचाने और जरूरतमंद परिवारों की मदद करने की बात भी सामने रखी गयी। उन्होंने उद्धव पर सवाल उठाया कि जब किसान परेशान हैं, तब केवल राजनीतिक प्रदर्शन करने से क्या हासिल होगा?</p><p>वहीं उद्धव ने सरकार की राहत राशि और किसानों की वास्तविक जरूरतों को लेकर सवाल उठाए। उनके हमले का आशय यह था कि सरकार की घोषणाओं और किसानों के हाथ में पहुंचने वाली मदद के बीच बड़ा अंतर है। उन्होंने शिंदे खेमे पर भी निशाना साधा और राजनीतिक बगावत के लिए कथित तौर पर दिए गए पैसों की तुलना किसानों को मिलने वाली छोटी राहत से की।</p><p>देखा जाये तो महाराष्ट्र की राजनीति में किसान का सवाल कभी सिर्फ खेत और फसल तक सीमित नहीं रहता। वह सत्ता की साख, ग्रामीण नाराजगी और चुनावी समीकरणों से जुड़ जाता है। इसलिए दोनों नेताओं के लिए किसानों का जिक्र जरूरी था। लेकिन किसानों के लिए असली सवाल यह नहीं है कि किस मंच से ज्यादा जोरदार भाषण हुआ; सवाल यह है कि सूखती फसल, कर्ज और घरेलू खर्च के बीच उन्हें ठोस राहत कितनी मिली।</p><p>इसमें कोई दो राय नहीं कि संगठन और सत्ता के गणित में शिंदे का पलड़ा भारी है। 2024 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में उनकी शिवसेना ने 57 सीटें जीती थीं, जबकि उद्धव ठाकरे की शिवसेना (यूबीटी) को 20 सीटें मिली थीं। चुनाव आयोग की मान्यता और सरकार में उनकी भागीदारी भी शिंदे को संस्थागत बढ़त देती है। इसके बावजूद शिवाजी पार्क का ऐतिहासिक मंच उद्धव के पास बना रहना बताता है कि राजनीतिक विरासत और चुनावी ताकत हमेशा एक ही तराजू में नहीं तौली जातीं। महाराष्ट्र की इस लड़ाई में दोनों नेताओं की कमजोरियां भी साफ हैं। जहां उद्धव को साबित करना है कि भावनात्मक समर्थन को चुनावी ताकत में बदला जा सकता है। वहीं शिंदे को साबित करना है कि पार्टी का नाम, विधायक और सत्ता होने के अलावा बालासाहेब की विरासत भी उन्हीं के साथ है।</p><p>बहरहाल, दशहरा रैली में तीर खूब चले, लेकिन सियासी रावण अभी पूरी तरह गिरा नहीं है। महाराष्ट्र की राजनीति में अगला अध्याय इस बात से तय होगा कि जनता किसकी कहानी पर भरोसा करती है उद्धव की, जिन्होंने पार्टी तोड़े जाने का दर्द अपनी राजनीति का आधार बनाया है, या शिंदे की, जो इसे शिवसेना को उसकी मूल दिशा में लौटाने की लड़ाई बताते हैं। फिलहाल महाराष्ट्र में भगवा एक है, लेकिन उसके दावेदार दो हैं। एक कहता है, शिवसेना हमारी विरासत है; दूसरा कहता है, शिवसेना हमारी असली पहचान है। इसी खींचतान में महाराष्ट्र की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल गूंज रहा है कि बालासाहेब के नाम पर तालियां कौन बटोरेगा और जनता के वोट कौन जीतेगा?</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 14:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/uddhav-thackeray-eknath-shinde-dussehra-rally-regime-change-maharashtra-politics-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[आस्था के सैलाब में कब तक गुम होती रहेगी जिंदगियां?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/for-how-much-longer-will-lives-continue-to-be-lost-in-the-surging-tide-of-faith]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कोलकाता में दुर्गापूजा के दौरान चोरबागान के सार्वजनिक पूजा पंडाल में हुई भगदड़ और उसमें 19 लोगों की मौत तथा 25 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया। यह केवल एक हादसा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक संवेदनहीनता, प्रशासनिक लापरवाही और धार्मिक आयोजनों के प्रति गैर-जिम्मेदार दृष्टिकोण पर लगा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। जिन पंडालों में लोग श्रद्धा, भक्ति, उल्लास और आध्यात्मिक शांति की तलाश में पहुंचते हैं, वहां यदि उन्हें जीवन की सुरक्षा का भरोसा भी न मिले, तो इससे बड़ी विडंबना क्या होगी? मां दुर्गा की आराधना शक्ति, साहस और अन्याय के विनाश का प्रतीक है, लेकिन उसी आराधना के बीच निर्दोष लोगों की सांसें थम जाएं, तो हमें अपने आयोजन, अपनी व्यवस्थाओं और अपनी प्राथमिकताओं पर गंभीरता से विचार करना ही होगा। आखिर आस्था के इस सैलाब में इंसानी जिंदगियां कब तक बहती रहेंगी? सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं कि हादसा कैसे हुआ, बल्कि यह है कि हादसे होने ही क्यों दिए जाते हैं? देश में धार्मिक मेलों, मंदिरों, तीर्थस्थलों, उत्सवों और राजनीतिक रैलियों में भगदड़ की घटनाएं बार-बार सामने आती रही हैं। हर बार कुछ परिवारों के घरों के चिराग बुझ जाते हैं, बच्चों के सिर से माता-पिता का साया उठ जाता है, किसी मां की गोद सूनी हो जाती है और किसी जीवनसाथी का संसार उजड़ जाता है। कुछ समय तक शोक, संवेदना, मुआवजे और जांच की खबरें सुर्खियों में रहती हैं, फिर सब कुछ सामान्य होने लगता है। व्यवस्थाएं जस की तस बनी रहती हैं और अगली त्रासदी का इंतजार शुरू हो जाता है। क्या हमारी व्यवस्था की संवेदनशीलता केवल हादसे के बाद जागने तक सीमित रह गई है? क्या मानवीय जीवन का मूल्य किसी आर्थिक सहायता या सरकारी घोषणा से चुकाया जा सकता है? आखिर सनातन की गौरवमय संस्कृति को धुंधलाने की इन त्रासद एवं विडम्बनापूर्ण घटनाओं के लेकर हम कब चेतेंगे?</p><p>किसी भी हादसे में मृतकों के परिजनों को आर्थिक सहायता देना आवश्यक है। संकट की घड़ी में सरकार का सहयोग प्रभावित परिवारों को संबल देता है, लेकिन मुआवजा किसी की जिंदगी वापस नहीं ला सकता। एक परिवार की आर्थिक क्षति की भरपाई संभवतः धन से हो जाए, मगर उस मां के आंसुओं का मूल्य कौन चुकाएगा, जिसने अपने जवान बेटे को खो दिया? उस बच्चे के भय और खालीपन को कौन भरेगा, जिसने भीड़ में अपने माता-पिता को हमेशा के लिए खो दिया? इसलिए सरकारों की जिम्मेदारी केवल राहत राशि घोषित करना नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां पैदा होने से पहले रोकना है, जिनमें नागरिकों को अपनी जान गंवानी पड़े। मृत्यु के बाद मुआवजा देना शासन का मानवीय दायित्व है, लेकिन मृत्यु से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना उसका अनिवार्य कर्तव्य है। धार्मिक आयोजनों की भव्यता और लोकप्रियता के साथ एक अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा भी बढ़ती दिखाई देती है। विशाल पंडाल, आकर्षक सजावट, भव्य प्रतिमाएं, रोशनी, प्रचार और अधिकाधिक श्रद्धालुओं की उपस्थिति को आयोजन की सफलता का पैमाना मान लिया जाता है। लेकिन क्या किसी आयोजन की सफलता का मूल्यांकन केवल वहां उमड़ने वाली भीड़ से होना चाहिए? क्या आयोजकों और समितियों को यह नहीं समझना चाहिए कि श्रद्धालुओं की संख्या जितनी अधिक होगी, उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी होगी? संकरी गलियों, सीमित निकास द्वारों, अवरुद्ध रास्तों और अपर्याप्त सुरक्षा व्यवस्थाओं के बीच हजारों लोगों को प्रवेश देना उत्सव की सफलता नहीं, बल्कि एक संभावित त्रासदी को आमंत्रण देना है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/suvendu-adhikari-gives-rs-25-lakh-ex-gratia-kolkata-stampede-victims" target="_blank" rel="noopener">Kolkata Stampede: सीएम शुभेंदु अधिकारी ने पीड़ित परिवारों को दिए 25-25 लाख रुपये</a></p><p>कोलकाता की घटना ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि भीड़ प्रबंधन कोई औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन रक्षा की अनिवार्य व्यवस्था है। किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन से पहले स्थल की क्षमता का वैज्ञानिक आकलन होना चाहिए। प्रवेश और निकास के रास्ते अलग-अलग तथा पर्याप्त चौड़े हों, आपातकालीन निकास स्पष्ट रूप से चिह्नित हों, भीड़ की आवाजाही एक दिशा में नियंत्रित की जाए और प्रशिक्षित कर्मियों की पर्याप्त तैनाती हो। सीसीटीवी, सार्वजनिक उद्घोषणा प्रणाली, चिकित्सा सहायता, एंबुलेंस तथा अग्निशमन सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए। बारिश, बिजली बाधित होने, अचानक अफवाह फैलने या किसी अप्रत्याशित घोषणा से भीड़ का व्यवहार बदल सकता है। इसलिए हर आयोजन में आपातकालीन योजना, नियमित अभ्यास और त्वरित प्रतिक्रिया की व्यवस्था होनी चाहिए। सुरक्षा की तैयारी हादसे के बाद नहीं, आयोजन की योजना बनाते समय शुरू होनी चाहिए। इस पूरे परिदृश्य में प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है। पुलिस और स्थानीय प्रशासन को केवल अनुमति जारी करने अथवा आयोजन के दौरान औपचारिक निरीक्षण करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। अनुमति से पहले स्थल का निरीक्षण, भीड़ की संभावित संख्या का आकलन, सुरक्षा मानकों की जांच और निकास मार्गों की उपलब्धता का सत्यापन अनिवार्य होना चाहिए। निर्धारित क्षमता से अधिक लोगों को प्रवेश देने पर तत्काल रोक लगाई जाए। नियमों का उल्लंघन करने वाले आयोजकों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई हो और यदि जांच में अधिकारियों की लापरवाही सामने आए, तो उनकी जवाबदेही भी तय की जाए। किसी समिति का प्रभाव, किसी आयोजक की प्रतिष्ठा या किसी उत्सव की लोकप्रियता कानून और नागरिक सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती। जवाबदेही के बिना सुरक्षा केवल कागजी घोषणा बनकर रह जाती है।</p><p>साथ ही यह मान लेना भी उचित नहीं कि हर भगदड़ का कारण केवल प्रशासनिक विफलता है। कई बार अफवाह, धक्का-मुक्की, अचानक आगे बढ़ने की प्रवृत्ति और दूसरों की सुरक्षा की चिंता किए बिना स्वयं निकलने की कोशिश भी स्थिति को भयावह बना देती है। इसलिए आम नागरिकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। धार्मिक स्थल पर पहुंचकर संयम बनाए रखना, निर्धारित मार्गों का पालन करना, धक्का न देना, बच्चों और बुजुर्गों का विशेष ध्यान रखना तथा आधिकारिक निर्देशों को सुनना आवश्यक है। यदि भीड़ असामान्य रूप से घनी हो जाए, तो आगे बढ़ने की जिद करने के बजाय सुरक्षित स्थान पर रुकना और निर्देशों का पालन करना चाहिए। आयोजकों को भी श्रद्धालुओं के बीच जागरूकता फैलानी चाहिए कि भक्ति का अर्थ अव्यवस्था नहीं, बल्कि अनुशासन और दूसरों के जीवन के प्रति सम्मान है। हमारे धर्म और संस्कृति का मूल संदेश करुणा, अहिंसा, सेवा और जीवन के प्रति आदर है। पूजा-पाठ का वास्तविक अर्थ तभी सार्थक है, जब हमारी आस्था मानवता की रक्षा का माध्यम बने। यदि किसी धार्मिक आयोजन में सुरक्षा की अनदेखी होती है, तो वह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि उन मूल्यों से विचलन भी है, जिनका उत्सव मनाने का दावा किया जाता है। देवी की आराधना करने वाले समाज को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि किसी श्रद्धालु की जान अव्यवस्था के कारण न जाए। श्रद्धा का अर्थ आंखें बंद करके भीड़ का हिस्सा बन जाना नहीं, बल्कि विवेक, संयम और जिम्मेदारी के साथ अपने धर्म का निर्वाह करना है।</p><p>अब समय आ गया है कि हर ऐसी त्रासदी को एक स्वतंत्र जांच, स्पष्ट जवाबदेही और ठोस सुधारों से जोड़ा जाए। जांच रिपोर्ट सार्वजनिक हो, दोषियों पर समयबद्ध कार्रवाई हो और भविष्य के आयोजनों के लिए लागू किए जाने वाले सुरक्षा मानकों की नियमित समीक्षा हो। केंद्र और राज्य सरकारों को बड़े धार्मिक आयोजनों के लिए एक समान न्यूनतम सुरक्षा मानक विकसित करने चाहिए। आयोजक समितियों, प्रशासन, पुलिस, स्वास्थ्य सेवाओं और स्वयंसेवकों के बीच समन्वय को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। इन व्यवस्थाओं का पालन केवल कागजों में नहीं, जमीन पर दिखाई देना चाहिए। कोलकाता की त्रासदी हमें चेतावनी दे रही है कि उत्सव की चमक के पीछे छिपी लापरवाही कभी भी अंधकार बनकर उतर सकती है। मृतकों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि केवल शोक व्यक्त करना या उनके परिजनों को सहायता देना नहीं, बल्कि यह संकल्प लेना है कि ऐसी दुर्घटनाएं दोबारा न हों। सरकार जागे, प्रशासन अपनी जिम्मेदारी समझे, आयोजक अपनी प्रतिष्ठा से पहले लोगों की सुरक्षा को रखें और नागरिक अपनी आस्था के साथ विवेक को भी स्थान दें। आखिर कितने हादसों के बाद हम सीखेंगे? कितने परिवारों के उजड़ने के बाद हमारी व्यवस्थाएं बदलेंगी? और कितनी जिंदगियों की कीमत पर हम समझेंगे कि कोई भी उत्सव, कोई भी आयोजन और कोई भी धार्मिक आस्था मनुष्य के जीवन से बड़ी नहीं हो सकती। आस्था का सच्चा सम्मान तभी होगा, जब हर श्रद्धालु उत्सव में सुरक्षित प्रवेश करे और सकुशल अपने घर लौटे।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 14:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/for-how-much-longer-will-lives-continue-to-be-lost-in-the-surging-tide-of-faith</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[France और Italy में जो हुआ वो India में नहीं हो, इसके लिए Modi-Shah ने क्या पहले से कोई तैयारी कर रखी है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/france-italy-protests-trump-border-security-india-illegal-immigration-modi-amit-shah]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने फ्रांस में हिंसा और लूटपाट की घटनाओं के बाद ट्रुथ सोशल पर जो टिप्पणी की है, उसने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। ट्रंप ने लिखा, “फ्रांस जल रहा है!” और चेतावनी दी है कि अलग दुनिया से आए लोगों के आव्रजन ने कभी महान रहे देश को संकट में डाल दिया है। उन्होंने फ्रांस से अपनी सीमाएं बंद करने और बहुत देर होने से पहले हालात पर नियंत्रण हासिल करने की अपील की है। ट्रंप की यह टिप्पणी भले ही राजनीतिक रूप से कठोर हो, लेकिन इसके पीछे उठ रहा बुनियादी सवाल बेहद महत्वपूर्ण है कि आखिर किसी राष्ट्र की सीमाओं, सुरक्षा और कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी किसकी है? और जब सरकारें इन चुनौतियों से निपटने में विफल होती हैं, तो उसकी कीमत कौन चुकाता है?</p><h2>फ्रांस के हालात से पूरी दुनिया स्तब्ध</h2><p>फ्रांस में 17 अक्टूबर को हुए प्रदर्शनों के दौरान जो तस्वीरें सामने आईं, वे किसी भी राष्ट्र के लिए चिंताजनक हैं। महंगाई, शिक्षा व्यवस्था और सार्वजनिक सेवाओं से जुड़ी शिकायतों को लेकर सड़कों पर उतरे हजारों लोगों के बीच हिंसक समूहों ने दुकानों में लूटपाट की, वाहनों में आग लगाई और सरकारी इमारतों को निशाना बनाया। लिमोज शहर का ऐतिहासिक टाउन हॉल आगजनी में बुरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। पेरिस, मार्सेई और लियोन में भी हिंसा और तोड़फोड़ की घटनाएं सामने आईं। फ्रांसीसी अधिकारियों ने कट्टरपंथी वामपंथी समूहों और उपद्रवियों को हिंसा के लिए जिम्मेदार ठहराया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rahul-gandhi-jaishankar-mumbai-meeting-salman-khurshid-jaipur-pakistan-pm" target="_blank" rel="noopener">राजनीति नहीं चली तो कूटनीति में हाथ आजमाने चले Rahul Gandhi ! मगर Jaishankar पर हमला करते ही सामने आ गया Salman Khurshid का रिकॉर्ड</a></p><p>फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने राष्ट्र के नाम संबोधन में इस हिंसा पर गहरा आक्रोश व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि शहरों की सड़कों को इस तरह बर्बाद होते देखना असहनीय है। मैक्रों ने सुरक्षा बलों के समर्थन में खड़े होते हुए स्पष्ट किया कि जायज मांगों और हिंसा के बीच अंतर किया जाना चाहिए। उन्होंने प्रशासन को सार्वजनिक इमारतों और कारोबारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने, जरूरत पड़ने पर कुछ प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने तथा हिंसा करने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने के निर्देश दिए। उनका संदेश साफ था कि संवाद का अर्थ कमजोरी और लोकतांत्रिक अधिकारों का अर्थ दंड से मुक्ति नहीं है।</p><p>देखा जाये तो एक बुनियादी बात समझने की जरूरत है। लोकतंत्र में विरोध करना अधिकार है, लेकिन हिंसा करके सरकार को झुकाना, सार्वजनिक संपत्ति नष्ट करना और आम नागरिकों के जीवन को संकट में डालना अधिकार नहीं हो सकता। यदि कोई समूह अपनी राजनीतिक या वैचारिक मांगों के लिए कानून को चुनौती देने लगे, तो सरकार का दायित्व है कि वह निर्णायक कार्रवाई करे। सरकार की लोकप्रियता और उसकी नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं, लेकिन देश की कानून-व्यवस्था को बंधक नहीं बनाया जा सकता।</p><h2>इटली में भी बिगड़े हालात</h2><p>दूसरी ओर, यूरोप की यह बेचैनी अब केवल फ्रांस तक सीमित नहीं है। इटली में भी 17 और 18 अक्टूबर को महंगाई, कम वेतन और सार्वजनिक सेवाओं की स्थिति के विरोध में प्रदर्शन हुए। मिलान में नकाबपोश प्रदर्शनकारियों ने दुकानों के शीशे तोड़े, आगजनी की और पुलिस पर पत्थर फेंके। पुलिस को आंसू गैस और पानी की बौछारों का इस्तेमाल करना पड़ा। बोलोन्या, ब्रेसिया, बर्गामो और ट्यूरिन में भी झड़पों की खबरें आईं। प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी ने हिंसा की निंदा करते हुए पुलिस के समर्थन में बयान दिया और स्थिति पर चर्चा के लिए सरकारी बैठक बुलाई।</p><p>इटली की घटनाएं एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती हैं। यूरोप में बढ़ती महंगाई, कम वेतन, महंगे आवास और सार्वजनिक सेवाओं की बदहाली ने लोगों में असंतोष पैदा किया है। इस असंतोष को केवल आव्रजन या किसी एक विचारधारा के खाते में डालना वास्तविक समस्याओं से आंखें मूंदना होगा। लेकिन जब जायज शिकायतों के बीच हिंसक समूह घुस आते हैं और विरोध को लूटपाट में बदल देते हैं, तो आम नागरिकों का नुकसान होता है और लोकतांत्रिक आंदोलन की विश्वसनीयता भी खत्म होने लगती है। फ्रांस और इटली दोनों की घटनाओं से यही सबक मिलता है कि सरकारों को जनता की समस्याओं का समाधान भी करना होगा और अराजकता फैलाने वालों के खिलाफ कठोरता भी दिखानी होगी।</p><h2>फ्रांस, इटली की घटनाओं का भारत के लिए निहितार्थ</h2><p>भारत के लिए इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पहलू अवैध घुसपैठ और राष्ट्रीय सुरक्षा है। बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ तथा म्यांमार से आए रोहिंग्या समुदाय के लोगों की अनधिकृत मौजूदगी लंबे समय से सुरक्षा और प्रशासन से जुड़े सवाल खड़े करती रही है। भारत जैसे विशाल और संवेदनशील सीमाओं वाले देश के लिए यह कोई मामूली विषय नहीं है। सीमा पार से आने वाले प्रत्येक व्यक्ति की पहचान, नागरिकता और कानूनी स्थिति का सत्यापन होना चाहिए। जहां अवैध प्रवेश प्रमाणित हो, वहां कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के खिलाफ अपराध या सुरक्षा संबंधी गतिविधियों के ठोस प्रमाण हों, तो जांच और अभियोजन में कोई ढिलाई नहीं होनी चाहिए।</p><h2>मोदी-शाह ने खतरे को पहले ही भांप लिया था</h2><p>वैसे ट्रंप आज दुनिया को सीमाओं की सुरक्षा और अवैध घुसपैठ पर सख्ती का जो संदेश दे रहे हैं, उसे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बहुत पहले ही भांप लिया था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस चुनौती से निपटने के लिए पहले से ही कदम उठा रहे हैं। मोदी सरकार ने अवैध घुसपैठ और उससे जुड़े जनसांख्यिकीय बदलावों की पड़ताल के लिए उच्चस्तरीय समिति गठित की है, जिसकी अध्यक्षता सेवानिवृत्त न्यायमूर्ति प्रकाश प्रभाकर नाओलेकर कर रहे हैं। गृह मंत्रालय ने 26 मई 2026 को इस समिति का गठन किया और 14 अक्टूबर को इसका आधिकारिक पोर्टल demography.mha.gov.in शुरू किया गया। इस पोर्टल के माध्यम से केंद्र और राज्य सरकारें, संस्थाएं तथा आम नागरिक जनसांख्यिकीय बदलावों, असामान्य बसावट और अवैध घुसपैठ से संबंधित जानकारी दे सकते हैं। समिति का उद्देश्य अवैध प्रवासियों की पहचान, हिरासत और निर्वासन के लिए कानूनी, निष्पक्ष और समयबद्ध व्यवस्था की सिफारिश करना भी है। इसके अलावा, अमित शाह सीमाओं की सुरक्षा के लिए स्मार्ट बॉर्डर परियोजना को आगे बढ़ा रहे हैं। इसके तहत ड्रोन, रडार, निगरानी कैमरे, वॉचटावर और अत्याधुनिक सेंसर जैसी तकनीकों को सीमा सुरक्षा व्यवस्था से जोड़ा जा रहा है। जुलाई 2026 में सिलीगुड़ी के झुमागाछ स्थित सीमा चौकी पर अमित शाह ने फेंसिंग में सेंध का पता लगाने वाली प्रणाली और दुर्गम इलाकों में घुसपैठ की चेतावनी देने वाली तकनीक का निरीक्षण भी किया था। सरकार का लक्ष्य केवल सीमा पार से होने वाली घुसपैठ रोकना नहीं, बल्कि देश के भीतर मौजूद अवैध प्रवासियों की पहचान और उनके मामलों का कानूनी निपटारा करना भी है।</p><p>भारत में घुसपैठ का मुद्दा तब और गंभीर हो जाता है, जब राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे संवेदनशील विषय को वोट बैंक की राजनीति की भेंट चढ़ा दिया जाता है। अवैध घुसपैठियों की पहचान और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का विरोध करने वाले राजनीतिक दलों को यह समझना होगा कि सत्ता की लालसा में देश के भविष्य से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता। आज फ्रांस और इटली में जो कुछ देखने को मिल रहा है, भारत को उससे सबक लेना है, वैसी परिस्थितियों का इंतजार नहीं करना है। भारत कोई प्रयोगशाला नहीं है, जहां राजनीतिक स्वार्थ के लिए देश की सामाजिक स्थिरता और आंतरिक सुरक्षा को दांव पर लगा दिया जाए। और चिंता तब और बढ़ जाती है, जब बांग्लादेश में हिंसक घटनाओं के बाद हुए सत्ता परिवर्तन से प्रेरणा लेने की बातें सामने आती हैं या खुलेआम यह कहा जाता है कि सत्ता पलटना ही मुख्य मकसद है। सवाल सीधा है कि भारत में सत्ता परिवर्तन का फैसला जनता करेगी या कुछ स्वयंभू नेता और दबाव समूह सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन करके सरकार बदलने का रास्ता तय करेंगे? लोकतंत्र में सरकारें चुनाव से बनती और बदलती हैं, न कि हिंसा, अराजकता या किसी विदेशी घटनाक्रम से प्रेरित होकर पैदा किए गए दबाव से। मोदी सरकार और अमित शाह के सामने चुनौती केवल घुसपैठ रोकने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि कानून का राज किसी राजनीतिक सौदेबाजी का मोहरा न बने। भारत की सीमाओं से लेकर लोकतांत्रिक संस्थाओं तक, देश की सुरक्षा और संप्रभुता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए।</p><p>बहरहाल, यह सबको स्पष्ट रहना चाहिए कि लोकतंत्र में सरकार बदलने का अधिकार जनता के पास है और इसका सबसे वैध रास्ता चुनाव है। शांतिपूर्ण प्रदर्शन, सरकार की आलोचना और जवाबदेही की मांग लोकतंत्र का हिस्सा हैं। लेकिन यदि कोई संगठन या दबाव समूह हिंसा, धमकी या गैर-संवैधानिक तरीकों से सत्ता परिवर्तन कराने की कोशिश करता है, तो उसकी मंशा और गतिविधियों की जांच होनी चाहिए। आंदोलन की आड़ में कानून तोड़ने वालों को राजनीतिक संरक्षण कतई नहीं मिलना चाहिए।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 12:54:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/france-italy-protests-trump-border-security-india-illegal-immigration-modi-amit-shah</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[क्या कभी आत्मदैन्य से मुक्त हो सकेंगे हम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/will-we-ever-be-able-to-free-ourselves-from-self-abasement]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>कोई भी राष्ट्र जिस स्थिति में होता है, उसके लिए वह खुद जिम्मेदार होता है। जापानी जैसे हैं ,उनका देश वैसा ही है। इसी तरह की बात इजरायल, चीन और ईरान या किसी भी देश के बारे में हो सकती है। भारत भी वैसा ही है, जैसे हम हैं! ऐसे में कभी विदेशी आक्रांताओं,कभी मैकाले और कभी अपनी आजादी के बाद सत्ता में आए नायकों को कोसते हुए हम अपने कर्तव्यबोध से मुक्त हो जाते हैं। कोई भी राष्ट्र अपने नागरिकों की सामूहिक चेतना के आधार पर विकसित होता है। उसका इतिहासबोध, संस्कृतिबोध, मित्रबोध और शत्रुबोध मिलकर उसका निर्माण करते हैं। इनसे ही राष्ट्रीय मानस या राष्ट्रीय भाव बनता है।</p><p>लंबे समय की गुलामी ने हमें आत्मदैन्य और आत्महीनता की ओर ढकेल दिया। भारतीय समाज के अपने पारंपरिक मूल्यों को छोड़कर हम शासक वर्गों द्वारा थोपी जा रही संस्कृति का अनुगमन करने लगे। हमें लगा हमारे अंग्रेज शासक, उनकी भाषा, पहनावा और उनकी संस्कृति-पंथ सबकुछ हमसे बेहतर है। उनके अनुयायी बनकर ही हमारी मुक्ति है। तत्कालीन समाज के श्रेष्ठ जन भी ब्रिटिश शासन में अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त कर भारत लौटते थे और खुद को आधा-अधूरा अंग्रेज साबित करने में जुट जाते थे। ऐसे में शेष समाज अपने श्रेष्ठ वर्ग का आचरण देख वैसा ही बनने का प्रयास करने लगा। देश में तमाम सर, रायबहादुर और साहेब बहादुर हमारे आदर्श बन गए। स्वामी विवेकानंद, लोकमान्य तिलक, महर्षि अरविन्द, महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी, भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद, बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय,रवीन्द्र नाथ टैगोर के बहुत गहरे भारतबोध की प्रज्ञा ने हमें संभाला ,वरना हमारी दास्तां भी न होती दास्तानों में। हमारी हस्ती मिटने से कोई रोक नहीं सकता था।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-supreme-court-will-not-become-an-arena-for-politicians" target="_blank" rel="noopener">सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा</a></p><p>औसत भारतीय का आचरण अंग्रेजी शासनकाल में कैसा था, कहने की जरूरत नहीं है। हम कोहिनूर को छोड़कर कांच की ओर दौड़ रहे थे। अंग्रेजी भाषा और संस्कृति श्रेष्ठता की परिचायक बन गई। जब तक अपना कोई व्यक्ति या कार्य पश्चिम में स्थापित न हो जाए, उसे हम श्रेष्ठ मानने को तैयार नहीं थे। अंग्रेजी शासन और उसके बाद के आजादी के साल भी आत्मगौरव के अभाव में गुजरे साल बनकर रह गए। सत्ता के आतंक और सत्ता से जुड़े रहने के आकर्षण से हमने 'अपने जीवन मूल्यों का &nbsp;सनातन सिद्ध राजमार्ग' छोड़कर 'अंग्रेजियत की पगडंडियों' पर चलना प्रारंभ कर दिया, जो हमारा देखा-परखा रास्ता नहीं था। जाहिर है इस मार्ग पर हम नेतृत्वकर्ता नहीं, अनुगामी ही बन सकते थे। हमारे एकत्व को चोटिल करने के सचेतन प्रयास प्रारंभ हुए। भारतीय शिक्षा पद्धति को अंग्रेजी राज में कैसे नष्ट किया गया, इसे धर्मपाल जी को पढ़कर ही समझ में आएगा। 'स्व' के स्थान पर 'परकीय' विचारों की स्थापना के प्रयास खूब चले। हम एक 'राष्ट्र' नहीं हैं, बताया गया। अनेक स्थानीयताओं को राष्ट्रीयता के बरक्स स्थापित करने के अकादमिक प्रयास भी खूब चले, सफल भी हुए। &nbsp;कैसे और कितने विभाजन गढ़े जा सकते हैं, सारा जोर इसी पर था। भारतीय ज्ञान परंपरा पर चल रहे लोगों के आत्मविश्वास को समाप्त कर इस पूरे विचार को ही पोंगापंथ और पिछड़ेपन के रुप में आरोपित किया जाना फैशन बन गया।</p><p>राजनीतिक परिवर्तन के कारण लंबे समय के बाद भारत फिर से खुद को खोज रहा है। अपनी जड़ों की तरफ वापसी करना चाहता है। जिसे 'विचारों की घर वापसी' कहकर संबोधित किया गया। जरूरी है कि भारत प्रेमी बौद्धिक वर्ग सत्य के सूर्य की स्थापना करने के लिए अध्यवसाय में जुट जाए। सिर्फ भावनात्मक प्रवचनों, कार्यक्रमों से आगे बढ़कर भ्रमों के निवारण का जतन करे। ऐसे कुशल बौद्धिक योद्धा ही अपनी ज्ञान परंपरा को सामने लाकर तथ्य, प्रमाणों के साथ उनकी युगानुकुल व्याख्या करेंगे। इसके लिए हमें लोकसंग्रही और विनम्र बनना पहली शर्त है। परंपरा,जीवन पद्धति और परिवार पर छाए संकटों के बीच ये प्रयत्न ही हमें आत्मशक्ति देंगे। दुनिया भर में चल रहे सभ्यतागत संघर्ष के बीच भारत को अपनी वृहत्तर भूमिका का निर्वहन करना है, क्योंकि हमारे पास दुनिया को देने के लिए समावेशी विचार है। जहां साझापन सौंदर्य की तरह है, विविधता और बहुलता का यहां उत्सव मनाया जाता है। हम पूजा में भी अनेक देवताओं की पूजा करते हैं। बहुलतावादी समाज होने कारण हमने मतभिन्नता का सदैव स्वागत किया। इसका उदाहरण हमारी 'शास्त्रार्थ' परंपरा है। इसलिए "एक किताब,एक विचार, एक देवता " को मानने और दूसरे विचार को समाप्त करने को आतुर विचार भारत को नहीं समझ सकते। जहां दुनिया के हर पंथ के लोग नैसर्गिक सहजता से सांस ले सकते हैं। यहां कोई श्रेष्ठ और निकृष्ट नहीं है। सब समान रूप से इस धरती मां की संतानें हैं। ऐसे में भारत केंद्रित विमर्श ही विश्व शांति का मार्ग है। 'स्वत्व' ही मार्ग है, जिस पर चलने के लिए हमें महात्मा गांधी, धर्मपाल, सीताराम गोयल, दीनदयाल उपाध्याय, वासुदेव शरण अग्रवाल, निर्मल वर्मा, विद्यानिवास मिश्र का अध्ययन मदद कर सकता है। इससे भारत के मूल विचार को समझने तथा भारत का मौलिक चिंतन स्थापित करने में मदद मिलती है। इससे ही ग़लत बातों का खंडन करते हुए हम सही विमर्श की स्थापना में सफल हो पाएंगे।</p><p>भारतीय उदात्त जीवन मूल्यों के आधार पर संपूर्ण विश्व के लिए हमें ही वैश्विक बौद्धिक नेतृत्व देना होगा। जिसकी एक झलक हमें स्वामी विवेकानंद में दिखती है। ऐसे में ‘स्वबोध‘ का जागरण ही विकल्प है। पहले हमारे अपने विचार को भारत तो स्वीकार करे। वह आत्मदैन्य से मुक्त होकर 'भारत' को 'भारत' (इंडिया नहीं) की नजर से देखना प्रारंभ करे। वैचारिक साम्राज्यवाद से मुक्ति के लिए कई स्तरों पर कार्य करने की आवश्यकता है। इसे इस तरह से समझिए कि गोरा बनाना और अंग्रेजी सिखाना आज भी हिंदुस्तान में दो सबसे बड़े व्यापार हैं। यही उपनिवेशवादी मानसिकता है। इसके चलते ही हमारे गांव उजड़ते चले गए और संयुक्त परिवार बिखर गए। आज एकल परिवारों के नाते अलग तरह के सामाजिक-सांस्कृतिक संकट हमारे सामने हैं। जाति, भाषा, क्षेत्र,पंथ की लड़ाइयों को छोड़कर भी बहुत सी विभाजनकारी बातें हर दिन आज भी खोजी जाती हैं , फिर आख्यान (नरेटिव) गढ़े जाते हैं। भारत जिसे कभी 'इंडिया' बनाने की कोशिशें हुईं, उसे भारत बनाए रखने के लिए हमें ही आगे आना होगा। क्योंकि भारत का नष्ट होना, उस विचार का मिट जाना होगा, जिसने हमें "वसुधैव कुटुम्बकम्" का संदेश दिया। जिसने हमें राम, कृष्ण,शिव, बुद्ध, महावीर, गुरु नानक देव जैसे नायक दिए। जिसने "सर्वे भवन्तु सुखिन:" में अपनी मुक्ति देखी और लोक-मंगल जिसका मूलमंत्र रहा।</p><p>- प्रो. संजय द्विवेदी&nbsp;<br>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 12:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/will-we-ever-be-able-to-free-ourselves-from-self-abasement</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट नहीं बनेगा नेताओं का अखाड़ा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-supreme-court-will-not-become-an-arena-for-politicians]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देश के सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह राजनीतिक दलों की सत्ता को लेकर चल रही मारामारी के बीच अखाड़ा नहीं बनेगा। सुप्रीम कोर्ट सिर्फ कायदे कानून और संविधान के दायरे में रह कर ही काम करेगा। दरअसल यह संदेश सुप्रीम कोर्ट ने कांग्रेस के जरिए तमाम राजनीतिक दलों को दिया, जोकि सुप्रीम कोर्ट के जरिए राजनीतिक फायदा उठाने का प्रयास कर रहे हैं।</p><p>यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट के बारे में कोई गलतफहमी या अफवाह पहले, इससे पहले ही मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) सूर्यकांत ने अप्रत्याशित कदम उठाते हुए पत्रकार वार्ता आयोजित की। सीजेआई ने यह कदम इसलिए उठाया कि नेता कहीं बात का बतंगड़ नहीं बना दे और उसमें सुप्रीम कोर्ट को इसमें नहीं घसीट लें।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/in-light-of-significant-judicial-rulings-by-the-supreme-court" target="_blank" rel="noopener">सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले</a></p><p>लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधान न्यायाधीश को पत्र लिखकर मुलाकात का समय मांगा था कि वे उन्हें एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे, जिसमें 'वोट चोरी' रोकने, मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे, मतदाता सूची के एसआईआर (विशेष गहन पुनरीक्षण) को रोकने और पुन: मतपत्र प्रणाली पर लौटने की मांग की गई थी।</p><p>सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने यह मांग यह कहते हुए ठुकरा दी, कि यदि सुनवाई चाहते हो तो रिट याचिका दायर करो। सीजेआई ने राहुल गांधी के आधिकारिक ईमेल के जवाब में कहा कि इस तरह की मुलाकात उचित नहीं होगी, क्योंकि जिन मुद्दों पर चर्चा की मांग की गई है, वे पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन हैं। इसी के साथ सीजेआई ने दूरदर्शिता अपनाते हुए अगले ही दिन प्रेस कांफ्रेंस करके स्थिति स्पष्ट कर दी, ताकि राजनीतिक दल उसकी बातों का गलत मतलब नहीं निकाल पाएं और सुप्रीम कोर्ट को राजनीतिक विवाद में नहीं घसीट सकें।</p><p>सीजेआई सूर्यकांत ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक व्यवस्था के तहत सुप्रीम कोर्ट, प्रशासनिक स्तर पर सरकार के कामकाज में दखल नहीं दे सकता, हालांकि नेताओं को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए न्यायिक पक्ष में अदालत का दरवाजा खटखटाने की छूट है। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में एक दो बार ही ऐसा हुआ है, जब सुप्रीम कोर्ट की तरफ से मीडिया के जरिए कोई जानकारी दी गई है, वरना तो मीडिया ही सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और सुनवाई की जानकारी देता है।</p><p>भारतीय सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में जजों द्वारा मीडिया से सीधे संवाद करने या प्रेस कॉन्फ्रेंस करने का सबसे चर्चित मौका 12 जनवरी 2018 को आया था। सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठ न्यायाधीशों—जस्टिस जे. चेलामेश्वर, जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस मदन बी. लोकूर और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने एक ऐतिहासिक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी। भारतीय न्यायिक इतिहास में यह पहला अवसर था जब वर्तमान जजों ने इस तरह मीडिया को संबोधित किया था।</p><p>इन जजों ने तब के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) दीपक मिश्रा के खिलाफ रोस्टर और प्रशासनिक कामकाज को लेकर सार्वजनिक सवाल उठाए थे। इसके अलावा, सुप्रीम कोर्ट अपनी अधिकांश जानकारी और फैसले आधिकारिक प्रेस विज्ञप्तियों अपनी वेबसाइट और सुनवाई के जरिए ही साझा करता है। हाल के दौर में अदालत ने न्यायिक कार्यवाही के लाइव-स्ट्रीमिंग और उसके डिजिटल क्लिप्स के कमर्शियल इस्तेमाल को लेकर भी कड़े नियम तय किए हैं।</p><p>सीजेआई सूर्यकांत ने मीडिया के सामने स्पष्ट किया था कि "मुझे कल बैठक के अनुरोध के संबंध में एक पत्र मिला था। मैंने कल रात ही उसका जवाब दे दिया था, जिसमें उन कारणों का उल्लेख किया गया था कि मैं क्यों नहीं मिल पाऊंगा? सीजेाई ने आगे कहा, "सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। किसी भी आम नागरिक या निर्वाचित निकाय के सदस्य की किसी भी याचिका का स्वागत है। हर भारतीय नागरिक को अदालत का दरवाजा खटखटाने का अधिकार है। हम उनकी चिंताओं को सुनेंगे और कानून के तहत जो भी उचित होगा, वह करेंगे।</p><p>सुप्रीम कोर्ट से स्थिति स्पष्ट होने के बाद इंडिया गठबंधन के दलों के पास अपनी मांगों को लेकर कानूनी प्रक्रिया अपनाने का एक ही रास्ता बचा था, वह था रिट याचिका के जरिए न्याय का तकाजा। इंडिया गठबंधन के नेताओं ने सुप्रीम कोर्ट तक पैदल मार्च निकाला और रिट याचिका दायर की। जिसमें राहुल गांधी, अखिलेश यादव, तेजस्वी यादव समेत 11 विपक्षी नेता याचिकाकर्ता हैं। इसमें चुनाव आयोग और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पार्टी बनाया गया है।</p><p>दरअसल इससे पहले सीजेआई से अकेले ही मुलाकात की मांग करके कांग्रेस ने यह साबित करने की कोशिाश की थी, इंडिया गठबंधन का नेतृत्व वही करती है। बाकी सब उसके पीछे हैं, किन्तु सीजेआई द्वारा मिलने से इंकार करने से कांग्रेस को अपने दाव में सफलता नहीं मिल सकी। जब सीजेआई ने मिलने से इंकार कर दिया और कानूनी तरीका अपनाने की सलाह दी, तब गठबंधन के बाकी नेताओं को भी साथ लेकर याचिका दायर की गई।</p><p>सुप्रीम कोर्ट ने जाहिर कर दिया कि गैर कानूनी और गैर संवैधानिक तरीके से इंडिया गठबंधन के नेताओं के मंसूबे कामयाब नहीं होने देगा। जो भी करेगा संविधान के दायरे में करेगा, अन्यथा सुप्रीम कोर्ट की साख पर भी बट्टा लग सकता है। यह भी निश्चित है कि कांग्रेस और विपक्षी दलों को कोई खास सफलता सुप्रीम कोर्ट से हाथ नहीं लगने वाली, सिवाए एसआईआर में कुछ प्रशासनिक आदेश निर्देश के, क्यों कि ज्ञानेश कुमार को हटाया नहीं जा सकता, उन्हें संविधान का संरक्षण प्राप्त है। केवल संसद में महाभियोग के जरिए ही मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाया जा सकता है, वह इसलिए पूरा नहीं होगा कि संसद में मोदी सरकार का बहुमत है।</p><p>इससे पहले भी राजनीतिक इरादों को पूरा करने के विपक्षी दलों के मंसूबों पर सुप्रीम कोर्ट पानी फेर चुका है। नवम्बर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने देश में चुनावों में धांधली का आरोप लगाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया था। पीठ ने कहा था कि जब आप चुनाव जीतते हैं, तो ईवीएम से छेड़छाड़ नहीं होती। जब आप चुनाव हार जाते हैं, तो छेड़छाड़ हो जाती है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर तीखा व्यंग्य करते हुए पूछा कि ये याचिका दायर करने संबंधित आपको शानदार विचार कैसे मिला?</p><p>इसी तरह सुप्रीम कोर्ट ने अप्रेल 2023 में 14 विपक्षी दलों की सीबीआई और ईडी की कार्रवाई के लिए नेताओं के लिए अलग से गाइडलाइंस बनाने के निर्देश देने से इंकार कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि विपक्षी नेताओं के खिलाफ ईडी और सीबीआई के ज्यादा केस दिखाने वाले आंकड़ों के आधार पर केवल नेताओं के लिए गाइडलाइन की मांग नहीं कर सकते हैं। उन्हें अभियोजन से कोई छूट नहीं मिलती है। कोर्ट ने कहा कि नेता आम नागरिकों के बराबर ही होते हैं। इसके बाद कोर्ट ने याचिका को वापस लेने की अनुमति दे दी। राजनीतिक दलों के मामले में दूरी बनाए रखने के सुप्रीम कोर्ट के नजरिए से साफ है कि इंडिया गठबंधन को अपने राजनीतिक मुद्दों की लड़ाई जनता की अदालत में लड़नी होगी। सत्ता किसे देनी है और किसे नहीं, इसका फैसला मतदाता ही करेंगे।</p><p>- योगेन्द्र योगी</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 19 Oct 2026 11:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-supreme-court-will-not-become-an-arena-for-politicians</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सुप्रीम कोर्ट के आवश्यक न्यायिक फैसलों के उजाले]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/in-light-of-significant-judicial-rulings-by-the-supreme-court]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>लोकतंत्र की मजबूती का वास्तविक प्रमाण केवल चुनावों का नियमित आयोजन, संसद में बहुमत अथवा राजनीतिक दलों की लोकप्रियता नहीं है, बल्कि यह है कि संविधान के सामने सत्ता, विपक्ष और सामान्य नागरिक की स्थिति समान हो। जब सामाजिक न्याय, आरक्षण, धार्मिक स्वतंत्रता और चुनावी निष्पक्षता जैसे प्रश्न एक साथ राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में आते हैं, तब सर्वोच्च न्यायालय की भूमिका और भी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। न्यायपालिका वह संवैधानिक संस्था है, जिससे नागरिक यह अपेक्षा करता है कि वह राजनीतिक आग्रहों, सामाजिक दबावों और सत्ता के प्रभाव से मुक्त रहकर न्याय का मार्ग प्रशस्त करेगी। आज आरक्षण की पात्रता और धर्मांतरण से जुड़े विवादों से लेकर निर्वाचन प्रक्रिया तथा न्यायालय की गरिमा तक, अनेक प्रश्न इसी अपेक्षा की कसौटी बनकर सामने हैं। इन प्रश्नों पर विचार करते समय आवश्यक है कि हम न किसी राजनीतिक पक्ष के प्रचारक बनें, न किसी धार्मिक समुदाय के प्रति पूर्वाग्रह रखें, बल्कि संविधान की भावना और न्याय के व्यापक उद्देश्य को केंद्र में रखें। अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षण भारतीय संविधान की उन ऐतिहासिक व्यवस्थाओं में है, जिनका उद्देश्य सदियों से चले आ रहे सामाजिक बहिष्कार, अस्पृश्यता और भेदभाव के दुष्परिणामों को दूर करना है। यह केवल रोजगार अथवा शिक्षा में कुछ अतिरिक्त अवसर उपलब्ध कराने की व्यवस्था नहीं, बल्कि उस सामाजिक अन्याय के विरुद्ध संवैधानिक हस्तक्षेप है, जिसने बड़ी आबादी को लंबे समय तक समान अवसरों से वंचित रखा। इसलिए आरक्षण और धर्मांतरण के संबंध में होने वाली बहस को भावनाओं, धार्मिक आग्रहों अथवा राजनीतिक आरोपों के बजाय संवैधानिक प्रावधानों और सामाजिक वास्तविकताओं के आधार पर समझना चाहिए।</p><p>सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह स्पष्ट किया जाना एक स्वागत योग्य कदम है कि अनुसूचित जाति (एससी) और अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के व्यक्तियों द्वारा धर्मांतरण करने पर उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। तमिलनाडु सरकार द्वारा इसे उच्च न्यायालय में चुनौती देना और अपने राज्य में इस प्रकार की सुविधा जारी रखना कि इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलता रहे, वास्तव में सनातन संस्कृति के आरक्षित वर्गों के हितों को कमजोर करने वाला और धर्मांतरण को परोक्ष रूप से बढ़ावा देने वाला कदम था। यह विडंबना ही है कि एक तरफ कुछ संगठन यह दावा करते हैं कि उनके यहां जातिगत भेदभाव का अस्तित्व नहीं है, वहीं दूसरी ओर वे एससी और ओबीसी वर्ग के लोगों को अपने पंथ में आने के बाद भी आरक्षण का लाभ मिलने की पुरजोर वकालत करते हैं। इस प्रकार के दोहरे लाभ और प्रलोभनों के कारण न केवल धर्मांतरण की प्रवृत्ति को बल मिलता है, बल्कि हिंदू समाज को इसका भारी नुकसान उठाना पड़ता है, क्योंकि धर्मांतरित लोग आरक्षण के साथ-साथ अल्पसंख्यक दर्जे के लाभों का भी अनुचित दोहन करने लगते हैं। हालांकि विभिन्न राज्य सरकारें छल-कपट से होने वाले धर्मांतरण के विरुद्ध कड़े कानून बना रही हैं, फिर भी यह समस्या थमने का नाम नहीं ले रही है, जिसका प्रमुख कारण धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर हो रहा इसका दुरुपयोग है। अब समय आ गया है कि इस गंभीर विषय पर केंद्र सरकार और सर्वाेच्च न्यायालय मिलकर ठोस और प्रभावी कदम उठाएं ताकि इस दुरुपयोग को रोका जा सके।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-crisis-of-politics-and-constitutional-propriety-at-the-threshold-of-justice" target="_blank" rel="noopener">न्याय की चौखट पर सियासत और संवैधानिक मर्यादा का संकट</a></p><p>इसी व्यापक संवैधानिक परिप्रेक्ष्य में सर्वोच्च न्यायालय का चुनावी प्रक्रिया से जुड़े विवादों पर हस्तक्षेप भी उल्लेखनीय है। 12 अक्टूबर 2026 को राहुल गांधी सहित विपक्षी गठबंधन ‘इंडिया’ के नेताओं ने मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की ओर मार्च किया, इस पर सुप्रीम कोर्ट का सख्त रवैया भी सराहनीय है। भले ही विपक्ष ने मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं, मतदाताओं के नाम हटाए जाने और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल उठाए, इन आरोपों की सत्यता का निर्धारण न्यायिक परीक्षण और संबंधित अभिलेखों के आधार पर होना चाहिए, लोकतंत्र में चुनाव केवल सरकार चुनने का माध्यम नहीं, बल्कि प्रत्येक पात्र नागरिक को अपनी राजनीतिक इच्छा व्यक्त करने का संवैधानिक अवसर है। इसलिए मतदाता सूची की शुद्धता और विश्वसनीयता किसी एक दल का नहीं, पूरे लोकतंत्र का प्रश्न है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट तक मार्च करना एक गलत परम्परा का सूत्रपात है।</p><p>15 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने विपक्षी नेताओं की याचिका पर निर्वाचन आयोग, मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी से जवाब माँगा। इससे स्पष्ट होता है कि निर्वाचन आयोग जैसी महत्त्वपूर्ण संवैधानिक संस्था के निर्णय भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आ सकते हैं। आयोग की स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं कि उसके प्रत्येक निर्णय को प्रश्नों से परे मान लिया जाए। इसी प्रकार, किसी निर्णय से असहमति अपने आप में यह प्रमाणित नहीं करती कि आयोग ने अनुचित कार्य किया है। न्यायिक समीक्षा का उद्देश्य आरोपों और तथ्यों के बीच अंतर स्पष्ट करना, निर्णय प्रक्रिया की वैधानिकता जाँचना तथा नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसी घटनाक्रम में सर्वोच्च न्यायालय ने 12 अक्टूबर के मार्च को लेकर राहुल गांधी, अखिलेश यादव और अन्य संबंधित नेताओं से भी जवाब माँगा। न्यायालय की चिंता यह थी कि राजनीतिक प्रदर्शन के माध्यम से न्यायपालिका पर दबाव बनाने की स्थिति उत्पन्न नहीं होनी चाहिए। इस प्रसंग का मूल्यांकन करते समय यह समझना आवश्यक है कि शांतिपूर्ण विरोध, राजनीतिक असहमति और न्यायालय की गरिमा-तीनों लोकतंत्र के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। विपक्ष को सरकार और निर्वाचन आयोग से प्रश्न पूछने का अधिकार है, लेकिन न्यायिक संस्थाओं की स्वतंत्रता का सम्मान करना भी उसकी संवैधानिक जिम्मेदारी है। दूसरी ओर, न्यायालय की गरिमा की रक्षा के नाम पर वैध आलोचना और शांतिपूर्ण असहमति के अधिकार को सीमित नहीं किया जाना चाहिए। नोटिस जारी होना किसी को दोषी घोषित करना नहीं, बल्कि उसका पक्ष जानने की न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा है।</p><p>यही वह बिंदु है जहाँ न्यायिक सक्रियता और न्यायिक संयम के बीच संतुलन का प्रश्न सामने आता है। यदि न्यायपालिका सामाजिक अन्याय, प्रशासनिक मनमानी अथवा संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन पर मौन रहे, तो आम नागरिक का न्याय व्यवस्था से विश्वास कमजोर हो सकता है। लेकिन यदि न्यायपालिका प्रत्येक राजनीतिक विवाद में स्वयं को निर्णायक नीति-निर्माता की भूमिका में रखे, तो शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत प्रभावित हो सकता है। लोकतंत्र की संस्थाएँ एक-दूसरे की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि एक-दूसरे को संवैधानिक मर्यादाओं में रखने वाली व्यवस्थाएँ हैं। विधायिका कानून बनाती है, कार्यपालिका उन्हें लागू करती है और न्यायपालिका यह सुनिश्चित करती है कि कानून तथा उनका क्रियान्वयन संविधान की सीमाओं के भीतर हों। इन तीनों के बीच स्वस्थ संतुलन ही लोकतांत्रिक स्थिरता की आधारशिला है। सर्वोच्च न्यायालय की प्रतिष्ठा उसके आदेशों की कठोरता से अधिक उसकी निष्पक्षता, स्वतंत्रता और तर्कपूर्ण निर्णयों से निर्मित होती है।</p><p>आज देश को ऐसी न्यायिक सक्रियता की आवश्यकता है, जो अन्याय के सामने निर्भीक हो, लेकिन अपने अधिकार क्षेत्र के प्रति सजग भी रहे, जो नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करे, लेकिन राजनीतिक आग्रहों से अप्रभावित रहे, जो संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बनाए रखे, लेकिन उनकी जवाबदेही को भी सुनिश्चित करे। धर्मांतरण और आरक्षण के प्रश्न पर स्पष्टता, चुनावी विवादों में पारदर्शिता तथा न्यायालय के प्रति सम्मान-ये अलग-अलग विषय दिखाई दे सकते हैं, लेकिन इन सभी के केंद्र में एक ही मूल प्रश्न है कि संविधान की सर्वोच्चता व्यवहार में कैसे सुनिश्चित हो। न्याय का अर्थ किसी पक्ष की जीत और दूसरे पक्ष की हार भर नहीं है। न्याय वह विश्वास है, जो नागरिक को यह भरोसा देता है कि उसकी आवाज सुनी जाएगी, उसके अधिकारों का निष्पक्ष परीक्षण होगा और शक्तिशाली व्यक्ति या संस्था भी कानून से ऊपर नहीं होगी। सर्वोच्च न्यायालय की वास्तविक शक्ति तभी सिद्ध होगी, जब उसका प्रत्येक निर्णय राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर संवैधानिक विवेक, सामाजिक संवेदनशीलता और विधिक निष्पक्षता का उदाहरण बने।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 18:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/in-light-of-significant-judicial-rulings-by-the-supreme-court</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[London में Dhruv Rathee और Washington में 6 अमेरिकी सांसदों ने थामी भारत विरोधी अभियान की कमान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-us-politics-dhruv-rathee-london-protest-american-lawmakers]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत के अंदरूनी मामलों में टांग अड़ाने और दुनिया भर में भारत को कटघरे में खड़ा करने का खेल एक बार फिर शुरू हो गया है। अमेरिकी सांसद प्रमिला जयपाल, इल्हान उमर, जिम मैकगवर्न, रशीदा तलाइब, एलेनॉर होम्स नॉर्टन और जीसस गार्सिया ने अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो को चिट्ठी लिखकर मांग की है कि वे भारत दौरे पर छात्र प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की कार्रवाई और कथित हिरासतों का मुद्दा उठाएं। यहां सवाल उठता है कि भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने निकले इन सांसदों को आखिर किसने हक दिया कि वे हमारे देश के आंतरिक मामलों में दखल दें? भारत की समस्याओं पर इतनी चिंता दिखाने वाले इन नेताओं से यह भी पूछा जाना चाहिए कि उनकी यह चिंता चुनिंदा मुद्दों पर ही क्यों जागती है और भारत के मामले में वे हर बार उंगली उठाने के लिए सबसे आगे क्यों खड़े नजर आते हैं? साथ ही सवाल यह भी उठता है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र पर उंगली उठाने वाले इन जनप्रतिनिधियों की अपनी राजनीतिक प्राथमिकताओं और अंतरराष्ट्रीय आचरण की पड़ताल कौन करेगा?</p><p>वैसे यह कोई पहला अवसर नहीं है जब इन अमेरिकी नेताओं ने भारत की नीतियों पर सवाल उठाए हों। प्रमिला जयपाल ने 2019 में भी जम्मू-कश्मीर में संचार प्रतिबंधों और हिरासतों को लेकर भारत से जवाब मांगा था। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने उस समय उनके आकलन को अनुचित बताते हुए उनसे मुलाकात करने तक में रुचि नहीं दिखाई थी। अप्रैल 2022 में इल्हान उमर के पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर के दौरे पर भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी और इसे देश की संप्रभुता से जुड़ा मामला बताया था। इल्हान उमर का तो अक्सर भारत विरोधी रवैया सामने आता ही रहता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/dhruv-rathee-announces-london-protest-against-alleged-vote-theft" target="_blank" rel="noopener">Dhruv Rathee ने 'वोट चोरी' के खिलाफ लंदन में विरोध प्रदर्शन की घोषणा की; कहा- अब 'अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आवाज उठाने' का समय आ गया है</a></p><p>सवाल उठता है कि भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था को ठीक से समझे बिना विदेशी दबाव बनाने की यह राजनीति आखिर क्यों चल रही है? क्या किसी राजनीतिक दल या किसी संगठन के आंदोलन के दौरान लगाये गये आरोपों को ही सच मानकर भारत को कटघरे में खड़ा कर देना इन सांसदों का नया शगल बन गया है? अगर इन्हें वाकई लोकतंत्र और नागरिकों की आजादी की इतनी चिंता है, तो यह चिंता हर देश के मामले में एक जैसी क्यों नहीं दिखती? आखिर भारत के मामले में ही इनका लोकतांत्रिक प्रेम क्यों उमड़ने लगता है? क्या भारत को नसीहत देना और उसके आंतरिक मामलों में दखल देना ही इनकी राजनीति का असली मकसद है?</p><p>अब बात ध्रुव राठी की। जर्मनी में रहने वाले इस यूट्यूबर ने लंदन पहुंचकर पार्लियामेंट चौक में महात्मा गांधी की प्रतिमा के निकट 18 अक्टूबर को प्रदर्शन करने का आह्वान किया है। उन्होंने भारत में कथित ‘वोट चोरी’ के मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठाने की बात कही है और विदेशों में लोगों से इस अभियान में शामिल होने का आग्रह किया है। यहां सवाल उठता है कि अगर ध्रुव राठी के पास वोट चोरी के सबूत थे तो वह उन्होंने अपने भारत दौरे के दौरान पुलिस या कोर्ट को क्यों नहीं दिये? क्यों वह वापस विदेश भाग गये? हर बात पर विदेशों में ढिंढोरा पीटना और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की चुनावी व्यवस्था को बदनाम करने की कोशिश करना आखिर किस बात का संकेत है? चुनावी प्रक्रिया से शिकायत होना अलग बात है, लेकिन अपनी राजनीतिक खुन्नस निकालने के लिए पूरी चुनाव व्यवस्था पर सवाल उठाना और दुनिया भर में भारत के लोकतंत्र की साख पर बट्टा लगाने की कोशिश करना अलग बात है। देखा जाये तो आरोप लगाना आसान है, लेकिन आरोपों को सबूतों के दम पर साबित करना ही असली कसौटी है!</p><p>सवाल यह भी है कि ध्रुव राठी आखिर विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ इतना बड़ा अभियान किसके दम पर चला रहे हैं? लंदन में प्रदर्शन, विदेशी मंचों पर भारत को घेरने की कोशिश और देश की राजनीति को अंतरराष्ट्रीय मुद्दा बनाने की मुहिम, क्या यह सब महज संयोग है, या इसके पीछे कोई बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है? विदेशी फंडिंग के आरोपों को झुठलाने वाले ध्रुव राठी को बताना चाहिए कि इस पूरे अभियान का पैसा कहां से आ रहा है, इसे कौन चला रहा है और इसके पीछे किसके हित जुड़े हैं? आखिर कौन है जो भारत की छवि को विदेशों में नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे अभियानों को ताकत दे रहा है?</p><p>साथ ही लंदन में भारत सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थन में भारतीयों का मैदान में उतरना उन लोगों के लिए करारा जवाब है, जो विदेशों में बैठकर भारत के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश करते हैं। उन्हें समझ लेना चाहिए कि विदेशों में रहने वाले भारतीय कोई उनके इशारे पर चलने वाली भीड़ नहीं हैं। इस देश से प्यार करने वाले लाखों भारतीय दुनिया के किसी भी कोने में हों, तिरंगा उठाना और अपनी सरकार के समर्थन में आवाज बुलंद करना जानते हैं। भारत के खिलाफ नारे लगाने वाले ही लोकतंत्र के ठेकेदार नहीं हैं; भारत के समर्थन में खड़े होने वालों को भी अपनी बात कहने का पूरा हक है। करोड़ों भारतीयों के वोट से बनी सरकार का फैसला विदेशों में बैठे कुछ लोगों के शोर-शराबे से नहीं बदला जा सकता। भारत किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह फैसला भारत की जनता करेगी, कोई विदेशी ताकत नहीं!</p><p>इसके अलावा, यह भी बड़ी हैरानी की बात है कि संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं को भारत के मामलों में दखल देने की इतनी जल्दी रहती है कि वे किसी भी आरोप पर चिंता जताने से पहले पूरी सच्चाई जानने की जहमत तक नहीं उठातीं! 10 अक्टूबर को दिल्ली में प्रदर्शनों के दौरान हिरासतों की खबरों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने चिंता जताई, तो भारत ने भी साफ-साफ जवाब दे दिया कि देश के आंतरिक मामलों में इस तरह की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। संयुक्त राष्ट्र महासभा की तीसरी समिति में भी भारत ने इन टिप्पणियों पर कड़ा ऐतराज जताते हुए अपने संविधान, स्वतंत्र न्यायपालिका और स्वतंत्र प्रेस का हवाला दिया। सवाल यह है कि मानवाधिकारों की दुहाई देने वाली इन वैश्विक संस्थाओं को दुनिया के हर मामले में एक जैसी तत्परता क्यों नहीं दिखती? भारत के मामले में बिना पूरी तस्वीर समझे बयान देने की जल्दी और दूसरे मामलों में चुप्पी...आखिर यह दोहरा रवैया कब तक चलेगा? जब संस्थाएं चुनिंदा मुद्दों पर ही जागेंगी और अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग तराजू रखेंगी, तो उनकी निष्पक्षता पर सवाल उठेंगे ही। यही रवैया उनकी विश्वसनीयता को कमजोर करता है और दुनिया भर में लोगों के मन में यह सवाल खड़ा करता है कि क्या ये संस्थाएं सचमुच मानवाधिकारों की रक्षा कर रही हैं या चुनिंदा राजनीतिक एजेंडे को आगे बढ़ाने का जरिया बनती जा रही हैं?</p><p>उधर, भारत सरकार ने साफ कर दिया है कि भारत के संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था और संस्थाओं पर बिना पूरी जानकारी के उंगली उठाने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाएगा। भारत कोई ऐसा देश नहीं है कि कोई भी विदेशी संस्था या नेता उठे और बिना सोचे-समझे हमें लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने लगे! भारत के अपने कानून हैं, अपनी अदालतें हैं और अपना संवैधानिक ढांचा है। लिहाजा, भारत पर सवाल उठाने वालों को पहले तथ्यों की जांच करनी चाहिए, फिर बयानबाजी करनी चाहिए। भारत को बदनाम करने की कोशिश करने वालों को यह समझना होगा कि हर आरोप पर जवाब मिलेगा और तथ्यों के दम पर मिलेगा।</p><p>बहरहाल, जो लोग सत्ता पलटने का ख्वाब देख रहे हैं उन्हें भी समझना होगा कि भारत की ताकत किसी एक सरकार में नहीं, बल्कि उस करोड़ों भारतीयों के जनादेश में है, जिसने दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की नींव मजबूत की है। इस देश को न विदेशी मंचों पर बैठकर भाषण देने वाले कुछ नेता चला सकते हैं, न सोशल मीडिया पर शोर मचाकर खुद को लोकतंत्र का सबसे बड़ा रखवाला बताने वाले लोग! भारत की छवि को झूठे आरोपों, आधी-अधूरी जानकारी और राजनीतिक एजेंडे के सहारे चोट पहुंचाने का सपना देखने वालों को समझना होगा कि भारत कोई कमजोर देश नहीं, जिसकी साख चंद बयानों से मिटा दी जाए। भारत पर उंगली उठाने से पहले अपने तथ्यों की जांच करो, आरोप लगाने से पहले सबूत जुटाओ और लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने से पहले यह समझो कि भारत का भविष्य तय करने का अधिकार भारतीय जनता के पास है, किसी विदेशी नेता या सोशल मीडिया के स्वयंभू विशेषज्ञ के पास नहीं! सवाल पूछने हैं तो पूछिए, लेकिन सवालों की आड़ में देश की संस्थाओं को बदनाम करने का ठेका मत लीजिए। क्योंकि भारत की असली ताकत तिरंगे के नीचे खड़े करोड़ों लोगों का विश्वास, स्वाभिमान और अपने देश का फैसला खुद करने का अधिकार है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 16:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-us-politics-dhruv-rathee-london-protest-american-lawmakers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सवालों के घेरे में हैं 'जेएनयू के क्रांतिकारियों' की 'चयनित चुप्पियां']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-selective-silences-of-jnu-revolutionaries-are-under-scrutiny]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शिक्षा केंद्रों की कलंक कथाएं अनंत हैं। गुरु-शिष्य परंपरा को लजाते प्रकरण मुंह चिढ़ा रहे हैं। ऐसी खबरें अब बहुत विचलित नहीं करतीं। किंतु बात जब जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा केंद्र की हो तो मामला साधारण नहीं रह जाता। आरोप किसी साधारण शिक्षक पर नहीं, मणिपुर से लोकसभा के सांसद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम पर हैं। वे जेएनयू के सामाजिक विज्ञान अध्ययन केंद्र में प्राध्यापक थे। जेएनयू प्रशासन ने 11 छात्राओं की शिकायतों की जांच के बाद प्रोफेसर अंगोमचा बिमोल अकोइजम को बर्खास्त कर दिया है। वे अभी सांसद बने हुए हैं। प्रो. बिमोल ने इन आरोपों पर सफाई देते हुए कहा कि उन्हें सरकार विरोधी रवैये के कारण शिकार बनाया जा रहा है। इस सफाई के बहुत मायने नहीं हैं। मुद्दा है शिक्षक की गरिमा का, यदि वह जनप्रतिनिधि हैं तो मामला गंभीर हो जाता है।</p><h2>कटघरों को तोड़कर आगे आती बेटियां-</h2><p><br>जेएनयू जैसे विश्वविद्यालय में जागरुक विद्यार्थियों की संख्या काफी है। राजनीतिक तौर पर भी उनकी सक्रियता किसी से छिपी नहीं है। ऐसे में किसी प्राध्यापक का यह रवैया आश्चर्यजनक है। उन छात्राओं के साहस को भी नमन करना चाहिए, जिनके कारण यह प्रकरण प्रकाश में आ सका। हमारी परंपरा में शिक्षक अपने विद्यार्थियों के लिए अभिभावक हैं। इस गरिमा को छोड़कर अपने विद्यार्थियों का किसी भी तरह का शोषण स्वीकार्य नहीं है। यह उस अकादमिक भरोसे की हत्या है, जिस पर शिक्षा की नींव टिकी है। आरोपी प्रोफेसर के बारे में विश्वविद्यालय की आंतरिक शिकायत समिति ने शिकायतों को सही पाया है। नैतिकता के आधार पर उन्हें सांसद पद से इस्तीफा देना चाहिए। उनकी अपनी कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई आधिकारिक बयान अभी तक सामने नहीं आया है। यह बात रेखांकित करती है कि शिक्षा केंद्रों में शिक्षक सुरक्षित माहौल नहीं देगें तो युवा पीढ़ी का मानसिक और शैक्षणिक विकास कैसे होगा? यह भी सुखद है कि जागरुक विद्यार्थी अब किसी तरह के शोषण को सहने को तैयार नहीं हैं। पीड़िताएं अब डरने के बजाए संस्थागत प्रक्रियाओं का दरवाजा खटखटा रही हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-police-summons-congress-mp-bimol-akoijam-in-jnu-sexual-harassment-case" target="_blank" rel="noopener">11 छात्राओं के आरोप और FIR के बाद Congress MP Bimol Akoijam को Delhi Police का समन</a></p><p>स्त्रियों ने इस समय में अपनी शक्ति को पहचान लिया है। वे बेहतर कर रही हैं और आगे आसमां छूने की कोशिशों में हैं। यहां भी पुरुष सत्ता चोटिल होती हुई लगती है। उसके प्रति सम्मान और संवेदनशीलता के बजाए, किस्से बनाने और उसे कमतर साबित करने की कोशिशें हर स्तर हो रही हैं। तेज होते सामाजिक-आर्थिक परिवर्तनों के इस दौर में सिर्फ कानून ही स्त्री के साथ खड़े हैं। कई जगह स्त्रियां भी, स्त्रियों के खिलाफ खड़ी हैं। यह संक्रमण काल है, स्त्री को अपने वजूद को साबित करते हुए निरंतर आगे बढ़ने का समय है। वह जीत रही है और आगे बढ़ रही है। आज की बेटियां अपने सपनों में रंग भर रही हैं। आसान शिकार होने के नाते कुछ शिकारी उसकी घात में हैं, किंतु आज की औरत इससे डरती नहीं। घबराती नहीं। वह बने-बनाए कठघरों को तोड़कर आगे आ रही है।</p><h2>दलगत सीमाओं से ऊपर उठें-</h2><p><br>कानून से ऊपर कोई नहीं है। आरोपी प्रोफेसर सांसद हैं तो उन्हें कुछ विशेषाधिकार जरुर हासिल हैं। ऐसे में मुद्दा यह भी है कि जब कानून बनाने वाले ही महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचा रहे हैं तो राजनीतिक शुचिता का क्या होगा। दलगत राजनीति और चयनित चुप्पियों के समय में राजनीतक दलों का रवैया दोमुंहा हो जाता है। टीवी डिबेट्स में राजनीतिक दलों की महिला प्रवक्ता भी उक्त प्राध्यापक का बचाव करते नजर आ रहे हैं। यह तर्क भी कितने गलीज हैं कि दूसरे दल के लोगों पर भी आरोप लगे हैं। इससे गहरी राजनीतिक संवेदनहीनता प्रकट होती है। आपको इसलिए छोड़ दिया जाए क्योंकि प्रतिपक्ष पर भी ऐसे आरोप हैं। नैतिकता और महिला सुरक्षा के मुद्दों पर दलीय सीमाओं से ऊपर उठकर स्त्री सम्मान के लिए सभी को खड़ा होना चाहिए। संसद को हम लोकतंत्र का मंदिर मानते हैं। वहां बैठे सांसदों से उच्च नैतिक आचरण की अपेक्षाएं बेमानी नहीं हैं। हालात इतने बदतर हैं कि गंभीर आरोपों से घिरे लोग अकसर संस्थागत जांच की वैधता पर सवालिया निशान लगाकर सहानुभूति हासिल करने का प्रयास करते हैं। इस मामले में भी यही दिख रहा है। वहीं दूसरी ओर जेएनयू प्रशासन का यह दावा कि उचित प्रक्रिया का पालन करते हुए आंतरिक समिति की रिर्पोट के आधार पर सांसद-प्राध्यापक पर कार्रवाई की गई है। यह साबित करता है कि राजनीतिक पदों की धमक से ऊपर अब संस्थागत नियमों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।</p><h2>लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत-</h2><p><br>विश्वविद्यालयों के परिसरों में वैचारिक विमर्श हों। संवाद हों। किंतु वे ताकतवर लोगों के लिए सुरक्षित शरणगाह नहीं बनें। लक्ष्मण रेखा खींचने की जरुरत है। इस पर शिक्षकों को विचार करना होगा। अपने गिरेबां में झांकना होगा। शिक्षा परिसरों में पुलिस डेरा डाल रही है। उनकी स्वायत्तता और सम्मान आज हाशिए पर है। राजनीतिक दलों से जुड़ी अपनी आस्थाओं के कारण अगर शिक्षक अपनी भूमिका से समझौता करेगें, तो उनका सम्मान बच नहीं सकता। विचारधारा और देशद्रोही विचारों के आधार पर चलने वाली शक्तियां परिसर को तो कलंकित करेंगी। शिक्षकों के सम्मान को आहत करेंगी। जेएनयू में कई वर्षों से चल रही भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने, संभालने और अपने युवाओं को सही राह दिखाने की कोशिशें होतीं तो यह आज नासूर बनकर न फूटता। सवाल सीधा है कि &nbsp;जेएनयू में हर देशद्रोही को स्पेस क्यों मिल जाता है? कोई भी विचार तभी तक स्वीकार्य है, जब तक हमारी अकादमिक योग्यताओं को निखारने और संवर्धित करने में सहायक हो। जो विचार देश तोड़ने और उसके टुकड़े करने के स्वप्न देखे उसका मिट जाना ही ठीक है।</p><h2>संस्थागत जवाबदेही जरुरी-</h2><p><br>अब जबकि स्त्रियों के सम्मान का मामला सामने है, तब ‘जेएनयू के क्रांतिकारियों’ की चयनित चुप्पियां सवालों के घेरे में हैं। यह प्रकरण अपने पद का दुरुपयोग करते हुए छात्राओं के उत्पीड़न का है। यह गुरु-शिष्य संबंधों को प्रभावित करता है। छात्राओं को भयभुक्त वातावरण प्रदान करना शासन- विश्वविद्यालय प्रशासन की जिम्मेदारी है। क्यों हम अपने परिसरों को छात्राओं के लिए सुरक्षित स्थान नहीं बना पाए हैं? जेएनयू जैसे जागरुक परिसर में ऐसा हो रहा है तो छोटे स्थान पर क्या हो रहा होगा? किसी छात्रा के लिए सत्ता प्रतिष्ठान से टकराना साधारण नहीं होता। बात जब यौन उत्पीड़न की हो मामला और संवेदनशील हो जाता है। छात्राओं को हिम्मत देना जरूरी है। जेएनयू की प्रथम महिला कुलपति प्रोफेसर शांतिश्री धूलिपुड़ी पंडित ने संवेदना के साथ इस विषय में न्याय किया है। समाज के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया है। स्त्री सुरक्षा से जुड़े मामलों में ऐसी ही कार्रवाई अपेक्षित है।</p><p>इस मामले के बाद उच्च शिक्षा परिसरों में सुरक्षा, सत्ता के दुरुपयोग और संस्थागत जबावदेही के सवाल उठेंगे। इसलिए इसका परिप्रेक्ष्य व्यापक है। “लड़की हूं लड़ सकती हूं” और “बेटी बचाओ -बेटी पढ़ाओ” के नारों के बीच ऐसी घटनाएं हमें मुंह चिढ़ा रही हैं। इस सिलसिले को रोकने के लिए कौन आएगा ? जीवंत समाज अपने समाज के प्रश्नों के हल खुद खोजता है। वह टीवी बहसों से प्रभावित नहीं होता। क्योंकि ये हमेशा अंतहीन और निष्कर्षहीन ही होती हैं। स्त्री सुरक्षा पर हमने आज ही सोचने और कुछ करने की शुरुआत नहीं की तो कल बहुत देर हो जाएगी।</p><p>- प्रो. संजय द्विवेदी<br>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं। भारतीय जनसंचार संस्थान के महानिदेशक रहे हैं। )</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 12:10:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-selective-silences-of-jnu-revolutionaries-are-under-scrutiny</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पंजाब में नशे का तांडवः वर्दी बनी त्रासदी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/drug-rampage-in-punjab-uniform-becomes-tragedy]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पंजाब की धरती कभी शौर्य, पराक्रम, मेहनत, उद्यमशीलता और जीवटता के लिए जानी जाती थी। इसी मिट्टी के नौजवानों ने देश की सीमाओं की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी और खेतों में पसीना बहाकर देश का अन्न भंडार भरा। लेकिन आज उसी पंजाब की पहचान नशे के बढ़ते कारोबार, युवाओं की बर्बादी और ड्रग्स माफिया के बढ़ते प्रभाव से जुड़ती जा रही है। यह केवल एक राज्य की सामाजिक त्रासदी नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, शासन-व्यवस्था और राजनीतिक इच्छाशक्ति की गंभीर परीक्षा है। जिस पंजाब के युवाओं के हाथों में कभी तलवार, हल और तिरंगा शोभा देते थे, वहां आज नशे ने अनेक हाथों को बेबस और अनेक परिवारों को बदहवास कर दिया है। विडंबना देखिए कि नशे के कारोबार पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी जिन पुलिसकर्मियों की है, यदि उन्हीं के घर से करोड़ों रुपये की हेरोइन बरामद होने की खबर सामने आती है, तो यह व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है। पंजाब में एक पुलिस कांस्टेबल के घर से कथित तौर पर 40 करोड़ रुपये की हेरोइन बरामद होने का मामला इसी सड़ांध की ओर संकेत करता है। यह घटना महज एक आपराधिक प्रकरण नहीं, बल्कि उस व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न है, जिसमें अपराध रोकने के लिए नियुक्त व्यक्ति ही कथित तौर पर अपराध के संदेह के घेरे में आ जाए। यह तो वही स्थिति हुई कि ‘बाड़ ही खेत को खाने लगे’, तो फसल की रखवाली कौन करेगा? जिस पुलिस के कंधों पर नशा तस्करों को पकड़ने का दायित्व है, यदि उसी व्यवस्था के भीतर ऐसे तत्व पनपने लगें, तो आम नागरिक का भरोसा डगमगाना स्वाभाविक है। इस मामले में निष्पक्ष जांच, दोषियों की पहचान और कठोर कानूनी कार्रवाई जरूरी है। किसी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन वर्दी की आड़ में अपराध करने वाले किसी भी व्यक्ति को कानून से बचने का अवसर भी नहीं मिलना चाहिए।</p><p>पंजाब में नशे का कारोबार अब गलियों, गांवों और कस्बों तक अपनी जड़ें फैला चुका है। कभी नशे की समस्या को सीमावर्ती क्षेत्रों या शहरी युवाओं तक सीमित माना जाता था, लेकिन आज सिंथेटिक ड्रग्स सहित विभिन्न मादक पदार्थों की उपलब्धता ने संकट को और व्यापक बना दिया है। युवा पीढ़ी का एक हिस्सा नशे की गिरफ्त में आकर अपना स्वास्थ्य, शिक्षा, रोजगार और भविष्य गंवा रहा है। कहीं मां की गोद सूनी हो रही है, कहीं वृद्ध पिता के बुढ़ापे का सहारा छिन रहा है और कहीं परिवार का कमाऊ सदस्य नशे की लत के कारण स्वयं अपने परिजनों पर बोझ बन रहा है। ‘घर का चिराग ही घर में अंधेरा कर दे’, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी! नशे की लत केवल व्यक्ति को नहीं तोड़ती, बल्कि पूरे परिवार और सामाजिक ताने-बाने को भीतर तक खोखला कर देती है। इस संकट की गंभीरता सरकारी आंकड़ों और पुलिस की कार्रवाइयों से भी समझी जा सकती है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार दस महीनों में पंजाब पुलिस ने 10,524 तस्करों को गिरफ्तार किया, जिनमें 153 बड़े ऑपरेटर शामिल थे। इस दौरान 790 किलोग्राम हेरोइन, 860 किलोग्राम अफीम और अन्य मादक पदार्थों के साथ 13 करोड़ रुपये से अधिक की ड्रग मनी जब्त की गई तथा नशे के कारोबार से जुड़ी 208 करोड़ रुपये से अधिक की संपत्ति पर कार्रवाई की गई। ये आंकड़े कार्रवाई के पैमाने को अवश्य दर्शाते हैं, लेकिन साथ ही यह सवाल भी उठाते हैं कि इतनी बड़ी मात्रा में नशीले पदार्थ आखिर राज्य में पहुंच कैसे रहे हैं? इतनी गिरफ्तारियों और जब्ती के बावजूद यदि नशे की उपलब्धता और लत पर निर्णायक अंकुश नहीं लग रहा, तो स्पष्ट है कि समस्या की जड़ें गहरी हैं। ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की’ जैसी स्थिति से बचने के लिए गिरफ्तारियों की संख्या से आगे बढ़कर नशे की आपूर्ति, वित्तीय नेटवर्क और राजनीतिक संरक्षण की पड़ताल करनी होगी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/rahul-gandhi-cjp-support-kejriwal-aap-india-alliance-punjab-politics" target="_blank" rel="noopener">Kejriwal की हरी झंडी के बाद Congress-CJP में हुई दोस्ती! क्या पंजाब चुनाव मिलकर लड़ेंगे कांग्रेस और AAP?</a></p><p>पाकिस्तान से लगी पंजाब की लगभग 553 किलोमीटर लंबी सीमा इस चुनौती को राष्ट्रीय सुरक्षा से जोड़ती है। ड्रोन के माध्यम से नशीले पदार्थों और हथियारों की तस्करी की आशंकाएं सीमा प्रबंधन को और जटिल बनाती हैं। वर्ष 2026 में अब तक पंजाब की सीमा से 183 ड्रोन जब्त किए जाने का उल्लेख इस खतरे की गंभीरता को रेखांकित करता है। सीमा पार से संचालित तस्करी के नेटवर्क पर प्रहार करना आवश्यक है, लेकिन सारी जिम्मेदारी बाहरी ताकतों पर डालकर राज्य के भीतर की कमजोरियों से आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। यदि स्थानीय तस्कर, संगठित गिरोह और भ्रष्ट तंत्र मिलकर काम कर रहे हों, तो सीमा पर कड़ी निगरानी के साथ-साथ भीतर भी कठोर कार्रवाई करनी होगी। ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने वाली जांच ही बता सकती है कि इस काले कारोबार में कौन मोहरा है, कौन खिलाड़ी और कौन पर्दे के पीछे बैठा सूत्रधार। आम आदमी पार्टी की पंजाब सरकार ने नशामुक्ति और तस्करों के विरुद्ध कार्रवाई को लेकर अनेक दावे किए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये दावे जमीन पर उतना परिवर्तन ला पाए हैं, जिसकी अपेक्षा पंजाब की जनता ने की थी? सत्ता में आने से पहले नशे के विरुद्ध निर्णायक लड़ाई के वादे करना आसान है, लेकिन उस लड़ाई को परिणाम तक पहुंचाना राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक ईमानदारी और निरंतर जवाबदेही मांगता है। यदि नशे की उपलब्धता बनी हुई है, युवा लगातार इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं और तस्करी के नेटवर्क बार-बार सक्रिय हो जाते हैं, तो सरकार की रणनीति और उसके क्रियान्वयन पर सवाल उठना स्वाभाविक है। केवल छापेमारी, गिरफ्तारी और घोषणाओं से नशामुक्त पंजाब का सपना साकार नहीं होगा। सरकार की सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि नशे की आपूर्ति कितनी घटी, कितने युवा उपचार के बाद सामान्य जीवन में लौटे और बड़े तस्करों तथा उनके संरक्षकों के विरुद्ध कितनी प्रभावी कार्रवाई हुई।</p><p>नशे के खिलाफ लड़ाई में पुलिस सुधार, आधुनिक तकनीक, सीमा सुरक्षा और वित्तीय जांच के साथ-साथ नशामुक्ति केंद्रों, मनोवैज्ञानिक परामर्श, रोजगार और पुनर्वास पर भी समान ध्यान देना होगा। नशे के शिकार युवाओं को केवल अपराधी मानकर खारिज करना समाधान नहीं है, उन्हें उपचार, सहारा और सम्मानजनक जीवन में लौटने का अवसर देना भी जरूरी है। गांवों में जनभागीदारी, स्कूल-कॉलेजों में जागरूकता और परिवारों की सक्रिय भूमिका इस अभियान को जनांदोलन का स्वरूप दे सकती है। साथ ही, पुलिस और राजनीतिक तंत्र में किसी भी स्तर पर संरक्षण देने वालों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। पंजाब को नशे की गिरफ्त से निकालना केवल सरकार का नहीं, पूरे समाज का दायित्व है, लेकिन नेतृत्व की पहली जवाबदेही सरकार की ही है। जब कानून के रखवाले ही संदेह के घेरे में आने लगें और करोड़ों की हेरोइन की बरामदगी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़े करे, तब आत्ममंथन टालना आत्मघाती होगा। ‘लकीर पीटने’ के बजाय अब निर्णायक परिणाम देने का समय है। पंजाब को खोखले नारों नहीं, कठोर कार्रवाई, पारदर्शी जांच और जवाबदेह शासन की जरूरत है। नशा माफिया की जड़ें उखाड़ने के लिए राजनीतिक संरक्षण की दीवारें तोड़नी होंगी और कानून का भय हर अपराधी तक पहुंचाना होगा। अन्यथा नशे का यह तांडव पंजाब की युवा शक्ति को ही नहीं, देश की सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा को भी गंभीर क्षति पहुंचाता रहेगा।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 12:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/drug-rampage-in-punjab-uniform-becomes-tragedy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मध्य प्रदेश में मामा Vs मुख्यमंत्री की जंग तेज! शिवराज सिंह चौहान के तीखे तेवर से राज्य की राजनीति गर्माई]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/shivraj-singh-chouhan-vs-mohan-yadav-madhya-pradesh-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मध्य प्रदेश की सियासत में इन दिनों फिर वही पुराना सवाल सिर उठाने लगा है कि क्या सूबे की राजनीति में शिवराज सिंह चौहान का दखल अब भी उतना ही दमदार है, या मुख्यमंत्री मोहन यादव अपनी अलग लकीर खींचने में जुटे हैं? ऊपर से सब कुछ भाजपा के अनुशासित कुनबे जैसा दिखता है, लेकिन बुधनी के कोसमी गांव से लेकर किसानों की मूंग खरीदी और लाड़ली बहना योजना तक, कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं, जिन्होंने भोपाल के सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है।</p><p>उल्लेखनीय है कि ताजा चिंगारी सीहोर जिले के कोसमी गांव से उठी है। यह वही इलाका है, जहां शिवराज सिंह चौहान की बरसों पुरानी राजनीतिक जमीन रही है। गांव में आदिवासी परिवारों के मकान हटाए जाने, फसलों को नुकसान पहुंचने और कुओं को मिट्टी से भरने की शिकायतों पर शिवराज ने अपनी ही पार्टी की सरकार के अधिकारियों को कठघरे में खड़ा कर दिया। उनका रुख साफ था कि सरकार किसी की भी हो, गरीब और आदिवासी परिवारों के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए। उन्होंने अधिकारियों पर कार्रवाई की मांग की और मुख्यमंत्री मोहन यादव से बात करने की बात कही।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/shivraj-singh-chouhan-mohan-yadav-mp-bjp-tribal-demolition-politics" target="_blank" rel="noopener">अपनी ही पार्टी की मध्य प्रदेश सरकार के खिलाफ Shivraj Singh Chouhan ने क्यों खोला मोर्चा? Madhya Pradesh BJP में सब ठीक है?</a></p><p>देखा जाये तो राजनीति में बात सिर्फ इतनी नहीं है कि किसी गांव में मकान टूटे और एक नेता ने नाराजगी जता दी। सवाल यह है कि शिवराज ने यह आवाज उस सरकार के खिलाफ उठाई है, जिसके मुखिया उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री हैं। मोहन यादव ने भी मामले को हल्के में नहीं लिया। उन्होंने मुख्य सचिव से जांच कराने और प्रभावित परिवारों के लिए अस्थायी आवास तथा भोजन की व्यवस्था करने की बात कही। दूसरी तरफ, कलेक्टर की रिपोर्ट में वन भूमि पर अतिक्रमण और सागौन के पौधों को नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आए। यानी मामला केवल सियासी बयानबाजी का नहीं, बल्कि वन संरक्षण, प्रशासनिक कार्रवाई और आदिवासी परिवारों के अधिकारों का भी है।</p><p>लेकिन मध्य प्रदेश की राजनीति में हर घटना का एक स्थानीय और एक राजनीतिक अर्थ होता है। कोसमी का मामला इसलिए भी चर्चा में है, क्योंकि शिवराज ने जिस इलाके में लंबे समय तक अपनी राजनीतिक पकड़ बनाई, वहीं की घटना पर उनका इस तरह सामने आना कई सवाल खड़े करता है। सवाल उठ रहा है कि क्या यह केवल अपने पुराने मतदाताओं के प्रति जवाबदेही है, या इसके पीछे भोपाल की सत्ता के साथ तालमेल का कोई बड़ा सवाल भी छिपा है?</p><p>इस कहानी का दूसरा सिरा लाड़ली बहना योजना से भी जुड़ता है। शिवराज की राजनीति की पहचान बनी इस योजना ने प्रदेश में महिलाओं के बीच उनकी अलग छवि बनाई। अब मुख्यमंत्री मोहन यादव की ओर से योजना के खर्च को भारी बताने वाली टिप्पणी ने पुरानी राजनीतिक विरासत और मौजूदा सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं पर बहस छेड़ दी है। शिवराज के लिए यह योजना महज सरकारी खर्च का हिसाब नहीं, उनकी राजनीतिक पहचान का भी हिस्सा है। वहीं, मौजूदा सरकार के सामने बजट, दूसरी योजनाओं और विकास कार्यों के बीच संतुलन बैठाने की चुनौती है।</p><p>तीसरा मोर्चा किसानों का है। मूंग की खरीदी को लेकर जब किसान परेशान हुए, तब केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखकर खरीद तेज करने की मांग की। राज्य सरकार को आखिरकार खरीदी बढ़ाने की मांग पर सहमति देनी पड़ी। देखा जाये तो यहां भी तस्वीर दिलचस्प है। केंद्र में मंत्री शिवराज, राज्य में मुख्यमंत्री मोहन यादव और बीच में किसान, जिनकी फसल और भुगतान का सवाल सीधे सरकार की जवाबदेही से जुड़ा है। शिवराज का हस्तक्षेप किसानों के लिए मददगार हो सकता है, लेकिन राजनीतिक तौर पर यह राज्य सरकार पर दबाव भी बनाता है।</p><p>यही वजह है कि शिवराज बनाम मोहन की चर्चा बार-बार लौट आती है। एक तरफ शिवराज हैं, जिनकी पहचान लंबे मुख्यमंत्री कार्यकाल, जनकल्याणकारी योजनाओं और प्रदेश के गांव-गांव में बने पुराने संपर्कों से जुड़ी है। दूसरी तरफ मोहन यादव हैं, जिन्हें अपनी सरकार की नीतियों, प्रशासनिक फैसलों और नेतृत्व की अलग पहचान स्थापित करनी है। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं, मगर प्रदेश की राजनीति में उनका असर एक-दूसरे से पूरी तरह अलग नहीं किया जा सकता।</p><p>फिर भी, हर मतभेद को मुख्यमंत्री की कुर्सी की लड़ाई मान लेना जल्दबाजी होगी। भाजपा में संगठन का अपना अनुशासन और केंद्रीय नेतृत्व की भूमिका है। अभी तक सामने आई घटनाएं प्रशासन, किसान नीति और राजनीतिक विरासत पर मतभेद दिखाती हैं; मगर वे किसी औपचारिक सत्ता-संघर्ष को साबित नहीं करतीं।</p><p>फिलहाल मध्य प्रदेश की राजनीति का असली इम्तिहान बयानों से आगे होगा। कोसमी की जांच में क्या कार्रवाई होती है, प्रभावित परिवारों को क्या राहत मिलती है, लाड़ली बहना योजना को लेकर राज्य सरकार क्या फैसला करती है और किसानों की खरीदी व्यवस्था कितनी दुरुस्त होती है, इन सवालों के जवाब ही आगे की तस्वीर साफ करेंगे।</p><p>बहरहाल, भोपाल की सियासत में मामा शिवराज की हुंकार अब भी गूंज रही है, तो मुख्यमंत्री मोहन यादव भी अपने फैसलों से सत्ता पर अपनी पकड़ और नेतृत्व की लकीर खींचने में जुटे हैं। दोनों के बीच सियासी खिंचाव की आहट साफ सुनाई दे रही है, लेकिन इसे खुली जंग का नाम देना अभी जल्दबाजी होगी। असली तस्वीर तब खुलेगी जब यह सामने आये कि कोसमी के मामले में सरकार के कदम क्या होते हैं, लाड़ली बहना योजना पर क्या रुख अपनाया जाता है और किसानों के सवाल पर किसका पलड़ा भारी पड़ता है। क्योंकि मध्य प्रदेश की राजनीति में सियासी इरादे सिर्फ बयानों से जाहिर नहीं होते, उनका असली रंग फैसलों में दिखता है। भोपाल में फिलहाल बयान गूंज रहे हैं, लेकिन निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि अगली चाल कौन चलता है और बाजी किस करवट बैठती है?</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 12:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/shivraj-singh-chouhan-vs-mohan-yadav-madhya-pradesh-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आखिर हुतियों को नियंत्रित करने में सऊदी अरब, अमेरिका और ‘इस्लामिक नाटो’ क्यों विफल प्रतीत हो रहे हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/saudi-the-us-and-the-islamic-nato-appear-to-be-failing-in-their-efforts-to-contain-the-houthis]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>खाड़ी देशों में ईरान पर जोरदार हमला करके अमेरिका-इजरायल ने जो आग भड़काई, उसकी भारी कीमत आज उसके समर्थक चुका रहे हैं। जब ईरान ने अपनी सधी हुई रणनीति से और रूस व चीन के बल पर अमेरिका-इजरायल को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया, तो उन्होंने अपनी सैन्य कार्रवाई रोक ली। इधर ईरान समर्थित यमन के हूती विद्रोहियों ने जब सऊदी को निशाने पर लिया और ताबड़तोड़ हमले शुरू किए, तो उनके विरुद्ध अमेरिका, सऊदी अरब और इस्लामिक नाटो की सैन्य क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। आधुनिक हथियारों, उन्नत वायु रक्षा प्रणालियों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बावजूद हूती विद्रोही सऊदी अरब के लिए सुरक्षा चुनौती बने हुए हैं।</p><p>जिस तरह से अक्टूबर 2026 में रियाद के किंग खालिद अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर हमले हुए और लाल सागर के समुद्री मार्गों को लेकर &nbsp;तनाव बढ़ा, उसने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। आइए हम आपको इसके पीछे के दस अहम सवाल समझाएंगे, जो आगे दिए हुए हैं। इससे पहले एक मीडिया की 12–13 अक्टूबर की रिपोर्टों में सऊदी हवाई सुरक्षा की कमजोरियों और हूतियों की बढ़ती क्षमताओं का उल्लेख किया गया है, उसकी चर्चा करते हैं। यही वजह है कि इस संकट को समझने के लिए तीन सवाल महत्त्वपूर्ण हैं:-</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/world-new-shouthis-attack-saudi-arabia-riyadh-airport-aramco-us-iran-war" target="_blank" rel="noopener">Prabhasakshi NewsRoom: Saudi Arabia पर Houthis के हमले और तेज होते ही Trump ने दी युद्ध की चेतावनी, जवाब में हूतियों ने अमेरिका को फटकारा</a></p><p>एक, अमेरिका जैसी महाशक्ति हूतियों को निर्णायक रूप से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रही है? शायद इसलिए कि उनके ऊपर ईरान और ईरान के ऊपर रूस व चीन का हाथ है। सभी मिलकर खाड़ी देशों से अमेरिकी पांव उखाड़ना चाहते हैं। इसलिए अमेरिका बेबस है।</p><p>दो, सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच बने नए रक्षा समझौते की वास्तविक उपयोगिता क्या है? दरअसल, यह अमेरिकी इशारे पर भारत के विरुद्ध बनवाया गया संगठन है। लेकिन इनकी आर्थिक और सैन्य क्षमता ईरान से सीधा टकराने की नहीं है। अब जान चुके हैं कि जो देश अमेरिका को पीछे हटने पर मजबूर कर सकता है, वह देश इन अमेरिकी पिल्लों को पल भर में दबोच कर शिया शासन के अधीन मिला लेगा। किसी भी लड़ाई में सारे मोर्चे एक साथ नहीं खोले जाते, बल्कि एक एक कर दुर्लभ लक्ष्य साधा जाता है। ईरान और उसके प्रॉक्सी शिया संगठनों की रणनीति यही है।</p><p>तीन, सऊदी अरब के पास सैन्य कार्रवाई के अलावा कौन-कौन से विकल्प हैं? चूंकि अमेरिका व इजरायल सऊदी अरब का साथ छोड़ चुके हैं, इसलिए अब वह रूस को माध्यम बनाकर ईरान के शरणागत हो जाए। साथ ही तमाम अमेरिका सैन्य अड्डों को खाली करवा ले। इससे ईरान खुद को सुरक्षित महसूस करेगा। यदि वह सुन्नी मुल्कों पाकिस्तान व तुर्कीये के भ्रमजाल में फंसेगा तो बर्बादी भी होगी और सत्ता पलट भी होगा।</p><p>अब आइए दस मौलिक सवालों से इस वैश्विक समस्या के समाधान को ढूंढने की कोशिश करते हैं, जहां पर हर पक्ष के संतुलन को दर्शाने की कोशिश की गई है।</p><p>पहला सवाल यह है कि हूतियों को नियंत्रित करना इतना कठिन क्यों है? तो जवाब होगा कि सैन्य शक्ति और युद्ध के परिणाम में अंतर होता है। अमेरिका और सऊदी अरब के पास आधुनिक सैन्य संसाधन हैं, लेकिन किसी सशस्त्र संगठन को पराजित करना केवल हथियारों की श्रेष्ठता का प्रश्न नहीं है, बल्कि सैनिकों में मजबूत राष्ट्रीय जज्बा भी होना चाहिए जो अबतक दिखा नहीं। हूती आंदोलन ने यमन के गृहयुद्ध के दौरान सैन्य अनुभव हासिल किया है। वह देश के बड़े हिस्से में अपना प्रभाव बनाए हुए है और उसके पास मिसाइल तथा ड्रोन जैसी क्षमताएँ हैं। एक ताजा विश्लेषण के अनुसार, हूतियों की चुनौती के पीछे अपेक्षाकृत कम लागत वाली सैन्य तकनीक, ईरान से मिली तकनीकी सहायता, स्थानीय समर्थन और विरोधी पक्षों के बीच मतभेद जैसे कारक हैं। दरअसल किसी देश की सैन्य श्रेष्ठता अपने आप यह सुनिश्चित नहीं करती कि वह अपने राजनीतिक उद्देश्यों को भी प्राप्त कर लेगा।</p><p>दूसरा सवाल है कि कम लागत वाले हमले और महँगी सुरक्षा व्यवस्था के बीच भी सऊदी अरब पर हुती क्यों भारी पड़ रहा है? शायद इसलिए कि हूती संकट का एक महत्त्वपूर्ण पहलू आर्थिक है। ड्रोन और अन्य अपेक्षाकृत सस्ते साधनों से खतरा उत्पन्न किया जा सकता है। हमलों को रोकने के लिए अत्याधुनिक निगरानी और वायु रक्षा व्यवस्था की आवश्यकता पड़ती है। लगातार हमलों की आशंका के कारण नागरिक विमानन, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और व्यापारिक गतिविधियों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि सऊदी अरब की रक्षा व्यवस्था पूरी तरह विफल हो गई है, बल्कि हालिया घटनाएँ यह सवाल उठाती हैं कि क्या उसकी मौजूदा व्यवस्था सभी प्रकार के हमलों से पर्याप्त सुरक्षा दे पा रही है। मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अधिकारी रियाद हवाई अड्डे पर हुए हमले के दौरान सुरक्षा व्यवस्था में आई कमियों की जाँच कर रहे हैं।</p><p>तीसरा सवाल यह है कि यमन का भूगोल और राजनीतिक परिस्थितियाँ हुतियों की मदद कर रही हैं। यमन की भौगोलिक परिस्थितियाँ और लंबे समय से जारी राजनीतिक अस्थिरता इस समस्या को जटिल बनाती हैं।<br>हूती आंदोलन को केवल बाहरी सैन्य शक्ति से नियंत्रित करने की कोशिश में स्थानीय राजनीतिक समीकरणों की अनदेखी नहीं की जा सकती। यमन में एक ओर हूतियों का प्रभाव है, तो दूसरी ओर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार और दूसरे स्थानीय राजनीतिक तथा सैन्य समूह हैं। इन सभी के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। इसलिए हूतियों के विरुद्ध कार्रवाई और यमन में स्थायी राजनीतिक व्यवस्था स्थापित करना दो अलग-अलग चुनौतियाँ हैं।</p><p>चौथा सवाल है कि आखिर इसके पीछे ईरान की भूमिका क्या है? तो जवाब होगा कि हूती आंदोलन को ईरान से समर्थन और तकनीकी सहायता मिलने की बात लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विश्लेषणों में सामने आती रही है। लेकिन हूतियों को केवल ईरान का निर्देश मानकर चलना भी अधूरा विश्लेषण होगा। एक अध्ययन के अनुसार, ईरान और हूतियों के हित कई मामलों में एक-दूसरे से मेल खाते हैं, लेकिन हूतियों के अपने स्थानीय राजनीतिक उद्देश्य भी हैं। इसका कूटनीतिक अर्थ यह है कि ईरान के साथ बातचीत उपयोगी हो सकती है, लेकिन उससे हूतियों के सभी निर्णय स्वतः नियंत्रित हो जाएँगे, इसकी गारंटी नहीं है।</p><p>पांचवां सवाल यह है कि आखिर अमेरिका हूतियों को निर्णायक रूप से नियंत्रित क्यों नहीं कर पा रहा? तो जवाब होगा कि अमेरिका की स्थिति में एक महत्त्वपूर्ण विरोधाभास है: वह सऊदी अरब की सुरक्षा में सहयोग करना चाहता है, लेकिन यमन में एक और व्यापक युद्ध में उलझने से भी बचना चाहता है। इसके पीछे कुछ कारण हैं:-</p><p>एक, सैन्य कार्रवाई की सीमाएँ: हूती ठिकानों पर हवाई हमले उनकी क्षमताओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन हवाई कार्रवाई अपने आप किसी संगठन का राजनीतिक नियंत्रण समाप्त नहीं करती। अतीत के अनुभवों से भी स्पष्ट है कि लंबे सैन्य अभियान के बावजूद हूती आंदोलन को समाप्त नहीं किया जा सका। इसलिए अमेरिका के सामने केवल हमले करने का प्रश्न नहीं, बल्कि यह भी है कि सैन्य कार्रवाई के बाद स्थायी सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाए?</p><p>दो, अमेरिका की प्राथमिकताएँ: एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार, सऊदी अरब ने हूतियों के विरुद्ध प्रस्तावित अभियान में अमेरिकी हवाई हमलों का समर्थन माँगा था, लेकिन उस समय वाशिंगटन ने प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई में शामिल होने से इनकार किया। रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका खुफिया जानकारी और अन्य सहायता देता रहा। इससे संकेत मिलता है कि अमेरिका की सहायता और उसकी प्रत्यक्ष युद्ध में भागीदारी अलग-अलग विषय हैं। वाशिंगटन के लिए व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का जोखिम, सैन्य संसाधनों पर दबाव और दूसरे मोर्चों पर उसकी प्राथमिकताएँ महत्त्वपूर्ण कारक हैं।</p><p>तीन, लाल सागर का सामरिक महत्त्व: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जलडमरूमध्य अंतरराष्ट्रीय व्यापार के महत्त्वपूर्ण मार्ग हैं। यदि इन मार्गों पर जहाजों की आवाजाही बाधित होती है, तो उसका असर केवल सऊदी अरब पर नहीं, बल्कि वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं, माल ढुलाई की लागत और ऊर्जा व्यापार पर भी पड़ता है। एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि लाल सागर की सुरक्षा को लेकर बढ़ता संकट अंतरराष्ट्रीय समुद्री सहयोग को कमजोर कर सकता है। अमेरिका की दुविधा यह है कि उसे समुद्री व्यापार और अपने सहयोगियों की सुरक्षा करनी है, लेकिन ऐसी कार्रवाई से बचना भी है जो संघर्ष को और व्यापक बना दे।</p><p>छठा सवाल है कि क्या ‘इस्लामिक नाटो’ हूतियों को रोक सकता है? तो यहाँ पर एक महत्त्वपूर्ण तथ्यात्मक अंतर समझना आवश्यक है। वह यह कि अगस्त 2026 में सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये ने मक्का में एक संयुक्त रक्षा समझौता किया, जिसे भारत विरोधी माना गया। इस समझौते में एक हस्ताक्षरकर्ता पर सशस्त्र हमला अन्य हस्ताक्षरकर्ताओं पर हमले के रूप में देखने का प्रावधान है। मीडिया और राजनीतिक चर्चाओं में इस व्यवस्था को कभी-कभी ‘इस्लामिक नाटो’ कहा जा रहा है। लेकिन इसे नाटो के समान संस्थागत, सैन्य और परिचालन क्षमता वाला संगठन मान लेना अभी उचित नहीं होगा। क्योंकि इस गठबंधन की अपनी संभावनाएँ हैं:-</p><p>एक, सामूहिक प्रतिरोध का संदेश: यदि सदस्य देशों की प्रतिबद्धता विश्वसनीय होती है, तो किसी एक सदस्य पर हमले की राजनीतिक कीमत बढ़ सकती है।</p><p>दो, सुरक्षा सहयोग: सदस्य देशों के बीच खुफिया जानकारी, प्रशिक्षण और सुरक्षा समन्वय में सहयोग बढ़ सकता है। हालांकि इन क्षेत्रों में वास्तविक सहयोग कितना विकसित हुआ है, इसका आकलन उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर करना होगा।</p><p>तीन, सऊदी अरब के लिए अतिरिक्त कूटनीतिक विकल्प: रियाद को अमेरिका पर अपनी सुरक्षा संबंधी निर्भरता कम करने की दिशा में नए साझेदार मिल सकते हैं। फिर भी तीन बड़ी चुनौतियाँ हैं:- एक, अलग-अलग राष्ट्रीय हित: प्रत्येक देश यह तय कर सकता है कि किसी संकट में उसकी भागीदारी कितनी और किस प्रकार की होगी। दो, समझौते का व्यावहारिक क्रियान्वयन: पारस्परिक रक्षा की घोषणा अपने आप संयुक्त सैन्य कार्रवाई सुनिश्चित नहीं करती। तीन, क्षेत्रीय संघर्ष का जोखिम&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;किसी सैन्य कार्रवाई से ईरान और अन्य क्षेत्रीय पक्षों के साथ तनाव बढ़ सकता है। एक मीडिया विश्लेषण ने भी इस गठबंधन की वास्तविक प्रभावशीलता और उसके सामने मौजूद चुनौतियों पर प्रश्न उठाए थे। वास्तव में यह समझौता सऊदी अरब की सुरक्षा कूटनीति में एक नया आयाम है, लेकिन इसे हूती समस्या का स्वतः समाधान नहीं माना जा सकता।</p><p>सातवां सवाल है कि सऊदी अरब के सामने अब क्या विकल्प हैं? तो जवाब होगा कि सऊदी अरब के सामने मुख्य चुनौती यह है कि वह अपनी जनता, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करे, जबकि एक और लंबा युद्ध शुरू करने के जोखिम को भी ध्यान में रखे। लिहाजा उसके सामने पाँच प्रमुख विकल्प हैं:-</p><p>एक, सैन्य दबाव बढ़ाना: सऊदी अरब यमन की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार के साथ मिलकर हूतियों पर सैन्य दबाव बढ़ा सकता है। इस विकल्प का उद्देश्य हूतियों की हमले करने की क्षमता को सीमित करना और विवादित क्षेत्रों पर नियंत्रण से संबंधित परिस्थितियों को बदलना होगा। इससे संभावित लाभ यह होगा कि हूतियों की सैन्य गतिविधियों पर दबाव बढ़ सकता है। जबकि जोखिम यह है कि संघर्ष लंबा खिंच सकता है, नागरिकों को नुकसान पहुँच सकता है और सऊदी अरब के भीतर हमलों का खतरा बढ़ सकता है।मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, सऊदी अरब नेतृत्व यमन की सरकारी सेनाओं के साथ अभियान की योजना बना रहा था। उस समय अमेरिकी सेना की प्रत्यक्ष भागीदारी सुनिश्चित नहीं थी। इसलिए केवल सैन्य अभियान की घोषणा को सफलता का प्रमाण नहीं माना जा सकता है।</p><p>दो, अमेरिका पर निर्भरता के साथ-साथ अन्य साझेदारों से सहयोग: सऊदी अरब अमेरिका के साथ अपने सुरक्षा संबंध बनाए रखते हुए पाकिस्तान, तुर्किये और दूसरे सहयोगियों के साथ सहयोग बढ़ा सकता है। लेकिन नए रक्षा समझौतों की वास्तविक उपयोगिता इस बात पर निर्भर करेगी कि सदस्य देश किस प्रकार की सहायता देने को तैयार हैं और उनके बीच व्यावहारिक समन्वय कितना है। यहाँ उद्देश्य केवल गठबंधन का विस्तार करना नहीं, बल्कि सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था को अधिक विश्वसनीय बनाना होगा।</p><p>तीन, ईरान के साथ कूटनीतिक संवाद बनाना: हूती संकट का एक महत्त्वपूर्ण आयाम ईरान-सऊदी अरब संबंध भी हैं। यदि दोनों देश क्षेत्रीय तनाव कम करने, यमन में राजनीतिक समाधान और हमलों को रोकने के लिए संवाद आगे बढ़ाते हैं, तो इससे संघर्ष के विस्तार का जोखिम घट सकता है।</p><p>हालाँकि, ईरान से बातचीत की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वह कितना प्रभाव डाल सकता है और हूती नेतृत्व किन शर्तों को स्वीकार करता है। यहां पर कूटनीतिक चुनौती यह है कि ऐसा समझौता खोजना जो सऊदी अरब की सुरक्षा चिंताओं को संबोधित करे, लेकिन यमन के भीतर राजनीतिक समाधान की संभावना भी बनाए रखे।</p><p>चार, समुद्री सुरक्षा को अंतरराष्ट्रीय सहयोग से मजबूत करना: लाल सागर की सुरक्षा केवल सऊदी अरब की समस्या नहीं है। इसलिए वह अन्य देशों के साथ समुद्री निगरानी, वाणिज्यिक जहाजों की सुरक्षा, सूचना साझा करने और संकट के समय समन्वित प्रतिक्रिया पर काम कर सकता है। चैथम हाउस ने मौजूदा बहुराष्ट्रीय समुद्री अभियानों और सहयोग को मजबूत करने की संभावनाओं का उल्लेख किया है। इस विकल्प का महत्त्व इसलिए है क्योंकि समुद्री व्यापार की सुरक्षा के लिए हूती आंदोलन के साथ पूरे संघर्ष का सैन्य समाधान निकालना अनिवार्य नहीं है।</p><p>पांच, यमन में राजनीतिक समाधान की दिशा में प्रयास: यह विकल्प तत्काल राजनीतिक रूप से कठिन हो सकता है, लेकिन स्थायी शांति के लिए इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। संयुक्त राष्ट्र ने सितंबर 2026 में हूतियों के हमलों की निंदा करते हुए सभी पक्षों से अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून का पालन करने और यमन के नेतृत्व में समावेशी राजनीतिक समाधान की दिशा में काम करने का आग्रह किया था। राजनीतिक समाधान में युद्धविराम, नागरिकों की सुरक्षा, मानवीय सहायता, बंदियों के प्रश्न और यमन की भविष्य की शासन-व्यवस्था जैसे विषय शामिल हो सकते हैं। इस प्रक्रिया में कठिन बातचीत और आपसी समझौते की आवश्यकता होगी।</p><p>आठवां सवाल है कि सऊदी अरब के विकल्पों की तुलना किससे और कैसे की जा सकती है? इस विकल्प के संभावित लाभ, प्रमुख जोखिम या सीमा स्पष्ट हैं। जहां तक सैन्य दबाव&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;की बात है तो हूतियों की क्षमताओं पर दबाव लंबा युद्ध और नागरिक नुकसान पहुंचा सकता है। अमेरिका के साथ सहयोग, मौजूदा सुरक्षा साझेदारी का लाभ, अमेरिकी प्रत्यक्ष भागीदारी की अनिश्चितता, पाकिस्तान-तुर्किये सहित नए साझेदार सुरक्षा सहयोग का विस्तार और समझौते की वास्तविक क्षमता अभी परखी जानी है। लिहाजा ईरान के साथ संवाद क्षेत्रीय तनाव कम करने की संभावना बढ़ा सकता है। ईरान का प्रभाव सीमित हो सकता है, लेकिन बहुराष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा में सहयोग व्यापक राजनीतिक संघर्ष का समाधान नहीं हो सकता। इसलिए यमन में राजनीतिक समझौता और स्थायी शांति की संभावना, कठिन वार्ता और परस्पर अविश्वास को दूर करके ही हासिल की जा सकती है। यह तुलना किसी एक विकल्प को सर्वश्रेष्ठ घोषित नहीं करती, बल्कि प्रत्येक विकल्प अलग समस्या का समाधान करने का प्रयास करता है और उसके परिणाम परिस्थितियों पर निर्भर होंगे।</p><p>नौवां सवाल है कि भारत के लिए इस संकट के क्या मायने हैं? तो जवाब होगा कि भारत के लिए यह संकट तीन प्रमुख कारणों से महत्त्वपूर्ण है:-</p><p>एक, ऊर्जा सुरक्षा: सऊदी अरब भारत के लिए एक महत्त्वपूर्ण ऊर्जा साझेदार है। क्षेत्रीय संघर्ष से तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव पड़ सकता है।</p><p>दो, समुद्री व्यापार: लाल सागर और बाब-अल-मंदेब में अस्थिरता से भारत और यूरोप के बीच व्यापारिक जहाजों के मार्ग, परिवहन लागत और माल पहुँचने के समय पर प्रभाव पड़ सकता है।</p><p>तीन, भारतीय नागरिकों की सुरक्षा: पश्चिम एशिया में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। क्षेत्रीय तनाव बढ़ने पर उनकी सुरक्षा और आवश्यकता पड़ने पर निकासी की तैयारी महत्त्वपूर्ण हो जाती है। इसलिए भारत के हित में समुद्री मार्गों की सुरक्षा, क्षेत्रीय तनाव में कमी और सभी संबंधित पक्षों के साथ संवाद बनाए रखना है।</p><p>दसवां सवाल है कि क्या सऊदी अरब को सैन्य रणनीति बदलनी होगी? तो जवाब होगा कि हूतियों के साथ जारी संघर्ष यह दिखाता है कि सैन्य संसाधनों की प्रचुरता और राजनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के बीच सीधा संबंध नहीं है। अमेरिका की प्रत्यक्ष सैन्य भागीदारी की सीमाएँ, हूतियों की अपनी राजनीतिक और सैन्य संरचना, ईरान का समर्थन तथा यमन की जटिल आंतरिक परिस्थितियाँ इस संकट को लगातार कठिन बना रही हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान और तुर्किये के साथ सऊदी अरब का नया रक्षा समझौता सुरक्षा सहयोग के नए अवसर प्रस्तुत करता है, लेकिन उसकी वास्तविक प्रभावशीलता समय और परिस्थितियों के साथ ही स्पष्ट होगी।</p><p>सऊदी अरब के लिए सबसे महत्त्वपूर्ण प्रश्न केवल यह नहीं है कि हूतियों पर सैन्य दबाव कैसे बढ़ाया जाए, बल्कि यह भी है कि अपने नागरिकों, ऊर्जा प्रतिष्ठानों और समुद्री व्यापार की सुरक्षा करते हुए यमन में ऐसा राजनीतिक समाधान कैसे खोजा जाए जो बार-बार युद्ध की स्थिति पैदा होने से रोके। वस्तुतः इस संकट का आकलन तीन कसौटियों पर करना उपयोगी होगा: सऊदी अरब की सुरक्षा, लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय व्यापार की निर्बाध आवाजाही और यमन में स्थायी शांति की संभावनाएँ। इसको साधे बिना हर सैन्य कार्रवाई व वैश्विक कूटनीतिक &nbsp;अधूरी रहेगी।</p><p>- कमलेश पांडेय<br>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 12:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/saudi-the-us-and-the-islamic-nato-appear-to-be-failing-in-their-efforts-to-contain-the-houthis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अनियंत्रित भीड़ को 'शिव बारात' की उपमा देकर राहुल गांधी ने हिंदू भावनाओं को पहुँचाई ठेस!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/rahul-gandhi-shiv-baraat-remark-sanatan-dharma-controversy]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भले ही राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर 2026 को दिल्ली में अपने राजनीतिक मार्च को ‘शिव बारात’ कहकर केवल एक उपमा दी हो, लेकिन सवाल यह है कि क्या भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र धार्मिक प्रसंग को राजनीतिक विरोध-प्रदर्शन के लिए इस्तेमाल करना उचित था? जिस बारात का संबंध देवाधिदेव महादेव और माता पार्वती के दिव्य विवाह से है, उसे एक राजनीतिक आंदोलन का नाम देते समय क्या उसकी धार्मिक गरिमा और करोड़ों श्रद्धालुओं की भावनाओं का ध्यान नहीं रखा जाना चाहिए था?</p><p>हम आपको याद दिला दें कि लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने निर्वाचन आयोग और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण से जुड़े मुद्दों पर विपक्ष के मार्च के दौरान कहा था कि यह शिव की बारात है, इसमें कोई भी शामिल हो सकता है। उन्होंने आंदोलन की तुलना भगवान शिव के तांडव से भी की थी। उनका आशय आंदोलन को स्वतःस्फूर्त और सबके लिए खुला बताना था। लेकिन इसी बयान ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल पर विवाद खड़ा कर दिया है। विश्व हिंदू परिषद ने उनकी टिप्पणी की आलोचना करते हुए सार्वजनिक माफी की माँग की है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/ajay-rai-bjp-joining-speculation-up-congress-office-clash-2026" target="_blank" rel="noopener">UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई!</a></p><p>देखा जाये तो यहाँ सवाल केवल एक उपमा का नहीं, बल्कि उस धार्मिक प्रतीक के अर्थ का है जिसे भारतीय समाज में विशेष श्रद्धा के साथ देखा जाता है। राहुल गांधी को शायद पता नहीं कि शिव बारात कोई सामान्य जुलूस नहीं है। शिवपुराण की रुद्रसंहिता के पार्वतीखंड में भगवान शिव की विवाह-यात्रा का विस्तृत वर्णन मिलता है। अध्याय 40 में शिव की बारात का प्रसंग है। इसके बाद विवाह की तैयारियों, शिव के हिमालय पहुँचने और विवाह-संस्कार का वर्णन आगे के अध्यायों में आता है। अध्याय 48 में पुरोहितों द्वारा तिथि आदि बताए जाने और शुभ समय आने के बाद विवाह-संस्कार प्रारंभ होने का उल्लेख है।</p><p>शिव बारात का धार्मिक महत्त्व इसी दिव्य विवाह से जुड़ा है। इसमें शिवगणों, नंदी, देवताओं और ऋषियों की सहभागिता का वर्णन मिलता है। लोकपरंपरा में भूत-प्रेत और विचित्र रूप वाले गणों के चित्रण ने इस बारात को एक विशिष्ट पहचान दी है। यह शिव के उस स्वरूप की याद दिलाता है जो बाहरी रूप, वैभव और सामाजिक प्रतिष्ठा की सीमाओं से परे है। इसीलिए शिव बारात को केवल लोगों की भीड़, नारेबाजी या किसी राजनीतिक आंदोलन के लिए सुविधाजनक उपमा मान लेना श्रद्धालुओं को असहज कर सकता है। धार्मिक प्रतीक की अपनी गरिमा होती है और उसका इस्तेमाल किस संदर्भ में किया जा रहा है, यह महत्त्वपूर्ण है।</p><p>साथ ही यहां यह सवाल भी उठता है कि क्या शिव बारात किसी भी दिन निकल सकती है? देखा जाये तो हिंदू धर्म में धार्मिक पर्व, विवाह-संस्कार और शोभायात्रा के अपने अलग-अलग नियम और परंपराएँ हैं। महाशिवरात्रि भगवान शिव की आराधना का सबसे प्रमुख पर्व है। इस अवसर पर देशभर में शिव बारात निकाली जाती है और शिव-पार्वती विवाह की झाँकियाँ सजाई जाती हैं। वहीं, शास्त्रोक्त विवाह-संस्कार में तिथि, पंचांग और शुभ मुहूर्त का विशेष महत्त्व होता है। शिवपुराण में भी शिव-पार्वती विवाह के प्रसंग में तिथि और शुभ समय का उल्लेख मिलता है। साथ ही परम्परागत रूप से शिव बारात महाशिवरात्रि के दिन ही निकाली जाती है और देश में शायद ही किसी अन्य दिवसों पर शिव बारात का आयोजन होता हो। सामान्य धार्मिक शोभायात्रा किसी स्थानीय उत्सव या मंदिर की परंपरा के अनुसार अन्य अवसरों पर भी निकाली जा सकती है। इसके विपरीत, यदि आयोजन को विधिवत शिव-विवाह या किसी विशिष्ट पर्व का शास्त्रोक्त अनुष्ठान बताया जा रहा है, तो संबंधित तिथि, पूजा-विधान, मुहूर्त और परंपरा का पालन अपेक्षित है।</p><p>साथ ही राहुल गांधी को यह भी समझना चाहिए कि भगवान शिव की बारात में धक्के मारने या कोहनी से दूसरों को मारने या किसी को कॉलर पकड़ कर पीछे धकेलने की कोई परम्परा नहीं है। शिव बारात में भक्ति, श्रद्धा और उत्सव का भाव होता है, न कि किसी को धक्का देने या कोहनी मारकर आगे बढ़ने का। भले ही राहुल गांधी की उपमा का उद्देश्य अपने राजनीतिक मार्च को सबके लिए खुला बताना रहा हो, लेकिन सवाल यह है कि इसके लिए भगवान शिव की बारात जैसे पवित्र प्रसंग को ही क्यों चुना गया? क्या एक राजनीतिक आंदोलन में शामिल भीड़ की तुलना शिव बारात से करना उचित था? और क्या ऐसी तुलना शिव बारात की धार्मिक छवि को एक अनियंत्रित भीड़ के रूप में प्रस्तुत नहीं करती?</p><p>बहरहाल, राहुल गांधी के इस बयान ने धार्मिक प्रतीकों के राजनीतिक इस्तेमाल और सनातन परंपराओं के प्रति संवेदनशीलता को लेकर एक गंभीर बहस छेड़ दी है। देखा जाये तो लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध का अधिकार सभी को है, लेकिन उस विरोध को व्यक्त करने के लिए करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़े प्रतीकों का इस्तेमाल करते समय उनकी गरिमा का ध्यान रखना भी उतना ही आवश्यक है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 13:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/rahul-gandhi-shiv-baraat-remark-sanatan-dharma-controversy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Narendra Modi की सियासत के 25 साल: Indian Politics में कैसे स्थापित हुआ 'मोदी मार्ग'?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/25-years-of-narendra-modi-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सात अक्टूबर 2001 को नरेंद्र मोदी ने जब गुजरात के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी, तब कोई नहीं सोच रहा था कि मोदी एक साल का भी कार्यकाल पूरा कर पाएंगे। राजनीतिक जानकारों और गुजरात के लोगों की इस सोच के पीछे कुछ खास वजहें भी थीं। मोदी के गुजरात का सरदार बनने से पहले के पांच वर्षों में राज्य में एक-एक करके चार मुख्यमंत्री आए और चले गए थे। मोदी राज्य के किसी ताकतवर जाति समुदाय से भी नहीं हैं और सबसे बड़ी बात कि मुख्यमंत्री बनने से पहले उन्होंने कोई चुनाव भी नहीं लड़ा था। हां, पर्दे के पीछे की राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी के तौर पर वे स्थापित थे। इतना ही नहीं, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर राज्यों के बीजेपी प्रभारी के रूप में भी अपनी सियासी समझ का भी वे लोहा मनवा चुके थे। लेकिन वक्त के साथ, मोदी ने सभी आशंकाओं को ना सिर्फ खारिज कर दिया है, बल्कि चौथाई सदी तक लगातार सत्ता का केंद्र बिंदु रहने वाले वाली शख्सियत भी बन चुके हैं। इसके पहले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेता ज्योति बसु के नाम देश में सबसे लंबे समय यानी करीब 23 साल सत्ता संभालने का रिकॉर्ड था। मोदी उस रिकॉर्ड से भी काफी आगे बढ़ चुके हैं।</p><p>हाल के दिनों में एक वरिष्ठ हिंदी पत्रकार मोदी मार्ग की अवधारणा देकर आलोचनाओं के केंद्र में हैं। मोदी मार्ग की चर्चा हो तो वामपंथी तो सांड़ की तरह भड़केंगे ही, वे समाजवादी भी वरिष्ठ पत्रकार के आलोचक हो गए हैं, जो कभी उनके सहयोगी रहे या वे उनके साथी रहे। बेशक मोदी मार्ग की इन दिनों आलोचना हो रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब नरेंद्र मोदी का अपना और उनके दौर के भारत का इतिहास लिखा जाएगा, निश्चित तौर पर मोदी मार्ग या मोदीत्व की अवधारणा को भी स्वीकार किया जाएगा। किसी शख्सियत के जरिए शुरू पंथ या वैचारिक धारा को उसके जीवन काल में सर्व मान्यता और स्वीकार्यता कम ही मिल पाती है। लेकिन जब वही शख्सियत इतिहास की धारा में विलीन हो जाती है, तो उसकी दिखाई राहों को पंथ का दर्जा मिलने लगता है। गांधी बेशक अपनी जिंदगी में ही महात्मा के रूप में स्थापित हो चुके थे, लेकिन उनके कई प्रयोगों की उसी तरह आलोचनाएं होती रहीं, जैसे आज मोदी के वैचारिक विरोधी उनके तमाम कदमों की कटु आलोचनामें लीन रहते हैं। वैसे भी लोकतांत्रिकक दौर के भारतीय समाज की एक धारा रही है। शुरू में वह पदधारकों का शुरू में स्वागत करता है, बाद में उसका विरोधी हो जाता है। लेकिन वही शख्सियत जब इतिहास में समाहित हो जाती है, कुछ अपवादों को छोड़ समाज उसका घोर प्रशंसक हो जाता है। बीजेपी की ही राजनीति का उदाहरण इस संदर्भ में ले सकते हैं। एक दौर में बीजेपी विरोधियों की नजर में अटल उदार थे, जबकि आडवाणी कट्टर। लिहाजा आडवाणी लगातार विरोधियों के निशाने पर रहे। लेकिन जैसे ही अटल युग की समाप्ति हुई और मोदी युग की ओर बीजेपी बढ़ चली, आडवाणी उन्हीं विरोधियों की नजर में आदर के पात्र होते गए और मोदी के कटु आलोचकों की संख्या बढ़ती गई। कुछ इसी अंदाज में कह सकते हैं कि आने वाले दिनों में भारतीय जनता पार्टी की राजनीति में कोई अन्य नेता उभरा तो हो सकता है कि मोदी बीजेपी विरोधियों की नजर में ही प्रशंसा का पात्र बन जाएं और बीजेपी का भावी नेता आडवाणी और मोदी की तरह आलोचनाओं के केंद्र में आ जाए। सत्ता की राजनीति में मोदी की यात्रा पर निगाह डालते हैं तो उनकी सबसे बड़ी चुनौती खुद की स्वीकार्यता बढ़ाना रही। जिस तरह चौथाई सदी से वे सत्ता के केंद्र में हैं, उसे देख कह सकते हैं कि इसमें वे कामयाब रहे हैं। इतना ही नहीं, वे सबसे ज्यादा समय तक सत्ता को खुद के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करने में भी सफल रहे हैं। आज भारत की केंद्रीय सत्ता ही नहीं, भारतीय जनता पार्टी का संगठन भी उन्हीं के इर्द-गिर्द केंद्रित है और उन्हीं से शक्ति ग्रहण करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/two-and-a-half-decades-of-tough-decisions-made-modi-modi" target="_blank" rel="noopener">ढ़ाई दशक के सख्त फैसलों ने बनाया मोदी को मोदी</a></p><p>यह मोदी का दुर्भाग्य रहा कि उनके गुजरात की सत्ता संभालने के महज छह महीने बाद ही राज्य को गोधरा कांड के चलते भयानक सांप्रदायिक दंगों का सामना करना पड़ा। गुजरात सरकार की रिपोर्ट के अनुसार इन दंगों में 1044 लोगों के मारे गए , जबकि 2548 लोग घायल हुए थे। इसके अलावा 223 लोग लापता बताए गए। दंगों के सात साल बीतने के बाद सरकार के ही अनुसार, लापता लोगों की संख्या कुछ बढ़ गई। इन दंगों के बाद नरेंद्र मोदी विशेषकर कांग्रेस और वामपंथी दलों के निशाने पर आ गए। देश के वामपंथी सोच से प्रभावित स्वयंसेवी संगठनों ने उनके खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर मोर्चा खोल दिया। एक तरह से मोदी को राजनीतिक घृणा का पात्र बनाने की कोशिश की गई। उनके चरित्र हनन तक की कोशिशें हुईं। गुजरात दंगों के साथ ही इशरत जहां मुठभेड़ कांड को लेकर उनके खिलाफ सीबीआई जांच हुई। सीबीआई के समक्ष बतौर मुख्यमंत्री पूछताछ के लिए उन्हें कई बार घंटों तक उपस्थिति जतानी पड़ी और बतौर मुख्यमंत्री उन्हें घंटों तक सीबीआई के अच्छे-बुरे सवालों का सामना करना पड़ा। गुजरात दंगों के दाग के चलते एक दौर में उन्हें अमेरिका ने वीजा देने से इनकार कर दिया। इस बिंदु पर देखें तो मोदी का जीवट व्यक्तित्व उभरता है। कह सकते हैं कि तिरस्कार और आलोचनाओं से वे ताकत ग्रहण करते हैं, कुछ-कुछ मिथकीय पात्र बालि की तरह। जिस तरह बालि के सामने आए उसके विरोधियों की आधी ताकत बालि में ही समाहित हो जाती थी, मोदी कुछ उसी तरह विरोधियों की आलोचनाओं से ताकत ग्रहण करते हैं और अपनी राह बनाते रहते हैं। तीखे और अपमानजनक विरोध से जीवट से जीवट वाली शख्सियतें टूट जाती हैं, मोदी की ना सिर्फ कटु आलोचना हुई या हो रही है, उन्हें सार्वजनिक मंचों से घटिया, अश्लील और फूहड़ गालियां दी जा रही हैं। अतीत में उन्हें चरित्र हनन की सीमा तक बदनाम करने की कोशिशें हुईं। लेकिन मोदी रूके नहीं। कभी पर्दे के पीछे से राजनीति करने वाले मोदी लगातार आगे बढ़ते रहे।</p><p>गुजरात में जब चीजें पटरी पर आनी शुरू हुईं तो उन्होंने राज्य के विकास को लेकर अपना मॉडल पेश किया। जिसे कालांतर में देश ने उसे ‘गुजरात मॉडल’ के नाम से जाना। ‘गुजरात मॉडल’ के विकास और इस विकास की गति को बनाए रखने के लिए प्रवासियों और निवेशकर्ताओं को लुभाने के लिए उन्होंने ‘वायव्रेंट गुजरात’ नाम से आयोजन शुरू किए। जिसे देखते ही देखते राज्य की जनता ने तो अपनाया ही, प्रवासियों ने भी हाथोंहाथ लिया। इसी का असर रहा कि जिस राज्य में महज पांच साल में चार मुख्यमंत्री आए और गए, उसी राज्य में मोदी ने साढ़े बारह साल से अधिक वक्त तक सत्ता संभालने का रिकॉर्ड बनाया। 2012 के विधानसभा चुनाव के दौरान उनकी ख्याति राज्य से बाहर की सीमाओं तक पैठ बना चुकी थी या बना रही थी। इसका ही नतीजा रहा कि 2012 के गुजरात विधानसभा चुनावों के वक्त राष्ट्रीय मीडिया के एक हिस्से ने मोदी को भावी प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकार कर लिया। तब कहा जा रहा था कि गुजरात इस बार सिर्फ अपने मुख्यमंत्री का ही नहीं, बल्कि देश के भावी प्रधानमंत्री का भी चुनाव कर रहा है। मोदी की राजनीतिक यात्रा जातिवादी राजनीति का जवाब भी है। कांग्रेस के प्रथम परिवार, नीतीश कुमार और ममता बनर्जी को छोड़ दें तो आज के ज्यादातर बड़े राजनेता कहीं न कहीं सिर्फ अपनी जातियों के नेता हैं या उनकी राजनीतिक बुनियाद का आधार उनकी जाति है। लेकिन मोदी की लोकप्रियता में उनकी जाति का कोई आधार नहीं है।</p><p>मोदी ने अपने लंबे शासन काल में ढरों उपलब्धियां हासिल की हैं, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि भारत की वैश्विक मंच पर बदली छवि। उनके शासनकाल में भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि में सुधार हुआ है। मोदी ने आर्थिक मोर्चे पर देश को बहुत गति दी है। मोदी कहते हैं कि उनकी नजर में सिर्फ चार जातियां हैं, महिला, युवा, गरीब और किसान। मोदी के लंबे शासन काल में इन चारों ही वर्गों का ध्यान ठीक से रखने की कोशिशें बढ़ी हैं। भारत दुनिया की चौथी बड़ी आर्थिक महाशक्ति अगर बन चुका है, तो इसके पीछे उनका नजरिया भी है। कृषि में साढ़े चार प्रतिशत सालाना की विकास दर हासिल की जा चुकी है, बीजेपी के एजेंडे के तहत अयोध्या में राममंदिर बन चुका है, कश्मीर को अलग-थलग करने वाले संविधान के विशेष अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी बनाया जा चुका है। मोदी के शासनकाल की उपलब्धियों को गिनाने बैठें तो पूरी रात गुजर जाएगी। बस मोटे तौर पर कह सकते हैं कि मोदी राज में देश ने अपना खोया गौरव हासिल करने की दिशा में एक मजबूत कदम जरूर बढ़ाया है।</p><p><br>उमेश चतुर्वेदी<br>लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक समीक्षक हैं..</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 12:57:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/25-years-of-narendra-modi-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[UP Congress में कुर्सी की लड़ाई जूते-चप्पल तक आई, Ajay Rai ने BJP में वापसी की टिकट कटाई!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/ajay-rai-bjp-joining-speculation-up-congress-office-clash-2026]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>उत्तर प्रदेश की राजनीति में कब कौन किस पाले में चला जाए, इसकी गारंटी न दिल्ली दे सकती है, न लखनऊ का कोई सियासी पंडित। अब कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अजय राय को लेकर भी यही सवाल उठने लगा है कि क्या वह एक बार फिर भाजपा का दामन थाम सकते हैं? सवाल उठ रहा है कि जिस नेता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वाराणसी में बार-बार चुनौती दी, क्या वही नेता अब कांग्रेस में अपनी सियासी जमीन खिसकती देख पुराने घर की ओर लौटने का रास्ता तलाश रहे हैं? फिलहाल यह अटकल है। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी छिनने, नए नेतृत्व से तनातनी और लखनऊ कांग्रेस दफ्तर में जूते-चप्पल चलने के बाद इन चर्चाओं को हवा जरूर मिल गई है।</p><p>वैसे कहावत है कि घर का भेदी लंका ढाए, लेकिन यूपी कांग्रेस का हाल देखिए, यहां लंका ढहाने के लिए विपक्ष को मशक्कत करने की जरूरत ही क्या है, जब अपने ही लोग एक-दूसरे से दो-दो हाथ करने को तैयार बैठे हों! हम आपको बता दें कि अजय राय को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष पद से हटाकर आराधना मिश्रा 'मोना' को जिम्मेदारी सौंप दी गई। नई व्यवस्था में इमरान मसूद को भी कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली। मगर संगठन में बदलाव का यह फैसला पुराने नेतृत्व और उसके समर्थकों के बीच सहज रूप से स्वीकार नहीं हुआ। अजय राय की नाराजगी की एक वजह यह भी बताई जा रही है कि उन्हें हटाने के तरीके से वह असहज थे। उन्हें लगता है कि उनकी भूमिका और राजनीतिक हैसियत को नजरअंदाज किया गया।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/owaisi-vs-akhilesh-yadav-muslim-vote-bank-up-politics-2027" target="_blank" rel="noopener">'यादवों की गुलामी छोड़ो', Asaduddin Owaisi ने Akhilesh Yadav पर सीधा हमला बोलते हुए UP के Muslims से कर दिया बड़ा आह्वान</a></p><p>देखा जाये तो यूपी की राजनीति में पद केवल नाम के आगे लगने वाला तमगा नहीं होता। उसके साथ समर्थकों की फौज, टिकट की दावेदारी, संगठन पर पकड़ और भविष्य की सियासी संभावनाएं भी जुड़ी होती हैं। ऐसे में प्रदेश अध्यक्ष की कुर्सी से उतरना किसी नेता के लिए महज जिम्मेदारी बदलना नहीं, अपने प्रभाव का हिसाब-किताब भी होता है। यही वजह है कि अब चर्चा चल रही है कि कांग्रेस उन्हें गुजरात जैसे किसी दूसरे राज्य में संगठनात्मक जिम्मेदारी देकर मनाने की कोशिश कर सकती है। दूसरी तरफ भाजपा में वापसी की संभावना भी सियासी गलियारों में तैर रही है। उल्लेखनीय है कि अजय राय 1996 से 2009 तक भाजपा में रहे और उसके टिकट पर तीन बार विधायक चुने गए थे।</p><p>दूसरी ओर, लखनऊ के कांग्रेस मुख्यालय में जो हुआ, वह महज दो नेताओं के समर्थकों की कहासुनी मानकर टाल देने वाला मामला नहीं है। आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह के दौरान अजय राय और ममता चौधरी से जुड़े गुट आमने-सामने आ गए। विवाद रास्ता देने और अध्यक्ष को लेकर हुई टिप्पणी से शुरू हुआ बताया गया, लेकिन देखते ही देखते मामला धक्का-मुक्की और जूते-चप्पल तक पहुंच गया था। देखा जाये तो इस घटना ने यूपी कांग्रेस की एक पुरानी बीमारी को फिर उजागर कर दिया है। पार्टी में कार्यकर्ताओं से ज्यादा नेताओं की फौज दिखाई देती है। हर नेता को अपना खेमा चाहिए, हर खेमे को अपनी हैसियत चाहिए और हर हैसियत को संगठन में अपनी हिस्सेदारी चाहिए। सवाल यह है कि जब पार्टी कार्यालय में ही नेतृत्व की इज्जत और अनुशासन की हिफाजत नहीं हो पा रही, तो गांव-कस्बों में संगठन खड़ा करने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा?</p><p>एक ओर चुनाव सामने हैं दूसरी ओर ऐसे वक्त पर अगर पदभार ग्रहण समारोह में जूते चल रहे हैं, तो टिकट बंटवारे, जिला अध्यक्षों की नियुक्ति और चुनावी गठबंधन के वक्त यह खींचतान किस मुकाम पर पहुंचेगी इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है। यह आशंका निराधार नहीं है कि जैसे-जैसे 2027 का विधानसभा चुनाव नजदीक आएगा, कांग्रेस की गुटबाजी और जूतम-पैजार बढ़ सकती है। आने वाले दिनों में टिकट के दावेदार बढ़ेंगे, पदों की खींचतान तेज होगी और हर नेता अपने समर्थकों के साथ ताकत दिखाने की कोशिश करेगा। अगर कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने अभी से अनुशासन की स्पष्ट लक्ष्मण रेखा नहीं खींची, तो चुनावी तैयारी से ज्यादा ऊर्जा आपसी हिसाब चुकता करने में खर्च हो सकती है।</p><p>साथ ही इस पूरे विवाद को केवल अजय राय बनाम नए नेतृत्व की लड़ाई बताकर खत्म नहीं किया जा सकता। ममता चौधरी ने आरोप लगाया है कि उनके साथ अभद्रता हुई और उन्हें धमकाया गया। उन्होंने अजय राय पर दलित विरोधी व्यवहार का आरोप भी लगाया है। दूसरी ओर, अजय राय ने भी ममता चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रदेश प्रभारी राजेंद्र पाल गौतम ने पांच सदस्यीय जांच समिति बनाई है। इसकी कमान पूर्व प्रदेश अध्यक्ष बृजलाल खाबरी को दी गई है। समिति में अभिषेक दत्त, अब्दुल हन्नान, रवि वर्मा और शमीना शफीक भी शामिल हैं।</p><p>देखा जाये तो यहां कांग्रेस नेतृत्व के सामने दोहरी चुनौती है। एक तरफ पार्टी को नेताओं के बीच अनुशासन कायम करना है, दूसरी तरफ महिला और दलित कार्यकर्ताओं की शिकायतों को निष्पक्षता से सुनना है। यदि किसी नेता के प्रभाव के कारण शिकायत दबती है, तो संगठन के भीतर बराबरी और सम्मान के दावों पर सवाल उठेंगे। और यदि जांच से पहले ही किसी को दोषी ठहरा दिया जाता है, तो निष्पक्ष प्रक्रिया पर सवाल खड़े होंगे। साथ ही अजय राय की नाराजगी का एक पहलू समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस के रिश्तों से भी जुड़ा बताया जा रहा है। पार्टी के भीतर ऐसी चर्चा है कि अखिलेश यादव के साथ बेहतर तालमेल बैठाने की कवायद में प्रदेश नेतृत्व बदलने का फैसला लिया गया। अजय राय के समाजवादी पार्टी के साथ रिश्ते सहज नहीं रहे, जबकि प्रमोद तिवारी और आराधना मिश्रा को गठबंधन के लिहाज से अपेक्षाकृत सुविधाजनक माना जाता है।</p><p>इसके अलावा, सोमवार को दिल्ली में राहुल गांधी के आह्वान पर निकले कांग्रेस के विरोध मार्च में अजय राय की गैरमौजूदगी ने भी अटकलों को हवा दी। जब प्रदेश में संगठनात्मक बदलाव के बाद नाराजगी खुलकर सामने आ रही हो और पूर्व अध्यक्ष राष्ट्रीय कार्यक्रम से दूर रहें, तो सवाल उठना लाजिमी है कि मामला सिर्फ पद का है या राजनीतिक भविष्य का भी। हालांकि अजय राय के सामने पिंडरा विधानसभा सीट का अपना सियासी हिसाब भी है। वह वहां से अपनी दावेदारी को लेकर सक्रिय रहना चाहते हैं। ऐसे में गुजरात की जिम्मेदारी स्वीकार करना, यूपी में अपनी जमीन पर ध्यान देना या किसी दूसरे राजनीतिक विकल्प पर विचार करना, इन संभावनाओं के बीच उनकी अगली चाल पर सबकी नजर रहेगी।</p><p>साथ ही यूपी कांग्रेस के सामने संकट केवल अजय राय की नाराजगी का नहीं है। संकट उस संगठनात्मक संस्कृति का है, जिसमें पद बदलते ही पुराने और नए नेतृत्व के बीच अविश्वास सिर उठाने लगता है। यदि हर बदलाव को प्रतिष्ठा की लड़ाई बना दिया जाएगा, तो संगठन का विस्तार कैसे होगा? और यदि हर असहमति समर्थकों की भिड़ंत में बदल जाएगी, तो आम कार्यकर्ता अपनी जगह कहां तलाशेगा? उत्तर प्रदेश में चुनावी राजनीति केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस, बयानबाजी और बड़े नेताओं की तस्वीरों से नहीं चलती। बूथ पर कार्यकर्ता चाहिए, गांव में भरोसा चाहिए और टिकट न मिलने पर भी संगठन के साथ खड़े रहने की राजनीतिक संस्कृति चाहिए। पार्टी कार्यालय में जूते-चप्पल चलना इसी कसौटी पर कांग्रेस के सामने असहज सवाल खड़ा करता है।</p><p>बहरहाल, अजय राय भाजपा में लौटेंगे या कांग्रेस उन्हें कोई नई जिम्मेदारी देकर रोक लेगी, इसका जवाब आने वाला वक्त देगा। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के लिए इससे भी बड़ा सवाल है कि क्या वह नेताओं की महत्वाकांक्षाओं के बीच संगठन को बचा पाएगा? क्योंकि यूपी की सियासत में चुनाव से पहले नाराजगी कोई नई बात नहीं। नई बात तब होगी, जब कोई पार्टी अपने नेताओं को यह समझा सके कि संगठन की कुर्सी निजी जागीर नहीं और पार्टी कार्यालय अखाड़ा नहीं होता। कांग्रेस ने अगर अनुशासन को कायम करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाये तो 2027 की चुनावी बिसात बिछने तक कांग्रेस में विरोधियों से मुकाबले की तैयारी कम और अपनों से हिसाब बराबर करने की कवायद ज्यादा दिखाई दे सकती है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 16:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/ajay-rai-bjp-joining-speculation-up-congress-office-clash-2026</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[आन्दोलन वही, जो सार्थक मुद्दा, दिशा एवं भरोसे से जुड़ा हो]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/movement-is-one-that-is-grounded-in-a-meaningful-issue-direction-and-trust]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>लोकतंत्र में असहमति उसकी कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। सरकार से सवाल पूछना, नीतियों का विरोध करना और अपने अधिकारों के लिए आवाज उठाना नागरिक स्वतंत्रता का अनिवार्य हिस्सा है। लेकिन लोकतंत्र की वास्तविक परीक्षा केवल इस बात से नहीं होती कि विरोध करने की कितनी स्वतंत्रता है, बल्कि इससे भी होती है कि उस स्वतंत्रता का उपयोग किस उद्देश्य, किस भाषा और किस पद्धति से किया जा रहा है। किसी आंदोलन का मुद्दा कितना ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हो, यदि उसका नेतृत्व दिशाहीन हो जाए, भाषा उत्तेजक बन जाए और पद्धति हिंसा अथवा अराजकता की ओर बढ़ने लगे, तो उसका नैतिक आधार कमजोर पड़ने लगता है। इसलिए आज देश के सामने प्रश्न केवल आंदोलनों का नहीं, बल्कि उनके चरित्र, विश्वसनीयता और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व का भी है। दिल्ली में हाल के विरोध प्रदर्शनों और उन पर प्रशासन की सख्ती के बाद सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप ने एक बार फिर लोकतंत्र की सीमाओं और संभावनाओं पर बहस छेड़ दी है। एक ओर शांतिपूर्ण विरोध नागरिकों का अधिकार है, तो दूसरी ओर सार्वजनिक व्यवस्था, नागरिक सुरक्षा और कानून का पालन सुनिश्चित करना शासन का दायित्व है। इन दोनों के बीच संतुलन ही संवैधानिक लोकतंत्र की पहचान है। न तो सरकार को कानून-व्यवस्था के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं के अनावश्यक दमन की छूट दी जा सकती है और न ही आंदोलनकारियों को लोकतांत्रिक अधिकारों की आड़ में सार्वजनिक जीवन को बाधित करने का असीमित अधिकार प्राप्त है। संविधान अधिकार देता है, लेकिन उन अधिकारों के साथ उत्तरदायित्व भी जोड़ता है।</p><p>आज सबसे गंभीर प्रश्न यह है कि जनांदोलनों की दिशा कौन तय कर रहा है? क्या आंदोलन वास्तव में जनसमस्याओं के समाधान के लिए खड़े हो रहे हैं, अथवा जनता के असंतोष को राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का साधन बनाया जा रहा है? यह प्रश्न किसी एक दल या संगठन तक सीमित नहीं है। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सामाजिक संगठन हों या जनसमूह, सभी को अपने आचरण की कसौटी संविधान, नैतिकता और जनहित को बनाना चाहिए। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। वह सरकार की नीतियों पर सवाल उठाता है, कमियों को सामने लाता है और जनहित के मुद्दों को राजनीतिक विमर्श में स्थान देता है। लेकिन विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि वैकल्पिक दृष्टि प्रस्तुत करना भी है। यदि हर असहमति को सत्ता के विरुद्ध निर्णायक संघर्ष में बदलने का प्रयास किया जाए, हर प्रशासनिक निर्णय को राजनीतिक षड्यंत्र बताया जाए और प्रत्येक जनसमस्या को व्यापक अव्यवस्था का प्रतीक बना दिया जाए, तो वास्तविक मुद्दे शोर में खोने लगते हैं। इसी तरह सरकार भी यदि आलोचना को शत्रुता समझने लगे, तो लोकतांत्रिक संवाद की संभावनाएं संकुचित हो जाती हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-protests-supreme-court-directs-authorities-to-allow-free-public-movement" target="_blank" rel="noopener">प्रदर्शन भी होगा, आवाजाही भी चलेगी! Delhi Protest Case में Supreme Court के अहम निर्देश</a></p><p>आंदोलन की साख उसके मूल उद्देश्य एवं भरोसे से बनती है। जिस मुद्दे को लेकर लोग एकत्र होते हैं, उसकी स्पष्टता, तथ्यात्मक प्रामाणिकता और समाधान की दिशा आंदोलन की विश्वसनीयता निर्धारित करती है। जब मूल प्रश्न पीछे छूट जाता है और राजनीतिक दलों की प्रतिस्पर्धा, व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाएं अथवा वैचारिक टकराव केंद्र में आ जाते हैं, तब आंदोलन की ऊर्जा बिखरने लगती है। जनसमर्थन जुटाना और जनविश्वास अर्जित करना दो अलग-अलग बातें हैं। भीड़ किसी क्षणिक आक्रोश का परिणाम हो सकती है, लेकिन जनविश्वास निरंतर नैतिक आचरण और रचनात्मक कार्यों से अर्जित होता है। भारत का लोकतांत्रिक इतिहास इस संदर्भ में अनेक महत्त्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करता है। वर्ष 1974 का छात्र आंदोलन और लोकनायक जयप्रकाश नारायण का नेतृत्व बताता है कि जनाक्रोश को रचनात्मक परिवर्तन की शक्ति में कैसे बदला जा सकता है। बिहार के छात्रों ने भ्रष्टाचार, महंगाई और शासन संबंधी समस्याओं के विरुद्ध आवाज उठाई थी। जयप्रकाश नारायण ने इस असंतोष को व्यापक सामाजिक और राजनीतिक सुधारों की दिशा देने का प्रयास किया।</p><p>आज के आंदोलनों को इस ऐतिहासिक अनुभव से सीखना चाहिए। किसी भी आंदोलन की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि कितनी सड़कें बंद हुईं, कितने लोग एकत्र हुए या कितने दिनों तक विरोध चला। उसकी सफलता का वास्तविक पैमाना यह होना चाहिए कि उसने किस समस्या का समाधान प्रस्तुत किया, जनजीवन में क्या सकारात्मक परिवर्तन लाया और समाज में संवैधानिक चेतना को कितना मजबूत किया। वर्तमान समय में इंटरनेट मीडिया ने जनमत निर्माण की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। अब कोई घटना कुछ ही मिनटों में व्यापक बहस का विषय बन सकती है। यह लोकतंत्र के लिए एक महत्त्वपूर्ण अवसर है, क्योंकि इससे आम नागरिकों को अपनी बात रखने और प्रशासन से जवाब मांगने का मंच मिला है। लेकिन यही माध्यम भ्रामक सूचनाओं, अधूरे तथ्यों, भावनात्मक अभियानों और अपुष्ट आरोपों को भी तेजी से प्रसारित कर सकता है।</p><p>हैशटैग, वायरल वीडियो और ऑनलाइन समर्थन अपने आप में किसी आंदोलन की नैतिक प्रामाणिकता का प्रमाण नहीं हैं। किसी आरोप की गंभीरता का निर्धारण उसके प्रमाणों से होना चाहिए, उसकी लोकप्रियता से नहीं। यदि आंदोलनकारी तथ्यों की पुष्टि किए बिना आरोप लगाते हैं, तो वे अपने ही उद्देश्य को नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसी प्रकार प्रशासन का दायित्व है कि वह आलोचनात्मक आवाजों को केवल इसलिए संदिग्ध न माने कि वे सरकार के विरुद्ध हैं। पारदर्शिता, तथ्यपरक संवाद और निष्पक्ष जांच ही अविश्वास को दूर करने के प्रभावी उपाय हैं। आज युवाओं के पास डिजिटल तकनीक, नवाचार, उद्यमिता और सामाजिक सहभागिता के अनेक अवसर हैं। उनकी ऊर्जा केवल विरोध तक सीमित न रहे, बल्कि समाधान निर्माण में भी लगे। भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हो तो पारदर्शिता के व्यावहारिक उपाय सामने आएं, चुनावी सुधारों की मांग हो तो प्रमाण आधारित सुझाव प्रस्तुत किए जाएं, प्रशासनिक अन्याय का प्रश्न हो तो कानूनी और संस्थागत रास्तों को मजबूत किया जाए। विरोध की सार्थकता तब बढ़ती है, जब वह किसी बेहतर व्यवस्था की कल्पना और निर्माण का आधार बनता है।&nbsp;</p><p><br>जनांदोलनों के संदर्भ में विदेशी शक्तियों की भूमिका पर भी चर्चा होती रही है। यह स्वाभाविक है कि भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में राष्ट्रीय हितों, बाहरी प्रभावों और सूचना के प्रवाह को लेकर सतर्कता बरती जाए। लेकिन इस विषय पर भी भावनाओं अथवा आशंकाओं के बजाय प्रमाणों के आधार पर बात होनी चाहिए। किसी आंदोलन में सरकार की आलोचना होने मात्र से उसे विदेशी षड्यंत्र का हिस्सा नहीं कहा जा सकता। उसी प्रकार यदि किसी गतिविधि में विदेशी वित्तपोषण, भ्रामक प्रचार अथवा अनुचित हस्तक्षेप के विश्वसनीय प्रमाण मिलते हैं, तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। राष्ट्रीय एकता और अखंडता की रक्षा केवल कठोर प्रशासनिक कार्रवाई से नहीं होती। वह नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की निष्पक्षता, न्याय की उपलब्धता और शासन की पारदर्शिता से मजबूत होती है। देश की आलोचना और देश के प्रति शत्रुता में अंतर समझना आवश्यक है। सरकार की किसी नीति का विरोध करना राष्ट्रविरोध नहीं है, जैसे राष्ट्रीय हित की चिंता करना किसी नागरिक की लोकतांत्रिक स्वतंत्रता को सीमित करने का औचित्य नहीं बन सकता।</p><p>अंततः लोकतंत्र की शक्ति न तो केवल सत्ता में निहित है और न ही केवल सड़क पर उतरने वाली भीड़ में। उसकी वास्तविक शक्ति नागरिक विवेक, संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता और समाज की संवाद करने की क्षमता में है। किसी भी आंदोलन को स्वयं से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए-क्या हमारा मुद्दा तथ्यपरक और जनहितकारी है? क्या हमारी पद्धति लोकतांत्रिक और अहिंसक है? क्या हमारे प्रयास से समस्या का समाधान निकलेगा या समाज में विभाजन और अविश्वास बढ़ेगा? केवल मुद्दा सही होना पर्याप्त नहीं है, उसके लिए सही नेतृत्व, सही भाषा, सही पद्धति और सही लक्ष्य भी आवश्यक हैं। आंदोलन का उद्देश्य केवल किसी व्यवस्था को चुनौती देना नहीं, बल्कि उससे बेहतर व्यवस्था के निर्माण में योगदान करना होना चाहिए। जो आंदोलन समाज को विवेक, अनुशासन, न्याय और रचनात्मकता की दिशा देता है, वही इतिहास में स्थायी स्थान प्राप्त करता है। भारत का भविष्य ऐसे ही लोकतांत्रिक चिंतन में सुरक्षित है, जहां असहमति को सम्मान मिले, सत्ता जवाबदेह रहे, विपक्ष रचनात्मक बने और राष्ट्रहित का अर्थ नागरिक स्वतंत्रता तथा संवैधानिक मर्यादा के समन्वय में खोजा जाए।</p><p>- ललित गर्ग<br>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 13:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/movement-is-one-that-is-grounded-in-a-meaningful-issue-direction-and-trust</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rahul Gandhi को दोटूक जवाब देकर CJI Surya Kant ने न्यायिक मर्यादा की लाज रख ली]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/by-giving-a-blunt-reply-to-rahul-gandhi-cji-surya-kant-upheld-judicial-propriety]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी और INDIA गठबंधन के नेताओं को मिलने का समय देने से इनकार कर दिया है। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR), कथित ‘वोट चोरी’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर विपक्ष सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को ज्ञापन सौंपना चाहता था। लेकिन CJI ने साफ कर दिया कि जिन विषयों पर विपक्ष हस्तक्षेप चाहता है, वे न्यायालय में पहले से विचाराधीन हैं। ऐसे मामलों में प्रशासनिक स्तर पर निर्देश देने के बजाय विपक्ष को न्यायिक प्रक्रिया के तहत याचिका दायर करनी चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि मौलिक अधिकारों के संरक्षण के लिए सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे सभी नागरिकों के लिए चौबीसों घंटे खुले हैं।</p><p>मुख्य न्यायाधीश का यह रुख ऐसे समय सामने आया है, जब राहुल गांधी और INDIA गठबंधन चुनावी प्रक्रिया से जुड़े आरोपों को लेकर सरकार तथा चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। विपक्ष की मांग थी कि SIR की प्रक्रिया रोकी जाए, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार इस्तीफा दें और कथित चुनावी अनियमितताओं की जांच हो। राहुल गांधी ने 12 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय तक मार्च करने का आह्वान करते हुए इसे लोकतंत्र और संविधान की रक्षा की लड़ाई बताया। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में कथित गड़बड़ियों से पात्र नागरिकों के मतदान के अधिकार पर असर पड़ रहा है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/elon-musk-prime-minister-ambani-remark-starlink-india-rahul-gandhi" target="_blank" rel="noopener">जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है?</a></p><p>देखा जाये तो इस घटनाक्रम को समझने के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष की हालिया मुलाकात भी महत्वपूर्ण है। विपक्षी नेताओं ने राष्ट्रपति को ज्ञापन सौंपकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं पर चिंता जताई थी। मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने कहा कि राष्ट्रपति ने उनसे आरोपों के समर्थन में सबूत मांगे हैं और विपक्ष प्रमाण प्रस्तुत करने को तैयार है। राहुल गांधी ने संकेत दिया था कि राष्ट्रपति ने वोट चोरी के आरोप को एक तरह से सही माना है। हालांकि बाद में सूत्रों के हवाले से आई खबर के अनुसार राष्ट्रपति कार्यालय ने राहुल गांधी के बयान और दावे पर अप्रसन्नता जताई।</p><p>दूसरी ओर, राष्ट्रपति से मुलाकात के बाद मुख्य न्यायाधीश से मिलने की कोशिश और फिर उनका इनकार विपक्ष की रणनीति के लिए एक अहम घटनाक्रम है। राहुल गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे चाहते थे कि वे अपनी चिंताओं को सीधे CJI के सामने रखें। लेकिन न्यायपालिका का काम राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के ज्ञापन पर प्रशासनिक निर्देश देना नहीं, बल्कि विधिसम्मत याचिकाओं पर सुनवाई करना और कानून के अनुसार फैसला देना है। CJI के रुख का यही संस्थागत अर्थ है। लेकिन फिर भी राहुल गांधी का सर्वोच्च अदालत तक मार्च निकालने का फैसला सीधे सीधे अराजकता फैलाने का प्रयास है। राहुल गांधी बार बार संविधान का हवाला देते हैं लेकिन संविधान की संरक्षक राष्ट्रपति के बारे में झूठ बोलते हैं, संवैधानिक अधिकारों के संरक्षण स्थल सर्वोच्च न्यायालय की बात नहीं मानते, ऐसे में सवाल उठेगा ही कि उनकी असल मंशा क्या है? यही नहीं, ईवीएम पर बार बार सवाल उठाने वाले कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दलों को हाल में असम और हिमाचल प्रदेश में बैलट पेपर से कराए गए नगर निगम चुनाव में भी करारा झटका लगा है। इसलिए राहुल गांधी समेत अन्य विपक्षी नेताओं को समझना होगा कि गड़बड़ चुनावी व्यवस्था में नहीं विपक्षी पार्टियों की नीतियों और नीयत पर है, उनकी विश्वसनीयता पर है।</p><p>देखा जाये तो SIR का विवाद केवल राजनीतिक दलों के बीच टकराव नहीं है। मतदाता सूची की शुद्धता चुनाव की विश्वसनीयता के लिए जरूरी है। चुनाव आयोग का पक्ष है कि पुनरीक्षण का उद्देश्य सूची को दुरुस्त करना है। विपक्ष इस प्रक्रिया की पारदर्शिता और संभावित प्रभाव पर सवाल उठा रहा है। विपक्ष चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का केंद्र बनाने की कोशिश कर रहा है, जबकि मोदी सरकार आर्थिक विकास और अपने नीतिगत प्रदर्शन को सामने रख कर विकसित भारत के संकल्प को सिद्ध करने की दिशा में आगे बढ़ रही है।</p><p>बहरहाल, CJI का इनकार इस पूरे विवाद में एक महत्वपूर्ण संस्थागत घटनाक्रम है। विपक्ष को समझना होगा कि अंतिम फैसला राजनीतिक नारों या मुलाकातों से नहीं, बल्कि अदालत के सामने प्रस्तुत तथ्यों और प्रमाणों से तय होगा। साथ ही मुख्य न्यायाधीश का विपक्षी नेताओं को मुलाकात का समय देने से इनकार करना संस्थागत मर्यादा बनाए रखने के लिहाज से उचित कदम माना जा सकता है। यदि राजनीतिक दल अपनी मांगों और आरोपों के आधार पर सीधे CJI से मुलाकात कर न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा करने लगें, तो भविष्य में दूसरे दल भी इसी परंपरा का सहारा ले सकते हैं। इससे न्यायपालिका पर राजनीतिक दबाव बनाने की कोशिशों को बढ़ावा मिलने और निष्पक्षता को लेकर अनावश्यक सवाल उठने की आशंका रहेगी। न्यायपालिका की स्वतंत्रता केवल उसके फैसलों में ही नहीं, बल्कि उसकी प्रक्रियाओं और राजनीतिक दलों से समान दूरी बनाए रखने में भी निहित है। इसलिए किसी भी पक्ष को विशेष राजनीतिक हैसियत के आधार पर अलग सुविधा देने के बजाय सभी के लिए निर्धारित न्यायिक प्रक्रिया का पालन करना अधिक उचित है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 13:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/by-giving-a-blunt-reply-to-rahul-gandhi-cji-surya-kant-upheld-judicial-propriety</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[एलन मस्क प्रकरण, विदेशी मुख के शंख न बनें राहुल गांधी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/regarding-the-elon-musk-episode-rahul-should-not-become-a-mouthpiece-for-foreign-voices]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>शंख का यह दुर्भाग्य है कि ईश्वर ने उसे मजबूत खोल तो दिया है पर कोमल मस्तिष्क नहीं, तो बेचारा पराई फूक से बजने को मजबूर है। शंख की इसी मजबूरी के खतरे भी अनेक है, चाहते न चाहते हुए भी वह दूसरों की हावर्ड को आवाज दे देता है और वो भी कई गुना बढ़ा कर। आजकल देश के प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी हर विदेशी मुंह का शंख बनने के प्रयास में दिख रहे हैं। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया हमला अनेक तरह के खतरनाक संकेत समेटे हुए हैं और इस हमले में किसी विदेशी शक्ति को देश के किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति का एक स्वर होना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। राहुल गांधी को विदेशी फूक से बजने वाला शंख बनने से गुरेज करना चाहिए।</p><p>जैसा कि सभी जानते हैं कि, सूचना प्रौद्योगिकी जिस तेजी से विकसित हो रही है उसी तेजी से इसके खतरे भी बढ़ रहे हैं। यह तकनीक जहां बड़ी आबादी को लाभ पहुंचा रही है, वहीं इसे नियंत्रित करने वाली चंद कंपनियों को बेशुमार ताकत भी सौंप रही है। इतनी कि ये कंपनियां राजनीतिक शक्तियों को भी बौना समझने लगी हैं। जहां बात नहीं बनती, वहां वे राष्ट्रीय नेतृत्व की साख बिगाडऩे में लग जाती हैं। कुछ देशों में सरकारें बनाने-गिराने के खेल में सक्रिय रहकर स्वार्थ साधना तो उनका पुराना नुस्खा है। दुनिया के सबसे धनी व्यक्ति और स्टारलिंक के मालिक एलन मस्क का भारत सरकार पर किया गया अपनी तरह का 'पहला हमला' इसी परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/elon-musk-prime-minister-ambani-remark-starlink-india-rahul-gandhi" target="_blank" rel="noopener">जब जब देश के साथ खड़े होने की बात आती है, तब तब Rahul Gandhi की राह अलग क्यों हो जाती है?</a></p><p>अपने सोशल मीडिया मंच 'एक्स' पर मस्क ने कहा कि स्टारलिंक को 165 से ज्यादा देशों में लाइसेंस मिल चुका है और उसने पांच वर्षों तक भारत के हर कानून का पालन किया, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं? यह बात पूरी तरह सच नहीं है। सरकार ने साफ किया कि स्टारलिंक को मई 2025 में ही लाइसेंस मिल चुका है। सिर्फ स्पेक्ट्रम आवंटन अटका है, क्योंकि विदेशी निवेश की मंजूरी और सुरक्षा शर्तों का परीक्षण बाकी है। स्टारलिंक ने जमीनी ढांचा विकसित करने के लिए जियो और भारती एयरटेल से साझेदारी भी की है और जियो के मालिक मुकेश अंबानी ही हैं। तो अंबानी पर कटाक्ष का अर्थ क्या है? सीधा अर्थ है कि मस्क सुरक्षा शर्तों में ढील चाहते हैं और यह भी कि सैटेलाइट फोन के क्षेत्र में कोई भारतीय कंपनी उनके मुकाबले आगे न बढ़े, क्योंकि अंबानी भी यह महत्वाकांक्षा रखते हैं।&nbsp;</p><p><br>ऐसे समय, जब केंद्र सरकार नीट और एसआइआर पर घरेलू राजनीति में घिरी है, मस्क की टिप्पणी मौके का फायदा उठाने की चाल है। ऐसा लगता है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने इस सोची-समझी चाल पर बिना सोचे प्रतिक्रिया दे दी- 'भारत में स्वागत है एलन, जब तक दूसरा शख्स न मिले इंतजार करें।' जबकि, स्टारलिंक के जियो और एयरटेल से समझौते पर तब कांग्रेस ने राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी।</p><p>घरेलू मोर्चे पर सरकार को घेरना एक बात है और अंतरराष्ट्रीय दांव-पेचों में शामिल होना दूसरी। क्या सुरक्षा की चिंता किए बिना किसी सैटेलाइट कंपनी को इसलिए मंजूरी दे देनी चाहिए कि उसके मालिक अंबानी-अदाणी नहीं, मस्क हैं? दूसरी बात यह है कि विदेशी कंपनी के आगे भारतीय कंपनी को तरजीह क्यों नहीं मिलनी चाहिए, भले ही वह अंबानी या अदाणी की ही क्यों न हो, जिनकी मोनोपॉली विपक्ष के लिए घरेलू मुद्दा है? मस्क जैसे लोग नई तकनीकों से मानवता की भलाई के लिए भले ही ढेरों काम कर रहे हों, पर इससे शायद ही कोई इनकार करे कि आर्थिक और राष्ट्रीय हितों के टकराव में उनका व्यवहार पराया ही रहेगा। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के युग में ऐसे तकनीकी महारथियों से सावधान रहना होगा, न सिर्फ सत्ता पक्ष को बल्कि विपक्ष को भी। माना कि शंख मस्तिष्क विहीन होते हैं पर शंख से जुड़े किसी न किसी को तो यह जिम्मेदारी उठानी पड़ेगी कि कोई विदेशी फूक शंख के माध्यम से देश का वातावरण बिगाड़ न पाए।</p><p>- राकेश सैन&nbsp;<br>32, खंडाला फार्म कॉलोनी<br>जालंधर।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 13:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/regarding-the-elon-musk-episode-rahul-should-not-become-a-mouthpiece-for-foreign-voices</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[रूस से डीजल खरीदेंगे ट्रंप, जेलेंस्की हुए आग बबूला, अमेरिकी राष्ट्रपति के दोहरेपन को देख दुनिया में मची हायतौबा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/donald-trump-russia-diesel-deal-india-100-percent-tariff-icc-sanctions]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूस से डीजल खरीदने का फैसला कर लिंडसे ग्राहम को मानो श्रद्धांजलि दे दी है! यह कटाक्ष इसलिए है, क्योंकि भारत रूस से तेल खरीदे तो उस पर सौ फीसदी टैरिफ लगा दिया जाता है, लेकिन अमेरिका वही काम करे तो उसे शानदार फैसला बताया जाता है। यही नहीं, नोबेल शांति पुरस्कार नहीं मिला, तो ट्रंप ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय पर ही प्रतिबंध लगा दिए। आखिर यह कैसी नीति है? दूसरों को नियमों का पाठ पढ़ाने वाले ट्रंप जब अपने देश के हितों की बात आती है, तो उन्हीं नियमों को भूल जाते हैं। भारत पर रूस से तेल नहीं खरीदने का दबाव बनाने वाले ट्रंप अब खुद रूस से डीजल खरीद रहे हैं, इस फैसले ने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है इसलिए सवाल उठ रहा है कि रूस से तेल खरीदना गलत है, या गलत सिर्फ तब है जब भारत खरीदे? यही है ट्रंप की नीति का दोहरापन और खोखलापन!</p><p>देखा जाये तो रूसी ऊर्जा खरीद को लेकर भारत पर दबाव बनाने वाले ट्रंप का ताजा फैसला उनकी कथनी और करनी के बीच की खाई को उजागर करता है। उल्लेखनीय है कि ट्रंप ने रूस से तत्काल तीन लाख टन से अधिक डीजल की आपूर्ति के साथ नवंबर में पांच लाख टन, उसके बाद दस लाख टन और फिर कुछ ही समय में तीस लाख टन अतिरिक्त डीजल की आपूर्ति की घोषणा की है। अमेरिकी प्रशासन ने रूसी डीजल की आपूर्ति को सुगम बनाने के लिए अस्थायी सामान्य अनुमति भी जारी की है, जिसके अंतर्गत निर्धारित शर्तों को पूरा करने वाले कुछ माल पर अप्रैल 2027 तक प्रतिबंधों में छूट का प्रावधान किया गया है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/donald-trump-slams-norway-over-nobel-peace-prize-claims-stopping-eight-wars" target="_blank" rel="noopener">Donald Trump ने नोबेल शांति पुरस्कार न मिलने पर Norway पर साधा निशाना, 8 युद्ध रुकवाने का किया दावा</a></p><p>गौरतलब है कि यह वही प्रशासन है जिसने रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ाने के उद्देश्य से प्रतिबंधों को सख्त करने की नीति अपनाई थी। लेकिन जब अमेरिका में ईंधन की कीमतें बढ़ीं और किसानों, ट्रक चालकों तथा कारोबारियों पर दबाव बढ़ा, तो रूस से ऊर्जा खरीद अचानक स्वीकार्य हो गई। दरअसल अमेरिका में नवंबर की शुरुआत में मध्यावधि चुनाव होने हैं और ट्रंप की नीतियों के चलते वहां महंगाई अप्रत्याशित रूप से बढ़ गयी है जिसके चलते जनता नाराज है।</p><p>रिपोर्टों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिकी डीजल की कीमत 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गयी थी और शुक्रवार को लगभग 6.28 डॉलर प्रति गैलन रही। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले महंगाई का सवाल ट्रंप के लिए बड़ा सिरदर्द बन चुका है। सर्वेक्षणों के मुताबिक, 78 प्रतिशत अमेरिकी नागरिकों ने बढ़ती जीवन-यापन लागत के लिए ट्रंप की नीतियों को जिम्मेदार माना है। इसलिए जब अमेरिकी मतदाताओं की जेब का सवाल आया, तो रूस से डीजल खरीदना ट्रंप के लिए राष्ट्रीय हित बन गया। लेकिन भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और आर्थिक हितों के अनुसार रूसी तेल खरीदे, तो उसे टैरिफ का सामना करना पड़ता है। इसलिए सवाल उठता है कि यह कैसी निष्पक्षता है? यह कैसी नियम-आधारित व्यवस्था है, जिसमें नियम दूसरों के लिए हैं और छूट अपने लिए?</p><p>दूसरी ओर, ट्रंप के इस फैसले ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की की नाराजगी भी बढ़ा दी है। उन्होंने इसे अनुचित और बेईमानी भरा कदम बताते हुए कहा कि इससे पुतिन को जन्मदिन का उपहार मिलने जैसा संदेश जाता है। जेलेंस्की की आपत्ति इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि यह घोषणा ऐसे समय हुई, जब ट्रंप के प्रतिनिधि यूक्रेनी और यूरोपीय अधिकारियों के साथ युद्ध समाप्त करने के प्रस्तावों पर बातचीत कर रहे थे।</p><p>जेलेंस्की ने यह भी संकेत दिया कि यदि ऊर्जा प्रतिबंधों में ढील दोनों देशों की ओर से सर्दियों में ऊर्जा ढांचे पर हमले रोकने जैसे पारस्परिक समझौते का हिस्सा होती, तो उसका समर्थन किया जा सकता था। लेकिन बिना ऐसी शर्तों के रियायत देना रूस की युद्ध क्षमता को आर्थिक सहारा देने जैसा दिखाई देता है। वहीं अमेरिकी रिपब्लिकन नेता डॉन बेकन ने भी इस फैसले की आलोचना की। उनका तर्क था कि अमेरिकी किसानों और उपभोक्ताओं के लिए डीजल सस्ता करना जरूरी है, लेकिन इसके लिए रूस से ईंधन खरीदना गलत रास्ता है। उन्होंने पूछा कि जब अमेरिकी संसद ने रूस पर दबाव बढ़ाने के लिए कानून पारित किया और ट्रंप ने स्वयं उस पर हस्ताक्षर किए, तो अब उसी दबाव को कमजोर करने का औचित्य क्या है?</p><p>इसके अलावा, ट्रंप की राजनीति का दूसरा चिंताजनक पहलू अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति उनका रवैया है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय की पूर्व न्यायाधीश नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलने के कुछ ही घंटों बाद ट्रंप प्रशासन ने न्यायालय के विरुद्ध प्रतिबंधों की घोषणा कर दी। नवी पिल्लै को सम्मान ऐसे समय मिला, जब अंतरराष्ट्रीय न्यायिक संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव बढ़ने को लेकर चिंताएं व्यक्त की जा रही थीं। नोबेल समिति ने युद्ध अपराधियों को जवाबदेह ठहराने और पीड़ितों को न्याय दिलाने वाली अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था को शांतिपूर्ण विश्व की अनिवार्य शर्त बताया। नवी पिल्लै को नोबेल शांति पुरस्कार मिलते ही ट्रंप जैसे बौखला गये और कुछ घंटों बाद अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि ट्रंप अमेरिकी नागरिकों पर अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय का अभियोजन स्वीकार नहीं करेंगे। अमेरिकी प्रशासन ने न्यायालय के साथ लेन-देन पर रोक लगाने और उसके संसाधनों को बाधित करने की मंशा जाहिर की। वहीं अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायालय ने इसे कानून के शासन और अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था की बुनियाद पर हमला बताया।</p><p>देखा जाये तो यहां भी वही पुराना सवाल सामने आता है कि क्या अंतरराष्ट्रीय कानून केवल कमजोर देशों और विरोधियों पर लागू होना चाहिए? क्या अमेरिका को अपने नागरिकों और अधिकारियों को किसी भी अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही से ऊपर रखने का अधिकार मिल जाना चाहिए? ऐसा लगता है कि वाशिंगटन अंतरराष्ट्रीय जवाबदेही की सीमाएं अपने हिसाब से तय करना चाहता है। ट्रंप की राजनीति में सबसे बड़ा विरोधाभास यही है कि वे राष्ट्रीय हित का इस्तेमाल कभी प्रतिबंधों को उचित ठहराने के लिए करते हैं, तो कभी उन्हीं प्रतिबंधों को कमजोर करने के लिए। भारत के लिए रूसी तेल आर्थिक और ऊर्जा संबंधी जरूरतों का प्रश्न है, लेकिन अमेरिका के लिए वही रूसी ऊर्जा घरेलू महंगाई घटाने और चुनावी नुकसान रोकने का साधन बन जाती है।</p><p>इसी तरह, अंतरराष्ट्रीय न्याय की बात तब तक स्वीकार्य दिखाई देती है, जब तक वह अमेरिकी सत्ता और उसके सहयोगियों के हितों से न टकराए। जैसे ही जवाबदेही का सवाल उठता है, स्वतंत्र न्यायिक संस्था को ही निशाना बनाया जाने लगता है। यह केवल नीतिगत असंगति नहीं, बल्कि उस नैतिक दावे की कमजोरी है जिसके आधार पर अमेरिका दुनिया को नियमों, लोकतंत्र और न्याय का उपदेश देता रहा है। ट्रंप ने अपने फैसलों से यह धारणा मजबूत की है कि उनके लिए सिद्धांत स्थायी नहीं, बल्कि परिस्थितियों और राजनीतिक लाभ के अनुसार बदलने वाली चीज हैं।</p><p>बहरहाल, ट्रंप चाहे अपने कदमों को अमेरिकी हितों की रक्षा बताएं, लेकिन जब वही कदम दूसरों पर थोपे गए नैतिक मानदंडों को ध्वस्त करते हैं, तो उनकी राजनीति का खोखलापन उजागर होता है। अमेरिका को रूसी डीजल और भारत पर सौ फीसदी टैरिफ, इससे बड़ा दोहरा मापदंड क्या होगा? साथ ही अंतरराष्ट्रीय न्यायालय पर प्रतिबंध लगाकर यदि कोई देश खुद को कानून से ऊपर समझने लगे, तो दुनिया उसे न्याय का संरक्षक नहीं, बल्कि अपने स्वार्थ का प्रहरी ही मानेगी।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 10 Oct 2026 12:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/donald-trump-russia-diesel-deal-india-100-percent-tariff-icc-sanctions</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[एलन मस्क के बयान से उठते गंभीर सवाल- भारत की संप्रभुता और सुरक्षा सर्वोपरि]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/serious-questions-raised-by-elon-musk-statement-india-sovereignty-and-security-are-paramount]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी और दुनिया के मशहूर उद्योगपति एलन मस्क के एक बयान ( सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर किया गया पोस्ट ) ने भारत में कई तरह के गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसका जवाब तलाशना और पूरी गंभीरता से देना बहुत जरूरी हो गया है।</p><p>इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उदारीकरण और भूमंडलीकरण के इस दौर में प्राइवेट कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा होनी ही चाहिए ताकि लोगों को फायदा भी हो और उनके पास चुनने का विकल्प भी हो। इसी तर्क का हवाला देकर भारत के अंदर भी कई लोग एलन मस्क की पीड़ा को सही बताते हुए सरकार को नसीहतें दे रहे हैं। लेकिन भारत की संप्रभुता और वैश्विक कंपनियों को भारत में कारोबार करने की इजाज़त देने के बीच में एक बहुत ही हल्की सी रेखा आती है, जिसे पार करते ही कई तरह की समस्याएं खड़ी हो सकती है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/elon-musk-starlink-india-oligarchs-security-concerns" target="_blank" rel="noopener">Elon Musk ने घेरा तो मोदी सरकार ने दिया करारा जवाब! समझिये Starlink का भारत में प्रवेश क्यों अटका हुआ है?</a></p><p>भारत के अंदर, हर भारतीय को यह स्वतंत्रता है कि वो अपनी सरकार से सवाल पूछ सके, अपनी सरकार पर सवाल उठा सके लेकिन क्या हम यही स्वतंत्रता किसी विदेशी कारोबारी को दे सकते हैं? कतई नहीं, भारत का असली बॉस कौन है, यह तय करने और बताने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ भारतीयों के पास ही रहना चाहिए।</p><p>एलन मस्क ने 8 अक्टूबर को अपने ही सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर पोस्ट कर लिखा, " स्टारलिंक को 165 से ज़्यादा देशों में लाइसेंस मिला हुआ है और कंपनी भारत सरकार के हर नियम और ज़रूरत को पूरा करने में पांच साल से काम कर रही है, फिर भी लाइसेंस क्यों नहीं मिला? क्या अंबानी ही भारत के असली बॉस हैं?" जिस अंदाज में और जितनी तेजी से राहुल गांधी ने इस पर कमेंट किया, उसे लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। मस्क के पोस्ट को रिपोस्ट करते हुए राहुल ने लिखा, " भारत में आपका स्वागत है, एलन। दूसरे शख्स के मिलने तक इंतजार कीजिए।" राहुल गांधी के जवाब से गदगद मस्क ने तुरंत जवाब देते हुए लिखा, "धन्यवाद राहुल, यह वाकई परेशान करने वाला है।"</p><p>यहां यह याद रखना भी बहुत जरूरी है कि मस्क पहले भी आरोप लगा चुके हैं कि भारत में इस सेक्टर से जुड़े बड़े कारोबारी स्टारलिंक की एंट्री भारत के बाज़ार में रोककर अपना दबदबा बनाए रखना चाहते हैं। लेकिन इस बार लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी के जवाब देने के कारण, मामला बहुत गंभीर हो गया है। पिछले कई दिनों से राहुल, देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर मोदी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं और यह बात स्पष्ट तौर पर नज़र आ रही है केंद्र में सत्तारूढ़ सरकार और विपक्षी दल खासकर राहुल के साथ संवादहीनता की स्थिति आ गई है, जिसे कतई सही नहीं माना जा सकता है। इतने गंभीर मसले पर राहुल की इतनी तेजी से की गई टिप्पणी को कतई जायज नहीं ठहराया जा सकता है। यहां साफ-साफ नजर आ रहा है कि राहुल ने एक बड़ी गलती कर दी है,जिसका जवाब अब उन्हें लगातार देते रहना पड़ेगा।</p><p>भारत सरकार ने गुरुवार, 8 अक्टूबर को ही मस्क के आरोपों को खारिज करते हुए यह साफ कर दिया कि, देश में सैटेलाइट कम्युनिकेशन सर्विसेज के लिए तय नियम सभी के लिए एक जैसे हैं। फिलहाल, तीनों कंपनियों के लिए सुरक्षा समीक्षा की प्रोसेस चल रही है। जैसे ही किसी कंपनी की सुरक्षा जांच पूरी हो जाएगी, वह अगली स्टेप यानी स्पेक्ट्रम आवंटन की मांग करने के लिए आगे बढ़ सकती है। सरकार ने आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि, यह कहना बिल्कुल गलत है कि नियमों को किसी के साथ भेदभाव करने के लिए लागू किया जा रहा है। मस्क के अलावा एयरटेल के मालिक सुनील भारती मित्तल की कंपनी यूटेलसैट वनवेब और मुकेश अंबानी की कंपनी रिलायंस जियो भी लाइसेंस लेने की होड़ में है।</p><p>एलन मस्क के आरोप अपनी जगह है लेकिन भारत की कोई भी सरकार देश की सुरक्षा और संप्रभुता से किसी तरह का समझौता नहीं कर सकती है। इस मामले में भारत के महत्वपूर्ण और बड़े राजनीतिक दलों को एक ही पेज पर होना चाहिए। सरकार की यह जिम्मेदारी है कि वह संसद के प्रमुख दलों को इससे जुड़े तथ्यों से अवगत कराएं। सरकार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के करीबी मित्र एलन मस्क को भी दो टूक शब्दों में यह बता देना चाहिए कि बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए भारत की सरकार पर कोई दबाव नहीं डाला जा सकता है। यह मामला बहुत बड़ा है और इसे दुनिया की तमाम बड़ी कंपनियों के लिए एक उदाहरण की तरह पेश किया जाना चाहिए। इसके साथ ही यह भी जरूरी है कि सब कुछ बिना किसी भेदभाव के होना चाहिए लेकिन ट्रंप प्रशासन जिस तरह से भारत, भारतीय कंपनियों और भारतीयों के खिलाफ लगातार फैसले ले रहा है, उसे भी ध्यान में रखना बहुत जरूरी है।</p><p>- संतोष कुमार पाठक<br>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 16:15:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/serious-questions-raised-by-elon-musk-statement-india-sovereignty-and-security-are-paramount</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[“भारतीय प्रतिभा का अपमान बर्दाश्त नहीं होगा'', ट्रंप प्रशासन को करारा जवाब देकर भारत ने लूटी दुनिया की वाहवाही]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-statement-on-announcement-made-by-the-us-department-of-labour]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमेरिका में भारतीय प्रतिभा का लोहा मानने वाले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने अब उसी प्रतिभा के लिए मुश्किलें खड़ी कर दी हैं, जिसने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को वैश्विक ताकत बनाने में अहम भूमिका निभाई है। एक तरफ ट्रंप भारतीय मूल के माइक्रोसॉफ्ट सीईओ सत्य नडेला की तारीफ करते हैं, तो दूसरी तरफ उपराष्ट्रपति जेडी वांस के नेतृत्व में अमेरिकी प्रशासन माइक्रोसॉफ्ट, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो और कॉग्निजेंट समेत आठ प्रमुख प्रौद्योगिकी कंपनियों को ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया से जुड़े PERM कार्यक्रम से निलंबित कर देता है। इस फैसले से हजारों भारतीय आईटी पेशेवरों के भविष्य और अमेरिका में स्थायी निवास पाने की उम्मीदों पर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं।</p><p>हालांकि, भारत सरकार ने इस मामले पर अपनी प्रतिक्रिया में स्पष्ट किया है कि PERM कार्यक्रम और एच-1बी वीजा अलग-अलग व्यवस्थाएं हैं तथा PERM आवेदनों पर रोक लगने से मौजूदा एच-1बी वीजा या उनके धारकों और आश्रितों की स्थिति अपने आप प्रभावित नहीं होती, भले ही पात्र कर्मचारियों की ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर असर पड़ सकता है। विदेश मंत्रालय ने यह भी दोटूक कहा है कि प्रतिभाओं की आवाजाही भारत और अमेरिका, दोनों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए फायदेमंद है। इससे अमेरिकी कंपनियों को उच्च कौशल वाले पेशेवर, नवाचार, अनुसंधान, उत्पादकता, प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता और रोजगार सृजन में मदद मिलती है। मंत्रालय ने वांस की उन टिप्पणियों पर भी आपत्ति जताई है, जिनमें विदेशी कर्मचारियों के लिए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया गया।</p><p>भारत ने कहा कि अमेरिका में भारतीय पेशेवर उच्च शिक्षित और कुशल योगदानकर्ता हैं तथा उन्हें औपनिवेशिक इतिहास की पीड़ादायक याद दिलाने वाली भाषा से संबोधित करना गहरे तौर पर आपत्तिजनक है। देखा जाये तो भारत का यह बयान महज औपचारिक कूटनीतिक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि वाशिंगटन के लिए स्पष्ट संदेश है कि भारतीय प्रतिभा को अपमानित करके और उसके अवसर सीमित करके दोनों देशों की साझा महत्वाकांक्षाओं को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता। अब बड़ा सवाल यह है कि ट्रंप प्रशासन का यह कदम अमेरिकी रोजगार की सुरक्षा तक सीमित है या इसके पीछे चुनावी राजनीति, भारत पर आर्थिक दबाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ संबंधों के समीकरण भी काम कर रहे हैं?</p><p>उल्लेखनीय है कि उपराष्ट्रपति जेडी वांस, श्रम सचिव कीथ सॉन्डरलिंग और अटॉर्नी जनरल टॉड ब्लांश ने अमेरिकी एंटी-फ्रॉड टास्क फोर्स पहल के तहत आठ प्रौद्योगिकी कंपनियों को PERM कार्यक्रम से निलंबित करने की घोषणा की। इनमें माइक्रोसॉफ्ट, एडोबी, टीसीएस, इंफोसिस, विप्रो, एचसीएल टेक्नोलॉजीज, कॉग्निजेंट और कैपजेमिनी शामिल हैं। प्रशासन का आरोप है कि कुछ कंपनियों ने विदेशी कर्मचारियों की भर्ती के लिए ऐसी व्यवस्था का इस्तेमाल किया, जिससे अमेरिकी कामगारों के रोजगार और वेतन पर प्रतिकूल असर पड़ा।</p><p>अब सवाल उठता है कि आखिर PERM है क्या और इस पर रोक से भारतीयों को कितना नुकसान होगा? हम आपको बता दें कि PERM यानी Permanent Labor Certification रोजगार आधारित ग्रीन कार्ड हासिल करने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण चरण है। सामान्यतः नियोक्ता को अमेरिकी श्रम विभाग से प्रमाणित कराना होता है कि संबंधित पद के लिए पर्याप्त इच्छुक और योग्य अमेरिकी कर्मचारी उपलब्ध नहीं हैं और विदेशी कर्मचारी की नियुक्ति से अमेरिकी कर्मचारियों के वेतन तथा कामकाजी परिस्थितियों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके बाद ही नियोक्ता विदेशी कर्मचारी के रोजगार आधारित स्थायी निवास की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है।</p><p>इस कार्यक्रम से आठ कंपनियों को बाहर करने का मतलब यह है कि वे नई PERM अर्जियां दाखिल नहीं कर पाएंगी और उनकी लंबित अर्जियों पर भी प्रक्रिया रुक जाएगी। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इन कंपनियों में काम कर रहे सभी भारतीयों के एच-1बी वीजा रद्द हो गए हैं या उन्हें तत्काल अमेरिका छोड़ना पड़ेगा। असली खतरा उन कर्मचारियों के लिए है जो छह साल की सामान्य एच-1बी अवधि के करीब पहुंच रहे हैं और अमेरिका में लंबे समय तक बने रहने के लिए ग्रीन कार्ड प्रक्रिया पर निर्भर हैं। कुछ परिस्थितियों में ग्रीन कार्ड की प्रक्रिया के निर्धारित चरण पूरे होने पर एच-1बी अवधि बढ़ाई जा सकती है। PERM प्रक्रिया रुकने से ऐसे कर्मचारियों के लिए भविष्य की योजना बनाना कहीं अधिक मुश्किल हो सकता है। देखा जाये तो अमेरिकी प्रशासन की इस कार्रवाई ने भारतीय आईटी उद्योग से लेकर अमेरिका में पढ़ाई और नौकरी करने का सपना देखने वाले युवाओं तक अनिश्चितता बढ़ा दी है।</p><p>जेडी वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर सबसे तीखा हमला करते हुए आरोप लगाया कि कंपनी ने 2025 में करीब 6,000 अमेरिकी कर्मचारियों की छंटनी की, लेकिन साथ ही 6,000 से अधिक एच-1बी वीजा की मंजूरी हासिल की और 3,600 से अधिक PERM आवेदन भी दाखिल किए। उन्होंने विदेशी कर्मचारियों को 'फॉरेन इंडेंचर्ड सर्वेंट्स' और ऐसी कंपनियों को 'वीजा मिल्स' तक कह दिया। श्रम सचिव सॉन्डरलिंग का दावा है कि केवल इन कंपनियों ने 2009 से लगभग 30 लाख विदेशी कर्मचारियों के लिए अनुरोध किए, 2.30 लाख से अधिक एच-1बी वीजा मंजूर कराए और एक लाख से अधिक PERM प्रमाणन हासिल किए। प्रशासन इन आंकड़ों को अमेरिकी कामगारों के अवसर छिनने से जोड़ रहा है। लेकिन आवेदन, मंजूरी, वास्तविक नियुक्ति और अमेरिकी कर्मचारी की जगह विदेशी कर्मचारी रखे जाने के आंकड़े अलग-अलग हैं।</p><p>माइक्रोसॉफ्ट का पक्ष भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। कंपनी ने कहा है कि उसके करीब 6,000 एच-1बी आवेदनों में लगभग 80 प्रतिशत मौजूदा कर्मचारियों के वीजा विस्तार या उनकी स्थिति बदलने से संबंधित थे। इसका अर्थ है कि सभी आवेदनों को नई विदेशी भर्तियों के रूप में नहीं देखा जा सकता। साथ ही नेशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर सॉफ्टवेयर एंड टेक्नोलॉजी प्रोफेशनल्स के संस्थापक राजीव दाभाडकर की व्याख्या इस विवाद का एक महत्वपूर्ण पहलू सामने लाती है। उनके मुताबिक, अमेरिकी प्रशासन अब केवल यह नहीं पूछ रहा कि विदेशी कर्मचारी योग्य है या नहीं, बल्कि यह भी जांच रहा है कि विदेशी श्रम की भर्ती, भुगतान और आपूर्ति का कारोबारी मॉडल किस तरह काम करता है। उदाहरण के लिए, यदि किसी तकनीकी पद के लिए अमेरिकी कंपनी एक लाख पचास हजार डॉलर खर्च करती है और कोई मध्यस्थ विदेशी कर्मचारी को उसकी वास्तविक आर्थिक कीमत से काफी कम भुगतान करके अंतर अपने मुनाफे के रूप में रखता है, तो सवाल भारतीय कर्मचारी बनाम अमेरिकी कर्मचारी का नहीं, बल्कि पारदर्शी वेतन बनाम श्रम लागत के अनुचित लाभ का बनता है। यह जांच का वैध विषय हो सकता है, लेकिन इसका इस्तेमाल सभी भारतीय पेशेवरों को संदेह के घेरे में रखने के लिए नहीं होना चाहिए।</p><p>अब सवाल उठता है कि ट्रंप ने सत्य नडेला की तारीफ क्यों की और वांस ने माइक्रोसॉफ्ट पर इतना सख्त रुख क्यों अपनाया? इसका उत्तर अमेरिकी राजनीति की दो प्राथमिकताओं में है। ट्रंप को आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्लाउड कंप्यूटिंग और तकनीकी निवेश में अमेरिकी नेतृत्व मजबूत करना है। माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनी इस लक्ष्य में महत्वपूर्ण है। दूसरी ओर, वांस और रिपब्लिकन राजनीति का एक प्रमुख संदेश अमेरिकी नागरिकों को प्राथमिकता देना और विदेशी श्रमिकों पर निर्भरता घटाना है। किसी कंपनी के सीईओ की उपलब्धियों की प्रशंसा करना और उसी कंपनी की श्रम नीतियों की जांच करना प्रशासन के लिए विरोधाभासी नहीं है। लेकिन यदि नियमों का इस्तेमाल चुनिंदा कंपनियों को दबाने या राजनीतिक संदेश देने के लिए किया जाता है, तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।</p><p>इस कार्रवाई का चुनावी पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। 3 नवंबर 2026 को होने वाले अमेरिकी मध्यावधि चुनावों से पहले अमेरिकी कामगारों की नौकरियों की रक्षा करने का संदेश रिपब्लिकन पार्टी के लिए राजनीतिक रूप से उपयोगी है। ट्रंप प्रशासन विदेशी श्रम के खिलाफ सख्त रुख दिखाकर अपने मतदाताओं को यह भरोसा देना चाहता है कि वह अमेरिकी रोजगार को प्राथमिकता दे रहा है। इसके साथ ही यह भी माना जा रहा है कि अपने तेवर कड़े दिखाकर जेडी वांस अगला राष्ट्रपति चुनाव लड़ने की तैयारी भी कर रहे हैं।</p><p>साथ ही भारतीय छात्रों के लिए भी स्थिति चिंताजनक है। पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में काम करने का अवसर देने वाला OPT कार्यक्रम और एच-1बी वीजा व्यवस्था दोनों राजनीतिक बहस के केंद्र में हैं। अंतरराष्ट्रीय छात्रों से संबंधित OPT प्रस्ताव में पहली बार कार्यक्रम में शामिल होने वाले प्रत्येक छात्र के लिए संस्थानों पर 70,000 डॉलर और नवीनीकरण पर 30,000 डॉलर शुल्क लगाने की बात सामने आई है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो विश्वविद्यालयों और नियोक्ताओं पर लागत बढ़ेगी, जिसका बोझ छात्रों पर भी पड़ सकता है। इसके अलावा, नए एच-1बी आवेदनों से संबंधित 1,00,000 डॉलर भुगतान की शर्त को लेकर भी विवाद है। इस शुल्क की लागू करने की प्रक्रिया संघीय अदालतों के आदेशों से फिलहाल बाधित है और मुकदमे जारी हैं।</p><p>माना जा रहा है कि भारतीय आईटी कंपनियों के शुरुआती और मध्यम स्तर के इंजीनियरों पर दबाव अधिक पड़ सकता है। वरिष्ठ इंजीनियरों और बड़ी अमेरिकी तकनीकी कंपनियों में स्थापित पदों पर काम करने वाले कुछ पेशेवर अपेक्षाकृत सुरक्षित हो सकते हैं, लेकिन भारतीय कंसल्टिंग कंपनियों के माध्यम से अमेरिका जाने वाले युवाओं के लिए रास्ता कठिन होता जा रहा है। PERM पर रोक, एच-1बी संबंधी शुल्क विवाद और चयन प्रक्रिया में बदलाव मिलकर उस व्यवस्था को कमजोर कर सकते हैं जिसके सहारे पिछले तीन दशकों में बड़ी संख्या में भारतीय इंजीनियर अमेरिकी तकनीकी उद्योग तक पहुंचे।</p><p>यहां एक सवाल यह भी उठता है कि क्या ट्रंप यह सब इसलिए कर रहे हैं कि भारत पर लगाए गए टैरिफ का अपेक्षित असर नहीं हुआ और अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर दबाव बनाने के लिए नया रास्ता अपनाया जा रहा है? देखा जाये तो इन कंपनियों में भारतीय आईटी उद्योग की प्रमुख हिस्सेदारी और प्रभावित पेशेवरों में भारतीयों की बड़ी संख्या के कारण भारत पर असर गंभीर हो सकता है। फिर भी प्रशासन का घोषित आधार अमेरिकी श्रम बाजार और आव्रजन व्यवस्था है।</p><p>देखा जाए तो ट्रंप प्रशासन की इस कार्रवाई का असर वीजा और ग्रीन कार्ड तक सीमित रहने वाला नहीं है, बल्कि यह भारत-अमेरिका आर्थिक साझेदारी की बुनियाद को भी चुनौती दे सकता है। जिन भारतीय कंपनियों और पेशेवरों ने अमेरिकी तकनीकी उद्योग को अपनी मेहनत, विशेषज्ञता और नवाचार से मजबूत किया, आज उन्हीं के रास्ते में नए अवरोध खड़े किए जा रहे हैं। भारतीय कंपनियों को अमेरिकी बाजार में भर्ती, परियोजनाओं के संचालन और प्रतिभाशाली कर्मचारियों को बनाए रखने की रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। लेकिन अमेरिका को भी समझना होगा कि भारतीय प्रतिभा के लिए दरवाजे संकरे करके वह अपनी ही तकनीकी ताकत और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को नुकसान पहुंचाने का जोखिम उठा रहा है। भारत को इस दबाव के आगे झुकने के बजाय वाशिंगटन से दोटूक कहना चाहिए कि भारतीय कंपनियों और पेशेवरों के साथ किसी भी तरह का भेदभाव स्वीकार नहीं किया जाएगा। साथ ही, भारत को अपनी तकनीकी क्षमता, अनुसंधान और उच्च कौशल वाले रोजगार में इतना निवेश करना होगा कि भारतीय प्रतिभा के भविष्य का फैसला केवल अमेरिकी नीतियां न करें।</p><p>बहरहाल, ट्रंप की नीति भारत के लिए महज एक चेतावनी नहीं, बल्कि आत्मनिर्भर तकनीकी शक्ति बनने की दिशा में निर्णायक कदम उठाने का संकेत है। अमेरिका एक ओर भारतीय मूल के तकनीकी दिग्गजों की सफलता का गुणगान करता है और दूसरी ओर भारतीय पेशेवरों के लिए अवसर सीमित करने वाली नीतियां अपनाता है। यह दोहरा रवैया उस साझेदारी पर सवाल खड़ा करता है, जिसे दोनों देश लोकतांत्रिक मूल्यों, आर्थिक सहयोग और साझा रणनीतिक हितों पर आधारित बताते हैं। भारत को अमेरिका से संबंध तोड़ने की जरूरत नहीं, लेकिन यह भी स्वीकार नहीं किया जा सकता कि भारतीय इंजीनियरों का भविष्य अमेरिकी घरेलू राजनीति और चुनावी लाभ-हानि का मोहरा बन जाए। अब वक्त है कि भारत अपनी प्रतिभा, तकनीकी क्षमता और विशाल बाजार की ताकत को कूटनीतिक आत्मविश्वास में बदले और स्पष्ट संदेश दे कि भारत अमेरिका के साथ साझेदारी चाहता है, किसी की राजनीतिक मजबूरियों की कीमत पर अपने नागरिकों और कंपनियों के हितों से समझौता नहीं होगा।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 13:11:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-statement-on-announcement-made-by-the-us-department-of-labour</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अचूक, अभेद्य और सटीक भारतीय वायु सेना: गर्व के साथ सफलता की ऊंचाइयों को छूते हुए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/iaf-celebrates-94th-anniversary-ranking-third-most-powerful-air-force-globally]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारतीय वायु सेना (आई. ए. एफ.) आज (8 अक्टूबर, 2026) अपनी 94वीं वर्षगांठ मना रही है। यह दिन हवाई सुरक्षा, रणनीतिक प्रतिरोध और मानवीय सेवा के लगभग एक सदी के सफल सफर को दर्शाता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/iaf-chief-amar-preet-singh-recalls-operation-sindoor-on-air-force-day" target="_blank" rel="noopener">IAF प्रमुख Amar Preet Singh ने 'ऑपरेशन सिंदूर' को किया याद! कहा- दुनिया ने देखी भारत की 'विध्वंसक ताकत', वायु सेना हर चुनौती के लिए पूरी तरह तैयार</a></h3><h2>भारतीय वायु सेना दिवस क्यों मनाया जाता है</h2><p>भारतीय वायु सेना दिवस हर साल 8 अक्टूबर को मनाया जाता है, जो 1932 में हमारी वायु सेना &nbsp;की आधिकारिक स्थापना की याद दिलाता है। ब्रिटिश शासन के दौरान 'रॉयल ​​इंडियन एयर फ़ोर्स' के रूप में स्थापित, वायु सेना ने 1950 में अपने नाम से "रॉयल" शब्द हटा दिया। यह दिन उन वायु योद्धाओं (सेवानिवृत्त एवं सेवारत) के साहस, पेशेवर रवैये और बलिदान का सम्मान करता है, जो शांति और संघर्ष के समय भारत के हवाई क्षेत्र, सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करते हैं।</p><h2>भारतीय वायु सेना &nbsp;दिवस समारोह की खास बातें</h2><p>भारतीय वायु सेना &nbsp;दिवस समारोह भव्यता, सटीकता और टेक्नोलॉजी के प्रदर्शन के लिए जाने जाते हैं। &nbsp;सालाना एयर डिस्प्ले और फ्लाईपास्ट में फाइटर जेट, ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और हेलीकॉप्टर के तालमेल वाले हवाई करतब शामिल होते हैं। एयर-वॉरियर परेड में पुरुष और महिला दोनों तरह के कर्मियों का सटीक तालमेल वाला मार्च होता है, जो अनुशासन और मिलिट्री अंदाज़ को दिखाता है।<br>फ्लाई-पास्ट कार्यक्रम को आम जनता तक पहुँचाने के लिए हर साल जगहें बदली जाती हैं, जैसे हिंडन एयर फ़ोर्स बेस, चंडीगढ़ और प्रयागराज। इस साल वाराणसी में 22, 23 और 25 अक्टूबर को फ्लाई-पास्ट डिस्प्ले होगा।<br>थीम-बेस्ड कैंपेन में प्रेस इन्फॉर्मेशन ब्यूरो (पीआईबी) और रक्षा मंत्रालय की तरफ़ से ऑफिशियल प्रमोशनल रिलीज़ शामिल हैं, जिनमें डायनामिक वीडियो कंटेंट होता है, जैसे 2026 का कैंपेन जिसकी थीम है, "इंडियन एयर फ़ोर्स: अचूक, अभेद्य और सटीक।"</p><h2>भारतीय वायु सेना की मुख्य बातें</h2><p>2022 से लगातार पांचवें साल, भारतीय वायु सेना दुनिया भर में अमेरिका और रूस के बाद तीसरे स्थान पर है। यह युद्ध में खुद को साबित कर चुकी और अनुभवी सेना है। साथ ही, यह इस क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना है जो लगातार युद्ध अभियानों में शामिल रही है। 2019 में बालाकोट, 2020 से 2025 तक लद्दाख एल ए सी गतिरोध और मई 2025 में 'ऑपरेशन सिंदूर' जैसे अभियानों ने भारतीय वायु सेना की लंबी दूरी तक हमला करने और हवाई सुरक्षा की क्षमताओं को दिखाया है। ऑपरेशन का अनुभव इसकी एक बड़ी ताकत है।</p><p>भारतीय वायु सेना 250 से ज़्यादा एसयू-30एम के आई एयर-डोमिनेंस फाइटर जेट्स का संचालन करती है। इन्हें एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली स्कैन्ड एरे रडार और अस्त्र मार्क2 मिसाइलों के साथ 'सुपर सुखोई' मानकों के अनुसार अपग्रेड किया जा रहा है। राफेल 4.5-जेनरेशन फाइटर जेट्स, जो मीटियोर और स्कैल्प मिसाइलों और एडवांस्ड इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सूट से लैस हैं, 'ऑपरेशन सिंदूर' में बहुत असरदार साबित हुए। जल्द ही राफेल का एक नया वेरिएंट आने की उम्मीद है। तेजस मार्क-1, अपग्रेडेड मिग-29यूपीजी, मिराज-2000 और जगुआर फाइटर जेट्स जैसे अन्य प्लेटफॉर्म भी अलग-अलग तरह की ऑपरेशनल क्षमताएं प्रदान करते हैं। लेह (10,700 फीट की ऊंचाई) से लेकर कार निकोबार जैसी जगहों से काम करने की भारतीय वायु सेना &nbsp;की क्षमता इसे क्षेत्र की एकमात्र ऐसी वायु सेना बनाती है जो लगातार ऊंचाई वाले इलाकों में ऑपरेशन करने में सक्षम है। भारतीय वायु सेना एस-400 और आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम के साथ &nbsp;आईएसीसीएस और एएफनेट का इस्तेमाल करके असरदार इंटीग्रेटेड नेट-सेंट्रिक ऑपरेशन करती है। ये प्लेटफ़ॉर्म एक यूनिफाइड नेटवर्क के तौर पर काम करते हैं। एयर वॉरियर्स ने टेक्नोलॉजी-बेस्ड ऑपरेशन के तरीके को सफलतापूर्वक अपना लिया है।<br>भारतीय वायु सेना &nbsp;का ट्रेनिंग का तरीका सबसे अच्छे तरीकों में से एक है और भारतीय वायु सेना &nbsp;के पायलटों ने कई इंटरनेशनल एक्सरसाइज़ जीती हैं।</p><p>'आत्मनिर्भर भारत' पहल और देश में ही मॉडर्नाइज़ेशन पर ध्यान देने के अच्छे नतीजे मिल रहे हैं। भारतीय वायु सेना ने 180 तेजस मार्क -1ए एयरक्राफ्ट का ऑर्डर दिया है और आमका (ए एम सी ए), फिफ्थ-जेनरेशन फाइटर, कैटस् टीमिंग ड्रोन और स्वदेशी अस्त्र बी वी आर मिसाइल को मंज़ूरी दी है। ये कदम आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देते हैं, साथ ही बदलाव के दौर में क्षमता की कमियों को दूर करने के लिए लगातार कोशिशें ज़रूरी हैं।</p><h2>इंडियन एयर फ़ोर्स की उपलब्धियाँ</h2><p>कई दशकों के इतिहास में, भारतीय वायु सेना &nbsp;बाइप्लेन के एक छोटे से बेड़े से बढ़कर दुनिया की टॉप पाँच सबसे ताकतवर एयर फ़ोर्स में से एक बन गई है। इसकी मुख्य उपलब्धियों में शामिल हैं:<br>युद्ध के समय बहादुरी: बड़े मिलिट्री ऑपरेशन्स में अहम भूमिका, जिसमें दूसरा विश्व युद्ध; 1948, 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान संघर्ष; 1999 का कारगिल युद्ध शामिल हैं। और 2019 के बालाकोट ऑपरेशन जैसे सटीक क्रॉस-बॉर्डर हमले।<br>सेना का आधुनिकीकरण और स्वदेशी इनोवेशन: पुराने आयातित विमानों से हटकर राफेल और एसयू-30एम के आई जैसे एडवांस्ड मल्टी-रोल फाइटर जेट, तेजस जैसे स्वदेशी हल्के लड़ाकू विमान, सी-17 ग्लोबमास्टर और सी-295 जैसे आधुनिक भारी-भरकम सामान ढोने वाले विमान, और स्वार्म ड्रोन व ड्रोनाथॉन जैसी नई तकनीकों को अपनाना।<br>मानवीय सहायता और आपदा राहत (एच ए डी आर): राष्ट्रीय आपातकाल, बाढ़ और भूकंप के दौरान ज़रूरी बचाव अभियान चलाना, और विदेशों में संघर्ष वाले इलाकों में फँसे नागरिकों और मेडिकल सप्लाई को एयरलिफ्ट करना।</p><h2>आज भारतीय वायु सेना के सामने चुनौतियाँ</h2><p>शानदार क्षमताओं के बावजूद, भारतीय वायु सेना को ऑपरेशन, स्ट्रक्चर और प्लानिंग से जुड़ी अहम चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। भारतीय वायु सेना &nbsp;के लड़ाकू विमानों की संख्या में काफी कमी आ रही है। हालाँकि 42 फाइटर स्क्वाड्रन की मंज़ूरी है, लेकिन अभी संख्या इससे कम है। 2030 के दशक में इनके और कम होने की उम्मीद है क्योंकि मिग-21, मिग-29, जगुआर और मिराज-2000 जैसे पुराने बेड़े तेज़ी से रिटायर हो रहे हैं और उनकी जगह नए विमान उतनी तेज़ी से नहीं आ रहे हैं। यह बढ़ता अंतर भविष्य की तैयारी के लिए सेना के आधुनिकीकरण को बहुत ज़रूरी बनाता है। एयर चीफ मार्शल एयर मार्शल ए.पी. सिंह ने 3 अक्टूबर 2026 को कहा, "हमारी संख्या कम है, लेकिन हम कमज़ोर नहीं हैं," जो भारतीय वायु सेना &nbsp;की मौजूदा स्थिति को दर्शाता है।</p><p>2021 में ऑर्डर किए गए स्वदेशी तेजस मार्क-1ए का एक स्क्वाड्रन साल के आखिर तक शामिल कर लिया जाएगा। तेजस मार्क-2 की पहली उड़ान सितंबर 2027 तक होने की संभावना है, जबकि आमका (ए एम सी ए) की पहली उड़ान सितंबर 2028 तक होने की उम्मीद है। भारतीय वायु सेना &nbsp;उत्तरी सीमा पर लंबे समय से चल रहे और बहुत अहम सैन्य गतिरोध को संभाल रही है, साथ ही परमाणु हथियार वाले पश्चिमी पड़ोसी के खिलाफ रणनीतिक तैयारी भी बनाए हुए है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/trending/indian-air-force-day-2026-marks-94th-anniversary-with-air-show" target="_blank" rel="noopener">Indian Air Force का 94वां स्थापना दिवस, Hindan Air Force Station पर भव्य परेड</a></h3><p>चीन का सैन्य बुनियादी ढांचे, एयरफील्ड और क्वांटम कंप्यूटिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्टील्थ क्षमताओं जैसी अगली पीढ़ी की तकनीकों का तेज़ी से आधुनिकीकरण क्षेत्रीय निर्माण क्षमताओं से कहीं आगे निकल रहा है। इससे प्रभावी 'फोर्स मल्टीप्लायर' (सैन्य क्षमता बढ़ाने वाले साधनों) और लगातार आधुनिकीकरण के ज़रिए सीमित संसाधनों का ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेमाल करने की ज़रूरत बढ़ जाती है। इन-फ्लाइट रिफ्यूलर (आई एल-78), एयरबोर्न वार्निंग एंड कंट्रोल सिस्टम (अवाक्स), लंबी दूरी की सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइल बैटरी और मज़बूत अनमैन्ड एरियल कॉम्बैट सिस्टम (यू ए एस) जैसे अहम 'फोर्स मल्टीप्लायर' की कुल संख्या में अभी भी कमी है, जिससे इन क्षमताओं को बड़े पैमाने पर तैनात करने में सीमाएँ आती हैं। भारतीय वायु सेना &nbsp;की लगातार प्रभावशीलता बनाए रखने के रोडमैप के लिए इन कमियों को दूर करना ज़रूरी है।</p><p>--- प्रोफेसर (डॉ.) डी. के. पांडेय</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 08 Oct 2026 13:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/iaf-celebrates-94th-anniversary-ranking-third-most-powerful-air-force-globally</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Elon Musk ने घेरा तो मोदी सरकार ने दिया करारा जवाब! समझिये Starlink का भारत में प्रवेश क्यों अटका हुआ है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/elon-musk-starlink-india-oligarchs-security-concerns]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत में एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स की उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवा स्टारलिंक की शुरुआत को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। एलन मस्क ने भारत में अपनी कंपनी की राह में “कुछ प्रभावशाली उद्योगपतियों” के रोड़े अटकाने का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि ये कारोबारी भारतीय जनता पर अपना एकाधिकार और नियंत्रण बनाए रखने के लिए स्टारलिंक को भारत में प्रवेश नहीं करने दे रहे हैं। मस्क ने यहां तक कह दिया कि यह “भारत की जनता के खिलाफ अपराध” है। लेकिन मस्क के इस बयान के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत जैसे संप्रभु देश की सुरक्षा और दूरसंचार नीति अब किसी अरबपति के सोशल मीडिया बयान से तय होगी?</p><p>उधर, भारत सरकार ने मस्क के आरोप को सीधे खारिज कर दिया है। सरकार का कहना है कि भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाओं के लिए बनाए गए नियम निष्पक्ष और किसी भी कंपनी के साथ भेदभाव से मुक्त हैं। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इन नियमों को किसी कंपनी के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताना पूरी तरह बेबुनियाद और गलत समझ पर आधारित है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत सरकार ने साफ किया है कि स्टारलिंक अकेली कंपनी नहीं है जो मंजूरी की प्रक्रिया में है। सुनील भारती मित्तल समर्थित वनवेब, मुकेश अंबानी की रिलायंस जियो और एलन मस्क की स्टारलिंक, तीनों कंपनियों के मामले में सुरक्षा संबंधी जांच चल रही है। सरकार के मुताबिक तीनों कंपनियां फिलहाल लगभग एक ही नियामकीय चरण में हैं। तो फिर मस्क से पहला सवाल यही पूछा जाना चाहिए कि अगर भारत सरकार तीनों कंपनियों की सुरक्षा जांच कर रही है, तो केवल स्टारलिंक को रोकने का आरोप भारत पर क्यों लगाया जा रहा है?</p><p>इस विवाद का दूसरा और बेहद अहम पहलू इसके समय से जुड़ा है। एलन मस्क का बयान ऐसे समय आया जब भारत दुनिया के सामने अपनी संचार और डिजिटल जगत की तकनीकी क्षमता का प्रदर्शन करने के लिए तैयार था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस के दसवें संस्करण का उद्घाटन किया। दुनिया के सौ से अधिक देशों की भागीदारी वाले इस आयोजन में भारत की 5जी तकनीक, डिजिटल संपर्क व्यवस्था, दूरसंचार क्षेत्र की उपलब्धियों और भविष्य की संचार तकनीक को दुनिया के सामने रखा जा रहा है। जब पूरी दुनिया भारत की संचार क्रांति और तकनीकी प्रगति को देखने के लिए जुटी थी, उसी समय स्टारलिंक को लेकर मस्क का तीखा बयान सामने आया। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह महज एक कारोबारी असहमति थी या फिर इस बयान के समय ने भारत की तकनीकी उपलब्धियों से दुनिया का ध्यान हटाकर स्टारलिंक विवाद की तरफ मोड़ दिया? यह सवाल उठेगा ही कि भारत के सबसे बड़े दूरसंचार आयोजनों में से एक के दौरान ही इस तरह का सार्वजनिक आरोप लगाने की जरूरत आखिर एलन मस्क को क्यों पड़ी?</p><p>अब बात उस मुद्दे की, जिस पर भारत सरकार कोई समझौता नहीं करना चाहती है। वह मुद्दा है राष्ट्रीय सुरक्षा। भारत ने स्टारलिंक को देश में आने से पूरी तरह मना नहीं किया है। कंपनी को भारत में उपग्रह आधारित संचार सेवाएं देने का आवश्यक लाइसेंस मिल चुका है। लेकिन लाइसेंस मिलना सेवा शुरू करने की अंतिम अनुमति नहीं है। इसके बाद सुरक्षा मंजूरी, रेडियो तरंगों के आवंटन और अन्य आवश्यक नियमों का पालन करना पड़ता है। यहीं पर मस्क के आरोप की असली परीक्षा होती है।</p><p>देखा जाये तो उपग्रह आधारित इंटरनेट सामान्य इंटरनेट सेवा से अलग है। यहां केवल तेज इंटरनेट पहुंचाने का सवाल नहीं है। इसके साथ भारतीय नागरिकों के आंकड़ों की सुरक्षा, आंकड़ों को देश के भीतर रखने, संचार की वैध निगरानी, आपातकालीन परिस्थितियों में सरकारी पहुंच और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर प्रश्न जुड़े हैं। भारत यह सुनिश्चित करना चाहता है कि भारतीय उपयोगकर्ताओं का आंकड़ा कहां रखा जाएगा, संचार व्यवस्था पर किसका नियंत्रण होगा और राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसियों को कानून के तहत आवश्यकता पड़ने पर आवश्यक जानकारी और पहुंच किस प्रकार उपलब्ध होगी?</p><p>वहीं स्टारलिंक ने भारत की सुरक्षा संबंधी चिंताओं को दूर करने की कोशिश करते हुए दावा किया है कि उसने भारत में लगभग 20 जमीन आधारित केंद्र तैयार किए हैं और भारतीय उपयोगकर्ताओं के आंकड़ों को देश के भीतर रखने के लिए विशेष सुरक्षा व्यवस्था विकसित की है। कंपनी की वरिष्ठ अधिकारी लॉरेन ड्रेयर ने इंडिया मोबाइल कांग्रेस में कहा कि भारत से सभी आवश्यक मंजूरियां मिलने के बाद कंपनी सेवा शुरू करने के लिए तैयार है। लेकिन भारत का रुख बिल्कुल स्पष्ट है, पहले सुरक्षा, उसके बाद सेवा।</p><p>साथ ही भारत के निष्पक्ष रवैये का एक बड़ा उदाहरण खुद एलन मस्क की दूसरी कंपनी टेस्ला है। भारत ने टेस्ला को देश में कारोबार करने से नहीं रोका। टेस्ला ने मुंबई में अपना पहला शोरूम खोला और भारत में अपनी इलेक्ट्रिक कारों की बिक्री शुरू की। अगर भारत सरकार वास्तव में मस्क की कंपनियों के खिलाफ होती, तो टेस्ला को भारतीय बाजार में प्रवेश की अनुमति क्यों दी जाती? लेकिन क्या कार बेचने और देश की संचार व्यवस्था का हिस्सा बनने को एक ही तराजू में तौला जा सकता है? बिल्कुल नहीं। कार एक उपभोक्ता वस्तु है, जबकि देश की संचार व्यवस्था सीधे राष्ट्रीय सुरक्षा, आंकड़ों और रणनीतिक संचार से जुड़ी होती है। इसलिए दोनों क्षेत्रों में सुरक्षा के अलग-अलग मानक होना स्वाभाविक है।</p><p>यही बात मस्क के आरोपों पर सबसे बड़ा सवाल खड़ा करती है। अगर भारत स्टारलिंक के साथ भेदभाव कर रहा है, तो वनवेब और रिलायंस जियो भी सुरक्षा जांच की प्रक्रिया से क्यों गुजर रहे हैं? और अगर भारत किसी एक कारोबारी समूह को फायदा पहुंचाना चाहता है, तो फिर मस्क की टेस्ला को भारत में कारोबार करने की अनुमति क्यों दी गई? इसमें कोई दो राय नहीं कि एलन मस्क को भारत के फैसले पर सवाल उठाने का अधिकार है। लेकिन किसी संप्रभु देश की नियामकीय प्रक्रिया पर सवाल उठाने के साथ आरोपों के समर्थन में ठोस प्रमाण देना भी जरूरी है। केवल सोशल मीडिया पर “प्रभावशाली उद्योगपतियों” वाला आरोप लगा देना इस बात का प्रमाण नहीं बन जाता कि भारत की व्यवस्था पक्षपातपूर्ण है।</p><p>भारत को विदेशी निवेश चाहिए, नई तकनीक चाहिए और दुनिया की बड़ी कंपनियों का स्वागत भी है। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि किसी विदेशी कंपनी को राष्ट्रीय सुरक्षा से ऊपर रखा जाए। भारत किसी अरबपति की निजी संपत्ति नहीं है और न ही किसी कारोबारी की सोशल मीडिया टिप्पणी भारत की नीतियां तय कर सकती है। भारत अपने फैसले अपनी संप्रभुता, अपने कानून, अपनी सुरक्षा और अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर करेगा। यही किसी भी स्वतंत्र राष्ट्र का अधिकार है और यही उसकी जिम्मेदारी भी है।</p><p>एलन मस्क को यह भी समझना होगा कि भारत की सुरक्षा चिंता को केवल आशंका मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के दूसरे देशों में भी Starlink को लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा और नियंत्रण से जुड़े गंभीर सवाल उठे हैं। ऑस्ट्रेलिया के सरकारी सुरक्षा अधिकारियों ने चेतावनी दी है कि निजी उपग्रह इंटरनेट कंपनियों पर किसी देश का नियंत्रण सीमित हो सकता है। ऐसे में इन कंपनियों पर जरूरत के मुताबिक निगरानी और नियंत्रण न होने से देश की सुरक्षा और संप्रभुता के लिए खतरा पैदा हो सकता है। यूक्रेन में तो Starlink की भूमिका सीधे युद्ध और सुरक्षा से जुड़ चुकी है। अमेरिकी सरकारी जांच में पाया गया कि Starlink दोहरे उपयोग वाली तकनीक है, जिसका इस्तेमाल नागरिक संचार के साथ-साथ युद्धक्षेत्र में ड्रोन संचालन, तोपों के निशाने और सैन्य संचार के लिए भी हुआ। जांच में यह भी सामने आया कि बड़ी संख्या में Starlink उपकरण ऐसे क्षेत्रों में पहुंच गए थे जहां उनके दुरुपयोग या चोरी का जोखिम था। यही नहीं, 2026 में यूक्रेन ने रूसी ड्रोन के लिए Starlink के अवैध इस्तेमाल को रोकने के उद्देश्य से केवल अधिकृत उपकरणों को सेवा देने की व्यवस्था लागू की। म्यांमार में भी Starlink पर गंभीर आरोप लगे हैं। अंतरराष्ट्रीय जांचों में सामने आया कि मानव तस्करी और साइबर ठगी के लिए चलाए जा रहे कुख्यात ठिकानों में Starlink का इस्तेमाल हो रहा था; एक कार्रवाई में ऐसे ही एक परिसर से 30 Starlink उपकरण जब्त किए गए थे।</p><p>यहां तक कि अमेरिकी सांसदों ने भी दक्षिण-पूर्व एशिया के इन ठगी केंद्रों में Starlink के इस्तेमाल को लेकर कंपनी से जवाब मांगा है। वैसे इन घटनाओं का अर्थ यह नहीं है कि Starlink स्वयं इन अपराधों में शामिल है, लेकिन ये घटनाएं यह जरूर दिखाती हैं कि इतनी शक्तिशाली और सीमापार काम करने वाली उपग्रह इंटरनेट व्यवस्था के इस्तेमाल पर किसी देश की सरकारें नियंत्रण, निगरानी और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर इतनी सतर्क क्यों हैं? ऐसे में भारत अगर अपने यहां Starlink को पूरी सुरक्षा जांच और स्पष्ट शर्तों के बाद ही अनुमति देना चाहता है, तो इसमें गलत क्या है?</p><p>बहरहाल, भारत में कारोबार करने के लिए दुनिया की कंपनियों का स्वागत है, लेकिन भारत की जमीन पर कारोबार करने वाली हर कंपनी को भारत के कानून, भारत के नियम और भारत की सुरक्षा शर्तों का पालन करना ही होगा। भारत तकनीक का स्वागत करेगा, निवेश का स्वागत करेगा और प्रतिस्पर्धा का भी स्वागत करेगा, लेकिन अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा की कीमत पर नहीं।</p><p>-नीरज कुमार दुबे<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 08 Oct 2026 11:43:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/elon-musk-starlink-india-oligarchs-security-concerns</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[एसआईआर पर हंगामा, हकीकत से ज्यादा फसाना]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/controversy-over-sir-project-based-more-on-rumours-than-reality]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर सियासी पारा लगातार चढ़ा हुआ है। विशेषकर विपक्षी दल जिस तरह से इस पूरी प्रक्रिया पर सवाल उठा रहे हैं, उससे माहौल में एक भ्रम फैल रहा है। विपक्षी हंगामे और सवालों के चलते ऐसे लोगों की संख्या बढ़ी है, जो मानने लगे हैं कि मतदाता सूची की जांच एक तरह से नागरिकता की जांच हो गई है। लोग एक बारगी वोटर न होने को बर्दाश्त कर भी लें, लेकिन कोई नहीं चाहेगा कि उसकी जन्मजात नागरिकता पर सवाल उठे या वह खतरे में पड़े। कहना न होगा कि विशेषकर पश्चिम बंगाल में हुए एसआईआर के बहाने विपक्ष यह भ्रम और डर-दोनों फैलाने में किंचित सफल रहा है। हालांकि यह भी सच है कि ऐसा भ्रम और डर सिर्फ पश्चिम बंगाल और बिहार के ही कुछ इलाकों में ही दिख रहा है। एसआईआर उत्तर प्रदेश में भी हुआ है और दिल्ली में भी जारी है। एसआईआर तमिलनाडु में भी हुआ है। लेकिन यहां के मतदाताओं के बीच ऐसा भ्रम और डर न के बराबर दिखा है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/justice-shiv-narayan-dhingra-defends-eci-voter-list-revision-process" target="_blank" rel="noopener">Voter List विवाद पर पूर्व जज SN Dhingra का बयान, ECI की SIR प्रक्रिया को बताया जरूरी</a></h3><p>ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर बिहार और पश्चिम बंगाल में ऐसा डर क्यों दिख रहा है? इसकी वजह है, वहां पिछले कुछ दशकों में बांग्लादेश से बढ़ी घुसपैठ। पश्चिम बंगाल में जब सत्ता में वाममोर्चा था, तब यही ममता बनर्जी वहां घुसपैठ के मुद्दे को उछालती रहती थीं और वाममोर्चे पर आरोप लगाती रहती थीं कि वह इसे बढ़ावा दे रहा है। ममता बनर्जी इस बहाने परोक्ष रूप से वाममोर्चा पर आरोप लगाती थीं कि मतदाता बने घुसपैठियों के ही सहारे वह पश्चिम बंगाल की सत्ता में काबिज है। बाद के दिनों में ये मतदाता ममता के समर्थक हो गए और ममता की सत्ता के आधार बनने लगे तो उन्हें भी यह मामला फिजूल का लगने लगा। बिहार का सीमांचल इलाका भी बांग्लादेशी घुसपैठ से प्रभावित रहा है। इसलिए वहां भी ऐसे सवाल और भ्रम उठ रहे हैं। चूंकि एसआईआर में ऐसे अवैध मतदाता ज्यादा सवालों के घेरे में हैं या फिर उनके नाम कट रहे हैं, इस वजह से इन्हीं राज्यों में यह मुद्दा कुछ ज्यादा तुर्श दिख रहा है।</p><p>मतदाता सूची में सुधार और उसमें चुनाव आयोग एवं मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका पर भी बड़े सवाल उठे हैं। सवाल यह भी है कि क्या एसआईआर को लेकर उठाए जा रहे सवाल असल में प्रक्रियात्मक और कानूनी हैं या इनके जरिए सिर्फ राजनीति हो रही है? पहले ही कहा जा चुका है कि एसआईआर को लेकर विपक्षी दलों की सबसे ज्यादा आपत्तियां बिहार और पश्चिम बंगाल से जुड़ी बताई जा रही हैं। कुछ राजनेताओं और दलों ने एसआईआर के आधार पर इन राज्यों के चुनावी परिणामों और मतदाता सूची की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। यहां ध्यान रखने की बात है कि एसआईआर केरल और तमिलनाडु जैसे राज्यों में भी हुआ, लेकिन वहां बिहार या पश्चिम बंगाल की तरह इस पर सियासी विवाद नहीं हुआ। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि यदि कुछ राज्यों में एसआईआर को लेकर गंभीर आपत्ति नहीं है तो फिर एक या दो राज्यों &nbsp;में गंभीर आपत्तियां क्या राजनीतिक एजेंडे की वजह से तो नहीं उठाई जा रहीं? एसआईआर को देखने और समझने की एक ही कसौटी हर राज्य में क्यों नहीं लागू की जा रही है? इससे तो यही संकेत जाता है कि इसका सियासी विरोध सेलेक्टिव है और दोहरे मापदंड से भरा हुआ है।</p><h2>क्या है एसआईआर की मानक प्रक्रिया?</h2><p>एसआईआर को लेकर जारी बहस में बड़े पैमाने पर नाम हटाने, तकनीकी प्रणाली के इस्तेमाल और पारदर्शिता जैसे सवाल उठाए गए हैं। मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया निर्धारित कानूनी और प्रशासनिक चरणों के तहत होती है। नाम हटाने से पहले मतदाता को नोटिस जारी करने और उसकी आपत्तियों और तर्कों की सुनवाई की जाती है। इसके बाद आखिरी निर्णय संबंधित निर्वाचन अधिकारी के स्तर पर होता है। इसलिए ड्राफ्ट मतदाता सूची में किसी मतदाता का नाम नहीं होना और अंतिम मतदाता सूची से नाम हट जाना, एक ही बात नहीं है। इसलिए जरूरी है कि दावे, ड्राफ्ट आंकड़े, आपत्तियों और अंतिम निर्णय, इन सभी चरणों को अलग-अलग समझा जाए। हर स्तर पर चूंकि आयोग ने पारदर्शी व्यवस्था अपना रखी है, इसे समझना हो तो अभी दिल्ली के किसी बीएलओ केंद्र का दौरा किया जा सकता है। दिल्ली में खूब नोटिस जारी किए गए हैं, उनके जवाब में लोग बीएलओ यानी बूथ स्तर के अधिकारी के पास पहुंच रहे हैं। लेकिन अफरातफरी, घबराहट या दहशत नहीं दिख रही। बीएलओ लोगों से जरूरी फॉर्म और प्रमाण ले रहे हैं। ज्यादातर नोटिस की वजह पूरा नाम ना होना, नाम की वर्तनी गलत होना, पिता या पति के नाम का पूरा न होना या फिर उनके नाम की वर्तनी में गड़बड़ी या कमी होना है। अधिकारियों का कहना है कि ईसीआईनेट का सॉफ्टवेयर मतदाता सूची के पहले से जारी नाम और आवेदन में कुछ ही गड़बड़ी पाता है तो वह नोटिस जेनरेट कर देता है। उदाहरण के लिए, पहले से किसी का नाम मतदाता सूची में सिर्फ रमेश दर्ज है, जबकि उसका पूरा नाम रमेश शर्मा है, या इसी तरह उसके पिता का पूरा नाम दर्ज नहीं है। लेकिन पहचान के दूसरे दस्तावेजों में उसका पूरा नाम दर्ज है। जब आयोग के अधिकारी ईसीआईनेट पर इसे लोड करते हैं तो सॉफ्टवेयर इस गड़बड़ी या बेमेल तथ्य को पकड़ता है। इसी तरह किसी का पता बदल गया है, जो पहले से दर्ज रिकॉर्ड से अलग है तो उसे भी नोटिस जा रही है। बस इन्हें प्रमाणित करना भर है। लेकिन राजनीतिक दल इसे या तो समझ नहीं रहे या फिर जानबूझकर नासमझी दिखा रहे हैं। वैसे भी इन प्रमाणों को घुसपैठिए या अवैध मतदाता साबित नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनके नाम कट रहे हैं या काटे जाने की संभावना बन रही है।</p><p>एसआईआर को लेकर जारी मौजूदा बहस में नागरिकों के लिए कुछ प्रश्न बेहद महत्वपूर्ण हो जाते हैं,<br>·&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;क्या पुनरीक्षण निर्धारित संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत हुआ?<br>·&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;क्या किसी पात्र मतदाता का नाम गलत तरीके से हटाया गया?&nbsp;<br>·&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;यदि ऐसा हुआ, तो क्या दावा और आपत्ति की प्रक्रिया के जरिए उसे सुधारा गया?<br>·&nbsp;&nbsp;&nbsp;&nbsp;क्या अलग-अलग राज्यों में समान प्रक्रियाओं को समान कसौटी पर देखा जा रहा है?</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/delhi-police-book-rahul-gandhi-and-priyanka-gandhi-over-akashvani-bhawan-protest" target="_blank" rel="noopener">आकाशवाणी भवन में जबरन घुसने का आरोप! Rahul Gandhi और Priyanka Gandhi के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने दर्ज की FIR</a></h3><h2>संस्थाओं पर बहस हो, लेकिन तथ्यों के आधार पर</h2><p>एसआईआर, निर्वाचन आयोग और न्यायपालिका पर सवाल उठाना लोकतांत्रिक तो है, लेकिन आरोप और प्रमाण, ड्राफ्ट सूची और अंतिम सूची, याचिका और न्यायिक आदेश तथा राजनीतिक मांग और कानूनी कार्रवाई, के बीच समझदारी से अंतर बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है। अव्वल तो मतदाता सूची की शुद्धता और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर बहस तथ्यों, कानून और निर्धारित प्रक्रिया के आधार पर होनी चाहिए। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है। चुनाव आयोग बार-बार यह भरोसा दिलाने की कोशिश कर रहा है कि एसआईआर &nbsp;मतदाताओं को बेहतर सुविधा देने की व्यवस्था है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य है, कोई भी वैध और योग्य मतदाता छूटे नहीं। मोटे तौर पर एसआईआर का एक ही मकसद है, हर योग्य और वैध मतदाता को सूची में जोड़ना, दिए गए पते पर न रहे मतदाताओं और मृतकों का नाम सूची से हटाना। इसके साथ ही विदेशी और घुसपैठियों को मतदाता सूची से बाहर करना है। एक आरोप यह लग रहा है कि मतदाता सूची तैयार करने में ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर की भूमिका बीएलओ और ईआरओ की तुलना में बढ़ गई है, जिसकी वजह से मतदाता सूची को फाइनल करने के ईआरओ के अधिकार दरकिनार हो गए हैं। लेकिन ऐसा नहीं है। ईसीआईनेट सिर्फ तकनीकी मंच है, जिसकी बुनियाद अधिकारियों द्वारा घर-घर से जुटाए आंकड़े हैं। नहीं भूलना चाहिए कि मतदाता सूची में किसी नाम को जोड़ने या उससे हटाने का निर्णय सिर्फ ईआरओ ही ले सकता है और वह भी जनप्रतिनिधित्व कानून 1950 और मतदाता सूची पंजीयन नियम 1960 के तहत, नोटिस और सुनवाई के बाद ही ऐसा कर सकता है। कहना न होगा कि ऐसा ही हो रहा है। लेकिन राजनीति इसे देखने की बजाय अपने हिसाब से घटनाओं और कार्यों की व्याख्या कर रही है।&nbsp;</p><p>उमेश चतुर्वेदी<br>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 07 Oct 2026 18:33:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/controversy-over-sir-project-based-more-on-rumours-than-reality</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या देश में मोदी विरोधी लहर शुरू हो चुकी है? अगर आज चुनाव हुए तो क्या परिणाम हो सकते हैं?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-25-years-leadership-changing-public-mood-sir-election-commission-political-analysis]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आज जब नरेंद्र मोदी सरकार के मुखिया के रूप में लगातार पच्चीस साल पूरे कर रहे हैं, तब भारतीय राजनीति की एक बेहद दिलचस्प और महत्वपूर्ण तस्वीर सामने आ रही है। सात अक्टूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में सरकार की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी ने पहले गुजरात और फिर देश की सत्ता का नेतृत्व करते हुए बिना किसी अंतराल के पच्चीस वर्ष पूरे कर लिए हैं। यह अपने आप में भारतीय लोकतंत्र के इतिहास की असाधारण राजनीतिक यात्रा है। इस अवसर पर सत्ता पक्ष इसे नेतृत्व, सेवा, विकास और निरंतर जनविश्वास की उपलब्धि के रूप में देख रहा है, तो दूसरी ओर विपक्ष ठीक इसी समय चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता, मतदाता सूची और लोकतांत्रिक व्यवस्था को लेकर सरकार और चुनाव आयोग को घेर रहा है। यानी नरेंद्र मोदी की राजनीतिक यात्रा के पच्चीसवें वर्ष का यह पड़ाव उस समय आया है जब सत्ता के सामने सबसे बड़ा सवाल शायद विपक्ष की ताकत का नहीं, बल्कि संस्थाओं और जनविश्वास का है।</p><p>देखा जाये तो सरकार और भारतीय जनता पार्टी के लिए आज का दिन स्वाभाविक रूप से उपलब्धियों को गिनाने का दिन है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नरेंद्र मोदी के पच्चीस वर्ष के शासन को ऐतिहासिक उपलब्धि बताते हुए उनके गुजरात के मुख्यमंत्रित्व और केंद्र की तीन लगातार सरकारों को सार्वजनिक विश्वास का प्रमाण बताया है। सरकार की ओर से कल्याणकारी योजनाओं, बुनियादी ढांचे, डिजिटल व्यवस्था, आर्थिक सुधार, राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेश नीति और तकनीकी उपलब्धियों को इस लंबे सफर की प्रमुख उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। प्रधानमंत्री ने भी इस अवसर को सेवा और राष्ट्रहित के भाव से जोड़ा है।</p><p>लेकिन राजनीति सिर्फ उपलब्धियों की सूची से नहीं चलती। देश की राजनीति का दूसरा चेहरा भी उतनी ही ताकत से दिखाई दे रहा है। छह अक्टूबर को राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के विरोध में प्रदर्शन किया। संसद से चुनाव आयोग की ओर बढ़ते विपक्षी सांसदों को पुलिस ने रोका, जिसके बाद धरना, हिरासत और राजनीतिक टकराव की तस्वीरें सामने आईं। राहुल गांधी का बैरिकेड पर चढ़ना और “ज्ञानेश, इट्स डन ब्रो” जैसी युवा शैली की भाषा सोशल मीडिया पर तेजी से फैली। इस पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और मतदाता सूची के विवाद को अचानक देश की राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया।</p><p>विपक्ष इस पूरे विवाद को केवल मतदाता सूची की तकनीकी प्रक्रिया नहीं मान रहा। उसके लिए यह लोकतंत्र, मताधिकार और चुनावी निष्पक्षता का सवाल है। कांग्रेस और उसके सहयोगी आरोप लगा रहे हैं कि मतदाता सूची में बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मतदान अधिकार पर असर पड़ सकता है। विपक्ष मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग कर रहा है और इस पूरे मामले को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने की कोशिश कर रहा है। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी का कहना है कि कांग्रेस लगातार चुनाव हारने के बाद चुनाव आयोग को कठघरे में खड़ा कर रही है और उसे अपनी राजनीतिक कमजोरी का जिम्मेदार संस्थाओं को बनाने के बजाय जनता का विश्वास जीतने की कोशिश करनी चाहिए। भाजपा का यह भी सवाल है कि जिस चुनावी व्यवस्था के माध्यम से विपक्ष कई राज्यों में जीत हासिल करता रहा, उसी व्यवस्था को अपनी हार के बाद अविश्वसनीय कैसे कहा जा सकता है।</p><p>यहीं से इस समय की राजनीति का सबसे बड़ा द्वंद्व सामने आता है। विपक्ष का सवाल है कि चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रश्न उठे तो लोकतंत्र कैसे सुरक्षित रहेगा? सत्ता पक्ष का सवाल है कि बिना निर्णायक प्रमाण के चुनावी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने से क्या लोकतांत्रिक संस्थाओं पर जनता का भरोसा ही कमजोर नहीं होगा? दोनों पक्ष अपने-अपने तर्क रख रहे हैं, लेकिन एक तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर बहस अब महज विपक्षी भाषण नहीं रह गई है। हालांकि इसका अर्थ यह बिल्कुल नहीं है कि विपक्ष के सारे आरोप सिद्ध हो चुके हैं। चुनाव आयोग पर गंभीर सवाल उठना एक बात है और “चुनाव चोरी सिद्ध हो जाना” दूसरी बात है।</p><p>शायद यही वह बिंदु है जहां से आम जनता और राजनीतिक विमर्श के बीच अंतर दिखाई देता है। राजनीति की दुनिया में इस समय SIR, चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार सबसे बड़ा मुद्दा दिखाई दे रहे हैं। समाचार चैनलों और सोशल मीडिया पर भी यही सबसे अधिक दिखाई दे रहा है। लेकिन जब हम व्यापक जनमत संकेतकों को देखते हैं तो तस्वीर कुछ अलग है। सितंबर 2026 के ताजा इप्सॉस सर्वेक्षण में सात में से लगभग सात भारतीयों ने माना कि देश सही दिशा में जा रहा है और करीब आठ में से आठ ने वर्तमान आर्थिक स्थिति को सकारात्मक माना है। लेकिन उसी सर्वेक्षण में बेरोजगारी भारत की सबसे बड़ी चिंता बनी हुई है। यानी देश के भविष्य को लेकर आशावाद मौजूद है, मगर नौकरी और अवसर को लेकर बेचैनी भी उतनी ही वास्तविक है।</p><p>यही भारतीय जनमत की वर्तमान जटिलता है। जनता का एक बड़ा हिस्सा यह मान सकता है कि देश आगे बढ़ रहा है, अर्थव्यवस्था टिकाऊ है, बुनियादी ढांचे में बदलाव आया है और भारत की वैश्विक स्थिति मजबूत हुई है, लेकिन उसी व्यक्ति के घर में नौकरी, आमदनी, महंगाई और भविष्य की सुरक्षा की चिंता भी हो सकती है। सितंबर में शहरी उपभोक्ता विश्वास में भी सुधार आया और भारत का उपभोक्ता विश्वास सूचकांक बढ़ा। इसका मतलब यह हुआ कि आर्थिक तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है; फिर भी रोजगार सबसे बड़ा चिंता का विषय बना हुआ है।</p><p>इससे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व के सामने असली राजनीतिक प्रश्न भी स्पष्ट होता है। चुनौती केवल यह नहीं है कि विपक्ष कितना आक्रामक है। चुनौती यह है कि सरकार आर्थिक उपलब्धियों और बड़े राष्ट्रीय लक्ष्यों की कथा को आम नागरिक की रोजमर्रा की जिंदगी से कितना जोड़ पाती है। जब विकास का अर्थ सड़क, रेल, डिजिटल भुगतान और वैश्विक प्रतिष्ठा से आगे बढ़कर नौकरी, स्थिर आय और युवा के भविष्य में दिखाई देने लगेगा, तभी सरकारी उपलब्धियों का राजनीतिक असर और गहरा होगा।</p><p>साथ ही नरेंद्र मोदी के व्यक्तिगत नेतृत्व को लेकर तस्वीर अभी भी पूरी तरह बदलती हुई नहीं दिखती। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण में 48.7 प्रतिशत लोगों ने मोदी को अगले प्रधानमंत्री के लिए सबसे पसंदीदा विकल्प माना। हालांकि जनवरी के मुकाबले उनके समर्थन में कुछ कमी आई है। इस गिरावट को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इसे सीधे मोदी विरोधी लहर भी नहीं कहा जा सकता। दूसरी ओर, राहुल गांधी अभी तक उस राजनीतिक बढ़त को हासिल नहीं कर पाए हैं, जो मोदी के समर्थन में कमी आने पर उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल सकती थी। यानी मोदी की राजनीतिक ताकत अभी भी बनी हुई है, लेकिन उसमें एक महत्वपूर्ण बदलाव दिखाई दे रहा है। पहले मोदी को लेकर बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित रहती थी कि उनके मुकाबले कौन है? अब बहस का एक हिस्सा इस बात पर भी केंद्रित होने लगा है कि सरकार और संवैधानिक संस्थाएं जनता का विश्वास कितना कायम रख पा रही हैं? यही बदलाव आगे चलकर महत्वपूर्ण हो सकता है।</p><p>सोशल मीडिया पर भी इस समय राजनीति का यही दोहरा चेहरा दिखाई दे रहा है। राहुल गांधी के प्रदर्शन के वीडियो और उनके अंदाज को उनके समर्थक पसंद कर रहे हैं, जबकि विरोधी इसे राजनीतिक दिखावा बता रहे हैं। भाजपा भी सोशल मीडिया के जरिए इसका जवाब दे रही है। यानी सोशल मीडिया ने राजनीतिक बहस को जरूर ज्यादा तेज और आक्रामक बना दिया है, लेकिन वहां दिखाई देने वाली प्रतिक्रियाओं को पूरे देश की राय मान लेना ठीक नहीं होगा। सोशल मीडिया पर वही आवाज ज्यादा सुनाई देती है, जिसके पीछे बड़ी संख्या में सक्रिय और भावनात्मक समर्थक हों। इसलिए सोशल मीडिया का शोर यह तो बताता है कि किसी मुद्दे पर बहस कितनी तेज है, लेकिन यह नहीं बताता कि जनता का बड़ा हिस्सा वास्तव में क्या सोच रहा है।</p><p>इस पूरे परिदृश्य में युवाओं की बेचैनी को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कॉकरोच जनता पार्टी जैसे युवा केंद्रित आंदोलनों और उनसे जुड़ी डिजिटल राजनीति ने यह दिखाया है कि एक नया राजनीतिक असंतोष उभर रहा है जो जरूरी नहीं कि सीधे कांग्रेस या भाजपा की पारंपरिक राजनीति में समा जाए। रोजगार, परीक्षा व्यवस्था, अवसर और संस्थागत निष्पक्षता जैसे मुद्दे इस नई पीढ़ी को प्रभावित कर रहे हैं। यह नाराज़गी अभी किसी एक पार्टी के पक्ष में संगठित नहीं हुई है, लेकिन इसे हल्के में लेना भी उचित नहीं होगा।</p><p>इसलिए आज की भारतीय राजनीति को अगर एक वाक्य में समझना हो तो तस्वीर यह है कि नरेंद्र मोदी का जनाधार टूटा नहीं है, मगर उनके नेतृत्व के इर्द-गिर्द सवालों की प्रकृति बदल रही है। व्यक्तिगत लोकप्रियता अभी मजबूत है, सरकार की उपलब्धियों का नैरेटिव अभी जीवित और प्रभावी है, देश की आर्थिक दिशा को लेकर आशावाद भी मौजूद है; लेकिन रोजगार की चिंता, युवा असंतोष और चुनावी संस्थाओं की विश्वसनीयता पर उठते सवाल एक नया दबाव पैदा कर रहे हैं। मोदी के लिए असली चुनौती विपक्ष की किसी एक रैली से नहीं, बल्कि इन अलग-अलग चिंताओं के एक साथ जुड़ जाने से पैदा हो सकती है।</p><p>फिलहाल स्थिति को “मोदी विरोधी लहर” कहना अतिशयोक्ति होगी। लेकिन यह कहना भी गलत होगा कि जनता के भीतर कोई बेचैनी नहीं है। बेचैनी है, सवाल हैं, संस्थाओं को लेकर आशंका है और युवाओं में अवसर को लेकर अधीरता है। साथ ही देश के बड़े हिस्से में स्थिरता, आर्थिक दिशा और प्रधानमंत्री के नेतृत्व को लेकर भरोसा भी कायम है। दूसरे शब्दों में कहें तो भारतीय मतदाता इस समय न तो पूरी तरह नाराज़ होकर सत्ता से विमुख दिखाई दे रहा है और न ही आंखें बंद करके संतुष्ट है। यही नरेंद्र मोदी के पच्चीसवें वर्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई है। यहां यह भी सवाल उठता है कि देश में आज चुनाव हों तो क्या होगा? उपलब्ध ताजा राष्ट्रीय जनमत संकेतक सरकार के लिए चेतावनी जरूर देते हैं लेकिन उसके लिए खतरे का संकेत नहीं दे रहे। अगस्त 2026 के इंडिया टुडे-सी वोटर सर्वेक्षण के मुताबिक आज लोकसभा चुनाव होने पर भाजपा को 261 और एनडीए को 326 सीटें मिल सकती हैं, जबकि इंडिया गठबंधन 185 सीटों तक पहुंच सकता है। यानी भाजपा अपने दम पर बहुमत से नीचे रहेगी, लेकिन एनडीए फिर भी आराम से सरकार बनाने की स्थिति में रहेगा।</p><p>बहरहाल, मोदी की सबसे बड़ी ताकत आज भी उनका व्यक्तिगत नेतृत्व और जनता के एक बड़े हिस्से से बना सीधा राजनीतिक जुड़ाव है। लेकिन आने वाले वर्षों में उनकी सबसे बड़ी परीक्षा यही होगी कि विकास, लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता, रोजगार और युवाओं के भविष्य को लेकर उठ रहे सवालों का सरकार कितना ठोस और भरोसेमंद जवाब दे पाती है। सरकार के मुखिया के रूप में 25 वर्ष पूरे होने पर नरेंद्र मोदी ने 2047 तक आत्मनिर्भर भारत बनाने का संकल्प दोहराते हुए कहा है, “वी विल डू इट।” यह नारा आने वाले भारत के लिए उनके बड़े लक्ष्य और राजनीतिक आत्मविश्वास को दर्शाता है। लेकिन इस लक्ष्य को जमीन पर उतारने के लिए सिर्फ संकल्प नहीं, बल्कि जनता के भरोसे को लगातार मजबूत करना भी जरूरी होगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि 25 वर्षों तक सरकार के मुखिया के रूप में बने रहना इतिहास है, लेकिन इतिहास की असली पहचान इस बात से होती है कि वह भविष्य को किस दिशा में ले जाता है। अब मोदी के सामने चुनौती इसी भविष्य को उपलब्धियों के साथ-साथ जनता के भरोसे का भविष्य बनाने की है।</p><p>-नीरज कुमार दुबे<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 07 Oct 2026 12:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-modi-25-years-leadership-changing-public-mood-sir-election-commission-political-analysis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बुआ मायावती ने भतीजे आकाश आनंद को वापस बुलाया या राजनीतिक जाल में फंसा दिया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/akash-anand-mayawati-bsp-national-coordinator-political-brand-value-up-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>लखनऊ की राजनीति बड़ी अजीब चीज है। यहां सामने कुछ दिखाई देता है मगर असली खेल पर्दे के पीछे चल रहा होता है। बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके भतीजे आकाश आनंद के मामले में भी कुछ ऐसा ही दिखाई दे रहा है। जिस आकाश आनंद को कुछ समय पहले मायावती ने पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था, आज वही आकाश आनंद फिर बसपा में लौट आए हैं और उन्हें दोबारा पार्टी का राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया है। ऊपर से कहानी इतनी-सी है कि भतीजे ने माफी मांगी, बुआ ने माफ कर दिया और परिवार फिर एकजुट हो गया। लेकिन यूपी की राजनीति में कहानी इतनी सीधी होती तो फिर राजनीति किस बात की?</p><p>असल सवाल यह है कि मायावती ने आकाश आनंद को वापस क्यों बुलाया और वापस बुलाकर उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी ही क्यों दी? क्या यह आकाश पर भरोसा है, या फिर उस राजनीतिक संभावना को रोकने की कोशिश है जो उनके बाहर जाने के बाद पैदा हो रही थी?</p><p>याद कीजिए, जब मायावती ने आकाश आनंद को पार्टी से बाहर किया था तो वह राजनीति में अकेले नहीं रह गए थे। उनके लिए दूसरे दलों के दरवाजे खुलने लगे थे। चंद्रशेखर आजाद ने उनके लिए जगह होने की बात कही। अखिलेश यादव से जब आकाश को समाजवादी पार्टी में लेने की संभावना पर सवाल हुआ तो उन्होंने भी दरवाजा बंद नहीं किया। निषाद पार्टी की तरफ से न्योता आया। यानी जिस भतीजे को मायावती ने बसपा से बाहर कर दिया था, उसे दूसरे राजनीतिक दल अपने यहां जगह देने के लिए तैयार दिख रहे थे। यहीं से मायावती के लिए असली खतरा पैदा होता था।</p><p>क्योंकि बात सिर्फ यह नहीं थी कि आकाश आनंद किसी दूसरी पार्टी में चले जाते। असली खतरा यह था कि अगर वह किसी दूसरे दल में जाकर अपनी राजनीतिक जमीन तैयार कर लेते, युवा दलितों के बीच अपनी पहचान बना लेते और धीरे-धीरे मायावती से अलग अपना एक स्वतंत्र राजनीतिक वजूद खड़ा कर लेते, तो फिर भविष्य में वह सिर्फ “मायावती के भतीजे” नहीं रहते। वह अपने आप में एक राजनीतिक ब्रांड बन सकते थे। यही वह चीज है जो शायद मायावती को सबसे ज्यादा खटकती।</p><p>देखा जाये तो बसपा पहले ही उत्तर प्रदेश की राजनीति में लगातार कमजोर हुई है। कभी जिस पार्टी के बिना यूपी की सत्ता का गणित पूरा नहीं होता था, वह आज विधानसभा और लोकसभा चुनावों में एक सीट जीतने की जद्दोजहद करती दिखाई देती है। 2019 में बसपा को उत्तर प्रदेश में करीब 19 प्रतिशत वोट मिले थे, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव में उसका वोट शेयर 10 प्रतिशत से भी नीचे चला गया। इस बीच दलित राजनीति के मैदान में चंद्रशेखर आजाद जैसा नया चेहरा भी उभरा है। यानी बसपा के सामने चुनौती सिर्फ भाजपा या सपा-कांग्रेस गठबंधन की नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक जगह की भी है जिसे कभी बसपा अपना स्थायी इलाका मानती थी।</p><p>ऐसे माहौल में अगर मायावती का भतीजा पार्टी से निकलकर किसी दूसरे दल में चला जाता और वहां अपनी अलग पहचान बनाने लगता, तो बसपा के लिए मामला और मुश्किल हो सकता था। क्योंकि मायावती के पास अपना मजबूत कोर वोट बैंक भले अभी भी मौजूद हो, लेकिन चुनावी राजनीति में सिर्फ कोर वोट बैंक होना और चुनाव जीतने की स्थिति में होना दो अलग-अलग बातें हैं। मुमकिन है कि मायावती ने इसी खतरे को भांप लिया हो। उन्हें लगा हो कि अगर आकाश दूसरे दल में चले गए और वहां युवा दलित राजनीति का नया चेहरा बन गए तो बसपा के सामने सिर्फ एक नेता के जाने का संकट नहीं होगा, बल्कि नेतृत्व की अगली पीढ़ी का विकल्प भी पार्टी के बाहर तैयार हो जाएगा। बसपा अगर अभी शून्य पर खड़ी दिखाई दे रही है तो आकाश का किसी दूसरे राजनीतिक मंच पर जाकर मजबूत होना इस शून्य को डबल शून्य में बदल सकता है। इसलिए भतीजे को वापस बुलाना जरूरी समझा गया।</p><p>लेकिन यहां कहानी में एक और पेंच है। आकाश को सिर्फ वापस नहीं बुलाया गया, उन्हें राष्ट्रीय संयोजक बना दिया गया। सुनने में यह बड़ा सम्मान है, लेकिन राजनीति में हर सम्मान के साथ जिम्मेदारी भी आती है। आकाश को अब जो जिम्मेदारी मिली है, वह आसान नहीं है। खासकर तब, जब सामने 2027 का उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव खड़ा है। अब अगर बसपा चुनाव में अच्छा प्रदर्शन करती है तो मायावती की रणनीति सफल कही जाएगी और आकाश आनंद को इसका फायदा भी मिलेगा। लेकिन अगर बसपा का प्रदर्शन फिर कमजोर रहा तो सवाल सिर्फ मायावती से नहीं होगा। सवाल आकाश से भी होगा। आखिर राष्ट्रीय संयोजक किसलिए बनाए गए थे? संगठन को मजबूत करने के लिए या सिर्फ पद की शोभा बढ़ाने के लिए? युवा वोटरों को बसपा से जोड़ने की जिम्मेदारी किसकी थी? चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने का काम कौन कर रहा था?</p><p>यानी मायावती ने आकाश को वापस लाकर उन्हें एक ऐसी जिम्मेदारी दे दी है जिसमें सफलता का श्रेय तो मिलेगा ही, लेकिन असफलता का ठीकरा भी सिर पर फूट सकता है। यही वह जगह है जहां सवाल उठता है कि कहीं यह आकाश आनंद की राजनीतिक ब्रांड वैल्यू को मजबूत करने की बजाय धीरे-धीरे खत्म करने की रणनीति तो नहीं? क्योंकि मान लीजिए 2027 में बसपा फिर चुनावी तौर पर कोई खास कमाल नहीं कर पाती। तब आकाश आनंद के पास क्या बचेगा? वह किसी दूसरी पार्टी में जाकर यह भी नहीं कह सकते कि उन्हें बसपा में मौका नहीं मिला था। मौका मिला, राष्ट्रीय संयोजक बनाया गया, संगठन की जिम्मेदारी दी गई और फिर भी पार्टी चुनाव नहीं जीत सकी। ऐसे में दूसरे दलों के लिए आकाश को अपने साथ लेना उतना आकर्षक नहीं रह जाएगा।</p><p>यानी जिस समय वह बसपा से बाहर थे, उस समय दूसरे दल उन्हें अपने यहां लाने की संभावनाएं तलाश रहे थे। लेकिन अब वह बसपा के राष्ट्रीय संयोजक हैं। अगर बसपा फिर कमजोर प्रदर्शन करती है तो वही दूसरे दल शायद यह सोचें कि जिस नेता को अपनी पार्टी संभालने का मौका मिला और वह उसे नहीं उठा पाया, उसे अपने यहां लाकर क्या हासिल होगा? देखा जाये तो राजनीति में इसे बहुत बारीक तरीके से समझना होगा। मायावती ने आकाश को बाहर जाने से तो रोक लिया, लेकिन साथ ही उन्हें बसपा की किस्मत से बांध भी दिया। अब आकाश की राजनीतिक कामयाबी और बसपा की राजनीतिक कामयाबी एक-दूसरे से अलग नहीं रह सकतीं।</p><p>इसके अलावा, यहां एक सवाल मायावती से भी पूछा जाना चाहिए। मायावती की राजनीति की सबसे बड़ी पहचान ही परिवारवाद के खिलाफ लड़ाई रही है। कांशीराम ने परिवार की राजनीति नहीं की। उन्होंने मायावती जैसे कार्यकर्ता को आगे बढ़ाया। मायावती ने भी लंबे समय तक यही संदेश दिया कि बसपा किसी एक परिवार की पार्टी नहीं, बल्कि बहुजन समाज की पार्टी है। लेकिन अब पिछले कुछ समय से बसपा के भीतर परिवार के सदस्यों की भूमिका लगातार चर्चा में है। आकाश आनंद को पहले आगे किया गया। फिर हटाया गया। ईशान आनंद को जिम्मेदारी मिली। फिर आकाश को वापस लाया गया। दीपिका आनंद के नाम की चर्चा भी सामने आई। कभी कहा गया कि परिवार के किसी सदस्य को राजनीतिक पद नहीं दिया जाएगा और फिर घटनाक्रम कुछ ही समय में दूसरी दिशा में जाता दिखाई दिया।</p><p>ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर बसपा में परिवार के बाहर नेतृत्व का विकल्प क्यों नहीं दिखाई देता? मायावती दूसरी पार्टियों में परिवारवाद पर सवाल उठाती रही हैं। समाजवादी पार्टी पर परिवारवाद का आरोप लगाने में वह कभी पीछे नहीं रहतीं। लेकिन जनता यह भी देखती है कि अपनी पार्टी के भीतर नेतृत्व की अगली कतार में कौन खड़ा है? यहां मामला सिर्फ आकाश आनंद का नहीं है। सवाल यह है कि क्या बसपा में मायावती के बाद कोई ऐसा गैर-पारिवारिक चेहरा नहीं है, जिसे राष्ट्रीय स्तर की जिम्मेदारी दी जा सके? क्या पार्टी में दशकों से काम कर रहे किसी दलित, पिछड़े, गरीब या वंचित कार्यकर्ता में नेतृत्व की संभावना नहीं बची? अगर है, तो फिर बार-बार परिवार के सदस्यों की तरफ ही क्यों देखा जा रहा है? देखा जाये तो यूपी की राजनीति में जनता बहुत कुछ भूल सकती है, लेकिन विरोधाभास जल्दी नहीं भूलती। अगर दूसरी पार्टियों के परिवारवाद को मायावती राजनीतिक अपराध मानती हैं तो फिर बसपा में परिवार के सदस्यों की बढ़ती भूमिका पर भी सवाल उठेंगे। सवाल सिर्फ विरोधियों की तरफ से नहीं उठेंगे, बसपा के भीतर भी उठेंगे।</p><p>उधर, आकाश आनंद के लिए भी अब मामला आसान नहीं है। उन्हें राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी जरूर मिल गई है, लेकिन यह कुर्सी फूलों की नहीं, कांटों की है। अब उन्हें यह साबित करना होगा कि वह सिर्फ मायावती के भतीजे नहीं हैं। उन्हें यह दिखाना होगा कि वह संगठन खड़ा कर सकते हैं, युवा दलित मतदाताओं को जोड़ सकते हैं और बसपा को उस राजनीतिक जमीन पर वापस ला सकते हैं, जहां से पार्टी लगातार खिसकती चली गई है।</p><p>बहरहाल, बुआ ने भतीजे को घर तो वापस बुला लिया, लेकिन अब उसके हाथ में पूरे घर का हिसाब-किताब पकड़ा दिया है। घर बचा तो भतीजे का कद बढ़ेगा और घर डूबा तो सवाल भी उसी से होगा। मगर सबसे बड़ा सवाल फिर भी वही रहेगा कि परिवारवाद के खिलाफ राजनीति की पहचान बनाने वाली मायावती को अब अपनी पार्टी का भविष्य परिवार के बाहर क्यों दिखाई नहीं देता? क्योंकि अगर बसपा सचमुच बहुजन की पार्टी है तो उसका भविष्य किसी एक परिवार की अगली पीढ़ी में नहीं, बल्कि उन लाखों कार्यकर्ताओं में दिखाई देना चाहिए जो दशकों से पार्टी का झंडा उठाए घूम रहे हैं। वरना राष्ट्रीय संयोजक की कुर्सी चाहे जितनी बड़ी हो, जनता पूछेगी जरूर कि यह आकाश आनंद की उड़ान है या मायावती की राजनीतिक छतरी के नीचे सुरक्षित किया गया एक और नाम?</p><p>-नीरज कुमार दुबे<br>&nbsp;</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 06 Oct 2026 12:08:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/akash-anand-mayawati-bsp-national-coordinator-political-brand-value-up-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Switzerland के साथ रिश्तों को नई ऊंचाई देकर Modi ने Europe में चली बड़ी कूटनीतिक चाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-switzerland-relations-modi-parmelin-strategic-partnership-trade-defence-technology]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>दुनिया के बदलते सामरिक और आर्थिक समीकरणों के बीच प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति लगातार भारत की वैश्विक पहुंच को नए आयाम दे रही है। इसी व्यापक कूटनीतिक रणनीति की एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में स्विट्जरलैंड के साथ संबंधों को नई ऊंचाई तक ले जाने की दिशा में आज एक अहम कदम सामने आया। स्विस राष्ट्रपति गाइ पार्मेलिन की भारत यात्रा के दौरान दोनों देशों ने प्रवास एवं गतिशीलता, युवा पेशेवरों, परिवहन प्रौद्योगिकी, वैज्ञानिक अनुसंधान तथा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग से जुड़े पांच महत्वपूर्ण समझौतों पर हस्ताक्षर किए। व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर रक्षा उत्पादन, परमाणु ऊर्जा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, विज्ञान, उन्नत प्रौद्योगिकी और वैश्विक कूटनीति तक साझेदारी का विस्तार यह संकेत देता है कि भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब एक नए रणनीतिक चरण में प्रवेश कर रहे हैं और मोदी की सक्रिय कूटनीति ने यूरोप के इस महत्वपूर्ण देश के साथ भारत की साझेदारी को जिस तेजी से व्यापक बनाया है, उसने अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक हलकों का ध्यान खींचा है।</p><p>प्रधानमंत्री मोदी और गाइ पार्मेलिन की मुलाकात का सबसे बड़ा संदेश यह है कि भारत और स्विट्जरलैंड अब अपने रिश्ते को बहु-आयामी रणनीतिक साझेदारी में बदलने की कोशिश कर रहे हैं। हैदराबाद हाउस में मोदी और पारमेलिन ने व्यापार एवं निवेश, एआई, नवाचार, रक्षा उत्पादन और सैन्य आदान-प्रदान, परमाणु ऊर्जा, विज्ञान-प्रौद्योगिकी तथा लोगों के बीच संपर्क सहित पूरे संबंधों की समीक्षा की। देखा जाये तो आर्थिक मोर्चे पर भारत–ईएफटीए व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौता इस रिश्ते की रीढ़ बनकर उभरा है। यह समझौता अक्टूबर 2025 में लागू हुआ था और स्विट्जरलैंड इसे भारतीय बाजार में स्विस कंपनियों की पहुंच और निवेश के लिए अधिक निश्चितता देने वाला करार मानता है। स्विट्जरलैंड के अनुसार भारत एशिया में उसका दूसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और देश में 330 से अधिक स्विस कंपनियां सक्रिय हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/narendra-modi-calls-for-global-institution-reforms-after-talks-with-swiss-president" target="_blank" rel="noopener">Swiss President से मुलाकात के बाद बोले PM Modi, वैश्विक शांति और संस्थाओं में सुधार जरूरी</a></p><p>द्विपक्षीय वार्ता के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि इस समझौते के जरिए अगले 15 वर्षों में भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश और 10 लाख प्रत्यक्ष रोजगार का लक्ष्य रखा गया है। भारतीय कृषि उत्पादों, औषधियों, वस्त्रों और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए स्विस बाजार में अवसर बढ़ाने के साथ भारत जैव-प्रौद्योगिकी, जीवन विज्ञान, बैंकिंग, बीमा, खाद्य प्रसंस्करण और सतत विकास जैसे क्षेत्रों में स्विस निवेश आकर्षित करना चाहता है।</p><p>लेकिन इस साझेदारी का असली रणनीतिक विस्तार रक्षा और उन्नत प्रौद्योगिकी में दिखाई देता है। दोनों पक्षों ने सैन्य आदान-प्रदान और रक्षा उत्पादन में नए अवसर तलाशने तथा परमाणु ऊर्जा सहयोग को और गहरा करने पर सहमति जताई है। यह संकेत इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्विट्जरलैंड की उच्च तकनीकी औद्योगिक क्षमता और भारत की बढ़ती रक्षा विनिर्माण महत्वाकांक्षा मिलकर नए तकनीकी और औद्योगिक सहयोग के रास्ते खोल सकती हैं।</p><p>साथ ही दोनों देशों के बीच बुनियादी ढांचे में भी सहयोग अब जमीन पर दिखाई दे रहा है। वाराणसी रोपवे, नोएडा के जेवर हवाई अड्डे और पर्वतीय क्षेत्रों में रेलवे तथा सुरंग परियोजनाओं का उल्लेख करते हुए मोदी ने परिवहन, गतिशीलता और आधारभूत ढांचे पर नए समझौते को आगे की साझेदारी का आधार बताया। समझौते में विद्युत वाहन, रोपवे, परिपत्र अर्थव्यवस्था, सुरंग और टिकाऊ परिवहन प्रणालियों पर सहयोग शामिल है।</p><p>साथ ही विज्ञान और नवाचार इस रिश्ते की दूसरी बड़ी धुरी बन रहे हैं। भारतीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग और स्विस राष्ट्रीय विज्ञान प्रतिष्ठान के बीच समझौता दीर्घकालिक संयुक्त अनुसंधान का ढांचा तैयार करेगा। स्वास्थ्य, स्वच्छ ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे क्षेत्रों में नए संयुक्त शोध की शुरुआत भी प्रस्तावित है। ज्यूरिख विश्वविद्यालय के अनुप्रयुक्त विज्ञान संस्थान के साथ समझौते के जरिए शुरुआती चरण के भारतीय स्टार्टअप को प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण, कार्यशालाओं और अंतरराष्ट्रीय नेटवर्किंग का अवसर मिलेगा।</p><p>मानव संसाधन के मोर्चे पर भी बड़ा बदलाव हुआ है। प्रवास एवं गतिशीलता साझेदारी के तहत पांच वर्ष तक वैध बहु-प्रवेश वीजा और प्रत्येक यात्रा में छह महीने तक ठहरने की सुविधा का प्रावधान है। छात्रों के लिए नवीकरणीय एक-वर्षीय अनुमति भी शामिल है। वहीं युवा पेशेवरों के आदान-प्रदान समझौते के तहत हर वर्ष दोनों देशों से 300-300 युवा पेशेवर भेजे जा सकेंगे, जिसे बढ़ाकर 500 तक किया जा सकता है। इसका उद्देश्य युवाओं को काम के साथ पेशेवर और भाषाई कौशल विकसित करने का अवसर देना है। यह समझौता प्रतिभा, तकनीक और पूंजी, तीनों को एक ही गलियारे में जोड़ता है। भारत को वैश्विक प्रतिभा और नवाचार नेटवर्क में प्रवेश मिलता है, जबकि स्विट्जरलैंड को भारत के विशाल प्रतिभा और बाजार आधार से जुड़ने का अवसर मिलता है।</p><p>इसके अलावा, दोनों देशों ने आगामी भारत–स्विस अनुसंधान प्रमुख कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र की भी घोषणा की है। साथ ही वैश्विक शांति, कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में सुधार की जरूरत पर दोनों पक्षों ने सहमति जताई है। यूक्रेन और पश्चिम एशिया जैसे संकटों पर भारत ने हर सार्थक शांति प्रयास के समर्थन की अपनी नीति दोहराई। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी इस रिश्ते का अगला मोर्चा है। भारत में 2026 के एआई इम्पैक्ट शिखर सम्मेलन के बाद स्विट्जरलैंड अगले चरण में जिनेवा एआई शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा। दोनों देशों की कोशिश जिम्मेदार, समावेशी और मानव-केंद्रित कृत्रिम बुद्धिमत्ता के लिए सहयोग बढ़ाने की है।</p><p>साफ है कि यह यात्रा केवल पांच समझौतों की कहानी नहीं है। इसके पीछे भारत की रणनीति यूरोप में व्यापार, निवेश, उन्नत तकनीक और विश्वसनीय आपूर्ति शृंखलाओं के नए केंद्रों से संबंध मजबूत करने की है, जबकि स्विट्जरलैंड भारत को अपने एशियाई आर्थिक और तकनीकी विस्तार के महत्वपूर्ण साझेदार के रूप में देख रहा है। 7 अक्टूबर का भारत–ईएफटीए ‘प्रॉस्पेरिटी समिट’ इस पूरी कवायद को निवेश और कारोबारी परियोजनाओं में बदलने की अगली परीक्षा होगा।</p><p>बहरहाल, रणनीतिक तस्वीर बिल्कुल स्पष्ट है। भारत–स्विट्जरलैंड संबंध अब घड़ियों, पर्यटन और बैंकिंग की पारंपरिक छवि से बाहर निकलकर रक्षा उत्पादन, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष, स्वच्छ ऊर्जा, अत्याधुनिक बुनियादी ढांचे, स्टार्टअप और वैश्विक कूटनीति के नए मैदान में प्रवेश कर चुके हैं।</p><p>-नीरज कुमार दुबे</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 18:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-switzerland-relations-modi-parmelin-strategic-partnership-trade-defence-technology</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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