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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[ममता बनर्जी का अदालतों से फटकार खाने का रिकार्ड]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-record-of-receiving-reprimands-from-the-courts]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की सरकार ने एक अनूठा रिकार्ड बनाया है। यह रिकार्ड है, अदालतों से फटकार खाने का। देश में शायद ही किसी राज्य की ऐसी सरकार होगी, जिसने अदालतों से ममता सरकार की जितनी डांट खाई होगी। आश्चर्य की बात यह है कि दर्जनों मामलों में हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से लताड़ खाने के बावजूद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के तेवरों में कोई अंतर नहीं आया है। देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं से टकराने का ममता का रवैया ऐसा है मानों पश्चिम बंगाल भारत का नहीं बल्कि पाकिस्तान का हिस्सा हो।&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में उपद्रवियों द्वारा तीन महिलाएं सहित सात न्यायिक अधिकारियों को अवैध रूप से बंधक बनाए जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि यह घटना न केवल न्यायिक अधिकारियों को डराने-धमकाने का एक घिनौना प्रयास है, बल्कि यह इस न्यायालय के अधिकार को भी चुनौती देती है। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य के मुख्य सचिव, पुलिस महानिदेशक, मालदा जिला मजिस्ट्रेट और एसएसपी को कारण बताने का निर्देश दिया। शीर्ष अदालत ने इस मामले की सीबीआई/एनआईए जांच का आदेश दिया। आश्चर्य की बात यह है कि मुख्यमंत्री ममता ने अफसरों की गलती नही मानने के बजाए जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए आरोपों का सारा ठीकरा चुनाव आयोग के सिर फोड़ने का प्रयास किया। इससे पहले बंगाल में चल रहे मतदाता सूची के स्पेशल इन्टेंसिव रिवीजन (एसआईआर) को लेकर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस की आपत्तियों पर फटकार लगाई थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>केंद्र की भाजपा सरकार किसी सरकारी योजना का चुनावी फायदा नही उठा ले, इसी मंशा से ममता सरकार ने कोलकाता मेट्रो प्रोजेक्ट में रोड़े अटकाने में कसर बाकी नहीं रखी, आखिरकार सुप्रीम कोर्ट की झाड़ खाने के बाद ममता सरकार परियोजना से बाधाओं को हटाने के लिए मजबूर हुई।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-battle-for-brigade-ground-mamata-vs-amit-shah" target="_blank">ब्रिगेड मैदान की जंग में ममता बनाम अमित शाह की जंग</a></h3><div>सुप्रीम कोर्ट ने 23 मार्च को कोलकाता मेट्रो रेल परियोजना के एक गलियारे के निर्माण में रोड़े अटकाने को लेकर ममता सरकार को कड़ी फटकार लगाई। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने बंगाल सरकार की याचिका खारिज करते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट को परियोजना की निगरानी करने का निर्देश दिया था। पीठ ने यह भी कहा, हाई कोर्ट ने राज्य सरकार प्रति काफी उदारता दिखाई है। शीर्ष अदालत ने गहरी नाराजगी जताते हुए यहां तक कह दिया कि यह ऐसा मामला था, जिसमें आपके मुख्य सचिव, डीजीपी और अन्य अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तमाम संवैधानिक हदें लांघते हुए ऐसा काम किया, जिसे आजाद भारत के इतिहास में कोई मुख्यमंत्री करने का दुस्साहस नहीं कर सका। ईडी ने राजनीतिक रणनीति बनाने वाली मशहूर फर्म इंडियन पॉलिटिकल एक्शन कमेटी से जुड़े कई ठिकानों पर छापेमारी की थी। छापेमारी के बीच में ही&nbsp; मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वहां मौजूद एक फाइल अपने साथ ले गईं। इस मुद्दे ईडी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर सख्त टिप्पणी की। न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा ने कहा कहा कि किसी मुख्यमंत्री को जबरन उस जगह में घुसते देखना सुखद नहीं है, जहां केंद्रीय जांच एजेंसी जांच कर रही है। कोर्ट ने कहा कि एजेंसी की जांच में दखल नहीं दिया जा सकता है।</div><div><br></div><div>सुप्रीम कोर्ट ने शिक्षक भर्ती घोटाले को लेकर बंगाल सरकार को फटकार लगाते हुए कहा था कि जब राज्य सरकार को सिलेक्शन में गड़बड़ी का पता चल चुका था, तो शिक्षकों की अतिरिक्त पद पर नियुक्ति क्यों की गई। तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना की पीठ ने बंगाल सरकार से पूछा-अतिरिक्त पद बनाने का उद्देश्य क्या था। गड़बड़ी का पता लगने के बावजूद आपने दागी उम्मीदवारों को बाहर क्यों नहीं किया। दाल में कुछ काला है या सब कुछ काला है। पश्चिम बंगाल के स्कूल सेवा आयोग में शिक्षकों की भर्ती में गड़बड़ी के&nbsp; मामले में केंद्रीय जांच ब्यूरो ने राज्य के पूर्व शिक्षा मंत्री पार्थ चटर्जी, उनकी करीबी अर्पिता मुखर्जी और एसएससी के कुछ अधिकारियों को गिरफ्तार किया था। पेशे से मॉडल अर्पिता के घर से 49 करोड़ कैश और करोड़ों की ज्वेलरी मिली थी।</div><div><br></div><div>साल 2024 में संदेशखाली में महिलाओं के यौन शोषण और जमीन हथियाने व राशन घोटाले से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार के रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार किसी शख्स को बचाने की कोशिश क्यों कर रही है। शीर्ष अदालत ने इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपे जाने के कलकत्ता हाई कोर्ट के आदेश के खिलाफ पश्चिम बंगाल सरकार की अर्जी को खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने कहा था कि आरोपित शाहजहां शेख काफी प्रभावी व्यक्ति हैं और उसका सत्ताधारी दल से संबंध है। राज्य की पुलिस ने उसे बचाने के लिए लुका-छिपी का खेल खेला।&nbsp;</div><div><br></div><div>कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज में महिला डॉक्टर के रेप और मर्डर केस को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने ममता सरकार को जमकर फटकार लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर से लेकर पूर्व प्रिंसिपल संदीप घोष को दूसरे कॉलेज में नियुक्त किए जाने तक अपनी नाराजगी जताई। इसके साथ ही सीबीआई और बंगाल सरकार से जांच रिपोर्ट सौंपने को कहा था। कोर्ट ने ये भी पूछा कि क्या प्रिंसिपल ने हत्या को आत्महत्या बताया? सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कई गंभीर सवाल किए थे।</div><div><br></div><div>11 अप्रैल 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने फ़िल्म "भविष्येर भूत" पर प्रतिबंध के मामले में ममता सरकार को फटकार लगाते हुए 20 लाख रुपये का जुर्माना लगाया था। सुप्रीम कोर्ट ने ममता बनर्जी सरकार को कहा कि वे 20 लाख रुपये बांग्ला फिल्म निर्देशक अनिक दत्त और सिनेमा हॉल के मालिकों को दें। दरसअल पश्चिम बंगाल में भविष्येर भूत पर बिना वजह प्रतिबंध को लगाए जाने के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई थी। गौरतलब है कि इस फिल्म में कथित तौर पर राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल काग्रेस समेत अन्य राजनीतिक पार्टियों पर कटाक्ष किया गया था। इसी वजह से फिल्म रिलीज होने के एक दिन बाद इसे राज्य भर के सभी सिनेमा हॉल से हटा दिया गया था।&nbsp;</div><div><br></div><div>अदालतों की इन तमाम नजीरों से साबित होता है कि ममता बनर्जी मनमाने तरीके से शासन चलाने की आदी हैं। देश में दूसरे राज्यों में भी गैरभाजपा दलों की सरकारें हैं, किन्तु उनका रवैया पश्चिम बंगाल सरकार जैसा नहीं है, जिन्हें बार—बार&nbsp; संवैधानिक संस्थाओं से टकराव को लेकर अदालतों की फटकार खानी पड़ती हो। हालांकि विपक्षी दलों की सरकारों की राज्यपाल और दूसरे मुद्दों पर केंद्र सरकार से तनातनी रही है, किन्तु बात—बात पर अदालतों तक जाने की नौबत नहीं आई। देश और राज्यों के लोकतंत्र का तकाजा यही है कि ममता बनर्जी को अदालतों के निर्णय और निर्देशों से सीखने की जरूरत है।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 19:02:39 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-banerjee-record-of-receiving-reprimands-from-the-courts</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[आम आदमी पार्टी पर बड़ा संकट- केजरीवाल कब छोड़ेंगे पार्टी सुप्रीमो की कुर्सी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/major-crisis-for-the-aap-when-will-kejriwal-step-down-from-the-post-of-party-supremo]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आम आदमी पार्टी के सुप्रीम लीडर अरविंद केजरीवाल अपने सांसदों द्वारा 24 अप्रैल को उन्हें दिए गए गिफ्ट को कभी भूल नहीं पाएंगे। सरकार से लड़-भिड़कर केजरीवाल ने अदालत के जरिए जो सरकारी बंगला लिया था, उस बंगले में परिवार सहित शिफ्ट होने की जानकारी केजरीवाल ने जिस दिन सोशल मीडिया पर शेयर किया, उसी दिन उनके भरोसेमंद सांसदों ने उनकी पार्टी ही तोड़ दी।</div><div><br></div><div>आंदोलन के समय के दिग्गज नेताओं को दरकिनार कर केजरीवाल ने जिस राघव चड्ढा और संदीप पाठक जैसे नेताओं को पार्टी का बड़ा चेहरा बनाया, उन्होंने ही एक झटके में केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। इन नेताओं ने सिर्फ केजरीवाल को झटका ही नहीं दिया, बल्कि राज्यसभा में एक तरह से आम आदमी पार्टी को खत्म ही कर दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/kumar-vishwas-criticized-political-upheaval-in-aap-while-anna-said-this-was-bound-to-happen" target="_blank">AAP में मचे सियासी भूचाल पर Kumar Vishwas ने किया जोरदार कटाक्ष, Anna Hazare भी बोले- ये तो होना ही था</a></h3><div>राघव चड्ढा की जिस काबलियत को देखकर एक जमाने में कुमार विश्वास, संजय सिंह और अरविंद केजरीवाल ने उन्हें इंटर्न के तौर पर पार्टी के साथ जोड़ा था। उसी काबलियत का इस्तेमाल करते हुए बड़ी ही चालाकी से राघव चड्ढा ने आप के 10 राज्यसभा सांसदों में से 7 का जुगाड़ ( खुद को मिलाकर) करते ही बीजेपी का दामन थाम लिया।टूट के लिए कानूनी रूप से जरूरी दो-तिहाई सांसदों का जुगाड़ कर एक बार फिर से राघव चड्ढा ने अपनी काबलियत तो साबित कर दी लेकिन इस बार वे अपने ही राजनीतिक गुरु केजरीवाल पर भारी पड़ गए।</div><div><br></div><div>पार्टी छोड़ने से पहले उन्होंने आरोप लगाते हुए कहा कि, जिस पार्टी को खून-पसीने से सींचा वह अपने सिद्धांतों से भटक गई है। वहीं केजरीवाल ने अपने राजनीतिक स्टाइल के मुताबिक, बीजेपी पर पंजाबियों के साथ धोखा देने का आरोप लगाया। आम आदमी पार्टी और उनके पूरे सिस्टम ने इन्हें गद्दार, यहां तक कि देशद्रोही तक साबित करने का अभियान छेड़ दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>जबकि होना तो यह चाहिए था कि इतनी बड़ी टूट के बाद आम आदमी पार्टी के नेताओं, खासकर आंदोलन के समय के नेताओं को बैठकर आत्ममंथन करना चाहिए। वर्ष 2013 से पहले और उसके बाद आए तमाम नेताओं पर नजर डालते हुए, यह सोचना चाहिए कि अब तक कितने गए, कब गए, क्यों गए और किसकी वजह से गए? लेकिन इसकी बजाय केजरीवाल पार्टी छोड़कर जाने वाले हर नेता को गद्दार साबित करने में जुट जाते हैं ताकि पार्टी के अंदर कोई भी उनके रवैए पर सवाल न उठा पाए।</div><div><br></div><div>आप का जन्म भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए देशव्यापी आंदोलन से हुआ था इसलिए इस पार्टी का खत्म होना दशकों तक इस देश को आंदोलन के नाम से डराता रहेगा। इसके लिए सिर्फ ऑपरेशन लोटस और बीजेपी को जिम्मेदार बता देने से काम नहीं चलेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>संजय सिंह और मनीष सिसोदिया जैसे नेताओं को तुरंत पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की आपात बैठक बुलाकर कुछ कड़े फैसले लेने की पहल करनी चाहिए। दिल्ली में मिली हार के बाद अब यह सवाल तो बेमानी हो गया है कि 'एक व्यक्ति, एक पद' के नियम के बावजूद अरविंद केजरीवाल वर्षों तक दो-दो पदों पर कैसे बने रहे? लेकिन अब यह सवाल तो पूछा ही जाना चाहिए कि आखिर पिछले साढ़े 13 वर्षों से एक ही व्यक्ति ( अरविंद केजरीवाल ) पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक क्यों बने हुए हैं? क्या संजय सिंह, मनीष सिसोदिया या पार्टी के किसी भी अन्य नेता में पार्टी की कमान संभालने की क्षमता नहीं है ? नेताओं को पार्टी से निकालने का मामला हो या राज्यसभा उम्मीदवार तय करने का मामला हो, यह सब कुछ एक ही व्यक्ति की इच्छा पर कब तक छोड़ा जाएगा? आखिर पार्टी की पॉलिटिकल अफेयर्स कमेटी क्यों बनाई गई है और इसका काम क्या है? पहले दिल्ली में सत्ता सुख भोगों और जब यहां पर जनता सत्ता से बाहर कर दें तो पंजाब जाकर जम जाओ, ये किस तरह का रवैया है? चाहे वो केजरीवाल हो या मनीष सिसोदिया या फिर बिभव&nbsp; कुमार या फिर कोई अन्य नेता या कर्मचारी, दिल्ली की हार के बाद क्या ये लोग 3-4 साल भी दिल्ली में या देश के अन्य राज्यों में संघर्ष नहीं कर सकते जो ये लोग सत्ता वाले राज्य पंजाब को घर बनाने निकल पड़ते है? अगर इन सवालों के जवाब नहीं तलाशे गए तो यकीन मानिए कि आने वाले दिनों में आप का पूरा संगठन भी बीजेपी में विलय होता हुआ नज़र आएगा।</div><div><br></div><div>अगर यह सब सिर्फ एक या दो व्यक्ति की जिद के कारण हो रहा है तो पार्टी के सभी नेताओं को मिलकर उन्हें किनारे लगाकर किसी और सक्षम नेता को जिम्मेदारी देनी चाहिए। पार्टी को अपने पुराने नेताओं की भी घर वापसी का अभियान बड़े पैमाने पर चलाना चाहिए और सबसे बड़ी बात आप के नेताओं को यह समझना चाहिए कि राज्यसभा की सांसदी का टिकट धन्नासेठों के लिए नहीं पार्टी के समर्पित कार्यकताओं के लिए होता है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक हालात जिस तेजी से बदल रहे हैं, अगर उससे भी ज्यादा तेजी से आप ने बदलाव नहीं किए तो आने वाले दिनों में पार्टी के नाम और निशान दोनों पर ही बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। लेकिन बड़ा सवाल तो यही है कि क्या अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह, बिभव कुमार, भगवंत मान और आतिशी इस बड़े बदलाव के लिए तैयार हैं?&nbsp;</div><div><br></div><div>- संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Apr 2026 18:50:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/major-crisis-for-the-aap-when-will-kejriwal-step-down-from-the-post-of-party-supremo</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[भारत नरक नहीं, स्वर्ग का अहसास है, मानवता का वैभव, सभ्यता का प्रकाश है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-is-not-hell-but-the-very-essence-of-paradise-grandeur-of-humanity-the-light-of-civilization]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के लिए अब तक कई बार ऐसे तीखे या अपमानजनक बयान दिए हैं जिनके पश्चात उन्होंने या तो रुख बदल दिया या सॉफ्ट स्टेटमेंट जारी करके अपनी बात पर “यू टर्न” लेकर साफ साफ मुकर जैसा अंदाज़ दिखाया है। हाल ही में फिर उन्होंने “नरक जैसा देश” वाला बयान दिया और फिर यू टर्न ले लिया। उनका रवैया दुनिया का थानेदार समझे जाने वाले सर्वाधिक विकसित और धनी देश अमेरिका के शालीन, सभ्य और सुसंस्कृत होने पर सवालिया निशान लगाने को काफी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>खासकर भारत के खिलाफ जिसका अंतर्राष्ट्रीय आचरण सदैव मर्यादित रहता आया है। भारत पैसे वालों की कद्र नहीं करता, क्योंकि यह तो देशी-विदेशी अपराधियों और वेश्याओं के पास भी खूब होता है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा बिल्कुल नहीं होती। ट्रंफ के नेतृत्व में अमेरिका इसी फूहड़ता से ग्रसित है, अभिशप्त है और अंतर्राष्ट्रीय गुंडई में इतना आगे निकल चुका है कि उसके मित्र देश भी उसके साथ खड़े होने में परहेज कर रहे हैं और उसे यूज एंड थ्रो कर रहे हैं। ईरान-अमेरिका युद्ध ने अमेरिका की पूरी मिट्टी पलीद कर दी है और उसके डीप स्टेट की जो भद्द पिटी है, वैसा कोई उदाहरण अन्यत्र नहीं मिलता। शायद इसी खीझ का नाता ट्रंफ के नारकीय विवाद से है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/iran-strength-remains-intact-america-weapons-are-reduced-is-this-why-trump-extended-the-ceasefire" target="_blank">ईरान की ताकत बरकरार, अमेरिका के घटे हथियार! क्या इसी वजह से ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम?</a></h3><div>आइए, जानते हैं कि सबसे हाल का विवाद 24 घंटे में ही कैसे दोनों ध्रुवों पर घूम गया, जब भारतीय विदेश मंत्रालय ने कड़ी प्रतिक्रिया दी। ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म “ट्रुथ सोशल” पर एक रेडियो होस्ट माइकल सैवेज के पॉडकास्ट का हिस्सा शेयर किया, जिसमें भारत और चीन जैसे देशों को “नरक” (hellholes / hell on earth) जैसी जगह बताया गया। इस पोस्ट में भारतीयों के बारे में नस्लवादी टिप्पणी भी थी कि भारत–चीन से लोग अमेरिका आते हैं बस यहीं बच्चे पैदा करने के लिए ताकि उन्हें तुरंत अमेरिकी नागरिकता मिल जाए, जो भारतीय डिप्लोमैसी और जनता के लिए बेहद अपमानजनक माना गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>फिर अगले ही नए बयान में ट्रंप ने रुख पूरी तरह बदल दिया, क्योंकि समझ में आ गया कि ये मोदी का भारत है, चुपचाप उल्टा लटका देगा। कोई काम नहीं आएगा, जब कूटनीतिक शतरंज की एक चाल चल देगा तो। लिहाजा, उन्होंने जनता के बीच और अमेरिकी दूतावास के प्रवक्ता के ज़रिए कहा कि भारत “एक महान देश” (a great country) है, “मजबूत और महान राष्ट्र” है और भारत के शीर्ष नेता (प्रधानमंत्री मोदी) के साथ उनकी “निजी दोस्ती” है। काबिलेगौर है कि इस तरह 24 घंटे के अंदर वही शख्स जो भारत को “hard to deal with” या नरक जैसी जगह कह चुके थे, उसी देश की तारीफ़ में बोलने लगे, जिसे राजनीतिक यू टर्न और दबाव में बदला गया माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>अब इनकी टैरिफ और “टैरिफ किंग” वाली पुरानी टिप्पणी को स्मरण करा देते हैं। इसके अलावा ट्रंप ने व्यापार के मसले पर भी दोहरा अपना बयान दिया है। अपने कई इंटरव्यू और भाषणों में उन्होंने भारत को “टैरिफ किंग” (tariff king) कहा है, और यह कहा है कि भारत दुनिया में सबसे ज्यादा शुल्क लगाने वाले देशों में से एक है, जिससे अमेरिकी उत्पादों को नुकसान होता है। इसी क्रम में उन्होंने भारत पर जवाबी टैरिफ लगाने की धमकी भी दी, लेकिन एक ही हवन में ही यह भी कहा कि भारत के साथ “बहुत अच्छे संबंध” हैं, यानी एक ही बयान में औपचारिक तारीफ़ और व्यावहारिक धमकी दोनों। निष्कर्षन के तौर पर पैटर्न यह दिखता है कि ट्रंप ने भारत के लिए एक बार नफरत भरी, नस्लवादी, “नरक जैसा देश” वाली भाषा इस्तेमाल की, और फिर तुरंत मिटाने के लिए भारत को “महान देश” और प्रधानमंत्री मोदी को “अपना दोस्त” कहकर मुकर जैसा कर दिया।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, व्यापार के मोर्चे पर भारत को “टैरिफ किंग” और हानिकारक बताने के साथ साथ राजनयिक रूप से “अच्छे रिश्ते” बताकर दोहरा रुख अपनाया है। इसी प्रकार ट्रंप भारतीय अर्थव्यवस्था को डेड इकॉनमी भी करार दे चुके हैं टैरिफ वार की खींझ में। उनके इस रवैये से भारत का अविश्वास अमेरिका और उनके प्रति बढ़ा है।</div><div><br></div><div>स्पष्ट है कि अमेरिका के सफल बिजनेसमैन और शातिर राजनेता से राष्ट्रपति बने डॉनल्ड ट्रंफ अपने सिरफिरे विचारों के लिए जाने जाते हैं, लेकिन जब से वो डीप स्टेट के हाथों का खिलौना बने, अपने अनाप-शनाप और अदूरदर्शिता भरे फैसलों से अंतरराष्ट्रीय जगत में अमेरिका की थू-थू करवा रखी है। पहले ट्रेड वार और अब सैन्य वार के बाद उसकी जो अंतरराष्ट्रीय फजीहत हुई है, उसके जैसे सो कॉल्ड देश ताकतवर की कलई खुल गई। यूक्रेन से शुरू हुई कूटनीतिक दोगलागिरी ईरान पहुंचते-पहुंचते न केवल चारो खाने चित्त हो गई, बल्कि आज अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंफ की बयानबाजी अब समझदार लोगों के लिए कोई मायने नहीं रखी। कभी वह भारत को "डेड इकोनॉमी" बताते हैं, तो कभी नरक जैसा देश! शायद इसलिए कि भारतीय नेतृत्व उनके इशारों पर नहीं थिरक रहा है, जिससे रूस-चीन भी उसे भाव देना बंद कर चुके हैं।</div><div><br></div><div>दुनिया का थानेदार अमेरिका को बेनेजुएला के राष्ट्रपति को गिरफ्तार करने के बाद जब कड़ी अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया नहीं मिली तो उसने यह समझ लिया कि रूस-चीन भी उससे डरे हुए हैं। इसी उत्साह में अमेरिका ने इजरायल के साथ मिलकर ईरान पर धावा बोल दिया और महज दो माह के भीतर ही परेशान हो उठा। इससे ईरान-रूस-चीन की संयुक्त ताकत का उसको एहसास हुआ। वहीं इसी मुद्दे पर नाटो में फूट भी पड़ गई और यूरोप तटस्थ बन गया। इसी बौखलाहट में ट्रंफ भारत और चीन को नरक जैसा बताने लगे।</div><div><br></div><div>बताते चलें कि भारत और चीन जैसी प्राचीन सभ्यताओं को "नरक" बताने का संदर्भ हाल ही में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के एक विवादित सोशल मीडिया पोस्ट से जुड़ा है, जिसमें उन्होंने जन्मसिद्ध नागरिकता (birthright citizenship) के मुद्दे पर भारत-चीन को "hellhole" कहा। यह बयान ट्रंप की इमीग्रेशन पॉलिसी से प्रेरित है, जहां वे आरोप लगाते हैं कि इन देशों से प्रवासी अमेरिका की सुविधाओं का दुरुपयोग करते हैं। जबकि ऐतिहासिक वास्तविकता कुछ और है, जो कई मायने में गौरवशाली भी है।</div><div><br></div><div>वास्त्व में, भारत और चीन दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताएं हैं, जिन्होंने ज्ञान, संस्कृति और व्यापार में दुनिया को प्रभावित किया—चीन भारत को कभी "स्वर्ग से बढ़कर" मानता था। जबकि अमेरिका की कोई प्राचीन सभ्यता नहीं है; यहां माया-इंका जैसी मूल निवासी सभ्यताएं 3000 ईसा पूर्व की हैं, लेकिन आधुनिक अमेरिका 15वीं शताब्दी के बाद यूरोपीय उपनिवेशवाद से उभरा है। अब तो यूरोप भी उससे दूर होते जा रहा है।</div><div><br></div><div>स्वाभाविक सवाल है कि आधुनिक अमेरिका "स्वर्ग" क्यों?</div><div>तो जवाब होगा कि ट्रंप जैसे अधकपाली नेता अमेरिका को "स्वर्ग" के रूप में पेश करते हैं क्योंकि यह उच्च जीवन स्तर, आर्थिक अवसरों और कानून के शासन के लिए जाना जाता है, लेकिन यह धारणा चुनिंदा है—अमेरिका में भी गरीबी, असमानता और अपराध मौजूद हैं। भारत-चीन की आबादी और विकास चुनौतियां उन्हें नजरअंदाज कर "नरक" कहना राजनीतिक प्रचार है, जबकि ये देश तेजी से उभर रही महाशक्तियां हैं। ट्रंफ को यह समझ लेना चाहिए कि भारत नरक नहीं दुनिया का स्वर्ग है, सत्योंमुख मानवता का वैभव है! अहिंसा का पुजारी है। यहां शाकाहारी मिलते हैं, लेकिन ईसाईयत और इस्लाम की गुलामी के पश्चात यहां मांसाहारी बढ़े और निरीह पशु-पक्षियों की शामत आ गई। पहले धर्म आधारित युद्ध होते थे, लेकिन षड्यंत्र उतना नहीं जितनी कि पिछले 1000-14000 वर्षों में दिखी। कड़वा सच है कि प्राचीन भारत और चीन दुनिया की सबसे समृद्ध सभ्यताओं में से थे, जिनकी समृद्धि व्यापार, संस्कृति, विज्ञान और वास्तुकला के प्रमाणों से सिद्ध होती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सांस्कृतिक आदान-प्रदान के तहत भारत से बौद्ध धर्म चीन पहुंचा, जहां फाह्यान (402 ईस्वी) और ह्वेनसांग जैसे चीनी यात्रियों ने नालंदा-तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालयों में अध्ययन किया और ग्रंथ अनुवादित किए। चीन में भारतीय प्रभाव वाले स्थल जैसे युंगांग-लोंगमेन गुफाएं, बिग गूस पगोडा और शाओलिन मंदिर इसकी गवाही देते हैं। वहीं, व्यापारिक समृद्धि के नजरिए से रेशम मार्ग (दक्षिणी समुद्री रूट सहित) से भारत-चीन के बीच रेशम, मसाले, मोती, लोहे के बर्तन और हस्तशिल्प का आदान-प्रदान होता था; रामायण-महाभारत में भी चीन का उल्लेख सोने के भंडार के रूप में है। चोल साम्राज्य ने समुद्री मार्ग सुरक्षित कर व्यापार बढ़ाया। जहां तक वैज्ञानिक योगदान की बात है तो&nbsp; आर्यभट्ट की ज्या तालिका का 8वीं शताब्दी में चीनी अनुवाद हुआ; पाणिनि ने चीनी रेशम को 'चीनांशुक' कहा। खोतान जैसे क्षेत्रों में भारतीय शासन, संस्कृत भाषा और विष्णु पूजा के पुरातात्विक प्रमाण मिले।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्राचीन भारत और चीन की समृद्धि मिस्र व ग्रीस से व्यापक और निरंतर थी, जहां पूर्वी सभ्यताओं ने आध्यात्मिक-वैज्ञानिक योगदान दिए जबकि पश्चिमी ने स्थापत्य-दार्शनिक। कृषि व अर्थव्यवस्था के क्षेत्र में भारत-चीन की उपजाऊ गंगा-ह्वांगहो घाटियां मिस्र के नील नदी की तरह ही अतिरिक्त उत्पादन देती रहीं, लेकिन सिंधु घाटी की नियोजित शहर व्यवस्था और चीन के रेशम व्यापार ने वैश्विक नेटवर्क बनाया। ग्रीस में मिनोअन-माइसीन व्यापार सीमित था, मिस्र निर्यात-आधारित।&nbsp;</div><div><br></div><div>सच कहा जाए तो भारत नरक नहीं, स्वर्ग है—यह मानवता का वैभव है, विविधता में एकता का अद्भुत उदाहरण है, जहाँ संस्कृति, करुणा और सहअस्तित्व की धारा अनवरत बहती है। काव्य शैली में लिखूं तो “भारत नरक नहीं, स्वर्ग का अहसास है, मानवता का वैभव, सभ्यता का प्रकाश है।” इस पंक्ति में एक गहरी सकारात्मकता और सांस्कृतिक आत्मविश्वास झलकता है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Apr 2026 12:33:55 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-is-not-hell-but-the-very-essence-of-paradise-grandeur-of-humanity-the-light-of-civilization</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ब्रिगेड मैदान की जंग में ममता बनाम अमित शाह की जंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-battle-for-brigade-ground-mamata-vs-amit-shah]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री रहते अटल बिहारी वाजपेयी ने कोलकाता की यात्रा की थी। उस दौरे पर उन्होंने तत्कालीन रेल मंत्री के कालीघाट स्थित घर का दौरा किया था। तब उन्होंने मंत्री की मां से उलाहना दिया था, आपकी बेटी मुझे बहुत परेशान करती हैं। कहना न होगा कि वह शख्सियत डेढ़ दशक से पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री है। ममता बनर्जी लड़ाका है। धूल से उठकर राजनीतिक आसमान का तारा अगर वे बनी हुई हैं, उसकी वजह उनका सघर्षशील व्यक्तित्व ही है। लेकिन कोलकाता के मैदान में इस बार यह योद्धा फंसा नजर आ रहा है। भारतीय जनता पार्टी जिस तरह उनसे दो-दो हाथ कर रही है, निश्चित तौर पर उसके पीछे नरेंद्र मोदी की अगुआई में बंगाल की धूल में लगातार परिश्रम कर रहे बीजेपी के कार्यकर्ता हैं। आज अगर बंगाली की सियासी लड़ाई आर-पार के दौर में आ चुकी है तो इसके पीछे अमित शाह की रणनीति काम कर रही है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>साल 2021 के विधानसभा चुनाव नतीजे आने के बाद कहा गया था कि बीजेपी चुनाव जीतते-जीतते हार गई है। ममता का संघर्ष बीजेपी की रणनीतियों पर भारी पड़ गया था। पांच साल बाद कोलकाता के रायटर्स बिल्डिंग पर कब्जे को लेकर सेनाएं सज गई हैं। लेकिन इस बार हालात बदले नजर आ रहे हैं। इसकी वजह अमित शाह का चुनाव प्रचार की कमान खुद संभालना है, जिन्होंने 170 सीटें जीतने का महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय कर रखा है। पिछले विधानसभा चुनाव में पिछड़ने के बावजूद अमित शाह ने राज्य की यात्राएं जारी रखीं और इसके जरिए अपने कार्यकर्ताओं को उत्साहित बनाए रखा। इस बार बीजेपी अगर सत्ता की प्रबल दावेदार के रूप में उभरी है तो इसकी बड़ी वजह बूथ प्रबंधन तो है ही, घुसपैठ और महिला सुरक्षा को मुद्दा बनाना भी है। बंगाल के बारे में कहा जाता है कि वह जो आज सोचता है, पूरा देश उस पर बाद में आगे बढ़ता है। शक्ति पूजा की संस्कृति वाले राज्य में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर ममता के राज में कई बार सवाल उठे। कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कालेज में रेजिडेंट डाक्टर से दुष्कर्म और बर्बर हत्या के बाद अंग्रेजों की पहली राजधानी का भद्रलोक उद्वेलित हो उठा। अभी इसकी आंच ठंडी पड़ी नहीं कि कस्बा लॉ कालेज की छात्रा के साथ बलात्कार हुई। इसके पहले संदेशखाली में हुई कथित तौर पर यौन हिंसा और ज़मीन हड़पने के मामलों से पश्चिम बंगाल का समाज उद्वेलित रहा। अमित शाह के बार-बार के बंगाल दौरे के चलते बीजेपी के कार्यकर्ताओं ने महिला सुरक्षा के मसले को कभी धीमा नहीं पड़ने दिया। इन्हीं वजहों से महिला सुरक्षा को लेकर तृणमूल कांग्रेस सवालों के घेरे में आ गई। राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की 2023 की रिपोर्ट भी राज्य में महिलाओं के खिलाफ बढ़ती हिंसा की ही तसदीक करती है, जिसके अनुसार, राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 34,691 मामले दर्ज किए गए और एसिड हमलों में इसका हिस्सा सबसे ज़्यादा करीब 27.5 प्रतिशत रहा। बीजेपी को महिला सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाने में ममता बनर्जी के एक बयान से भी मिला, जिसमें उन्होंने कहा था कि महिलाओं को शाम सात बजे के बाद बाहर नहीं निकलना चाहिए। बीजेपी ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर आरजी कर की पीड़िता की मां मंजू देवनाथ को पनियाहाटा से उम्मीदवार बनाकर एक तरह से राज्य की महिलाओं को संदेश दे दिया है, संदेश यह कि वह उनकी सुरक्षा के लिए संजीदा है। बीजेपी ने महिलाओं को लुभाने के लिए दुर्गा सुरक्षा दस्ते बनाने और नौकरियों में महिलाओं को 33 फीसद आरक्षण देने का भी वादा किया है। इसके साथ ही महिलाओं को मध्य प्रदेश, हरियाणा और महाराष्ट्र की तरह प्रतिमाह तीन हजार रूपए देने का वादा किया है। यहां याद रखना चाहिए कि ममता सरकार हर महीने महिलाओं को डेढ़ हजार रूपए दे रही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/will-bjp-be-able-to-take-advantage-of-the-anti-incumbency-wave-in-west-bengal" target="_blank">पश्चिम बंगाल में सत्ता विरोधी लहर का फायदा क्या उठा पाएगी भाजपा?</a></h3><div>साल 2021 में राज्य में तृणमूल कांग्रेस को 213 सीटें और करीब 44 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि बीजेपी को 38 प्रतिशत वोट के साथ 77 सीटों पर संतोष करना पड़ा था। हालांकि 2016 के विधानसभा चुनावों के मुकाबले देखें तो पार्टी ने तीन सीट और करीब 28 प्रतिशत वोट की तुलना में बड़ी छलांग लगाई। अमित शाह ने इसी बुनियाद को मजबूत करते हुए आगे बढ़ने की रणनीति बनाई। इसके तहत उन्होंने दो बातों पर जोर दिया। उन्होंने उन गढ़ों को और मज़बूत बनाने की रणनीति बनाई, जहां पहले से ही पार्टी मजबूत स्थिति में है। इसके साथ ही उन चुनाव क्षेत्रों में आधार बढ़ाने की कोशिश तेज की, जहां 2021 में वह बहुत कम अंतर से हारी थी। इसके साथ ही अमित शाह ने पार्टी के भीतर की गुटबाज़ी को भी सुलझाने की कोशिश की। राज्य में पार्टी के अध्यक्ष रहे दिलीप घोष के बारे में माना जा रहा था कि वे नाखुश हैं। अमित शाह ने उनसे मुलाकात करके तृणमूल से आए शुभेंदु अधिकारी से बीच उनके मतभेदों को दूर करने की कोशिश की।&nbsp;</div><div><br></div><div>ममता बनर्जी ने पिछली बार बंगाली माटी और मानुष यानी स्थानीय को मुद्दा बनाया था। उन्हें इस मुद्दे से पिछली बार मदद भी मिली। इस बार भी ममता विपक्ष यानी बीजेपी के नेताओं के बाहरी होने का आरोप लगा रही हैं। इसके जवाब स्वरूप अमित शाह ने ऐलान किया है कि अगर पश्चिम बंगाल में पार्टी सत्ता में आई तो राज्य का मुख्यमंत्री ‘धरती का बेटा’ यानी स्थानीय व्यक्ति ही बनेगा। पार्टी ने इस बार घुसपैठ को भी बड़ा मुद्दा बनाया है। राज्य में विशेष पुनरीक्षण अभियान के दौरान राज्य में नब्बे लाख वोटरों के नाम हटाने को लेकर ना सिर्फ सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस समेत समूचा गैर बीजेपी दल मुद्दा बना रहे हैं। हालांकि अमित शाह चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान यानी एसआईआर के कदम को सही बताया है। बीजेपी यहीं नहीं रूकी है, उसने वादा किया है कि अगर वह सत्ता में आई तो राज्य से अवैध घुसपैठियों की पहचान करेगी और उन्हें बाहर करेगी। इसके साथ ही पार्टी ने सत्ता में आने के पैंतालीस दिनों के अंदर सीमा पर बाड़ लगाने के लिए केंद्र सरकार को जमीन देगी। बीजेपी ने इसके जरिए बांग्लादेश की ओर हो रही पशु तस्करी को रोकने का भी ऐलान किया है।&nbsp;</div><div>राज्य में भ्रष्टाचार को भी बड़ा मुद्दा बनाने में बीजेपी कामयाब रही है। इसमें अतीत में हुई भ्रष्टाचार की घटनाओं ने मदद की है। यहां का शिक्षक भर्ती घोटाला रहा, जिसकी सुनवाई करते हुए कलकत्ता हाईकोर्ट ने 26 हजार नौकरियां रद्द कर दी थी। इसके साथ ही राशन और मिड-डे मील, मनरेगा&nbsp; A जॉब कार्ड घोटाला भी सुर्खियां बनता रहा है। बीजेपी ने इस बार इसे भी मुद्दा बनाया है। इन मामलों में तृणमूल के बीस से ज्यादा नेताओं को जेल भेजा गया। हालांकि तृणमूल कांग्रेस इसे केंद्र की बदले की कारर्वाई बताती रही है। यही वजह है कि पार्टी ने दागी नेताओं को टिकट भी दिया है। इसकी वजह से भद्रलोक के बीच तृणमूल को सवालों के घेरे में लाने की पुरजोर कोशिश अमित शाह और उनकी बीजेपी कर रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे ढेरों मामले हैं, जिनकी वजह से बीजेपी सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस को जबरदस्त चुनौती देती नजर आ रही है। इसका मतलब यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस ने सरेंडर कर दिया है। ममता की अगुआई में पार्टी अब भी पुरजोर तरीके से मैदान में खड़ी है। इस वजह से इस बार भी मुकाबला सीधे तौर पर ममता बनाम बीजेपी ही नजर आ रहा है। हालांकि सही तौर पर कहें तो इस बार मुकाबला ममता बनाम अमित शाह है। इस जंग में अमित शाह सफल होंगे या ममता एक बार फिर उन्हें मात देने में कामयाब रहेंगी, यह तो चार मई को मतगणना के बाद ही पता चल पाएगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 23 Apr 2026 11:54:51 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-battle-for-brigade-ground-mamata-vs-amit-shah</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईरान की ताकत बरकरार, अमेरिका के घटे हथियार! क्या इसी वजह से ट्रंप ने बढ़ाया युद्धविराम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/iran-strength-remains-intact-america-weapons-are-reduced-is-this-why-trump-extended-the-ceasefire]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ जारी संघर्षविराम को अनिश्चित काल के लिए बढ़ाने का ऐलान किया है। यह फैसला उस समय लिया गया जब संघर्षविराम समाप्त होने में कुछ ही घंटे बाकी थे और हालात तेजी से बिगड़ते नजर आ रहे थे। ट्रंप ने कहा कि यह कदम ईरान को एक साझा और स्पष्ट प्रस्ताव तैयार करने का समय देने के लिए उठाया गया है। उन्होंने यह भी बताया कि यह निर्णय पाकिस्तान के अनुरोध पर लिया गया है। वहीं पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इस फैसले के लिए ट्रंप का धन्यवाद किया और इसे क्षेत्रीय शांति के लिए महत्वपूर्ण कदम बताया। ट्रंप ने भी अपने संदेश में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और फील्ड मार्शल आसिम मुनीर की भूमिका का जिक्र किया।</div><div><br></div><div>हालांकि, संघर्षविराम के ऐलान के बावजूद जमीन पर हालात पूरी तरह शांत नहीं हैं। अमेरिका ने ईरान के खिलाफ समुद्री नाकाबंदी जारी रखी है और अपनी सैन्य तैयारियों को बरकरार रखा है। वहीं ईरान ने साफ कर दिया है कि वह धमकियों और दबाव के माहौल में किसी भी तरह की बातचीत के लिए तैयार नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/china-sent-a-gift-to-iran-we-intercepted-it" target="_blank">China ने ईरान को भेजा था गिफ्ट, ट्रंप बोले- हमने पकड़ लिया, ड्रैगन ने किया इनकार</a></h3><div>इस बीच, इजराइल ने दक्षिणी लेबनान में हवाई हमले जारी रखे हैं, जिसमें कई लोग घायल हुए और कई घरों को नुकसान पहुंचा। गाजा में भी हमले जारी हैं, जिससे क्षेत्र में मानवीय संकट और गहरा गया है। इस स्थिति ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संघर्षविराम केवल कागजी राहत है, जबकि वास्तविकता में तनाव बना हुआ है।</div><div><br></div><div>राजनयिक स्तर पर भी स्थिति उलझी हुई है। इस्लामाबाद में बातचीत को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और ईरानी प्रतिनिधिमंडल के नहीं पहुंचने से आंतरिक मतभेदों के संकेत मिल रहे हैं। चीन ने भी स्थिति को गंभीर बताते हुए हस्तक्षेप किया है और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य को खोलने की मांग की है।</div><div><br></div><div>अब यदि अमेरिकी रक्षा विभाग की खुफिया शाखा के ताजा आकलन की बात करें, तो यह तस्वीर और जटिल हो जाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि ईरान अब भी अपनी प्रमुख सैन्य क्षमताएं बनाए हुए है और वह एक मजबूत क्षेत्रीय शक्ति बना हुआ है। यह आकलन उन दावों के विपरीत है, जिनमें कहा गया था कि ईरान की सैन्य ताकत को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया गया है। खुफिया रिपोर्ट के अनुसार, ईरान की वायु और नौसेना पूरी तरह नष्ट नहीं हुई है और उसकी रणनीतिक क्षमता अभी भी प्रभावी बनी हुई है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिका के सार्वजनिक बयान और वास्तविक स्थिति में अंतर है। यह अंतर भविष्य की रणनीति और निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।</div><div><br></div><div>इसी बीच, एक और महत्वपूर्ण रिपोर्ट सामने आई है, जिसने अमेरिका की सैन्य तैयारियों को लेकर चिंता बढ़ा दी है। रक्षा विश्लेषकों और पेंटागन से जुड़े सूत्रों के अनुसार, ईरान के साथ सात सप्ताह तक चले संघर्ष में अमेरिका ने अपने कई महत्वपूर्ण मिसाइल भंडार का बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया है। एक अध्ययन के अनुसार, अमेरिका ने अपने प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइल का लगभग 45 प्रतिशत, थाड इंटरसेप्टर का लगभग आधा और पैट्रियट वायु रक्षा मिसाइलों का करीब 50 प्रतिशत इस्तेमाल कर लिया है। इसके अलावा टॉमहॉक मिसाइल का लगभग 30 प्रतिशत और अन्य लंबी दूरी की मिसाइलों का भी बड़ा हिस्सा खर्च हो चुका है। विशेषज्ञों का कहना है कि अमेरिका के पास फिलहाल ईरान के खिलाफ अभियान जारी रखने के लिए पर्याप्त हथियार मौजूद हैं, लेकिन यदि उसे चीन जैसे किसी बड़े प्रतिद्वंद्वी के साथ संघर्ष करना पड़ा, तो मौजूदा भंडार पर्याप्त नहीं होगा। इन हथियारों को फिर से तैयार करने में एक से चार साल तक का समय लग सकता है, जबकि पूरी क्षमता हासिल करने में और ज्यादा समय लग सकता है।</div><div><br></div><div>रिपोर्ट में यह भी चेतावनी दी गई है कि हथियारों की इस तेजी से खपत ने पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका की रणनीतिक स्थिति को कमजोर किया है। यह स्थिति भविष्य में अमेरिका की सैन्य रणनीति के लिए चुनौती बन सकती है। हालांकि, पेंटागन ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि अमेरिकी सेना के पास अपने मिशनों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधन हैं। ट्रंप प्रशासन ने भी हथियारों की कमी से इंकार किया है, हालांकि अतिरिक्त बजट की मांग की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि घटते भंडार का असर केवल अमेरिका तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इससे यूक्रेन और अन्य सहयोगी देशों को मिलने वाली सैन्य सहायता भी प्रभावित हो सकती है। अमेरिकी संसद में भी इस मुद्दे को लेकर चिंता जताई गई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इन तमाम घटनाक्रमों के बीच एक बड़ा सवाल उभरकर सामने आता है कि क्या ईरान की सैन्य ताकत के बने रहने और अमेरिकी हथियार भंडार में कमी से जुड़ी रिपोर्टों ने ही ट्रंप के फैसले को प्रभावित किया है। जब खुफिया आकलन यह संकेत दे रहे हैं कि ईरान अब भी एक मजबूत शक्ति है और दूसरी ओर अमेरिका को अपने मिसाइल भंडार को फिर से भरने में वर्षों लग सकते हैं, तो ऐसे में संघर्षविराम का ऐलान केवल कूटनीतिक कदम नहीं बल्कि एक रणनीतिक जरूरत भी हो सकता है। यह भी संभव है कि अमेरिका फिलहाल टकराव को टालकर अपनी सैन्य तैयारी को मजबूत करना चाहता हो। ऐसे में यह प्रश्न और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि क्या यह युद्धविराम वास्तव में शांति की दिशा में कदम है या फिर एक बड़े और लंबे संघर्ष से पहले की रणनीतिक विराम स्थिति है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, मौजूदा स्थिति कई स्तरों पर अस्थिर बनी हुई है। एक ओर संघर्षविराम ने अस्थायी राहत दी है, लेकिन दूसरी ओर सैन्य तनाव, खुफिया आकलनों में अंतर और हथियारों की कमी से जुड़ी चिंताएं भविष्य में बड़े संकट की ओर इशारा कर रही हैं। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं या यह संकट एक बड़े युद्ध में बदल जाता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 11:50:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/iran-strength-remains-intact-america-weapons-are-reduced-is-this-why-trump-extended-the-ceasefire</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[वैश्विक औसत से बहुत दूर है सत्ता में महिलाओं की भागीदारी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/women-participation-in-power-remains-far-below-the-global-average]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>संसद में महिलाओं के 33 फीसदी आरक्षण का बिल गिरने के साथ ही देश में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी को लेकर नई बहस छिड़ गई है। जहां एक और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संदेश के माध्यम से महिलाओं से माफी मांगी है तो दूसरी और विपक्ष ने इसे अपनी बड़ी जीत और सरकार की हार बताई है। हांलाकि विपक्ष यह भी कह रहा है कि उनका विरोध सीटों के परिसीमन से अधिक है। खैर यह अलग बहस का विषय हो सकता है। पर एक बात साफ हो जानी चाहिए कि सत्ता में महिलाओं की हिस्सेदारी के मामलें में हम दुनिया के देशों से अभी काफी पीछे चल रहे हैं। दुनिया के 190 देशों के आंकड़ों का विष्लेषण करे तो हमारे देश का स्थान 147 वां आता है। दुनिया के देशों में सत्ता में महिलाओं की भागीदारी की बात करें तो वैश्विक स्तर औसत 27.5 फीसदी है। 30 महिला राष्ट्राध्यक्ष महिलाएं है तो दुनिया के केवल 8 देश ही ऐसे हैं जहां महिलाओं की भागीदारी 50 फीसदी से अधिक है। रवांडा, क्यूबा, निकारागुआ, कोस्टारिका, बोलिविया, मैक्सिको, एंडोरा और संयुक्त अरब अमीरात में 50 प्रतिशत से अधिक भागीदारी है। न्यूजीलैंड, डेनमार्क और आइसलैंड 45 से 50 प्रतिशत महिलाओं का प्रतिनिधित्व है। आज हम महिलाओं की 33 प्रतिशत भागीदारी की बात कर रहे हैं वहीं इस समय दुनिया के 56 देश ऐसे हैं जहां सत्ता में महिलाओं का 33 प्रतिशत प्रतिनिधित्व है।&nbsp;</div><div><br></div><div>एक मोटे अनुमान के अनुसार हालिया चुनावों में 14 राज्यों में महिलाओं की निर्णायक भूमिका रही है। 2024 के लोकसभा चुनावों में भी 19 राज्यों केन्द्र शासित प्रदेशों में महिलाओं ने निर्णायक भूमिका निभाई। इसके साथ ही पिछले कुछ सालों के चुनाव परिणामों का विश्लेषण करें तो यह भी साफ हो जाता है कि लगभग सभी पार्टियों ने महिलाओं को केन्द्र में रखकर चुनाव घोषणा पत्र बनाये और महिलाओं को किसी भी नाम से योजना रखते हुए एक निश्चित राशि देने की बात प्रमुखता से की। बिहार, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश या अन्य प्रदेशों में लखपति दीदी या इसी तरह के नाम से मिलती जुलती योजनाओं में राशि उपलब्ध कराने की रणनीति महिला वोटों को अपनी और करने की रही है, यह दूसरी बात है कि इसका लाभ किस पार्टी को अधिक मिला। एक बात साफ हो जानी चाहिए राजनीतिक पार्टियां कहने को कुछ भी कहे या महिलाओं को आगे लाने की कितनी भी बात करें पर विधानसभा और संसद में महिलाओं की भागीदारी अभी तक महिलाओं की बढ़ नहीं पाई है। महिला प्रतिनिधित्व का वैश्विक औसत जहां 27.5 प्रतिशत है वहीं हमारे देश में अभी तक यह 14-15 प्रतिशत तक पहुंच पाया है। रौचक बात यह है कि 2009 की 15 वीं लोकसभा के पहले तक तो हमारे देश में लोकसभा में महिलाओं का प्रतिनिधित्व दहाई की संख्या में भी नहीं पहुंचा था। 15 वीं लोकसभा में पहली बार 10.9 प्रतिशत प्रतिनिधित्व हो सका। हांलाकि 1977 में आपातकाल के ठीक बाद की लोकसभा में सबसे कम भागीदारी केवल 3.5 प्रतिशत ही रह गई थी। पर 1977 के हालात अलग थे और उनको अलग करके देखा जाना चाहिए। उस समय आपातकाल के बाद की स्थितियां थी। 18 वीं लोकसभा में 17 वीं लोकसभा की तुलना में 3 महिला सांसद कम है। इस तरह से 17वीं लोकसभा में महिलाओं की सर्वाधिक 14.4 प्रतिशत भागीदारी रही।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/wave-of-change-in-west-bengal-mamata-haunted-by-the-fear-of-defeat" target="_blank">पश्चिम बंगाल में परिवर्तन की लहर: ममता को सताने लगा हार का डर</a></h3><div>जहां तक राजनीतिक दलों की बात है तो भले ही महिला आरक्षण बिल का अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धता के कारण कांग्रेस व अन्य विपक्षियों के साथ तृणमूल कांग्रेस ने भी विपक्ष में मतदान किया पर लोकसभा और राज्य सभा में टीएमसी दल की महिलाओं की हिस्सेदारी अधिक है। जहां तक कांग्रेस का प्रश्न है तो कांग्रेस की भागीदारी 14.3 प्रतिशत और बीजेपी की भागीदारी 12.9 प्रतिशत है। अन्य दलों की भी कमोबेश यही स्थिति है। जहां तक राज्यों का प्रश्न है तो इस समय देश में सर्वाधिक महिला सदस्य छत्तीसगढ़ विधानसभा में है। छत्तीसगढ़ में कुल सदस्यों में 21.1 प्रतिशत महिला सदस्य है। त्रिपुरा में 15 प्रतिशत महिला सदस्य है। बाकी देश के अन्य राज्यों में 15 प्रतिशत महिलाएं भी विधानसभा की सदस्य नहीं है। नागालैंड देश का ऐसा प्रदेश है जहां सबसे कम महिला सदस्य है। कर्नाटक जैसे राज्य में भी पांच प्रतिशत से कम महिला विधानसभा सदस्य है।&nbsp;</div><div><br></div><div>खैर इससे यह तस्वीर साफ हो जानी चाहिए कि जब तक संवैधानिक बाध्यता नहीं होगी तब तक महिलाओं की भागीदारी लाख प्रयासों के बावजूद नहीं बढ़ने वाली है। इसके लिए एक सीमा तक सीटों का आरक्षण करना ही होगा। इसका जीता जागता उदाहरण पंचायतीराज व स्थानीय स्वशासन संस्थाएं है। जहां महिलाओं की सीटे आरक्षित होने से आज तस्वीर ही बदल गई है। आज सरपंच पति या प्रधान पति वाली बात भी नहीं रही है। पिछले चुनाव परिणाम भी यह साफ कर चुके हैं कि आज महिलाएं अपने निर्णय स्वयं लेती है। यही कारण है कि सरकार बनने और बनाने में महिलाओं मतदाताओं की निर्णायक भूमिका रही है। आने वाले समय में इसमें और अधिक सकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। ऐसे में एक बात साफ हो जानी चाहिए कि बिना आरक्षित सीटों के विधानसभाओं या संसद में महिला सदस्यों की हिस्सेदारी बढ़ने की कल्पना करना बेमानी होगी। यह तो संवैधानिक बाध्यता से ही संभव हो पाएगा। यह सभी राजनीतिक दलों को समझना होगा। यदि महिलाओं की सत्ता में सहभागिता बढ़ानी है तो महिला सीटों का आरक्षण करना ही होगा। यह अवश्य है कि आरक्षण की सीमा आपसी समन्वय व विचार विमर्श से सर्वसम्मति से तय होता है तो यह बेहतर लोकतांत्रिक परंपरा होगी। राजनीतिक दलों को आपसी आग्रह दुराग्रहों से हटकर इस दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। गैरसरकारी संगठनों को भी इस दिशा में देश में माहौल बनाना चाहिए। यह साफ है कि अब समय आ गया है जब महिलाओं की हिस्सेदारी तय होनी ही चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Apr 2026 11:47:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/women-participation-in-power-remains-far-below-the-global-average</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत व दक्षिण कोरिया के बीच हुई नई डील के सियासी निहितार्थ ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-political-implications-of-the-new-deal-between-india-and-south-korea]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दुनियाभर में भारत की कूटनीति अपने अनोखे अंदाज के लिए चर्चित रहती आई है, क्योंकि हम तमाम हानि-लाभ की परवाह किए बगैर वसुधैव कुटुंबकम और सर्वे भवंतु सुखिनः के सभ्यता-संस्कृतिगत सिद्धांतों को अमलीजामा पहनाते आए हैं। हालांकि कोई इसे गुटनिरपेक्षता समझता है तो कोई निज स्वार्थपरकता, जो गलत भी नहीं है। आखिर बिना स्वार्थ साधे परमार्थ भी किया जाए तो कैसे? इसलिए व्यवहारम फलदायकम हमारा मूलमंत्र है। भारत और द#क्षिण कोरिया के बीच हुई नई डील (व्यापार, तकनीक, रक्षा और ऊर्जा सहयोग) को इसी नजरिए से देखने की जरूरत है, क्योंकि इससे ही द्विपक्षीय रिश्तों के साथ साथ हिंद प्रशांत के रणनीतिक संतुलन में भी गहरे सियासी निहितार्थ निकलते हैं। आइए क्रमबद्ध तरीके से इसे समझते हैं-</div><div><br></div><div>पहला, भारत की वैश्विक रणनीतिक स्थिति मजबूत होना&nbsp; सबसे ज्यादा मायने रखता है। जहां भारत दक्षिण कोरिया की “विशेष रणनीतिक साझेदारी” को आगे बढ़ाने के घोषणाओं से भारत को उत्तर पूर्व एशिया और इंडो पैसिफिक में एक अलग मध्य शक्ति के रूप में स्थापित करने में मदद मिलती है। वहीं, दक्षिण कोरिया का भारत नेतृत्व वाली पहलों जैसे इंडिया पैसिफिक ओशियन इनिशिएटिव और सोलर एलायंस में शामिल होना भारत की “मल्टी एलायंस” रणनीति को वैधता देता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/amidst-the-turmoil-in-the-strait-of-hormuz-south-korean-president-meets-modi" target="_blank">होर्मुज की उथल-पुथल के बीच अचानक मोदी से मिले कोरियाई राष्ट्रपति, चीन की उल्टी गिनती शुरू?</a></h3><div>दूसरा, अमेरिकी चीन टकराव में एक मजबूत तीसरा धुरा, जो संतुलन कारी साबित हो सकता है। दक्षिण कोरिया, जो राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में अमेरिका का मजबूत सहयोगी है, अब भारत के साथ चिप, एआई, ऊर्जा और जल मार्ग जैसे क्षेत्रों में गहरा तकनीकी आर्थिक सहयोग बना रहा है; यह चीन केंद्रित आपूर्ति श्रृंखला से बचने के लिए "डी-रिस्किंग" रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि इससे भारत, अमेरिका जैसे देशों के लिए चीन के बिना एक वैकल्पिक टेक और विनिर्माण हब बनने की दिशा में आगे बढ़ता है, जिससे हिंद प्रशांत में चीन विरोधी छोटे गुटों के लिए भारत का भू रणनीतिक मूल्य बढ़ता है। भारत इसे भुनाने में भी पीछे नहीं रहता, ताकि भारत के पड़ोसियों से चीन के बेहतर होते सम्बन्धों को उसके पड़ोस से साधकर अपना हित वर्द्धन किया जा सके।</div><div><br></div><div>तीसरा, अंतरराष्ट्रीय व्यापार और सुरक्षा व्यवस्था पर गहरा असर इसलिए कि भारत और दक्षिण कोरिया के बीच व्यापार 2030 तक 50 अरब डॉलर तक पहुंचाने के साथ ही चिप से शिप जैसी डील्स को रफ्तार देने से दोनों देश आपूर्ति श्रृंखलाओं में आपसी निर्भरता बढ़ा रहे हैं। इससे किसी भी एक बड़े खिलाड़ी (जैसे चीन या अमेरिका) के दबाव से निकलने की लचीलापन बढ़ता है। इसके अलावा, दोनों देशों ने ऊर्जा आपूर्ति, आर्थिक सुरक्षा वार्ता और नौसैनिक लॉजिस्टिक सहयोग पर भी जोर दिया है, जिससे दक्षिण कोरिया को भी भारत के माध्यम से ईरान और मध्य पूर्व से ऊर्जा तक पहुंच के विकल्प मिलते हैं। इससे भारत को विभिन्न तरह की मजबूती मिलती है।</div><div><br></div><div>चौथा, चीन और उत्तर कोरिया पर निर्देशित संदेश का रणनीतिक फायदा मिलता है। भारत दक्षिण कोरिया की बढ़ती रक्षा और तकनीकी साझेदारी, खासकर चिप, एआई, डिफेंस इंडस्ट्री और नौसैनिक लॉजिस्टिक पर काम, क्षेत्रीय स्थिरता के नाम पर चीन की समुद्री दबाव रणनीति के खिलाफ एक छोटा बफर बनाती है। यह उत्तर कोरिया के लिए भी यह ज्यादा टेंशन वाला है, क्योंकि दक्षिण कोरिया भारत सहयोग से उसके अपने देश के खिलाफ एक और बाहरी “प्रतिनिधित्व” बनता है, जो चीन‌ रूस के साथ उसके एकमात्र बड़े सहयोग पर भी राजनीतिक दबाव डाल सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, भारत के भीतरी राजनीतिक लाभ महत्वपूर्ण होते हैं। भारत के लिए यह डील एक ऐसा नारा बनती है जिससे सत्ताधारी गठबंधन यह दिखाने की कोशिश कर सकता है कि “मल्टी एलायंस विदेश नीति” और तकनीक आधारित “वैश्विक फैक्टरी” की तस्वीर धीरे धीरे असली हो रही है। इससे चुनावी राजनीति में “मजबूत वैश्विक भागीदार” बनने की चित्रण रणनीति मजबूत होती है, खासकर जब भारत अमेरिका, जापान, कोरिया और ऑस्ट्रेलिया के साथ अलग अलग गैर आधिकारिक गुटों में एक बड़ा खिलाड़ी बन रहा है। चूंकि इससे भारतीय प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत होता है, इसलिए सराहनीय पहल है।</div><div><br></div><h2># 15 समझौतों में चिप और शिप से जुड़े कौन से हैं, इसे समझिए</h2><div><br></div><div>भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौतों में सीधे तौर पर “चिप” (सेमीकंडक्टर/एआई टेक) और “शिप/पोत” (जहाज निर्माण, नौवहन, स्टील, बंदरगाह) से जुड़े कुछ मुख्य सहमति पत्रक (MoUs) इस प्रकार हैं:-&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, चिप (सेमीकंडक्टर/एआई/टेक) से जुड़े समझौते-&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">एआई, सेमीकंडक्टर और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में समझौते: भारत दक्षिण कोरिया के बीच एआई, सेमीकंडक्टर डिजाइन मैन्युफैक्चरिंग और आईटी इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों में कई सहमति पत्रक (MoUs) पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें साझा शोध, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और स्टार्टअप/कंपनी स्तरीय सहयोग जैसे बिंदु शामिल हैं।</span></div><div><br></div><div>क्रिटिकल टेक्नोलॉजी और आपूर्ति शृंखला सहयोग (आर्थिक सुरक्षा वार्ता): भारत कोरिया “आर्थिक सुरक्षा वार्ता” थीम के तहत चिप आधारित क्रिटिकल टेक (सेमीकंडक्टर, एक्ज़ीक्यूटिव ग्रेड टेक) की आपूर्ति शृंखला में सहयोग बढ़ाने के MoU भी शामिल हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, शिप/जहाज निर्माण और समुद्री क्षेत्र से जुड़े समझौते- समाचारों में “15 समझौतों” की लिस्ट के तौर पर निम्न बिंदु विशेष रूप से पोत निर्माण और समुद्री विकास सहयोग से सीधे जुड़े हैं:&nbsp;</div><div><br></div><div>पोत निर्माण (Shipbuilding): भारत दक्षिण कोरिया के बीच जहाज निर्माण और जहाज हार्डवेयर डिज़ाइन/टेक्नोलॉजी ट्रांसफर पर एक या अधिक सहमति पत्रक (MoUs) हुए, जिनका उद्देश्य भारत के डॉकयार्ड्स और प्राइवेट शिपबिल्डर्स को कोरिया की उन्नत जहाज निर्माण तकनीक से जोड़ना है।&nbsp;</div><div><br></div><div>स्टील/इस्पात आपूर्ति श्रंखला के लिए तकनीक और व्यापार: इस्पात उत्पादन और आपूर्ति श्रंखला (जो शिपबिल्डिंग के लिए महत्वपूर्ण है) पर तकनीक आधारित सहमति पत्रक (MoU) शामिल, जिससे भारतीय स्टील मिलों और कोरियाई शिपबिल्डर्स के बीच सीधा बंधन बढ़ेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>समुद्री विरासत समझौता (Maritime Heritage MoU) : भारत कोरिया के बीच समुद्री इतिहास और संस्कृति संरक्षण, म्यूजियम सहयोग और अंडरवाटर आर्कियोलॉजी जैसे प्रोजेक्टों पर सहमति पत्रक (MoU) हुआ, जो राजनीतिक सांस्कृतिक स्तर पर समुद्र केंद्रित विज़न को बढ़ावा देता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पोर्ट्स क्षेत्र में सहयोग: भारत और दक्षिण कोरिया ने पोर्ट इन्फ्रास्ट्रक्चर, आधुनिकीकरण और पोर्ट बेस्ड लॉजिस्टिक्स पर अलग सहमति पत्रक (MoU) शामिल किया है, जो “चिप से शिप” नारे के तहत लॉजिस्टिक्स डिजिटल हार्डवेयर चेन को जोड़ता है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>वहीं, कुल 15 समझौतों में अन्य प्रमुख क्षेत्र क्या क्या हैं, यहां जनिए</h2><div><br></div><div>भारत और दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौतों में “चिप” और “शिप” के अलावा कई अन्य प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:- पहला, ऊर्जा और आर्थिक सुरक्षा, ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक सुरक्षा वार्ता पर एक सहमति पत्रक (MoU): दोनों देश लिक्विड नेचुरल गैस (LNG), रिन्यूएबल एनर्जी और “क्रिटिकल टेक” आपूर्ति शृंखला के संदर्भ में सहयोग बढ़ाने पर सहमत हुए हैं। भारत कोरिया “ऊर्जा आपूर्ति” सहमति पत्रक (MoU) ने ऊर्जा आपूर्ति विविधता और आर्थिक राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देने का लक्ष्य रखा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>दूसरा, विज्ञान, अनुसंधान और इनोवेशन, विज्ञान और प्रौद्योगिकी आदान प्रदान : भारत की राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विकास एजेंसियों और दक्षिण कोरिया के विज्ञान तकनीकी संस्थानों के बीच शोध और इनोवेशन आधारित सहमति पत्रक (MoU) शामिल हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, नवीनतम तकनीकों का आदान प्रदान (लेज़र, फोटोनिक्स जैसे क्षेत्रों में): इस तरह के समझौते भारत को दक्षिण कोरिया की उन्नत रिसर्च क्षमताओं से जोड़ते हैं।</div><div><br></div><div>तीसरा, व्यापार, विकास और निवेश, व्यापार और विकास बैंक सहमति पत्रक (MoU): भारत के विकास बैंक (जैसे EXIM या DFDC जैसी संस्थाएँ) और दक्षिण कोरिया आधिकृत विकास वित्त संस्थानों के बीच सहयोग MoU शामिल, जो बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और उद्योग प्रोजेक्ट्स के लिए वित्तपोषण संरचना को सुगम बनाएगा। व्यापार लक्ष्य (2030 तक 50 अरब डॉलर) को मजबूत करने के लिए व्यापार नीति, निवेश और मानक समन्वय पर कई विशेष सहमति पत्रक (MoUs) शामिल है।</div><div><br></div><div>चतुर्थ, स्वास्थ्य, फार्मा और जीव विज्ञान, स्वास्थ्य और जीव विज्ञान शोध: भारत के जैव वैज्ञानिक शोध संस्थानों और दक्षिण कोरिया के फार्मा/बायोटेक संस्थानों के बीच शोध सहयोग सहमति पत्रक (MoU) है, जिसमें दवाओं, वैक्सीन और जैव तकनीकों के साझा अध्ययन शामिल हैं। इससे भारतीय फार्मा और जैव उद्योग को उन्नत टेक्नोलॉजी और वैश्विक मानकों के अनुरूप लाने में मदद मिलेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>पांचवां, संस्कृति, शिक्षा और लोगों के बीच संबंध, संस्कृति, शिक्षा और शोध संस्थानों का सहयोग: दोनों देशों के विश्वविद्यालयों, विज्ञान संस्कृति संस्थानों के बीच शिक्षा और सांस्कृतिक आदान प्रदान सहमति पत्रक (MoUs) शामिल हैं, जिसमें छात्र विनिमय, शोध समन्वय और यूनेस्को (UNESCO) जैसे प्लेटफॉर्म पर सहयोग शामिल है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, "कोरिया और भारत” के लोगों के बीच लिंक शैक्षणिक-सहमति पत्रक (Edu MoU): यह युवा, शिक्षक और शोधकर्ताओं को दोनों देशों के बीच लिंक करने वाला संरचनात्मक समझौता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>छठा, आर्थिक और नीतिगत सहयोग (अन्य), वैश्विक व्यापार और नीति समन्वय: दोनों देश ने वैश्विक व्यापार नियमों, स्वतंत्र व्यापार समझौतों (जैसे भारत कोरिया CEPA) को और प्रभावी बनाने के लिए नीति समन्वय सहमति पत्रक (MoUs) जोड़े हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वहीं, कस्टम सहयोग और व्यापार सुविधा: कस्टम नियमों, व्यापार बाधाओं कम करने और ई कॉमर्स/पेमेंट सिस्टम जोड़ने पर अलग से व्यवस्था संबंधी सहमति पत्रक</div><div>(MoUs) शामिल हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2># इन समझौतों से भारत को क्या-क्या आर्थिक लाभ होंगे?</h2><div><br></div><div>भारत दक्षिण कोरिया के बीच हुए 15 समझौते, खासकर चिप, शिप, ऊर्जा, व्यापार, विज्ञान तकनीक और नीति सहयोग के तहत, भारत के लिए कई तरह के आर्थिक लाभ ला सकते हैं। इस समझौते समूह के रूप में ये लाभ नीचे दिए गए प्रमुख सिद्धांतों पर बने हैं, विशेष रूप से भारत कोरिया विशेष रणनीतिक साझेदारी और 2030 तक 50 अरब डॉलर व्यापार लक्ष्य के संदर्भ से विश्लेषित तर्कों के आधार पर, इसलिए इन्हें समझिए:&nbsp;</div><div><br></div><div>पहला, विनिर्माण और निवेश उत्तेजना: चिप, शिप और भारी उद्योग में कोरियाई तकनीक और निवेश से भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, जहाज निर्माण और स्टील आधारित इंडस्ट्रीज को आधुनिक क्षमता मिलेगी, जिससे घरेलू विनिर्माण लागत कम होने और एक्सपोर्ट प्रतिस्पर्धा बढ़ने की संभावना है। यह समझौता "मेक इन इंडिया" (Make in India) और “आत्मनिर्भर भारत” के लक्ष्यों को आगे बढ़ाता है, क्योंकि कोरियाई कंपनियां भारत में ज्यादा स्थानीय उत्पादन जोड़ी बना सकती हैं, जिससे रोज़गार और टैक्स बेस दोनों को लाभ मिल सकता है।</div><div><br></div><div>दूसरा, व्यापार और एक्सपोर्ट बढ़ोतरी: 2030 तक भारत कोरिया व्यापार 50 अरब डॉलर तक बढ़ने के लक्ष्य से भारतीय निर्यातकों को एक नया और परिपक्व बाज़ार मिलता है, खासकर आईटी सेवाएँ, फार्मा उत्पाद, जैव उद्योग, मशीनरी और इंजीनियरिंग गुड्स के लिए।</div><div>दोनों देशों के बीच सीपीपीए (CEPA) जैसी व्यापार सुविधा वाले समझौते (या उनके विस्तार) से टैरिफ कम होने, रेगुलेटरी बैरियर कम करने और स्टैंडर्ड हार्मोनाइज़ेशन से भारतीय उत्पादों को कोरिया में बेहतर पहुंच मिलेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, ऊर्जा सुरक्षा और लागत नियंत्रण: ऊर्जा आपूर्ति और आर्थिक सुरक्षा वार्ता पर सहमति पत्रक (MoU) से भारत लिक्विड नेचुरल गैस (LNG) और अन्य ऊर्जा स्रोतों के लिए विविध आपूर्ति स्रोत बना सकता है, जिससे ऊर्जा आयात बिल में अस्थिरता और लागत की वृद्धि रोकने में मदद मिलेगी। यह भारत की "डी-रिस्किंग" (de risking) रणनीति को बढ़ावा देगा, जिससे ऊर्जा आपूर्ति में चीन या किसी एक देश पर ज्यादा निर्भरता कम होगी और घरेलू औद्योगिक उत्पादन की लागत अधिक पूर्वानुमान योग्य रहेगी।</div><div><br></div><div>चौथा, टेक्नोलॉजी आधारित उद्योगों में लागत और उत्पादकता: एआई (AI), सेमीकंडक्टर और उन्नत टेक्नोलॉजी के सहयोग से भारतीय उद्योगों (जैसे ऑटो पार्ट्स, इलेक्ट्रिक वाहन, स्मार्ट इंफ्रास्ट्रक्चर) में उत्पादकता बढ़ेगी और ऑटोमेशन के माध्यम से लागत प्रति यूनिट घटेगी, जिससे निर्यात की प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। शिपबिल्डिंग और पोर्ट टेक्नोलॉजी से लॉजिस्टिक्स खर्च कम होने से भारतीय निर्यातक अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में कीमत प्रतिस्पर्धा और समय पाबंद डिलीवरी के लिहाज से मजबूत होंगे।</div><div><br></div><div>पांचवां, रोज़गार और मैन्युफैक्चरिंग लिंकेज: चिप आधारित इलेक्ट्रॉनिक्स, रोबोटिक्स, जहाज निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे क्षेत्रों में कोरियाई तकनीक सहायता और निवेश से हाई स्किल और मिड स्किल दोनों तरह के रोज़गार बढ़ेंगे, खासकर राज्य–स्तरीय औद्योगिक क्लस्टर और स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन्स में। यह समझौता उन राज्यों के लिए भी फायदेमंद होगा जहाँ जहाज निर्माण, इलेक्ट्रॉनिक्स पार्क और ऑटोमोबाइल हब विकसित हो रहे हैं, क्योंकि कोरियाई निवेश सीधे उन क्षेत्रों में जाएगा।</div><div><br></div><div>छठा, बौद्धिक संपदा और इनोवेशन अर्थव्यवस्था : विज्ञान, बायोटेक और फार्मा शोध सहयोग सहमति पत्रक (MoUs) से भारतीय निजी और सार्वजनिक अनुसंधान संस्थानों को डेटा शेयरिंग, कोरियाई पेटेंट लाइसेंसिंग और जॉइंट रिसर्च प्रोजेक्ट्स के अवसर मिलेंगे, जिससे बौद्धिक संपदा आधारित निर्यात (जैसे एपीआई, बायोफार्मास्युटिकल उत्पाद) बढ़ सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:35:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-political-implications-of-the-new-deal-between-india-and-south-korea</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[ममता, मोदी, मुस्लिम और महिला- पश्चिम बंगाल में 'करो या मरो' का चुनाव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-modi-muslims-and-women-a-do-or-die-election-in-west-bengal]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल में होने विधानसभा चुनाव के लिए चुनाव प्रचार जोर-शोर से जारी है। राज्य में पहले चरण का मतदान 23 अप्रैल और दूसरे चरण का मतदान 29 अप्रैल को होना है। इस चुनाव के लिए राज्य की सत्तारूढ़ पार्टी तृणमूल कांग्रेस और केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी बीजेपी ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। दोनों ही राजनीतिक दलों के लिए यह 'करो या मरो' वाला चुनाव बन गया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेफ्ट फ्रंट के 34 साल के शासन का अंत कर ममता बनर्जी वर्ष 2011 में पहली बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बनी थी। वर्ष 2016 में ममता बनर्जी ने लगातार दूसरी बार चुनाव जीता। वर्ष 2021 के पिछले विधानसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की अगुवाई में बीजेपी ने ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने का पुरजोर दावा किया। बीजेपी ने उस चुनाव को कांटे की टक्कर का बना देने में कामयाबी भी हासिल की और नतीजे भी उसके हिसाब से शानदार ही रहे लेकिन ममता बनर्जी उससे कहीं ज्यादा आगे रही। पिछले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सीटों की संख्या अप्रत्याशित रूप से 3 से बढ़कर सीधे 77 पर तो पहुंच गई लेकिन 48.5 प्रतिशत वोट के बल पर 215 सीटें जीतकर ममता बनर्जी लगातार तीसरी बार राज्य की मुख्यमंत्री बन गईं। इस बार जहां ममता बनर्जी लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री बनने के लिए चुनाव लड़ रही है, वहीं बीजेपी के लिए यह चुनाव प्रतिष्ठा का मुद्दा बन गया है। बीजेपी को इस बात का बखूबी अहसास है कि अगर इस बार पार्टी बंगाल में सत्ता में आने से चूक गई तो पार्टी के लिए राज्य में संगठन और कैडर तक बचाना मुश्किल हो जाएगा।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/election-campaign-intensifies-in-bengal-bjp-manifesto-released" target="_blank">बंगाल में आक्रामक हुआ चुनाव प्रचार, जारी हुआ भाजपा संकल्प पत्र</a></h3><div>चुनाव आयोग द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक, पहले चरण के तहत राज्य की जिन 152 सीटों पर 23 अप्रैल को मतदान होना है। उन सीटों पर अब तक तीन करोड़ सात लाख 77 हजार 171 मतदाता मतदान के लिए पात्र हैं। इनमें एक करोड़ 84 लाख 99 हजार 496 पुरूष मतदाता है जबकि महिला मतदाताओं की संख्या एक करोड़ 75 लाख 77 हजार 210 है। दोनों चरणों को अगर मिलाकर देखा जाए तो महिला मतदाताओं की संख्या 3.33 करोड़ है जो कि पुरुष मतदाताओं के लगभग ही है। इसलिए बंगाल में किसकी सरकार बनेगी, यह महिला वोटरों के रूख पर ही ज्यादा निर्भर करेगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>यही वजह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में एक तरफ जहां बीजेपी महिला आरक्षण से जुड़े बिल के लोकसभा में पास नहीं होने का ठीकरा ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस पर फोड़ रही है, वहीं टीएमसी अपने महिला सांसदों की संख्या और महिला मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का जिक्र करते हुए बीजेपी को ही महिला विरोधी साबित करने की कोशिश कर रही है।&nbsp; इसके साथ ही महिलाओं के लिए बीजेपी ने अपने घोषणापत्र में सौगातों की बौछार कर दी है। जिसके जवाब में ममता ने पहले से ही चलाई जा रही लक्ष्मी भंडार योजना की राशि बढ़ाने का वायदा किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>महिला वोटरों के साथ ही राज्य में मुस्लिम मतदाता भी ममता बनर्जी की जीत में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। राज्य की कुल 294 विधानसभा सीटों में से 125 सीटों पर मुस्लिम वोटर निर्णायक भूमिका में है और इसमें से ज्यादातर सीटों पर टीएमसी का ही कब्जा है। ममता की पार्टी का आरोप है कि एसआईआर के नाम पर मुस्लिम वोटरों के ही नाम काटे गए हैं। असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम और हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी भी मुस्लिम वोटों में सेंध लगाने की कोशिश कर रही है।</div><div><br></div><div>महिला और मुस्लिम वोटरों के साथ ही ब्रांड मोदी और ममता भी राज्य के जनादेश को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगे। जिस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश के जरिए ममता बनर्जी को महिला विरोधी बताते हुए मोर्चा खोल दिया है, उससे साफ-साफ नजर आ रहा है कि इस देश के कई राज्यों में हुए विधानसभा चुनाव की तर्ज पर ही बंगाल में भी बीजेपी 'ब्रांड मोदी' के नाम पर ही चुनाव लड़ रही है। जबकि टीएमसी पिछले 3 विधानसभा चुनावों की तरह ही इस बार भी 'ब्रांड ममता बनर्जी' पर ही निर्भर है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम बंगाल के चुनावी परिदृश्य, घमासान और चुनावी बयानबाजी से यह साफ-साफ नज़र आ रहा है कि इस राज्य का विधानसभा चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बनाम मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का चुनाव बन गया है। कांग्रेस पार्टी और लेफ्ट फ्रंट, दूर-दूर तक मुकाबले में कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। हालांकि , इस बात को भूलना नहीं चाहिए कि चुनावी राजनीति में जनता कभी-कभी अप्रत्याशित चमत्कार भी कर देती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Apr 2026 19:17:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/mamata-modi-muslims-and-women-a-do-or-die-election-in-west-bengal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विकास और सुशासन के मुद्दों पर भी काम करे मीडिया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/media-should-also-work-on-issues-of-development-and-good-governance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मीडिया की ताकत आज सर्वव्यापी है और कई मायनों में सर्वग्रासी भी। ऐसे में विकास के सवालों और उसके लोकव्यापीकरण में मीडिया की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण हो उठी है। यह एक ऐसा समय है, जबकि विकास और सुशासन के सवालों पर हमारी राजनीति में बात होने लगी है, तब मीडिया में यह चर्चाएं न हों यह संभव नहीं है। समाज विकास की प्रक्रिया और उसकी आकांक्षाएं मीडिया में दर्ज हों, ऐसी उम्मीद की जाती है। इन विषयों की रिपोर्टिंग के लिए तमाम पत्रकार आगे आ रहे हैं। वैश्विक स्तर पर भी विकास की पत्रकारिता को एक नई नजर से देखा जा रहा है। भारत में विकास की पत्रकारिता और उसके सवालों से जूझने के लिए पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी तैयार है, किंतु मुख्यधारा के मीडिया के द्वारा इन विषयों को तरजीह न दिए जाने के कारण निराशा ही हाथ लगती है। संकट पत्रकारों की ओर से नहीं, मीडिया संस्थानों और प्रबंधकों की ओर से है। विकास का मुद्दा क्या सिर्फ सरकारी विज्ञापनों का विषय है, सरकारी मीडिया का विषय है, या यह समाज में हो रहे नवाचारों का भी विषय है। विकास पत्रकारिता को पाठ्यक्रम के साथ मीडिया कर्म का भी हिस्सा होना चाहिए।</div><div><br></div><div>भारत जैसे विविधता और बहुलता भरे समाज में सभी उम्मीदों, सपनों और बदलावों को रेखांकित कर पाना कठिन है। क्योंकि विकास के अनेक तल हैं और देश में समाज की रचना भी बहुस्तरीय है, देश में कहावत प्रचलित है ‘चार कोस पर पानी बदले आठ कोस पर वाणी‘ , इसलिए किसी राज्य को भी एक ही पैमाने से नहीं नापा जा सकता। जैसे मध्य प्रदेश में एक तरफ समृद्ध मालवा है, तो दूसरी और झाबुआ जैसे इलाके भी हैं। एक तरफ इंदौर की चमक है, तो दूसरी ओर अलीराजपुर जैसे क्षेत्र भी हैं। छत्तीसगढ़ में अबूझमाड़ है, तो भिलाई भी है। ऐसे में पत्रकारों या विकास के सवालों पर लिखने वालों की चुनौतियां बढ़ जाती हैं। इसी तरह विकास की भूमिका भी यहां विस्तृत और परिवर्तित हो जाती है। हम देखें तो 1950 के पहले आर्थिक विकास हमारे लिए सबसे महत्वपूर्ण था। किंतु 1950 के बाद की चिंताएं अलग हो गयी। बाद के दिनों में सामाजिक विकास को एक बड़ा कारक माना जाने लगा है। सामाजिक न्याय से लेकर स्थाई विकास के सवाल अब बड़े हो गए हैं। यहां तक कि पर्यावरण और ग्लोबल वार्मिंग जैसी चीजें भी हमारे सामने हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/prof-sanjay-dwivedi-on-journalism-icon-achyutanand-mishra" target="_blank">प्रो. Sanjay Dwivedi बोले- अजातशत्रु हैं Achyutanand Mishra, हिंदी Journalism के भीष्म पितामह</a></h3><div>एक समय में विकसित और विकासशील देशों की बहसें भी हमने सुनीं जिनमें मैकब्राइड कमीशन की रिपोर्ट एक अलग तरह से बात करती हुयी नजर आती है, जिनमें कुछ सवाल आज भी मौजू हैं। नियंत्रित मीडिया से मीडिया के चौतरफा विकास का समय भी आया जिसमें कुछ भी छिपाना और दबाना असंभव सा हो गया। कई बार यह भी लगता रहा कि विकास का सवाल सिर्फ सरकारी माध्यमों (मीडिया) के लिए ही महत्व का है, बाकी माध्यमों का अपना एजेंडा और राय अलग है। यहां यह भी देखना जरूरी है कि कम्युनिकेशन(संचार) सिर्फ सूचनाओं का हस्तांतरण नहीं है। बल्कि पक्षधरता के साथ, न्याय के लिए खड़ा होना भी है। जन को ताकतवर बनाना भी है। अवसर की समानता की अवधारणा को प्रचारित और स्थापित करना भी है।</div><div><br></div><div>विकेन्द्रीकरण ने विकास के सामने कई नए प्रश्न खड़े किए हैं। जिनके भी ठोस और वाजिब हल हमें ढूंढने चाहिए। जैसे पंचायती राज में भारत ने एक लंबी छलांग लगाई है। सत्ता इसके चलते पंचायतों तक पहुंची, पर सवाल यह है कि क्या इससे लोकतंत्र मजबूत हुआ है? क्या संसदीय राजनीति और चुनावों की तमाम बुराईयां हमारी पंचायतों तक नहीं पहुंच गयी? वहीं हम मीडिया को देखें तो उसका भी विस्तार हुआ है। व्यापकता बढ़ी है, पहुंच भी बढ़ी है। पर सवाल यह है कि क्या मीडिया में संवेदनशीलता, ग्रहणशीलता और विविधता को आदर देने की उसकी भावना भी बढ़ी है, तो शायद उत्तर नकारात्मक ही हो। तीनों तंत्रों ( कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका) से निराश लोग मीडिया की ओर बहुत उम्मीदों से देखते हैं। कई अर्थों में सत्ता का तो विकेन्द्रीकरण दिखता है, किंतु मीडिया धीरे-धीरे केन्द्रीकरण का शिकार हो रहा है। इसलिए जरूरी है क्रास मीडिया ओनरशिप के बारे में भी भारत जैसे देश सोचें। ताकि मीडिया के एकाधिकार के खतरों से बचा जा सके। इसके साथ ही प्रेस कौंसिल जैसी नख-दंत हीन संस्था के अधिकारों और क्षेत्राधिकार में बदलाव करते हुए उसे मीडिया कौंसिल में बदला जाना जरूरी है ताकि वह आज के प्रभावी मीडिया को भी अपनी चर्चा में ले सके।</div><div><br></div><div>हम जिस संकट से दो चार हैं, वह यह है कि सूचनाएं बढ़ गई हैं और खबरें घट गई हैं। अखबारों के पन्ने बढ़ गए हैं, किंतु इनसे आम-आदमी गायब है। चैनल अब चौबीस घंटे कुछ बोलते हैं, पर उनमें विकास और जनता के सवालों की जगह बहुत कम है। जबकि विकास की पत्रकारिता की मुक्ति इसमें है कि जो लोग मीडिया तक नहीं पहुंच सकते, मीडिया उन तक पहुंचे। उनका दर्द सुने। अच्छी और उम्मीद जगाने वाली खबरों की ओर जाएं।</div><div><br></div><div>हमारी राजनीति बदल रही है, हमारा समाज बदल रहा है किंतु हमारे मीडिया के सोचने और अभिव्यक्त करने की शैली उस तुलना में नहीं बदली जैसी बदलनी चाहिए। आज यह मान्यता बन चुकी है कि विकास भारतीय मीडिया की प्राथमिकता नहीं है, शायद समाज भी उसकी प्राथमिकता नहीं है। हमारे नागरबोध ने मीडिया को समाज से बड़ा बना दिया है। किंतु यह तय मानिए कि कोई भी मीडिया, कोई भी राजनीति और कोई भी व्यक्ति समाज से बड़ा नहीं हो सकता। 18 से 25 साल और 18 से 35 साल के युवाओं के बीच बाजार खोज रहे मीडिया की चितांएं अलग हो सकती हैं किंतु समाज की चितांएं कुछ भिन्न हैं। वे ही वास्तविक चिंताएं हैं। मीडिया अगर इन चिंताओं से अलग व्यवहार कर रहा है तो वह अपने अस्तित्व पर संकट स्वयं रच है। विश्वसनीयता और प्रामणिकता के संकट तो उसके साथ संयुक्त हैं ही। मीडिया के नेतृत्वकर्ताओं के लिए यह सोचने का सही समय है कि जब सारा देश विकास और सुशासन के सवालों पर गंभीर हो रहा है, उसमें अपने शासकों से जवाब मांगने की हिम्मत आ रही है, तो हमारा मुख्यधारा का मीडिया क्या कर रहा है? ऐसे तमाम सवाल मीडिया के नेतृत्वकर्ताओं के सामने आज उपस्थिति हैं, अगर इन सवालों के हल हमने आज नहीं तलाशे तो कल बहुत देर हो जाएगी।</div><div><br></div><div>- प्रो. संजय द्विवेदी</div><div>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 18 Apr 2026 15:01:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/media-should-also-work-on-issues-of-development-and-good-governance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[वैश्विक तनाव के बीच भारत की सधी हुई चाल, ऑस्ट्रिया के साथ सहयोग बढ़ाकर मोदी ने किया कमाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-achieves-remarkable-success-by-increasing-cooperation-with-austria]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत और ऑस्ट्रिया के बीच संबंधों को नई दिशा देने वाली एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक पहल के तहत ऑस्ट्रिया के चांसलर क्रिश्चियन स्टॉकर की भारत यात्रा ऐतिहासिक मानी जा रही है। लगभग चार दशकों के बाद किसी ऑस्ट्रियाई चांसलर का भारत आगमन न केवल द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती का संकेत है, बल्कि यह वैश्विक परिदृश्य में बदलती प्राथमिकताओं के बीच नई साझेदारी के निर्माण का भी प्रतीक है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चांसलर स्टॉकर का स्वागत करते हुए इसे विशेष अवसर बताया और इस बात पर जोर दिया कि यूरोप के बाहर अपनी पहली यात्रा के लिए भारत को चुनना ऑस्ट्रिया की भारत के प्रति गहरी प्रतिबद्धता को दर्शाता है। यह यात्रा ऐसे समय में हुई है जब भारत और यूरोपीय संघ के बीच मुक्त व्यापार समझौते के बाद आर्थिक और रणनीतिक सहयोग के नए अवसर सामने आए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/putin-will-come-to-india-for-the-brics-summit-modi-will-go-to-russia" target="_blank">BRICS Summit के लिए Putin आएंगे India, Modi जाएँगे Russia, दोनों पक्के दोस्त मिलकर बदलेंगे वैश्विक समीकरण!</a></h3><div>भारत और ऑस्ट्रिया के संबंध पहले से ही अवसंरचना, नवाचार और सतत विकास के क्षेत्रों में मजबूत रहे हैं। दिल्ली मेट्रो और अटल सुरंग जैसे महत्वपूर्ण परियोजनाओं में ऑस्ट्रिया की तकनीकी विशेषज्ञता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसके अलावा रेलवे परियोजनाओं, रोपवे, स्वच्छ ऊर्जा और शहरी विकास जैसे क्षेत्रों में भी ऑस्ट्रियाई कंपनियों की सक्रिय भागीदारी रही है।</div><div><br></div><h2>दोनों देशों के बीच हुए 15 करार</h2><div><br></div><div>इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच कुल पंद्रह महत्वपूर्ण समझौते और पहलें सामने आईं, जो रक्षा, प्रौद्योगिकी, व्यापार, नवाचार और कौशल विकास जैसे क्षेत्रों को कवर करती हैं। इनमें सबसे प्रमुख है आतंकवाद के खिलाफ संयुक्त कार्य समूह की स्थापना का प्रस्ताव, जो वैश्विक स्तर पर आतंकवाद से निपटने में रणनीतिक सहयोग को मजबूत करेगा।</div><div><br></div><div>रक्षा क्षेत्र में भी सहयोग को नई गति देने के लिए सैन्य मामलों में सहयोग पर एक आशय पत्र पर सहमति बनी है। इसके तहत रक्षा उद्योग, नीति संवाद, प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण को बढ़ावा दिया जाएगा। यह पहल भारत और यूरोप के बीच हाल ही में हुए सुरक्षा सहयोग को भी मजबूती प्रदान करेगी।</div><div><br></div><div>आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से एक फास्ट ट्रैक तंत्र स्थापित करने की घोषणा की गई है, जिससे दोनों देशों की कंपनियों और निवेशकों को आने वाली समस्याओं का शीघ्र समाधान किया जा सकेगा। इससे व्यापार को सुगम बनाने और निवेश को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है।</div><div><br></div><div>सांस्कृतिक और रचनात्मक क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने के लिए ऑडियो विजुअल सह उत्पादन समझौता किया गया है, जिससे दोनों देशों के फिल्म उद्योग के बीच संयुक्त निर्माण और सांस्कृतिक आदान प्रदान को बढ़ावा मिलेगा। खाद्य सुरक्षा के क्षेत्र में भी एक महत्वपूर्ण समझौता हुआ है, जिसके तहत वैज्ञानिक सहयोग, मानकों के आदान प्रदान और सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जाएगा। इससे कृषि और खाद्य उत्पादों के व्यापार को भी मजबूती मिलेगी।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, दोनों देशों के बीच कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण को बढ़ावा देने के लिए एक संयुक्त आशय पत्र पर हस्ताक्षर किए गए हैं, जिसमें प्रशिक्षुता प्रणाली, ज्ञान साझा करने और योग्यता की पारस्परिक मान्यता पर जोर दिया गया है। इसके अलावा शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए संरचित संवाद शुरू करने और तकनीकी विश्वविद्यालयों के माध्यम से भारतीय छात्रों के लिए नए अवसर उपलब्ध कराने की पहल भी की गई है।</div><div><br></div><div>इस यात्रा के दौरान स्टार्टअप सहयोग को बढ़ाने, साइबर सुरक्षा संवाद शुरू करने, अंतरिक्ष उद्योग में संयुक्त सेमिनार आयोजित करने और वर्किंग हॉलिडे कार्यक्रम को लागू करने जैसी घोषणाएं भी की गईं। उच्च प्रौद्योगिकी जैसे क्वांटम तकनीक, मशीन लर्निंग, जल शोधन और सामग्री विज्ञान में संयुक्त अनुसंधान को साझेदारी का मुख्य आधार बनाया गया है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर यह भी कहा कि भारत की प्रतिभा और ऑस्ट्रिया की नवाचार क्षमता मिलकर वैश्विक स्तर पर भरोसेमंद तकनीक और आपूर्ति श्रृंखला विकसित कर सकती है। उन्होंने रक्षा, सेमीकंडक्टर, जैव प्रौद्योगिकी और क्वांटम क्षेत्रों में सहयोग की अपार संभावनाओं को रेखांकित किया। इसके अलावा, मानव संसाधन के क्षेत्र में भी दोनों देशों ने प्रगति की दिशा में कदम बढ़ाया है। वर्ष 2023 में हुए प्रवासन और गतिशीलता समझौते के तहत अब नर्सिंग क्षेत्र में भी सहयोग को विस्तार दिया जाएगा। युवा आदान प्रदान को प्रोत्साहित करने के लिए वर्किंग हॉलिडे कार्यक्रम की शुरुआत की गई है।</div><div><br></div><div>साथ ही वैश्विक परिदृश्य पर चर्चा करते हुए दोनों देशों ने इस बात पर सहमति जताई कि सैन्य संघर्ष किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। चाहे यूक्रेन का संकट हो या पश्चिम एशिया की स्थिति, दोनों देशों ने स्थायी और शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन किया। साथ ही वैश्विक संस्थाओं में सुधार और आतंकवाद के पूर्ण उन्मूलन की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया।</div><div><br></div><div>हम आपको एक बार फिर बता दें कि ऑस्ट्रिया भारत के लिए एक महत्वपूर्ण यूरोपीय साझेदार है। यह मध्य और पूर्वी यूरोप में प्रवेश का एक प्रमुख द्वार है और हरित प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा तथा उन्नत इंजीनियरिंग में इसकी विशेषज्ञता भारत के विकास कार्यक्रमों के लिए उपयोगी है। दोनों देशों के बीच व्यापार लगातार बढ़ रहा है और यह लगभग तीन अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच चुका है।</div><div><br></div><h2>वैश्विक परिदृश्य पर क्या असर पड़ेगा?</h2><div><br></div><div>देखा जाये तो भारत और ऑस्ट्रिया के बीच मजबूत होते संबंधों का प्रभाव वैश्विक भू-राजनीति पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देगा। यूरोप के मध्य में स्थित ऑस्ट्रिया, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण रणनीतिक सेतु का काम करता है, जिससे भारत को यूरोप के बाजारों, तकनीक और निवेश तक बेहतर पहुंच मिलती है। इस सहयोग से भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला में भूमिका और अधिक मजबूत होगी, विशेषकर उच्च प्रौद्योगिकी, रक्षा और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में। इसके साथ ही, ऑस्ट्रिया का भारत के प्रति समर्थन अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की स्थिति को सुदृढ़ करेगा, खासकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता जैसे मुद्दों पर। दक्षिण एशिया के संदर्भ में यह साझेदारी भारत की रणनीतिक बढ़त को और मजबूत करेगी, क्योंकि उन्नत तकनीक, रक्षा सहयोग और आर्थिक निवेश के माध्यम से भारत क्षेत्रीय नेतृत्व को और प्रभावी ढंग से स्थापित कर सकेगा। इससे न केवल भारत की सुरक्षा क्षमताएं बढ़ेंगी, बल्कि वह क्षेत्र में स्थिरता, विकास और संतुलन बनाए रखने में भी अधिक सक्षम भूमिका निभा सकेगा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, ऑस्ट्रिया के चांसलर की भारत यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों देशों के संबंध अब पारंपरिक सहयोग से आगे बढ़कर नवाचार केंद्रित और भविष्य उन्मुख साझेदारी की ओर अग्रसर हैं। दोनों देशों ने मिलकर एक ऐसे सहयोग मॉडल की नींव रखी है जो न केवल द्विपक्षीय हितों को साधेगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर भी स्थिरता और प्रगति में योगदान देगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 16:46:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-achieves-remarkable-success-by-increasing-cooperation-with-austria</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[लेकिन शहरी माओवाद पर कैसे लगे लगाम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/but-how-can-urban-maoism-be-controlled]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बीते तीस मार्च को गृहमंत्री अमित शाह ने लाल आतंक के रूप में कुख्यात रहे माओवादी और नक्सली आतंकवाद के खात्मे का औपचारिक अंत की घोषणा कर दी है। चाहे माओवाद हो या नक्सलवाद, दोनों ही धाराएं उग्रपंथी वामपंथ से प्रभावित रही हैं। इनका मानना रहा है कि सत्ता बंदूक की नली या बारूद से निकलती है। इसी विचारधारा के तहत इस वैचारिकी ने भारत के तकरीबन एक तिहाई जिलों पर अरसे तक कब्जा जमाए रखा। इस विचारधारा से प्रभावित लाल आतंक एक दौर में पशुपति से लेकर तिरूपति तक फैला हुआ था। लेकिन अब यह निस्तेज हो चुका है। ज्यादातर नक्सली या माओवादी लड़ाके या तो हथियार डाल कर मुख्यधारा की जिंदगी में वापस लौट गए हैं या फिर सुरक्षा बलों की कार्रवाई में मारे गए हैं। लेकिन अब भी इस विचारधारा से प्रभावित एक वर्ग बचा हुआ है। जिसका सत्ता के प्रतिष्ठानों पर भले ही प्रभाव ना हो, लेकिन तंत्र पर उसका प्रभाव अब भी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>मार्च 2022 में जम्मू-कश्मीर के आतंकवाद और कश्मीरी पंडितों के घाटी छोड़ने की पृष्ठभूमि पर एक फिल्म आई थी। ‘द कश्मीर फाइल्स’ नामक इस फिल्म में एक संवाद है, सत्ता भले ही उनकी है, लेकिन सिस्टम अपना है। इस संवाद में जिस सिस्टम की ओर इशारा है, दरअसल तंत्र पर उसका ही प्रभाव है। कहना न होगा कि यह प्रभावी तबका वैसी ही उग्र वामपंथी विचारधारा से प्रभावित है, जिसके बारूदी रूख के अंत का ऐलान गृहमंत्री अमित शाह ने किया है। कभी दिल्ली विश्वविद्यालय में सक्रिय अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जिज्ञासु कार्यकर्ताओं ने इसे&nbsp; ‘अर्बन नक्सल’ कहा था। अर्बन यानी शहरी नक्सल। याद कीजिए, छह अप्रैल 2010 की घटना, जब बस्तर में सीआरपीएफ के 74 जवानों को घेरकर नक्सलियों ने बारूदी सुरंगों के जरिए उड़ाकर मार डाला था। इस लोमहर्षक कार्रवाई भारतीय राष्ट्र राज्य पर अर्बन नक्सल समुदाय ने बड़ी जीत के रूप में देखा था। राजधानी दिल्ली में लाल गढ़ के रूप में विख्यात जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों के एक समूह ने इस कार्रवाई पर खुलेआम खुशियां जताई थीं। तमाम विश्वविद्यालयों के वामपंथी प्रोफेसरों और छात्रों के एक समूह ने इस लोमहर्षक हत्या कांड को भारतीय राज व्यवस्था पर नक्सली जीत के रूप में लिया था। बस्तर की इस घटना के बाद तत्कालीन मनमोहन सरकार सकते में थी। उसने समानांतर सत्ता चला रहे नक्सली और माओवादी आतंकियों पर हवाई कार्रवाई करने का विचार शुरू कर दिया था। लेकिन शहरी इलाकों के वामपंथी बुद्धिजीवियों ने इसका विरोध शुरू किया। तंत्र में इनकी उपस्थिति कितनी प्रभावी है, इससे ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि मनमोहन सरकार ने नक्सली हिंसा का प्रभावी जवाब देने का विचार त्याग दिया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/maoists-will-no-longer-thrive-do-spare-a-thought-for-them-too" target="_blank">अब नहीं पनपेंगे माओवादी: जरा याद इन्हें भी कर लो</a></h3><div>नक्सलवाद कहें या माओवाद या फिर वामपंथ की कोई अन्य धारा, विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, पत्रकारिता, स्वयंसेवी संगठनों, वकालत, अस्पतालों, प्रशासनिक व्यवस्था और कर्मचारीतंत्र में भी इनके प्रभावी लोग अब भी मिल जाएंगे। अरूंधती रॉय, हर्ष मंदर, प्रशांत भूषण जैसे प्रसिद्ध बुद्धिजीवी तो खुद ही मानते हैं कि वे इस विचारधारा से हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>तंत्र में इस विचारधारा के प्रभावी होने की शुरूआत 1969 में कांग्रेस के विभाजन से होती है। तब अपनी केंद्रीय सत्ता को बचाने के लिए इंदिरा गांधी को वामपंथी दलों के सहयोग की जरूरत थी। उन्होंने सहयोग किया भी, बदले में शैक्षिक संस्थानों पर उनका प्रभाव बढ़ा। इसकी वजह यह रही कि इंदिरा सरकार ने शोध और शैक्षिक संस्थानों एवं विश्वविद्यालयों को इन्हीं के हवाले कर दिया। इस विचारधारा ने अपने ही लोगों को इन संस्थानों में खूब भरा।&nbsp;</div><div><br></div><div>2014 में जब केंद्र में नरेंद्र मोदी की सरकार आई तो यह वैचारिकी पहले सकते में रही। बाद में इसने रणनीति और पैंतरा बदला। शुरू में तो इस विचारधारा ने कभी पश्चिम बंगाल के जादवपुर विश्वविद्यालय में वैचारिकी आधारित आंदोलन छेड़ा तो कभी काशी हिंदू विश्वविद्यालय में लड़कियों से छेड़खानी के बहाने राष्ट्रवादी विचाराधारा को निशाने पर लेकर आंदोलन चलाया। हैदराबाद विश्वविद्यालय में रोहित बेमुला के बहाने राष्ट्रवादी शासन व्यवस्था के दौरान कथित तौर पर दलितों और पिछड़ों के उत्पीड़न का आरोप लगाकर वैचारिक आंदोलन खड़ा किया। दो कृषि कानूनों के बदलाव के विरोध में लंबे समय तक चले किसान आंदोलन को भी इस वैचारिकी का खुला समर्थन रहा। टूल किट गिरोह इसी दौरान बेपर्दा हुए। नागरिकता संशोधन कानून के खिलाफ देशभर के अल्पसंख्यकों को भड़काने और उन्हें आंदोलन में लाने के पीछे भी यही विचारधारा रही। इन आंदोलनों के लंबे समय तक चलने, इनके लिए लोगों के एकत्रित होने की वजह से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शहरी नक्सलियों का कितना बड़ा नेटवर्क है और कितनी गहराई तक उनकी पहुंच है।&nbsp;</div><div><br></div><div>मोदी सरकार के बाद राष्ट्रवादी विचारधारा को उम्मीद थी कि सत्ता केंद्रों और संस्थानों से इस विचारधारा की विदाई हो जाएगी। लेकिन अब भी यह विचारधारा प्रभावी तौर पर उपस्थित है। इस विचारधारा के कतिपय क्रांतिकारियों ने तो अब चोला तक बदल लिया है और मौजूदा सत्ता तंत्र में भागीदार भी बन चुके हैं। पत्रकारिता में अब भी इस विचारधारा के लोगों की भारी संख्या है। इसकी वजह से अब भी नैरेटिव का मायाजाल रचने में यह विचारधारा प्रभावी हो जाती है। नागरिक समाज में इस विचारधारा के लोग तभी पहचान में आते हैं, जब वे बहसों में हिस्सा लेते हैं या आंदोलनों में खुली भागीदारी करते हैं। अन्यथा समाज के सभी वर्गों की तरह इनको भी आसानी से सामान्य जन पहचान नहीं पाता। शहरी नक्सलवादियों की एक खासियत यह है कि वे खासा पढ़ते लिखते हैं। इसलिए बहसों में उनकी भागीदारी प्रभावी रहती है। लेकिन भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं का माखौल उड़ाना उन्हें सबसे प्रिय है। वैसे भारतीय शैक्षिक संस्थानों में एक सोच गहरे तक पैठी हुई है कि युवावस्था में जो वामपंथी नहीं हुआ, इसका अभिप्राय है कि उसमें कोई न कोई कमी है। इस सोच की बुनियाद और संस्थानों में अपनी प्रभावी उपस्थिति के चलते यह विचारधारा अक्सर युवाओं को प्रभावित कर लेती है। उसके आगोश में आने के बाद युवा भारतीयता, भारतीय मूल्य और सांस्कृतिक परंपराओं का माखौल उड़ाने लगता है, उसे पूजा-पाठ दकियानूसी लगने लगता है। हालांकि अल्पसंख्यकों के धार्मिक और सांस्कृतिक कलाप उसे प्रगतिशीलता की निशानी लगने लगते हैं। इस तरह समाज के बीच वे अपनी वैचारिक धारा को बनाए रखने के जतन में जुटे रहते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>जंगलों, खेतों-खलिहानों और आदिवासी इलाकों में खून की होली खेलने, रेल की पटरियां उड़ाने, स्कूलों को उड़ाने वाली खूनी नक्सली और माओवादी विचारधारा के समर्थक और नेतृत्वकर्ता भले ही सुरक्षा बलों की कार्रवाई और समानांतर चलाई गई विकास योजनाओं के चलते खत्म हो गए हों या हथियार डाल दिए हों, लेकिन किताबों, बहसों और नैरेटिव के सहारे लड़ाई चलाने वाले माओवादी और नक्सली अब भी बाकी हैं और तंत्र में प्रभावी मौजूदगी भी रखते हैं। कहा जाता है कि विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं। उनके अनुयायियों की संख्या कम-ज्यादा जरूर हो सकती हैं। मौजूदा सामाजिक और राजनीतिक तंत्र ऐसा नहीं रहा कि हथियार के सहारे क्रांतियां कर ली जाएं और सत्ताएं बदल दी जाएं। ऐसा होता तो अमेरिका पूरी दुनिया पर राज कर रहा होता, क्योंकि उसकी सेना दुनिया की सबसे ताकतवर सेना है, उसके पास हथियारों का अकूत भंडार है। अब राजसत्ताओं को बारूद या बंदूक के जरिए नहीं बदला जा सकता। बारूद और बंदूक के सहारे सत्ता बदलने वाला तंत्र इसीलिए पस्त हो गया। लेकिन वैचारिक लड़ाई करने वालों को समानांतर खड़ा मजबूत वैचारिक तंत्र ही मात दे सकता है। दूसरी बात यह है कि वैचारिक तंत्र को जहां से खाद-पानी मिलता है, उस स्रोत को ही खत्म&nbsp; करके वैचारिकी को काबू में किया जा सकता है। वैचारिकी की बुनियाद पर जहर फैलाने वाले लोगों को सामाजिक तौर पर अलग-थलग करना भी इसे रोकने की रणनीति हो सकती है। जब तक ऐसे कदम नहीं उठाए जाएंगे, जंगलों और आदिवासी इलाकों की बंदूकें भले ही शांत हो जाएं, सामाजिक तौर पर वाम वैचारिकी मजबूत उपस्थिति बनाए रखेगी और अगर वह प्रभावी रही तो देर-सवेर किसी और रूप में फिर से लाल आतंक को सिर उठाने के लिए प्रेरित करेगी। इस नजरिए से भी इस समस्या और शहरी माओवाद या नक्सलवाद को भी देखना एवं परखना होगा।</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 13:13:11 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/but-how-can-urban-maoism-be-controlled</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बिहार में संभावनाएं विकास की: अब सत्ता सम्राट की]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/possibility-of-development-in-bihar-now-the-power-belongs-to-the-emperor]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बिहार की राजनीति लंबे समय से बदलाव, प्रयोग और नेतृत्व के उतार-चढ़ाव का साक्षी रही है। ऐसे परिदृश्य में जब लंबे इंतजार और जटिल कूटनीतिक समीकरणों के बाद पहली बार भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में शासन स्थापित होने की स्थिति बनती है और सम्राट चौधरी जैसे नेता मुख्यमंत्री के रूप में उभरते हैं, तो यह केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि एक संभावित राजनीतिक और प्रशासनिक परिवर्तन का संकेत भी है। यह क्षण बिहार के लिए एक नए युग की शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है, जहां अपेक्षाएं केवल शासन परिवर्तन की नहीं, बल्कि शासन की गुणवत्ता, दृष्टि और परिणामों की भी हैं। नये मुख्यमंत्री के रूप में सम्राट चौधरी के सामने न सिर्फ बिहार की जनता में एक कुशल प्रशासक की छाप छोड़ने की चुनौती है, बल्कि पार्टी की अपेक्षाओं एवं नीतीश कुमार द्वारा खींची रेखाओं से आगे निकलने के संघर्ष में भी उन्हें खरा उतरना होगा। सम्राट को उससे आगे ऐसा कुछ करना होगा, ताकि भाजपा उसके आधार पर भविष्य की दावेदारी पेश कर सके एवं अपने बल पर पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की पात्रता विकसित कर सके। बिहार में भाजपा का एक नया अध्याय शुरु हो रहा है, सम्राट के भरोसे से।</div><div><br></div><div>सम्राट चौधरी का मुख्यमंत्री के रूप में चयन कई दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। वे कोई अप्रत्याशित या अपरिचित चेहरा नहीं हैं। बिहार की राजनीति में सक्रिय रहते हुए, उपमुख्यमंत्री के रूप में कार्य करते हुए और विभिन्न राजनीतिक धाराओं से गुजरते हुए उन्होंने राज्य की जटिलताओं को निकट से समझा है। उनकी राजनीतिक यात्रा उन्हें एक व्यावहारिक नेता के रूप में स्थापित करती है, जो केवल सिद्धांतों तक सीमित नहीं, बल्कि जमीन की वास्तविकताओं से भी जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि उनके नेतृत्व से बिहार की जनता को एक ऐसे प्रशासन की उम्मीद है जो नीतिगत स्पष्टता के साथ-साथ क्रियान्वयन की क्षमता भी रखता हो। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि बिहार में नेतृत्व का मूल्यांकन केवल व्यक्ति के आधार पर नहीं, बल्कि उसकी नीतियों, प्राथमिकताओं और परिणामों के आधार पर होता है। पिछले वर्षों में यह प्रवृत्ति स्पष्ट रूप से सामने आई है कि शासन की सफलता का निर्धारण केवल मुख्यमंत्री के व्यक्तित्व से नहीं, बल्कि उस व्यापक नीति-ढांचे से होता है जो केंद्र और राज्य के बीच समन्वय स्थापित करता है। भारतीय राजनीति में यह एक नया आयाम है, जहां केंद्र सरकार की नीतियां राज्यों के विकास की दिशा को काफी हद तक प्रभावित करती हैं। राजस्थान, मध्य प्रदेश और ओडिशा जैसे राज्यों के उदाहरण इस बात को पुष्ट करते हैं कि अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरों के बावजूद विकास की गति तेज रह सकती है, यदि नीतिगत समर्थन और प्रशासनिक इच्छाशक्ति मजबूत हो।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/samrat-gains-power-in-bihar-cm-personally-handles-29-departmentsallies-given-this-responsibility" target="_blank">Nitish के बाद Bihar में 'सम्राट' का पावर कंट्रोल! CM ने खुद संभाले 29 विभाग, सहयोगी दलों को मिला ये जिम्मा</a></h3><div>बिहार के संदर्भ में यह पहलू और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह राज्य लंबे समय तक अवसंरचनात्मक पिछड़ेपन, बेरोजगारी, पलायन और सामाजिक विषमताओं से जूझता रहा है। ऐसे में सम्राट चौधरी के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि वे इन जटिल समस्याओं के समाधान के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत करें। केवल राजनीतिक स्थिरता पर्याप्त नहीं होगी, बल्कि उसे विकासात्मक स्थिरता में परिवर्तित करना होगा। सड़क, बिजली, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मूलभूत क्षेत्रों में निरंतर सुधार के साथ-साथ रोजगार सृजन पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि बिहार के युवाओं को अपने ही राज्य में अवसर मिल सकें। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि बिहार के हालिया इतिहास में यदि किसी नेता ने प्रशासनिक सुधार और सुशासन की एक स्पष्ट छवि प्रस्तुत की है, तो वह नीतीश कुमार हैं। उन्होंने जिस समय सत्ता संभाली, उस समय बिहार ‘जंगलराज’ की छवि से जूझ रहा था। कानून-व्यवस्था की स्थिति दयनीय थी, अवसंरचना लगभग ध्वस्त थी और राज्य की छवि राष्ट्रीय स्तर पर नकारात्मक थी। ऐसे समय में नीतीश कुमार ने सड़क, बिजली और शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किए। विशेष रूप से बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए साइकिल योजना जैसी पहलें सामाजिक परिवर्तन का आधार बनीं। उन्होंने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को भी बढ़ाने का प्रयास किया, जिससे शासन के प्रति जनता का विश्वास पुनः स्थापित हुआ।</div><div><br></div><div>नीतीश कुमार का व्यक्तित्व एक संतुलित, संयमित और व्यावहारिक नेता के रूप में उभरता है। वे आक्रामक राजनीति के बजाय संवाद और सहमति की राजनीति के पक्षधर रहे हैं। उनकी सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि उन्होंने राजनीति को व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा से ऊपर उठाकर विकास के एजेंडे से जोड़ने का प्रयास किया। हालांकि समय के साथ उनकी राजनीतिक रणनीतियों और गठबंधनों में बदलाव ने उनकी छवि को कुछ हद तक प्रभावित भी किया, लेकिन उनके द्वारा स्थापित प्रशासनिक मानक आज भी बिहार के लिए एक संदर्भ बिंदु बने हुए हैं। सम्राट चौधरी के लिए यह एक बड़ी चुनौती और अवसर दोनों है कि वे इन स्थापित मानकों को न केवल बनाए रखें, बल्कि उन्हें और आगे बढ़ाएं। उन्हें यह समझना होगा कि बिहार की जनता अब केवल वादों से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि परिणाम चाहती है। शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में अभी भी सुधार की व्यापक संभावनाएं हैं। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा के अवसर, अस्पतालों की स्थिति और चिकित्सकीय सुविधाओं का विस्तार ऐसे क्षेत्र हैं जहां ठोस कार्य की आवश्यकता है। इसके साथ ही भ्रष्टाचार एक ऐसी समस्या है जो किसी भी विकासात्मक प्रयास को कमजोर कर सकती है। यदि सम्राट चौधरी वास्तव में एक प्रभावी और जनोन्मुखी शासन स्थापित करना चाहते हैं, तो उन्हें प्रशासनिक स्तर पर भ्रष्टाचारमुक्त शासन, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी। डिजिटल गवर्नेंस, ई-टेंडरिंग और निगरानी तंत्र को सशक्त बनाकर इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>महिला सशक्तिकरण भी बिहार के विकास का एक महत्वपूर्ण आयाम है। पिछले वर्षों में इस दिशा में कुछ सकारात्मक पहलें हुई हैं, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। महिलाओं की सुरक्षा, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को बढ़ाना राज्य के सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए अनिवार्य है। यदि सम्राट चौधरी इस क्षेत्र में ठोस और नवाचारी कदम उठाते हैं, तो यह बिहार की प्रगति को एक नई दिशा दे सकता है। पलायन की समस्या भी बिहार के लिए एक स्थायी चुनौती रही है। लाखों लोग रोजगार की तलाश में अन्य राज्यों में जाते हैं, जिससे न केवल राज्य की श्रमशक्ति का क्षरण होता है, बल्कि सामाजिक संरचना पर भी प्रभाव पड़ता है। इस समस्या का समाधान केवल उद्योगों के विकास और स्थानीय रोजगार के अवसरों के सृजन से ही संभव है। कृषि आधारित उद्योग, लघु और मध्यम उद्योग तथा स्टार्टअप संस्कृति को बढ़ावा देकर इस दिशा में सकारात्मक परिवर्तन लाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>निश्चिततौर पर यह कहा जा सकता है कि बिहार आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां अतीत के अनुभव, वर्तमान की अपेक्षाएं और भविष्य की संभावनाएं एक साथ उपस्थित हैं। सम्राट चौधरी के नेतृत्व में यह राज्य किस दिशा में आगे बढ़ेगा, यह उनके निर्णयों, नीतियों और कार्यशैली पर निर्भर करेगा। यदि वे नीतीश कुमार द्वारा स्थापित सुशासन के मानकों को आधार बनाते हुए नवाचार और दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ते हैं, तो बिहार न केवल अपने पुराने कलंक से पूरी तरह मुक्त हो सकता है, बल्कि एक विकसित और आत्मनिर्भर राज्य के रूप में भी उभर सकता है। यह समय केवल नेतृत्व परिवर्तन का नहीं, बल्कि सोच और दृष्टिकोण के परिवर्तन का है। बिहार की जनता अब जागरूक है, अपेक्षाएं स्पष्ट हैं और अवसर भी व्यापक हैं। ऐसे में सम्राट चौधरी के लिए यह आवश्यक है कि वे व्यक्ति-आधारित राजनीति से ऊपर उठकर नीतियों और परिणामों पर केंद्रित शासन प्रस्तुत करें। यदि वे ऐसा कर पाते हैं, तो न केवल वे अपने नेतृत्व को सिद्ध करेंगे, बल्कि बिहार को एक नई पहचान भी देंगे-एक ऐसे राज्य के रूप में जो संघर्ष से उबरकर सफलता की नई गाथा लिखने में सक्षम है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Apr 2026 12:14:08 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/possibility-of-development-in-bihar-now-the-power-belongs-to-the-emperor</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[परिसीमन मुद्दे पर उत्तर बनाम दक्षिण का नैरेटिव खड़ा कर रहे नेताओं से कुछ सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/some-questions-for-the-leaders-creating-a-north-vs-south-narrative-on-the-delimitation-issue]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच परिसीमन को लेकर छिड़ा विवाद अब राजनीतिक टकराव के नए चरण में पहुंच चुका है। तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन द्वारा राज्य भर में काला झंडा प्रदर्शन की घोषणा ने इस मुद्दे को और अधिक तीखा बना दिया है। यह विवाद उत्तर और दक्षिण के बीच राजनीतिक शक्ति संतुलन के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जो कई सवाल खड़े करता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो परिसीमन का अर्थ है जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्निर्धारण और निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं का पुनर्गठन। संविधान के अनुच्छेद 82 के अनुसार यह प्रक्रिया प्रत्येक जनगणना के बाद होनी चाहिए। वर्तमान में लोकसभा की 543 सीटें 1971 की जनगणना पर आधारित हैं, क्योंकि लंबे समय से परिसीमन पर रोक लगी हुई थी ताकि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को नुकसान नहीं हो। अब केंद्र सरकार इस रोक को हटाकर 2011 की जनगणना के आधार पर नई व्यवस्था लागू करना चाहती है और सीटों की संख्या को बढ़ाकर लगभग 850 तक करने का प्रस्ताव है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/cm-stalin-enraged-over-delimitation-said-historical-injustice-to-south-india" target="_blank">Delimitation पर भड़के CM Stalin, बोले- South India के साथ ऐतिहासिक अन्याय, परिणाम भुगतने होंगे</a></h3><div>केंद्र का तर्क है कि देश की जनसंख्या संरचना में भारी बदलाव आया है और प्रतिनिधित्व को वास्तविक स्थिति के अनुरूप बनाया जाना आवश्यक है। साथ ही महिला आरक्षण को लागू करने के लिए भी यह प्रक्रिया महत्वपूर्ण मानी जा रही है। लेकिन दक्षिण के कई नेता इस प्रस्ताव को संदेह की नजर से देख रहे हैं।</div><div><br></div><div>एमके स्टालिन ने इसे दक्षिणी राज्यों के खिलाफ पक्षपात बताया है। उनका कहना है कि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में सफलता पाई, उन्हें इस प्रक्रिया के जरिए दंडित किया जा रहा है। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि केंद्र सरकार ने उनकी चिंताओं को नजरअंदाज किया तो उसे भारी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी। उन्होंने इस मुद्दे को केवल तमिलनाडु का नहीं बल्कि संघीय ढांचे की रक्षा का सवाल बताया है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने भी इस प्रस्ताव पर गंभीर चिंता जताई है। उनका कहना है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण दक्षिणी राज्यों की राजनीतिक शक्ति को कमजोर कर सकता है। उन्होंने सुझाव दिया कि एक संतुलित मॉडल अपनाया जाए जिसमें जनसंख्या के साथ-साथ आर्थिक योगदान को भी ध्यान में रखा जाए। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने भी चेतावनी दी है कि यह प्रक्रिया कुछ बड़े राज्यों के पक्ष में शक्ति का केंद्रीकरण कर सकती है और संघीय संतुलन को बिगाड़ सकती है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यहां तक तो बहस एक लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा लगती है, लेकिन जिस तरह से इसे उत्तर बनाम दक्षिण की लड़ाई के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वह चिंताजनक है। भारत एक संघीय गणराज्य है जहां सभी राज्यों की समान भागीदारी और राष्ट्रीय एकता सर्वोपरि है। ऐसे में क्षेत्रीय भावनाओं को भड़काना और राजनीतिक लाभ के लिए विभाजन की रेखाएं खींचना एक गलत मानसिकता को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम का बयान भी कई सवाल खड़े करता है। उन्होंने दावा किया कि परिसीमन से दक्षिणी राज्यों की आवाज दब जाएगी और संसद सत्र को चुनाव के समय बुलाना एक सुनियोजित साजिश है।&nbsp; लेकिन यह समझना जरूरी है कि परिसीमन एक संवैधानिक प्रक्रिया है, जिसे समय समय पर लागू किया जाना आवश्यक है। इसे साजिश या राजनीतिक चाल बताना क्या देश की संस्थाओं पर अनावश्यक संदेह पैदा नहीं करता?</div><div><br></div><div>चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेता, जो देश के गृह मंत्री रह चुके हैं, उनसे अपेक्षा की जाती है कि वह तथ्यों और संतुलित दृष्टिकोण के साथ अपनी बात रखें। यदि तमिलनाडु की सीटें बढ़कर 39 से 58 तक पहुंच सकती हैं, जैसा उन्होंने स्वयं कहा, तो फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि राज्य की आवाज पूरी तरह दब जाएगी? यह तर्क स्वयं में विरोधाभासी प्रतीत होता है।</div><div><br></div><div>दरअसल, इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या जनसंख्या आधारित प्रतिनिधित्व लोकतंत्र का मूल सिद्धांत नहीं है? यदि किसी क्षेत्र की जनसंख्या अधिक है, तो उसका प्रतिनिधित्व भी अधिक होना स्वाभाविक है। साथ ही यह भी सही है कि विकास और जनसंख्या नियंत्रण के प्रयासों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसलिए इस मुद्दे पर संतुलित और व्यावहारिक समाधान की आवश्यकता है, न कि राजनीतिक ध्रुवीकरण की।</div><div><br></div><div>दक्षिणी राज्यों के नेताओं को चाहिए कि वह इस विषय पर संवाद और सहमति की दिशा में आगे बढ़ें, न कि विरोध और टकराव की राजनीति को बढ़ावा दें। केंद्र सरकार को भी सभी राज्यों की चिंताओं को गंभीरता से सुनते हुए ऐसा रास्ता निकालना चाहिए जो न्यायसंगत और सर्वमान्य हो।</div><div><br></div><div>यहां यह भी उल्लेखनीय है कि कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने घोषणा की है कि INDIA ब्लॉक के तहत एकजुट विपक्षी दल संसद में प्रस्तावित परिसीमन विधेयक का कड़ा विरोध करेंगे। नई दिल्ली के कॉन्स्टीट्यूशन क्लब में विपक्षी नेताओं की बैठक के बाद पत्रकारों से बातचीत में खरगे ने कहा कि यह विधेयक लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को कमजोर कर सकता है और सरकार ने इसे बिना जनगणना पूरी किए पेश किया है। उन्होंने आरोप लगाया कि कार्यपालिका संवैधानिक संस्थाओं की शक्तियों को अपने हाथ में ले रही है और परिसीमन के जरिए कभी भी सीमाओं में बदलाव कर सकती है। देखा जाये तो तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, डीएमके और आम आदमी पार्टी सहित कई दलों की मौजूदगी में हुई इस बैठक को 16 अप्रैल से शुरू हो रहे संसद सत्र से पहले विपक्षी एकजुटता के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। विपक्ष का मानना है कि यह विधेयक हिंदी भाषी राज्यों को लाभ पहुंचाकर दक्षिण और पूर्वी राज्यों के प्रभाव को कम कर सकता है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, इसमें कोई दो राय नहीं कि परिसीमन का मुद्दा केवल सीटों के बंटवारे का नहीं, बल्कि देश की एकता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा भी है। इसे क्षेत्रीय अस्मिता की लड़ाई बनाने की बजाय राष्ट्रीय हित में संतुलित दृष्टिकोण अपनाना ही समय की मांग है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 18:23:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/some-questions-for-the-leaders-creating-a-north-vs-south-narrative-on-the-delimitation-issue</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[नारी-आरक्षणः नये भारत का आधार एवं संभावनाओं का शिखर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/women-reservation-the-foundation-of-a-new-india-and-the-pinnacle-of-possibilities]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर भारत की राजनीति और समाज में जो नई चेतना उभरकर सामने आई है, वह केवल एक विधायी परिवर्तन का संकेत नहीं, बल्कि एक व्यापक सामाजिक रूपांतरण एवं नये भारत-निर्माण की संभावनाओं की प्रस्तावना है। निश्चिततौर पर भारत अब अपने विकास की धुरी में महिलाओं की सक्रिय और निर्णायक भागीदारी को अनिवार्य मानने लगा है। दशकों से लंबित महिला आरक्षण का मुद्दा केवल संसद के गलियारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह भारतीय समाज की उस अंतर्धारा से जुड़ा रहा है, जिसमें बराबरी, सम्मान और अवसर की मांग निरंतर उठती रही है। लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत स्थान आरक्षित करने वाले नारी शक्ति वंदन अधिनियम को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने यह सही कहा कि यह इस सदी के महत्वपूर्ण कदमों में से एक है। पहले यह अधिनियम नई जनगणना के बाद लागू होना था, पर उसमें देरी के चलते सरकार ने इसे 2011 की जनगणना के आधार पर लागू करने का निर्णय किया। इस पर विपक्षी दलों ने आपत्ति जताई है, पर इस आपत्ति को महत्व देने से अगले लोकसभा चुनाव में महिला आरक्षण लागू करना संभव नहीं होगा, क्योंकि ताजा जनगणना के आंकड़ों के आधार पर बनने वाले परिसीमन आयोग की रिपोर्ट आने में समय लगता और तब तक 2029 के आम चुनाव हो जाते। इसी कारण इस अधिनियम में संशोधन करने हेतु संसद का एक विशेष सत्र बुलाया गया है। चूंकि यह सत्र विधानसभा चुनावों के बीच बुलाया जा रहा है, इसलिए भी कई विपक्षी दलों को यह कांटों की तरह चुभन दे रहा है।</div><div><br></div><div>भारतीय लोकतंत्र में महिलाओं की भागीदारी का इतिहास विरोधाभासों से भरा रहा है। एक ओर देश ने इंदिरा गांधी जैसी सशक्त महिला नेतृत्व को देखा, वहीं दूसरी ओर संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की संख्या लंबे समय तक सीमित बनी रही। वर्तमान में लोकसभा में महिलाओं की भागीदारी लगभग 15 प्रतिशत के आसपास है, जो यह बताती है कि राजनीतिक प्रतिनिधित्व के स्तर पर अभी भी एक बड़ा अंतर विद्यमान है। इस संदर्भ में महिला आरक्षण अधिनियम उस अंतर को पाटने का एक संगठित और संरचनात्मक प्रयास है। महत्वपूर्ण यह भी है कि इस अधिनियम को लागू करने के संदर्भ में जनगणना और परिसीमन को लेकर जो विवाद सामने आया है, वह भारतीय लोकतंत्र की जटिलताओं को भी उजागर करता है। सरकार द्वारा 2011 की जनगणना के आधार पर इसे लागू करने का निर्णय एक व्यावहारिक दृष्टिकोण को दर्शाता है, क्योंकि नई जनगणना और उसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया में होने वाली देरी महिला आरक्षण को वर्षों तक टाल सकती थी। विपक्ष की आशंकाएं अपनी जगह पर हैं, परंतु अभी तक उनके समर्थन में ठोस तथ्य सामने नहीं आए हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/women-reservation-bill-a-silent-revolution-in-india-democratic-journey" target="_blank">महिला आरक्षण विधेयक: भारत की लोकतांत्रिक यात्रा में एक शांत क्रांति</a></h3><div>भारतीय राजनीति में किसी भी बड़े निर्णय को राजनीतिक दृष्टिकोण से देखने की परंपरा रही है और महिला आरक्षण भी इससे अछूता नहीं है। विपक्ष द्वारा यह आरोप लगाना कि सरकार इस पहल के माध्यम से राजनीतिक लाभ लेना चाहती है, लोकतांत्रिक विमर्श का हिस्सा है। किन्तु यह भी उतना ही सत्य है कि लोकतंत्र में लिए जाने वाले अधिकांश निर्णयों के पीछे राजनीतिक गणित काम करता है। प्रश्न यह नहीं होना चाहिए कि निर्णय के पीछे राजनीतिक लाभ है या नहीं, बल्कि यह होना चाहिए कि उसका प्रभाव समाज पर कितना सकारात्मक पड़ता है। यदि महिला आरक्षण से महिलाओं की भागीदारी बढ़ती है और नीति निर्माण में उनका दृष्टिकोण शामिल होता है, तो यह संपूर्ण समाज के लिए लाभकारी होगा। पिछले कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में महिलाओं की भूमिका में एक उल्लेखनीय परिवर्तन देखने को मिला है। महिलाएं अब केवल मतदाता नहीं रहीं, बल्कि वे एक निर्णायक मतदाता वर्ग के रूप में उभरी हैं। 2019 के आम चुनावों में महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों के लगभग बराबर रही और कई राज्यों में उन्होंने पुरुषों से अधिक मतदान किया। यह परिवर्तन केवल संख्या का नहीं, बल्कि चेतना का संकेत है। महिलाएं अब अपने अधिकारों और हितों के प्रति अधिक सजग हो रही हैं और राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने की क्षमता रखती हैं।</div><div><br></div><div>सरकारी योजनाओं ने भी इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उज्ज्वला योजना के माध्यम से रसोई गैस की उपलब्धता, जनधन योजना के तहत बैंकिंग सुविधा, स्वच्छ भारत मिशन के अंतर्गत शौचालय निर्माण और मातृत्व लाभ योजनाओं ने महिलाओं के जीवन में प्रत्यक्ष सुधार किया है। इन योजनाओं का प्रभाव केवल आर्थिक या भौतिक नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी रहा है, जिससे महिलाओं का आत्मविश्वास बढ़ा है और वे सार्वजनिक जीवन में अधिक सक्रिय हुई हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों को इस संदर्भ में विशेष रूप से स्मरण किया जाना चाहिए। उन्होंने भारतीय संविधान के माध्यम से समानता और न्याय के सिद्धांतों को स्थापित करते हुए महिलाओं को समान अधिकार देने की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किया। उनका यह विश्वास था कि किसी भी समाज की प्रगति का आकलन वहां की महिलाओं की स्थिति से किया जा सकता है। आज जब महिला आरक्षण की बात हो रही है, तो यह उसी विचारधारा का विस्तार प्रतीत होता है, जिसमें महिलाओं को केवल संरक्षण नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का अवसर प्रदान किया जाता है।</div><div><br></div><div>हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि महिला आरक्षण अपने आप में कोई अंतिम समाधान नहीं है। यह एक आवश्यक कदम है, परंतु पर्याप्त नहीं। राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ने से महिलाओं की आवाज अवश्य मजबूत होगी, परंतु सामाजिक, आर्थिक और शैक्षिक स्तर पर समानता स्थापित करने के लिए और भी प्रयास करने होंगे। आज भी भारत में महिला श्रम भागीदारी दर लगभग 25 प्रतिशत के आसपास है, जो वैश्विक औसत से काफी कम है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति हुई है, परंतु उच्च शिक्षा और तकनीकी क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी को और बढ़ाने की आवश्यकता है। महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के सामने कुछ चुनौतियां भी हैं। यह आशंका व्यक्त की जाती रही है कि कई स्थानों पर महिलाएं केवल नाममात्र की प्रतिनिधि बनकर रह जाएंगी और वास्तविक निर्णय उनके पुरुष परिजन लेंगे। पंचायत स्तर पर इस तरह के उदाहरण देखने को मिले हैं, परंतु समय के साथ महिलाओं ने इस स्थिति को बदला भी है और अपने अधिकारों को स्वयं संभालने की क्षमता विकसित की है। इसी प्रकार राजनीतिक प्रशिक्षण और नेतृत्व विकास की आवश्यकता भी महत्वपूर्ण है, ताकि महिलाएं केवल प्रतिनिधि न होकर प्रभावी नीति निर्माता बन सकें। इसके साथ ही राजनीतिक दलों की आंतरिक संरचना में भी परिवर्तन आवश्यक है। यदि दल अपने संगठनात्मक ढांचे में महिलाओं को पर्याप्त स्थान नहीं देंगे, तो केवल आरक्षण के माध्यम से वास्तविक सशक्तिकरण संभव नहीं होगा। दलों को चाहिए कि वे महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान करें, उन्हें चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करें और उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करें।</div><div><br></div><div>नया भारत जिस विकसित राष्ट्र की कल्पना कर रहा है, उसमें नारी शक्ति की भूमिका केंद्रीय है। आज भारतीय महिलाएं हर क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं। विज्ञान, तकनीक, खेल, शिक्षा, प्रशासन और उद्यमिता-हर क्षेत्र में उनकी उपलब्धियां यह प्रमाणित करती हैं कि अवसर मिलने पर वे किसी भी चुनौती का सामना कर सकती हैं। इसरो की महिला वैज्ञानिकों की सफलता, ओलंपिक में पदक जीतने वाली खिलाड़ियों का प्रदर्शन, और ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से आर्थिक सशक्तिकरण के उदाहरण इस परिवर्तन के सशक्त प्रमाण हैं। इस अधिनियम के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि विकास का कोई भी मॉडल तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक उसमें आधी आबादी की समान भागीदारी सुनिश्चित न हो। हालांकि इसके क्रियान्वयन में राजनीतिक मतभेद और व्यावहारिक चुनौतियां सामने आती रहेंगी, परंतु इसकी मूल भावना पर प्रश्नचिह्न नहीं लगाया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि इसे एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में नहीं, बल्कि एक सामाजिक परिवर्तन के अवसर के रूप में देखा जाए। यदि सरकार, विपक्ष और समाज मिलकर इस दिशा में कार्य करते हैं, तो यह अधिनियम न केवल महिलाओं के लिए, बल्कि पूरे राष्ट्र के लिए एक नई दिशा निर्धारित कर सकता है। यही वह मार्ग है, जिस पर चलते हुए भारत एक सशक्त, समावेशी और विकसित राष्ट्र के रूप में अपनी पहचान को और अधिक मजबूत कर सकता है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Apr 2026 18:08:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/women-reservation-the-foundation-of-a-new-india-and-the-pinnacle-of-possibilities</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[कूटनीति के जरिए पेट्रोलियम आपूर्ति को रखा बरकरार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/petroleum-supplies-maintained-through-diplomacy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>28 फरवरी को ईरान पर अमेरिकी और इजरायली हमले के बाद पूरी दुनिया की चिंता ऊर्जा को लेकर थी। आज की दुनिया ऊर्जा के लिए जीवाश्म तेलों पर सबसे ज्यादा निर्भर है, जिसे हम पेट्रोल और डीजल के रूप में जानते हैं। इसके साथ ही प्राकृतिक गैस भी आज ऊर्जा की बड़ी स्रोत है। ईरान पर हमले के पहले बहुत लोगों ने होमुर्ज जलडमरूमध्य का नाम नहीं सुना था, लेकिन आज हर पढ़ा-लिखा और सचेत शख्स इसे जान गया है। फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी के बीच स्थित इस संकरे समुद्री रास्ते पर ईरान का कब्जा है। इसके जरिए पूरी दुनिया को आपूर्ति होने वाला बीस प्रतिशत पेट्रोलियम पदार्थ इसी रास्ते से गुजरता रहा है। जहां तक भारत का सवाल है तो ईरान पर हमले के पहले तक भारत आयात होने वाले कच्चे तेल के आधे हिस्से की आपूर्ति इसी रास्ते होती थी। इससे भारत की चिंताएं बढ़ना स्वाभाविक थी। लेकिन भारत ने ना सिर्फ होमुर्ज के जरिए अपनी आपूर्ति को बनाए रखने की कूटनीतिक कोशिशें जारी रखीं, बल्कि वैकल्पिक रास्ते की भी तलाश तेज कर दी।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों का करीब 85 फीसद हिस्सा आयात करता है। इसका आधा हिस्सा होमुर्ज के रास्ते ही आता था। भारतीय वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार होमुर्ज के रास्ते भारत रोजाना ढाई से 2.7 मिलियन बैरल कच्चा तेल आयात करता था। लेकिन ईरान पर हमले के बाद यह घटकर इसका आधा ही रह गया है। वैसे तो होमुर्ज पर ओमान का भी दावा माना जाता है, लेकिन हकीकत में इस जलमार्ग पर पूरी तरह ईरान का दबदबा है। हमले के बाद ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने इस रास्ते पर ना सिर्फ निगरानी बढ़ा दी है, बल्कि सीमित आवाजाही हो ही मंजूरी दी है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/there-is-no-shortage-of-petrol-diesel-and-lpg-supplies-in-the-country" target="_blank">West Asia संकट के बीच सरकार का बड़ा बयान, देश में Petrol-Diesel और LPG Supply की कोई कमी नहीं</a></h3><div>भारत को इसकी आशंका थी, इसलिए उसने खाड़ी के देशों से तेल आयात के लिए वैकल्पिक मार्गों पर भी ध्यान देना शुरू कर दिया। संकट के क्षण में भले ही ईरान ने भारत के प्रति सहयोगी रूख अख्तियार कर रखा है, लेकिन भारत ने ‘केप ऑफ गुड होप’ यानी अफ्रीका के दक्षिण से गुजरने वाले जलमार्ग का भी उपयोग बढ़ा दिया है। इस बीच भारत ने कूटनीतिक प्रयास जारी रखा। इसका असर यह हुआ कि ईरान भारतीय जहाजों को होमुर्ज से गुजरने की अनुमति दे रहा है। एलपीजी लदा एक जहाज कोचीन आ चुका है और ऐसे ही कुछ और जहाज तेल और गैस लेकर भारत आ रहे हैं। इस बीच भारत ओमान की खाड़ी से गुजरने वाले जहाजों को अपनी नौसेना के जरिए सुरक्षा दे रहा है। भारत सरकार के अनुसार, भारतीय रिफायनरियों के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है। इस बीच भारत ने रूस से भी कच्चे तेल और गैस की आपूर्ति बढ़ा दी है। इसका असर यह हुआ है कि भारत में जिस तरह की महंगाई की आशंका थी, वैसी नहीं दिखी। हालांकि उद्योगों के लिए आपूर्ति किए जाने वाले व्यवसायिक गैस सिलिंडर की कीमतें बढ़ा दी गई हैं। तेल की बढ़ती कीमतों और व्यवसायिक गैस की आपूर्ति कम होने के चलते खाने-पीने वाली चीजों की कीमतों में बढ़ोतरी हुई है। महानगरों में सर्वसुलभ ठेले की चाय की कीमतें डेढ़ गुनी तक बढ़ चुकी हैं। लेकिन आपूर्ति श्रृंखला जारी रहने के चलते स्थिति खराब नहीं हुई है। जबकि पड़ोसी पाकिस्तान में आधी गाड़ियों को ही सड़कों पर उतरने की अनुमति है, वहां पेट्रोल भारत के मुकाबले करीब ढाई गुनी ऊंची दर पर मिल रहा है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पश्चिम एशिया में संकट शुरू होने के बाद कूटनीति की कमान प्रधानमंत्री मोदी ने संभालते हुए युद्ध शुरू होने के महज 48 घंटों के भीतर आठ खाड़ी देशों संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, कुवैत,ओमान, कतर, जार्डन, ओमान, बहरीन और इजरायल के नेताओं से बात की। इसके साथ ही उन्होंने फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रां और मलयेशिया के प्रधानमंत्री अनवर इब्राहीम से बात की। इस बातचीत का मकसद वैश्विक हालात पर चर्चा के साथ ही भारतीय हितों को सुनिश्चित करना भी था। इस बीच ‘गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल’ के महासचिव जासेम मोहम्मद अल बुदैवी से फोन पर वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने बात की है। इस बातचीत का मकसद खाड़ी देशों के इस संगठन के साथ एकजुटता प्रदर्शित करने के साथ ही भावी ऊर्जा संकट से भारत को मुक्ति दिलाने को लेकर रणनीति बनाना भी है। इसके पहले मंत्री हरदीप पुरी ने कतर की यात्रा की थी। दरअसल भारत इन देशों से भी पेट्रोलियम पदार्थों का आयात बढ़ाना चाहता है। भारत की कोशिश ईरान के विकल्प के रूप में अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे देशों का भी सहयोग हासिल करने की है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत को अपनी खेती के लिए रासायनिक खाद की भी जरूरत पड़ती है। भारत में खाद उत्पादन के लिए पेट्रोलियम पदार्थों का सबसे ज्यादा इस्तेमाल होता है। बेशक रूस से भारत को कच्चा तेल और खाद की सामग्री मिल रही है, लेकिन भारत की कोशिश आपूर्ति को विविधरंगी बनाए रखना है। इसकी वजह यह है कि किसी एक देश पर किसी खास आयात के लिए पूरी तरह निर्भर होना भविष्य में ब्लैकमेलिंग की वजह बन सकता है। भारत के पास आज करीब साठ करोड़ का ऐसा विशाल मध्य वर्ग है, जिसकी खरीद क्षमता लगातार बढ़ रही है। ऐसे में शायद ही कोई उपभोक्ता वस्तुओं का उत्पादक देश ऐसा होगा, जिसे भारत की जरूरत महसूस नहीं होगी। लेकिन भारत की अपनी जरूरतें भी हैं और यहां लोकतांत्रिक व्यवस्था है। ऐसी व्यवस्था में अगर किसी चीज की गंभीर कमी होती है तो अफरातफरी का माहौल उत्पन्न होना आसान हो जाता है। इससे महंगाई भी बढ़ती है। महंगाई बढ़ने से लोक के बीच नाराजगी बढ़ती है और फिर यह गुस्सा राज व्यवस्था के खिलाफ आंदोलनों के रूप में मुखर होता है। तेल और ईरान संकट को देखते हुए भारत ने कूटनीतिक कार्रवाई करते हुए जिस तरह अपनी जरूरतों के लायक आपूर्ति का संतुलन बनाए रखा है, वह गौर करने लायक है।&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Apr 2026 13:05:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/petroleum-supplies-maintained-through-diplomacy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sabarimala पर धर्म और कानून में महासंग्राम, Supreme Court के फैसले से सियासत में आएगा तूफान?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/sabarimala-debate-justice-faith-or-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सबरीमाला प्रकरण के बहाने भारतीय लोकतंत्र में, संसद और संविधान के दायरे में, सियासत और न्यायपालिका के मठाधीशों के नजरिए में, क्या सही है और क्या गलत? क्या जिम्मेदारी है और क्या नहीं?, यह बहस का विषय नहीं होना चाहिए, बल्कि स्पष्ट कार्रवाई नजर आनी चाहिए। या तो सियासतदान, संसद और विधानमंडलों में कानून स्पष्ट बनाएं या फिर सुलगते सवालों पर न्यायपालिका के न्यायाधीशगण स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष न्यायदेश देने की पहल करें, क्योंकि आम जनता का हित सर्वोपरि होना चाहिए।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/father-and-son-beaten-in-police-station-constable-testimony-gets-9-policemen-hanged" target="_blank">Yes Milord: बाप बेटे को थाने में पीटा, कांस्टेबल की गवाही ने 9 पुलिसवाले को फांसी दिलाई</a></h3><div><br></div><div>हालांकि, व्यवहारिक कसौटी पर ये बातें पूरी तरह से खरी नहीं उतरती हैं। इसलिए अपेक्षा है कि धर्म सम्मत न्याय दीजिए, अन्यथा लोकतांत्रिक तर्क-वितर्क भारी पड़ेगा!</div><div>धर्मनिरपेक्षता की आड़ में एक शांति प्रिय धर्म के बारे में&nbsp; सुनवाई और दिशानिर्देश, जबकि दूसरे-तीसरे कट्टर धर्म के बारे में अपेक्षित सुनवाई पर टालमटोल ज्यादा दिन तक नहीं चलने वाला है, क्योंकि प्रबुद्ध हिंदुओं के संज्ञान में सारी बातें आईने की तरह चमक रही हैं और कॉन्वेंट एजुकेटेड लोगों से ज्यादा अपेक्षा भी किसी को नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लिहाजा, केंद्र सरकार और न्यायमूर्ति के स्टैंड अपनी अपनी जगह पर सही हैं, इसलिए भारतीय जनता के व्यापक हित में फैसला आना चाहिए, न कि पीक एंड चूज! जैसा कि विभिन्न विवादास्पद मामलों में प्रतीत होता है। सरकार और न्यायालय से जुड़े लोगों से बहुमत का पक्ष लेने की अपेक्षा नहीं कि जाती है, बल्कि बिटवीन द लाइंस की तरह ऐसा निर्णय आना चाहिए, जिसपर तर्क-वितर्क की कोई गुंजाइश ही न बने।&nbsp;</div><div><br></div><div>बीच बहस में पड़ने का दूसरा अदृश्य पहलू यह है कि आम तौर पर किसी न्यायाधीश या नौकरशाह की बुद्धि आम&nbsp; बहुमतधारी नेताओं की बुद्धि से औसत रूप में अच्छी समझी जाती है! फिर भी जब राजनीतिक अतिरेक पर, धार्मिक चुनींदेपन पर, व्यक्तिगत विभेद आदि पर न्यायपालिका और ओछी सियासत के बीच सबकुछ गड्डमड्ड दिखाई देने लगता है तो न्यायिक विवेक और विधायी विवेक के ऊपर सवाल उठाना लाजिमी है। यही पर जनमत को प्रभावित करने वाले संपादकीय विवेक का उत्तरदायित्व बढ़ जाता है! पर दुर्भाग्य की बात है कि इसे भी खुल्लमखुल्ला बाजार बनने को अभिशप्त बना दिया गया है।</div><div><br></div><div>सुलगता सवाल है कि आखिर विधायिका और न्यायपालिका देश के सुलगते हुए सवालों का हल बीते सात-आठ दशकों में भी क्यों नहीं ढूंढ पाई हैं? वहीं सामाजिक न्याय और साम्प्रदायिक सोच से जुड़े मसलों पर कड़वा सच कहने का हौसला नहीं प्रदर्शित कर पाई। इससे बहुमत का नँगानाच बढ़ा और मानवीयता नकार दी गई। विधिवत पक्षपात दिखता रहा, लेकिन न्यायविदों की खामोशी पीड़ितों की सिसकन पर भारी पड़ी। यह कोई उलाहना नहीं, बल्कि आपकी अंतरात्मा को झकझोरने की एक पहल है। आखिर कई बार न्यायपालिका/कार्यपालिका&nbsp; भीड़तंत्र के समक्ष घुटने टेकती हुई प्रतीत क्यों होती हैं? यक्ष प्रश्न है।</div><div><br></div><div>खैर, जब जब ऐसा हुआ, उन्हें संपादकीय विवेक सम्मत आलोचनाओं का सामना करना पड़ा। बावजूद इसके मुद्दे जस के तस बने हुए हैं और व्यवस्था पूंजीवादी सोच के प्रति नतमस्तक नजर आती है, क्योंकि 'दीपावली उपहार' तो किसान-मजदूर-कारीगर कभी दे नहीं सकते। सबसे बड़ा सवाल यह कि भारतीय संविधान के प्रथम संशोधन पर यानी संविधान की नौवीं अनुसूची पर न्यायिक चुप्पी आजतक प्रबुद्ध लोगों को खल रही है, क्योंकि जब सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है तो ऐसा कोई विषय नहीं छोड़ा जाना चाहिए, जिसकी न्यायिक समीक्षा नहीं हो सके, जैसा कि प्रथम संवैधानिक संशोधन के बाद प्रचलन में आया। यह तो महज एक बानगी है, अन्यथा कार्यपालिका की हरकतों पर न्यायपालिका की लाचारी दिखाती है कि लोकतंत्र आना अभी शेष है!</div><div><br></div><div>दरअसल, सबरीमला मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने गत 8 अप्रैल, दिन बुधवार को एक अहम टिप्पणी की। कोर्ट ने कहा कि उसके पास यह तय करने का अधिकार है कि किसी धर्म में कौन-सी प्रथा अंधविश्वास है। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीट ने कहा, अगर विधायिका चुप रहे तो न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती? बता दें कि कोर्ट की यह टिप्पणी केंद्र सरकार के उस तर्क के जवाब में आई, जिसमें कहा गया था कि अदालत यह तय नहीं कर सकती कि कोई धार्मिक प्रथा अंधविश्वास है या नहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>मसलन, केंद्र का कहना था कि जज कानून के विशेषज्ञ होते हैं, धर्म के नहीं। केंद्र की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने 'संवैधानिक नैतिकता' और 'ट्रांसफॉर्मेटिव कॉन्स्टिट्यूशनलिज्म' पर सवाल उठाए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि, धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मामलों में 'संवैधानिक नैतिकता' को आधार नहीं बनाया जा सकता। मेहता ने कहा कि यह न्यायिक समीक्षा का स्वतंत्र आधार नहीं हो सकता।</div><div><br></div><div>सॉलिसिटर जनरल मेहता ने पूछा, अदालत कैसे तय कर सकती है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है। भले कोई प्रथा अंधविश्वासी हो, उसे ऐसा घोषित करना अदालत का काम नहीं है। कानून बनाना विधायिका का अधिकार है। इस पर जस्टिस अमानुल्लाह ने कहा, कोर्ट के पास यह कहने का अधिकार है कि कोई प्रथा अंधविश्वास है या नहीं।</div><div><br></div><div>जस्टिस बीवी नागरत्ना ने कहा- समाज में नैतिकता समय के साथ बदलती है। किसी प्रथा को अंधविश्वासी मानने का अधिकार कोर्ट के पास है? सुप्रीम कोर्ट का सवाल है कि अगर विधायिका चुप रहे तो क्या न्यायपालिका हस्तक्षेप नहीं कर सकती, विधायिका चुप रहे तो? मेहता ने कहा, भारत जैसे विविध समाज में एक समुदाय की धार्मिक प्रथा दूसरे के लिए अंधविश्वास हो सकती है। इस पर जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने पूछा, कोई समुदाय जादूटोना को प्रथा बताए, तो उसे अंधविश्वास नहीं माना जाएगा? अगर अनुच्छेद 32 के तहत मामला कोर्ट में आए और विधायिका चुप रहे तो?</div><div><br></div><div>सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह भी पूछा कि जो लोग भगवान अयप्पा के भक्त नहीं है, क्या वे मंदिर की परपराओ को चुनौती दे सकते है? सॉलिसिटर जनरल मेहता ने बताया कि मूल याचिका इंडियन यंग लॉयर्स एसोसिएशन ने दायर की थी। इस पर जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि क्या गैर-भक्त को ऐसा अधिकार है?</div><div>&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/congress-called-action-against-pawan-khera-witch-hunt-venugopal-said-this-is-revenge-politics" target="_blank">Pawan Khera पर Action को Congress ने बताया Witch-Hunt, Venugopal बोले- यह Revenge Politics है</a></h3><div><br></div><div>दरअसल, सबरीमला केस की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की पीठ कर रही है। धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के प्रवेश से जुड़े, सबरीमला विवाद मामलों पर सुनवाई चल रही है। इसी पर केंद्र ने कहा- धर्म में अंधविश्वास है या नहीं, यह तय करना अदालत का काम नहीं है। जब भक्त नहीं तो चुनौती कैसे दे सकते है? यहां पर केंद्र सरकार और न्यायपालिका के दृष्टिकोण से असहमत होने का कोई औचित्य नजर नहीं आता है, लेकिन मामले का सकारात्मक हल निकले, यह ज्यादा महत्वपूर्ण है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 11 Apr 2026 19:47:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/sabarimala-debate-justice-faith-or-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[तीन राज्यों में बंपर वोटिंग ने क्या संदेश दिया? क्या जनादेश अभी से साफ नजर आ रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/what-message-did-the-bumper-voting-in-three-states-send-is-the-mandate-already-clear]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असम, केरल और पुडुचेरी में हुए विधानसभा चुनावों में इस बार जबरदस्त मतदान ने लोकतंत्र की मजबूती का एक नया उदाहरण प्रस्तुत किया है। लगभग 80 प्रतिशत के औसत मतदान ने यह संकेत दिया है कि जनता न केवल राजनीतिक रूप से जागरूक है, बल्कि अपने मताधिकार का उपयोग करने के लिए भी पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इतना ही नहीं, इस भारी मतदान ने राजनीतिक दलों की धड़कनें भी तेज कर दी हैं, क्योंकि हर दल इसे अपने पक्ष में जनसमर्थन के रूप में देख रहा है। हालांकि इस बंपर मतदान के वास्तविक मायने क्या हैं, यह समझने के लिए तीनों राज्यों का अलग अलग विश्लेषण जरूरी है।</div><div><br></div><h2>असम चुनाव</h2><div><br></div><div>सबसे पहले बात असम की करें तो यहां का मतदान प्रतिशत न केवल पिछले चुनावों से अधिक रहा बल्कि कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गया। कुल 126 विधानसभा क्षेत्रों में लगभग 85 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो पहले के चुनावों के मुकाबले अधिक है। खास बात यह रही कि सोलह निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान नब्बे प्रतिशत से भी ऊपर पहुंच गया। दलगांव में तो मतदान लगभग 95 प्रतिशत के करीब रहा, जो राज्य में सबसे अधिक है।</div><div><br></div><div>असम में चुनावी मुकाबला मुख्य रूप से दो ध्रुवों के बीच रहा। एक ओर भाजपा के नेतृत्व वाला सत्तारुढ़ गठबंधन है जो लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष गठबंधन सत्ता में वापसी के लिए संघर्षरत है। इसके अलावा कुछ क्षेत्रीय दल भी कुछ सीटों पर प्रभाव डालने की स्थिति में हैं।</div><div><br></div><div>यहां मतदान का एक महत्वपूर्ण पहलू क्षेत्रीय असमानता के रूप में सामने आया। निचले असम के क्षेत्रों में, जहां अल्पसंख्यक मतदाताओं की संख्या अधिक है, वहां मतदान प्रतिशत अत्यधिक रहा। बरपेटा, बोंगाईगांव और धुबरी जैसे जिलों में मतदान नब्बे प्रतिशत से ऊपर दर्ज किया गया। इसके विपरीत ऊपरी असम के क्षेत्रों में मतदान अपेक्षाकृत कम रहा। इससे यह संकेत मिलता है कि चुनावी उत्साह उन क्षेत्रों में अधिक था जहां मुकाबला अधिक तीखा है।</div><div><br></div><div>हालांकि मतदान के दौरान कुछ स्थानों पर हिंसा की घटनाएं भी सामने आईं, लेकिन कुल मिलाकर मतदान प्रक्रिया शांतिपूर्ण रही। भारी मतदान को लेकर सत्तारुढ़ नेतृत्व ने इसे ऐतिहासिक बताया और इसे जनता के विश्वास का प्रतीक माना।</div><div><br></div><h2>केरल चुनाव</h2><div><br></div><div>अब केरल की बात करें तो यहां का चुनाव परंपरागत रूप से दो प्रमुख गठबंधनों के बीच होता रहा है। इस बार भी मुख्य मुकाबला सत्तारुढ़ वाम मोर्चा और कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ मोर्चे के बीच रहा, जबकि तीसरा विकल्प बनने की कोशिश कर रहा भाजपा के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में लगा है।</div><div><br></div><div>केरल में लगभग 77 प्रतिशत से अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो पिछले चुनाव से अधिक है। आंकड़ों के मुताबिक कोझिकोड जिले में सबसे अधिक मतदान दर्ज किया गया, जबकि कुछ क्षेत्रों में अपेक्षाकृत कम मतदान हुआ। केरल में इस बार चुनाव का मुख्य सवाल यह रहा कि क्या सत्तारुढ़ गठबंधन लगातार तीसरी बार सत्ता में लौटेगा या फिर विपक्ष वापसी करेगा? उच्च मतदान को लेकर अलग अलग राजनीतिक दलों ने अलग अलग दावे किए हैं। सत्तारुढ़ पक्ष इसे अपनी नीतियों के समर्थन के रूप में देख रहा है, जबकि विपक्ष इसे बदलाव की इच्छा का संकेत बता रहा है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि उत्तर केरल यानी मलाबार क्षेत्र इस बार भी चुनावी परिणामों की कुंजी माना जा रहा है। यहां की साठ सीटों पर तीनों प्रमुख राजनीतिक धाराओं की नजर है। पिछले चुनाव में इस क्षेत्र में सत्तारुढ़ दल को बड़ी सफलता मिली थी, लेकिन इस बार विपक्ष यहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद कर रहा है। कई सीटों पर कड़ा मुकाबला और अस्सी प्रतिशत से अधिक मतदान इस क्षेत्र को और भी महत्वपूर्ण बना देता है।</div><div><br></div><h2>पुडुचेरी चुनाव</h2><div><br></div><div>अब पुडुचेरी की बात करें तो यहां सबसे अधिक मतदान दर्ज किया गया, जो लगभग नब्बे प्रतिशत के करीब रहा। यह पिछले सभी रिकॉर्ड को पार करता हुआ दिखाई देता है। यहां मुकाबला मुख्य रूप से दो गठबंधनों के बीच है। एक ओर सत्तारुढ़ एनडीए गठबंधन है तो दूसरी ओर कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष।</div><div><br></div><div>पुडुचेरी में चुनावी मुद्दों में राज्य का दर्जा, बेरोजगारी और जल प्रदूषण जैसे विषय प्रमुख रहे। इसके अलावा एक नए राजनीतिक दल की एंट्री ने भी चुनाव को दिलचस्प बना दिया है। उच्च मतदान से यह संकेत मिलता है कि जनता इन मुद्दों को लेकर गंभीर है और बदलाव या स्थिरता में से किसी एक को स्पष्ट रूप से चुनना चाहती है।</div><div><br></div><div>तीनों राज्यों के आंकड़ों को मिलाकर देखें तो कुल मिलाकर पांच करोड़ से अधिक मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग किया और कुल एक हजार नौ सौ से अधिक उम्मीदवार मैदान में रहे। यह संख्या इस बात को दर्शाती है कि लोकतंत्र में भागीदारी कितनी व्यापक है।</div><div><br></div><h2>भारी मतदान से क्या संदेश मिला?</h2><div><br></div><div>अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारी मतदान सत्ता परिवर्तन का संकेत है या फिर यह सत्तारुढ़ दलों के प्रति विश्वास को दर्शाता है? चुनावी विशेषज्ञों की राय इस पर बंटी हुई है। कुछ का मानना है कि जब लोग बड़ी संख्या में मतदान करते हैं तो यह बदलाव की इच्छा का संकेत होता है, जबकि अन्य इसे सरकार के प्रति संतोष के रूप में देखते हैं। वैसे कई विश्लेषकों का यह भी कहना है कि तीनों ही राज्यों में चुनाव प्रचार के दौरान जो बात सबसे प्रमुख तौर पर नजर आई वह यह थी कि सरकार के खिलाफ नाराजगी जरूर दिखी लेकिन सरकार बदलने का भाव जनता के बीच नहीं दिखा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि असम में क्षेत्रीय ध्रुवीकरण, केरल में परंपरागत मुकाबला और पुडुचेरी में सीधी टक्कर ने इन चुनावों को बेहद रोमांचक और निर्णायक बना दिया है। भारी मतदान ने लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत करने का काम किया है और यह साफ संकेत दिया है कि जनता अपने अधिकार को लेकर पहले से अधिक सजग है।&nbsp; अब सबकी नजर मतगणना पर टिकी है, क्योंकि असली तस्वीर वही सामने लाएगी जो इस जनभागीदारी के पीछे छिपे जनमत को स्पष्ट करेगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 10 Apr 2026 14:00:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/what-message-did-the-bumper-voting-in-three-states-send-is-the-mandate-already-clear</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[NATO से बाहर निकलने की तैयारी में US, Trump के फैसले से Europe की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था होगी ध्वस्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/america-is-preparing-to-leave-nato-trump-decision-will-destroy-europe-collective-security-system]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अंतरराष्ट्रीय राजनीति में इस समय एक ऐसा तूफान उठ रहा है, जिसने दुनिया की सबसे मजबूत मानी जाने वाली सुरक्षा व्यवस्था को हिला कर रख दिया है। हम आपको बता दें कि अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच बढ़ती खाई अब खुलकर सामने आ चुकी है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा नाटो से बाहर निकलने की चर्चा ने साफ कर दिया है कि अब यह गठबंधन केवल औपचारिकता बनकर रह सकता है।</div><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान के खिलाफ सैन्य अभियान छेड़ा था तब नाटो के सहयोगी देशों ने इसमें खुलकर सैन्य भागीदारी करने से इंकार कर दिया था। व्हाइट हाउस की प्रवक्ता कैरोलिन लेविट ने इसे साफ शब्दों में नाटो की असफलता बताया। खुद ट्रंप ने नाटो को कागजी शेर तक करार दे दिया। उनका बयान केवल नाराजगी नहीं बल्कि चेतावनी था कि अमेरिका अब नाटो का बोझ अकेला नहीं उठायेगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो ट्रंप का यह रुख अचानक सामने नहीं आया है। पिछले कुछ वर्षों से वह लगातार यूरोपीय देशों पर रक्षा बजट बढ़ाने का दबाव बना रहे हैं। नाटो के सदस्य देशों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद का पांच प्रतिशत रक्षा पर खर्च करने की सहमति भी इसी दबाव का परिणाम थी। लेकिन जब असली परीक्षा आई तो सहयोगी देश पीछे हट गए। यही वह क्षण था जिसने ट्रंप को यह कहने पर मजबूर कर दिया कि नाटो केवल कागजी शेर बनकर रह गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/where-have-those-who-released-the-doves-of-peace-gone" target="_blank">कहां गए शांति के कपोत उड़ाने वाले?</a></h3><div>रणनीतिक दृष्टि से देखें तो यह घटनाक्रम कई स्तरों पर बेहद महत्वपूर्ण है। सबसे पहले, यह ट्रांस अटलांटिक गठबंधन की विश्वसनीयता पर सीधा हमला है। यदि अमेरिका वास्तव में नाटो से दूरी बनाता है तो यूरोप की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था ध्वस्त हो सकती है। रूस जैसे प्रतिद्वंद्वी देशों के लिए यह सुनहरा अवसर साबित होगा, क्योंकि यूरोप बिना अमेरिकी सैन्य समर्थन के कमजोर पड़ जाएगा।</div><div><br></div><div>एक और बड़ा पहलू है पश्चिम एशिया की बदलती रणनीतिक तस्वीर। होरमुज जलडमरूमध्य को लेकर हुए तनाव और तेल आपूर्ति पर पड़े प्रभाव ने यह साफ कर दिया है कि ऊर्जा सुरक्षा अब वैश्विक शक्ति राजनीति का केंद्र बन चुकी है। ट्रंप का यह कहना कि यह जिम्मेदारी उन देशों की है जो तेल पर निर्भर हैं, सीधे तौर पर यूरोप और एशिया को चेतावनी है कि वह अपनी सुरक्षा खुद सुनिश्चित करें।</div><div><br></div><div>वहीं सबसे आक्रामक संकेत है अमेरिका द्वारा अपने सैन्य अड्डों को स्पेन और जर्मनी जैसे देशों से हटाने या कम करने की योजना। यदि यह कदम उठाया जाता है तो यह केवल सैन्य पुनर्संतुलन नहीं बल्कि एक प्रकार का रणनीतिक दंड होगा। इसका संदेश साफ है कि जो अमेरिका के साथ नहीं खड़ा होगा, उसे उसकी कीमत चुकानी होगी।</div><div><br></div><div>ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप की जिद भी इस पूरे घटनाक्रम का अहम हिस्सा है। उन्होंने बार बार यह दोहराया है कि यह क्षेत्र अमेरिकी सुरक्षा के लिए जरूरी है। डेनमार्क और यूरोपीय देशों के विरोध के बावजूद यह मुद्दा अभी ठंडा नहीं पड़ा है। यह दिखाता है कि अमेरिका अब पारंपरिक कूटनीतिक सीमाओं को तोड़कर खुली रणनीतिक आक्रामकता की ओर बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>इस बीच, नाटो महासचिव मार्क रुटे और ट्रंप के बीच हुई बातचीत भले ही औपचारिक रूप से सकारात्मक बताई गई हो, लेकिन अंदर की कड़वाहट साफ झलक रही है। रुटे ने माना कि ट्रंप निराश हैं, जबकि ट्रंप ने साफ शब्दों में कहा कि नाटो ने अमेरिका का साथ नहीं दिया।</div><div><br></div><div>इतिहास गवाह है कि नाटो की सबसे बड़ी परीक्षा 2001 में हुई थी, जब अमेरिका पर हमला हुआ और सभी सदस्य देशों ने उसका साथ दिया। लेकिन आज स्थिति उलट गई है। अब अमेरिका खुद को अकेला महसूस कर रहा है और यही असंतोष उसे गठबंधन से दूरी बनाने की ओर धकेल रहा है।</div><div><br></div><div>यदि अमेरिका नाटो से अलग होता है तो वैश्विक शक्ति संरचना बहुध्रुवीय हो जाएगी। चीन और रूस जैसे देश तेजी से अपने प्रभाव का विस्तार करेंगे। यूरोप को मजबूरन अपनी स्वतंत्र सैन्य नीति बनानी पड़ेगी, जबकि एशिया में भी नए सुरक्षा गठबंधनों का उदय हो सकता है। ट्रंप का आक्रामक रवैया यह संकेत देता है कि आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय संबंध अधिक कठोर, स्वार्थ आधारित और टकरावपूर्ण होने वाले हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि नाटो संकट उस पूरी व्यवस्था का संकट है जिसने दशकों तक दुनिया को एक ढांचे में बांधकर रखा। अब यह ढांचा दरक रहा है और इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दे रही है। यही कारण है कि यह घटनाक्रम आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति की दिशा तय करेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 16:57:23 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/america-is-preparing-to-leave-nato-trump-decision-will-destroy-europe-collective-security-system</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[कहां गए शांति के कपोत उड़ाने वाले?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/where-have-those-who-released-the-doves-of-peace-gone]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज की दुनिया बारूद से धधक रही है। रूस-यूक्रेन से लेकर मध्य पूर्व के रेगिस्तानों तक, हर तरफ मिसाइलों की गूँज है। शांति की बाते अब सुनाई नहीं देतीं। शांति के कपोत उड़ाने वाले दिखाई देने बंद हो गए। युद्ध की विभिषिका के विरोध में प्रदर्शन करने और मोमबत्त्ती जलाने वाले अब सड़कों से गायब है। युद्ध के विरोध के स्वर धीमे ही नही हुए, पूरी तरह खामोश हो गए। बुद्ध के संदेश अब किताबों में ही बंद होकर रह गए है। युद्धों के विरोध की कही से बात नही उठ रही। दुनिया में शांति स्थित करने के लिए बने संयुक्त राष्ट्रसंघ के मुंह पर टेप चिपक गया। वह देख&nbsp; सकता है। न कुछ बोल सकता है। न आदेश कर सकता है।</div><div><br></div><div>विडंबना देखिए कि इक्कीसवीं सदी में हम मंगल पर बस्तियां बसाने की बात कर रहे हैं, लेकिन ज़मीन के चंद टुकड़ों और आपसी वर्चस्व के लिए हज़ारों बेगुनाहों का खून बहाने से भी पीछे नहीं हट रहे। युद्ध चाहे रूस और यूक्रेन के बीच हो, या इज़राइल, ईरान और अमेरिका के बीच का तनाव हो। जीत के झंडे चाहे जिस देश के हाथ आएं, हारती हमेशा मानवता है। इन युद्ध में विजयी कोई भी हो, सदा पराजित तो मानव होती है। मरती बस इंसानियत है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/the-sword-of-oil-and-the-shield-of-diplomacy-india-trial-by-fire-in-the-west-asian-crisis" target="_blank">तेल की तलवार और कूटनीति की ढाल: पश्चिम एशिया संकट में भारत की अग्निपरीक्षा</a></h3><div>इतिहास गवाह है कि युद्ध कभी समस्या का समाधान नहीं रहा, बल्कि यह नई समस्याओं का जन्मदाता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के समय भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कई बार कहा कि दुनिया को युद्ध की नहीं, बुद्ध की जरूरत है। कई मंचों से उन्होंने यह मांग उठाई, किंतु किसी भी देश ने शांति का समर्थन नहीं किया। सब देश गूंगे बन कर रह गए। आज भी ये ही हाल है। मरता ईरान खाड़ी के उन देशों पर मिसाइल और ड्रोन दाग कर तबाही मचा रहा है, जिनमे अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं। अपनी बरबादी होते देख ये देश ईरान पर अमेरिकी हमलों का उस तरह विरोध नही कर रहे, जिस तरह कि करना चाहिए।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>रूस-यूक्रेन युद्ध के समय जहाँ वैश्विक अर्थव्यवस्था और ऊर्जा संकट को जन्म दिया तो मध्य पूर्व (इज़राइल-हमास-ईरान) के संघर्ष ने दुनिया को धार्मिक और कूटनीतिक ध्रुवीकरण के मुहाने पर खड़ा कर दिया है। इन लड़ाइयों में टैंकों की गड़गड़ाहट के बीच जो आवाज़ दब जाती है, वह है—एक मासूम बच्चे की चीख और एक बेबस माँ की कराह। युद्ध की सबसे बड़ी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिनका राजनीति या सत्ता की लालसा से कोई लेना-देना नहीं होता। यूक्रेन के कीव से लेकर गाज़ा की गलियों और ईरान के गांव तक तक, हज़ारों औरतें और बच्चे मौत की नींद सो चुके हैं। जो उम्र खिलौनों से खेलने की थी, उस उम्र में बच्चे बमों के धमाकों को पहचानना सीख रहे हैं। हज़ारों बच्चे अनाथ हो चुके हैं और लाखों का भविष्य मलबे के नीचे दब गया है। युद्ध के दौरान महिलाओं को न केवल विस्थापन का दंश झेलना पड़ता है, बल्कि वे शारीरिक और मानसिक हिंसा का सबसे आसान लक्ष्य बनती हैं।</div><div><br></div><div>युद्ध केवल इंसान को नहीं मारता, वह सदियों से बनी-बनाई सभ्यताओं और बुनियादी ढांचे को भी नष्ट कर देता है। स्कूलों, अस्पतालों और रिहायशी इमारतों पर गिरते बम यह दर्शाते हैं कि आधुनिक समाज कितना "असंवेदनशील" हो चुका है। जब एक अस्पताल पर मिसाइल गिरती है, तो वह केवल ईंट-पत्थर की इमारत नहीं ढहती, बल्कि इंसानियत की आखिरी उम्मीद भी टूट जाती है। इन लड़ाइयों का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। रूस-यूक्रेन संघर्ष ने दुनिया भर में अनाज की आपूर्ति श्रृंखला को तोड़ दिया। इससे गरीब देशों में भुखमरी का खतरा बढ़ गया। ईंधन की बढ़ती कीमतें और खाद्य पदार्थों की कमी ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। जो खरबों डॉलर शिक्षा, स्वास्थ्य और जलवायु परिवर्तन से लड़ने में खर्च होने चाहिए थे, वे आज आधुनिक हथियार और मिसाइलें बनाने में झोंके जा रहे हैं।</div><div><br></div><div>युद्ध का एक और खामोश शिकार हमारा पर्यावरण है। हज़ारों टन गोला-बारूद का इस्तेमाल वायुमंडल को ज़हरीला बना रहा है। जंगलों की आग, समुद्री प्रदूषण और ज़मीन में धंसे बारूदी सुरंग आने वाली कई पीढ़ियों के लिए मौत का जाल बिछा रहे हैं। हम जिस धरती को बचाने की कसमें खाते हैं, उसी को युद्ध की आग में झोंक रहे हैं। संसाधनों को बरबाद कर रहे हैं। जब हम टीवी पर बमबारी के दृश्य देखते हैं और उन्हें केवल एक "न्यूज़ अपडेट" की तरह छोड़ देते हैं, तो समझ लीजिए कि हमारे भीतर की इंसानियत मर चुकी है। युद्ध हमें क्रूर बना देता है। हम मौतों को केवल 'आंकड़ों' में गिनने लगते हैं। घृणा का यह बीज जो आज बोया जा रहा है, वह भविष्य में और अधिक कट्टरपंथ और आतंकवाद को जन्म देगा।</div><div><br></div><div>अमेरिका आज दुनिया का सबसे बड़ा तानाशाह बन गया है। उसने इराक पर यह कह कर हमला किया था कि उसके पास कैमिकल और अन्य घातक शस्त्र है। इराक हार गया। सद्दाम हुसैन पकड़े ही नही गए, उन्हें फांसी हो गई, किंतु अमेरिका इराक से कुछ भी बरामद नही कर पाया। उसका सब झूंठा&nbsp; प्रचार रहा। अब ईरान पर यह कह कर इजरायल और अमेरिका ने हमला किया कि वह परमाणु बम बनाने के नजदीक है। उसकी इस शक्ति को खत्म करना है। हमले जारी है। इस दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने मीडिया से बात करते हुए अपने मन की बात कह&nbsp; दी कि उसे ईरान के तेल पर कब्जा करना है। तीन जनवरी 2026 को अमेरिकी सेना ने एक सैन्य ऑपरेशन के दौरान वेनेजुयला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को उनके देश (कराकस) से गिरफ्तार किया है। यह कार्रवाई नार्को-आतंकवाद और मादक पदार्थों की तस्करी के आरोपों के बाद की गई। इसके बाद उन्हें न्यूयॉर्क लाया गया। बहाना मादक पदार्थो की तस्करी रोकना था किंतु अब अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप कह रहे हैं कि वेनेजुयला का तेल वे बेचेंगे। उनकी मर्जी से बिकेगा। इस सब का मतलब साफ है कि दुनिया के संसाधनों पर अमेरिका की नजर है। वह किसी ने किसी बहाने उन पर कब्जा करना चाहता है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का एक बड़ा बयान सामने आया। ट्रंप ने कहा है कि अगर थोड़ा और समय मिला तो अमेरिका होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोल सकता है और वहां से तेल लेकर बड़ा मुनाफा कमा सकता है। उनके इस बयान ने पहले से चल रहे संघर्ष को और संवेदनशील बना दिया है।</div><div><br></div><div>फिलहाल ईरान ने इस अहम समुद्री रास्ते को बंद कर दिया है। इस कारण दुनिया भर में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है और कीमतों में तेजी देखी जा रहीयह संघर्ष अब सिर्फ ईरान तक सीमित नहीं रहा है। अमेरिका और इस्राइल ने ईरान और लेबनान में कई ठिकानों पर हमले किए हैं। इसके जवाब में ईरान ने भी कई खाड़ी देशें पर मिसाइल और ड्रोन हमले किए हैं। हाल के दिनों में हमलों की संख्या कुछ कम हुई है, लेकिन पूरी तरह रुकी नहीं है।</div><div><br></div><div>ईरान के खिलाफ कार्रवाई में शामिल होने से इन्कार करने वाले ब्रिटेन जैसे वह देश होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने की वजह से जेट ईंधन नहीं पा रहे हैं। उनके लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप का सुझाव है: पहला- अमेरिका से तेल खरीदो, हमारे पास बहुत है। दूसरा- हिम्मत जुटाओ, जलडमरूमध्य पर जाओ और उसे अपने कब्जे में ले लो।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के पूर्व महानिदेशक मोहम्मद अल बारदेई ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान के खिलाफ 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी करने के बाद खाड़ी देशों से हस्तक्षेप करने की तत्काल अपील की है। पूर्व आईएईए प्रमुख ने विनाशकारी सैन्य टकराव की संभावना का जिक्र किया। बारदेई ने एक्स पर एक पोस्ट में पड़ोसी खाड़ी देशों को संबोधित करते हुए कहा, "कृपया, एक बार फिर अपनी पूरी ताकत झोंक दें, इससे पहले कि यह पागल शख्स इलाके को आग का गोला बना दे।" मोहम्मद अल बारदेई ने अपनी गुहार को वैश्विक मंच तक पहुंचाते हुए युद्ध को रोकने में अंतर्राष्ट्रीय संस्थानों की भूमिका पर भी सवाल उठाया। संयुक्त राष्ट्र के साथ रूस-चीन-फ्रांस को संबोधित एक अलग पोस्ट में उन्होंने पूछा कि क्या इस पागलपन को रोकने के लिए कुछ भी नहीं किया जा सकता है?</div><div><br></div><div>युद्ध किसी समस्या का स्थायी हल नहीं है। इतिहास ने बार-बार सिखाया है कि युद्ध के मैदान में कभी कोई नहीं जीतता, बस जो कम हारता है वह खुद को विजेता घोषित कर देता है। रूस, यूक्रेन, इज़राइल, ईरान या अमेरिका—शक्ति का प्रदर्शन किसी को महान नहीं बनाता। महानता इस बात में है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसी दुनिया दें जहाँ बारूद की गंध नहीं, बल्कि भाईचारे की मिठास हो। एक बार और अमेरिका वियतनाम और अफगानिस्तान में जाकर अपना अंजाम देख चुका है। बाद में बहुत कुछ गंवाकर वहां से भाग आया। ये ईरान है। यहां के गांव वाले, युवाओं और बच्चों ने भी अब शस्त्रों से दोस्ती कर ली है। हथियार संभाल लिए है। अमेरिका के दो हेलिकॉप्टर को मार गिराने वाला एक मामूली गडरिया है। इस गडरिए को तो युद्ध कला भी नही आती। सिर्फ&nbsp; इतना जानता है कि ये हेलिकॉप्टर हमलावर अमेरिका के है। जिस देश की जनता इतनी जुझारू और लड़ाका हो, जिसके गडरिये अमेरिका जैसे देश के दो−दो आधुनिकतम हेलिकॉप्टर गिरा दें, उसे हराना संभव नहीं।&nbsp; &nbsp;</div><div><br></div><div>आज दुनिया के शक्तिशाली राष्ट्रों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी होगी। उन्हें युद्ध के उन्माद को रोकना होगा। नहीं रोका, तो वह दिन दूर नहीं जब 'इंसान' तो बचेगा, लेकिन उसके भीतर की 'इंसानियत' पूरी तरह दफन हो चुकी होगी। हमें यह समझना होगा कि धरती पर सरहदें हमने खींची हैं, कुदरत ने नहीं। शांति की मेज़ पर बैठकर बात करना कमज़ोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी बहादुरी है। वक्त आ गया है कि हम "हथियारों की होड़" को छोड़कर "मानवता की जोड़" पर ध्यान दें। वरना इतिहास हमें उन लोगों के रूप में याद रखेगा, जिनके पास सब कुछ था, बस एक-दूसरे के लिए दया और प्रेम नहीं था।</div><div><br></div><div>- अशोक मधुप</div><div>(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 09 Apr 2026 13:39:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/where-have-those-who-released-the-doves-of-peace-gone</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Iran को पहले US से पिटवाया, फिर दिखावे के लिए Pakistan बीच बचाव के लिए आया, वाह रे दोहरा चरित्र!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/how-pakistan-asim-munir-and-shehbaz-sharif-play-double-game-with-iran]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पाकिस्तान की विदेश नीति को अगर सीधे शब्दों में समझना हो तो यह साफ दिखता है कि वह एक साथ दो खेल खेलता है। सामने दोस्ती, पीछे साजिश यही उसकी पहचान बन चुकी है। हाल के घटनाक्रम ने इसे और उजागर कर दिया है। पिछले साल जून में जब पाकिस्तान के सेनाध्यक्ष असीम मुनीर ने व्हाइट हाउस में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से मुलाकात की थी तो इसके पीछे गहरी रणनीति छिपी थी। इस एक बैठक ने दिखा दिया था कि पाकिस्तान कैसे एक तरफ खुद को सहयोगी बताता है और दूसरी तरफ पर्दे के पीछे अपने मतलब का खेल खेलता रहता है।</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि इस मुलाकात में ईरान के मुद्दे पर लंबी बातचीत हुई थी। यह भी चर्चा में रहा कि अमेरिका ने ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के लिए पाकिस्तान के ठिकानों के इस्तेमाल की संभावना टटोली। इससे भी गंभीर आरोप यह है कि पाकिस्तान ने ईरान के परमाणु ठिकानों से जुड़ी जानकारी अमेरिका को उपलब्ध कराई, जिसके आधार पर पिछले साल ही ईरान में अमेरिकी हमला हुआ था। यह न केवल विश्वासघात है बल्कि मुस्लिम दुनिया में भी एक गहरी दरार का संकेत देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-finally-agreed-only-after-china-intervened" target="_blank">China ने मनाया तब जाकर माना ईरान, पाकिस्तान नहीं जिनपिंग के दखल से हुआ सीजफायर</a></h3><div>देखा जाये तो पाकिस्तान और ईरान के संबंध कभी भी सहज नहीं रहे। एक ओर धार्मिक मतभेद हैं जहां सुन्नी और शिया का सवाल हमेशा तनाव का कारण बना रहा, वहीं दूसरी ओर रणनीतिक प्रतिस्पर्धा भी है। पाकिस्तान खुद को इस्लामी दुनिया की एकमात्र परमाणु शक्ति के रूप में देखता रहा है और वह नहीं चाहता कि कोई और मुस्लिम देश इस श्रेणी में आए। ऐसे में ईरान का परमाणु कार्यक्रम पाकिस्तान के लिए असहजता का कारण बनता है। यही वजह है कि पाकिस्तान खुले मंच पर भले ही तटस्थता की बात करे, लेकिन पर्दे के पीछे वह अलग खेल खेलता दिखता है।</div><div><br></div><div>यह दोहरापन सिर्फ ईरान के मामले तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान एक ओर अमेरिका के साथ खुफिया सूचनाएं साझा करता है, वहीं दूसरी ओर खुद को शांति दूत के रूप में प्रस्तुत करता है। ईरान-अमेरिका-इजराइल युद्ध में पाकिस्तान ने शांति वार्ता कराने की पहल का दिखावा किया, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में शांति की कोशिश थी या अपनी छवि सुधारने का प्रयास था?</div><div><br></div><div>इस पूरे खेल में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ की भूमिका भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। एक तरफ वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर शांति और सहयोग की बात करते हैं, वहीं दूसरी ओर उनकी सरकार की नीतियां और फैसले पाकिस्तान की दोहरी रणनीति को मजबूत करते हैं। यह एक तरह का सुनियोजित भ्रम है जिसमें दुनिया को एक चेहरा दिखाया जाता है और दूसरा चेहरा छिपा रहता है।</div><div><br></div><div>साथ ही अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध भी इस संदर्भ में दिलचस्प हैं। डोनाल्ड ट्रंप भले ही अपने पिछले कार्यकाल में पाकिस्तान को आतंकवाद के मुद्दे पर कठघरे में खड़ा कर चुके हों, लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में उनका रुख बदला हुआ नजर आता है। इसकी एक वजह यह भी है कि ट्रंप परिवार का पाकिस्तान में आर्थिक निवेश है। ऐसे में रणनीतिक हित और निजी हित एक दूसरे में घुलते नजर आते हैं।</div><div><br></div><div>यही सबसे खतरनाक पहलू है कि अमेरिका पाकिस्तान के इस खुले दोहरे चरित्र को भलीभांति समझता है, फिर भी जानबूझकर उसे नजरअंदाज करता है। यह कोई मजबूरी नहीं बल्कि सोची समझी चाल है। हालिया संघर्षविराम का श्रेय पाकिस्तान को देना इसी खेल का हिस्सा है। अमेरिका जानता है कि पाकिस्तान एक तरफ आग को हवा देता है और दूसरी तरफ खुद को बुझाने वाला बताता है, फिर भी वह इस्लामाबाद को आगे करता है ताकि अपने रणनीतिक हित साध सके। दूसरी ओर पाकिस्तान इस मौके को ऐसे भुनाता है मानो वह दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत हो, जबकि हकीकत यह है कि वही पर्दे के पीछे हालात बिगाड़ने में भी शामिल रहता है। यह पूरी कहानी एक सुनियोजित नाटक की तरह है, जिसमें अमेरिका और पाकिस्तान दोनों अपने अपने किरदार निभा रहे हैं और दुनिया को गुमराह किया जा रहा है।</div><div><br></div><div>यहां असल सवाल यह है कि क्या दुनिया इस दोहरे खेल को समझ रही है? पाकिस्तान लंबे समय से इसी रणनीति पर काम करता आया है। अफगानिस्तान के मामले में भी उसने एक तरफ अमेरिका का साथ दिया और दूसरी तरफ तालिबान को समर्थन दिया। अब वही नीति ईरान के संदर्भ में दिखाई दे रही है।</div><div><br></div><div>असीम मुनीर और शहबाज शरीफ की जोड़ी इस रणनीति को नए स्तर पर ले जाती दिख रही है। सेना और सरकार के बीच तालमेल के जरिए एक ऐसा तंत्र तैयार किया गया है जो अंतरराष्ट्रीय मंच पर भ्रम पैदा करने में सक्षम है। यह सिर्फ कूटनीति नहीं बल्कि एक सुनियोजित छवि प्रबंधन है।</div><div><br></div><div>दुनिया के लिए यह समझना जरूरी है कि पाकिस्तान की नीति सिर्फ बयानबाजी तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके पीछे गहरी रणनीतिक सोच काम करती है। जब तक अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस दोहरे चरित्र को पहचान कर उसके अनुसार प्रतिक्रिया नहीं देगा, तब तक पाकिस्तान इसी तरह दो नावों पर सवार होकर अपने हित साधता रहेगा। यह कहना गलत नहीं होगा कि पाकिस्तान आज भी विश्वास और संदेह के बीच खड़ा देश है। उसके कदमों में स्थिरता नहीं बल्कि अवसरवादिता झलकती है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, ईरान के खिलाफ युद्ध में संघर्षविराम के ऐलान के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा शांति दूत साबित करने में जुटे हैं। हालांकि नोबेल शांति पुरस्कार की चाहत रखने वाले ट्रंप का अपने दूसरे कार्यकाल में युद्ध भड़काना और फिर सभ्यता खत्म कर देने जैसी धमकियां देना उनके असली चरित्र को उजागर करता है। इसी कड़ी में पाकिस्तान भी पीछे नहीं है, जो इस संघर्ष में मध्यस्थता का श्रेय लेने की कोशिश कर रहा है। असीम मुनीर और शहबाज शरीफ के नेतृत्व में पाकिस्तान एक तरफ शांति की बात करता है, जबकि दूसरी ओर उसी पर दुनिया भर में अशांति और आतंकवाद फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। सच यह है कि यह पूरा घटनाक्रम शांति का नहीं बल्कि दोहरे चरित्र और अवसरवादी राजनीति का एक और उदाहरण बनकर सामने आया है, जिसे अब दुनिया साफ साफ समझने लगी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 08 Apr 2026 12:45:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/how-pakistan-asim-munir-and-shehbaz-sharif-play-double-game-with-iran</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[तेल की तलवार और कूटनीति की ढाल: पश्चिम एशिया संकट में भारत की अग्निपरीक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-sword-of-oil-and-the-shield-of-diplomacy-india-trial-by-fire-in-the-west-asian-crisis]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दशकों पहले युद्ध केवल सीमाओं पर जमीन के टुकड़ों के लिए लड़े जाते थे लेकिन 2026 का यह दौर गवाह है कि आधुनिक युद्ध ‘संप्रभुता’ से ज्यादा ‘संसाधनों’ का है। युद्ध की गोलियां, मिसाइलें अब ऊर्जा की पाइपलाइनों और तेल के टैंकरों पर चलती है। पश्चिम एशिया में ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच छिड़ा यह त्रिकोणीय संघर्ष भी महज जमीन का विवाद नहीं है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की जीवनरेखा ‘ऊर्जा आपूर्ति’ पर नियंत्रण की जंग है। भारत के लिए यह संकट केवल पैट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक ऐसी राष्ट्रीय सुरक्षा चुनौती है, जिसने देश के सामने एक अदृश्य ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ का खतरा पैदा कर दिया है। जब संसद में प्रधानमंत्री ने इस संकट की तुलना ‘कोरोना काल’ की विभीषिका से की तो उनका आशय घर में बंद होने से नहीं बल्कि उस वैश्विक अनिश्चितता से था, जो किसी भी क्षण भारत की विकास दर के पहियों को जाम कर सकती है। यदि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ पर ताला लगता है तो भारत की रगों में दौड़ने वाला 60 प्रतिशत तेल और एलएनजी का प्रवाह थम जाएगा, जो देश को एक भयावह ‘ऊर्जा लॉकडाउन’ की ओर धकेल सकता है।</div><div><br></div><h2>होर्मुज की घेराबंदी</h2><div>विश्व मानचित्र पर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज वह संकरा जलमार्ग है, जिससे दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल और भारी मात्रा में एलएनजी गुजरती है। ईरान द्वारा इस जलमार्ग को प्रभावित करने का अर्थ है, वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की गर्दन दबाना। फरवरी 2026 के अंत से शुरू हुए इस युद्ध ने मात्र पांच हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों को 85 डॉलर से 110 डॉलर के पार पहुंचा दिया है। भारत अपनी एलपीजी जरूरतों का 40 प्रतिशत अकेले कतर से पूरा करता है। कतर के रास लाफान एलएनजी प्लांट पर हुए हमलों ने न केवल उत्पादन घटाया है बल्कि भारत के घरेलू चूल्हों तक पहुंचने वाली गैस की कीमतों में आग लगा दी है। युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक कच्चे तेल की कीमतें 85 डॉलर से उछलकर 110 डॉलर प्रति बैरल को छू रही हैं। भारत के लिए गणित सीधा और क्रूर है, कच्चे तेल में 10 डॉलर की हर बढ़ोतरी हमारे चालू खाता घाटे में लगभग 12-15 अरब डॉलर की वृद्धि करती है। यह स्थिति हमें दो टूक शब्दों में चेतावनी दे रही है कि पराई बैसाखियों पर टिकी ऊर्जा सुरक्षा कभी भी धराशायी हो सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-israel-attacked-kharg-island-pezeshkian-said-every-iranian-is-ready-to-sacrifice-his-life" target="_blank">US-Israel ने कर दिया Kharg Island पर हमला, राष्ट्रपति Pezeshkian बोले- हर ईरानी जान देने को तैयार, तुर्की में Israeli Consulate के बाहर फायरिंग</a></h3><h2>सामरिक पैट्रोलियम भंडार: क्या पर्याप्त है चंद दिनों की सुरक्षा?</h2><div>ऊर्जा सुरक्षा के मोर्चे पर भारत की सबसे बड़ी कमजोरी उसका सीमित सामरिक पैट्रोलियम भंडार है। दुनिया के विकसित देश जैसे अमेरिका, जापान और चीन अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए 90 दिनों का ‘स्ट्रैटिजिक पेट्रोलियम रिजर्व’ रखते हैं, वहीं भारत की स्थिति चिंताजनक है। वर्तमान में हमारे पास विशाखापट्टनम, मंगलुरु और पाडुर में कुल 53.3 लाख टन का भंडार है, जो मुश्किल से 9 दिन की आपूर्ति कर सकता है। हालांकि दूसरे चरण में चंडीखोल और बीकानेर जैसे स्थानों पर भंडार क्षमता बढ़ाकर इसे 60-65 दिनों तक ले जाने की योजना है लेकिन इसकी गति ‘युद्धस्तर’ पर नहीं है। हमारे मौजूदा भंडार का करीब 36 प्रतिशत हिस्सा खाली पड़ा है। एक तरफ हम तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का स्वप्न देख रहे हैं और दूसरी तरफ हमारी ऊर्जा की ‘लाइफलाइन’ केवल कुछ दिनों के स्टॉक पर टिकी है। यदि आज हमारे पास 90 दिनों का सुरक्षित भंडार होता तो भारत को अपनी विदेश नीति में तटस्थता का नाटक नहीं करना पड़ता बल्कि वह एक सशक्त वैश्विक खिलाड़ी की तरह अपना पक्ष रख सकता था। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य 30 दिनों के लिए बंद हो जाता है और भारत के लिए आपूर्ति बाधित होती है तो भारत की अर्थव्यवस्था ‘वेंटिलेटर’ पर आ जाएगी। इसलिए चंडीखोल और बीकानेर में प्रस्तावित दूसरे चरण के भंडारों का निर्माण युद्धस्तर पर होना अब विकल्प नहीं, अनिवार्यता है।</div><div><br></div><h2>कूटनीतिक विवशता और स्वतंत्र विदेश नीति का संकट</h2><div>भारत की रणनीतिक स्वायत्तता आज तेल की निर्भरता के कारण परीक्षा की घड़ी में है। तेल की निर्भरता केवल आर्थिक बोझ नहीं बल्कि कूटनीतिक बेड़ियां भी है। भारत को अपने पुराने और रणनीतिक मित्र ईरान का साथ छोड़कर इजरायल और अमेरिकी समर्थित खाड़ी देशों के पाले में खड़े होने पर मजबूर होना पड़ा है। यह बदलाव केवल नीतिगत नहीं बल्कि विवशतापूर्ण है। खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख भारतीयों की सुरक्षा और वहां से आने वाला ‘रेमिटेंस’ भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। इसलिए खाड़ी देशों में रहने वाले 90 लाख भारतीय प्रवासियों के हितों और तेल की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ही भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति से समझौता करना पड़ रहा है। जब तक हम ऊर्जा के लिए आयात पर 85 प्रतिशत निर्भर रहेंगे, तब तक हमारी विदेश नीति की चाबी विदेशी राजधानियों के हाथों में रहेगी और वाशिंगटन या तेहरान में होने वाली हर हलचल नई दिल्ली के माथे पर चिंता की लकीरें खींचती रहेगी। यह युद्ध हमें सिखाता है कि सच्ची संप्रभुता केवल सीमाओं की रक्षा में नहीं बल्कि ऊर्जा की आत्मनिर्भरता में निहित है।</div><div><br></div><h2>अफवाहों का बाजार और सरकारी डैमेज कंट्रोल</h2><div>युद्ध के बीच भारत में लॉकडाउन की अफवाहों ने पैनिक पैदा किया है। हालांकि, तीन मंत्रियों निर्मला सीतारमण, किरेन रिजिजू और हरदीप पुरी ने स्पष्ट किया कि देश सुरक्षित है। सरकार की ओर से दावा किया जा रहा है कि भारत के पास तेल और गैस की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विविधीकृत स्रोत हैं और&nbsp; पैनिक की कोई आवश्यकता नहीं है लेकिन सतर्कता और ऊर्जा संरक्षण हमारा सामूहिक धर्म है। सरकार का यह स्पष्टीकरण अल्पकालिक राहत तो देता है लेकिन एक दीर्घकालिक प्रश्न भी छोड़ता है कि क्या हम हर संकट के समय केवल डैमेज कंट्रोल ही करते रहेंगे या भविष्य की नींव रखेंगे?</div><div><br></div><h2>विकल्प नहीं, अनिवार्यता है वैकल्पिक ऊर्जा</h2><div>वैश्विक ऊर्जा संकट और बढ़ती आयात निर्भरता के इस दौर में वैकल्पिक ऊर्जा अब केवल एक विकल्प नहीं बल्कि राष्ट्रीय अनिवार्यता बन चुकी है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता ही सच्ची स्वतंत्रता का आधार है और भारत को इस दिशा में निर्णायक कदम उठाने होंगे। प्रधानमंत्री की मुफ्त बिजली योजनाएं और रूफटॉप सोलर मिशन केवल नीतिगत पहल नहीं बल्कि आत्मनिर्भर भारत के सशक्त आधारस्तंभ हैं। भारत में 33 करोड़ एलपीजी उपभोक्ता हैं, जो बड़े पैमाने पर आयातित ईंधन पर निर्भर हैं। यदि रसोई को इंडक्शन कुकिंग और एथनॉल आधारित विकल्पों की ओर मोड़ा जाए तो न केवल खर्च कम होगा बल्कि ऊर्जा आयात का बोझ भी घटेगा। लगभग 8 रुपये प्रति यूनिट की दर से बिजली पर खाना बनाना एलपीजी की तुलना में किफायती है, वहीं कृषि अवशेषों से बनने वाला एथनॉल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है। इससे ‘अन्नदाता’ ही ‘ऊर्जादाता’ बन सकता है। परिवहन क्षेत्र में विद्युतीकरण भी उतना ही आवश्यक है। वर्तमान में तेल की सबसे अधिक खपत इसी क्षेत्र में होती है जबकि बिजली की हिस्सेदारी नगण्य है। यदि सार्वजनिक और वाणिज्यिक परिवहन को इलैक्ट्रिक किया जाए तो अरबों डॉलर की विदेशी मुद्रा बचाई जा सकती है। सौर ऊर्जा और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे विकल्प भारत को स्थायी, स्वच्छ और सुरक्षित ऊर्जा भविष्य की ओर ले जा सकते हैं। अब समय आ गया है कि भारत ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में निर्णायक परिवर्तन करे।</div><div><br></div><h2>बिजली खपत का बदलता स्वरूप</h2><div>भारतीय अर्थव्यवस्था में बिजली का 42 प्रतिशत हिस्सा उद्योगों में और 17 प्रतिशत कृषि में उपयोग होता है। जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ रहा है, कार्यालयों और दुकानों (वाणिज्यिक क्षेत्र) में बिजली की मांग बढ़ेगी। हमें कोयला आधारित बिजली (जो अभी भी हमारी रीढ़ है) से हटकर परमाणु, सौर और पवन ऊर्जा की ओर तीव्र गति से मुड़ना होगा। सालाना 143 अरब डॉलर (2025 के आंकड़े) का तेल आयात एक ऐसा घाव है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था को भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। सूर्य और पवन के रूप में भारत के पास असीमित प्राकृतिक संसाधन हैं लेकिन उन्हें ‘ऊर्जा’ में बदलने की इच्छाशक्ति और निवेश की गति अभी भी मंथर है।</div><div><br></div><h2>भविष्य का रोडमैप: ऊर्जा सुरक्षा ही राष्ट्रीय सुरक्षा</h2><div>ईरान-इजरायल युद्ध ने भारत के लिए एक कठोर चेतावनी प्रस्तुत की है। यदि होर्मुज जलडमरूमध्य बाधित होता है तो यह केवल क्षेत्रीय संकट नहीं रहेगा बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए ‘आर्थिक प्रलय’ का कारण बन सकता है। उर्वरक, ईंधन, सेमीकंडक्टर, हर आपूर्ति शृंखला पर इसका गहरा प्रभाव पड़ेगा। ऐसे में भारत को त्वरित, ठोस और दूरदर्शी कदम उठाने होंगे। सबसे पहले, रणनीतिक भंडार का सुदृढ़ीकरण अनिवार्य है। अगले 24 महीनों में कम से कम 90 दिनों का तेल और गैस रिजर्व तैयार करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए ताकि किसी भी वैश्विक व्यवधान के समय देश की ऊर्जा आवश्यकताएं प्रभावित न हों। दूसरा, ऊर्जा विविधीकरण पर आक्रामक रणनीति अपनानी होगी। रूस, मध्य एशिया और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों के साथ दीर्घकालिक आपूर्ति समझौते, पाइपलाइन परियोजनाएं और वैकल्पिक व्यापार मार्ग विकसित करना समय की मांग है। तीसरा, परमाणु ऊर्जा, सौर शक्ति और ग्रीन हाइड्रोजन में निवेश को युद्ध स्तर पर बढ़ाना होगा। ये केवल स्वच्छ ऊर्जा के स्रोत नहीं बल्कि स्थायी ऊर्जा सुरक्षा के स्तंभ हैं। अंततः, यह स्पष्ट है कि वैश्विक शांति हमारे नियंत्रण में नहीं परंतु अपनी ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करना पूरी तरह हमारे हाथ में है। आत्मनिर्भरता अब केवल नारा नहीं बल्कि अस्तित्व की शर्त बन चुकी है। यदि हम आज निर्णायक कदम नहीं उठाते तो भविष्य का अंधकार हमारी ही निष्क्रियता का परिणाम होगा।</div><div><br></div><div>- योगेश कुमार गोयल</div><div>(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 17:43:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-sword-of-oil-and-the-shield-of-diplomacy-india-trial-by-fire-in-the-west-asian-crisis</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[बागी सिपाहियों को सबक सिखाने के मूड में कांग्रेस]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/congress-in-the-mood-to-teach-a-lesson-to-rebel-soldiers]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आती जा रही है, चुनावी घमासान बढ़ता जा रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी का दांव चूंकि दो राज्यों में ही सबसे ज्यादा है, इसलिए उसका सारा ध्यान इन्हीं दो राज्यों पर है। असम और केरल के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की स्थिति अलग-अलग है। इसलिए दोनों ही राज्यों में उसकी चुनौतियां अलग हैं, इसलिए उसकी लड़ाई के रूप और तरीके अलग-अलग हैं। हरियाली और समुद्री किनारे के चलते केरल को खूबसूरत राज्यों में शुमार किया जाता है। इस खूबसूरती की ही वजह से केरल को ‘भगवान का देश’ कहा जाता है। बारह साल से केंद्रीय सत्ता से दूर कांग्रेस को उम्मीद भगवान के इसी देश से ही ज्यादा है। पिछले लोकसभा चुनावों में जिस तरह इस राज्य से उसे समर्थन मिला था, उसकी वजह से उसकी उम्मीदों का परवान चढ़ना स्वाभाविक है। लेकिन यहां उसकी चुनौती भगवान को न मानने वाली विचारधारा से है। केरल की सत्ता पर काबिज जिस वाममोर्चा से विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का मुकाबला है, राष्ट्रीय स्तर पर मोदी के खिलाफ बने विपक्षी मोर्चे में कांग्रेस उसी वाममोर्चे के साथ है। स्थानीय स्तर पर विरोध और राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग का विरोधाभास अगर सर्वाधिक शिक्षित राज्य में भारी पड़ सकता है। हाल ही में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में राजधानी तिरूअनंतपुरम् में जीत हासिल कर चुकी बीजेपी इस विरोधाभास को खूब उछाल रही है। वैसे तो बीजेपी का दावा है कि इस बार भगवान के देश में भगवा ध्वज फहरने जा रहा है, हालांकि अब तक चुनावी अभियान से साफ है कि बीजेपी को वैसी सफलता मिलती नजर नहीं आ रही। लेकिन बीजेपी का मौजूदा जीन आखिरी दम तक हार नहीं मानने का है। इसलिए पार्टी की कोशिश सीपीएम की अगुआई वाले वाममोर्चे और कांग्रेस की अगुआई वाले संयुक्त मोर्चे के विरोधाभास को उजागर करने पर है। पार्टी को लगता है कि देश के इस सर्वाधिक साक्षर राज्य में अगर जनता ने इस विरोधाभास को समझ लिया तो राज्य के चुनावी नतीजे 2017 के उत्तर प्रदेश के परिणामों की तरह आश्चर्यजनक रूप से अपने पक्ष में किए जा सकते है। 2017 में किसने सोचा था कि भारतीय जनता पार्टी प्रचंड बहुमत हासिल करेगी। इसी कोशिश के तहत अमित शाह केरल की करीब 19 प्रतिशत जनसंख्या वाले ईसाई समुदाय से लगातार संपर्क कर रहे हैं। साल 2011 की जनगणना के अनुसार, केरल के कुल 3.34 करोड़ निवासियों में से लगभग 61.41 लाख ईसाई हैं, जो मुख्य रूप से मध्य केरल में केंद्रित हैं। पारंपरिक रूप से केरल में यह समुदाय कांग्रेस का सहयोग करता रहा है, लेकिन बीजेपी की कोशिश इस समुदाय को कांग्रेस से तोड़ने की रही है। हालिया अतीत के कुछ चुनावों में यह समुदाय बीजेपी के साथ खड़ा होता नजर आया है। इसकी वजह यह है कि राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित लव जेहाद का शिकार केरल में यह समुदाय भी होता रहा है। इससे स्थानीय स्तर पर इस समुदाय में भी कुछ वैसा ही गुस्सा है, जैसा उत्तर भारत में हिंदू समाज में ऐसा नजर आता है। कांग्रेस का संकट है कि वह वाममोर्चा का विरोध और समर्थन की उलटबांसी की सटीक काट नहीं खोज पा रही है। इस वजह से राज्य का चुनावी मुकाबला लगातार दिलचस्प होता जा रहा है। वैसे बीजेपी जिस तरह की कोशिश करती नजर आ रही है, उससे सबसे ज्यादा संकट में कांग्रेस की संभावनाएँ ही नजर आ रही है। ऐसा लगता है कि बीजेपी की रणनीति कांग्रेस को इस राज्य की सत्ता से दूर रखने की ही है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/amit-shah-in-assam-rally-rahul-baba-listen-we-not-allow-this-to-become-infiltrators-stronghold" target="_blank">Assam Rally में गरजे Amit Shah, बोले- Rahul Baba सुन लें, घुसपैठियों का गढ़ नहीं बनने देंगे</a></h3><div>पूर्वोत्तर भारत के प्रमुख राज्य असम की जहां तक बात है, तो वहां मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस में ही है। कांग्रेस की चिढ़ यह है कि बीजेपी जिस हिमंत विस्वसरमा के चेहरे पर चुनावी मैदान में है, वह कभी कांग्रेस का ही चेहरा होते थे। कांग्रेस अपने इस पूर्व नेता को इस बार हर हाल में सबक सिखाने के मूड में नजर आ रही है। जिस तरह उनकी पत्नी रिंकी भुइयां सरमा के पास तीन-तीन पासपोर्ट हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा का आरोप है कि रिन्की भुइयां सरमा के पास संयुक्त अरब अमीरता, एंटीगुआ और बारबुडा एवं मिस्र का पासपोर्ट है। कांग्रेस ने इसके समर्थन के कुछ दस्तावेज़ों की कॉपी भी दिखाई है। हालांकि हिमंत विस्वसरमा का कहना है कि कांग्रेस हताशा में है और उनकी ओर से कांग्रेस के नेताओं पर मानहानि का केस दायर करने की भी बात कही जा रही है। कांग्रेस एक तरह से अपने इस पुराने सिपाही को भ्रष्टतम साबित करने की कोशिश में है। कांग्रेस का यह भी आरोप है कि हिमंत के पास अमेरिका में भी कंपनी है, जिसमें बावन हजार करोड़ रूपए जमा हैं। कांग्रेस का यह आरोप राहुल गांधी के आरोपों का विस्तार ही लगता है। राहुल गांधी ने कुछ दिन पहले उन्होंने अपने पुराने सहयोगी को देश का सबसे भ्रष्ट मुख्यमंत्री बताया था। राहुल गांधी उन्हें सत्ता में वापसी के बाद जेल भेजने की बात कहते रहे हैं। कांग्रेस की इन आरोपों के जरिए कोशिश सिर्फ हिमंत को ही सवालों के घेरे में रखना नहीं है, बल्कि बीजेपी को भी भ्रष्टाचार बताने की भी है। वैसे हिमंत भी राहुल गांधी की आलोचना करते रहे हैं। अपने कांग्रेस छोड़ने की वजह वे राहुल गांधी को ही बताते रहे हैं। दोनों के रिश्तों के संदर्भ में मौजूदा आरोपों को देखें तो यह निजी खुन्नस का भी मामला लगता है। हिमंत इन आरोपों को निजी खुन्नस बताने और असम के लोगों को समझाने की कोशिश में लगे हैं। अगर वे इसमें कामयाब रहे तो असम में कांग्रेस की चुनावी संभावना दूर होगी। अगर ऐसा हुआ तो फिर कांग्रेस के लिए उत्तर पूर्व में अपनी मौजूदगी बनाए रखना दूर की कौड़ी हो जाएगा। इसका कारण यह है कि हिमंत पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी का चेहरा और संकट मोचक बन चुके हैं। अगर कांग्रेस की कोशिशें कामयाब रहीं तो पूर्वोत्तर में बीजेपी की राह कठिन हो जाएगी। हिमंत की हार उसकी चुनावी संभावनाओं पर बड़ा प्रश्नचिन्ह बनकर उभरेगी। असम पर काबू पाने के लिए कांग्रेस ने अपने हरावल दस्ते के हर हथियार मैदान में उतार दिए हैं। कांग्रेस की कोशिशों को पलीता उसकी प्रेस कांफ्रेंस में ही लगता दिखा, जब राष्ट्रीय मीडिया के एक पत्रकार ने उस कंपनी की वेबसाइट खोलकर उसकी स्थापना के तथ्य कांग्रेस प्रवक्ता के सामने पेश करने शुरू कर दिए, जो कांग्रेस के दावे के ठीक उलट नजर आ रहे थे। इसका माकूल और संतोषजनक जवाब कांग्रेस प्रवक्ता नहीं दे पाए।&nbsp;</div><div><br></div><div>असम से सटे पश्चिम बंगाल में भी विधानसभा चुनाव हो रहे हैं। वहां तो वह लड़ती भी नहीं दिख रही। राज्य की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी कभी कांग्रेस की सिपाही रहीं। केरल की तरह पश्चिम बंगाल में भी कांग्रेस विरोधाभास से जूझ रही है। राष्ट्रीय स्तर पर वह ममता के साथ है, लेकिन राज्य में उसकी पूरी कोशिश ममता को हिमंत की तरह सबक सिखाने की ही लग रही है। दरअसल राज्य में कांग्रेस का एक भी विधायक नहीं है। हालांकि 2023 में मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले की सगरदीघी सीट के उपचुनाव में कांग्रेस तृणमूल कांग्रेस को हराकर विधानसभा में अपना खाता खोलने में सफल रही थी। मुस्लिम बहुल विधानसभा में कांग्रेस की जीत से ममता की नींद उड़ गई थी। राज्य के करीब पैंतीस फीसद मुस्लिम वोट बैंक में सेंध का डर उन्हें सताने लगा। इसके लिए उन्होंने ऑपरेशन सगरदीघी शुरू किया और यहां से जीते कांग्रेसी विधायक बायरन विश्वास को तृणमूल कांग्रेस में शामिल करा दिया। कांग्रेस ने इसे विश्वासघात माना और लगता ऐसा है कि वह ममता को इन चुनावों में सबक सिखाने की कोशिश कर रही है। वैसे पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान राज्य की ग्यारह मुस्लिम बहुल विधानसभा सीटों पर उसके प्रत्याशी पहले नंबर पर रहे थे। इसलिए कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि विधानसभा चुनावों में उसे मुस्लिम वोटरों का साथ मिल सकता है। उसकी पूरी रणनीति इसी लिहाज से आगे बढ़ रही है।</div><div>साफ है कि इस बार के चुनावों में कांग्रेस जहां अपने पुराने सिपाहियों को सिखाने की कोशिश में है, वहीं खुद की संभावनाएं बेहतर करने का भी प्रयास कर रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 07 Apr 2026 12:48:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/congress-in-the-mood-to-teach-a-lesson-to-rebel-soldiers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ईरान ने कैसे गिराया अमेरिकी विमान? अमेरिका ने कैसे बचाए अपने पायलट? ये रहे सवालों के जवाब]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/how-did-iran-shoot-down-the-american-fighter-plane-how-did-the-us-save-its-pilots]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच एक बेहद साहसिक और जटिल बचाव अभियान ने वैश्विक स्तर पर ध्यान खींचा है। ईरान के भीतर गिराए गए एक अमेरिकी लड़ाकू विमान के दो चालक दल सदस्यों को निकालने के लिए चलाया गया यह अभियान आधुनिक युद्ध रणनीति, गुप्त संचालन और जोखिम भरे फैसलों का अनोखा उदाहरण बन गया है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शुक्रवार को ईरान के इस्फहान प्रांत के ऊपर उड़ान भर रहे अमेरिकी लड़ाकू विमान को ईरानी हमले में निशाना बनाया गया। विमान के दो पायलट समय रहते बाहर निकल गए, लेकिन वह दुश्मन के इलाके में अलग अलग स्थानों पर उतर गए। पहले पायलट को कुछ ही घंटों में सुरक्षित निकाल लिया गया, लेकिन दूसरे सदस्य यानी हथियार विशेषज्ञ को बचाना बेहद चुनौतीपूर्ण साबित हुआ।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/us-retrieved-its-soldier-from-iran-like-abhinandan-while-iran-foreign-minister-called-jaishankar" target="_blank">अभिनंदन जैसा ईरान से अपना सैनिक छीन लाया अमेरिका, उधर ईरान के विदेश मंत्री ने जयशंकर को फोन घुमाया</a></h3><div>यह अभियान केवल एक सामान्य बचाव मिशन नहीं था, बल्कि इसमें खुफिया एजेंसियों, विशेष बलों और अत्याधुनिक तकनीक का समन्वय देखने को मिला। अमेरिकी विशेष बलों ने रात के अंधेरे में ईरान के भीतर गहराई तक प्रवेश किया। लगभग दो हजार एक सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर छिपे घायल अधिकारी तक पहुंचकर उसे सुरक्षित स्थान तक लाया गया।</div><div><br></div><div>हालांकि मिशन के बीच में एक बड़ा संकट भी आया। जिन परिवहन विमानों के जरिए लगभग सौ विशेष बलों को इलाके में पहुंचाया गया था, उनमें तकनीकी खराबी आ गई और वे उड़ान भरने में असमर्थ हो गए। इससे सैनिकों के दुश्मन इलाके में फंसने का खतरा पैदा हो गया। ऐसे में कमांडरों ने जोखिम भरा फैसला लेते हुए अतिरिक्त विमानों को भेजने का आदेश दिया। कुछ घंटों की तनावपूर्ण प्रतीक्षा के बाद अंततः सभी सैनिकों को चरणबद्ध तरीके से बाहर निकाल लिया गया। साथ ही इस दौरान अमेरिकी सेना ने अपने दो परिवहन विमानों और चार हेलीकॉप्टरों को खुद ही नष्ट कर दिया ताकि वह ईरान के हाथ न लग सकें। यह फैसला इस मिशन की गंभीरता और संवेदनशीलता को दर्शाता है।</div><div><br></div><h2>अमेरिकी सैनिकों को दिया जाता है खास प्रशिक्षण</h2><div><br></div><div>घायल अधिकारी की जीवित रहने की कहानी भी किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है। बाहर निकलने के बाद वह पहाड़ों में छिप गया और एक दरार में शरण ली। उसके पास सीमित संसाधन थे, लेकिन विशेष प्रशिक्षण के कारण वह खुद को बचाने में सफल रहा। बाद में उसने सुरक्षित तरीके से अमेरिकी सेना से संपर्क स्थापित किया, जिससे उसकी पहचान की पुष्टि हो सकी और बचाव अभियान आगे बढ़ाया जा सका। हम आपको बता दें कि अमेरिकी पायलटों को दुश्मन के इलाके में फंसने की स्थिति के लिए जो विशेष प्रशिक्षण दिया जाता है, उसे सामान्यतः सेरे प्रशिक्षण कहा जाता है, जिसका अर्थ है सर्वाइवल, एवेजन, रेसिस्टेंस और एस्केप यानी जीवित रहना, दुश्मन से बचना, गिरफ्तारी की स्थिति में प्रतिरोध करना और मौका मिलने पर निकल भागना। इस प्रशिक्षण में पायलटों को अत्यंत कठिन परिस्थितियों में खुद को जिंदा रखने की कला सिखाई जाती है, जैसे पानी ढूंढ़ना और शुद्ध करना, अस्थायी आश्रय बनाना, सीमित संसाधनों में भोजन जुटाना और प्राथमिक उपचार करना। साथ ही उन्हें यह भी सिखाया जाता है कि दुश्मन की नजर से कैसे बचा जाए, जैसे जमीन के करीब रहना, छिपने के तरीके अपनाना, रात का उपयोग करना और सुरक्षित संचार उपकरणों के जरिए अपने स्थान की जानकारी देना। प्रशिक्षण का एक महत्वपूर्ण हिस्सा मानसिक मजबूती विकसित करना होता है, जिसमें पायलटों को पूछताछ या बंदी बनाए जाने की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत सीमित जानकारी देना, दबाव का सामना करना और दुश्मन के मनोवैज्ञानिक प्रभाव से बचना सिखाया जाता है। इसके अलावा उन्हें भागने की योजना बनाना, रास्तों की पहचान करना और बचाव दल से संपर्क स्थापित करने की रणनीतियां भी सिखाई जाती हैं। कुल मिलाकर यह प्रशिक्षण पायलटों को इस लायक बनाता है कि वह अकेले, घायल या संसाधनहीन होने पर भी दुश्मन के इलाके में लंबे समय तक जीवित रह सकें और सही समय पर सुरक्षित वापस लौटने की संभावना बनाए रखें।</div><div><br></div><h2>अमेरिका की रणनीति</h2><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि ईरान की ओर से भी इस दौरान व्यापक स्तर पर खोज अभियान चलाया गया था। स्थानीय लोगों से अपील की गई कि यदि उन्हें कोई दुश्मन पायलट दिखे तो उसे पकड़कर अधिकारियों को सौंपें। इनाम की घोषणा भी की गई, जिससे इलाके में खोज और तेज हो गई। लेकिन अमेरिकी खुफिया एजेंसी ने इस बीच एक भ्रम फैलाने वाली रणनीति अपनाई। ईरान के भीतर यह संदेश फैलाया गया कि लापता अधिकारी को पहले ही ढूंढ़ लिया गया है और उसे कहीं और ले जाया जा रहा है। इसके साथ ही अमेरिकी सेना ने इलेक्ट्रॉनिक संकेतों को बाधित किया और कुछ प्रमुख रास्तों पर हमले किए ताकि कोई भी व्यक्ति उस क्षेत्र तक न पहुंच सके। इस मिशन के दौरान अमेरिकी हेलीकॉप्टरों पर भी हमला हुआ। दो हेलीकॉप्टरों को नुकसान पहुंचा, लेकिन वे किसी तरह सुरक्षित वापस लौटने में सफल रहे।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, ईरान ने दावा किया कि उसने अमेरिकी अभियान को पूरी तरह विफल कर दिया और कई विमानों को मार गिराया। ईरानी मीडिया में जले हुए विमान के मलबे और धुएं की तस्वीरें भी दिखाई गईं। हालांकि अमेरिका का कहना है कि उसने अपने उपकरण खुद नष्ट किए ताकि वे दुश्मन के हाथ न लगें। इस पूरे घटनाक्रम में दोनों देशों के बीच सूचना युद्ध भी साफ दिखाई देता है, जहां हर पक्ष अपनी जीत का दावा कर रहा है। हम आपको यह भी बता दें कि इस संघर्ष में अब तक अमेरिका के तेरह सैनिकों की मौत हो चुकी है और तीन सौ से अधिक घायल हुए हैं, लेकिन किसी भी सैनिक को बंदी नहीं बनाया गया है।</div><div><br></div><h2>ईरान ने कैसे गिराया अमेरिकी विमान?</h2><div><br></div><div>जहां तक ईरान द्वारा इस्फहान प्रांत के ऊपर अमेरिकी लड़ाकू विमान को मार गिराने की बात है तो इस बारे में आपको और जानकारी देते हुए बता दें कि यह हमला किसी एक साधारण हथियार से नहीं, बल्कि उन्नत वायु रक्षा प्रणाली के संयोजन से किया गया हो सकता है। कई रिपोर्टों में संकेत मिला है कि ईरान ने अपने स्वदेशी “थर्ड खोरदाद” नामक मध्यम दूरी के सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम का उपयोग किया, जो पहले भी उन्नत विमानों को निशाना बनाने के लिए जाना जाता है। इसके साथ ही कुछ खुफिया आकलनों में यह भी कहा गया कि ईरान ने रूसी मूल के कंधे पर रखकर दागे जाने वाले आधुनिक मिसाइल सिस्टम (मैनपैड्स), जैसे वेरबा प्रकार, का इस्तेमाल किया होगा, जो कम ऊंचाई पर उड़ रहे विमानों को आसानी से निशाना बना सकते हैं और पारंपरिक रडार चेतावनी प्रणालियों को चकमा देने में सक्षम होते हैं। इसके अलावा “पैसिव इंफ्रारेड ट्रैकिंग” तकनीक का भी उल्लेख मिलता है, जो बिना रडार सिग्नल छोड़े विमान की गर्मी या गति को ट्रैक करती है, जिससे पायलट को खतरे का अंदाजा देर से होता है।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि ऐसी वायु रक्षा तकनीक आज केवल ईरान तक सीमित नहीं है, बल्कि रूस, चीन, अमेरिका, इजराइल, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे कई देशों के पास उन्नत सतह से हवा में मार करने वाले मिसाइल सिस्टम मौजूद हैं। रूस के एस 300 और एस 400, अमेरिका के पैट्रियट सिस्टम, इजराइल के आयरन डोम और डेविड स्लिंग तथा चीन के एचक्यू सीरीज जैसे सिस्टम इसी श्रेणी में आते हैं। इसके अलावा मैनपैड्स तकनीक भी कई देशों के पास है, जिससे छोटे और मोबाइल यूनिट्स भी बड़े लड़ाकू विमानों के लिए खतरा बन जाते हैं। कुल मिलाकर यह घटना दिखाती है कि आधुनिक युद्ध में उन्नत वायु रक्षा प्रणाली और सेंसर आधारित तकनीकें किसी भी अत्याधुनिक लड़ाकू विमान को भी गंभीर खतरे में डाल सकती हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह पूरी घटना केवल एक लड़ाकू विमान को मार गिराने या एक पायलट को बचाने की कहानी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युद्ध के बदलते स्वरूप की स्पष्ट झलक पेश करती है। एक ओर जहां उन्नत वायु रक्षा प्रणालियां दुनिया की सबसे ताकतवर वायु सेनाओं को चुनौती दे रही हैं, वहीं दूसरी ओर विशेष प्रशिक्षण, खुफिया रणनीति और त्वरित निर्णय क्षमता जीवन और मृत्यु के बीच फर्क तय कर रहे हैं। ईरान और अमेरिका के बीच यह टकराव यह भी दिखाता है कि आने वाले समय में युद्ध केवल हथियारों की ताकत से नहीं, बल्कि तकनीक, सूचना और रणनीतिक चतुराई के संतुलन से जीते जाएंगे। ऐसे में यह घटना वैश्विक सैन्य विशेषज्ञों के लिए एक महत्वपूर्ण अध्ययन बनकर उभरेगी और यह सवाल भी छोड़ेगी कि क्या भविष्य के युद्ध और भी अधिक जटिल और अप्रत्याशित होने वाले हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 06 Apr 2026 12:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/how-did-iran-shoot-down-the-american-fighter-plane-how-did-the-us-save-its-pilots</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[पश्चिम बंगाल में बढ़ती अराजकता लोकतंत्र के लिए चुनौती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/rising-anarchy-in-west-bengal-a-challenge-to-democracy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम बंगाल, जो कभी सांस्कृतिक चेतना, बौद्धिकता और राजनीतिक परिपक्वता का प्रतीक माना जाता था, आज एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहां लोकतांत्रिक मूल्यों की जड़ें लगातार कमजोर होती प्रतीत हो रही हैं। जैसे-जैसे चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे राज्य में हिंसा, अराजकता अलोकतांत्रिकता और राजनीतिक असहिष्णुता की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। यह केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का परिणाम नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति घटते सम्मान और कानून व्यवस्था की गिरती स्थिति का भी द्योतक है। हाल ही में मालदा जिले में मतदाता सूची पुनरीक्षण अर्थात एसएआर को लेकर जिस प्रकार का असंतोष और तनाव देखने को मिला, वह भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति अविश्वास को दर्शाता है। मतदाता सूची में नाम जुड़ना या हटना एक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसके लिए स्पष्ट नियम और प्रावधान होते हैं। यदि इस प्रक्रिया को राजनीतिक चश्मे से देखा जाएगा या प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव बनाया जाएगा, तो निष्पक्ष चुनाव की पूरी प्रक्रिया ही संदिग्ध हो जाएगी। एसएआर प्रक्रिया में बाधक बनते हुए जिसे तरह से न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे तक बंधक बनाए जाने की घटना सामने आयी है, वह न केवल चिंताजनक है बल्कि लोकतंत्र के लिये एक गंभीर चेतावनी भी है। यह उस व्यापक घातक एवं विडम्बनापूर्ण प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें प्रशासनिक और न्यायिक तंत्र को भी राजनीतिक दबाव और भीड़तंत्र के आगे झुकने के लिए मजबूर किया जा रहा है। विशेष रूप से यह तथ्य कि बंधक बनाए गए अधिकारियों में महिलाएं भी शामिल थीं, इस घटना को और अधिक गंभीर बना देता है। यह न केवल कानून के शासन पर प्रश्नचिह्न लगाता है, बल्कि समाज में बढ़ती असंवेदनशीलता को भी उजागर करता है।</div><div>पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का इतिहास नया नहीं है। 1960 और 70 के दशक में नक्सल आंदोलन के दौरान हिंसा का जो दौर शुरू हुआ था, उसने राज्य की राजनीतिक संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद वामपंथी शासन के लंबे कालखंड में भी राजनीतिक विरोधियों के प्रति असहिष्णुता और हिंसा की घटनाएं समय-समय पर सामने आती रहीं। सत्ता परिवर्तन के बाद तूणमूल कांग्रेस एवं ममता बनर्जी के शासन में यह प्रवृत्ति समाप्त नहीं हुई, बल्कि नए स्वरूप में सामने आई। यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या केवल किसी एक दल या विचारधारा की नहीं, बल्कि पूरे राजनीतिक तंत्र में व्याप्त एक गहरे संकट की है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में, चुनावों के निकट आते ही जिस प्रकार की घटनाएं सामने आ रही हैं, वे लोकतंत्र के लिए गंभीर खतरे का संकेत देती हैं। मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसे संवेदनशील कार्य में लगे अधिकारियों को बंधक बनाना यह दर्शाता है कि कुछ तत्व चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मतदाता की स्वतंत्रता और निष्पक्ष चुनाव के अधिकार पर सीधा हमला है।</div><div><br></div><div>इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की सक्रियता उल्लेखनीय है। समय-समय पर न्यायालय ने राज्य सरकार को कड़े निर्देश दिए हैं और कानून व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी की याद दिलाई है। किंतु यह भी एक चिंताजनक तथ्य है कि इन निर्देशों का जमीनी स्तर पर अपेक्षित प्रभाव नहीं दिखाई देता। इससे यह प्रश्न उठता है कि क्या राज्य प्रशासन एवं सत्तारूढ पार्टी इन निर्देशों को लागू करने में अक्षम है या इच्छुक नहीं है? यदि सर्वोच्च न्यायालय के आदेश भी प्रभावी नहीं हो पा रहे हैं, तो यह लोकतंत्र के लिए एक गंभीर चेतावनी है। चुनाव के समय बढ़ती अराजकता के पीछे राजनीतिक बौखलाहट भी एक महत्वपूर्ण कारण हो सकती है। जब किसी दल को अपनी लोकप्रियता में गिरावट का भय होता है, तो वह अक्सर लोकतांत्रिक मर्यादाओं को दरकिनार कर असंवैधानिक उपायों का सहारा लेने लगता है। पश्चिम बंगाल में भी कुछ ऐसी ही प्रवृत्तियां देखने को मिल रही हैं, जहां सत्तारूढ़ दल के कार्यकर्ताओं पर विपक्ष को डराने, प्रशासनिक कार्यों में बाधा डालने और चुनाव प्रक्रिया को प्रभावित करने के आरोप लगते रहे हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह स्थिति अत्यंत चिंताजनक है और लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों के विपरीत है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/will-mamata-once-again-emerge-victorious-in-the-west-bengal-assembly-elections" target="_blank">क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी?</a></h3><div>नागरिक समाज सक्रिय रूप से लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे नहीं आएगा, तब तक केवल प्रशासनिक उपायों से इस समस्या का समाधान संभव नहीं है। लोकतंत्र केवल चुनावों तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह एक सतत प्रक्रिया है जिसमें कानून का शासन, संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों की भागीदारी महत्वपूर्ण होती है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति इन सभी पहलुओं पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है। यदि चुनाव प्रक्रिया ही निष्पक्ष और शांतिपूर्ण नहीं रह जाती, तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है। लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति मतदाता का विश्वास होता है, और यदि मतदाता को यह लगने लगे कि मतदाता सूची, चुनाव प्रक्रिया या प्रशासन किसी राजनीतिक दबाव में काम कर रहा है, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता स्वतः कमजोर होने लगती है। इस पूरे घटनाक्रम में प्रशासनिक नाकामी का प्रश्न भी गंभीरता से सामने आता है। किसी भी राज्य में यदि अधिकारी सुरक्षित नहीं हैं, न्यायिक अधिकारी तक बंधक बना लिए जाते हैं और पुलिस या प्रशासन समय पर प्रभावी कार्रवाई नहीं कर पाता, तो यह प्रशासनिक तंत्र की कमजोरी का स्पष्ट प्रमाण है। प्रशासन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी कानून व्यवस्था बनाए रखना और सरकारी कार्यों को निर्भय वातावरण में संपन्न कराना होता है। यदि प्रशासन यह सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है, तो इससे जनता में भय और अविश्वास दोनों बढ़ते हैं। जनता का विश्वास ही किसी सरकार की सबसे बड़ी पूंजी होता है, और जब यही विश्वास डगमगाने लगता है, तो शासन की वैधता पर भी प्रश्नचिह्न लगने लगते हैं।</div><div><br></div><div>राजनीतिक दलों की भूमिका भी इस पूरे परिदृश्य में अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में राजनीतिक दल केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों के संवाहक भी होते हैं। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को संयम, कानून के सम्मान और लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करने के लिए प्रेरित करें। लेकिन जब राजनीतिक प्रतिस्पर्धा कटु संघर्ष में बदल जाती है और कार्यकर्ताओं को किसी भी तरह से राजनीतिक लाभ प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, तो अराजकता की स्थिति उत्पन्न होती है। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक दल चुनाव को युद्ध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक उत्सव के रूप में देखें। आज आवश्यकता इस बात की है कि पश्चिम बंगाल की घटनाओं को केवल एक राज्य की समस्या न मानकर लोकतंत्र के लिए चेतावनी के रूप में देखा जाए। यदि प्रशासनिक तंत्र कमजोर होगा, राजनीतिक दल मर्यादा नहीं रखेंगे, और जनता का विश्वास कम होता जाएगा, तो लोकतंत्र केवल कागजों तक सीमित रह जाएगा। लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान या न्यायालय नहीं कर सकते, इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक निष्पक्षता और जनता की जागरूकताकृतीनों का संतुलन आवश्यक है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान परिस्थितियां हमें यही संदेश देती हैं कि लोकतंत्र को केवल चुनाव से नहीं, बल्कि व्यवस्था की निष्पक्षता, कानून के शासन और नागरिक विश्वास से मजबूत बनाया जा सकता है।</div><div><br></div><div>इस परिप्रेक्ष्य में आवश्यक है कि राज्य सरकार, चुनाव आयोग और न्यायपालिका मिलकर ठोस कदम उठाएं। कानून व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए, दोषियों के खिलाफ त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई हो और प्रशासनिक तंत्र को राजनीतिक दबाव से मुक्त रखा जाए। इसके साथ ही राजनीतिक दलों को भी आत्ममंथन करना होगा और यह सुनिश्चित करना होगा कि उनके कार्यकर्ता लोकतांत्रिक मर्यादाओं का पालन करें। निश्चित ही यह समझना होगा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संस्थाओं की जिम्मेदारी नहीं है, बल्कि प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है। पश्चिम बंगाल की वर्तमान स्थिति एक चेतावनी है कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो यह अराजकता और गहराई तक फैल सकती है। लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है कि हम सभी मिलकर कानून, नैतिकता और सहिष्णुता के मूल्यों को पुनः स्थापित करें। पश्चिम बंगाल आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां से वह या तो लोकतांत्रिक पुनर्जागरण की ओर बढ़ सकता है या अराजकता के गहरे गर्त में गिर सकता है। यह निर्णय न केवल राजनीतिक नेतृत्व, बल्कि पूरे समाज को मिलकर लेना होगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 15:14:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/rising-anarchy-in-west-bengal-a-challenge-to-democracy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Annamalai को किनारे कर BJP ने कोई सियासी चाल चली है या पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/by-sidelining-annamalai-has-the-bjp-played-a-political-ploy-or-shot-itself-in-the-foot]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>तमिलनाडु की सियासत में इस समय जो उबाल दिख रहा है, उसने राष्ट्रीय राजनीति तक हलचल मचा दी है। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष के. अन्नामलाई को विधानसभा चुनाव की सूची से बाहर रखे जाने ने न केवल पार्टी के अंदर बल्कि पूरे राजनीतिक गलियारे में तीखी बहस छेड़ दी है। सवाल यह नहीं है कि उन्हें टिकट क्यों नहीं मिला, बल्कि यह है कि क्या उन्हें सुनियोजित तरीके से किनारे किया गया है?</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि शुक्रवार को नई दिल्ली से जारी उम्मीदवारों की सूची में 27 नाम शामिल थे, लेकिन अन्नामलाई का नाम गायब रहा। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष नैनार नागेंद्रन ने इसे सीधे तौर पर शीर्ष नेतृत्व का फैसला बताया तो वहीं केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने संकेत दिया कि अन्नामलाई को व्यापक रणनीति के तहत पूरे तमिलनाडु में प्रचार की जिम्मेदारी दी गई है, न कि किसी एक सीट तक सीमित रखा गया है। लेकिन इस एक वाक्य ने जवाब देने की बजाय कई सवाल खड़े कर दिये।</div><div><br></div><div>साथ ही अन्नामलाई को लेकर सियासी हलचल उस वक्त और तेज हो गई जब उन्हें केरल के कन्नूर में चल रहे प्रचार अभियान के बीच अचानक चेन्नई लौटने का निर्देश दिया गया, जहां आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उनकी अहम बैठक तय की गयी थी। प्रधानमंत्री के साथ अन्नामलाई की बैठक के बाद इस तरह के संकेत मिले हैं कि पार्टी उन्हें पर्दे के पीछे एक बड़े चुनावी चेहरे के रूप में इस्तेमाल करने की तैयारी में है, खासकर तब जब गठबंधन के तहत भाजपा को 27 सीटों पर ही चुनाव लड़ना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/tamil-nadu-bjp-releases-first-list-annamalai-name-missing-did-coalition-politics-become-a-hurdle" target="_blank">Tamil Nadu Elections 2026 | BJP की पहली सूची जारी, अन्नामलाई का नाम गायब, क्या गठबंधन की राजनीति बनी रोड़ा | Explained</a></h3><div>हम आपको बता दें कि अन्नामलाई ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी कड़ी मेहनत से पार्टी को तमिलनाडु में जमीन से उठाकर चर्चा के केंद्र में ला खड़ा किया। खास बात यह है कि उनके प्रशंसक और समर्थक सिर्फ तमिलनाडु में ही नहीं बल्कि देशभर में हैं और उनको एक प्रतिभाशाली नेतृत्व के रूप में देखते हैं। इसलिए अन्नामलाई को उम्मीदवारी नहीं मिलने पर हर कोई हैरान है।</div><div><br></div><div>हालांकि तमाम तरह की चर्चाओं पर विराम लगाते हुए खुद अन्नामलाई ने दावा किया है कि उन्होंने चुनाव नहीं लड़ने का फैसला पहले ही पार्टी को लिखित रूप में दे दिया था। उन्होंने कहा है कि वह पूरे राज्य में एनडीए के उम्मीदवारों के लिए प्रचार करना चाहते हैं, न कि किसी एक सीट तक सीमित रहना चाहते हैं। लेकिन राजनीति के जानकार इस बयान को पूरी सच्चाई मानने को तैयार नहीं हैं। अंदरखाने की खबरें कुछ और ही कहानी बयां कर रही हैं।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि असल खेल गठबंधन का है। एक साल पहले ही अन्नामलाई को प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया था और यह कदम सीधे तौर पर अन्नाद्रमुक के साथ रिश्ते सुधारने की रणनीति से जोड़ा गया। अन्नाद्रमुक प्रमुख एडप्पडी के. पलानीस्वामी की शर्त साफ थी कि जब तक अन्नामलाई किनारे नहीं होंगे, गठबंधन संभव नहीं है। ऐसे में पार्टी ने अपने सबसे आक्रामक चेहरे को ही पीछे कर दिया।</div><div><br></div><div>अब समीकरण देखिए। अन्नाद्रमुक को एक सौ अठहत्तर सीटें, भाजपा को सत्ताइस और अन्य सहयोगियों को बाकी सीटें दी गईं। यह बंटवारा साफ संकेत देता है कि भाजपा ने तमिलनाडु में अपने विस्तार की रणनीति को फिलहाल गठबंधन के दबाव में ढाल दिया है। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। जातीय समीकरण भी इस पूरे घटनाक्रम में अहम भूमिका निभा रहे हैं। अन्नामलाई और पलानीस्वामी दोनों एक ही समुदाय से आते हैं। इस समुदाय का प्रभाव पश्चिमी तमिलनाडु में मजबूत है और यही क्षेत्र चुनावी दृष्टि से निर्णायक माना जाता है। अन्नामलाई का तेजी से उभरना अन्नाद्रमुक के लिए सीधी चुनौती बन गया था। ऐसे में उन्हें सीमित करना राजनीतिक मजबूरी बन गया।</div><div><br></div><div>इसके चलते पिछले एक साल में अन्नामलाई की भूमिका लगातार कम होती गई। उन्हें पहले प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाया गया, फिर चुनाव प्रबंधन समिति से बाहर रखा गया और अंततः उन्हें सिर्फ छह सीटों की जिम्मेदारी दी गई। यह किसी भी बड़े नेता के लिए स्पष्ट संकेत होता है कि उसकी पकड़ कमजोर की जा रही है।</div><div><br></div><div>अन्नामलाई संकेतों को समझ गये थे इसलिए फरवरी 2026 में उन्होंने छह सीटों की जिम्मेदारी से भी खुद को अलग कर लिया और इसके लिए वजह बताई पिता की तबीयत। लेकिन अंदर की खबर यह थी कि उन्हें इतने सीमित दायरे में बांधे जाने से नाराजगी थी। विधानसभा चुनाव में उनके करीबी नेताओं को भी टिकट नहीं दिया गया, जिससे यह संदेश और मजबूत हुआ कि यह सिर्फ एक व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे गुट को किनारे करने की रणनीति है।</div><div><br></div><div>अब जरा अन्नामलाई के राजनीतिक सफर पर नजर डालिए। उन्होंने अपने कार्यकाल में जिस तरह आक्रामक राजनीति की, उसने उन्हें युवा मतदाताओं के बीच बेहद लोकप्रिय बना दिया। चाहे द्रविड दलों पर तीखे हमले हों, या भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ जारी की गई फाइलें, उन्होंने हर मुद्दे को आक्रामक अंदाज में उठाया। उन्होंने राज्यभर में यात्रा कर कार्यकर्ताओं को जोड़ा, बड़े जनसमूह जुटाए और पार्टी का वोट प्रतिशत भी बढ़ाया। हालांकि लोकसभा चुनाव में सीटें नहीं मिलीं, लेकिन वोट प्रतिशत में बढ़ोतरी ने यह दिखाया कि जमीन पर बदलाव हो रहा है।</div><div><br></div><div>यही वजह है कि उनका अचानक हाशिए पर जाना कई लोगों को पच नहीं रहा। पार्टी के अंदर भी दो राय साफ दिख रही है। एक धड़ा मानता है कि यह दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा है, जबकि दूसरा मानता है कि इससे कार्यकर्ताओं का उत्साह प्रभावित हो सकता है। अब सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अन्नामलाई की गैरमौजूदगी चुनावी नतीजों को प्रभावित करेगी? वह भी तब जब खुद पार्टी के कई नेता मानते हैं कि उनकी रैलियों में भारी भीड़ जुटती है और युवाओं में उनकी मजबूत पकड़ है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, अन्नामलाई ने भले ही खुद को एक कार्यकर्ता बताते हुए सभी उम्मीदवारों के लिए प्रचार करने का ऐलान किया हो, लेकिन सियासत में प्रतीकात्मक संदेश भी उतना ही मायने रखता है जितना वास्तविक कदम। उनको टिकट नहीं मिलना विपक्ष को हमला करने का मौका दे चुका है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और गरमाने वाला है। देखा जाये तो तमिलनाडु का चुनाव अब सिर्फ सीटों का खेल नहीं रह गया है। यह नेतृत्व, अहंकार, रणनीति और संतुलन की लड़ाई बन चुका है। और इस लड़ाई के केंद्र में खड़े हैं अन्नामलाई, जो भले ही चुनाव मैदान में नहीं हैं, लेकिन पूरी राजनीति उनके इर्द गिर्द घूमती नजर आ रही है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

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      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 12:18:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/by-sidelining-annamalai-has-the-bjp-played-a-political-ploy-or-shot-itself-in-the-foot</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/will-mamata-once-again-emerge-victorious-in-the-west-bengal-assembly-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भागलपुर मूल के दिल्लीवासी नेता और तृणमूल कांग्रेस के तेजतर्रार सांसद कीर्ति झा आजाद ने पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के संदर्भ में एक बड़ा संकेत दिया और शांडिल्य गोत्रीय ब्राह्मण मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तारीफ करते हुए भविष्यवाणी की कि राज्य विधानसभा चुनाव में टीएमसी 250 सीटें जीतेगी और 2029 में ममता बनर्जी भारत की प्रधानमंत्री बनेंगी। यदि ऐसी राजनीतिक परिस्थिति बनती है तो पूर्वी भारत की सियासत के लिए यह शुभ घड़ी होगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसा इसलिए कि बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु पारस्परिक दांवपेंचों की वजह से देश का प्रधानमंत्री नहीं बन पाए थे। जहां सूझबूझ वाले दूरदर्शी नेता ज्योति बसु ने कांटे के ताज पीएम पद की पेशकश को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया था, वहीं लालू प्रसाद के सपनों का शिकार उत्तरप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पूर्व प्रधानमंत्री द्वय देवगौड़ा और गुजराल जैसे जनाधार विहीन नेताओं को आगे करके करवा दिया।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/why-is-no-action-being-taken-against-officials-responsible-for-electoral-jungle-raj-in-bengal" target="_blank">आखिर पश्चिम बंगाल में 'चुनावी जंगलराज' के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई क्यों नहीं?</a></h3><div>यूँ तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उड़ीसा के पूर्व मुख्यमंत्री नवीन पटनायक भी सियासी बिल्ली के भाग्य से पीएम पद रूपीं छींके टूटने का इंतजार करते रह गए, लेकिन नीयत और नीति में खोंट की वजह से गच्चा खाते रहे, जबकि उम्मीद अभी भी बाकी है! अब तो कई राजनेता मुंगेरी लाल के हसीन सपने देखते रहने के आदी बन चुके हैं, जबकि किस्मत ने साथ दिया तो राजद नेता और पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव और लोजपा रामविलास नेता व केंद्रीय कैबिनेट मंत्री चिराग पासवान भी आगे इस रेस के घोड़े बन सकते हैं। सबके दिल्ली के साथ साथ कोलकाता, रांची, भुवनेश्वर से समझदारी भरे रिश्ते हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>राजनीतिक विश्लेषक बताते हैं कि षड्यंत्रकारी यूजीसी बिल से सवर्णों का विश्वास भाजपा से डिगा है और ममता बनर्जी को ब्राह्मण होने का पहली बार लाभ पश्चिम बंगाल में मिलने वाला है। वहीं, उनके जुझारू तेवर के मद्देनजर पूरे देश के सवर्ण उनपर फिदा होने को तैयार बैठे हैं। यही वजह है कि बंगाल में 250 सीटों को पार करने का उनके समर्थकों का दावा बेबुनियाद नहीं है। कांग्रेस के पूरे जनाधार को आज बंगाल में वही सहेजे हुए हैं। शायद इसलिए ही कीर्ति आजाद का मानना है कि टीएमसी (TMC) की सीटें लगातार बढ़ रही हैं—2011, 2016, 2021 में वृद्धि हुई और लोकसभा 2024 में भी 6 अतिरिक्त सीटें मिलीं। कोई एंटी-इनकंबेंसी नहीं है, बंगाल में विकास, अस्मिता और अलग संस्कृति की लड़ाई है।</div><div><br></div><div>उनके शब्दों में ममता को प्रधानमंत्री बनाने का कारण स्पष्ट है। आज उनके कद का कोई क्षेत्रीय नेता नहीं है। उन्होंने ममता को सबसे ताकतवर नेता बताया जो लगातार बीजेपी की खतरनाक राजनीतिक चालों से टक्कर ले रही हैं, और आने वाले समय में और मजबूत होंगी। राजनीतिक विश्लेषक भी मानते हैं कि ममता से बेहतर कोई चेहरा नहीं, खासकर इंडिया गठबंधन में उनकी भूमिका मजबूत होगी। चूंकि ये बयान 2026 बंगाल चुनाव प्रचार के दौरान आए, जहां उन्होंने बीजेपी, मोदी-शाह पर हमले किए और टीएमसी की योजनाओं (जैसे कन्याश्री, मनरेगा फंडिंग) की सराहना की।</div><div><br></div><div>आपको पता होना चाहिए कि ममता बनर्जी का बंगाल मॉडल महिलाओं, युवाओं, स्वास्थ्य, शिक्षा और गरीबों के कल्याण पर केंद्रित है, जो टीएमसी सरकार की प्रमुख जनकल्याणकारी योजनाओं से जाना जाता है। ये योजनाएं जीवन के विभिन्न चरणों को कवर करती हैं। जहां तक महिलाओं की योजनाएं की बात है तो लक्ष्मी भंडार योजना के तहत सामान्य महिलाओं को 1500 रुपये मासिक और SC/ST महिलाओं को 1700 रुपये मिलते हैं। जबकि रूपश्री में विवाह के लिए 25,000 रुपये सहायता दी जाती है, जिससे 22 लाख से अधिक महिलाओं को लाभ हुआ। कन्याश्री लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देती है।</div><div><br></div><div>वहीं, यदि युवाओं और बेरोजगारों के लिए बात की जाए तो बांग्ला युवा साथी (युवा साथी) योजना में 21-40 वर्ष के बेरोजगार युवाओं को 1500 रुपये मासिक भत्ता मिलता है। जबकि श्रमश्री प्रवासी मजदूरों को नई नौकरी तक 5000 रुपये सहायता देती है। वहीं, स्वास्थ्य और अन्य कल्याण कारी योजनाओं में स्वास्थ्य साथी स्वास्थ्य बीमा योजना चिकित्सा सुविधा प्रदान करती है। दुआरे चिकित्सा द्वार-द्वार स्वास्थ्य शिविर चलाती है। समावयती अंतिम संस्कार सहायता देती है, हर घर में पाइप पानी और पक्का घर सुनिश्चित करने वाली योजनाएं भी शामिल हैं।</div><div><br></div><div>चूंकि ममता बनर्जी को पश्चिम बंगाल में 'जमीन से जुड़ी' नेता माना जाता है क्योंकि उन्होंने सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण आंदोलनों के जरिए किसानों और आम जनता के हितों की रक्षा की, जो उनकी छवि को मजबूत बनाता है। हालांकि, सवर्णों (जैसे ब्राह्मण) का उन्हें 'पूरा सपोर्ट' मिलना एक अतिशयोक्ति है, क्योंकि उनकी राजनीति मुख्य रूप से मुस्लिम (लगभग 30%) और दलित/ओबीसी वोटबैंक पर निर्भर है।&nbsp;</div><div><br></div><div>लेकिन यूजीसी बिल विवाद से सवर्णों में उनकी पैठ लगातार बढ़ रही है।पूरे देश के सवर्ण कार्यकर्ता गोपनीय तौर पर बंगाल पहुंच रहे हैं और ममता की मदद करके सवर्ण विरोधियों को सही सबक सिखाना चाहते हैं, ताकि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा की ओबीसी राजनीति हतोत्साहित हो सके। सबकुछ भीतर ही भीतर किया जा रहा है, ताकि ममता बनर्जी का पुराना वोट बैंक प्रभावित न हो।</div><div><br></div><div>ममता बनर्जी जमीन से जुड़ाव रखने वाली नेता हैं। ममता बनर्जी ने 2006-07 के सिंगूर (टाटा नैनो प्रोजेक्ट) और नंदीग्राम आंदोलनों में किसानों की जमीन बचाने के लिए आंदोलन किया, जिससे वामपंथी सरकार गिरी। यह उनके 'आम आदमी की नेता' वाली इमेज का आधार बना, जहां वे गरीबों, किसानों और दबे-कुचले वर्गों की आवाज बनीं।</div><div><br></div><div>टीएमसी की कल्याणकारी योजनाएं जैसे लक्ष्मीर भांडार ने ग्रामीण और एससी/एसटी वोटरों को बांधा। वहीं, सवर्ण समर्थन की हकीकत यह है कि सवर्ण (ब्राह्मण, बंगाली बाबू) टीएमसी को सीमित समर्थन देते हैं, लेकिन 'पूरा' नहीं—क्योंकि ममता पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप लगते हैं (जैसे वक्फ कानून, एसआईआर विरोध)। फिर भी उन्होंने ब्राह्मण सम्मेलन आयोजित किए, पुजारियों को पेंशन/आवास दिए और खुद को 'ब्राह्मण की बेटी' कहा ताकि सॉफ्ट हिंदुत्व दिखाएं और बीजेपी का हिंदू वोट काटें।</div><div><br></div><div>जानकार बताते हैं कि यूजीसी बिल विवाद के बाद उन्होंने सवर्णों को रिझाने के लिए अपने खास लोगों को लगा दिया है। फिर भी, अपर मिडिल क्लास/सवर्णों में कुछ कुछ असंतोष है जो शासन की खराबी पर है, और इसलिए भी 2026 चुनावों में जातिगत ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। सवाल मुखर है कि क्या पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में टीएमसी की जमीनी रणनीति से ममता बनर्जी पुनः मारेंगी बाजी?</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 04 Apr 2026 11:44:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/will-mamata-once-again-emerge-victorious-in-the-west-bengal-assembly-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[माओवाद का खात्मा और साय सरकार की पुनर्वास नीति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-eradication-of-maoism-and-the-sai-government-rehabilitation-policy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कभी देश के एक तिहाई हिस्से पर अपनी समानांतर सरकार चलाने वाली माओवादी विचारधारा का क्या आज अंत हो जाएगा? यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हो चुका है, क्योंकि नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने आज ही के दिन को माओवादी आतंकवाद का आखिरी दिन घोषित कर रखा है। ठीक एक हफ्ते पहले यानी 25 मार्च को बस्तर के मुख्यालय जगदलपुर में शीर्ष माओवादी नेता पापा राव के नेतृत्व में 18 माओवादियों ने आत्मसमर्पण किया, तब कहा गया कि राव आखिरी महत्वपूर्ण नक्सली कमांडर हैं और उन्होंने भी हथियार सौंप दिए हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>2014 के आम चुनावों में बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में माओवाद पर लगाम का वादा किया था। तब झीरम घाटी कांड की याद ताजा थी, छत्तीसगढ़ कांग्रेस का तकरीबन समूचे शीर्ष नेतृत्व को माओवादियों ने घेरकर मार डाला था। वैसे खुद नक्सली भी मानते रहे हैं कि उनके लिए कांग्रेस और बीजेपी सरकारों में खास अंतर नहीं रहा। अलबत्ता कांग्रेस सरकार माओवादी हिंसा के खिलाफ सख्त कदम उठाने से बचती रही हैं, जिस तरह बीजेपी की अगुआई वाली सरकारें उठाती रही हैं। बस्तर में छह अप्रैल 2010 को बारूदी सुरंगों के जरिए केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को उड़ाने के बाद नक्सलियों के खिलाफ राष्ट्रव्यापी गुस्सा था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने माओवादियों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई का मन बना लिया था, लेकिन सिविल सोसायटी के दबाव में यह विचार उसे छोड़ना पड़ा। लेकिन बीजेपी ने माओवादियों को कोई रियायत नहीं दी। 2019 में गृहमंत्रालय की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने खुलेआम नक्सलियों को चेतावनी देनी शुरू कर दी कि या तो वे हथियार डालें या फिर गोली खाने के लिए तैयार रहें। इसके साथ ही उन्होंने 31 मार्च 2026 तक माओवादी हिंसा से देश को मुक्त करने का ऐलान कर दिया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-end-of-naxalism-a-national-problem-through-resolve" target="_blank">संकल्प के साथ राष्ट्रीय समस्या नक्सलवाद का अंत</a></h3><div>जिस तरह शीर्ष नक्सली कमांडर या तो मारे गए हैं या फिर उन्होंने हथियार डाले हैं, उससे लगता है कि बीजेपी सरकार का अपना वादा पूरा करने जा रही है। माओवादी विचारधारा के प्रभाव में घर-परिवार, सुख-चैन छोड़कर जंगलों की खाक छानने और सत्ता से जूझने वाले माओवादी युवाओं को मुख्यधारा में लाने में सिर्फ केंद्रीय सुरक्षा बलों की गोलियों का दबाव ही काम नहीं आया, बल्कि इसमें राज्यों की पुनर्वास योजनाओं का भी बड़ा योगदान रहा है। छत्तीसगढ़ ने 2025-26 की अपनी पुनर्वास नीति में हिंसा छोड़ने वाले नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़ने के लिए कई कदम उठाए, जिनमें उसका 'पूना मारगेम' अभियान प्रमुख रहा। इन शब्दों का अर्थ है 'नया रास्ता’। इसके तहत दंडकारण्य क्षेत्र के सैकड़ों माओवादी कैडरों को मुख्यधारा में वापस लाने की सफल कोशिश हुई। इसके तहत नक्सलियों की वापसी के बाद उन्हें नई जिंदगी शुरू करने के लिए तत्काल डेढ़ लाख रूपए तक की आर्थिक सहायता दी गई, साथ ही उन्हें तीन साल के लिए मासिक वजीफा और व्यावसायिक प्रशिक्षण दिया जाना शुरू हुआ। मकसद यह रहा कि हथियार छोड़ने के बाद मुख्यधारा में लौटे माओवादी आत्मनिर्भर जिंदगी बिता सकें। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार ने हथियार सौंपने वाले माओवादियों को अलग से प्रोत्साहन राशि देने की भी व्यवस्था की। इससे राज्य में माओवादियों के समर्पण में तेजी आई। हथियार छोड़ने वाले माओवादियों के बच्चों की शिक्षा का इंतजाम किया गया, इसके साथ ही उन्हें सुरक्षित आवास भी मुहैया कराए गए। इसके साथ ही उन्हें वापसी के बाद भयमुक्त जीवन गुजारने के लिए परिवार की सुरक्षा की गारंटी भी दी गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी तरह झारकंड सरकार ने भी माओवादियों को समर्पण के लिए प्रोत्साहित करने के लिए 'आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति' बनाई। जिसके तहत समर्पण के बाद माओवादियों को आर्थिक सहायता दी जाती है। उनके कौशल विकास के कार्यक्रम चलाए जाते हैं और उन्हें रोजगार के साथ ही आवास की व्यवस्था की जाती है। साथ ही उन्हें और उनके परिवार को सुरक्षा की गारंटी दी जाती है। झारखंड की इस नीति का उद्देश्य समर्पित नक्सलियों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए आत्मनिर्भर बनाना है। इसके तहत हथियार जमा करने पर पूर्व नक्सलियों को प्रोत्साहन राशि, उन्हें तत्काल पुनर्वास अनुदान और घरेलू सामान के लिए नकद सहायता दी जाती है। साथ ही उनको कौशल प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि वे भविष्य में अपना रोजगार कर सकें। इसके साथ ही उनके बच्चों को मुफ्त शिक्षा व छात्रवृत्ति की सुविधा भी दी जाती है। उन्हें आवास के लिए भूमि या प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घर भी दिए जाते हैं। इसी तरह मुख्यधारा में लौटे नक्सलियों को खेती के लिए प्राथमिकता के आधार पर सोलर पंप और बिजली कनेक्शन भी देने का इंतजाम है। पूर्व नक्सलियों पर चल रहे छोटे मामलों को झारखंड सरकार जहां वापस ले रही है, वहीं गंभीर मामलों में कानूनी सहायता मुहैया करा रही है। कुछ ऐसे ही इंतजाम पश्चिम बंगाल, तेलंगाना, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में किए गए हैं।</div><div><br></div><div>कभी माओवादियों के डर से बस्तर में सड़कें तक बनाना संभव नहीं था, बिजली पहुंचाना भी कठिन था। झारखंड के भी दूरदराज के इलाके में ऐसा ही हाल था। लेकिन केंद्र सरकार की शह पर राज्य सरकार ने नक्सली हिंसा प्रभावित क्षेत्र में भी सड़क, स्कूल और अस्पतालों का निर्माण कराने में तेजी आई। बस्तर के कुछ इलाके में रेलवे लाइन भी पहुंच गई है। नक्सली इलाके में सड़कें भी बेहतर हो गई हैं। इन कदमों से माओवादी प्रभाव में रहने वाले इलाकों में भरोसा बहाली में मदद मिली। सरकारी योजनाओं के साथ ही सरकार के प्रति भी स्थानीय लोगों का रवैया बदला।</div><div><br></div><div>कभी पशुपति से तिरुपति यानी नेपाल से आंध्र तक का जंगली इलाका लाल गलियारे के रूप में विख्यात था। यहां सुरक्षा बलों के लिए भी घुसना आसान नहीं था। इसमें देश के तकरीबन एक तिहाई जिले आते थे। इन जिलों में माओवादी वैचारिकी के असर वाले हथियारबंद दस्तों की सत्ता चलती थी। माओवादी स्कूलों, रेलवे लाइनों, पुलिस थानों, डाकघरों को निशाना बनाते थे। साथ ही वे इलाके की जनता को यह समझाने में कामयाब रहे थे कि मौजूदा व्यवस्था और तंत्र सिर्फ और सिर्फ उनका शोषण ही कर रहा है। चूंकि विकास की धारा इन इलाकों में माओवादी हथियारबंद दस्तों के अवरोध के चलते बह नहीं पा रही थी, इसलिए अविश्वास का माहौल बढ़ता रहा। लेकिन मोदी सरकार ने सत्ता संभालते ही एक तरफ माओवादियों को उन्हीं की तर्ज में गोली का जवाब गोली से देना शुरू किया, वहीं दूसरी तरफ उनके पुनर्वास के साथ ही नक्सल प्रभावित इलाकों में विकास की धारा को भी बहाने की कोशिश तेज की। माओवादी कहते रहे हैं कि सत्ता की राह बंदूक की गोली से निकलती है, बारूद से निकलती है, मोदी सरकार ने कुछ उसी अंदाज में माओवादी सत्ता की राह को बंदूक और बारूद से रोका, लेकिन दूसरी तरफ पुनर्वास अभियान भी जारी रखा। इसमें राज्यों की भूमिका खास रही। चूंकि छत्तीसगढ़ और झारखंड नक्सली हिंसा से सबसे ज्यादा प्रभावित रहे हैं, इसलिए दोनों राज्यों ने इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जिसका नतीजा सामने है।</div><div><br></div><div>कभी पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी से शुरू हिंसक और माओवादी विचारधारा का असर देश के एक तिहाई हिस्से पर रहा। लेकिन अब यह विचारधारा और उसके हथियारबंद अनुयायी निस्तेज नजर आ रहे हैं। कह सकते हैं कि वामपंथ की तरह माओवादी विचारधारा भी भारत में कुंद हो गई। नक्सली हिंसा पर लगाम इस लगाम का ही प्रतीक है। वैसे यह भी सच है कि विचारधाराएं कभी नहीं मरतीं, एक विचारधारा के रूप में वह माओवाद भी जिंदा रह सकता है। लेकिन अब उसके उस तरह प्रतिबद्ध अनुयायी नहीं होंगे, उनकी गोलियों की आवाज और धमक भी नहीं होगी। अगर यह विचारधारा लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोकतांत्रिक तरीके से आगे बढ़े तो शायद ही किसी को एतराज होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि अगर यह विचारधारा जिंदा भी बचती है तो वह लोकतांत्रिक ढंग से आगे बढ़ेगी, हथियारों के दम पर नहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>-उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 03 Apr 2026 12:31:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-eradication-of-maoism-and-the-sai-government-rehabilitation-policy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[बुजुर्गों के भरण-पोषण के लिये एक सराहनीय पहल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/a-commendable-initiative-for-the-maintenance-of-the-elderly]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय संस्कृति में माता-पिता को देवतुल्य माना गया है- “मातृदेवो भव, पितृदेवो भव” केवल शास्त्रों की पंक्ति नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संरचना की आत्मा रही है। इसलिए यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि जन्म देने और पालन-पोषण करने वाले माता-पिता को जीवन की सांझ में उपेक्षा, अपमान और आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़े, और उन्हें अपने ही बच्चों से गुजारा भत्ता पाने के लिए कानून और प्रशासन का सहारा लेना पड़े। दुर्भाग्य से यह आज के समय की कठोर वास्तविकता बनती जा रही है। बुढ़ापा अपने आप में एक बड़ी चुनौती है। उम्र बढ़ने के साथ शरीर की क्षमताएं कम होने लगती हैं, बीमारियां बढ़ने लगती हैं और आय के स्रोत लगभग समाप्त हो जाते हैं। सेवानिवृत्ति के समय जो थोड़ी बहुत जमा-पूंजी होती है, वह बच्चों की पढ़ाई, शादी-ब्याह और मकान बनाने में खर्च हो जाती है। सरकारी नौकरी करने वालों को पेंशन मिल भी जाती है, लेकिन निजी क्षेत्र या छोटे व्यवसाय से जुड़े लोगों की स्थिति अधिक कठिन हो जाती है। ऐसे समय में यदि बच्चे ही माता-पिता की देखभाल न करें तो यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है।</div><div>&nbsp;</div><div>इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए तेलंगाना विधानसभा द्वारा पारित “तेलंगाना कर्मचारी जवाबदेही और माता-पिता सहायता निगरानी विधेयक 2026” एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया है। इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो उनके वेतन से एक निश्चित राशि काटकर माता-पिता को दी जाए। यह कानून सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों, सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होगा। इस प्रकार यह कानून केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप देने का प्रयास है। हालांकि भारत में पहले से “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007” मौजूद है, लेकिन तेलंगाना का यह नया विधेयक अधिक व्यापक, संवेदनात्मक और प्रभावी माना जा रहा है। इसमें प्रावधान है कि यदि बच्चे माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो शिकायत मिलने पर उनके वेतन से पंद्रह प्रतिशत या दस हजार रुपये (जो भी कम हो) काटकर माता-पिता के खाते में जमा किए जाएंगे। शिकायत का निस्तारण जिला कलेक्टर द्वारा साठ दिनों के भीतर किया जाएगा और इसके लिए वरिष्ठ नागरिक आयोग का गठन भी किया जाएगा। इस कानून का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि इसमें केवल जैविक माता-पिता ही नहीं, बल्कि सौतेले माता-पिता भी शिकायत कर सकते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/revanth-reddy-became-revanthuddin-shehzad-poonawalla-attack-on-telangana-government-over-eid-gift" target="_blank">रेवंत रेड्डी बने रेवंतुद्दीन..., Eid Gift पर shehzad poonawalla का Telangana सरकार पर तीखा हमला</a></h3><div>यह कानून इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भारतीय परिवार व्यवस्था तेजी से बदल रही है। संयुक्त परिवार टूटकर एकल परिवार में बदल चुके हैं और अब तो एक व्यक्ति परिवार की अवधारणा भी विकसित हो रही है। करियर की दौड़, आर्थिक दबाव, शहरी जीवनशैली, सुविधावाद और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती भावना ने परिवार की पारंपरिक संरचना को कमजोर किया है। कई बार माता-पिता को घर से निकालकर वृद्धाश्रम भेज दिया जाता है, और यदि घर में रख भी लिया जाए तो उन्हें उपेक्षा, तिरस्कार और मानसिक पीड़ा सहनी पड़ती है। उनकी दवाइयों, भोजन और देखभाल तक में लापरवाही बरती जाती है। ऐसी परिस्थितियों में यह प्रश्न उठता है कि क्या माता-पिता की सेवा केवल संस्कारों से सुनिश्चित की जा सकती है या इसके लिए कानून की भी आवश्यकता है? आदर्श स्थिति में तो संस्कार ही पर्याप्त होने चाहिए। भारतीय इतिहास और परंपरा में माता-पिता की सेवा के अनेक प्रेरक उदाहरण मिलते हैं। श्रवण कुमार का उदाहरण तो भारतीय संस्कृति में आदर्श पुत्र का प्रतीक बन चुका है, जिसने अपने अंधे माता-पिता को कंधे पर बैठाकर तीर्थ यात्रा करवाई। इसी प्रकार भगवान श्रीराम ने पिता के वचन को निभाने के लिए राजपाट छोड़कर वनवास स्वीकार किया। यह केवल धार्मिक कथाएं नहीं, बल्कि भारतीय समाज की नैतिक संरचना के आदर्श हैं।</div><br><div>इतिहास में छत्रपति शिवाजी, महात्मा गांधी, स्वामी विवेकानंद जैसे अनेक व्यक्तित्वों के जीवन में भी माता-पिता के प्रति गहरी श्रद्धा और सम्मान देखने को मिलता है। इससे स्पष्ट होता है कि माता-पिता के प्रति सम्मान और सेवा भारतीय संस्कृति की मूल आत्मा रही है। लेकिन आज जब संस्कार कमजोर हो रहे हैं, तब समाज को कानून का सहारा लेना पड़ रहा है। लेकिन इस पूरे विषय को केवल एकतरफा दृष्टि से देखना भी उचित नहीं होगा। यह भी एक सच्चाई है कि कई बार माता-पिता भी बच्चों के प्रति अत्यधिक अनुशासन, नियंत्रण और अपेक्षाओं का दबाव बनाते हैं। वे चाहते हैं कि बच्चे हमेशा उनकी इच्छाओं के अनुसार ही जीवन जिएं, अपने निर्णय स्वयं न लें, विवाह, करियर, जीवनशैली हर चीज में माता-पिता की इच्छा सर्वाेपरि रहे। कई बार माता-पिता बच्चों की निजी जिंदगी में अत्यधिक हस्तक्षेप करते हैं, जिससे परिवार में तनाव उत्पन्न होता है। ऐसी परिस्थितियों में बच्चों और माता-पिता के बीच दूरी बढ़ जाती है और पारिवारिक वातावरण तनावपूर्ण हो जाता है।</div><div><br></div><div>इसलिए समस्या का समाधान केवल कानून नहीं है, बल्कि परिवार के भीतर संतुलन, संवाद और समझ भी उतनी ही आवश्यक है। बच्चों को यह समझना चाहिए कि माता-पिता ने उनके लिए अपना पूरा जीवन समर्पित किया है, इसलिए बुढ़ापे में उनकी सेवा और सम्मान उनका नैतिक कर्तव्य है। वहीं माता-पिता को भी यह समझना चाहिए कि समय बदल गया है, नई पीढ़ी की जीवनशैली और सोच अलग है, इसलिए उन्हें बच्चों को समझने और उन्हें स्वतंत्रता देने की आवश्यकता है। वास्तव में परिवार एक संस्था है, जो प्रेम, त्याग, सम्मान और संवाद पर चलती है, न कि केवल अधिकार और अनुशासन पर। जहां केवल अधिकार होंगे, वहां टकराव होगा; जहां केवल त्याग होगा, वहां असंतुलन होगा; लेकिन जहां प्रेम और संतुलन होगा, वहां परिवार मजबूत होगा।</div><div><br></div><div>तेलंगाना का यह कानून एक महत्वपूर्ण पहल है, लेकिन यह अंतिम समाधान नहीं है। कानून बच्चों को माता-पिता का भरण-पोषण करने के लिए मजबूर कर सकता है, लेकिन वह प्रेम, सम्मान और संवेदना पैदा नहीं कर सकता। इसके लिए समाज में नैतिक शिक्षा, पारिवारिक संस्कार और सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता है। स्कूलों में, सामाजिक संस्थाओं में और धार्मिक संगठनों में परिवार और बुजुर्गों के सम्मान की शिक्षा दी जानी चाहिए। आज “नया भारत” और “विकसित भारत” की बात की जा रही है, लेकिन केवल आर्थिक विकास ही पर्याप्त नहीं है। यदि समाज में बुजुर्ग असुरक्षित, उपेक्षित और अपमानित होंगे, तो विकास अधूरा रहेगा। वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का हर वर्ग-बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सकें।</div><div><br></div><div>अतः आवश्यक है कि हम तीन स्तरों पर कार्य करें-पहला, सरकार और कानून बुजुर्गों की आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करें। दूसरा, समाज में माता-पिता के सम्मान और सेवा के संस्कार विकसित किए जाएं। तीसरा, परिवार के भीतर माता-पिता और बच्चों के बीच संतुलित और संवादपूर्ण संबंध स्थापित किए जाएं। यदि ये तीनों स्तर मजबूत हो जाएं, तो न केवल बुजुर्गों का जीवन सुरक्षित और सम्मानजनक होगा, बल्कि परिवार संस्था भी मजबूत होगी और समाज में मानवीय संवेदनाएं जीवित रहेंगी। निश्चिततौर पर कहा जा सकता है कि माता-पिता केवल परिवार का हिस्सा नहीं होते, वे परिवार की जड़ होते हैं। यदि जड़ कमजोर होगी, तो वृक्ष भी कमजोर होगा। इसलिए बुजुर्गों का सम्मान और सुरक्षा केवल एक पारिवारिक या कानूनी मुद्दा नहीं, बल्कि समाज की नैतिकता और सभ्यता की परीक्षा है। जो समाज अपने बुजुर्गों का सम्मान नहीं करता, वह कभी महान नहीं बन सकता।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 02 Apr 2026 14:17:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/a-commendable-initiative-for-the-maintenance-of-the-elderly</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[होर्मुज संकट से बेहाल दुनिया को चीन की ऊर्जा नीति से सीख लेनी चाहिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-world-troubled-by-the-hormuz-crisis-should-learn-from-china-energy-policy]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच एक सख्त सच्चाई उभर कर सामने आ रही है। होर्मुज जलडमरूमध्य पर मंडराते खतरे ने पूरी दुनिया की सांसें रोक दी हैं, लेकिन इस उथल पुथल के बीच चीन एक अलग ही खेल खेलता नजर आ रहा है। जहां एशिया के कई देश ऊर्जा बचाने की अपील कर रहे हैं, वहीं चीन आत्मविश्वास से भरा हुआ है और दावा कर रहा है कि उसके पास ऊर्जा का पर्याप्त रणनीतिक भंडार है।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह आत्मविश्वास यूं ही नहीं आया। चीन ने पिछले कई वर्षों में एक ऐसी रणनीति तैयार की है जिसने उसे वैश्विक तेल आपूर्ति के झटकों से काफी हद तक सुरक्षित बना दिया है। जब दुनिया तेल के लिए समुद्री मार्गों पर निर्भर है, चीन ने अपनी निर्भरता को योजनाबद्ध तरीके से कम किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/mri/a-friend-sitting-8000-kilometers-away-will-open-a-treasure-trove-for-india" target="_blank">8000 KM दूर बैठा दोस्त भारत के लिए खोलेगा खजाना! इस गरीब देश से मोदी ने गैस भंडार की कौन सी डील कर ली?</a></h3><div>सबसे बड़ा बदलाव चीन के इलेक्ट्रिक वाहन अभियान में दिखता है। जहां 2020 में लक्ष्य रखा गया था कि 2025 तक नए वाहनों में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी इलेक्ट्रिक वाहनों की होगी, वहीं यह आंकड़ा अपेक्षा से कहीं आगे निकल गया और आधे से ज्यादा नई गाड़ियां इलेक्ट्रिक हो गईं। इसका सीधा असर यह हुआ कि चीन की तेल खपत अब स्थिर होने लगी है।</div><div><br></div><div>आंकड़े बताते हैं कि केवल इलेक्ट्रिक वाहनों के कारण जितना तेल बचा है, वह लगभग उतना ही है जितना चीन सऊदी अरब से आयात करता था। यह बदलाव मामूली नहीं है, बल्कि यह ऊर्जा भू राजनीति की दिशा बदलने वाला संकेत है।</div><div><br></div><div>चीन की दूसरी सबसे बडी ताकत उसका विविधीकृत आयात तंत्र है। जहां जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश एक या दो आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भर हैं, वहीं चीन ने अपने तेल स्रोतों को आठ से ज्यादा देशों में फैला रखा है। रूस, ईरान, वेनेजुएला जैसे देशों से सस्ता तेल लेकर उसने पश्चिमी प्रतिबंधों को भी अपने हित में बदल लिया है। रणनीतिक दृष्टि से यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है। इसका मतलब है कि यदि किसी एक क्षेत्र में संकट आता है, तो चीन पूरी तरह ठप नहीं होगा।</div><div><br></div><div>तीसरा और सबसे खतरनाक दांव है चीन का विशाल तेल भंडार। अनुमान है कि उसके पास इतना तेल जमा है कि वह होर्मुज मार्ग बंद होने की स्थिति में करीब सात महीने तक अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है। यह भंडारण केवल आर्थिक सुरक्षा नहीं बल्कि सामरिक हथियार भी है। देखा जाये तो ऊर्जा सुरक्षा के इस खेल में चीन ने केवल तेल पर ही भरोसा नहीं किया है। उसकी बिजली व्यवस्था लगभग आत्मनिर्भर हो चुकी है। कोयले और तेजी से बढ़ती नवीकरणीय ऊर्जा के दम पर चीन ने अपने ग्रिड को बाहरी निर्भरता से लगभग मुक्त कर लिया है।</div><div><br></div><div>इसके साथ ही सौर और पवन ऊर्जा का विस्फोटक विस्तार इस बात का संकेत है कि चीन भविष्य की ऊर्जा लड़ाई के लिए पहले ही तैयार है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि उसे कम एलएनजी आयात करना पड रहा है और तटीय इलाकों की निर्भरता भी घट रही है। गैस के मामले में भी चीन ने चालाकी दिखाई है। पाइपलाइन नेटवर्क के जरिए उसने रूस, मध्य एशिया और म्यांमार से सीधी आपूर्ति सुनिश्चित कर ली है। इससे समुद्री मार्गों पर निर्भरता और कम हो गई है। सामरिक नजरिए से देखें तो यह पूरी रणनीति एक गहरी सोच का परिणाम है। चीन ने समझ लिया था कि भविष्य की जंग केवल हथियारों से नहीं बल्कि ऊर्जा पर नियंत्रण से जीती जाएगी।</div><div><br></div><div>आज जब होर्मुज जलडमरूमध्य पर खतरा मंडरा रहा है, तब भारत, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश चिंता में डूबे हुए हैं। लेकिन चीन इस संकट को अवसर में बदलने की स्थिति में है। सबसे बड़ी बात यह है कि चीन की तेल मांग अब चरम पर पहुंचकर घटने की ओर बढ़ रही है। इसका मतलब है कि आने वाले समय में उसकी आयात निर्भरता और कम होगी, जिससे वैश्विक बाजार में उसकी स्थिति और मजबूत होगी।</div><div><br></div><div>बहरहाल, यह पूरा घटनाक्रम एक साफ संदेश देता है। जो देश समय रहते अपनी ऊर्जा रणनीति नहीं बदलेंगे, वे आने वाले संकटों में बुरी तरह फंस सकते हैं। चीन ने यह साबित कर दिया है कि दीर्घकालिक योजना, आक्रामक निवेश और रणनीतिक विविधीकरण के दम पर किसी भी वैश्विक संकट को मात दी जा सकती है। अब सवाल यह है कि क्या बाकी दुनिया इस सबक को समझेगी या फिर अगला संकट उन्हें पूरी तरह झकझोर देगा।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 01 Apr 2026 19:09:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-world-troubled-by-the-hormuz-crisis-should-learn-from-china-energy-policy</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[मोदी की विदेश यात्राओं पर सवाल उठाने और कूटनीति को विफल बताने वालों को यह रिपोर्ट देखनी चाहिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/those-questioning-modi-foreign-visits-and-calling-diplomacy-a-failure-should-watch-this-report]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर सवाल उठाने वाले और मोदी की विदेश नीति को विफल बताने वाले विपक्षी नेताओं को यह देखना चाहिए कि जब भारत के सामने ऊर्जा संकट मंडराया तो दुनिया के वही देश मदद के लिए खड़े हो गए जिनके साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्षों तक भरोसे का रिश्ता बनाया था। खासकर अफ्रीकी देशों से बढ़ते आयात ने यह साबित कर दिया है कि भारत ने समय रहते अपने ऊर्जा स्रोतों को विविध बनाया था। आज वही रिश्ते और रणनीतिक फैसले भारत की ढाल बनकर खड़े हैं और यही असली कूटनीति की ताकत है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को झकझोर दिया है। होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से भारत पहले अपनी कच्चे तेल की आपूर्ति का लगभग चालीस से पैंतालीस प्रतिशत हिस्सा प्राप्त करता है उस पर दबाव बढ़ने से कई तरह की अटकलें लगाई गईं। लेकिन भारत न तो घबराया और न ही संकट में फंसा। इसका कारण है मोदी सरकार की दूरदर्शी ऊर्जा नीति और समय रहते उठाए गए रणनीतिक कदम।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-on-india-heritage-at-museum-inauguration" target="_blank">PM Modi ने Koba तीर्थ से देश को दिए 9 Sankalps, पानी बचाने से लेकर प्राकृतिक खेती तक का आह्वान</a></h3><div>आज स्थिति यह है कि भारत में कच्चे तेल, एलपीजी और एलएनजी की उपलब्धता एक महीने पहले की तुलना में काफी बेहतर हो चुकी है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि देश में किसी प्रकार की ऊर्जा की कमी नहीं है और पेट्रोल, डीजल तथा रसोई गैस की आपूर्ति पूरी तरह सुचारु बनी हुई है। यह कोई संयोग नहीं बल्कि सुनियोजित रणनीति का परिणाम है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो सबसे बड़ा बदलाव आया है ऊर्जा स्रोतों के विविधीकरण में। एक दशक पहले तक भारत केवल 27 देशों से कच्चा तेल लेता था, लेकिन आज यह संख्या बढ़कर 41 हो चुकी है। इसका सीधा मतलब है कि भारत अब किसी एक क्षेत्र पर निर्भर नहीं है। अमेरिका, रूस, कनाडा, नार्वे से लेकर अफ्रीकी देशों जैसे नाइजीरिया, अल्जीरिया और अंगोला तक भारत ने अपने ऊर्जा संबंधों का विस्तार किया है। एलएनजी के लिए कैमरून, इक्वेटोरियल गिनी और मोजाम्बिक जैसे नए साझेदार जुड़े हैं।</div><div><br></div><div>यही नहीं, रणनीतिक भंडारण की दिशा में भी भारत ने ऐतिहासिक कदम उठाए हैं। पिछले 11 वर्षों में 5.3 मिलियन टन का रणनीतिक तेल भंडार तैयार किया गया है और अतिरिक्त क्षमता पर तेजी से काम चल रहा है। इसका मतलब यह है कि वैश्विक संकट के बावजूद भारत के पास आपूर्ति बनाए रखने के लिए पर्याप्त भंडार मौजूद है।</div><div><br></div><div>मोदी सरकार ने केवल आपूर्ति बढ़ाने पर ही ध्यान नहीं दिया बल्कि प्रबंधन को भी मजबूत किया। चौबीसों घंटे निगरानी के लिए नियंत्रण कक्ष स्थापित किया गया और एक अंतर मंत्रालयी समूह रोज बैठक कर हालात का आकलन कर रहा है। जमाखोरी रोकने के लिए सख्त निर्देश दिए गए और राज्यों को आवश्यक वस्तुओं की सुचारु आपूर्ति सुनिश्चित करने को कहा गया।</div><div><br></div><div>यहां सबसे महत्वपूर्ण पहलू है कूटनीतिक सक्रियता। प्रधानमंत्री मोदी ने सऊदी अरब, यूएई, कतर, ईरान और अमेरिका जैसे देशों के नेताओं से लगातार संपर्क बनाए रखा। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि भारतीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित हुई और आपूर्ति बाधित नहीं हुई। यह वही देश हैं जिनसे भारत ने संकट के समय पहले भी सहयोग किया था और आज वही रिश्ते काम आए।</div><div><br></div><div>सामरिक दृष्टि से देखें तो यह पूरी स्थिति भारत की ऊर्जा सुरक्षा नीति की बड़ी परीक्षा थी। पश्चिम एशिया जैसे संवेदनशील क्षेत्र में तनाव का सीधा असर भारत पर पड़ सकता था, लेकिन भारत ने अपनी निर्भरता घटाकर इस खतरे को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया। अब होर्मुज मार्ग पर निर्भरता घटकर लगभग तीस प्रतिशत रह गई है।</div><div><br></div><div>इसके रणनीतिक निहितार्थ और भी गहरे हैं। भारत अब केवल उपभोक्ता नहीं बल्कि वैश्विक ऊर्जा कूटनीति का सक्रिय खिलाड़ी बन चुका है। अफ्रीका और अन्य क्षेत्रों में बढ़ती मौजूदगी भारत को दीर्घकालिक सुरक्षा देती है। साथ ही पाइप्ड नेचुरल गैस जैसे विकल्पों को बढ़ावा देकर एलपीजी पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी काम हो रहा है।</div><div><br></div><div>आम जनता पर इसका सकारात्मक असर साफ दिख रहा है। रसोई गैस की आपूर्ति जारी है, भले ही घबराहट में बुकिंग बढ़ने से डिलीवरी में चार से पांच दिन का समय लग रहा हो, लेकिन कहीं भी गैस खत्म होने की खबर नहीं है। किसानों के लिए उर्वरक की उपलब्धता सुनिश्चित की जा रही है और पेट्रोल, डीजल की कीमतों को नियंत्रित रखने के लिए उत्पाद शुल्क में कटौती की गई है।</div><div><br></div><div>यह पूरा घटनाक्रम एक बात साफ करता है कि मोदी सरकार ने ऊर्जा सुरक्षा को केवल नीतिगत मुद्दा नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का अहम हिस्सा माना है। आज जब दुनिया के कई देश ऊर्जा संकट से जूझ रहे हैं तब भारत मजबूती से खड़ा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, विपक्ष को यह समझना होगा कि विदेश यात्राएं केवल फोटो खिंचवाने के लिए नहीं होतीं, बल्कि संकट के समय काम आने वाले रिश्ते बनाने के लिए होती हैं। और जब संकट आया, तो वही रिश्ते भारत के लिए कवच बन गए। यही है नई भारत की आक्रामक, आत्मविश्वासी और दूरदर्शी कूटनीति।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 31 Mar 2026 13:21:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/those-questioning-modi-foreign-visits-and-calling-diplomacy-a-failure-should-watch-this-report</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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