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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Badrinath Dham Update: शीतकाल में बंद होंगे कपाट, जानें क्यों Joshimath में होती है भगवान की पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-doors-will-be-closed-during-winter-know-why-god-worshipped-in-joshimath]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर साल सर्दियों के मौसम की शुरूआत में बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद हो जाते हैं। क्योंकि इस क्षेत्र में भारी बर्फबारी होती है और मौसम बेहद सर्द हो जाता है। कपाट बंद होने की डेट हर साल दशहरा के बाद घोषित की जाती है। यह एक अहम धार्मिक घटना होती है। जब मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं, तब भगवान बद्री विशाल की पूजा की जाती है। ऐसे में अब आपने मन में यह सवाल होगा कि बद्रीनाथ के कपाट बंद हो जाते हैं, तो बद्री विशाल की पूजा कहां होती है।</div><div><br></div><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक बर्फबारी के दौरान भगवान बद्री विशाल के पूजा को स्थानातंरित कर दिया जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि कपाट बंद होने के बाद बद्री विशाल की पूजा कहां होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-divine-facts-of-tirupati-balaji-temple-which-even-science-surprised-by-do-you-know" target="_blank">Famous Temple: Tirupati Balaji Temple के 5 Divine Facts, जिनके आगे विज्ञान भी हैरान, क्या आप जानते हैं</a></h3><div><br></div><h2>कहां होती है बद्रीविशाल की पूजा</h2><div>बता दें कि जब बद्रीनाथ धाम के कपाट शीतकाल के लिए बंद हो जाते हैं, तो भगवान बद्री विशाल की पूजा की व्यवस्था को उनके शीतकालीन गद्दी स्थल पर स्थानांतरित कर दी जाती है। सर्दियों में बद्री विशाल की पूजा जोशीमठ स्थित श्री नरसिंह मंदिर में की जाती है। इस दौरान बद्रीनाथ मंदिर से भगवान के प्रतिनिधि के तौर पर कुबेर जी और उद्धव जी की डोली भी जोशीमठ लाई जाती है।</div><div><br></div><div>सदियों पुरानी इस परंपरा का पालन करते हुए मुख्य पुजारी और अन्य लोग एक विशेष धार्मिक यात्रा के तहत भगवान की गद्दी को जोशीमठ लेकर जाते हैं। वहीं इस दौरान श्रद्धालु श्री नरसिंह मंदिर में बद्री विशाल की पूजा और दर्शन कर सकते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 23 Jun 2026 16:49:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-doors-will-be-closed-during-winter-know-why-god-worshipped-in-joshimath</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Famous Temple: Tirupati Balaji Temple के 5 Divine Facts, जिनके आगे विज्ञान भी हैरान, क्या आप जानते हैं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/5-divine-facts-of-tirupati-balaji-temple-which-even-science-surprised-by-do-you-know]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश भर में कई ऐसे फेमस मंदिर हैं, जो अपने अपने आप में कई तरह के रहस्यों को समेटे हुए है। ऐसा ही एक मंदिर आंध्र प्रदेश राज्य के चित्तूर में तिरुमला पर्वत पर बसा तिरुपति बालाजी का मंदिर है। यह भगवान वेंकटेश्वर स्वामी को समर्पित है। तिरुपति बालाजी मंदिर दुनिया के सबसे अमीर और प्रमुख हिंदू तीर्थ स्थलों में से शामिल है। तिरुमला का तिरुपति बालाजी मंदिर अपनी आस्था के अलावा गहरे तथ्यों के लिए भी पूरी दुनिया में विख्यात है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े कुछ रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिरों में बालों का दान</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर में दान करने की अनोखी परंपरा है। यहां पर बालों का दान किया जाता है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के धन और समृद्धि के देवता कुबेर देव जी से उधार लिया था। भगवान विष्णु ने कुबेर देव को वचन दिया था कि कलियुग का जब अंत होगा, तब तक पूरा उधार चुका दिया जाएगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-kamakhya-shaktipeeth-know-why-mother-court-closed-during-ambubachi-fair" target="_blank">Ambubachi Mela 2026: कामाख्या शक्तिपीठ का सबसे बड़ा रहस्य, जानें Ambubachi Fair में क्यों बंद हो जाता है मां का दरबार</a></h3><div><br></div><div>उसी उधार को चुकाने के लिए यहां पर आने वाले श्रद्धालु अपनी मन्नत पूरी होने पर बालों का दान करते हैं। तिरुपति मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा बाल का दान ऋण की किस्त का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>चावल-दही प्रिय भोग</h2><div>दक्षिण भारत का तिरुपति बालाजी मंदिर जहां भगवान विष्णु की पूजा श्रीवेंकटेश्वर स्वामी के रूप में की जाती है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक, इस स्थान को कलयुग में श्रीविष्णु का निज निवास भी माना जाता है।</div><div><br></div><div>मंदिर में आने वाले भक्तों की माने तो यहां मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। बात जब वेंकटेश्वर स्वामी को भोग लगाने की आती है, तब प्रसाद के रूप में लड्डू या छप्पन तरह के पकवान नहीं, बल्कि दही-चावल का भोग लगाया जाता है।</div><div><br></div><h2>मंदिर की प्रतिमा से जुड़े रहस्य</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर की मूर्ति भव्य होने के साथ काफी अहम भी है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक प्रतिमा के पीछे से हमेशा समुद्र की लहरों की आवाजें आती हैं। जिन भी श्रद्धालुओं ने इसको कान लगाकर सुनने की कोशिश की, उनको समुद्र की लहरों की आवाज सुनाई देती है।</div><div><br></div><div>इस मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर को मां लक्ष्मी और भगवान श्रीहरि विष्णु दोनों के ही वस्त्र पहनाए जाते हैं। क्योंकि मूर्ति को मां लक्ष्मी और श्रीविष्णु का अवतार माना जाता है।</div><div><br></div><h2>वेंकटेश्वर स्वामी के असली बाल</h2><div>बता दें कि तिरुपति बालाजी मंदिर में मौजूद भगवान वेंकटेश्वर स्वामी की मूर्ति पर लगे बाल असली हैं। जोकि आपस में बिगड़ते या उलझते नहीं हैं। यह बाल हमेशा काले और चमकदार दिखाई देते हैं। इसके अलावा गर्मी के मौसम में श्री वेंकटेश्वर स्वामी की प्रतिमा को पसीना भी आता है। जोकि काफी रोचक होने के अलावा उनकी मौजूदगी का भी एहसास दिलाता है।</div><div><br></div><h2>चमत्कारी दीपक</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर में हमेशा एक दीपक जलता रहता है। इस दीपक में कभी भी तेल या घी का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। लेकिन इसके बाद भी यह दीपक जलता रहता है। यह दीपक आज भी मंदिर में आने वाले हर भक्त के लिए रहस्य बना हुआ है।</div><div><br></div><div>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक त्रेतायुग में स्वयं भगवान ब्रह्मा ने इस दीपक को जलाया था। तब से यह दीपक बिना किसी रुकावट के लगातार जल रहा है। जिसको अनंत काल का भी प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>मंदिर में रखी छड़ी का रहस्य</h2><div>तिरुपति बालाजी मंदिर के मुख्य द्वार पर दरवाजे के दाईं ओर एक छड़ी है। इस छड़ी को लेकर कई लोक मान्यताएं हैं। माना जाता है कि बाल रूप में इसी छड़ी से बालाजी की पिटाई हुई थी। जिस कारण उनकी ठोड़ी पर चोट लग गई थी। तब से लेकर आज तक हमेशा उनकी ठोड़ी पर चंदन का लेप लगाया जाता है। जिससे कि उनका घाव सही हो जाए।</div><div><br></div><div>तिरुपति बालाजी मंदिर से जुड़े चमत्कारों और रहस्यों का मुख्य स्त्रोत वराह पुराण, स्कंद पुराण, मंदिर के शिलालेख और सदियों से चली आ रही स्थानीय धार्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 22 Jun 2026 10:56:09 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Ambubachi Mela 2026: कामाख्या शक्तिपीठ का सबसे बड़ा रहस्य, जानें Ambubachi Fair में क्यों बंद हो जाता है मां का दरबार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/secret-of-kamakhya-shaktipeeth-know-why-mother-court-closed-during-ambubachi-fair]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत अपनी संस्कृति और कलाओं के साथ-साथ अपनी आध्यात्म और धार्मिक मान्यताओं के लिए जाना जाता है। खासकर हिंदू धर्म में आस्था से जुड़े कई चमत्कार देखने को मिलते हैं। यहां कई ऐसे मंदिर हैं, जो अपना रहस्यों के लिए जाने जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर पूर्वोत्तर भारत के असम में स्थित है, जो कामाख्या देवी मंदिर है और इसको एक दिव्य और चमत्कारी जगह कहा जाता है। हर साल यहां जून के महीने में आध्यात्म, आस्था और रहस्य का अनूठा संगम देखने को मिलता है। जिसको दुनिया 'अंबुबाची मेला' कहती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस बार यह मेला कब शुरू होगा और इस मेले की क्या खासियत है।</div><div><br></div><h2>रहस्यों से भरा मां का दरबार</h2><div>असम के गुवाहाटी शहर की नीलाचल पहाड़ियों पर मां कामाख्या का यह पावन धाम मौजूद है। हिंदू धर्म की सभी 51 शक्तिपीठों में मां कामाख्या मंदिर का सबसे खास और ऊंचा स्थान माना गया है। मंदिर की मान्यता है कि यहां बाकी मंदिरों की तरह किसी देवी की मूर्ति नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it" target="_blank">Famous Temple: Visakhapatnam का अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग जैसे दिखते हैं नरसिंह, जानें इसके पीछे की 'Secret Story'</a></h3><div><br></div><div>मूर्ति की जगह पर यहां एक प्राकृतिक रूप से निर्मित शिला की पूजा होती है। जिसका आकार योनि के समान है। माना जाता है कि देवी सती के योनि का भाग यहां पर गिरा था, जिसके बाद यहां पर शक्तिपीठ बना था।</div><div><br></div><h2>कब लगेगा अंबुबाची मेले</h2><div>अंबुबाची मेला यहां पर होने वाला एक अहम पर्व है। इस मेले से प्राचीन और गहरी धार्मिक मान्यताएं जुड़ी हैं। माना जाता है कि हर साल मेले के दौरान मां कामाख्या अपने मासिक धर्म से गुजरती हैं। इसी वजह से देवी मां को पूरा आराम दिया जाता है और मंदिर के मुख्य कपाट को तीन दिनों के लिए पूरी तरह बंद कर दिया जाता है।</div><div><br></div><div>इन तीन दिनों में मंदिर के अंदर किसी भी तरह का पूजा-पाठ, आरती या अन्य कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं होता है। वहीं चौखे दिन शुद्धिकरण अनुष्ठान करने के बाद ही मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोले जाते हैं। इस साल 22 जून 2026 से अंबुबाची मेले की शुरूआत होने जा रही है, जोकि 26 जून तक चलेगा।</div><div><br></div><div>बता दें कि अंबुबाची मेले से जुड़ी कई मान्यताएं हैं। माना जाता है कि मंदिर का पट बंद करते समय यहां पर एक सफेद कपड़ा रखा जाता है, जोकि 3 दिन बाद मंदिर खुलने पर पूरी तरह से लाल हो जाता है। वहीं प्रसाद के रूप में भक्तों को यही 'अंगवस्त्र' यानी लाल कपड़े का टुकड़ा दिया जाता है। जिसको लोग मां कामाख्य का परम आशीर्वाद मानते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 14:37:18 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Famous Temple: Visakhapatnam का अनोखा मंदिर, जहां शिवलिंग जैसे दिखते हैं नरसिंह, जानें इसके पीछे की 'Secret Story']]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित एक दिव्य मंदिर सिंहाचलम मंदिर है। बता दें कि यहां पर भगवान नरसिंह की मूर्ति से सिर्फ 24 घंटे के लिए 'चंदन की परत' हटाई जाती है। वहीं तभी यह मंदिर दर्शन के लिए खुलता है। इस मंदिर को भगवान नरसिंह का घर कहा जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको मंदिर से जुड़ी कुछ अनोखी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कहां है यह दिव्य धाम</h2><div>आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में सिंहाचलम मंदिर स्थित है। जोकि आस्था और वास्तुकला का एक अद्भुत संगम है। वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर विशाखापट्टनम से करीब 16 किमी दूर है। जोकि सिंहाचल पर्वत की चोटी पर स्थित है। इस वजह से मंदिर को सिंहाचलम मंदिर के नाम से जाना जाता है। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण खुद प्रह्लाद ने कराया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins" target="_blank">Mysterious Temples: Mahabharat काल से जुड़ा है Panch Kedar का रहस्य, यहां दर्शन से मिलती है पापों से मुक्ति</a></h3><div><br></div><h2>चंदन का लेप</h2><div>भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को वीरता और उग्रता का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकश्यपु का वध करने के बाद भगवान नरसिंह का क्रोध बेहद बढ़ गया था। ऐसे में सभी देवताओं को उनको शांत कराने का प्रयास असफल रहा।</div><div><br></div><div>तब भगवान नरसिंह अपने परम भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर शांत हुए और सिंहाचलम पर्वत पर प्रकट हुए थे। भगवान नरसिंह के तेज और उग्रता को कम करने के लिए उनको चंदन से शीतल रखा जाता है। यही वजह है कि वह साल भर तक चंदन से ढके रहते हैं, जिससे उनका स्वरूप सौम्य बना रहे।</div><div><br></div><h2>कब खुलता है मंदिर</h2><div>चंदन की मोटी परत से ढके रहने की वजह से भगवान नरसिंह की मूर्ति शिवलिंग के आकार में दिखती है। वहीं सिर्फ अक्षय तृतीया के मौके पर ही चंदन हटाया जाता है। जिसको 'निजरूप दर्शन' या 'चंदनोत्सव' कहा जाता है। श्रद्धालु इस दिन भगवान के असली विग्रह हो देख पाते हैं।</div><div><br></div><div>ऐसे में इस मंदिर में अक्षय तृतीया के मौके पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। वहीं नरसिंह जयंती के मौके पर यहां श्रद्धालु पहुंचते हैं।</div><div><br></div><h2>जानें मंदिर की खासियत</h2><div>आमतौर पर भगवान नरसिंह के अन्य मंदिरों में आपको उनका उग्र रूप देखने को मिलेगा। लेकिन सिंहाचलम मंदिर में भगवान माता लक्ष्मी के साथ बेहद शांत और सौम्य मुद्रा में विराजमान हैं। अगर मंदिर के वास्तुकला की बात की जाए, तो इस मंदिर में चालुक्य, चोल और कलिंग शैलियों का अद्भुत मिश्रण देखने को मिलेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 20 Jun 2026 11:12:22 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-temple-in-visakhapatnam-where-narasimha-resembles-shivalinga-learn-secret-story-behind-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra: 42 पहिए, बिना धातु का इस्तेमाल, कैसे बनते हैं ये 3 भव्य रथ?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-chariots-an-analysis-of-sacred-design]]></guid>
      <description><![CDATA[<div><span style="font-size: 1rem;">भारत में व्रत, त्योहारों और संस्कृतियों का समावेश है। यहां पर हर एक त्योहार की विशेष खासियत है। विविधताओं से भरा हुआ भारत में कई सारे त्योहारों को उत्साह के साथ मनाया जाता है। ऐसा ही हर साल ओडिशा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक पर्व के रुप में मानी जाती है।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक जरुर पहुंचती हैं। दरअसल, रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण केवल भगवानों के दर्शन तक सीमित नहीं होता है, बल्कि इन विशाल रथों का निर्माण और उनकी अनोखी बनावट भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र माना जाता है। असल में हर साल इन तीनों रथों का निर्माण नए सिरे से किए जाता है। आइए आपको बताते हैं रथ यात्रा के तीनों रथों की अनोखी संरचना के बारे में विस्तार से।</span></div><div><br></div><div><b>कब शुरू होता है जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा के लिए रथों का निर्माण कार्य अक्षय तृतीया से आरंभ किया जाता है, जिसे सनातन परंपरा में बेहद मंगलकारी दिन माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस शुभ तिथि पर शुरू किए गए कार्यों में सफलता और समृद्धि प्राप्त होती है। यही कारण है कि रथ निर्माण की शुरुआत इसी दिन की जाती है। इस पावन अवसर पर वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-अर्चना और हवन के साथ रथ निर्माण का शुभारंभ किया जाता है।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">फिर मंदिर के पुजारी पूजा-अर्चना करके मुख्य कारीगरों को माला अर्पित करते हैं। इसके बाद तीनों रथों का निर्माण एक साथ शुरु किया जाता है और करीब एक ही समय पर पूरा भी किया जाता है। इन तीनों रथों का सबसे जरुरी हिस्सा इसके पहिए होते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथों के लिए कुल 42 पहिए बनाए जाते हैं। इन पहियों को तैयार करने के बाद उन्हें रथ के मुख्य ढांचे में लगाया जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>अलग-अलग तरह से रथों की सजावट होती</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इन रथों की सजावट काफी अलग-अलग होती है। असल में जगन्नाथ रथ यात्रा के रथों की खूबसूरती उनकी कलात्मक सजावट में छिपी होती है। ओडिशा की पारंपरिक मंदिर वास्तुकला से प्रेरित नक्काशी रथों पर की जाती है। रथ की लकड़ी पर उकेरे गए डिजाइन और रंग-बिरंगी पेंटिंग इन रथों की भव्य रुप प्रदान करते हैं। रंथों के ऊपर लगाए जाने वाले विशाल कपड़े के छत्र लाल, पीले, हरे&nbsp; और काले रंगों से सजाया जाता है। इन कपड़ों पर पारंपरिक कढ़ाई की जाती है, जो रथों की सुंदरता को और अधिक बढ़ा देता है।</span></div><div><br></div><div><b>नंदीघोष- भगवान जगन्नाथ का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान जगन्नाथ का रथ नंदीघोष के नाम से प्रसिद्ध है। यह तीनों रथों में सबसे भव्य माना जाता है और इसकी ऊंचाई करीब 45 फीट तक होती है। इस विशाल रथ को 16 बड़े पहियों से सजाया जाता है। रथ पर मुख्य रूप से लाल और पीले रंग का आकर्षक संयोजन देखने को मिलता है। वहीं, इसे आगे बढ़ाने वाले घोड़े सफेद रंग के होते हैं, जो पवित्रता और दिव्यता का प्रतीक माने जाते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>लालध्वज- भगवान बलभद्र का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है। इसकी ऊंचाई भी करीब 45 फीट होती है और इसके 14 पाहिए होते हैं। इस रथ को लाल और हरे रंग से सजाया जाता है। इसके घोड़े काले रंग के होते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>दर्पदलन- देवी सुभद्रा का रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन या देबदलन होता है। इसकी ऊंचाई करीब 44 फीट 6 इंच होती है। वहीं, इसमें 12 पहिए होते हैं। रथ का प्रमुख रंग लाल और काला होता है। इसे खींचने के लिए घोड़े का रंग लाल होता है।</span></div><div><br></div><div><b>बिना कील के बनाया जाता है रथ</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इन रथ की सबसे खास बात यह है कि इनमें किसी भी प्रकार का धातु इस्तेमाल नहीं होता है बल्कि इनमें केवल लड़कियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके निर्माण में लकड़ी के हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए खांचे और लकड़ी की खूंटियों का इस्तेमाल किया जाता है। जिससे इसकी सरचना और भी खूबसूरत बन जाती है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 19 Jun 2026 17:51:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jagannath-rath-yatra-chariots-an-analysis-of-sacred-design</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Mysterious Temples: Mahabharat काल से जुड़ा है Panch Kedar का रहस्य, यहां दर्शन से मिलती है पापों से मुक्ति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में पंचकेदार की तीर्थयात्रा को बेहद पवित्र माना जाता है। पंच केदार की यात्रा को मन, शरीर और आत्मा की शुद्धि का एक आध्यात्मिक मार्ग माना गया है। पंच केदार उत्तराखंड के गढ़वाल हिमालय में स्थित है। पंच केदार की उत्पत्ति महाभारत काल की एक कथा से जुड़ी है। पौराणिक कथा के मुताबिक कुरुक्षेत्र के युद्ध के बाद पापों से छुटकारा पाने के लिए पांडव हिमालय पहुंचे। लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे। जिस कारण महादेव पांडवों को दर्शन नहीं देना चाहते थे। इसलिए भगवान शिव बैल का रूप धारण करके धरती में लुप्त हो गए।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि मुताबिक जब भगवान शिव बैल रूप में धरती में समाए तो उनके शरीर के अलग-अलग हिस्से हिमालय के पांच अलग-अलग स्थानों पर प्रकट हुए। इन्हीं 5 स्थानों पर पांडवों द्वारा भगवान शिव की पूजा की गई। जिसको पंच केदार के नाम से जाना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको पंच केदार और इसके महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple" target="_blank">Somnath Mandir की अद्भुत कहानी: जब चंद्रमा को मिला श्राप, Lord Shiva ने ऐसे की रक्षा</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>केदारनाथ</h2><div>पंचकेदार में केदारनाथ मंदिर सबसे प्रमुख माना जाता है। यहां पर बैल रूपी अवतार की पीठ का हिस्सा प्रकट हुआ था। केदारनाथ को आस्था का बड़ा केंद्र माना जाता है और हर साल भारी संख्या में श्रद्धालु केदारनाथ मंदिर आते हैं। यहां पर भगवान शिव की पूजा करने से जातक को पापों से मुक्ति मिलती है और शुभ फल की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>तुंगनाथ</h2><div>धार्मिक मान्यता के अनुसार तुंगनाथ में भगवान शिव का हाथ प्रकट हुआ था। यह मंदिर सबसे ऊंचाई पर स्थित है। पांडवों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए तुंगनाथ मंदिर का निर्माण किया जाता है। माना जाता है कि यहां पर भगवान शिव के दर्शन से व्यक्ति को मन की शांति मिलती है।</div><div><br></div><h2>रुद्रनाथ</h2><div>रुद्रनाथ में भगवान शंकर का मुख प्रकट हुआ था। यहां पर भगवान शिव की पूजा नीलकंठ के रूप में की जाती है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक इस मंदिर में साधना करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><h2>मध्यमहेश्वर</h2><div>मध्यमहेश्वर में भगवान शिव की नाभि प्रकट हुई थी। पांडवों ने महादेव की आराधना की थी। इसको शांति और मोक्ष का केंद्र माना जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक जो भी भक्त मध्यमहेश्वर मंदिर में स्थित भगवान शिव की पूजा करता है। उसके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और भगवान शिव की कृपा प्राप्त करता है।</div><div><br></div><h2>कल्पेश्वर</h2><div>बता दें कि जहां पर कल्पेश्वर मंदिर है, उसी स्थान पर भगवान शिव की जटाएं प्रकट हुई थीं। कल्पेश्वर एक मात्र ऐसा केदार है, जिसके कपाट भक्तों के लिए पूरे साल खुले रहते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 18 Jun 2026 12:36:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-panch-kedar-linked-to-mahabharata-period-visit-here-liberates-one-from-sins</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Somnath Mandir की अद्भुत कहानी: जब चंद्रमा को मिला श्राप, Lord Shiva ने ऐसे की रक्षा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>गुजरात के पश्चिम−दक्षिण छोर पर सागर के तट पर स्थित पाटन जिसे प्रभासपात्तन भी कहा जाता है में स्थित है सोमनाथ मंदिर। यहां भगवान शिव का स्वयंभू ज्योतिर्लिंग है। यह भारत के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख है। स्कन्दपुराण के प्रभासखण्ड में सोमनाथ की महिमा निरूपित है। प्रभासपाटन की चार वस्तुएं प्रसिद्ध हैं− नदी, नारी, अश्व तथा भगवान सोमनाथ का दर्शन। स्कन्दपुराण के अनुसार, दक्ष प्रजापति की 27 पुत्रियां थीं। उन सबके पति चन्द्रमा थे। इनमें रोहिणी सर्वाधिक सुन्दरी होने के कारण चन्द्रमा को अत्यधिक प्रिय थी। चन्द्रमा सदैव उसी के साथ रहते थे। उपेक्षित पत्नियों ने चन्द्रमा की शिकायत दक्ष प्रजापति से की।</div><div><br></div><div>दक्ष के समझाने पर चन्द्रमा ने समस्त पत्नियों के साथ एक−सा व्यवहार करने का वचन दिया, लेकिन उनकी रोहिणी के प्रति आसक्ति पूर्व की भांति बनी रही। वे अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते ही रहे। दुखी पत्नियां पुनः अपने पिता दक्ष के पास पहुंचीं और उन्हें अपनी व्यथा−कथा तथा उपेक्षा से परिचित कराया। दक्ष प्रजापति चन्द्रमा पर कुपित हो उठे। अत्यधिक क्रोधित होकर उन्होंने चंद्रमा को शाप दे दिया कि तू निस्तेज हो जाएगा और क्षयरोग से पीड़ित रहेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit" target="_blank">Hanuman Garhi Temple: Ayodhya में क्यों है हनुमान गढ़ी का इतना महत्व? जानें Lord Ram के दर्शन से जुड़ा ये रहस्य</a></h3><div>चन्द्रमा शक्तिहीन तथा निस्तेज होते गये। उनकी कांति मलिन हो गई। संसार में अंधेरा छाने लगा। चन्द्रमा की बीमारी से पशु, पक्षी, मनुष्य तथा देवता सभी चिंतित हो गये। देवताओं ने दक्ष से चन्द्रमा को शापमुक्त करने का निवेदन किया। दक्ष का क्रोध अभी तक शांत नहीं हुआ था, अतष्ः उन्होंने चंद्रमा को शाप से मुक्त नहीं किया। निर्बल तथा कांतिहीन चन्द्रमा ने दक्ष से वचनभंग करने के लिए क्षमा मांगी। दक्ष ने उनसे कहा कि तुम प्रभासपाटन जाकर शिव की आराधना करो। केवल वे ही तुम्हें निरोग कर सकते हैं।</div><div><br></div><div>चन्द्रमा ने प्रभासपाटन जाकर अनेक वर्षों तक शिवजी की आराधना की। चन्द्रमा की तपस्या से प्रसन्न होकर शिवजी ने कहा कि मैं तुम्हें पूर्ण शक्ति तो नहीं दे सकता, लेकिन महीने में पंद्रह दिनों तक तुम नित्य बढ़ते रहोगे तथा शेष पंद्रह दिनों में तुम्हारी शक्ति का क्रमशः नित्य क्षय होता रहेगा। कृतज्ञता प्रकट करते हुए चन्द्रमा ने प्रभासपाटन में स्वर्ण का मंदिर निर्माण करने का संकल्प लिया। ब्रह्माजी ने प्रभासपाटन में भूमि कुरेदी तो वहां कागदी नींबू के आकार का एक शिवलिंग स्वयं प्रकट हो गया। उस स्थान को दूध तथा मधु से ढककर उप पर ब्रह्मशिला रखी गई। उस पर ब्रह्मा के निर्देशों के अनुसार चन्द्रमा तथा उनकी प्रिय पत्नी रोहिणी ने शिवलिंग की स्थापना की।</div><div><br></div><div>भागवत, महाभारत आदि में अनेक स्थानों पर प्रभासपाटन का उल्लेख है। यहीं प्राची, सरस्वती, कपिला तथा हिरण्या नदियों का संगम हुआ है। यहीं यदुवंशियों का पारस्परिक युद्ध द्वारा संहार हुआ था। इसके निकट ही बालक तीर्थ है। इस स्थान पर पेड़ के नीचे लेटे हुए श्रीकृष्ण के तलुवे में भील का प्राणघातक तीर लगा था। यह स्थान देहोत्सर्ग कहलाता है। इसी स्थान के निकट बलरामगुका है। श्रीकृष्ण के भाई शेषावतार बलराम अपना कार्य पूरा कर इसी गुफा द्वारा पाताललोक गये थे।</div><div><br></div><div>-शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 17 Jun 2026 18:00:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-amazing-story-of-somnath-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Garhi Temple: Ayodhya में क्यों है हनुमान गढ़ी का इतना महत्व? जानें Lord Ram के दर्शन से जुड़ा ये रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देश भर में हनुमान जी को समर्पित कई मंदिर है। इस मंदिरों का अपना विशेष महत्व है। इन्हीं मंदिरों में अयोध्या का हनुमान गढ़ी मंदिर शामिल है। यह मंदिर आस्था का केंद्र है और एक ऊंचे टीले पर स्थित है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है। हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी के दर्शन करने के बाद ही रामलला के दर्शन का शुभ फल प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक हनुमान जी इस मंदिर में रक्षक के रूप में वास करती है।</div><div><br></div><div>हनुमान गढ़ी मंदिर में आने पर भक्तों को खास ऊर्जा और शांति का अनुभव होता है। किसी खास मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हनुमान गढ़ी मंदिर से जुड़े रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles" target="_blank">Rahu Ketu Temples: Rahu-Ketu के प्रकोप से हैं परेशान? India के इन 6 मंदिरों में दर्शन से मिलेगा हर संकट से छुटकारा</a></h3><div><br></div><h2>पौराणिक कथा</h2><div>पौराणिक कथा के मुताबिक भगवान श्रीराम ने रावण की लंका पर विजय प्राप्त की और जब अयोध्या वापस आए, तो प्रभु श्रीराम, माता सीता और भाई लक्ष्मण के आने का उत्साह मनाया जा रहा था। भगवान श्रीराम का राज्याभिषेक हुआ और राम जी ने सभी को विदा किया। लेकिन हनुमान जी अयोध्या को छोड़कर नहीं जाना चाहते थे।</div><div><br></div><h2>राम जी ने दी हनुमान जी को ये जगह</h2><div>हनुमानजी की भक्ति और प्रेम से प्रसन्न होकर भगवान श्रीराम ने हनुमान जी को अयोध्या में रहने के लिए एक जगह दी। यह स्थान एक ऊंचे टीले पर मौजूद थी। जहां पर हनुमान गढ़ी मंदिर को बनाया गया था। धार्मिक मान्यता के मुताबिक ऊंचे टीले पर होने के कारण हनुमान जी को यहां से पूरी अयोध्या नगरी दिखती थी। राम जी ने रहने के लिए यह स्थान देते हुए हनुमान को यह वचन दिया कि अयोध्या मेरा दर्शन तब तक पूरा नहीं माना जाएगा, जब तक की हनुमान गढ़ी के दर्शन नहीं किए जाएंगे।</div><div><br></div><h2>मनोकामनाएं होती हैं पूरी</h2><div>इस प्रसंग का वर्णन स्कंद पुराण में देखने को मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी के दर्शन मात्र से भक्तों के सभी पाप नष्ट होते हैं और उनकी हर मनोकामना पूरी होती है। वहीं व्यक्ति को हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। हनुमान गढ़ी मंदिर में हनुमान जी को चोला अर्पित करने से सभी दोष की समस्या से छुटकारा मिलता है।</div><div><br></div><div>हनुमान गढ़ी मंदिर में माता अंजनी की गोद में बाल हनुमान की प्रतिमा विराजमान है। इस मंदिर में दर्शन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। वहीं यूपी सरकार की ऑफिशियल वेबसाइट के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण राजा विक्रमादित्य द्वारा कराया गया है। इस मंदिर तक पहुंचने के लिए भक्तों को 76 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 16 Jun 2026 16:02:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-hanuman-garhi-so-important-in-ayodhya-learn-this-secret-related-to-lord-ram-visit</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Ujjain में Mahakal के पास है यह Special शक्तिपीठ, जहां दर्शन से हर मनोकामना होती है पूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-special-shaktipeeth-located-near-mahakal-in-ujjain-where-every-wish-fulfilled-by-visiting-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर मां सती के शक्तिपीठ हैं। मां सती के अंगों से 51 शक्तिपीठ बने, जिसमें उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर भी शामिल है। हरसिद्ध माता मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास स्थित है। नवरात्रि या किसी खास मौके पर मंदिर में भव्य नजारा देखने को मिलता है। ज्यादा संख्या में भक्त हरसिद्ध माता मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हरसिद्ध माता मंदिर से जुड़ी कथा और कई महत्वपूर्ण जानकारी देने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर</h2><div>धार्मिक मान्यता के मुताबिक जिस-जिस स्थान पर माता सती के शरीर के अंग गिरे थे, वह सभी स्थान शक्तिपीठ में बदल गए। जिस स्थान पर देवी सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी, उस स्थान पर हरसिद्ध माता मंदिर बना। यह मंदिर शक्ति का केंद्र माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles" target="_blank">Rahu Ketu Temples: Rahu-Ketu के प्रकोप से हैं परेशान? India के इन 6 मंदिरों में दर्शन से मिलेगा हर संकट से छुटकारा</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>कथा</h2><div>उज्जैन के पवित्र स्थलों में शामिल हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर में महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्ति विराजमान है। इन मूर्ति के बीच में मां अन्नपूर्णा की मूर्ति है। इसके अलावा मंदिर में श्रीयंत्र भी स्थापित है। जिसके विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शिव पुराण के मुताबिक जब भगवान शिव मां सती के जलते हुए शरीर को उठाकर जा रहे थे। तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। मां सती की दाहिनी कोहनी इस स्थान पर गिरी थी। जिसके बाद यहां पर हरसिद्धि माता शक्तिपीठ बना।</div><div><br></div><div>स्कंद पुराण में बताया गया है कि कैसे देवी चंडी हरसिद्धि की उपाधि मिली। पौराणिक कथा के मुताबिक जब भगवान शिव और मां पार्वती एक साथ कैलाश पर एकांत में थे, तो उस दौरान दो राक्षसों में शिव-पार्वती के पास आने की कोशिश की। उन राक्षसों के नाम चंड और मुंड थे। महादेव ने राक्षसों को मारने के लिए देवी चंडी को बुलाया और देवी चंडी ने राक्षसों का अंत किया। इससे भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उनको 'सब पर विजय पाने वाली' की उपाधि प्रदान की।</div><div><br></div><div>बता दें कि मराठा काल के समय इस मंदिर का पुनर्निर्माण किया गया था। मंदिर में दो स्तंभ हैं और रोजाना शाम को इन स्तंभों पर दीपक जलाए जाते हैं। इस दौरान मंदिर का दिव्य और भव्य नजारा देखने को मिलता है। मंदिर में दर्शन और पूजन के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 15 Jun 2026 12:36:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-special-shaktipeeth-located-near-mahakal-in-ujjain-where-every-wish-fulfilled-by-visiting-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rahu Ketu Temples: Rahu-Ketu के प्रकोप से हैं परेशान? India के इन 6 मंदिरों में दर्शन से मिलेगा हर संकट से छुटकारा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ज्योतिष शास्त्र में राहु और केतु को भी उतना ही महत्वपूर्ण ग्रह हैं, जिनके की अन्य ग्रह हैं। राहु-केतु ग्रह को छाया ग्रह माना जाता है और इनको जीवन में अचानक होने वाले बदलाव, भ्रम और कर्मों के सबक के लिए जिम्मेदार माना जाता है। वहीं इन दोनों ग्रहों को आध्यात्मिक विकास और आत्म साक्षात्कार की तरफ बढ़ने वाली शक्तिशाली ताकतों के रूप में भी पूजा जाता है। देशभर में राहु-केतु से जुड़े 6 ऐसे मंदिर हैं, जहां पर भक्त इन स्थानों पर आकर अपने ग्रहीय प्रभावों को कम करने के लिए धार्मिक अनुष्ठानों का भी आयोजन करते हैं।</div><div><br></div><h2>श्री कालहस्तीश्वर मंदिर</h2><div>आंध्र प्रदेश के तिरुपति जिले में श्रीकालहस्तीश्वर में स्थित है। यह मंदिर देश के सबसे पूजनीय शैव तीर्थों में शामिल है। यहां पर भगवान शंकर को कालहस्तीश्वर के रूप में पूजा जाता है। जोकि वायु का प्रतिनिधित्व करते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-these-5-mistakes-during-ekadashi-fast-otherwise-lord-vishnu-may-get-angry" target="_blank">Ekadashi Rules: एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, Lord Vishnu हो सकते हैं नाराज</a></h3><div><br></div><div>इस मंदिर को राहु-केतु क्षेत्र के रूप में भी जाना जाता है। जिस कारण से स्थानीय इसको दक्षिण कैलाशम भी कहते हैं। धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर में दर्शन करने से राहु-केतु से जुड़े दोष कम होते हैं।</div><div><br></div><h2>तिरुनागेश्वरम नागनाथर मंदिर</h2><div>तिरुनागेश्वर नागनाथर मंदिर तमिलनाडु में स्थित है। इसको राहु स्थलम के नाम से भी जाना जाता है। तिरुनागेश्वरम नागनाथर मंदिर तमिलनाडु के कुंभकोणम के नजदीक एक पूजनीय शिव मंदिर है। स्थानीय लोग यहां पर भगवान शिव को नागनाथ और मां पार्वती को पिरैसूदी अम्मन के रूप में पूजते हैं।</div><div><br></div><div>नवग्रह स्थलों में शामिल यह स्थान राहु ग्रह का प्रतिनिधित्व करता है। मंदिर में चार गोपुरम, कई मंदिर और हॉल बने हैं। जिनमें सबसे ज्यादा आकर्षक नायक काल में बना भव्य अलंकृत हॉल शामिल है।</div><div><br></div><h2>श्री नागनाथस्वामी केथु मंदिर</h2><div>श्री नागनाथस्वामी केथु मंदिर तमिलनाडु के कीझापेरुमपल्लम में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव के नागनाथ स्वामी के रूप में समर्पित है। यह मंदिर समतल, साधारण और राजगोपुरम और दो प्रकारम है। यहां पर रोजाना सुबह 6 बजे से 8:30 बजे तक दिन में 4 बार पूजा होती है। वहीं महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में भीड़ रहती है।</div><div><br></div><h2>राहु केतु मंदिर</h2><div>तेलंगाना में स्थित राहु-केतु मंदिर अपने शांत वातावरण के लिए जाना जाता है। देश भर से भक्त यहां पर आते हैं और राहु-केतु से जुड़े दोषों के निदान के लिए धार्मिक अनुष्ठान करवाते हैं। मंदिर का शांत वातावरण इन ग्रहों के नकारात्मक प्रभाव को कम करता है और आध्यात्मिक रूप से यह मंदिर खास स्थान प्रदान करता है।</div><div><br></div><h2>श्री नीलकंडेश्वर मंदिर</h2><div>चेन्नई के गेरुगमबक्कम में श्री नीलकंडेश्वर मंदिर स्थित है। यहां पर भगवान शंकर को नीलकंडेश्वरार के रूप में पूजा जाता है। वहीं मां पार्वती की पूजा मां कामाक्षी के रूप में होती है। मंदिर में केतु को समर्पित एक मंदिर है। जहां पर केतु से जुड़े दोषों से छुटकारा पाने के लिए अनुष्ठान किया जाता है।</div><div><br></div><h2>राहु मंदिर</h2><div>उत्तराखंड के ऊंचे पहाड़ों के बीच राहु मंदिर है। राहु को समर्पित यह मंदिर अपने अनुष्ठानिक महत्व और खुले वातावरण के लिए जाना जाता है। यहां के सौम्य और शांत वातावरण में भक्त ध्यान करते हैं। वहीं राहु के अशुभ दोषों को कम करने के लिए अनुष्ठानों में हिस्सा लेते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 13 Jun 2026 11:13:26 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/troubled-by-wrath-of-rahu-and-ketu-visiting-6-temples-in-india-provide-relief-from-all-troubles</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mysterious Temple: Uttarakhand का Kasar Devi Temple, जहां Van Allen Belt की शक्ति के आगे Science भी फेल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/kasar-devi-temple-in-uttarakhand-where-even-science-fails-in-front-of-power-of-van-allen-belt]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देवभूमि के नाम से फेमस उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक, सुंदरता और अनोखी परंपराओं के लिए जाना जाता है। यहां कई ऐसे मंदिर हैं, जहां पर देश-विदेश से भक्त दर्शन के लिए आते हैं। लेकिन आज हम आपको उत्तराखंड में मौजूद एक ऐसे मंदिर के रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां लोग दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं। अल्मोड़ा का कसार देवी मंदिर अपनी अनोखी चुंबकीय शक्ति के लिए काफी ज्यादा लोकप्रिय है।</div><div><br></div><div>इस मंदिर में भक्तों के अलावा वैज्ञानिकों भी आते हैं और इसके पीछे का रहस्य जानने के लिए के लिए। लेकिन माना जाता है कि आज तक कोई भी इस मंदिर से जुड़े चमत्कार के पीछे का असल कारण कोई पता नहीं लगा पाया। तो आइए जानते हैं इस रहस्यमयी मंदिर के बारे में...&nbsp;</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-only-sabarimala-temple-there-no-entry-for-women-in-these-temples-too-reason-surprise" target="_blank">Famous Temple: Sabarimala Temple ही नहीं, इन मंदिरों में भी महिलाओं की 'No Entry', वजह कर देगी हैरान</a></h3><div><br></div><h2>इन मशहूर हस्तियों ने किया दर्शन</h2><div>उत्तराखंड के अल्मोड़ा में स्थित कसार देवी मंदिर में स्वामी विवेकानंद ध्यान-योग के लिए आए थे। तब से यह मंदिर भक्तों के बीच काफी फेमस है। स्वामी विवेकानमद को यह जगह इतनी पसंद आई थी कि उन्होंने अपने लेखन में भी इस मंदिर का जिक्र किया था। इस मंदिर की महिमा इतनी विशाल है कि यहां पर जॉर्ज हैरिसन, बॉब डायलन, एलन गिन्सबर्ग, कैट स्वीवंस और टिमोथी जैसी शख्सियत आ चुकी हैं। साल 1970 में यह जगह हिप्पी हिल बन गई थी।</div><div><br></div><h2>क्यों फेमस है मंदिर</h2><div>इस मंदिर के बारे में कहा जाता है कि यहां पर देवी मां साक्षात अवतार में आई थीं। माना जाता है कि यह भारत की एकमात्र ऐसी जगह है, जहां चुंबकीय पिंड है। वैज्ञानिकों की मानें, तो कसार देवी मंदिर के आसपास का एरिया वैन एलेन बेल्ट है। जहां धरती के भीतर भू-चुंबकीय पिंड है।</div><div><br></div><div>कसार देवी मंदिर से कई शक्तियां जुड़ी हैं। जिसके बारे में पता लगाने नासा के वैज्ञानिक भी आए थे। लेकिन उनको इसके पीछे का रहस्य नहीं पता चला और वैज्ञानिकों को खाली हाथ लौटना पड़ा। इस क्षेत्र के आसपास के लोगों को यहां पर मानसिक शांति मिलती है।</div><div><br></div><h2>ऐतिहासिक महत्व</h2><div>यहां के स्थानीय लोगों के बीच कसार देवी मंदिर का बड़ा ऐतिहासिक महत्व है। यह मंदिर पवित्र तीर्थ स्थलों में शामिल है। हर साल कार्तिक माह की पूर्णिमा के मौके पर कसार देवी मंदिर में मेला लगता है। जिसमें हजारों की संख्या में लोग शामिल होते हैं। माना जाता है कि इस मेले का महत्व सिर्फ देश ही नहीं बल्कि विदेश से आए श्रद्धालुओं के बीच भी है।</div><div><br></div><div>कसार देवी मंदिर में भक्त अक्सर मानसिक शांति और गहन साधना के लिए यहां आते हैं। यहां के नजारे और हरियाली आपको मानसिक शांति और अंदर से तरोताजा कर देंगी। कसार देवी मंदिर बिनसर वाइल्ड लाइफ सेंचुरी के काफी ज्यादा करीब है। यहां पर हर प्रजाति के पक्षी देख सकते हैं। गहन ध्यान और साधना वाले लोगों की यह जगह आज भी पहली पसंद बनी है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 15:35:33 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/kasar-devi-temple-in-uttarakhand-where-even-science-fails-in-front-of-power-of-van-allen-belt</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kedarnath के 'रक्षक' हैं भैरव बाबा, इनके दर्शन के बिना अधूरी मानी जाती है तीर्थ यात्रा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-a-20-min-bhairav-temple-visit-at-kedarnath-is-key]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हर एक शिवभक्त का सपना होता है कि एक दिन केदारनाथ धाम जरुर जाएं। अक्सर देखा जाता है कि लोग केदारनाथ बाबा के दर्शन तो कर लेते हैं, लेकिन काल भैरव के दर्शन करके नहीं आते हैं। माना जाता है कि इससे आपकी यात्रा अधूरी रह जाती है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए केदारनाथ मंदिर आस्था का केंद्र है, लेकिन कई लोग आस-पास स्थित खास जगहों के बारे में कम ही जानते हैं। हर साल लाखों लोग देश-विदेश से केदारनाथ के दर्शन करने जाते हैं, लेकिन काल भैरव के दर्शन करना भूल ही जाते हैं। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि काल भैरव मंदिर कैसे जाएं और यह कहां पर स्थित है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>केदारनाथ में काल भैरव मंदिर कहां पड़ता है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब हम केदारनाथ मंदिर जाते हैं, तो यह वहां से ज्यादा दूर नहीं हैं। केदारनाथ से करीब 1 किमी की दूरी पर स्थित है यह मंदिर। यहां पहुंचने के लिए कोई वाहन नहीं जाता है, इसलिए इस मंदिर में जाने के लिए पैदल ही यात्रा करनी पड़ती है। यहां पहुंचने के लिए आपको करीब 15 से 20 मिनट की चढ़ाई करनी पड़ेगी। रास्ता काफी छोटा है, लेकिन चढ़ाई के कारण यहां समय लग जाता है।</span></div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>कब जाना अच्छा है?</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस बात का ध्यान रखें कि यहां जाने के लिए आपको केदारनाथ की तरह पालकी ले जाने की जरुरत नहीं है। वहीं, हेलीकॉप्टर भी तक यहां तक नहीं जाता, दूरी कम है, इसलिए आपको पैदल ही सफर करना होगा। आप यहां सुबह 6 बजे से शाम 7 बजे तक दर्शन करके लौट आएं। वैसे यहां पर भीड़ कम होती है और सूर्यास्त के समय केदारनाथ घाटी का नजारा और सुंदर भी हो जाता है। ध्यान रखें कि, रात के समय यहां पर न जाएं, क्योंकि रास्ते में लाइट नहीं होने के कारण आपको परेशानी हो सकती है। दिन के समय में ही दर्शन करना अच्छा है।</span></div><div><br></div><div><b>श्रद्धालु कैसे दर्शन करने जाते हैं</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;- भक्तजन पहले केदारनाथ जाते हैं और इसके बाद होटल या धर्मशाला में अपना सामान रख देते हैं।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- केदारनाथ बाबा के दर्शन करने के बाद काल भैरव जाएं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- जितना हो सके समय रहते हुए नीचे आ जाए, क्योंकि होटल आपको नीचे ही मिलेगा।</div><div><br></div><div>&nbsp;- वैसे काल भैरव के पास कोई भी होटल नहीं है, इसलिए आपको नीचे आना होगा।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;">यात्री इस बात का ध्यान रखें कि केदारनाथ यात्रा से पहले केदारनाथ मंदिर आता है, इसके बाद काल भैरव मंदिर आता है। केदारनाथ धाम के पीछे जा रहे रास्ते पर चढ़कर काल भैरव मंदिर पहुंचाना होता है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 14:15:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-a-20-min-bhairav-temple-visit-at-kedarnath-is-key</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Sabarimala Temple ही नहीं, इन मंदिरों में भी महिलाओं की 'No Entry', वजह कर देगी हैरान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-only-sabarimala-temple-there-no-entry-for-women-in-these-temples-too-reason-surprise]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आपको जानकर हैरानी होगी कि कुछ मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश करना वर्जित माना जाता है। प्राचीन मान्यताओं, लोक परंपराओं और सदियों पुरानी रीति-रिवाजों की वजह से कुछ मंदिरों में महिलाओं का प्रवेश वर्जित माना जाता है। यह मंदिर सिर्फ पूजा स्थल ही नहीं बल्कि अपने आप में सदियों पुरानी भक्ति, शक्ति और रहस्यों से भरी कहानियों को समाहित किए हुए हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको देश के 5 ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर आज भी महिलाओं के प्रवेश पर नो एंट्री है।</div><div><br></div><h2>सबरीमाला मंदिर</h2><div>केरल का सबरीमाला मंदिर भारत के सबसे फेमस तीर्थ स्थलों में से एक है। जहां भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य से जुड़ी सदियों पुरानी मान्यताओं की वजह से महिलाओं के प्रवेश की मनाही है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-these-5-mistakes-during-ekadashi-fast-otherwise-lord-vishnu-may-get-angry" target="_blank">Ekadashi Rules: एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, Lord Vishnu हो सकते हैं नाराज</a></h3><div><br></div><div>केरल का यह मंदिर दुनियाभर में भक्तों को अपनी ओर आकर्षित करता है। 41 दिनों का उपवास के दौरान जो भी भक्त उनकी गहन शक्ति और अनुशासन को दर्शाता है। हालांकि इस मामलों को लेकर कानूनी लड़ाई जारी है। लेकिन फिर भी आध्यात्मिक परंपरा मजबूत बनी है।</div><div><br></div><h2>शनि शिंगणापुर मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र का शनि शिंगणापुर मंदिर भगवान शनि देव को समर्पित है। यहां पर गर्भ गृह में महिलाओं को प्रवेश की अनुमति नहीं है। क्योंकि मान्यताओं के मुताबिक शनि की शक्तिशाली ऊर्जा महिलाओं पर अलग तरह से असर दिखा सकती है।</div><div><br></div><div>शनि शिंगणापुर मंदिर अपनी चमत्कारी कहानियों को लेकर फेमस है। इन कहानियों में चोरी की गई चीजों को लौटाने वाले चोरों की कहानियां भी शामिल हैं।</div><div><br></div><h2>गुरुवायूर मंदिर</h2><div>केरल का एक और गुरुवायूर मंदिर भगवान श्रीकृष्ण को समर्पित है। यहां पर मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के लिए कड़े नियम हैं।</div><div><br></div><div>परंपराओं के मुताबिक महिलाओं को कुछ गर्भ गृह में प्रवेश नहीं करने दिया जाता है। जोकि अनुष्ठानिक पवित्रता में सदियों पुरानी मान्यताओं को दर्शाता है। श्रद्धालु इसको दैवीय निर्देश मानते हैं। जोकि भेदभाव की जगह आध्यात्मिकता पर आधारित है।</div><div><br></div><h2>कोटिलिंगेश्वर मंदिर</h2><div>कर्नाटक का कोटिलिंगेश्वर मंदिर लाखों शिवलिंग के लिए फेमस है। सदियों पुरानी परंपराओं के अनुसार, आध्यात्मिक एनर्जी को सुरक्षित करने की परंपरा के तहत खास पर्व-त्योहारों के दौरान मंदिर के कुछ आंतरिक क्षेत्रों में महिलाओं को जाने की मनाही है। यह मंदिर ध्यान, गहरी भक्ति और तपस्या का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>मूकाम्बिका मंदिर</h2><div>कर्नाटक का मूकाम्बिका मंदिर कोडाचाद्री पहाड़ियों पर बसा है। यह मंदिर मूकाम्बिका देवी को समर्पित है। इस मंदिर की ऐतिहासिक परंपराओं के मुताबिक कुछ आयु वर्ग की महिलाओं को पारंपरिक रूप से मंदिर के कुछ हिस्सों में प्रवेश की अनुमति नहीं देता है।</div><div><br></div><div>नवरात्रि और अन्य त्योहारों के दौरान हजारों की संख्या में तीर्थयात्री इस मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं। जोकि अनुशासन, आस्था और आध्यात्मिक ज्ञान का प्रतीक है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 12 Jun 2026 11:57:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-only-sabarimala-temple-there-no-entry-for-women-in-these-temples-too-reason-surprise</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ekadashi Rules: एकादशी व्रत में भूलकर भी न करें ये 5 गलतियां, Lord Vishnu हो सकते हैं नाराज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-these-5-mistakes-during-ekadashi-fast-otherwise-lord-vishnu-may-get-angry]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में सभी तिथियों में एकादशी तिथि का विशेष महत्व माना जाता है। एकादशी तिथि जगत के पालनहार भगवान विष्णु को समर्पित है। एकादशी को किया गया व्रत, जप, तप व ध्यान का विशेष महत्व होता है। धार्मिक शास्त्रों को मुताबिक एकादशी का व्रत करने से सांसारिक जीवन की सभी समस्याओं से मुक्ति मिलती है। वहीं इस व्रत के प्रभाव से जातक जीवन-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो जाता है और अंत में बैकुंठ धाम को प्राप्त करता है।</div><div><br></div><div>धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक एकादशी तिथि पर कुछ कार्यों को करने से बचना चाहिए। अगर आप इस तिथि को कोई वर्जित कार्य करते हैं, तो आपको कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि एकादशी तिथि को कौन से कार्य भूलकर भी नहीं करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-how-offer-perfume-to-hare-ka-sahara-learn-3-surefire-rules-of-khatu-shyam-temple" target="_blank">Shyam Baba Puja: 'हारे का सहारा' को ऐसे लगाएं इत्र की अर्जी, जानें Khatu Shyam Temple के 3 अचूक नियम</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>एकादशी तिथि पर न करें ये काम</h2><div>एकादशी तिथि को रात में नहीं सोना चाहिए। क्योंकि यह तिथि पुण्यदायी होती है और इस रात भगवान विष्णु के भजन गाने चाहिए, मंत्र या आरती सुननी चाहिए। भगवान विष्णु की प्रतिमा के सामने बैठकर पूरी रात जागकर आदि करना चाहिए। ऐसा करने से भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।</div><div><br></div><div>एकादशी तिथि को भूलकर भी चावल का सेवन नहीं करना चाहिए। एकादशी के दिन चावल खाने वाला व्यक्ति अगले जन्म में रेंगने वाली योनि में जन्म लेता है। वहीं अगर आप द्वादशी तिथि को चावल खाते हैं, तो आपको इस योनि से मुक्ति मिल जाती है।</div><div><br></div><div>इस पावन तिथि को दातुन या मंजन करना वर्जित माना गया है। वहीं इस दिन क्रोध करना, चुगली करना, झूठ बोलना और दूसरों की बुराई करना आदि चीजों से बचना चाहिए। ऐसे लोगों को परिवार बल्कि पूरे समाज में सम्मान नहीं मिलता है और पाप के भागी बनते हैं।</div><div><br></div><div>एकादशी तिथि को तुलसी के पत्ते नहीं तोड़ने चाहिए। शास्त्रों में इसको वर्जित माना गया है। वहीं द्वादशी तिथि को जब पारण करें, तो तुलसी के पत्ते से ही करना चाहिए। लेकिन एकादशी तिथि को तुलसी की पत्ती नहीं तोड़ना चाहिए।</div><div><br></div><div>एकादशी तिथि को चना दाल, उड़द दाल, गोभी, मसूर दाल, गाजर, शलजम, पालक का साग आदि का सेवन नहीं करना चाहिए। वहीं इस दिन शारीरिक और मानसिक रूप से किए जाने वाले बुरे कर्मों से बचना चाहिए।</div><div><br></div><div>एकादशी तिथि के दिन चोरी करना, हिंसा करना, पान खाना, मैथुन, क्रोध करना, स्त्रीगमन और कपट आदि चीजों से बचना चाहिए। वहीं अगर इस तिथि पर कोई गलती हो जाए, तो आपको उसके लिए माफी मांगनी चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 10 Jun 2026 17:01:28 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/not-make-these-5-mistakes-during-ekadashi-fast-otherwise-lord-vishnu-may-get-angry</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shyam Baba Puja: 'हारे का सहारा' को ऐसे लगाएं इत्र की अर्जी, जानें Khatu Shyam Temple के 3 अचूक नियम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-how-offer-perfume-to-hare-ka-sahara-learn-3-surefire-rules-of-khatu-shyam-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>बाबा खाटू श्याम के भक्तों के बीच इत्र अर्पित करने की एक बेहद पावन और गहरी मान्यता है। इत्र को सकारात्मकता, प्रेम और पूर्ण समर्पण का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि अगर सही विधि से बाबा श्याम को 'इत्र की अर्जी' लगाई जाए, तो हारे के सहारे बाबा श्याम अपने भक्तों की मनोकामना फौरन पूरी कर देते हैं। लेकिन क्या आप बाबा खाटू श्याम को इत्र चढ़ाने के सही तरीके के बारे में जानते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इसके बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>बाबा श्याम को इत्र चढ़ाने का तरीका</h2><div>अक्सर बाबा के दरबार में अर्पित करने के लिए कई भक्त इत्र की तीन शीशियां लेकर आते हैं। जिसके पीछे बेहद सुंदर भाव छिपा है। जिसके मुताबिक पहली शीशी बाबा के दरबार में अपनी अर्जी लगाने के लिए चढ़ाई जाती है। दूसरी शीशी अपनी मनोकामना पूरी होने के प्रार्थना के साथ बाबा श्याम को धन्यवाद देने के लिए होता है। वहीं तीसरी शीशी की बात की जाए, तो जब मनोकामना पूरी हो जाती है, तो शीशी श्याम बाबा को आभार प्रकट करते हुए भोग के रूप में भेंट की जाती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-how-the-first-ekadashi-fast-started-what-its-divine-vrat-katha" target="_blank">Ekadashi Vrat: जानिए कैसे हुई पहले एकादशी व्रत की शुरुआत, क्या है इसकी Divine Vrat Katha</a></h3><div><br></div><div>जब आप बाबा श्याम के मंदिर में दर्शन के लाइन में लगे हों, तो पुजारी के जरिए तीनों शीशियों को बाबा श्याम के चरणों या विग्रह के पास अर्पित करवाएं। जब सेवादार इत्र अर्पित करे, तो हाथ जोड़कर बाबा के सामने अपनी अर्जी लगाएं। अपने मन में समस्या या फिर मनोकामना को स्पष्ट रूप से कहें। पुजारी जी प्रसाद के रूप में उन तीनों शीशियों में से कोई एक शीशी या थोड़ा सा इत्र आपको वापस कर देंगे। इस इत्र को अपने घर ले जाएं, फिर इस शीशी को तब अर्पित करें, जब आपकी समस्या हल हो जाए, या मनोकामना पूरी हो जाए।</div><div><br></div><h2>ध्यान रखें ये बातें</h2><div>बता दें कि बाबा श्याम को खुशबू काफी प्रिय है। लेकिन बाबा को इत्र अर्पित करते समय कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना जरूरी है, जिससे आपको पूजा का पूरा फल मिल सके।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक बाबा श्याम को गुलाब और केसर दोनों इत्र अधिक प्रिय हैं। इसलिए हमेशा असली और शुद्ध इत्र का चुनाव करना चाहिए।</div><div><br></div><div>इत्र को हमेशा बाबा श्याम के चरणों में स्पर्श कराएं। या फिर फूलों की माला या गजरे पर रुई के फोहे की मदद से इत्र अर्पित करें।</div><div><br></div><h2>जानिए इत्र अर्पित करने के नियम</h2><div>अगर आप घर पर बाबा श्याम की पूजा में इत्र अर्पित कर रहे हैं, तो कभी बाबा के शीश पर सीधे तौर पर इत्र नहीं लगाना चाहिए। हमेशा अपने दाहिने हाथ की अनामिका उंगली से ही इत्र को स्पर्श कराना चाहिए। दीपक जलाने के बाद ही बाबा श्याम को इत्र सेवा देनी चाहिए। ऐसा करने से घर में पॉजिटिव एनर्जी का प्रवाह तेजी से बढ़ता है। साथ ही इत्र हमेशा सीमित मात्रा में अर्पित करना चाहिए। क्योंकि इत्र लगाने से फूलों की अपनी प्राकृतिक महक दब जाती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 09 Jun 2026 16:37:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/this-how-offer-perfume-to-hare-ka-sahara-learn-3-surefire-rules-of-khatu-shyam-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ekadashi Vrat: जानिए कैसे हुई पहले एकादशी व्रत की शुरुआत, क्या है इसकी Divine Vrat Katha]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-how-the-first-ekadashi-fast-started-what-its-divine-vrat-katha]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन धर्म में सभी व्रतों में एकादशी व्रत का बड़ा महत्व बताया जाता है। साल में पूरी 24 एकादशी आती है। जिनमें देव प्रबोधनी, देवशयनी और मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का बड़ा महत्व होता है। इस एकादशी को उत्पन्ना एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि उत्पन्ना एकादशी से ही एकादशी व्रत की शुरूआत हुई थी। क्योंकि सतयुग में इसी एकादशी तिथि को जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के शरीर से देवी का जन्म हुआ था। इसी देवी ने भगवान विष्णु के प्राण बचाए और जिससे प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने इनको एकादशी का नाम दिया था।</div><div><br></div><div>धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक जो भी व्यक्ति उत्पन्ना एकादशी के दिन पर व्रत करता है, भगवान विष्णु संग देवी एकादशी की पूजा करता है। तो उसके कई जन्मों के पाप कट जाते हैं। वहीं व्यक्ति उत्तम लोग में स्थान पाने का अधिकारी बन जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhar-bhojshala-700-year-wait-over-after-asi-report-chants-of-praise-now-resonate" target="_blank">Dhar Bhojshala का 700 साल पुराना इंतजार खत्म, ASI रिपोर्ट के बाद अब गूंजेंगे स्तुति मंत्र</a></h3><div><br></div><h2>उत्पन्ना एकादशी व्रत कथा</h2><div>मुर नामक असुर से युद्ध करते हुए जब श्रीविष्णु थक गए, तो वह बद्रीकाश्रम में गुफा में जाकर विश्राम करने लगे। लेकिन मुर असुर श्रीहरि विष्णु का पीछा करते हुए बद्रीकाश्रम पहुंच गया। वहां पर निद्रा में लीन विष्णु को जब मुर ने लात मारना चाहा, तो श्रीहरि विष्णु के शरीर से एक देवी का जन्म हुआ और उन देवी ने मुर का वध कर दिया।</div><div><br></div><div>देवी के कार्य से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने कहा कि हे देवी ! तुम्हारा जन्म मार्गशीर्ष मास की कृष्ण पक्ष की एकादशी को हुआ है। इस कारण तुम्हारा नाम एकादशी होगा। वहीं आज से एकादशी को मेरे साथ तुम्हारी भी पूजा होगी। वहीं जो भी व्यक्ति एकादशी का व्रत करेगा, वह सभी पापों से मुक्त हो जाएगा।</div><div><br></div><div>मार्गशीर्ष माह की कृष्ण पक्ष की एकादशी को एकादशी देवी का अवतार हुआ था। इसलिए सभी एकादशी में इसका बड़ा महत्व माना जाता है। यह एकादशी भगवान श्रीविष्णु की माया से प्रकट हुई थी। धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक जो भी व्यक्ति पूरे श्रद्धाभाव से उत्पन्ना एकादशी का व्रत करता है, वह मोहमाया के प्रभाव से मुक्त हो जाता है और उसमें छल-कपट की भावना कम हो जाती है। वहीं एकादशी व्रत के प्रभाव से जातक विष्णु लोक में स्थान पाने योग्य बन जाता है।</div><div><br></div><h2>व्रत विधि</h2><div>जो भी लोग इस व्रत को करना चाहते हैं, उनको एकादशी पर सुबह उठकर स्वच्छ होकर भगवान विष्णु के साथ देवी एकादशी की पूजा-अर्चना करना चाहिए। वहीं पूरा दिन निराहार रहकर संध्या पूजन करनी चाहिए और फलाहार करना चाहिए। इस दौरान मन में छल-कपट, लालच, परनिंदा और द्वेष की भावना मन में नहीं लाना चाहिए। वहीं द्वादशी के दिन ब्राह्मणों को भोजन और यथा संभव दान के बाद भी पारण करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 08 Jun 2026 11:32:04 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-how-the-first-ekadashi-fast-started-what-its-divine-vrat-katha</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Dhar Bhojshala का 700 साल पुराना इंतजार खत्म, ASI रिपोर्ट के बाद अब गूंजेंगे स्तुति मंत्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhar-bhojshala-700-year-wait-over-after-asi-report-chants-of-praise-now-resonate]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सनातन के विराट, विशद वैभव का गुणगान करती धार की भोजशाला सदियों से जिस पल की प्रतीक्षा कर रही थी, वह आखिरकार आ ही गया। यह प्रतीक्षा सिर्फ धार नगरी के निवासियों की नहीं बल्कि कटक से लेकर लद्दाख और लक्षद्वीप से लेकर समस्त भारत वर्ष भी को भी थी। यह प्रतीक्षा उन लोगों को भी थी, जो अपनी आराध्य मां वाग्देवी के मंदिर को लेकर स्वप्न संजोए थे। </div><div>&nbsp;</div><div>वहीं करीब 700 वर्षों के कालखंड में परमार वंश के प्रतापी राजा भोज की आराध्य वाग्देवी का यह मंदिर कई आक्रमण झेलकर आज भी प्रसन्न है। इसने पहले विदेशी आक्रांताओं से अपनी धरोहर की रक्षा की और फिर इसके स्वामित्व के लिए लड़ी गई लंबी कानूनी लड़ाई के बाद मिली इस विरासत की गाथा कम रोमांचक नहीं है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-the-goddess-menstruates-learn-divine-secret-of-ambubachi-mela" target="_blank">Ambubachi Mela 2026: जब रजस्वला होती हैं देवी, जानें Ambubachi Mela का Divine रहस्य</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>सनातन के स्तंभ</h2><div>परमार वंश के प्रतापी राजा भोज एक उद्भट विद्वान थे। उन्होंने 1010 से 1055 ईस्वी तक शासन किया। वहीं 1034 ईस्वी में राजा भोज ने भोजशाल का निर्माण कराया था। कला और संस्कृति के उपासक राजा भोज ने धारा नगरी को कला और शिक्षा की राजधानी के रूप में विकसित किया था।</div><div><br></div><div>राजा भोज ने नालंदा और तक्षशिला की तरह यहां पर भी संस्कृत विश्वविद्यालय स्थापित किए। जहां देश-दुनिया के शोधार्थी, विद्वान और बटुक वेद-उपनिषदों के गूढ़ रहस्यों का अध्ययन करते थे। इससे पूर्वाभिमुख बहुमंजिला आयताकार भवन में विशाल सभा मंडप, सैंकड़ों नक्काशीदार कक्ष और स्तंभ थे। लेकिन विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण के बाद भोजशाला का मुख्य प्रसाद, जहां पर कभी वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित थी, वह ही शेष बचा है।</div><div><br></div><div>बता दें कि परिसर में मौजूद 188 स्तंभ गवाही देते हैं कि कितनी मुश्किलें सहकर भी सनातन के गौरव को संभाले रखा। एमपी हाईकोर्ट के आदेश के बाद जब ASI के सर्वे में इन स्तंभों पर जमी धूल हटी, तो यहां का हर स्तंभ नई गाथा सुनाता नजर आया। परमारकालीन अद्भुत वास्तु शिल्प भोजशाला में मौजूद स्तंभों में नजर आता है।</div><div><br></div><h2>यहां स्तुति मंत्र सुनाती हैं दीवारें&nbsp;&nbsp;</h2><div>भोजशाला के मुख्यद्वार से अंदर प्रवेश करते ही आपकी निगाहें बरबस ही काले पाषाण पर उत्कीर्ण प्राकृत और संस्कृत भाषा में लिखे शब्दों पर टिक जाएंगी। एक्सपर्ट बताते हैं कि यह पारिजात मंजरी नाट्य को लिपिबद्ध कर लगाया गया था।</div><div><br></div><div>तो वहीं कुछ पत्थरों पर मां सरस्वती के मंत्र और महादेव व श्रीराम का भी उल्लेख मिलता है। तो वहीं कुछ पत्थरों पर धारा नगरी के नगर नियोजन से जुड़ी जानकारी दर्ज मिलती है। दीवारों पर राजा भोज द्वारा बनवाए गए सिद्धि यंत्र और कालसर्प स्पष्ट नजर आते हैं। राजा भोज ने धार में 84 चौराहों का निर्माण कराया था। वहीं भोजशाला में 84 अलग-अलग यंत्र बनवाए गए थे।</div><div><br></div><h2>700 वर्ष बाद तैयार हवनकुंड</h2><div>भोजशाला परिसर के ठीक बीचोबीच में विशाल हवनकुंड है। इस हवन कुंड के निर्माण की तकनीकी को देखकर यह पता चलता है कि हमारा प्राचीन ज्ञान-विज्ञान कितना समृद्ध था। कुंड गणितीय माप के मुताबिक है, मंडर का आकार और कुंड का आकार आहुतियों की संख्या पर और आहुतियों की संख्या अनुष्ठान पर निर्भर करती थी।</div><div><br></div><div>यज्ञकुंड में बड़ी मात्रा में घी के लिए भी व्यवस्था की गई थी। हर साल वसंत पंचमी के मौके पर राजा भोज भव्य आयोजन करते थे, जिसमें सरस्वती यज्ञ सबसे महत्वपूर्ण होता था। इस दौरान 500 महाविद्वान और कविगणों से सज्जित राजा भोज का राजदरबार इस उत्सव में शामिल होकर आहुतियां देता था। वहीं 1305 में अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के बाद से अब यह हवनकुंड मानो फिर से आहुतियों के लिए तैयार हो रहा है।</div><div><br></div><h2>धार की धरोहर</h2><div>परमार काल विज्ञान, ज्ञान, कला, स्थापत्य और संस्कृति के क्षेत्र में काफी ज्यादा उन्नत था। वाग्देवी की प्रतिमा जिस स्थान पर विराजमान थी, वहां गुंबद की नक्काशी चमत्कृत कर देती है। अष्टमल की और उसके आसपास की रचनाएं भी काफी मोहक हैं। इसके एक हिस्से में कई चक्रों की नक्काशी बनी है। भोजशाला के पूर्व उत्तर क्षेत्र के पास कमाल मौला मस्जिद भी नजर आती है। इस परिसर के भीतर सरस्वती कूप भी है, जिसको अकल कूप भी कहा जाता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>बताया जाता है कि इसके निर्माण में धातु विज्ञान और शिलाओं के एक्सपर्ट की सहायता ली गई थी। इस सरस्वती कूप पर 14 कोणीय संरचनाएं बनी हैं। यहां पर छात्र पढ़ाई करते थे, हालांकि अब भी इस कूप से जलधाराएं प्रवाहित होती हैं।</div><div><br></div><h2>मंदिर है भोजशाला</h2><div>एएसआई द्वारा 98 दिन किए गए सर्वे के बाद एमपी हाईकोर्ट में 24 दिन नियमित सुनवाई हुई। वहीं 15 मई को कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा, 'मंदिर ही भोजशाला है' तो इस फैसले से सालों से प्रतीक्षा कर रहे लोगों की आत्मा झंकृत हो उठा।</div><div><br></div><div>कोर्ट ने भोजशाला में पूजा के सीमित अधिकार को समाप्त कर दिया और पूरे साल दर्शन-पूजन की अनुमति दे दी। पूरे परिसर को मंदिर घोषित करते हुए कहा, यहां पूजा की परंपरा कभी खत्म नहीं हुई। यहां पर मिले साक्ष्य और स्थापत्य इसको राजा भोजकालीन सरस्वती मंदिर सिद्ध करते हैं। कोर्ट ने ASI के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसमें हर शुक्रवार को भोजशाला परिसर में नमाज पढ़ने की अनुमति दी गई थी।</div><div><br></div><h2>वाग्देवी की प्रतीक्षा</h2><div>बता दें कि मां सरस्वती का 'शारदा सदन' कहलाने वाली भोजशाला में निर्बाध पूजा की अनुमति मिल गई। जिसके बाद अब लोगों को वाग्देवी की दुर्लभ प्रतिमा की प्रतीक्षा है। जोकि साल 1875 में अंग्रेजों द्वारा लंदन ले जाई गई थी। इस प्रतिमा का निमार्ण करीब 1034 ईस्वी में करवाया गया था।</div><div><br></div><div>वहीं 128.5 सेमी ऊची और करीब 250 किमी वजनी यह प्रतिमा धार क्षेत्र के भग्नावशेषों के बीच से मिली थी। अब लोगों को उस पल की प्रतीक्षा है, जब लंदन से मां वाग्देवी की प्रतिमा को लाकर दिव्य और भव्य 'सरस्वती लोक' के गर्भगृह में स्थापित किया जाएगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 06 Jun 2026 10:33:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhar-bhojshala-700-year-wait-over-after-asi-report-chants-of-praise-now-resonate</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ambubachi Mela 2026: जब रजस्वला होती हैं देवी, जानें Ambubachi Mela का Divine रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-the-goddess-menstruates-learn-divine-secret-of-ambubachi-mela]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>असम के गुवाहाटी स्थित प्रसिद्ध कामाख्या देवी मंदिर में हर साल अंबुबाची मेला लगता है। जोकि देश के सबसे आध्यात्मिक और रहस्यमयी मेलों में गिना जाता है। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु, तांत्रिक, साधु-संत और पर्यटक इस पर्व का हिस्सा बनते हैं। बता दें कि इस मेले से एक प्राचीन रहस्य जुड़ा है। कामाख्या मंदिर को भारत के प्रमुख शक्तिपीठों में से एक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जहां-जहां पर मां सती के शरीर के अंग गिरे थे, वहां शक्तिपीठों की स्थापना हुई। इन्हीं शक्तिपीठों में कामाख्या देवी मंदिर भी शामिल है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको अंबुबाची मेले के रहस्य और इसकी डेट के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>साल 2026 में कब लगेगा अंबुबाची मेला</h2><div>प्राप्त जानकारी के मुताबिक 22 जून 2026 की रात से अंबुबाची मेला की शुरूआत होगी। इस दौरान मेले के लिए मंदिर के कपाट 22 जून को बंद किए जाएंगे। फिर 25 जून को विशेष शुद्धिकरण और अनुष्ठान के बाद दर्शन के लिए मंदिर के कपाट खोले जाएंगे। वहीं मेले का समापन 26 जून 2026 की सुबह माना जा रहा है। इस तीन दिनों तक मंदिर में सामान्य पूजा-पाठ बंद रहती है। भक्त मंदिर के बाहर जप, साधना और ध्यान आदि करते हैं। फिर चौथे दिन मां के 'शुद्धि स्नान' के बाद श्रद्धालुओं को विशेष प्रसाद बांटा जाता है, जिसको अंगोदक और अंगवस्त्र कहा जाता है। इस विशेष प्रसाद को बेहद शुभ और चमत्कारी माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-why-ukhimath-winter-seat-of-baba-kedar-where-he-worshipped-for-six-months" target="_blank">Kedarnath Dham: जानें Ukhimath क्यों है बाबा केदार की Winter Seat, यहीं होती है 6 महीने पूजा</a></h3><div><br></div><h2>मेले से जुड़ा रहस्य</h2><div>इस मेले से जुड़ी सबसे रहस्यमयी मान्यताओं में से एक ब्रह्मपुत्र नदी के जल का हल्का लाल दिखना है। भक्तों का विश्वास है कि यह परिवर्तन मां कामाख्या के रजस्वला होने का प्रतीक है। इसको देवी कामाख्या की दिव्य शक्ति का संकेत माना जाता है। इस वजह से इस अवधि को बेहद पवित्र और शक्तिशाली माना जाता है। लेकिन वैज्ञानिक दृष्टि से देखा जाए, तो वैज्ञानिक खनिज तत्वों, मिट्टी और मानसून के दौरान पानी में आने वाले प्राकृतिक बदलावों को बताते हैं। लेकिन इसके बाद भी श्रद्धालुओं के लिए यह घटना सिर्फ प्राकृतिक नहीं बल्कि मां कामाख्य की अलौकिक उपस्थिति और आशीर्वाद का प्रतीक है।</div><div><br></div><h2>आस्था की भीड़</h2><div>इस मेले में हर साल लाखों लोग शामिल होते हैं। यही वजह है कि प्रशासन काफी पहले से इस मेले की तैयारियों में लग जाता है। सरकार ने साल 2026 में लगने वाले मेले की तैयारियां भी अभी शुरू कर दी हैं। वहीं इस मेले के लिए सुरक्षा व्यवस्था, भीड़ प्रबंधन और नए मार्गों की योजना पर काम किया जा रहा है। जिससे कि इस मेले में शामिल होने वाले भक्तों को किसी तरह की परेशानी का समाना न करना पड़े।</div><div><br></div><div>जो लोग तंत्र साधना, आध्यात्मिक अनुभव और भारतीय संस्कृति की अनोखी परंपराओं को बेहद करीब से देखना चाहते हैं। तो उनके लिए अंबुबाची मेला एक अद्भुत अनुभव साबित हो सकता है।&nbsp;</div><div>अंबुबाची मेला सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं बल्कि स्त्री शक्ति और प्रकृति के सम्मान का जीवंत संदेश भी देता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 04 Jun 2026 16:37:48 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-the-goddess-menstruates-learn-divine-secret-of-ambubachi-mela</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kedarnath Dham: जानें Ukhimath क्यों है बाबा केदार की Winter Seat, यहीं होती है 6 महीने पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-why-ukhimath-winter-seat-of-baba-kedar-where-he-worshipped-for-six-months]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंग और उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। सर्दियों में बाबा 6 महीनों तक भक्तों को दर्शन नहीं देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इन 6 महीनों में बाबा केदार की पूजा कहां होती है और उनका दूसरा घर कहां है। केदारनाथ मंदिर 12 ज्योतिर्लिंगों में से हैं और उत्तराखंड के चार धामों में से एक है। शीलकाल में बाबा भक्तों को दर्शन नहीं देते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इन 6 महीनों में बाबा केदार की पूजा कहां होती है और उनका दूसरा निवास कहां है।</div><div><br></div><h2>बाबा केदार के द्वार हो जाते हैं बंद</h2><div>शीतकाल में बर्फबारी की वजह से बाबा केदार के द्वार बंद कर दिए जाते हैं। क्योंकि यहां पर इतनी ज्यादा बर्फ पड़ती है कि मंदिर तक पहुंच पाना और आध्यात्मिक गतिविधियों को कर पाना मुश्किल होता है। पहाड़ पर बसे होने की वजह से सर्दियों में ऑक्सीजन की भी कमी हो जाती है। इसलिए बाबा केदार को दूसरा स्थान दिया जाता है, जिसका नाम ऊखीमठ है। ऊखीमठ को भगवान केदार का शीतकालीन घर कहा जाता है। केदारनाथ के कपाट बंद होने के बाद बाबा केदार की चलविग्रह पंचमुखी डोली कई जगहों से होकर यहां आती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-shivalinga-of-kedarnath-triangular-this-mythological-story-related-to-pandavas" target="_blank">Kedarnath Mystery: क्यों त्रिभुजाकार है केदारनाथ का शिवलिंग? पांडवों से जुड़ी है ये पौराणिक कथा</a></h3><div><br></div><h2>बाबा केदार का शीतकालीन मंदिर</h2><div>ऊखीमठ में मौजूद ओंकारेश्वर मंदिर को दूसरा केदारनाथ कहा जाता है। सर्दियों में भी दूर-दूर से भक्त बाबा के दर्शन के लिए आते हैं। आने वाले समय में बाबा ऊखीमठ से ही श्रद्धालुओं को दर्शन देंगे। इस मंदिर की बनावट भी केदारनाथ मंदिर से काफी मिलता है। प्रमुख मंदिर की बनावट केदारनाथ मंदिर जैसी है। लेकिन मंदिर का प्रांगण बड़ा है, मंदिर प्रांगण में सुंदर नक्काशी मंदिर की दीवारें सजी हैं। वहीं 6 महीने के बाद शुभ मुहूर्त में फिर से बाबा को केदारनाथ के लिए रवाना कर दिया जाता है।</div><div><br></div><h2>देवताओं के बदलते हैं स्थान</h2><div>सर्दी के मौसम में सिर्फ बाबा केदार ही नहीं बल्कि गंगोत्री, यमुनोत्री और बद्रीनाथ भगवान भी अपना स्थान बदलते हैं। गंगोत्री धाम को मुखवा, यमुनोत्री को खरसाली और बाबा ब्रदीनाथ को पांडुकेश्वर और ज्योर्तिमठ में स्थापित किया जाता है। बर्फबारी के दौरान चारों धाम को उनके दूसरे घर पर विराजमान किया जाता है।</div><div><br></div><h2>चमत्कारी दीया</h2><div>बता दें कि केदारनाथ मंदिर के कपाट बंद होने के बाद मंदिर में 6 महीने तक पूजा-पाठ नहीं होती है। लेकिन फिर भी इस मंदिर के अंदर लगातार 6 महीने तक एक चमत्कारी दीपक जलता रहता है। मंदिर में उस दीपक के लिए कोई व्यवस्था नहीं होती है, लेकिन इसके बाद भी वह दीपक लगातार जलता रहता है। अपने आप दीपक जलने के पीछे का रहस्य आज तक बना हुआ है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 03 Jun 2026 15:29:27 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-why-ukhimath-winter-seat-of-baba-kedar-where-he-worshipped-for-six-months</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kedarnath Mystery: क्यों त्रिभुजाकार है केदारनाथ का शिवलिंग? पांडवों से जुड़ी है ये पौराणिक कथा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-shivalinga-of-kedarnath-triangular-this-mythological-story-related-to-pandavas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शिव पुराण में 12 ज्योतिर्लिंग का उल्लेख मिलता है, जिनको द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है। भगवान शिव को समर्पित ज्योतिर्लिंग देश के अलग-अलग जगहों पर स्थापित हैं। ज्योतिर्लिंगों को भगवान शिव की शक्ति का केंद्र माना जाता है। वहीं 12 ज्योतिर्लिंगों में केदारनाथ भी शामिल है। केदारनाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग का आध्यात्मिक महत्व बेहद अनोखा है। केदारनाथ मंदिर में शिवलिंग त्रिकोणीय आकार का है। यह एक विशाल चट्टान का हिस्सा है, जिसको स्वयंभू माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि केदारनाथ का शिवलिंग त्रिभुजाकार क्यों है।&nbsp;</div><div><br></div><h2>त्रिभुजाकार शिवलिंग</h2><div>पौराणिक कथा के मुताबिक महाभारत के युद्ध के बाद पांडवों को अपने कुल के लोगों की हत्या करने के बाद पछतावा हुआ। पांडव मृत्यु के पाप से छुटकारा पाना चाहते थे। इसलिए पांडव भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते थे, लेकिन भगवान शिव पांडवों से नाराज थे, जिस कारण उनको दर्शन नहीं देना चाहते थे। पांडवों से भगवान शिव रुष्ट थे, इसलिए पांडवों से बचने के लिए महादेव ने बैल का रूप धारण किया। लेकिन भीम बेहद शक्तिशाली थे। भीम ने भगवान शिव को पहचान लिया।</div><div><br></div><div>जब महादेव भीम से बचने के लिए धरती में समाने लगे, तो भीम ने शिव को पकड़ने की कोशिश की। बैल का पूरा हिस्सा धरती में धस गया, लेकिन पीठ का हिस्सा वहीं रह गया, आज वही त्रिकोणीय शिवलिंग भगवान शिव के रूप में पूजा जाता है।</div><div><br></div><div>केदारनाथ मंदिर विशाल पठार के बीच में बना है। 8वीं शताब्दी में जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने केदारनाथ मंदिर का निर्माण कराया था। वहीं मंदिर के मुख्य द्वार पर नंदी बैल की एक विशाल प्रतिमा मौजूद है, इस मंदिर का शिवलिंग त्रिदेवों का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>दूर-दूर से आते हैं श्रद्धालु</h2><div>केदारनाथ में शिवलिंग के दर्शन के लिए दूर-दूर से श्रद्धालु यहां पर आते हैं। वहीं मंदिर में दर्शन करने से भक्तों के मन को शांति मिलती है। स्कंद पुराण के केदारखंड में केदारनाथ के त्रिभुजाकार शिवलिंग के बारे में वर्णन मिलता है। इस बार 22 अप्रैल से केदारनाथ मंदिर की यात्रा शुरू हो गई है। वहीं मंदिर के कपाट नवंबर तक खुले रहेंगे।</div><div><br></div><div>बता दें कि केदारनाथ के अलावा भगवान शिव के अंग अलग-अलग जगहों पर प्रकट हुए, जिनको आज पंचकेदार के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><div>पंचकेदार</div><div>केदारनाथ&nbsp;</div><div>तुंगनाथ</div><div>रुद्रनाथ</div><div>मदमहेश्वर</div><div>कल्पेश्वर</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 02 Jun 2026 14:09:45 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-shivalinga-of-kedarnath-triangular-this-mythological-story-related-to-pandavas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Naimisharanya Mystery: UP की वो जगह जहां Kaliyug की 'No Entry', जानें क्या है पौराणिक कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/that-place-in-up-where-there-no-entry-during-kaliyuga-know-mythological-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>कलियुग चारों युगों में आखिरी युग है। कलियुग की अवधि अन्य तीनों युगों से सबसे कम मानी गई है। वेद पुराण के मुताबिक कलियुग में लालच, अधर्म, हिंसा और अज्ञानता की अधिकता रहेगी। उत्तर प्रदेश में स्थित नैमिषारण्य को एक बेहद पवित्र हिंदू तीर्थ स्थल माना गया है। नैमिषारण्य तीर्थ स्थल को लेकर धार्मिक मान्यता है कि अभी तक इस स्थान पर कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको नैमिषारण्य के महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।<span style="font-size: 1rem; color: inherit; font-family: inherit;">&nbsp;</span></div><div><br></div><h2>जानें कहां स्थित है नैमिषारण्य</h2><div>बता दें कि यूपी के सीतापुर जिले में गोमती नदी के तट पर नैमिषारण्य तीर्थ स्थित है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक यह वही स्थान है, जहां पर अभी तक कलियुग का प्रवेश नहीं हुआ है। यानी की नैमिषारण्य कलियुग के प्रभाव से पूरी तरह मुक्त है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/a-unique-frog-temple-in-up-where-lord-shiva-rides-frogs-not-nandi" target="_blank">Famous Mandir: UP का अनोखा 'Frog Temple', यहां नंदी नहीं मेंढक हैं भोलेनाथ की सवारी, जानिए पूरा रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>पवित्र है ये स्थान</h2><div>कथा के मुताबिक महाभारत के युद्ध के बाद साधु-संत कलियुग की शुरूआत को लेकर काफी चिंतित थे। तब उन्होंने सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी से मदद मांगी और ऐसे स्थान के बारे में पूछा, जो कलियुग के प्रभाव से हमेशा मुक्त रहे। तब ब्रह्माजी ने अपना 'मनोमय चक्र' छोड़ा और कहा कि जहां भी यह चक्र रुकेगा, वह स्थान कलियुग के प्रभाव से मुक्त रहेगा। ब्रह्माजी का चक्र नैमिष वन में आकर रुका, जिसके बाद साधु-संतों ने इस स्थान को अपनी तपोभूमि बना ली।</div><div><br></div><h2>जानिए नैमिषारण्य का महत्व</h2><div>महाभारत समेत कई ग्रंथों में नैमिषारण्य का जिक्र एक घने जंगल के तौर पर मिलता है। जिसको नीमषार या नैमिष के नाम से भी जाना जाता है। यह हिंदुओं के सभी तीर्थों में सबसे पवित्र और पहला तीर्थ स्थान माना जाता है। नैमिषारण्य का संबंध ब्रह्माजी, भगवान विष्णु, देवी सती और महादेव से माना जाता है। यहां पर 33 कोटि देवी-देवताओं का निवास भी माना जाता है। इसके दर्शन के बाद ही चार धाम यात्रा पूरी मानी जाती है।</div><div><br></div><div>माना जाता है कि अगर कोई इस पवित्र भूमि पर 12 वर्षों तक तपस्या करता है, तो उसको ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है। यह जगह विशेष रूप से 84 कोस परिक्रमा के लिए फेमस है। जिसकी शुरूआत फाल्गुम माह की अमावस्या के बाद होती है। इसके अलावा नैमिषारण्य में हनुमान गढ़ी, ललिता देवी मंदिर, व्यास गद्दी और चक्रतीर्थ जैसे प्रमुख स्थान मौजूद हैं।</div><div><br></div><h2>घटनाएं</h2><div>नैमिषारण्य में 88 हजार ऋषियों ने तपस्या की थी। इस कारण इसको तपोभूमि भी कहा जाता है।</div><div><br></div><div>भगवान श्रीराम ने इसी स्थान पर अपना अश्वमेध यज्ञ पूरा किया था।</div><div><br></div><div>माना जाता है कि ब्रह्माजी का चक्र इसी स्थान पर गिरा था।</div><div><br></div><div>लोक कल्याण के लिए ऋषि दधीचि ने इसी स्थान पर देवराज इन्द्र को अपनी अस्थियां दान की थीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 30 May 2026 14:04:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/that-place-in-up-where-there-no-entry-during-kaliyuga-know-mythological-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Mandir: UP का अनोखा 'Frog Temple', यहां नंदी नहीं मेंढक हैं भोलेनाथ की सवारी, जानिए पूरा रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/a-unique-frog-temple-in-up-where-lord-shiva-rides-frogs-not-nandi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे तो दुनियाभर में भगवान शिव के कई प्राचीन, अद्भुत और विशाल मंदिर स्थापित हैं। इस शिव मंदिरों को लेकर अपनी-अपनी मान्यताएं प्रचलित हैं। ऐसे में आज हम आपको उत्तर प्रदेश के एक अनोखे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं, जोकि वास्तुकला की दृष्टि से बहुत अनोखा है। यह अपनी तरह का एक मात्र मंदिर है। वहीं सावन और महाशिवरात्रि के पावन मौके पर इस मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। इसलिए आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको 'मेंढक मंदिर' के नाम से जाने वाले इस अद्भुत मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>जानिए कहां है मंदिर</h2><div>उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी जिले के ओयल कस्बे में नर्मदेश्वर महादेव मंदिर स्थित है। यह मंदिर लखीमपुर-सीतापुर मार्ग पर लखीमपुर से करीब 12 की दूरी पर स्थित है। एक विशाल मेंढक की आकृति वाले चबूतरने पर मंदिर विराजमान है। जिस वजह से इसको 'मेंढक मंदिर' कहा जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vishnu-sahasranaam-divine-solution-to-every-problem-in-life-reciting-it-give-miraculous-benefits" target="_blank">Chanting Benefits: Life की हर मुश्किल का Divine Solution है विष्णु सहस्त्रनाम, पाठ से मिलेंगे चमत्कारी लाभ</a></h3><div><br></div><h2>मंदिर का निर्माण</h2><div>साल 1860-1870 के बीच ओयल रियासत के राजा बख्श सिंह ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था। इसके पीछे एक कथा प्रचलित है, जिसके मुताबिक चाहमाना वंश के राजा बख्श सिंह के राज में भयंकर सूखा अकाल पड़ गया था।</div><div><br></div><div>राजा भोलेनाथ के भक्त थे और राजा ने एक तांत्रिक की सलाह पर 'मंडूक तंत्र' के आधार पर इस मंदिर का निर्माण मेंढक के आकार में कराया था। इस मंदिर के निर्माण का उद्देश्य बाढ़-सूखे से क्षेत्र की रक्षा करना था। ऐसे में ओयल कस्बे में स्थित नर्मदेश्वर महादेव मंदिर को सुख-समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।</div><div><br></div><h2>मुख्य विशेषताएं</h2><div>नर्मदेश्वर महादेव मंदिर अपनी अनूठी वास्तुकला के लिए जाना जाता है, जोकि राजस्थानी वास्तुकला पर आधारित है। मंदिर एक विशाल मेंढक की आकृति के ऊपर बना है। जिसके ऊपर भोलेनाथ का मंदिर है।</div><div><br></div><div>भोलेनाथ नंदी पर नहीं बल्कि मेंढक की पीठ पर बैठे हैं और यहां पर मेंढक की पूजा की जाती है।</div><div><br></div><div>अन्य शिव मंदिरों में नंदी को बैठी हुई मुद्रा में देखा होगा, वहीं इस मंदिर में नंदी खड़ी मुद्रा में नजर आते हैं, जोकि अपने आप में अनूठा है।</div><div><br></div><div>नर्मदेश्वर मंदिर मांडुक तंत्र पर आधारित है।</div><div><br></div><div>इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग नर्मदा नदी से लाया गया था। इसको लेकर मान्यता है कि यह शिवलिंग दिन में 3 बार रंग बदलता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 29 May 2026 13:17:00 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mansa Devi Temple: Haridwar के Mansa Devi Temple का चमत्कार! यहां पूरी होती है संतान की मुराद, जानें History]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/miracle-of-haridwar-mansa-devi-temple-wishes-for-children-fulfilled-here-know-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>देवभूमि उत्तराखंड में देवी-देवताओं के कई मंदिर हैं। जिनमें से हरिद्वार के बिल्व पर्वत पर मां मनसा देवी का मंदिर स्थित है। मनसा देवी मंदिर भक्तों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर से जुड़ी कई गहरी धार्मिक मान्यताएं सुनने को मिलती है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी भक्त सच्चे मन से मां मनसा देवी के दर्शन करता है, मां उसकी सभी मनोकामनाओं को पूरी करती हैं। खास मौके पर मंदिर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ देखने को मिलती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको मनसा देवी मंदिर के इतिहास और यहां से जुड़ी धार्मिक मान्यता के बारे में बताने जा रहे हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>मंदिर का इतिहास</h2><div>साल 1811 से 1815 के बीच राजा गोपाल सिंह द्वारा मनसा देवी मंदिर का निर्माण कराया गया था। बता दें कि मनसा देवी मंदिर उन जगहों में शामिल है, जहां पर समुद्र मंथन के दौरान अमृत की कुछ बूंदे गिरी थीं। इस मंदिर में मनसा देवी की दो मूर्तियां स्थापित हैं। एक मूर्ति के तीन मुख और पांच भुजाएं हैं, तो वहीं दूसरी मूर्ति की आठ भुजाएं और स्वयं देवी सर्प पर विराजमान हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vishnu-sahasranaam-divine-solution-to-every-problem-in-life-reciting-it-give-miraculous-benefits" target="_blank">Chanting Benefits: Life की हर मुश्किल का Divine Solution है विष्णु सहस्त्रनाम, पाठ से मिलेंगे चमत्कारी लाभ</a></h3><div>&nbsp;</div><h2>मंदिर की मान्यता</h2><div>धार्मिक मान्यता है कि मां मनसा देवी अपने दरबार में आने वाले हर भक्त की मनोकामना को पूरी करती हैं। माना जाता है कि जो भी भक्त मां के दरबार में सच्चे मन और पूरी श्रद्धा भाव के साथ आता है, वह कभी खाली हाथ नहीं जाता है। वहीं मनसा देवी मंदिर आने से दंपति को संतान सुख की प्राप्ति होती है। वहीं सुहागिन महिलाएं अपने सुहाग की रक्षा और पति की लंबी उम्र के लिए मां मनसा देवी से प्रार्थना करती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 28 May 2026 13:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/miracle-of-haridwar-mansa-devi-temple-wishes-for-children-fulfilled-here-know-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chanting Benefits: Life की हर मुश्किल का Divine Solution है विष्णु सहस्त्रनाम, पाठ से मिलेंगे चमत्कारी लाभ]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vishnu-sahasranaam-divine-solution-to-every-problem-in-life-reciting-it-give-miraculous-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>महाभारत के 'अनुशासन पर्व' में सबसे पहले विष्णु सहस्त्रनाम का जिक्र मिलता है। यह वह समय था जब कुरुक्षेत्र में पांडवों और कौरवों का युद्ध समाप्त हो चुका था और भीष्म पितामह बाणों की शैय्या पर लेटे हुए अपने आखिरी समय का इंतजार कर रहे थे। तब धर्मराज युधिष्ठिर ने पूछा था कि इस दुनिया में सबसे बड़ा धर्म क्या है। वहीं किसके जब से व्यक्ति को हर दुख से मुक्ति मिल सकती है। तब भीष्म पितामह ने धर्मराज युधिष्ठिर को जगत के पालनहार भगवान श्रीहरि विष्णु के 1000 नामों के महत्व के बारे में बताया था।</div><div><br></div><div>बता दें कि महाभारत, अनुशासन पर्व अध्याय 149 में विष्णु सहस्त्रनाम का उल्लेख मिलता है। विष्णु सहस्त्रनाम का मतलब भगवान विष्णु के 1000 नामों से है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के इन नामों में पूरी सृष्टि का सार छिपा है। ऐसे में जब कोई व्यक्ति इनका जप करता है, तो उसके आसपास एक ऐसी ऊर्जा बनती है, जोकि नकारात्मक ऊर्जा को दूर करती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/janaki-stotram-miraculous-benefits-reciting-it-bring-eternal-good-fortune-and-success-in-life" target="_blank">Janaki Stotram के हैं चमत्कारिक Benefits, पाठ से मिलेगा अखंड सौभाग्य और Life में Success</a></h3><div><br></div><h2>जानिए कैसे करें विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ</h2><div>विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ करने के लिए कोई कठिन नियम नहीं है। सुबह स्नान आदि के बाद साफ कपड़े पहनकर शांति से बैठ जाएं। अगर आप संस्कृत में इसको पढ़ नहीं सकते हैं, तो आप इसको सुन भी सकते हैं या फिर इसका हिंदी अनुवाद पढ़ सकते हैं। इसका एक सबसे जरूरी नियम 'भाव' और 'श्रद्धा' है।</div><div><br></div><h2>विष्णु सहस्रनाम</h2><div>शुक्लाम्बरधरं विष्णुं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।</div><div>प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥१॥</div><div><br></div><div>यस्य द्विरदवक्त्राद्याः पारिषद्याः परः शतम् ‌।</div><div>विघ्नं निघ्नन्ति सततं विष्वक्सेनं तमाश्रये ॥२॥</div><div><br></div><div>व्यासं वसिष्ठनप्तारं शक्तेः पौत्रमकल्मषम् ‌।</div><div>पराशरात्मजं वन्दे शुकतातं तपोनिधिम् ॥३॥</div><div><br></div><div>व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे ।</div><div>नमो वै ब्रह्मनिधये वासिष्ठाय नमो नमः ॥४॥</div><div><br></div><div>अविकाराय शुद्धाय नित्याय परमात्मने ।</div><div>सदैकरूपरूपाय विष्णवे सर्वजिष्णवे ॥५॥</div><div><br></div><div>यस्य स्मरणमात्रेण जन्मसंसारबन्धनात् ।</div><div>विमुच्यते नमस्तस्मै विष्णवे प्रभविष्णवे ॥६॥</div><div><br></div><div>ॐ नमो विष्णवे प्रभविष्णवे।</div><div><br></div><h2>श्रीवैशम्पायन उवाच-</h2><div>श्रुत्वा धर्मानशेषेण पावनानि च सर्वशः ।</div><div>युधिष्ठिरः शान्तनवं पुनरेवाभ्यभाषत ॥७॥</div><div><br></div><h2>युधिष्ठिर उवाच-</h2><div>किमेकं दैवतं लोके किं वाप्येकं परायणम् ।</div><div>स्तुवन्तः कं कमर्चन्तः प्राप्नुयुर्मानवाः शुभम् ॥८॥</div><div><br></div><div>को धर्मः सर्वधर्माणां भवतः परमो मतः ।</div><div>किं जपन्मुच्यते जन्तुर्जन्मसंसारबन्धनात् ॥९॥</div><div><br></div><h2>भीष्म उवाच-</h2><div>जगत्प्रभुं देवदेवमनन्तं पुरुषोत्तमम् ।</div><div>स्तुवन् नामसहस्रेण पुरुषः सततोत्थितः ॥१०॥</div><div><br></div><div>तमेव चार्चयन्नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।</div><div>ध्यायन् स्तुवन् नमस्यंश्च यजमानस्तमेव च ॥११॥</div><div><br></div><div>अनादिनिधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् ।</div><div>लोकाध्यक्षं स्तुवन्नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥१२॥</div><div><br></div><div>ब्रह्मण्यं सर्वधर्मज्ञं लोकानां कीर्तिवर्धनम् ।</div><div>लोकनाथं महद्भूतं सर्वभूतभवोद्भवम् ॥१३॥</div><div><br></div><div>एष मे सर्वधर्माणां धर्मोऽधिकतमो मतः ।</div><div>यद्भक्त्या पुण्डरीकाक्षं स्तवैरर्चेन्नरः सदा ॥१४॥</div><div><br></div><div>परमं यो महत्तेजः परमं यो महत्तपः ।</div><div>परमं यो महद्ब्रह्म परमं यः परायणम् ॥१५॥</div><div><br></div><div>पवित्राणां पवित्रं यो मङ्गलानां च मङ्गलम् ।</div><div>दैवतं दैवतानां च भूतानां योऽव्ययः पिता ॥१६॥</div><div><br></div><div>यतः सर्वाणि भूतानि भवन्त्यादियुगागमे ।</div><div>यस्मिंश्च प्रलयं यान्ति पुनरेव युगक्षये ॥१७॥</div><div><br></div><div>तस्य लोकप्रधानस्य जगन्नाथस्य भूपते ।</div><div>विष्णोर्नामसहस्रं मे शृणु पापभयापहम् ॥१८॥</div><div><br></div><div>यानि नामानि गौणानि विख्यातानि महात्मनः ।</div><div>ऋषिभिः परिगीतानि तानि वक्ष्यामि भूतये ॥१९॥</div><div><br></div><div>ऋषिर्नाम्नां सहस्रस्य वेदव्यासो महामुनिः ।</div><div>छन्दोऽनुष्टुप् तथा देवो भगवान् देवकीसुतः ॥२०॥</div><div><br></div><div>अमृतांशूद्भवो बीजं शक्तिर्देवकिनन्दनः ।</div><div>त्रिसामा हृदयं तस्य शान्त्यर्थे विनियोज्यते ॥२१॥</div><div><br></div><div>विष्णुं जिष्णुं महाविष्णुं प्रभविष्णुं महेश्वरम् ‌।</div><div>अनेकरूप दैत्यान्तं नमामि पुरुषोत्तमं ॥२२॥</div><div><br></div><h2>पूर्वन्यासः</h2><div><br></div><h2>श्रीवेदव्यास उवाच</h2><div>ॐ अस्य श्रीविष्णोर्दिव्यसहस्रनामस्तोत्रमहामन्त्रस्य ॥</div><div>श्री वेदव्यासो भगवान ऋषिः ।</div><div>अनुष्टुप् छन्दः ।</div><div>श्रीमहाविष्णुः परमात्मा श्रीमन्नारायणो देवता ।</div><div>अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजम्‌ ।</div><div>देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तिः ।</div><div>उद्भवः क्षोभणो देव इति परमो मन्त्रः ।</div><div>शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकम् ।</div><div>शार्ङ्गधन्वा गदाधर इत्यस्त्रम् ।</div><div>रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति नेत्रम् ‌।</div><div>त्रिसामा सामगः सामेति कवचम् ।</div><div>आनन्दं परब्रह्मेति योनिः ।</div><div>ऋतुः सुदर्शनः काल इति दिग्बन्धः ॥</div><div>श्रीविश्वरूप इति ध्यानम्‌ ।</div><div>श्रीमहाविष्णुप्रीत्यर्थं सहस्रनामजपे विनियोगः ॥</div><div><br></div><h2>अथ न्यासः</h2><div>ॐ शिरसि वेदव्यासऋषये नमः ।</div><div>मुखे अनुष्टुप्छन्दसे नमः ।</div><div>हृदि श्रीकृष्णपरमात्मदेवतायै नमः ।</div><div>गुह्ये अमृतांशूद्भवो भानुरिति बीजाय नमः ।</div><div>पादयोर्देवकीनन्दनः स्रष्टेति शक्तये नमः ।</div><div>सर्वाङ्गे शङ्खभृन्नन्दकी चक्रीति कीलकाय नमः ।</div><div>करसंपूटे मम श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः ॥</div><div>इति ऋषयादिन्यासः ॥</div><div><br></div><h2>अथ करन्यासः</h2><div>ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इत्यङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।</div><div>अमृतांशूद्भवो भानुरिति तर्जनीभ्यां नमः ।</div><div>ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति मध्यमाभ्यां नमः ।</div><div>सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इत्यनामिकाभ्यां नमः ।</div><div>निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।</div><div>रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इति करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।</div><div>इति करन्यासः॥</div><div><br></div><h2>अथ षडङ्गन्यासः</h2><div>ॐ विश्वं विष्णुर्वषट्कार इति हृदयाय नमः ।</div><div>अमृतांशूद्भवो भानुरिति शिरसे स्वाहा ।</div><div>ब्रह्मण्यो ब्रह्मकृद्ब्रह्मेति शिखायै वषट् ।</div><div>सुवर्णबिन्दुरक्षोभ्य इति कवचाय हुम् ।</div><div>निमिषोऽनिमिषः स्रग्वीति नेत्रत्रयाय वौषट् ।</div><div>रथाङ्गपाणिरक्षोभ्य इत्यस्त्राय फट् ।</div><div>इति षडङ्गन्यासः ॥</div><div><br></div><div>श्रीकृष्णप्रीत्यर्थे विष्णोर्दिव्यसहस्रनामजपमहं करिष्ये इति सङ्कल्पः ।</div><div><br></div><h2>अथ ध्यानम्-</h2><div>क्षीरोदन्वत्प्रदेशे शुचिमणिविलसत्सैकतेर्मौक्तिकानां</div><div>मालाकॢप्तासनस्थः स्फटिकमणिनिभैर्मौक्तिकैर्मण्डिताङ्गः।</div><div>शुभ्रैरभ्रैरदभ्रैरुपरिविरचितैर्मुक्तपीयूष वर्षैः</div><div>आनन्दी नः पुनीयादरिनलिनगदा शङ्खपाणिर्मुकुन्दः॥१॥</div><div><br></div><div>भूः पादौ यस्य नाभिर्वियदसुरनिलश्चन्द्र सूर्यौ च नेत्रे</div><div>कर्णावाशाः शिरो द्यौर्मुखमपि दहनो यस्य वास्तेयमब्धिः।</div><div>अन्तःस्थं यस्य विश्वं सुरनरखगगोभोगिगन्धर्वदैत्यैः</div><div>चित्रं रंरम्यते तं त्रिभुवन वपुषं विष्णुमीशं नमामि॥२॥</div><div><br></div><div>ॐ शान्ताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशं</div><div>विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।</div><div>लक्ष्मीकान्तं कमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यं</div><div>वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्॥३॥</div><div><br></div><div>मेघश्यामं पीतकौशेयवासं</div><div>श्रीवत्साङ्कं कौस्तुभोद्भासिताङ्गम्।</div><div>पुण्योपेतं पुण्डरीकायताक्षं</div><div>विष्णुं वन्दे सर्वलोकैकनाथम्॥४॥</div><div><br></div><div>नमः समस्तभूतानामादिभूताय भूभृते।</div><div>अनेकरूपरूपाय विष्णवे प्रभविष्णवे॥५॥</div><div><br></div><div>सशङ्खचक्रं सकिरीटकुण्डलं</div><div>सपीतवस्त्रं सरसीरुहेक्षणम्।</div><div>सहारवक्षःस्थलकौस्तुभश्रियं</div><div>नमामि विष्णुं शिरसा चतुर्भुजम्॥६॥</div><div><br></div><div>छायायां पारिजातस्य हेमसिंहासनोपरि</div><div>आसीनमम्बुदश्याममायताक्षमलंकृतम् |</div><div>चन्द्राननं चतुर्बाहुं श्रीवत्साङ्कित वक्षसं</div><div>रुक्मिणी सत्यभामाभ्यां सहितं कृष्णमाश्रये॥७॥</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 27 May 2026 13:33:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/vishnu-sahasranaam-divine-solution-to-every-problem-in-life-reciting-it-give-miraculous-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Janaki Stotram के हैं चमत्कारिक Benefits, पाठ से मिलेगा अखंड सौभाग्य और Life में Success]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/janaki-stotram-miraculous-benefits-reciting-it-bring-eternal-good-fortune-and-success-in-life]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>माता सीता दयालुता की साक्षात मूर्ति मानी जाती है। इसलिए सादगी से की गई पूजा से माता सीता को प्रसन्न कर उनकी कृपा प्राप्त की जा सकती है। मां सीता की पूजा में जानकी स्त्रोत और श्रीजानकी स्तुति का पाठ करना विशेष फलदायी माना जाता है। यह मां सीता को समर्पित एक अत्यंत पावन और दिव्य स्त्रोत है, इसके पाठ से आपको मां सीता की असीम कृपा प्राप्त हो सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको श्रीजानकी स्त्रोत और जानकी स्तुति के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>जानकी स्तोत्र</h2><div>नीलनीरज-दलायतेक्षणां लक्ष्मणाग्रज-भुजावलम्बिनीम्।</div><div>शुद्धिमिद्धदहने प्रदित्सतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/who-first-saw-baba-barfani-learn-secret-story-of-amarnath-yatra" target="_blank">Amarnath Yatra Story: Baba Barfani के पहले दर्शन किसने किए? जानिए Amarnath Yatra शुरू होने की Secret Story</a></h3><div><br></div><div>रामपाद-विनिवेशितेक्षणामङ्ग-कान्तिपरिभूत-हाटकाम्।</div><div>ताटकारि-परुषोक्ति-विक्लवां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।</div><div><br></div><div>कुन्तलाकुल-कपोलमाननं, राहुवक्त्रग-सुधाकरद्युतिम्।</div><div>वाससा पिदधतीं हियाकुलां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।</div><div><br></div><div>कायवाङ्मनसगं यदि व्यधां स्वप्नजागृतिषु राघवेतरम्।</div><div>तद्दहाङ्गमिति पावकं यतीं भावये मनसि रामवल्लभाम्।।</div><div><br></div><div>इन्द्ररुद्र-धनदाम्बुपालकै: सद्विमान-गणमास्थितैर्दिवि।</div><div>पुष्पवर्ष-मनुसंस्तुताङ्घ्रिकां भावये मनसि रामवल्लभाम्।।</div><div><br></div><div>संचयैर्दिविषदां विमानगैर्विस्मयाकुल-मनोऽभिवीक्षिताम्।</div><div>तेजसा पिदधतीं सदा दिशो भावये मनसि रामवल्लभाम्।।</div><div><br></div><div>।।इति जानकीस्तोत्रं सम्पूर्णम्।।</div><div><br></div><h2>जानकी स्तोत्र के लाभ</h2><div>विवाहित महिलाएं अगर इस स्त्रोत का पाठ करती हैं, तो इसके पाठ से उनको अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है और वैवाहिक जीवन में मधुरता आती है।</div><div><br></div><div>जानकी स्त्रोत का पाठ करने से घर की दरिद्रता दूर होती है और मां सीता की कृपा से धन-धान्य में वृद्धि होती है।</div><div><br></div><div>जानकी स्त्रोत का पाठ करने से जातक को अनजाने भय से मुक्ति मिलती है और पाप नष्ट होते हैं।</div><div><br></div><div>जो भी व्यक्ति सीता नवमी के दिन श्रद्धापूर्वक इस स्त्रोत का पाठ करने से जातक की मनोकनाएं पूरी होती है।</div><div><br></div><div>इस स्त्रोत से जातक को मानसिक शांति प्रदान होती है और आत्मविश्वास को बढ़ाने में सहायक होता है।</div><div><br></div><div>मां जानकी की कृपा से व्यक्ति को शत्रुओं पर विजय मिलती है।</div><div><br></div><h2>श्री जानकी स्तुति</h2><div>जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।</div><div>जानकि त्वां नमस्यामि सर्वपापप्रणाशिनीम्।।1।।</div><div><br></div><div>दारिद्र्यरणसंहर्त्रीं भक्तानाभिष्टदायिनीम्।</div><div>विदेहराजतनयां राघवानन्दकारिणीम्।।2।।</div><div><br></div><div>भूमेर्दुहितरं विद्यां नमामि प्रकृतिं शिवाम्।</div><div>पौलस्त्यैश्वर्यसंहत्रीं भक्ताभीष्टां सरस्वतीम्।।3।।</div><div><br></div><div>पतिव्रताधुरीणां त्वां नमामि जनकात्मजाम्।</div><div>अनुग्रहपरामृद्धिमनघां हरिवल्लभाम्।।4।।</div><div><br></div><div>आत्मविद्यां त्रयीरूपामुमारूपां नमाम्यहम्।</div><div>प्रसादाभिमुखीं लक्ष्मीं क्षीराब्धितनयां शुभाम्।।5।।</div><div><br></div><div>नमामि चन्द्रभगिनीं सीतां सर्वाङ्गसुन्दरीम्।</div><div>नमामि धर्मनिलयां करुणां वेदमातरम्।।6।।</div><div><br></div><div>पद्मालयां पद्महस्तां विष्णुवक्ष:स्थलालयाम्।</div><div>नमामि चन्द्रनिलयां सीतां चन्द्रनिभाननाम्।।7।</div><div><br></div><div>आह्लादरूपिणीं सिद्धिं शिवां शिवकरीं सतीम्।</div><div>नमामि विश्वजननीं रामचन्द्रेष्टवल्लभाम्।</div><div><br></div><div>सीतां सर्वानवद्याङ्गीं भजामि सततं हृदा।।8।।</div><div><br></div><h2>देवी सीता के मंत्र</h2><div><br></div><h2>सामान्य मंत्र</h2><div>श्री जानकी रामाभ्यां नमः।</div><div><br></div><h2>मूल मंत्र</h2><div>श्री सीतायै नमः।</div><div><br></div><h2>देवी सीता गायत्री मंत्र</h2><div>ॐ जनकाय विद्महे राम प्रियाय धीमहि। तन्नो सीता प्रचोदयात्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 23 May 2026 11:42:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/janaki-stotram-miraculous-benefits-reciting-it-bring-eternal-good-fortune-and-success-in-life</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Aditya Hridaya Strot: Ram की तरह चाहते हैं हर मुश्किल पर Victory? सूर्य देव का ये पाठ पलट देगा आपकी Destiny]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/want-victory-over-every-difficulty-like-lord-rama-this-lesson-from-sun-god-change-destiny]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आदित्य हृदय स्त्रोत को भगवान सूर्य देव की अत्यंत शक्तिशाली स्तुति मानी जाती है। जोकि वाल्मीकि रामायण के युद्धकांड में मिलती है। 'राम-रावण युद्ध' के प्रसंग के दौरान जब भगवान श्रीराम जब युद्ध में थक गए थे, तो अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को 'आदित्य हृदय स्त्रोत' का पाठ करने की सलाह दी थी। आदित्य हृदय स्त्रोत शत्रुओं के नाश के अलावा आत्मविश्वास में वृद्धि और करियर में सफलता के लिए भी अचूक माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>।।आदित्य हृदय स्तोत्र।।</h2><div><br></div><h2>आदित्य हृदय स्तोत्र विनियोग</h2><div><br></div><div>''ओम अस्य आदित्यह्रदय स्तोत्रस्य अगस्त्यऋषि: अनुष्टुप्छन्दः आदित्यह्रदयभूतो भगवान् ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्माविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः''।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/who-first-saw-baba-barfani-learn-secret-story-of-amarnath-yatra" target="_blank">Amarnath Yatra Story: Baba Barfani के पहले दर्शन किसने किए? जानिए Amarnath Yatra शुरू होने की Secret Story</a></h3><div><br></div><h2>पूर्व पिठित</h2><div>''ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌। रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌।</div><div><br></div><div>दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌। उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा।।</div><div><br></div><div>राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌। येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे।।</div><div><br></div><div>आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌। जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌।।</div><div><br></div><div>सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌। चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌''।।</div><div><br></div><h2>मूल-स्तोत्र</h2><div>''रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌। पुजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌।।</div><div><br></div><div>सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन:। एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि:।।</div><div><br></div><div>एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति:। महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः।।</div><div><br></div><div>पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु:। वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर:।</div><div><br></div><div>आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌। सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर:।।</div><div><br></div><div>हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌। तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌।।</div><div><br></div><div>हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि:। अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन:।।</div><div><br></div><div>व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग:। घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।।</div><div><br></div><div>आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:। कविर्विश्वो महातेजा: रक्त:सर्वभवोद् भव:।</div><div><br></div><div>नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन:। तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तु ते।।</div><div><br></div><div>नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम:। ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम:।।</div><div><br></div><div>जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम:। नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम:।।</div><div><br></div><div>नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम:। नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।</div><div><br></div><div>ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे। भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम:।।</div><div><br></div><div>तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने। कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम:।।</div><div><br></div><div>तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे। नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।</div><div><br></div><div>नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु:। पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि:।</div><div><br></div><div>एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित:। एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌।।</div><div><br></div><div>देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतुनां फलमेव च। यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु:।।</div><div><br></div><div>एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च। कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव।।</div><div><br></div><div>पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌। एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि।।</div><div><br></div><div>अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि। एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌।।</div><div><br></div><div>एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा। धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌।।</div><div><br></div><div>आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌। त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌।।</div><div><br></div><div>रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌। सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌।।</div><div><br></div><div>अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण:।</div><div><br></div><div>निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति''।।</div><div><br></div><h2>सूर्य देव के मंत्र</h2><div>ॐ सूर्यनारायणायः नमः।</div><div><br></div><div>ऊँ घृणि सूर्याय नमः</div><div><br></div><div>'ॐ आदित्याय विदमहे दिवाकराय धीमहि तन्नो सूर्य प्रचोदयात'</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 21 May 2026 11:30:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/want-victory-over-every-difficulty-like-lord-rama-this-lesson-from-sun-god-change-destiny</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Amarnath Yatra Story: Baba Barfani के पहले दर्शन किसने किए? जानिए Amarnath Yatra शुरू होने की Secret Story]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/who-first-saw-baba-barfani-learn-secret-story-of-amarnath-yatra]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक मान्यता है कि अमरनाथ की कठिन चढ़ाई चढ़ने के बाद बाबा बर्फानी के दर्शन मात्र से व्यक्ति को अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है। वहीं हर साल अमरेश्वर के दर्शन के लिए लाखों की संख्या में श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस रहस्य़मई गुफा की खोज कैसे हुई और बाबा बर्फानी के दर्शन करने का सौभाग्य सबसे पहले किसको मिला था। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि सबसे पहले बाबा बर्फानी के दर्शन किए हुए थे, तो आइए जानते हैं अमरनाथ यात्रा से जुड़ी पौराणिक कथाओं के बारे में...</div><div><br></div><h2>जानें बाबा बर्फानी के दर्शन का महत्व</h2><div>'नीलमत पुराण' और 'बृंगेश संहिता' जैसे ग्रंथों में इस बार का वर्णन मिलता है कि अमरनाथ के दर्शन करने वाले व्यक्ति को काशी से 10 गुना, प्रयागराज से 100 गुना और नैमिषारण्य से 1000 गुना फल मिलता है। जो भी व्यक्ति पूरे श्रद्धा और भक्तिभाव से बाबा बर्फानी के दर्शन करता है, उसके लिए सीधे मोक्ष के द्वार खुल जाते हैं। यह वह पवित्र गुफा है, जहां पर भगवान शिव ने मां पार्वती को 'अमर कथा' यानी की सृष्टि और अमरता के रहस्य की कथा सुनाई थी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-even-pandava-bhima-not-lift-statue-of-bhairav-??baba-this-miraculous-temple-in-delhi" target="_blank">Bhairav ​​Nath Temple: जब पांडव भीम भी नहीं उठा पाए थे Bhairav Baba की प्रतिमा, Delhi में है ये चमत्कारी मंदिर</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></h3><div><br></div><h2>जानिए सबसे पहले किसने किए दर्शन</h2><div>बता दें कि बाबा बर्फानी के दर्शन को लेकर दो प्रमुख मान्यताएं मिलती हैं, जोकि इस प्रकार हैं-</div><div><br></div><div>पुराणों के मुताबिक कश्मीर की घाटी पानी में डूबी थी। जोकि एक विशाल झील थी। ऋषि कश्यप ने कई नदियों और छोटी धाराओं के जरिए पानी को बाहर निकाला। उस समय ऋषि भृगु हिमालय की यात्रा पर उस रास्ते से जा रहे थे, तभी उनको यह पवित्र गुफा मिली थी। इसलिए ऋषि भृगु को अमरेश्वर शिवलिंग का दर्शन करने वाला पहला व्यक्ति माना जाता है।</div><div><br></div><h2>कैसे शुरू हुई अमरनाथ यात्रा</h2><div>स्थानीय और लोक कथाओं के मुताबिक 15वीं शताब्दी में एक बूटा मलिक नामक चरवाहा था। जिसने इस पवित्र गुफा की खोज की थी। एक दिन बूटा मलिक को एक संत मिले, जिन्होंने उसको अपना कोयले से भरा एक थैला थमा दिया। जब चरवाहे ने घर जाकर थैला खोलकर देखा, तो थैले में रखा कोयला सोने के सिक्कों में बदल गया था।</div><div><br></div><div>वह हैरान होकर उसी स्थान पर संत को धन्यवाद कहने के लिए गया। लेकिन चरवाहे को वहां पर संत नहीं मिले। तब बूटा मलिक चरवाहे को अमरनाथ की गुफा और उसमें विराजमान स्वयंभू शिवलिंग मिला। जब लोगों ने इस शिवलिंग के बारे में सुना, तो यह स्थान तीर्थयात्रा का प्रमुख केंद्र बन गया।</div><div><br></div><h2>अमरेश्वर शिवलिंग</h2><div>सिर्फ मान्यताओं तक ही अमरनाथ यात्रा सीमित नहीं है, बल्कि इसका ऐतिहासिक प्रमाण भी मौजूद है। कल्हण द्वारा रचित प्रसिद्ध पुस्तक 'राजतरंगिणी' में अमरेश्वर शिवलिंग का उल्लेख मिलता है। इस पुस्तक में बताया गया है कि रानी सूर्यमती ने 11वीं शताब्दी में त्रिशूट भेंट किया था।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 19 May 2026 13:54:52 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/who-first-saw-baba-barfani-learn-secret-story-of-amarnath-yatra</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhairav ​​Nath Temple: जब पांडव भीम भी नहीं उठा पाए थे Bhairav Baba की प्रतिमा, Delhi में है ये चमत्कारी मंदिर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-even-pandava-bhima-not-lift-statue-of-bhairav-??baba-this-miraculous-temple-in-delhi]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>काल भैरव के नाम से पहचाने जाने वाले भैरव बाबा भगवान शिव का अद्वितीय और शक्तिशाली रूप हैं। भगवान भैरव नाथ न्याय, शक्ति और भयमुक्ति के देवता हैं। भैरव बाबा को समय और मृत्यु का भी स्वामी माना जाता है। माना जाता है कि भगवान शिव की तांडव शक्ति से भैरव बाबा का जन्म हुआ था। दिल्ली के चाणक्यपुरी में भी भैरव नाथ का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास महाभारत काल से जुड़ा है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि इस मंदिर की स्थापना स्वयं भीम ने की थी। इस कारण यहां पर पूजा के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि भैरव नाथ मंदिर की स्थापना कैसे हुए और इस मंदिर के दर्शन कैसे करें।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/where-shakti-resides-with-shiva-only-such-temple-in-world" target="_blank">Baba Vaidyanath Jyotirlinga: जहां शिव के साथ विराजती हैं शक्ति, विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर</a></h3><div><br></div><h2>भैरव मंदिर की स्थापना</h2><div>वाराणसी के बटुक भैरव से जुड़े दिल्ली के इस मंदिर की स्थापना भीम ने की थी। स्कंद पुराण की कथा के मुताबिक महाभारत के युद्ध के दौरान काशी से भैरव बाबा को लेकर भीम हस्तिनापुर चले गए थे। भीम ने बाबा को यह वचन दिया था कि वह उनको रास्ते में अपने कंधे से नहीं उतारेंगे। लेकिन दिल्ली आते-आते भीम को बहुत प्यास लगी तो उन्होंने बाबा को अपने कंधे से उतार दिया। भीम ने अपनी प्यास तो बुझा ली, लेकिन बाबा को दिया हुआ वचन टूट गया।</div><div><br></div><div>ऐसे में जब बाबा को भीम ने दोबारा उठाने की कोशिश की, तो वह ऐसा नहीं कर सके। तब भैरव बाबा ने अपनी शक्ति का परिचय देते हुए कुंए की मुंडेर पर विराजमान होने का निश्चय किया। भीम के प्रार्थना करने के बाद भी बाबा भैरव ने अपनी स्थिति को नहीं बदला और तब से भैरव नाथ स्थायी रूप से यहीं विराजमान हो गए।</div><div><br></div><h2>मंदिर की मान्यता</h2><div>बाबा भैरव नाथ शक्ति, न्याय और भयमुक्ति के देवता माने जाते हैं। उनका स्वरूप भक्तों के लिए रौद्र और दयालु दोनों हैं। माना जाता है कि भैरव नाथ की पूजा करने से व्यक्ति को संकटों से मुक्ति मिलती है। साथ ही सुख-शांति का भी आशीर्वाद प्राप्त होता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 18 May 2026 14:10:12 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/when-even-pandava-bhima-not-lift-statue-of-bhairav-??baba-this-miraculous-temple-in-delhi</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Baba Vaidyanath Jyotirlinga: जहां शिव के साथ विराजती हैं शक्ति, विश्व का इकलौता ऐसा मंदिर]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/where-shakti-resides-with-shiva-only-such-temple-in-world]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शिव भक्त भगवान शिव की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए किसी भी शिवालय में जाकर भगवान शिव की पूजा करते हैं। वहीं भगवान शिव की पूजा करने से जातक के जीवन के कष्टों का अंत होता है। लेकिन द्वादश ज्योतिर्लिंग यानी कि भगवान शिव के 12 शिवलिंगों की पूजा और दर्शन करने का अपना एक अलग महत्व है। धार्मिक मान्यता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों के दर्शन और सुबह-शाम के स्मरण मात्र से व्यक्ति के सारे कष्ट दूर हो जाते हैं। द्वादश ज्योतिर्लिंग में देवघर के बाबा बैद्यनाथ की पूजा का विशेष महत्व होता है। क्योंकि यह इकलौता ऐसा ज्योतिर्लिंग है, जिसके साथ शक्तिपीठ भी मौजूद है।</div><div><br></div><h2>कामना ज्योतिर्लिंग</h2><div>झारखंड के देवघर में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से बाबा बैद्यनाथ का ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठों में से एक मां पार्वती की शक्तिपीठ एक साथ विराजमान है। जिसकी वजह से बाबा बैद्यनाथ को कामना ज्योतिर्लिंग भी कहते हैं। क्योंकि यहां पर जो भक्त आते हैं, वह भगवान शिव के साथ मां शक्ति की भी पूजा-अर्चना करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/immortal-story-of-baba-barfani-why-secret-of-amarnath-more-special-than-12-jyotirlingas" target="_blank">Amarnath Yatra Mystery: Baba Barfani की अमर कहानी, क्यों 12 ज्योतिर्लिंगों से भी खास है Amarnath का ये रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>विश्व का इकलौता ज्योतिर्लिंग</h2><div>बता दें कि देवघर में बाबा बैद्यनाथ का ज्योतिर्लिंग विश्व का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है। जहां पर ज्योतिर्लिंग के साथ शक्तिपीठ भी मौजूद है। शिव और शक्ति के एक साथ होने से बाबा नगरी और बाबा बैद्यनाथ का महत्व विश्व विख्यात है।</div><div><br></div><h2>शिव और शक्ति की पूजा</h2><div>आध्यात्म जगत में शिव और शक्ति की पूजा का विशेष महत्व होता है। माना जाता है कि भगवान शिव और शक्ति जीवन के दो मूलभूल स्तंभ हैं। वहीं पौराणिक कथाओं के मुताबिक देवघर में मां सती का हृदय गिरा था। जिस वजह से देवघर में भगवान शिव के साथ मां पार्वती का भी निवास है। बाबा नगरी में बसे भगवान शिव और शक्ति के दर्शन के लिए भक्त दूर-दूर से यहां पहुंचते हैं और मां पार्वती और भगवान शिव की एक साथ पूजा की जाती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 13 May 2026 15:11:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/where-shakti-resides-with-shiva-only-such-temple-in-world</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Amarnath Yatra Mystery: Baba Barfani की अमर कहानी, क्यों 12 ज्योतिर्लिंगों से भी खास है Amarnath का ये रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/immortal-story-of-baba-barfani-why-secret-of-amarnath-more-special-than-12-jyotirlingas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में 12 ज्योतिर्लिगों के दर्शन करने का विशेष महत्व बताया गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि 12 ज्योतिर्लिगों में शामिल न होने के बाद भी अमरनाथ में स्थापित शिवलिंग के दर्शन का विशेष महत्व होता है। अमरनाथ में भगवान शिव को बाबा बर्फानी के रूप में पूजा जाता है। जोकि आस्था और मोक्ष का अनूठा केंद्र है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बाबा बर्फानी के महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही यहां पर मौजूद कबूतरों के रहस्य के बारे में भी जानेंगे।</div><div><br></div><h2>अमरेश्वर शिवलिंग का महत्व</h2><div>बाबा बर्फानी 12 ज्योतिर्लिंगों में शामिल न होकर इसलिए भी खास है, क्योंकि यह स्वयंभू हिमलिंग है। जहां पर ज्योतिर्लिंग स्थापित किए जाते हैं, वहीं अमरनाथ गुफा में शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बर्फ की बूंदों से बनता है। यह बूंद गुफा की छत से टपकती है। यह शिवलिंग चंद्रमा की कलाओं के साथ घटता और बढ़ता रहता है। यह शिवलिंग सावन महीने में प्रकट होता है और सावन पूर्णिमा यानी रक्षाबंधन तक रहता है। धार्मिक मत है कि बाबा बर्फानी के दर्शन करने मात्र से मोक्ष की प्राप्ति होती है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/new-rules-for-darshan-in-gangotri-now-entry-not-be-allowed-without-panchgavya" target="_blank">Char Dham Yatra 2026: गंगोत्री में दर्शन के New Rules, अब 'पंचगव्य' के बिना नहीं मिलेगी Entry</a></h3><div><br></div><h2>क्यों पवित्र मानी जाती है ये गुफा</h2><div>अमरनाथ गुफा को बेहद पवित्र और पावन मानी जाती है। क्योंकि यह वही स्थान है, जहां पर भगवान शिव ने मां पार्वती को अमरकथा सुनाई थी। इस कारण इसको 'अमरनाथ' कहा जाता है और इस स्थान को मोक्ष की प्राप्ति के लिए भी परम पवित्र मानी जाती है। इस गुफा की एक खासियत यह भी है कि यहां मुख्य शिवलिंग के साथ गुफा में मां पार्वती और भगवान गणेश के भी हिमखंड प्राकृतिक रूप में निर्मित होते हैं।</div><div><br></div><h2>जानें अमर कबूतरों का रहस्य</h2><div>पौराणिक कथा के मुताबिक जब महादेव मां पार्वती को अमर कथा सुना रहे थे, तो इस दौरान कबूतर के जोड़े ने इस कथा को सुन लिया और वह अमर हो गए। जब यह बात भगवान शिव को पता चली तो वह क्रोधित हुए। वहीं बाद में महादेव ने उन कबूतरों को शिव-पार्वती के प्रतीक के रूप में हमेशा गुफा में रहने का वरदान दिया। माना जाता है कि जिस भी भक्त को इस गुफा में दो कबूतर दिखते हैं, वह बेहद भाग्यशाली होते हैं।</div><div><br></div><h2>अमरनाथ यात्रा की खासियत</h2><div>अमरनाथ गुफा समुद्र तल से करीब 14,500 फीट से ज्यादा ऊंचाई पर है। इसलिए अमरनाथ यात्रा को साहस और अटूट विश्वास का भी प्रतीक माना जाता है। यह एक धार्मिक स्थान नहीं बल्कि एक अलौकिक अनुभव है। यहां पर श्रद्धालु अमरत्व की कामना और भगवान शंकर के दर्शन के लिए दुर्गम रास्तों से होकर जाते हैं।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि अमरनाथ की कठिन यात्रा को करने के बाद जो भी भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन करते हैं, उनके जीवन की हर बाधा दूर होती है और हर मनोकामना पूरी होती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 12 May 2026 14:16:16 +0530</pubDate>
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      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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