नेहा बोरा को भेजा Delhi Police का नोटिस असंवैधानिक, High Court में BNSS के नियमों पर वकील ने दी दलील

दिल्ली हाई कोर्ट ने आइसा अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई की, जिसमें दिल्ली पुलिस के 10,000 रुपये के पर्सनल बॉन्ड वाले नोटिस को चुनौती दी गई है। वकील ने इस नोटिस को असंवैधानिक बताते हुए रद्द करने की मांग की। उन्होंने दलील दी कि बोरा ने कोई अपराध नहीं किया और विरोध स्थल पर पहुंचते ही उन्हें हिरासत में ले लिया गया।
हाई कोर्ट ने गुरुवार को AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की याचिका पर सुनवाई शुरू की। इस याचिका में उन्होंने दिल्ली पुलिस के उस नोटिस को चुनौती दी है, जिसमें उनसे "जांच के दौरान शांति बनाए रखने" के लिए 10,000 रुपये का पर्सनल बॉन्ड और एक ज़मानत देने को कहा गया था। बोरा, जो चुनाव आयोग द्वारा मतदाता सूची के 'विशेष गहन पुनरीक्षण' (SIR) में कथित अनियमितताओं के खिलाफ विरोध प्रदर्शनों में सबसे आगे रही हैं, उन्होंने इस नोटिस को रद्द करने और पुलिस को उनके खिलाफ कोई भी कठोर कार्रवाई न करने का निर्देश देने की मांग की है।
इसे भी पढ़ें: Crime Branch की पूछताछ में नहीं पहुंचे CJP कार्यकर्ता सौरव दास और आशुतोष, मांगा और समय
बेंच ने AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायणन से पूछा कि क्या अदालत आने से पहले, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 135 के तहत चल रही जांच पूरी होने का इंतजार करना ज्यादा समझदारी नहीं होगी। बेंच ने यह भी सवाल किया कि शनिवार को अदालत आने या रविवार को उसे परेशान करने की क्या जरूरत थी? अदालत को जवाब देते हुए शंकरनारायणन ने कहा कि हम वापस आएंगे और आपको परेशान करेंगे, क्योंकि हमें न्यायिक प्रणाली पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि बोरा को जारी किया गया नोटिस साफ तौर पर संवैधानिक और कानूनी रूप से गलत है और कानूनी जांच में टिक नहीं सकता। उन्होंने आगे तर्क दिया कि स्पेशल एग्जीक्यूटिव मजिस्ट्रेट (SEM) ने कोई राय दर्ज नहीं की है, जिससे यह सवाल उठता है कि नोटिस जारी करने का आधार क्या था।
विरोध प्रदर्शन शुरू होने की जगह पर धारा 163 का कोई आदेश लागू नहीं था, जबकि लाउडस्पीकर पर कुछ और ही दावा किया जा रहा था।
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायणन ने हाई कोर्ट को बताया कि जिस जगह से उन्होंने अपना मार्च शुरू किया था, वहां भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत कोई आदेश लागू नहीं था, भले ही लाउडस्पीकर पर इसके विपरीत घोषणाएं की जा रही थीं। उन्होंने आगे दलील दी कि इस चरण में बोरा से पर्सनल बॉन्ड (निजी मुचलका) मांगने की कोई कानूनी जरूरत नहीं थी। उन्होंने कहा कि ऐसी मांग केवल जांच पूरी होने के बाद ही की जा सकती है।
इसे भी पढ़ें: नेदुंबस्सेरी Mini Cooper हादसे के मुख्य आरोपी को Central Jail भेजने की मांग कोर्ट ने ठुकराई
नेहा बोरा को विरोध स्थल पर पहुंचने के 10-15 मिनट बाद ही हिरासत में ले लिया गया
AISA अध्यक्ष नेहा बोरा की ओर से पेश वकील गोपाल शंकरनारायणन ने हाई कोर्ट को बताया कि 15 अक्टूबर को दिल्ली के कई हिस्सों में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत निषेधाज्ञा लागू की गई थी। उन्होंने कहा कि बोरा ने उसी दिन प्रेस क्लब में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी, और इसके बाद 16 अक्टूबर को शाम 4 बजे सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया था। शंकरनारायणन ने कहा इसमें हिंसा भड़काने, कानून तोड़ने, शांति भंग करने या व्यवस्था बिगाड़ने का कोई सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने बताया कि बोरा कनॉट प्लेस के सेंट्रल पार्क में हो रहे विरोध प्रदर्शन से नहीं जुड़ी थीं, बल्कि उन्होंने मंडी हाउस में एक अलग विरोध प्रदर्शन आयोजित किया था। वकील के अनुसार, 16 अक्टूबर की शाम को विरोध प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मंडी हाउस इलाके में पहुंचने के महज 10-15 मिनट बाद ही बोरा को हिरासत में ले लिया गया। उन्होंने तर्क दिया कि बोरा ने कोई अपराध नहीं किया था; हिरासत में लिए जाने से पहले उन्होंने केवल नारे लगाए थे।
अन्य न्यूज़














