<?xml version="1.0" encoding="UTF-8" standalone="no"?><rss xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
  <channel>
    <title><![CDATA[Hindi News - News in Hindi - Latest News in Hindi | Prabhasakshi]]></title>
    <description><![CDATA[Latest News in Hindi, Breaking Hindi News, Hindi News Headlines, ताज़ा ख़बरें, Prabhasakshi.com पर]]></description>
    <link>https://www.prabhasakshi.com/</link>
    <item>
      <title><![CDATA[Dravidian Architecture का बेजोड़ नमूना है Chamundeshwari Temple, शिखर पर हैं 7 स्वर्ण कलश]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maharaja-krishna-raja-wadiyar-renovated-historic-chamundeshwari-temple-in-1827]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>मैसूर की 3489 फीट ऊंची पहाड़ी की चोटी पर चामुंडेश्वरी मंदिर स्थित है। यह मंदिर न सिर्फ भारत बल्कि विदेशों में भी प्रसिद्ध है। यहां पर भक्त अपनी मनोकामना लेकर दूर-दूर से पहुंचते हैं। यह मंदिर प्रमुख शक्तिपीठों में से एक हैं। खासकर नवरात्रि के पावन मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है। यहां पर दर्शन का अनुभव साधारण नहीं बल्कि आत्मा को छू जाने वाला होता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको चामुंडेश्वरी देवी और मंदिर के रहस्य के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>चामुंडेश्वरी देवी</h2><p>श्री चामुंडेश्वरी देवी को चामुंडी भी कहा जाता है। यह मां दुर्गा की शक्ति का उग्र रूप हैं। देवी चामुंडी भगवान शिव की पत्नी देवी पार्वती का अवतार हैं। पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक पहाड़ी पर आतंक मचाने वाले राक्षस महिषासुर का चामुंडी देवी ने वध किया था। जिस कारण उनको 'महिषासुर मर्दिनी' के रूप में भी जाना जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/madhya-kailash-temple-in-chennai-houses-unique-half-ganesha-and-half-hanuman-idol" target="_blank" rel="noopener">Chennai के Madhya Kailash Temple में विराजते हैं आधे गणेश और आधे हनुमान रूपी आद्यंत प्रभु</a></p><h2>श्री चामुंडेश्वरी मंदिर</h2><p>कर्नाटक के मैसूरु के चामुंडी पहाड़ियों पर लगभग समुद्र तल से 3,489 फीट की ऊंचाई पर चामुंडेश्वरी मंदिर स्थित है। स्कंद पुराण और अन्य प्राचीन ग्रंथों में आठ पहाड़ियों से घिरे 'त्रिमुता क्षेत्र' नाम के पवित्र स्थान का वर्णन मिलता है। इन 8 पहाड़ियों में से एक पश्चिमी भाग में चामुंडेश्वरी मंदिर स्थित है, जोकि पहाड़ी पर स्थित सबसे प्राचीन मंदिर है। इसके अलावा पहाड़ी पर महाबलेश्वर मंदिर भी स्थापित है।</p><h2>इतिहास</h2><p>बता दें कि मैसूरु के राजपरिवार का श्री चामुंडेश्वरी मंदिर के वर्तमान स्वरूप और इसकी भव्यता के पीछे बड़ा योगदान रहा है। महाराजा कृष्णा राजा वोडेयार देवी मां के परम भक्त थे। उन्होंने साल 1827 में इस मंदिर का बड़े पैमाने पर जीर्णोद्धार कराया था। वहीं मंदिर के प्रवेश द्वार पर वर्तमान सात मंजिला सुंदर गोपुरम बनवाया था। राजा द्वारा भेंट किए गए इन ऐतिहासिक रथों का उपयोग आज भी विशेष त्योहारों और धार्मिक अवसरों पर निकलने वाले जुलूसों के लिए किया जाता है।</p><h2>द्रविड़ शैली की भव्य वास्तुकला</h2><p>श्रीचामुंडेश्वरी मंदिर की बनावट आध्यात्मिकता और कला का बेजोड़ नमूना है। यह मुख्य रूप से एक चतुर्भुजाकार संरचना है, जिसको पारंपरिक द्रविड़ वास्तुकला वाली शैली में तैयार किया गया है। मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक भव्य सात मंजिला गोपुरम है।</p><p>इस मंदिर के शिखर के सबसे ऊपरी हिस्से पर सात स्वर्ण कलश स्थापित हैं। जोकि दूर से ही चमकते हुए दिखते हैं। मंदिर परिसर के अंदर नवरंग हॉल, प्राकार, अंतर्ला मंडप और मुख्य गर्भगृह शामिल है। मुख्य गर्भगृह के ठीक ऊपर एक छोटा और सुंदर सा 'विमान' भी बना हुआ है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 22 Oct 2026 17:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maharaja-krishna-raja-wadiyar-renovated-historic-chamundeshwari-temple-in-1827</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/22/chamundeshwari-temple_large_173934_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Chennai के Madhya Kailash Temple में विराजते हैं आधे गणेश और आधे हनुमान रूपी आद्यंत प्रभु]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/madhya-kailash-temple-in-chennai-houses-unique-half-ganesha-and-half-hanuman-idol]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आप सभी लोगों ने भगवान भोलेनाथ और मां पार्वती के अर्धनारीश्वर स्वरूप के बारे में तो सुना, पढ़ा और देखा जरूर होगा। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश में एक ऐसा अनोखा मंदिर है, जहां पर आधे हनुमान और आधे गणेश जी विराजते हैं। दरअसल, तमिलनाडु के नादुक्कयिलाई के नाम से प्रसिद्ध मध्य कैलाश मंदिर है। जोकि दक्षिण चेन्नई में स्थित हिंदू मंदिर है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस अनोखे मंदिर के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>मंदिर में आधे गणेश और आधे हनुमान की मूर्ति</h2><p>बता दें कि मध्य कैलाश मंदिर अपनी अनोखी प्रतिमा के लिए काफी ज्यादा फेमस है। यहां मंदिर में स्थापित आधे गणेश और आधे हनुमान जी की मूर्ति को आद्यंत प्रभु के रूप में जाना जाता है। जोकि भगवान श्रीगणेश और हनुमान जी के रूप में विलीन है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/daksheshwar-mahadev-temple-haridwar-history-and-significance-in-kankhal" target="_blank" rel="noopener">Famous Temple: हरिद्वार के Kankhal स्थित Daksheshwar Mahadev मंदिर से जुड़ा है माता सती का इतिहास</a></p><p>प्रतिमा के दाहिने ओर गणेश और बाईं ओर हनुमान जी की मूर्ति है। मंदिर में स्थापित आद्यंत प्रभु का साल 1994 में कुंभाभिषेकम पूरा हुआ। तब से लेकर आज तक दुनिया भर से लोग आद्यंत प्रभु की अद्भुत और अनोखी प्रतिमा को देखने के लिए भक्त दूर-दूर से मध्य कैलाश मंदिर आते हैं।</p><h2>मंदिर से जुड़ा रोचक तथ्य</h2><p>प्राप्त जानकारी के मुताबिक मंदिर के ही एक अधिकारी को इस रूप के दर्शन हुए थे। जिसके बाद इस प्रतिमा की रचना की गई थी। आद्यंत प्रभु की आरती के लिए कपूर जलाया जाता है और दोपहर को पुजारी मूर्ति का स्नान कराते हैं और गीले कपड़ों में ही अनुष्ठान शुरूकर देते हैं।</p><h2>आद्यंत प्रभु के नाम का अर्थ</h2><p>आद्यंत प्रभु के नाम का अर्थ है, जिनका न तो उद्गम है और न ही कोई अंत है। हिंदू शास्त्रों और पुराणों में हनुमान जी को चिरंजीवी बताया गया है, जबकि भोलेनाथ और मां पार्वती के पुत्र श्री गणेश का जन्म दो बार हुआ था। बता दें कि इस अनोखे मंदिर में आधे हनुमान और आधे गणेश जी की मूर्ति स्थापित है, जिनको रूद्र का रूप भी कहा जाता है।</p><p>वहीं मंदिर के मुख्य देवता के रूप में भगवान शिव, वेंकट आनंद विनायकर, भगवान विष्णु और भगवान सूर्य का भी मंदिर है। यह मंदिर भक्तों के लिए खास महत्व रखता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 21 Oct 2026 13:15:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/madhya-kailash-temple-in-chennai-houses-unique-half-ganesha-and-half-hanuman-idol</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/21/madhya-kailash-temple_large_131508_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: हरिद्वार के Kankhal स्थित Daksheshwar Mahadev मंदिर से जुड़ा है माता सती का इतिहास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/daksheshwar-mahadev-temple-haridwar-history-and-significance-in-kankhal]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>उत्तराखंड के हरिद्वार से करीब 4 किमी दूर कनखल में दक्षेश्वर महादेव मंदिर है। इस मंदिर को दक्ष प्रजापति मंदिर भी कहा जाता है। यह पवित्र स्थल श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक जिस स्थान पर दक्षेश्वर महादेव मंदिर है, उस स्थान पर देवी सती ने अग्निदाह करके अपने प्राणों को त्याग दिया था। भगवान शिव ने प्रलंयकारी तांडव किया था। वहीं सावन के महीने में और महाशिवरात्रि के मौके मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ होती है। इस दौरान भक्त पूजा-अर्चना और महादेव के दर्शन के लिए दूर-दूर से आते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको दक्षेश्वर महादेव मंदिर से जुड़े रोचक तथ्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>दक्षेश्वर महादेव मंदिर की पौराणिक कथा</h2><p>पौराणिक कथा के मुताबिक देवी सती के पिता राजा दक्ष ने कनखल में एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया। इस यज्ञ में सभी देवी-देवताओं को बुलाया गया था। लेकिन राजा दक्ष ने माता सती और भगवान शिव को निमंत्रण नहीं दिया। माता सती ने भोलेनाथ से इस यज्ञ में जाने की इच्छा जताई, लेकिन भगवान शिव ने उनको मना कर दिया। जिस पर माता सती ने पिता के यज्ञ में जाने की जिद करने लगीं, तो भगवान शिव ने उनको यज्ञ में जाने की अनुमति दे दी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/var-siddhi-temple-in-ujjain-attracts-devotees-for-early-marriage-wishes" target="_blank" rel="noopener">उज्जैन के Var Siddhi Mandir में सांकल बजाकर उल्टा स्वास्तिक बनाने से तय होता है विवाह</a></p><p>जब मां सती यज्ञ स्थल पर पहुंची, तो राजा दक्ष ने महादेव का घोर अपमान किया। देवी सती अपने पति भगवान शिव का अपमान सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने उसी यज्ञ कुंड में कूदकर जान दे दी और अपने प्राण त्याग किए। देवी सती के के आत्मदाह की घटना का जब भगवान शिव को पता चली, तो उनको इतना क्रोध आया कि वह प्रलयंकारी तांडव करने लगे। भगवान शिव ने राजा दक्ष का सिर काटने के लिए वीरभद्र को भेजा।</p><p>इसके बाद राजा दक्ष ने माता सती और उनके साथ उचित व्यवहार नहीं किया था। वीरभद्र द्वारा सिर काटे जाने के बाद अन्य देवताओं के अनुरोध पर भगवान शिव ने राजा दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाकर उनको फिर से जीवित कर दिया। इसके बाद राजा दक्ष ने अपनी भूल के लिए महादेव से क्षमा मांगी।</p><h2>मंदिर में स्थित है यज्ञ कुंड</h2><p>आज भी दक्षेश्वर महादेव मंदिर परिसर में यज्ञ कुंड मौजूद है। जिसमें मां सती ने क्रोधित होकर अपने प्राण त्यागे थे। भारी संख्या में भक्त इस कुंड के दर्शन करने आते हैं। इस मंदिर में एक शिवलिंग भी विराजमान है, जिसकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।</p><p>आपकी जानकारी के मुताबिक दक्षेश्वर महादेव मंदिर के ठीक बगल से गंगा नदी बहती है। यहां पर स्थित घाट को दक्ष घाट भी कहा जाता है। मंदिर में दर्शन और पूजा-अर्चना करने से पहले भी भक्त इस घाट पर स्नान करते हैं।</p><h2>जानें कब बना था मंदिर</h2><p>बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 1810 में रानी धनकौर ने करवाया था। इसके बाद साल 1962 में इस मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 20 Oct 2026 13:35:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/daksheshwar-mahadev-temple-haridwar-history-and-significance-in-kankhal</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/20/daksheshwar-mahadev-temple_large_133248_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bihar के Bihta स्थित Van Devi Mandir का रहस्य, जिसपर बनी Film The Vvan]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/van-devi-mandir-bihta-history-and-story-behind-ancient-bihar-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>उत्तर भारत के बिहार राज्य में एक ऐसा रहस्यमयी मंदिर है, जोकि अपनी पौराणिक कथाओं और लोक संस्कृति के लिए जाना जाता है। बता दें कि बिहार के बिहटा में वन देवी का मंदिर है। इस पर बॉलीवुड में एक फिल्म भी बनी है। बॉलीवुड अभिनेता सिद्धार्थ मल्होत्रा और तमन्ना भाटिया स्टारर फिल्म 'द वीवान:फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट' की कहानी बिहार के वन देवी मंदिर पर आधारित है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको वन देवी मंदिर के बारे में कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>जानिए वन देवी मंदिर की कहानी</h2><p>पटना से करीब 35 किमी दूर अमहारा, राघोपुर और कंचनपुर गावों के संगम पर मां वन देवी का मंदिर स्थित है। यह मंदिर बिहार के कम ज्ञान आकर्षणों और धार्मिक स्थलों में शामिल है। श्रद्धालुओं के लिए यह पसंदीदा गंतव्य है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/var-siddhi-temple-in-ujjain-attracts-devotees-for-early-marriage-wishes" target="_blank" rel="noopener">उज्जैन के Var Siddhi Mandir में सांकल बजाकर उल्टा स्वास्तिक बनाने से तय होता है विवाह</a></p><p>स्थानीय मान्यातओं के हिसाब से वन देवी की कहानी सदियों पुरानी है। वहीं यह मंदिर करीब 350-400 साल पुराना बताया जाता है। वहीं फिल्म निर्माताओं ने इस मंदिर की उत्पत्ति 16वीं शताब्दी की बताई है।</p><h2>जानें वन देवी का मां विंध्यवासिनी से संबंध</h2><p>स्थानीय लोक कथाओं के अनुसार, वन देवी मंदिर का संबंध विंध्याचल की मां विंध्यवासिनी से है। बताया जाता है कि राघोपुर के विद्यानंद मिश्रा नामक भक्त विंध्याचल में देवी विंध्यवासिनी की श्रद्धा और भक्ति के साथ पूजा करते थे।</p><p>जैसे-जैसे विद्यानंद मिश्रा की उम्र बढ़ती गई, तो उनके लिए लंबी यात्रा मुश्किल होती गई। एक दिन उनको वन देवी ने सपने में दर्शन दिए और कहा, पवित्र पिंड का एक अंश अपने निवास स्थान ले आओ।</p><p>प्राप्त जानकारी के मुताबिक विद्यानंद मिश्रा ने देवी मां के आदेश पर पवित्र पिंड को अपने गांव लाए और जंगल में स्थापित कर दिया। उस दौरान वहां पर कोई भव्य मंदिर नहीं था, सिर्फ झोपड़ी के अंदर पवित्र पिंड स्थापित था। जंगल के बीचो-बीच मंदिर होने के कारण इसको वन देवी के रूप में जाना जाने लगा।</p><h2>मंदिर में नहीं की जाती मूर्ति पूजा</h2><p>साल 1958 के आसपास संत भगवान दास त्यागी यज्ञ के लिए अमहारा आए। स्थानीय लोगों के अनुसार, पवित्र पिंड के आसपास की साधारण संरचना को एक औपचारिक मंदिर का रूप देने का श्रेय संत भगवान दास त्यागी को दिया जाता है।</p><p>वहीं 12 फरवरी 1997 में स्थानीय भक्तों ने मंदिर के आगे का निर्माण कराया। वहीं इस मंदिर में किसी मूर्ति की पूजा नहीं होती है, बल्कि यहां पर एक पिंड है। जिसकी पूजा-अर्चना की जाती है।</p><h2>सूर्यास्त के बाद वर्जित है मंदिर जाना</h2><p>इस मंदिर से जुड़ा एक रोचक पहलू भी है। यहां पर सूर्यास्त के बाद किसी को भी जंगल या फिर मंदिर के अंदर जाने की अनुमति नहीं है। इस कारण वन देवी मंदिर को रहस्यमयी कहा जाता है। सूर्यास्त के बाद मंदिर के कपाट बंद हो जाते हैं और पुजारी भी चले जाते हैं। इसके बाद मंदिर में रुकने की अनुमति किसी को नहीं है।</p><p>लोक कथाओं के अनुसार, माना जाता है कि अंधेरा होते ही स्वयं वन देवी जंगलों में विचरण करती हैं। हालांकि इसका कोई प्रमाण नहीं है कि रात में कोई अलौकिक शक्ति प्रकट होती है। लेकिन पीढ़ियों से यह परंपरा चली आ रही है, जोकि इस मंदिर की पहचान का सबसे अहम हिस्सा है।</p><h2>ऐसे पहुंचे वन देवी मंदिर</h2><p>पटना से वन देवी मंदिर तक पहुंचने के लिए सड़क और हवाई मार्ग दोनों मौजूद हैं। अगर आप पटना से गाड़ी से वन देवी मंदिर जाते हैं, तो आपको करीब 35 किमी सफर करना होगा।</p><p>वहीं यहां का सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन बिहटा रेलवे स्टेशन है। यहां से आप ऑटो या टैक्सी से आगे जा सकती हैं।</p><p>यहां का सबसे नजदीकी हवाई अड्डा जय प्रकाश नारायण अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है। यहां से वन देवी मंदिर की दूरी 28 से 30 किमी है।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 17 Oct 2026 11:30:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/van-devi-mandir-bihta-history-and-story-behind-ancient-bihar-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/17/van-devi-mandir_large_112956_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[उज्जैन के Var Siddhi Mandir में सांकल बजाकर उल्टा स्वास्तिक बनाने से तय होता है विवाह]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/var-siddhi-temple-in-ujjain-attracts-devotees-for-early-marriage-wishes]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>उज्जैन को महाकाल की नगरी के नाम से जाना जाता है। उज्जैन की शान महाकालेश्वर मंदिर है, लेकिन शहर में कुछ ऐसे भी मंदिर हैं, जिनकी मान्यताएं अनोखी होने के साथ-साथ हैरान करने वाली भी हैं। उज्जैन के मध्य में हरसिद्धि मंदिर स्थित है, जोकि शहर के सबसे पूजनीय पीठों में से एक माना जाता है। शिव पुराण में भी इस मंदिर का उल्लेख मिलता है। धार्मिक मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती की कोहनी गिरी थी।</p><h2>मंदिर की अनोखी मान्यता</h2><p>हरसिद्धि शक्तिपीठ मंदिर के पीछे एक ऐसी देवी का मंदिर है, जिनको वर सिद्धि माता के नाम से जाना जाता है। वर सिद्धि यानी को योग्य वर का आशीष देने वाली देवी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/eight-famous-durga-temples-in-india-and-their-mythological-stories" target="_blank" rel="noopener">Famous Temple: भारत के आठ प्रसिद्ध Durga Mandir जहां Vaishno Devi और Kamakhya की पौराणिक मान्यता है</a></p><p>इस मंदिर से जुड़ी मान्यता है कि जो भी कुंवारे लड़के या लड़कियां मां के दरवाजे की सांकल बजाकर विवाह की मनोकामना का धागा बांधती हैं, उनकी जल्द ही शादी हो जाती है।</p><h2>सांकल के अलावा स्वास्तिक बनाने की क्या है मान्यता</h2><p>हरसिद्धि मंदिर के पीछे सीढ़ियों के पास वरसिद्धि देवी का मंदिर है। हालांकि यह मंदिर छोटा सा है। मंदिर के अंदर देवी की प्रतिमा है और इस मंदिर में आने वाले युवक-युवतियां मंदिर के दरवाजे की सांकल को बजाती हैं और मन्नत का धागा बांधती हैं। इसको पचरंगी धागा कहा जाता है। इस धागे में तीन या पांच गांठ लगाई जाती हैं।</p><p>वहीं मंदिर के मुख्य द्वार पर स्वास्तिक बनाने की परंपरा भी है। जब भी भक्त मां वरसिद्धि के दर्शन और पूजन के लिए जाते हैं, तो दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं। जिससे कि विवाह की मनोकामना पूरी हो सके। वहीं जिन लोगों की मनोकामना पूरी हो जाती है, वह फिर से दर्शन करने के बाद सीधा स्वास्तिक बनाते हैं और देवी वरसिद्धि को पूजन की सामग्री समेत प्रसाद भेंट करते हैं।</p><p>हरसिद्धि मंदिर के पीछे स्थित वरसिद्धि मंदिर भी बेहद प्राचीन है। शादी से जुड़ी ऐसी मान्यता की वजह से जिन लोगों के विवाह में देरी होती है, वह युवक और युवतियां मंदिर में रोजानाधागे बांधते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 16 Oct 2026 12:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/var-siddhi-temple-in-ujjain-attracts-devotees-for-early-marriage-wishes</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/16/var-siddhi-temple_large_121642_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Temple: भारत के आठ प्रसिद्ध Durga Mandir जहां Vaishno Devi और Kamakhya की पौराणिक मान्यता है]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/eight-famous-durga-temples-in-india-and-their-mythological-stories]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू पौराणिक कथाओं के मुताबिक देवी दुर्गा को शक्ति के रूप में पूजा जाता है। वह नारी शक्ति और सामर्थ्य का भी प्रतीक हैं। भारत में विभिन्न रूपों और अवतारों में देवी दुर्गा की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं भारत के हर क्षेत्र में शक्ति और मां दुर्गा की उपस्थिति की अपनी अनूठी कहानी है। चाहे जम्मू के बर्फ से ढके पहाड़ों से लेकर असम के हरे-भरे परिदृश्यों और नदी किनारे स्थित देवी दुर्गा के मंदिरों की अपनी कहानी है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको भारत के 8 सबसे प्रतिष्ठित देवी दुर्गा मंदिर और उनके पीछे की कहानी के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>वैष्णो देवी मंदिर, जम्मू-कश्मीर</h2><p>जम्मू के कटरा में पहाड़ों के बीच स्थित वैष्णो देवी मंदिर त्रिकुटा पर्वत श्रृंखला में है। हर साल लाखों की संख्या में भक्त इस तीर्थस्थान के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। यह भारत के सबसे पूजनीय स्थलों में से एक है। कथा के मुताबिक देवी भगवान श्रीराम की भक्त थीं और भैरव नाथ नामक तांत्रिक उनका पीछा कर रहा था। भागते-भागते देवी को एक गुफा मिली और यहां पर उन्होंने शरण लेकर ध्यान करना शुरूकर दिया। लेकिन तांत्रिक गुफा में प्रवेश करने के लिए उनको परेशान कर रहा था। जिसके बाद वैष्णो देवी ने भैरव नाथ का सिर काटकर उसका वध कर दिया। बाद में यह गुफा तीर्थस्थल के रूप में स्थापित हुई। इस पवित्र गुफा की खोज करीब 700 वर्ष पूर्व पंडित श्रीधर ने की थी।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-lakshmi-emerged-from-samudra-manthan-in-kshirsagar" target="_blank" rel="noopener">Kshirasagar Manthan: क्षीरसागर में समुद्र मंथन से हुआ था मां लक्ष्मी का प्राकट्य, 14 दिव्य रत्नों में थीं शामिल</a></p><h2>दुर्गा मंदिर, वाराणसी</h2><p>वाराणसी का दुर्गा मंदिर 18वीं शताब्दी में बना था। इसको रानी भवानी द्वारा बनवाया गया था। इस मंदिर में अद्वितीय लाल संरचना में गंगा से जुड़े एक पवित्र कुंड से सामने स्वयंभू दुर्गा की प्रतिमा है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इस दुर्गा मंदिर का निर्माण देवी दुर्गा के सम्मान में कराया गया था, जोकि शेर पर सवार होकर आई थीं और वाराणसी और काशी के राजा की पुत्री और उनके पति की रक्षा करने के लिए प्रतिद्वंदी राजाओं से युद्ध किया था।</p><h2>कामाख्या मंदिर, असम</h2><p>गुवाहाटी के नीलाचल पहाड़ी पर शक्तिपीठ के रूप में कामाख्या मंदिर स्थित है। यहां पर देवी सती की योनि गिरी थी। यहां पर कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि एक पत्थर को देवी की योनी/तंत्र देवी के रूप में पूजा जाता है। यह स्थान देवी दुर्गा और उनकी सृजन शक्ति को समर्पित है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब भोलेनाथ सती के शव को लेकर जा रहे थे। तो श्रीहरि के चक्र ने देवी सती के शरीर के टुकड़े कर दिए थे। ऐसे में उनकी योनि इस क्षेत्र में गिरी और तब से यहां मां कामाख्या की पूजा की जाती है। मासिक धर्म के दौरान मंदिर बंद रहता है।</p><h2>कालकाजी मंदिर, दिल्ली</h2><p>भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में शामिल कालकाजी मंदिर 3000 साल से ज्यादा पुराना है। यह दिल्ली के नेहरू प्लेस के पास अरावली की पहाड़ियों पर स्थित है। यह मंदिर पांडवों और श्रीकृष्ण की उपस्थिति से जुड़ा है। पौराणिक कथा के मुताबिक देवी पार्वती ने दो राक्षसों को पराजित करने के लिए अपनी कोख से देवी कौशिकी को जन्म दिया था। तब से इस स्थान पर देवी की पूजा की जाती है।</p><h2>कात्यायनी मंदिर, वृंदावन</h2><p>यह मंदिर वृंदावन के सबसे लोकप्रिय और प्राचीन मंदिरों में से एक है। हर साल लाखों की संख्या में भक्त देवी कात्यायनी के दर्शन के लिए इस मंदिर में आते हैं। पौराणिक कथा के मुताबिक यह मंदिर भगवान श्रीकृष्ण के युग का है। माना जाता है कि गोपियों ने भगवान श्रीकृष्ण को पति के रूप में पाने के लिए देवी कात्यायनी की पूजा की थी।</p><h2>चामुंडा देवी, हिमाचल प्रदेश</h2><p>चामुंडा देवी हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले के पास स्थित है। हर साल हजारों-लाखों की संख्या में भक्त मंदिर पहुंचते हैं। पौराणिक कथा के अनुसार, दुर्गा के माथे से यह अवतार उत्पन्न हुआ था। उन्होंने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध किया था। इन राक्षसों ने देवी दुर्गा के ध्यान में खलल डालने की कोशिश की और संसार में अत्याचार किया था। मंदिर में देवी दुर्गा को योद्धा के रूप को बाध की खाल और खोपड़ी की माला से सुशोभित किया गया है।</p><h2>चामुंडेश्वरी मंदिर, कर्नाटक</h2><p>मैसूर के पास स्थित चामुंडी पहाड़ियों पर यह मंदिर स्थित है। यह मंदिर करीब 600 साल पुराना है और देवी दुर्गा के चामुंडा रूप को समर्पित है। देवी चामुंडा ने महिषासुर का वध किया था और राजा चामराजा वाडियार यहां पर बिजली गिरने से बच गए थे।</p><h2>कनक दुर्गा मंदिर, आंध्र प्रदेश</h2><p>आंध्र प्रदेश में कृष्णा नदी के पास विजयवाड़ा में इंद्रकीलाद्री पहाड़ी पर यह मंदिर है। इस मंदिर में स्वर्ण देवी दुर्गा को महिषासुर का वध करते दर्शाया गया है। करीब 10वीं शताब्दी में चालुक्य राजाओं ने मंत्र शास्त्र की मूर्तियों से साथ इसका निर्माण कराया था। नवरात्रि के मौके पर यहां भक्तों की भारी भीड़ होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 15 Oct 2026 10:42:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/eight-famous-durga-temples-in-india-and-their-mythological-stories</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/15/vaishno-devi-temple_large_104029_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Kshirasagar Manthan: क्षीरसागर में समुद्र मंथन से हुआ था मां लक्ष्मी का प्राकट्य, 14 दिव्य रत्नों में थीं शामिल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-lakshmi-emerged-from-samudra-manthan-in-kshirsagar]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में मां लक्ष्मी को धन, ऐश्वर्य और सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। माना जाता है कि मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना और व्रत करने से आर्थिक तंगी दूर होती है और कभी धन संबंधी समस्या नहीं होती है। इसके साथ ही दीपावली पर भी मां लक्ष्मी की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मां लक्ष्मी के प्रकट होने की कथा क्या है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि मां लक्ष्मी का जन्म कैसे हुआ।</p><h2>धन की देवी ऐसे हुईं प्रकट</h2><p>सनातन धर्म में मां लक्ष्मी को वैभव, धन, सुख-समृद्धि की देवी माना जाता है। पौराणिक कथाओं और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक मां लक्ष्मी का जन्म साधारण माता-पिता के कोख से नहीं बल्कि उनका प्राकट्य ब्रह्मांड के सबसे बड़े और प्रसिद्ध 'समुद्र मंथन' से हुआ था। जब देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन किया था, तो समुद्र में से 14 बहुमूल्य रत्न और दिव्य वस्तुएं निकली थीं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-harsiddhi-mata-temple-history-signifies-sati-right-elbow-shaktipeeth" target="_blank" rel="noopener">Ujjain Shaktipeeth: Ujjain के Harsiddhi Temple में गिरी थी सती की कोहनी, बना 51 शक्तिपीठों का केंद्र</a></p><p>समुद्र मंथन के दौरान शरद पूर्णिमा के दिन क्षीरसागर से मां लक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसके बाद उन्होंने जगत के पालनहार श्री विष्णु को अपने पति के रूप में चुना था। मां लक्ष्मी की उत्पत्ति सृष्टि में ऊर्जा, धन और सकारात्मकता के संतुलन को स्थापित करने के लिए थी।</p><h2>समुद्र मंथन की कथा</h2><p>पौराणिक कथा के मुताबिक देवराज इंद्र और सभी देवता महर्षि दुर्वासा के शाप के कारण अपनी शक्ति और वैभव खो बैठे थे। जिसके बाद स्वर्ग पर असुरों का राज हो गया। ऐसे में इस संकट से उबरने के लिए सभी देवताओं ने भगवान श्रीहरि विष्णु से मदद मांगी। तब श्रीहरि ने देवताओं को क्षीरसागर मंथन करने का उपाय बताया। इस महामंथन के लिए मंदाचल पर्वत को मथानी और वासुकी नाग को रस्सी के रूप में इस्तेमाल किया गया। समुद्र मंथन में मदद पाने के लिए देवताओं ने असुरों से समझौता किया। जिसके बाद देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र की गहराई को मथना शुरू किया।</p><h2>समुद्र मंथन से निकले 14 रत्न</h2><p>इस अद्भुत प्रक्रिया में समुद्र मंथन से एक-एक करके कुल चौहद दिव्य और शक्तिशाली रत्न प्रकट हुए।</p><p>समुद्र मंथन की शुरूआत में सबसे पहले विष हलाहल निकला। जोकि बेहद घातक और विषैला था। सृष्टि की रक्षा के लिए महादेव ने विष को अपने कंठ में धारण किया और वह नीलकंठ बन गए।</p><p>समुद्र मंधन से सभी की इच्छाएं पूरी करने वाली कामधेनु गाय निकली।</p><p>इसके बाद सात मुख वाला सफेद रंग का चमकीला और उड़ने वाला उच्चैःश्रवा घोड़ा समुद्र मंथन से निकला।</p><p>इंद्रदेव का वाहन ऐरावत हाथी समुद्र मंथन से निकला। यह हाथी सफेद रंग का और ऐश्वर्य का प्रतीक था।</p><p>समुद्र मंथन से भगवान विष्णु के वक्ष स्थल पर शोभा पाने वाली सबसे मूल्यवान और जादुई कौस्तुभ मणि निकली।</p><p>हर मनोकामना को पूरी करने वाला कल्पवृक्ष समुद्र मंथन से निकला।</p><p>समुद्र मंथन से रंभा और मेनका आदि अप्सराएं निकलीं, जोकि सुंदर और कला में निपुण थीं।</p><p>समुद्र मंथन से धन, ऐश्वर्य और सौंदर्य की देवी मां लक्ष्मी निकलीं।</p><p>मदिरा की देवी वरुणी देवी समुद्र मंथन से निकलीं।</p><p>शीतलता और प्रेम के प्रतीक भगवान चंद्रमा का समुद्र मंथन से प्राकट्य हुआ।</p><p>जिसकी खुशबू से पूरा लोक महक उठता है, वह पारिजात वृक्ष भी समुद्र मंथन से निकला।</p><p>विजय और पवित्रता का प्रतीक दिव्य पाञ्चजन्य शंख भी समुद्र मंथन से निकला।</p><p>आयुर्वेद के जनक और देवताओं के चिकित्सक धन्वंतरि हाथ में अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।</p><p>समुद्र मंथन से दिव्य अमृत कलश निकला, जिसको पीने से देवता अमर हो गए।</p><h2>भगवान विष्णु से विवाह</h2><p>जब समुद्र से चौदहवें रत्न के रूप में मां लक्ष्मी क्षीरसागर से प्रकट हुईं, तो उनके हाथ में कमल का फूल था और वह स्वयं एक खिले हुए कमल पर विराजमान थीं। मां लक्ष्मी के इस अलौकिक और दिव्य सौंदर्य को देखकर असुर और देवता उन पर मोहित हो गए। वहीं मां लक्ष्मी के स्वागत के लिए दिशाएं जगमगा उठीं और गंगाजल से हाथियों ने मां लक्ष्मी का अभिषेक किया।</p><p>जब मां लक्ष्मी ने अपनी दृष्टि दौड़ाई तो उन्होंने संसार के पालनहार श्रीहरि को अपने पति के रूप में चुना। उन्होंने भगवान श्रीहरि के वक्ष स्थल पर अपना स्थान ग्रहण किया, तब से वह श्रीविष्णु की अर्धांगिनी और श्री विष्णु की शक्ति माना जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 12:48:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-lakshmi-emerged-from-samudra-manthan-in-kshirsagar</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/14/goddess-lakshmi_large_124652_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ujjain Shaktipeeth: Ujjain के Harsiddhi Temple में गिरी थी सती की कोहनी, बना 51 शक्तिपीठों का केंद्र]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-harsiddhi-mata-temple-history-signifies-sati-right-elbow-shaktipeeth]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>पूरे भारत में अलग-अलग स्थानों पर देवी सती के शक्तिपीठ स्थापित हैं। देवी सती के अंगों से 51 शक्तिपीठों का निर्माण हुआ था। जिनमें से उज्जैन का हरसिद्धि माता मंदिर शामिल है। हरसिद्धि मंदिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के पास स्थित है। नवरात्रि या फिर किसी भी खास मौके पर मंदिर में भव्य नजारा देखने को मिलता है। ज्यादा संख्या में श्रद्धालु हरसिद्धि माता के दर्शन के लिए मंदिर पहुंचते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हरसिद्धि मंदिर से जुड़ी कथा और महत्वपूर्ण जानकारी के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>हरसिद्धि माता शक्तिपीठ मंदिर</h2><p>धार्मिक मान्यता के मुताबिक जब देवी सती के शरीर में अंग जिस-जिस स्थान पर गिरे, वह सभी स्थान शक्तिपीठ में बदल गए। जहां पर देवी सती की दाहिनी कोहनी गिरी थी। उस स्थान पर हरसिद्धि माता मंदिर को बनाया गया। इस मंदिर को शक्ति का केंद्र माना जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mundeshwari-devi-temple-kaimur-famous-for-unique-bloodless-ritual" target="_blank" rel="noopener">Mundeshwari Temple में होती है बिना खून बहाए सात्विक बलि, बदलता है शिवलिंग का रंग</a></p><h2>कथा</h2><p>उज्जैन के पवित्र स्थलों में हरसिद्धि माता शक्तिपीठ शामिल है। मंदिर में महासरस्वती और महालक्ष्मी की मूर्ति विराजमान है। इन मूर्ति के बीच में मां अन्नपूर्णा की मूर्ति भी है। इसके अलावा श्रीयंत्र भी स्थापित है। जिसकी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। शिव पुराण के मुताबिक जब भोलेनाथ यज्ञ की अग्नि से देवी सती के जलते शरीर को उठाकर ले जा रहे थे, तो मां सती की दाहिनी कोहनी यहां पर गिरी थी। जिसके बाद इस स्थान पर हरसिद्धि माता शक्तिपीठ बना।</p><p>पौराणिक कथा के मुताबिक भोलेनाथ देवी पार्वती के साथ कैलाश पर्वत पर एकांत में थे, तो उसी दौरान दो राक्षसों ने शिव-पार्वती के पास आने की कोशिश की। उनका नाम चंड और प्रचंड था। तब भगवान शिव ने राक्षसों का वध करने के लिए चंडी को बुलाया और चंडी ने राक्षसों को नष्ट कर दिया। इससे महादेव प्रसन्न हुए और देवी चंडी को सब पर विजय पाने वाली की उपाधि प्रदान की।</p><p>हरसिद्धि माता मंदिर का पुनर्निर्माण मराठा काल के दौरान किया गया था। मंदिर में 2 स्तंभ हैं और रोजाना शाम को इन स्तंभों पर दीपक जलाए जाते हैं। इस दौरान मंदिर का नजारा बेहद भव्य लगता है। इस दृश्य को देखने के लिए दूर-दूर से भक्त आते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 14 Oct 2026 10:46:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/ujjain-harsiddhi-mata-temple-history-signifies-sati-right-elbow-shaktipeeth</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/14/harsiddhi-mata-temple_large_104533_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mundeshwari Temple में होती है बिना खून बहाए सात्विक बलि, बदलता है शिवलिंग का रंग]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mundeshwari-devi-temple-kaimur-famous-for-unique-bloodless-ritual]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>बिहार के कैमूर जिले के पवरा पहाड़ी पर मां मुंडेश्वरी मंदिर है। जोकि अद्भुत शक्तिपीठ होने के अलावा भारत का सबसे पुराना जीवित मंदिर है। इस मंदिर का निर्माण करीब 108 ईस्वी में किया गया था। स्थापत्य और आस्था दोनों के नजरिए से यह मंदिर बेहद खास है। मंदिर में मां मुंडेश्वरी की अष्टभुजा वाली प्रतिमा स्थापित है। सुरक्षा और सिद्धि प्राप्ति के लिए मां मुंडेश्वरी की पूजा-अर्चना की जाती है। वहीं मंदिर में एक शिवलिंग भी स्थापित है, जिस वजह से यह शैव और शक्त दोनों संप्रदायों के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है।</p><p>यह एक अष्टकोणीय मंदिर है और इसकी वास्तुकला, शिल्पकला और पहाड़ पर बसे होने की वजह से इसके दर्शन करना काफी मनोरम लगता है। बसंत पंचमी, नवरात्रि और महाशिवरात्रि के मौके पर मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hartalika-teej-story-traces-the-divine-union-of-lord-shiva-and-goddess-parvati" target="_blank" rel="noopener">Goddess Parvati: बालू के शिवलिंग की पूजा और सखी द्वारा हरण के बाद ऐसे पड़ा इस कठिन व्रत का नाम हरतालिका तीज</a></p><h2>जानें मां मुंडेश्वरी मंदिर का रहस्य</h2><p>मां मुंडेश्वरी मंदिर अपनी प्राचीनता के अलावा बलि देने के अनोखे तरीके के लिए भी जाना जाता है। यहां पर खासतौर पर बिना खून बहाए बकरे की सात्विक बलि भी दी जाती है।</p><p>इसके बाद बकरे को जीवित छोड़ दिया जाता है। वहीं इस मंदिर में स्थित पंचमुखी शिवलिंग को लेकर भी यह मान्यता है कि इसका रंग हमेशा बदलता रहता है। वहीं यह दुनिया के पुराने चालू मंदिरों में से एक है।</p><h2>जानें मंदिर से जुड़ी मुख्य बातें</h2><p>मंदिर तक पैदल जाने के लिए सीढ़ियों की भी व्यवस्था है। वहीं मंदिर तक पहुंचने के लिए करीब 500-600 सीढ़ियां चढ़नी होती हैं। वहीं मंदिर पहाड़ी पर स्थित है जोकि करीब 608 फीट ऊपर है।</p><p>सीढ़ियों के अलावा &nbsp;ऊपर जाने के लिए वाहन और सड़क मार्ग की भी व्यवस्था है। मां मुंडेश्वरी का वाहन महिष है, क्योंकि मां मुंडेश्वरी को वाराही देवी के रूप में पूजा जाता है।</p><h2>पौराणिक कथाएं</h2><p>हिंदू धर्म के पवित्र देवी ग्रंथ दुर्गा सप्तशती में कथा आती है कि चंड-मुंड के नाश के बाद देवी मां उग्र हो गई थीं। तो चंड को मारने के बाद मुंड देवी से युद्ध करते हुए इसी पहाड़ी के पीछे जा छिपा और यहां पर देवी ने उसका वध किया था।</p><p>इस कारण देवी मां उनको मुंडेश्वरी के नाम से पूजते हैं। यहां पर पूजा की परंपरा आज से नहीं बल्कि 1900 सालों से लगातार चली आ रही है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 13 Oct 2026 11:28:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mundeshwari-devi-temple-kaimur-famous-for-unique-bloodless-ritual</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/13/ai-news-image-large_large_112754_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[दिल्ली में Durga Puja: CR Park से मिंटो रोड तक इन पंडालों में मिलेगा कोलकाता जैसा माहौल]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/delhi-durga-puja-pandals-across-eight-locations-bring-kolkata-like-vibe]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>क्या आप भी कोलकाता जैसा दुर्गा पंडाल का भव्य नजारा दिल्ली में देखना चाहते हैं? तो यह लेख आपके लिए है। नवरात्रि के समय में दिल्ली की सड़कों पर एक अलग ही जादू देखने को मिलता है। दुर्गा पंडाल से लेकर गरबा-डांडिया नाइट की धूम और रामलीला के कार्यक्रम देखने को मिलते हैं।</p><p>यदि इस बार आप सोच रहे है कि इस साल दोस्तों या परिवार के साथ वो परफेक्ट &nbsp;'पंडाल हॉपिंग' वाली वाइब कहां मिलेंगी, तो आप दिल्ली के इन शानदार पंडालों में जरुर जाएं। यहां पर आपको एकदम कोलकाता वाली वाइब देखने को मिलती है।</p><p><strong>सीआर पार्क मेला ग्राउंड</strong></p><p>दिल्ली में दुर्गा पूजा पंडाल की बात हो रही है, तो सबसे पहला नाम सीआर पार्क का ही आता है। मेला ग्राउंड का पंडाल अपने आप में विशाल आकार और भव्य मूर्तियां के लिए जाना जाता है। यहां दर्शन करने के बाद बाहर लगे फूड स्टॉल्स पर गरमागरम काठी रोल और पुचका का आनंद ले सकते हैं।</p><p><strong>सीआर पार्क बी-ब्लॉक</strong></p><p>हर साल यह पर कुछ न कुछ नया और हटकर देखने को मिलता है। बी-ब्लॉक पंडाल में अनोखी थीम और पर्यावरण को ध्यान में रखकर की गई सजावट के लिए यह जगह काफी प्रसिद्ध है। वैसे यहां पर बड़े-बड़े कल्चरल प्रोग्राम भी देखने को मिलते हैं।</p><p><strong>मिंटो रोड दुर्गा पूजा</strong></p><p>यहां पर 1940 से लेकर अब तक पूजा पंडाल का आयोजन हो रहा है। इस पंडाल में आपको एक बड़ी-सी फैमिली गैदरिंग वाला फील देखने को मिलेगा। लाउड म्यूजिक से दूर, यह जगह अपने स्वादिष्ट भोग और पारंपरिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों के लिए जानी जाती है। इधर का खाना काफी टेस्टी होता है।</p><p><strong>सीआर पार्क काली मंदिर</strong></p><p>इधर आपको कोई मॉर्डन तड़क-भड़क या थीम नहीं देखने को मिलेगी नहीं। कोलकाता से आए कारीगरों द्वारा सजाई गई मूर्ति और शाम में होने वाली आरती का भव्य नजारा होता है , जो कि काफी सुकून देती है। बंगाल की असली पारंपरिक पूजा यहां पर देखने को मिलती है।</p><p><strong>मिलानी दुर्गा पूजा</strong></p><p>ईस्ट दिल्ली का यह खास पंडाल अपनी आर्टिस्टिक थीम के लिए हर साल लोकप्रिय होता है। यहां की सुंदर सजावट और लाइटिंग देखकर आपको लगेगा जैसे आप दिल्ली में नहीं, बल्कि कोलकाता के किसी नामी पंडाल में खड़े हैं। फोटोग्राफी के शौकीनो के लिए यह बेहतरीन जगह है।</p><p><strong>जीके-2 दुर्गोत्सव</strong></p><p>अगर आप कम भीड़-भाड़ चाहते हैं, तो आफ दिल्ली के जीके- 2 में चल जाएं। यहां पर आपको धुनुची डांस और लाइव ढाक बीट्स आपको खुद ही थिरकने पर मजबूर कर देगा।</p><p><strong>दक्षिणायन, जीके-2</strong></p><p>अगर आपको एकदम शांति वाला माहौल चाहिए, तो आप यहां जा सकते हैं। दर्शन करने के बाद आप यहां पर लगी हुई छोटी दुकानों से साड़ियां और ट्रेंडी जूलरी की शॉपिंग कर सकते हैं।</p><p><strong>आराम बाग दुर्गा पूजा</strong></p><p>यहां का विशाल सेट-अप और चमकादर लाइटिंग के लिए पंडाल दूर-दूर तक मशहूर है। यहां पर आपको एकदम मेले जैसा माहौल देखने को मिलेगा। आराम बाग दुर्गा पंडाल आपको काफी पसंद आएगा और सुकून भी मिलेगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 17:36:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/delhi-durga-puja-pandals-across-eight-locations-bring-kolkata-like-vibe</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/12/ai-news-image-large_large_173549_157.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Goddess Parvati: बालू के शिवलिंग की पूजा और सखी द्वारा हरण के बाद ऐसे पड़ा इस कठिन व्रत का नाम हरतालिका तीज]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hartalika-teej-story-traces-the-divine-union-of-lord-shiva-and-goddess-parvati]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हर साल भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को हरतालिका व्रत किया जाता है। इस दौरान भगवान शिव और मां पार्वती की पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत मां पार्वती के तप और शिव-पार्वती के पवित्र मिलन का प्रतीक है। हम सभी जानते हैं कि देवी पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक घने जंगलों में तप किया था। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने कितने साल तप किया था और इसको लेकर क्या कथा है।</p><h2>मां पार्वती ने कितने साल तप किया</h2><p>पौराणिक कथाओं के मुताबिक भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए देवी पार्वती ने हजारों वर्षों बेहद कठिन और घोर तपस्या की थी। पुराणों के अनुसार, देवी पार्वती ने कुल हजारों वर्षों तक अलग-अलग चरणों में तपस्या की थी। देवी पार्वती की अचल भक्ति और प्रेम ने यह साबित कर दिया था कि अगर सच्ची निष्ठा और अटूट विश्वास हो, तो असंभव को भी संभव किया जा सकता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/pilgrimage-to-trikuta-hills-happens-when-vaishno-devi-calls-her-devotees" target="_blank" rel="noopener">Vaishno Devi Yatra का बुलावा आते ही दूर होने लगती हैं रुकावटें और बनते हैं काम</a></p><h2>सती रूप त्यागकर हिमालयराज के यहां लिया जन्म</h2><p>देवी पार्वती पिछले जन्म में माता सती थीं। सती रूप में अपना शरीर त्यागने के बाद देवी पार्वती ने पर्वतराज हिमालय के यहां पर पुत्री के रूप में जन्म दिया था। उनके मन में बचपन से ही महादेव के प्रति अगाध प्रेम था और उन्होंने देवर्षि नारद के मार्गदर्शन पर चलकर भगवान शिव को पति रूप में पाने का संकल्प लिया। देवी पार्वती ने अपनी जिद और भक्ति को पूरा करने के लिए राजसी सुख-सुविधाओं को त्यार दिया और जंगलों में कड़ी साधना करना शुरूकर दिया।</p><p>देवी पार्वती ने तपस्या के शुरूआती समय में कंद-मूल और फल खाकर की हजारों वर्षों तपस्या की।</p><p>समय के साथ देवी पार्वती ने फलों का त्याग कर दिया और सिर्फ पेड़ों से गिरने वाले सूखे पत्ते खाकर व्रत किया।</p><p>तपस्या के अंतिम चरणों में देवी पार्वती ने पत्तों का आहार भी छोड़ दिया और वह सिर्फ जल और हवा के सहारे तपस्या करने लगीं। जिस कारण उनका शरीर बेहद क्षीण हो गया था।</p><h2>हरतालिका तीज की अनसुनी कथा</h2><p>भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया और हस्त नक्षत्र के दिन देवी पार्वती ने पूरा दिन निराहार रहकर बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। फिर उन्होंने रात भर जगकर महादेव की पूजा और कठिन निर्जला व्रत किया। इस दौरान उन्होंने सूखे बेलपत्र भी खाने बंद कर दिए। जिसके बाद देवी पार्वती का नाम 'अपर्णा' पड़ा। इसका अर्थ ऐसा व्यक्ति जिसने पत्ते भी न खाए हों।</p><h2>हरतालिका तीज नाम की कहानी</h2><p>देवी पार्वती के इस अदम्य तप, बालू के शिवलिंग की पूजा और अटूट संकल्प से तीनों लोक और स्वयं महादेव की समाधि हिल उठी। तब भगवान शिव ने प्रकट होकर देवी पार्वती की तपस्या को स्वीकार किया और देवी पार्वती को अपनी पत्नी के रूप में पाने का वरदान दिया। क्योंकि देवी पार्वती ने अपनी सखी द्वारा अपहरण कर इस प्रकार सुरक्षित रखा गया था, और उन्होंने ताली के साथ मिलकर यह व्रत किया था, जिस वजह से इस व्रत का नाम हरतालिका व्रत पड़ा।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 12 Oct 2026 10:58:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/hartalika-teej-story-traces-the-divine-union-of-lord-shiva-and-goddess-parvati</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/12/goddess-parvati_large_105640_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Vaishno Devi Yatra का बुलावा आते ही दूर होने लगती हैं रुकावटें और बनते हैं काम]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/pilgrimage-to-trikuta-hills-happens-when-vaishno-devi-calls-her-devotees]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत में सबसे ज्यादा पूजी जाने वाली देवियों में मां वैष्णो देवी का नाम सबसे पहले आता है। महालक्ष्मी, महाकाली और महासरस्वती की संयुक्त और तेज शक्तियों से मां वैष्णों देवी का प्राकट्य हुआ है। इस बात का प्रतीक मां वैष्णों देवी की पवित्र गुफा मंदिर के अंदर त्रिदेवी यानी की तीन पिंडियों के दर्शन से पता चलता है। अक्सर मां वैष्णो देवी के दर्शन को लेकर आपने लोगों से अक्सर यह सुना होगा कि जब तक मां के दरबार से बुलावा नहीं आता है, कोई उनके दर्शन के लिए नहीं जा सकता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर मां वैष्णो देवी का बुलावा कैसे आता है। क्या भक्तों को मां वैष्णो देवी कोई संकेत देती हैं।</p><h2>वैष्णो देवी के बुलावे का संकेत</h2><p>हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु देश और दुनिया से मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आते हैं। लेकिन मां वैष्णो देवी के दर्शन को लेकर कहा जाता है, 'मां के दरबार में वही जाता है, जिसको मां बुलाती है।' अक्सर लोग मां के बुलावे को चमत्कार से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि इसके पीछे कई संकेत हो सकते हैं। जिसमें से अचानक से मां वैष्णो देवी के दर्शन की तीव्र इच्छा हो सकती है। या फिर कोई दोस्त या रिश्तेदार बिना किसी वजह के दर्शन यात्रा की बात करने लगे होते हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/twelve-zodiac-signs-and-auspicious-mantras-for-daily-worship-benefits" target="_blank" rel="noopener">Mantra Chanting: मेष से मीन तक 12 राशियों के लिए खास मंत्र, नियमित जाप से बढ़ेगा आत्मविश्वास और शांति</a></p><p>कई बार कभी-कभी मां वैष्णो देवी के दर्शन से जुड़े वीडियो, फोटो या रील बार-बार आपके सामने आने लगते हैं। वहीं कई बार ऐसी स्थिति बन जाती है कि सालों-साल से टल रही यात्रा अचानक से बन जाती है। समय, पैसा और छुट्टी सभी काम अपने आप बनने लगते हैं।</p><p>मां वैष्णो देवी के दर्शन को लेकर कई भक्तों का कहना है कि जब तक माता रानी का बुलावा नहीं आता है, तब तक मां के दर्शन की हर कोशिश नाकाम रहती है। लेकिन जिस दिन मां का बुलावा आता है, उस दिन हर रुकावट दूर होती चली जाती है। मां वैष्णो देवी के बुलावे की कोई आवाज नहीं है, बल्कि वह एक आशीर्वाद है, जोकि भक्तों को मां के भवन आने के लिए उत्साह और भक्ति से भर देता है।</p><h2>त्रिकुट पर्वत पर है मां वैष्णो देवी का दरबार</h2><p>जम्मू में स्थित मां वैष्णो देवी उत्तर भारत की पूजनीय देवियों में से एक है। मां वैष्णो देवी का भवन त्रिकुट पर्वत है, जहां वैष्णो देवी निवास करती हैं। करीब 14 किमी की चढ़ाई है, जिसमें भैरव बाबा के दर्शन भी शामिल हैं। हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु कटरा स्थित मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए पहुंचते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 09 Oct 2026 10:38:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/pilgrimage-to-trikuta-hills-happens-when-vaishno-devi-calls-her-devotees</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/9/vaishno-devi-bulawa_large_103633_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Mantra Chanting: मेष से मीन तक 12 राशियों के लिए खास मंत्र, नियमित जाप से बढ़ेगा आत्मविश्वास और शांति]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/twelve-zodiac-signs-and-auspicious-mantras-for-daily-worship-benefits]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>सनातन धर्म में मंत्र जाप का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि मंत्रों के जाप से मन को शांति मिलती है और जीवन में सकारात्मकता बढ़ती है। वहीं पूजा के दौरान किया गया मंत्र उच्चारण भगवान के प्रति जुड़ाव को मजबूत करता है। इसके साथ ही रोजाना पूजा के समय मंत्र जाप करने से पूजा का पूर्ण फल मिलता है और जीवन में अच्छे बदलाव भी महसूस किए जाते हैं। हालांकि रोजाना पूजा के दौरान अपनी राशि के हिसाब से मंत्र का जाप करना बेहद शुभ माना जाता है।</p><p>मान्यता है कि राशि के हिसाब से मंत्र जाप करने से संबंधित ग्रहों की कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख-समृद्धि आती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको बताने जा रहे हैं कि राशि के हिसाब से कौन से मंत्र का जाप करना लाभकारी माना जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhari-devi-temple-in-uttarakhand-revered-as-guardian-of-char-dham" target="_blank" rel="noopener">Pauri Garhwal के Dhari Devi Temple में दिन में तीन बार स्वरूप बदलती है मां काली की प्रतिमा</a></p><h2>मेष राशि</h2><p>मेष राशि के जातकों द्वारा 'ॐ हं हनुमते रुद्रात्मकाय हुं फट्' मंत्र का जाप करना चाहिए। मान्यता है कि इस मंत्र का जाप करने से जातक का आत्मबल बढ़ता है और मनोबल मजबूत होता है।</p><h2>वृषभ राशि</h2><p><br>इस राशि के जातकों को 'ॐ उमायै नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जातक के मन को शांति मिलती है और साथ ही सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।</p><h2>मिथुन राशि</h2><p>इस राशि के जातकों को पूजा के दौरान 'ॐ गं गणपतये नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करने से अटके हुए कामों को गति मिलती है।</p><h2>कर्क राशि</h2><p>कर्क राशि के जातकों को पूजा के दौरान 'ऊँ नम: शिवाय' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जातक के मन को शांति मिलती है।</p><h2>सिंह राशि</h2><p>इस राशि के लोगों को 'ॐ सूर्याय नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे इन लोगों का आत्मविश्वास बढ़ता है और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।</p><p>सिंह राशि के लोगों के लिए 'ॐ सूर्याय नमः' मंत्र का जाप शुभ माना जाता है। इससे आत्मविश्वास बढ़ता है और सकारात्मक ऊर्जा प्राप्त होती है।</p><h2>कन्या राशि</h2><p>कन्या राशि के जातकों के लिए 'ॐ गणराजाय नमः' मंत्र का जाप करना लाभकारी माना जाता है। इस मंत्र का जाप करने से बुद्धि और एकाग्रता बढ़ती है, साथ ही कार्यों में सफलता मिलती है।</p><h2>तुला राशि</h2><p>इस राशि के जातकों को 'ॐ महालक्ष्म्यै नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जातक पर मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहती है और जीवन में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।</p><h2>वृश्चिक राशि</h2><p>वृश्चिक राशि के जातकों के लिए 'ॐ रामदूताय नमः' मंत्र का करना लाभकारी माना जाता है। इससे आत्मबल बढ़ता है औऱ नकारात्मकता भी दूर होती है।</p><h2>धनु राशि</h2><p>इस राशि के जातकों को 'ॐ नमो भगवते वासुदेवाय' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जातक के मन को शांति मिलती है और सकारात्मकता बढ़ती है।</p><h2>मकर राशि</h2><p>मकर राशि के जातकों को 'ॐ शं शनैश्चराय नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करने से जातक पर शनिदेव की कृपा बनी रहती है।</p><h2>कुंभ राशि</h2><p>कुंभ राशि के जातकों के लिए 'ॐ महाकालाय नमः' मंत्र का जाप करना लाभकारी माना जाता है।</p><h2>मीन राशि</h2><p>मीन राशि वाले लोगों को 'ॐ विष्णवे नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए। इससे जातक के मन को शांति मिलती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 08 Oct 2026 13:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/twelve-zodiac-signs-and-auspicious-mantras-for-daily-worship-benefits</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/8/ai-news-image-large_large_130521_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pauri Garhwal के Dhari Devi Temple में दिन में तीन बार स्वरूप बदलती है मां काली की प्रतिमा]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhari-devi-temple-in-uttarakhand-revered-as-guardian-of-char-dham]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>देवभूमि उत्तराखंड में एक ऐसा मंदिर है, जहां पर एक ऐसा मंदिर है, जो बेहद प्रसिद्ध है। धारी देवी मंदिर, मुख्य रूप से मां काली को समर्पित है। यह मंदिर क्षेत्र में पूजनीय होने के साथ-साथ भारत के अन्य हिस्सों में भी काफी प्रसिद्धि प्राप्त कर रहा है। धारी देवी मंदिर को चार धाम का रक्षक भी कहा जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इस मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनको जानकर आप भी हैरान रह जाएंगे।</p><h2>कहां स्थित है मंदिर</h2><p>उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में श्रीनगर और रुद्रप्रयाग के बीच कलियासौड़ में अलकनंदा नदी के किनारे धारी देवी मंदिर के पास है। यह प्राचीन और रहस्यमयी मंदिर है। वहीं धारी माता को देवी कालीसौर के रूप में भी जाना जाता है। इनका आशीर्वाद पाने के लिए भक्त दूर-दूर से इस मंदिर के दर्शन के लिए आते हैं। वहीं मंदिर के पास एक प्राचीन गुफा भी मौजूद है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><h2>दिन में तीन बार रूप बदलती है मूर्ति</h2><p>स्थानीय लोगों का मानना है कि मंदिर में स्थित धारी देवी की प्रतिमा दिन में 3 बार अपना रूप बदलती है। सुबह के समय छोटी बालिका, दिन में महिला और शाम को उनका स्वरूप बूढ़ी महिला के रूप में दिखाई देता है।</p><h2>जानें क्यों प्रसिद्ध है मंदिर</h2><p>पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक एक बार भीषण बाढ़ की वजह से मंदिर बह गया था और धारी देवी की मूर्ती धारो नामक गांव के पास एक चट्टान के पास रुक गई थी। वहीं गांव वालों को मूर्ति से विलाप की आवाज सुनाई दी और इस आवाज ने उनको मूर्ति को स्थापित किए जाने के निर्देश दिए। तब गांव वालों ने मिलकर फिर उसी स्थान पर धारी माता की मूर्ति को स्थापित किया।</p><p>वहीं अन्य मान्यता के अनुसार, साल 2013 में केदारनाथ बाढ़ से ठीक पहले किसी काम के कारण धारी देवी मंदिर को स्थानांतरित किया गया था। स्थानीय लोगों का मानना है कि धारी देवी के प्रकोप की वजह से ही बाढ़ आई थी। फिर बाद में उसी जगह पर मंदिर का निर्माण कर देवी की मूर्ति को स्थापित किया। इसलिए धारी देवी मंदिर की इतनी अधिक मान्यता है।</p><h2>मंदिर की खासियत</h2><p>धारी देवी मंदिर में देवी को 'उत्तराखंड की रक्षक देवी' और चारों धाम की संरक्षक के रूप में पूजा जाता है।</p><p>इस मंदिर को 108 शक्ति स्थलों में से एक माना जाता है।</p><p>धारी देवी की मूर्ति का सिर्फ ऊपरी आधा भाग पूजनीय है। वहीं रुद्रप्रयाग के कालीमठ में मूर्ति का निचला हिस्सा पूजा जाता है।</p><p>धारी देवी के दर्शन किए बगैर चार धाम यात्रा अधूरी मानी जाती है।</p><p>हर साल नवरात्रि के मौके पर देवी कालीसौर की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 16:20:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/dhari-devi-temple-in-uttarakhand-revered-as-guardian-of-char-dham</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/5/dhari-devi-temple_large_161952_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Shaktipeeth Jwala Ji: हिमाचल प्रदेश के Jwala Devi Temple में बिना तेल-बाती जलती हैं 9 पवित्र ज्वालाएं]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jwala-devi-temple-in-kangra-features-nine-natural-eternal-flames]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>51 शक्तिपीठ में मां ज्वाला देवी मंदिर भी शामिल है। ज्वाला देवी मंदिर भगवान शिव और शक्ति को समर्पित है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब देवी सती के शरीर को भगवान विष्णु ने अपने चक्र से 51 टुकड़े किए थे, तो यह अंग जहां-जहां गिरे थे वहां-वहां पर शक्तिपीठ बन गए। माना जाता है कि ज्वाला देवी मंदिर में देवी सती की जीव गिरी थी। हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में स्थित मां ज्वाला देवी मंदिर प्रसिद्ध शक्तिपीठों में से एक है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको ज्वाला देवी मंदिर के कुछ रोचक रहस्यों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>जानिए मंदिर से जुड़ा रोचक रहस्य</h2><p>सदियों से ज्वाला देवी मंदिर में बिना तेल बाती और ईंधन के प्राकृतिक रूप से 9 ज्वालाएं जल रही हैं। 9 ज्वालाओं में प्रमुख ज्वाला वह है, जो चांदी के जाला के बीच में हैं और इसको महाकाली कहा जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><p>वहीं अन्य 8 ज्योतियां अन्नपूर्णा, हिंगलाज, चण्डी, विंध्यवासिनी, सरस्वती, महालक्ष्मी, अंबिका और अंजी देवी ज्वाला देवी मंदिर में वास करती हैं।</p><h2>पौराणिक कथा</h2><p>इस मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा के मुताबिक भक्त गोरखनाथ यहां पर मां की आराधना करते थे। वह देवी मां के परम भक्तों में से एक थे। एक बाद गोरखनाथ को काफी तेज भूख लगी और उन्होंने माता से कहा कि आप यहां आग जलाकर पानी गर्म करो, वह भिक्षा लेकर आते हैं।</p><p>गोरखनाथ के कहने पर माता ने आग जला दी, लेकिन काफी समय बीत जाने के बाद भी गोरखनाथ वापस नहीं लौटे। माना जाता है कि तब से माता अग्नि जलाकर यहां पर गोरखनाथ का इंतजार कर रही हैं। धार्मिक मान्यता है कि सतयुग आने पर ही गोरखनाथ मंदिर लौटेंगे और तब तक यह ज्वाला इसी तरह से जलती रहेगी।</p><h2>जानें मंदिर का चमत्कारी कुंड</h2><p>वहीं ज्वाला देवी शक्तिपीठ मंदिर क पास एक चमत्कारी कुंड भी है। जिसको गोरख डिब्बी कहा जाता है। इस कुंड को देखने में लगता है कि मानो कुंड का पानी काफी तेज खौल रहा है, लेकिन जब पानी को आप स्पर्श करते हैं, तो आपको पानी ठंडा लगेगा।</p><h2>अकबर का घमंड हुआ था चूर</h2><p>बताया जाता है कि एक बार मुगल सम्राट अकबर ने लोहे के ढक्कन से आग को ढककर और पानी से इसको बुझाने की कोशिश की थी। लेकिन अकबर अपने प्रयासों में बुरी तरह से असफल हुआ था। जिसके बाद उसने मंदिर में सोने का एक छाता भेंट दिया था। लेकिन देवी मां की शक्ति के प्रति अकबर के संदेह की वजह से सोना एक अज्ञात धातु में बदल गया था। इस घटना के बाद से मुगल शासक अकबर ने मन में ज्वाला देवी के प्रति आस्था और भी ज्यादा मजबूत हो गई थी।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 05 Oct 2026 11:09:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/jwala-devi-temple-in-kangra-features-nine-natural-eternal-flames</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/10/5/jwala-devi-temple_large_110850_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Pitru Paksha: गया के अलावा Kashi, Haridwar और Ujjain में भी कर सकते हैं पिंडदान]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/best-sacred-places-in-india-other-than-gaya-for-pitru-paksha-pind-daan]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भाद्रपद की पूर्णिमा से पितृ पक्ष की शुरुआत हो चुकी है और इसका समापन अमावस्या के दिन होता है। पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों को तर्पण, श्राद्ध और पिंडदान किए जाते हैं। अगर आप भी पितरों की आत्मा की शांति और मोक्ष के लिए तर्पण के साथ ही पिंडदान कराने की योजना बना रहे हैं, तो यह लेथ आपके लिए है।</p><p>पिंडदान के लिए आपको गया जाने की कोई जरुरत नहीं है। अब आप भारत में गया के अलावा भी कई फेमस जगहें , जहां आप श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं। &nbsp;आइए आपको इन जगहों के बारे में बताते हैं।</p><p><strong>कुरुक्षेत्र, हरियाणा</strong></p><p>जैसा कि कुरुक्षेत्र को हमेशा महाभारत से जोड़कर देखा गया है, जबकि यहां ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर और 48 कोस कुरुक्षेत्र में पिंडदान कराए जाने का भी बेहद ही खास महत्व माना जाता है।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>यहां पर पहुंचने के लिए सबसे पहले आप कुरुक्षेत्र जंक्शन जाएं। इसके बाद ब्रह्म सरोवर, सन्निहित सरोवर और 48 कोस कुरुक्षेत्र का रास्ता महज, 3-4 किलोमीटर का ही रह जाता है, जिसके लिए बस, ऑटो-रिक्शा या गाड़ी लेना सबसे बेहतरीन ऑप्शन है।</p><p><strong>काशी, उत्तर प्रदेश</strong></p><p>हिंदू धर्म काशी यानी वारणसी को मोक्ष का द्वार कहा जाता है। इसी कारण से यह भोलेनाथ की इस नगरी में पितरों की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान कराया जाता है। यहां पर पिशाच मोचन कुंड स्थल इसके लिए खास है, जहां पिंडदान के साथ ही त्रिपिंडी श्राद्ध और पूर्वजों से संबंधित अन्य अनुष्ठान किए जाते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>आप वाराणसी एयरपोर्ट या वाराणसी रेलवे स्टेशन तक पहुंचकर, वहां से अपनी सुविधा के अनुसार टैक्सी या ऑटो ले सकते हैं। वैसे यहां पर पिशाच मोचन कुंड की दूरी करीब 5 किलोमीटरर है।</p><p><strong>हरिद्वार, उत्तराखंड</strong></p><p>उत्तराखंड में हरिद्वार एक ऐसा स्थान है, जहां पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए अनुष्ठान किए जाते हैं। आपको बता दें कि, हरिद्वार में गंगा के किनारे जो नारायणी शिला मंदिर है, वहां आप पिंडदान कर सकते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>अगर आप हरिद्वार में पिंडदान करने का सोच रहे हैं, तो इसके लिए आपको हरिद्वार रेलवे स्टेशन सबसे नजदीक पड़ता है। रेलवे से यह मार्ग देश के कई बड़े शहरों के सड़क मार्ग से भी जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, फ्लाइट से आने के लिए आपको देहरादून जा सकते हैं।</p><p><strong>उज्जैन, मध्य प्रदेश</strong></p><p>महाकाल की नगरी उज्जैन पितृकर्म के लिए बेहद खास मानी जाती है। यहां पर सिद्धवट, गयाकोठा मंदिर, राम घाट औऱ नृसिंह घाट पितरों की शांति के लिए पूजा &nbsp;व पिंडदान किए जाते हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>अगर आप ट्रेन जाना चाहते हैं, तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन उज्जैन है। वहीं, आप फ्लाइट से जाना चाहते है, तो इंदौर का देवी अहिल्याबाई होलकर एयरपोर्ट तक आना होगा। यह उज्जैन से करीब 53 किलोमीटर की दूरी पर है। वहीं, सड़क मार्ग से भी उज्जैन जा सकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 28 Sep 2026 11:40:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/best-sacred-places-in-india-other-than-gaya-for-pitru-paksha-pind-daan</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/28/pitru-paksha_large_114025_157.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Saraswati Mantra: Maa Saraswati के इन चमत्कारी Mantras के जाप से मिलेगी बुद्धि और ज्ञान में अपार सफलता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-saraswati-mantras-for-higher-intellect-and-success-in-studies]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में देवी सरस्वती को कला और ज्ञान की देवी माना जाता है। देवी सरस्वती को वेदों की माता भी कहा जाता है। देवी सरस्वती का स्वरूप निर्मल चांद की ओर जिनके मुख पर दिव्य चमक है। पीत और श्वेत रंग के वस्त्र पहने और उनको कमल के फूल पर विराजमान और हाथों में वीणा धारण किए दिखाया जाता है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक जो भी व्यक्ति नियमित रूप से मां के मंत्रों का जाप सच्चे मन से करता है, उसको मां सरस्वती की विशेष कृपा प्राप्त होती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको देवी सरस्वती के कुछ खास मंत्रों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनका जप करने से आप स्वयं में बड़ा बदलाव महसूस कर सकेंगे।</p><h2>दर्शन, रहस्यवाद या उससे जुड़े विषय</h2><p>जो भी व्यक्ति रहस्यवाद, दर्शन या इससे जुड़े किसी भी तरह के विषयों का अध्ययन कर रहा होता है, उनके लिए यह मंत्र मस्तिष्क में महान विचारों को धारण करने और उन पर सोचने-समझने की क्षमता प्रदान करता है। इस मंत्र से व्यक्ति की मेधा और बुद्धि दोनों को जागृत करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma" target="_blank" rel="noopener">Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता</a></p><p>मंत्र- ऊं ब्रह्म ज्ञानायै नम:</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि मैं ब्रह्मांड में मौजूद उस चेतन बुद्धि की शक्ति को नमन करते हैं। यह मंत्र देवी सरस्वती के उस शक्ति रूप को वर्णित करता है, जोकि खुद ब्रह्मांड की बुद्धि के पीछे मौजूद हैं।</p><h2>खगोल, भौतिकी, रसायन विज्ञान या संबंधित विषय</h2><p>जो भी व्यक्ति खगोल, भौतिकी या अलग-अलग तरह के रसायन विज्ञान और अन्य तरह के विषयों का अध्ययन करता है, उनको इस मंत्र का जाप करना चाहिए।</p><p>मंत्र - ऊं महा विद्यायै नम:</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि महान ज्ञान के पीछे स्थित और इससे उत्पन्न करने वाली शक्ति को नमन करते हैं। मां सरस्वती को महान ज्ञान और उसकी अनुभूति के पीछे स्थित शक्ति के रूप में इस मंत्र को वर्णित किया जाता है।</p><h2>धार्मिक विषयों से जुड़े लोगों के लिए</h2><p>जो भी लोग धर्म के विचारों और ग्रंथों में गहराई से उतारने की कोशिश करते हैं। जिससे किसी भी धर्म या संस्कृति के शास्त्रों के गहरे अर्थ को समझने का प्रयास करते हैं। यह मंत्र धार्मिक विषयों से जुड़े लोगों की बौद्धिक क्षमताओं को भी अधिक तेज बनाने का काम करता है।</p><p>मंत्र- वेदानां मातरं पश्य मत्सथां देवीं सरस्वती।</p><p>इस मंत्र का अर्थ है कि देखो, वेदों की माता मां सरस्वती मुझमें निवास करती हैं।</p><p>इन तीनों मंत्रों में मां सरस्वती को ब्रह्मांड में मौजूद बुद्धि, ज्ञान को उत्पन्न करने वाली शक्ति और अंदर निवास करने वाली वेदों की मां के रूप में पुकारा गया था।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 25 Sep 2026 17:49:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-saraswati-mantras-for-higher-intellect-and-success-in-studies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/25/goddess-saraswati_large_175334_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Goddess Gayatri: सृष्टि रचना और ब्रह्माजी के संकल्प से हुआ था मां गायत्री का प्राकट्य, ऐसे बनीं वेदमाता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा की जाती है। वहीं सभी देवी-देवताओं की पूजा का अपना अलग-अलग महत्व होता है। लेकिन सभी देवी-देवताओं में मां गायत्री को सबसे विशेष माना जाता है, और यही वजह है कि इनको देवताओं की देवी कहा जाता है। देवी गायत्री के जन्म की कहानी थोड़ी अद्भुत और सामान्य देवियों से थोड़ा अलग है। गायत्री देवी आदि शक्ति का स्वरूप है और दिव्य चेतना के रूप में इनका प्राकट्य हुआ था।</p><h2>जानें कैसे हुआ देवी गायत्री का जन्‍म</h2><p>धार्मिक ग्रंथों के मुताबिक सृष्टि की रचना के लिए भगवान ब्रह्मदेव को जिस शक्ति की जरूरत थी, उसी शक्ति का स्त्रीरूप देवी गायत्री के रूप में प्रकट हुआ था। वहीं कुछ कथाओं में बताया जाता है कि देवी गायत्री ने ब्रह्माजी के शरीर के बाएं भाग से जन्म लिया था। वहीं कुछ कथाओं में देवी सावित्री, देवी सरस्वती और देवी गायत्री को एक ही परम शक्ति के अलग-अलग स्वरूप बताए गए हैं। वहीं दूसरी ओर एक अन्य धार्मिक कथा के मुताबिक देवी गायत्री का संबंध सूर्य देव से हैं। देवी गायत्री को सूर्य मंडल के मध्य स्थित दिव्य चेतना या फिर शक्ति के रूप में पूजा जाता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it" target="_blank" rel="noopener">Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता</a></p><h2>यज्ञ से जुड़ी कथा</h2><p>एक लोकप्रिय कथा के मुताबिक ब्रह्माजी को एक यज्ञ करना था। लेकिन यज्ञ में ब्रह्माजी की पत्नी सावित्री समय से नहीं पहुंची। वहीं यज्ञ की पूर्णता के लिए एक योग्य स्त्री की जरूरत हुई, तब एक दिव्य शक्ति का प्राकट्य हुआ, जिसको गायत्री कहा गया और ब्रह्मा जी ने देवी गायत्री से विवाह करके उस यज्ञ को पूर्ण किया।</p><h2>क्यों कहा जाता है 'वेदमाता'</h2><p>माना जाता है कि सभी ग्रंथों, वेदों और मंत्रों की उत्पत्ति देवी गायत्री से हुई है। मां गायत्री के अंदर चारों वेदों का ज्ञान है, इस कारण उनको वेदमाता भी कहा जाता है। देवी गायत्री की पूजा सिर्फ आम मनुष्य ही नहीं बल्कि देवता भी करते हैं। इसलिए मां गायत्री को सिर्फ देवी नहीं बल्कि ज्ञान, चेतना, विवेक और आध्यात्मिक प्रकाश की शक्ति के रूप में भी देखा जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 24 Sep 2026 15:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/maa-gayatri-manifested-through-act-of-creation-and-resolve-of-lord-brahma</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/24/goddess-gayatri_large_151019_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Hanuman Mantra: Sankatmochan Hanuman की पूजा में इन 6 Mantras का जप बदल सकता है आपकी जिंदगी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-hanuman-mantras-for-positive-energy-and-protection-from-enemies]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में हर किसी के पास कोई न कोई परेशानी जरूर है। वहीं हिंदू धर्म में हनुमान जी को 'संकटमोचन' कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि जो भी जातक सच्चे मन से हनुमान जी की पूजा-अर्चना करता है, तो उसके जीवन से बड़े से बड़े संकट पल भर में दूर हो जाते हैं। ऐसे में अगर आपके जीवन में भी बीमारी, तनाव, करियर संबंधी परेशानी या किसी अनजाने डर से परेशान रहते हैं, तो आपको हनुमान जी के कुछ खास मंत्रों का जप करना चाहिए। इन मंत्रों का जप करने से आपकी पूरी जिंदगी बदल सकती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको हनुमान जी के 6 चमत्कारी मंत्र के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही इन मंत्र जप से होने वाले फायदों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>डर और निगेटिविटी दूर करने के लिए मंत्र<br>&nbsp;</h2><p>ॐ दक्षिणमुखाय पच्चमुख हनुमते करालबदनाय।</p><p>अगर किसी व्यक्ति को रात में डर लगता है, मन में हमेशा घबराहट होती है या फिर बुरे सपने आते हैं। तो मंगलवार को इस मंत्र का जप करना चाहिए। इस मंत्र का जप करने से हर तरह की निगेटिविटी एनर्जी से एक कवच की तरह हमारी रक्षा करता है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it" target="_blank" rel="noopener">Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता</a></p><h2>जोश और सकारात्मक ऊर्जा के लिए मंत्र</h2><p>नारसिंहाय ॐ हां हीं हूं हौं हः सकलभीतप्रेतदमनाय स्वाहा।</p><p>जब आपको ऐसा महसूस हो कि शरीर में ऊर्जा की कमी है या फिर आप पर निराशा हावी हो रही है, तो कम से कम 21 बार इस मंत्र का जप करें। इस मंत्र का जप करने से आपके अंदर फौरन एक नया जोश और गजब की सकारात्मकता महसूस होगी।</p><h2>शत्रुओं से रक्षा और आत्मविश्वास के लिए मंत्र</h2><p>ॐ पूर्वकपिमुखाय पच्चमुख हनुमते टं टं टं टं टं सकल शत्रु सहंरणाय स्वाहा।</p><p>अगर अक्सर लोग बिना बात के ही आपके दुश्मन बन जाते हैं, तो मंगलवार या शनिवार को इस मंत्र का जाप करना चाहिए। इस मंत्र के जाप से न सिर्फ आपके अंदर आत्मविश्वास आता है, बल्कि बना मतलब के बने विरोधी भी शांत रहते हैं।</p><h2>नौकरी और तरक्की में आ रही बाधाओं को दूर करने के लिए मंत्र</h2><p>मर्कटेश महोत्साह सर्वशोक विनाशन।</p><p>अगर किसी व्यक्ति को खूब मेहनत करने के बाद भी आपको करियर में वह मुकाम हासिल नहीं हो रहा है, जिसके आप हकदार हैं, तो हर मंगलवार को इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए। इस मंत्र का जाप करने से व्यापार और नौकरी से जुड़ी रुकावटें दूर होती हैं।</p><h2>हर मनोकामना पूरी करने वाली चौपाई</h2><p>मंगल भवन अमंगलहारी द्रवहु सो दशरथ अजिर विहारी।</p><p>यह रामचरितमानस की चौपाई है, अगर कोई व्यक्ति रोजाना इस चौपाई का पाठ करते हैं, तो शारीरिक और मानसिक दोनों तरह के कष्टों से मुक्ति मिलती है।</p><h2>सफलता और रोग मुक्ति के लिए मंत्र</h2><p>ऊं हं हनुमते नम:</p><p>भले ही यह मंत्र छोटा है, लेकिन इसका असर उतना ही बड़ा है। रोजाना सुबह स्नान आदि करने के बाद इस मंत्र का जाप करने से बीमारियां दूर होती हैं और कार्यों में सफलता प्राप्त होती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 23 Sep 2026 10:53:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-hanuman-mantras-for-positive-energy-and-protection-from-enemies</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/23/lord-hanuman_large_105637_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Rajasthan के Kalki Temple में संगमरमर के घोड़े का भर रहा घाव, जुड़ी है रहस्यमयी मान्यता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भगवान विष्णु ने धरती को अधर्म से बचाने के लिए और धर्म की रक्षा के लिए कई बार अवतार लिया। ऐसा ही एक अवतार कल्कि अवतार है। माना जाता है कि कल्कि अवतार लेकर भगवान विष्णु कलियुग का अंत करेंगे। लेकिन भगवान विष्णु के अंतिम अवतार कल्कि के जन्म को लेकर कई रहस्य देखने को मिलते हैं। हिंदू शास्त्रों के अनुसार, जब धरती पर पाप और अधर्म अपने चरम पर होगा, तो इसको खत्म करने और धर्म की स्थापना के लिए भगवान विष्णु कलियुग में कल्कि अवतार लेगें।</p><p>माना जाता है कि भगवान विष्णु का कल्कि का जन्म आम मनुष्य के तौर पर होगा। भले ही अभी तक भगवान विष्णु कलियुग का अंत करने के लिए कल्कि रूप में धरती पर अवतरित नहीं हुए हैं, लेकिन उनके आने से पहले ही भगवान कल्कि के एक मंदिर का निर्माण हो चुका है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle" target="_blank" rel="noopener">Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन</a></p><h2>भगवान कल्कि का दिव्य मंदिर</h2><p>राजस्थान के जयपुर में भगवान कल्कि को समर्पित एक मंदिर है, जोकि करीब 300 साल पुराना माना जाता है। यह मंदिर अपनी आध्यात्मिकता के लिए नहीं बल्कि अपने गहरे रहस्यों के लिए जाना जाता है।</p><p>कल्कि मंदिर भारत के उन मंदिरों में शामिल है, जिनका संबंध भगवान कल्कि और कलियुक के अंत से जुड़ा है। धार्मिक शास्त्रों और प्राचीन मान्यताओं के मुताबिक कलियुग के अंत में भगवान कल्कि अवतार लेंगे। वहीं इस मंदिर का करीब 18वीं शताब्दी में कराया गया था।</p><h2>किसने बनवाया कल्कि मंदिर</h2><p>प्राप्त जानकारी के मुताबिक जयपुर शहर के संस्थापक महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने कल्कि मंदिर का निर्माण कराया था। इस मंदिर में भगवान कल्कि के अलावा उनके घोड़े की भी पूजा की जाती है।</p><p>वहीं कई धार्मिक ग्रंथों में इस बात का जिक्र मिलता है कि भगवान कल्कि अपने दिव्य और श्वेत घोड़े पर सवार होकर कलियुग का अंत करेंगे और भगवान कल्कि के घोड़े का नाम देवदत्त होगा।</p><p>राजस्थान के इस मंदिर में न सिर्फ भगवान कल्कि बल्कि उनका घोड़ा भी रहस्य का केंद्र है। मंदिर के गर्भगृह में मुख्य मूर्ति के साथ घोड़े की मूर्ति भी है।</p><h2>चमत्कारी मान्यताएं</h2><p>इस मंदिर की हैरान करने वाली बात यह है कि मंदिर के प्रवेश द्वार पर घोड़े की मूर्ति है, जोकि एक अलग सफेद संगमरमर की है। घोड़े की मूर्ति के पिछले बाएं पैर में दरार है। जिसको स्थानीय लोग घाव मानते हैं।</p><p>माना जाता है कि जब घोड़े के पैर की दरार भर जाएगी, तब भगवान कल्कि पृथ्वी पर अवतरित होंगे। वहीं यहां के स्थानीय पुजारी और लोगों का मानना है कि सालों से यह घाव भर रहा है।</p><p>वहीं हैरान करने वाली बात यह भी है कि अभी तक धरती पर कल्कि भगवान नहीं आए हैं, लेकिन भारत में कई कल्कि मंदिर हैं और इन मंदिरों में विधि-विधान से भगवान कल्कि की पूजा-अर्चना की जाती है।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 22 Sep 2026 12:13:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/wound-on-marble-horse-at-rajasthan-kalki-temple-healing-mysterious-belief-associated-it</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/22/kalki-temple_large_121458_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Thanjavur के Brihadeeswarar Temple के शिखर की परछाई जमीन पर क्यों नहीं पड़ती]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/thanjavur-brihadeeswarar-temple-shikhara-casts-no-shadow-on-the-ground]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत में कई प्राचीन मंदिर हैं, जिनकी अपनी-अपनी कहानियां हैं। देश के करीब सभी मंदिर गणित, विज्ञान और वास्तुकला की ऐसी अद्भुत मिसाले हैं, जिनको देखकर इंजीनियर और वैज्ञानिक भी हैरान रह जाते हैं। ऐसा ही एक मंदिर तमिलनाडु के तंजावुर शहर में है। भगवान शिव को समर्पित यह बृहदेश्वर मंदिर बेहद अद्भुत है। आमतौर पर अधिकतर मंदिरों के शिखर की परछाई धूप के कारण जमीन दिखाई देती है। लेकिन बृहदेश्वर मंदिर के शिखर की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती है।</p><h2>रहस्यमयी बृहदेश्वर मंदिर</h2><p>भारत सरकार के पर्यटन मंत्रालय और यूनेस्को की विश्व धरोहर लिस्ट के मुताबिक 11वीं शताब्दी में राजा राजराज चोल ने बृहदेश्वर मंदिर का निर्माण कराया था। यह मंदिर मजबूत ग्रेनाइट पत्थरों से बना है। उस समय जब क्रेन जैसी आधुनिक मशीनें नहीं होती थीं, तो चोल कालीन कारीगरों की सहायता से पत्थरों को सैकड़ों फीट ऊपर लेकर जाकर मंदिर का निर्माण कराया गया था। 1000 साल पुराने और शानदार मंदिर की बनावट इतनी गजब की है कि इस मंदिर के शिखर यानी की गुंबद की परछाई कभी जमीन पर नहीं पड़ती है। इस रहस्य को लेकर वैज्ञानिक आज भी हैरान हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle" target="_blank" rel="noopener">Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन</a></p><h2>मंदिर के शिखर की परछाई से जुड़ा रहस्य</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। यह मंदिर पूरे भारत में फेमस है और इसका मुख्य रहस्य मंदिर के शिखर से जुड़ा है। इस मंदिर का शिखर करीब 216 फीट ऊंचा है। इस शिखऱ के ऊपरी हिस्से पर 80 टन के एक पत्थर से बना कलश रखा है। दिन के समय जब सूर्य ठीक सिर के ऊपर होता है या फिर धूप ढलती है, तो इसके मुख्य शिखर की परछाई मंदिर परिसर के जमीन पर नहीं गिरती है।</p><h2>जानें क्या है वैज्ञानिकों और आर्किटेक्ट्स की राय</h2><p>सिविल इंजीनियरिंग और ऐतिहासिक वास्तुकला में इसके बार में बताया गया है। वैज्ञानिकों और आर्किटेक्ट्स की मानें, तो बृहदेश्वर मंदिर को खास गणितीय और ज्यामितीय कोणों के आधार पर डिजाइन किया गया है। मंदिर का चबूतरा काफी चौड़ा है और शिखर की बनावट एक खास कोण में बनाई गई है। इस अलग और अद्भुत संरचना के कारण मंदिर के शिखर की परछाई जमीन तक नहीं आती है और मंदिर के आधार में ही समा जाती है।</p><h2>बिना सीमेंट और केमिकल के बना है मंदिर</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर के निर्माण में चूना, सीमेंट या फिर अन्य किसी तरह के जोड़ने वाले केमिकल का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यहां पर पत्थरों को आपस में जोड़ने के लिए पजल लॉक या इंटरलॉकिंग तकनीक का यूज किया गया है।</p><p>मंदिर के प्रांगण में बाहर की ओर नंदी महाराज की मूर्ति स्थापित है। एक बड़े पत्थर को तराशकर इस मूर्ति का निर्माण किया गया है। इसको भारत की दूसरी सबसे बड़ी नंदी प्रतिमा माना जाता है। यह मंदिर 'ग्रेट लिविंग चोल टेम्पल्स' का हिस्सा है और यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल है।</p><h2>ऐसे पहुंचे बृहदेश्वर मंदिर</h2><p>बृहदेश्वर मंदिर जाने के लिए सबसे नजदीकी एयरपोर्ट तिरुचिरापल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है।</p><p>रेलवे स्टेशन की बात की जाए, तो सबसे नजदीकी रेलवे स्टेशन तंजावुर जंक्शन पड़ेगा।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 21 Sep 2026 14:05:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/thanjavur-brihadeeswarar-temple-shikhara-casts-no-shadow-on-the-ground</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/21/brihadeeswarar-temple_large_140712_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Devi Bhagavata Purana: सालों के इंतजार के बाद ऐसे बना शेर मां दुर्गा का दिव्य वाहन]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में मां दुर्गा को असीम दिव्य शक्ति और ऊर्जा की सर्वोच्च देवी के रूप में पूजा जाता है। देवी दुर्गा को आदि शक्ति, जगत जननी और ब्रह्मांड की माता माना जाता है। जोकि ज्ञान और बुराई को खत्म करके धर्म की रक्षा करती हैं। भारत में देवी दुर्गा को समर्पित कई मंदिर हैं, जहां पर मां दुर्गा की पूजा होती है। वहीं मां दुर्गा का दिव्य वाहन शेर है, जिस पर मां दुर्गा सवार होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि शक्तिशाली शेर मां दुर्गा का वाहन कैसे बना। आज हम इस आर्टिकल के जरिए इस पौराणिक कथा के बारे में बताने जा रहे हैं।<br>&nbsp;</p><h2>भूखा शेर बना मां दुर्गा का वाहन</h2><p>महर्षि व्यास द्वारा रचित 'श्रीमद् देवीभागवत पुराण' मां दुर्गा की उत्पत्ति और उनके कर्तव्यों को समर्पित है। शेर की मां दुर्गा के वाहन बनने की कहानी तब शुरू होती है, जब देवी पार्वती भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तपस्या कर रही थीं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends" target="_blank" rel="noopener">South India का काशी है Rameswaram Jyotirlinga, जहां 22 Teertham में प्रायश्चित स्नान करते हैं भक्त</a></p><p>कई सालों की तपस्या से प्रसन्न होकर महादेव देवी पार्वती को पत्नी रूप में स्वीकार कर लेते हैं। इसी बीच तपस्या के प्रभाव से देवी पार्वती का रंग काला पड़ गया था। एक दिन भगवान शिव देवी पार्वती को काली कह देते हैं, यह बात देवी पार्वती को अच्छी नहीं लगती है और वह नाराज होकर फिर से तपस्या करने चली जाती हैं।</p><h2>भगवान शिव का आशीर्वाद</h2><p>पौराणिक कथाओं के मुताबिक जब मां पार्वती तपस्या कर रही थीं, उस दौरान वहां पर एक शेर घूमते-घूमते आ गया। मां को खाने की इच्छा रखने वाला शेर मां पार्वती का तप पूरा होने का इंतजार करता है। समय बीतता जाता है और शेर तपस्या खत्म होने का इंतजार करता है। जब सालों बीत जाते हैं और शेर का देवी पार्वती का इंतजार करता रहा, तब देवी को खाने की इच्छा के साथ वह देवी पार्वती के पास जाता है, लेकिन देवी के तप के तेज से वह पीछे हट जाता है। कई बार कोशिश करने के बाद भी शेर उनके पास नहीं जा पाता है और कोने में बैठ जाता है। फिर मां पार्वती की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव वहां प्रकट होते हैं और देवी पार्वती से वरदान मांगने को कहते हैं।</p><p>मां पार्वती कहती हैं कि उनको पहले की तरह गोरा रंग वापस मिल जाए। महादेव उनकी इच्छा पूरी करती हैं। आशीर्वाद मिलने ही देवी पार्वती नहाने चली जाती हैं। उनसे स्नान करते ही शरीर से एक अन्य देवी प्रकट होती हैं, जिनका नाम कौशिकी पड़ता है। नहाने के समय देवी पार्वती के शरीर से काला रंग निकल जाता है और पहले की तरह उनका रंग साफ हो जाता है। जिस वजह से मां पार्वती का नाम गौरी पड़ जाता है। जब देवी पार्वती की नजर शेर पर पड़ती है, जो उनको खाने के इंतजार में एक कोने में बैठा था।</p><p>तो मां पार्वती भगवान शिव के पास जाती हैं और उनसे वरदान मांगती हैं कि इस शेर ने उनको खाने के लिए सालों तक इंतजार किया है। जितना तप मैंने किया, उतना ही तब इस शेर ने भी किया है। इस वजह से आप इस शेर को वरदान के रूप में मेरी सवारी बना दीजिए। शिव मां पार्वती की इस बात से खुश हो जाते हैं और शेर को देवी पार्वती की सवारी बना देते हैं। तभी से देवी पार्वती का नाम शेरावाली और मां दुर्गा पड़ा।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 19 Sep 2026 14:06:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-parvati-asked-lord-shiva-to-make-the-patient-lion-her-divine-vehicle</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/19/devi-bhagavata-purana_large_140818_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Ganesha का स्त्री स्वरूप हैं Devi Vinayaki, इस वजह से प्रकट हुआ था यह दिव्य रूप]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-vinayaki-the-female-form-of-lord-ganesha-history-and-significance]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में गणेश भगवान को प्रथम पूज्य देवता माना जाता है। वहीं किसी भी शुभ व मांगलिक कार्य की शुरूआत से पहले भगवान गणेश की पूजा-अर्चना की जाती है। भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, बुद्धि, समृद्धि और शुभता का देवता माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में भगवान गणेश के कई स्वरूपों का वर्णन मिलता है। ऐसा ही एक अनोखा स्वरूप देवी विनायकी का है। जिनको भगवान गणेश का स्त्री स्वरूप माना जाता है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको देवी विनायकी से जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताने जा रहे हैं और साथ ही यह भी जानेंगे कि श्री गणेश के इस स्‍वरूप की प्रतिमाएं और चित्र कहां-कहां पाए जाते हैं।</p><h2>इन नामों से जानी जाती हैं देवी विनायकी</h2><p>अलग-अलग स्थानों पर भगवान गणेश के इस स्त्री स्वरूप को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। इनको विनायकी, गणेश्वरी, गणेशानी, गजाननी जैसे नामों से भी जाना जाता है। वहीं देवी विनायकी का स्वरूप देखने में भगवान गणेश से मिलता है। लेकिन इनका स्वरूप स्त्री का होता है।</p><p>देवी विनायकी से जुड़ी मान्यताओं में इनको गणेश और शक्ति का मिलाजुला स्वरूप माना जाता है। वहीं भारत के कुछ प्राचीन मंदिरों में देवी के इस अनोखे स्वरूप की प्रतिमाएं भी हैं।</p><h2>राजस्थान से लेकर दक्षिण भारत तक हैं प्रमाण</h2><p>राजस्थान के खेड़ में देवी विनायकी की प्राचीन मूर्ति को काफी पुराना माना जाता है। वहीं ओडिशा के हीरापुर में 64 योगिनी मंदिर में भी आपको देवी विनायकी का स्वरूप देखने को मिलता है। यह मंदिर अपनी प्राचीन योगिनी सिद्धियों के लिए जाना जाता है।</p><p>इसके अलावा दक्षिण भारत में देवी विनायकी की पूजा-अर्चना होती है। तमिलनाडु के कन्याकुमारी क्षेत्र में स्थित थानुमालयन मंदिर में देवी विनायकी का प्राचीन रूप है। यह मंदिर करीब 1300 साल पुराना बताया जाता है।</p><h2>देवी विनायकी की पौराणिक कथा</h2><p>पौराणिक कथा में अंधक नामक राक्षस का वर्णन मिलता है। धार्मिक मान्यता के मुताबिक अंधक मां पार्वती को अपनी पत्नी बनाना चाहता था। मां पार्वती की रक्षा के लिए महादेव ने अंधक राक्षस पर प्रहार किया।</p><p>लेकिन जब अंधक की रक्त की बूंदे धरती पर गिरती थीं, तो उनसे नए राक्षस उत्पन्न होने लगते थे। जिससे अंधक की शक्ति बढ़ती जा रही थी। इस स्थिति को देखते हुए देवी-देवताओं ने अपनी शक्तियों का आह्वान किया।</p><h2>कैसे प्रकट हुआ विनायकी स्वरूप</h2><p>बता दें कि देवी-देवताओं की शक्तियों से तमाम मातृ शक्तियां प्रकट हुईं। जिसके बाद महादेव ने अंधक से युद्ध किया और गणपति ने भी अपने मातृ शक्ति स्वरूप में अंधक का सामना किया। पौराणिक कथा में बताया जाता है गणपति ने अंधक का वध किया और उसके रक्त की बूंदों को धरती पर गिरने से रोक दिया।</p><p>इसी के बाद से देवी विनायकी का स्वरूप लोकप्रिय हुआ। उनको भगवान गणेश की स्त्री शक्ति या स्त्री का स्वरूप माना जाता है। यही कारण है कि कुछ स्थानों पर विशेष रूप से देवी विनायकी की पूजा होती है।</p><h2>देवी विनायकी का स्वरूप</h2><p>देवी विनायकी की प्रतिमा में भगवान गणेश से मिलते-जुलते कई प्रतीक दिखाई देते हैं। हाथी के मुख और स्त्री के शरीर की वजह से यह स्वरूप बेहद अनोखा माना जाता है। देवी विनायक से जुड़ी मान्यताएं भारत की प्राचीन धार्मिक और शाक्त परंपराओं की विविधता को दिखाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Fri, 18 Sep 2026 14:47:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/goddess-vinayaki-the-female-form-of-lord-ganesha-history-and-significance</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/18/goddess-vinayaki_large_144948_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[South India का काशी है Rameswaram Jyotirlinga, जहां 22 Teertham में प्रायश्चित स्नान करते हैं भक्त]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>तमिलनाडु के रामानाथपुरम जिले के रामेश्वरम में रामेश्वर मंदिर स्थित है। रामेश्वरम मंदिर 12 पवित्र ज्योतिर्लिंगों में से 11वें नंबर पर आता है। रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग रामेश्वरम द्वीप पर बसा है। जो उत्तर भारत में काशी की मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम की भी है। रामेश्वरम को दक्षिण भारत का काशी भी कहा जाता है। वहीं रामेश्वरम को रामनाथस्वामी मंदिर कहा जाता है। यह मंदिर अपनी भव्य संरचना, जटिल मूर्तिकला, विशाल मीनारों और गलियारों के लिए जाना जाता है। वहीं मंदिर में पूजे जाने के भगवान लिंग के रूप में विराजमान हैं।</p><p>मंदिर में नंदी की भी बेहद विशाल मूर्ति मौजूद है, जोकि करीब 17.5 फीट ऊंची है। इस मंदिर में भगवान शिव के अलावा देवी विशालाक्षी, भगवान विनायक, भगवान सुब्रह्मण्य, पर्वतवर्धिनी, उत्सव प्रतिमा, सायनागृह और पेरुमल शामिल हैं।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter" target="_blank" rel="noopener">Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi</a></p><h2>भक्तों के लिए बेहद खास</h2><p>बता दें कि यह मंदिर भगवान श्रीराम द्वारा स्थापित और भगवान भोलेनाथ की पूजा को समर्पित ज्योतिर्लिंग है। यह जगह भगवान विष्णु और महादेव के भक्तों के लिए बेहद खास मानी जाती है। वहीं रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हिंदू धर्म में 4 प्रमुख स्थलों में भी शामिल है।</p><p>मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 17वीं शताब्दी में भारत के राजाओं ने कराया था। इसमें श्रीलंका के राजाओं का भी महत्वपूर्ण योगदान रहा था। माना जाता है कि भारत के सभी हिंदू मंदिरों की तुलना में रामेश्वरम मंदिर का गलियारा काफी ज्यादा लंबा है। वहीं इसके कुछ हिस्से हजारों साल पुराने बताए गए थे। लेकिन रामेश्वरम मंदिर का संबंध रामायण काल से है।</p><h2>कथा</h2><p>इस मंदिर से जुड़ी कथाओं और भारतीय महाकाव्य रामायण के मुताबिक भगवान श्रीराम ने रावण पर विजय हासिल करने के बाद प्रायश्चित के लिए महादेव की पूजा करने की सोचा। इसके लिए उन्होंने हनुमान को काशी से शिवलिंग लाने का अनुरोध किया।</p><p>जब हनुमान जी ने शिवलिंग को लाने में देरी की, तो माता सीता ने रेत से शिवलिंग बनाया, जिससे कि श्रीराम भगवान शिव की पूजा कर सकें। माना जाता है कि यह वहीं शिवलिंग है, जिसको रामलिंगम के नाम से भी जाना जाता है। जो अब रामनाथस्वामी में पूजा जाता है। वहीं काशी से हनुमान जी द्वारा लाए गए शिवलिंग को विश्वलिंगम कहते हैं।</p><p>वहीं इस मंदिर के अंदर 22 तीर्थम यानी की पवित्र जल निकाय हैं, जहां पर भक्त अपने पापों के प्रायश्चित के लिए नहाते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Thu, 17 Sep 2026 13:19:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/rameshwaram-temple-history-architecture-and-sacred-ramayana-legends</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/17/rameswaram-jyotirlinga_large_132235_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Trinetra Ganesh Temple: Ranthambore के Trinetra Ganesh को चिट्ठी लिखकर अपनी मनोकामना भेजते हैं श्रद्धालु]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/trinetra-ganesh-temple-in-rajasthan-attracts-devotees-with-divine-history]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>राजस्थान के सवाई माधोपुर जिले में रणथंभौर के ऐतिहासिक किले के भगवान गणेश का एक मंदिर है। यह मंदिर सिर्फ अपनी भव्यता के लिए नहीं बल्कि अनूठे रहस्य और गहरी आस्था के लिए भी जाना जाता है। यह मंदिर त्रिनेत्र गणेश मंदिर हैं, जहां पर गणपति बप्पा अपने पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर में भक्त भगवान गणेश, उनकी पत्नियां रिद्धि-सिद्धि और पुत्र शुभ-लाभ के दर्शन करते हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको माधोपुर के त्रिनेत्र गणेश मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक बातों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>गणपति का अनोखा मंदिर</h2><p>वैसे तो रणथंभौर किला जंगल सफारी के लिए पॉपुलर है। लेकिन यहां पर स्थित त्रिनेत्र गणेश मंदिर हजारों-लाखों भक्तों की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर की बड़ी विशेषता यह है कि यहां पर भगवान गणेश अकेले नहीं बल्कि पूरे परिवार के साथ विराजमान हैं। इस मंदिर में बप्पा की पत्नियां रिद्धि और सिद्धि, पुत्र शुभ और लाभ व उनके वाहन मूषक भी साथ में विराजमान हैं। यही वजह है कि यह त्रिनेत्र गणेश मंदिर अन्य मंदिरों से अलग है।</p><p>इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter" target="_blank" rel="noopener">Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi</a></p><h2>जानें मंदिर की कहानी</h2><p>रणथंभौर के राजा हम्मीर 13वीं शताब्दी के अंत में अलाउद्दीन खिलजी से युद्ध कर रहे थे। लंबे समय तक चले घेराव की वजह से किले में अनाज और अन्य जरूरी चीजों की कमी हो गई। ऐसे में राजा हम्मीर चिंतित हो उठे कि अब प्रजा का क्या होगा। उस दौरान रात में राजा को सपने में भगवान गणेश के दर्शन हुए और उनको आश्वासन दिया कि सुबह तक सब ठीक हो जाएगा। अगली सुबह किले में चमत्कार हुआ, भगवान गणेश की त्रिनेत्र प्रतिमा प्रकट हुआ और राजा हम्मीर के भंडार अनाज से भर गए। जिसके बाद युद्ध भी समाप्त हो गया। वहीं इस घटना के बाद राजा हम्मीर ने 1300 ईस्वी में इस मंदिर का निर्माण कराया था।</p><h2>महत्व</h2><p>भक्तों का मानना है कि इस मंदिर में पूरे परिवार के दर्शन मात्र से घर-परिवार में सुख-शांति और समृद्धि आती है। भगवान गणेश का तीसरा नेत्र शक्ति और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि यहां मंदिर में दर्शन करने से जीवन की सभी परेशानियां दूर होती हैं।</p><h2>चिट्ठी लिखने की परंपरा</h2><p>त्रिनेत्र गणेश मंदिर की एक खास और अनोखी परंपरा इसको सबसे अलग बनाती है। यहां पर श्रद्धालु बप्पा को चिट्ठी लिखते हैं। हजारों चिट्ठियां रोज मंदिर पहुंचती हैं। इन चिट्ठियों में लोग अपनी समस्याएं, इच्छाएं और दुआएं लिखकर भेजते हैं। वहीं मंदिर के पुजारी बप्पा के चरणों में इन चिट्ठियों को अर्पित कर देते हैं। माना जाता है कि सच्चे मन और श्रद्धा के साथ लिखी चिट्ठी का उत्तर बप्पा जरूर देते हैं और मनोकामना पूरी करते हैं।</p><p>रणथंभौर का यह मंदिर सिर्फ पूजा-अर्चना का स्थान नहीं है। बल्कि यह विश्वास और चमत्कार का भी प्रतीक माना जाता है। यहां पर बप्पा को परिवार सहित देखकर अनुभव होता है कि परिवार और आस्था का बंधन की जीवन को पूर्ण बनाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Wed, 16 Sep 2026 12:17:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/trinetra-ganesh-temple-in-rajasthan-attracts-devotees-with-divine-history</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/16/trinetra-ganesh-temple_large_121823_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Ganesh Utsav पर Delhi-NCR में दर्शन के लिए Noida के ये प्रसिद्ध मंदिर हैं बेहद खास]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/noida-ganesha-temples-to-visit-during-ganesh-utsav-celebrations]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>गणेशोत्सव की धूम हर जगह देखने को मिल रही है। अगर आप दिल्ली-एनसीआर में रहते हैं, तो इस खास अवसर पर नोएडा के इन मंदिरों के दर्शन जरुर करें। यहां पर आपको मंदिर की सुंदर सजावट देखने को मिल जाएगी, तो कहीं सुबह-शाम आरती और पूजा के लिए भक्तों की भीड़ देखने को मिलेगी।</p><p>यदि आप गणेश उत्सव के समय नोएडा में किसी ऐसे मंदिर की तलाश कर रहे हैं, तो यह लेख आपके लिए है। आइए आपको इस लेख में नोएडा के सबसे लोकप्रिय गणेश मंदिरों के बारे में बताते हैं।</p><p><strong>नोएडा सेक्टर-62 का श्री विनायक मंदिर</strong></p><p>वैसे नोएडा का यह श्री विनायक मंदिर भगवान गणेश जी समर्पित है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है इसकी वास्तुकला। प्रवेश द्वार पर की गई नक्काशी इसे दूसरे मंदिरों से खास बनाती हैं। गणेश उत्सव के समय यहां पर पूजा के साथ ही धार्मिक अनुष्ठान और आरती भी होती है।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- सेक्टर-62 के इंडस्ट्रियल एरिया में, मुख्य डी-सर्कल के पास।</p><p>- नजदीकी मेट्रो स्टेशन- सेक्टर-62, इलेक्ट्रॉनिक सिटी मेट्रो स्टेशन से ऑटो या ई-रिक्शा लेकर पहुंचा जा सकता है।</p><p><strong>वरसिद्धि विनायगर मंदिर, सेक्टर-22</strong></p><p>इस दौरान आप नोएडा में गणेश जी का कोई मंदिर सर्च कर रहे हैं, तो ऐतिहासिक महत्व और अलग मूर्ति के लिए जाना जाता है, तो यहां पर जाना आपको अच्छा लगेगा। वैसे यहां पर गणेश चतुर्थी के मौके पर विशेष पूजा और धार्मिक कार्यक्रमों की परंपरा रही है। वैसे यहां गणेश उत्सव के समय काफी भीड़ देखने को मिलेगी।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- G ब्लॉक, सेक्टर-22 नोएडा</p><p>- सेक्टर 22 पहुंचने के बाद, ऑटो या ई-रिक्शा से मंदिर तक आसानी से जा सकते हैं।</p><p><strong>श्री विनायक और श्री कार्तिकेय मंदिर</strong></p><p>नोएडा में स्थित यह मंदिर भगवान गणेश और भगवान कार्तिकेय के लिए जाना जाता है। इस मंदिर के निर्माण में भी दक्षिण भारतीय शैली का इस्तेमाल किया गया है। यहां काले पत्थर से बनी देवी-देवताओं की प्रतिमाएं मौजूद हैं, जो इस मंदिर को और भी खूबसूरत बना देती हैं।</p><p><strong>कैसे पहुंचें?</strong></p><p>- लोकेशन- C-30/2, C ब्लॉक, फेज-2 इंडस्ट्रियल एरिया, सेक्टर- 62</p><p>- नजदीकी मेट्रो स्टेशन- 62 मेट्रो स्टेशन से ऑटो या ई-रिक्शा लेकर मंदिर तक पहुंच सकते हैं।</p>]]></description>
      <pubDate>Tue, 15 Sep 2026 17:16:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/noida-ganesha-temples-to-visit-during-ganesh-utsav-celebrations</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/15/noida-ganesh-temple_large_171907_157.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Lord Shiva की मानस पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कैसे बनीं Mansa Devi]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>हिंदू धर्म में कई देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। ऐसी ही एक मनसा देवी हैं, जिनको नागों की देवी कहा जाता है। मनसा देवी का भगवान शिव से गहरा रिश्ता है। हालांकि देवी मनसा के जन्म और भगवान शिव से उनके संबंध को लेकर अलग-अलग धार्मिक ग्रंथों में विभिन्न कथाएं मिलती हैं। लेकिन इसका विस्तृत विवरण ब्रह्मवैवर्त पुराण के प्रकृति खंड के अध्याय 45 और 46 में मिलता है। इस पुराण में देवी मनसा का भगवान शिव के साथ क्या संबंध है, इस बात का जिक्र मिलता है। तो आइए जानते हैं देवी मनसा के जन्म की पौराणिक कथा और महादेव से उनके संबंध के बारे में...</p><h2>भगवान शिव की मानस पुत्री हैं मनसा देवी</h2><p>पौराणिक मान्यता के मुताबिक देवी मनसा को महादेव की मानस पुत्री कहा जाता है। मानस पुत्री का अर्थ ऐसी संतान से है, जिसका जन्म शारीरिक प्रक्रिया से न होकर मन के संकल्प से हुआ हो। इसके पीछे एक कथा सुनने को मिलती है, जिसमें इस बात का उल्लेख मिलता है कि देवी मनसा का जन्म कैसा हुआ था। धार्मिक मान्यता के मुताबिक देवी मनसा को भगवान भोलेनाथ की पुत्री और नागराज वासुकी की बहन कहा जाता है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/festivals/women-observe-the-hartalika-teej-fast-for-the-blessing-of-unbroken-marital-bliss" target="_blank" rel="noopener">Hartalika Teej 2026: अखंड सौभाग्य के लिए महिलाएं करती हैं हरितालिका तीज व्रत</a></h3><h2>देवी मनसा के जन्म की कथा</h2><p>कथा के मुताबिक जब भगवान शिव ध्यान में लीन थे, तो उनको मां पार्वती के मनोहर स्वरूप का अनुभव हुआ। इस अनुभव से उनका वीर्य जमीन पर गिरा और देवी मनसा का जन्म हुआ। देवी मनसा का जन्म होने के बाद नागों और सर्पियों ने उनकी रक्षा की। वासुकी नाग ने देवी रो अपनी पुत्री की तरह पाल-पोसकर बड़ा किया। धीरे-धीरे वह एक दिव्य और सुंदर नाग कन्या के रूप में प्रकट हुईं, जिनको आगे जाकर मनसा देवी के नाम से जाना गया।</p><h2>महादेव ने पुत्री के रूप में किया स्वीकार</h2><p>जब देवी मनसा बड़ी हुईं, तो वासुकी नाग के उनको बताया कि वह भोलेनाथ की पुत्री हैं और वासुकी उनको भोलेनाथ के पास ले गए। जब महादेव ने देवी को देखा, तो उनको अपनी मानस पुत्री के रूप में स्वीकार कर लिया।</p><h2>माता पार्वती ने क्‍यों दिया था श्राप</h2><p>श्रीमद् देवीभागवत पुराण के स्कंध 9 और अध्याय 48 में इसका जिक्र मिलता है। इन ग्रंथों में बताया गया कि जब देवी पार्वती ने मां मनसा को देखा, तो भगवान शिव और उनके बीच विवाद हो गया। क्योंकि मनसा देवी को देवी पार्वती अपनी सौतेली पुत्री मानती थीं। क्योंकि भगवान शिव के मन से देवी मनसा का जन्म हुआ था, इसलिए मां पार्वती के लिए उनको अपनाना आसान नहीं था। इसलिए उन्होंने देवी मनसा को श्राप दे दिया कि उनकी पूजा हमेशा अधूरी मानी जाएगी।</p><p>बता दें कि मनसा देवी को विषहरी माता के नाम से भी जाना जाता है। वहीं इनकी पूजा में दाएं हाथ की जगह बाएं हाथ का इस्तेमाल किया जाता है। वहीं हिंदू धर्म में बाएं हाथ से की गई पूजा को अधूरा माना जाता है।</p>]]></description>
      <pubDate>Mon, 14 Sep 2026 15:37:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/lord-shiva-accepted-goddess-mansa-devi-as-his-mind-born-daughter</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/14/mansa-devi_large_154013_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Unique Temple: संतान सुख और नौकरी के लिए इन प्रसिद्ध Temple में चढ़ाते हैं Resume व लौकी]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/job-seekers-and-hopeful-parents-make-unique-offerings-at-indian-temple]]></guid>
      <description><![CDATA[<p>भारत को मंदिरों का देश भी कहा जाता है। यहां पर उत्तर से लेकर दक्षिण तक कई भव्य और प्राचीन मंदिर हैं। यह मंदिर सिर्फ पूजा-पाठ का स्थान नहीं बल्कि लोक परंपरा और अनोखी मान्यताओं के लिए भी जाने जाते हैं। भारत के हर एक मंदिर की अपनी कहानी है, जो उसको अन्य मंदिरों से अलग बनाते हैं। आमतौर पर ज्यादातर मंदिरों में मन्नत पूरी होने पर फल-फूल, मिठाई, पैसा, नारियल, सोना और चांदी चढ़ाई जाती है। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां पर मनोकामना पूरी होने पर बायोडाटा, तांबे-पीतल की घंटियां, हरी लौकी और लकड़ी आदि चढ़ाई जाती है। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको इन अनोखे मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं।</p><h2>चितई गोलू देवता मंदिर</h2><p>चितई गोलू देवता मंदिर उत्तराखंड के अल्मोड़ा से करीब 8 किमी दूर है। यह राज्य के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। यहां पर गौर भैरव के रूप में भगवान शिव के अवतार गोलू देवता की पूजा-अर्चना की जाती है।</p><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india" target="_blank" rel="noopener">Famous Ganesh Temple in India: Siddhivinayak से लेकर Trinetra Ganesh तक, भारत के 11 प्रसिद्ध मंदिरों का धार्मिक महत्व</a></h3><p>गोलू देवता को न्याय का देवता भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता है कि यहां पर श्रद्धालु अपनी इच्छा और न्याय पाने के लिए कागज पर अर्जी या स्टांप पेपर लिखकर बांधते हैं। वहीं मन्नत पूरी होने के बाद श्रद्धालु भगवान को तांबे या पीतल की घंटियां अर्पित की जाती हैं। इस कारण इस मंदिर को घंटी वाला मंदिर भी कहा जाता है।</p><h2>महामाया माता मंदिर</h2><p>महामाया माता मंदिर राजस्थान के नागौर जिले में स्थित है। इस मंदिर को 'बच्चों वाली माता' के धाम के रूप में भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे बड़ी खासियत है कि यहां पर बच्चों को होने वाली गंभीर बीमारियों का इलाज आध्यात्मिक तरीके से होता है।</p><p>जैसे अगर किसी बच्चे को देर से बोलने की समस्या, बोलने में तुतलापना, लकवा या गंभीर शारीरिक परेशानियां होती हैं, तो महामाया माता मंदिर के दरबार में ठीक होने की प्रार्थना की जाती है। इसके अलावा बच्चे के रोग खत्म होने पर मां को प्रसन्न करने के लिए लकड़ी का पालना अर्पित किया जाता है।</p><h2>शाटन देवी मंदिर</h2><p>शाटन देवी मंदिर छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले के रतनपुर में स्थित है। यह मंदिर लोगों के बीच आस्था का बड़ा केंद्र है। वैसे तो इस मंदिर में हर कोई दर्शन के लिए आ सकता है। लेकिन जो लोग संतान प्राप्ति की इच्छा रखते हैं, तो उनके लिए यह मंदिर बेहद खास है। इस मंदिर की अनोखी परंपरा के अनुसार, भक्त अपनी मनोकामना पूरी होने पर तेंदू और लौकी की लकड़ियां चढ़ाते हैं।</p><h2>करणी माता मंदिर</h2><p>करणी माता का मंदिर राजस्थान के सीकर जिले में हैं। यहां पर नौकरी की इच्छा रखने वालों की मनोकामना पूरी होती है। करणी माता मंदिर को लेकर धार्मिक मान्यता है कि अगर कोई जातक बार-बार नौकरी या फिर इंटरव्यू में असफल हो जाता है। तो यहां पर दर्शन करने मात्र से व्यक्ति की नौकरी लग जाती है। वहीं यहां पर कई भक्त करणी माता के चरणों में सीवी भी अर्पित करते हैं, जिससे की उनकी अच्छी सी नौकरी लग जाए।</p>]]></description>
      <pubDate>Sat, 12 Sep 2026 11:44:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/job-seekers-and-hopeful-parents-make-unique-offerings-at-indian-temple</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/12/unique-temple_large_114719_148.jpg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Famous Ganesh Temple in India: Siddhivinayak से लेकर Trinetra Ganesh तक, भारत के 11 प्रसिद्ध मंदिरों का धार्मिक महत्व]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>वैसे तो भारत में भगवान गणेश को समर्पित हजारों मंदिर हैं। वहीं देश-विदेश में भगवान गणेश की कई प्राचीन मूर्तियां विराजमान हैं। लेकिन कुछ खास मंदिर हैं, जिनकी प्रसिद्धि और प्रताप दूर-दूर तक फैला है। इन मंदिरों में लाखों की संख्या में भक्त दर्शन और गणपति बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए आते हैं। वहीं गणेश चतुर्थी के मौके पर भगवान गणेश को समर्पित इन मंदिरों की रौनक देखते ही बनती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको भगवान गणेश के 11 चमत्कारी मंदिरों के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>मनकुला विनयगर मंदिर</h2><div>पुडुचेरी का मनकुला विनायक मंदिर करीब 300 साल से अधिक पुराना है। यह भगवान गणेश का मंदिर है, जोकि बंगाल की खाड़ी के पास स्थित है। मनकुला का मतलब रेत का तालाब होता है। मनकुला विनायक मंदिर अपनी स्वर्ण रथ यात्रा और हाथियों के आशीर्वाद के लिए काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में विराजमान भगवान गणेश को को वरसिद्धि विनायक के नाम से जाना जाता है।</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach" target="_blank">Bhimashankar Temple Facts: जानिए 6वें ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास और चांदी के Kavach की मान्यता</a></h3><div><br></div><h2>मधुर महागणपति मंदिर</h2><div>यह मंदिर केलर कासरगोड स्थित मधु वाहिनी नदी के तट पर बना है। यह अपने त्रिस्तरीय गोपुरम और अनोखी गणेश प्रतिमा के लिए काफी फेमस है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक टीपू सुल्तान ने इस मंदिर पर एक बार आक्रमण किया था, लेकिन दैवीय हस्तक्षेप के बाद उसको छोड़ दिया। गणेश चतुर्थी के मौके पर मंदिर की दिव्यता और भव्यता देखने लायक होती है।</div><div><br></div><h2>दगडूशेठ गणपति मंदिर</h2><div>यह मंदिर कर्नाटक के बेलगावी में स्थित है। यह मंदिर भगवान गणेश की भव्य मूर्ति और सामुदायिक समारोहों के लिए काफी प्रसिद्ध है। गणपति बप्पा के दर्शन के लिए महाराष्ट्र और कर्नाटक दोनों जगहों से भक्त मंदिर आते हैं। वहीं गणेश चतुर्थी के मौके पर यहां पर हजारों की संख्या में भक्त पहुंचते हैं।</div><div><br></div><h2>अष्टविनायक मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र का अष्टविनायक मंदिर गणपति बप्पा के प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है। इस मंदिर की पवित्र तीर्थयात्रा पुणे के आसपास 8 प्राचीन मंदिरों में से होकर गुजरती है। जिनमें से हर एक ही अनोखी कथा और स्वयंभू बप्पा की मूर्ति है। मोरगांव से रंजनगांव तक भक्त भक्ति में डूबकर इन मंदिरों की परिक्रमा करते हैं। वहीं पौराणिक कथाओं में भी इस मंदिर का जिक्र मिलता है।</div><div><br></div><h2>करपगा विनायक मंदिर</h2><div>तमिलनाडु के पिल्लैयारपट्टी में स्थित यह मंदिर कराईकुडी के बेहद समीप है। इस प्राचीन चट्टानी मंदिर में एक गुफा में भगवान गणेश की 6 फीट प्रतिमा तराशी गई है। स्थानीय लोगों के अनुसार, यह मंदिर करीब 1600 साल पुराना है। जोकि करपगा विनायक के नाम से फेमस है। यहां पर भी गणेश चतुर्थी के मौके पर विशेष रौनक देखने को मिलती है।</div><div><br></div><h2>गणेश टोक मंदिर</h2><div>यह मंदिर सिक्किम के गंगटोक में स्थित है। यह भगवान गणेश को समर्पित एक छोटा और प्रसिद्ध पहाड़ी मंदिर है। इस मंदिर से आपको गंगटोक शहर का पूरा मनोहर दृश्य देखने को मिलता है। नया व्यापार शुरू करने से पहले भक्त इस मंदिर में आकर बप्पा का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।</div><div><br></div><h2>कनिपकम विनायक मंदिर</h2><div>आंध्र प्रदेश के चित्तूर में स्थित कनिपकम विनायक मंदिर को 11वीं शताब्दी में बनवाया गया था। इस मंदिर का निर्माण चोल राजाओं द्वारा कराया गया था। इस मंदिर में भगवान गणेश की स्वयंभू मूर्ति स्थापित है। माना जाता है कि समय के साथ-साथ मूर्ति का भी आकार बढ़ रहा है। भक्तों का मानना है कि गणपति बप्पा ही उनके जीवन में आए किसी भी तरह के विवाद को सुलझाते हैं। इस कारण उनको वरसिद्धि विनायक के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>सिद्धिविनायक मंदिर</h2><div>कर्नाटक के बैंगलोर में स्थित सिद्धिविनायक मंदिर करीब 600 साल से ज्यादा पुराना है। यह मंदरि बप्पा के शक्तिशाली मंदिर के रूप में पूजा जाता है। मंदिर में विराजमान गणपति की मूर्ति की पूजा वरसिद्धि विनायक यानी की वरदान देने वाले भगवान के रूप में की जाती है। गणेश चतुर्थी के मौके पर मंदिर की दिव्यता और भव्यता देखने लायक होती है।</div><div><br></div><h2>उच्ची पिल्लयार मंदिर</h2><div>तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली में 7वीं शताब्दी का रॉकफोर्ट उच्ची पिल्लयार मंदिर भगवान गणेश को समर्पित है। इस मंदिर को स्थानीय लोग पिल्लयार के नाम से भी जानते हैं। पौराणिक कहानियों के मुताबिक यह भगवान श्रीराम के राज्याभिषेक की कथा और रावण की विभीषण की मूर्ति छिपाने में बप्पा की अहम भूमका थी।</div><div><br></div><h2>त्रिनेत्र गणेश जी</h2><div>राजस्थान के रणथंभौर किले के अंदर बना भगवान गणेश का यह सबसे पुराना मंदिर है। इस मंदिर में स्थापित गणेश जी की मूर्ति के तीन नेत्र हैं। जिस कारण उनको त्रिनेत्र गणेश जी के नाम से भी जाना जाता है। गणपति के इस मंदिर में हर शुभ काम को करने से पहले उनको निमंत्रण भेजा जाता है।</div><div><br></div><h2>सिद्धि विनायक मंदिर</h2><div>महाराष्ट्र का सिद्धिविनायक मंदिर सबसे फेमस मंदिरों में से एक है। यहां पर बप्पा को मनोकामना पूरी करने वाले भगवान के रूप में पूजा जाता है। साल 1801 में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। यह मंदिर पूरे भारत में काफी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में विराजमान बप्पा की मूर्ति की सूंड दाईं ओर मुड़ी है, जिसको बेहद शक्तिशाली और दुर्लभ माना जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Fri, 11 Sep 2026 12:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/siddhivinayak-to-trinetra-ganesh-religious-significance-of-11-famous-temples-in-india</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/11/famous-ganesh-temple_large_1239_148.jpeg" />
    </item>
    <item>
      <title><![CDATA[Bhimashankar Temple Facts: जानिए 6वें ज्योतिर्लिंग का पौराणिक इतिहास और चांदी के Kavach की मान्यता]]></title>
      <guid isPermaLink="false"><![CDATA[https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach]]></guid>
      <description><![CDATA[<div>भगवान शिव के पवित्र 12 ज्योतिर्लिंग के दर्शन मात्र से ही तमाम बाधाएं, ग्रह दोष, बुरे विचार और नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं। सावन के महीने में द्वादश ज्योतिर्लिंगों में किसी एक भी ज्योतिर्लिंग के दर्शन करना उस समान ही पुण्य देता है, जितना की चारधाम यात्रा से मिलता है। क्योंकि इस दौरान महादेव धरती पर निवास करते हैं और जो भी भक्त सच्चे मन से उनकी प्रार्थना करते हैं, उसकी सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। ऐसे में आज इस आर्टिकल के जरिए हम आपको शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से छठवें ज्योतिर्लिंग 'भीमाशंकर' के बारे में बताने जा रहे हैं।</div><div><br></div><h2>शिव महापुराण में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों का श्वलोक</h2><div>सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् उज्जयिन्यां महाकालं ओम्कारममलेश्वरम् ॥</div><div><br></div><div>परल्यां वैद्यनाथं च डाकिन्यां भीमशंकरं सेतुबन्धे तु रामेशं नागेशं दारुकावने ॥</div><div><br></div><div>वारणस्यां तु विश्र्वेशं त्रयंम्बकं गौतमीतटे हिमालये तु केदारं घृश्नेशं च शिवालये ॥</div><div><br></div><div>एतानि ज्योतिर्लिङ्गानि सायं प्रातः पठेन्नरः सप्तजन्मकृतं पापं स्मरणेन विनश्यति ॥</div><h3 class="readthish3">इसे भी पढ़ें: <a href="https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/mystery-of-gola-math-temple-in-maihar-built-by-lord-vishwakarma-in-single-night" target="_blank">Maihar के Gola Math Temple का रहस्य, एक ही रात में भगवान Vishwakarma ने किया था निर्माण</a></h3><div><br></div><h2>भीमाशंकर मंदिर का इतिहास</h2><div>त्रेतायुग में त्रिपुरसुर नामक दैत्य था। उसने भगवान शिव की पूजा कर उनसे अमरता का वरदान प्राप्त किया। महादेव की तपस्या से खुश होकर महादेव ने उसको आशीर्वाद देते हुए कहा कि कोई भी महिला या पुरुष तुमको मार नहीं सकता है। भगवान शिव के आशीर्वाद से वह तीनों लोक में जमकर खूब आतंक मचाने लगा। सभी देवता और मनुष्य उस दैत्य के आतंक से परेशान हो गए हैं।</div><div><br></div><div>जिसक बाद सभी देवता भगवान शिव के शरण में पहुंचे और महादेव ने उस दैत्य को खत्म करने का फैसला किया। फिर महादेव और मां पार्वती ने अर्धनारी नटेश्वर के रूप में एक नया रूप धारण किया। फिर कार्तिका पूर्णिमा के दिन त्रिपुरासुर को मौत के घाट उतार दिया।</div><div><br></div><div>त्रिपुरासुर दैत्य की मौत के बाद उसकी पत्नियां डाकिनी और शाकिनी ने महादेव के पास त्रिपुरासुर के बिना अपने अस्तित्व के बारे में पूछा था। तब भगवान शिव ने दोनों को अमरता का वरदान दे दिया। जो महादेव ने त्रिपुरासुर को प्रदान किया था। तब से भीमाशंकर को 'डाकिन्यांभीशंकरम' के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><h2>जानें इस मंदिर से जुड़ी जानकारी</h2><div>भीमाशंकर मंदिर चारों ओर पहाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर की करीब 3.5 मीटर चौड़ा और करीब 15 मीटर लंबाई में है। माना जाता है कि छत्रपति शिवजी महाराज ने इस मंदिर का निर्माण कराया था। जिसके बाद इस मंदिर के शिखर को18वीं शताब्दी में नाना फडणवीस ने बनवाया था।</div><div><br></div><div>इस ज्योतिर्लिंग से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। जिसमें एक कथा यह भी है कि कुंभकर्ण के पुत्र का नाम भीम था। वह अपने पिता की मौत का बदला लेना चाहता था। जिसके लिए उसने घोर तपस्या की और ब्रह्माजी से विजय होने का वरदान प्राप्त किया। वरदान पाने के बाद उसने तीनों लोकों में आतंक मचाना शुरूकर दिया था। इसके बाद भोलेनाथ ने भीम राक्षस से युद्ध किया और उसका वध कर दिया था।</div><div><br></div><div>जिसके बाद सभी देवताओं ने भगवान से वहीं पर शिवलिंग रूप में विराजमान होने का आग्रह किया। इस आग्रह को महादेव ने स्वीकार कर लिया। तभी से इसको भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।</div><div><br></div><div>अधिकतर समय भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग पर चांदी का श्रृंगार रूपी कवच चढ़ा होता है। जिससे ज्यादातर समय ज्योतिर्लिंग के मूल स्वरूप के दर्शन नहीं कर पाते हैं। केवल कुछ समय के लिए दिन में इसके चांदी के कवच को हटाया जाता है।</div>]]></description>
      <pubDate>Wed, 09 Sep 2026 10:39:00 +0530</pubDate>
      <link>https://www.prabhasakshi.com/articles-on-gods/discover-mythological-history-of-6th-jyotirlinga-and-significance-of-silver-kavach</link>
      <dc:creator><![CDATA[प्रभासाक्षी न्यूज नेटवर्क]]></dc:creator>
      <media:thumbnail url="https://images.prabhasakshi.com/2026/9/9/bhimashankar-temple-facts_large_1040_148.jpeg" />
    </item>
  </channel>
</rss>