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    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
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      <title><![CDATA[Mysterious Temple: इन मंदिरों में चलता है महिलाओं का राज, Rituals के दौरान पुरुषों के प्रवेश पर लगा है कड़ा प्रतिबंध]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/women-rule-these-temples-there-strict-ban-on-entry-of-men-during-rituals]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शायद आपने उन मंदिरों के बारे में तो सुना ही होगा, जहां पर महिलाओं का जाना वर्जित है। लेकिन क्या आपने कभी ऐसे मंदिर के बारे में सुना है, जहां पर पुरुषों का जाना वर्जित हो। भले ही आपको यह बात सुनने में हैरान करने वाली और थोड़ी अटपटी जरूर लगे। लेकिन ऐसा एक रहस्यमयी मंदिर है, जहां पर पुरुषों का जाना वर्जित है। इसलिए आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको उस मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। साथ ही इसके पीछे के कारण के बारे में भी जानेंगे।</div><div><br></div><h2>केरल का अट्टुकल भगवती मंदिर</h2><div>केरल का फेमस अट्टुकल भगवती मंदिर जहां पर पोंगल उत्सव के समय हजारों की संख्या में महिलाएं प्रसाद को तैयार करने के लिए एकत्र होती है। इस दिन पुरुषों को मंदिर परिसर में प्रवेश करने की मनाही होती है। हालांकि यह पूर्ण तरीके से प्रतिबंध नहीं है। लेकिन एक सामान्य भूमिकाओं का एक अनुष्ठानिक निलंबन है। जोकि महिलाओं को आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र में निर्बोध रूप से रहने की अनुमति देता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries" target="_blank">Famous Temple: गुजरात का वो 'City of Temples' जहां रात में रुकना है मना, जानें इसके Spiritual और दिव्य रहस्य</a></h3><div><br></div><h2>चक्कुलाथुकावु मंदिर केरल</h2><div>केरल के देव भगवती को समर्पित इस मंदिर में नारी पूजा नाम से वार्षिक अनुष्ठान आयोजित किया जाता है। इसका मतलब है कि महिलाओं की पूजा से, उस दिन पुरुषों का मंदिर में प्रवेश वर्जित माना जाता है।</div><div><br></div><div>नारी पूजा के समय महिलाएं व्रत करने के साथ एकत्रित होती हैं। वहीं पुरुष पुजारी उनके पैरों को धोता है। जो सत्ता के पारंपरिक उल्टे क्रम को दिखाता है।</div><div><br></div><h2>असम का कामाख्या मंदिर</h2><div>महान शक्तिपीठों में से एक मां कामाख्या मंदिर भी नारी शरीर से गहराई से जुड़ा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, मां सती की योनि यहां पर गिरी थी।</div><div><br></div><div>अंबुबाची मेले के दौरान देवी कामाख्या को मासिक धर्म होता है, इस दौरान मंदिर को तीन दिन के लिए बंद कर दिया जाता है और पुरुषों को मंदिर जाने की अनुमति नहीं होती है।</div><div><br></div><h2>तमिलनाडु का कुमारी अम्मन मंदिर</h2><div>कन्याकुमारी मंदिर कन्या कुंवारी दु्र्गा को समर्पित है। परंपराओं के मुताबिक विवाहित पुरुषों को गर्भगृह में अंदर जाने की अनुमति नहीं है। सिर्फ ब्रह्मचारी पुरुष या फिर संन्यासी ही पास जा सकते हैं।</div><div><br></div><div>पुरुषों का तिरस्कार करने के लिए यह नियम नहीं बनाए गए हैं, बल्कि ब्रह्मचर्य, भक्ति और आध्यात्मिक वैराग्य की पवित्रता को बनाए रखने के लिए है।</div><div><br></div><h2>राजस्थान का ब्रह्मा मंदिर</h2><div>राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर विवाहित पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश की अनुमति नहीं देता है। पौराणि कथाओं के मुताबिक जब भगवान ब्रह्मा ने देवी गायत्री से विवाह किया था, तो देवी सरस्वती ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया और यह आदेश दिया कि मंदिर में कभी विवाहित पुरुष मंदिर में प्रवेश नहीं कर पाएंगे।</div><div><br></div><div>यह प्रतिबंध स्त्री शरीर के बारे में नहीं बल्कि खुद विवाह के बारे में है। जो भक्तों की व्यक्तिगत स्थिति को मंदिर की आध्यात्मिक संरचना से जोड़ने का काम करता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 22 Aug 2026 11:31:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/women-rule-these-temples-there-strict-ban-on-entry-of-men-during-rituals</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
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      <title><![CDATA[Famous Temple: गुजरात का वो 'City of Temples' जहां रात में रुकना है मना, जानें इसके Spiritual और दिव्य रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत का गुजरात राज्य अपने आप में ही अनोखा और समृद्ध माना जाता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि गुजरात के भावनगर जिले में शत्रुंजय पहाड़ियों की गोद में बसा पालिताणा एक ऐसी अनोखी जगह है। जिसको मंदिरों के शहर के नाम से जाना जाता है। पूर्व में यह स्थान पादलिप्तपुर नाम से फेमस था। यह शहर जैन धर्म के अनुयायियों के लिए अटूट आस्था का केंद्र माना जाता है। इस जगह की खासियत यह है कि यहां पर 800 से ज्यादा संगमरमर के मंदिर मौजूद हैं। इसी वजह से इसको मंदिरों का शहर कहा जाता है। तो आइए जानते हैं गुजरात के पालीताणा मंदिर की खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>यहां हैं 800 से ज्यादा भव्य मंदिर</h2><div>माना जाता है कि जैन धर्म के लोगों में अपने जीवनकाल में कम से कम एक बार इन मंदिरों के दर्शन करना निर्वाण या फिर मोक्ष के लिए जरूरी है। शत्रुंजय पहाड़ी पर स्थित यह स्थल इतना अधिक विशाल और भव्य है कि यहां पर करीब 836 संगमरमर से तराशे मंदिर हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/fact-behind-saas-bahu-name-given-to-lord-vishnu-sahastrabahu-temple-know-full-story" target="_blank">Unique Temple: भगवान विष्णु के सहस्त्रबाहु मंदिर का 'सास-बहू' नाम पड़ने के पीछे क्या है Fact? जानें पूरा सच</a></h3><div><br></div><div>इन मंदिरों तक पहुंचने का सफर भी किसी तपस्या से कम नहीं माना जाता है। क्योंकि मुख्य मंदिर तक पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को करीब 3500 सीढ़ियां चढ़नी पड़ती हैं। यह जगह इसलिए भी खास है, क्योंकि मान्यता के हिसाब से 24 में से 23 तीर्थकरों ने यहां आकर इस अपनी उपस्थिति से इस पहाड़ी को पावन किया था।</div><div><br></div><h2>रात को रुकना है मना</h2><div>पालिताणा की सबसे अनोखी बात को जानकर आपको हैरानी होगी। दरअसल, यह स्थान पूरी तरह से देवताओं का निवास स्थान माना गया है। यही वजह है कि यहां पर सूर्यास्त के बाद किसी भी इंसान को रात गुजारने की अनुमति नहीं है। यहां तक कि मंदिर की सेवा करने वाले पुजारियों को भी यहां पर रात में रुकने की मनाही है। सदियों से यह परंपरा इस स्थान की दिव्यता और पवित्रता को बनाए रखने के लिए चली आ रही है।</div><div><br></div><h2>जानें धार्मिक महत्व</h2><div>बता दें कि पहाड़ी पर बना मुख्य मंदिर प्रथम तीर्थकर ऋषभदेव जी को समर्पित है। यह श्वेतांबर मूर्तिपूजक संप्रदाय के लिए सबसे अधिक पवित्र स्थान माना जाता है। हालांकि यहां पर दिगंबर जैन समुदाय का भी एक मंदिर है। यह पूरा क्षेत्र न सिर्फ धार्मिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है, बल्कि यह अपनी अद्भुत नक्काशी और वास्तुकला के लिए भी पूरी दुनिया में जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>ऐसे पहुंचें पालिताणा</h2><div>अगर आप भी इस पावन नगरी की यात्रा करना चाहते हैं, तो बता दें कि यहां तक पहुंचना बेहद आसान है।</div><div><br></div><div>यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा भावनगर एयरपोर्ट है। जोकि पालिताणा से सिर्फ 55 किमी दूर पर स्थित है।</div><div><br></div><div>वहीं अगर आप ट्रेन से आना चाहते हैं, तो ये शहर भावनगर और मुंबई जैसे प्रमुख शहरों से रेल से अच्छे से जुड़ा है।</div><div><br></div><div>वहीं गुजरात के सभी प्रमुख शहरों से पालिताणा के लिए बेहतरीन सड़क कनेक्टिविटी भी मौजूद है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 20 Aug 2026 13:41:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gujarat-city-of-temples-where-staying-overnight-forbidden-know-spiritual-and-divine-mysteries</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Unique Temple: भगवान विष्णु के सहस्त्रबाहु मंदिर का 'सास-बहू' नाम पड़ने के पीछे क्या है Fact? जानें पूरा सच]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/fact-behind-saas-bahu-name-given-to-lord-vishnu-sahastrabahu-temple-know-full-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आप सभी ने हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों के बारे में तो जरूर सुना होगा। जहां पर विराजमान भगवान की नियमित रूप से पूजा होती है। लेकिन क्या आपने सास-बहु के नाम का मंदिर सुना है। यह सुनने में थोड़ा सा अजीब जरूर लग सकता है। लेकिन भारत में एक ऐसा मंदिर है, जिसका नाम सास-बहू मंदिर है। सास-बहू मंदिर का नाम सुनते ही हम सभी के दिमाग में सास-बहू के रिश्ते और उनके बीच होने वाली खट्टी-मीठी नोंकझोंक याद आता है।</div><div><br></div><div>बता दें कि सास-बहू मंदिर में न तो सास की पूजा होती है और न ही बहू की पूजा होती है। तो ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि इस मंदिर का नाम सास-बहू मंदिर कैसे पड़ा।</div><div><br></div><h2>जानें सहस्त्रबाहु मंदिर का इतिहास</h2><div>राजस्थान के उदयपुर के राजसी शहर से करीब 22 किमी दूर सहस्त्रबाहु मंदिर है। जिसको सास-बहु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की स्थापत्य कला 10वीं शताब्दी ईस्वी के आसपास की है।</div><div><br></div><div>प्रचलित कहानियों के अनुसार, इस मंदिर का मूल नाम सहस्त्रबाहु था, जोकि भगवान विष्णु को समर्पित है। लेकिन समय के साथ यह मंदिर सास-बहु मंदिर के नाम से जाना गया।</div><div><br></div><div>राजस्थान के नागदा गांव में स्थित इस परिसर के अंदर मुख्य दो मंदिर हैं। विशाल मंदिर सास और छोटा मंदिर बहू। सास मंदिर करीब 10 छोटे-छोटे मंदिरों के समूह से घिरा है। वहीं बहू मंदिर में 5 अन्य छोटे मंदिर हैं। सास के मंदिरों के समक्ष एक मेहराबदार प्रवेश द्वार है। जहां पर कुछ खास मौकों पर श्रीहरि की मूर्ति को रखा जाता है। इसमें 3 अलग दिशाओं में खुलने वाले तीन अन्य द्वार हैं। वहीं चौथा दरबार में आम जनता का जाना मना है।</div><div><br></div><h2>किसने बनवाया था मंदिर</h2><div>मंदिर के इतिहास के बारे में बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कच्छवाह वंश के राजा महिपाला ने 10 या 11वीं शताब्दी के आसपास कराया था। महिपाला की रानी भगवान श्रीहरि विष्णु की परम भक्त थीं। वहीं राजा भी अपनी पत्नी के प्रति प्रेम और उदार स्वभाव रखता था। इस तरह से भगवान शिव को सम्मान देने के लिए अन्य मंदिर बनवाया। यह मंदिर राजा की बहू के बने भगवान श्रीविष्णु के मंदिर के बगल में था।</div><div><br></div><div>जब श्रीहरि के मंदिर का निर्माण हुआ, तो इस मंदिर का नाम सहस्त्रबाहु मंदिर रखा गया। सहस्त्रबाहु का अर्थ हजार भुजाओं वाला, जोकि श्रीहरि विष्णु के रूप का प्रतीक था। वहीं समय बीतने के साथ ही इस मंदिर को सास-बहु मंदिर के नाम से जाना गया।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 19 Aug 2026 09:42:24 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/fact-behind-saas-bahu-name-given-to-lord-vishnu-sahastrabahu-temple-know-full-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Wednesday Remedies: बुधवार और गणपति पूजा का खास कनेक्शन, संकटनाशन स्तोत्र से दूर होगी हर समस्या]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/connection-between-wednesday-and-lord-ganesha-worship-sankatnashan-stotra-resolve-problem]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में बुधवार का दिन भगवान गणेश को समर्पित होता है। गणेश भगवान को बुद्धि और ज्ञान का देवता माना जाता है। वहीं बुधवार को भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करने से बप्पा की कृपा प्राप्त होती है। वहीं गणपति बप्पा की कृपा के लिए बुधवार का व्रत भी किया जाता है। बुधवार के दिन भगवान गणेश की पूजा करने से सुख-सौभाग्य और आय में वृद्धि होती है। वहीं इससे आर्थिक स्थिति मजबूत होती है।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप भी आर्थिक विषमता से मुक्ति पाना चाहते हैं। तो बुधवार के दिन भक्ति भाव से भगवान गणेश की पूजा करनी चाहिए। वहीं पूजा के समय इस खास स्त्रोत का पाठ करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/jyotish/love-horoscope-for-18-august-2026" target="_blank">Love Horoscope For 18 August 2026 | आज का प्रेम राशिफल 18 अगस्त  2026 | प्रेमियों के लिए कैसा रहेगा आज का दिन</a></h3><div><br></div><h2>संकटनाशन गणेश स्तोत्र</h2><div>प्रणम्यं शिरसा देव गौरीपुत्रं विनायकम ।</div><div>भक्तावासं: स्मरैनित्यंमायु:कामार्थसिद्धये ॥</div><div><br></div><div>प्रथमं वक्रतुंडंच एकदंतं द्वितीयकम ।</div><div>तृतीयं कृष्णं पिङा्क्षं गजवक्त्रं चतुर्थकम॥</div><div><br></div><div>लम्बोदरं पंचमं च षष्ठं विकटमेव च ।</div><div>सप्तमं विघ्नराजेन्द्रं धूम्रवर्ण तथाष्टकम् ॥</div><div><br></div><div>नवमं भालचन्द्रं च दशमं तु विनायकम ।</div><div>एकादशं गणपतिं द्वादशं तु गजाननम ॥</div><div><br></div><div>द्वादशैतानि नामानि त्रिसंध्य य: पठेन्नर:।</div><div>न च विघ्नभयं तस्य सर्वासिद्धिकरं प्रभो ॥</div><div><br></div><div>विद्यार्थी लभते विद्यां धनार्थी लभते धनम् ।</div><div>पुत्रार्थी लभते पुत्रान् मोक्षार्थी लभते गतिम् ॥</div><div><br></div><div>जपेद्वगणपतिस्तोत्रं षड्भिर्मासै: फलं लभेत् ।</div><div>संवत्सरेण सिद्धिं च लभते नात्र संशय:॥</div><div><br></div><div>अष्टभ्यो ब्राह्मणेभ्यश्च लिखित्वां य: समर्पयेत ।</div><div>तस्य विद्या भवेत्सर्वा गणेशस्य प्रसादत:॥</div><div><br></div><h2>ऋणहर्ता गणेश स्तोत्र</h2><div>ॐ सिन्दूर-वर्णं द्वि-भुजं गणेशं लम्बोदरं पद्म-दले निविष्टम् ।</div><div>ब्रह्मादि-देवैः परि-सेव्यमानं सिद्धैर्युतं तं प्रणामि देवम् ॥</div><div><br></div><div>सृष्ट्यादौ ब्रह्मणा सम्यक् पूजित: फल-सिद्धए ।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>त्रिपुरस्य वधात् पूर्वं शम्भुना सम्यगर्चित:।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>हिरण्य-कश्यप्वादीनां वधार्थे विष्णुनार्चित:।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>महिषस्य वधे देव्या गण-नाथ: प्रपुजित:।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>तारकस्य वधात् पूर्वं कुमारेण प्रपूजित: ।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे॥</div><div><br></div><div>भास्करेण गणेशो हि पूजितश्छवि-सिद्धए ।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>शशिना कान्ति-वृद्धयर्थं पूजितो गण-नायक:।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>पालनाय च तपसां विश्वामित्रेण पूजित:।</div><div>सदैव पार्वती-पुत्र: ऋण-नाशं करोतु मे ॥</div><div><br></div><div>इदं त्वृण-हर-स्तोत्रं तीव्र-दारिद्र्य-नाशनं,</div><div>एक-वारं पठेन्नित्यं वर्षमेकं सामहित:।</div><div>दारिद्र्यं दारुणं त्यक्त्वा कुबेर-समतां व्रजेत्॥</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 18 Aug 2026 12:25:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/connection-between-wednesday-and-lord-ganesha-worship-sankatnashan-stotra-resolve-problem</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Nag Panchami Tradition: आखिर क्यों पीटी जाती है कपड़े की गुड़िया? जानिए UP की इस अनोखी Ritual के पीछे की पौराणिक कहानी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/analyzing-the-gudiya-peetne-ritual-on-nag-panchami]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आज यानी 17 अगस्त 2026 को नाग पंचमी का त्योहार मनाया जा रहा है। अक्सर लोग यहीं जानते हैं कि इस दिन नाग देवता की पूजा की जाती है, हालांकि उत्तर प्रदेश के कुछ जगहों पर इस दिन एक अनोखी लोकपरंपरा देखने को मिलती है। इसके के बारे में कम ही लोग जानते होंगे।</div><div><span style="font-size: 1rem;">असल में नाग पंचमी के दिन कपड़े की गुड़िया बनाई जाती है और फिर इसे डंडे से पीटने की रस्म पूरी की जाती है। अब लोगों के मन में यही सवाल आया होगा कि आखिर गुड़िया पीटने का नाग पंचमी से क्या संबंध है? दरअसल, इसके पीछे एक लोककथा प्रचलित है, जो कि एक भाई, उसकी बहन और एक सांप से जुड़ी है। आइए आपको इस बारे में विस्तार से बताते है-</span></div><div><br></div><div><b>नाग पंचमी पर कहां निभाई जाती है गुड़िया पीटने की परंपरा?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">उत्तर प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में खासकर बुंदेलखंड से जुड़ी लोकपरंपराओं में कपड़े की गुड़िया पीटने का रस्म देखने को मिलती है। लेकिन, गोंड़ा, कानपुर, बलरामपुर, अयोध्या और बहराइच जैसी जगहों पर भी इस तरह की परपंरा को निभाई जाती है। नाग पंचमी के दिन कपड़े से एक छोटी गुड़िया बनाई जाती है। इसके बाद बच्चे या भाई उसे डंडे से पीटते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>भाई-बहन से जुड़ी है इसकी कहानी</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, इसके पीछे एक लोककथा सुनाई जाती है। जिसमें एक भाई और उसकी बहन की कहानी है। बताया जाता है कि बहुत समय पहले एक लड़का भगवान शिव का भक्त था। वह नियमित तौर पर मंदिर जाता था और पूजा करता था। जिस मंदिर में वह जाता था, वहां एक साप रहता था। सांप उस लड़के को नुकसान नहीं पहुंचाता था। सांप उस लड़के पास जाता है और उसके पैर में लिपट जाता था। लड़का भी उससे डरता नहीं था।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">एक दिन लड़का अपनी बहन को भी मंदिर लेकर गया। पूजा के बाद जब दोनों वहां से जाने लगे तो सांप हमेशा की तरह लड़के के पास आया और उसके पैर से लिपट गया।</span></div><div><br></div><div><b>सांप को देखकर डर गई बहन</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब बहन ने देखा भाई के पैर से सांप लिपटा हुआ, तो वह डर गई। उसे लगा कि सांप उसके भाई को डंस लेगा। इसी डर के कारण उसकी बहन ने डंडा उठाकर सांप को पीट दिया। डंडे की चोट से सांप की मौत हो गई। जब गांव के लोगों को इस बारे में पता चला, तो उन्होंने यही समझा कि लड़की से अनजाने में कोई गलती हुई है।</span></div><div><br></div><div><b>बच्चे की जगह गुड़िया को मिली सजा</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">लोककथा के मुताबिक, लड़की ने यह सब जानबूझकर नहीं किया था। उसने डर के कारण अपने भाई को बचाने की कोशिश की। ऐसे गांव वालों ने उसे सजा देने के स्थान पर कपड़े की एक गुड़िया बनाई। फिर गांव के लोगों ने गुड़िया को डंडे से पीटा। उस दिन से नाग पंचमी के दिन गुड़िया पीटने वाली परंपरा चलती जा रही है।</span></div><div><br></div><div><b>क्यों गुड़िया बनाई जाती है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, इस कहानी में गुड़िया का इस्तेमाल सिर्फ एक प्रतीक के तौर पर किया जाता है। समय के साथ यह रस्म वहां स्थनीय परंपरा का रुप ले लिया है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>नांग पंचमी पर इसका क्या लेना-देना है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">खासतौर पर इस रस्म का संबंध उस लोककथा में हुई सांप की मौत से है। नाग पंचमी पर नागों के प्रति सम्मान और उनकी पूजा के लिए खास मानी जाती है। इसी कारण से यह कहानी और गुड़िया पीटने की परंपरा नाग पंचमी से जुड़ी है।&nbsp;</span></div><div><br></div><div><b>गुड़िया बनाने के बाद क्या किया जाता है।</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">सबसे पहले कपड़ों की गुड़िया बना लेते हैं। फिर नाग पंचमी के दिन उसे डंडे से पीटने की रस्म निभाई जाती है। कुछ जगहों पर जब रस्म पूरी हो जाती है, तो इन गुड़ियों को पानी में बहाने या विसर्जित करने की परंपरा है।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 12:39:43 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/analyzing-the-gudiya-peetne-ritual-on-nag-panchami</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Rajasthan के Pushkar में छुपा है 27वां शक्तिपीठ, जानिए Puruhota Hill पर मां सती के मणिबंध गिरने का रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/27th-shaktipeeth-in-pushkar-mystery-behind-falling-of-maa-sati-manibandh-on-puruhota-hill]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका आदि देशों में आदिशक्ति मां के 52 शक्तिपीठ हैं। इन शक्तिपीठों में से एक पुष्कर की पुरूहोता पहाड़ी की तलहटी में राजराजेश्वरी मणिवेदिका शक्तिपीठ स्थित है। यह 27वां शक्तिपीठ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक यहां पर मां सती के हाथ की कलाइयां गिरी थीं। यहां पर मां आदिशक्ति और मां गायत्री एक साथ विराजमान हैं। बता दें कि स्थानीय लोग मां को चामुंडा माता के नाम से भी जानते हैं। वहीं स्कंद पुराण में भी इस पावन स्थान के बारे में उल्लेख मिलता है।</div><div><br></div><h2>27वां शक्तिपीठ</h2><div>सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा की नगरी पुष्कर में जगत जननी माता का 27वां शक्तिपीठ है। सावित्री मां की पहाड़ी के पास पुरूहोता पर्वत है। धार्मिक मान्यता है कि इस पर्वत पर मां सती के दोनों हाथों की कलाइयां गिरी थी। जिससे पर्वत के बीच एक विशाल गड्ढा हो गया था। इस स्थान तक पहुंचना काफी दुर्गम है। माना जाता है कि मां की एक बुजुर्ग भक्त की प्रार्थना पर मां पहाड़ी के बीच तलहटी में आ गई थीं। सदियों से यह स्थान गुप्त और अज्ञान रहा। पुष्कर आने वाले अधिकतर भक्तों को 27वें शक्तिपीठ के बारे में कम जानकारी है। अन्य फेमस मंदिरों की तरह मां के इस पावन शक्तिपीठ का उतना ज्यादा विकास नहीं हो सका है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-architecture-of-3000-year-old-temple-mahadev-remains-submerged-in-ganga-water" target="_blank">Famous Shiv Temple: 3000 साल प्राचीन मंदिर की अनोखी बनावट, जहां गंगा जल में डूबे हैं महादेव</a></h3><div><br></div><h2>पौराणिक कथा</h2><div>पौराणिक कथाओं के मुताबिक महाराज दक्ष प्रजापति की पुत्री सती से भगवान शिव का विवाह हुआ था। लेकिन इस विवाह से महाराजा दक्ष प्रसन्न नहीं थे। जब प्रजापति दक्ष ने यज्ञ किया तो ब्रह्मा, विष्णु समेत सभी देवी-देवताओं को आमंत्रण दिया। लेकिन अपने दामाद और पुत्री सती को आमंत्रित नहीं किया। लेकिन सती बिना आमंत्रण के अपने पिता के घर यज्ञ में शामिल होने के लिए जाती हैं। सती के पिता के घर पहुंचने पर दक्ष ने भगवान शिव का अपमान किया। जिससे क्रोधित होकर मां सती ने अग्निकुंड में अपनी देह का त्याग कर दिया।</div><div><br></div><h2>इस स्थान पर गिरे थे मणिबंध</h2><div>जब सती ने देहत्याग किया, तो भगवान शिव मां सती की देह को अपने हाथों में उठाकर रौद्र रूप के साथ ब्रह्मांड में इधर-उधर भटकने लगते हैं। जिससे सृष्टि में हाहाकार मच जाता है। ऐसे में श्रीविष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से मां सती की देह के टुकड़े कर दिए। मां सती की देह के टुकड़े जहां-जहां धरती पर गिरे, वहां-वहां पर शक्तिपीठ बन गए। पुष्कर में स्थिति पुरुहोता पर्वत पर मां सती के दोनों हाथ के मणिबंध यानी कलाइयां गिरी थीं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 17 Aug 2026 10:37:50 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/27th-shaktipeeth-in-pushkar-mystery-behind-falling-of-maa-sati-manibandh-on-puruhota-hill</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Shiv Temple: 3000 साल प्राचीन मंदिर की अनोखी बनावट, जहां गंगा जल में डूबे हैं महादेव]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-architecture-of-3000-year-old-temple-mahadev-remains-submerged-in-ganga-water]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में महादेव के कई फेमस मंदिर हैं, जो अपनी अनोखी परंपराओं और रहस्यों के कारण जाने जाते हैं। उन्हीं में से एक केरल के मलप्पुरम जिले में नीरपथूर महादेव मंदिर है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां पर भगवान शिव का शिवलिंग सालभर पानी में डूबा रहता है। यही कारण है कि इस मंदिर में दूर-दूर से भक्त दर्शन के लिए आते हैं।</div><div><br></div><div>मॉनसून में मंदिर का नजारा बेहद खूबसूरत हो जाता है। सावन में यहां एक अलग रंग देखने को मिलता है। यहां चारों ओर हरियाली, बारिश का मौसम और पानी से भरा गर्भगृह इस मंदिर की खूबसूरती को कई गुना बढ़ा देता है। बताया जा रहा है कि यह मंदिर करीब 3,000 पुराना है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visiting-famous-shiva-temples-in-himachal-offers-immense-peace" target="_blank">Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide</a></h3><div><br></div><h2>कहां है ये मंदिर</h2><div>भगवान शिव का यह मंदिर केरल के मलप्पुरम जिले में पुथूर गांव में है। नीरपथूर महादेव मंदिर का संचालन मालाबार देवस्वम बोर्ड करता है। यहां पर हर साल बड़ी संख्या में भक्त भगवान शिव के दर्शन के लिए आते हैं।</div><div><br></div><h2>इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत</h2><div>नीरपथूर महादेव मंदिर की सबसे बड़ी खासियत गर्भगृह है। यहां पर महादेव शिवलिंग के रूप में विराजमान थे। यहां पूरे साल गर्भगृह में पानी भरा रहता है। यही कारण है कि यह मंदिर केरक के सबसे अनोखे शिव मंदिरों में शामिल है।</div><div><br></div><h2>हमेशा पानी में रहता है शिवलिंग</h2><div>माना जाता है कि मंदिर में मौजूद शिवलिंग स्वयंभू है। यहां कि यह शिवलिंग अपने आप प्रकट हुआ था। वहीं गर्भगृह में भरा यह पवित्र जल मां गंगा का प्रतीक है।</div><div><br></div><h2>क्यों खास होते हैं यहां के दर्शन</h2><div>नीरपथूर महादेव मंदिर के आसपाल हरियाली छाई रहती है। गर्भगृह में मौजूद पानी का दृश्य बेहद सुंदर दिखता है। यहां पर भारी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं। वहीं कई बार भारी बारिश के कारण पानी का लेवल भी बढ़ जाता है। इस कारण मौसम के हिसाब से दर्शन की व्यवस्था बदल दी जाती है।</div><div><br></div><h2>यहां मनाए जाते हैं ये त्योहार</h2><div>नीरपथूर महादेव मंदिर में महाशिवरात्रि का पर्व बहुत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इसके अलावा यहां सहस्र दीपम भी यहां का प्रमुख उत्सव है। इस मौके पर मंदिर में बड़ी संख्या में ऊक्त पहुंचते हैं और दीपक की रोशनी से पूरा परिसर जगमगा उठता है।</div><div><br></div><h2>मंदिर की बनावट</h2><div>यह मंदिर सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं बल्कि अपनी अनोखी बनावट के कारण भी खास है। जहां ज्यादातर मंदिरों में गर्भगृह सूखा रहता है। वहीं यहां पर शिवलिंग पूरे साल पानी से भरा रहता है।</div><div><br></div><h2>ऐसे पहुंचे</h2><div>आप यहां पर हवाई जहाज से पहुंच सकते हैं। बता दें के कालीकट से अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा मंदिर से करीब 60 किमी दूर है।</div><div><br></div><div>वहीं आप यहां पर ट्रेन से आना चाहती हैं, तो तिरूर रेलवे स्टेशन मंदिर से 60.7 किमी दूर है।</div><div><br></div><div>वहीं अगर बस से आते हैं, तो पेरिंथलमन्ना KSRTC बस डिपो मंदिर से करीब 25.9 दूर है।</div><div><br></div><h2>इन बातों का रखें ध्‍यान</h2><div>बारिश के मौसम में फिसलन के लिए कंफर्टेबल जूते पहनें।</div><div>मंदिर के अंदर जाने से पहले वहां के सभी नियमों का पालन करें।</div><div>दर्शन और पूजा के दौरान शांति बनाए रखें।</div><div>अगर आप मॉनसून में यहां जा रहे हैं, तो पहले मौसम की जानकारी ले लें।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 15 Aug 2026 12:40:40 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/unique-architecture-of-3000-year-old-temple-mahadev-remains-submerged-in-ganga-water</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Amarnath Yatra: Sharika Bhawani Temple पहुंची Chhari Mubarak, महंत दीपेंद्र गिरी ने की विशेष पूजा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amarnath-yatra-chhari-mubarak-reaches-sharika-bhawani]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>अमरनाथ यात्रा के तहत बृहस्पतिवार कोभगवान शिव के प्रतीक के तौर पर केसरिया रंग के वस्त्रों से सजी पवित्र ‘छड़ी मुबारक’ को यहां के प्राचीन शारिका भवानी मंदिर में विशेष पूजा-अर्चना के लिए ले जाया गया।
छड़ी मुबारक के संरक्षक महंत दीपेंद्र गिरी ने कहा, ‘‘प्राचीन परंपराओं के अनुसार, श्रावण शुक्ल प्रतिपदा के मौके पर छड़ी मुबारक स्वामी अमरनाथ जी को हरि पर्वत स्थित शारिका भवानी मंदिर ले जाया गया, ताकि देवी ‘त्रिपुरसुंदरी’ के प्रति श्रद्धा व्यक्त की जा सके।’’</p><p>
उन्होंने कहा कि पूजनमें बड़ी संख्या में साधुओं और श्रद्धालुओं ने भाग लिया। 
 देवी शारिका भवानी को श्रीनगर शहर की इष्ट देवी माना जाता है, जो हरि पर्वत पर एक शिला के रूप में प्रकट हुई थीं।
 शहर के बुदशाह चौक इलाके में स्थित श्री अमरेश्वर मंदिर अखाड़ा भवन में शनिवार को छड़ी स्थापना समारोह आयोजित किया जाएगा और 17 अगस्त को ‘नाग पंचमी’ के दिन पारंपरिक ‘छड़ी पूजन’ किया जाएगा।</p><p>
‘छड़ी मुबारक’ 22 अगस्त को तीर्थयात्रा के मुख्य पड़ाव के लिए रवाना होगी।
गिरी ‘छड़ी मुबारक’ को अमरनाथ की पवित्र गुफा तक ले जाएंगे। वह 28 अगस्त को श्रावण-पूर्णिमा के शुभ अवसर पर पूजा और दर्शन करेंगे। इस यात्रा के दौरान वह 22 और 23 अगस्त को पहलगाम, 24 अगस्त को चंदनवाड़ी, 25 अगस्त को शेषनाग और 26 व 27 अगस्त को पंचतरणी में रात्रि विश्राम करेंगे। 
 दक्षिण कश्मीर में अमरनाथ की पवित्र गुफा के लिए 57 दिनों की वार्षिक तीर्थयात्रा तीन जुलाई को शुरू हुई और यह 28 अगस्त, 2026 को समाप्त होगी।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 18:02:13 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amarnath-yatra-chhari-mubarak-reaches-sharika-bhawani</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Shiv Temple: हिमाचल के इन Famous Shiva Temples के दर्शन से मिलेगी अपार शांति, देखें पूरी Travel Guide]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visiting-famous-shiva-temples-in-himachal-offers-immense-peace]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का महीना भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए सबसे पहले खास होता है। इस दौरान शिवभक्तों की मंदिरों में भारी भीड़ देखने को मिलती है। अगर आप भी इस महीने कहीं घूमने के साथ-साथ भोलेनाथ के दर्शन करना चाहती हैं। तो हिमाचल प्रदेश एक अच्छा ऑप्शन हो सकता है। यहां कई ऐसे मंदिर हैं, जो ऊंचाई पर बने हुए हैं। इस शिव मंदिरों तक पहुंचने का सफर उतना ही खूबसूरत होता है, जितने सुंदर यहां के नजारे होते हैं।</div><div><br></div><h2>बिजली महादेव मंदिर</h2><div>कुल्लू में ऊंचे पहाड़ों पर स्थित बिजली महादेव मंदिर हिमाचल प्रदेश का सबसे फेमस शिव मंदिर है। यह मंदिर करीब 2,460 मीटर की ऊंचाई पर है। यहां से कुल्लू और पार्वती वैली का खूबसूरत नजारा बेहद साफ दिखता है। मंदिर की मान्यता है कि समय-समय पर शिवलिंग पर बिजली गिरती है। फिर पारंपरिक तरीके से पुजारी शिवलिंग को जोड़ते हैं। यही कारण है कि इस मंदिर का नाम बिजली महादेव रखा गया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/how-to-worship-baba-barfani-and-correct-way-to-distribute-prasad" target="_blank">Amarnath Yatra Rituals: कैसे करें बाबा बर्फानी की पूजा और क्या है प्रसाद वितरण का सही तरीका</a></h3><div><br></div><h2>बैजनाथ शिव मंदिर</h2><div>हिमाचल के कांगड़ा जिले में बैजनाथ मंदिर भी है। जो भोलेनाथ को समर्पित है। यह धौलाधार पर्वत की तलहटी में बना हुआ है। भगवान शिव का यह मंदिर अपनी खूबसूरत पत्थर की नक्काशी और अपने पुराने इतिहास के लिए जाना जाता है। माना जाता है कि रावण भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए यहीं पर तपस्या की थी। सावन के महीने में यहां पर बड़ी संख्या में लोग दर्शन के लिए आते हैं।</div><div><br></div><h2>मणिमहेश</h2><div>चंबा जिले में स्थित मणिमहेश भगवान भोलनाथ का सबसे पवित्र स्थल है। यहां मणिमहेश लेक और इसके पीछे दिखने वाली मणिमहेश पीक बेहद खूबसूरत लगती है। सावन और जन्माष्टमी के आसपास यहां पर मणिमहेश यात्रा भी निकलती है। समुद्र तल से मणिमहेश कैलाश चोटी की ऊंचाई करीब 5,653 मीटर बताई जाती है।</div><div><br></div><h2>अर्द्धनारीश्वर मंदिर</h2><div>हिमाचल प्रदेश के मंडी शहर को छोटी काशी भी कहा जाता है। क्योंकि यहां पर कई प्राचीन मंदिर हैं। इनमें से एक अर्द्धनारीश्वर मंदिर है। जोकि भगवान शिव और मां पार्वती की शक्ति का प्रतीक है। पहाड़ों के बीच बसे इस शहर का धार्मिक माहौल सावन के महीने में अधिक खास हो जाता है।</div><div><br></div><h2>इन बातों का रखें ध्यान</h2><div>अगर आप भी सावन के महीने में हिमाचल के ऊंचाई वाले शिव मंदिरों में जाने का प्लान बना रहे हैं। तो मौसम की जानकारी पहले ले लें। क्योंकि बारिश की वजह से कई जगह सड़कें फिसलने वाली हो सकती है। इसलिए अच्छी ग्रिप वाले जूते पहनें। साथ में छाता या रेनकोट रख लें। ट्रैकिंग वाले मंदिरों में तब जाएं, जब आप फिजिकली फिट हों।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 13 Aug 2026 16:25:14 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visiting-famous-shiva-temples-in-himachal-offers-immense-peace</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Amarnath Yatra Rituals: कैसे करें बाबा बर्फानी की पूजा और क्या है प्रसाद वितरण का सही तरीका]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/how-to-worship-baba-barfani-and-correct-way-to-distribute-prasad]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अमरनाथ यात्रा शुरू होने के बाद बाबा के दर्शन के लिए शिव भक्तों का तांता लग गया है। हर कोई बाबा बर्फानी को देखने के लिए उत्सुक नजर आ रहा है। इस यात्रा में सबसे कठिन और अहम तीर्थों में से एक मानी जाती है। भक्त भगवान शिव को अर्पित करने के लिए अपने साथ प्रसाद और पूजन की सामग्री लेकर जाते हैं। </div><div>&nbsp;</div><div>जिसका काफी गहरा धार्मिक महत्व होता है। अमरनाथ यात्रा भक्तों को मन की शांति ही नहीं देती है, बल्कि यह आत्मा का परमात्मा से मिलन भी कराती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको अमरनाथ में चढ़ाए जाने वाले प्रसाद और पूजन सामग्री के धार्मिक महत्व के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/kashishwar-temple-in-mohanlalganj-lucknow-entire-shiva-family-manifests-on-single-shivling" target="_blank">Lucknow के Mohanlalganj में स्थित Kashishwar Temple, एक ही शिवलिंग पर दर्शन देता है पूरा शिव परिवार</a></h3><div><br></div><h2>जानें अमरनाथ में प्रसाद और पूजन सामग्री का महत्व</h2><div>शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ाना शुभ माना जाता है। इससे तीन गुण सत, रज और तम संतुलित होते हैं।</div><div><br></div><div>मिश्री और फल अर्पित करना भी शुद्धता का प्रतीक माना जाता है। यह भक्ति की सरलता को दर्शाता है।</div><div><br></div><div>नारियल अर्पित करना भगवान के प्रति आपके समर्पण को दिखाता है। इसलिए भी प्रसाद चढ़ाया जाता है।</div><div><br></div><div>पूजा में कपूर का इस्तेमाल वातावरण को शुद्ध करने और सकारात्मक ऊर्जा पैदा करने के लिए किया जाता है।</div><div><br></div><h2>प्रसाद के सेवन और बांटने के नियम</h2><div>भगवान शिव के मंदिर से लाए प्रसाद को फौरन नहीं खाना चाहिए। इसको सबसे पहले घर के मंदिर में रखें। इसके बाद आप खास सदस्यों और दोस्तों को बांटें।</div><div><br></div><div>तीर्थ का प्रसाद खुद अकेले खाने की जगह दूसरों को खिलाने से इसका फल कई गुना बढ़ जाता है।</div><div><br></div><div>प्रसाद खाने से पहले हाथ-पैर धोकर शुद्ध हो जाएं और कभी भी जूठे हाथों से प्रसाद को स्पर्श न करें।</div><div><br></div><div>हमेशा प्रसाद को आने के बाद ही बांटे, इसको ज्यादा समय के लिए नहीं रखना चाहिए।</div><div><br></div><div>बता दें कि अमरनाथ यात्रा में ले जाने वाली पूजन सामग्री सिर्फ बाजार से खरीदी गई वस्तुएं नहीं है। बल्कि यह भक्त की भावनाएं हैं, जो अपने आराध्य को समर्पित होता है। यह वस्तुएं हमको यह सिखाती हैं कि ईश्वर की भक्ति में भाव होना जरूरी होता है। जब हम पवित्र हृदय से बाबा बर्फानी को यह भेंट करते हैं, तो हम खुद को उनके चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देते हैं। इसलिए भक्त बाबा बर्फानी के दर्शन के लिए काफी लंबा इंतजार करते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 11 Aug 2026 10:54:06 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/how-to-worship-baba-barfani-and-correct-way-to-distribute-prasad</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan 2026: Omkareshwar Jyotirlinga जहां विश्राम करते हैं Lord Shiva, जानें इस पावन धाम का History और धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/omkareshwar-jyotirlinga-history-and-religious-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का महीना चल रहा है। सभी श्रद्धालु महादेव की पूजा-अर्चना और प्रभु की कृपा पाने में लगे हैं। कई लोग सावन के महीने में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन करने के लिए जाते हैं, इन्हीं से एक है चौथा ज्योतिर्लिंग ओंकारेश्वर है। ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग का वर्णन स्कंद पुराण, शिव पुराण और वायु पुराण जैसे प्राचीन धार्मिक ग्रंथों में भी देखने को मिलता है। मध्य प्रदेश के नर्मदा नदी के उत्तरी तट पर स्थित ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग, जो कि इंदौर से करीब 77 किलोमीटर की दूरी पर बसा हुआ है। धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, यहां पर रोजाना तीनों लोकों की यात्रा के बाद भगवान शिव विश्राम करने के लिए आते हैं। इसलिए इस मंदिर में भगवान शिव के विश्राम व्यवस्था, अनुष्ठान और शयन दर्शन का ध्यान रखा जाता है। आइए आपको यहां के इतिहास के बारे में बताते हैं।</div><div><br></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>ओंकारेश्वर के&nbsp;</b></span><b style="font-size: 1rem;">दर्शन नहीं किए तो तीर्थ यात्रा अधूरी मानी जाती है</b></div><div><br></div><div>हिंदू धर्म में सभी तीर्थ यात्रा के दर्शन के बाद ओंकारेश्वर के दर्शन करना व पूजन का विशेष महत्व माना जाता है। यहां पर तीर्थ यात्री सभी तीर्थों का जल लेकर ओंकारेश्वर धाम में शिवलिंग पर जला अर्पित करते हैं, तभी सभी तीर्थ पूर्ण माने जाते हैं। वरना वे यात्रा अधूरी मानी जाती है।</div><div><br></div><div><b>मंदिर में 3 समय होती है आरती</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">बता दें कि, ओंकारेश्वर में कई मंदिर स्थित है। नर्मदा के दोनों दक्षिणी व उत्तरी तटों पर मंदिर बसे हैं। ओंकारेश्वर में ओमकार पर्वत का परिक्रमा पथ करीब 7 किलोमीटर लंबा मार्ग है, जो कि पक्के सीमेंट से बना है। रास्ते भर मन मोह लेने वाले नजारे देखने को मिलते हैं। परिक्रमा पथ पर सुंदर संगम स्थल भी हैं।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">ओंकारेश्वर मंदिर में रोजाना 3 पूजा होती है। तीनों ही पूजा कराने के लिए अगल-अलग पुजारी है। सुबह के समय ट्रस्ट के पुजारी, दोपहर के समय सिंधिया घराने के पुजारी और शाम की पूजा में होलकर स्टेट के पुजारी पूजा करते हैं।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">हर सोमवार को एक पालकी पर भगवान ओंकारेश्वर की तीन मुखों वाली सोने की मूर्ति को रखकर जुलूस निकाला जाता है। इस भव्य नजारे को देखने के लिए स्थानीय लोगों को भगवान के दर्शन प्राप्त होते हैं।&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 17:52:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/omkareshwar-jyotirlinga-history-and-religious-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Lucknow के Mohanlalganj में स्थित Kashishwar Temple, एक ही शिवलिंग पर दर्शन देता है पूरा शिव परिवार]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/kashishwar-temple-in-mohanlalganj-lucknow-entire-shiva-family-manifests-on-single-shivling]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के मोहनलालगंज में स्थित काशीश्वर मंदिर की अपनी विशेषता के लिए फेमस है। यहां पर स्थापित करीब 4 फीट ऊंचे शिवलिंग में पूरा शिव परिवार विराजमान माना जाता है। इस शिवलिंग पर प्राकृतिक रूप से बनी लाल धारियों और आकृतियों में मां पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की छवि साफ दिखेगी। राजा काशी प्रसाद द्वारा यह मंदिर 1860 में बनवाया गया था। तो आइए जानते हैं इस मंदिर की खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>इतिहास</h2><div>मंदिर निर्माण का कार्य राजा काशी प्रसाद ने 1860 में करवाया था। उन्हीं के नाम पर इस मंदिर का नाम भी काशीश्वर महादेव पड़ा। यह मंदिर भारतीय स्थापत्य कला और लखनवी नवाबी वास्तुकला के अधार पर बना है। इस मंदिर में अष्टकोणीय यानी 8 कोनों वाली संरचना है। वहीं इसके चारों और 8 छोटे शिवालय बने हुए हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/learn-about-the-benefits-of-worshipping-a-shivling-made-from-a-specific-material" target="_blank">विभिन्न द्रव्यों से बनते हैं शिवलिंग, जानिये किस द्रव्य से बने शिवलिंग के पूजन से क्या लाभ होता है?</a></h3><div><br></div><div>इस मंदिर का शिखर इतना ऊंचा है कि इसको कई किमी दूर से भी देखा जा सकता है। काशीश्वर महादेव का मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित स्थल है।</div><div><br></div><h2>शिवलिंग पर विराजमान पूरा शिव परिवार</h2><div>मोहनलालगंज में मौजूद इस मंदिर में शिवलिंग में मां पार्वती, भगवान गणेश और कार्तिकेय की छवि है। शिवलिंग पर बनी लाल धारियों को शिव परिवार की छवि मानी जाती है। इसके अलावा गर्भग्रह में भगवान गणेश, मां दुर्गा, सूर्य देव और भगवान विष्णु की मूर्तियां विराजमान हैं। वहीं मंदिर के गर्भग्रह के बाहर नंदी महाराज विराजमान है</div><div><br></div><h2>मंदिर खुलने और आरती का समय</h2><div>मंदिर सुबह 5 बजे से रात 10 बजे तक खुला रहता है। महाशिवरात्रि और सावन के महीने में यहां भक्तों की भारी भीड़ लगती है। प्रतिदिन शाम को डमरू, नगाड़ों और मंजीरों की थाप पर बाबा का भव्य शृंगार और महाआरती की जाती है। इसके अलावा वह मंदिर के बारे में बताते हुए कहते हैं कि मंदिर का शिखर इतना ऊंचा है, कि पांच किलोमीटर दूर से यह नजर आता है।</div><div><br></div><h2>ऐसे पहुंचे काशीश्वर महादेव मंदिर</h2><div>अगर आप भी इस सावन काशीश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करना चाहती हैं। तो आपको लखनऊ चारबाग स्टेशन या रायबरेली स्टेशन आना होगा।</div><div><br></div><div>लखनऊ चारबाग स्टेशन से मोहनलालगंज की दूरी 25-30 किमी है। चारबाग से आप ऑटो या बस से यहां तक आ सकती हैं।</div><div><br></div><div>वहीं रायबरेली स्टेशन से मोहनलालगंज की दूरी करीब 58 किमी है। आप बस या ऑटो से यहां पहुंच सकती हैं।</div><div><br></div><div>वहीं मोहनलालगंज मेन रोड से मंदिर की दूरी करीब 740 किमी है। यहां से आप पैदल या फिर ऑटो आदि से मंदिर तक पहुंच सकती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 16:29:35 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/kashishwar-temple-in-mohanlalganj-lucknow-entire-shiva-family-manifests-on-single-shivling</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[विभिन्न द्रव्यों से बनते हैं शिवलिंग, जानिये किस द्रव्य से बने शिवलिंग के पूजन से क्या लाभ होता है?]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/learn-about-the-benefits-of-worshipping-a-shivling-made-from-a-specific-material]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>शिवलिंग सम्पूर्ण वेदमय, समस्य देवमय, समस्त भूधर, सागर, गगनमिश्रित सम्पूर्ण विश्वब्रह्माण्डमय माना जाता है। वह शिवशक्तिमय, त्रिगुणमय और त्रिदेवमय भी सिद्ध होने से सबके लिए उपास्य है। इसलिये सृष्टि के प्रारम्भ से ही समस्त देवता, ऋषि, मुनि, असुर, मनुष्यादि विभिन्न ज्योतिर्लिंगों, स्वयंभूलिंग, मणिमय, रत्नमय, धातुमय, मृण्मय, पार्थिव तथा मनोमय आदि लिंगों की उपासना करते आये हैं। स्कन्दपुराण के अनुसार इसी उपासना से इन्द्र, वरूण, कुबेर, सूर्य, चंद्र आदि का स्वर्गाधिपत्य, राजराजाधिपत्य, दिक्पालपद, लोकपालपद, प्राजापत्य पद तथा पृथ्वी पर राजाओं के सार्वभौम चक्रवर्ती साम्राज्य की प्राप्ति होती आयी है। मार्कण्डेय, लोमश आदि ऋषियों के दीर्घायुष्टव, नैरुज्य, ज्ञान−विज्ञान तथा अणिमादिक अष्ट ऐश्वर्यों की सिद्धि का मूल कारण भी योगयोगेश्वर भगवान शंकर के मूल प्रतीक लिंग का विधिवत पूजन ही रहा है।</div><div><br></div><div>भारत वर्ष में 'पार्थिव' पूजा के साथ ही विशेष स्थानों में पाषाणमय शिवलिंग प्रतिष्ठित और पूजित होते हैं। ये अचल मूर्तियां होती हैं। वाणलिंग या सोने−चांदी के छोटे लिंग जंगम कहलाते हैं। इन्हें प्राचीन पाशुपत−सम्प्रदाय एवं लिंगायत−सम्प्रदाय वाले पूजा के व्यवहार में लाने के लिए अपने साथ भी रखते हैं। लिंग विविध द्रव्यों के बनाये जाते हैं। गरूण पुराण में इसका अच्छा विस्तार है। उसमें से कुछ का संक्षेप में परिचय इस प्रकार है-</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-abode-of-lord-shiva-at-ellora-kailasa-temple-built-through-hard-work-of-7000-laborers" target="_blank">Ellora Kailasanatha Temple: एलोरा में भगवान शिव का दिव्य धाम, 7000 मजदूरों की मेहनत से बना Kailasa Temple</a></h3><div>1. गन्धलिंग दो भाग कस्तूरी, चार भाग चंदन और तीन भाग कुंकुम से बनाये जाते हैं। शिवसायुज्यार्थ इसकी अर्चा की जाती है।</div><div><br></div><div>2. पुष्पलिंग विविध सौरमय फूलों से बनाकर पृथ्वी के आधिपत्य लाभ के लिए पूजे जाते हैं।</div><div><br></div><div>3. गोशकृल्लिंग, स्वच्छ कपिल वर्ण की गाय के गोबर से बनाकर पूजने से ऐश्वर्य मिलता है। अशुद्ध स्थान पर गिरे गोबर का व्यवहार वर्जित है।</div><div><br></div><div>4. बालुकामयलिंग, बालू से बनाकर पूजने वाला विद्याधरत्व और फिर शिवसायुज्य प्राप्त करता है।</div><div><br></div><div>5. यवगोधूमशालिजलिंग, जौ, गेहूं, चावल के आटे का बनाकर श्रीपुष्टि और पुत्रलाभ के लिए पूजते हैं।</div><div><br></div><div>6. सिताखण्डमयलिंग मिस्री से बनता है, इसके पूजन से आरोग्य लाभ होता है।</div><div><br></div><div>7. लवणजलिंग हरताल, त्रिकटु को लवण में मिलाकर बनता है। इससे उत्तम प्रकार का वशीकरण होता है।</div><div><br></div><div>8. तिलपिष्टोत्थलिंग तिल को पीसकर उसके चूर्ण से बनाया जाता है, यह अभिलाषा सिद्ध करता है।</div><div><br></div><div>9−11. भस्मयलिंग सर्वफलप्रद है, गुडोत्थलिंग प्रीति बढ़ाने वाला है और शर्करामयलिंग सुखप्रद है।</div><div><br></div><div>12. वंशांकुरमय (बांस के अंकुर से निर्मित) लिंग वंशकर है।</div><div><br></div><div>13−14. पिष्टमय विद्याप्रद और दधिदुग्धोद्भवलिंग कीर्ति, लक्ष्मी और सुख देता है।</div><div><br></div><div>15−18. धान्यज धान्यप्रद, फलोत्थ फलप्रद, धात्रीफलजात मुक्तिप्रद, नवनीतज कीर्ति और सौभाग्य देता है।</div><div><br></div><div>19−24. दूर्वाकाण्डज अपमृत्युनाशक, कर्पूरज मुक्तिप्रद, अयस्कान्तमणिज सिद्धिप्रद, मौक्तिक सौभाग्यकर स्वर्णिनर्मित महामुक्तिप्रद, राजत भूतिवर्धक है।</div><div><br></div><div>25−33. पित्तलज तथा कांस्यज मुक्तिद, त्रपुज, आयस और सीसकज शत्रुनाशक होते हैं। अष्टधातुज सर्विसद्धिप्रद, अष्टलौहजात कुष्ठनाशक, वैदूर्यज शत्रुदर्पनाशक और स्फटिकलिंग सर्वकामप्रद हैं।</div><div><br></div><div>परंतु ताम्र, सीसक, रक्तचंदन, शंख, कांसा, लोहा, इन द्रव्यों के लिंगों की पूजा कलियुग में वर्जित है। पारे का शिवलिंग विहित है यह महान ऐश्वर्यप्रद है। लिंग बनाकर उसका संस्कार पार्थिव लिंगों को छोड़कर प्रायः अन्य लिंगों के लिए करना पड़ता है। स्वर्णपात्र में दूध के अंदर तीन दिनों तक रखकर फिर 'त्र्यम्बकं यजामहे' इत्यादि मंत्रों से स्नान कराकर वेदी पर पार्वतीजी की षोडशोपचार से पूजा करनी उचित है। फिर पात्र से उठाकर लिंग को तीन दिन गंगाजल में रखना होता है। फिर प्राण प्रतिष्ठा करके स्थापना की जाती है।</div><div><br></div><div>पार्थिवलिंग एक या दो तोला मिट्टी लेकर बनाते हैं। ब्राह्मण सफेद, क्षत्रिय लाल, वैश्य पीली और शूद्र काली मिट्टी ग्रहण करते हैं। परंतु यह जहां अव्यवहार्य हो, वहां सामान्य मृत्तिका का प्रयोग भी किया जा सकता है। लिंग साधारणतया अंगुष्ठप्रमाण का बनाया जाता है। पाषाणादि के लिंग इससे बड़े भी बनते हैं। लिंग से दूनी वेदी और उसका आधा योनिपीठ का मान होना चाहिए। योनिपीठ या मस्तकादि अंग बिना लिंग बनाना अशुभ है।</div><div><br></div><div>लिंगमात्र की पूजा में पार्वती−परमेश्वर दोनों की पूजा हो जाती है। लिंग के मूल में ब्रह्मा, मध्य देश में त्रैलोक्यनाथ विष्णु और ऊपर प्राणस्वरूप महादेव स्थित हैं। वेदी महादेवी हैं और लिंग महादेव हैं। अतः एक लिंग की पूजा में सबकी पूजा हो जाती है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 08 Aug 2026 15:42:58 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/learn-about-the-benefits-of-worshipping-a-shivling-made-from-a-specific-material</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ellora Kailasanatha Temple: एलोरा में भगवान शिव का दिव्य धाम, 7000 मजदूरों की मेहनत से बना Kailasa Temple]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-abode-of-lord-shiva-at-ellora-kailasa-temple-built-through-hard-work-of-7000-laborers]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान शिव और मंदिरों का बहुत अधिक महत्व माना जाता है। माना जाता है कि भगवान ही इस सृष्टि का संचालन करते हैं। हिंदू मान्यता के मुताबिक भगवान हर जगह मौजूद हैं, लेकिन भारत की संस्कृति ऐसी है कि यहां पर जगह-जगह आपको अलग-अलग देवी-देवताओं के मंदिर मिल जाएंगे। सदियों से ऐसा चलता आ रहा है कि लोग अपनी श्रद्धा से मंदिरों का निर्माण करवाते हैं।</div><div><br></div><div>आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको एक 100 साल के भी ज्यादा समय में बने एक मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं। महाराष्ट्र के औरंगाबाद जिले में स्थित एलोरा की गुफाओं में यह मंदिर है। इस मंदिर को एलोरा के कैलाश मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। 276 फीट लंबे और 154 फीट चौड़े इस मंदिर की खासियत यह है कि इसको सिर्फ एक चट्टान काटकर बनाया गया है। वहीं इसकी ऊंचाई की बात करें, तो यह मंदिर किसी दो या तीन मंजिला इमारत के बराबर है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/for-moksha-in-kashi-it-essential-to-bow-at-thresholds-of-these-six-ancient-temples" target="_blank">Moksha के लिए Kashi में सिर्फ Vishwanath नहीं, इन 6 प्राचीन Temples की चौखट पर माथा टेकना है बेहद जरूरी</a></h3><div><br></div><div>माना जाता है कि इस मंदिर के निर्माण में करीब 40 हजार टन वजनी पत्थरों को काटा गया था। यह मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसको हिमालय के कैलाश की तरह देने की कोशिश की गई है।</div><div><br></div><div>माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कराने वाले राजा का मानना था कि अगर कोई व्यक्ति हिमालय तक नहीं पहुंच पाए, तो वह यहां पर आकर अपने आराध्य भगवना शिव का दर्शन कर लें।</div><div><br></div><div>मालखेड स्थित राष्ट्रकूट वंश के नरेश कृष्ण (प्रथम) (757-783 ई.) ने इस मंदिर का निर्माण कार्य शुरू करवाया था। इसको बनाने में 100 साल से अधिक का समय लगा था। करीब 7000 मजदूरों ने दिन-रात एक करके इस मंदिर के निर्माण में अपना योगदान दिया था।</div><div><br></div><div>भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर से लोग इस भव्य मंदिर को देखने के लिए आते हैं। यह मंदिर में आज तक कभी पूजा की गई हो, इसका कभी प्रमाण नहीं मिलता है। यहां पर कोई पुजारी नहीं है। साल 1983 में यूनेस्को ने इस जगह को 'विश्व विरासत स्थल' घोषित किया है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 15:50:17 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-abode-of-lord-shiva-at-ellora-kailasa-temple-built-through-hard-work-of-7000-laborers</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[वृंदावन का रहस्यमयी Bhandirvan, जहां स्वयं Brahma Ji ने कराया था Radha-Krishna का दिव्य विवाह: जानिए इसका इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/bhandirvan-where-brahma-ji-wedded-radha-and-krishna]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण की लीलाभूमि ब्रज अत्यंत अलौकिक और रहस्यमयी माने जाते हैं। असल में वृंदावन के 12 मुख्य वनों में शामिल भांडीरवन एक ऐसा ही परम पवित्र स्थल है, जो श्री राधा-कृष्ण के अनोखे और दिव्य विवाह का साक्षी बना है। यहां के लोकल लोगों का मानना है कि राधा-कृष्ण का सांसारिक विवाह नहीं हुआ था, हालांकि शास्त्रों और ब्रज की प्राचीन मान्यताओं के अनुसार, स्वयं जगत्पिता ब्रह्मा जी ने भांडीरवन में आचार्य बनकर दोनों का विवाह संपन्न करवाया था।&nbsp;<span style="font-size: 1rem;">वैसे यह पावन स्थल आज भी भक्ति, प्रेम और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत केंद्र है, जहां कदम रखते ही आलौकिक शांति का अनुभव प्राप्त होता है। आइए आपको बताते हैं भांडीरवन के पौराणिक इतिहास, इसकी रहस्यमयी कथा और अन्य महत्वपूर्ण बातें।</span></div><div><br></div><div><b>क्या कहती है भांडीरवन से जुड़ी कथा?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय नंदबाबा रूपी श्रीकृष्ण को गोद में लेकर भांडीरवन से गुजर रहे थे। उसी दौरान भगवान की इच्छा से अचानक भयंकर आंधी-तूफान आ गया। नंदबाबा घबरा गए और कृष्ण को सुरक्षित रखने के लिए एक विशाल वटवृक्ष के नीचे खड़े हो गए। इसी दौरान वहां श्री राधारानी का प्राकट्य हुआ। नंदबाबा दोनों को दिव्य स्वरुप से भली-भांति परिचित थे, उन्होंने बाल-कृष्ण को राधा जी की गोद में सौंप दिया और प्रणाम कर वहां से चले गए।&nbsp;</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब नंदबाबा यहां से चले गए तो आंधी थम गई और श्रीकृष्ण ने अपना पूर्ण पुरुषोत्तम रुप धारण कर लिया है। फिर&nbsp; बाद में भगवान की योगमाया शक्ति से वहां ब्रह्मा जी प्रकट हुए। ब्रह्मा जी ने वैदिक मंत्रोच्चारण के साथ श्री राधा और कृष्ण का विवाह संस्कार संपन्न करवाया।</span></div><div><br></div><div><b>भांडीरवन की मुख्य विशेषताएं</b></div><div><br></div><div><b>राधा-कृष्ण मुख्य मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span><b style="font-size: 1rem;">- विवाह स्थल मंदिर- </b><span style="font-size: 1rem;">आपको बता दें कि, भांडीरवन के मुख्य मंदिर में एक विशाल पेड़ के नीचे श्री राधा-कृष्ण की मूर्तियां हैं, जहां वे एक-दूसरे को वरमाना पहना रहे हैं और ब्रह्मा जी विवाह की रस्में पूरी करा रहे हैं।</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">- बलराम जी का मंदिर-</b><span style="font-size: 1rem;"> यहां पर विवाह स्थल के पास ही बलराम जी का मंदिर स्थित है। यह वह स्थान है, जहां बलराम जी ने कंस द्वारा भेजे गए दैत्य प्रलंबसुर का वध किया था।</span></div><div><br></div><div><b>भांडीरवन का गोपनीय रहस्य</b></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>- एक कल्प भजन का पुण्य-</b> श्रीमद्भागवत के मुताबिक, भांडीरवन में 1 घंटा बिताना 1 कल्प (करीब 4.32 अरब वर्ष) तक लगातार भजन-कीर्तन करने के समान फलदायी मानी गई है।</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">- राधारानी की अनुकंपा-</b><span style="font-size: 1rem;"> धार्मिक मान्यता है कि यहां वहीं श्रद्धालु आते हैं, जिन्हें राधारानी बुलाती हैं।</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">&nbsp;</b></div><div><b style="font-size: 1rem;">पास में स्थित वंशीवट का अद्भुत रहस्य</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भांडीरवन से करीब 600 मीटर की दूरी पर स्थित वंशीवट अत्यंत रमणीक स्थान है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर श्री कृष्ण अपने ग्वाल-बालों के साथ बैठकर भोजन किया करते थे और अपनी मधुर वंशी बजाकर राधारानी व गोपियों को बुलाते थे। यहां भी एक खास वृक्ष हैं, धार्मिक मान्यता है कि यदि कोई सच्चा साधक अपने कान इस पेड़ के तने पर लगाए, तो उसे आज भी रासलीला के मृंदग की मधुर ध्वनि सुनाई देती है।</span></div><div><br></div><div><b>कैसे पहुंचे भांडीरवन?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>- टैक्सी या पर्सनल वाहन-</b> वृंदावन से हाईवे मार्ग से यह करीब 21 किमी की दूरी पर है, जहां कैब या अपनी गाड़ी से आसानी से पहुंचा जा सकता है।</span></div><div><br></div><div><b>- बाइक या यमुना मार्ग-</b> मानसून के अलावा, आप अन्य किसी भी दिनों में केशी घाट से यमुना पार करके बेलवन होते हुए मात्र 8 किमी में भांडीरवन पहुंचा जा सकता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 07 Aug 2026 14:19:59 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/bhandirvan-where-brahma-ji-wedded-radha-and-krishna</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Moksha के लिए Kashi में सिर्फ Vishwanath नहीं, इन 6 प्राचीन Temples की चौखट पर माथा टेकना है बेहद जरूरी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/for-moksha-in-kashi-it-essential-to-bow-at-thresholds-of-these-six-ancient-temples]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>काशी को मोक्षदायिनी कहा जाता है। कहा जाता है कि अगर अपने जीवनकाल में एक बार भी काशी नगरी के दर्शन हो जाएं, तो जातक को मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन यह मोक्ष इतनी आसानी से कहां मिलता है। स्कंद पुराण के 'काशी खंड' का पहला श्लोक है- 'विश्वेशं माधवं धुण्डिं दण्डपाणिं च भैरवम्। वन्दे काशीं गुहां गङ्गां भवानीं मणिकर्णिकाम॥'' जिसका अर्थ है कि सिर्फ विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही काशी धाम की यात्रा पूरी नहीं होती है।</div><div><br></div><div>हिंदू धर्म में ऐसे बहुत सारे तीर्थ स्थल हैं, जिनका अलग-अलग धार्मिक महत्व रहा है। लेकिन काशी विश्वनाथ को हिंदू धर्म का एक बेहद पवित्र धाम बताया गया है। जिसकी यात्रा काशी में मौजूद कुछ अन्य विशेष मंदिरों की चौखट पर माथा टेकने के बाद ही पूरी होती है।</div><div><br></div><h2>जानिए इन मंदिरों के बारे में</h2><div><br></div><h2>काल भैरव मंदिर</h2><div>काशी के कोतवाल काल भैरव हैं। काशी में घुसते ही सबसे पहले इनके दरबार में हाजिर होना जरूरी है। बिना काल भैरव के अनुमति के काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन संभव नहीं है।</div><div><br></div><h2>माता अन्‍नपूर्णा मंदिर</h2><div>ज्योतिर्लिंग के दर्शन के बाद मां अन्नपूर्णा के दर्शन जरूरी है। यह काशी की अन्न की देवी हैं। पुराणों में उल्लेख मिलता है कि जो भी व्यक्ति यहां आता है, उसको जीवन में कभी भी अन्न की कमी नहीं होती है।</div><div><br></div><h2>धुंडीराज विनायक मंदिर</h2><div>काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रवेश द्वार पर ही आपको गणेश जी का प्राचीन मंदिर मिल जाएगा। इनके दर्शन के बिना ज्योतिर्लिंग के दर्शन अधूरे हैं। धुंडीराज के दर्शन के बाद आपको भगवान शिव के दर्शन होते हैं।</div><div><br></div><h2>बिंदु माधव मंदिर</h2><div>बिंदु माधव मंदिर वाराणसी के पंचगंगा घाट पर स्थित है। यहां पर भगवान श्रीहरि विष्णु विराजमान हैं। धार्मिक मान्यता है कि यह वही स्थान है, जहां पर भगवान विष्णु ने महादेव की तपस्या की थी। इनके दर्शन के बिना भी काशी की यात्रा अधूरी मानी जाती है।</div><div><br></div><h2>विशालाक्षी मंदिर</h2><div>51 शक्तिपीठों में से एक विशालक्षी मंदिर भी इस यात्रा का अहम हिस्सा है। यह मंदिर मणिकर्णिका घाट पर है। यहां पर मां सती के दाहिने कान का कुंडल गिरा था। इसलिए जरूरी है कि आप इस मंदिर आकर देवी के दर्शन जरूर करें।</div><div><br></div><h2>दंडपाणि मंदिर</h2><div>दंडपाणि मंदिर काशी के सबसे प्राचीन मंदिरों में से एक है। यहां के दर्शन करना भी जरूरी है। यहां की विशेषता यह है कि यहां काशी का न्यायाधीश कहे जाने हरिकेश देव की पूजा होती है। यह हाथ में छड़ी लिए हुए हैं। कहा जाता है कि काशी में किसी भी गलत व्यक्ति को नहीं रहने देते हैं।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप काशी यात्रा पर जा रहे हैं, तो आपको भी एक बार इन मंदिरों के दर्शन जरूर करने चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 06 Aug 2026 15:00:53 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/for-moksha-in-kashi-it-essential-to-bow-at-thresholds-of-these-six-ancient-temples</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[सावन में Greater Noida के इस प्राचीन शिव मंदिर का दर्शन हैं बेहद खास, भक्तों की भीड़ लगी रहती है!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visit-bisrakh-shiv-mandir-in-greater-noida-this-sawan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>सावन का महीना भगवान शिव को अति प्रिय है। श्रावण मास को बेहद ही पवित्र माना जाता है। इस दौरान श्रद्धालु व्रत व पूजा-अर्चना करते हैं। सावन के दौरान भक्तजन भगवान शिव के मंदिरों का दर्शन करने जरुर जाते हैं। अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो एक बार नोएडा के इस मंदिर में घूमने जरुर जाएं।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">ग्रेटर नोएडा में प्रसिद्ध प्रचीन शिव मंदिर है, जिसे सावन के महीने में भक्तों के दर्शन के लिए बेहद खास माना जाता है। तो चलिए इस लेख में हम आपको बताते हैं यह मंदिर कहां है और क्यों खास है?</span></div><div><br></div><div><b>ग्रेटर नोएडा में कहां है भोलेनाथ का सबसे खास मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भगवान शिव का यह मंदिर ग्रेटर नोएडा के बिसरख गांव में स्थित है। मंदिर का नाम प्राचीन शिव मंदिर है, जिसका संबंध रावण से जोड़कर देखा जाता है। दरअसल, बिसरख गांव को रावण का जन्मस्थल माना जाता है। वाल्मीकि रामायण के ग्रंथों के अनुसार रावण के पिता ऋषि विश्रवा और माता कैकेसी का आश्रम इसी गांव में था। इस कारण से इस मंदिर को शिव पूजा के लिए बेहद खास माना गया है, क्योंकि रावण भगवान भोलेनाथ के सबसे बड़े भक्त में से एक हैं।</span></div><div><br></div><div><b>कहां पर स्थित प्राचीन शिव मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यह मंदिर ग्रेटर नोएडा वेस्ट के बिसरख जलालपुर गांव में सेक्टर-1 स्थित है। यहां पर पहुंचना आसान है, आइए आपको बताते हैं कैसे यहां पर पहुंचे-</span></div><div><br></div><div>- यदि आप दिल्ली से आ रही हैं, तो नोएडा-ग्रेटर नोएडा एक्सप्रेसवे या&nbsp; NH-9 के रास्ते से यहां से जा सकती है। यहां पर पहुंचने पर आपको करीब 1 से 1.5 घंटे का समय लग सकता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- अगर आप नोएडा से आने का प्लान कर रहे हैं, तो सेक्टर 62, सेक्टर 71 या गौर सिटी से कैब या ऑटो लेकर यहां पहुंचा जा सकता है। यदि आप मेट्रो से जाने का प्लान बना रही हैं, तो आप 52 या 59 मेट्रो स्टेशन पर उतरकर ऑटो लें सकती हैं।</div><div><br></div><div>- दरअसल, मेट्रो का सबसे नजदीकी मेट्रो स्टेशन नोएडा सेक्टर 52 है। यहां से ऑटो या कैब लेकर बिसरख गांव पहुंच सकती हैं। दूरी करीब 11 किमी की है, जिसमें आपको 30 से 45 मिनट लग सकते हैं।</div><div><span style="font-size: 1rem;"><b>प्राचीन शिव मंदिर से जुड़ी खास जानकारी</b></span></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस मंदिर में आपको प्राचीन शिवलिंग पर चढ़ाने का अवसर प्राप्त होगा। सावन के दौरान यहां पर ज्यादा भीड़ रहती है इसिलए सुबह आने वाले भक्त जरुर ध्यान दें। इस मंदिर में आपके पूरे शिव परिवार की प्रतिमाओं के साथ-साथ अन्य देवताओं की प्रतिमा के दर्शन करने का मौका मिलेगा।</span></div><div><br></div><div>- मंदिर सुबह 5 बजे से लेकर 12 बजे तक खुला रहता है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- शाम को 4 बजे से लेकर रात 9 बजे तक आप दर्शन कर सकते हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 31 Jul 2026 17:46:20 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/visit-bisrakh-shiv-mandir-in-greater-noida-this-sawan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Sawan 2026 Special: नागपंचमी और महाशिवरात्रि पर खुलने वाले ये Unique Temples, जानें इनकी पौराणिक परंपराएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>श्रावण मास भगवान शिव को अति प्रिय है। कल यानी 30 जुलाई 2026 से सावन का महीना शुरु होने जा रहा है। इस महीने का इंतजार शिवभक्त लंबे समय से करते हैं। देशभर के शिवालयों में भक्तों की लंबी-लंबी लाइनें देखने को मिलती है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">कुछ भक्तजन जलाभिषेक करने जाते हैं, तो कई लोग अपनी मनोकामना को लेकर भगवान भोलेनाथ के दरबार में पहुंच सकती हैं। क्या आप भी सावन में भगवान शिव के अनोखे मंदिरों के दर्शन करना चाहते हैं, तो यह लेख आपके लिए है।</span></div><div><br></div><div><b>भगवान शिव के अनोखे मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">भारत में भगवान शिव के हजारों मंदिर हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी मंदिर हैं जो अपनी अनोखी परंपराओं के लिए अलग पहचान रखते हैं। इन्हीं में से दो मंदिर ऐसे हैं जिनके कपाट पूरे साल बंद रहते हैं। सिर्फ साल में एक बार इनके कपाट खोले जाते हैं। बता दें कि, एक मंदिर के कपाट सावन में खुलते हैं। दूसरे के कपाट भगवान शिव के ही खास त्योहार पर खोले जाते हैं। आइए आपको इन दोनों मंदिर के बारे में बताते हैं।</span></div><div><br></div><div><b>उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">मध्य प्रदेश के उज्जैन जिला में स्थित महाकालेश्वर मंदिर परिसर में तीसरी मंजिल पर भगवान नागचंद्रेश्वर का भी मंदिर है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि इसके कपाट सिर्फ साल में एक बार नाग पंचमी के दिन 24 घंटे के लिए खोले जाते हैं। जबकि पूरा साल यह मंदिर बंद रहता है।</span></div><div><br></div><div><b>क्यों है यह मंदिर इतना खास?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">इस मंदिर में भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की दुर्लभ प्रतिमा है। यहां भगवान शिव नाग की शय्या पर हैं। ऐसी प्रतिमा बहुत कम जगह देखने को मिलती है। माना जाता है कि नाग पंचमी के दिन यहां दर्शन करने और पूजा करने से भगवान शिव और नाग देवता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। यहां आने वाले श्रद्धालु मानते हैं सच्चे मन से प्रार्थना करने पर उनकी मनोकामनाएं जरुर पूर्ण होती हैं। वैसे इस मंदिर के दर्शन के कालसर्प दोष दूर हो जाता है।</span></div><div><br></div><div><b>कैसे पहुंचें उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यहां जाने के लिए आपको उज्जैन पहुंचना होगा। सबसे पहले आप उज्जैन जंक्शन मेन रेलवे स्टेशन पहुंच जाए। वहां से मंदिर मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर है, जहां से ऑटो या ई-रिक्शा आसानी से मिल जाएगा। फ्लाइट से आने के लिए आपको इंदौर के देवी अहिल्याबाई होल्कर एयरपोर्ट पर उतरना होगा, जो कि उज्जैन से करीब 53 किलोमीटर दूर है। यहां से आप बस या ट्रैक्सी लेकर पहुंच सकते हैं। इसके अलावा आप बस या प्राइवेट कार से भी उज्जैन पहुंच सकते हैं। उज्‍जैन के नागचंद्रेश्वर मंदि‍र इस तरह पहुंच सकते हैं-</span></div><div><br></div><div>- नागचंद्रेश्वर मंद‍िर के ल‍िए आपको महाकाल मंदिर के लिए ऑटो या टैक्सी ले सकते हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- महाकालेश्वर मंदिर परिसर में सबसे ऊपरी मंजिल पर नागचंद्रेश्वर मंदिर मौजूद है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- नागपंचमी के दौरान यहां काफी भीड़ देखने को मिलती है।&nbsp;</div><div><br></div><div><b>रायसेन का सोमेश्वर महादेव मंदिर</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">एमपी के रायसेन जिले की पहाड़ियों पर स्थित है सोमेश्वर महादेव मंदिर, जो अपनी अनोखी परंपरा के लिए जाना जाता है। यह मंदिर ऊंचाई पर बना हुआ और यहां पर पहुंचने के लिए श्रद्धालुओं को चढ़ाई करनी पड़ती है।</span></div><div><br></div><div><b>कब खुलते हैं सोमेश्वर महादेव मंदिर के कपाट?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">यहां के लोकल के अनुसार, इस मंदिर के कपाट महाशिवरात्रि के दिन कुछ घंटों के लिए खोले जाते हैं। इसी समय भक्तजन पूजा और दर्शन के लिए आते हैं। वरना पूरे साल यह मंदिर बंद रहता है।</span></div><div><br></div><div><b>मंदिर बंद रहने पर भी पहुंचते हैं श्रद्धालु</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">जब यह मंदिर बंद रहता है, तो तभी श्रद्धालु यहां आना नहीं छोड़ते है। लोग मंदिर के बाहर से ही भगवान शिव को प्रणाम करते हैं और अपनी श्रद्धा को दर्शाते हैं। यहां पर आने वाले कई श्रद्धालुओं अपनी मनोकामना मांगते समय मंदिर के प्रवेश द्वार पर कलावा बांधते हैं। कहा जाता है कि इच्छा पूरी होने पर भक्त यहां पर दोबारा आकर कलावा खोलते हैं। वैसे यह यह स्थानीय परंपरा है।</span></div><div><br></div><div><b>कैसे पहुंचें रायसेन के सोमेश्वर महादेव मंदिर?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">- यह मंदिर मध्य प्रदेश के रायसेन में स्थित है। इसलिए आपको रायसेन पहुंचना होगा।</span></div><div><br></div><div>&nbsp;- एमपी की राजधानी भोपाल से रायसेन करीब 45 किलोमीटर दूर है।</div><div><br></div><div>&nbsp;- रेलवे स्टेशन भोपाल जंक्शन से आप रायसेन के लिए टैक्सी ले सकती हैं।</div><div><br></div><div>&nbsp;- जब आप रायसेन पहुंचेगी तो आपको किले के निचले हिस्से (तलहटी) तक जाना होगा। उधर से मंदिर तक जाने के लिए पैदल चढ़ाई करनी पड़ती है।&nbsp;</div><div><br></div><div>- वैसे मंदिर साल में एक बार महाशिवरात्रि पर खोला जाता है, बाकी समय आप किले के बाहर दर्शन कर सकते हैं। सावन के दौरान आप रायसेन का किला देख सकती हैं।&nbsp;</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 17:53:49 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rare-shiva-temples-in-mp-nagchandreshwar-and-someshwar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ram Lalla Shringar: Ayodhya Ram Mandir में Ram Lalla की पोशाक का रहस्य, क्यों Navgraha के अनुसार बदलते हैं वस्त्रों के रंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-mystery-behind-ram-lalla-attire-at-ayodhya-ram-mandir]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>अयोध्या के राम मंदिर में विराजमान रामलला के राजसी ठाठ हैं। हर रोज रामलला के वस्त्र बदले जाते हैं। रामलला हर रोज अलग-अलग रंग की पोशाकें पहन रहे हैं। वहीं रामलला की पोशाकें भक्तों को भी काफी आकर्षक लगती हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक रामलला की पोषाकों के रंगों का चयन ग्रहों के मुताबिक किया गया है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि रामलला का श्रृंगार रोज अलग रंग के कपड़ों से क्यों होता है और इसका क्या महत्व है।</div><div><br></div><h2>रामलला की पोषाकें</h2><div>बता दें कि रामलला के अधिकतर वस्त्र बंगाल, राजस्थान, उड़ीसा, कश्मीर और आंध्र के सिल्क के बनते हैं। रामलला सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार का हरा, बृहस्पति वार को पीला, शुक्रवार को क्रीम, शनिवार को नीला और रविवार को गुलाबी रंग के कपड़े पहनते हैं। रोजाना नई धोती और दो पटका पहनते हैं। इसमें एक पटका छोटा और दूसरा बड़ा होता है। पटकों पर गुलाबी रंग की छपाई होती है। कुल मिलाकर यह पूरी तरह से भारतीय परंपरागत परिधान हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan" target="_blank">Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत</a></h3><div><br></div><h2>महत्व</h2><div>आयोध्या में विराजमान रामलला अपने बाल रूप में हैं। इसलिए रामलला को नजर लगने का डर लगा रहता है। इस कारण रामलला को नवग्रह से बचाने के लिए उनकी पोशाक में नवरत्न जड़े गए हैं। भगवान श्रीराम के बाल स्वरूप को किसी की नजर न लगे, इस कारण उनको खास तरह की पोशाकें पहनाई जाती हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 29 Jul 2026 14:54:16 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/the-mystery-behind-ram-lalla-attire-at-ayodhya-ram-mandir</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Simhachalam Temple में साल में सिर्फ 24 घंटे होते हैं असली दर्शन, Akshaya Tritiya पर हटती है चंदन की परत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आंध्र प्रदेश का सिंहाचलम मंदिर भगवान विष्णु के नरसिंह अवतार को समर्पित है। यह मंदिर बेहद दिव्य और अद्भुत है। आपको जानकर हैरानी होगी कि भगवान नरसिंह की मूर्ति से साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए 'चंदन की परत' हटाई जाती है। तभी यह मंदिर दर्शन के लिए खुलता है। ऐसे में भक्त साल में सिर्फ 24 घंटे के लिए भगवान नरसिंह के असली विग्रह के दर्शन कर सकते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ अनोखी बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।&nbsp;</div><div><br></div><h2>कहां स्थित है दिव्य धाम</h2><div>आंध्र प्रदेश के विशाखापट्टनम में सिंहाचलम मंदिर स्थित है। यह मंदिर आस्था और वास्तुकला का अनोखा और अद्भुत संगम है। विशाखापट्टनम से लगभग 16 किमी दूर वराह लक्ष्मी नरसिम्हा मंदिर सिंहाचल पर्वत की चोटी पर स्थित है। माना जाता है कि भगवान विष्णु के परम भक्त प्रह्लाद ने स्वयं इस मंदिर का निर्माण कराया था।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history" target="_blank">Famous Temple: Canada में अद्भुत नज़ारा, Shivarpanam Temple में स्थापित हैं 450 शिवलिंग, जानिए इस शिव धाम की पूरी History</a></h3><div><br></div><h2>क्यों लगाया जाता है चंदन का लेप</h2><div>भगवान विष्णु को नरसिंह अवतार उग्रता और वीरता का प्रतीक है। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक हिरण्यकशिपु का वध करने के बाद जब भगवान नरसिंह का क्रोध बहुत बढ़ गया, तो सभी देवताओं की भगवान नरसिंह को शांत कराने की कोशिश असफल रही।</div><div><br></div><div>जिसके बाद भगवान नरसिंह अपने परम भक्त प्रह्लाद की प्रार्थना पर शांत हुए और सिंहाचलम पर्वत पर प्रकट हुए। भगवान नरसिंह की उग्रता और तेज को कम करने के लिए उनको चंदन से शीतल रखा जाता है। यही वजह है कि साल भर भगवान नरसिंह चंदन से ढके रहते हैं, जिससे कि उनका स्वरूप सौम्य रहे।</div><div><br></div><h2>जानें कब खुलता है यह मंदिर</h2><div>बता दें कि चंदन की मोटी परत से ढके रहने की वजह से भगवान नरसिंह की मूर्ति एक शिवलिंग के आकार में दिखती है। सिर्फ अक्षय तृतीया के पावन दिन पर यह चंदन हटाया जाता है। जिसको 'निजरूप दर्शन' या 'चंदनोत्सव' भी कहा जाता है। सिर्फ इसी दिन भक्त भगवान के असली विग्रह को देख पाते हैं। अक्षय तृतीया के दिन इस मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है। वहीं नरसिंह जयंती पर भी भक्त मंदिर में दर्शन के लिए आते हैं।&nbsp;</div><div><br></div><h2>क्या है मंदिर की खासियत</h2><div>आमतौर पर आपको भगवान नरसिंग के अन्य मंदिरों में भगवान का उग्र रूप देखने को मिलेगा। लेकिन सिंहाचलम मंदिर में भगवान नरसिंह मां लक्ष्मी के साथ बेहद सौम्य और शांत मुद्रा में विराजमान हैं। वहीं मंदिर की वास्तुकला में चोल, चालुक्य और कलिंग शैलियों का मिश्रण देखने को मिलेगा।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 28 Jul 2026 16:26:05 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/simhachalam-temple-only-24-hours-of-actual-darshan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: Canada में अद्भुत नज़ारा, Shivarpanam Temple में स्थापित हैं 450 शिवलिंग, जानिए इस शिव धाम की पूरी History]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत देश में तमाम प्राचीन और ऐतिहासिक मंदिर हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कनाडा में एक ऐसा मंदिर है, जहां पर 1-2 नहीं बल्कि पूरे 450 शिवलिंग हैं। यह स्थल आपके मन को शांति से भर देगा। कनाडा में स्थित भगवान शिव को समर्पित यह शिवर्पणम मंदिर है। इस मंदिर में 450 शिवलिंग हैं। ऐसे में अगर आप भी कनाडा घूमने का प्लान कर रहे हैं, तो आपको इस मंदिर के दर्शन जरूर करना चाहिए। यह एक बेहद शांत और सुंदर मंदिर है। तो आइए जानते हैं इस मंदिर की खासियत के बारे में...</div><div><br></div><h2>450 शिवलिंगों वाला मंदिर</h2><div>वैसे तो कनाडा में कई हिंदू मंदिर हैं। लेकिन इनमें छिपा हुआ रत्न शिवर्पणम मंदिर है। यह मंदिर मॉन्ट ट्रेम्बलेंट क्षेत्र में स्थित है। टोरंटो से यहां पहुंचने में 6 घंटे का समय और मॉन्ट्रियल से एक घंटे का समय लगता है। यह मंदिर पहाड़ों और ताजी हवा से घिरा हुआ है। ऐसा नजारा आपको अन्य देशों में देखने को नहीं मिलेगा।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn" target="_blank">Bemata Goddess: हाथ में कलम और दूतों का साथ, Ujjain में विराजमान Bemata कैसे तय करती हैं नवजात का Destiny</a></h3><div><br></div><h2>मंदिर की विशेषता</h2><div>इस मंदिर की विशेषता यह है कि इसमें काले पत्थर से निर्मित 450 शिवलिंग हैं। यह शिवलिंग मंदिर परिसर में करीने से स्थापित हैं। केंद्र में विशाल शिवलिंग है और एक छोटा फव्वारा भी हैं। यह फव्वारा चारों और पानी छिड़कता है। इससे स्थान का जादुई वातावरण और भी बढ़ जाता है। शिवलिंग के अलावा यहां पर काले पत्थर से निर्मित भगवान शिव की एक मूर्ति और नंदी बैल की मूर्ति है।</div><div><br></div><h2>आध्यात्मिक यात्रा के लिए</h2><div>शिवर्पणम मंदिर के अलावा कनाडा के होप शहर में आशा महाकालेश्वर मंदिर है। इस स्थान की स्थापना शर्मिला नारायण ने की थी। यहां 8 फुट ऊंचा शिवलिंग औक 1008 छोटे शिवलिंग हैं। मंदिर में गौशाला भी है।</div><div><br></div><div>दो प्रमुख भगवान शिव मंदिरों और अन्य कई हिंदू मंदिरों के साथ, कनाडा हिंदू भक्तों के लिए भी एक आध्यात्मिक यात्रा के लिए एकदम सही जगह है।</div><div><br></div><div>ऐसे में अगर आप भी अपने परिवार या दोस्तों के साथ कनाडा घूमने का प्लान बना रहे हैं। तो आपको इन शांत और खूबसूरत जगहों पर जाना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 27 Jul 2026 13:27:34 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-sight-in-canada-shivarpanam-temple-houses-450-shivlingas-know-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bemata Goddess: हाथ में कलम और दूतों का साथ, Ujjain में विराजमान Bemata कैसे तय करती हैं नवजात का Destiny]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>क्या आपने विधाता माता के बारे में जानते हैं। अगर आपका जवाब न है, तो आज हम आपको विधाता माता के बारे में बताने जा रहे हैं। विधाता माता को अलग-अलग स्थानों पर अलग-अलग नामों से जाना जाता है। विधाता माता को भय माता, बेमाता, विधात्री देवी, छठी मैया या फिर षष्ठी माता के रूप में जाना जाता है। लोक मान्यताओं के मुताबिक बच्चे के जन्म के छठे दिन ही विधाता देवी बच्चे के भाग्य का लेखा-जोखा लिखती हैं।</div><div><br></div><h2>उज्जैन स्थित है मंदिर</h2><div>महाकाल की नगरी उज्जैन में विधाता देवी का फेमस मंदिर है। विधाता देवी का मंदिर पटनी बाजार के पास मगरमुहा की गली में स्थित है। इसका इतिहास करीब 1500 साल पुराना माना जाता है। इस मंदिर में विधाता देवी की करीब ढाई फीट ऊंची खड़ी अवस्था में मूर्ति विराजित है। इसको एक स्वयंभू मूर्ति माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday" target="_blank">Shani Dev Mantra: Shani Sade Sati और ढैय्या का कष्ट होगा कम, शनिवार को जरूर जपें ये विशेष Vedic Mantras और शनि स्त्रोत</a></h3><div><br></div><div>विधाता देवी के उल्टे हाथ में कपाल है। तो वहीं उनके सीधे हाथ में कलम है। इनके आसपास दो दूत भी विराजमान हैं। एक दूत का नाम चित्र और दूसरे का नाम गुप्त है। माना जाता है कि जब भी किसी बच्चे का जन्म होता है, तो विधाता देवी के यही दोनों दूत माता को इसकी जानकारी देते हैं।</div><div><br></div><h2>बच्चों के साथ आते हैं श्रद्धालु</h2><div>देवी भागवत और दुर्गा सप्तशती सहित अवंतिका पुराण में विधाता माता का उल्लेख मिलता है। विधाता माता का पौराणिक नाम विद्यात्तय है। धार्मिक मान्यता है कि विधाता माता बच्चे के जन्म के छठे दिन उसका भाग्य लिखती हैं। यही वजह है कि विधाता माता के मंदिर में दूर-दूर से श्रद्धालु आते हैं। मंदिर में विधाता माता के दर्शन करते हैं, जिससे कि उनके बच्चे को सौभाग्य की प्राप्ति हो सके।</div><div><br></div><h2>जानें कैसे मिली मूर्ति</h2><div>बताया जाता है कि एक भक्त को माता ने सपने में दर्शन दिए थे, सपने में इस स्थान पर मूर्ति होने के संकेत मिले थे। जब उस स्थान पर खुदाई की गई तो वहां पर विधाता देवी की मूर्ति निकली। जिसके बाद इसी स्थान पर मूर्ति की स्थापना की गई और फिर मंदिर का निर्माण करवाया गया। तभी से यहां पर यह मंदिर स्थित है।</div>]]></description>
      <pubDate>Sat, 25 Jul 2026 09:23:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/with-pen-in-hand-and-messengers-at-her-side-how-bemata-in-ujjain-decide-fate-of-newborn</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Shani Dev Mantra: Shani Sade Sati और ढैय्या का कष्ट होगा कम, शनिवार को जरूर जपें ये विशेष Vedic Mantras और शनि स्त्रोत]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में हर दिन किसी न किसी देवी-देवता को समर्पित होता है। ठीक इसी तरह शनिवार का दिन न्याय के देवता शनिदेव को समर्पित होता है। ऐसे में अगर आप शनिदेव की साढ़ेसाती, ढैय्या या फिर शनि दोष से परेशान हैं। तो आपको शनिदेव के कुछ मंत्रों का जाप करना चाहिए। </div><div>&nbsp;</div><div>इससे शनिदेव की कृपा होती है और साढ़ेसाती, शनि दोष और ढैय्या के कष्टों से भी मुक्ति मिलती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि साढ़े साती और शनि दोष को दूर करने के लिए शनिवार को किन मंत्रों का जाप करना चाहिए।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck" target="_blank">Nag Vasuki की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए Lord Shiva, गले में धारण कर दिया सम्मान</a></h3><div><br></div><h2>शनि मूल मंत्र</h2><div>ॐ शं शनैश्चराय नमः।</div><div><br></div><h2>शनि बीज मंत्र</h2><div>ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः।</div><div><br></div><h2>शनि गायत्री मंत्र</h2><div>ॐ सूर्यात्मजाय विद्महे मृत्युरूपाय धीमहि तन्नः सौरिः प्रचोदयात्॥</div><div><br></div><h2>शनि प्रणाम मंत्र</h2><div>ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्।</div><div>छाया मार्तण्डसंभूतं तं नमामि शनैश्चरम्‌॥</div><div><br></div><h2>शनि वैदिक मंत्र</h2><div>ॐ शन्नोदेवीर भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंय्योरभिस्त्रवन्तुनः।</div><div><br></div><h2>शनि एकाक्षरी मंत्र</h2><div>शं॥</div><div><br></div><h2>साढ़ेसाती मंत्र</h2><div>ऊँ त्रयम्बकं यजामहे सुगंधिम पुष्टिवर्धनम्।</div><div>उर्वारुक मिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मा मृतात्।।</div><div><br></div><div>ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये।संयोरभिश्रवन्तु न:। ऊँ शं शनैश्चराय नमः।।</div><div>ऊँ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजम्। छायामार्तण्डसंभूतं तं नमामिशानश्चराम।।</div><div><br></div><div>ॐ शन्नोदेवीरभिस्ताय आपो भवन्तु पीतये</div><div>शनयोरभिस्रवन्तु नः, ॐ समं शनैश्चराय नमः।</div><div>ॐ नीलांजनसमाभासं रविपुत्रं यमाग्रजं</div><div>छायामार्तण्डसंभूतं तम नमामि शनैश्चरम।</div><div><br></div><h2>जानें शनि दोष से मुक्ति पाने के उपाय</h2><div>अगर आप भी शनि दोष, ढैय्या और साढ़ेसाती के कष्टों से परेशान हैं, तो आप इन कुछ विशेष उपायों को अपनाकर राहत पा सकते हैं।</div><div><br></div><div>हर शनिवार को सुबह स्नान आदि करने के बाद पीपल के पेड़ की जड़ में जल अर्पित करना चाहिए और पेड़ की 7 बार परिक्रमा करें। यह उपाय शनि दोष के प्रभाव को कम करता है।&nbsp;</div><div><br></div><div>शनिवार को शनिदेव की विधिविधान से पूजा-अर्चना करना चाहिए और श्रद्धा से 'शनि स्तुति' का पाठ करना चाहिए।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता यह भी है कि शनि देव हनुमान जी के भक्तों को कष्ट नहीं पहुंचाते हैं। इसलिए शनिवार को हनुमान जी की पूजा करें और नियमित रूप से हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।&nbsp;</div><div><br></div><div>शनिदेव की कृपा पाने के लिए हर शनिवार को अपने सामर्थ्य के मुताबिक काले तिल, काले रंग के कपड़े, साबुत उड़द, सरसों का तेल और गुड़ आदि का दान करना चाहिए।</div><div><br></div><div>ऐसे कार्यों या आचरण से दूर रहना चाहिए, जिससे शनिदेव रुष्ट हों। गरीबों, असहायों और बुजुर्गों आदि का अपमान नहीं करना चाहिए।</div><div><br></div><div>वहीं अच्छे कर्म करने वाले लोगों पर शनिदेव की हमेशा कृपा बनी रहती है। इसलिए अपने कर्मों को अच्छा रखना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 24 Jul 2026 12:08:42 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/shani-sade-sati-and-dhaiyya-reduced-chant-vedic-mantras-and-shani-stotra-on-saturday</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Nag Vasuki की अनन्य भक्ति से प्रसन्न हुए Lord Shiva, गले में धारण कर दिया सम्मान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान शिव का रूप जितना ज्यादा रहस्यमयी है, उतना ही आकर्षक भी है। भगवान शिव अपने शरीर में भस्म, जटाओं में गंगा, माथे पर चंद्रमा और गले में नाग धारण करते हैं। भगवान शिव के इन सभी चीजों को धारण करने के पीछे अलग-अलग मान्यताएं हैं। असल में महादेव न सिर्फ मनुष्यों बल्कि अन्य जीवों पर भी अपनी कृपा और आशीर्वाद बनाए रखते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि भगवान शिव अपने गले में नाग को धारण करते हैं।</div><div><br></div><div>भगवान शिव एक ऐसे देवता हैं, जो समाज की बहिष्कृत चीजों को अपने साथ जोड़ते हैं। सांप को भगवान शिव ने अपने गले में धारण कर उसको सम्मान दिया। श्मशान की भस्म को अपने तन का लिबास बना लिया। कैलाश पर्वत को महादेव ने अपना घर बना लिया। तो आइए जानते हैं भगवान शिव ने अपने गले में सांप क्यों धारण किया है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari" target="_blank">Lord Vishnu Mantras: गुरुवार को Lord Vishnu की पूजा से दूर होगा Guru Dosha, इन Powerful Mantras के जाप से बरसेगी श्रीहरि की विशेष कृपा</a></h3><div><br></div><h2>शिवजी ने क्यों धारण किया सांप</h2><div>धार्मिक कथाओं के मुताबिक नागराज वासुकी भगवान शंकर के परम भक्त थे। वह हमेशा भगवान शिव की पूजा-उपासना में लीन रहते थे। धार्मिक शास्त्रों के मुताबिक समुद्र मंथन के समय नागराज वासुकी ने रस्सी का किया था। जिससे सागर को मथा गया था। नागराज वासुकी की भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उनको नागलोक का राजा बना दिया। साथ ही भगवान शिव ने अपने गले में आभूषण की तरह लिपटे रहने का वरदान दिया।</div><div><br></div><h2>क्या मिलता है संकेत</h2><div>भगवान शिव के विषैले सांप को अपने गले में धारण करना इस ओर भी संकेत देता है कि अगर दुर्जन भी अच्छे कर्म करें, तो ईश्वर उसको जरूर स्वीकार करते हैं। ऐसे में व्यक्ति को सिर्फ अच्छे कर्म करना चाहिए, चाहे उनका स्वभाव कैसा भी हो।</div><div><br></div><h2>यहां भी मिलता है उल्लेख</h2><div>धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक समुद्र मंथन के अलावा एक अन्य स्थान पर भी वासुकी नाग का वर्णन मिलता है। जब भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय वासुदेव कंस की जेल से उनको गोकुल लेकर जा रहे थे। तब यमुना में एक भयंकर तूफान आया। ऐसे में नागराज वासुकी ने भगवान श्रीकृष्ण और वासुदेव को सुरक्षित यमुना पार कराने में सहायता की थी।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 22 Jul 2026 13:20:30 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-pleased-with-unwavering-devotion-of-nag-vasuki-and-honored-him-by-wearing-neck</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Vishnu Mantras: गुरुवार को Lord Vishnu की पूजा से दूर होगा Guru Dosha, इन Powerful Mantras के जाप से बरसेगी श्रीहरि की विशेष कृपा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में गुरुवार का दिन भगवान विष्णु और बृहस्पति देव को समर्पित है। गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा करने से व्यक्ति के सभी दुख-दर्द दूर होते हैं। वहीं अगर किसी व्यक्ति की कुंडली में गुरु दोष है, तो भगवान विष्णु और बृहस्पति देव की पूजा और उपासना करनी चाहिए। गुरुवार को व्रत करने से व्यक्ति के जीवन की सभी समस्याएं दूर हो जाती हैं। वहीं घर में धन की कमी नहीं रहती है। वहीं इस दिन भगवान विष्णु के साथ मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ होता है।</div><div><br></div><div>धार्मिक मान्यता है कि रोजाना भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करने से शुभ फल की प्राप्ति होती है। मान्यता है कि रोजाना भगवान विष्णु के मंत्रों का जाप करने से सभी संकटों से मुक्ति मिलती है और धन-वैभव की प्राप्ति होती है। तो आइए जानते हैं इन मंत्रों के बारे में...</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri" target="_blank">Puri में Lord Jagannath Rath Yatra का दिव्य आगाज, 100 यज्ञों के पुण्य फल और मोक्ष की अद्भुत परंपरा</a></h3><div><br></div><h2>श्रीहरि विष्णु के पवित्र मंत्र</h2><div><br></div><div>ॐ नमो भगवते वासुदेवाय</div><div><br></div><div>श्रीकृष्ण गोविन्द हरे मुरारे।</div><div>हे नाथ नारायण वासुदेवाय।।</div><div><br></div><div>ॐ नारायणाय विद्महे। वासुदेवाय धीमहि। तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।</div><div><br></div><div>ॐ विष्णवे नम:</div><div><br></div><div>ॐ हूं विष्णवे नम:</div><div>&nbsp;</div><div>ॐ नमो नारायण। श्री मन नारायण नारायण हरि हरि।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>लक्ष्मी विनायक मंत्र</h2><div>दन्ताभये चक्र दरो दधानं,</div><div>कराग्रगस्वर्णघटं त्रिनेत्रम्।</div><div>धृताब्जया लिंगितमब्धिपुत्रया</div><div>लक्ष्मी गणेशं कनकाभमीडे।।</div><div><br></div><h2>धन-वैभव और संपन्नता का मंत्र</h2><div>ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।&nbsp;</div><div>ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।</div><div><br></div><div>ॐ अं वासुदेवाय नम:</div><div>ॐ आं संकर्षणाय नम:</div><div>ॐ अं प्रद्युम्नाय नम:</div><div>ॐ अ: अनिरुद्धाय नम:</div><div>ॐ नारायणाय नम:</div><div><br></div><h2>श्रीहरि का पंचरूप मंत्र</h2><div>ॐ ह्रीं कार्तविर्यार्जुनो नाम राजा बाहु सहस्त्रवान। यस्य स्मरेण मात्रेण ह्रतं नष्‍टं च लभ्यते।।</div><div><br></div><div>भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की कृपा और आशीर्वाद पाने के लिए रोजाना इन मंत्रों का जाप करना चाहिए। इन मंत्रों का जाप करने से जीवन के सभी कष्ट दूर होते हैं। धन-वैभव और संपन्नता की प्राप्ति होती है। लेकिन इन मंत्रों का जाप करते समय इस बात का ध्यान रखें कि मंत्रों का उच्चारण साफ और शुद्ध होना चाहिए। वरना इसका फल नहीं मिलता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 21 Jul 2026 11:07:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/chanting-powerful-mantras-bring-special-blessings-from-lord-hari</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Puri में Lord Jagannath Rath Yatra का दिव्य आगाज, 100 यज्ञों के पुण्य फल और मोक्ष की अद्भुत परंपरा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया को ओडिशा के पुरी नामक स्थान और गुजरात के द्वारका पुरी में भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा बड़ी धूमधाम से निकाली जाती है। इस उत्सव के दौरान श्रद्धालुओं का भक्ति भाव देखते ही बनता है क्योंकि जिस रथ पर भगवान सवारी करते हैं उसे घोड़े या अन्य जानवर नहीं बल्कि श्रद्धालुगण ही खींच रहे होते हैं। पुरी में श्री जगदीश भगवान को सपरिवार विशाल रथ पर आरुढ़ कराकर भ्रमण करवाया जाता है फिर वापस लौटने पर यथास्थान स्थापित किया जाता है। यह उत्सव अद्वितीय होता है। इस अवसर पर देश विदेश से लाखों श्रद्धालु यहां एकत्र होते हैं।</div><div><br></div><div>भगवद भक्त इस दिन व्रत रखते हैं और उत्सव मनाते हैं। पुरी में जिस रथ पर भगवान की सवारी चलती है वह विशाल एवं अद्वितीय है। वह 45 फुट ऊंचा, 35 फुट लंबा तथा इतना ही चौड़ाई वाला होता है। इसमें सात फुट व्यास के 16 पहिये होते हैं। इसी तरह बालभद्र जी का रथ 44 फुट ऊंचा, 12 पहियों वाला तथा सुभद्रा जी का रथ 43 फुट ऊंचा होता है। इनके रथ में भी 12 पहिये होते हैं। प्रतिवर्ष नए रथों का निर्माण किया जाता है। भगवान मंदिर के सिंहद्वार पर बैठकर जनकपुरी की ओर रथयात्रा करते हैं। जनकपुरी में तीन दिन का विश्राम होता है जहां उनकी भेंट श्री लक्ष्मीजी से होती है। इसके बाद भगवान पुनः श्री जगन्नाथ पुरी लौटकर आसनरुढ़ हो जाते हैं।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/currentaffairs/a-grand-celebration-of-faith-tradition-and-spiritual-consciousness" target="_blank">आस्था, परम्परा, आध्यात्मिक चेतना का विराट उत्सव</a></h3><div>दस दिवसीय यह रथयात्रा भारत में मनाए जाने वाले धार्मिक उत्सवों में महत्वपूर्ण स्थान रखती है। भगवान श्रीकृष्ण के अवतार 'जगन्नाथ' की रथयात्रा का पुण्य सौ यज्ञों के बराबर माना जाता है। यात्रा की तैयारी अक्षय तृतीया के दिन श्रीकृष्ण, बलराम और सुभद्रा के रथों के निर्माण के साथ ही शुरू हो जाती है। जगन्नाथ जी का रथ 'गरुड़ध्वज' या 'कपिलध्वज' कहलाता है। रथ पर जो ध्वज है, उसे 'त्रैलोक्यमोहिनी' या ‘नंदीघोष’ रथ कहते हैं। बलराम जी का रथ 'तलध्वज' के नाम से पहचाना जाता है। रथ के ध्वज को 'उनानी' कहते हैं। जिस रस्सी से रथ खींचा जाता है वह 'वासुकी' कहलाता है। सुभद्रा का रथ 'पद्मध्वज' कहलाता है। रथ ध्वज 'नदंबिक' कहलाता है। इसे खींचने वाली रस्सी को 'स्वर्णचूडा' कहते हैं।</div><div><br></div><div>रथयात्रा आरंभ होने से पहले पुराने राजाओं के वंशज पारंपरिक ढंग से सोने के हत्थे वाली झाडू से ठाकुर जी के प्रस्थान मार्ग को साफ करते हैं। इसके बाद मंत्रोच्चार एवं जयघोष के साथ रथयात्रा शुरू होती है। सर्वप्रथम बलभद्र का रथ तालध्वज प्रस्थान करता है। थोड़ी देर बाद सुभद्रा की यात्रा शुरू होती है। अंत में लोग जगन्नाथ जी के रथ को बड़े ही श्रद्धापूर्वक खींचते हैं। लोग मानते हैं कि रथयात्रा में सहयोग से मोक्ष मिलता है, अत: सभी श्रद्धालु कुछ पल के लिए रथ खींचने को आतुर रहते हैं। जगन्नाथ जी की यह रथयात्रा गुंडीचा मंदिर पहुंचकर संपन्न होती है। 'गुंडीचा मंदिर' वहीं पर स्थित है जहां विश्वकर्मा जी ने तीनों देव प्रतिमाओं का निर्माण किया था। यह भगवान की मौसी का घर भी माना जाता है। यहां भगवान एक सप्ताह प्रवास करते हैं और इस दौरान यहीं पर उनकी पूजा की जाती है। आषाढ़ शुक्ल दशमी को जगन्नाथ जी की वापसी यात्रा शुरू होती है। शाम तक रथ जगन्नाथ मंदिर पहुंच जाते हैं लेकिन प्रतिमाओं को अगले दिन ही मंत्रोच्चार के साथ मंदिर के गर्भगृह में फिर से स्थापित किया जाता है।</div><div><br></div><div>- शुभा दुबे</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 18:33:47 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/divine-commencement-of-the-lord-jagannath-rath-yatra-in-puri</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    <item>
      <title><![CDATA[Baidyanath Dham से Mehandipur Balaji तक, शारीरिक कष्टों के उपचार और Spiritual Peace के लिए विख्यात हैं ये 7 पावन स्थल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-baidyanath-dham-to-mehandipur-balaji-these-sites-renowned-for-healing]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भारत में मंदिरों को सिर्फ पूजा-पाठ का स्थान नहीं बल्कि आशा, मानसिक शांति और आध्यात्मिक शक्ति का केंद्र माना जाता है। अलग-अलग हिस्सों में कुछ खास मंदिर हैं। जो मानसिक तनाव, सेहत संबंधी समस्याओं, संतान प्राप्ति और रोग मुक्ति की लोक मान्यताओं से जुड़े हैं। लाखों की संख्या में भक्त इन मंदिरों में मानसिक बल, आशीर्वाद और आध्यात्मिक संतुलन प्राप्त करने के लिए जाते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको 7 ऐसे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां पर भक्त आरोग्य और अच्छी सेहत की प्रार्थना करते हैं।</div><div><br></div><h2>नैना देवी मंदिर</h2><div>हिमाचल प्रदेश में स्थित नैना देवी मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में से एक है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यहां पर मां सती की आंख गिरी थी। इस कारण इस स्थान को नैना देवी कहा जाता है। नैना देवी को ज्ञान, दृष्टि और दिव्य दर्शन की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas" target="_blank">Gupt Navratri 2026: 15 जुलाई से शुरू हो रही है गुप्त नवरात्रि, जानें 10 Mahavidyas की पूजा का रहस्य</a></h3><div><br></div><div>यहां आने वाले भक्तों का मानना है कि आंखों से जुड़ी समस्याओं में देवी का विशेष आशीर्वाद प्राप्त होता है। वहीं मानसिक स्पष्टता और निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है।</div><div><br></div><h2>मेहंदीपुर बालाजी मंदिर</h2><div>राजस्थान के दौसा जिले में स्थित यह मंदिर हनुमान जी के बाला जी रूप को समर्पित है। यह भारत के खास और चर्चित आध्यात्मिक केंद्रों में से एक है।</div><div><br></div><div>बालाजी आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि यहां पर दर्शन करने से चिंता, मानसिक तनाव, डर, बुरी नजर और मानसिक कष्ट दूर होते हैं। मंदिर का प्रसाद घर न ले जाने वाली परंपरा भी फेमस है।</div><div><br></div><h2>बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग</h2><div>झारखंड में स्थित बैद्यनाथ शिवलिंग देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है। वैद्यनाथ शब्द का अर्थ चिकित्सकों के स्वामी से है। भगवान शिव के इस रूप के दर्शन और पूजन से रोग और कष्ट दूर होते हैं।</div><div><br></div><div>यहां आने वाले भक्तों का मानना है कि वैद्यनाथ दर्शन करने से दीर्घकालिक रोगों से छुटकारा मिलता है। वहीं यहां दर्शन करने से मानसिक संतुलन, शारीरिक पीड़ा में राहत और आध्यात्मिक शांति की प्राप्ति होती है।</div><div><br></div><h2>काशी विश्वनाथ मंदिर</h2><div>यूपी के वाराणसी शहर में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर को भारत के सबसे प्राचीन और पूजनीय शिव मंदिरों में से एक है। भक्तों का मानना है कि यहां पर भगवान शिव के समक्ष सच्ची प्रार्थना करने से सेहत, दीर्घायु और आध्यात्मिक शांति मिलती है।</div><div><br></div><h2>गर्भरक्षाम्बिगई मंदिर</h2><div>दक्षिण भारत के तमिलनाडु में स्थित गर्भरक्षाम्बिगई का मंदिर फेमस है। यहां पर देवी गर्भरक्षाम्बिगई की पूजा होती है। यहां पर आने वाले श्रद्धालुओं का मानना है कि मंदिर में दर्शन करने से सुरक्षित गर्भावस्था, संतान प्राप्ति और स्वस्थ प्रसव में आसानी होती है। दंपत्ति के बीच यह मंदिर काफी फेमस है।</div><div><br></div><h2>झंडेवालान मंदिर</h2><div>नई दिल्ली में मौजूद झंडेवालन मंदिर मां आदिशक्ति को समर्पित है। यहां पर दर्शन करने आने वाले श्रद्धालुओं के बीच मान्यता है कि जिन भी लोगों पर बुरी नजर होती है। उनके मंदिर में पूजा करने से यह समस्या दूर हो जाती है।</div>]]></description>
      <pubDate>Thu, 16 Jul 2026 14:46:21 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/from-baidyanath-dham-to-mehandipur-balaji-these-sites-renowned-for-healing</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Jagannath Rath Yatra 2026: क्या वाकई प्रेमी जोड़ों के लिए अशुभ है जगन्नाथ मंदिर के दर्शन? जानिए क्या कहती है पौराणिक मान्यता!]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-couples-avoid-puri-jagannath-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>ओडिशा में स्थित जगन्नाथ मंदिर अपने चमत्कार के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है। दूर-दूर से देश-दुनिया के लोग पुरी जगन्नाथ मंदिर का दर्शन करने आते हैं। माना जाता है कि जो भक्त सच्चे मन से इस मंदिर के दर्शन करने आता है उनकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।&nbsp;</div><div><span style="font-size: 1rem;">वैसे आपने भी जगन्नाथ मंदिर संबंधित कई सारे चमत्कार की कहानी जरुर सुनी होगी, जहां पर भगवान ने भक्तों की मनोकामनाएं जरुर पूर्ण होती है। हालांकि शायद ही आप जानते होंगे कि इस मंदिर में शादी से पहले प्रेमी जोड़े दर्शन के लिए नहीं जा सकते हैं। क्या आपने इसके पीछे की मान्यता के बारे में सुना है, क्या है इसकी पौराणिक कथा? आइए आपको इस लेख में बताते हैं भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रेमी जोड़ो का जाना वर्जित क्यों हैं।</span></div><div><br></div><div><b>जगन्नाथ मंदिर में क्यों प्रेमी जोड़ा का जाना मना है?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">दरअसल, पुरी के जगन्नाथ मंदिर में अविवाहित प्रेमी जोड़े या फिर जिन जोड़ों की शादी तय हो चुकी है लेकिन, हुई नहीं है उन लोगों के लिए दर्शन करने के लिए नहीं जाना चाहिए। असल में इसके पीछे एक पुरानी धार्मिक कथा है। लोककथाओं व मान्यताओं के अनुसार, एक बार राधा रानी जगन्नाथ भगवान के दर्शन करने के लिए पुरी पहुंची थी। हालांकि, राधा रानी को मंदिर के पुजारियों ने बाहर ही रोक दिया। पुजारियों ने कहा कि मंदिर में सिर्फ भगवान और उनकी पत्नियां ही प्रवेश कर सकती हैं। जब राधा रानी ने यह बात सुनी तो उन्हें काफी बुरा लगा। फिर राधा रानी ने उन्हें श्राप दिया कि यदि ऐसा है जो भी प्रेमी जोड़ा इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आएगा उनके प्रेम में बाधा आ जाएगी। इस श्राप के चलते आज भी भगवान जगन्नाथ मंदिर में प्रेमी जोड़े दर्शन के लिए एक साथ नहीं जाएंगे।</span></div><div><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><a href="https://www.prabhasakshi.com/touristplaces/delhi-ncr-rath-yatra-jagannath-temples-guide" target="_blank">इसे भी पढ़ें:पुरी नहीं जा पा रहे? Delhi-NCR के इन Jagannath मंदिरों में करें रथ यात्रा के दर्शन</a><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div><div><b style="font-size: 1rem;">क्या जगन्नाथ रथ यात्रा में शामिल हो सकते हैं प्रेमी जोड़ा?</b></div><div><span style="font-size: 1rem;">पुरी में कल यानी 16 जुलाई से रथ यात्रा शुरु हो रही है। ऐसे में आपके मन में भी काफी सवाल आ रहे होगे। जी हां! जगन्नाथ रथ यात्रा में प्रेमी जोडे़ शामिल हो सकते हैं। बस प्रेमी जोड़े सिर्फ मंदिर में भगवान के दर्शन नहीं कर सकते हैं। लेकिन वह रथ यात्रा में शामिल हो सकते हैं। आज भी वहां के लोग इस परंपरा को मान रहे है। लेकिन मंदिर की तरफ से कोई भी रोक नहीं लगाई जाती है। स्थानीय लोगों के मुताबिक, अविवाहित जोड़े यहां शादी से पहले आते हैं, तो उनके रिश्तों में समस्या आ सकती है।&nbsp;</span><span style="font-size: 1rem;">&nbsp;</span></div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 15 Jul 2026 11:22:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/why-couples-avoid-puri-jagannath-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Gupt Navratri 2026: 15 जुलाई से शुरू हो रही है गुप्त नवरात्रि, जानें 10 Mahavidyas की पूजा का रहस्य]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में चैत्र और शारदीय नवरात्रि के अलावा दो 'गुप्त नवरात्रि' भी पड़ती हैं। गुप्त नवरात्रि शक्ति साधना का बेहद रहस्यमय और प्रभावशाली पर्व माना जाता है। माघ और आषाढ़ माह में आने वाली इन नवरात्रि को तांत्रिक और अघोरी के लिए खास मानी जाती है। इन नवरात्रि में अघोरी और तांत्रिक अपनी साधना को सिद्ध करने के लिए 'दस महाविद्याओं' की पूजा-उपासना करते हैं। गुप्त नवरात्रि में की जाने वाली साधना बेहद खास और प्रभावशाली मानी जाती है। धार्मिक मान्यता है कि गुप्त नवरात्रि में दस महाविद्याओं या विशेष देवियों की पूजा-आराधना करने से जातक को मनचाहा फल प्राप्त होता है।&nbsp;&nbsp;</div><div><br></div><h2>कब है गुप्त नवरात्रि</h2><div>हर साल आषाढ़ माह की प्रतिपदा तिथि से गुप्त नवरात्रि की शुरूआत होती है। इस बार 15 जुलाई 2026 से गुप्त नवरात्रि की शुरूआत हो रही है। वहीं इसकी समाप्ति 23 जुलाई 2026 को होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story" target="_blank">Amarnath Story का यह रहस्य जानते हैं आप? जब अमर कथा सुनने की इजाजत Ganesha को भी नहीं थी</a></h3><div><br></div><h2>दस महाविद्याएं</h2><div>गुप्त नवरात्रि के दौरान 9 दुर्गा की जगह पर 10 देवियों की विशेष रूप से पूजा-अर्चना की जाती है।</div><div>&nbsp;</div><div>मां काली</div><div><br></div><div>मां तारा</div><div><br></div><div>मां त्रिपुर सुंदरी</div><div>&nbsp;</div><div>मां भुवनेश्वरी</div><div>&nbsp;</div><div>मां छिन्नमस्ता</div><div><br></div><div>मां त्रिपुर भैरवी</div><div>&nbsp;</div><div>मां धूमावती</div><div>&nbsp;</div><div>मां बगलामुखी</div><div>&nbsp;</div><div>मां मातंगी</div><div>&nbsp;</div><div>मां कमला</div><div>&nbsp;</div><h2>गुप्त नवरात्रि पूजन विधि और सावधानियां</h2><div>बता दें कि गुप्त नवरात्रि की पूजा को 'गुप्त' रखा जाता है। जितना ज्यादा इसको गुप्त रखा जाता है, फल उतना ही ज्यादा मिलता है।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि की साधना विशेष रूप से मध्यरात्रि, निशिथ काल में करना अच्छा माना जाता है।</div><div><br></div><div>अगर संभव हो तो 9 दिन तक अखंड ज्योति जलाना चाहिए।</div><div><br></div><div>मनोकामना के मुताबिक संबंधित देवी के मंत्रों का जाप करना चाहिए।</div><div><br></div><div>गुप्त नवरात्रि के 9 दिनों तक सात्विक आहार लेना चाहिए और ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए।</div>]]></description>
      <pubDate>Tue, 14 Jul 2026 14:40:01 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/gupt-navratri-begins-on-july-15-learn-secret-of-worshipping-10-mahavidyas</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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      <title><![CDATA[Amarnath Story का यह रहस्य जानते हैं आप? जब अमर कथा सुनने की इजाजत Ganesha को भी नहीं थी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>हिंदू धर्म में भगवान शिव और मां पार्वती की अमरकथा से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनने को मिलती है। श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड ने लिखा है कि सदियों पर भगवान शिव से माता पार्वती ने पूछा कि उन्होंने मुंड माला कब और क्यों धारण करना शुरू किया। जिस पर भगवान शिव ने जवाब देते हुए कहा कि जब भी देवी पार्वती का जन्म होता है, तो वह अपनी माला में एक और सिर जोड़ लेते हैं।</div><div><br></div><div>तब देवी पार्वती ने कहा कि मैं बार-बार मरती हूं, लेकिन आप अमर हैं। इसलिए मुझे अपनी अमरता का कारण बताइए। जिस पर भगवान शिव-शंकर ने उत्तर देते हुए कहा कि पार्वती इसके लिए आपको अमर कथा सुननी होगी।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/amazing-facts-related-to-puri-jagannath-dha-why-birds-do-not-fly-over-temple" target="_blank">Jagannath Temple Significance: Puri के Jagannath Dham से जुड़े 5 Amazing Facts, क्यों मंदिर के ऊपर से नहीं उड़ते पक्षी</a></h3><div><br></div><h2>अमरकथा सुनाने से पहले क्या-क्या त्यागा</h2><div>जब भगवान शिव जी माता पार्वती को अमरकथा सुनाने को तैयार हो गए। तो शिव-पार्वती ऐसी जगह के लिए चल पड़े, जहां पर अन्य कोई अमर कथा को न सुन सके। अमरकथा सुनाने के लिए उन्होंने अमरनाथ गुफा को चुना। लेकिन इससे पहले भगवान शिव ने अपने प्रिय भक्त और वाहन नंदी को पहलगाम में छोड़ दिया।</div><div><br></div><div>वहीं अपने नागों को शेषनाग झील के किनारे छोड़ दिया। उन्होंने भगवान गणेश को महागुण पर्वत पर छोड़ा और जीवन के पंच तत्वों को पंजतरणी में त्याग दिया। जिनके वह स्वामी हैं। इन सभी को त्यागने के बाद भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया और समाधि ले ली।</div><div><br></div><h2>दो कबूतरों ने सुनी अमरता की कथा</h2><div>कोई भी अमरता से जुड़ा वृत्तांत न सुन पाए, यह सुनिश्चित करने के लिए भगवान शिव ने कालाग्नि को पैदा किया। कालाग्नि को गुफा के अंदर और इसके आसपास के सभी जीवों को नष्ट करने के लिए आग फैलाने का आदेश दिया। फिर भगवान शिव में मां पार्वती को अमरता का रहस्य बताना शुरू किया।</div><div><br></div><div>लेकिन संयोगवश एक कबूतर के जोड़े ने अमरता का वृत्तांत सुन लिया और वह अमर हो गए। माना जाता है कि आज भी कई तीर्थयात्री उन पवित्र कबूतरों के जोड़े को वहां देखने का दावा करते हैं। वहीं तीर्थयात्री भी यह देखकर हैरान हो जाते हैं कि इतने ठंडे और पहाड़ी क्षेत्र में यह पक्षी जीवित कैसे रहते हैं।</div>]]></description>
      <pubDate>Mon, 13 Jul 2026 11:02:54 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/know-secret-of-amarnath-story-when-ganesha-not-allowed-to-listen-to-amarnath-story</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
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