<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[जिनपिंग की भारत यात्रा- बॉर्डर पर तैनाती और निगरानी बढ़ाने का समय आ गया]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/xi-jinping-visit-to-india-time-to-step-up-border-deployment-and-surveillance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आने की तैयारी कर रहे हैं। भारत यात्रा के दौरान चीन के राष्ट्रपति 18वें ब्रिक्स सम्मेलन में शामिल होंगे। जिनपिंग इससे पहले वर्ष 2019 में शिखर वार्ता के लिए भारत आएं थे। चीनी राष्ट्रपति के भारत यात्रा के दौरान जाहिर तौर पर दोनों देशों के बीच शीर्ष स्तर पर भी बातचीत होगी। हाल के दिनों में भारत चीन सीमा पर खासकर अरुणाचल प्रदेश को लेकर जो खबरें आ रही है, उसने पूरे देश को चिंतित कर दिया है। बदले माहौल में अब भारत की कोई भी सरकार सिर्फ शांति और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने के नाम पर पड़ोसी देश की इस तरह की नापाक हरकतों को ठंडे बस्ते में नहीं डाल सकती है। ऐसे में नई दिल्ली में स्वागत की तैयारियों से भी ज्यादा जरूरी हो जाता है भारत-चीन सीमा पर सैनिकों को पूरे साजो-सामान के साथ 24 घंटे रेडी मोड में रखना। चीन का इतिहास भी यही बताता है कि भारत को अब और ज्यादा सतर्क रहने की जरूरत है।&nbsp;</div><div><br></div><div>भारत-चीन संबंधों के बीच सबसे बड़ी&nbsp; विडंबना शीर्ष नेताओं के दौरे के दौरान या दौरे के आसपास ही शुरू होती है। आमतौर पर जब भी किसी दो देशों के बीच शीर्ष स्तर पर यात्रा की कोई योजना बनती है तो दोनों ही देश, इस बात को सुनिश्चित करते हैं कि यात्रा से पहले और यात्रा के दौरान तो कम से कम कहीं कोई तनाव न पैदा हो। लेकिन चीन इसके बिल्कुल उल्टा करता है। चीन का इतिहास यह बताता है कि भारत की तरफ से संबंध सुधारने के लिए जब भी शीर्ष स्तर पर कोई नेता चीन जाता है या फिर भारत के निमंत्रण पर जब भी चीन से कोई शीर्ष नेता भारत आता है तो अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति और राजनयिक शिष्टाचार को पूरी तरह से धत्ता बताते हुए चीन की सेना सीमा पर खुराफात शुरू कर देती है। एक तरफ शीर्ष स्तर पर बातचीत, शांति और व्यापारिक संबंधों के ढोल बज रहे होते हैं तो वहीं दूसरी तरफ चीन की सेना भारत के क्षेत्र में जबरदस्ती घुसपैठ करने और भारतीय सेना से लड़ती-भिड़ती नज़र आती है। आपको बता दें कि, चीन की सेना पाकिस्तानी सेना की तरह बेलगाम नहीं है यानी चीन की सेना जो कुछ भी करती है वह राष्ट्रपति की मंजूरी से ही करती है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/india-japan-defence-deal-before-xi-jinping-india-visit-china-indo-pacific-strategy" target="_blank">Modi ने पिछले साल China जाने से पहले चली थी तगड़ी चाल, अब Xi Jinping के India आने से पहले खेल दिया बड़ा दाँव</a></h3><div>वैसे तो शीर्ष स्तर पर यात्राओं के दौरान चीन की इस तरह की हरकतों का लंबा इतिहास रहा है। लेकिन आपके सामने कुछ महत्वपूर्ण घटनाओं को उदाहरण के तौर पर रख देते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>वर्ष 2003 में भारत के तत्कालीन&nbsp; प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की चीन यात्रा के दौरान ही चीनी सेना की एक टुकड़ी ने अरुणाचल प्रदेश के अपर सुबनसिरी जिले के असफीला इलाके में LAC पार करके भारतीय सीमा में न केवल घुसपैठ किया था बल्कि भारतीय सैनिकों की एक छोटी&nbsp; सी टुकड़ी से उनके हथियार तक छीन लिए थे। चीनी सेना ने इससे भी बड़ी नापाक हरकत वर्ष 2013 में अपने ही प्रधानमंत्री ली केकियांग के भारत दौरे से पहले की थी। मनमोहन सिंह सरकार के दौरान वर्ष 2013 में चीनी प्रधानमंत्री की भारत यात्रा से पहले PLA यानी चीनी सेना पूर्वी लद्दाख ( भारतीय क्षेत्र ) में 19&nbsp; किलोमीटर तक न केवल अंदर घुस आई थी बल्कि वहां तंबू लगाकर कब्जा भी कर लिया था। दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ गई थी और लगभग 20 दिनों तक यह गतिरोध बना रहा था।&nbsp;</div><div><br></div><div>नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद वर्ष 2014 में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत यात्रा पर आएं। जिनपिंग के भारत पहुंचने से महज कुछ घंटे पहले ही चीन की सेना ने लद्दाख में घुसपैठ कर, अवैध तरीके से सड़क बनाना शुरू कर दिया। यहां भी दोनों देशों की सेनाएं लगभग दो सप्ताह तक आमने-सामने खड़ी रहीं।&nbsp; इस तरह के अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं जब भारत और चीन के शीर्ष नेता बातचीत कर रहे थे या बातचीत करने की तैयारी कर रहे थे, ठीक उसी समय चीन की सेना नापाक हरकतें कर रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>ऐसे में बड़ा सवाल तो यही खड़ा हो रहा है कि क्या चीन सितंबर के महीने में बॉर्डर पर फिर से कोई बड़ी खुराफात करने की योजना तो नहीं बना रहा है ? यह सवाल इसलिए खड़ा हो रहा है क्योंकि भारत में 12-13 सितंबर को 18वां ब्रिक्स सम्मेलन होने जा रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इसमें शामिल होने के लिए भारत आएंगे। चीन के राष्ट्रपति के भी इस सम्मेलन में आने की तैयारियां चल रही है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत के विदेश मंत्रालय के सूत्र यह बता रहे हैं कि जिनपिंग के दौरे की अभी आधिकारिक तौर पर औपचारिक सूचना भले ही न मिली हो लेकिन एडवांस टीमों के दौरे और बाकी तैयारियों से यह लग रहा है कि वह भारत आ सकते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>अगर ऐसा है तो भारत और चीन की सीमा पर चौकसी को और ज्यादा बढ़ाने का समय आ गया है। बॉर्डर से लगती भारत की हर चौकी पर सेना को पूरी ताकत और साजो-सामान के साथ तैनात करना पड़ेगा। वहां पर संचार के साधन और बिजली की उपलब्धता को हर हाल में सुनिश्चित करने वाली व्यवस्था करनी होगी। रिजर्व फौज को भी तैयार रखना होगा ताकि आपात स्थिति में तुरंत मदद पहुंचाई जा सके। दोनों देशों के बीच सीमा पर हथियार नहीं चलाने का समझौता हो रखा है तो ऐसे में जाहिर तौर पर लड़ने के लिए अलग तरह की तैयारियां तो करनी ही पड़ेगी।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस तरह के हालात में सैन्य साजो-सामान, हथियार, बेहतर संचार के साधन, 24 घंटे बिजली की उपलब्धता, बेहतर सड़क और खाने-पीने के सामानों की भरपूर उपलब्धता के साथ ही बड़ी-बड़ी नुकीले कील लगे डंडे की भी जरूरत पड़ती है। सबसे जरूरी बात यह है कि नई दिल्ली की तरफ से इनके पास स्पष्ट ऑर्डर होना चाहिए कि चीनी सेना की नापाक हरकतों का जवाब कैसे और किस हद तक जाकर देना है।</div><div><br></div><div>- संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 15:01:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/xi-jinping-visit-to-india-time-to-step-up-border-deployment-and-surveillance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/22/xi-jinping_large_1501_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[India Bangladesh Ganga Water Treaty पर Bihar से उठ रहे सवालों का जवाब Modi सरकार को देना ही होगा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-bangladesh-ganga-water-treaty-2026-bihar-sanjay-jha-farakka-dispute]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>1996 की भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि दिसंबर में समाप्त होने वाली है, ऐसे में ढाका नई संधि की मांग तेज कर रहा है और सूखे के मौसम में न्यूनतम जल प्रवाह की गारंटी जैसी शर्त जोड़ना चाहता है, मगर केंद्र और बिहार में सत्तारुढ़ एनडीए के एक प्रमुख घटक जनता दल यूनाइटेड के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने अपने लेख के माध्यम से जो सवाल उठाए हैं, उसने पूरे मामले का नया मोड़ दे दिया है। उनका संदेश साफ है कि भारत को केवल बांग्लादेश के साथ नई संधि पर विचार नहीं करना चाहिए, बल्कि उससे पहले यह तय करना होगा कि बदलती जलवायु, घटते प्रवाह और बढ़ती जरूरतों के बीच गंगा का पानी भारत के अपने राज्यों खासकर बिहार के बीच किस आधार पर बांटा जाएगा। यही वह सवाल है जो 2026 के बाद गंगा की राजनीति को केवल जल बंटवारे का मुद्दा नहीं रहने देता, बल्कि इसे राष्ट्रीय हित, सीमा सुरक्षा, क्षेत्रीय कूटनीति और सामरिक रणनीति के केंद्र में ला खड़ा करता है।</div><div><br></div><div>दरअसल, ढाका चाहता है कि नई संधि में एक ‘गारंटी क्लॉज’ शामिल हो, जिसके तहत सूखे के मौसम में बांग्लादेश को गंगा के पानी की एक न्यूनतम मात्रा सुनिश्चित की जाए। 1977 के समझौते में इस तरह की गारंटी का प्रावधान था, लेकिन 1996 की संधि में इसे शामिल नहीं किया गया। बांग्लादेश का तर्क है कि जलवायु परिवर्तन, अनिश्चित होते सूखे मौसम के प्रवाह और पानी की घटती उपलब्धता के कारण पुराना फार्मूला अब उसकी जरूरतों और वर्तमान परिस्थितियों को प्रतिबिंबित नहीं करता।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/bangladesh-pm-tarique-rahman-india-visit-decision-pending-dhaka-clarification" target="_blank">Bangladesh PM Tarique Rahman की India visit पर फैसला नहीं, ढाका ने दी सफाई</a></h3><div>लेकिन ठीक यही तर्क भारत, विशेषकर बिहार के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है। संजय झा का सवाल है कि तीन दशक पुरानी गणना के आधार पर भारत खुद को एक और लंबे अंतरराष्ट्रीय दायित्व में क्यों बांधे? गंगा का अविरल प्रवाह बिहार में कई हिस्सों में टूट रहा है, नदी के चैनल बदल रहे हैं, कई इलाकों में भूजल संकट गहरा रहा है और दूसरी ओर दक्षिण बिहार के सूखा प्रभावित क्षेत्रों के साथ-साथ उत्तर बिहार के बाढ़ग्रस्त इलाके भी पानी की असमानता से जूझ रहे हैं। ऐसे में जब नदी का व्यवहार ही बदल चुका है तो 1996 के आंकड़ों और फार्मूले को भविष्य के लिए स्थायी मान लेना बिहार के हितों पर भारी पड़ सकता है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो फरक्का पर विवाद इस पूरी बहस का सबसे संवेदनशील केंद्र है। बांग्लादेश लंबे समय से फरक्का बैराज को सूखे मौसम में उसके हिस्से के जल प्रवाह में कमी के लिए जिम्मेदार ठहराता रहा है। वहां की ओर से इसे लेकर तीखी भाषा भी इस्तेमाल की गई है। भारत का पक्ष अलग है। भारत फरक्का को बांध नहीं बल्कि एक डायवर्जन संरचना मानता है, जिसका उद्देश्य गंगा के पानी का एक हिस्सा हुगली नदी प्रणाली की ओर मोड़ना है, जबकि शेष प्रवाह बांग्लादेश की दिशा में आगे बढ़ता है। भारत यह भी कहता रहा है कि जल प्रवाह से जुड़ा डेटा संयुक्त नदी आयोग के माध्यम से साझा किया जाता है।</div><div><br></div><div>लेकिन अब असली सवाल केवल फरक्का नहीं है। सवाल यह है कि गंगा पर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता तय करने से पहले भारत के भीतर गंगा बेसिन वाले राज्यों यानि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के अधिकारों और जरूरतों का वैज्ञानिक आकलन क्यों नहीं होना चाहिए?</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां संजय झा की मांग बिहार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। बिहार की आबादी 1996 के मुकाबले काफी बढ़ चुकी है। पीने के पानी, सिंचाई और औद्योगिक जरूरतों का दबाव भी कई गुना बढ़ा है। राज्य को यदि अपनी कृषि, सिंचाई परियोजनाओं और जल प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक योजना बनानी है तो उसे पहले से यह पता होना चाहिए कि गंगा बेसिन में उसका वास्तविक और न्यायसंगत हिस्सा कितना है। नई संधि से पहले भारत के भीतर वैज्ञानिक जल आवंटन बिहार के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक लाभ हो सकता है।</div><div><br></div><div>भारत के लिए भी यह केवल बिहार बनाम बांग्लादेश का प्रश्न नहीं है। गंगा भारत और बांग्लादेश के बीच साझा 54 प्रमुख नदियों वाले व्यापक जल संबंधों का हिस्सा है। यदि भारत बिना घरेलू जल संतुलन तय किए बांग्लादेश को न्यूनतम प्रवाह की गारंटी देता है, तो भविष्य में सूखे के गंभीर वर्षों में अपने राज्यों की जरूरतों और अंतरराष्ट्रीय दायित्वों के बीच टकराव पैदा हो सकता है। इसलिए नई संधि का आधार 1950 के दशक या 1990 के दशक के आंकड़े नहीं, बल्कि वर्तमान हाइड्रोलॉजिकल डेटा, जलवायु अनुमान, वास्तविक प्रवाह और समय-समय पर समीक्षा की व्यवस्था होना चाहिए।</div><div><br></div><div>भारत की संसदीय समिति भी इस दिशा में संकेत दे चुकी है कि संधि के नवीनीकरण पर बातचीत में बिहार और पश्चिम बंगाल की चिंताओं, अपडेटेड जल आंकड़ों और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को शामिल किया जाना चाहिए। इसका अर्थ साफ है कि नई व्यवस्था यदि बनती है तो वह पुराने अंकगणित की कॉपी नहीं हो सकती।</div><div><br></div><div>दूसरी तरफ, मान लीजिये कि अगर संधि समाप्त हो जाती है और नई संधि नहीं हो पाती तब क्या होगा? ऐसे में संभव है कि बांग्लादेश इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उठाने की कोशिश कर सकता है। ढाका संयुक्त राष्ट्र समेत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर जल अधिकार और सूखे के मौसम में जल संकट का सवाल उठा सकता है। इससे भारत पर कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश होगी और द्विपक्षीय संबंधों में एक नया तनाव पैदा हो सकता है। बांग्लादेश घरेलू राजनीति में भी गंगा जल को एक संवेदनशील राष्ट्रवादी मुद्दे के रूप में इस्तेमाल कर सकता है।</div><div><br></div><div>ऐसे में भारत पर इसका असर केवल कूटनीतिक छवि तक सीमित नहीं रहेगा। जल विवाद सीमा पार सहयोग, नदी प्रबंधन, व्यापार और व्यापक भारत-बांग्लादेश संबंधों को प्रभावित कर सकता है। यही कारण है कि नई दिल्ली के लिए सबसे समझदारी भरा रास्ता न तो आंख बंद करके पुरानी संधि का नवीनीकरण है और न ही जल प्रश्न को अनिश्चितता में छोड़ देना। भारत को इस मौके का इस्तेमाल एक मजबूत, आधुनिक और संतुलित जल रणनीति बनाने में करना चाहिए। पहले अपने राज्यों के हितों का वैज्ञानिक निर्धारण, फिर बांग्लादेश के साथ पारदर्शी बातचीत। नई संधि में वास्तविक प्रवाह के आधार पर आवंटन, छोटे समीक्षा चक्र, जलवायु परिवर्तन के अनुसार संशोधन और असाधारण परिस्थितियों के लिए स्पष्ट प्रावधान किए जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दिसंबर 2026 की समयसीमा इसलिए केवल एक संधि की समाप्ति नहीं है। यह भारत के सामने अपनी गंगा नीति को नए सिरे से लिखने का अवसर है। और अगर इस बार बिहार के हितों, बदलती जलवायु और राष्ट्रीय जल सुरक्षा को केंद्र में रखकर फैसला हुआ, तो नई व्यवस्था केवल कूटनीतिक समझौता नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक सामरिक और जल सुरक्षा की मजबूत नींव बन सकती है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 11:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-bangladesh-ganga-water-treaty-2026-bihar-sanjay-jha-farakka-dispute</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/22/india-bangladesh-ganga-water-treaty_large_1141_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA['वंदे मातरम्' के अपमान से Congress के तुष्टिकरण की पोल खुली, Nehru से लेकर Rahul Gandhi तक एक ही पैटर्न?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-insult-to-vande-mataram-has-exposed-the-congress-party-appeasement-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>एक बंगाली कहावत है -&nbsp;</div><h2>“मायेर स्तबेर अर्धेक ग्रहण, अर्धेक बर्जन, ए कैमन सन्तानेर भक्ति?”</h2><div><br></div><div>मातृभूमि के स्तुति गीत को आधा स्वीकारना और आधा त्यागना, यह किस प्रकार की संतान की भक्ति है? भद्र बंगाल की सौ वर्षों की व्यथा, वेदना ही इस लोकोक्ति रूप में प्रकट हुई है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><div>भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का शायद ही कोई दूसरा गीत “वन्दे मातरम्” जितना भावात्मक, राजनीतिक और ऐतिहासिक रहा हो। बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय जी की यह रचना केवल साहित्य नहीं अपितु वह स्वदेशी आन्दोलन, क्रांतिकारियों और राष्ट्रीय जागरण का उद्भट उद्घोष बनी थी।</div><div>&nbsp;</div><div>15 अगस्त, 2026 को कांग्रेस के केंद्रीय कार्यालय दिल्ली में कारित घृणित कृत्य से कांग्रेस का इस्लामिक डीएनए पुनः सिद्ध हो गया है। वंदे मातरम् के इस अपमान के समय नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी, दशक भर कांग्रेस अध्यक्ष रही सोनिया गांधी और कांग्रेस अध्यक्ष खड़गे उपस्थित थे। दुस्साहस और दुर्भाग्य का विषय यह है कि इन तीनों ने ही वंदे मातरम् के अपमान के इस दुष्कृत्य को प्रारंभ किया था।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sajjan-kumar-death-1984-anti-sikh-riots-convict-congress-mp-tihar-jail" target="_blank">बुरे काम का नतीजा बुरा ही होता है, बाहरी दिल्ली के बेताज बादशाह रहे Sajjan Kumar की सत्ता, सियासत और सजा की कहानी यही संदेश देती है</a></h3><div>इस दुर्भाग्यजनक घटना के बाद कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं ने देश को स्पष्टीकरण देना प्रारंभ किया कि - “सोनिया गांधी ने वंदे मातरम् का अपमान नहीं किया बल्कि वे बुजुर्ग खड़गे जी को खड़े होने के कारण असहज होता देखकर उनके लिए कुर्सी मंगा रही थी”। यहीं से कांग्रेस नेतृत्व की मूढ़ता, राष्ट्र अनास्था व मुस्लिम तुष्टिकरण के पक्ष में दुराग्रह रखने के चरित्र की पुनरावृत्ति दिखाई पड़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इस घटनाक्रम के अंतरतत्व को समझिए। कांग्रेस के जमीनी कार्यकर्ताओं को अपने नेतृत्व द्वारा ‘वंदे मातरम्’ का यह अपमान बुरा लगा इसलिए ही उन्होंने बिना केंद्र या प्रदेश नेतृत्व के कहे ही इस घटना पर कांग्रेस नेतृत्व का बचाव प्रारंभ कर दिया था। हजारों कांग्रेसी कार्यकर्ताओं ने सोशल मीडिया पर लाखों पोस्ट डाली और कांग्रेस नेतृत्व का बचाव किया। यह ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण की कांग्रेसी प्रवृत्ति’ के विरोध का प्रतीक था। इस मनोभाव को कांग्रेस के इटालियन नेतृत्व ने समझने का प्रयास ही नहीं किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>कांग्रेस ने इस घटना पर अपने कार्यकर्ताओं की भावनाओं को नहीं समझा तो भी कोई बात नहीं होती। कांग्रेस ने तो अपनी हठधर्मिता, अड़ियलपन, मति मूढ़ता की हद तो तब दिखा दी जब उसने अपनी राष्ट्रीय वर्किंग कमेटी में ‘वंदे मातरम्’ को पूर्ण रूप में नहीं गाने के लिए प्रस्ताव ही पारित कर दिया।&nbsp;&nbsp;</div><div>&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>‘वंदे मातरम्’ के हाल ही में किए गए अपराध और अपमान के संदर्भ में कांग्रेस के प्रवक्ता और आधिकारिक व्यक्तव्य जो कह रहे हैं उसमें वे गांधी जी, नेताजी सुभाषचंद्र, गुरुदेव रबिन्द्रनाथ टैगोर आदि का नाम लेते हुए इस गीत के विभाजन को उनकी से हुआ बता रहे हैं। यह एक भ्रमजाल और झूठ का पहाड़ है।&nbsp;</div><div><br></div><div>गांधी जी तो इस बात के पक्षधर थे कि यह गीत संपूर्ण देश को जोड़ने वाला प्राणतत्त्व है और इसे इसके पूर्ण वैभव के साथ संपूर्णतः स्वीकार किया जाना चाहिए। गांधी जी ने इसके समर्थन में अपनी स्पष्ट राय रखी थी, किंतु जवाहरलाल नेहरू ने तुष्टिकरण की अपनी राजनैतिक कुटिलताओं और प्राथमिकताओं के चलते गांधी जी की एक न चलने दी।&nbsp;</div><div><br></div><div>इतिहास यह भी है कि, यह दुखद एतिहासिक पृष्ठ रहस्यमयी भी है। रहस्य यह कि - “अंततः वह कौन सी कमजोर नस थी,, जिसके आधार पर नेहरू जी ऐसे निर्णय भी गांधी जी से करवा लेते थे जिनके लिए गांधी जी कभी भी तैयार नहीं थे”।&nbsp;</div><div><br></div><div>गांधी जी वंदेमातरम् विभाजन हेतु असहमत थे। गांधी जी बंग-भंग हेतु भी सहमत नहीं थे। गांधी जी ने कहा था कि “इस देश का विभाजन मेरी लाश पर होगा”। गांधी जी स्वतंत्रता पश्चात् कांग्रेस को विसर्जित करने हेतु भी संकल्पित थे। गांधी जी ने कहा था कि स्वतंत्रता पश्चात् हम एक बूँद की स्याही लेंगे और यह लिख देंगे - “इस देश में गौहत्या वैसा ही दंड होगा जैसा मानव हत्या के लिए होता है”।&nbsp; स्वच्छता, हिंदी राष्ट्रभाषा, ग्रामवासी भारत आदि हेतु भी गांधी जी प्रतिबद्ध थे। कांग्रेस ने सात दशकों की सत्ता में इन विषयों को त्याज्य रखा। ‘भारत में रामराज स्थापना’ को कांग्रेस का लक्ष्य बनाया था किंतु ‘नेहरू-गांधी कांग्रेस’ मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए श्रीराम को ही कल्पना सिद्ध करने के प्रयास में लग गई। कांग्रेस स्वयं को सेकुलर सिद्ध करने के अनथक प्रयास करने लगी थी और ‘रामेश्वरम् रामसेतु’ के विध्वंस, विनाश, भंजन, खंडन हेतु मशीनें समुद्रतट पर भेज चुकी थी। ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ हेतु कांग्रेस ने न जाने कितने ही कांड इस देश में किया और सतत-निरंतर किए हैं। आश्चर्य और दुस्साहस का विषय यह है कि ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ के लिए देश भर से लताड़े जाने के बाद भी कांग्रेस नेतृत्व इस बात को समझ ही नहीं रहा है। हाँ, कांग्रेस का जमीनी कार्यकर्ता इस बात कोई समझ भी रहा है और वह कांग्रेस की ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की नीति के विरोध में भी है, तब ही तो ‘कार्यकर्ता बेचारे’ ने सोशल मीडिया पर लाखों की संख्या में आकर यह कहा था कि “सोनिया जी वंदे मातरम् का गान रोक नहीं रही थी बल्कि खड़गे जी के लिए कुर्सी बुला रही थी”। ‘वंदे मातरम्’ और ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ की यह कांग्रेस कार्यकर्ता की नैसर्गिक प्रतिक्रिया थी जिसे कांग्रेस नेतृत्व ने स्वीकार करना चाहिए थे किंतु कांग्रेस ने ‘राम पथ’ को नहीं बल्कि ‘रोम पथ’ को चुना हुआ है।&nbsp;</div><div>&nbsp; &nbsp;&nbsp;</div><div>26 अक्टू.- 1 नव. 1937 की कलकत्ता कांग्रेस कार्यसमिति में ‘वंदे मातरम्’ गान के विभाजन की अनुशंसा और कुछ नहीं बल्कि एक ‘इमोशनल राष्ट्रीय ब्लैक मेल’ था। यह देश विभाजन में अपना हित देखने वाले नेताओं द्वारा निर्मित ‘ब्लैकमेल’ था।&nbsp;</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>आदरणीय बंकिम बाबू ने जब भारतमाता को केवल एक भौगोलिक भू-भाग के रूप में नहीं, बल्कि साक्षात् देवी और जननी के रूप में देखा, तो उनके मानस में 'सोनार बांग्ला' और संपूर्ण भारतवर्ष का एक ऐसा दिव्य चित्र उभर आया, जिसने औपनिवेशिक दास्तां के अंधकार को चीरकर रख दिया।</div><div><br></div><div>विडंबना, वंचना, विसंगति, विचित्र, यह है कि जिस गीत ने स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों, क्रांतिकारियों और हुतात्माओं को हँसते-हँसते फाँसी के फंदों को जयमाल मान लेने की असीम शक्ति दी, उसी महान कृति को स्वतंत्रता&nbsp; के पश्चात राजनीति और तुष्टिकरण के बवंडर में उलझा दिया गया। मुस्लिम तुष्टिकरण के मकड़जाल ने वंदेमातरम् को कोई एक सौ वर्षों तक, उसके पूर्ण गान से वंचित रखा।&nbsp;</div><div><br></div><div>प्रश्न यह है कि यदि प्रथम दो छंद पहले से ही कई कांग्रेस सभाओं में प्रचलित थे, तो 1937 में उसे औपचारिक रूप से सीमित करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? वस्तुतः कांग्रेस, मुस्लिम तुष्टिकरण का समायोजन कर रही थी।&nbsp;</div><div><br></div><div>कांग्रेस द्वारा गांधी जी, गुरुदेव रबिंद्रनाथ व नेताजी की ढाल लेकर ‘वंदे मातरम्’ का विरोध ग़लत है। इतिहासकार एस. मुखर्जी ने अपनी पुस्तक Muslim Politics के पृष्ठ क्र. 53 पर इसे कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को संतुष्ट करने के लिए गीत को “mutilate” (अंगभंग) करने जैसा बताया है। इतिहासकार ए. जी. नूरानी ने “Vande Mataram: A Historical Lesson”, Economic and Political Weekly, Vol. 8, 9 जून 1973, पृष्ठ क्र. 1039–1043 में लिखा है कि “वन्दे मातरम् का विभाजन केवल एक पक्ष की कायरता थी”।&nbsp;</div><div><br></div><div>इतिहासकार सब्यसाची भट्टाचार्य ने भी अपनी पुस्तक Vande Mataram: The Biography of a Song में देश के अनेक अग्रणी मुस्लिम नेताओं द्वारा ‘वंदे मातरम्’ पूर्णतः आनंदपूर्वक गाने की घटनाओं का विस्तृत उल्लेख किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यही सत्य है शेष कांग्रेस के झूठ का पहाड़!&nbsp;</div><div><br></div><div>- डॉ. प्रवीण दाताराम</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 15:26:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-insult-to-vande-mataram-has-exposed-the-congress-party-appeasement-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/congress_large_1526_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ताकि बचा रहे बचपन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/so-that-childhood-remains-intact]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किशोरों और बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को ध्यान में रखते हुए यूरोप के कई देशों ने पंद्रह या सोलह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर पाबंदी लगानी शुरू कर दी है। इसका अगुआ होने का श्रेय ऑस्ट्रेलिया को है, जिसने 16 साल से कम उम्र के बच्चों के इंस्टाग्राम, फेसबुक, टिकटॉक, एक्स यानी ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्मों के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी है। इसी तरह फ्रांस ऐसा कानून बनाने वाला यूरोप का पहला देश हो गया है। वहां की संसद ने पंद्रह साल तक के बच्चों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने का कानून पारित कर दिया है। हालांकि यह कानून खटाई में पड़ गया है। फ्रांस के सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का उल्लंघन माना है। अदालत का कहना है कि नाबालिगों पर प्रतिबंध लगाने के चक्कर में यह कानून असल में हर नागरिक पर सोशल मीडिया का उपयोग करने से पहले अपनी उम्र साबित करने का दबाव बनाता है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैंक्रो इस इस कानून के प्रबल समर्थक हैं। अदालत के फैसले के बाद उन्होंने कहा है कि इस कानून को लागू करने के लिए अदालती फैसले के मद्देनजर जरूरी सुधार करके फिर से इसे संसद से पारित कराया जाएगा।</div><div><br></div><div>फ्रांस के इस फैसले से स्पष्ट है कि वह किशोरों के सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर लगाम लगाने के लिए पीछे नहीं हटने जा रहा है। जिस पश्चिमी दुनिया में सोशल मीडिया का आविष्कार हुआ, जिन्होंने कभी अरब देशों में क्रांति के लिए सोशल मीडिया की सराहना की थी, अब उन्हें ही यह माध्यम अपने ही बच्चों का दुश्मन लगने लगा है। इसकी वजह है, वहां के बच्चों और किशोरों का बिगड़ता मानसिक स्वास्थ्य और पढ़ाई का गिरता स्तर। इसकी वजह से अमेरिका तक में सोशल मीडिया कंपनियों के खिलाफ लोगों में नाराजगी दिख रही है। प्रसिद्ध न्यूज एजेंसी रायटर्स ने आईपोस कंपनी के साथ हाल ही में एक सर्वे किया है। इसमें शामिल 61 फीसद लोगों ने कहा कि सोशल मीडिया कंपनियों पर सरकार को और सख्त निगरानी रखनी चाहिए। इस सर्वे में शामिल 66 प्रतिशत लोग तो 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए उम्र के प्रमाणीकरण की प्रक्रिया लागू करने पर जोर दिया है। वैसे अमेरिका के फ्लोरिडा जैसे कुछ राज्यों में चौदह साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/regulation-of-social-media-which-is-becoming-antisocial-is-essential" target="_blank">असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी</a></h3><div>दुनियाभर में बच्चों और किशोंरों के सोशल मीडिया इस्तेमाल पर रोक के लिए उनके मानसिक स्वास्थ्य में आ रही गिरावट और बढ़ते मानसिक तनाव को जिम्मेदार माना जा रहा है। कई शोधों से पता चला है कि लगातार स्क्रीन देखने और सोशल मीडिया के इस्तेमाल से बच्चे दूसरों की लाइफस्टाइल से खुद की तुलना करने लग रहे हैं। इससे उनमें हीन भावना, तनाव और डिप्रेशन बढ़ रहा है। इसकी वजह से उनकी नींद में कमी हो रही है। देर रात तक फोन चलाने के कारण भी बच्चों की सोने की आदत बिगड़ रही है। इससे उनमें चिड़चिड़ाहट बढ़ रही है। जिससे उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर असर पड़ रहा है। जानकारों का मानना है कि सोशल मीडिया ऐप्स का अलगोरिदम ऐसा है, जिससे बच्चे ही नहीं, बड़े भी उसके लत का शिकार हो रहे हैं. इससे वे स्क्रीन के आदी हो रहे हैं। कई बार&nbsp; कम उम्र के बच्चों के सामने आत्महत्या, हिंसा या उम्र के हिसाब से गलत सामग्री भी आती है। वैसे सोशल मीडिया का अलगोरिदम ऐसा है कि नकारात्मक, हिंसा प्रधान और सेक्स से जुड़ी खबरें और दृश्य जल्दी वायरल होते हैं। सोशल मीडिया ट्रोलिंग और अभद्र टिप्पणियों का बड़ा और आसान माध्यम बन गया है। इनकी वजह से बच्चे मानसिक प्रताड़ना का शिकार हो रहे हैं। बच्चों को फंसाने वाले अपराधी उन्हे आसानी से अपना शिकार बना लेते हैं। इसीलिए दुनिया में कई देशों की सरकारें बच्चों के लिए सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर रोक लगाने की तैयारी में हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>रोक लगाने वालों में इंडोनेशिया भी शामिल हो चुका है, जिसने मार्च 2026 से इसके नियम लागू कर दिए हैं। इनके अनुसार, 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए यूट्यूब, टिकटॉक, फेसबुक और रोब्लॉक्स जैसे हाई-रिस्क प्लेटफॉर्म्स पर पाबंदी लगा दी गई है। इंडोनेशिया की तरह मलयेशिया ने भी ऑनलाइन सुरक्षा अधिनियम के तहत 16 साल से कम उम्र के बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट बनाने पर रोक लगा रखी है। संयुक्त अरब अमीरात ने बच्चों के लिए सोशल मीडिया के लिए न्यूनतम उम्र 15 वर्ष तय की है। इससे कम उम्र के बच्चों के अकाउंट बनाने पर यहां पूरी तरह रोक है। यूरोप के देश डेनमार्क में 15 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया ब्लॉक करने का कानून बन चुका है। बच्चों की उम्र की जांच के लिए सरकार डिजिटल एविडेंस ऐप पर काम कर रही है। इसी तरह ब्रिटेन की सरकार ने भी 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है, जो जनवरी 2027 से प्रभावी होने जा रही है। तुर्की में भी 15 साल से कम उम्र के बच्चों को सोशल मीडिया से दूर रखने के लिए कानून को मंजूरी मिल चुकी है, जिसे 2026 के अंत तक लागू किया जाना है। चीन में किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर पूरी तरह पाबंदी तो नहीं है, लेकिन उनके लिए सख्त "माइनर मोड" लागू है, जो रात के समय सोशल मीडिया ऐप्स के इस्तेमाल और स्क्रीन टाइम को सीमित करता है। ब्राजील का बाल एवं किशोर डिजिटल कानून 17 मार्च, 2026 से लागू हो चुका है। जिसके तहत 16 वर्ष से कम आयु के बच्चों को अपने सोशल मीडिया खाते को माता-पिता या कानूनी अभिभावक से जोड़ना अनिवार्य है। इसके अलावा, यह कानून युवाओं के लगातार स्क्रॉल जैसी आदतों पर प्रतिबंध लगाता है। जर्मनी में भी इसी तरह का नियम लागू हो चुका है। स्वीडन समेत कई अन्य देश भी ऐसी तैयारी में हैं। अपने यहां कर्नाटक राज्य भी ऐसे कानून पर काम कर रहा है। जबकि नोएडा के जिला प्रशासन ने स्कूलों में ऑनलाइन के इस्तेमाल को सीमित करने का निर्देश दिया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विदेशों की तुलना में जरा भारत को देखिए, यहां दिल्ली के जंतर-मंतर पर युवाओं और किशोरों ने जिस तरह अभद्र और अश्लील गालियों का कैमरे के सामने प्रदर्शन किया, उसे सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया ने देखा है। दिलचस्प है कि इसे प्रगतिशील बौद्धिकों के एक वर्ग ने समर्थन किया। दो राय नहीं कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल अगर सही तरीके से किया जाए तो उसकी पहुंच और त्वरा समाज को कई तरह के फायदे दिला सकती है। खामियां उजागर करके तंत्र पर दबाव बनाया जा सकता है। लेकिन हमें यह स्वीकार करने की हिचक नहीं होनी चाहिए कि देश में सोशल मीडिया अर्धनग्नता और अश्लीलता का वाहक बनता जा रहा है। इन्फ्लूएंसर बनने, रीच बढ़ाने और लाइक के जरिए कमाई के चक्कर में शरीफ परिवारों की महिलाओं को भी अंग प्रदर्शन से परहेज नहीं रहा। सोशल मीडिया के लिएकोई सेंसर नीति न होने की वजह से सबकी पहुंच किशोरों और बच्चों तक हो रही है। इसलिए भी जरूरी है कि पश्चिम की तरह अपने यहां भी इस पर ध्यान दिया जाए और महामारी बनने से पहले इस पर लगाम लगाने की कोशिश शुरू हो। नियमों का उल्लंघन करने पर सोशल मीडिया कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जाता है।</div><div><br></div><div>दिसंबर 2010 में ट्यूनिशिया से शुरू लोकतंत्र समर्थक लहर सोशल मीडिया के इतिहास का निर्णायक बिंदु है। सोशल मीडिया के सहारे यह लहर काहिरा के तहरीर चौक से सीरिया और लीबिया होते हुए समूचे अरब जगत में फैल गई। इतिहास में इस लहर को अरब स्प्रिंग यानी अरब का बसंत और पिंक रिवोल्यूशन या गुलाबी क्रांति के रूप में दर्ज है। अरब देशों में बदलाव लाने की सोच के विस्तार के पीछे सोशल मीडिया को बड़ा जरिया माना गया। लंबे यूरोपीय शासन और शिक्षा-दीक्षा के चलते भारतीय मानस अपनी सांस्कृतिक जड़ों और मूल्यों से कहीं ज्यादा प्रभावित है। इसलिए भारत में सोशल मीडिया पर ऑस्ट्रेलिया और दूसरे पश्चिमी देशों जैसे सवाल नहीं उठे। अगर इन देशों से पहले यहां सवाल उठते तो उसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बता दिया जाता। बहरहाल उम्मीद की जानी चाहिए कि हम भी पश्चिमी देशों से सबक लेंगे और अपने यहां के बचपन को स्वस्थ रखने और बचाने की कोशिश जरूर करेंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 14:56:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/so-that-childhood-remains-intact</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/social-media_large_1456_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या कैप्टन ने सरकार के 'कप्तान' पर ही सवाल उठा दिये हैं? अमरिंदर ने Modi-ism का जिक्र कर क्या संदेश दिया?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/captain-amarinder-singh-modi-ism-institution-centred-nation-building-democracy-punjab-elections]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पंजाब विधानसभा चुनावों से पहले राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह ने व्यक्ति-केंद्रित राजनीति पर सवाल उठाते हुए एक बड़ा राजनीतिक सवाल दागा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व और पिछले एक दशक की उपलब्धियों को स्वीकार करते हुए कैप्टन ने अंग्रेजी समाचार-पत्र में अपने आलेख के जरिए यह संकेत दिया है कि अब भाजपा और देश की राजनीति को सिर्फ एक नाम और एक व्यक्ति के इर्द-गिर्द सिमटने की बजाय मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और स्थायी लोकतांत्रिक ढांचे की ओर बढ़ना चाहिए। एक तरह से कैप्टन ने भाजपा को भी सलाह दे डाली है कि मोदी-इज़्म की अगली मंजिल केवल मोदी के नाम पर आगे बढ़ना नहीं, बल्कि ऐसी संस्था-केंद्रित व्यवस्था खड़ी करना होनी चाहिए, जो किसी एक नेता से परे जाकर देश की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत को स्थायी आधार दे सके।</div><div><br></div><div>अपने आलेख में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साफ तौर पर कहा है कि नरेंद्र मोदी के दौर ने भारतीय राजनीति और शासन की दिशा बदल दी है। उनके अनुसार, मोदी ने भारतीय जनता पार्टी को राजनीति के एक सीमित दायरे से निकालकर देशव्यापी शक्ति में बदला। डिजिटल सार्वजनिक ढांचे, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण, वित्तीय समावेशन, स्वच्छता, आवास, बिजली और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में हुए कामों का उल्लेख करते हुए उन्होंने माना कि मोदी सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धि सरकार की पहुंच और डिलीवरी क्षमता का विस्तार रही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/harsimrat-badal-reignites-speculation-about-an-sad-bjp-alliance-will-there-be-a-comeback-in-punjab" target="_blank">‘ऐसे समझौते...’: Harsimrat Badal ने SAD-BJP Alliance की अटकलों को फिर दी हवा, Punjab में होगी वापसी?</a></h3><div>लेकिन कैप्टन का असली संदेश इससे आगे जाता है। उनका तर्क है कि किसी भी लोकतंत्र की सफलता को केवल एक शक्तिशाली नेता की उपलब्धियों से नहीं मापा जा सकता। मजबूत सरकार और मजबूत नेता महत्वपूर्ण हैं, लेकिन लोकतंत्र की असली मजबूती मजबूत संस्थाओं, जवाबदेही और संवैधानिक संतुलन से आती है। उन्होंने सवाल उठाया कि मोदी-इज़्म की अगली यात्रा आखिर किस दिशा में होगी? क्या वह एक व्यक्ति के नेतृत्व के इर्द-गिर्द सीमित रहेगा या फिर ऐसी संस्थागत व्यवस्था खड़ी करेगा, जो किसी भी व्यक्ति के सत्ता से हटने के बाद भी देश को आगे बढ़ाती रहे?</div><div><br></div><div>यहीं से कैप्टन अमरिंदर सिंह का आलेख राजनीतिक रूप से और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। भाजपा के वरिष्ठ नेता होते हुए भी उन्होंने संसद की भूमिका, संसदीय समितियों की जांच, संघीय विमर्श, संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों को खुलकर उठाया है। उनका कहना है कि लोकतंत्र केवल नियमित चुनावों का नाम नहीं है। चुनावी जीत किसी सरकार को जनादेश जरूर देती है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि सत्ता के इस्तेमाल पर संस्थागत नियंत्रण कितना प्रभावी है।</div><div><br></div><div>कैप्टन ने विशेष रूप से संसद की समितियों और संसदीय जांच की भूमिका पर जोर दिया है। उनके अनुसार, बड़े फैसलों से पहले गंभीर विचार-विमर्श और समितियों की जांच को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। संघीय ढांचे के सवाल पर भी उनका संकेत साफ है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति संतुलन तथा संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता लोकतंत्र की दीर्घकालिक मजबूती के लिए जरूरी है।</div><div><br></div><div>उनका एक और महत्वपूर्ण तर्क कल्याणकारी योजनाओं को लेकर है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने कहा कि खाद्य सुरक्षा, आवास, छात्रवृत्ति और सामाजिक सुरक्षा जैसी योजनाओं को किसी नेता की उदारता या राजनीतिक उपहार के रूप में नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकार और राज्य के दायित्व के रूप में देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक, जब शासन का आधार व्यक्ति की छवि से आगे बढ़कर संस्थागत अधिकारों और जवाबदेही पर टिकेगा, तभी विकास की प्रक्रिया स्थायी और निष्पक्ष बन सकेगी।</div><div><br></div><div>आलेख में कैप्टन ने संविधान की मूल अवधारणाओं पर भी अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि बहुलतावाद, धर्मनिरपेक्षता और समाजवाद जैसे शब्दों पर राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन संवैधानिक व्यवस्था को केवल राजनीतिक नारों के आधार पर नहीं आंका जा सकता। उनका तर्क है कि समाजवाद का अर्थ निजी क्षेत्र का विरोध या राज्य का पूर्ण नियंत्रण नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक न्याय तथा अवसरों की समानता भी है।</div><div><br></div><div>कैप्टन अमरिंदर सिंह ने मोदी सरकार की उपलब्धियों को नकारने की बजाय उन्हें भारत की नई राजनीतिक वास्तविकता का हिस्सा माना है। उनका कहना है कि पिछले एक दशक में भारत ने ऊर्जा, महत्वाकांक्षा और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत पहचान हासिल की है। लेकिन उन्होंने यह भी चेताया है कि किसी नेता की ऐतिहासिक सफलता का अंतिम पैमाना केवल उसकी व्यक्तिगत लोकप्रियता या चुनावी जीत नहीं होती। असली कसौटी यह होती है कि उसके बाद देश की संस्थाएं कितनी मजबूत, स्वायत्त और सक्षम बनकर उभरती हैं।</div><div><br></div><div>यानी, कैप्टन का संदेश सीधे तौर पर मोदी के नेतृत्व को खारिज करने का नहीं, बल्कि उसकी अगली मंजिल तय करने का है। उनका मानना है कि मोदी-इज़्म का अगला चरण व्यक्ति-केंद्रित राजनीति से संस्था-केंद्रित राष्ट्र निर्माण की ओर बढ़ना चाहिए। मजबूत नेतृत्व अपनी जगह जरूरी है, लेकिन उसे संविधान, संसद, न्यायिक एवं संवैधानिक संस्थाओं और नागरिक अधिकारों की मजबूती के साथ आगे बढ़ना होगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो पंजाब के चुनावी माहौल में एक वरिष्ठ भाजपा नेता और दो बार के पूर्व मुख्यमंत्री की ओर से उठाया गया यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल पंजाब की राजनीति तक सीमित नहीं है। कैप्टन अमरिंदर सिंह ने अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के सामने एक बुनियादी सवाल रखा है कि क्या भारत का अगला विकास चरण केवल मजबूत नेता के भरोसे आगे बढ़ेगा, या फिर ऐसा संस्थागत ढांचा तैयार करेगा जो किसी भी नेता से बड़ा, ज्यादा टिकाऊ और आने वाली पीढ़ियों के लिए अधिक जवाबदेह हो?</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर देखें तो कैप्टन के शब्दों का सार यही है कि भारत को मजबूत नेतृत्व चाहिए, लेकिन उससे भी ज्यादा मजबूत लोकतांत्रिक संस्थाएं। और शायद यही वह बहस है, जिसे उन्होंने पंजाब चुनावों से पहले अपने आलेख के जरिए राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 21 Aug 2026 13:59:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/captain-amarinder-singh-modi-ism-institution-centred-nation-building-democracy-punjab-elections</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/21/modi-amarinder_large_1359_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या Gen-Z होना सुरक्षा नियम तोड़ने का लाइसेंस है? Kargil में महिला पर्यटक के आचरण से उठे कई गंभीर सवाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/kargil-gen-z-tourist-argues-indian-army-viral-video-border-security]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सोशल मीडिया पर इस समय एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक महिला पर्यटक भारतीय सेना के जवानों के साथ बहस कर रही है और खुद को “Gen-Z” बताकर सुरक्षा व्यवस्था को चुनौती दे रही है। शायद इस महिला को पता नहीं कि सीमा पर खड़े सैनिक की ड्यूटी कोई पर्यटन सेवा नहीं है और राष्ट्रीय सुरक्षा कोई ऐसी व्यवस्था नहीं है जिसे किसी पर्यटक की सुविधा, बहस या अधिकारों के नाम पर दरकिनार कर दिया जाए। साथ ही वीडियो में महिला खुद को “Gen-Z” बताते हुए यह कहती सुनाई देती है कि वह “यह बकवास बर्दाश्त नहीं करेगी।” यहां सवाल यह उठता है कि क्या किसी पीढ़ी का टैग राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल से ऊपर हो सकता है?</div><div><br></div><div>बताया जा रहा है कि वायरल वीडियो में दिखी घटना कारगिल सेक्टर के एक संवेदनशील हाई-एल्टीट्यूड चेक पोस्ट की है, जहां पर्यटकों के एक समूह को प्रतिबंधित दिशा में आगे बढ़ने से रोका गया। बताया जा रहा है कि संबंधित क्षेत्र में प्रवेश के लिए आवश्यक अनुमति और सुरक्षा नियम लागू थे। एक अन्य विवरण में इसे मिनामार्ग या मिनीमार्ग चेक पोस्ट के पास अस्थायी सड़क प्रतिबंध से जुड़ा बताया गया है। वीडियो में दिख रही तस्वीर बेहद स्पष्ट है। एक तरफ शांत रहकर सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन कराने की कोशिश करता जवान और दूसरी तरफ अपनी यात्रा, दूरी और अधिकारों का हवाला देकर बहस करता पर्यटक समूह।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/sergio-gor-kashmir-india-statement-pakistan-us-clash-trump-administration" target="_blank">Sergio Gor के बयान से तिलमिलाये Pakistan ने Trump Administration पर उतारी भड़ास, US Diplomat Natalie Baker को तलब कर थमाया Strong Demarche</a></h3><div>महिला पर्यटक का यह तर्क कि “हम Gen-Z हैं, हम यह सब बर्दाश्त नहीं करेंगे”, दरअसल उस मानसिकता को उजागर करता है जिसमें व्यक्तिगत सुविधा को व्यवस्था और सुरक्षा से ऊपर मान लिया जाता है। Gen-Z होना न कोई विशेष सुरक्षा पास है, न ही यह कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा प्रोटोकॉल को चुनौती देने का लाइसेंस है। सेना यह नहीं देखती कि सामने खड़ा व्यक्ति किस पीढ़ी का है; उसे यह देखना होता है कि सीमा सुरक्षित रहे, कोई संदिग्ध गतिविधि न हो और कोई नागरिक अनजाने में किसी खतरे की जद में न पहुंच जाए।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो कारगिल और नियंत्रण रेखा के आसपास के इलाके सामान्य पर्यटन स्थल नहीं हैं। यह वही संवेदनशील भूभाग है जहां भारत ने युद्ध का सामना किया है, जहां घुसपैठ और आतंकी गतिविधियों का इतिहास रहा है और जहां मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियां तथा सैन्य गतिविधियां हर समय सुरक्षा की अलग चुनौतियां पैदा करती हैं। ऐसे में सड़क बंद होना, आवाजाही नियंत्रित होना, चेकिंग होना या किसी क्षेत्र में प्रवेश के लिए अनुमति मांगना कोई “एंटी-टूरिस्ट” रवैया नहीं, बल्कि एक जरूरी सुरक्षा व्यवस्था है।</div><div><br></div><div>सेना और सुरक्षा एजेंसियों को वहां इसलिए तैनात रहना पड़ता है क्योंकि सीमावर्ती इलाकों में खतरे केवल दिखाई देने वाले नहीं होते। कई बार खुफिया सूचना के आधार पर तलाशी या घेराबंदी की जरूरत पड़ सकती है। कभी सैन्य काफिले की आवाजाही होती है, कभी खराब मौसम या भूस्खलन के कारण रास्ता असुरक्षित हो जाता है और कभी किसी संभावित खतरे को देखते हुए नागरिकों की आवाजाही अस्थायी रूप से रोकी जाती है। ऐसे निर्णय किसी एक पर्यटक को परेशान करने के लिए नहीं, बल्कि दर्जनों या सैकड़ों लोगों की जान बचाने के लिए लिए जाते हैं।</div><div><br></div><div>बर्फीली चोटियों, दुर्गम सड़कों और हर वक्त मौजूद संभावित खतरे के बीच जवान इसलिए तैनात है ताकि देश के नागरिक सुरक्षित रहें और पर्यटन जैसी सामान्य गतिविधियां भी संभव हो सकें। ऐसे में किसी पर्यटक का जवानों से यह पूछना कि रास्ता आखिर क्यों बंद किया गया है, हर परिस्थिति में उचित नहीं कहा जा सकता, क्योंकि सुरक्षा बलों के पास मौजूद खुफिया जानकारी, किसी विशेष इनपुट या चल रहे ऑपरेशन का कारण सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। कई बार एक मामूली-सा खुलासा भी सुरक्षा अभियान और जवानों की जान को जोखिम में डाल सकता है।</div><div><br></div><div>देश पुलवामा में सुरक्षा बलों के काफिले पर हुए आतंकी हमले की भयावहता देख चुका है और पहलगाम में पर्यटकों को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले की त्रासदी भी झेल चुका है। ऐसे अनुभव साफ बताते हैं कि संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा को लेकर एक छोटी-सी चूक कितनी भारी पड़ सकती है। इसलिए पर्यटकों को यह समझना होगा कि जब सेना या सुरक्षा बल किसी रास्ते को बंद करते हैं या आगे बढ़ने से रोकते हैं, तो हर निर्णय के पीछे की वजह कैमरे के सामने बताना संभव नहीं होता। ऐसे में जवान से बहस करना, वीडियो बनाकर उस पर अनावश्यक प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाना या सुरक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करना केवल असंवेदनशीलता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की गंभीरता को न समझ पाने का उदाहरण है। सुरक्षा के मामले में सहयोग और धैर्य ही समझदारी है, क्योंकि कई बार जिस खतरे को आम नागरिक देख नहीं सकता, उसे रोकने के लिए ही जवान वहां खड़ा होता है।</div><div><br></div><div>साथ ही वायरल हो रहे वीडियो में पर्यटक समूह के कुछ सदस्य यह कहते भी दिखाई देते हैं कि वे सैकड़ों किलोमीटर दूर से वहां पहुंचे हैं। लेकिन ऐसे लोगों को समझना होगा कि लंबी यात्रा किसी प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश का अधिकारपत्र नहीं बन जाती। यदि किसी क्षेत्र के लिए परमिट जरूरी है तो पहले उसकी जानकारी लेना और नियमों का पालन करना पर्यटक की जिम्मेदारी है। विशेष रूप से लद्दाख और अन्य संरक्षित सीमावर्ती क्षेत्रों में नियम परिस्थितियों और सुरक्षा स्थिति के अनुसार बदल सकते हैं। सैन्य प्रतिष्ठानों, चेक पोस्टों और रणनीतिक स्थानों पर फोटोग्राफी या वीडियोग्राफी भी प्रतिबंधित हो सकती है।</div><div><br></div><div>इस पूरे प्रकरण का सबसे चिंताजनक पहलू वह भाषा और रवैया है, जिसमें सुरक्षा व्यवस्था को व्यक्तिगत अधिकारों के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश दिखाई देती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने का अधिकार है, लेकिन संवेदनशील सैन्य चौकी पर ऑपरेशन या सुरक्षा प्रतिबंध के दौरान बहस करके आदेश बदलवाने का अधिकार किसी को नहीं है। संसद, टैक्स या किसी पीढ़ी का नाम लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा की जरूरतों को चुनौती देना न तो लोकतंत्र को मजबूत करता है और न ही नागरिक अधिकारों की रक्षा करता है।</div><div><br></div><div>दूसरी ओर, सोशल मीडिया पर इस वीडियो को लेकर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली जोकि स्वाभाविक है। लोगों ने महिला पर्यटक और उसके साथियों के रवैये को अहंकारी और गैर-जिम्मेदाराना बताया है। “Gen-Z” वाली टिप्पणी पर मीम्स भी बन रहे हैं, लेकिन इस घटना को केवल मनोरंजन के रूप में देखने की बजाय इससे एक गंभीर सबक लेने की जरूरत है। कैमरे के सामने हंगामा करके वायरल होना आसान है, लेकिन सीमा की सुरक्षा में एक छोटी-सी चूक की कीमत कितनी बड़ी हो सकती है, इसका अंदाजा वहां तैनात जवान को हमसे कहीं बेहतर है।</div><div><br></div><div>यह चेतावनी केवल उस महिला पर्यटक के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के लिए है जो सोशल मीडिया की लोकप्रियता, व्यक्तिगत सुविधा या पीढ़ीगत पहचान के नाम पर सुरक्षा नियमों को हल्के में लेते हैं। राष्ट्र की सुरक्षा किसी हैशटैग, नारे या वायरल वीडियो के हिसाब से नहीं चल सकती। सीमा पर तैनात सैनिक को अपना काम करने दीजिए। यदि रास्ता बंद है तो रुकिए, यदि अनुमति चाहिए तो परमिट लीजिए और यदि सुरक्षा बल वापस लौटने को कहें तो सहयोग कीजिए।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो इस घटना ने एक जरूरी संदेश जरूर दे दिया है कि यात्रा का अधिकार जिम्मेदारी के साथ आता है और राष्ट्रीय सुरक्षा के सामने व्यक्तिगत सुविधा का कोई दावा नहीं चल सकता। सीमा की हकीकत को सभी को समझना होगा। जेन जी हो या कोई भी हो, वर्दी का सम्मान कीजिए, प्रोटोकॉल का पालन कीजिए और याद रखिए, जवान आपकी आजादी रोकने के लिए नहीं, आपकी सुरक्षा और देश की सीमाओं की रक्षा के लिए वहां खड़े हैं।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/kargil-gen-z-tourist-argues-indian-army-viral-video-border-security</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/20/gen-z-tourist-controversy_large_1341_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[नितिन नवीन की नई टीमः नई ऊर्जा और नया संतुलन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/nitin-navin-new-team-new-energy-and-new-balance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन ने अपनी नई राष्ट्रीय टीम की घोषणा के साथ यह संकेत दे दिया है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदों के पुनर्विन्यास के रूप में नहीं, बल्कि आने वाले राजनीतिक दौर की आवश्यकताओं के अनुरूप नए सिरे से गढ़ने की दिशा में आगे बढ़ रही है। 17 अगस्त 2026 को घोषित नई टीम में 13 राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, 8 राष्ट्रीय महासचिव और 16 राष्ट्रीय सचिवों सहित संगठन के विभिन्न स्तरों पर व्यापक परिवर्तन किया गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी नई टीम को संगठनात्मक अनुभव, ऊर्जा और जमीनी जुड़ाव का मिश्रण बताया है। इस टीम को समझने के लिए इसे केवल ‘कौन आया और कौन गया’ के चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे भाजपा की दीर्घकालीन संगठनात्मक रणनीति, सामाजिक समीकरणों की समझ और आने वाले चुनावों की राजनीतिक चुनौतियों को पढ़ना अधिक महत्वपूर्ण है। नितिन नवीन की टीम का सबसे बड़ा संदेश है-अनुभव को हटाकर युवा ऊर्जा नहीं लाई गई है, बल्कि अनुभव के साथ नई ऊर्जा को जोड़ा गया है। यही संतुलन किसी बड़े राजनीतिक संगठन को गतिशील बनाता है।</div><div><br></div><div>राम माधव की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष के रूप में वापसी इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। संगठन, वैचारिक संवाद और रणनीतिक राजनीति की उनकी समझ भाजपा के लिए उपयोगी हो सकती है। वसुंधरा राजे सिंधिया, डी. पुरंदेश्वरी, बैजयंत पांडा, तीरथ सिंह रावत और अन्य वरिष्ठ नेताओं को महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देकर यह स्पष्ट किया गया है कि नितिन नवीन ने वरिष्ठता और अनुभव को किनारे नहीं किया है। यह उस संगठनात्मक सोच का प्रमाण है जिसमें पुराने अनुभव को नई परिस्थितियों के अनुरूप इस्तेमाल करने की कोशिश दिखाई देती है। दूसरी ओर स्मृति ईरानी को राष्ट्रीय महासचिव की जिम्मेदारी देना भी केवल एक व्यक्ति की वापसी नहीं है। स्मृति ईरानी का राजनीतिक व्यक्तित्व आक्रामक संवाद, महिला मतदाताओं से जुड़ाव और राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी राजनीतिक संप्रेषण से जुड़ा रहा है। उनकी वापसी भाजपा के लिए राजनीतिक संदेश और संगठनात्मक उपयोगिता-दोनों दृष्टियों से महत्वपूर्ण है। उनके साथ विनोद तावड़े, सुनील बंसल जैसे संगठनात्मक अनुभव रखने वाले नेताओं को महासचिव की जिम्मेदारी मिलना संगठन और चुनावी प्रबंधन के बीच बेहतर तालमेल की ओर संकेत करता है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/akhilesh-yadav-jayant-chaudhary-chavanni-rupya-political-war" target="_blank">अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल</a></h3><div>पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष बनाया जाना भी उल्लेखनीय है। यह जिम्मेदारी बताती है कि संगठन में राजनीतिक अनुभव के साथ प्रशासनिक, आर्थिक और पेशेवर दक्षता को भी महत्व दिया जा रहा है। बी. एल. संतोष का राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बने रहना संगठन की निरंतरता को सुनिश्चित करता है। अर्थात् नितिन नवीन ने पूरी तरह से ‘पुराना हटाओ, नया लाओ’ की नीति नहीं अपनाई, बल्कि जहां निरंतरता आवश्यक थी वहां उसे बनाए रखते हुए परिवर्तन के लिए पर्याप्त जगह बनाई है। नई टीम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष सामाजिक और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व है। भाजपा के लिए अब राजनीति केवल चुनाव जीतने तक सीमित नहीं है, समाज के अलग-अलग वर्गों में संगठन की स्वीकार्यता और पहुंच बढ़ाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। नई टीम में महिलाओं, विभिन्न सामाजिक समुदायों, उत्तर भारत से लेकर पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत तक के प्रतिनिधित्व को स्थान दिया गया है। रिपोर्टों के अनुसार टीम में महिलाओं और अल्पसंख्यक समुदायों के प्रतिनिधियों को भी उल्लेखनीय जगह मिली है।&nbsp;</div><div><br></div><div>यहां एक और महत्वपूर्ण संकेत दिखाई देता है-भाजपा अब केवल अपने परंपरागत समर्थक वर्ग से संवाद करने के बजाय नए मतदाता समूहों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है। युवा, प्रथम बार मतदान करने वाली पीढ़ी, शहरी पेशेवर, तकनीक से जुड़े वर्ग और महिलाओं की राजनीतिक आकांक्षाएं आज चुनावी परिणामों को प्रभावित करती हैं। इसलिए संगठन में ऐसे चेहरों की आवश्यकता है जो केवल राजनीतिक भाषण न दें, बल्कि बदलते समाज की भाषा समझें। भाजपा की नई टीम में इस दिशा का प्रयास स्पष्ट दिखाई देता है। विशेष रूप से युवा मोर्चा और महिला मोर्चा के स्तर पर किए गए बदलाव इस बात का संकेत हैं कि संगठन भविष्य के मतदाता को आज से ही संबोधित करना चाहता है। जेन-जी को केवल सोशल मीडिया की पीढ़ी मानना भूल होगी। यह पीढ़ी रोजगार, तकनीक, उद्यमिता, पारदर्शिता, राष्ट्रवाद, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और अवसरों को लेकर अलग तरह की अपेक्षाएं रखती है। भाजपा यदि इस पीढ़ी से वास्तविक संवाद स्थापित कर पाती है तो उसका लाभ केवल आगामी चुनाव में नहीं, बल्कि 2030 और 2040 के दशक की राजनीति में भी मिल सकता है।</div><div><br></div><div>नई टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक परीक्षण हालांकि उत्तर प्रदेश और अन्य चुनावी राज्यों में होगा। उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में संगठन की मजबूती का सीधा असर राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ता है। आगामी चुनावों की दृष्टि से भाजपा के सामने केवल सत्ता विरोधी भावनाओं का मुकाबला करने की चुनौती नहीं है, बल्कि विपक्ष के बदलते गठजोड़, जातीय समीकरण, युवाओं की आकांक्षाओं और स्थानीय मुद्दों को भी साधना है। इसलिए राष्ट्रीय टीम में उत्तर प्रदेश सहित विभिन्न राज्यों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देना चुनावी दृष्टि से स्वाभाविक रणनीति है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि नई टीम का उद्देश्य केवल 2026-27 के चुनाव नहीं हो सकते। भाजपा की दृष्टि निश्चित रूप से 2029 के लोकसभा चुनाव और उससे आगे तक जाती है। ‘विकसित भारत 2047’ का लक्ष्य तभी राजनीतिक और सामाजिक आधार प्राप्त कर सकता है जब पार्टी संगठन निरंतर नई पीढ़ी को अपने साथ जोड़ता रहे। इसलिए नितिन नवीन की टीम को एक प्रकार से 2029 की तैयारी और 2047 की राजनीतिक-संगठनात्मक नींव के रूप में भी देखा जा सकता है।</div><div><br></div><div>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार के स्तर पर भी आने वाले समय में परिवर्तन या विस्तार की अटकलें स्वाभाविक हैं, विशेषकर जब सरकार को आगामी राज्यों के राजनीतिक समीकरणों और प्रशासनिक प्राथमिकताओं को साथ लेकर चलना है। लेकिन मंत्रिमंडल विस्तार के संबंध में अभी किसी विशेष व्यक्ति की नियुक्ति को निश्चित मानना उचित नहीं होगा। अनुराग ठाकुर जैसे अनुभवी नेताओं के संभावित भविष्य की चर्चा राजनीतिक हलकों में हो सकती है, पर अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री और भाजपा नेतृत्व पर निर्भर करेगा। नरेन्द्र मोदी की राजनीति में संगठन और सरकार के बीच नई जिम्मेदारियों के माध्यम से ऊर्जा पैदा करने की परंपरा रही है, इसलिए भविष्य में कोई महत्वपूर्ण बदलाव हो तो उसे आश्चर्य के बजाय व्यापक रणनीति का हिस्सा माना जाना चाहिए। वास्तव में नितिन नवीन की नई टीम का सबसे बड़ा संदेश ‘रीसेट’ नहीं, ‘रीकैलिब्रेशन’ है-अर्थात् संगठन को पूरी तरह बदलना नहीं, बल्कि बदलते राजनीतिक वातावरण के अनुरूप उसकी दिशा और गति को पुनर्संतुलित करना। वरिष्ठ नेताओं का अनुभव, युवाओं की ऊर्जा, महिलाओं की बढ़ती भूमिका, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व, सामाजिक विविधता और पेशेवर दक्षता-इन सभी को एक मंच पर लाने का प्रयास दिखाई देता है। नई टीम में 65 पदाधिकारियों में बड़ी संख्या में नए चेहरों को जिम्मेदारी मिलने की बात भी सामने आई है, जो संगठन में पीढ़ीगत बदलाव की गति को दर्शाती है।</div><div><br></div><div>अब असली चुनौती पद प्राप्त करने वालों की नहीं, परिणाम देने वालों की होगी। संगठन कितना जमीनी बनेगा, कार्यकर्ताओं और नेतृत्व के बीच संवाद कितना मजबूत होगा, सोशल मीडिया के शोर के बाहर जनता की वास्तविक समस्याओं को कितना समझा जाएगा और युवाओं-महिलाओं सहित नए सामाजिक वर्गों का विश्वास कितना अर्जित किया जाएगा-इन्हीं कसौटियों पर नितिन नवीन की नई टीम का मूल्यांकन होगा। कुल मिलाकर यह टीम भाजपा की उस राजनीति की तस्वीर प्रस्तुत करती है जिसमें अनुभव को विरासत, युवा ऊर्जा को भविष्य और सामाजिक विविधता को विस्तार का माध्यम बनाया गया है। यदि नितिन नवीन इस टीम की क्षमताओं को एक साझा संगठनात्मक लक्ष्य में बदल पाए, तो यह परिवर्तन केवल भाजपा के पदाधिकारियों की सूची में बदलाव नहीं रहेगा, बल्कि पार्टी की कार्यशैली, जनसंपर्क और चुनावी रणनीति में दिखाई देने वाला परिवर्तन बन सकता है। आने वाले चुनाव इस प्रयोग की पहली परीक्षा होंगे और 2029 उसका बड़ा मूल्यांकन। फिलहाल इतना कहा जा सकता है कि भाजपा ने अपने संगठन को नई दिशा देने का प्रयास किया है और अब उस दिशा को जनविश्वास में बदलने की जिम्मेदारी नितिन नवीन तथा उनकी नई टीम के कंधों पर है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/nitin-navin-new-team-new-energy-and-new-balance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/20/nitin-navin_large_1331_23.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अखिलेश यादव के वार पर जयंत चौधरी का संयमित पलटवार, पश्चिमी यूपी की राजनीति में नया उबाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/akhilesh-yadav-jayant-chaudhary-chavanni-rupya-political-war]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री जयंत चौधरी का नाम लिए बिना ऐसा तंज कसा है जिसकी गूंज सीधे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सियासी मैदान तक पहुंच गई। अखिलेश ने कहा, “कहां-कहां से आ गए थे, चवन्नी का रुपया बना दिया, फिर भी…”। दरअसल अखिलेश ने अपने इस बयान के जरिये पुराने साथी को राजनीति में आगे बढ़ाने का दावा किया और फिर साथी द्वारा उन्हें छोड़ देने पर अपनी शिकायत दर्ज कराई लेकिन इस दौरान उनके जो तेवर रहे उसने पश्चिमी यूपी की सियासत को गर्मा दिया है। रालोद कार्यकर्ता सड़कों पर उतर आये हैं और अखिलेश यादव के पुतले फूंक रहे हैं।</div><div><br></div><div>यही नहीं, रालोद प्रमुख जयंत चौधरी ने भी अखिलेश पर पलटवार करते हुए दर्शा दिया है कि एक्शन का रिएक्शन तत्काल होगा। हालांकि अखिलेश के तंज पर जयंत चौधरी ने पलटवार तल्खी की बजाय बेहद नपे-तुले अंदाज में किया। उन्होंने कहा, “वो अपनी बात कहें तो अच्छा है। उनके साथ खड़े होने वाले हर सहयोगी… इस तरह की बयानबाजी से सोचने को मजबूर हो रहे हैं।” जयंत ने आगे कहा, “लोकतंत्र है, यहां जनता सबको बनाती है और सबको बिगाड़ती है।” जब उनसे पूछा गया कि अखिलेश उन्हें इतना क्यों याद कर रहे हैं, तो उन्होंने गेंद वापस अखिलेश के पाले में डालते हुए कहा, “ये तो आप लोग उनसे जाकर पूछिए।”</div><div><br></div><div>दरअसल, यह सिर्फ दो नेताओं की निजी राजनीतिक नोकझोंक नहीं है। इसके पीछे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के बदलते जातीय और गठबंधन समीकरण की पूरी पटकथा पढ़ी जा सकती है। 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा और रालोद ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। इस गठबंधन में जाट-मुस्लिम समीकरण को साधने की कोशिश साफ दिखाई दी थी। अखिलेश यादव ने जयंत चौधरी को राज्यसभा भेजने में भी भूमिका निभाई। लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले पूर्व प्रधानमंत्री और जयंत के दादा चौधरी चरण सिंह को भारत रत्न मिलने के बाद रालोद ने एनडीए का दामन थाम लिया। अब जयंत भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं और केंद्र सरकार में राज्यमंत्री हैं।</div><div><br></div><div>यही बदलाव अखिलेश के मौजूदा हमले को राजनीतिक धार देता है। सपा प्रमुख लगातार पीडीए यानि पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश में हैं। पश्चिमी यूपी में उनकी चुनौती इसलिए भी बड़ी है क्योंकि यहां सपा का पारंपरिक मुस्लिम-यादव आधार पूर्वांचल या मध्य यूपी की तरह निर्णायक नहीं रहा है। ऐसे में गुर्जर, दलित, अन्य पिछड़ी जातियों और गैर-जाट मतदाताओं को जोड़ना सपा की रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>जयंत चौधरी का रालोद इस गणित में छोटी पार्टी जरूर है, लेकिन पश्चिमी यूपी में उसका प्रभाव उसके चुनावी आंकड़ों से कहीं ज्यादा राजनीतिक वजन रखता है। जाट समुदाय में चौधरी चरण सिंह की विरासत और रालोद की पकड़ अब भी गठबंधन राजनीति के लिए अहम है। भाजपा के साथ जयंत की मौजूदगी एनडीए को पश्चिमी यूपी में जाट समर्थन को साधने का अतिरिक्त आधार देती है। यही कारण है कि अखिलेश का “चवन्नी” वाला तंज महज पुरानी दोस्ती का हिसाब नहीं, बल्कि नए सामाजिक समीकरणों की जंग भी माना जा रहा है।</div><div><br></div><div>दिलचस्प यह है कि अखिलेश ने हाल में अपने नेताओं-कार्यकर्ताओं को चुनावी समय में सोच-समझकर बयान देने की नसीहत दी थी, ताकि भाजपा को कोई राजनीतिक लाभ न मिले। इसके तुरंत बाद जयंत पर निशाना साधना बताता है कि सियासी प्राथमिकताएं कभी-कभी रणनीतिक संयम पर भारी पड़ जाती हैं।</div><div><br></div><div>उधर, जयंत ने तीखा पलटवार करने की बजाय संयम चुना। शायद इसलिए कि वह अखिलेश के बनाए जाट बनाम गैर-जाट नैरेटिव में फंसना नहीं चाहते। उनकी सौम्य प्रतिक्रिया का संदेश भी उतना ही राजनीतिक है। इसका अर्थ यह है कि रालोद अब सपा के साथ नहीं बल्कि एनडीए के साथ ही अपना भविष्य देख रहा है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, “चवन्नी” और “रुपया” की यह लड़ाई असल में पश्चिमी यूपी की उस सियासी तिजोरी की लड़ाई है, जिसकी चाबी जाट, मुस्लिम, दलित, गुर्जर और अन्य पिछड़े मतदाताओं के हाथ में है। देखा जाये तो चुनावी राजनीति में सवाल यह नहीं कि किसने किसे रुपया बनाया; असली सवाल यह है कि जनता की नजर में अब कौन कितने का है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div><div><br></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 18:23:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/akhilesh-yadav-jayant-chaudhary-chavanni-rupya-political-war</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/19/akhilesh-yadav-and-jayant-chaudhary_large_1822_24.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[‘दिमागी नक्सली’ यानी सियासी तापमान ब़ढ़ाने वाले शब्द]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/intellectual-naxal-a-term-that-raises-the-political-temperature]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>लालकिले की प्राचीर से होने वाले प्रधानमंत्री के सालाना संबोधन पर चर्चाएं और बहसें होना कोई नई बात नहीं है। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त दो शब्दों ‘दिमागी नक्सल’ ने चर्चाओं की तासीर बढ़ा दी है। ऐसा नहीं कि इन शब्दों के संजीदापन को प्रधानमंत्री नहीं जानते होंगे। प्रधानमंत्री द्वारा इन शब्दों के प्रयोग के पीछे दो वजहे साफ नजर आती हैं। दरअसल इस बहाने प्रधानमंत्री देश के उस वर्ग की तरफ दिलाना चाहते हैं, जिसकी नजर में उनकी और उनकी&nbsp; सरकार का हर कदम गलत और दकियानूसी है। दूसरी वजह, अपने समर्थकों और पार्टी कार्यकर्ताओं को नए उत्साह से भरना है, जो हालिया कुछ घटनाओं से किंचित निराश हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>लालकिले की प्राचीर से देश के संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने जो कहा, उस पर एक बार फिर ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा, "21वीं सदी में यह बहुत ज़रूरी है कि हम दशकों पुरानी उन चुनौतियों को खत्म करें, जिन्होंने देश को पीछे रखा है। नक्सलवाद और माओवाद ने लाखों युवाओं का भविष्य बर्बाद कर दिया है। उन्होंने अनगिनत माताओं के युवा बेटों को छीन लिया और देश भर के परिवारों के सपनों को चकनाचूर कर दिया। लगभग चार दशकों तक, नक्सलवाद ने भारत के बड़े हिस्सों और उसकी आबादी के एक बड़े हिस्से को अपनी गिरफ्त में रखा, बंदूक के दम पर शासन किया और संविधान की धज्जियां उड़ाईं। आज हथियारों वाले नक्सल से बड़ी चुनौती दिमागी नक्सली ज्यादा खतरनाक हैं, इससे देश को बचाना होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/the-prime-minister-resolve-for-a-viksit-bharat-from-the-red-fort" target="_blank">प्रधानमंत्री मोदी का लालकिले से 'विकसित भारत' का संकल्प</a></h3><div>कभी देश के एक तिहाई हिस्से को लाल गलियारे के रूप में जाना जाता था। कभी माओवादियों और नक्सलियों की समानांतर सत्ता नेपाल से लेकर आंध्र प्रदेश तक समानांतर सत्ता चलती थी। उनके प्रभाव वाले क्षेत्रों कों ‘ पशुपति से तिरूपति तक ’ के नाम से जाना जाता था। देश का गृहमंत्रालय की कमान संभालने के बाद अमित शाह ने 31 मार्च तक देश को लाल गलियारे से मुक्त कराने का वादा किया था। अमित शाह की दोहरी रणनीति के चलते यह गलियारा अब नक्सली हिंसा और आतंक से मुक्त हो चुका है। इसे संयोग कहें या कुछ और, जिस वक्त लाल किले से प्रधानमंत्री देश को संबोधित कर रहे थे, उसी वक्त लाल गलियारे वाले उड़ीसा के मलकानगिरी और छत्तीसगढ़ के बस्तर के कई गांवों में पहली बार तिरंगा लहरा रहा था। उन तिरंगों को सलामी देने वालों में वे लोग भी भारतीय संविधान के तहत हासिल पुलिस या होमगार्ड की वर्दी में शामिल थे, जो हाल के दिनों तो इन इलाकों में भारतीय संविधान को नहीं मानते थे, जिनका मानना था कि सत्ता बारूद से निकलती है। अब भी उनके हाथों में बंदूकें हैं, जिनके ट्रिगर पर अब भी उनकी ही उंगलियां हैं,लेकिन अब वे भारतीय संविधान की मर्यादा से बंध चुकी हैं।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>प्रधानमंत्री ने अपने संबोधन में इस बदलाव को रेखांकित किया है, लेकिन उन्हें आशंका है कि समाज के विशेषकर बौद्धिक वर्ग में जो नक्सलवादी मानस के लोग हैं, उनसे निबटना आसान नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><div>वैसे दिमागी नक्सली कोई नए शब्द नहीं है। करीब दशक भर पहले फिल्मकार विवेक अग्निहोत्री ने इसी तरह अर्बन नक्सली शब्द का इस्तेमाल किया था। तब से वामपंथी हिंसा का विरोधी मानस इन शब्दों का खुलकर प्रयोग करता रहा है। वह मानता रहा है कि देश में जब भी अराजक परिस्थितियां बनती हैं, उसके पीछे अर्बन नक्सलियों की ही सोच काम करती है। कह सकते हैं कि दिमागी नक्सली शब्द ने उन्हीं शब्दों को नई पहचान दे दी है। देश का अधिसंख्य बौद्धिक समाज शायद ही इससे इत्तेफाक रखता हो, लेकिन अतीत में यह वर्ग ‘दबाव समूह’ के रूप में काम करता रहा है। छह अप्रैल 2020 को दंतेवाड़ा में घात लगाकर नक्सलियों ने केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 75 और छत्तीसगढ़ पुलिस के एक सवाल को बारूदी सुरंगों से उड़ा दिया था। इस घटना के बाद देश का बड़ा वर्ग सदमे में था। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने नक्सलियों को सबक सिखाने के लिए सैनिक कार्रवाई करने की ठान ली थी। उस दौरान भी दिमागी नक्सलियों को विश्वविद्यालयों और दूसरे संस्थानों में चिन्हित करने की प्रक्रिया चली थी। लेकिन शहरों में वामपंथी उग्रवाद के समर्थक लोगों के प्रबल विरोध के चलते मनमोहन सरकार सैनिक कार्रवाई से पीछे हट गयी थी। हालाकि इस घटना के तीन साल एक महीने बाद 25 मई 2013 को छत्तीसगढ़ की झीरम घाटी में घात लगाकर नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ कांग्रेस के तकरीबन समूचे नेतृत्व को उड़ा दिया था।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>भुक्तभोगी होने के बावजूद कांग्रेस की अगुआई वाली केंद्रीय सरकार ने नक्सलियों को नेस्तनाबूद करने के लिए न तो ठोस रणनीति बना सकी और न ही रोक लगाने में कामयाब हुई। वह सिर्फ 'रोकथाम' की रणनीति पर चलती रही, लेकिन अमित शाह ने इसे बदलकर 'पूरी तरह खत्म करने' की रणनीति को अपनाया। इसके तहत, 'वामपंथी उग्रवाद’ के प्रति 'ज़ीरो टॉलरेंस' नीति बनाई गई। देश को नक्सल मुक्त करने के राष्ट्रीय लक्ष्य के तहत संवाद, सुरक्षा और समन्वय पर जोर दिया। खुफिया जानकारी पर आधारित ऑपरेशन किए जाने लगे।&nbsp; केंद्रीय और राज्य बलों के बीच बेहतर तालमेल बनाया गया और जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद के लिए खजाना खोला गया। इसके साथ ही मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों के पुनर्वास की व्यवस्था को भी जारी रखा गया। खुफिया जानकारी ही थी, कि बसवराजू, पतिराम मांझी, गणेश उइके और मिलिंद तेलतुंबडे जैसे कई बड़े माओवादी नेताओं को सुरक्षा बलों ने घेर कर ढेर कर दिया। सुरक्षा बलों के लगातार दबाव के चलते छत्तीसगढ़, तेलंगाना और महाराष्ट्र में बड़े पैमाने पर आत्मसमर्पण हुए।</div><div><br></div><div>इसका असर जल्द दिखने लगा। नक्सली हिंसा में 56 फीसद और जवानों की मौतों में 75 फीसद की कमी आई। आम नागरिकों के शिकार बनने की घटनाओं में भी 70 प्रतिशत की कमी आई। इसके चलते नक्सल-प्रभावित ज़िलों की संख्या 2014 के 126 की तुलना में 2026 में घटकर सिर्फ एक जिले तक सीमित हो गई है।&nbsp;</div><div><br></div><div>सुरक्षा और विकास की साझी रणनीति के तहत सुरक्षा अभियानों के साथ-साथ पुलिसिंग, कनेक्टिविटी, वित्तीय समावेश और आजीविका में लगातार निवेश किया, गया। इसके तहत 2014 के बाद नक्सली इलाकों में&nbsp; 594 थाने, 408 नए सुरक्षा कैंप और 12,211 किलोमीटर लंबी सड़कें बनाई गईं। इससे वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाक़ों में राज्य की मौजूदगी बढ़ी। वामपंथी उग्रवाद प्रभावित इलाकों में संचार कनेक्टिविटी, बैंकिंग ढांचा, डाकघर,आईटीआई, कौशल विकास केंद्र और पुनर्वास नीतियों का जमकर विस्तार किया गया। इससे आर्थिक अवसर पैदा हुए और पूर्व माओवादी कैडरों को मुख्यधारा में लौटने के लिए प्रोत्साहन मिला।&nbsp;</div><div><br></div><div>लालकिले की प्राचीर से अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने इसे अपनी सरकार की उपलब्धि के रूप में गिनाया भी। हाल ही में सफल माने जा रहे काकरोच जनता पार्टी के आंदोलन में पीछे से वामपंथी उग्रवाद समर्थक ताकतों के हाथ की चर्चाएं रहीं। बीस जुलाई के संसद मार्च के दिन हुई हिंसा के पीछे दिल्ली पुलिस पेशेवर अपराधियों के साथ ही वामपंथी संगठनों के हाथ को भी मान रही है। सरकार का मानना है कि हथियार बंद नक्सलियों को पहचानना और उनका मुकाबला आसान है, बनिस्बत समाज के बीच उनकी जैसी मानसिकता का सामना आसान नहीं है।&nbsp;</div><div>&nbsp;</div><div>वैसे विपक्षी दलों को एतराज है कि इस बहाने प्रधानमंत्री और उनकी सरकार का विरोध करने वालों को दिमागी नक्सली कहकर किनारे करने की कोशिश होगी। उनका तर्क है कि इसके जरिए लोकतंत्र की खासियत ‘लोकतांत्रिक विरोध’ के अधिकार को भी बाधित किया जा सकता है। फिर लोकतंत्र का कोई मतलब नहीं रह जाएगा। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने जिस तरह इन शब्दों को लेकर सरकार पर जवाबी हमला बोला है, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में ये दोनों शब्द चर्चा में ही नहीं रहेंगे, बल्कि सियासी तापमान को बढ़ाए रखने का बड़ा जरिया होंगे।</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं..</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 14:43:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/intellectual-naxal-a-term-that-raises-the-political-temperature</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/18/pm-modi_large_1446_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भाजपा राष्ट्रीय पदाधिकारियों की नई सूची ने जो सियासी संकेत दिया है वह सबके समझ में आने वाली बात नहीं है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/bjp-nitin-nabin-new-team-smriti-irani-amit-malviya]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नितिन नबीन की बहुप्रतीक्षित टीम का आज आखिरकार ऐलान हो ही गया। भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन ने संगठन में लंबे समय से चल रही कवायद को अंजाम देते हुए अपनी नई राष्ट्रीय टीम सामने रख दी है। इस टीम में अनुभव, क्षेत्रीय संतुलन, सामाजिक समीकरण और चुनावी जरूरतों का ऐसा मिश्रण तैयार किया गया है, जिसमें पार्टी के पुराने दिग्गजों से लेकर नए चेहरों तक को जिम्मेदारी दी गई है। लेकिन इस पूरी कवायद में दो फैसले राजनीतिक चर्चा के केंद्र में हैं। एक तो अमित मालवीय को आईटी सेल प्रमुख की जिम्मेदारी से बाहर का रास्ता दिखाया गया है, जबकि पूर्व केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी की राष्ट्रीय महासचिव के तौर पर भाजपा के शीर्ष संगठन में वापसी हुई है।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि आईटी और सोशल मीडिया सेल की कमान अब छत्तीसगढ़ के दीपक म्हास्के को दी गई है। वहीं अनिल बलूनी मीडिया प्रभारी की अपनी जिम्मेदारी पर कायम हैं। यानी भाजपा ने डिजिटल मोर्चे पर चेहरे में बदलाव किया है, लेकिन मीडिया प्रबंधन के मौजूदा ढांचे में निरंतरता बनाए रखी है। इस बदलाव को केवल संगठनात्मक फेरबदल मानना मुश्किल है। यह संकेत है कि नितिन नबीन डिजिटल और राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई में नई रणनीति और नए चेहरों के साथ उतरना चाहते हैं। साथ ही चूंकि नितिन नबीन छत्तीसगढ़ में पार्टी के प्रभारी रह चुके हैं ऐसे में वह जानते हैं कि उस राज्य के किस नेता की कार्यक्षमता का उपयोग कहां पर करना पार्टी के लिए ज्यादा फायदेमंद रहेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-has-full-confidence-in-new-bjp-team-urges-them-to-focus-on-organization-and-public-service" target="_blank">PM Modi का नई BJP टीम पर पूरा भरोसा, बोले- संगठन और जनसेवा पर दें ध्यान</a></h3><div>इसके अलावा, स्मृति ईरानी की वापसी इस टीम का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। उन्हें उत्तर प्रदेश का राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। आक्रामक राजनीतिक शैली, संसदीय अनुभव और विपक्ष के खिलाफ मुखर राजनीतिक लड़ाई के लिए पहचाने जाने वाली स्मृति ईरानी को संगठन के शीर्ष स्तर पर लाना बताता है कि भाजपा उत्तर प्रदेश जैसे निर्णायक राज्य में राजनीतिक सक्रियता को और धार देना चाहती है।</div><div><br></div><div>राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है। उनके साथ तीरथ सिंह रावत, राम माधव, बैजयंत पांडा, डी. पुरंदेश्वरी, रेखा वर्मा, वर्षाबेन नरेंद्रभाई दोशी, डॉ. भारती प्रवीण पवार, मनप्रीत सिंह बादल, लाल सिंह आर्य, एम. नागराजा, प्रो. तारिक मंसूर और डॉ. मधुचंद्र कर को राष्ट्रीय उपाध्यक्ष की जिम्मेदारी मिली है। छह महिला उपाध्यक्षों की मौजूदगी से महिला प्रतिनिधित्व का संदेश भी स्पष्ट है।</div><div><br></div><div>इसके अलावा, राष्ट्रीय महासचिवों की टीम में विनोद तावड़े, सुनील बंसल, बिप्लब कुमार देब, स्मृति ईरानी, डॉ. सतीश पूनिया, गजेंद्र पटेल, हरीश द्विवेदी और संजय भाटिया शामिल हैं। संगठन के स्तर पर बीएल संतोष राष्ट्रीय महासचिव संगठन बने हुए हैं, जबकि शिवप्रकाश और सौदान सिंह को राष्ट्रीय संयुक्त महासचिव संगठन की जिम्मेदारी मिली है। इसका अर्थ है कि नबीन ने संगठन की अनुभवी मशीनरी को बनाए रखते हुए राजनीतिक मोर्चे पर अपनी टीम को विस्तार दिया है।</div><div><br></div><div>साथ ही 16 राष्ट्रीय सचिवों की सूची में भी व्यापक क्षेत्रीय संतुलन दिखाई देता है। कविता पाटीदार, के. सुरेंद्रन, डॉ. भोला सिंह, डॉ. प्रदीप वर्मा, जगदीश ईश्वरभाई पटेल, आम आदमी पार्टी से भाजपा में आये डॉ. संदीप पाठक और फांगनॉन कोन्याक, संगीता यादव, अनिल एंटनी, डॉ. एम. वेंकटेशन, मनोज तिग्गा, सिद्धार्थ शंभू, डॉ. स्वदेश सिंह, मृगांका देब बर्मन, रोहन गुप्ता और जय प्रकाश को राष्ट्रीय सचिव बनाया गया है। इनमें दक्षिण, पूर्वोत्तर, पूर्वी भारत, हिंदी पट्टी और शहरी राजनीतिक पृष्ठभूमि, सभी को जगह मिली है।</div><div><br></div><div>नई टीम के अन्य हिस्से भी राजनीतिक संकेत दे रहे हैं। केंद्रीय कार्यालय प्रभारी तरुण चुग और केंद्रीय कार्यालय सचिव महेंद्र पांडे बनाए गए हैं। नॉर्थ-ईस्ट कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी डॉ. संबित पात्रा और संयुक्त कोऑर्डिनेटर की जिम्मेदारी राजीव बब्बर को दी गई है। सभी सेल्स के समन्वय की कमान विष्णु दत्त शर्मा को मिली है, जबकि ऋतुराज सिन्हा और विष्णु वर्धन रेड्डी संयुक्त समन्वयक होंगे।</div><div><br></div><div>मोर्चों की कमान भी सामाजिक और चुनावी विस्तार को ध्यान में रखकर तय की गई है। युवा मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. हेमंग जोशी, महिला मोर्चा की अध्यक्ष रूप कुमारी चौधरी, ओबीसी मोर्चा के अध्यक्ष अमरपाल मौर्य, किसान मोर्चा के अध्यक्ष बंसीलाल गुर्जर, एससी मोर्चा के अध्यक्ष शिवेश कुमार राम, एसटी मोर्चा के अध्यक्ष डॉ. मन्नालाल रावत और अल्पसंख्यक मोर्चा के अध्यक्ष कुंवर बसीत अली बनाए गए हैं। इससे भाजपा ने समाज के अलग-अलग वर्गों के बीच संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश की है।</div><div><br></div><div>वित्तीय मोर्चे पर केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल को राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष और राजस्थान के राजेश मंगल को संयुक्त कोषाध्यक्ष बनाया गया है। पीयूष गोयल के प्रशासनिक और आर्थिक अनुभव का लाभ संगठन के वित्तीय प्रबंधन को मिल सकता है। पीयूष गोयल पहले भी पार्टी के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष रह चुके हैं। यहां सवाल यह है कि अब देखना यह होगा कि 'एक व्यक्ति एक पद' के सिद्धांत को महत्व देने वाली भाजपा क्या पीयूष गोयल से केंद्रीय मंत्री का पद छोड़ने को कहती है या फिर वह दोनों पदों पर बने रहेंगे?</div><div><br></div><div>कुल मिलाकर नितिन नबीन की टीम का संदेश साफ है कि भाजपा अब संगठन को केवल पदाधिकारियों की सूची के रूप में नहीं, बल्कि चुनावी मशीनरी के रूप में कसना चाहती है। राम माधव की रणनीतिक समझ, वसुंधरा राजे का जनाधार, स्मृति ईरानी की आक्रामक राजनीतिक शैली, सुनील बंसल का संगठनात्मक अनुभव, पीयूष गोयल की प्रशासनिक क्षमता और दक्षिण-पूर्वोत्तर से आए नेताओं का क्षेत्रीय अनुभव पार्टी के लिए अलग-अलग मोर्चों पर उपयोगी साबित हो सकता है।</div><div><br></div><div>लेकिन असली चुनौती भी यहीं से शुरू होती है। अलग-अलग क्षमताओं और महत्वाकांक्षाओं वाले नेताओं को एक सूत्र में बांधना, राज्यों में गुटबाजी को नियंत्रित करना, डिजिटल नैरेटिव को विपक्ष के हमलों के सामने प्रभावी बनाना, संगठन और सरकार के बीच तालमेल कायम रखना और आगामी चुनावों में इन नियुक्तियों के जरिये साधे गये सामाजिक समीकरणों को वास्तविक वोटों में बदलना आसान नहीं होगा। नितिन नबीन ने टीम चुन ली है; अब इस टीम को परिणाम देने वाली राजनीतिक ताकत में बदलना उनकी सबसे बड़ी परीक्षा होगी।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 17:43:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/bjp-nitin-nabin-new-team-smriti-irani-amit-malviya</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/17/nitin-nabin_large_1746_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा मानसून सत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/monsoon-session-failed-to-live-up-to-expectations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>संसदीय मर्यादाओं का क्षरण कब तक? आखिर कब हम संसद के एक-एक मिनट का उपयोग करने की पात्रता विकसित करेंगे? आजादी की 80वीं वर्षगांठ की आयोजना से पूर्व भारत में संसद का मानसून सत्र जिस निराशाजनक स्थिति, नाउम्मीदी और उपेक्षापूर्ण स्थितियां के साथ संपन्न हुआ, वह केवल किसी एक दल, सरकार या विपक्ष की विफलता नहीं है, बल्कि हमारी संसदीय संस्कृति के सामने खड़ा एक गंभीर प्रश्नचिह्न है। 25 दिनों तक चले इस सत्र में तीखी राजनीतिक बहस के बजाय हंगामा, नारेबाजी, गतिरोध और कार्यवाही बाधित करने की प्रवृत्ति अधिक प्रभावी रही। प्रश्न यह नहीं है कि सत्ता पक्ष सही था या विपक्ष, प्रश्न यह है कि क्या हमारी संसद अपने मूल दायित्व-जनता के प्रश्नों पर गंभीर विमर्श, सरकार की जवाबदेही और राष्ट्रहित में कानून निर्माण को पूरा कर पा रही है? इस सत्र के आंकड़े स्वयं बहुत कुछ कह रहे हैं। लोकसभा की उत्पादकता बमुश्किल 19 प्रतिशत रही, जबकि राज्यसभा में लगभग 39 प्रतिशत काम हो पाया। लोकसभा में एक भी दिन प्रश्नकाल पूरा नहीं हो सका। यह स्थिति इसलिए अधिक चिंताजनक है क्योंकि प्रश्नकाल संसद की आत्मा माना जाता है। देश की जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों को सरकार से प्रश्न पूछने और सरकार को उनका उत्तर देने का अवसर ही यदि सदन में उपलब्ध न हो, तो लोकतंत्र की जवाबदेही किस रास्ते से सुनिश्चित होगी? 28 जुलाई को लोकसभा में अपेक्षाकृत ठीक काम हुआ, जबकि राज्यसभा में भी केवल कुछ दिन ही सार्थक कार्यवाही हो सकी। शेष समय का बड़ा हिस्सा राजनीतिक टकराव की भेंट चढ़ गया।</div><div><br></div><div>संसद केवल ईंट-पत्थर से बनी इमारत नहीं है। वह भारत की सामूहिक चेतना का सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है। वहां देश के करोड़ों नागरिकों की आकांक्षाएं, समस्याएं और सपने पहुंचते हैं। किसान, मजदूर, विद्यार्थी, महिला, व्यापारी, युवा, गरीब और वंचित वर्ग-सभी की आवाज संसद के माध्यम से राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनती है। इसलिए संसद का एक मिनट भी केवल सांसद का समय नहीं होता, वह देश की जनता के धन, विश्वास और लोकतांत्रिक अधिकार का समय होता है। संसद का प्रत्येक व्यर्थ गया मिनट वास्तव में जनता के विश्वास से घटा हुआ एक मिनट है। दुर्भाग्य यह है कि संसद में हंगामा अब अपवाद नहीं, बल्कि संसदीय राजनीति का लगभग नियमित हथियार बनता जा रहा है। मुद्दे उठाना लोकतांत्रिक अधिकार है, सरकार को घेरना विपक्ष का दायित्व है और असहमति लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन असहमति को संवाद में बदलने के बजाय कार्यवाही रोक देना लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता। विरोध की भी एक मर्यादा होती है। यदि विपक्ष अपनी बात रखने के लिए सदन को चलने ही न दे और सत्ता पक्ष विपक्ष की आवाज सुनने की बजाय राजनीतिक बहुमत को ही पर्याप्त समझे, तो दोनों मिलकर संसदीय लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/parliament-monsoon-session-2026-19-percent-lok-sabha-39-17-percent-rajya-sabha-productivity" target="_blank">Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल!</a></h3><div>इस सत्र में कुछ घटनाएं इस गिरावट को और स्पष्ट करती हैं। लोकसभा अध्यक्ष ने सत्र के समापन पर पारंपरिक समापन भाषण नहीं दिया। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस द्वारा लोकसभा अध्यक्ष के साथ होने वाली चाय पार्टी का बहिष्कार किया जाना भी केवल एक कार्यक्रम का बहिष्कार नहीं माना जा सकता। यह सदन के भीतर बढ़ती राजनीतिक कटुता का संकेत है। लोकतंत्र में मतभेद स्वाभाविक हैं, मनभेद लोकतंत्र के लिए घातक हैं। संसद में बहस के बाद हाथ मिलाने की संस्कृति विकसित होनी चाहिए, बहस के बाद दूरी बढ़ाने की नहीं। इस मानसून सत्र को नीट-यूजी पेपर लीक, जंतर-मंतर छात्र आंदोलन, शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग और राम मंदिर में दान चोरी जैसे मुद्दों के लिए भी याद किया जाएगा। जंतर-मंतर पर हुई हिंसा के बाद विपक्ष केंद्रीय गृहमंत्री से जवाब मांग रहा था। जब सत्र के अंतिम दिनों में गृहमंत्री जवाब देने को तैयार हुए तो विपक्ष द्वारा उनका वक्तव्य सुनने से इनकार करना संसदीय विवेक की कसौटी पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। यदि विपक्ष को सरकार के जवाब से असहमति थी, तो उसे सुनकर तथ्यात्मक प्रतिवाद करना अधिक प्रभावी लोकतांत्रिक रास्ता होता। संसद में जवाब सुनने से इनकार करना प्रश्न का समाधान नहीं, प्रश्न को अनुत्तरित छोड़ना है।</div><br><div>यह भी सच है कि तमाम गतिरोध के बीच संसद ने कुछ महत्वपूर्ण काम किए। विदेशी अंशदान विनियमन संशोधन विधेयक यानी एफसीआरए को सरकार ने विरोध के बीच संयुक्त संसदीय समिति के पास भेजा। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन विधेयक, 2026 दोनों सदनों में पारित हुआ, जिसका उद्देश्य परीक्षाओं में अनुचित साधनों पर अंकुश लगाना और दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई सुनिश्चित करना है। बैंकिंग रिकॉर्ड को नए डिजिटल ढांचे से जोड़ने, जन्म-मृत्यु के विलंबित पंजीकरण को अधिक कठोर बनाने तथा अन्य विधायी एवं प्रशासनिक सुधारों की दिशा में भी कदम उठे। केरल का नाम विधिवत केरलम किए जाने का निर्णय भी इसी सत्र का हिस्सा रहा। ये उपलब्धियां बताती हैं कि यदि संसद चले तो कम समय में भी महत्वपूर्ण काम संभव है। लेकिन सवाल फिर वही है-जब संसद चल सकती है तो उसे बार-बार रोकने की आवश्यकता क्यों पड़ती है? क्या हम यह भूल गए हैं कि लोकतंत्र का अर्थ केवल चुनाव जीतना नहीं है? लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ है-विचारों का सम्मान, असहमति की स्वीकार्यता, संवाद की निरंतरता और निर्णय प्रक्रिया में जनता की भागीदारी। सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि बहुमत उसे शासन करने का अधिकार देता है, लेकिन विपक्ष को सुनने से मुक्त नहीं करता। दूसरी ओर विपक्ष को यह स्वीकार करना होगा कि विरोध का अधिकार संसद को निष्क्रिय करने का अधिकार नहीं है।</div><div><br></div><div>अतीत में हमारी संसदीय परंपरा ने अनेक कठिन दौर देखे हैं। तीखी बहसें हुईं, वैचारिक संघर्ष हुए, सरकारों की आलोचना हुई, लेकिन संसद को संवाद का मंच बनाए रखने की कोशिश होती रही। आज आवश्यकता है कि हम उस परंपरा को पुनर्जीवित करें। राजनीतिक दलों को अपने भीतर यह आत्ममंथन करना होगा कि क्या वे जनता के बीच जाकर यह कह सकते हैं कि हमने संसद में आपके प्रश्नों के लिए उपलब्ध समय का पूरा उपयोग किया? क्या कोई सांसद गर्व से कह सकता है कि उसने अपने कार्यकाल के प्रत्येक संसदीय अवसर को राष्ट्रहित में लगाया? संसद में हंगामा करना आसान है, लेकिन संसद चलाना चरित्र, संयम और लोकतांत्रिक परिपक्वता मांगता है। नारे लगाने के लिए ऊर्जा चाहिए, लेकिन तथ्यपूर्ण बहस के लिए अध्ययन चाहिए। माइक के सामने खड़े होने के लिए राजनीतिक उत्साह चाहिए, लेकिन कानून बनाने के लिए दूरदृष्टि चाहिए। कार्यवाही रोकने के लिए संख्या पर्याप्त हो सकती है, लेकिन राष्ट्र निर्माण के लिए विवेक, धैर्य और संवाद आवश्यक है।</div><div><br></div><div>आजादी के 80वें वर्ष की ओर बढ़ते भारत के लिए यह आत्ममंथन का समय है। हमने विज्ञान, अर्थव्यवस्था, तकनीक और वैश्विक प्रतिष्ठा के अनेक क्षेत्रों में बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन क्या हमारी राजनीतिक संस्थाएं भी उसी गति से परिपक्व हुई हैं? क्या हम संसदीय प्रणाली को इतना सशक्त बना पाए हैं कि संसद के एक-एक मिनट का अधिकतम उपयोग कर सकें? क्या हम अपनी असहमति को इतनी गरिमा दे पाए हैं कि विरोध भी हो और संवाद भी बना रहे? क्या हम सत्ता को इतनी विनम्रता और विपक्ष को इतना विवेक दे पाए हैं कि दोनों मिलकर लोकतंत्र को मजबूत करें? इन प्रश्नों के उत्तर केवल संसद भवन के भीतर नहीं खोजे जाने चाहिए। राजनीतिक दलों के नेतृत्व, सांसदों, संसदीय कार्यप्रणाली और अंततः हम नागरिकों-सभी को इस पर विचार करना होगा। जनता को भी यह प्रश्न पूछना चाहिए कि उसका प्रतिनिधि संसद में कितनी बार उपस्थित रहा, कितने प्रश्न पूछे, कितनी बहसों में भाग लिया और राष्ट्र के लिए क्या सार्थक योगदान दिया। लोकतंत्र केवल पांच वर्ष में एक बार वोट देने से मजबूत नहीं होता, लोकतंत्र तब मजबूत होता है जब जनता अपने प्रतिनिधियों से निरंतर जवाब मांगती है। हंगामा किसी दल की विजय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र की सामूहिक पराजय है। संसद चलेगी तो प्रश्न पूछे जाएंगे, प्रश्न पूछे जाएंगे तो सरकार जवाब देगी, जवाब मिलेगा तो नीतियों की समीक्षा होगी और सार्थक कानून बनेंगे। यही लोकतंत्र की जीवन-धारा है।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 17:08:19 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/monsoon-session-failed-to-live-up-to-expectations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/17/monsoon-session_large_1710_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत में पाकिस्तानियों को मिल गई नागरिकता?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/did-pakistanis-get-citizenship-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>किसी पाकिस्तानी को आज के दौर में हिंदुस्तान में बसाना, उन्हें पनाह देना या फिर नागरिकता देनी वाली बात, शायद ही किसी के गले उतरे? बसाना तो दूर, ऐसा सोचना मात्र भी, सूरज का पूरब की जगह पश्चिम से निकलने जैसा माना जाएगा। पर, यह कोरी कल्पना पिछले दिनों हकीकत में तब्दील हुई। भारत में 56 साल पहले आए पाकिस्तानियों को नागरिकता दी गई है। वह भी एकाध लोगों को नहीं, बल्कि हजारों को। सरकार ने पिछले महीने बकायदा एक रंगारंग कार्यक्रम कर, ढोल-नगाड़े बजाकर विस्थापित पाकिस्तानियों को नागरिकता प्रमाण पत्र बांटे। ताज्जुब यह भी है कि ऐसा चमत्कार हुकूमत ने ऐसे माहौल में किया, जब समूचे भारत में विभिन्न देशों के घुसपैठियों को निकालकर उन्हें खदेड़ने का अभियान केंद्रीय व राज्य स्तरों पर छिड़ा हो। इस अभियान की बानगी हमने हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधाानसभा चुनाव के दौरान भी देखा। जब दो बॉर्डर राज्य, असम और पश्चिम बंगाल, का चुनाव इसी मसले के इर्दगिर्द घूमा। घुसपैठियों के अलावा भारत में कुछ वर्षों से एनआरसी और सीएए का भी शोर है। बावजूद इसके सरकार ने पाकिस्तानियों को नागरिकता देने का बड़ा जाखिम उठाया। सरकार ने यह कदम क्यों उठाया? हालांकि, इस फैसले के सियासी मायने बहुतेरे हैं, जिसकी तस्वीर आने वाले दिनों में दिखाई भी देगी।</div><div>&nbsp;&nbsp;</div><div>सरकार ने विस्थापितों को नागरिकता हिंदुस्तान के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दी है। जिले का नाम है पीलीभीत जो नेपाल बॉर्डर से एकदम सटा हुआ है जिसकी पहचान बांसुरी निमार्ण के अलावा तराई क्षेत्र के लिए भी प्रसिद्ध है। पीलीभीत को मिनी पंजाब भी कहते हैं। प्राकृतिक सौंदर्य से लबरेज, जैव-विविधता के अलावा विश्व प्रसिद्ध टाइगर रिजर्व तो है ही, धान की पैदावार के लिए भी जिला पूरे प्रदेश में विख्यात है। सरकार ने जिन परिवारों को बसाने का फैसला किया है उनमें बंगाली हिन्दू, बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं। भारत के नक्शे में देखें, तो पीलीभीत हिंदुस्तान के एक अलहदे छोर पर बसा है जहां करीब पांच दशक से भी ज्यादा पहले पाकिस्तान से आए विस्थापित लोग बस गए थे। तभी, से वह विभिन्न सरकारों से नागरिकता मांगते आए हैं। सरकारी कागजों के मुताबिक पूर्वी पाकिस्तान से वर्ष 1959 से 1971 के बीच पाकिस्तान से पीड़ित होकर कुछेक परिवार भारत आए थे। शुरूआत में यह परिवार कई राज्यों में भटकते रहे, कहीं ठिकाना नहीं मिला। आखिरकार उन्हें बाद में यही जिला मुफीद लगा। पीलीभीत के अलावा कुछ नागरिकता रामपुर और बिजनौर में बसे विस्थापितों को भी दी गई है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/javed-akhtar-slams-asif-ali-zardari-over-remarks-on-hindu-minority" target="_blank">'हिंदुओं को किसी तरह सहन कर रहे हैं पाकिस्तान के मुसलमान', Zardari के इस बयान पर भड़के Javed Akhtar, Pakistan President को दिखाया आईना</a></h3><div>पीलीभीत के जिस क्षेत्र में यह परिवार रहते आए हैं वह जगह कभी विरान होती थी। इन लोगों ने इसे रहने लायक बनाया और उबड़खाबड़ जगहों पर मेहनत करके उसे खेतीबाड़ी के लिए तैयार किया। आज इस क्षेत्र में अच्छी फसलें उगती हैं। सभी के पास कागजी दस्तावेजों के रूप में भारतीय आधार कार्ड, पैन कार्ड, राशन कार्ड इत्यादि पहले से मौजूद हैं। साथ ही लंबे वक्त से मतदान भी करते आए हैं। लेकिन नागरिकता और मालिकाना हक से वंचित थे, जिसे मौजूदा योगी सरकार ने पूरा कर दिया। ये परिवार पीलीभीत जिले के अमरिया, न्यूरिया, शारदा डैम की तलहटी सहित आसपास के क्षेत्रों में बसे हैं। सरकार ने उन्हें खेती और आवास के लिए जमीन तो पहले से दी हुई हैं। लेकिन मालिकाना हैसियत नहीं दी, जिसके लिए यह लोग दशकों जद्दोजहद कर रहे थे। प्रत्येक चुनावों में इनसे के झूठा आश्वासन हुआ। पूर्ववर्ती बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी की सरकारों ने भी इनको नागरिकता दिलवाने का दिलासा दिया। पर, कुछ राजनैतिक अड़चनों के चलते वादा पूरा नही ंकर पाए।&nbsp;</div><div><br></div><div>बीते 2022 के विधानसभा चुनाव में इनके साथ वादा किया गया था, जिसे अब पूरा किया गया। प्रदेश सरकार की पहल पर सभी पीड़ित परिवारों को सूचीबद्ध करके नागरिकता और मालिकाना के प्रमाण बांटे गए हैं। नागरिकता करीब 2500 परिवारों को दी गई हैं जिनकी कुल संख्या 15 हजार के आसपार है। ऐसा करके सरकार ने शायद विपक्षी दलों को बड़ा सियासी मुद्दा बैठे-बिठाए थमा दिया है। ये लोग वर्ष 1960 से 1975 के बीच धार्मिक प्रताड़ना के चलते पूर्वी बंगालादेश जो अब पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा है, से भारत आए थे और उत्तर प्रदेश के तराई के जिले पीलीभीत में आकर बसे। ये क्षेत्र पीलीभीत जिले की कलीनगर व पूरनपुर तहसीलों में आते हैं जहां ये करीब 25-26 गांवों में बसे हैं। पिछले महीने 29 जून को सूबे के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का जिले में दौरा हुआ जिसमें मुख्यमंत्री ने इनको ना सिर्फ नागरिकता के प्रमाण पत्र बांटे, बल्कि मालिकाना हक के सरकारी कागज भी दिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह फैसला चुनाव के ऐन वक्त लिया गया। प्रदेश में मात्र 6-7 महीनों बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। इसलिए सरकार के इस निर्णय पर प्रदेश की राजनीति जमकर गर्माई हुई है। विपक्षी पार्टियों ने सीधे-सीधे एक बड़े वोटबैंक को साधने का आरोप मौजूदा सरकार पर लगाया है। पाकिस्तानी विस्थापियों को बसाने का यह पहला चरण है, अभी दूसरा चरण शेष है। 35 हजार लोग और हैं जो बहराईच, बाराबंकी, गोंडा, लखीमपुर, बिजनौर जैसे जिलों में बसे हैं। सभी को चिंहित किया जा चुका है, अगले कुछ महीनों बाद इन्हें भी मुकम्मल नागरिकता देने का फैसला हो चुका है। सरकारी आंकड़ों की माने तो प्रदेश के करीब सात-आठ जिलों में कुल 55 हजार विस्थापित पाकिस्तानियों की आबादी है, इनमें प्रत्येक वर्ष तेजी से इजाफा भी हो रहा है। 56 वर्ष पहले धार्मिक प्रताड़ना के रूप में मात्र 12 हजार 380 लोग आए थे। आबादी बढ़ाने के पीछे इनका मकसद था कि बढ़ी आबादी से सरकारों को वोटिंग का लालच देकर किसी भी दल पर दबाव बना सकेंगे। कमोबेश, हुआ भी वैसा ही। अपने योजनाओं में यह लोग आज सफल हुए हैं।</div><div><br></div><div>- डॉ. रमेश ठाकुर</div><div>सदस्य, राष्ट्रीय जन सहयोग एवं बाल विकास संस्थान (NIPCCD), भारत सरकार!</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 17:00:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/did-pakistanis-get-citizenship-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/17/citizenship-certificate_large_1702_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[आत्मनिर्भरता से विकसित भारत की ओर आजादी की उड़ान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-flight-of-freedom-towards-a-self-reliant-and-developed-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>15 अगस्त भारत के राष्ट्रीय जीवन का वह गौरवपूर्ण दिन है, जब हमारी धरती ने पराधीनता की लंबी रात के बाद स्वतंत्रता का सूर्य देखा था। 2026 में हम स्वतंत्रता का 80वां दिवस मना रहे हैं। यह केवल अतीत के गौरव को याद करने का अवसर नहीं, बल्कि यह आत्ममंथन करने का भी समय है कि जिन सपनों के लिए असंख्य स्वतंत्रता सेनानियों ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया था, उन सपनों को हमने कितना साकार किया और अब 2047 में स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष तक भारत को कैसा बनाना है। 1947 ने हमें राजनीतिक स्वतंत्रता दी थी, लेकिन 2047 का लक्ष्य हमें आर्थिक, सामाजिक, तकनीकी, सामरिक और नैतिक रूप से आत्मनिर्भर एवं विकसित भारत बनाने का है।</div><div><br></div><div>स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं है। स्वतंत्रता तब सार्थक होगी, जब प्रत्येक नागरिक भय, अभाव, अशिक्षा, बेरोजगारी, भेदभाव और अवसरों की असमानता से मुक्त हो। जब व्यक्ति अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों को भी समझे, जब लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने और सरकार बनाने की प्रक्रिया न रहकर जनकल्याण का माध्यम बने, जब राजनीति में सेवा, सार्वजनिक जीवन में शुचिता और समाज में संवेदना प्रतिष्ठित हो। आजादी की पहली पीढ़ी ने देश को गुलामी से मुक्त किया था; आज की पीढ़ी को देश को निर्भरता, पिछड़ेपन और आत्महीनता से मुक्त करना है। पिछले वर्षों में भारत की यात्रा में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई देता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले की प्राचीर से बार-बार देश को आत्मनिर्भरता, नवाचार और युवाशक्ति का मंत्र दिया है। 2025 के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में उन्होंने विशेष रूप से युवा वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, प्रतिभाशाली युवाओं और शोधकर्ताओं का आह्वान करते हुए पूछा कि भारत अपने लड़ाकू विमानों के लिए जेट इंजन स्वयं क्यों नहीं बना सकता। उन्होंने सेमीकंडक्टर से लेकर अंतरिक्ष, जैव-प्रौद्योगिकी और रक्षा तक भारतीय प्रतिभा को अपनी क्षमता के बल पर आगे बढ़ने का आग्रह किया। उन्होंने युवाओं के विचारों को रोकने के बजाय उन्हें अवसर देने और उनके नवाचार को राष्ट्रनिर्माण से जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया। यह बदलाव केवल भाषणों तक सीमित नहीं है। आज छोटे शहरों, कस्बों और गांवों से निकलने वाली प्रतिभाएं स्टार्टअप, अंतरिक्ष, खेल, विज्ञान, डिजिटल तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में नई पहचान बना रही हैं। प्रधानमंत्री ने लाल किले से यह भी रेखांकित किया है कि भारत के युवाओं ने देश को दुनिया के अग्रणी स्टार्टअप इकोसिस्टम में स्थान दिलाया है और अनेक छोटे शहरों तथा ग्रामीण क्षेत्रों के युवा नई तकनीकी संभावनाओं को जन्म दे रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/79-years-of-independence-a-celebration-of-achievements-an-opportunity-for-introspection" target="_blank">स्वतंत्रता के 79 वर्ष: उपलब्धियों का उत्सव, आत्ममंथन का अवसर</a></h3><div>आत्मनिर्भर भारत इसी बदलती मानसिकता का परिणाम है। आत्मनिर्भरता का अर्थ दुनिया से कट जाना नहीं, बल्कि दुनिया के साथ बराबरी से खड़े होकर अपने सामर्थ्य के आधार पर प्रतिस्पर्धा करना है। भारत अब केवल आयात करने वाला विशाल बाजार नहीं रहना चाहता; वह निर्माण करने, नवाचार करने और दुनिया को निर्यात करने वाला देश बन रहा है। मोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल, फार्मा, रक्षा उपकरण, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल सेवाओं में भारत की क्षमता लगातार बढ़ी है। गैर-पेट्रोलियम वस्तुओं के निर्यात ने भी नए रिकॉर्ड बनाए हैं, जबकि सेवाओं के क्षेत्र में भारत की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मक शक्ति लगातार मजबूत हुई है। आत्मनिर्भरता की सबसे प्रभावशाली तस्वीर रक्षा क्षेत्र में दिखाई देती है। कभी भारत विश्व के बड़े हथियार आयातकों में गिना जाता था, लेकिन अब स्वदेशी उत्पादन और रक्षा निर्यात दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत के रक्षा निर्यात ने 38,424 करोड़ रुपये का रिकॉर्ड स्तर हासिल किया, जो पिछले वर्ष के 23,622 करोड़ रुपये से 62.66 प्रतिशत अधिक है। यह परिवर्तन बताता है कि भारत अब केवल अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं को पूरा करने की दिशा में आगे नहीं बढ़ रहा, बल्कि विश्व के देशों को रक्षा सामग्री उपलब्ध कराने की क्षमता भी अर्जित कर रहा है। इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत ने गोला-बारूद, हथियार, उप-प्रणालियां, प्रणालियां और महत्वपूर्ण पुर्जे लगभग 80 देशों तक पहुंचाए हैं। 2013-14 में रक्षा निर्यात महज 686 करोड़ रुपये था, जो 2024-25 में 23,622 करोड़ रुपये तक पहुंच गयाकृअर्थात एक दशक में लगभग 34 गुना वृद्धि। यह ‘मेक इन इंडिया’ से ‘मेक फॉर द वर्ल्ड’ की यात्रा का सशक्त प्रमाण है।</div><div><br></div><div>लेकिन आत्मनिर्भर भारत की असली परीक्षा केवल अर्थव्यवस्था और तकनीक में नहीं है। हमें ऐसा भारत बनाना है जो आत्मनिर्भर होने के साथ आत्मसंयमी भी हो, शक्तिशाली होने के साथ संवेदनशील भी हो और आधुनिक होने के साथ अपनी संस्कृति एवं नैतिक जड़ों से जुड़ा भी हो। महात्मा गांधी, भगवान महावीर और भगवान बुद्ध ने हमें बताया था कि विकास का अंतिम लक्ष्य मनुष्य की गरिमा और समाज में शांति है। यदि तकनीक बढ़ती जाए लेकिन मनुष्यता घटती जाए, यदि संपन्नता बढ़े लेकिन संवेदना कम हो जाए, यदि अधिकारों की मांग बढ़े लेकिन कर्तव्यबोध समाप्त हो जाए तो स्वतंत्रता अधूरी ही रहेगी। हमारे सामने आज भी गरीबी, बेरोजगारी, असमानता, भ्रष्टाचार, सामाजिक तनाव, हिंसा, पर्यावरण संकट और डिजिटल असमानता जैसी चुनौतियां हैं। इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि कमियों को पहचानकर उन्हें दूर करने का संकल्प भी है। हमें ऐसी नागरिक संस्कृति विकसित करनी होगी जिसमें सत्य, शुचिता, सहिष्णुता, अनुशासन, परस्पर सम्मान और राष्ट्रहित सर्वाेपरि हों। लोकतंत्र की मजबूती केवल संसद या सरकार से नहीं होती; वह नागरिक के चरित्र से होती है। लोकतंत्र को मजबूत संसद के साथ मजबूत समाज और जिम्मेदार नागरिक भी चाहिए।</div><div><br></div><div>आज का भारत विश्व की युवा शक्ति का महत्वपूर्ण केंद्र है। 2047 तक विकसित भारत का लक्ष्य मूलतः युवाओं का लक्ष्य है, क्योंकि आज का युवा ही 2047 के भारत का नेतृत्व करेगा। प्रधानमंत्री ने ‘विकसित भारत/2047 रू वॉइस ऑफ यूथ’ पहल के माध्यम से युवाओं को केवल भविष्य के लाभार्थी नहीं, बल्कि परिवर्तन के एजेंट के रूप में सामने रखा है।&nbsp; इसीलिए 2026 के स्वतंत्रता दिवस अभियान का केंद्र भी युवाओं को एक मजबूत, आत्मनिर्भर, नवाचारी और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण से जोड़ना है। सरकारी ‘माय भारत’ पहल में युवाओं की भागीदारी को विशेष महत्व दिया गया है। 2047 की यात्रा में हमें युवाओं से केवल नौकरी पाने की अपेक्षा नहीं करनी चाहिए; उन्हें रोजगार देने वाला, समस्या का समाधान खोजने वाला, नवाचार करने वाला और समाज का नेतृत्व करने वाला बनाना होगा। शिक्षा को डिग्री से कौशल, कौशल से रोजगार और रोजगार से उद्यमिता की ओर ले जाना होगा। गांव का युवा भी अंतरिक्ष में अवसर देखे, छोटे शहर की बेटी भी विज्ञान और तकनीक में विश्वस्तरीय पहचान बनाए, किसान का बेटा भी एग्रीटेक उद्यमी बने और सामान्य परिवार का युवा भी स्टार्टअप के माध्यम से हजारों लोगों के लिए रोजगार पैदा करेकृयही नए भारत की तस्वीर है।</div><div><br></div><div>आजादी की पहली लड़ाई में युवाओं ने अपने प्राणों की आहुति देकर भारत को स्वतंत्र बनाया था। 2047 के भारत की लड़ाई में युवाओं को ज्ञान, नवाचार, चरित्र, परिश्रम और राष्ट्रभावना को अपना हथियार बनाना होगा। यदि 1947 की पीढ़ी ने पूछा थाकृ‘भारत को आजाद कैसे कराएं?’, तो आज की पीढ़ी को पूछना होगा-‘भारत को दुनिया का विकसित, समर्थ, शांतिपूर्ण और नैतिक नेतृत्व करने वाला राष्ट्र कैसे बनाएं?’स्वतंत्रता की सार्थकता इसी प्रश्न के उत्तर में छिपी है। हमें ऐसा भारत बनाना है जहां विकास की चमक के साथ मानवीयता की रोशनी भी हो; जहां विज्ञान आगे बढ़े तो संस्कार भी साथ चलें; जहां अर्थव्यवस्था मजबूत हो तो समाज भी समरस हो; जहां भारत अपनी सुरक्षा के लिए किसी पर निर्भर न हो और विश्व की शांति में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाए।</div><div><br></div><div>आज जब तिरंगा लाल किले की प्राचीर पर लहराएगा, तब हमें केवल यह नहीं कहना चाहिए कि भारत स्वतंत्र है, बल्कि यह संकल्प भी लेना चाहिए कि हम इस स्वतंत्रता को अधिक सार्थक, अधिक जिम्मेदार और अधिक जनकल्याणकारी बनाएंगे। 2047 का विकसित भारत सरकार का अकेला सपना नहीं, 140 करोड़ भारतीयों का सामूहिक संकल्प होना चाहिए। प्रधानमंत्री ने भी 2047 को नागरिकों के सपनों और संकल्पों से जोड़ते हुए स्पष्ट किया है कि विकसित भारत का निर्माण प्रत्येक भारतीय की भागीदारी से होगा।&nbsp; आजादी के अमृत से लेकर स्वतंत्रता के 80वें पड़ाव तक भारत ने लंबी यात्रा तय की है। अब अगला पड़ाव केवल आर्थिक शक्ति बनना नहीं, बल्कि विश्वास, विवेक, विज्ञान, संस्कार और सामर्थ्य से सम्पन्न भारत बनना है। शहीदों ने हमें स्वतंत्र भारत सौंपा था; अब हमारी जिम्मेदारी है कि हम आने वाली पीढ़ी को एक ऐसा भारत सौंपें जिस पर उसे गर्व हो। ’यही स्वतंत्रता का नया आयाम है, यही 2047 की ओर बढ़ते भारत का संकल्प है और यही हमारे तिरंगे के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है।’</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 17:53:37 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-flight-of-freedom-towards-a-self-reliant-and-developed-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/independence-day_large_1755_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भारत स्वतंत्रता दिवस: रक्षा-उत्पादन विकास की राह पर तेज़ दौड़]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-independence-day-rapid-strides-on-the-path-of-defence-production-and-development]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>विकासशील भारत अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है, यह राष्ट्रीय स्तर पर आत्मनिरीक्षण और आगे की सोच का प्रतीक है। रक्षा उत्पादन का क्षेत्र इसकी आत्मनिर्भरता और रणनीतिक ऑटोनॉमी का एक अहम स्तंभ बनकर उभरा है। मिलिट्री हार्डवेयर के एक बड़े आयातक से एक भरोसेमंद डिफेंस निर्यातक बनने का सफर भारत की बढ़ती क्षमताओं और रणनीतिक दूरदर्शिता का सबूत है। यह बदलाव सिर्फ एक आर्थिक या टेक्नोलॉजिकल उपलब्धि नहीं है; यह असल में नेशनल सिक्योरिटी, जियोपॉलिटिकल स्टैंडिंग और ग्लोबल स्टेज पर ज़्यादा असरदार भूमिका निभाने की इच्छा से जुड़ा है। पिछले कुछ दशकों में, खासकर हाल के सालों में रक्षा उत्पादन में जो तरक्की हुई है, वह एक मजबूत स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम बनाने की सोची-समझी कोशिश को दिखाती है। यह लेख भारत के रक्षा-उत्पादन विकास की खास बातों पर गहराई से बात करेगा, क्योंकि यह अपने 80वें स्वतंत्रता दिवस के करीब पहुंच रहा है, इसकी ग्रोथ को आगे बढ़ाने वाले कई वजहों को देखेगा, और उन रुकावटों की बारीकी से जांच करेगा जो इसकी पूरी क्षमता को चुनौती दे रही हैं।</div><div><br></div><h2>रक्षा उत्पादन डेवलपमेंट की खास बातें</h2><div>भारत के रक्षा उत्पादनके माहौल में एक बड़ा बदलाव आया है, जो विदेशी डिजाइनों की असेंबली और लाइसेंस्ड प्रोडक्शन से आगे बढ़कर स्वदेशी इनोवेशन और मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा दे रहा है। कई खास बातें इस तरक्की को दिखाती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/find-out-why-delhi-remains-a-target-for-terrorists" target="_blank">जानिए, आखिर दिल्ली क्यों रहती है आतंकियों के निशाने पर?</a></h3><div>वायुसेना के संदर्भ में, एडवांस्ड प्लेटफॉर्म और सिस्टम का विकास स्वदेशी टेक्नोलॉजी में एक बड़ी छलांग दिखाता है। लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (एल सी ए) तेजस, एक मल्टी-रोल फाइटर जेट, इसका एक बड़ा उदाहरण है। दशकों के विकास के बाद, तेजस इंडियन एयर फोर्स के साथ स्क्वाड्रन सर्विस में शामिल हो गया है और इसे एक्सपोर्ट करने पर विचार किया जा रहा है, जो भारत की एडवांस्ड फाइटर एयरक्राफ्ट डिजाइन करने, डेवलप करने और बनाने की क्षमता को दिखाता है। इसी तरह, पांचवीं पीढ़ी के फाइटर, एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (ए एम सी ए) का विकास चल रहा है, जिसका मकसद भारत को ऐसी एडवांस क्षमताओं वाले चुनिंदा देशों के ग्रुप में जगह दिलाना है।</div><div><br></div><div>नेवल डिफेंस के क्षेत्र में काफी तरक्की हुई है। भारत ने आई एन एस विक्रांत जैसे स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर को सफलतापूर्वक डेवलप और डिप्लॉय किया है, जो पहला स्वदेशी रूप से डिजाइन और बनाया गया एयरक्राफ्ट कैरियर है। यह उपलब्धि भारत को दुनिया भर में एक खास जगह दिलाती है, जो इसकी व्यापक नेवल शिपबिल्डिंग क्षमताओं को दिखाती है। इसके अलावा, स्कॉर्पीन क्लास (फ्रांस के नेवल ग्रुप के साथ मिलकर बनाया गया लेकिन इसमें काफी भारतीय कंटेंट है) और एडवांस्ड पारंपरिक पनडुब्बियों पर फोकस करने वाला आने वाला P75I प्रोजेक्ट सहित सबमरीन का स्वदेशी विकास, पानी के नीचे की लड़ाई में बढ़ती आत्मनिर्भरता को दिखाता है। एडवांस्ड स्वदेशी हथियारों और सेंसर से लैस डिस्ट्रॉयर, फ्रिगेट और ऑफशोर पेट्रोल वेसल का कंस्ट्रक्शन, भारतीय नेवी की ऑपरेशनल पहुंच और टेक्नोलॉजिकल बढ़त को और मजबूत करता है।</div><div><br></div><div>थल सेना के लिए स्वदेशीकरण में काफी बढ़ोतरी देखी गई है। अर्जुन जैसे मेन बैटल टैंक (एम बी टी) का प्रोडक्शन, हालांकि शुरुआती विकास में चुनौतियों का सामना कर रहा था, लेकिन अब एक मज़बूत प्लैटफ़ॉर्म बन गया है। इससे भी ज़्यादा ज़रूरी बात यह है कि मॉडर्न आर्टिलरी सिस्टम, जिसमें धनुष टोड आर्टिलरी गन और के9 वज्र-T (भारत में लाइसेंस के तहत बनाया गया एक साउथ कोरियन डिज़ाइन) शामिल हैं, के लिए ज़ोर ने इंडियन आर्मी की फायरपावर को बेहतर बनाया है। कलाश्निकोव ए के-203 (भारत में बनी) जैसी देसी असॉल्ट राइफलों का विकास, और अगली पीढ़ी के इन्फेंट्री कॉम्बैट व्हीकल और आर्मर्ड पर्सनल कैरियर के लिए भविष्य के प्रोजेक्ट, ज़मीनी सेना को स्टेट-ऑफ़-द-आर्ट हथियारों से लैस करने के कमिटमेंट को दिखाते हैं।</div><div><br></div><div>मिसाइल और रॉकेट का क्षेत्र भारत के लिए लगातार ताकत का क्षेत्र रहा है। इंटरकॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल (आई सी बी एम) की अग्नि सीरीज़, पृथ्वी शॉर्ट-रेंज बैलिस्टिक मिसाइल, आकाश सरफेस-टू-एयर मिसाइल सिस्टम, और ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल (रूस के साथ एक जॉइंट वेंचर) का विकास और इंडक्शन मिसाइल टेक्नोलॉजी में भारत की एडवांस्ड क्षमताओं को दिखाता है। ये सिस्टम ज़रूरी रणनीतिक रोकथाम और हमला करने की क्षमता देते हैं। वर्टिकल टेक-ऑफ और लैंडिंग (वी टी ओ एल) मिसाइलों और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी का चल रहा विकास, मिसाइल युद्ध में सबसे आगे रहने की भारत की इच्छा का और संकेत देता है।</div><div><br></div><div>इलेक्ट्रॉनिक्स और कम्युनिकेशन सेक्टर में स्वदेशीकरण की तरफ़ काफ़ी ज़ोर देखा गया है। रोहिणी और स्वाति जैसे एडवांस्ड रडार सिस्टम से लेकर इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सुइट्स और सुरक्षित कम्युनिकेशन सिस्टम तक, भारतीय कंपनियां तेज़ी से ज़रूरी कंपोनेंट्स और सबसिस्टम डेवलप और प्रोड्यूस कर रही हैं। इससे विदेशी सप्लायर्स पर निर्भरता कम होती है और रक्षा नेटवर्क के अंदर साइबर सिक्योरिटी बढ़ती है।</div><div>&nbsp;</div><div>आखिर में, निजी रक्षा क्षेत्र का विकास एक उल्लेखनीय घटनाक्रम है। ऐतिहासिक रूप से सरकारी कंपनियों का दबदबा रहने के बाद, भारत ने अब निजी क्षेत्र की भागीदारी को सक्रिय रूप से बढ़ावा दिया है। लार्सन एंड टुब्रो, टाटा एडवांस्ड सिस्टम्स लिमिटेड और महिंद्रा रक्षा सिस्टम्स जैसी कंपनियाँ महत्वपूर्ण खिलाड़ी के रूप में उभर रही हैं और विभिन्न रक्षा प्लेटफॉर्म और पुर्जों के डिज़ाइन, विकास और निर्माण में योगदान दे रही हैं। इससे इस क्षेत्र में गतिशीलता, प्रतिस्पर्धा और नवाचार आया है।</div><div><br></div><h2>विकास के कारक</h2><div>भारत के रक्षा उत्पादन की प्रभावशाली प्रगति रणनीतिक, आर्थिक और राजनीतिक कारकों के मेल से प्रेरित है। ये कारक आपस में जुड़े हुए हैं और एक-दूसरे को मज़बूत करते हैं, जिससे निरंतर विकास के लिए अनुकूल माहौल बनता है।</div><div><br></div><div>(a) सबसे महत्वपूर्ण कारक रणनीतिक स्वायत्तता हासिल करने और विदेशी सैन्य उपकरणों पर निर्भरता कम करने की अटूट प्रतिबद्धता है। तेज़ी से बदलते भू-राजनीतिक परिदृश्य में, राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक मज़बूत स्वदेशी रक्षा औद्योगिक आधार का होना बहुत ज़रूरी है। यह सुनिश्चित करता है कि भारत अन्य देशों की नीतियों या रणनीतिक हितों के दबाव में आए बिना अपनी रक्षा ज़रूरतों को पूरा कर सके। आत्मनिर्भरता की यह कोशिश भारत की विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा सिद्धांत का एक मुख्य आधार है।</div><div><br></div><div>(b) बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण की ज़रूरत ने उन्नत रक्षा उपकरणों की निरंतर माँग पैदा की है। सीमा विवाद, क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियाँ और विश्वसनीय प्रतिरोध बनाए रखने की ज़रूरत के कारण लगातार अपग्रेड और आधुनिक प्लेटफॉर्म खरीदने की आवश्यकता होती है। यह माँग घरेलू उत्पादन के लिए एक शक्तिशाली प्रोत्साहन का काम करती है, जिससे निवेश और तकनीकी विकास को बढ़ावा मिलता है।</div><div><br></div><div>(c) 'मेक इन इंडिया' पहल और स्वदेशीकरण के लिए सरकार की नीतिगत कोशिशें, जो 'रक्षा उत्पादन और निर्यात प्रोत्साहन नीति' (डी पी ई पी पी) जैसी योजनाओं में शामिल हैं, महत्वपूर्ण गति प्रदान करती हैं। 'रक्षा खरीद प्रक्रिया' (डी ए पी) जैसी नीतियां स्वदेशी डिज़ाइन और निर्मित उत्पादों को प्राथमिकता देती हैं और कुछ श्रेणियों को विशेष रूप से घरेलू खरीद के लिए आरक्षित करती हैं। उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में रक्षा कॉरिडोर की स्थापना समर्पित विनिर्माण केंद्र बनाने की दिशा में एक ठोस कदम है।</div><div><br></div><div>(d) आर्थिक विकास और रोज़गार सृजन के लिए रक्षा विनिर्माण को एक प्रमुख क्षेत्र के रूप में पहचानना एक और महत्वपूर्ण कारक है। रक्षा उद्योग का उच्च गुणक प्रभाव (मल्टीप्लायर इफ़ेक्ट) होता है, जो डिज़ाइन, इंजीनियरिंग, विनिर्माण और अनुसंधान एवं विकास में कुशल रोज़गार के अवसर पैदा करता है। रक्षा उपकरणों के निर्यात से मूल्यवान विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है, जिससे अर्थव्यवस्था को और बढ़ावा मिलता है।</div><div><br></div><div>(e) रक्षा औद्योगिक कॉरिडोर की स्थापना और सार्वजनिक-निजी भागीदारी को बढ़ावा देने से रक्षा विनिर्माण के लिए अधिक अनुकूल इकोसिस्टम तैयार हुआ है। ये कॉरिडोर इंफ्रास्ट्रक्चर, वित्तीय प्रोत्साहन और आसान रेगुलेटरी माहौल देते हैं, जिससे स्थापित कंपनियां और स्टार्टअप दोनों आकर्षित होते हैं। प्राइवेट सेक्टर की बढ़ती भागीदारी से तेज़ी, इनोवेशन और दक्षता आती है, जो डिफेंस पब्लिक सेक्टर अंडरटेकिंग्स (डी पी एस यू) की क्षमताओं को और बेहतर बनाती है।</div><div><br></div><div>(f) इनोवेशन को बढ़ावा देने के लिए डिफेंस रिसर्च एंड विकास ऑर्गनाइज़ेशन ( डी आर डी ओ ) जैसे संस्थानों और एकेडमिक सहयोग से चल रही रिसर्च और विकास (आर एंड डी ) कोशिशें बहुत ज़रूरी हैं। आर एंड डी में निवेश और साथ ही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स और साइबर वॉरफेयर जैसी नई तकनीकों को अपनाने पर ध्यान देने से यह पक्का होता है कि भारत की रक्षा क्षमताएं अत्याधुनिक बनी रहें।</div><div><br></div><div>रक्षा उत्पादों के लिए बढ़ता एक्सपोर्ट मार्केट विकास का एक बड़ा मौका देता है। भारतीय कंपनियां ग्लोबल मंच पर अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर रही हैं और मित्र देशों को पेट्रोल बोट और हल्के लड़ाकू विमानों से लेकर मिसाइल और सर्विलांस ड्रोन तक के सिस्टम एक्सपोर्ट कर रही हैं। यह एक्सपोर्ट अभियान न केवल रेवेन्यू पैदा करता है, बल्कि भारतीय रक्षा उत्पादों की क्वालिटी और कॉम्पिटिटिवनेस को भी साबित करता है।</div><div><br></div><h2>विकास में चुनौतियां</h2><div>काफी प्रगति और मज़बूत प्रेरक कारकों के बावजूद, कई रुकावटें भारत की रक्षा उत्पादन क्षमता को पूरी तरह से हासिल करने में बाधा डाल रही हैं। विकास को तेज़ करने और सही मायने में आत्मनिर्भरता हासिल करने के लिए इन चुनौतियों से निपटना ज़रूरी है।</div><div><br></div><div>(a) सबसे बड़ी रुकावटों में से एक है ज़रूरी कंपोनेंट्स और सब-सिस्टम के लिए आयात पर लगातार निर्भरता। हालांकि भारत ने बड़े प्लेटफॉर्म बनाने में काफी प्रगति की है, लेकिन खास इलेक्ट्रॉनिक्स, सेंसर, इंजन और कुछ कच्चे माल के लिए सप्लाई चेन अक्सर विदेशी स्रोतों पर निर्भर रहती है। यह निर्भरता जियोपॉलिटिकल संकट या सप्लाई में रुकावट के समय कमज़ोरी पैदा कर सकती है और लागत-प्रभावशीलता पर असर डाल सकती है।</div><div><br></div><div>(b) नौकरशाही की रुकावटें और जटिल रेगुलेटरी माहौल अक्सर खरीद प्रक्रिया और प्रोजेक्ट को पूरा करने में देरी करते हैं। मंज़ूरी की लंबी प्रक्रियाएं, कई स्तरों पर क्लीयरेंस और जोखिम से बचने की संस्कृति इनोवेशन को रोक सकती है और शामिल करने में देरी कर सकती है। नई तकनीकों का असर ग्लोबल मार्केट में भारतीय कंपनियों की कॉम्पिटिटिवनेस पर भी पड़ता है।</div><div><br></div><div>(c) आर एंड डी के लिए पर्याप्त फंडिंग की कमी और लैब में हुए इनोवेशन को कमर्शियल तौर पर सफल प्रोडक्ट्स में बदलने की चुनौतियां चिंता का विषय बनी हुई हैं। हालांकि&nbsp; डी आर डी ओ&nbsp; अहम भूमिका निभाता है, लेकिन बेसिक रिसर्च के लिए फंडिंग की मात्रा और इंडस्ट्री तक टेक्नोलॉजी को असरदार ढंग से पहुंचाने के तरीकों को मजबूत करने की ज़रूरत है। एक मज़बूत इनोवेशन इकोसिस्टम बनाने के लिए एकेडेमिया, रिसर्च संस्थानों और इंडस्ट्री के बीच बेहतर सहयोग की भी ज़रूरत है।</div><div><br></div><div>(d) स्किल्ड वर्कफोर्स की कमी, खासकर डिफेंस मैन्युफैक्चरिंग के खास क्षेत्रों में, एक बड़ी चुनौती है। डिफेंस इंडस्ट्री को खास तकनीकों में माहिर इंजीनियरों, टेक्नीशियनों और रिसर्चर्स की ज़रूरत होती है। इस कमी को पूरा करने और क्वालिफाइड लोगों की लगातार सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए खास एजुकेशनल प्रोग्राम और वोकेशनल ट्रेनिंग पहलों की ज़रूरत है।</div><div><br></div><div>(e) अच्छी तरह से विकसित स्वदेशी डिफेंस इंडस्ट्रियल इकोसिस्टम की कमी, खासकर खास मटीरियल, ज़रूरी अलॉय और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग तकनीकों जैसे क्षेत्रों में, एक रुकावट बनी हुई है। ऐसे इकोसिस्टम के विकास के लिए लंबे समय के निवेश और रणनीतिक योजना की ज़रूरत होती है, जिसमें अक्सर बड़े मैन्युफैक्चरर्स और छोटे व मध्यम आकार के उद्यमों (एस एम ई) के बीच आपसी सहयोग शामिल होता है।</div><div><br></div><div>(f) पूरी इंडस्ट्री में क्वालिटी एश्योरेंस और स्टैंडर्डाइजेशन के मुद्दे पर लगातार ध्यान देने की ज़रूरत है। यह सुनिश्चित करना ज़रूरी है कि स्वदेशी रूप से बने कंपोनेंट्स और सिस्टम कड़े इंटरनेशनल क्वालिटी स्टैंडर्ड्स को पूरा करें, ताकि घरेलू ऑपरेशनल प्रभावशीलता और एक्सपोर्ट मार्केट में पैठ बनाई जा सके।</div><div><br></div><div>(g) स्वदेशी उत्पादन की लागत-प्रभावशीलता कभी-कभी एक चुनौती हो सकती है। नए प्लेटफॉर्म के लिए शुरुआती विकास लागत ज़्यादा हो सकती है, और बड़े पैमाने पर उत्पादन के फायदे हमेशा हासिल नहीं हो पाते, खासकर खास प्रोडक्ट्स के लिए। इससे इम्पोर्टेड विकल्पों की तुलना में यूनिट कॉस्ट ज़्यादा हो सकती है, जिसके लिए सरकारी समर्थन और रणनीतिक दीर्घकालिक खरीद योजनाओं की ज़रूरत होती है।</div><div><br></div><div>राजनीतिक इच्छाशक्ति और लगातार पॉलिसी लागू करना बहुत ज़रूरी है। हालांकि अक्सर पॉलिसीज़ लाई जाती हैं, लेकिन लंबे समय तक उन्हें लगातार और असरदार ढंग से लागू करना निवेशकों का भरोसा बनाने और डिफेंस इंडस्ट्री के लिए स्थिर विकास की राह बनाने के लिए बहुत ज़रूरी है।</div><div><br></div><h2>निष्कर्ष</h2><div>भारतीय रक्षा उत्पादन में हुई तरक्की आत्मनिर्भरता और रणनीतिक स्वायत्तता की ओर उसकी यात्रा का एक अहम पहलू है। स्वदेशी एयरक्राफ्ट कैरियर और फाइटर जेट से लेकर एडवांस्ड मिसाइल सिस्टम और तेज़ी से बढ़ते प्राइवेट डिफेंस सेक्टर तक की मुख्य बातें, तकनीकी क्षमता और मैन्युफैक्चरिंग कौशल में एक ज़बरदस्त उछाल को दिखाती हैं। इस विकास के मुख्य कारण राष्ट्रीय सुरक्षा की ज़रूरतें, सरकार का स्वदेशीकरण और आर्थिक विकास पर ज़ोर, और रक्षा उत्पादों की बढ़ती वैश्विक मांग हैं। हालाँकि, अभी भी कई बड़ी चुनौतियाँ हैं, जैसे कि आयातित पुर्ज़ों पर निर्भरता, नौकरशाही की जटिलताएँ, आर एंड डी के लिए फंड की कमी, कुशल कर्मचारियों की कमी, और एक मज़बूत औद्योगिक इकोसिस्टम की ज़रूरत। इन चुनौतियों से निपटने के लिए लगातार नीतिगत प्रतिबद्धता, रिसर्च और इनोवेशन में ज़्यादा निवेश, और सरकार, इंडस्ट्री और एकेडेमिया के बीच बेहतर सहयोग बहुत ज़रूरी होगा। आने वाले कुछ दशक भारत को एक बड़े वैश्विक रक्षा निर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने, उसकी रणनीतिक आज़ादी सुनिश्चित करने और उसकी आर्थिक समृद्धि में बड़ा योगदान देने के लिए बहुत महत्वपूर्ण होंगे। आगे का रास्ता इनोवेशन, क्वालिटी और रणनीतिक साझेदारियों पर लगातार ध्यान देने की मांग करता है, ताकि क्षमता को एक ठोस रक्षा निर्माण पावरहाउस में बदला जा सके।</div><div><br></div><div>- प्रोफ़ेसर (डॉ.) डी.के. पांडेय</div><div>विज़िटिंग सीनियर फ़ेलो, सेंटर फ़ॉर एयरोस्पेस पावर एंड स्ट्रैटेजिक स्टडीज़,</div><div>एडजंक्ट प्रोफ़ेसर, राष्ट्रीय रक्षा विश्वविद्यालय,</div><div>सलाहकार, एकेडमिक काउंसिल, फ़ॉरेन पॉलिसी स्कूल और GNOIT,</div><div>पूर्व एसोसिएट डीन, SoB, गलगोटिया विश्वविद्यालय।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 16:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-independence-day-rapid-strides-on-the-path-of-defence-production-and-development</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/independence-day_large_1632_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Taliban के 5 साल के राज में कितना बदला Afghanistan? बंदूकधारियों की Diplomacy देखकर दुनिया हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/taliban-five-years-diplomacy-india-pakistan-afghanistan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भले ही दुनिया ने तालिबान को औपचारिक मान्यता देने से अब तक परहेज किया हो, लेकिन पांच साल में इस संगठन ने एक बात साबित कर दी है कि सत्ता पर कब्जे के बाद राजनय की ताकत को हथियार की तरह इस्तेमाल करना उसे आता है। 15 अगस्त 2021 को अमेरिकी नेतृत्व वाली नाटो सेनाओं की वापसी के बाद काबुल पर कब्जा करने वाला तालिबान आज उस मुकाम पर है जहां कई देश उसे पसंद नहीं करने के बावजूद उससे बात कर रहे हैं, उसके साथ सौदे कर रहे हैं और क्षेत्रीय सुरक्षा से लेकर व्यापार तक के सवालों पर उसे नजरअंदाज नहीं कर सकते।</div><div><br></div><div>इस बदलते समीकरण का सबसे बड़ा संकेत भारत है। 15 अगस्त को तालिबान ‘विक्ट्री डे’ मनाने जा रहा है और नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में होने वाले समारोह में वरिष्ठ भारतीय अधिकारियों की संभावित भागीदारी को लेकर भी संकेत मिले हैं। निमंत्रण अफगानिस्तान के चार्ज द अफेयर्स मुफ्ती नूर अहमद नूर की ओर से भेजा गया है और उस पर ‘इस्लामिक अमीरात ऑफ अफगानिस्तान’ का प्रतीक चिह्न है। भारत ने तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता नहीं दी है, लेकिन उसे अफगान दूतावास संचालित करने की अनुमति देकर और उसके राजनयिकों को काम करने की जगह देकर उसने साफ कर दिया है कि कूटनीति में ‘मान्यता’ और ‘व्यावहारिक संबंध’ दो अलग चीजें हैं।</div><div><br></div><h2>पांच साल में तालिबान राज ने आखिर बदला क्या?</h2><div><br></div><div>देखा जाये तो तालिबान का पांच साल का राज हालात में कोई अहम बदलाव नहीं कर पाया है। आम अफगान की जिंदगी आर्थिक, सामाजिक और मानवीय संकटों से अब भी घिरी है। करीब आधी आबादी गरीबी में है, बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है, निवेश नहीं है और महिलाओं को कामकाज से लगभग बाहर कर दिया गया है। हां, कर संग्रह में सुधार हुआ है, भ्रष्टाचार में कुछ कमी आई है और देश के बड़े हिस्से में हिंसा पहले की तुलना में कम हुई है। लेकिन बदले में मनमानी गिरफ्तारियां, जबरन गुमशुदगियां और प्रतिशोधात्मक कार्रवाई जैसी शिकायतें बनी हुई हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/taliban-detains-two-un-mission-staff-in-herat-afghanistan" target="_blank">Taliban ने Herat से संयुक्त राष्ट्र के दो कर्मचारियों को हिरासत में लिया</a></h3><div>तालिबान ने आर्थिक मोर्चे पर खनन और सीमा-पार बुनियादी ढांचे पर जोर बढ़ाया है। चीन और दूसरे पड़ोसी देशों की कंपनियां अफगानिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों में संभावनाएं तलाश रही हैं। मध्य एशिया के ताजिकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और कजाखस्तान जैसे देश भी काबुल के साथ व्यापारिक गलियारों को लेकर सक्रिय हैं, क्योंकि समुद्र तक पहुंच बनाने के लिए अफगानिस्तान एक अहम भौगोलिक कड़ी बन सकता है। यही तालिबान की असली कूटनीतिक चाल है। यानि वह विचारधारा की बजाय भूगोल को बेच रहा है। वह कह रहा है कि उसे पसंद करें या न करें, लेकिन अफगानिस्तान की जमीन, खनिज, व्यापार मार्ग और सुरक्षा समीकरण से दुनिया बच नहीं सकती।</div><div><br></div><h2>बिना मान्यता के भी दुनिया से रिश्ते</h2><div><br></div><div>रूस फिलहाल तालिबान सरकार को औपचारिक मान्यता देने वाला अकेला देश है, लेकिन व्यवहार में तस्वीर इससे कहीं बड़ी है। चीन, जापान, तुर्किये, सऊदी अरब और ब्रिटेन समेत अनेक देशों के प्रतिनिधि काबुल पहुंच रहे हैं। यूरोपीय संघ के साथ असफल अफगान शरणार्थियों की वापसी पर बातचीत हो रही है और जर्मनी ने तालिबान की वापसी के बाद पहली बार ऐसे अफगान नागरिक को निर्वासित किया जिसे किसी अपराध में दोषी नहीं ठहराया गया था। साथ ही तालिबान ने समय को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है। पांच साल गुजर चुके हैं। दुनिया को धीरे-धीरे यह कठोर वास्तविकता स्वीकार करनी पड़ रही है कि अफगानिस्तान पर वास्तविक नियंत्रण तालिबान का है। संयुक्त राष्ट्र से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, क्षेत्रीय देशों में यह सोच मजबूत हुई है कि यह ऐसी वास्तविकता है जिससे निपटना ‘अनिवार्य’ है, चाहे उसे पसंद किया जाए या नहीं।</div><div><br></div><h2>पाकिस्तान को तालिबान ने दिखाया आईना</h2><div><br></div><div>भारत के लिए सबसे बड़ा रणनीतिक बदलाव तालिबान और पाकिस्तान के रिश्तों में आई दरार है। जिस पाकिस्तान को कभी तालिबान का संरक्षक और रणनीतिक साझेदार माना जाता था, वही आज काबुल के साथ खुले टकराव में है। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच संघर्ष इतना बढ़ा कि चीन, कतर, सऊदी अरब, ओमान, ईरान, तुर्किये, उज्बेकिस्तान और मलेशिया तक को हस्तक्षेप करना पड़ा। सैकड़ों नागरिकों की मौत के बाद चीन ने बातचीत की मेजबानी की।</div><div><br></div><div>यहीं पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा झटका है। तालिबान ने यह दिखा दिया कि काबुल की सत्ता अब इस्लामाबाद की जेब में नहीं है। बल्कि अफगान संप्रभुता और सीमा विवाद पर वह पाकिस्तान से भिड़ने को तैयार है। भारत के लिए यह किसी रणनीतिक बोनस से कम नहीं। पिछले वर्ष भारत और तालिबान के संयुक्त बयान में जम्मू-कश्मीर को भारत में स्थित केंद्रशासित प्रदेश के रूप में संदर्भित किया गया और पहलगाम आतंकी हमले की निंदा की गई। पाकिस्तान के लिए इससे अधिक कड़वा कूटनीतिक संदेश शायद ही कुछ हो सकता था।</div><div><br></div><h2>भारत की चाल: मान्यता नहीं, मगर दूरी भी नहीं</h2><div><br></div><div>भारत ने अफगानिस्तान में अपने ऐतिहासिक और सभ्यतागत संबंधों को कभी पूरी तरह टूटने नहीं दिया। 34 में से सभी प्रांतों में 500 से अधिक विकास परियोजनाओं के जरिए बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि और क्षमता निर्माण जैसे क्षेत्रों में उसकी मौजूदगी रही है। पिछले वर्ष काबुल में भारतीय दूतावास बहाल हुआ और तालिबान के राजनयिकों को नई दिल्ली स्थित अफगान दूतावास में काम करने की अनुमति मिली। विदेश मंत्री अमीर खान मुत्तकी की भारत यात्रा ने इस रिश्ते को और गति दी।</div><div><br></div><div>जून में भारत ने संयुक्त राष्ट्र में यह संकेत भी दिया कि मौजूदा तालिबान प्रतिबंध व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत है। भारत के संयुक्त राष्ट्र प्रतिनिधि हरीश पार्वतनैनी ने कहा कि पांच वर्षों में अफगानिस्तान की राजनीतिक वास्तविकता बदल चुकी है और प्रतिबंध व्यवस्था को इस बदलाव को ध्यान में रखना चाहिए।</div><div><br></div><div>लेकिन तालिबान की सबसे बड़ी कीमत अफगान महिलाएं चुका रही हैं</div><div><br></div><div>इस पूरी कूटनीतिक सफलता के बीच तालिबान शासन का सबसे भयावह चेहरा महिलाओं और लड़कियों की जिंदगी में दिखाई देता है। पांच साल में 160 से अधिक आदेश महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा, रोजगार, आवाजाही, पहनावे, बोलने और निर्णय लेने के अधिकारों पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। माध्यमिक और उच्च शिक्षा से लड़कियों का बाहर किया जाना अफगानिस्तान के भविष्य पर सीधे हमला है। संयुक्त राष्ट्र की महिला एजेंसी के अनुसार आधुनिक दौर में किसी अन्य देश ने कानून, नीति और व्यवहार के जरिए आधी आबादी के अधिकारों को इस पैमाने पर खत्म नहीं किया।</div><div><br></div><div>महिलाओं को संयुक्त राष्ट्र परिसर समेत कई जगहों से बाहर रखा गया है। अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय ने तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्लाह अखुंदजादा और मुख्य न्यायाधीश अब्दुल हकीम हक्कानी के खिलाफ महिलाओं और लड़कियों के उत्पीड़न को मानवता के खिलाफ अपराध बताते हुए गिरफ्तारी वारंट भी जारी किए हैं। यही तालिबान की सबसे बड़ी विडंबना है कि बाहर की दुनिया से वह बातचीत के दरवाजे खोल रहा है, जबकि अपने ही देश की आधी आबादी के लिए दरवाजे बंद कर रहा है।</div><div><br></div><h2>रणनीतिक संदेश साफ है</h2><div><br></div><div>भारत के लिए तालिबान के पांच साल का अर्थ न तो भावनात्मक दोस्ती है और न ही वैचारिक समर्थन। यह कठोर रणनीतिक यथार्थवाद है। भारत को अफगानिस्तान में अपनी सुरक्षा, पाकिस्तान की गतिविधियों, आतंकवाद, मध्य एशिया तक पहुंच, मानवीय सहायता और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं के लिए काबुल से संवाद बनाए रखना होगा।</div><div><br></div><div>उधर, तालिबान ने पांच साल में दुनिया को यह दिखाया है कि बिना औपचारिक मान्यता के भी सत्ता प्रभाव पैदा कर सकती है। उसने पाकिस्तान को चुनौती दी, पड़ोसी देशों को अपने साथ बैठाया, यूरोप को वापसी के मुद्दे पर बातचीत के लिए मजबूर किया और भारत जैसे देश को भी व्यावहारिक जुड़ाव बढ़ाने की दिशा में सोचने के लिए प्रेरित किया। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि तालिबान जीत गया है। असली परीक्षा अभी बाकी है। जब तक अफगान लड़कियों के स्कूल नहीं खुलते, महिलाओं को काम और सार्वजनिक जीवन में अधिकार नहीं मिलता और शासन में मनमानी तथा दमन कम नहीं होता, तब तक तालिबान की कूटनीतिक सफलता उसके शासन की नैतिक विफलता को ढक नहीं सकती।</div><div><br></div><div>बहरहाल, कुल मिलाकर देखें तो पांच साल बाद तस्वीर यह है कि तालिबान को दुनिया ने मान्यता नहीं दी, लेकिन वह उससे बात करने लगी है। साथ ही पाकिस्तान, जिसने कभी काबुल को अपनी रणनीतिक गहराई समझा था, अब उसी काबुल से सीमा पर भिड़ रहा है। यही पिछले पांच वर्षों का सबसे बड़ा भू-राजनीतिक उलटफेर है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 14:18:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/taliban-five-years-diplomacy-india-pakistan-afghanistan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/afghanistan_large_1420_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विदेशी चंदे पर नियंत्रण और संतुलन की अपेक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/expect-checks-and-balances-on-foreign-donations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>12 अगस्त 2026 का दिन भारतीय संसद के लिए इसलिए महत्वपूर्ण रहा कि विदेशी अंशदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 यानी एफसीआरए विधेयक को लोकसभा ने 31 सदस्यीय संयुक्त संसदीय समिति- जेपीसी के पास भेज दिया। यह फैसला केवल एक विधेयक को संसदीय प्रक्रिया के अगले चरण में भेजना नहीं है, बल्कि उस व्यापक बहस का अवसर है जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी धन की पारदर्शिता, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं की स्वायत्तता, नागरिक समाज की भूमिका और लोकतांत्रिक अधिकार-सभी एक साथ जुड़े हुए हैं। विधेयक को जेपीसी के पास भेजे जाने से सरकार और विपक्ष के बीच तत्काल टकराव को कुछ हद तक विमर्श में बदलने का अवसर मिला है। एफसीआरए का इतिहास भी इस बहस की गंभीरता को समझने में मदद करता है। विदेशी धन के माध्यम से देश के राजनीतिक और सामाजिक जीवन पर बाहरी प्रभाव की आशंकाओं को देखते हुए 1976 में पहली बार कानून बनाया गया था। वर्ष 2010 में इसे नए एफसीआरए कानून से प्रतिस्थापित किया गया और उसके बाद 2020 सहित विभिन्न चरणों में इसके प्रावधान अधिक कठोर होते गए। आज यह कानून केवल विदेशी चंदे की प्राप्ति और उसके उपयोग का लेखा-जोखा रखने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़े विमर्श का भी महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुका है।</div><div><br></div><div>आंकड़े इस विषय की व्यापकता बताते हैं। पीआरएस के अनुसार 15 जुलाई 2026 तक 14,449 एफसीआरए प्रमाणपत्र सक्रिय थे, जबकि 22,498 रद्द और 15,212 समाप्त माने गए। 2019 से 2022 के बीच 13,520 संगठनों को लगभग 55,741 करोड़ रुपये का विदेशी अंशदान मिला। इन आंकड़ों को देखकर यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी बड़ी धनराशि का उपयोग कहां, किस उद्देश्य से और किस स्तर की निगरानी के साथ हुआ? लेकिन इसके साथ दूसरा प्रश्न भी उतना ही महत्वपूर्ण है-क्या किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाना अपने आप में किसी वित्तीय या आपराधिक अनियमितता का प्रमाण माना जा सकता है? सरकार के अपने स्पष्टीकरण के अनुसार भी पंजीकरण समाप्त होने के कई कारण हो सकते हैं और हर समाप्ति को गलत काम से जोड़ना उचित नहीं है। यहीं से प्रस्तावित संशोधन का सबसे संवेदनशील पक्ष सामने आता है। विधेयक में ‘नामित प्राधिकरण’ की व्यवस्था प्रस्तावित है। यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण रद्द हो जाता है, वह स्वयं पंजीकरण छोड़ देती है या उसका प्रमाणपत्र नवीनीकरण न होने के कारण समाप्त हो जाता है, तो विदेशी अंशदान और उससे निर्मित संपत्तियां पहले अस्थायी रूप से इस प्राधिकरण के अधीन आ सकती हैं। यदि निर्धारित अवधि में पंजीकरण बहाल नहीं होता तो संपत्तियां स्थायी रूप से निहित की जा सकती हैं तथा उन्हें सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए उपयोग या बेचने का प्रावधान है। बिक्री से प्राप्त राशि और अप्रयुक्त विदेशी अंशदान भारत की समेकित निधि में जमा किए जाने का प्रस्ताव है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/parliament-monsoon-session-2026-19-percent-lok-sabha-39-17-percent-rajya-sabha-productivity" target="_blank">Lok Sabha में मात्र 19% और Rajya Sabha में 39.17% हो सका कामकाज, Parliament के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड देखकर खुद तय कीजिये सांसद पास हुए या फेल!</a></h3><div>भारत में समय-समय पर ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें विदेशी वित्तपोषण के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं अथवा राष्ट्रीय हित से टकराने वाली गतिविधियों को लेकर सवाल उठे हैं। इसलिए एफसीआरए का मूल उद्देश्य-विदेशी अंशदान को पारदर्शी, उत्तरदायी और वैध उद्देश्यों तक सीमित रखना-न तो अनुचित है और न ही लोकतंत्र विरोधी। लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता और प्रशासनिक शक्ति के विस्तार के बीच एक स्पष्ट रेखा भी होनी चाहिए। यही इस विधेयक की असली परीक्षा है। यदि किसी संस्था ने विदेशी धन का इस्तेमाल आतंकवाद, हिंसा, अलगाववाद, जबरन या प्रलोभन आधारित धर्मांतरण, राजनीतिक अस्थिरता अथवा भारत की संप्रभुता को नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों में किया है, तो उसके विरुद्ध कठोरतम कार्रवाई होनी चाहिए। राष्ट्रहित में ऐसी कठोरता आवश्यक है। मगर दूसरी ओर यदि कोई संस्था अस्पताल चला रही है, गरीबों के लिए शिक्षा उपलब्ध करा रही है, पर्यावरण संरक्षण कर रही है, महिलाओं और बच्चों के लिए काम कर रही है अथवा प्राकृतिक आपदा में राहत पहुंचा रही है, तो केवल तकनीकी या प्रक्रियागत चूक के कारण उसके वर्षों के सामाजिक कार्य और विदेशी अंशदान से निर्मित परिसंपत्तियों पर तत्काल सरकारी नियंत्रण स्थापित हो जाना चिंता का विषय बन सकता है। यही कारण है कि जेपीसी के पास जाना इस विधेयक के लिए एक सकारात्मक अवसर है। संसद में बहुमत से कानून पारित करना लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है, लेकिन जिन कानूनों का प्रभाव हजारों संस्थाओं, लाखों लाभार्थियों और देश के व्यापक नागरिक समाज पर पड़ता हो, उनकी बारीकी से जांच लोकतंत्र को मजबूत करती है। जेपीसी में विपक्ष अपनी आपत्तियां रख सकता है, सरकार अपने तर्क स्पष्ट कर सकती है और विधि विशेषज्ञों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं, वित्तीय विशेषज्ञों तथा सुरक्षा एजेंसियों के अनुभवों को भी सामने लाया जा सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>विधेयक में एक महत्वपूर्ण संतुलनकारी प्रावधान यह भी है कि धार्मिक स्थल की धार्मिक प्रकृति को बनाए रखना अनिवार्य होगा। नामित प्राधिकरण किसी ऐसे स्थल को दूसरे उद्देश्य में बदल या उसकी धार्मिक प्रकृति समाप्त नहीं कर सकेगा। इसके अलावा प्रभावित संस्था को 90 दिनों के भीतर पुनरीक्षण का अधिकार और जिला न्यायाधीश के समक्ष अपील का प्रावधान दिया गया है। सरकार ने यह भी बताया है कि पंजीकरण बहाल होने पर अस्थायी रूप से निहित संपत्तियां और अप्रयुक्त धन वापस किए जाएंगे। ये प्रावधान स्वागत योग्य हैं, लेकिन सवाल यह रहेगा कि इन अधिकारों की वास्तविक स्वतंत्रता और प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी। एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन नवीनीकरण से जुड़ा है। 2026 के नियमों में पिछले दो वित्तीय वर्षों में कम से कम 10 लाख रुपये विदेशी अंशदान के उपयोग को सक्रिय संस्था की पहचान के रूप में रखा गया है। साथ ही गतिविधि और राज्य-विशिष्ट पंजीकरण तथा अधिक विस्तृत उपयोग संबंधी जानकारी देने की व्यवस्था भी की गई है। यह व्यवस्था निष्क्रिय संस्थाओं पर नियंत्रण के लिए उपयोगी हो सकती है, लेकिन जेपीसी को यह भी देखना होगा कि क्या हर छोटी लेकिन वास्तविक सामाजिक संस्था के लिए 10 लाख रुपये खर्च करना व्यावहारिक मानदंड है। सामाजिक उपयोगिता का मूल्य केवल धनराशि से नहीं किया जा सकता।</div><div><br></div><div>एफसीआरए की बहस को केवल ‘सरकार बनाम विपक्ष’ या ‘राष्ट्रवाद बनाम नागरिक स्वतंत्रता’ के द्वंद्व में सीमित करना भी उचित नहीं होगा। असली प्रश्न इससे कहीं बड़ा है-भारत विदेशी धन को किस तरह स्वीकार करेगा और यह सुनिश्चित कैसे करेगा कि विदेशी संसाधन भारतीय समाज के हित में काम करें, न कि भारत की नीतियों और सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने का माध्यम बनें? इसी के साथ यह भी तय करना होगा कि सरकार की नियामक शक्ति इतनी व्यापक न हो जाए कि स्वतंत्र सामाजिक संस्थाओं की वैध असहमति भी संदेह की दृष्टि से देखी जाने लगे। भारत जैसे विशाल और विविध लोकतंत्र में नागरिक समाज सरकार का विरोधी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था का सहयोगी अंग है। हजारों गैर-सरकारी संगठन स्वास्थ्य, शिक्षा, ग्रामीण विकास, पर्यावरण, महिला सशक्तीकरण, दिव्यांग कल्याण और आपदा राहत के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं। विदेशी अंशदान प्राप्त करने वाली प्रत्येक संस्था को पारदर्शिता, लेखांकन और राष्ट्रीय कानूनों का पालन करना चाहिए, लेकिन सरकार को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि नियमन का उद्देश्य संस्थाओं को नियंत्रित करना नहीं, बल्कि धन के सही उपयोग को सुनिश्चित करना हो। संसद और जेपीसी के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती यही संतुलन स्थापित करने की है। विदेशी चंदे की आड़ में राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए, लेकिन सामाजिक सेवा की आड़ में यदि कहीं वित्तीय अनियमितता है तो उसके लिए भी कोई छूट नहीं होनी चाहिए। समान रूप से, वैध सामाजिक कार्य को केवल वैचारिक असहमति के कारण संदेह के घेरे में नहीं लाया जाना चाहिए। कानून ऐसा हो जिसमें अपराध पर कठोरता और वैध सामाजिक कार्य के प्रति संवेदनशीलता-दोनों साथ चलें।</div><div><br></div><div>एफसीआरए संशोधन विधेयक भारत की शासन-व्यवस्था के लिए एक बड़ा अवसर भी है। यदि जेपीसी इस बहस को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठाकर तथ्य, कानून, राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक अधिकारों के संतुलन के आधार पर देखती है, तो यह विधेयक केवल विदेशी चंदे को नियंत्रित करने वाला कानून नहीं रहेगा, बल्कि भारत में पारदर्शी, उत्तरदायी और स्वस्थ नागरिक समाज की नई आधारशिला बन सकता है। अब अपेक्षा यह है कि जेपीसी न तो सरकारी कठोरता को आंख मूंदकर स्वीकार करे और न विपक्ष की आशंकाओं को अंतिम सत्य माने, बल्कि तथ्यों की गहराई में जाकर ऐसा संतुलित कानून सुझाए जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा भी सुरक्षित रहे, विदेशी धन भी पारदर्शी रहे और सामाजिक सेवा की स्वतंत्रता भी अक्षुण्ण रहे। यही एफसीआरए की वास्तविक कसौटी है-विदेशी धन पर नियंत्रण हो, लेकिन जनसेवा पर अंकुश नहीं।&nbsp;</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 14 Aug 2026 11:51:32 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/expect-checks-and-balances-on-foreign-donations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/14/indian-parliament_large_1153_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Modi ने माहौल ही बदल डाला, Red Corridor से Red Carpet पर Ramp Walk करने लगीं पूर्व नक्सली महिलाएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/bastar-red-corridor-to-red-carpet-former-women-maoists-transformation]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>रेड कॉरिडोर पर चलने वाले कदम अब रेड कार्पेट पर अपने जलवे बिखेर रहे हैं। कभी नक्सलियों की साथी रहने के दौरान हाथों में बंदूक थामकर बस्तर के घने जंगलों में भटकने वाली महिलाएं अब उसी आत्मविश्वास के साथ रैंप पर चल रही हैं, जहां उनके स्वागत में गोलियों की आवाज नहीं, तालियों की गड़गड़ाहट सुनाई दे रही है। रायपुर में राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर आयोजित ट्राइबल फैशन शो में पूर्व महिला माओवादियों ने हाथ से बुने परिधानों में रैंप वॉक कर एक ऐसी तस्वीर पेश की, जिसकी कुछ साल पहले कल्पना भी मुश्किल थी। यह सिर्फ फैशन शो नहीं था, बल्कि बंदूक से मुख्यधारा, हिंसा से विकास और भय से आत्मविश्वास तक बस्तर की बदलती कहानी का जीवंत प्रतीक था।</div><div><br></div><div>कभी बस्तर के जंगलों में हथियार उठाकर चलने वाली इन महिलाओं ने आत्मसमर्पण के बाद हिंसा का रास्ता छोड़ा और समाज में लौटने का फैसला किया। आज इनमें से कई महिलाएं सामाजिक संगठनों के साथ काम कर रही हैं, नई आजीविका तलाश रही हैं और उन अवसरों को हासिल कर रही हैं, जो कभी उनके लिए दूर की बात थे। रैंप पर उनका आत्मविश्वास इस बात का संकेत है कि पुनर्वास केवल हथियार छीन लेने का नाम नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का रास्ता खोलने की प्रक्रिया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-modi-nitin-nabin-bjp-mission-up-2027-election-strategy" target="_blank">Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार!</a></h3><div>इस आयोजन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ तो लोगों ने भी इसे बस्तर के बदलते चेहरे की असाधारण तस्वीर बताया। कई यूजर्स ने कहा कि कुछ वर्ष पहले तक ऐसी तस्वीर की कल्पना करना भी कठिन था। किसी ने इसे सशक्तिकरण का वास्तविक रूप बताया तो किसी ने सवाल उठाया कि ऐसी कहानियों को व्यापक प्रचार क्यों नहीं मिलता। दरअसल, रैंप पर चलती ये महिलाएं उस बदलाव की प्रतिनिधि हैं, जो दशकों तक वामपंथी उग्रवाद से प्रभावित इलाकों में धीरे-धीरे जमीन पर आकार ले रहा है।</div><div><br></div><div>बस्तर में बदलाव की सबसे बड़ी तस्वीर खेल के मैदानों से भी सामने आई है। बस्तर ओलंपिक 2025 में 3.91 लाख से अधिक खिलाड़ियों का पंजीयन हुआ। इससे भी महत्वपूर्ण यह रहा कि 700 से अधिक आत्मसमर्पित नक्सली और हिंसा से प्रभावित ग्रामीण ‘नियो बात’ यानी ‘नया रास्ता’ टीम के तहत खेलों में शामिल हुए। महिलाओं और बेटियों की भागीदारी भी लगभग तीन गुना बढ़ी। यानी जिन इलाकों में कभी बंदूकों की गूंज सुनाई देती थी, वहां अब खेलों की तालियां सुनाई दे रही हैं।</div><div><br></div><div>शिक्षा के मोर्चे पर भी बदलाव साफ दिखाई देता है। माओवादियों द्वारा ध्वस्त या बंद कराए गए कई स्कूल फिर खुले हैं और जंगलों के बीच बच्चों की पढ़ाई दोबारा शुरू हुई है। आदिवासी युवाओं को बेहतर अवसर देने के लिए 259 एकलव्य मॉडल आवासीय स्कूल, 46 आईटीआई और 49 कौशल विकास केंद्र स्थापित किए जा चुके हैं।</div><div><br></div><div>राज्य सरकार अब विकास को बस्तर के आखिरी छोर तक पहुंचाने पर जोर दे रही है। ‘नियद नेल्लानार’ योजना के तहत सुरक्षा बलों के कैंपों को ‘सेवा डेरा’ के रूप में इस्तेमाल कर ग्रामीणों तक राशन, बिजली, पानी और स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा रही हैं। ‘हर गांव रोशन’ जैसी पहलों के जरिए इंद्रावती टाइगर रिजर्व जैसे दुर्गम इलाकों के 70 से अधिक गांवों तक पहली बार बिजली और सोलर लाइटिंग पहुंची है। डिस्ट्रिक्ट मिनरल फंड की राशि से आदिवासी गांवों में पक्के मकान और बुनियादी ढांचा विकसित किया जा रहा है।</div><div><br></div><div>साथ ही कनेक्टिविटी भी इस बदलाव की रीढ़ बन रही है। बस्तर के दुर्गम इलाकों में 11 हजार किलोमीटर से अधिक सड़कों और 1,300 से ज्यादा मोबाइल टावरों का विस्तार हुआ है। इससे ग्रामीण बाजारों, प्रशासन और देश-दुनिया से जुड़ रहे हैं। उधर, माओवाद के कमजोर पड़ने के बाद सुरक्षा बल अब जंगलों में छिपे आईईडी को भी नष्ट कर रहे हैं और ‘आईईडी मुक्त पंचायत’ की दिशा में काम हो रहा है।</div><div><br></div><div>इस बदलते माहौल की पुष्टि राजनीतिक स्तर पर भी हो रही है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने केंद्रीय ग्रामीण विकास एवं कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात कर बस्तर में सड़क संपर्क बढ़ाने के लिए केंद्रीय योजनाओं के मानकों में विशेष छूट की मांग की है। उनका कहना है कि चार-पांच दशकों के बाद बस्तर माओवाद के प्रभाव से बाहर निकलने की स्थिति में पहुंचा है, लेकिन दूर-दराज बिखरी आबादी के कारण सामान्य जनसंख्या आधारित नियमों के तहत सड़क निर्माण में दिक्कत आती है। अब चुनौती है कि शांति को स्थायी विकास में बदला जाए।</div><div><br></div><div>सबसे प्रतीकात्मक बदलाव तिरंगे को लेकर है। बस्तर संभाग के 92 से अधिक ऐसे सुदूर गांवों में स्वतंत्रता के बाद पहली बार राष्ट्रीय ध्वज शान से फहराया गया है। साथ ही पुनर्वास नीति 2025 के तहत आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों को घर, जमीन, मासिक सहायता और रोजगार के अवसर देकर मुख्यधारा में सम्मानजनक जीवन की राह दी जा रही है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, बस्तर की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां बदलाव केवल सुरक्षा बलों की सफलता की कहानी नहीं है। यह उस सामाजिक परिवर्तन की कहानी है, जिसमें बंदूक की जगह खेल, जंगल के डर की जगह स्कूल, अलगाव की जगह सड़क और हिंसा की जगह रोजगार ने लेना शुरू किया है। साथ ही जिस छत्तीसगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों को कभी ‘रेड कॉरिडोर’ के नाम से जाना जाता था, वहां अब रेड कार्पेट पर आत्मविश्वास से चलती पूर्व महिला माओवादियों की तस्वीर यही संदेश दे रही है कि राज्य का भविष्य अब भय नहीं, बल्कि शांति, सम्मान और संभावनाओं के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

<iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/8NiB9DFpNRw?si=0dH9unHmWkrBzB7p" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 14:18:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/bastar-red-corridor-to-red-carpet-former-women-maoists-transformation</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/13/former-maoists-walked-on-ramp_large_1420_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/is-india-now-sending-a-comply-or-quit-message-to-global-tech-companies]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत सरकार ने इंस्टाग्राम, वाट्सएप और फेसबुक का संचालन करने वाली कंपनी मेटा की मनमानी को अब नियंत्रित करने का निर्णय लिया है। इसी के दृष्टिगत उसे यह चेतावनी भी दी है कि उसे भारतीय कानूनों का पालन करना ही होगा। यही नहीं, सरकार ने मेटा से अपने एल्गोरिदम को लेकर भी जवाब तलब किया है।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसका तात्पर्य है कि अब मेटा को यह सुनिश्चित करना होगा कि इस सरकारी निर्देश का वास्तव में पालन हो, क्योंकि मेटा अथवा अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियां एलगोरिदम का मनमाना उपयोग करती हैं। एआइ के आगमन के बाद उनके लिए ऐसा करना और आसान हो गया है। इसलिए सवाल उठने लगे हैं कि क्या भारत अब वैश्विक टेक कंपनियों के लिए ‘नियम मानो या रास्ता छोड़ो’ वाला संदेश दे रहा है?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/regulation-of-social-media-which-is-becoming-antisocial-is-essential" target="_blank">असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी</a></h3><div>वस्तुतः वैश्विक इंटरनेट कंपनियां एक विशेष एजेंडे का प्रचार-प्रसार करती हैं। अब इंटरनेट मीडिया कंपनियां यह सुनिश्चित कर रही हैं कि लोग क्या देखें और क्या नहीं? मसलन, ऐसा करके वे लोगों के स्वस्थ चिंतन को प्रभावित कर रही हैं। चिंताजनक पहलू यह है कि यह सब काम प्रायः संकीर्ण अंतर्राष्ट्रीय उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किया जाता है ताकि भारतीय हित प्रभावित होता रहे और कम्पनियों के लिए लाभदायक स्थिति निर्मित होती रहे।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह एक तथ्य है कि इंटरनेट कंपनियां कई देशों में चुनावों को प्रभावित करने का काम कर चुकी हैं। वे ऐसा भारत में भी कर चुकी हैं और इसका पता कैंब्रिज एनालिटिका मामले से चलता है। वैसे तो इंटरनेट मीडिया कंपनियां अपने को- 'सोशल मीडिया' कहती हैं, लेकिन सच यह है कि वे असामाजिक और अराजक तत्वों को भी प्रोत्साहन प्रदान करती हैं। वे ध्रुवीकरण के साथ ही सामाजिक विभाजन की खाई भी चौड़ी कर रही हैं।&nbsp;</div><div><br></div><div>अलबत्ता, कई बार वे अपने गलत इरादों की पूर्ति करती हुई पाई गई हैं। पहले हर बार वे माफी मांगकर बच निकलती हैं। लेकिन इस बार भारत सरकार ने उनकी नकेल कसी है। लिहाजा सरकार को अब केवल माफी से संतुष्ट नहीं होना चाहिए, बल्कि यदि कोई इंटरनेट मीडिया कंपनी अनुचित कार्य करती पाई जाए तो उसे वैसे ही कठोर दंड का भागीदार बनाया जाना चाहिए जैसे अनेक पश्चिमी देश समय-समय पर बनाते हैं और उन पर भारी जुर्माना लगाते हैं। अभी हाल में अमेरिका ने मेटा पर भारी जुर्माना लगाया। इसके दृष्टिगत भारत सरकार ने भी, हाल में मेटा ने प्रधानमंत्री मोदी के वीडियो को हटाने को लेकर जो माफी मांगी, उसे खारिज कर उचित ही किया। दरअसल, समस्या केवल यह नहीं कि मेटा ने किसी खास एजेंडे के तहत शरारतपूर्ण ढंग से प्रधानमंत्री के वीडियो को हटाया, बल्कि यह भी है कि उसने यह माना कि उसके प्लेटफार्म पर बाल यौन शोषण से जुड़े कंटेंट के साथ-साथ डीपफेक वीडियो को बढ़ावा दिया गया। यह भी स्वीकारा कि उसने पैसे लेकर हानिकारक सामग्री को बढ़ावा दिया। मसलन, ये सब ऐसी हरकतें हैं, जिनके लिए मेटा अथवा अन्य इंटरनेट कंपनियों को जवाबदेह बनाना अनिवार्य है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब यह सही समय है कि भारत सरकार मेटा एवं अन्य इंटरनेट मीडिया कंपनियों को जवाबदेह बनाने के साथ ही इस पर भी विचार करे कि आखिर विदेशी इंटरनेट मीडिया कंपनियों पर निर्भर रहना कहां तक उचित है? चूंकि सोशल मीडिया दुनिया भर में लोगों को लती/बीमार भी बना रही हैं, इसलिए इनकी बढ़ती प्रवृत्ति पर पुनर्विचार की जरूरत तो है ही!&nbsp;</div><div><br></div><div>इसी के मद्देनजर भारत सरकार की ताजा चेतावनी को लिया जाना चाहिए, जिसका का तत्काल कारण Meta/Facebook द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक वीडियो कुछ समय के लिए Facebook से हटाया जाना है। लिहाजा, सरकार ने Meta की यह सफाई कि वीडियो गलती से हट गया था, स्वीकार नहीं की और कहा कि मामला अभी “सुलझा हुआ” नहीं है।&nbsp;</div><div><br></div><h2># आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया?</h2><div><br></div><div>ऐसे में सीधा सवाल है कि आखिर सरकार ने Meta को क्यों चेताया? वस्तुतः इसके मुख्यतः चार कारण सामने आए हैं: पहला, PM मोदी के वीडियो को हटाना — जुलाई 2026 में प्रधानमंत्री का युवाओं से जुड़ा वीडियो अस्थायी रूप से Facebook से हट गया। Meta ने इसे operational error बताया, लेकिन सरकार ने स्पष्टीकरण को संतोषजनक नहीं माना। दूसरा, भारतीय कानून बनाम Meta की global policy — सरकार का स्पष्ट संदेश है कि भारत में काम करने वाली Meta को अपनी वैश्विक नीतियों से ऊपर भारतीय कानूनों और नियामकीय निर्देशों का पालन करना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>तीसरा, Deepfake और AI-generated misinformation — सरकार ने Meta से algorithms और content-moderation व्यवस्था मजबूत करने, deepfake/propaganda को तेजी से पहचानने तथा अधिक प्रभावी takedown mechanism बनाने को कहा है। चौथा, Safe-harbour का दबाव — संसदीय IT समिति के अध्यक्ष निशिकांत दुबे ने चेतावनी दी कि नियमों के अनुपालन में गंभीर चूक होने पर Meta को IT Act की धारा 79 के तहत मिलने वाली safe-harbour सुरक्षा पर सवाल उठ सकता है।</div><div><br></div><h2># इन आधा दर्जन विवादों में सबसे गंभीर मामला कौन-सा है?</h2><div><br></div><div>मेरे आकलन में 2021 WhatsApp Privacy Policy विवाद और उसके परिणामस्वरूप CCI की ₹213.14 करोड़ की कार्रवाई सबसे महत्वपूर्ण नियामकीय मामला है। CCI ने पाया कि WhatsApp ने अपनी dominant position का इस्तेमाल करते हुए यूजर डेटा संग्रह/शेयरिंग के संबंध में प्रतिस्पर्धा कानून का उल्लंघन किया; बाद में मामला न्यायिक चुनौती तक गया। लेकिन 2026 का नया टकराव अलग प्रकृति का है।&nbsp;</div><div><br></div><div>अब सवाल सिर्फ privacy या competition का नहीं, बल्कि Meta के algorithm, content moderation, AI/deepfake, राजनीतिक सामग्री और भारतीय संप्रभु नियमन का बनता जा रहा है। यही वजह है कि सरकार का संदेश मूलतः यह है: “भारत में कारोबार करना है तो Meta को भारतीय कानून और भारतीय नियामकीय व्यवस्था के अनुसार चलना होगा।” यही वजह है कि भारत में केंद्र सरकार और अमेरिकी टेक कंपनी Meta के बीच टकराव अब केवल सोशल मीडिया कंटेंट या यूजर प्राइवेसी तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि इससे भी आगे बढ़ चुका है।&nbsp;</div><div><br></div><div>खासकर 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के Facebook वीडियो को अस्थायी रूप से प्रतिबंधित किए जाने के बाद पैदा हुआ विवाद इस रिश्ते को एक नए और अधिक संवेदनशील दौर में ले गया है, जो भारत-अमेरिका सम्बन्धों में जारी उतार-चढ़ाव की चुगली करने को काफी है। भले ही Meta ने इसे “operational error” बताया और वीडियो बहाल कर दिया। लेकिन भारत सरकार ने इसे केवल तकनीकी गलती मानने से इनकार किया। बाद में Meta के वैश्विक अधिकारियों ने भारत सरकार के सामने माफी भी मांगी। फिर भी यह सवाल इसलिए बड़ा है कि क्या भारत में डिजिटल प्लेटफॉर्म अब केवल निजी कंपनियां हैं या वे सार्वजनिक जीवन और लोकतांत्रिक विमर्श को प्रभावित करने वाली ‘डिजिटल संस्थाएं’ भी बन चुकी हैं?</div><div><br></div><h2># Meta बनाम भारत सरकार: 2018 से 2026 तक विवादों की पूरी कहानी</h2><div><br></div><div>आइए जानते हैं चरणबद्ध रूप से बढ़े टकराव के बारे में विस्तार से, ताकि आप समझ सकें कि गंगा-यमुना में कितना पानी बह चुका है:-</div><div><br></div><h2>पहला, 2021: WhatsApp Privacy Policy से शुरू हुआ बड़ा टकराव</h2><div><br></div><div>भारत में Meta और केंद्र सरकार के बीच सबसे गंभीर विवादों में एक WhatsApp की 2021 Privacy Policy थी। जिसके मार्फ़त WhatsApp ने अपनी नई नीति के तहत उपयोगकर्ताओं के डेटा को Meta की दूसरी कंपनियों के साथ साझा करने की व्यवस्था को लेकर सुनियोजित विवाद खड़ा किया। तब आलोचना यह हुई थी कि उपयोगकर्ता के पास वास्तविक विकल्प सीमित था—नीति स्वीकार करें या WhatsApp का इस्तेमाल छोड़ दें।</div><div><br></div><div>यही मामला आगे चलकर Competition Commission of India यानी CCI तक पहुंचा। तब जाकर नवंबर 2024 में CCI ने Meta और WhatsApp पर ₹213.14 करोड़ का भारी भरकम जुर्माना लगाया और डेटा शेयरिंग के संबंध में भी कई कड़े निर्देश दिए। इस मामले में मूल प्रश्न यह था कि— क्या किसी अत्यधिक प्रभावशाली डिजिटल प्लेटफॉर्म को अपनी बाजार-स्थिति का इस्तेमाल करके उपयोगकर्ता से ऐसी शर्तें स्वीकार कराने का अधिकार है जिन्हें वह वास्तविक रूप से अस्वीकार नहीं कर सकता?</div><div><br></div><h2>दूसरा, 2024-26 में यह मामला अदालत तक पहुंचा</h2><div><br></div><div>Meta और WhatsApp ने CCI के आदेश को अदालत में चुनौती दी। मामला NCLAT और फिर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने भी WhatsApp और Meta की डेटा नीति को लेकर कड़े सवाल उठाए और नागरिकों की निजता के अधिकार पर गंभीर चिंता जताई। इससे यह स्पष्ट हुआ कि भारत में Meta के सामने केवल सरकार नहीं, बल्कि नियामकीय और न्यायिक संस्थाओं की संयुक्त निगरानी भी बढ़ रही है।</div><div><br></div><h2>तीसरा, जुलाई 2026: Instagram पर बाल शोषण सामग्री के विज्ञापन</h2><div><br></div><div>जुलाई 2026 में Meta के लिए एक और गंभीर संकट आया। वह यह कि Instagram पर Child Sexual Exploitative and Abuse Material (CSEAM) से संबंधित कथित paid advertisements की रिपोर्ट सामने आई। इसके बाद राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) ने जांच शुरू की और सरकार ने Meta को सामग्री हटाने तथा स्पष्टीकरण देने को कहा। यह मामला इसलिए अत्यंत गंभीर है क्योंकि यहां सवाल केवल “content moderation” का नहीं, बल्कि Meta के विज्ञापन और algorithmic monitoring तंत्र की विश्वसनीयता का है।</div><div><br></div><h2>चौथा, जुलाई 2026: प्रधानमंत्री मोदी का Facebook वीडियो</h2><div><br></div><div>इसके बाद आया सबसे राजनीतिक रूप से संवेदनशील विवाद। जिसके अंतर्गत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक Facebook वीडियो, जिसमें वे युवाओं और NEET से जुड़े मुद्दे पर बात कर रहे थे, कुछ समय के लिए Facebook पर उपलब्ध नहीं रहा। हालांकि, जब प्रशासन सक्रिय हुआ तो Meta ने बाद में स्वीकार किया कि वीडियो गलती से हटाया गया था और उसे बहाल कर दिया गया। लेकिन सरकार ने इस स्पष्टीकरण को पर्याप्त नहीं माना। जिसके बाद Meta के अधिकारियों को सरकार के सामने जवाब देना पड़ा और मामला संसदीय IT समिति तक पहुंच गया।&nbsp;</div><div><br></div><div>समिति ने Meta के शीर्ष नेतृत्व से माफी की मांग तक की और safe-harbour protection पर सवाल उठाए। लिहाजा, यहां से विवाद का स्वरूप ही बदल गया। क्योंकि अब सवाल था कि—अगर Meta का algorithm या moderation system भारत के प्रधानमंत्री की सामग्री को गलती से भी प्रतिबंधित कर सकता है, तो क्या भारत की डिजिटल संप्रभुता वास्तव में विदेशी कंपनियों के algorithm के हाथ में है?</div><div><br></div><h2>पांचवां, Deepfake और AI ने विवाद को और गंभीर बनाया</h2><div><br></div><div>2026 में सरकार ने Meta से deepfake, misinformation और propaganda से निपटने के लिए अपने algorithms और content-moderation व्यवस्था को मजबूत करने को कहा है। क्योंकि सरकार की चिंता यह है कि AI के दौर में किसी नेता, संस्था या व्यक्ति का नकली वीडियो कुछ ही मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकता है। इसलिए सरकार अब केवल “हटाओ” नहीं कह रही, बल्कि Meta से बेहतर detection system, तेज response और compliance roadmap की अपेक्षा कर रही है।</div><div><br></div><h2>छठा, WhatsApp और डेटा: विवाद अभी खत्म नहीं हुआ</h2><div><br></div><div>WhatsApp का मामला भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। CCI की कार्रवाई के बाद डेटा शेयरिंग और उपयोगकर्ता की सहमति का प्रश्न अभी भी न्यायिक विमर्श का हिस्सा है। सुप्रीम कोर्ट में Meta और WhatsApp की चुनौती पर भी सुनवाई हुई है। इसलिए यह कहना गलत होगा कि 2021 का विवाद केवल अतीत की बात है। वास्तव में वह विवाद आज के डेटा-सॉवरेनिटी और डिजिटल संप्रभुता के विमर्श की नींव बन चुका है।</div><div><br></div><h2># असली लड़ाई Meta बनाम सरकार से कहीं बड़ी है!</h2><div><br></div><div>इस पूरे विवाद को केवल “मोदी का वीडियो हटाने” तक सीमित करना शायद सही नहीं होगा। असल संघर्ष तीन स्तरों पर है- पहला — डेटा पर नियंत्रण यानी भारतीय नागरिकों का डेटा किसके नियंत्रण में रहेगा? दूसरा — algorithm पर नियंत्रण यानी भारत में क्या दिखेगा, क्या नहीं दिखेगा और कौन-सी सामग्री कितने लोगों तक पहुंचेगी—इसका निर्णय भारतीय कानून करेगा या अमेरिका में बैठे technology teams के algorithms? तीसरा — डिजिटल संप्रभुता यानी क्या भारत अपने लोकतांत्रिक विमर्श की सुरक्षा के लिए विदेशी टेक कंपनियों को अपने नियमों के अनुसार चलने के लिए बाध्य कर सकता है? भारत सरकार का वर्तमान रुख स्पष्ट रूप से इसी तीसरे प्रश्न की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।</div><div><br></div><h2># Safe Harbour: सरकार का सबसे बड़ा हथियार?</h2><div><br></div><div>भारत में social-media intermediaries को कुछ परिस्थितियों में उपयोगकर्ताओं द्वारा पोस्ट की गई सामग्री के लिए कानूनी सुरक्षा मिलती है। इसे सामान्यतः safe harbour कहा जाता है। यही कारण है कि संसदीय समिति द्वारा Meta की इस सुरक्षा पर सवाल उठाना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि किसी बड़े प्लेटफॉर्म की कानूनी सुरक्षा कमजोर होती है तो उसके ऊपर user-generated content को लेकर कहीं अधिक जिम्मेदारी आ सकती है। इसलिए Meta के लिए भारत सरकार की चेतावनी केवल राजनीतिक बयान नहीं है—यह व्यावसायिक और कानूनी जोखिम भी है।</div><div><br></div><h2># भारत ने Meta को क्या संदेश दिया?</h2><div><br></div><div>भारत का संदेश मोटे तौर पर यह है: “Global company होने का अर्थ यह नहीं कि भारत में Global rules भारतीय कानून से ऊपर हो जाएंगे।” और यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक संदेश है। Meta ने हालिया विवाद में माफी मांगकर तत्काल संकट को टाल दिया है। Reuters के अनुसार Meta के Chief Global Affairs Officer Joel Kaplan ने PM मोदी के वीडियो को प्रतिबंधित किए जाने को operational error बताते हुए भारत से माफी मांगी। लेकिन इससे मूल प्रश्न समाप्त नहीं होता।</div><div><br></div><h2># सवाल है कि अब आगे क्या?</h2><div><br></div><div>आने वाले वर्षों में भारत और Meta के बीच तीन मुद्दे निर्णायक रहेंगे— डेटा + AI + डिजिटल अभिव्यक्ति। भारत दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल बाजारों में है। WhatsApp और Instagram जैसे प्लेटफॉर्म करोड़ों भारतीयों के रोजमर्रा के जीवन का हिस्सा हैं। इसलिए सरकार के सामने भी संतुलन की चुनौती है। एक तरफ उसे नागरिकों की निजता, बच्चों की सुरक्षा, चुनावी प्रक्रिया और राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा करनी है। दूसरी तरफ उसे यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नियमन के नाम पर डिजिटल अभिव्यक्ति और स्वतंत्र विमर्श पर अनावश्यक सरकारी नियंत्रण न बढ़े।</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां Meta बनाम भारत सरकार का विवाद आने वाले समय में “कंटेंट मॉडरेशन” से आगे बढ़कर “डिजिटल संप्रभुता बनाम वैश्विक टेक शक्ति” का बड़ा राजनीतिक विमर्श बन सकता है। और शायद यही इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा निहितार्थ है।</div><div><br></div><div>- कमलेश पांडेय</div><div>वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 13:49:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/is-india-now-sending-a-comply-or-quit-message-to-global-tech-companies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/13/social-media_large_1351_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संसदीय समिति की रिपोर्ट से उठते सवाल- प्राइवेट अस्पतालों और स्कूलों की लूट पर कब लगेगी लगाम?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/when-will-the-fleecing-by-private-hospitals-and-schools-be-reined-in]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पिछले कुछ वर्षों के दौरान देश में प्राइवेट यानी निजी अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई है। देश के राज्य और जिले तो छोड़िए , अब तो छोटे-छोटे शहरों में भी खुलते जा रहे नर्सिंग होम और स्कूल लोगों की जेब काटने का कोई मौका नहीं चूक रहे हैं। देश का गरीब तबका तो छोड़िए, मध्यम आय और उच्च मध्यम आय की कैटेगरी में आने वाले लोग भी इनकी लूट से परेशान होते जा रहे हैं।</div><div><br></div><div>ऐसे में प्राइवेट अस्पतालों को लेकर आई संसदीय समिति की एक रिपोर्ट ने फिर से इस घाव को ताजा कर दिया है। एक बार फिर से वही पुराना सवाल उठ कर खड़ा हो गया है कि खुली लूट का अड्डा बन चुके प्राइवेट अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की मनमानी पर आखिर कब लगाम लगेगी?</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/politics-articles/yogi-adityanath-modi-nitin-nabin-bjp-mission-up-2027-election-strategy" target="_blank">Modi-Yogi ने 'Mission 2027' को सफल बनाने के लिए कसी कमर, कई BJP MLAs के टिकट पर लटकी तलवार!</a></h3><div>देश के प्राइवेट अस्पताल, भर्ती होने वाले मरीजों/ उनके परिजनों से कमरे का जो किराया वसूलते है, यह उसी इलाके के महंगे होटलों से भी कई गुना ज्यादा होता है। ध्यान दीजिएगा, इलाज के नाम पर जो बाकी चार्ज लिए जाते हैं वो कमरे के चार्ज में अलग से जोड़ा जाता है। यह सारे खुलासे केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय से जुड़ी संसद की स्थायी समिति की रिपोर्ट से हुए हैं। समिति की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकारी अस्पतालों में इलाज का खर्च औसतन 6,631 रुपए है जबकि प्राइवेट अस्पतालों में यही खर्च साढ़े सात गुने से भी ज्यादा (50,508 रुपए ) है। इलाज के नाम पर भी अनाप-शनाप वसूली की जाती है। बिल में पारदर्शिता नहीं होती है, गंभीर इलाज या सर्जरी से पहले मरीज को फाइनल खर्च का एस्टिमेट नहीं बताया जाता है। नतीजा प्राइवेट अस्पतालों की मनमानी बेलगाम होती जा रही है और जिसकी जो मर्जी वो वसूल रहा है। मुंबई के नानावटी अस्पताल में कमरे का चार्ज 6 से 12 हजार रुपए प्रतिदिन है जबकि उसी इलाके के 3 स्टार होटल में कमरे कमरे का चार्ज 2500 से लेकर 4500 रुपए के बीच ही है। दिल्ली के साकेत में स्थित मैक्स अस्पताल में भर्ती मरीज से अस्पताल वाले 7-11 हजार रुपए प्रतिदिन कमरे का चार्ज वसूलते है जबकि अस्पताल के पास ही स्थित होटल में आपको 2100 से 3500 रुपए प्रतिदिन के आधार पर बढ़िया कमरा मिल सकता है। यही हाल देश के ज्यादातर शहरों में प्राइवेट अस्पतालों का है।</div><div>&nbsp;</div><div>समिति ने सरकार को कुछ सुझाव देते हुए यह सिफारिश की है कि, प्राइवेट अस्पताल के कमरे का किराया 3 स्टार होटल के किराए से अधिक नहीं होनी चाहिए। भर्ती से पहले अस्पताल को इलाज का पूरा खर्च स्पष्ट रूप से बताना चाहिए। सर्जरी और गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए फिक्स रेट तय होना चाहिए और उसमें सभी खर्चे शामिल होने चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसके अलावा भी संसदीय समिति ने कई महत्वपूर्ण सिफारिश करते हुए सरकार की भूमिका पर भी सवाल उठाए है। समिति ने स्पष्ट तौर पर सरकार को सरकारी अस्पतालों में बेड और विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने को कहा है। हालांकि यह सब जानते हैं कि सरकार ऐसा करेगी नहीं। लेकिन इस बात का भी ध्यान रखना जरूरी है कि स्वास्थ्य मंत्रालय समिति की रिपोर्ट की आड़ लेकर कहीं वैसा ही खेल न कर दें जैसा कि CGHS चार्ज के मामले में किया गया है। सरकार को यह याद दिलाना बेहद जरूरी है कि दिल्ली या मुंबई के महंगे अस्पतालों में इलाज का खर्च इन शहरों के हिसाब से है वहीं देश के दूर-दराज इलाकों में इलाज का खर्च उस इलाके के आधार पर है। डर इस बात का है कि कहीं CGHS में जो गलतियां की गई है,उसी तरह की गलती को इस मामले में दोहराते हुए दिल्ली या मुंबई के आधार पर इलाज़ और सर्जरी का फिक्स रेट पूरे देश के लिए न तय कर दिया जाए। ऐसे हालात में दूर-दराज के इलाकों में चलने वाले प्राइवेट अस्पताल सरकारी आदेश का हवाला देते हुए कई गुना पैसा वसूलना शुरू कर देंगे। सरकार , सरकार के मंत्री और अधिकारियों को इस बात का विशेष ध्यान रखना होगा।&nbsp;</div><div><br></div><div>जब भी प्राइवेट अस्पतालों की खुली लूट का जिक्र आता है तो आप इससे स्कूलों और कॉलेजों को अलग नहीं कर सकते हैं। क्योंकि जिस तरह से एक छोटे नर्सिंग होम को बड़ा और भव्य अस्पताल बनने में देर नहीं लगती, उसी तरह से स्कूल और कॉलेजों की बिल्डिंग भी साल दर साल भव्य से भव्यतम होती चली जाती है। फीस, किताबें, ड्रेस और बाकी खर्चो की मनमानी के बारे में तो सबको मालूम है। इसलिए यहां पर हम सिर्फ कुछ उदाहरण आपके सामने रखना चाहेंगे। दिल्ली से सटे गाजियाबाद में स्थित एक मेडिकल कॉलेज से MBBS करने की कुल लागत सवा से डेढ़ करोड़ रुपए के बीच आती है। मिडिल क्लास तो छोड़िए , हाई इनकम ग्रुप में आने वाले लोगों के लिए भी अब अपने बच्चों को MBBS करवा पाना आसान नहीं रहा है। आजकल प्राइवेट स्कूलों में लूट का एक जरिया स्मार्ट बोर्ड यानी स्मार्ट क्लासेस भी बन चुका है। एक बार स्मार्ट बोर्ड लगा दिया और फिर उसके बाद सालों तक इसके नाम पर स्कूल वाले वसूली करते हैं। अलग-अलग इलाकों के आधार पर स्मार्ट क्लास के नाम पर प्राइवेट स्कूल वाले 200 रुपए से लेकर 800 रुपए महीने तक वसूलते हैं। पहली कक्षा से बारहवी तक, हर महीने.. हर साल..। हालत इतनी खराब है कि अगर इन स्कूलों में जाकर आप अध्यापकों से स्मार्ट बोर्ड पर पढ़ाने को कहेंगे तो ज्यादातर शिक्षकों को शायद यह चलाना भी नहीं आएगा लेकिन हर महीने वसूली जारी है।&nbsp;</div><div><br></div><div>संसदीय समिति भले ही कितने भी गंभीर सवाल उठाए या कितने ही अच्छे सुझाव दें लेकिन कड़वी सच्चाई तो यही है कि प्राइवेट अस्पतालों, स्कूलों और कॉलेजों की मनमानी एवं खुली लूट पर लगाम कसने का कोई स्थायी फॉर्मूला सरकारों के पास नहीं है और इसके लिए सभी राजनीतिक दलों के नेता जिम्मेदार हैं क्योंकि पिछले तीन दशकों में देश के तमाम राजनीतिक दल कहीं न कहीं किसी न किसी सरकार में भागीदार/साझीदार रहे हैं इसलिए कोई भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>संतोष कुमार पाठक</div><div>लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 18:31:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/when-will-the-fleecing-by-private-hospitals-and-schools-be-reined-in</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/12/parliamentary-committee-report_large_1833_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[इधर एक रक्षा समझौता कर उछल रहा पाकिस्तान, उधर मोदी की Defence Diplomacy ने बिछा दिया रणनीतिक सुरक्षा का जाल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/india-recent-defence-cooperation-developments-vs-pakistan-turkey-saudi-defence-pact]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भले ही तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान 7 अगस्त 2026 के मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बाद इसे अपनी बड़ी रणनीतिक कामयाबी के तौर पर पेश कर रहे हों, लेकिन भारत ने इस बदलते शक्ति-संतुलन का जवाब किसी एक मोर्चे पर नहीं, बल्कि कई दिशाओं में पहले ही तैयार कर लिया था। सिर्फ एक साल के ही घटनाक्रमों को देखें तो फरवरी 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान दोनों देशों ने अपने संबंधों को “Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity” के स्तर तक पहुंचाया और रक्षा, सुरक्षा, अंतरिक्ष, साइबर तथा अत्याधुनिक तकनीकों में सहयोग को नई धार दी। उसी फरवरी में फ्रांस के साथ रिश्तों को “Special Global Strategic Partnership” तक पहुँचाया गया, जिसके तहत रक्षा उत्पादन, HAMMER मिसाइलों के भारत में संयुक्त निर्माण और उन्नत सैन्य तकनीक पर सहयोग बढ़ा है। इससे पहले अगस्त 2025 में फिलीपींस के साथ भारत ने Strategic Partnership स्थापित की थी, जिसके केंद्र में रक्षा, समुद्री सुरक्षा और हिंद-प्रशांत सहयोग है। साथ ही अप्रैल 2026 में दक्षिण कोरिया के साथ Special Strategic Partnership को अगले पांच वर्षों के लिए नई रणनीतिक दिशा दी गई, जबकि मई 2026 में वियतनाम के साथ Enhanced Comprehensive Strategic Partnership के तहत रक्षा खरीद, समुद्री सुरक्षा, साइबर सहयोग और हिंद-प्रशांत में समन्वय को और मजबूत किया गया। मई 2026 में ही नीदरलैंड के साथ भी संबंधों को Strategic Partnership तक ले जाने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी अरब ने जहां एक त्रिकोण बनाया है, वहीं भारत ने इजराइल, फ्रांस, फिलीपींस, दक्षिण कोरिया, वियतनाम, नीदरलैंड और खाड़ी के महत्वपूर्ण साझेदारों के साथ अलग-अलग लेकिन आपस में जुड़े रणनीतिक रिश्तों का ऐसा व्यापक नेटवर्क खड़ा किया है, जिसमें रक्षा तकनीक, मिसाइलें, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग और रक्षा उत्पादन सभी शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>भारत-इजराइल रक्षा सहयोग</h2><div><br></div><div>हम आपको याद दिला दें कि ईरान युद्ध से ठीक पहले हुई प्रधानमंत्री मोदी की इजराइल यात्रा का सबसे बड़ा पहलू आधुनिक रक्षा तकनीक था। करीब 10 अरब डॉलर मूल्य के संभावित रक्षा सौदों में आयरन बीम जैसी लेजर आधारित वायु रक्षा प्रणाली, आयरन डोम, डेविड्स स्लिंग और एरो प्रणालियों की तकनीक, सटीक निर्देशित बम, लोइटरिंग म्यूनिशन, नौसैनिक रक्षा प्रणालियां और अत्याधुनिक ड्रोन शामिल हैं। इससे साफ है कि भारत केवल हथियार खरीदने की दिशा में नहीं, बल्कि अपनी दीर्घकालिक सैन्य वास्तुकला को इजराइली तकनीक के साथ जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ रहा है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-changes-his-approach-following-the-neet-ug-controversy-advises" target="_blank">NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह</a></h3><div>कहानी यहीं खत्म नहीं होती। भारत-इजराइल सहयोग में “होराइजन स्कैनिंग” जैसी AI आधारित व्यवस्था पर भी काम हो रहा है, जिसके जरिए भविष्य के सुरक्षा जोखिमों, सीमाई चुनौतियों और तकनीकी बदलावों का पहले से आकलन किया जा सकेगा। AI, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा में संयुक्त शोध का अर्थ है कि भारत अपनी अगली पीढ़ी की सुरक्षा क्षमता केवल आज के युद्ध के लिए नहीं, बल्कि कल के युद्ध की प्रकृति को ध्यान में रखकर तैयार कर रहा है। साथ ही रक्षा उत्पादन में संयुक्त शोध, तकनीकी हस्तांतरण और घरेलू सह-उत्पादन “आत्मनिर्भर भारत” को सैन्य शक्ति से जोड़ते हैं।</div><div><br></div><div>इसी संदर्भ में इजराइल की प्रस्तावित “Hexagon of Alliances” अवधारणा भी महत्वपूर्ण हो जाती है, जिसमें भारत, इजराइल, ग्रीस, साइप्रस और अन्य साझेदारों के बीच सुरक्षा और आर्थिक सहयोग की परिकल्पना की गई है। इसका रणनीतिक संदेश यह है कि भारत पश्चिम एशिया और भूमध्यसागर में बन रहे नए शक्ति-संतुलन को केवल देख नहीं रहा, बल्कि अपने लिए वैकल्पिक रणनीतिक नेटवर्क भी तैयार कर रहा है।</div><div><br></div><h2>मक्का समझौते से जुड़े सवाल</h2><div><br></div><div>अब आते हैं मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर। सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने सामूहिक प्रतिरोध का संकल्प लेते हुए कहा है कि तीनों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। आंकड़ों के मुताबिक, तीनों देशों के पास संयुक्त रूप से करीब 14 लाख सक्रिय सैन्यकर्मी, 3,415 विमान, 6,046 टैंक, 344 नौसैनिक परिसंपत्तियां और लगभग 124.4 अरब डॉलर का वार्षिक रक्षा बजट है। सऊदी अरब पूंजी और रणनीतिक भूगोल देता है, तुर्की रक्षा उद्योग, ड्रोन, मिसाइल और नौसैनिक तकनीक देता है, जबकि पाकिस्तान मानवबल, सैन्य अनुभव और परमाणु क्षमता लेकर आता है। लेकिन इस गठजोड़ को “इस्लामिक नाटो” कह देना इसकी वास्तविक क्षमता का अंतिम प्रमाण नहीं है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि हमला होने की स्थिति में बाकी सदस्य वास्तव में कितनी और किस प्रकार की सैन्य सहायता देने के लिए बाध्य होंगे। फिलहाल अभी कोई स्थायी केंद्रीय संयुक्त सैन्य कमान स्थापित नहीं हुई है। यानी राजनीतिक घोषणा और वास्तविक संयुक्त युद्ध क्षमता के बीच अभी लंबी दूरी है।</div><div><br></div><h2>रणनीतिक साझेदारियों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है हिंदुस्तान</h2><div><br></div><div>साथ ही पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब के बीच बने नए रक्षा समीकरण को समझने के लिए केवल तीन देशों की सैन्य ताकत देखना काफी नहीं है। असली तस्वीर यह है कि पिछले एक साल में भारत ने भी अपनी रणनीतिक साझेदारियों और रक्षा सहयोग का दायरा तेजी से बढ़ाया है। अगस्त 2025 में भारत और फिलीपींस ने अपने संबंधों को औपचारिक रूप से Strategic Partnership यानि रणनीतिक साझेदारी का दर्जा दिया। फरवरी 2026 में भारत-इजराइल संबंधों को Special Strategic Partnership for Peace, Innovation and Prosperity तक पहुँचाया गया। फरवरी में ही भारत और फ्रांस ने अपने रिश्तों को Special Global Strategic Partnership के स्तर तक पहुंचाया। मई 2026 में भारत और वियतनाम ने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership में बदल दिया। यूएई के साथ जनवरी 2026 में दोनों देशों ने Strategic Defence Partnership स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया।</div><div><br></div><div>इन साझेदारियों की खासियत यह है कि ये केवल कागज पर कूटनीतिक घोषणाएं नहीं हैं। इनके पीछे रक्षा, समुद्री सुरक्षा, खुफिया सहयोग, तकनीक, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष और रक्षा उत्पादन जैसे ठोस क्षेत्र जुड़े हैं। यानी पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ अगर एक तरफ शक्ति का त्रिकोण बना रहा है, तो भारत दूसरी तरफ अलग-अलग क्षेत्रों में कई मजबूत साझेदारों का नेटवर्क खड़ा कर रहा है।</div><div><br></div><h2>भारत-फिलीपींस रक्षा संबंध</h2><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण उदाहरण फिलीपींस है। भारत पहले ही उसे करीब 375 मिलियन डॉलर की ब्रह्मोस मिसाइल प्रणाली बेच चुका है और फिलीपींस को इसकी अतिरिक्त प्रणालियों में भी रुचि है। इसके अलावा आकाश मिसाइल प्रणाली की संभावित बिक्री पर भी बातचीत हुई है। इसका सामरिक महत्व इसलिए बड़ा है क्योंकि फिलीपींस दक्षिण चीन सागर में चीन के साथ गंभीर समुद्री तनाव का सामना कर रहा है। भारत की मिसाइलें वहां पहुंचकर न केवल भारतीय रक्षा उद्योग की ताकत दिखाती हैं, बल्कि हिंद-प्रशांत में भारत की सुरक्षा भूमिका को भी मजबूत करती हैं।</div><div><br></div><h2>भारत-वियतनाम रक्षा संबंध</h2><div><br></div><div>दूसरी बड़ी सफलता वियतनाम की है। मई 2026 में दोनों देशों ने अपने संबंधों को Enhanced Comprehensive Strategic Partnership तक पहुंचाया और उसी दौरान भारत की ब्रह्मोस मिसाइल के लिए वियतनाम के साथ सौदे की आधिकारिक पुष्टि हुई। यह कदम बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि वियतनाम दक्षिण चीन सागर में चीन के दबाव का सामना कर रहा है। भारत के लिए इसका अर्थ है कि उसकी मिसाइल और रक्षा तकनीक हिंद-प्रशांत के एक और महत्वपूर्ण तटीय देश तक पहुंच रही है।</div><div><br></div><h2>भारत-इंडोनेशिया रक्षा संबंध</h2><div><br></div><div>इसके बाद इंडोनेशिया आता है। जुलाई 2026 में भारत और इंडोनेशिया ने ब्रह्मोस के साथ-साथ अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल और रक्षा तकनीक से जुड़े कई समझौते किए। रिपोर्टों के अनुसार इंडोनेशिया को दो ब्रह्मोस बैटरियों की आपूर्ति का सौदा करीब 200 मिलियन डॉलर का है। इंडोनेशिया की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए यह केवल हथियार बिक्री नहीं, बल्कि हिंद महासागर और दक्षिण-पूर्व एशिया के समुद्री सुरक्षा ढांचे में भारत की बढ़ती भूमिका का संकेत है।</div><div><br></div><h2>भारत-आर्मेनिया रक्षा संबंध</h2><div><br></div><div>वहीं आर्मेनिया भारत की रणनीतिक रक्षा नीति का एक अलग लेकिन बेहद महत्वपूर्ण मोर्चा है। भारत ने उसे आकाश एयर डिफेंस सिस्टम, पिनाका रॉकेट सिस्टम, स्वाति रडार और अन्य हथियार प्रणालियां उपलब्ध कराई हैं। 2022-24 के दौरान आर्मेनिया के हथियार आयात में भारत की हिस्सेदारी 43 प्रतिशत बताई गई है। यह साझेदारी इसलिए भी अहम है क्योंकि आर्मेनिया अजरबैजान के साथ संघर्ष में है और अजरबैजान के पाकिस्तान तथा तुर्किये के साथ करीबी रक्षा संबंध हैं। इसलिए भारत-आर्मेनिया रक्षा सहयोग सीधे तौर पर उस क्षेत्रीय समीकरण में नई सैन्य धुरी बनाता है, जिसमें तुर्किये और पाकिस्तान पहले से सक्रिय हैं।</div><div><br></div><h2>भारत-यूएई रक्षा समझौता</h2><div><br></div><div>वहीं भारत के लिए दूसरा बड़ा मोर्चा अरब जगत में उसकी बढ़ती रक्षा साझेदारी है। यूएई द्वारा ब्रह्मोस मिसाइल में रुचि इसी रणनीतिक समीकरण को बदल सकती है। यदि सौदा अंतिम रूप लेता है तो यह खाड़ी में भारत की शक्तिशाली उपस्थिति होगी। इससे तुर्की के ड्रोन और मिसाइल निर्यात को चुनौती मिल सकती है तथा यूएई को अपनी रक्षा क्षमता में नया विकल्प मिलेगा।</div><div><br></div><div>पाकिस्तान के लिए यह बड़ा रणनीतिक झटका बन सकता है। एक तरफ वह तुर्की और सऊदी अरब के साथ मिलकर नया रक्षा मोर्चा मजबूत कर रहा है, तो दूसरी तरफ भारत यूएई के साथ ब्रह्मोस जैसे अत्याधुनिक हथियारों के सहयोग की दिशा में आगे बढ़ रहा है। अगर यह सौदा हुआ, तो अरब सागर और ओमान की खाड़ी में पाकिस्तान की नौसैनिक रणनीति पर दबाव बढ़ सकता है। इतना ही नहीं, यूएई के बाद सऊदी अरब जैसे दूसरे खाड़ी देश भी भारत की रक्षा तकनीक में रुचि ले सकते हैं। साथ ही चूंकि यूएई फारस की खाड़ी, होर्मुज जलडमरूमध्य और अरब सागर के बीच एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामरिक स्थिति में है। ऐसे में भारतीय लंबी दूरी की सटीक मारक क्षमता यूएई को तुर्किये या पाकिस्तान पर निर्भर हुए बिना अपनी सुरक्षा क्षमता बढ़ाने का विकल्प दे सकती है।</div><div><br></div><div>यही वह बिंदु है जहां पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ की काट साफ दिखाई देती है। सऊदी अरब को पाकिस्तान से सैन्य मानवबल और परमाणु प्रतिरोध की छाया मिलती है, तुर्किये से ड्रोन, मिसाइल और रक्षा उद्योग की ताकत मिलती है। लेकिन भारत यूएई जैसे खाड़ी देश को अलग रक्षा विकल्प दे सकता है। दूसरी तरफ फिलीपींस, वियतनाम और इंडोनेशिया में भारतीय मिसाइलों की मौजूदगी हिंद-प्रशांत में भारत की समुद्री पहुंच बढ़ाती है, जबकि आर्मेनिया के साथ सहयोग तुर्किये-पाकिस्तान समर्थित क्षेत्रीय समीकरण को दूसरी दिशा से चुनौती देता है।</div><div><br></div><div>इसलिए पाकिस्तान-तुर्किये-सऊदी गठजोड़ का जवाब भारत किसी एक नए सैन्य गठबंधन से देने की बजाय कई दिशाओं में दे रहा है। इजराइल से अत्याधुनिक तकनीक, फ्रांस से उच्चस्तरीय रक्षा औद्योगिक सहयोग, यूएई से खाड़ी में रणनीतिक पहुंच और फिलीपींस-वियतनाम-इंडोनेशिया के जरिए हिंद-प्रशांत में मिसाइल तथा समुद्री सुरक्षा नेटवर्क। यही भारत की असली रणनीतिक बढ़त है। यानि एक गठजोड़ के सामने दूसरा गठजोड़ खड़ा करने की बजाय भारत ने साझेदारियों का ऐसा जाल बिछाना शुरू किया है जिसमें पाकिस्तान, तुर्किये और सऊदी अरब को हर दिशा में अलग-अलग रणनीतिक समीकरणों का सामना करना पड़ेगा। बहरहाल, एक चीज स्पष्ट है कि पाकिस्तान अगर डाल-डाल चलने की कोशिश कर रहा है तो उसे पता होना चाहिए कि भारत पहले से पात-पात पर अपनी रणनीतिक मौजूदगी दर्ज करा रहा है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 18:09:57 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/india-recent-defence-cooperation-developments-vs-pakistan-turkey-saudi-defence-pact</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/12/pm-modi_large_1811_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[असामाजिक हो रहे सोशल मीडिया का नियमन जरूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/regulation-of-social-media-which-is-becoming-antisocial-is-essential]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>दिल्ली में बीस जुलाई को काकरोच जनता पार्टी के संसद मार्च के दौरान हुई हिंसा और 23 जुलाई को प्रधानमंत्री मोदी के जेन जी के संबोधन की वीडियो फेसबुक और इंस्टाग्राम से हटाए जाने के बाद सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बहुत चर्चा में हैं। चर्चा से ज्यादा उनकी भूमिका कहीं ज्यादा विमर्श के केंद्र में है। इसमें दो राय नहीं कि दुनियाभर में जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ज्यादा प्रचलन में हैं, उनमें से ज्यादातर विदेशी हैं। जाहिर है कि वे उन जगहों के कानूनों और सांस्कृतिक परंपराओं से ज्यादा संचालित हैं, जहां उनके मुख्यालय हैं। इसलिए अपने व्यापक हितों के लिए वे अपने प्रचलन वाले देशों की परंपराओं और संस्कृतियों को सवालों के घेरे में लाने, उसका उपहास उड़ाने और उन्हें तार-तार करने वाला अलगोरिदम उन्होंने विकसित कर रखा है। जिसका खामियाजा तीसरी दुनिया के देश और वहां की सांस्कृतिक परंपराएं उठा रही हैं।</div><div>&nbsp;</div><div>सोशल मीडिया को लोकतंत्र के बड़े मंच के रूप में 17 दिसंबर 2010 को ट्यूनिशिया के सिटी बौजिज शहर में फलों का ठेला लगाने वाले मोहम्मद बोआजीजी की आत्महत्या के बाद हुए उबाल के बाद देखा जाने लगा। म्यूनिसिपल कर्मचारियों की सख्ती के चलते क्षुब्ध बोआजीजी ने खुद पर पेट्रोल डालकर आग लगा ली। किसी ने इस घटना को सोशल मीडिया पर डाल दिया। सोशल मीडिया के तत्कालीन अलगोरिदम ने इस घटना को इस रूप में प्रस्तुत किया कि समूचे अरब जगत में उबाल आ गया। नागरिक अधिकारों की स्थापना और लोकतंत्र की बहाली की मांग को लेकर अरब देशों की जनता सड़कों पर उतर आई। इसका ही नतीजा मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर दिखा। जहां महीनों तक लोग जमे रहे और वहां के राष्ट्रपति को इस्तीफा देना पड़ा। यह आग सीरिया, यमन और लीबिया तक जा पहुंची। वहां के पारंपरिक शासकों के खिलाफ लोगों का दबा हुआ गुस्सा निकला और कई जगह सत्ताएं बदल गईं। भारत में भी इसके ही कुछ महीनों बाद अन्ना हजारे को आगे रखकर एक आंदोलन छेड़ा गया। जिसकी परिणति आम आदमी पार्टी के रूप में हुई और वह दिल्ली की सत्ता पर काबिज हुई। फिर पंजाब में भी उसने पैठ बना ली।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-changes-his-approach-following-the-neet-ug-controversy-advises" target="_blank">NEET-UG विवाद के बाद बदला PM Modi का अंदाज़, Gen Z को Influencers और 'Shortcuts' की होड़ से बचने की दी सलाह</a></h3><div>इन घटनाओं को याद करना इसलिए जरूरी है कि इन सबके पीछे सोशल मीडिया के जरिए त्वरित गति से फैलाई गई सूचनाओं का हाथ सबसे ज्यादा रहा। तब सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए जरूरी बताया गया। सोशल मीडिया के बारे में कहा गया कि लोकतंत्र में सबकी आवाज पहुंचाने और उन्हें मौका देने का यह बड़ा माध्यम है। इसे लोकतंत्र के वाजिब और जरूरी औजार के रूप में भी मान्यता मिली। लेकिन बीतते वक्त के साथ पता चल रहा है कि जिसे हम सोशल मीडिया कहते हैं, वह लोकतंत्र के लिए जितना जरूरी है, उससे कहीं ज्यादा अनसोशल यानी असामाजिक भी है। यह ठीक है कि सोशल मीडिया के जरिए व्यवस्था की अंधी सुरंग में खो रही आवाजों को मौका मिलता है। लेकिन यह उतना ही सच है कि इस माध्यम ने लोगों की नजर का पानी उतार दिया है। लोग अब लिहाज करना भूल गए हैं। सोशल मीडिया पर अगर किसी की बात पसंद नहीं आती तो उसे खुलेआम&nbsp; गालियां दी जा सकती हैं। उसके चरित्र पर आक्षेप लगाया जा सकता है। उसका चरित्र हनन किया जा सकता है। चाहे वह व्यक्ति सामाजिक जीवन में कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न हो, उसकी उम्र चाहे जितनी भी बड़ी क्यों ना हो।&nbsp;</div><div><br></div><div>सोशल मीडिया मंचों ने अपना अलगोरिदम भी ऐसा विकसित किया है, जो अच्छी बातों, सामाजिक चिंतन और बेहतर कल की बातों को ज्यादा तवज्जो नहीं देखा। एक तरह से कहें तो वह इसकी अनदेखी ही करता है। लेकिन जैसे ही किसी को कोई गाली देता है, किसी के चरित्र का बेवजह ही हनन करता है, किसी का घटिया कार्टून बनाता है, सोशल मीडिया का अलगोरिदम उसे फैलाने में द्रुत गति से जुट जाता है। सोशल मीडिया ने अब तक पर्दे के पीछे रही नंगई को भी उजागर कर दिया है। आज रील्स के चक्कर में अधनंगे और कई बार करीब-करीब नग्न फोटोग्राफ और वीडियो तक जारी किए जा रहे हैं। भले ही अपने परिवारों में महिलाएँ और युवतियां सलीके से रहती हों, लेकिन सोशल मीडिया पर प्रसिद्धि पाने और उसके जरिए कुछ कमाने के चक्कर में अपने शील और अपनी लज्जा को भी बेपर्दा कर रही हैं। सोशल मीडिया कितना असमाजिक हो चुका है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उसका अलगोरिदम अश्लीलता को बढ़ावा देता है, लेकिन शील और लज्जा की बात को अपने मंच के किसी कोने में डाल देता है। कह सकते हैं कि वर्चुअल स्पेस के किसी अंधेरे कोने में उसे गुम कर देता है।</div><div>तीन साल पहले प्यू रिसर्च सेंटर ने 19 विकसित अर्थव्यवस्थाओं वाले देशों में सोशल मीडिया को लेकर एक शोध किया था। उसके मुताबिक, आम नागरिकों की नजर में सोशल मीडिया राजनीतिक जीवन के लिए रचनात्मक और विनाशकारी दोनों है। इस अध्ययन में शामिल देशों में, औसतन 57 प्रतिशत लोगों ने माना कि सोशल मीडिया लोकतंत्र के लिए अच्छा है, लेकिन इसे बिनाशकारी मानने वालों की संख्या भी कम नहीं रही। करीब 35 प्रतिशत से ज्यादा लोगों का का कहना था कि सोशल मीडिया विनाशकारी साबित हो रहा है। सिर्फ 34 प्रतिशत अमेरिकियों ने ही सोशल मीडिया को लोकतंत्र के लिए लाभकारी माना, जबकि 64 फीसद का कहना था कि इसने नकारात्मक प्रभाव ज्यादा डाला है। हाल ही में जेन जी से चर्चा के दौरान संघ प्रमुख मोहन भागवत ने भी सोशल मीडिया को लेकर अपने विचार व्यक्त किए। उसमें उन्होंने कहा है कि यदि सोशल मीडिया पर उनके कारण दस लाख लोग कोई गलत निर्णय लेते हैं, तो उसकी जिम्मेदारी मेरी भी है। सोशल मीडिया पर सकारात्मक, उपयोगी और समाजहित की सामग्री साझा करनी चाहिए। सोशल मीडिया पर केवल प्रामाणिक स्रोतों से प्राप्त जानकारी पर ही विश्वास करना चाहिए। जेन-ज़ी में भी यह विवेक विकसित होना चाहिए कि क्या सही है और क्या नहीं। वरिष्ठ पीढ़ी की भी जिम्मेदारी है कि वह नई पीढ़ी का मार्गदर्शन करे तथा उन्हें सही और गलत के बीच अंतर समझाए।</div><div><br></div><div>सोशल मीडिया का अनसोशल चेहरा और मंच आर्थिक कमाई का जरिया भी है। नंगई, हिंसा और व्यभिचार-अतिचार की कहानियां, दृश्य, वीडियो और फोटो को वायरल करने में उसका कोई सानी नहीं है। इस बहाने इसे प्रसारित करने वाले को सोशल मीडिया मंच आर्थिक कमाई भी कराते हैं। और तो और, वे खुद भी ऐसी घटनाओं, दृश्यों को प्रसारित-प्रचारित और वायरल करने के लिए बड़ी रकम लेते हैं। संसदीय समिति के सामने फेसबुक और इंस्टाग्राम की संचालक कंपनी मेटा के अधिकारियों ने माना है कि काकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन के दौरान गाली, हिंसा आदि को बढ़ावा देने के लिए पैसे भी लिए थे। इन कोशिशों का मकसद भारत में व्यापक पैमाने पर लोगों को उत्तेजित करके अराजकता फैलाना था। इस लिहाज से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म राष्ट्रों के अंदरूनी मामलों में लोकतंत्र की रक्षा के मुखौटे के पीछे से दखल भी दे रहे हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती भी दे रहे हैं। वक्त आ गया है कि इनके नियमन के लिए कठोर कानून बनाए जाएं। जिसके तहत उन्हें अभिव्यक्ति के अधिकार को बढ़ावा देने की व्यवस्था तो हो, लेकिन इसकी आड़ में अराजकता फैलाने की छूट नहीं।</div><div><br></div><div>- उमेश चतुर्वेदी</div><div>वरिष्ठ पत्रकार</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 12 Aug 2026 15:30:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/regulation-of-social-media-which-is-becoming-antisocial-is-essential</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/12/social-media_large_1532_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[भागवत की नजरों में जेन-जी आंदोलन का दृष्टिकोण]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/the-perspective-of-the-gen-z-movement-in-bhagwat-view]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>जंतर-मंतर से उठी हाल की युवा आवाजों ने भारतीय लोकतंत्र के सामने कई नए प्रश्न खड़े किए हैं। आंदोलन को लेकर समाज में दो मत हो सकते हैं, आंदोलन की शैली, नेतृत्व और उसके राजनीतिक इस्तेमाल पर भी बहस हो सकती है, लेकिन एक बुनियादी सत्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि लोकतंत्र में प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने, असहमति व्यक्त करने और शांतिपूर्ण ढंग से विरोध करने का अधिकार है। इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत का युवाओं और विशेषकर जेन-जी को लेकर दिया गया दृष्टिकोण अत्यंत महत्वपूर्ण बन जाता है। उन्होंने साफ कहा कि नई पीढ़ी सवाल करती है, तर्कसंगत उत्तर चाहती है, उसे केवल आदेश देकर नहीं समझाया जा सकता। उनके अनुसार आज जरूरत ‘डिक्टेशन’ की नहीं, ‘डिस्कशन’ की और आदेश की नहीं, सहमति की है। भागवत ने हाल में इससे भी आगे बढ़कर कहा कि लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन संवाद का एक वैध माध्यम है और जेन-जी के आंदोलन में उठाई गई शिकायतें जायज हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि विरोध करने वालों को राष्ट्रविरोधी कह देना उचित नहीं है। उनका मानना है कि आंदोलन का उद्देश्य समाज में विभाजन पैदा करना नहीं, बल्कि सहमति और समाधान की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत और छात्रों की नाराजगी के बीच संबंध की ओर भी उन्होंने संकेत किया।&nbsp;</div><div><br></div><div>भागवत के इस दृष्टिकोण की सराहना इसलिए भी की जानी चाहिए कि यह केवल किसी एक आंदोलन या किसी एक सरकार का प्रश्न नहीं है। यह भारतीय लोकतंत्र की उस मूल आत्मा को स्पर्श करता है, जिसमें सत्ता जनता से शक्ति प्राप्त करती है और जनता की आवाज सुनना उसकी संवैधानिक तथा नैतिक जिम्मेदारी है। विरोध को हमेशा विद्रोह मान लेना लोकतंत्र की समझ को संकुचित करना है। असहमति को राष्ट्रविरोध समझना उससे भी बड़ी भूल है। राष्ट्र सरकार से बड़ा है और लोकतंत्र सत्ता से बड़ा। जो नागरिक देश के भविष्य को लेकर सवाल करता है, वह जरूरी नहीं कि देश का विरोध कर रहा हो, कई बार वह देश को बेहतर बनाने की बेचैनी व्यक्त कर रहा होता है। आजादी की वर्षगांठ के अवसर पर जब हम स्वतंत्र भारत की उपलब्धियों का उत्सव मनाते हैं, तब हमें यह भी पूछना चाहिए कि हमारी आजादी का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या आजादी केवल तिरंगा फहराने, राष्ट्रगान गाने और स्वतंत्रता सेनानियों को याद करने तक सीमित है? या इसका अर्थ यह भी है कि देश का युवा अपने भविष्य को लेकर सवाल कर सके, व्यवस्था की कमियों की ओर ध्यान आकर्षित कर सके और अपनी बात बिना भय के रख सके? यदि हम सचमुच विकसित भारत, समृद्ध भारत और शक्तिशाली भारत का सपना देखते हैं तो हमें भारत के युवाओं के सपनों को सुनना ही होगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/mohan-bhagwat-to-address-indian-community-in-new-york" target="_blank">Mohan Bhagwat New York में 29 अगस्त को भारतीय समुदाय को करेंगे संबोधित</a></h3><div>भारत के महान चिंतकों ने युवाशक्ति को राष्ट्रनिर्माण का आधार माना है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं को जागने, अपनी शक्ति पहचानने और लक्ष्य की ओर बढ़ने का आह्वान किया था। उनके चिंतन का मूल संदेश यही था कि युवा केवल राष्ट्र का भविष्य नहीं, वर्तमान की सक्रिय शक्ति भी हैं। महात्मा गांधी का विश्वास था कि परिवर्तन केवल सत्ता के गलियारों से नहीं आता, वह जागरूक नागरिकों की चेतना से आता है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने बार-बार युवाओं के सपनों को भारत के भविष्य से जोड़ा। उनके लिए सपना वह नहीं था जो सोते समय दिखाई देता है, बल्कि वह था जो व्यक्ति को सोने नहीं देता। आज के युवाओं की बेचैनी को इसी दृष्टि से समझने की आवश्यकता है। नई पीढ़ी और पिछली पीढ़ी के बीच अंतर स्वाभाविक है। पहले परिवार, विद्यालय और समाज में ‘क्यों’ पूछने की गुंजाइश कम थी, बड़े जो कहते थे, उसे मान लेना संस्कार समझा जाता था। आज का युवा प्रश्न करता है-क्यों, कैसे और किसलिए? वह केवल परंपरा के नाम पर किसी बात को स्वीकार नहीं करता। वह प्रमाण चाहता है, तर्क चाहता है और परिणाम देखना चाहता है। यह बदलाव चुनौती भी है और अवसर भी। यदि हम इस प्रश्नाकुलता को दबाएंगे तो कुंठा पैदा होगी, यदि इसे सही दिशा देंगे तो यही प्रश्न नवाचार, अनुसंधान और राष्ट्रनिर्माण की शक्ति बनेंगे।</div><div><br></div><div>विचारों के टकराव से घबराने की जरूरत नहीं है। भारतीय संस्कृति स्वयं ‘वादे वादे जायते तत्त्वबोधः’ की संवाद परंपरा से विकसित हुई है। उपनिषदों में प्रश्न हैं, उत्तर हैं, पुनः प्रश्न हैं। भगवान महावीर की अनेकांत दृष्टि हमें सिखाती है कि सत्य को एकांगी दृष्टि से नहीं देखा जा सकता। एक ही विषय के अनेक पक्ष हो सकते हैं। इसलिए बहस लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी बौद्धिक ताकत है। समस्या बहस में नहीं, बहस के हिंसक हो जाने में है, समस्या असहमति में नहीं, असहमति के नाम पर अराजकता में है। इसीलिए भागवत की बात का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है-विरोध संविधान की मर्यादा में हो, शांतिपूर्ण हो और उसका लक्ष्य व्यक्ति को अपमानित करना नहीं, व्यवस्था में सकारात्मक परिवर्तन लाना हो। आंदोलन लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन लोकतांत्रिक अनुशासन के साथ। सरकार की आलोचना लोकतंत्र है, हिंसा लोकतंत्र नहीं। प्रश्न करना स्वतंत्रता है, सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाना स्वतंत्रता नहीं। इसलिए सरकार और आंदोलनकारी-दोनों की जिम्मेदारियां हैं। लेकिन सरकार की जिम्मेदारी अधिक बड़ी है, क्योंकि उसके पास सत्ता, प्रशासन और संस्थागत शक्ति होती है। किसी छात्र की आवाज को लाठी से दबाया जा सकता है, लेकिन उसकी आशंका को लाठी से समाप्त नहीं किया जा सकता। किसी आंदोलनकारी को राष्ट्रविरोधी कह देने से उसका प्रश्न समाप्त नहीं हो जाता। यदि उसकी मांग गलत है तो तथ्य और तर्क से उसे गलत सिद्ध किया जाए। यदि मांग सही है तो उसे स्वीकार करने में संकोच क्यों? लोकतंत्र में सरकार का सबसे प्रभावी हथियार पुलिस नहीं, संवाद है।</div><div><br></div><div>यहां मोहन भागवत की भूमिका एक मार्गदर्शक की तरह दिखाई देती है। उन्होंने अनेक अवसरों पर केवल प्रशंसा करने के बजाय व्यापक सामाजिक हित के प्रश्न उठाए हैं। जब सत्ता या व्यवस्था किसी दिशा में आवश्यकता से अधिक आगे बढ़ती दिखाई देती है, तब एक जिम्मेदार मार्गदर्शक का दायित्व होता है कि वह उसे आत्ममंथन की ओर ले जाए। भागवत की यह भूमिका हमें महाभारत के भीष्म पितामह की याद दिलाती है-ऐसे व्यक्ति की, जो सत्ता के केंद्र में रहते हुए भी समय-समय पर धर्म, मर्यादा और व्यापक हित की याद दिलाता है। यह तुलना व्यक्ति-पूजा के लिए नहीं, बल्कि मार्गदर्शक की भूमिका की व्याख्या के लिए है। सरकारें जब जनता की आवाज समय पर सुनती हैं तो आंदोलन समस्या बनने से पहले समाधान बन सकता है। लेकिन जब शिकायतें महीनों और वर्षों तक फाइलों में पड़ी रहती हैं, जब संवाद के रास्ते बंद होते जाते हैं और जब नागरिक को लगता है कि उसकी सुनवाई नहीं होगी, तब असंतोष सड़क पर आता है। फिर वही आंदोलन राजनीतिक दलों, अवसरवादी तत्वों और निहित स्वार्थों के लिए मैदान बन जाता है। परिणामतः मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और आंदोलन का चरित्र बदलने लगता है। यही वह स्थिति है जिससे लोकतंत्र को बचाना है।</div><div><br></div><div>नीट और परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवादों ने भी यही संदेश दिया है कि युवाओं के भविष्य से जुड़े मामलों में सरकार और संस्थाओं को असाधारण संवेदनशीलता दिखानी होगी। परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होती, वह लाखों परिवारों के वर्षों के परिश्रम, सपनों और आर्थिक-सामाजिक आकांक्षाओं से जुड़ी होती है। यदि किसी विद्यार्थी को लगता है कि उसकी मेहनत निष्पक्ष व्यवस्था में नहीं आंकी गई, तो उसका आक्रोश स्वाभाविक है। हाल के छात्र आंदोलनों ने शिक्षा व्यवस्था में सुधार की जरूरत को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है। इस संदर्भ में पुलिस की भूमिका भी पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है। हर प्रदर्शनकारी अपराधी नहीं होता और हर नारा राष्ट्रविरोधी नहीं होता। पुलिस को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा का प्रशिक्षण भी मिलना चाहिए। राष्ट्रविरोधी गतिविधि और जायज नागरिक असहमति के बीच अंतर करना लोकतांत्रिक पुलिस व्यवस्था की पहली कसौटी है। इसलिए मोहन भागवत की बात को केवल जेन-जी आंदोलन के संदर्भ में देखने की बजाय उसे भारत की लोकतांत्रिक यात्रा के व्यापक संदेश के रूप में देखा जाना चाहिए। सरकारें आएंगी-जाएंगी, राजनीतिक दल बदलेंगे, आंदोलनों के स्वरूप बदलेंगे, लेकिन लोकतंत्र की बुनियादी आवश्यकता नहीं बदलेगी, जनता को सुनना होगा।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकारा</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 16:55:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/the-perspective-of-the-gen-z-movement-in-bhagwat-view</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/11/mohan-bhagwat_large_1656_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अफसरों जिम्मेदार ठहराने से होगा समस्याओं का समाधान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/holding-officers-accountable-will-lead-to-the-resolution-of-problems]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश की सरकारों के पास हर समस्या का एक लाइलाज रामबाण इलाज यह है कि किसी समस्या की गहराई के उपचार के बजाए कानून बना दिया जाए। सरकारें हर समस्या का इलाज व्यवहारिक धरातल पर नहीं बल्कि कानून में ढूंढने की आदी हो चुकी हैं। देश में हर क्षेत्र में एक के बाद एक नए कानून बनाए जा रहे हैं, किन्तु समस्याएं थमने का नाम नहीं ले रही हैं। जितने भी नए कानून बनाए जा रहे हैं, या पुराने कानूनों मे संशोधन किया जा रहा, उसका सारा भार देश के आम लोगों पर ही डाला जा रहा है। इन काूननों में कहीं लापरवाही बरतने या अनदेखी के लिए देश के आला अफसर जिम्मेदार नहीं हैं। आजादी से लेकर आज तक ऐसा कोई कानून केंद्र या किसी राज्य ने नहीं बनाया है कि यदि कोई घटना—दुर्घटना या कांड होगा तो उसके लिए सीधे अफसर भी जिम्मेदार माने जाएंगे।&nbsp;</div><div><br></div><div>संशोधित केंद्रीय पेपर लीक कानून में अनुचित साधनों का इस्तेमाल करने पर कम से कम 5 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष तक की सजा होगी। अधिकतम जुर्माना 10 लाख रुपये से बढ़ाकर 50 लाख रुपये कर दिया गया है। संगठित अपराधों में 7 से 10 वर्ष तक की सजा और 10 करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान किया गया है। पेपर लीक का नया केंद्रीय कानून बनाने के बावजूद झारखंड लोक सेवा आयोग (जेपीएससी) परीक्षा में पेपर लीक और अनियमितताएं हुईं। इस मामले में अब तक 11 लोगों की गिरफ्तारी हो चुकी है और जेपीएससी के चेयरमैन एल. खियांगटे ने इस्तीफा भी दे दिया। केंद्र सरकार के बनाए पेपर लीक परीक्षा कानून देश में एक अगस्त से अस्तित्व मे आ चुका है। इसके बावजूद देश में भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक मामले थम नहीं रहे हैं।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/jharkhand-student-protest-jssc-cgl-hemant-soren-opposition-silence" target="_blank">जंतर-मंतर पर Students के लिए आवाज, झारखंड में छात्रों पर हुए लाठीचार्ज पर चुप्पी, वाह क्या दोगलापन है!</a></h3><div>राजस्थान में अप्रैल 2022 में एंटी पेपर लीक एक्ट लागू किया गया। गुजरात में मार्च 2023 से सख्त नकल और पेपर लीक विरोधी कानून लागू। उत्तराखंड में वर्ष 2023 में प्रतियोगी परीक्षा अध्यादेश/कानून लागू किया गया। झारखंड में वर्ष 2023 में अनुचित साधनों की रोकथाम के लिए अधिनियम बनाया गया। हरियाणा में सितंबर 2021 से प्रभावी कानून लागू है। इसी तरह असम, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, अरुणाचल प्रदेश, ओडिशा और आंध्र प्रदेश आदि राज्यों में भी अलग-अलग वर्षों में इससे जुड़े कड़े कानूनी प्रावधान या अधिनियम बनाए जा चुके हैं। केंद्र और इतने राज्यों में पेपर लीक कानून के बाद भी पेपर लीक की घटनाएं थम नहीं रही है।&nbsp;</div><div><br></div><div>पेपर लीक की तरह देश में बलात्कार के मामलों में बेहद कठोर कानून बनाए गए थे। बलात्कार और इसके साथ हत्या के मामलों में फांसी तक का प्रावधान किया गया है। 2012 में दिल्ली में एक छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार और हत्या के दोषी चार भारतीय पुरुषों को फांसी दे दी गई थी। निर्भया बलात्कार हत्याकांड से लोगों में आक्रोश फैल गया था और भारत में बलात्कार विरोधी नए कानून बनाए गए। आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम, 2018 के तहत 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के बलात्कार में मृत्युदंड का प्रावधान किया गया। गैंग रेप में न्यूनतम सजा 20 साल से आजीवन की गई।&nbsp;</div><div><br></div><div>इतने कठोर कानून के लागू होने के बावजूद देश में बलात्कार—हत्या के मामले बढ़ते चले गए। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो&nbsp; (एनसीआरबी) की रिपोर्ट के मुताबिक देश के राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में साल 2023 में 31,982 महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले दर्ज हुए। इससे जाहिर है कि नए कठोर कानूनों का अपराधियों को कोई भय नहीं है। ये कानून महज कागज का पुलिन्दा साबित हो रहे हैं। यही भ्रष्टाचार का भी हाल है। देश में भ्रष्टाचार रोकने के लिए कठोर कानून बने हुए हैं, इसके बावजूद देश से भ्रष्टाचार खत्म होना तो दूर बल्कि कम तक नहीं हो सका। आए दिन कहीं न कहीं भ्रष्टाचार की खबरें आती रहती हैं। भ्रष्टाचार खत्म नहीं करने के लिए कभी किसी अफसर को जिम्मेदार नहीं माना गया। बेशक उनके विभाग का ही कोई भ्रष्टाचारी क्यों न पकड़ा जाए।</div><div><br></div><div>आज तक जितने भी कानून बनाए गए हैं, उसमें अफसरों की जिम्मेदारी कहीं भी तय नहीं की गई। मसलन सड़क पर गडढा होने से यदि कोई सड़क दुर्घटना होती है या फिर बगैर अग्नि सुरक्षा उपायों के संचालित किसी व्यवसायिक भवन में अग्नि दुर्घटना होती है तो इसके निगरानी करने वाले अफसर जिम्मेदार ठहराए जाएंगे, ऐसा कोई कानून नहीं बना है। यही प्रमुख वजह है कि चाहे पेपर लीक हों या किसी तरह का बड़ा हादसा, कानूनों को सख्त कर दिया जाता है, किन्तु जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय नहीं की जाती।&nbsp;</div><div><br></div><div>इसका बड़ा उदाहरण मेलों, धार्मिक स्थलों पर होने वाले आयोजनों में भगदड़ के दौरान होने वाली मौतें हैं। ऐसा शायद ही कोई साल जाता होगा, जब ऐसे हादसे नहीं होते होंगे। ऐसे हादसों में अब तक देश भर में हजारों लोगों की मौत हो चुकी है। इसके बावजूद अफसरों की ज्मिमेदारी तय नहीं की गई। ऐसा कोई कानून नहीं बनाया गया कि ऐसे आयोजनों में हादसों के लिए सीधे अफसर जिम्मेदार ठहराएं जाएंगे, उनके खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलेगा और उन्हे जेल की सजा भुगतनी पड़ेगी।</div><div><br></div><div>अफसरों की लापरवाही से हुए हादसों और इससे बच निकलने का बड़ा उदाहरण राजस्थान का है। जहां दो साल पहले स्कूल की छत्त गिरने से 10 से ज्यादा बच्चों की मौत हो गई, इसके बाद भी स्कूल की छत्त गिरने या दीवार गिरने के हादसे होते रहे, किन्तु एक भी अफसर को आपराधिक आरोपी नहीं माना गया। किसी पर एफआईआर दर्ज नहीं हुई। पुलिस ने आईएएस अफसर तो दूर बल्कि शिक्षा विभाग के किसी अफसर के खिलाफ एफआईआर दर्ज नहीं की। राजस्थान सहित देश के लाखों सरकारी स्कूलों की इमारतों की हालत खस्ता है। सरकारों के पास इतना बजट ही नहीं है कि इतना रखरखाव किया जा सके।&nbsp;</div><div><br></div><div>यह निश्चित है कि चुनी हुई सरकारें लंबे अर्से तक देश के लोगों की आंखों में धूल नहीं झौंक सकती, उन्हें कानून बनाने के साथ ही धरातल पर समस्याओं का समाधान ढूंढना होगा। देश में बुनियादी सुविधाओं की पहुंच आम नागरिकों तक बढ़ानी होगी। इसकी कमी से हर साल बिजली, पानी, सड़क, स्कूल, अस्पताल के अभाव जैसे मुद्दों पर धरने, प्रदर्शन, आंदोलन होते हैं, किन्तु इनका स्थायी समाधान नहीं होता। सरकारों की हालत 'खेत खाए गदहा और मार खाए जुलहा' जैसी है। जब तक सरकारें और जिम्मेदार अफसर अपनी जिम्मेदारी से भागते रहेंगे। ऐसी समस्याओं का समाधान नहीं होगा, बेशक कितने भी नए कानून बन जाएं।</div><div><br></div><div>- योगेन्द्र योगी</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 15:59:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/holding-officers-accountable-will-lead-to-the-resolution-of-problems</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/10/jharkhand-student-protest_large_1600_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[गजब है Russia से India तक Train चलाने का प्रस्ताव, रूट मैप देखकर Modi-Putin की रणनीति के कायल हो जाएंगे]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/russia-india-direct-rail-link-indian-ocean-hormuz-bosphorus-instc]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पश्चिम एशिया में जारी अस्थिरता और समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते जोखिम के बीच रूस ने भारत के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी को एक नई दिशा देने वाला बड़ा प्रस्ताव सामने रखा है। रूस के उप प्रधानमंत्री मरात खुसनुलिन ने मॉस्को से हिंद महासागर तक सीधे रेल संपर्क की संभावनाएं तलाशने की बात कही है। उन्होंने कहा है कि बोस्फोरस और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे रणनीतिक समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिमों को देखते हुए रूस और भारत के बीच वैकल्पिक जमीनी संपर्क विकसित करना जरूरी हो गया है। रूसी समाचार एजेंसी TASS के हवाले से खुसनुलिन ने कहा कि तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान के रास्ते भारत तक पहुंचने वाले विकल्पों पर विचार किया जा सकता है और भारत तक पहुंच उपलब्ध कराने वाला कोई भी विकल्प स्वीकार्य होगा।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो यह प्रस्ताव केवल रेलवे लाइन बिछाने की सामान्य योजना नहीं है। इसके पीछे बदलती वैश्विक भू-राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार मार्गों की विश्वसनीयता और रूस-भारत के बीच लंबे समय से चली आ रही रणनीतिक दोस्ती का बड़ा आयाम छिपा है। खास तौर पर ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया के संघर्ष ने दुनिया को यह दिखा दिया है कि किसी एक समुद्री चोकपॉइंट पर अत्यधिक निर्भरता वैश्विक व्यापार के लिए कितनी बड़ी कमजोरी बन सकती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/business/trump-kept-pushing-bill-imposing-100-tariffs-what-india-preparing-import-next-from-russia" target="_blank">मोदी हैं कि मानते नहीं...ट्रंप 100% टैरिफ वाला बिल लाते रह गए, इधर जिगरी रूस से तेल के बाद अब क्या लाने की तैयारी में भारत?</a></h3><h2>होर्मुज संकट ने बढ़ाई वैकल्पिक रास्ते की जरूरत</h2><div><br></div><div>रूस के इस प्रस्ताव को समझने के लिए मौजूदा भू-राजनीतिक परिस्थितियों को देखना जरूरी है। 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ईरान के खिलाफ सैन्य कार्रवाई के बाद पश्चिम एशिया में तनाव तेजी से बढ़ा। ईरान की जवाबी मिसाइल और ड्रोन कार्रवाइयों के बाद फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री यातायात पर गंभीर असर पड़ा। रिपोर्टों के मुताबिक होर्मुज से होकर गुजरने वाला वैश्विक तेल व्यापार का करीब पांचवां हिस्सा प्रभावित हुआ।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि होर्मुज जलडमरूमध्य फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है और यह दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। इसी तरह तुर्किये के नियंत्रण वाला बोस्फोरस जलडमरूमध्य काला सागर को मरमारा सागर से जोड़ता है। ऐसे समुद्री ‘चोकपॉइंट’ किसी भी संकट की स्थिति में अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए गंभीर जोखिम पैदा कर सकते हैं। यही वजह है कि मॉस्को अब समुद्री मार्गों के साथ-साथ वैकल्पिक स्थलीय व्यापार नेटवर्क विकसित करने पर जोर दे रहा है।</div><div><br></div><h2>भारत इस योजना के केंद्र में क्यों?</h2><div><br></div><div>इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि रूस ने संभावित रेल मार्ग के अंतिम गंतव्य के रूप में भारत को विशेष महत्व दिया है। यह संयोग नहीं है। भारत और रूस पहले से ही International North-South Transport Corridor (INSTC) के प्रमुख साझेदार हैं। लगभग 7200 किलोमीटर लंबा यह बहु-माध्यमीय कॉरिडोर रूस को ईरान और भारत से जोड़ने की महत्वाकांक्षी परियोजना है। इसमें रेल, सड़क और समुद्री परिवहन का संयोजन शामिल है।</div><div><br></div><div>मौजूदा व्यवस्था में रूस से आने वाला माल कजाखस्तान और तुर्कमेनिस्तान होते हुए ईरान पहुंच सकता है। वहां से रेल नेटवर्क के जरिए बंदर अब्बास जैसे बंदरगाहों तक और फिर समुद्री रास्ते से भारत भेजा जा सकता है। पूर्वी शाखा में कजाखस्तान-तुर्कमेनिस्तान-ईरान मार्ग की भूमिका महत्वपूर्ण है।</div><div><br></div><div>इस लिहाज से रूसी उप प्रधानमंत्री खुसनुलिन का प्रस्ताव बिल्कुल शून्य से शुरू होने वाली परियोजना नहीं, बल्कि मौजूदा कनेक्टिविटी ढांचे को और आगे बढ़ाने की सोच है। लक्ष्य यह हो सकता है कि आने वाले समय में रूस और भारत के बीच माल ढुलाई को ज्यादा तेज, भरोसेमंद और बहुविकल्पीय बनाया जाए।</div><div><br></div><h2>अभी ‘मॉस्को से भारत’ सीधी ट्रेन नहीं</h2><div><br></div><div>हालांकि इस खबर ने यात्रियों और रेलवे प्रेमियों की कल्पना को जरूर हवा दी है, लेकिन फिलहाल इसे मॉस्को से दिल्ली या मुंबई तक चलने वाली सीधी यात्री ट्रेन समझना जल्दबाजी होगी। अभी तक रूस या भारत की ओर से इस तरह की यात्री सेवा या पर्यटन केंद्रित ट्रेन की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। रूसी उप प्रधानमंत्री के प्रस्ताव का मूल उद्देश्य फ्रेट, लॉजिस्टिक्स और रणनीतिक कनेक्टिविटी है।</div><div><br></div><div>वैसे भी यात्री सेवा शुरू करने में कई व्यावहारिक अड़चनें होंगी जैसे कई देशों के वीजा, अलग-अलग रेल गेज, सीमा और सुरक्षा जांच, विभिन्न देशों के रेलवे के बीच समय-सारिणी का तालमेल तथा यात्री सुविधाओं का अभाव। लेकिन भविष्य की संभावना को पूरी तरह खारिज भी नहीं किया जा सकता। यदि कॉरिडोर स्थिर, सुरक्षित और आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनता है तो बाद में यात्री रेल सेवा की संभावना तलाशना संभव होगा। ऐसी ट्रेन यूरेशिया के विशाल भूभाग, मध्य एशिया और ऐतिहासिक सिल्क रूट के शहरों को जोड़ने वाली असाधारण यात्रा बन सकती है।</div><div><br></div><h2>भारत के लिए बड़ा रणनीतिक लाभ</h2><div><br></div><div>वैसे रूस के इस प्रस्ताव का सबसे बड़ा फायदा भारत को कनेक्टिविटी की रणनीतिक विविधता के रूप में मिल सकता है। भारत की विदेश और आर्थिक नीति लंबे समय से यह सुनिश्चित करने की कोशिश कर रही है कि उसकी व्यापारिक आपूर्ति किसी एक मार्ग या एक देश पर निर्भर न रहे। इसलिए रूस से भारत तक मजबूत स्थलीय नेटवर्क बनने पर भारतीय कारोबारियों को रूसी बाजार तक पहुंच का एक वैकल्पिक रास्ता मिलेगा। इससे मशीनरी, ऊर्जा संसाधन, उर्वरक, धातु, कृषि उत्पाद और अन्य वस्तुओं की आवाजाही अधिक लचीली हो सकती है।</div><div><br></div><div>दूसरा बड़ा लाभ समय और लागत का हो सकता है। INSTC का मूल उद्देश्य भी पारंपरिक समुद्री मार्गों की तुलना में माल परिवहन को तेज और अधिक प्रतिस्पर्धी बनाना है। पूर्ण रूप से विकसित नेटवर्क भारत-रूस व्यापार को नई गति दे सकता है।</div><div><br></div><div>एक और सबसे महत्वपूर्ण लाभ ऊर्जा सुरक्षा है। होर्मुज जैसी किसी एक संवेदनशील समुद्री पट्टी पर निर्भरता कम होने से भारत वैश्विक संकटों के दौरान अपनी आपूर्ति श्रृंखला को ज्यादा प्रभावी ढंग से संभाल सकता है।</div><div><br></div><h2>पाकिस्तान वाला रास्ता सबसे कठिन कड़ी</h2><div><br></div><div>हालांकि प्रस्तावित मार्ग में पाकिस्तान का नाम आना इसे रणनीतिक रूप से बेहद दिलचस्प और चुनौतीपूर्ण बनाता है। रूस ने संभावित विकल्पों में तुर्कमेनिस्तान, ईरान, अफगानिस्तान और पाकिस्तान का उल्लेख किया है। लेकिन भारत-पाकिस्तान संबंधों की मौजूदा जटिलताओं को देखते हुए इस रास्ते को तत्काल व्यवहार्य मानना कठिन होगा। यही कारण है कि भारत के लिए ईरान और मध्य एशिया के रास्ते विकसित होने वाले वैकल्पिक नेटवर्क अधिक व्यावहारिक महत्व रखते हैं।</div><div><br></div><h2>चीन के लिए भी बदलता समीकरण</h2><div><br></div><div>इस परियोजना का एक व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव चीन पर भी पड़ सकता है। चीन ने वर्षों से Belt and Road Initiative के जरिए यूरेशिया में अपनी परिवहन और आर्थिक पहुंच बढ़ाई है। इसके मुकाबले भारत-रूस समर्थित INSTC और उससे जुड़े नए रेल नेटवर्क यूरेशिया में एक वैकल्पिक आर्थिक गलियारा मजबूत कर सकते हैं। भारत को इससे यह अवसर मिलेगा कि वह चीन केंद्रित कनेक्टिविटी मॉडल के समानांतर अपना प्रभाव क्षेत्र विकसित करे। मध्य एशिया, ईरान और रूस के साथ भारत के आर्थिक संबंधों को भी इससे मजबूती मिल सकती है।</div><div><br></div><h2>रूस-भारत की दोस्ती का नया आर्थिक अध्याय</h2><div><br></div><div>सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह प्रस्ताव भारत और रूस के रिश्तों को केवल रक्षा और ऊर्जा सहयोग तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उन्हें कनेक्टिविटी और व्यापार की नई धुरी पर ले जाता है। रूस के लिए भारत हिंद महासागर तक पहुंच का महत्वपूर्ण द्वार है, जबकि भारत के लिए रूस यूरेशिया के विशाल बाजार तक पहुंच का प्रमुख साझेदार है। इसलिए दोनों देशों के हित इस परियोजना में स्वाभाविक रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो बदलती दुनिया में समुद्री रास्तों पर जोखिम बढ़ रहे हैं और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं लगातार नए झटकों का सामना कर रही हैं। ऐसे में रूस का मॉस्को से हिंद महासागर तक रेल संपर्क का विचार भले ही अभी शुरुआती चरण में हो, लेकिन इसकी रणनीतिक दिशा बेहद स्पष्ट है। यानि व्यापार के लिए सिर्फ एक रास्ते पर निर्भर मत रहिए, विकल्पों का ऐसा नेटवर्क तैयार कीजिए जिसे संकट भी आसानी से बाधित न कर सके।</div><div><br></div><div>बहरहाल, भारत के लिए यह सिर्फ रूस तक पहुंचने वाली रेल लाइन नहीं होगी। यह यूरेशिया से हिंद महासागर तक भारत की रणनीतिक पहुंच, ऊर्जा सुरक्षा, व्यापारिक स्वायत्तता और वैश्विक कनेक्टिविटी को मजबूत करने वाला संभावित नया गलियारा बन सकती है। और अगर भारत-रूस की पुरानी मित्रता इस परियोजना को राजनीतिक इच्छाशक्ति और आर्थिक निवेश का आधार देती है, तो आने वाले वर्षों में यह कॉरिडोर एशिया की बदलती भू-आर्थिक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 10 Aug 2026 14:20:38 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/russia-india-direct-rail-link-indian-ocean-hormuz-bosphorus-instc</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/10/russia-india-direct-rail-link_large_1422_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[ढाका की राजनीति और भारत-बांग्लादेश संबंधों की नई परीक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/dhaka-politics-and-a-new-test-for-india-bangladesh-relations]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना द्वारा दिसंबर 2026 में स्वदेश लौटने की घोषणा केवल एक राजनीतिक बयान नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीति, लोकतांत्रिक मूल्यों और भारत-बांग्लादेश संबंधों की दिशा तय करने वाला एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम बन गया है। जिस समय बांग्लादेश की राजनीति सत्ता परिवर्तन, वैचारिक धु्रवीकरण और संस्थागत अस्थिरता के दौर से गुजर रही है, उसी समय शेख हसीना ने यह घोषणा कर राजनीतिक विमर्श को एक नए मोड़ पर ला खड़ा किया है। उनका यह कहना कि ‘गिरफ्तारी, जेल या मृत्यु का भय भी उन्हें अपने देश लौटने से नहीं रोक सकता’, उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक आह्वान है तो विरोधियों के लिए एक बड़ी राजनीतिक चुनौती। बांग्लादेश में पिछले वर्ष सत्ता परिवर्तन के बाद जो राजनीतिक वातावरण बना, उसमें लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता और राजनीतिक सहिष्णुता पर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। बांग्लादेश में अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा शेख हसीना के विरुद्ध सुनाया गया फैसला और उसके बाद उनके समर्थकों पर बढ़ती कार्रवाइयों ने यह संकेत दिया कि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा धीरे-धीरे प्रतिशोध की राजनीति में बदलती जा रही है। हाल ही में उनकी प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल रहे पूर्व क्रिकेट कप्तान साकिब अल हसन के घर पर हुआ हमला भी इस बात का संकेत है कि राजनीतिक असहमति अब सामाजिक तनाव का रूप लेने लगी है। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री तारिक रहमान के एक करीबी सहयोगी द्वारा शेख हसीना को ‘तुरंत लौटकर सामना करने’ की चुनौती देना बताता है कि बांग्लादेश का राजनीतिक वातावरण अभी भी सामान्य नहीं हुआ है।</div><div><br></div><div>लोकतंत्र में किसी भी राजनीतिक दल या नेता से असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति का समाधान न्यायपूर्ण राजनीतिक प्रक्रिया और स्वतंत्र संस्थाओं के माध्यम से होना चाहिए। यदि किसी नेता की लोकप्रियता का उत्तर प्रतिबंध, दमन या भय के वातावरण से दिया जाए, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होती है। शेख हसीना की वापसी को केवल एक व्यक्ति की वापसी के रूप में नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए। यदि अवामी लीग को राजनीतिक प्रक्रिया से बाहर रखने की कोशिश होती है, तो यह बांग्लादेश के लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगाएगा। वास्तविकता यह भी है कि बांग्लादेश की राजनीति आज केवल अवामी लीग और बांग्लादेश नेशनललिस्ट पार्टी (बीएनपी) के बीच सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रह गई है। अब यह संघर्ष राष्ट्र की ऐतिहासिक पहचान, 1971 के मुक्ति संग्राम की विरासत और भविष्य की वैचारिक दिशा का भी बन चुका है। अवामी लीग स्वयं को मुक्ति संग्राम की मूल चेतना का प्रतिनिधि बताती है, जबकि बीएनपी भी अब उसी विरासत पर अपना दावा प्रस्तुत कर रही है। इतिहास की इस प्रतिस्पर्धी व्याख्या ने राजनीतिक धु्रवीकरण को और गहरा किया है। ऐसी परिस्थितियों में शेख हसीना की वापसी केवल राजनीतिक समीकरण नहीं बदलेगी, बल्कि राष्ट्रीय विमर्श की दिशा भी प्रभावित करेगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/sheikh-hasina-return-bangladesh-democracy-shakib-al-hasan-house-attack" target="_blank">Prabhasakshi NewsRoom: Sheikh Hasina के भाषण के बाद बड़ा बवाल, Shakib Al Hasan के घर पर हमला, Sajeeb Wazed Joy बोले- Bangladesh बन रहा दूसरा Pakistan</a></h3><div>इन परिस्थितियों में भारत की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। भारत और बांग्लादेश के संबंध केवल दो पड़ोसी देशों के रिश्ते नहीं हैं, बल्कि साझा इतिहास, संस्कृति, भाषा, आर्थिक सहयोग और सामरिक हितों पर आधारित हैं। पिछले डेढ़ दशक में दोनों देशों के संबंधों में अभूतपूर्व निकटता आई, जिसका एक बड़ा आधार शेख हसीना सरकार और नई दिल्ली के बीच बना विश्वास था। सीमा विवादों का समाधान, ऊर्जा सहयोग, संपर्क परियोजनाएं, आतंकवाद के विरुद्ध साझा कार्रवाई तथा पूर्वोत्तर भारत की कनेक्टिविटी जैसे अनेक क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति हुई। लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन ने इस विश्वास की नई परीक्षा शुरू कर दी है। नई दिल्ली ने एक ओर शेख हसीना को सुरक्षा और आश्रय दिया है, वहीं दूसरी ओर उसने ढाका की नई सरकार से संवाद भी जारी रखा है। यही परिपक्व कूटनीति का परिचायक है। भारत के सामने चुनौती किसी एक राजनीतिक दल के साथ खड़ा दिखाई देने की नहीं, बल्कि पूरे बांग्लादेश के साथ स्थायी और संतुलित संबंध बनाए रखने की है। इसी संदर्भ में नई दिल्ली में आयोजित होने वाला बारहवाँ ब्रिक्स शिखर सम्मेलन अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर बन सकता है। यदि बांग्लादेश के प्रधानमंत्री तारिक रहमान इसमें भाग लेते हैं और भारत के शीर्ष नेतृत्व के साथ सकारात्मक संवाद होता है, तो दोनों देशों के बीच हाल के तनावों को कम करने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। यह केवल औपचारिक शिखर बैठक नहीं होगी, बल्कि दोनों देशों के बीच विश्वास बहाली का अवसर भी होगी। भारत को इस मंच का उपयोग केवल आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता, लोकतांत्रिक मूल्यों और सुरक्षा सहयोग पर भी स्पष्ट संवाद स्थापित करना चाहिए।</div><div><br></div><div>भारत के सामने अनेक जटिल प्रश्न भी हैं। गंगा जल संधि के नवीनीकरण, तीस्ता जल बंटवारे, सीमा-पार व्यापार, अवैध घुसपैठ, सीमा सुरक्षा तथा शेख हसीना के प्रत्यर्पण जैसे मुद्दे आने वाले समय में द्विपक्षीय संबंधों की दिशा तय करेंगे। इनमें किसी भी विषय पर भावनात्मक या राजनीतिक प्रतिक्रिया के बजाय कानूनी, कूटनीतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक होगा। विशेष रूप से प्रत्यर्पण का प्रश्न केवल कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और राजनीतिक परिस्थितियों से भी जुड़ा हुआ है। भारत को अपनी संधियों, न्यायिक प्रक्रियाओं और रणनीतिक हितों के बीच संतुलन बनाकर आगे बढ़ना होगा। दूसरी ओर बांग्लादेश में चीन का बढ़ता प्रभाव भी नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय है। वर्तमान सरकार के शुरुआती महीनों में चीन के साथ बढ़ते संपर्क और सामरिक महत्व की परियोजनाओं पर समझौते इस बात का संकेत हैं कि ढाका अपनी विदेश नीति में संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है। भारत के लिए आवश्यक है कि वह प्रतिस्पर्धा की मानसिकता के बजाय विश्वास और विकास की साझेदारी को प्राथमिकता दे। यदि भारत आर्थिक सहयोग, निवेश, आधारभूत संरचना, शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी साझेदारी के नए अवसर विकसित करता है, तो दोनों देशों के संबंध और अधिक मजबूत हो सकते हैं।</div><div><br></div><div>शेख हसीना की वापसी का प्रश्न अंततः बांग्लादेश के लोकतांत्रिक चरित्र की परीक्षा है। यदि उन्हें निष्पक्ष राजनीतिक अवसर मिलता है, तो जनता स्वयं तय करेगी कि भविष्य का नेतृत्व किसे सौंपना है। लेकिन यदि राजनीतिक प्रतिशोध, दमन और हिंसा का वातावरण बना रहता है, तो इससे न केवल बांग्लादेश की लोकतांत्रिक साख प्रभावित होगी, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया की स्थिरता पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। भारत को इस पूरे घटनाक्रम में संयम, संतुलन और दूरदृष्टि के साथ आगे बढ़ना होगा। न तो उसे किसी आंतरिक राजनीतिक विवाद का पक्षकार बनना चाहिए और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों की उपेक्षा करनी चाहिए। भारत की विदेश नीति का मूल उद्देश्य एक स्थिर, शांतिपूर्ण, लोकतांत्रिक और समृद्ध पड़ोस होना चाहिए। यही उसकी सुरक्षा, आर्थिक प्रगति और क्षेत्रीय नेतृत्व के लिए सबसे अनुकूल स्थिति होगी।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता किसी राजनीतिक विजय की नहीं, बल्कि राजनीतिक परिपक्वता की है। बांग्लादेश को यह सिद्ध करना होगा कि लोकतंत्र केवल चुनाव का नाम नहीं, बल्कि विपक्ष के सम्मान, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और राजनीतिक सहिष्णुता का भी नाम है। वहीं भारत को यह दिखाना होगा कि वह पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को व्यक्तियों के बजाय संस्थागत विश्वास, पारस्परिक सम्मान और साझा हितों के आधार पर आगे बढ़ाने में सक्षम है। दिसंबर 2026 में यदि शेख हसीना वास्तव में बांग्लादेश लौटती हैं, तो वह केवल एक नेता की वापसी नहीं होगी, वह बांग्लादेश के लोकतंत्र, भारत की कूटनीतिक परिपक्वता और दक्षिण एशिया की राजनीतिक स्थिरता की एक साथ परीक्षा होगी। यदि इस चुनौती को संवाद, लोकतांत्रिक मर्यादा और विवेकपूर्ण कूटनीति के साथ संभाला गया, तो यह संकट दोनों देशों के संबंधों में एक नए विश्वास और नई शुरुआत का आधार भी बन सकता है। यही समय की सबसे बड़ी मांग है। यहां एक बड़ा प्रश्न यह भी है कि शेख हसीनाा के बांग्लादेश यानी वतन-वापसी से वहां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को नई धार मिलेगी या फिर वह और अधिक बंट जाएंगी?</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 15:08:15 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/dhaka-politics-and-a-new-test-for-india-bangladesh-relations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/8/sheikh-hasina_large_1509_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[अगर भारत-पाक युद्ध हुआ तो क्या India के खिलाफ अपनी सेना उतारेंगे Turkey और Saudi Arabia?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/mecca-joint-defence-agreement-sunni-alliance-india-impact]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>नाटो के भीतर जब अमेरिका और उसके सहयोगियों के बीच भरोसे की दरारें गहरी हो रही हैं, ठीक उसी समय पश्चिम एशिया में एक नया शक्ति-केंद्र खड़ा करने की कोशिश शुरू हो गई है। मक्का में तुर्किये, सऊदी अरब और पाकिस्तान ने ऐसा रक्षा समझौता किया है, जिसकी सबसे अहम लाइन में साफ कहा गया है कि तीनों में से किसी एक पर हमला हुआ तो उसे तीनों पर हमला माना जाएगा। यही वह बिंदु है, जो इस समझौते को सामान्य सैन्य सहयोग से उठाकर एक संभावित नए क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधन में बदल देता है। हालांकि इसे अभी आधिकारिक तौर पर ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन इसके भीतर उसकी बुनियादी तस्वीर जरूर दिखाई देने लगी है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो मक्का में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान और तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोगन का एक मंच पर आना अपने आप में बड़ा संदेश है। खास बात यह है कि यह समझौता ऐसे समय हुआ है जब पश्चिम एशिया पहले ही ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव की आग में झुलस रहा है। सऊदी अरब पर ईरान और उसके सहयोगी संगठनों के हमलों का खतरा है। पाकिस्तान अपनी क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है और तुर्किये पश्चिम एशिया में अपनी भूमिका लगातार बढ़ा रहा है। यानी तीनों देश एक-दूसरे की जरूरत बन गए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/international/iran-mp-criticizes-saudi-arabia-turkey-pakistan-defense-pact" target="_blank">Iran ने Saudi Arabia, पाकिस्तान और Turkey के रक्षा समझौते को बताया बेअसर</a></h3><h2>क्यों हुआ त्रि-पक्षीय समझौता?</h2><div><br></div><div>वर्तमान हालात को देखें तो सऊदी को चाहिए सुरक्षा, पाकिस्तान को पैसा और तुर्किये को ताकत, इसलिए तीनों एक साथ आ गये हैं। हालांकि इस गठजोड़ को समझने के लिए तीनों देशों के हितों को अलग-अलग देखना होगा। सबसे पहले सऊदी अरब की बात करें तो उसके सामने सबसे बड़ा सवाल सुरक्षा का है। दशकों तक रियाद ने अमेरिकी सुरक्षा छाते पर भरोसा किया। लेकिन अब सऊदी नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बदलती अमेरिकी नीति में किसी एक बाहरी शक्ति पर पूरी तरह निर्भर रहना जोखिम भरा हो सकता है। ईरान और उसके सहयोगियों की मिसाइल तथा ड्रोन क्षमता ने इस खतरे को और वास्तविक बना दिया है।</div><div><br></div><div>ऐसे में सऊदी अरब ने अपना सुरक्षा कवच चौड़ा करना शुरू किया है। पाकिस्तान उसके लिए स्वाभाविक साझेदार है। पाकिस्तानी सेना दशकों से सऊदी सुरक्षा बलों को प्रशिक्षण देती रही है और हाल के महीनों में पाकिस्तान ने सऊदी अरब में सैनिकों, लड़ाकू विमानों, ड्रोन और वायु रक्षा प्रणालियों की मौजूदगी भी बढ़ाई है।</div><div><br></div><div>वहीं पाकिस्तान की जरूरत बिल्कुल दूसरी है। आर्थिक संकट से जूझ रहे पाकिस्तान को सऊदी अरब से निवेश और आर्थिक मदद चाहिए, जबकि तुर्किये से रक्षा तकनीक और सैन्य सहयोग चाहिए। बदले में पाकिस्तान अपनी सेना और परमाणु क्षमता को मुस्लिम दुनिया की सुरक्षा में सबसे बड़ा सैन्य योगदान बताकर अपनी भू-राजनीतिक अहमियत बढ़ाना चाहता है।</div><div><br></div><div>वहीं तुर्किये की बात करें तो एर्दोगन लंबे समय से अपने देश को सिर्फ नाटो का सदस्य नहीं, बल्कि मुस्लिम दुनिया की एक स्वतंत्र शक्ति के रूप में स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। तुर्किये के पास अत्याधुनिक ड्रोन, रक्षा उद्योग और बड़ी सैन्य ताकत है। पाकिस्तान के साथ उसका रक्षा सहयोग पहले ही तेजी से बढ़ चुका है।</div><div><br></div><h2>यह गठबंधन किसके खिलाफ है?</h2><div><br></div><div>अब सवाल उठता है कि यह गठबंधन किसके खिलाफ है? इस सवाल का जवाब हालांकि तीनों देशों ने नहीं में दिया है। तुर्किये ने साफ कहा है कि समझौता रक्षात्मक है, यह किसी खास देश या संगठन को निशाना नहीं बनाता और दूसरे क्षेत्रीय देशों के लिए भी खुला है। लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिर्फ दस्तावेज की भाषा नहीं देखी जाती, टाइमिंग भी देखी जाती है। और इस समझौते की टाइमिंग बहुत कुछ कहती है क्योंकि इस समय ईरान और सऊदी अरब के बीच तनाव चरम पर है। ईरान समर्थित हूती, इराकी मिलिशिया और अन्य समूहों की गतिविधियों ने खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंता बढ़ाई है। दूसरी तरफ इजरायल और ईरान के बीच संघर्ष ने पूरे क्षेत्र को बारूद के ढेर में बदल दिया है। इसलिए यह समझौता भले ही ईरान का नाम न ले, लेकिन ईरान के लिए इसका संदेश साफ है कि सऊदी अरब अब अकेला नहीं है।</div><div><br></div><h2>ईरान की बढ़ेंगी मुश्किलें</h2><div><br></div><div>वहीं इस समझौते के बाद ईरान के लिए नई चुनौती खड़ी हो गयी है। तेहरान अब तक पश्चिम एशिया में अपने प्रभाव का बड़ा हिस्सा सहयोगी और प्रॉक्सी संगठनों के नेटवर्क के जरिए कायम करता रहा है। लेकिन यदि सऊदी अरब को पाकिस्तान की सैन्य क्षमता और तुर्किये की रक्षा तकनीक का समर्थन मिलने लगे तो क्षेत्रीय समीकरण बदल सकते हैं। यही कारण है कि मक्का समझौते को ईरान के खिलाफ सीधा सैन्य गठबंधन नहीं होते हुए भी ईरान के लिए रणनीतिक चुनौती जरूर माना जा सकता है।</div><div><br></div><h2>इजराइल-अमेरिका को भी संदेश</h2><div><br></div><div>दिलचस्प बात यह है कि इस गठबंधन का एक और बड़ा संदेश इजरायल के लिए भी है। पश्चिम एशिया में जिस ‘सुन्नी धुरी’ की चर्चा लंबे समय से होती रही है, वह अब सिर्फ राजनीतिक अवधारणा नहीं रहना चाहती। साथ ही यह अमेरिका के लिए भी खतरे की घंटी है और यह समझौता वाशिंगटन के लिए भी सुखद खबर नहीं है। दरअसल सऊदी अरब और तुर्किये दोनों अमेरिकी सुरक्षा व्यवस्था के पुराने साझेदार हैं। लेकिन यदि यही देश अपनी सुरक्षा के लिए अलग क्षेत्रीय सैन्य ढांचा बनाने लगें तो इसका अर्थ साफ है कि अमेरिकी सुरक्षा छतरी पर भरोसा कम हो रहा है। यही इस समझौते का सबसे बड़ा दीर्घकालिक रणनीतिक अर्थ हो सकता है।</div><div><br></div><h2>सुन्नी नाटो सिर्फ कल्पना है या हकीकत?</h2><div><br></div><div>इसके अलावा, यदि मक्का मॉडल सफल होता है और उसमें दूसरे सुन्नी देश शामिल होते हैं, तो पश्चिम एशिया में अमेरिका के नेतृत्व वाली सुरक्षा व्यवस्था के समानांतर एक क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचा खड़ा हो सकता है। सवाल उठता है कि इसमें और कौन-से देश शामिल हो सकते हैं? इसके जवाब में कतर, मिस्र, संयुक्त अरब अमीरात और सीरिया जैसे देशों के नाम संभावित सदस्य के रूप में सामने आ रहे हैं। हालांकि यह भी एक तथ्य है कि यूएई की कई क्षेत्रीय मुद्दों पर सऊदी अरब और तुर्किये से अलग नीति रही है। साथ ही मिस्र भी किसी ऐसे सैन्य गठबंधन में फंसना नहीं चाहेगा जो उसे सीधे किसी क्षेत्रीय युद्ध में धकेल दे। वहीं सीरिया अपनी युद्धोत्तर परिस्थितियों से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा है। इसलिए ‘सुन्नी नाटो’ का विस्तार संभव जरूर है, लेकिन आसान नहीं है।</div><div><br></div><h2>त्रि-पक्षीय समझौते का भारत पर क्या होगा असर?</h2><div><br></div><div>अब सवाल यह है कि इस रक्षा समझौते का भारत पर क्या असर पड़ेगा और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच फिर सैन्य टकराव हुआ तो क्या तुर्किये और सऊदी अरब पाकिस्तान के साथ खड़े होंगे और भारत के खिलाफ युद्ध लड़ेंगे? देखा जाये तो भारत के लिए सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान की बढ़ती रणनीतिक क्षमता है। तुर्किये पहले से ही पाकिस्तान का करीबी सैन्य साझेदार है और कश्मीर से लेकर रक्षा सहयोग तक उसका रुख भारत के लिए चिंता का विषय रहा है। 2025 के भारत-पाकिस्तान सैन्य टकराव में भी अंकारा ने खुलकर पाकिस्तान का समर्थन किया था। ऐसे में भविष्य में पाकिस्तान को तुर्किये से ड्रोन, हथियार, तकनीक, खुफिया सहयोग और सैन्य सहायता का अधिक संगठित समर्थन मिल सकता है। हालांकि सऊदी अरब को तुर्किये के साथ एक ही नजर से देखना सही नहीं होगा क्योंकि रियाद के पाकिस्तान से गहरे रक्षा संबंध जरूर हैं, लेकिन भारत भी उसके लिए ऊर्जा, व्यापार, निवेश और रणनीतिक सहयोग का अहम साझेदार है। इसलिए भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में तुर्किये का पाकिस्तान के पक्ष में खुलकर खड़ा होना ज्यादा संभावित है, जबकि सऊदी अरब के लिए सीधे भारत के खिलाफ युद्ध में उतरना आसान नहीं होगा। वह पाकिस्तान को राजनीतिक, आर्थिक या सीमित सैन्य-लॉजिस्टिक मदद दे सकता है, लेकिन मक्का समझौते की मौजूदा सार्वजनिक भाषा से यह नहीं कहा जा सकता कि पाकिस्तान पर हमले की स्थिति में सऊदी और तुर्किये अपने आप भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ देंगे। यही वजह है कि भारत के लिए असली चिंता इस समझौते की ‘सामूहिक युद्ध’ वाली भाषा से ज्यादा पाकिस्तान को मिलने वाली संभावित अतिरिक्त सैन्य और रणनीतिक ताकत है।</div><div><br></div><h2>पाकिस्तान का विरोधाभास</h2><div><br></div><div>हालांकि इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान का सबसे बड़ा विरोधाभास भी सबके सामने आया है। जिस देश की अपनी सीमाओं पर लगातार तनाव है, जिसे अफगानिस्तान सीमा पर संघर्ष का सामना करना पड़ रहा है, जिसके बलूचिस्तान प्रांत ने आजादी का ऐलान कर दिया है, जिसके अवैध कब्जे वाले पीओके में विद्रोह और दमन तेज होता जा रहा है, वह देश अब मुस्लिम दुनिया की सामूहिक सुरक्षा का प्रहरी बनने की भूमिका तलाश रहा है। देखा जाये तो पाकिस्तान के आंतरिक संकटों के बीच यह समझौता उसके लिए अपनी अंतरराष्ट्रीय प्रासंगिकता दिखाने का अवसर भी बन गया है।</div><div><br></div><h2>कई सवालों के जवाब समय देगा</h2><div><br></div><div>वैसे मक्का समझौते की असली परीक्षा तब होगी जब तीनों में से किसी एक पर वास्तविक सैन्य हमला होगा। अगर सऊदी अरब पर हूती या किसी अन्य ईरान समर्थित समूह का बड़ा हमला होता है, तो क्या पाकिस्तान और तुर्किये युद्ध में उतरेंगे? अगर पाकिस्तान पर हमला होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये सैनिक भेजेंगे? और अगर भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध होता है, तो क्या रियाद अपने भारत संबंधों को दांव पर लगाकर इस्लामाबाद के साथ खड़ा होगा? इन सवालों का जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन एक बात साफ है कि मक्का में सिर्फ एक समझौते पर हस्ताक्षर नहीं हुए हैं। पश्चिम एशिया में शक्ति के नए समीकरण की नींव रखी गई है।</div><div><br></div><div>बहरहाल, नाटो की छतरी के नीचे मतभेद बढ़ रहे हैं और उसी समय मुस्लिम दुनिया के तीन देश अपनी सुरक्षा को एक-दूसरे से जोड़ रहे हैं। अभी इसे ‘सुन्नी नाटो’ कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यदि इसमें दूसरे देश जुड़ते हैं, संयुक्त सैन्य अभ्यास बढ़ते हैं, खुफिया और हथियार सहयोग संस्थागत होता है और ‘एक पर हमला, सभी पर हमला’ सिर्फ कागज की लाइन न रहकर वास्तविक सैन्य नीति बन जाती है, तो आने वाले वर्षों में पश्चिम एशिया का नक्शा बदल सकता है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 13:03:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/mecca-joint-defence-agreement-sunni-alliance-india-impact</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/8/mecca-joint-defence-agreement_large_1304_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[संसदीय-गतिरोध से नहीं चलेगा लोकतंत्र, संवाद ही है समाधान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी संसद है। यही वह सर्वोच्च लोकतांत्रिक मंच है जहां राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य से जुड़े विषयों पर गंभीर विमर्श होता है, सरकार जवाबदेह बनती है, विपक्ष जनभावनाओं को स्वर देता है और कानूनों के माध्यम से देश के विकास की दिशा तय होती है। लेकिन अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज संसद संवाद और सहमति का मंच बनने के बजाय टकराव, आरोप-प्रत्यारोप, नारेबाजी और राजनीतिक हठधर्मिता का अखाड़ा बनती जा रही है। मानसून सत्र में जिस प्रकार लगातार गतिरोध बना हुआ है, उससे केवल संसदीय कार्यवाही ही बाधित नहीं हो रही, बल्कि लोकतंत्र की आत्मा भी आहत हो रही है। संसदीय कार्यमंत्री किरेन रिजीजू और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी के बीच गतिरोध समाप्त करने के लिए हुई बातचीत भी किसी ठोस निष्कर्ष तक नहीं पहुंच सकी। यह स्थिति बताती है कि दोनों पक्ष अपने-अपने राजनीतिक आग्रहों में इतने उलझ गए हैं कि राष्ट्रहित पीछे छूट गया है। विपक्ष की ओर से यह शर्त रखी जा रही है कि जब तक कुछ विशेष मुद्दों पर सरकार सदन में बयान और चर्चा के लिए तैयार नहीं होती, तब तक संसद की कार्यवाही नहीं चलने दी जाएगी। दूसरी ओर सरकार भी अपने विधायी एजेंडे को आगे बढ़ाने पर अडिग है। परिणाम यह है कि संसद का बहुमूल्य समय निरर्थक विवादों की भेंट चढ़ रहा है।</div><div><br></div><div>लोकतंत्र में असहमति स्वाभाविक है, किंतु असहमति को अराजकता में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति नहीं है। विपक्ष का दायित्व केवल विरोध करना नहीं, बल्कि रचनात्मक सुझाव देना भी है। सरकार को कठघरे में खड़ा करना विपक्ष का अधिकार है, परंतु संसद को ठप कर देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता। लोकतंत्र में विरोध की भी मर्यादा होती है। जब विरोध संसद को चलने ही न दे, तब वह लोकतांत्रिक अधिकार नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक दायित्वों की उपेक्षा बन जाता है। पिछले कुछ वर्षों से यह चिंताजनक प्रवृत्ति लगातार बढ़ी है कि संसद सत्र प्रारंभ होने से पहले ऐसे मुद्दे राजनीतिक रूप से उछाले जाते हैं, जिनके आधार पर पूरे सत्र को बाधित किया जा सके। परिणामस्वरूप अनेक महत्वपूर्ण विधेयक बिना पर्याप्त चर्चा के पारित हो जाते हैं अथवा कई विधेयक लंबित रह जाते हैं। इससे सबसे अधिक नुकसान देश को होता है। संसद का प्रत्येक मिनट करोड़ों रुपये की सार्वजनिक धनराशि से संचालित होता है। यदि वह समय केवल शोर-शराबे और नारेबाजी में बीत जाए तो यह करदाताओं के धन और लोकतांत्रिक विश्वास-दोनों का अपमान है।&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/pm-modi-big-signal-the-delimitation-bill-will-be-passed-now-the-nda-has-the-full-numbers" target="_blank">PM Modi का बड़ा संकेत: Delimitation Bill अब आकर रहेगा! NDA के पास पूरा संख्या बल</a></h3><div>लोकतंत्र में संवाद ही समाधान का सबसे प्रभावी माध्यम है। महात्मा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी तक भारतीय राजनीति की श्रेष्ठ परंपरा संवाद, सहमति और संवेदनशीलता की रही है। आज आवश्यकता इस बात की है कि पक्ष और विपक्ष दोनों अपने-अपने दुराग्रह छोड़कर संवाद की मेज पर बैठें। संसद की गरिमा इस बात में नहीं कि कौन किसे अधिक कठघरे में खड़ा करता है, बल्कि इस बात में है कि राष्ट्रहित के प्रश्नों पर कितनी गंभीरता से विचार किया जाता है। विशेष रूप से कांग्रेस और उसके नेता राहुल गांधी को यह समझना होगा कि लोकतंत्र केवल आंदोलन और विरोध का नाम नहीं है। विपक्ष की भूमिका सरकार को गिराने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र को संभालने की होती है। यदि प्रत्येक मुद्दे पर संसद को बाधित करने की रणनीति अपनाई जाएगी तो जनता के बीच यह संदेश जाएगा कि विपक्ष के पास वैकल्पिक नीति और दृष्टि का अभाव है। लोकतंत्र में जनता केवल विरोध नहीं, समाधान भी चाहती है। यदि विपक्ष स्वयं संवाद से दूरी बनाएगा तो ‘संवाद से समाधान’ का आदर्श केवल नारा बनकर रह जाएगा।</div><div><br></div><div>सरकार की भी जिम्मेदारी कम नहीं है। लोकतंत्र में बहुमत का अर्थ मनमानी नहीं होता। सरकार को भी विपक्ष की उचित मांगों को सुनना चाहिए और जहां संभव हो, सहमति का मार्ग निकालना चाहिए। संसद किसी एक दल की नहीं, पूरे राष्ट्र की संस्था है। इसलिए सरकार को भी संवेदनशीलता, धैर्य और व्यापक दृष्टिकोण का परिचय देना होगा। किंतु यदि संवाद का प्रत्येक प्रयास केवल राजनीतिक शर्तों और हठधर्मिता में उलझ जाए तो समाधान की संभावनाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं। आज सबसे बड़ी आवश्यकता राजनीतिक परिपक्वता की है। दुर्भाग्य से भारतीय राजनीति में आग्रह, पूर्वाग्रह और दुराग्रह का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। हर मुद्दे को चुनावी लाभ-हानि के चश्मे से देखा जा रहा है। संसद में बहस कम और राजनीतिक संदेश अधिक दिए जा रहे हैं। यह प्रवृत्ति लोकतंत्र को कमजोर करती है। संसद का उद्देश्य जनकल्याणकारी नीतियों पर विचार करना है, न कि चुनावी रणनीतियों का मंच बन जाना।</div><div><br></div><div>देश आज आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, रोजगार, शिक्षा, कृषि, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सामाजिक समरसता जैसी अनेक चुनौतियों के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय संसद का प्रत्येक दिन अत्यंत मूल्यवान है। यदि यह समय केवल राजनीतिक टकराव में व्यतीत होगा तो विकास की गति अवश्य प्रभावित होगी। कानूनों में विलंब, नीतिगत निर्णयों की देरी और संसदीय अस्थिरता का सीधा प्रभाव आम नागरिक के जीवन पर पड़ता है। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इस बात में नहीं कि संसद में कितना शोर हुआ, बल्कि इस बात में है कि वहां कितने सार्थक विचार सामने आए। स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता और विपक्ष प्रतिद्वंद्वी अवश्य होते हैं, किंतु शत्रु नहीं। दोनों का अंतिम लक्ष्य राष्ट्रहित होना चाहिए। यदि राजनीतिक दल इस मूल भावना को भूल जाएंगे तो लोकतंत्र केवल संख्या का खेल बनकर रह जाएगा।</div><div><br></div><div>आज आवश्यकता इस बात की है कि सभी राजनीतिक दल आत्ममंथन करें। विपक्ष अपने विरोध को रचनात्मक बनाए, सरकार अपने संवाद को व्यापक बनाए और दोनों मिलकर संसद की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित करें। लोकतंत्र का भविष्य टकराव में नहीं, संवाद में सुरक्षित है। संसद की गरिमा नारेबाजी से नहीं, विचार-विमर्श से बढ़ती है। भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में यदि संसद ही गतिरोध का प्रतीक बन जाएगी तो जनता का विश्वास कमजोर होगा, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। समय की पुकार है कि राजनीति चुनावों की सीमाओं से ऊपर उठकर राष्ट्रनिर्माण की दिशा में आगे बढ़े। पक्ष और विपक्ष दोनों यह स्मरण रखें कि वे किसी दल के नहीं, पहले भारत के प्रतिनिधि हैं। संसद की प्रत्येक घड़ी राष्ट्र की अमूल्य धरोहर है। उसे हठ, अहंकार और राजनीतिक स्वार्थ की भेंट चढ़ाना भविष्य की पीढ़ियों के साथ अन्याय होगा। यदि लोकतंत्र को सशक्त बनाना है, संसद की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करनी है और भारत को विकसित राष्ट्र बनाना है, तो केवल एक ही मार्ग है-संवाद, सहमति और राष्ट्रहित। यही भारतीय लोकतंत्र की वास्तविक शक्ति है और यही संसदीय मर्यादा का सर्वोच्च आदर्श।</div><div><br></div><div>- ललित गर्ग</div><div>लेखक, पत्रकार, स्तंभकार</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 17:54:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/democracy-cannot-function-amidst-parliamentary-deadlock-dialogue-is-the-solution</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/7/indian-parliament_large_1755_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[FCRA Bill पर हल्ला मचा रहे विपक्षी दलों और ईसाई संगठनों को मार्को रुबियो का बयान सुनना चाहिए]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/modi-government-fcra-amendment-foreign-funding-ngos-india-marco-rubio]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (एफसीआरए) संशोधन विधेयक को लेकर देश में तो इस समय व्यापक बहस छिड़ी ही हुई है, साथ ही इसकी गूंज अमेरिका तक सुनाई दे रही है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो पहले स्वयं यह कह चुके हैं कि किसी भी देश में विदेशी फंड से संचालित संस्थाओं को वहां की संप्रभु सरकार के समानांतर व्यवस्था नहीं चलानी चाहिए और उन्हें मेजबान देश के कानूनों का सम्मान करना चाहिए। इसके बावजूद अमेरिकी सांसद राइली मूर भारत के प्रस्तावित कानून की आलोचना कर रहे हैं। दूसरी ओर, मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात के बाद स्पष्ट किया कि केंद्र सरकार ने उन्हें आश्वस्त किया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव (रेट्रोस्पेक्टिव) से लागू नहीं किया जाएगा। इन घटनाक्रमों के बीच मोदी सरकार का स्पष्ट संदेश है कि विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों के संचालन में पारदर्शिता, जवाबदेही और भारतीय कानूनों का पालन सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगा।</div><div><br></div><div>हम आपको बता दें कि केंद्र सरकार के आंकड़े बताते हैं कि पिछले कुछ वर्षों में एफसीआरए के तहत पंजीकृत सक्रिय संगठनों की संख्या घटी है, लेकिन विदेशी चंदे का प्रवाह बना हुआ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2024-25 में 16,200 संगठनों को लगभग 22,963 करोड़ रुपये का विदेशी योगदान प्राप्त हुआ। वहीं बड़ी संख्या में ऐसे संगठनों के एफसीआरए लाइसेंस निरस्त या समाप्त भी किए गए हैं। सरकार का कहना है कि केवल वैध पंजीकरण रखने वाले संगठनों को ही विदेशी धन प्राप्त करने और उसका उपयोग करने का अधिकार होना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/national/parliament-clashes-between-ruling-and-opposition-parties-kiren-rijiju-sharply-attacks-kharge-claim" target="_blank">संसद में सत्ता-विपक्ष की टकरार! Kharge के दावे पर Kiren Rijiju का तीखा वार</a></h3><div>हम आपको बता दें कि सरकार द्वारा लाए गए संशोधन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि यदि किसी संस्था का एफसीआरए पंजीकरण समाप्त हो जाता है, रद्द हो जाता है, नवीनीकृत नहीं होता या संस्था स्वयं उसे छोड़ देती है, तो विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियों के प्रबंधन के लिए एक "नामित प्राधिकरण" की व्यवस्था की जाएगी। यदि बाद में संस्था का पंजीकरण बहाल हो जाता है तो संबंधित संपत्तियां और अप्रयुक्त विदेशी योगदान वापस कर दिए जाएंगे। यदि ऐसा नहीं होता, तो कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी। केंद्र सरकार का तर्क है कि यह व्यवस्था किसी नए अधिकार का सृजन नहीं, बल्कि पहले से मौजूद प्रावधानों को अधिक स्पष्ट और व्यवस्थित बनाने का प्रयास है।</div><div><br></div><div>वहीं प्रस्तावित संशोधन को लेकर कुछ चर्च संगठनों ने आशंकाएं भी व्यक्त की हैं। उनका कहना है कि कानून की कुछ धाराएं अत्यधिक कठोर हैं और उन्हें संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) के पास भेजा जाना चाहिए। इसी उद्देश्य से विभिन्न चर्च संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। वहीं मिजोरम के मुख्यमंत्री लालदुहोमा ने अमित शाह के साथ बैठक के बाद कहा कि केंद्रीय गृह मंत्री ने स्पष्ट आश्वासन दिया है कि प्रस्तावित संशोधन को पूर्व प्रभाव से लागू नहीं किया जाएगा।</div><div><br></div><div>हम आपको यह भी बता दें कि केंद्र सरकार ने इन आशंकाओं का विस्तार से जवाब भी दिया है। सरकार का कहना है कि प्रस्तावित कानून किसी विशेष धर्म, समुदाय या विचारधारा को निशाना नहीं बनाता। एफसीआरए के प्रावधान सभी विदेशी चंदा प्राप्त करने वाले संगठनों पर समान रूप से लागू होते हैं। केंद्र सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि किसी धार्मिक स्थल से जुड़ी संपत्ति का मामला आता है तो उसके धार्मिक स्वरूप को कानूनन सुरक्षित रखा जाएगा। साथ ही, नामित प्राधिकरण के आदेश अंतिम नहीं होंगे और उनके विरुद्ध न्यायालय में अपील का अधिकार भी उपलब्ध रहेगा।</div><div><br></div><div>उधर, इस पूरे विवाद का अंतरराष्ट्रीय पहलू भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। अमेरिकी सांसद राइली मूर ने आरोप लगाया कि यह कानून चर्चों और ईसाई संस्थाओं के खिलाफ है। हालांकि स्वयं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पिछले वर्ष यह कहा था कि विदेशी सहायता कार्यक्रम मेजबान देशों की सरकारों के समानांतर नहीं चलने चाहिए और विदेशी वित्तपोषित संस्थाओं को संबंधित देश की नीतियों और कानूनों के अनुरूप काम करना चाहिए। यही कारण है कि भारत के संदर्भ में उठ रही आलोचना पर दोहरे मापदंड का प्रश्न भी सामने आया है।</div><div><br></div><div>देखा जाये तो लोकतंत्र में किसी भी कानून पर बहस और समीक्षा का अधिकार सभी को है, लेकिन भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय हित सर्वोपरि हैं। यदि कोई संगठन विदेशी चंदे के सहारे पूरी पारदर्शिता और भारतीय कानूनों का पालन करते हुए जनकल्याण का कार्य करता है, तो उसके लिए इस कानून से घबराने का कोई कारण नहीं होना चाहिए। इसके विपरीत, जिन संस्थाओं या तत्वों ने विदेशी धन का उपयोग नियमों से इतर गतिविधियों, अपारदर्शी वित्तीय लेन-देन या भारत में अस्थिरता और अशांति फैलाने के प्रयासों के लिए किया है, उनके लिए स्वाभाविक रूप से चिंता की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि प्रस्तावित संशोधन निगरानी, जवाबदेही और कानूनी अनुपालन को और मजबूत करने का प्रयास करता है। मोदी सरकार का कहना है कि यह कानून किसी धर्म या समुदाय को लक्षित नहीं करता, बल्कि विदेशी अंशदान के नियमन और पारदर्शिता के लिए समान रूप से लागू होगा। ऐसे में यदि विदेशी फंडिंग के नाम पर नियमों की अनदेखी करने वालों की मुश्किलें बढ़ती हैं, तो इसे कानून के दायरे में जवाबदेही सुनिश्चित करने की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।</div><div><br></div><div>बहरहाल, संसद में होने वाली चर्चा के बाद कानून का अंतिम स्वरूप तय होगा, लेकिन यह स्पष्ट है कि विदेशी धन के उपयोग पर प्रभावी निगरानी और राष्ट्रीय हितों की रक्षा किसी भी संप्रभु राष्ट्र की वैध जिम्मेदारी है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 14:17:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/modi-government-fcra-amendment-foreign-funding-ngos-india-marco-rubio</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/7/amit-shah_large_1418_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[राजेंद्र माथुर- विचारों की पत्रकारिता के नायक]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/rajendra-mathur-a-champion-of-journalism-of-ideas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>राजेंद्र माथुर की पूरी जीवन यात्रा एक साधारण आम आदमी की कथा है। वे इतने साधारण हैं कि असाधारण लगने लगते हैं। उन्होंने जो कुछ पाया, एकाएक नहीं पाया; संघर्ष से पाया, नियमित लेखन से पाया और अपनी रचनाशीलता से पाया। इसी संघर्ष की वृत्ति ने उन्हें असाधारण पत्रकार और संपादक बना दिया। राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात से तय होता है कि आखिर उनके लेखन में विचारों की गहराई कितनी है। अपने अखबार को ऊंचाइयों पर ले जाने का उनका संकल्प कितना गहरा है और हमारे समय के प्रश्नों के जवाब तलाशने तथा नए सवाल खड़े करने की कितनी प्रश्नाकुलता संबंधित व्यक्ति में है। राजेंद्र माथुर का संपादकीय और पत्रकारीय व्यक्तित्व इस बात की गवाही देता है कि वे असहज प्रश्नों से मुंह नहीं चुराते, बल्कि उनसे दो-दो हाथ करते हैं। वे सवालों से जूझते हैं और उनके सही एवं प्रासंगिक उत्तर तलाशने की कोशिश करते हैं।</div><div><br></div><div>वे सही मायने में पत्रकारिता में विचारों के एक ऐसे प्रतीक पुरुष बनकर सामने आए, जिन्होंने अपने लेखन के माध्यम से एक बौद्धिक उत्तेजना का सृजन किया और हिंदी को एक ऐसी भाषा तथा विराट अनुभव-संसार दिया, जिसकी प्रतीक्षा में वह सालो से खड़ी थी। इस मायने में राजेंद्र माथुर की उपस्थिति अपने समय में एक कद्दावर पत्रकार-संपादक की मौजूदगी है। वरिष्ठ पत्रकार श्री सूर्यकांत बाली के मुताबिक,“माथुर साहब जैसा बोलते थे, वैसा ही लिखते थे। वे धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत बोलते थे, तो धाराप्रवाह, विचार-परिपूर्ण और रूपक-अलंकृत लिखते भी थे।” ऐसे में कहा जा सकता है कि राजेंद्र माथुर के पत्रकारीय एवं संपादकीय व्यक्तित्व में एक बौद्धिक आकर्षण दिखता है। उनके लेखन में भारत-जिज्ञासा, भारत-अनुराग और भारत-स्वप्न पूरी समग्रता में प्रकट होते हैं। वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने लिखा है कि&nbsp; “राजेंद्र माथुर में बौद्धिकता और सच्चरित्रता का असाधारण संगम था, इसीलिए वे हिंदी पत्रकारिता में शिखर स्थान पा सके। वे असाधारण शैलीकार थे। अंग्रेजी साहित्य के प्राध्यापक होने के बावजूद उनकी हिंदी लेखन शैली बिंब-प्रधान थी। उनके मुहावरे अपने होते थे। उनमें अभिव्यंजना की अद्भुत शक्ति थी। हिंदी पत्रकारिता के इतिहास में वे एक शैलीकार के रूप में याद किए जाएंगे।”</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/why-do-not-we-find-people-like-shivaji-chandrashekhar-azad-and-bhagat-singh-anymore" target="_blank">अब शिवाजी, चंद्रशेखर आज़ाद, भगत सिंह जैसे लोग क्यों नहीं मिलते?</a></h3><div>राजेंद्र माथुर एक श्रेष्ठ संपादक थे। उनकी उपस्थिति ही 'नईदुनिया' और 'नवभारत टाइम्स' को एक ऐसा समाचार पत्र बनाने में सफल हुई, जिस पर हिंदी पत्रकारिता को नाज है। 'नवभारत टाइम्स' में श्री माथुर के सहयोगी रहे श्री विष्णु खरे ने लिखा है कि, “राजेंद्र माथुर महान संपादक होने का अभिनय करने की कोई जरूरत महसूस नहीं करते थे। दरअसल, लिबास से लेकर बोलचाल तक उनकी कोई बनावटी शैली या लहजा नहीं था; वे अपने मामूलीकरण में विश्वास करते थे, वैशिष्ट्य में नहीं। उनकी संपादकीय आदेशों या हुक्मों से नहीं, एक गुणात्मक तथा नैतिक विकिरण से चलती” राजेंद्र माथुर का पत्रकारीय व्यक्तित्व बेहद प्रेरक था। आज की पत्रकारिता और मीडिया संस्थानों में घुस आई तमाम बुराइयों से उनका व्यक्तित्व एकदम अलग था। संपादक की जैसी शास्त्रीय परिभाषाएं बताई गई हैं, श्री माथुर उन पर पूरी तरह फिट बैठते हैं।</div><div><br></div><div>उनके समकक्ष पत्रकारों की राय में, जिस समय वे दिल्ली में 'नवभारत टाइम्स' जैसे बड़े अखबार के संपादक थे, वे सत्ता के लाभ उठा सकते थे। आज की पत्रकारिता में जिस तरह पत्रकार एवं संपादक सत्ता से लाभ लेकर मंत्री से लेकर राज्यसभा की सीटें ले रहे हैं, श्री माथुर भी ऐसे प्रलोभनों के पास जा सकते थे। किंतु उन्होंने तमाम चर्चाओं के बीच इससे खुद को बचाया। पत्रकार विष्णु खरे अपने लेख में इस बात की पुष्टि भी करते हैं। सही मायने में राजेंद्र माथुर एक ऐसे संपादक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने अपने पत्रकारीय व्यक्तित्व को वह ऊंचाई दी जिसके लिए पीढ़ियां उन्हें याद कर रही हैं। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी हिंदी पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंताएं हैं। वे हिंदी पत्रकारिता के एक ऐसे संपादक थे, जो लगातार यह सोचते रहे कि हिंदी पत्रकारिता का विचार-दारिद्र्य कैसे दूर किया जाए और कैसे हिंदी में एक संपूर्ण अखबार निकले तथा उसे व्यापक लोकस्वीकृति भी मिल सके। 'नवभारत टाइम्स' के कार्यकारी संपादक रहे स्व. सुरेंद्र प्रताप सिंह ने उनकी इन चिंताओं को निकटता से देखा था। वे लिखते हैं, “माथुर साहब का गहन इतिहास-बोध, शुद्ध श्रद्धा और उससे उत्पन्न गरिमामय अतीत की मरीचिका पर आधारित हिंदी पत्रकारिता की कमजोर आधारभूमि के बारे में उन्हें बार-बार सचेत करता रहता था। वे भूतकाल के वायवीय स्वर्णिम अतीत में जीने वाले नहीं थे। वे स्वप्नदर्शी थे और अपने सपनों की उदात्तता के साथ उन्होंने कभी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया। हिंदी पत्रकारिता का वर्तमान परिदृश्य उन्हें बार-बार विचलित तो कर देता था, लेकिन एक कुशल अभियात्री की तरह उन्होंने अपने जहाज की दिशा को क्षणिक प्रलोभनों के लिए किसी अन्य रास्ते पर डालने के बारे में क्षणिक विचार भी नहीं किया।”</div><div><br></div><div>उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की विशिष्टता यह भी है कि वे अंग्रेजी के प्राध्यापक और विद्वान होने के बावजूद अपने लेखन की भाषा के नाते हिंदी को चुनते हैं। हिंदी उनकी सांसों में बसती थी। हिंदी पत्रकारिता को नई जमीन तोड़ने के लिए प्रेरित करने और हिंदी लेखकों एवं पत्रकारों की एक पूरी पीढ़ी का निर्माण करने का काम श्री माथुर जीवन भर करते रहे। इंदौर से लेकर दिल्ली तक उनकी पूरी यात्रा में एक भारत-प्रेम, भारत-बोध और हिंदी-प्रेम साफ नजर आता है। शायद इसी के चलते वे देश की पत्रकारिता को एक नई और सही दिशा देने में सफल रहे। श्री मधुसूदन आनंद लिखते हैं, “माथुर साहब ने अंग्रेजी में एम.ए. किया था और अंग्रेजी भाषा पर उनकी पकड़ अंग्रेजी पत्रकारों को भी विस्मय में डालती थी। लेकिन उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को चुना, तो शायद इसलिए कि वे अपनी बात अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। अगर यह कहा जाए कि हिंदी पत्रकारों की एक पीढ़ी माथुर साहब को पढ़कर पली और बढ़ी है, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। उनके असामयिक निधन के बाद 'नवभारत टाइम्स' को देश के दूर-दूर के इलाकों से हजारों पत्र प्राप्त हुए थे। ये वे पाठक थे, जो उनके उत्कट राष्ट्र-प्रेम, समाज के प्रति उनके सरोकारों, इतिहास की अतल गहराइयों से अनमोल तथ्य ढूंढ कर लाने के उनके सामर्थ्य और शालीन भाषा में राजनेताओं की खिंचाई करने के उनके साहस पर मुग्ध थे।”&nbsp;</div><div><br></div><div>उनके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता थी, जिसे उनके सहयोगी रहे सूर्यकांत बाली इन शब्दों में रेखांकित करते हैं,“हमारे प्रधान संपादक को कोई पांचवां काम आता है, इस पर तो मुझे पूरा शक है: बस सोचना, पढ़ना, बतियाना और लिखना, उनकी सारी दुनिया इन चार कामों में सिमट चुकी थी।” श्री माथुर के व्यक्तित्व पर यह एक मुकम्मल टिप्पणी है, जो बताती है कि वे किस तरह के पत्रकार-संपादक थे। उनका पत्रकारीय व्यक्तित्व इसीलिए एक अलग किस्म की आभा के साथ सामने आता है, जिसमें एक बौद्धिक तेज और आकर्षण निरंतर दिखता है। उनके पत्रकारीय व्यक्तित्व की सबसे बड़ी खूबी यह है कि वे एक ऐसे लेखक-संपादक के तौर पर सामने आते हैं, जो पूर्णकालिक पत्रकार थे। वे किसी साहित्य की परंपरा से आने वाले संपादक नहीं थे। अतः उन्होंने हिंदी पत्रकारिता को साहित्यकार-संपादकों द्वारा दी गई भाषा और उसके मुहावरों से अलग एक अनूठी पत्रकारीय भाषा का अनुभव दिया। हिंदी को संवाद, संचार और सूचना की भाषा बनाने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है। सही मायने में वे एक ऐसे संपादक और लेखक के रूप में सामने आते हैं, जिन्होंने बहुत से अनछुए विषयों को हिंदी के अनुभव का विषय बनाया, जिन पर पहले अंग्रेजी के पत्रकारों का एकाधिकार माना जाता था। उन्होंने भावनाओं से ऊपर विचार और बौद्धिकता को महत्व दिया। इसके चलते हिंदी को एक नई भाषा, एक नया अनुभव और अभिव्यक्ति का एक नया संबल मिला। उनकी बौद्धिकता ने हिंदी पत्रकारिता को अंग्रेजी अखबारों के सामने सम्मान से खड़े होने लायक बनाया, जिससे हिंदी पत्रकारिता ने एक नया आत्मविश्वास और नई ऊर्जा हासिल की।&nbsp; आज हिंदी पत्रकारिता पर जिस तरह बाजारवादी ताकतों का दबाव गहरा रहा है, ऐसे समय में राजेंद्र माथुर के बहाने हिंदी पत्रकारिता की पड़ताल एक आवश्यक विमर्श बन गई है। शायद उनकी स्मृति के बहाने हम कुछ ऐसे रास्ते तलाश पाएं, जो हमें इस कठिन समय में अपने मूल्यों के साथ काम करने का हौसला दे सकें।</div><div><br></div><div>- प्रो.संजय द्विवेदी</div><div>(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में जनसंचार विभाग के अध्यक्ष हैं।)</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 09:51:31 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/rajendra-mathur-a-champion-of-journalism-of-ideas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/7/rajendra-mathur_large_0952_23.webp" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[MP में कुशवाहा वोट बैंक की ताकत के आगे झुकी BJP, 'गुलाटी' बयान के लिए तोमर को मांगनी पड़ी माफी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-singh-tomar-apology-kushwaha-community-datia-bypoll-mp-politics]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>मध्य प्रदेश की राजनीति में दतिया विधानसभा उपचुनाव के नतीजे ने भारतीय जनता पार्टी को ऐसा राजनीतिक संदेश दिया है, जिसकी गूंज अब पूरे प्रदेश में सुनाई दे रही है। विधानसभा अध्यक्ष और भाजपा के वरिष्ठ नेता नरेंद्र सिंह तोमर के एक विवादित बयान से शुरू हुआ विवाद आखिरकार सार्वजनिक माफी तक पहुंच गया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह संकेत मिलने के बाद कि कुशवाहा समाज की नाराजगी पार्टी की हार का बड़ा कारण बनी, तोमर ने स्वयं आगे आकर अपने शब्द वापस लिए और कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी इस समाज का अपमान करने की नहीं सोचा।</div><div><br></div><div>पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब 31 जुलाई को मुरैना में भाजपा के जिला अध्यक्ष कमलेश कुशवाहा के निवास पर आयोजित एक कार्यक्रम में नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज को संबोधित करते हुए कहा कि यह समाज बीच-बीच में "गुलाटी खाता रहा" और इसी कारण उसने अपनी "विश्वसनीयता को खंडित" किया। उन्होंने यह भी कहा कि एक समय ऐसा था जब कुशवाहा समाज भाजपा का मजबूत समर्थक माना जाता था और भाजपा ने उस दौर में भी समाज को सम्मान दिया, जब अन्य राजनीतिक दल उन्हें पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की स्थिति में नहीं थे। उन्होंने पूर्व नेता कालीचरण कुशवाहा को टिकट दिए जाने का उदाहरण भी प्रस्तुत किया।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/column/pm-modi-slams-pakistan-on-article-370-anniversary-kashmir-development-pojk-hypocrisy" target="_blank">Article 370 पर बदजुबानी कर रहे थे जरदारी और शहबाज शरीफ, मोदी ने खुद आगे आकर दिया करारा जवाब</a></h3><div>हालांकि, कार्यक्रम का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राजनीतिक भूचाल आ गया। कुशवाहा समाज के विभिन्न संगठनों और प्रतिनिधियों ने इस टिप्पणी को पूरे समाज की राजनीतिक निष्ठा पर सवाल बताकर तीखी आपत्ति जताई। कांग्रेस ने भी इसे तुरंत बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना दिया। प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष जीतू पटवारी ने इसे अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) का अपमान बताते हुए कहा कि संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को इस तरह की भाषा शोभा नहीं देती और उन्होंने नरेंद्र सिंह तोमर से सार्वजनिक माफी की मांग की।</div><div><br></div><div>इस बीच, दतिया विधानसभा उपचुनाव के परिणाम ने भाजपा की मुश्किलें और बढ़ा दीं। कांग्रेस उम्मीदवार कुंवर घनश्याम सिंह ने भाजपा प्रत्याशी आशीष तिवारी को 6,016 वोटों के अंतर से पराजित कर दिया। भाजपा की आंतरिक समीक्षा में यह बात सामने आई कि दतिया के लगभग 12 प्रतिशत मतदाता रहे कुशवाहा समाज का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस की ओर खिसक गया, जिसने चुनावी परिणाम को निर्णायक रूप से प्रभावित किया। इसके बाद भाजपा संगठन ने हार की व्यापक समीक्षा शुरू की। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वरिष्ठ नेताओं और चुनाव प्रभारियों के साथ बैठक की, दतिया जिला इकाई को भंग किया गया, समीक्षा समितियां गठित की गईं और संगठनात्मक कमजोरियों के साथ-साथ संभावित अंदरूनी असंतोष की भी जांच शुरू हुई।</div><div><br></div><div>इसी राजनीतिक आत्ममंथन के बीच नरेंद्र सिंह तोमर ने कुशवाहा समाज के नाम हस्ताक्षरित पत्र जारी कर अपने बयान पर खेद व्यक्त किया। उन्होंने लिखा कि कमलेश कुशवाहा के घर आयोजित कार्यक्रम पारिवारिक वातावरण में था और उसी संदर्भ में बातचीत हुई थी। उन्होंने कहा कि उनका और कुशवाहा समाज का रिश्ता परस्पर पूरक है तथा उन्होंने जीवनभर इस समाज का सम्मान किया है और आगे भी करते रहेंगे। यदि उनके शब्दों से किसी की भावना आहत हुई है तो वह अपने शब्द वापस लेते हैं और इसके लिए खेद प्रकट करते हैं। उनका यह बयान भाजपा के भीतर बढ़ी राजनीतिक बेचैनी और सामाजिक समीकरणों को साधने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।</div><div><br></div><div>दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम केवल एक बयान और माफी तक सीमित नहीं है, बल्कि मध्य प्रदेश की बदलती सामाजिक-राजनीतिक राजनीति का संकेत भी देता है। राज्य की कुल आबादी में अन्य पिछड़ा वर्ग लगभग आधी हिस्सेदारी रखता है और कुशवाहा समाज इस वर्ग का एक प्रभावशाली हिस्सा माना जाता है। ग्वालियर-चंबल अंचल के मुरैना, दतिया, भिंड और ग्वालियर जैसे जिलों से लेकर बुंदेलखंड और विंध्य क्षेत्र तक इस समाज की उल्लेखनीय उपस्थिति है। कई विधानसभा सीटों पर यह समाज जीत-हार तय करने की क्षमता रखता है।</div><div><br></div><div>विशेष रूप से दतिया जैसी सीट पर, जहां कुशवाहा मतदाता लगभग 12 प्रतिशत हैं, किसी भी दल के लिए इस समाज की अनदेखी राजनीतिक जोखिम बन सकती है। यही कारण है कि भाजपा ने पिछले दो दशकों में ओबीसी सामाजिक समीकरणों के केंद्र में कुशवाहा समाज को महत्वपूर्ण स्थान दिया। दूसरी ओर कांग्रेस भी अब इस वर्ग में अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। पार्टी ने सतना विधायक सिद्धार्थ कुशवाहा के नेतृत्व में बूथ स्तर तक व्यापक अभियान चलाया, जिसका असर दतिया उपचुनाव में दिखाई दिया।</div><div><br></div><div>राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुशवाहा समाज मध्य प्रदेश में केवल एक बड़ा वोट बैंक नहीं, बल्कि एक प्रभावी "स्विंग फैक्टर" भी है। यदि समाज को सम्मान, पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व और भागीदारी का संदेश मिलता है तो वह किसी भी दल के साथ मजबूती से खड़ा हो सकता है। लेकिन उपेक्षा या अपमान की भावना पैदा होने पर उसका रुख तेजी से बदलने की क्षमता भी रखता है। यही वजह है कि नरेंद्र सिंह तोमर के "गुलाटी" वाले बयान के बाद भाजपा को सार्वजनिक रूप से डैमेज कंट्रोल करना पड़ा।</div><div><br></div><div>बहरहाल, दतिया उपचुनाव ने भाजपा और कांग्रेस दोनों को स्पष्ट संकेत दे दिया है कि मध्य प्रदेश की आगामी राजनीतिक लड़ाई केवल नेताओं के भाषणों या चुनावी नारों से नहीं जीती जाएगी। सामाजिक सम्मान, प्रतिनिधित्व और ओबीसी वर्गों के साथ मजबूत संवाद आने वाले चुनावों की दिशा तय करेगा। नरेंद्र सिंह तोमर की सार्वजनिक माफी इस बात का प्रमाण है कि मध्य प्रदेश की राजनीति में कुशवाहा समाज अब केवल एक वोट बैंक नहीं, बल्कि सत्ता का समीकरण बदलने वाली निर्णायक राजनीतिक ताकत बन चुका है।</div><div><br></div><div>-नीरज कुमार दुबे</div>

<iframe width="560" height="315" src="https://www.youtube.com/embed/Frrh-JkMP-A?si=7SPeuwkjOWEbeJnG" title="YouTube video player" frameborder="0" allow="accelerometer; autoplay; clipboard-write; encrypted-media; gyroscope; picture-in-picture; web-share" referrerpolicy="strict-origin-when-cross-origin" allowfullscreen=""></iframe>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:21:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/column/narendra-singh-tomar-apology-kushwaha-community-datia-bypoll-mp-politics</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/8/6/narendra-singh-tomar_large_1522_23.webp" />
    </item>
  </channel>
</rss>